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 4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4 / सम्पूर्ण शिक्षा मनोविज्ञान

 4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4

सम्पूर्ण शिक्षा मनोविज्ञान


4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4

एक नजर में इन्हें जरुर देखें
अधिगम के सिद्धान्त
            अधिगम मलतब कि “सीखना” एक कला है, परन्तु अधिगम एक प्रक्रिया भी है। जब आप किसी काम को करने की इच्छा रखते हैं, तो आपको उससे पहले उस कार्य को सीखना पड़ता है। उस कार्य को सीखने के लिए आपको एक निश्चित कर्म से या पद्धति से गुजरना होगा, इसे ही अधिगम कहा जाता हैं। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने सीखने की कुछ सिद्धांत भी निर्धारित किए है। अतः किसी भी उद्दीपक के प्रति क्रमबद्ध प्रतिक्रिया की खोज को ही अधिगम का सिद्धांत कहते हैं।
“पावलव ने कुत्ता छोड़ा, थार्नडायिक की बिल्ली पर। 
स्किनर का चूहा मर गया, कोहलर के चिम्पैंजी पर।”
पावलव  का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त
प्रतिपादक – IP पावलव/ शरीर शास्त्री
निवासी – रूस
सिद्धान्त – 1904
नोबेल पुरुस्कार – 1904
प्रयोग  – कुत्ते पर
प्रमुख संकेत 
U.C.S.- UNCONDITIONAL SITIMULUS (स्वभाविक उददीपक अर्थात भोजन)
C.S.-  CONDITIONAL SITIMULUS (अस्वभाविक उददीपक  अर्थात  घण्टी की आवाज)
U.C.R.- UNCONDITIONAL RESPONSE (स्वभाविक अनुक्रिया अर्थात  लार)
C.R. – CONDITIONAL RESPOSE (अस्वभाविक अनुकूलित अनुक्रिया र्अथात अनुबंधित)
पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त :-   इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1904 में पावलन ने एक कुत्ते पर किये प्रयोग से किया। प्रारम्भ में पावलव ने पाया कि भूखे कुत्ते को भोजन दिखाने से उसके मुँह में लार आ जाना स्वभाविक क्रिया है।  बाद में पावलव ने कई दिनो तक कुत्ते को घण्टी बजाकर खाना दिया। (घण्टी +खाना) प्रक्रिया कई दिनो तक दोहराने से पाया कि खाना एवं घण्टी के मध्य सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है एवं लार टपकना स्वभाविक क्रिया होती है।
                 पावलव ने इसके बाद घण्टी बजाई परन्तु खाना साथ में नहीं दिया तथा देखा कि कुत्ता स्वभाविक क्रिया (लार) करता है। 
पावलव के इस प्रयोग हम निम्न 3 चरणों में समझ सकते हैं-
प्रथम चरण = अनुकूलन से पूर्व ⇒  स्वभाविक उददीपक (भोजन) U.C.S अनुबंधित उद्दीपक ⇒ स्वभाविक अनुक्रिया (लार) अनानुबंधित अनुक्रिया U.C.R.
द्वितीय चरण  = अनुकूलन के दौरान ⇒ अस्वभाविक उद्दीपक (घण्टी ) C.R. ⇒ स्वभाविक उद्दीपक (भोजन) U.C.S. अनानुबंधित उददीपक ⇒ स्वभाविक अनुक्रिया (लार) अनानुबंधित अनुक्रिया U.C.R.
तृतीय चरण = अनुकूलन के बाद ⇒ अस्वभाविक उद्दीपक (घण्टी) C.S. अनुबंधित उद्दीपक ⇒ स्वभाविक अनुक्रिया (लार) अनुबंधित व C.R. अनुकूलित अनुक्रिया
Note : अनुकूलित अनुक्रिया:- अस्वभाविक उद्दीपक के प्रति स्वभाविक अनुक्रिया होना। 
पावलव अनुक्रिया सिद्धान्त के उपनाम
➡ शरीर शास्त्री का सिद्धान्त 
➡ शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धान्त
➡ क्लासिकल सिद्धान्त / अनुबंधन
➡ अनुबंधित अनुक्रिया का सिद्धान्त 
➡ सम्बन्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त
➡ अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धान्त  
➡ अस्वभाविक अनुक्रिया का सिद्धान्त
पावलव अनुक्रिया सिद्धान्त का शैक्षिक महत्व – 
➡ भय निवारण में सहायक 
➡ सामाजीकरण में सहायक 
➡ अनुशासन विकसित करने में सहायक 
➡ गणित शिक्षण में सहायक
➡ अभिवृत्ति विकास में सहायक
➡ स्वभाव व आदत निर्माण में सहायक 
थार्नडाइक के सीखने के सिद्धान्त
प्रतिपादक – थार्नडाइक
वर्ष – 1913 ई० 
निवासी – U.S.A. (अमेरिका)
प्रयोग – बिल्ली पर (भूखी)
उद्दीपक – मांस/मछली का टुकड़ा
BOOK – Education Psychology
➡ अपने प्रयोग मे थार्नडाइक में एक भूखी बिल्ली को पिंजड़े में बन्द कर दिया और पिंजड़े के बाहर भोज्य सामग्री रख दी। बिल्ली के लिए भोजन उद्दीपक था, उद्दीपक के कारण उसमे प्रतिक्रिया आरम्भ हुई। बिल्ली ने बाहर निकलकर भोजन प्राप्त करने के लिए कई प्रयास किये, और पिंजड़े के अन्दर चारों ओर घूमकर कई पंजे मारे। प्रयत्न करते करते उसने अचानक उस तार को खींच लिया जिससे पिंजड़े का दरवाजा खुलता था। दोबारा फिर बिल्ली को बन्द करने पर उसे बाहर आने के लिए पहले से कम समय में सफलता मिल गयी। इसी प्रकार तीसरे व चौथे प्रयास में और भी कम प्रयत्नों में सफलता मिल गई। अंततः एक परिस्थिति आई जब वह एक बार में ही दरवाजा खोलकर बाहर आना सीख जाती है। इसलिए थार्नडाइक के इस सिद्धान्त को ‘प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त’ भी कहा जाता है।
NOTE-
           एक विशेष स्थिति / उद्दीपक (Stimulus) होता है, जो उसे एक प्रकार की प्रतिक्रिया / अनुक्रिया (Response) करनें के लिए प्रेरित करती हैं।
थार्नडाइक सिद्धान्त के उपनाम
➡ प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त,
➡ प्रयत्न एवं भूल का सिद्धान्त,
➡ आवृत्ति का सिद्धान्त, 
➡ उद्दीपक, अनुक्रिया का सिद्धान्त,
➡ SR BOND का सिद्धान्त, 
➡ सम्बन्ध वाद का सिद्धान्त,
➡ अधिगम का बन्ध सिद्धान्त।
इस प्रकार एक विशिष्ट उद्दीपक का एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया / अनुक्रिया से सम्बन्ध स्थापित होना SR-BOND कहलाता है। 
बिल्ली के समान ही बालक का चलना, चम्मच से खाना, जूते पहनना। 
वयस्क लोग भी ड्राईविंग, टाई की गाँठ, कोई खेल इसी सिद्धान्त के अनुसार सीखते है।
थार्नडाइक सिद्धान्त का शैक्षिक महत्व –
➡ बड़े व मन्दबुद्धि बालकों के लिए उपयोगी।
➡ धैर्य व परिश्रम के गुणों का विकास। 
➡ सफलता के प्रति आशा।
➡ कार्य की स्पष्ट धारणा।
➡ शिक्षा के प्रति रुचि।
➡ गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र आदि विषयों के लिए उपयोगी। 
➡ अनुभवों से लाभ उठाने की क्षमता का विकास।
स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त
निवासी – U.S.A.
प्रतिपादक – बी. एफ. स्किनर
वर्ष – 1938
प्रयोग – चूहा (1938 व कबूतर 1943)
⇒ यह सिद्धान्त थार्नडाइक के प्रभाव के नियम पर आधारित है।
स्किनर ने अपने आधार पर बताया कि व्यक्ति, प्राणी सीखते समय दो प्रकार के व्यवहार करता है।
(A) एक प्रकार के व्यवहार में उद्दीपक की जानकारी होती है, इसे अनुक्रियात्मक व्यवहार और ज्ञात उद्दीपक के प्रति होने वाली अनुक्रिया प्रकाशित अनुक्रिया कहलाती है।
(B) दूसरे प्रकार के व्यवहार में उद्दीपक की जानकारी नहीं होती है। इसे क्रिया प्रसूत व्यवहार और अज्ञात उद्दीपक के प्रति होने वाली अनुक्रिया निर्गमित या उत्सर्जित क्रिया कहते हैं। 
स्किनर का परीक्षण:-
स्किनर ने अधिगम से सम्बन्धित अपने सिद्धान्त के प्रयोग के लिए एक विशेष बॉक्स बनाया जिसे स्किनर बॉक्स कहा जाता है।
स्किनर ने चूहे को अपने प्रयोग का विषय बनाया। इस बॉक्स में एक लीवर था, जिसके दबते ही खट की आवाज आती थी, इस लीवर का सम्बन्ध एक प्लेट से था, जिसमें खाने का टुकड़ा आ जाता था।
          वह खाना उसकी क्रिया के लिए पुनर्बलन का कार्य करता था। इस प्रयोग में चूहा भूखा होने पर बॉक्स के लीवर को दबाता, और उसे भोजन मिल जाता था।
इसी आधार पर स्किनर ने कहा कि यदि किसी क्रिया के बाद ‘लिवर’ कोई बल प्रदान करने वाला उद्दीपक ‘भोजन’ प्राप्त हो जाता है तो उस क्रिया की शक्ति में वृद्धि हो जाती है।
स्किनर का मत:–
(i) यदि इस प्रकार अनुक्रियाओं को पुनर्बलित कर दिया। जाये तो वे बलवति हो जाती है, और व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाती है।
(ii) अनुक्रिया के लिए सदैव उद्दीपक का होना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी उद्दीपक की अनुपस्थिति में अनुक्रिया होती है। इसलिए स्किनर के बारे में कहा गया।
इन्होंने परम्परागत थ्योरी (S-R) को (R-S) थ्योरी में परिवर्तित कर दिया है।
स्किनर सिद्धान्त का शैक्षिक महत्व:-
➡ अवांछित व्यवहारों को नकारात्मक पुनर्बलन प्रदान करके रोका जा सकता है।
➡ विद्यार्थी को तत्काल पुनर्बलन देना चाहिए। 
➡ शिक्षार्थी का परिणाम शीघ्रातिशीघ्र घोषित करना चाहिए।
➡ अभिक्रमित अनुदेशन, कम्प्यूटर सहायक, शिक्षण मशीन आदि में पुनर्बलन देने के लिए इसी सिद्धान्त का प्रयोग किया जाता है।
➡ अध्यापक छात्रों के वांछित व्यवहार को प्रशंसा पुरुस्कार प्रोत्साहन व अपनी सहमति से पुनर्बलित कर दे तो ‘विद्यार्थी ऐसे व्यवहार को बार-बार करना चाहेगा।
स्किनर सिद्धान्त के उपनाम :-
➡ R-S सिद्धान्त
➡ सक्रिय अनुबंध का सिद्धान्त
➡ व्यवहारिक सिद्धान्त  
➡ नेमेन्तिक वाद का सिद्धान्त
➡ कार्यात्मक प्रतिबद्धता का सिद्धान्त
अभिक्रमित अनुदेशन
➡ एक रेखिय अभिक्रमित अनुदेशन:-
प्रतिपादक – BF स्किनर 
वर्ष – 1952
शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन:-
प्रतिपादक- नार्मन ए क्राउड
वर्ष – 1960
मैथेमेटिक्स या अवरोधी अभिक्रमित अनुदेशन:-
प्रतिपादक – थामस एफ गिलबर्ट
वर्ष – 1962
नोट : भारत में पहली बार प्रयोग इलाहबाद में सन् 1969 में किया गया।
कोहलर का अर्न्तदृष्टि या सूझ का सिद्धान्त:-
प्रतिपादक – कोहलर, मेलस वर्दीमर
प्रयोग कर्ता – कोहलर (1912)
प्रयोग – चिम्पैजी/वनमानुस/सुल्तान 
वर्ष – 1912
प्रसिद्ध 1920
सहयोगी- कोफ्का
गैस्टालवाद- जर्मन भाषा का शब्द (सम्पूर्ण से अंश की ओर)
➡ गैस्टालवादियों के अनुसार सीखना प्रयास व त्रुटि के द्वारा न होकर सूझ के द्वारा होता है।
➡ सूझ से तात्पर्य अचानक उत्पन्न होने वाले एक ऐसे विचार से है, जो किसी समस्या का समाधान कर दें।
➡ सूझ द्वारा सीखने के अन्तर्गत प्राणी परिस्थितियों का भली प्रकार से अवलोकन करता है, तत्पश्चात अपनी प्रक्रिया/प्रतिक्रिया देता है।
➡ सूझ द्वारा सीखने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है, और इस प्रकार के अधिगम में मस्तिष्क का सर्वाधिक प्रयोग होता है।
कोहर सिद्धान्त के उपनाम:-
➡ गेस्टाल का सिद्धान्त
➡ समग्रकार सिद्धान्त
➡ कोहलर का सिद्धान्त
➡ अन्तर्दृष्टि/सूझ का सिद्धान्त
जीन पियाजे का संज्ञानवादी सिद्धान्त
निवासी – स्विटजरलैण्ड
सहयोगी – बारबेल इन्हेलडर
➡ जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते हुए संज्ञानवादी विकास का प्रतिपादन किया इसलिए जीन पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
➡ विकास प्रारम्भ होता है गर्भावस्था से जबकि संज्ञान विकास शैशवावस्था से प्रारम्भ होकर जीवन पर्यन्त चलता है।
➡ जीन पियाजे में मानव संज्ञान विकास चार अवस्थाओं में समझाया है-
(i) संवेदी पेशिय अवस्था (0-2 वर्ष)
(ii) पूर्व सक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष)
(iii) मूर्त सक्रियात्मक अवस्था (7- 11 वर्ष)
(iv) औपचारिक सक्रियात्मक अवस्था (12-15 वर्ष)
(i) संवेदी पेशिय अवस्था (0-2 वर्ष) – 
➡ इसे इन्द्रिय जनित अवस्था भी कहते हैं। इस अवस्था में शिशु अपनी संवेदनाओं व शारीरिक क्रियाओं के द्वारा सीखता है।
➡ वह वस्तुओं को देखकर, सुनकर, स्पर्शकर, गन्ध तथा स्वाद के माध्यम से ज्ञान ग्रहण करता है।
➡ इस अवस्था में शिशु अपने हाथ-पैरो को चलाना व शब्दों को बोलना सीख जाता है।
(ii) पूर्व सक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष) – 
➡ इस अवस्था में शिशु दूसरों के सम्पर्क व खिलौनो तथा अनुकरण के माध्यम से सीखता है।
➡ अक्षर लिखना, गिनती गिनना, रंग की पहिचान करना, हल्का भारी बताना इत्यादि सीख जाता है।
➡ माता-पिता की आज्ञा मानना, नाम बताना, छोटे-छोटे कार्यों में भाग लेना आदि सीख जाता है।
➡ इस अवस्था में बालक तार्किक चिन्तन करने योग्य नहीं होता इसलिए इसे अतार्किक चिन्तन की अवस्था कहते हैं।
(iii) मूर्त सक्रियात्मक अवस्था (7- 11 वर्ष) – 
➡ इसे वैचारिक अवस्था चिन्तन की तैयारी का काल भी कहलाता है। 
➡ इस अवस्था में चिन्तन की शुरूआत हो जाती है, लेकिन उसका चिन्तन केवल मूर्त (प्रत्यक्ष) वस्तुओं तक ही सीमित रहता है। इसलिए इसे मूर्त चिन्तन की अवस्था भी कहते है।
➡ इस अवस्था में बालक दो वस्तुओं के मध्य अन्तर करना, तुलना करना, समानता बताना, सही-गलत में भेद करना आदि सीख जाता है।
➡ इस अवस्था मे बालक दिन, तारीख, वर्ष, महीन आदि बताने के योग्य हो जाता है।
(iv) औपचारिक सक्रियात्मक अवस्था (12-15 वर्ष)
➡ इस अवस्था में किशोर मूर्त के साथ-साथ अमूर्त चिन्तन करने के योग्य भी हो जाता है, इसलिए इसे तार्किक अवस्था भी कहते हैं।
➡ इस अवस्था में चिन्तन करना, कल्पना करना, निरीक्षण करना समस्या, समाधान करना आदि मानसिक योग्यताओं का विकास हो जाता है।
PSYCHOLOGY CAPSULE 4
जीन पियाजे का शिक्षा में योगदान-
➡ बाल केन्द्रित शिक्षा पर बल दिया। 
➡ शिक्षक के पद को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि शिक्षक को बालक की समस्या का निदान करना चाहिए। 
➡ शिक्षा हेतु बालकों को उचित वातावरण प्रदान करना चाहिए।
जी पियाजे ने बुद्धि को जीव विज्ञान की स्कीमा की भाँति बताया है।
स्कीमा- मानसिक संरचना को व्यवहार गत समानान्तर प्रक्रिया जीव विज्ञान में स्कीमा कहलाती है, अर्थात किसी उद्दीपक के प्रति विश्वसनिय अनुक्रिया को स्लीमा कहते है।
नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

8. Law of Primate City / प्रमुख नगर के नियम या प्रमुख शहर एवं श्रेणी आकार प्रणाली की संकल्पना

8. Law of Primate City

(प्रमुख नगर के नियम या प्रमुख शहर एवं श्रेणी आकार प्रणाली की संकल्पना)


           Law of Primate City

    प्राइमेट नगर की संकल्पना का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता माइक जैफरसन को जाता है। किसी भी भौगोलिक प्रदेश में मिलने वाला सबसे बड़ा नगर या प्रथम पदानुक्रम वाले नगर को ‘प्राथमिक नगर/ प्रमुख नगर/ प्राइमेट नगर’ कहते हैं।

          जैफरसन ने अपने नगरों के अध्ययन में पाया कि किसी देश का प्राइमेट सिटी उस देश के द्वितीयक पदानुक्रम वाला नगर के तुलना में दो या तीन गुणा अधिक बड़ा होता है।

         जैफरसन ने देखा कि 28 प्रमुख देशों में मिलने वाला प्राइमेट सिटी द्वितीयक नगर की तुलना में दो गुगा बड़ा था। जबकि 18 देशों में द्वितीयक नगर के तुलना में तीन गुणा बड़ा था। जैफरसन बताया कि प्राइमेट नगर अन्य नगरों की तुलना में अधिक कार्य को सम्पादित करते हैं। पुनः जैफरसन के प्राइमेट सिटी के संबंध में व्यक्त सिद्धांत में तीन तत्व प्रमुख हैं:-

(1) प्राइमेट सिटी का आकार द्वितीय नगर से अधिक बड़ा होता है।
(2) प्राइमेट सिटी किसी राष्ट्र के विकास के प्रवृति और प्रभाव का धोतक होता है।
(3) प्राइमेट सिटी एक बार जब बड़ा हो जाता है तो भविष्य में भी उसका आकार और प्रभाव में वृद्धि होते रहती है।
             
          जैफरसन महोदय ने इस नियम के सहारे 1939 ई० के नगरों के वितरण की व्याख्या काने हेतु प्रतिपादित किया। इस नियम के प्रतिपादन का सैद्धांतिक आधार यह है कि किसी भी वृहद भौगोलिक प्रदेश में वितरित नगर के बीच आकार का तुलनात्मक परीक्षण किया जाय। जैफरसन का यह सिद्धांत निम्नलिखित परिकल्पना पर आधारित है-
(1) किसी भी नगर का पदानुक्रम उस नगर में विकसित संगठन, आकार, प्रभाव और शक्ति को बताता है।
(2) नगर की शक्ति और प्रभाव नगर के आकार से सूचित होता है।
(3) विभिन्न जनसंख्या आकार नगरों के आकार में विभिन्नता को सुनिश्चित करता है। कुछ नगर में तीव्र गति से वृद्धि होने की प्रवृत्ति होती है।
             
             जैफरसन ने प्राथमिक नगरों की पहचान हेतु एक ‘प्राथमिक सूचकांक का विकास किया है। जैसे-
     
            दो नगरों का प्राथमिक सूचकांक = वृहद नगर की जनसंख्या / दूसरे बड़े नगर की जनसंख्या
                       
           जैफरसन का यह सिद्धांत अनुमानित पयर्वेक्षण पर आधारित था जिसके कारण उनके विचारों में कई विसंगतियाँ भी पायी जाती हैं और उन विसंगतियों को दूर करने के लिए कई नवीन विचार भी प्रस्तुत किये गए हैं। 1967 ई० में क्लार्क महोदय ने नगरों के वितरण की व्याख्या हेतु तथा प्राथमिक नगर के संबंध में एक अलग विचार प्रस्तुत किया।
         क्लार्क के अनुसार एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगर को ही प्राथमिक नगर कहा जाना चाहिए। क्लार्क के विचार इस संदर्भ में अल्पतंत्रीय वितरण के विचार से प्रसिद्ध है।
          क्लार्क का विचार जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील जैसे देशों में पाये जाते हैं। पुनः नगरीय वितरण को व्याख्या करने हेतु कोटि-आकार सह-संबंध नियम भी प्रस्तुत किया गया है। इस नियम के अनुसार नगरों के आकार और उसके पदानुक्रम में गहरा संबंध होता है।
         इसके अनुसार किसी आदर्श भौगोलिक परिस्थिति में निम्न पदानुक्रम के नगर एक निश्चित कोटि-आकार नियम के अनुरूप विकसित होते हैं। अगर यह विकास इस नियम के अनुरूप नहीं है तो उस प्रदेश में अस्वस्थ नगरीकरण की प्रवृत्ति है।
        कोटि आका का नियम स्पीयर्समैन के कोटि आकार सह संबंध नियम पर आधारित है। इस नियम का सहारा लेते हुए अमेरिकी भूगोलवेता जिप्स ने निम्न सूत्र विकसित किया है:-
Pr = P1 / r
जहाँ,
Pr = निश्चित कोटि के नगर की अनुमानित जनसंख्या
P1 = प्राथमिक नगर की जनसंख्या
r = निश्चित किये गये कोटि या पदानुक्रम
                     
         1949 ई० में जी. के. जिफ महोदय ने अपने सूत्र का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित सांख्यिकीय मान निर्धारित किये। जैसे 1, 0.500, 0.333, 0.250, 0.200 । जिफ के अनुसार अगर पाँच प्रथम क्रम तक कोटि आकार नियम के पालन होता है तो आगे नगरों पर अपने आप यह नियम लागू हो जाता है। लेकिन जिफ ने यह नहीं बताया कि नगरों के कितने कोटि या पदानुक्रम हो सकते हैं।
           1959 ई० में स्टीवर्ट महोदय ने विश्व के 72 देशों में कार्य करने के बाद यह बताया कि निम्न स्तर के नगर के लिए कोटि आकार नियम का पालन करना आवश्यक नहीं है जितना कि प्रथम पाँच कोटि आकार नियमों के पालन के लिए आवश्यक है। क्योंकि किसी की भौगोलिक प्रदेश में विकसित प्रथम पाँच पदानुक्रम के नगर ही द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों के प्रमुख केन्द्र होते हैं।
        स्टीवर्ट महोदय ने यह भी बताया कि विकसित देशों में कोटि आकार का नियम पूर्णतः लागू होता है लेकिन लेटिन अमेरिका में यह देखने को मिलता है कि वहाँ की अधिकत्तर जनसंख्या उसके राजधानी नगर या प्राथमिक नगर में ही केन्द्रित हैं। इसका तात्पर्य है कि वहाँ प्राथमिक नगर ही चुम्बकीय आकर्षण का कार्य करते हैं।
          लेटिन अमेरिका, USA और जिप्स के द्वारा दिया गया औसत आकार का तुलनात्मक अध्ययन नीचे के तालिका में किया जा रहा है।-       
पदानुक्रम जिप्स का मान  USA का मान ब्राजील के पदानुक्रम का मान
1 1 1 1
2 0.500 0.435 0.210
3 0.333  0.310 0.210
4 0.250  0.200 0.105
5 0.200  0.169 0.079
               
           दिये गये तालिका से स्पष्ट होता है कि ब्राजील में सभी प्रकार की जनसंख्या के लिए प्राथमिक नगर ही आकर्षण का कार्य करते हैं। हैगेट के अनुसार किसी भी नगर के कार्यों की गहनता से प्राथमिक नगरों की पहचान की जाती है।
       पुन: प्राथमिक नगर के संबंध में दिये गए कोटि आकार का निगम भारत जैसे देश में भी प्राथमिक स्तर पर लागू होता है। जैसे:- भारत को गंगा के मैदान है लिए प्राथमिक नगर अलग होगा और पूर्व तटीय मैदान के लिए अलग होगी।
 
        पीटर हैगेट ने कहा कि बड़े देशों में प्रादेशिक नगरों के कोटि- आकार का निर्धारण किया जाना चाहिए। N.B.K. रेड्डी ने गोदावरी और कृष्णा के मैदानी क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए बताया है कि यहाँ हैदराबाद जैसे विशाल नगर के बाद विजयवाड़ा जैसे छोटे नगर है जिसकी जनसंख्या 10 लाख है इसका परिणाम यह है कि प्रादेशिक स्तर पर पिछड़ेपन के कारण महानगर जनसंख्या के जमघट बन चुके हैं।
          कुछ प्रदेशों में एक ही आकार के दो नगर पाये जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्राथमिक नगरों का निर्धारण काफी मुश्किल हो जाता है। जैसे ब्राजील के द०-पूर्वी भाग में स्थित साओ पोली & रियो द जेनरियो नगर। यहाँ साओ-पोलो की जनसंख्या अधिक है जबकि कार्यिक विभिन्नता रियो द जेनरियो में अधिक मिलती है।
          वस्तुतः स्वस्थ कोटि नियम का पालन तभी संभव है जब संपूर्ण प्रदेश में वातावरणीय समरूपता पायी जाती हो साथ ही आर्थिक सामाजिक विकास की प्रक्रिया संतुलित रूप से चल ही हो। यदि ऐसा नहीं होता है तो उन प्रदेशों में प्राथमिक नगर के संबंध में प्रतिपादित नियम लागू नहीं होगा।

7. Internal Structure of Cities / नगरों की आन्तरिक संरचना

7. Internal Structure of Cities

(नगरों की आन्तरिक संरचना)


             Internal Structure of Cities
     
          नगरों की आन्तरिक संरचना का तात्पर्य नगर के आन्तरिक भागों में विकसित भौतिक तथा सांस्कृति स्वरूप से है। भूगोल यह मानता है कि नगर एक जीवित प्राणी के समान है, जो सदैव विकास तथा विस्तार की प्रवृति रखता है। इसी प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप नगरों के आन्तरिक संरचना का विकास होता है। इसी संदर्भ में कुछ भूगोलवेताओं का मानना है कि नगरों की आन्तरिक संरचना की संकल्पना एक गत्यात्मक पहलू है जो मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होती है:-
(1) भौतिक कारक
(2) मानवीय / सांस्कृतिक कारक
(3) नियोजन और प्रशासनिक पहलू
          नगरों के आन्तरिक संरचना नगर के अन्दर भूमि के उपयोग किये जाने के प्रतिरूप से है। भूगोलवेताओं ने कहा है कि नगरों का विकास केन्द्रीय स्थल पर होता है और सभी नगर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों को सम्पन्न करते हैं। लेकिन सभी नगर एक समान द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों को सम्पन्न नहीं करते हैं। ये असमानता ही नगरों के आन्तरिक संरचना में विषमता उत्पन्न करते हैं। नगरों के आन्तरिक संरचना में उत्पन्न असमानता के सैद्धांतीकरण का कार्य किया है। इसके लिए चार निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं:-
(1) सकेन्द्रीय वलय पेटी का सिद्धत (Concentric Zone Theory)- बर्गेस (1927 ई0)
(2) खण्ड सिद्धांत- हॉयट (1939 ई0)
(3) बहुनाभिक सिद्धांत- हैरिस तथा उल्मैन (1945 ई0)
(4) संयुक्त वृद्धि का सिद्धांत- गैरिसन (1962 ई0)
 
(1) सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत
         सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी समाजशास्त्री बर्गेस ने (1927 ई0) में शिकागो नगर का अध्ययन करने के बाद प्रस्तुत किया था। उन्होंने अपने सिद्धांत में कहा था कि नगरों की आन्तरिक संरचना सकेन्द्रीय वलय पेटी के समान होते हैं, जिसे नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।
 
INDEX
1 = केन्द्रीय बाजार क्षेत्र Central Business District (CBD) – केंद्रीय व्यापार जिला
2 = संक्रमण पेटी – अधिवास & व्यापार का कार्य साथ-साथ
3 = श्रमिकों के अधिवासीय क्षेत्र पेटी
4 = मध्यम एवं उच्च आय वर्ग के अधिवासीच पेटी
5 = अभिगमन के क्षेत्र
               
           बर्गेस ने दिये गये मॉडल के अनुसार ही नगरों के आन्तरिक संरचना विकसित होने की संभावना विकसित की है। उन्होंने प्रत्येक पेटी की विशेषता निम्नलिखित प्रकार से बताया है।
(1) CBD (Central Business District)⇒
          इसे केन्द्रीय बाजार या केन्द्रीय व्यापार जिला से सम्बोधित करते है। CBD शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मरफी महोदय ने किया था। GBD वह क्षेत्र है जो नगर के केन्द्र में होता है। जमीन और मकान का किराया अधिक होता है। भूमि के चप्पे-चप्पे प्रयोग व्पायार के रूप में किया जाता है। मकानें बहुमंजिले होते हैं। दिन में भीड़-भाड़ू लेकिन रात में शुन्य -शान का क्षेत्र होता है। रात में स्ट्रीट लाईट चौकीदार कुछ विश्विप्त लोग (पागल) और नगर निगम की सफाई की गाड़ियाँ दिखाई देती हैं। इस क्षेत्र को शिकागो में Loop, न्यूयॉर्क में Up and down Town तथा पीटरसबर्ग में ‘गोल्डेन टेम्पल’ के नाम से जानते हैं।
(2) संक्रमण पेटी⇒ 
              यह पेटी CBD के चारों ओर विकसित होता है। यह वह क्षेत्र है जहाँ पर व्यापार एवं अधिवास का कार्य साथ-साथ किया जाता है। अनियोजन इसकी एक सामान्य विशेषता है।
(3) श्रमिक या निम्न आय वर्ग की पेटी⇒ 
         यह तीसरी पेटी है जो संक्रमण पेटी के चारों ओर विकसित होती है। श्रमिक वर्ग के लोग तीसरी पेटी में निवास करते हैं क्योंकि यहाँ पर एक ओर अधिवासीय खर्च कम पड़ता है और दूसरी तरफ केन्द्रीय बस्ती तक पहुँचने में भाड़ा और समय कम लगता है।
(4) मध्यम और उच्च आय वर्ग की पेटी⇒ 
              इसका विकास चौथी पेटी के रूप में होता है क्योंकि यहाँ पर बसाव के लिए अधिक भूमि उपलब्ध होता है स्वच्छ और खुला वातावरण होता है। इनके पास परिवहन क्षमता अधिक होता है। इसलिए वे सार्वजनिक और निजी परिवहन का सफलतापूर्वक उपयोग कर लेते हैं।
(5) अभिगमन की पेटी⇒ 
           यह पाँचवाँ और अंतिम पेटी है। यहाँ दैनिक अभिगमन करने वाले लोग रहते हैं। कहीं-2 पर उच्च श्रेणी के रिहायसी मकान दिखाई देते हैं। सर्वत्र निर्माण का कार्य दिखाई देता है। बीच-बीच में दुग्ध व्यवसाय या सब्जी व्यवसाय का व्यापार करने वाले लोग दिखाई देते है।
           
       बर्गेस महोदय ने बताया है कि अगर नगरों का तेजी से बिस्तार हो रहा हो तो चार अन्य पेटियाँ भी मिल सकती है। पुन: 5वाँ पेटी (अभिगमन की पेटी), 9वाँ पेटी में चला जाता है। चार सांभावित पेटी को शामिल कर लिये जाने के बाद क्रमश: निम्नलिखित 9 पेटियों का विकास होता है:-
(1) CBD
(2) संक्रमण पेटी
(3) श्रमिकों की पेटी
(4) मध्यम और उच्च वर्ग की पेटी
(5) भारी उद्योग की पेटी
(6) अधिवासीय पेटी
(7) सीमान्त बाजार
(8) औद्योगिक उपनगरीय क्षेत्र
(9) अभिगमन की पेटी
                  उपरोक्त 9वीं पेटियों का विकास शिकागो नगर के अन्दर हुआ है।
आलोचना
(1) बर्गेस ने जिस ज्यामितीय नियम के आधार पर संकेन्द्रीय वलय पेटी के विकास की संभवना व्यक्त किया है वह संभव नहीं है क्योंकि नगर के अन्दर से गुजरने वाला सड़‌क नदी, पुल इत्यादि नगर की आन्तरिक संरचना को प्रभावित कर देते हैं।
(2) नगरों की आन्तरिक संरचना पर भौतिक कारकों का भी प्रभाव पड़ता है जिसकी चर्चा बर्गेस ने नहीं किया है।
(3) एक ही नगर को आधार मानकर पूरे विश्व के नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन किसी भी दृष्टिकोण में औचित्य दिखाई नहीं पड़ता।
(4) विकासशील देशों के CBD में अधिवास का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है, पुनः पूर्वी यूरोप के नगर के केन्द्र सांस्कृतिक जमघट के केन्द्र होते हैं।
(5) इस सिद्धांत के सबसे बड़े आलोचक हॉयट महोदय हुए जिन्होंने बताया कि नगरों की आन्तरिक संरचना का विकास सकेन्द्रीय पेटी के रूप में न होकर खण्डीय होता है।
(6) डिक्सन महोदय में पेरिस का अध्ययन करते हुए बताया कि उसकी संरचना संकेन्द्रीय नहीं हैं बल्कि तारा द्वारा प्रतिरूप में हुआ है।
निष्कर्ष-
       उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद यह सिद्धांत नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन एवं सैद्धान्तीकरण करने का प्रथम प्रयास था जिसकी सराहना मुक्त्त रूप से सभी भूगोलवेताओं ने किया है।
 
2. खण्ड सिद्धान्त (Sector Theory):
               
             इसका प्रतिपादित अमेरिकी समाजशास्त्री होयट महोदय द्वारा 1939 ई. में किया गया था। इसका अध्ययन 142 अमेरिकी नगरों पर आधारित था।
मान्यताएँ : 
     
      होयट का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि-
(i) नगरों की संरचनात्मक फैलाव में केन्द्रीय बाजार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(ii) सभी कार्यों की प्रकृति होती है कि वे केन्द्रीय बाजार तक सहज पहुँच रखते हो। अतः केन्द्रीय बाजार से निकलने वाले मुख्य पथ के किनारे विभिन्न प्रकार के कार्यों का फैलाव होने लगता है।
(iii) नगर के मध्य वाणिज्य तथा व्यापार के कार्य होते है और यह वृत्ताकार प्रवृत्ति में होता है।
(iv) नगरों का विकास एक वृत्त के रूप में होता है जिसके आन्तरिक भाग संकेन्द्रीय पेटी के रूप में नहीं बल्कि कई खण्डों में विकसित होते है।
               
         होयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड देखने को मिलते हैं।
1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र
2. थोक पैमाने पर हल्के विनिर्माण उद्योग
3. निम्न श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
4. मध्यम श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
5. उच्च श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
               
             होयट के अनुसार सड़क मार्ग के किनारे उच्च आय वर्ग की बस्ती होता है। इसके किनारे मध्यम आय वर्ग की बस्ती विकसित होती है और दो मध्यम आय वर्ग के बीच एक उच्च आय वर्ग की खण्ड विकसित होती है। होयट के अनुसार उच्च आय वर्ग के बस्ती का विकास निम्नलिखित तीन प्रवृत्तियों के अनुसार होती है:-
(i) नगर लम्बवत् रूप (Vertical Expansion) से बढ़ सकता है। एक परिवार वाले मकान एक से अधिक परिवार वाले मकानों में परिवर्तित हो जाते हैं।
(ii) मकान खाली पड़े प्लाटों पर भी बनने लगते हैं। इस प्रकार बस्तियों के बीच में खाली हुआ भाग मकानों से घिर जाता है।
(iii) जब नगर पर जनसंख्या का दबाव पड़ता है तब मकान नगरीय सीमा को धक्का देकर बाहर की ओर बढ़ जाते हैं। इस प्रकार का विस्तार अपकेन्द्रीय विस्तार कहलाता है। अपकेन्द्रीय विस्तार के भी तीन रूप होते हैं-
(a) ध्रुवीय विकास
(b) एकाकी बस्तियां और
(c) एकाकी बस्तियों का मिलाप।
          होयट महोदय ने हल्के उद्योगों की स्थापना करें। पुन: होयट कहा है कि सभी पेटियों का बाहर फैलाव भी होता है। अर्थात् जनसंख्या जैसे-जैसे बढ़ेगी पेटी भी बाहर की ओर फैलता जाएगा। इतना ही नहीं नवीन खण्डों का भी निर्माण होता है। जैसे- यदि किसी नगर में बृहद् उद्योग की स्थापना होगी तो उसके लिए एक खण्ड विकसित होंगे जो दूसरे या तीस खण्ड के ऊपर होगी। चौथे खण्ड के ऊपर अधिवासीय उपनगर विकसित होगा जिसमें मध्य व उच्च वर्ग के लोग होंगे। पांचवे खण्ड के ऊपर अधिवासित खण्ड, स्वास्थ्य, शिक्षा खण्ड विकसित होंगे।
आलोचनाएँ
(i) यह सिद्धांत महानगरों के लिए उपयोगी नहीं हैं बल्कि छोटे एवं मध्यम आकार के औद्योगिक नगरों पर लागु होता है।
(ii) वर्तमान नगर नियोजन में उच्चवर्गीय अधिवासीय क्षेत्र को उच्च वर्ग से दूर रखा जाता है।
(iii) इस सिद्धान्त के विश्लेषण से स्पष्ट है कि नगर का मुख्य कार्य अधिवास है जबकि ऐसा नहीं है।
               
            जहाँ तक भारत का प्रश्न है भारतीय नगरों में पूर्णरूपेण खण्डीय विकास की प्रवृत्ति नहीं है लेकिन औपनिवेशिक काल में कुछ नगरों में खण्डीय प्रवृत्ति भी ऐसा इसलिए कि वे लोग भारतीयों के साथ मिश्रित नहीं होना चाहते थे। वाराणसी में खण्डीय प्रवृत्ति विकसित हुई थी। इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान में इस सिद्धांत की उपयोगिता नहीं के बराबर है।
 
3. बहुनाभिक सिद्धान्त (Muittiple Nuclei Theory) :
             
            इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1945 ई. में हैरिस तथा उल्मैन महोदय ने किया है। ये दोनों भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने भौगोलिक सन्दर्भ में नगरों के आन्तरिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इसके निर्धारण में नगर के अधिवासीय कार्यों के अलावे उसके आर्थिक कार्य और परिवहन मार्गों के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। बहुनाभिक सिद्धांत के अनुसार, किसी नगर का विकास केवल एक ही केन्द्र पर नहीं बल्कि कई केन्द्रों पर होता है।
मान्यताएँ :
         
        हैरिस तथा उल्मैन द्वारा विकसित मॉडल निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-
(1) यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि नगर के प्रत्येक कार्यों का विकास निजी स्थानीय गुणां के कारण निकसित होती है। वह दूसरे पर आधारित नहीं होता है। चूंकि प्रत्येक कार्य के अपने आगे बढ़ने की शक्ति होती है, इसलिए प्रत्येक कार्य एक नाभिक केन्द्र का निर्माण करता है और इसी आधार पर उसे बहुनाभिक सिद्धांत कहा गया है।
(2) कुछ नगरीय क्षेत्रों का विकास विशिष्ट सुविधाओं के आधार पर होता है। जैसे- भारी उद्योग का विकास रेल परिवहन सुविधा के कारण होता है।
(3) कई कार्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अत: उसका विकास एक-दुसरे के अगल-बगल में होता है। जैसे-अधिकांश वाणिज्यिक बैंक,का विकास CBD में होता है।
(4) कई नगरीय कार्य एक दूसरे के कार्य से विलगाव रखते है अर्थात् एक-दूसरे के अगल-बगल विकसित नहीं होते। जैसे- उच्च आय वर्ग की बस्ती और औद्योगिक बस्ती, उच्च आय वर्गीय बस्ती और गन्दी बस्ती अगल-बगल में विकसित नहीं होते हैं।
(5) कुछ ऐसे भी कार्य होते है जो अधिक आर्थिक लगान नहीं दे सकते है: अतः उनका विकास नगर के बाह्य क्षेत्रों में कम किराए के मकान पर होता है। जैसे – विश्वविद्यालय, हॉस्पीटल, प्रशासनिक।
       
            उपरोक्त मान्यताओं के आधार पर निम्न मानचित्र दिया गया है-
1. केन्द्रीय व्यापारिक केन्द्र
2. थोक पैमाने पर हल्के निर्माण उद्योग
3. निम्न श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
4. मध्यम श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
5. उच्च श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
6. भारी निर्माण उद्योग
7. भारी व्यापारिक पेटी
8. रिहाइशी उपनगर
9. औद्योगिक उपनगर
10. अभिगमनकर्ताओं की पेटी
आलोचनाएँ:
(i) यह सिद्धान्त सिर्फ महानगरों पर ही लागू होता है, छोटे नगरों के लिए उपयोगी नहीं है।
(ii) यह सिद्धान फैलाव के नियमों पर आधारित नहीं है। बल्कि वस्तुस्थिति का अधिक विश्लेषण करता है।
नोट: रिहाइशी = आवास
(iii) यह मूलतः पश्चिमी देशों के लिए उपयोगी है।
(iv) सिद्धान्त सभी प्रकार के कार्यों के मध्य नाभीय चरित्र की अपेक्षा रखता है जो यथार्थ में सभी क्षेत्र में संभव नहीं है।
(v) भारत जैसे देशों में बहुनाभिक सिद्धांत में वृद्धि की प्रवृत्ति तो है फिर भी यहां सकेन्द्रीय वलय प्रवृत्ति अधिक सशक्त है। नियोजित दिल्ली तथा स्वतंत्रता के बाद विकसित कलकत्ता में बहुनाभिक प्रवृति देखने को मिलता है।
(vi) हैरिस तथा उल्मेन ने यह भी बताया कि नगरीय कार्यिक केन्द्रों में परिवर्तन भी होता है। जैसे –
(1) पुराने उपांत अधिवासीय क्षेत्र का परिवर्तन उपनगरीय बस्ती में होता है।
(2) पुराने औद्योगिक बस्ती का परिवर्तन निम्न आय वर्ग औद्योगिक श्रमिकों के अधिवास क्षेत्र में हो जाता है।
(3) पुराने कम आय वर्ग के क्षेत्र या तो गंदी बस्ती में बदल जाते हैं या हल्के उद्योग वाले क्षेत्र हो जाते हैं।
4. संयुक्त वृद्धि सिद्धान्त (Fused Growth Theory):
           इसका प्रतिपादन अमेरिकी भूगोलवेत्ता गैरिसन में 1962 ई. में कलकत्ता महानगर के सन्दर्भ में किया। गैरिसन के अनुसार ‘विकासशील देशों के महानगरों की तुलना में विकसित देशों की संरचनात्मक प्रवृत्ति भिन्न होती है। विकासशील देशों में प्रारम्भिक नगरीय विकास संकेन्द्रीय था, औपनिवेशिक युग में यह खण्डीय हो गया तथा 1900 के बाद अर्थात् नगरीय विस्फोट के बाद बहुनाभिक हो गया है।
मान्यताएँ :
     गैरिसन का मत है कि नगरों के विकास में संकेन्द्रीय वलय प्रतिरूप खण्ड प्रतिरूप और बहुनाभिक प्रतिरूप तीनों एक दूसरे से नितान्त पृथक नहीं होते हैं बल्कि प्रत्येक मॉडल में शेष दो मंडलों का रूप भी कुछ-न-कुछ अंशों में देखने को मिलता है। इस प्रकार कोई भी एक नगर तीनों प्रकार का मिश्रित प्रतिरूप रखता है तथा उसमें उद्योगों और रिहाइशी केन्द्रों के पृथक-पृथक सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी खण्ड स्थापित हो जाते हैं।
आलोचना:-
(1) यह सिद्धान्त पूर्व के तीन सिद्धान्तों की उपयोगिता को लागू करते हैं।
(2) इसका संरचनात्मक स्वरूप जनसंख्या दबाव का परिणाम है। इससे स्पष्ट है कि अगर ये दबाव न होते तो इस प्रकार की संरचना का निकास नहीं हो।
(3) यह सिद्धांत नगर के अनियोजित चरित्र को स्पष्ट करता है। इसमें विकास की वैज्ञानिकता का अभाव है।
(4) यह छोटे नगरों की संरचना को स्पष्ट नहीं करता है फिर भी विकासशील देशों के महानगरों की आन्तरिक संरचना की अत्यंत ही उपयोगी व्याख्या करता जवत (करांची आदि शहरों के लिए अत्यंत ही उपयोगी व्याख्या करता है।
निष्कर्ष:- 

        ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कोई भी सिद्धांत पूर्णरूप से मान्यता नहीं रखता है। प्रत्येक सिद्धांतो की कुछ सीमाएं हैं तथा प्रत्येक सिद्धांत कुछ विशेष परिस्थितियों में ही उपयोगी प्रतीत होता है। वस्तुतः सभी सिद्धान्तों के अनुरूप उदाहरण मिलते है। यही कारण है कि नगरों की आन्तरिक संरचना के लिए कोई भी सर्वमान्य सिद्धान्त विकसित नहीं जा सकता है फिर भी विकसित देशों के नियोजित नगरों पर प्रथम दो सिद्धांत बहुत हद तक लागू होते है। विकसित देशों के महानगरों प तीसरे सिद्धांत की भी उपयोगिता है जबकि विकासशील देशों के महानगरों में चौथे सिद्धांत की उपयोगिता प्रतीत होती है।


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6. Internal Structure of Indian Cities / भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना

6. Internal Structure of Indian Cities 

(भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना)


प्रश्न प्रारूप

Q.भारत के प्राचीन, मध्ययुगीन तथा ब्रिटिश नगरों से विशिष्ट उदाहरण देते हुए उसके आंतरिक संरचना के विकास का परीक्षण कीजिए। 

Q. भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना से आप क्या समझते है?

Q. नगरों की आन्तरिक संरचना से आप क्या समझते है? Internal Structure of Indian Cities

        नगरों की आंतरिक संरचना का तात्पर्य नगर की उस व्यवस्था से है जिसमें नगरों की विन्यास प्रणाली और नगरों के कार्यिक प्रारूप का अध्ययन किया जाता है। किसी भी नगर का विकास किसी न किसी केन्द्रीय(चौराहा) स्थल पर होता है तथा नगरों के आन्तरिक संरचना की एक निश्चित प्रवृत्ति होती है। इन्हीं प्रवृतियों को कई भूगोलवेताओं ने सैद्धांतीकरण करने का प्रयास किया है। इनमें बर्गेस, हायड, उल्मान, हेरीस तथा गैरीसन जैसे भूगोलवेताओं का नाम उल्लेखनीय है। इन भूगोलवेताओं ने भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर विकसित देशों के नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर सैद्धांतीकरण करने का प्रयास किया था।

भारतीय नगरों के आंतरिक संरचना को प्रभावित करने वाले कारक

      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर निम्नलिखित कारकों का व्यापक प्रभाव पड़ा है।

(1) धार्मिक कार्य-

       धार्मिक कार्यों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- वाराणसी, गया, मथुरा, मदुरई इत्यादि। धार्मिक स्थल से प्रत्येक लोग जुड़े रहना चाहते हैं। इसलिए ऐसे नगरों में संकरी और अनियोजित सड़क प्रणाली विकास हुआ है। भारत के अधिकांश प्राचीनकालीन नगर इसी प्रकार के उदा० प्रस्तुत करते हैं।

(2) धर्म तथा प्रशासन-

      मध्यकाल में नगरों की आंतरिक संरचना पर धर्म एवं प्रशासन दोनों का प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- फतेरपुर सिकरी, आगरा का किला, दिल्ली का लाल किला, जौनपुर, विजयनगर, इत्यादि नगरों पर प्रशासनिक प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

(3) औपनिवेशिक संस्कृति-
      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर औपनिवेशिक संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। औपनिवेशिक काल मे नियोजित एवं अनियोजित दोनों प्रकार के नगरों का विकास हुआ।इस काल में प्रत्येक अनियोजित नगर के पास नियोजित नजर देखने को मिलती है। अंग्रेजों ने अनियोजित नगर के पास ब्रिटिश अधिकारियों को रहने हेतु, सैनिक छावनी एवं प्रशासनिक कार्य हेतु नियोजित नगरों का विकास किया।

(4) ग्रामीण-नगरीय स्थानान्तरण- 

         भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर ग्रामीण नगरीण जनसंख्या स्थानान्तरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसके चलते नगरों में जनसंख्या विस्फोट हुआ है जिसके चलते गंदी बस्ती का विकास तेजी से हो रहा है।

(5) राजनीतिक व प्रशासनिक निर्णय-

     भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर राजनैतिक एवं प्रशासनिक निर्णय का भी प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- स्वतंत्रता के बाद नगरों के विकास के लिए “मास्टर प्लान बनाये गये। इसके लागू होने के कारण ही नगरों के बाहरी क्षेत्रों में नियोजित संरचना दिखाई देती है।

(6) सामाजिक एवं सांस्कृकृतिक कारक- 

      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों का भी प्रभाव देखा जाता है। इन कारकों के कारण सामाजिक विलगाव पर आधारित अधिवासीय क्षेत्र देखने को मिलता है। जैसे- उत्तर भारत के प्रत्येक नगर में बंगालियों का एक अलग मुहल्ला मिलता है।

(7) द्वितीयक व तृतीयक आर्थिक गतिविधियाँ-

      भारतीय नगरों पर द्वितीय एवं तृतीयक आर्थिक गतिविधियों का भी स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। आजादी के बाद भारत में तेजी से हो रहे औद्योगिक विकास के कारण औद्योगिक नगरों का विकास  हुआ है। जैसे- बोकारो, गांधीनगर, ईटानगर, भुवनेश्वर, राउरकेला, दिसपुर इत्यादि।

(8) ग्रामीण संस्कृति का प्रभाव- 

       भारतीय नगरों का विकास प्राय: ग्रामीण क्षेत्रों के लिए हुआ है और ग्रामीण क्षेत्र नगरों का सेवा किया करते है। ग्रामीण लोग नगरों में आकर ग्रामीण परिवेश के आधार पर ही आन्तरिक संरचना विकसित करते हैं।

भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना की विशेषता

      उपरोक्त कारकों के प्रभाव से भारतीय नगरों में निम्नलिखित विशेषताएं दिखाई देती है:-

(1) विकसित देशों में प्रत्येक नगर के मध्य CBD (Central Business District) दिखाई देता है और यह क्षेत्र अट्टालिकाओं का क्षेत्र होता है। यहाँ वाणिज्य, व्यापार थोक मूल्य, खुदरा मूल्य पर आधारित दुकानें होती हैं। रात में CBD खाली हो जाता है। यद्यपि भारत में CBD का विकास हुआ है। तथापि यह अट्टालिकाओं का क्षेत्र नहीं होता है तथा निचले तल्ले पर व्यापार और ऊपरी मंजिल पर अधिवास के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

(2) विकसित देशों के नगर में नगर के केन्द्र से ज्यों-2 बाहर की ओर निकलते हैं त्यों-2 मकानों की ऊँचाई में कमी आते जाती है। लेकिन भारतीय नगरों में ऐसी कोई प्रकृति नहीं पायी जाती है।

(3) भारतीय नगरों में अधिवासीय क्षेत्र सामान्यत: मिश्रित रूप में पायी जाती है। अर्थात यहाँ सभी आय वर्ग के लोग साथ-2 अधिवासित होते हैं। 

(5) यहाँ के नगरों में अधिक आयु वाले मकान देखने को मिलते  और उनमें भी मकान निम्न स्तरीय होता।

(6) भारतीय नगरों में सघन जनसंख्या देखने को मिलती है।

(7) भारतीय नगरों में कार्यों की विशिष्टता के आधार पर नगरीय बस्तियाँ कम ही दिखाई देती है।

भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना का भूगोलवेताओ द्वारा अध्ययन

        भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना का कई भूगोलवेताओं ने अध्ययन किया है जिनमें तीन का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है:-

(1) गैरीसन का अध्ययन

(2) अशोकदत्ता का अध्ययन 

(3) डॉ. कुसुमलता का अध्ययन

(1) गैरीसन का अध्ययन 

        गैरीसन एक अमेरिकी भूगोलवेता थे जिन्होंने 1962ई० में कोलकाता नगर के आन्तरिक संरचना का अध्ययन किया और उन्होंने “संयुक्त वृद्धि का सिद्धांत” प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया कि एक ही नगर में सकेन्द्रीय वलय पेटी या संकेन्द्रीय वलय प्रतिरूप, खण्डीय प्रतिरूप देखने को मिलता है। गैरीसन ने कहा कि वैसा नगर जिसका विकास लम्बी अवधि से हो रहा हो वहाँ तीनों प्रकार के प्रतिरूप मिलते हैं। उन्हेंने कहा कि कोलकाता महानगर में सबसे पहले सकेंद्रीय पेटियों का विकास हुआ और अंत में बहुनाभिक पेटी का विकास हुआ।

      गैरीसन ने बताया कोलकाता में 1887ई० तक सकेन्द्रीय विकास की प्रवृति थी। 1887ई०-1947ई० के बीच सकेन्द्रीय वलय पेटी और खण्डीय प्रतिरूप के विकास की प्रवृति थी और स्वतंत्रता के बाद बहुनाभिक विकास की प्रवृति है।

      गैरीसन के अध्ययन को आधार मानते हुए कानपुर, वाराणसी, बंगलौर एवं नगरीय जनसंख्या विस्फोट वाले नगरों का जब अध्ययन किया गया तो पाया गया कि उपरोक्त सभी नगरों का विकास गैरीसन के सिद्धांत के अनुरूप हुआ है। लेकिन गैरीसन का मॉडल भारत के छोटे नगरों पर लागू नहीं होता है, इसलिए अन्य अध्ययन आवश्यक था।

(2) अशोकदता का अध्ययन

          A.K. एक्रोन विश्वविद्यालय, USA में प्रो० थे। उन्होंने भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर 1974ई० में शोध-पत्र प्रस्तुत किया। उनके अनुसार भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना का निम्नलिखित प्रतिरूप दिखाई देता है।

(1) कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई जैसे ब्रिटिशकालीन महानगरों में पश्चिमी देशों के समान ही नगर के केन्द्र में CBD का विकास हुआ है। लेकिन साथ-2 अधिवासीय क्षेत्र का भी विकास हुआ है।

(2) भारत में ब्रिटिशकाल के पूर्व जितने भी नगर विकसित हुए हैं वे सभी अनियोजित प्रकार के हैं।

(3) भारतीय नगरों में अधिवासीय क्षेत्र विलगाव पर आधारित है। भारतीय नगरों में यह विलगाव भाषा, जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर देखा जा सकता है।

(3) डॉ. कुसुमलता का अध्ययन 

           डॉ. कुसुमलता ने 1968ई० में ही भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का तीन प्रतिरूप देखने को मिलता है।

(i) अनियोजित प्रतिरूप

(ii) अनियोजित सह नियोजित प्रतिरूप

(iii) नियोजित प्रतिरूप

(i) अनियोजित प्रतिरूप वाले नगर-

        डॉ० कुसुमलता के अनुसार संरचनात्मक विकास के आधार पर अनियोजित नगर दो प्रकार के हैं। प्रथम प्रकार में वैसे नगरों को शामिल करते हैं, जो अति प्राचीन है लेकिन, वर्तमान समय में विकसित होकर बहुत बड़े हो चुके हैं। जैसे- वाराणसी नगर इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यहाँ पर नगर का विकास मंदिर के चारों ओर सबसे पहले अनियोजित तरीके से हुआ और आज भी उसका विकास अनियोजित क्रम में जारी है।

          भारत में दूसरे प्रकार के अनियोजित नगर वह है जो हाल के वर्षों में जनसंख्या विस्फोट और कार्यिक संरचना में आये परिवर्तन से हुआ है। उपरोक्त दोनों प्रकार के अनियोजित नगर के केन्द्र में सघन जनसंख्या देखी जा सकती है और वहाँ मिश्रित कार्यों की प्रवृति होती है।

(ii) अनियोजित सह नियोजित नगर-

        इस प्रतिरूप का विकास औपनिवेशिक काल में हुआ जैसे-पुरानी नगरीय बस्ती पहले से ही अनियोजित बस्ती थी। लेकिन उसके सटे ब्रिटिश प्रशासकों ने नियोजित बस्ती का विकास किया। ऐसे बस्ती आयताकार विन्यास प्रणाली पर आधारित थीं। ऐसे नियोजित नगरों में सिविल लाइन, सैनिक छावनी  तथा प्रशासनिक क्षेत्र का विकास किया गया। पुराने नगरों के नजदीक नियोजित नगर बसाने का प्रमुख कारण अनुकूल बसाव स्थान था। उदा०-(पटना और दानापुर, राँची और बामकुम्प, कैट, दिल्ली और दिल्ली कैंट, आगरा और आगरा कैंट आदि।   

(iii) नियोजित प्रतिरूप-

      भारत में पूर्ण नियोजित नगर का अभाव है। फिर भी कई ऐसे नगर हैं जिनका विकास नियोजित तरीक से किया जाता है। जैसे – जमशेदपुर, चण्डीगढ़, गाँधी नगर, भुवनेश्वर, ईटानगर, येहलांका, बंगलोर, दिसपुर इत्यादि।

       चण्डीगढ़ आयताकार विन्यासप्रणाली पर आधारित एक नियोजित नगर है जिसके केन्द्र में सेक्टर-17 है जिसमें CBD विकास हुआ है। अधिवासीय क्षेत्रों का विकास आय के आधार पर किया गया है। आजादी के पूर्व ब्रिटिश काल में मकड़े जाली प्रतिरूप पर नई दिल्ली को नियोजित नगर के रूप में विकसित किया गया था। जिसके केन्द्र में कनॉट पैलेस है। ब्रिटिश काल के पूर्व जयपुर को राजा जयसिंह ने नियोजित नगर के रूप में विकसित किया था।

  निष्कर्ष:- 

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भात में अनियोजित, नियोजित तथा अनियोजित सह नियोजित आन्तरिक संरचना नगरों में देखी जाती है।


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5. Hierarchy of Urban Settlements / नगरीय बस्तियों का पदानुक्रम

 5. Hierarchy of Urban Settlements

(नगरीय बस्तियों का पदानुक्रम)



          Hierarchy of Urban Settlements

          नगरीय बस्तियों का विकास केन्द्रीय स्थल से प्रारंभ होता है। लेकिन सभी भौगोलिक प्रदेश में विकसित होने वाले केन्द्रीय बस्ती या स्थल समान रूप से केन्द्रीयता नहीं रखता है। अत: केन्द्रीय स्थलों की कार्य और जनसंख्या आकार में भिन्नता होती है। इन्हीं विभिन्नताओं के आधार पर कई भूगोलवेताओ ने नगरों के पदानुक्रम को निर्धारित करने का प्रयास किया है। कार्य के दृष्टिकोण से नगरीय पदानुक्रम के निर्धारण का कार्य 1933 ई० में क्रिस्टॉलर महोदय ने किया था। उन्होंने षष्टकोणीय मॉडल के आधार पर नगरों का सात पदानुक्रम निर्धारित किया था। उन्होंने एक ही पदानुक्रम के दो नगरों के बीच की समान दूरी भी निर्धारित किया था। जैसे:-

पदानुक्रम   नाम दूरी (km)
1. कस्बा बाजार 7
2. शहर  12
3. काउन्टी केन्द्र  21
4. जिला नगर  36
5. राज्यों की राजधानी  62
6. प्रान्तीय नगर 108
7. प्रादेशिक राजधानी नगर 186

          क्रिस्टॉलर ने प्रथम पदानुक्रम में सबसे छोटे नगर को शामिल किया और अंतिम पदानुक्रम में सबसे बड़े नगर को रखा है। बाद में लॉश, फिलब्रिक, बेरी, गैरीसन जैसे- भूगोलवेत्ताओं ने क्रिस्टॉलर के विधितंत्र की आलोचना की लेकिन नगरों को पदानुक्रमिक विकास पर सहमति जताया।

        पेरॉक्स & बोडोविले ने प्रादेशिक नियोजन के अन्तर्गत कार्यों के आधार पर केन्द्रीय स्थल की विकसित होने की चार पदानुक्रम निर्धारित किये हैं-

(1) विकास ध्रुव

(2) विकास केन्द्र

(3) विकास बिन्दु 

(4) सेवा केन्द्र

          बोडोबिले के अनुसार विकास ध्रुव वह नगर है जहाँ पर सर्वाधिक सेवा कार्य किये जाते हैं। जबकि सेवा केन्द्र वैसा नगर है जहाँ पर सबसे कम सेवा का कार्य होता है।

     विभिन्न देशों के जनगणना विभाग भी नगरों के पदानुक्रम का निर्धारण करने का प्रयास करती है। ब्रिटिश औपनिवेशिक देशों में जनसंख्या के आधार पर नगरों का 6 पदानुक्रम निर्धारित किया गया है-

पदमुक्रम जनसंख्या
1. 1 लाख या उससे अधिक
2. 50,000 – 99,999
3. 20000 – 49 999
4. 10000 – 19999 
5. 5000 – 9999
6. 5000 से कम 

         एक लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर को सामान्य तौर पर महानगर कहा जाता है। लेकिन वर्तमान समय में 10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या रखने वाले नगर महानगर और 50 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर को मेगा सिटी कहा जाता है। 

           कई भूगोलवेताओं ने सांख्यिकी विधि के द्वारा कोटि आकार नियम विकसित किया है। इस संदर्भ में जेफर्सन, जिप्स, स्टीवर्ट, रेड्डी इत्यादि का कार्य विशेष महत्व है।

         अधिकतर विद्वानों ने बताया है कि नगर की आकार और उसके कोटि (पदानुक्रम) के बीच व्युत्क्रमानुपाती संबंध पाया जाता है। जिप्स ने नगरों का कोटि-आकार का संबंध स्थापित करने के लिए कुछ सांख्यिकीय मान निर्धारित की। जैसे-

            1, 0.5, 0.333, 0.250 तथा 0.200 उपयुक्त सांख्यिकी मान जिन नगरों के कोटि-आकार पर लागू होता है, वहाँ पर इससे ज्ञात होता है कि स्वस्थ्य नगरीय पदानुक्रम का विकास हो रहा है।

       कई भारतीय भूगोलवेताओं ने भी नगरीय पदानुक्रम को निर्धारित करने का प्रयास किया है। जैसे- 1955 ई० में राम लोचन सिंह बनारस प्रदेश के नगरीय पदानुक्रम का निर्धारण किया। उन्होंने बताया कि यहाँ पर नगरों का विकास चार पदानुक्रम में हुआ है।

(1) नगर

(2) उपनगर

(3) बड़ा कस्बा 

(4) छोटा कस्बा

            राम लोचन सिंह के द्वारा निर्धारित पदानुक्रम कार्यों के आधार पर किया गया था। पुन: 1951 ई० की जनगणना को मानते हुए 1969 ई० में डॉ० काशीनाथ सिंह ने मध्य गंगा के मैदानी भाग के नगरों का पदानुक्रम निर्धारित किया। उन्होंने मध्य गंगा के मैदानों के नगरों को 6 पदानुक्रम विभाजित किया है :-

(1) प्रादेशिक राजधानी नगर

(2) प्रादेशिक नगर

(3) मध्य आकार के नगर

(4) स्थानीय नगर

(5) ग्रामीण सह नगरीय केन्द्र-

(6) ग्रामीण बाजार

          प्रो० R. P. मिश्रा ने नियोजन कार्यों के संबंध में बोडोविले का सहारा लेते हुए नगरों का पाँच पदानुक्रम निर्धारित किया  इसी तरह कोटि-आकार नियम का सहारा लेते हुए N.B. रेड्‌डी आन्ध्रप्रदेश के, S.R. पाटिल कर्नाटक के, ओम प्रकाश सिंह उत्तर प्रदेश के नगरों का पदानुक्रम निर्धारित किया भारत के जनगणना विभाग काशीनाथ सिंह के द्वारा निर्धारित 6 पदानुक्रम को मान्यता प्रदान करती है।

       नगरीय बस्तियों का पदानुक्रमिक अध्ययन प्रदेशिक नियोजन के संदर्भ में अति आवश्यक है। इस अध्ययन से उन नगरों की पहचान की जा सकती है जो कार्य और जनसंख्या के दबाव में है। अत: ऐसे नगरों में प्रादेशिक संसाधन और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अनुकूल पदानुक्रम विकसित कने का प्रयास किया जा सकता है।


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4. Environmental Issues in Rural Settlements (ग्रामीण बस्तियों में पर्यावरणीय मुद्दे) 

4. Environmental Issues in Rural Settlements 

(ग्रामीण बस्तियों में पर्यावरणीय मुद्दे)



                Environmental Issues

         वह भौगोलिक स्थान जहाँ मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है, उस स्थान को बस्ती कहते हैं। सार्वभौमिक परिभाषा अनुसार जिस अधिवासीय बस्ती की 2/3 जनसंख्या प्राथमिक कार्य में संलग्न हो, उस अधिवासीय बस्ती को ग्रामीण बस्ती कहते हैं। किसी भी प्रकार के बस्ती के विकास पर भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि भौतिक पर्यावरण ही ग्रामीण बस्ती के प्रकार, प्रतिरूप तथा उसके आन्तरिक संरचना एवं अन्य विशेषताओं को प्रभावित करती हैं। लेकिन बदलते पर्यावरण के कारण आज की ग्रामीण-बस्तियाँ भी किसी भी प्रकार के बदलाव से अछूते नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में नगरों के भाँति ही अनेक प्रकार के पर्यावरणीय समस्याओं को देखा जा सकता है। जैसे:- 

(1) भूमिगत जलस्तर का ह्रास

            ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल एवं सिंचाई का सबसे बड़ा जलस्रोत भूमिगत जल रहा है। आज हरित क्रांति, सघन कृषि इत्यादि के कारण भूमिगत जलस्रोत का दोहन किसानों के द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिसका परिणाम है कि भूमिगत जलस्तर का ह्रास हो रहा है। मरुस्थलीय क्षेत्र एवं पठारी क्षेत्र के ग्रामीण बस्तियों में यह समस्या अति गंभीर रूप धारण कर चुका है।

         ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर के ह्रास में कमी का प्रमुख कारण भूमिगत जल का रिचार्ज करने वाले जलस्रोत का समाप्त हो जाना है। इसके अलावे वनों के तीव्र कटाव के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है। वनीय कटाव के कारण वर्षा में अनियमितता उत्पन्न होता है अर्थात कभी अतिवृद्धि तो कभी अनावृष्टि की समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पन्न होती है। अनावृष्टि के दौरान जल का अभाव  हो जाता है, वहीं अतिवृष्टि के दौरान सभी जलस्रोत प्रदूषित हो जाते हैं जिसके कारण पेयजल की गंभीर समस्या उत्पन्न होती है।

(2) मृदा लवणीकरण की समस्या- 

          ग्रामीण क्षेत्रों में सतही सिंचाई के कारण मिट्टी के B स्तर के लवण जल के साथ घुलकर मिट्टी के ऊपरी भाग में आने की प्रवृति रखते हैं, जिसके कारण मृदा लवणीकरण की गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। विश्व के शुष्क एवं उपार्द्र क्षेत्रों में यह एक गंभीर समस्या उभरकर सामने आयी है।

(3) प्रदूषण की समस्या- 

           प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं। जैसे – वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, और आण्विक प्रदूषण इत्यादि। ग्रामीण लोग आज भी अधिकांश ऊर्जा की जरूरत जीवाश्म ऊर्जा से प्राप्त करते हैं जिससे बड़े पैमाने पर धुआं और प्रदूषक पदार्थ वलुमण्डल में मिलते रहते है, जिसके कारण वायु का प्रदूषण तेजी से हो रहा है।

         ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल जैसे नवीन परिवहन साधन के आगमन से ग्रामीण वायु भी स्वच्छ नहीं रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में घूँआ से युक्त प्रदूषित वायु को शीत ऋतु में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वर्षा ऋतु में ग्रामीण बस्तियाँ नरक का रूप धारण कर लेती है क्योंकि ग्रामीण लोग घर से निकलने वाले कचड़े को घर के पास ही जमा रखते हैं।

         शौच इत्यादि के लिए शौचालय का प्रयोग न कर खुले स्थानों का प्रयोग करते है। मृत जानवरों को गाँव के खुले स्थानों पर ही फेंक आते हैं। ग्रामीण गलियाँ एवं सड़‌क कच्चे होने के कारण और उसमें जानवरों के मल-मूत्र मिल जाने के कारण दुर्गन्ध उत्पन्न होने लगती है। उपरोक्त कारणों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में वायु एवं जल दोनों के प्रदूषित होते हुए देखा जा सकता है।

(4) ध्वनि प्रदूषण- 

         आधुनिक ग्रामीण बस्तियाँ भी सूचना क्रांति के दौर से पीछे नहीं है। रात-दिन सिंचाई के लिए चलने वाले फिटर, थ्रेसर मशीन, क्रेसर मशीन, सुबह-शाम मंदिरों के ऊपर बजने वाले लाउड्सपीकर, मस्जिदों के ऊपर लगे लाउड्सपीकर, ग्रामीण क्षेत्र का सांस्कृतिक वातावरण के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण होता रहता है। 

(5) नाभिकीय प्रदूषण-

          आधुनिक युग  में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने हेतु नाभिकीय ऊर्जा पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है, जिन-2 स्थानों पर नाभिकीय संयंत्र स्थापित है उन संयंत्रों के पास स्थित ग्रामीण बस्तियों में नाभिकीय प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(6) जल प्रदूषण- 

           ग्रामीण बस्तियाँ जल के लिए मुख रूप से दो श्रोतों पर निर्भर करती है। पहला भूमिगत जलस्रोत दूसरा सतही जलस्रोत।  भूमिगत जल स्रोत की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। यहाँ सतही जलस्रोत की चर्चा की जा रही है।

           पोखर, तालाब, नदी, झील, बड़े-2 प्राकृतिक और कृत्रिम रूप से निर्मित गर्त में जमा पानी सतही जलस्रोत का कार्य करती है। खेतों में रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों का प्रयोग, जल स्रोत के पास मल त्याग का प्रयास, जलस्रोत में ही स्नान करने के दौरान डिटर्जेन्ट का प्रयोग, पशुओं को जलाशय में ले जाकर स्नान कराना इत्यादि आम बात है। इसके चलते सतही जलस्रोत प्रदूषित हो चुके हैं। ऐसे प्रदूषित जल ग्रामीण क्षेत्रों में जल जनित बीमारी, महामारी इत्यादि को जन्म देते हैं। 

(7) वन हाल की समस्या-

          ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन, विभिन्न प्रकार के कृषि कार्य, गृह निर्माण एवं अन्य कार्यों में बड़े पैमाने पर वृक्ष की आवश्यकता पड़ती है। इस आवश्यकता की पूर्ति करने हेतु ग्रामीण लोग अपने गाँव के इर्द-गिर्द उपस्थित वृक्ष को काट‌कर तात्कालिक रूप से प्रयोग में लाने का कार्य करते हैं। वृक्ष को पर्यावरण “लंगस्” कहा जाता है। इतना ही नहीं बल्कि वनस्पति जलवायु का निर्धारक होता है। आज वनीय हास के कारण जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापन इत्यादि की समस्या उत्पन्न हो रही है। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में ओजोन क्षरण के प्रभाव को वनस्पति एवं पशुओं के ऊपर देखा जा सकता है। समय-2 पर अम्ल वर्षा, बादल फटना, अत्याधिक तड़ित झंझा का गिरना इत्यादि पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।

निष्कर्ष

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि आज ग्रामीण क्षेत्र के पर्यावरण भी अछूते नहीं रहे हैं जिसका परिणाम यह हो रहा है, कि आज विश्व की ग्रामीण बस्तियाँ न केवल परम्परागत समस्याओं को झेल रही है बल्कि उन्हें आधुनिक पर्यावरणीय समस्याओं से भी झेलना पड़‌ रहा है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि समय रहते संपोषणीय ग्रामीण विकास की योजनाओं का निर्माण कर ग्रामीण क्षेत्रों में लागू किया जाए औ ग्रामीण वातावरण को सुरक्षित खा जाय।


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3. Type of Rural Settlement (ग्रामीण बस्ती के प्रकार)

3.  ग्रामीण बस्ती के प्रकार

(Type of Rural Settlement)



Type of Rural Settlement

बस्ती (Settlement)

     पृथ्वी के धरातल का वह स्थान जहाँ पर मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है, उस स्थान को बस्ती कहते हैं। 

      बस्ती दो प्रकार के होते हैं:-

(1) नगरीय बस्ती (Urban settlement) और

(2) ग्रामीण बस्ती (Rural settlement)

              ग्रामीण बस्ती वह है जहाँ की अधिकांश जनसंख्या प्राथमिक आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। जहाँ की जनसंख्या का आकार छोटी होती है तथा जनसंख्या में घनत्व कम होता है। विश्व की लगभग 50% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं। वहीं भारत की लगभग 69% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं।   

भौगोलिक कारक:-

            ग्रामीण बस्तियों की उत्पत्ति एवं विकास को प्रभावित करने वाले कारक: 

(A) प्राकृतिक कारक (Natural factors):

(i) जलवायु (Climate)

(ii) उच्चावच (Relief)

(iii) जल की उपलब्ध (Availability of water)

(iv) मिट्टियां (Soils)

(v) सूर्य प्रकाश (Sunlight)

(Vi) वनस्पति (Vegetation)

(B) आर्थिक एवं सामाजिक कारक (Economic and social factors):-

(i) आर्थिक व्यवसाय (Economic Business)

(ii) कृषि व्यवस्था (Agricultural system)

(iii) फसल प्रतिरूप (Cropping pattern)

(iv) परिवहन व्यवस्था (Transportation)

(v) सुरक्षा (Security)

(C) ऐतिहासिक एवं राजनितिक कारक (Historical and political factors):-

(i) जाति व्यवस्था (Caste system)

(ii) जनसंख्या (Population)

(iii) सामाजिक एवं रूढ़ियाँ (Social and conventions)। 

ग्रामीण बस्तियों के प्रकार (Types of rural settlements)

     ग्रामीण बस्तियों का प्रकार किसी बस्ती में मकानों की संख्या एवं मकानों के बीच की पारस्परिक दूरी के आधार पर निश्चित किया जाता है। मोटे तौर पर ग्रामीण बस्तियाँ दो प्रकार की होती हैं, जो निम्नवत है :-

(1) गुच्छित ग्रामीण बस्ती/सघन ग्रामीण बस्ती (Compact Settlement) 

(2) प्रकीर्ण ग्रामीण बस्ती/बिखरी बस्तियाँ (scattered settlements)

(1) गुच्छित ग्रामीण बस्ती/सघन ग्रामीण बस्ती (Compact Settlement)

        अमेरिकी भूगोलवेत्ता प्रेसी ने गुच्छित ग्रामीण बस्ती को “Compact Anglomeration” से सम्बोधित किया है। वैसी ग्रामीण बस्ती जिसमें अधिवासीय मकान एक-दूसरे से बिल्कुल सटे-2 हो, वैसी ग्रामीण बस्ती को ही गुच्छित ग्रामीण बस्ती कहते हैं। गुच्छित ग्रामीण बस्ती की मुख्य विशेषता निम्नलिखित है –

(i) मकानों के बीच की दूरी बहुत कम होती है। 

(ii) कम स्थान पर अधिक से अधिक लोग निवास करते हैं।

(iii) सड़‌क एवं गलियाँ पूर्णरूपेण विकसित नहीं होती है। 

(iv) ऐसी बस्तियाँ प्रायः (मानसूनी जलवायु क्षेत्रों) में पायी जाती है। 

गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के विकास के कारण

(Reasons for the development of clustered rural settlements)                 

        गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के विकास के पीछे निम्नलिखित कारण सक्रिय होते हैं-  

(i) बाढ़ के मैदान में अधिवास करने योग्य भूमि का अभाव होता है। इसलिए उन क्षेत्रों में मिलने वाला प्राकृतिक बाँध तथा ऊँचे-2 स्थानों पर गुच्छित बस्तियाँ विकसित हो जाती है।

नोट:-  सघन बस्ती (Compact Settlement) को संकेन्द्रित (Concentrated), पुंजित (Clustered), नाभिकीय (Nucleated) एवं एकत्रित/ गुच्छित (Agglomerated) बस्तियों के नाम से भी जाना जाता है।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रों में गुच्छित बस्तियों का विकास होता है क्योंकि सभी घर के लोग जल स्रोतों से जुड़े हुए रहना चाहते हैं।

(iii) पर्वतीय कटकों के सहारे भी गुच्छित बस्तियां विकसित होती है। जैसे- नागा जनजाति के लोग जानवरों एवं कुकी जनजातियों की भय से पहाड़ों की चोटियों पर निवास करते हैं। चोटियों पर कम भूमि उपलब्ध होने के कारण बस्तियाँ गुच्छित हो जाती है।

(iv) बाढ़ के मैदान में उपजाऊ एवं उर्वर भूमि का महत्त्व अधिक होता है। किसान चप्पे-2 भूमि का प्रयोग कर उसका सदुपयोग करना चाहता है, जिसके कारण अधिवास जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए भूमि कम बच जाती है। फलतः गुच्छित बस्तियों का विकास हो जाता है। 

(v) मानसूनी प्रदेशों में और बाढ़ वाले क्षेत्रों में श्रम प्रधान चावल की खेती की जाती है। अत: श्रम की पूर्ति बनाये रखने के लिए गुच्छित ग्रामीण बस्तियों का विकास होता है।

(vi) एक सांस्कृतिक विशेषता रखने वाले लोगों के बीच विशेष भावनात्मक लगाव होता है। अतः एक ही धर्म, भाषा, जाति, प्रजाति के लोग गुच्छित अधिवास करने की प्रवृति रखते हैं। आज भी भारत गाँवों में जातीय टोले मिलते हैं।

(vii) लुटेरों की भय, सामाजिक तनाव, जंगली जानवरों का आक्रमण इत्यादि कुछ ऐसे अन्य कारण है जो गुच्छित ग्रामीण बस्ती के विकास को प्रेरित करती हैं। 

 गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के लाभ और हानियाँ

(Advantages and Disadvantages of Clustered Rural Settlements)

         गुच्छित बस्तियों के कुछ लाभ और कुछ हानियाँ दोनों हैं। जैसे:-

गुच्छि बस्ती के लाभ (Benefits of cluster settlement)

(i) सामुदायिक भावना का विकास होता है। 

(ii) लोग सुख-दुःख में एक-दूसरे के सहभागी बनते हैं। 

(iii) श्रम आधारित सघन कृषि का विकास होता है।

गुच्छित बस्ती के हानि (Disadvantages of clustered settlement)

(i) गुच्छित बस्तियों में किसी भी व्यक्ति का जीवन निजी नहीं रह जाता है। जब निजी जीवन प्रभावित होता है तब संपूर्ण ग्रामीण बस्ती में अशान्ति का वातावरण उत्पन्न हो जाता है।

(ii) गुच्छित बस्तियों में अधिवासीय जमीन का अभाव होता है जिसके कारण भूमि की माँग बढ़ जाती है जिससे लोग दूसरे की जमीन हड़पने लगते हैं। फलतः ग्रामीण लोग कानूनी जटिलताओं में फँसकर अपना जीवन व्यर्थ गवाँ देते हैं।

 नोट :- गुच्छित = पूँजित = सघन

(iii) गुच्छित बस्तियाँ आलसी लोगों की बस्तियाँ कहलाती है। आलस्यपन का कारण मकानों का नजदीक होना है। इससे लोगों के कार्मिक क्षमता में कमी आती है।

गुच्छित ग्रामीण बस्ती के प्रकार (Types of clustered rural settlement)

        गुच्छित बस्तियाँ पाँच प्रकार के होती हैं-

(a) मानसूनी गुच्छित बस्ती (Monsoon clustered settlement):-

       यह मानसूनी जलवायु प्रदेश में बाढ़ के मैदानों में दिखाई देती है। ब्रह्मपुत्र का मैदान, निचली गंगा का मैदान, संपूर्ण बांग्लादेश, पूर्वी चीन के मैदान, ईरावदी का मैदान, मेकांग का मैदान, नील नदी के डेल्टा पर गुच्छित बस्तियाँ दिखाई देती हैं।

(b) लगभग गुच्छित बस्ती (Almost clustered settlements):-

      ऐसी बस्तियाँ वैसे मानसूनी क्षेत्रों से विकसित होती है जहाँ पर बाढ़ की समस्या नहीं है। ये वैसी बस्तियाँ है जहाँ एक से अधिक गुच्छित बस्ती एक ही भौगोलिक क्षेत्र में विकसित होते हैं। ऐसे बस्तियों में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन बस्ती पुराना है और कौन बस्ती नवीन है तथा किस बस्ती के प्रति आकर्षण सर्वाधिक है?

         ऐसी बस्ती उत्तर-पश्चिम भारत, सिन्धु के मैदान, उत्तरी चीन & नील नदी के ऊपरी भाग में ये बस्तियाँ मिलती हैं।

(c) रेखीय गुच्छित बस्ती (Linear clustered settlement):-

     रेखीय गुच्छित बस्तियों का विकास राजमार्गो, नहरों, प्राकृतिक बाँधों के ऊपर होता है क्योंकि ग्रामीण बस्ती के प्रत्येक लोग राजमार्गों और नहरों की सुविधा समान रूप से लेना चाहते हैं। इन्दिरा गांधी नहर, सरहिन्द नहर, पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र और उत्तरी चीन में नहरों के ऊपर विकसित गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं। बाढ़ वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक बाँध के ऊपर विकसित गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं जबकि भारत के तटीय मैदानी क्षेत्रों में राजमार्गो के किनारे गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं।

(d) गुच्छित सह पुरवा बस्ती (Clustered cum hamlet settlement):-

      वैसी बस्ती जिसमें एक केन्द्रीय बस्ती सर्वाधिक अनुकूलन वाले स्थान पर विकसित होती है और उसके ईर्द-गिर्द छोटी बस्तियों का विकास हो जाता है। छोटी बस्ती को ही पुरवा बस्ती कहते हैं। छोटी ब‌स्तियाँ और केन्द्रीय बस्ती एक-दूसरे से सांस्कृतिक कार्यों के लिए जुड़े हुए होते हैं। मानसूनी भारत में पुरवा बस्ती श्रमिकों की बस्ती होती है।

नोट- पुरवा = छोटी बस्ती या श्रमिकों की बस्ती

(e) गुच्छित सह पुरवा सह बिखरी बस्ती (Clustered cum hamlet cum scattered settlement):-

      ऐसी बस्तियाँ मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई देती है। पहला शोषण मूलक कृषि अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में, जैसे – बिहार, बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बांग्लादेश, इत्यादि में। दूसरा वैसे क्षेत्रों में जहाँ कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूलित वातावरण सर्वत्र रूप से मौजूद है। 

(2) प्रकीर्ण ग्रामीण बस्ती/बिखरी बस्तियाँ (Scattered rural settlement/scattered settlements)

       प्रकीर्ण बस्ती को बिखरी हुई बस्ती भी कहते हैं, क्योंकि इसमें अधिवासीय मकान एक-दूसरे से दूर-2 बने होते हैं। 

प्रकीर्ण बस्तियों के विकास के कारण (Reasons for the development of scattered settlements)

       प्रकीर्ण बस्तियों के विकास के निम्नलिखित कारण हैं।

(i) अधिवास की सुविधा सर्वत्र एक समान मौजूद होना। जैसे:- प० यूरोप

(ii) पर्याप्त समतल भूमि उपलब्ध न होना। 

(iii) समाज में किसी भी प्रकार का भय, आतंक या तनाव का अभाव होना।

(iv) कभी-2 गाँवों में कुछ विशेष लोगों को रहने की इजाजद न किया जाना।

(v) नवीन आर्थिक गतिविधियों का विकास होना। 

 प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के लाभ और हानियाँ (Advantages and Disadvantages of Scattered Rural Settlements)

प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के लाभ (Advantages of scattered rural settlements)-

         प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के निम्नलिखित लाभ है- 

(i) प्रत्येक व्यक्ति का निजी जीवन सुरक्षित रहता है।

(ii) आर्थिक क्षमता अधिक होने के कारण ऐसे बस्ती के लोग अधिक सम्पन्न होते हैं।

प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के हानि (Disadvantages of scattered rural settlements)-

      प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों का कुछ नाकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है। जैसे –

⇒ लोग एकाकी जीवन जीते-2 एकाकी हो जाते हैं।

⇒ लोग एक-दूसरे के सुख-दु:ख में सहभागी नहीं बन पाते हैं।

⇒ आकस्मिक संकट आ जाने पर लोगों की स्थिति दयनीय हो जाती है।

⇒ लोगों को सभी प्रकार के कार्य स्वयं करने पड़ते हैं।

प्रकीर्ण बस्तियों के प्रकार (Types of Scattered settlements)

           प्रकीर्ण बस्तियाँ भी पाँच प्रकार के होती हैं-

(i) एकाकी प्रकीर्ण बस्ती (Isolated scattered settlement):- 

       इसमें एक स्थान पर एक ही मकान स्थित होता है। यह विकसित देशों के गाँवों की विशेषता है। न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, USA, यूरोप में ऐसी बस्तियाँ मिलती हैं। उतर-पश्चिम भारत में भी ऐसी बस्ती विकास की प्रक्रिया से गुजर रही है।

(ii) बिखरी प्रकीर्ण बस्ती (Dispersed scattered settlement):- इसमें एक स्थान पर‌ एक से अधिक मकान होते हैं लेकिन एक-दूसरे से काफी दूर होते हैं। पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्रों में इस प्रकार के बस्तियों का उदाहरण मिलता है। उ०-पूर्वी भारत के जनजातीय बस्तियाँ, मध्य अफ्रीका, मोजाम्बिक, आमेजन प्रदेश, केरल के पर्वतीय क्षेत्र, राजस्थान के द०-पूर्वी पठारी क्षेत्रों में बिखरी प्रकीर्ण बस्तियाँ दिखाई देती है।

(iii) पुरवा प्रकीर्ण बस्ती (Purva scattered settlement):-

     वैसे प्रकीर्ण बस्ती जिसमें कई मकान एक स्थान पर होते हैं लेकिन मकानों के बीच की दूरी अधिक होती है। इसमें बस्ती का कुल आकार छोटा होता है। ऐसी बस्तियों का विकास पठारी क्षेत्रों में प्रकीर्ण वस्ती वहाँ पर होता है जहाँ पर पेयजल और कृषि की संभनाएँ मौजूद है। ढक्कन का पठार, मेघालय के पठार पर ऐसी बस्ती मिलती है।

(iv) रेखीय प्रकीर्ण बस्ती (Linear scattered Settlement):-

     रेखीय प्रकीर्ण बस्ती में अधिवासीय मकान एक ही रेखा में दूर-2 पर अवस्थित होते हैं। ऐसी बस्ती प्राकृतिक बांध, राजमार्ग, नहर, वनीय सड़क के किनारे पायी जाती है। इसका उदा० उन सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है जहाँ पर उपरोक्त भौगोलिक कारक मौजूद है।

(v) सीढ़ीनुमा प्रकीर्ण बस्ती (Terraced Scattered Settlement):-

     ऐसी बस्तियाँ पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीनुमा स्थलाकृति के सहारे विकसित होती है। अरुणाचल प्रदेश या हिमालय के ढालों पर, आल्पस एवं किलीमंजारो पर्वत के ढालों पर इस तरह के अनेक बस्ति‌याँ मिलती है। 

निष्कर्ष-

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण बस्तियों के प्रकार पूर्णत: भौगोलिक कारकों पर निर्भर करता है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. ग्रामीण बस्तियाँ कितने प्रकार की होती हैं। भारत के संदर्भ में उन बस्तियों की विशेषता और वितरण प्रारूप की चर्चा करें।

Q. ग्रामीण बस्तियाँ नगरीय बस्तियों से किस प्रका भिन्न है? ग्रामीण बस्तियों के प्रकार तथा प्रतिरूप की विशेषता भारत के सन्दर्भ में विशेष रूप से करें।



3. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 3  / सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान

3. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 3 

सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान


PSYCHOLOGY CAPSULE 3

एक नजर में इन्हें जरुर देखें-

अधिगम (सीखना): 

                        अधिगम शिक्षा मनोविज्ञान का ही मुख्य घटक है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। क्योंकि शिक्षा का सर्वप्रथम उद्देश्य ही सीखना है। हम सभी जानते है कि मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखना ही है। घर, स्कूल एवं अपने आस-पास के वातावरण से मनुष्य कुछ न कुछ निरंतर सीखता ही रहता है और अपना सर्वांगीण विकास करता है। 

             उदाहरण के लिए छोटे बालक के सामने जलता हुआ दीपक ले जाने पर वह दीपक की लौ को पकड़ने का प्रयास करता है। इस प्रयास में उसका हाथ जलने लगता है। वह हाथ को पीछे खींच लेता है। पुनः जब कभी उसके सामने जलता हुआ दीपक लाया जाता है तो वह अपने पूर्व अनुभव के आधार पर लौ पकड़ने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता है बल्कि  वह उससे दूर हो जाता है। इसी विचार को स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करना कहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अनुभव के आधार पर बालक के स्वाभाविक व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। अधिगम का सर्वोत्तम सोपान अभिप्रेरणा है।

सीखने की भूमिका 

                          सीखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, व्यक्ति जन्म से ही सीखना प्रारम्भ कर देता है और मृत्यु पर्यन्त सीखता रहता है।

अधिगम का प्रत्यय 

                          अधिगम से अभिप्राय अनुभवों के द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया से है।

सीखना किसी क्रिया/स्थिति के प्रति – सक्रिय प्रतिक्रिया /अनुक्रिया

अधिगम सम्बन्धित परिभाषाये:-

 स्किनर:- ” सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।”

वुडवर्थ:- “नवीन ‘ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।”

गेट्स :- “सीखना अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन है।”

क्रो एण्ड क्रो :- ‘सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।”

अधिगम की विशेषताऐं:-

अधिगम जीवन-पर्यन्त चलता है।

अधिगम उद्देश्य पूर्ण है। 

अधियम व्यवहार में परिवर्तन लाता है।

अधिगम विकास है।

अधिगम अनुकूलन है। 

अधिगम सार्वभौमिक है।

अधिगम विवेकपूर्ण है।

अधिगम निरन्तर है। 

अधिगम खोज एवं परिवर्तन है।

अधिगम सक्रिय प्रक्रिया है।

अधिगम व्यक्तिगत व सामाजिक होता है। 

अधिगम एक नया कार्य है।

अधिगम अनुभवों का संगठन है। 

अधिगम वातावरण की उपज है।

अधिगम समायोजन है।

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक व दशाएँ

➡वातावरण

प्रेरणा 

परिपक्वता 

बालकों का स्वास्थ्य

सीखने की इच्छा 

शिक्षण प्रक्रिया

विषय सामग्री का स्वरूप

सीखने की विधि 

सम्पूर्ण परिस्थिति

सीखने का समय व थकान 

अधिगम के सिद्धान्त:-

रायबर्न के अनुसार – “यदि शिक्षण विधियों में नियमों व सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाता है, तो सीखने का कार्य अधिक संतोषजनक होता है। “

थार्नडाइक के अधिगम सम्बन्धी नियम –

                                            थार्नडाइक ने कुल 8 नियम दिये जिसमें तीन प्रमुख व पाँच गौण या सहायक नियम दिये।

थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी तीन प्रमुख नियम:

1. तत्परता का नियम:-यदि हम किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहे तो काम तत्काल तथा आसानी से हो जायेगा।” उदाहरण – घोड़े को पानी के तालाब तक ले जाया तो जा सकता है, लेकिन पीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि घोड़ा पानी पीने के लिए तत्पर नहीं है।

2. अभ्यास का नियम:- ” इसे प्रयोग/अनुप्रयोग का नियम भी कहते हैं, ज्ञान को स्थायी करने के लिए अभ्यास करना अति आवश्यक है।”

किसी कवि ने कहा है –

                    “करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर होत निशान”

उपयोग का नियम:- ‘यदि कोई कार्य पहले किया गया है और अब उसको दुबारा किया जाता है तो वह हमारे मस्तिष्क में पुनः आ जाता है और ज्ञान स्थायी हो जाता है।’

अनुप्रयोग का नियम:- “यदि किसी किये हुए कार्य को पुनः नहीं करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसे भुला देता है।”‘

3. प्रभाव संतोष असंतोष अथवा परिमाण का नियम :-

                    “यदि किसी कार्य को करने पर हमे संतोष प्राप्त होता है, वो हम उस कार्य को दुबारा करेंगे और यदि कार्य को करने पर हमे असंतोष होता है तो हम उस कार्य को दुबारा नहीं करेंगें।”

थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी पाँच गौण या सहायक नियम

1. बहुप्रतिक्रिया का नियम:- कोई नया कार्य करने के लिए कई प्रकार की प्रतिक्रियाओं को अपनाया जाता है तथा उसमें से सही प्रतिक्रिया का पता लगाकर भविष्य में काम किया जाता है।  (ज्ञात से अज्ञात की ओर)

2. मनोवृत्ति का नियम:- किसी कार्य को जिस मनोवृत्ति से (मन/मेहनत) में करेंगे हमे वैसी ही सफलता मिलेगी।

3. आंशिक क्रिया का नियम:- जब किसी कार्य को छोटे-छोटे भागों में बांटकर किया जाता है तो उस कार्य में सफलता प्राप्ति सुगम व सरल हो जाती है। (अंश से पूर्ण की और)

4. आत्मीकरण का नियम :- कोई नया कार्य करने पर उसमें किसी पुराने किये गये कार्य का ज्ञान मिला देना आत्मीकरण प्रक्रिया अधिगम से उसका स्थायी अंग बना लिया जाता है। (ज्ञात से अज्ञात की ओर)

5. साहचर्य परिवर्तन का नियम:- इस नियम में किसी कार्य को पूर्ण करने की क्रिया विधि तो पूर्ववत रखी जाती है, लेकिन परिस्थितियों में परिवर्तन क दिया जाता है। उदाहरण :- पावलब का कुत्ता 

PSYCHOLOGY CAPSULE 3 

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

2. Pattern of rural settlements (ग्रामीण बस्तियों का प्रतिरूप)

2. Pattern of rural settlements

(ग्रामीण बस्तियों का प्रतिरूप)



              Pattern of rural settlements

       ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप का तात्पर्य गाँवों के बसाव की आकृति से है अर्थात एक गाँव को अगर बाहर से देखा जाय तो मानव के स्मृति पटल पर किस प्रकार की आकृति उभरकर सामने आती है। इसी ग्रामीण बस्ती के बाह्य आकृति का अध्ययन ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप कहलाता है। ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप पर दो भौगोलिक कारकों  का प्रभाव पड़ता है।:-

(1) भौतिक कारक और

(ii) सांस्कृतिक कारक।

     भौतिक कारक के अन्तर्गत कुंआ, तालाब, पोखर, (कच्चा मिट्टी) टीले, भूमि का ढाल, सीढ़ीनुमा, ढाल की आकृति, भूमिगत जलस्तर, दलदली भूमि इत्यादि प्रमुख हैं। 

    जबकि सांस्कृतिक कारक के अन्तर्गत ऐतिहासिक घटना क्रम, सड़क एवं गलियों का नियोजित एवं अनियोजित प्रारूप, खेतों का प्रतिरूप, ग्रामीण धार्मिक संस्थाएँ, जातीय संरचना इत्यादि को शामिल करते है। 

       ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव से गुजरने वाली सड़के एवं गलियाँ ग्रामीण बस्तियों के आतंरिक विन्यास के ढाँचे को सुनिश्चित करते है। भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक प्रकार के प्रतिरूप का विकास हुआ है जिनमें मुख्य निम्नवत है।:- 

(1) रेखीय प्रतिरूप⇒

     इसे रिबन प्रतिरूप या लम्बाकार प्रतिरूप या डोरी प्रतिरूप भी कहा जाता है। जब ग्रामीण बस्तियाँ किसी सड़‌क या नहर या पर्वतीय कटक या बाढ़ वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक बाँधों के सहारे विकसित होती हैं तो उसे रेखीय प्रतिरूप कहा जाता है।

      उदा०- उत्तरी-पूर्वी भारत में नागा जनजाति के लोग पर्वतीय कटक के सहारे घर बनाते हैं। प्रायद्वीपीय भारत में पूर्वी तटीय मैदान के सहारे रेखीय प्रतिरूप का घर मिलता है। निम्न गंगा के मैदानी क्षेत्र में, चीन के मैदानी क्षेत्रों में, पश्चिम एशिया में नहरों के सहारे रेखीय प्रतिरूप बस्तियाँ मिलते हैं। 

(2) L- प्रतिरूप⇒

     जब कोई मुख्य सड़क आगे बढ़‌कर अचानक समकोण पर मुड़ जाती है तथा उसके किनारे जब ग्रामीण अधिवासों का विकास हो जाता है तो वैसे प्रतिरूपों को है L- प्रतिरूप कहा जाता है। जैसे- पटना का दनियावां गाँव, मुजफ्फरपुर का नवगढ़ी गाँव इसका सर्वोत्तम उदहारण है।

(3) T- प्रतिरूप-

       जब किसी मुख्य सड़‌क मार्ग पर किसी सहायक सड़‌क का मिलन होता है तो उस पर विकसित ग्रामीण अधिवास T प्रतिरूप का कहलाता है। इसका उदा० नदी घाटी क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलती है।

       उदा० पटना का बख्तियारपुर, हजारीबाग का बरही।

(4) वर्गाकार और आयताकार प्रतिरूप:-

       ये दोनों प्रतिरूप एक-दूसरे के पूरक है। जब किसी ग्रामीण बस्ती का विकास नियोजित तरीके से किया जाता है तो वहाँ सड़‌कें एवं गलियाँ समकोण पर विभाजित करती है। अगर ग्रामीण बस्तियाँ बसकर एक वर्ग के रूप में उभरकर सामने आती हैं तो उसे वर्गाकार प्रतिरूप कहते है और जब आयत के रूप में सामने उभरकर आती हैं तो उसे आयताकार प्रतिरूप कहते है।

     वर्गाकार प्रतिरूप का उदा०- भागलपुर का माफला गाँव, सारण का कात्सा सांथी गाँव।

      आयताकार प्रतिरूप का उदा०- शाहाबाद का ऐरे गॉंव, भागलपुर का घोघली गाँव, सारण का सारथा गाँव।

(5) चौकोर प्रतिरूप:-

   वैसे ग्रामीण बस्ती जिसके बाहर में चाहार दीवारियाँ होती हैं और मध्य भाग में खुली आयताकार भूमि छोड़ दी जाती है। ऐसे प्रतिरूप को चौकोर प्रतिरूप कहते हैं। जैसे- पश्चिम राजस्थान में विकसित होने वाले मरूस्थलीय गाँव इसके उदा० है।

(6) चौकपट्टी प्रतिरूप:-

      इसकी तुलना शतरंज  के गोट से की जा सकती है। जब ग्रामीण क्षेत्रों में समान महत्व वाले गली या सड़‌क सम‌कोण पर कटती हैं उसके बाद बस्तियों का विकास हो जाता है तो वैसे प्रतिरूप को चौकपट्टी प्रतिरूप कहते है। गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र में, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश में चौकपट्टी प्रतिरूप की बस्तियाँ दिखाई देती हैं।

(7) दोहरा प्रतिरूप:-

     नदी पर पुल या फेरी के दोनों तरफ इन बस्तियों का विस्तार होता है।

(8) सीढ़ीनुमा प्रतिरूप:-

      इनायत अहमद ने सीढ़ीनुमा प्रतिरूप को सर्वोच्च रेखीय प्रतिरूप कहा है। इस प्रकार के गाँव पर्वतीय ढालों पर बसे मिलते है। हिमालय, रॉकी, एण्डीज, आल्प्स पर्वत इत्यादि पर सीढ़ीनुमा गाँव मिलते हैं।

(9) त्रिभुजाकार प्रतिरूप:-

        जब  कोई परिवहन मार्ग या नहर दूसरी नहर या परिवहन मार्ग से मिलती है परन्तु उसको पार नहीं करती है तो वहाँ त्रिभुजाकार प्रतिरूप का विकास होता है। इसका उदा० पंजाब, हरियाणा में अधिक मिलते हैं।

(10) तीर प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण अधिवास का विकास किसी केप/नुकीले मोड़ के सहारे होता है तो ऐसी स्थिति में तीर प्रतिरूप का विकास होता है। जैसे- दक्षिण भारत के कन्याकुमारी के पास, द० अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के पास, बिहार में बुढ़ी गंडक और बागमती नदी के संगम पर इस तरह के बस्तियाँ का विकास हुआ है। 

(11) वृताकार प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण बस्तियों का विकास किसी झील, कुँआ, जमीनदार का किला, चर्च, मस्जिद या मंदिर के किनारे विकसित होता है और उसका आकार एक वृत के समान हो जाता है तो वैसे प्रतिरूप को वृताकार प्रतिरूप कहते हैं। प्राचीन काल से ही इस तरह के बस्तियों का विकास होता रहा है। भारत में वृताकार बस्तियों का प्रतिरूप सर्वाधिक मिलता है। वृताकार प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती के केन्द्र में कुआँ या तालाब होता है तो उसे खोखला वृताकार प्रतिरूप कहते हैं और जब केन्द्र में कोई धार्मिक संस्थान, पंचायत भवन या जमीनदार का घर मौजूद होता है तो उसे निहारिका प्रतिरूप कहते हैं।

(12) तारा प्रतिरूप:-

      किसी स्थान पर कई दिशाओं से आकर परिवहन मार्ग एक बिन्दु पर मिल जाती है और सड़कों के किनारे ग्रामीण बस्तियाँ विकसित हो जाती है तो वैसे प्रतिरूप को तारा प्रतिरूप कहते हैं।

       मेरठ और गाजियाबाद का अधिकांश गाँव तारा प्रतिरूप के ही है।

(13) पंखा प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण बस्तियाँ विकसित होकर एक पंखे के रूप में तब्दील हो जाते हैं, तो उसे पंखा प्रतिरूप कहते है।

       डेल्टाई और पर्वतीय क्षेत्रों में पंखा प्रतिरूपों का विकास देखा जा सकता है। गंगा, कृष्णा, के डेल्टा पर तथा हिमालय के जलोढ़ पंखों पर इस प्रकार के ग्रामीण प्रतिरूपों  का विकास हुआ।

       उपरोक्त प्रतिरूप के अलावे कई अन्य प्रतिरूप भी देखने मिलता है। जैसे- बहुभुजीय प्रतिरूप, अर्द्धवृताकार प्रतिरूप, अनाकार प्रतिरूप इत्यादि हैं। 

निष्कर्ष-

        इसह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि पूरे विश्व में अलग-2 क्षेत्रों में भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण अलग-2 प्रतिरूपों का विकास हुआ है।

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