Category OCENOGRAPHY (समुद्र विज्ञान)

8. OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY

सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY




OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता 

         समुद्री जल में लवण की घुली हुई मात्रा को समुद्री लवणता कहते है प्रारंभ में जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो उसका उपरी भाग ठंडा होकर भूपटल का निर्माण किया। भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व कम था उससे महाद्वीपीय भूपटल का निर्माण हुआ और भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व अधिक था उससे महासागरीय भूपटल का निर्माण हुआ 

     कालान्तर में स्थ्लमंडल से अपरदन के दूतों के द्वारा लवणों को सागर तक पहुँचाने का कार्य अनवरत जारी है समुद्री जल में मुख्यतः 47 प्रकार के लवण पाए जाते है जिसमें NaCl की मात्रा सर्वाधिक (77.08%) है इसके अतिरिक्त MgCl (10.09%), MgSo4 (4.9%) कैल्सियम सल्फेट (3.6%) भी प्रमुख लवण पाए जाते है शेष अन्य प्रकार के लवण पाए जाते है

लवणता का मापन:

        लवणता का मापन प्रति हजार ग्राम जल में उपस्थित लवण की मात्रा के अनुपात से ज्ञात करते है इसे प्रति हजार (gm ‰) के द्वारा निरुपित करते है डिटमर महोदय के अनुसार सागरीय जल में औसत लवणता 35 ‰ पायी जाती है समुद्री जल में लवणता सर्वत्र एक सामान नहीं पाई जाती है लवणता को प्रभावित करने वाले कई कारक है-

लवणता को प्रभावित करने वाले  कारक:

1. वर्षा एवं वाष्पीकरण-

      वर्षा एवं लवणता  के बीच व्यत्क्रमानुपाती संबंध होता है अर्थात जिन स्थानों पर वर्षा ज्यादा होती है वहाँ लवणता कम होती है जहाँ पर वर्षा कम होती है वहाँ पर लवणता अधिक होती हैइसी तरह लवणता एवं वाष्पीकरण के बीच समानुपाती का संबंध होता है जिन क्षेत्रों में वाष्पीकरण अधिक होता है उन क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है और जहाँ वाष्पीकरण कम होता है वहाँ लवणता भी कम पायी जाती है इन संबंधों को नीचे के ग्राफ में देखा जा सकता है-

चित्र : लवणता एवं वर्षा में व्युत्क्रमानुपाती संबंध
चित्र: लवणता एवं वाष्पीकरण में समानुपाती का सम्बंध

          विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर अन्य उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण का प्रभाव कम होता है और वर्षा कम होती है। यही कारण है की विश्व के अधिक लवणता वाले क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्र में स्थित नहीं है बल्कि 30° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र में स्थित है। जैसे- तुर्की का वानगोलु झील (330 ‰), मृत सागर (340 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰)।

            विषुवतीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण की तुलना में वर्षा अधिक होती है। इसीलिए वहाँ लवणता कम पाए जाते है।

2. समुद्री जलधाराएँ-

       विश्व के सभी महासागरों में समुद्री जलधाराएँ चला करती है। उत्तरी गोलार्द्ध  में जलधाराएँ Clock Wise  और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock Wise चला करती है। इसका तात्पर्य हुआ कि निम्न अक्षांश से जलधाराएँ उच्च अक्षांश की ओर जाती है और कुछ जलधाराएँ उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आती है। तापमान के विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार के होती है-

(i) ठंडी जलधारा

(ii) गर्म जलधारा।

     गर्म जलधारा में वाष्पीकरण अधिक होता है जिससे लवणता बढ़ने की प्रवृति रखती है। इसके विपरीत ठंडी जलधाराओं में वाष्पीकरण कम होता है। इसीलिए लवणता भी कम होती है। उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह के कारण ही उत्तरी सागर में लवणता बढ़ जाती जाती है। इसी तरह उत्तरी प्रशांत गर्म जल जलधारा के कारण अलास्का की खाड़ी में लवणता बढ़ जाती है।

 3. बर्फ का पिघलना-

       यह ज्ञात है कि ध्रुवीय क्षेत्र बर्फ से ढके हुए हैं। सूर्याताप प्राप्त करके जब बर्फ पिघलती हैं तो समुद्र में जलापूर्ति बढ़ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप लवणता में भी कमी आ जाती है। यही कारण है कि आर्कटिक सागर और अंटार्कटिका के तटीय क्षेत्रों में लवणता कम पाई जाती है।

4. नदियों के द्वारा स्वच्छ जल की  आपूर्ति-

          नदी जल स्वच्छ जल के उदाहरण है। विश्व के कई बड़ी बड़ी नदियां अपना जल सतत समुद्र में उधेड़ रही है। काला सागर और कैस्पियन सागर दोनों एक ही अक्षांश पर है लेकिन काला सागर में डेन्यूब नदी और वोल्गा नदी के गिरने के कारण काला सागर की लवणता कम और कैस्पियन सागर की लवणता अधिक है।

5. तटीय आकृति-

       जिन क्षेत्रों में समुद्र का किनारा सीधा और सपाट है वहाँ पर जल का मिश्रण आसानी से हो जाता है। जबकि अधिक कटे-फटे तटीय क्षेत्रों में जल का मिश्रण आसानी से नहीं हो पाता है जिसके कारण ऐसे क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है।

6. ज्वालामुखी उदगार की क्रिया-

        प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर में कई जीवित ज्वालामुखी पाये जाते हैं। इन ज्वालामुखी उदगारों के कारण जल वाष्पीकृत होते है और लवणता को बढ़ा देते हैं। ज्वालामुखी उदगार के ही कारण अटलांटिक कटक के सहारे लवणता अधिक पायी जाती है।

7. वायुदाब-

       अधिक वायुदाब के कारण जल के सतह नीचे की ओर धँस जाता है जबकि निम्न वायुदाब क्षेत्रों में जल का सतह सामान्य जल स्तर से ऊपर उठा होता है। इस परिघटना के कारण समुद्री जलधाराएँ  उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जलस्तर वाले क्षेत्र की ओर चलने लगते है जिसके कारण समुद्री लवणताएँ प्रभावित होती है।

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लवणता को कई कारक प्रभावित करते हैं।

लवणता का वितरण

         विश्व के सभी महासागर आपस में जुड़े हुए हैं। इसीलिए बड़े महासागर और छोटे महासागरों के लवणता में कोई विशेष अंतर नहीं पायी जाती है। लेकिन धरातल  पर कुछ ही जलाशय हैं जो समुद्र से जुड़े हुए नहीं हैं। ऐसे ही बंद सागरों की लवणता खुली सागरों की तुलना में अधिक है। सामान्य तौर पर समुद्री लवणता का अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर किया जा सकता है-

(A) क्षैतिज लवणता

(B) लम्बवत लवणता

(A) क्षैतिज लवणता

      इसके अंतर्गत महासागरीय लवणता का वितरण का अध्ययन अक्षांशीय आधार पर किया जाता है। सामान्यतः पृथ्वी को दो भागों में बाँटा जाता है- उत्तरी गोलार्द्ध एवं  दक्षिणी गोलार्द्ध। 

     उत्तरी गोलार्द्ध में महासागर का विस्तार कम और महाद्वीपों का विस्तार अधिक हुआ है। जबकि दक्षिणी  गोलार्द्ध में सागर का विस्तार अधिक और स्थल का विस्तार कम हुआ है। यही कारण है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी  गोलार्द्ध के पानी में लवणता कम पायी जाती है। दोनों गोलार्द्धों में समुद्री लवणता के अक्षांशीय वितरण को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है-

अक्षांशीय क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में लवणता दक्षिणी गोलार्द्ध में लवणता प्रमुख कारण
0°–10° (भूमध्यरेखीय क्षेत्र) कम (≈ 34‰) कम (≈ 34‰) अधिक वर्षा, नदियों का मीठा जल
10°–20° मध्यम मध्यम वर्षा में कमी, वाष्पीकरण बढ़ता
20°–30° (उपोष्ण कटिबंध) अधिकतम (≈ 36–37‰) अधिकतम (≈ 36‰) तीव्र वाष्पीकरण, कम वर्षा
30°–40° घटती हुई घटती हुई पश्चिमी पवनों से वर्षा
40°–60° कम कम कम तापमान, हिम पिघलना
60°–90° (ध्रुवीय क्षेत्र) बहुत कम (≈ 30–32‰) बहुत कम (≈ 30–32‰) हिम गलन, न्यून वाष्पीकरण
   उपरोक्त तालिका के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध की लवणता कम होती है। लेकिन समुद्री लवणता के वितरण को आधार बनाकर विश्व के महासागरीय क्षेत्र को सामान्य रूप से चार भागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते है।

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र-

     इसके अंतर्गत वैसे सागरों एवं झीलों को शामिल किया जाता है जिनकी औसत लवणता 40 ०/०० से अधिक है। इसके अंतर्गत उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के बन्द सागर एवं झील आते है। ये वे क्षेत्र है जहाँ वाष्पीकरण अधिक एवं जलापूर्ति या वर्षा कम होती है। यह सामान्यतः 30° से 35° अक्षांश के बीच के क्षेत्र है। इन्ही क्षेत्रों में मरुस्थलीय एवं अर्द्धमरुस्थलीय जलवायु पायी जाती है। विश्व में सर्वाधिक लवणता रखने वाला मृत सागर (340‰), वानगोलू/वुलर झील (330 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰), ऑस्ट्रेलिया के आयर झील आते है। इसके अलावे लाल सागर, पार्सियन की खाड़ी, कैस्पियन सागर, भूमध्य सागर के अफ्रीकी तट और जिब्राल्टर के मुहाना पर भी समुद्री लवणता 40 ‰ से अधिक पायी जाती है।

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र-

      इसके अंतर्गत 30 से 40 ‰ लवणता रखने वाले जलाशयों को शामिल करते है। भौगोलिक वितरण की दृष्टि से विषुवतीय क्षेत्र 5º से 5º को छोड़कर 5º से 30º अक्षांश वाले क्षेत्र को और 45° से 50° अक्षांश के मध्य दोनों गोलार्द्धों में लवणता अधिक पायी जाती है। 40° से 50° अक्षांश के बीच गर्म समुद्री जलधारा के कारण लवणता अधिक पायी जाती है। जबकि 5° से 30° अक्षांश के बीच वर्षा एवं वाष्पीकरण में विभिन्नता के कारण लवणता अधिक पायी जाती है।

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

      इसके अंतर्गत 20 से 30 ‰ लवणता वाले क्षेत्र को शामिल करते है। इसके अंतर्गत मुख्यतः तीन क्षेत्र आते है-

(क) विषुवतीय क्षेत्र के महासागरों में 5°N से 5°S के बीच। यहाँ पर लवणता कम होने का प्रमुख कारण वर्षा अधिक और वाष्पीकरण का कम होना है।

(ख) 35° से 45°अक्षांश के बीच

(ग) 55° अक्षांश से ध्रुव (90° अक्षांश) तक

      विषुवतीय क्षेत्रों में निम्न लवणता का एक प्रमुख कारण बड़ी-बड़ी नदियों का समुद्र में गिरना भी है। जैसे- जायरे एवं अमेजन नदी अपना मुहाना विषुवतीय क्षेत्रों में ही बनाती है। यही कारण है कि इनके मुहाने पर औसत लवणता 10 ‰ तक पहुँच जाती है।

      उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में न्यून लवणता का प्रमुख कारण सूर्य के तापीय प्रभाव का कम होना है। सूर्य के कम तापीय प्रभाव के कारण वाष्पीकरण की क्रिया भी कम होती है। इसके अलावे उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में ध्रुवीय हिम शीलाखण्ड और सेंटलॉरेन्स, राईन, एनेसी, ओब, लीना, जैसे नदियों के द्वारा बड़े पैमाने पर जलापूर्ति की जाती है।

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

       इसके अंतर्गत 20‰ से कम लवणता वाले क्षेत्रों को शामिल करते है। इसके अंतर्गत उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों के बन्द सागर और झील को शामिल करते है। उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में शामिल होने के कारण यहाँ वाष्पीकरण कम होता है और हिमानियों के द्वारा स्वच्छ जल की आपूर्ति अधिक होती है।

      विश्व में सबसे कम लवणता बाल्टिक सागर के गल्फ ऑफ बोथनियाँ में गोटलैंड द्वीप (6 से 8 ‰) के पास पायी जाती है। इसके अलावे हड्सन की खाड़ी, कारा सागर, उजला सागर और बाल्टिक सागर की भी औसत लवणता बहुत कम पायी जाती है।

(B) लम्बवत लवणता का वितरण 

           महासागरों में लम्बवत दृष्टिकोण से भी लवणीय विषमता दिखाई पड़ती है। जैसे-

(i) विषुवतीय क्षेत्रों में सतह के ऊपर वर्षा अधिक होने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण का घनत्व अधिक होने के कारण नीचे की ओर बैठने की प्रवृति होती है। इसी कारण से ऊपर से नीचे की ओर जाने पर विषुवतीय क्षेत्रों में लवणता अधिक मिलती है।

(ii) मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में 200 फैदम की गहराई तक लवणता में वृद्धि होती है। लेकिन उसके बाद लवणता में कमी आती है क्योंकि उपसतही जलधारा के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों के नीचले भागों में जलापूर्ति बढ़ जाती है।

(iii) ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊपरी भागों में हिमशीलाखण्डों के पिघलने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण के बैठने के कारण निचले भागों में लवणता अधिक पायी जाती है। सम्पूर्ण लम्बवत सागरीय लवणता के वितरण को नीचे के Flow Chart में देखा जा सकता है-

निष्कर्ष:

     इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों  से स्पष्ट है कि सागरीय लवणता में क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से काफी विषमताएँ पायी जाती है। सागरीय लवणता में विषमता उतपन्न करने वाले कई कारक है। लेकिन इसके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वर्षा और वाष्पीकरण लवणता को प्रभावित करने वाले दो सबसे प्रमुख कारक हैं।

नोट:

👉 वानगोलू झील (Lake Van) तुर्की के पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र में स्थित एक अंत:स्थलीय खारी क्षारीय झील है। यह तुर्की की सबसे बड़ी झील है और समुद्र से कोई निकास नहीं रखती।

👉 मृत सागर

  • यह मध्य पूर्व (Middle East) में स्थित है।

  • इज़राइल और जॉर्डन की सीमा के बीच फैली हुई है।

  • यह पृथ्वी का सबसे निचला स्थल है (समुद्र तल से लगभग 430 मीटर नीचे)।

  • अत्यधिक लवणता के कारण इसमें जीव लगभग नहीं पाए जाते इसीलिए इसे मृत सागर कहा जाता है।

👉 ग्रेट बेसिन झील 

  • ग्रेट बेसिन झील उत्तरी अमेरिका के ग्रेट बेसिन क्षेत्र में स्थित है।
  • यह झील मुख्यतः Utah राज्य में पाई जाती है।
  • इसे सामान्यतः Great Salt Lake के नाम से जाना जाता है।
  • यह एक आंतरिक अपवाह (Inland Drainage) क्षेत्र की झील है, अर्थात इसका जल समुद्र तक नहीं पहुँचता।
  • अधिक वाष्पीकरण के कारण इसका जल अत्यधिक लवणीय (खारा) है।


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7. Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमान

7. Temperature of Oceanic Water

(सागरीय जल का तापमान)



Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमानTemperature of Oceanic Water

                 समुद्री जल ऊर्जा के अनेक स्रोतों से गर्म होने की प्रवृत्ति रखती है जिसे सागरीय तापमान कहते हैं। सागरीय जल को ऊष्मा कई स्रोतों से प्राप्त होती है। जैसे – सौर विकरण, रेडियो सक्रिय पदार्थों के विखंडन, ज्वालामुखी, सागरीय जल के दबाव एवं सागरीय जल के विभिन्न स्तरों के मध्य होने वाला घर्षण इत्यादि से। ऊर्जा के इन स्रोतों में से सबसे प्रमुख स्रोत सौर ऊर्जा है। सौर ऊर्जा स्थल और जल दोनों एक साथ प्राप्त करते हैं। लेकिन दोनों में तापमान ग्रहण करने की दर में अंतर होता है क्योंकि स्थल जल्दी गर्म होता है और जल्द ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है इसके विपरीत सागर जल देर से गर्म और देर से ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है। यही कारण है कि स्थल के औसत तापमान 15॰C की तुलना में सागरीय जल का औसत तापमान 17॰C होता है। समुद्री जल एवं स्थल के वार्षिक तापांतर में भी विभिन्नता पाई जाती है। जैसे- स्थल का वार्षिक तापांतर 145.5॰C है जबकि सागरीय जल का वार्षिक तापांतर 80॰C है क्योंकि समुद्री जल में लगातार मिश्रण होता रहता है। जबकि स्थलीय भाग में इस तरह का कोई मिश्रण नहीं होता है। सागरीय जल सूर्य विकिरण के अवशोषण, पृथ्वी के नितल द्वारा, संवहन, गतिज ऊर्जा, जलवाष्प का संघनन जैसे प्रक्रियाओं से गर्म होता है। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सागरीय जल कई स्रोतों से एवं कई प्रक्रियाओं से गर्म होने की प्रवृत्ति रखते हैं। इन प्रक्रियाओं को कई कारक प्रभावित करते हैं। जिसके कारण सागरीय जल के वितरण में विविधता पाई जाती है।

सागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक
            समुद्री जल के तापमान को कई कारक प्रभावित करते हैं। जैसे:- 
(1) अक्षांशीय स्थिति
(2) समुद्री जलधारा
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
(4) लवणता
(5) तट रेखा की बनावट
(6) मेघावरण
(7) हेमशीलाखंड
(8) समुद्री जल का घनत्व
 
(1) अक्षांशीय स्थिति
             विषुवत रेखा (0 अक्षांश रेखा) या निम्न अक्षांशीय क्षेत्र सालों भर सूर्य की लंबवत किरण प्राप्त करते हैं जिसके कारण इस क्षेत्र के समुद्री भाग में तापमान अधिक होता है। जबकि ध्रुवीय प्रदेश में सूर्य की किरणें सालोंभर तिरछी पड़ती है। इसलिए यहां का तापमान काफी कम होता है। विषुवतीय प्रदेश का औसत समुद्री तापमान 25॰-26॰C के मध्य होता है जबकि आर्कटिक सागर का औसत तापमान शून्य से -1॰C से 1.9॰C होता है।
 
(2) समुद्री जल धारा
             यह ज्ञात है कि समुद्री जलधाराएं दो प्रकार की होती है -(i) गर्म जलधारा (ii) ठंडी जलधारा  गर्म जलधाराएं निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर चला करती है जबकि ठंडी जलधाराएं उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर चला करती है। जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में स्थानांतरण की प्रक्रिया पाई जाती है उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह एक गर्म जलधारा है जिसके कारण उच्च अक्षांश के क्षेत्रों में स्थित बंदरगाहें खुली रहती है। जैसे नार्वे का हेमरफिस्ट और रूस का मरमंस्क बंदरगाह। दोनों लगभग एक ही अक्षांश पर स्थित है लेकिन समुद्री गर्म जलधारा के कारण हेमरफिस्ट का बंदरगाह सालोंभर खुला रहता है जबकि मरमंस्क बंदरगाह सालों भर लगभग बंद रहता है।
          अलनीनो और लानीनो ऐसी दो जलधाराएं हैं जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में विविधता उत्पन्न होती है अलनीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में 1-6॰C तक बढ़ोतरी होती है जबकि लानीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में गिरावट आती है।
 
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
               समुद्री जल के तापमान का निर्धारक प्रचलित वायु और वायुदाब को भी माना जाता है। जैसे- उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र का जलस्तर नीचे जबकि निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र जल का स्तर ऊपर होता है जिसके कारण जल का प्रवाह उच्च जल स्तर से निम्न जलस्तर क्षेत्र की ओर होने लगता है। अगर जल का प्रवाह विषुवतीय निम्न वायुदाब से उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का हस्तांतरण निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर होता है। इसके विपरीत जब जल का प्रवाह उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का स्थानांतरण उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर होता है।
           प्रचलित वायु मुख्यत: तीन है- (i) वाणिज्य हवा (ii)  पछुआ हवा और (iii) ध्रुवीय हवा। ये हवाएं समुद्री सतह पर हजारों किलोमीटर तक सतत चलने की प्रवृत्ति रखती है। वाणिज्यिक हवा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र से विषुवतीय क्षेत्र की ओर ध्रुवीय हवा ध्रुवीय उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय भार की ओर, जबकि पछुआ हवा उपोष्ण उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय वायुदाब क्षेत्र की ओर चला करती है ये हवाएं समुद्र से तापमान को ग्रहण भी करती है और समुद्री जल के तापमान को बढ़ाती है। यह वायु की प्रकृति पर निर्भर करती है जैसे ध्रुवीय वायु ठंडी होने के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्र के जलीय तापमान को घटा देती है इसके विपरीत पछुआ हवा गर्म होने के कारण उच्च अक्षांश क्षेत्र के समुद्री तापमान को बढ़ा देती है।
 
(4) लवणता
              समुद्री लवणता के कारण जल का प्रवाह कम लवणता वाले क्षेत्र से अधिक लवणता वाले क्षेत्र की ओर होता है। जैसे- अटलांटिक महासागर की तुलना में भूमध्य सागर का लवणता अधिक है जिसके कारण अटलांटिक महासागर का जल भूमध्यसागर में प्रविष्ट करता रहता है जिसके फलस्वरूप भूमध्यसागर के औसत तापमान में 1-2C तापमान की कमी हो जाती है।
 
(5) तट रेखा की बनावट
            अगर कोई खुला समुद्र हो तो उसका तापमान कम होता है जबकि बंद सागरों का तापमान अधिक होता है जैसे विश्व के तीनों बड़े महासागरों में सबसे कम औसत समुद्री तापमान प्रशांत महासागर का और सबसे ज्यादा औसत समुद्र तापमान हिंद महासागर का है हिंद महासागर में भी लाल सागर और परसियन  की खाड़ी का तापमान अरब सागर की तुलना में अधिक है क्योंकि वे दोनों सागर स्थलीय भाग से घिरे हैं जिसके कारण समुद्री जल का मिश्रण नहीं हो पाता है।
 
(6) मेघावरण
            विषुवतीय क्षेत्र और शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात क्षेत्र में मेघावरण अधिक पाई जाती है। जिसके कारण सूर्य की रोशनी समुद्री सतह पर सतह नहीं पड़ पाती है जबकि उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में आसमान सालोंभर साफ रहती है जिसके कारण समुद्री सतह सालोंभर सूर्यातप प्राप्त करती है फलत: समुद्री जल के तापमान में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती है।
 
(7) हिमशीलखण्ड
                 ध्रुवीय क्षेत्रों में गर्म समुद्री जलधारा के कारण एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण सदियों से जमीन पिघल रहे हैं जिसके कारण यहां एक ओर समुद्री जल स्तर वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर समुद्री जल की औसत तापमान में कमी आ रही है।
 
(8) समुद्री जल का घनत्व
                समुद्री जल का घनत्व मूलतः लवणता से ही संबंधित है फिर भी अलग-अलग गहराई पर अलग-अलग समुद्री लवणता के कारण समुद्री जल में उदग्र रूप से कई स्तर पाए जाते हैं। जैसे – समुद्री जल के सबसे ऊपरी भाग में जब लवणता अधिक होती है तो उसका घनत्व भी अधिक हो जाता है जिसके कारण सौर विकरण के अवशोषण की क्षमता भी अधिक हो जाती है जबकि 100 फैदम गहराई के बाद लवणता में कमी के कारण दूसरी परत का निर्माण होता है फलत: ऊपरी परत की तुलना में निचली परत के तापमान में लगभग 1C कमी आ जाती है। अतः समुद्री जल के विभिन्न स्तर भी समुद्री तापमान को प्रभावित करने में सक्षम है।
 
सागरीय तापमान का वितरण
                समुद्री जल के तापमान का वितरण को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है:-
(i)  क्षैतिज वितरण 
(ii) लम्बवत वितरण
 
(i) क्षैतिज वितरण
               तीनों प्रमुख महासागरों के क्षैतिज तापमान को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-
Temperature of Oceanic Water
(ii) लम्बवत वितरण
              समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। इसके बावजूद समुद्री वैज्ञानिकों के द्वारा निम्नलिखित लम्बवत तापीय वितरण को मान्यता प्राप्त है:-
Temperature of Oceanic Water
निष्कर्ष

          इस तरह उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री जल के क्षैतिज एवं उदग्र तापमान में काफी विषमता पाई जाती है।


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6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच

6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN

(प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच       BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN                     

        प्रशांत महासागर तथा उसके तटवर्ती सागर सम्मिलित रूप से विश्व के एक तिहाई भाग पर फैले हुए हैं। प्रशांत महासागर एक विशाल त्रिभुज के आकार का है जिसका विस्तार उत्तर में बेरिंग जलडमरूमध्य तथा दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप के मध्य है। इसके पश्चिम में एशिया तथा आस्ट्रेलिया और पूर्व में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप है। प्रशांत महासागर उत्तर से दक्षिण 14000 किलोमीटर लंबा और भूमध्यरेखा पर इसकी चौड़ाई 16000 किलोमीटर से कुछ अधिक है। प्रशांत महासागर की औसत गहराई 4572 मीटर है। प्रशांत महासागर में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 20,000 द्वीप पाए जाते हैं। यदि पश्चिमी तट द्वीपों की भरमार से आवृत है तो पूर्वी तट पर इनकी संख्या विरल है।

          सामान्य तौर पर प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं।

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)
               
         प्रशांत महासागर के मग्नतट उसके तटवर्ती क्षेत्रों की संरचना और बनावट पर निर्भर करते हैं। प्रशांत महासागर के पूर्वी तट पर मग्नतटों की चौड़ाई बहुत कम है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों के समानांतर क्रमशः रॉकी और एंडीज पर्वत मालाओं की उपस्थिति के कारण मग्नतट प्रायः अत्याधिक सँकरे हो गए हैं। उनकी औसत चौड़ाई 80 किलोमीटर है परंतु प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में पर्वतों अथवा पठारों की समानांतर श्रृंखला के अभाव में मग्नतट अधिक विस्तृत है।
        ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी-द्वीप समूह तथा एशिया महाद्वीप से सटे मग्नतट का अपेक्षाकृत अधिक चौड़े हैं। इनकी औसत चौराहे 160 से 1600 किलोमीटर तक पाई जाती है। इन ग्नतटों की औसत गहराई 1000 मीटर से अधिक नहीं है। इन मग्नतटों पर प्रशांत महासागर के अनेक द्वीप (क्यूराइल, जापान द्वीप, फिलीपाइन्स, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड आदि)  तथा कई आंतरिक एवं सीमांत सागर (बेरिंगसागर, ओखोटस्क, जापान सागर, पीत सागर, चीन सागर सागर, जावा सागर, कोरल सागर आदि) स्थित है।
(2) महासागरीय कटक / श्रेणी (Ocean Ridges)
           
       प्रशांत महासागर में अटलांटिक महासागर तथा हिंद महासागर के समान मध्यवर्ती कटक नहीं है। कुछ बिखरे कटक अवश्य मिलते हैं। जैसे- पूर्वी प्रशांत कटक (अलबट्रास पठार) लॉर्डहोवे कटक, टुआमामार्ट कटक, कोकरा कटक, हवायन कटक, होंशू कटक इत्यादि इसमें प्रसिद्ध है। पूर्वी प्रशांत कटक जिसे अलबट्रास पठार के नाम से जानते हैं 1600 किलोमीटर की चौड़ाई में विस्तृत है।
         23°- 35° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसकी दो शाखाएँ हो जाती है। पूर्वी शाखा चिली तट की ओर चली जाती है तथा पश्चिमी शाखा इस्टर्न आईलैंड राइज के नाम से दक्षिण की ओर चली जाती है। दूसरा प्रमुख कटक न्यूजीलैंड रिज है। ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ के पश्चिम में क्वींसलैंड पठार प्रमुख कटक है। मध्य प्रशांत महासागर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कटक हवायन उभार है जो 960 किलोमीटर चौड़ा और 2640 किलोमीटर लंबा है।
 
(3) महासागरीय बेसिन/ मैदान/ द्रोणी (Oceans Besins)
                    
         प्रशांत महासागर के नितल का अधिकांश भाग गहरे अंत: समुद्री मैदानों से बना है। अन्य महासागरों की तुलना में इसमें अपेक्षाकृत अधिक गहरे अंत: समुद्री मैदान मिलते हैं। तट से मैदानों के में उतरते ही अचानक गहराई में वृद्धि हो जाती है। प्रशांत महासागर में कैलीफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिणी-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिणी-पश्चिमी प्रशांत बेसिन, न्यूजीलैंड एवं पूर्वी आस्ट्रेलिया के बीच तस्मानियाँ बेसिन, फिजी द्वीप के दक्षिण में फिजी बेसिन स्थित है।
(4) महासागरीय गर्त /खाई (Ocean Deeps)
       
        प्रशांत महासागर में अभी तक 32 गर्तों की खोज की गई है। प्रशांत महासागर के अधिकांश गर्त पश्चिमी प्रशांत में मिलते हैं। ये गर्त या तो द्वीपीय चापों या पर्वतीय श्रृंखलाओं के समांतर पाए जाते हैं। प्रशांत महासागर में ही विश्व का सबसे गहरा गर्त मेरियाना ट्रेंच (11.02 Km) है जो फिलीपींस दीप के पूर्वी भाग में स्थित है।
         विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 मैदम) दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है। इसके अतिरिक्त प्रशांत महासागर में क्यूराइल, फिलीपाइन, करमाडेक, पेरू-चिल्ली, अल्यूशियन, मध्य अमेरिका, रिक्यू, नीरो, मरे, ब्रूक, बेली, प्लानेट इत्यादि प्रमुख गर्त हैं।
निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है। प्रशांत महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचना वाले भूपटल है।


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5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN / हिंद महासागर के तलीय उच्चावच

5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

(हिंद महासागर के तलीय उच्चावच)

BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN



BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

         हिंद महासागर के तली का विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसकी लंबाई लगभग 10000 किमी० और चौड़ाई 9000 किमी० है। इसका क्षेत्र 7.34 करोड़ वर्ग किमी० है। यह कुल महासागरीय जल का 20% जल अपने पास रखता है। इसके किनारे पर पूर्व में आस्ट्रेलिया, उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप उपस्थित है।

         हिंद महासागर का दक्षिणी भाग अंटार्कटिका के पास, पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ जाता है। इसका तलीय भाग एवं तटीय भाग कठोर एवं सघन चट्टानों से निर्मित है। हिंद महासागर के तटीय भाग में ब्लॉक पर्वतों का प्रमाण मिलता है क्योंकि इसका निर्माण गोंडवाना भूखंड के विखंडन एवं उनके स्थानांतरण से हुआ है। हिन्द महासागर के पूर्वी भाग में मोड़दार पर्वतों की श्रेणियाँ है जो हिमालय का ही भाग माना जाता है। इसी मोड़दार पर्वत श्रृंखला पर कोको द्वीप, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह स्थित है। सामान्यत: प्रायद्वीपीय भारत दक्षिण में स्थित हिंद महासागर को दो भागों में बाँट देता है-

(1) बंगाल की खाड़ी

(2) अरब सागर।

       हिंद महासागर के सीमांत क्षेत्रों में कई छोटे-छोटे सागर मिलते हैं। जैसे- फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर, मोजांबिक चैनल, अंडमान सागर इत्यादि।

     1965 में अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान जर्मन एवं भारतीय समुद्री वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। इनके अनुसार हिंद महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। जॉनसन महोदय ने प्रादेशिक विशेषताओं के आधार पर हिंद महासागर को तीन भागों में वर्गीकृत किया है:-  

(1) पश्चिमी भाग- अफ्रीका के समीप, औसत गहराई 2000 फैदम

(2) पूर्वी भाग- ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में, औसत गहराई 3000 फैदम

(3) सँकरा और महाद्वीपीय मग्नढाल वाला क्षेत्र मध्यवर्ती भाग- एक उत्थित कटक के रूप में।

            सामान्य तौर पर हिंद महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट

      हिंद महासागर के मग्नतट में काफी विविधता दिखाई देती है। इसकी औसत चौ० 640 किलोमीटर है। सबसे चौड़ा मग्नतट अफ्रीका के पूर्व और मेडागास्कर के समीप में पाए जाते हैं। इसी तरह बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर में भी चौड़े मग्नतट मिलते हैं। लेकिन आस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग और अंटार्कटिका के उत्तरी भाग में सँकरे मग्नतट मिलते हैं। जावा एवं सुमात्रा द्वीप के पास इसकी चौड़ाई मात्र 160 किलोमीटर है।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल

     यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मन्द होता है।

(3) महासागरीय कटक

       हिंद महासागर में उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला एक मुख्य कटक मिलता है और इस मुख्य घटक के सहारे सहायक कटक भी मिलते हैं। हिंद महासागरीय कटक का आकार ‘Y’ अक्षर के समान है। यह समुद्र तल से 4000 मीटर नीचे तक अवस्थित है। यह कटक हिंद महासागर को पूर्वी एवं पश्चिमी भागों में बाँट देता है। कहीं-कहीं पर यह कटक समुद्री सतह से ऊपर चला जाता है जिस पर कई द्वीप बसे हुए हैं। जैसे- लक्षद्वीप, मालद्वीप, मॉरीशस द्वीप, कोकस किलिंग द्वीप, क्रिसमस द्वीप, रियूनियन द्वीप, सेशेल्स द्वीप, चैगोस द्वीप, डियागो गार्सिया द्वीप, प्रिंस एडवर्ड द्वीप, क्रोजेट द्वीप, कारगुलेन द्वीप, एमस्टर्डम द्वीप, सेंट पॉल द्वीप,  इत्यादि। यह उत्तर में प्रायद्वीपीय भारत के किनारे से शुरू होकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक फैला हुआ है।

       प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिण में इस कटक की चौड़ाई सर्वाधिक है। इसे लक्षद्वीप और मालद्वीप के बीच लक्काद्वीप चैगोस कटक कहते हैं। यही कटक दक्षिण की ओर बढ़ता चला जाता है। इसे विषुवत रेखा तथा 30° दक्षिणी अक्षांश के बीच चैगोस सेंटपॉल कटक कहते हैं। 30° से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसे एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक कहते हैं। यहाँ पर इसकी चौड़ाई 1600 कि०मी० हो जाता है। 50° दक्षिणी अक्षांश के पास यह दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। पश्चिमी शाखा को करगुलेन गॉसबर्ग कटक और पूर्वी शाखा को इंडियन अंटार्कटिका कटक कहते हैं।

        हिंद महासागर का मुख्य कटक कई भागों में विभक्त है। जैसे- 5° दक्षिणी अक्षांश से एक शाखा निकलकर उत्तर-पश्चिम दिशा में चली जाती है जिसे सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक कहते हैं। 18° दक्षिणी अक्षांश के पास से एक कटक निकलती है जिसे सेशेल्स कटक कहते हैं। यही कटक अचानक दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुड़ जाता है जिसे मलागासी कटक कहते हैं। 48° दक्षिणी अक्षांश के पास हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में एक कटक अवस्थित है, जिसे प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक कहते हैं। पूर्वी हिंद महासागर में 50° दक्षिणी अक्षांश के पास से ही एक कटक पूरब की ओर चली जाती है, जिसे दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक कहते हैं।

सूची-

1. लक्काद्वीप चैगोस कटक

2. चैगोस सेंटपॉल कटक

3. एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक

4. करगुलेन गॉसबर्ग कटक

5. इंडियन अंटार्कटिका कटक

6. सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक

7. सेसिल्स कटक

8. मलागासी कटक

9. प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक

10. दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक

(4) महासागरीय मैदान

      महासागरीय कटक हिंद महासागर को कई गहन सागरीय मैदानों में विभक्त करते हैं। जैसे-

(i) ओमान बेसिनओमान की खाड़ी में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(ii) अरेबियन बेसिन- यह लक्काद्वीप चैगोस कटक और  सोकोत्रा द्वीप चैगोस के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(iii) सोमाली बेसिन- यह सोकोत्रा चैगोस, सेंटपाल कटक और सेशेल्स कटक के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(iv) मॉरीशस बेसिन- यह मलागासी और सेंट पाल कटक के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(v) नेटाल बेसिन- मलागासी और दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vi) अटलांटिक-भारतीय-अंटार्कटिका बेसिनयह अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका और प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक के बीच अवस्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vii) अंडमान बेसिन- यह बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार के पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी औसत गहराई 6000 से 12000 फीट है।

(viii) भारत-ऑस्ट्रेलिया बेसिन- इसका विस्तार 10° दक्षिणी अक्षांश से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच पूर्वी हिंद महासागर में हुआ है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट के बीच है।

(ix) पूर्वी भारतीय अंटार्कटिका बेसिन- यह पूर्वी हिंद महासागर के सबसे दक्षिणी भाग में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(5) महासागरीय गर्त

        हिंद महासागर में 6 प्रमुख गर्त मिलते हैं। इसके 60% भूभाग पर गहन सागरीय मैदान है। इसलिए इसमें गर्तों की संख्या बहुत कम है। हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है जो सुमात्रा एवं जावा द्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी गहराई 7725 मीटर है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि हिंद महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है।



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4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN / अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच

4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN 

(अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN ⇒
BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN

           अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा अफ्रीका के मध्य 8.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। यह संपूर्ण विश्व के क्षेत्रफल का 1/6 भाग तथा प्रशांत महासागर के क्षेत्रफल का 1/2 भाग है। इसका आकार अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर के समान है जिससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारंभ में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका यूरोप तथा अफ्रीका से मिले थे। बाद में महाद्वीपीय प्रवाह के कारण उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका अलग होकर पश्चिम दिशा में प्रवाहित हो गए। जिस कारण अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ।

       उत्तर में यह डेविस की खाड़ी तथा डेनमार्क जलडमरूमध्य एवं नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिन्द महासागर से मिला हुआ है। अटलांटिक महासागर दक्षिण में सर्वाधिक चौड़ा है। 35° दक्षिणी अक्षांश पर इसकी पूर्वी-पश्चिमी चौड़ाई 5920 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा की ओर यह निरंतर सँकरा होता जाता है। साओरोक अंतरीप तथा लाइबेरिया तट के बीच चौड़ाई 2560 किलोमीटर ही है। उत्तर की ओर चौड़ाई पुनः बढ़ती जाती है। 40° उत्तरी अक्षांश पर यह 4800 किलोमीटर हो जाती है। अटलांटिक महासागर के सीमांत सागरों में रूम सागर, कैरेबियन सागर, मेक्सिको की खाड़ी, बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, बैफिन की खाड़ी आदि प्रमुख है।

           अटलांटिक महासागर के नितल में निम्नलिखित चार प्रमुख रूप देखने को मिलते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

            कुछ भागों को छोड़कर अटलांटिक महासागर के चारों ओर चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। उत्तरी अटलांटिक महासागर में मग्नतट सर्वत्र सपाट एवं चौड़े हैं। मग्नतट की चौड़ाई समीपी तट के उच्चावच पर आधारित होती है। पर्वतीय अथवा पठारी तटों के मग्नतट अत्यधिक सँकरे और मैदानी तटों के मग्नतट अत्यधिक विस्तृत और समतल होते हैं। जैसे – बिस्के की खाड़ी से उत्तमाशा अंतरीप के बीच अफ्रीका का मग्नतट तथा 5°-10° S अक्षांश के बीच ब्राजील का मग्नतट सँकरा हो गया है। इसके विपरीत उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी भाग तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के मग्नतट 240 से 400 किलोमीटर तक चौड़े है। न्यूफाउंडलैंड (ग्रांड बैंक) तथा ब्रिटिश द्वीप (डागर बैंक) के चारों ओर विस्तृत मग्नतट पाए जाते हैं। ग्रीनलैंड तथा आइसलैंड के बीच मग्नतट चौड़े हैं। दक्षिणी अटलांटिक महासागर में बाहियाब्लैंक तथा अंटार्कटिका के बीच चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सँकरे मैदान मिलते हैं। इस महासागर के मग्नतटों पर कई सीमांत सागर तथा असंख्य द्वीप पाए जाते हैं।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

        यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मंद होता है। अटलांटिक महासागर में 12.4 प्रतिशत भाग पर मग्नढाल का विस्तार है।

(3) मध्य अटलांटिक कटक (Mid Atlantic Ridge)

           मध्य अटलांटिक कटक उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोवेट द्वीप तक ‘S’ अक्षर के आकार में 14400 किलोमीटर की लंबाई में फैला है तथा कहीं भी सागरतल से 4000 मीटर से नीचे नहीं जाता। इस श्रेणी की उपस्थिति ही अटलांटिक के नितल की सबसे बड़ी विशेषता है। भूमध्यरेखा के उत्तर इस कटक/श्रेणी को डॉल्फिन उभार तथा दक्षिण में चैलेंजर उभार कहते हैं। आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच इस कटक को विविल थामसन कटक कहते हैं। ग्रीनलैंड के दक्षिण में कटक चौड़ा हो जाता है जिसे टेलीग्राफ पठार कहते हैं। 50°N अक्षांश के पास इस कटक की शाखा न्यूफाउंडलैंड उभार के नाम से अलग न्यूफाउंडलैंड तट तक चली जाती है। 40°N अक्षांश के दक्षिण मध्यवर्ती कटक से एक शाखा अजोर उभार के नाम से अजोर तट की ओर जाती है। भूमध्यरेखा पर सियरा लिओन उभार उ०-पू० की ओर तथा पारा उभार उत्तर-पश्चिम की ओर मध्यवर्ती कटक की दो शाखाओं के रूप में चले जाते हैं। 40°S  अक्षांश के पास इस कटक की एक शाखा वालविस कटक अफ्रीका के मग्नतट की ओर तथा दूसरी शाखा रियोग्रांडे उभार के नाम से दक्षिण अमेरिका की ओर मुड़ जाती है।

(4) महासागरीय बेसिन या द्रोणी (Oceanic Basin)

          मध्यवर्ती अटलांटिक कटक द्वारा अटलांटिक महासागर दो विस्तृत बेसिनों में विभक्त है जिनमें अनेक छोटी-छोटी बेसिनें पायी जाती हैं। इनमें प्रमुख बेसिन निम्नलिखित है:-

(i) लेब्राडोर बेसिन- यह उत्तर में ग्रीनलैंड तथा दक्षिण में न्यूफाउंडलैंड के मध्य 4000 मीटर की गहराई तक फैली है।

(ii) उतरी अमेरिका बेसिन- यह उत्तरी अटलांटिक महासागर की सबसे बड़ी बेसिन है। जिसका विस्तार 12° से 40° उत्तरी अक्षांशों के मध्य उत्तरी अमेरिका के तट से 5000 मीटर की गहराई तक विस्तृत है।

(iii) ब्राजील बेसिन- यह दक्षिणी अटलांटिक महासागर में भूमध्य रेखा से 30° दक्षिणी अक्षांश तथा दक्षिणी अमेरिका के तट एवं पारा उभार के मध्य स्थित है।

(iv) स्पेनिश बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक के पूर्व आईबेरियन के पास 30° से 50° उत्तरी अक्षांश के बीच 5000 मीटर की गहराई तक है।

(v) उत्तरी तथा दक्षिणी कनारी बेसिन- यह दो वृत्ताकार बेसिनों से मिलकर बनी है, जिसका विभाजन उच्च भाग द्वारा होता है।

(vi) केपवर्ड बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक तथा अफ्रीका के मध्य 10° से 20° उत्तरी अक्षांशों के बीच 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(vii) गायना बेसिन- यह गायना कटक तथा सियरा लियोन के मध्य उ०-प० से द०-पू० दिशा में 4000-5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(viii) अंगोला बेसिन- अफ्रीका के तट से प्रारम्भ होकर उ०-पू० से द०-प० दिशा में वॉलविस कटक तक 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(ix) केप बेसिन – 25° से 45° द० अक्षांशों के मध्य अफ्रीका के पश्चिम में स्थित है।

(x) अगुल्हास बेसिन – उत्तमाशा अंतरिप के दक्षिण में 40° से 50° दक्षिणी अक्षांश के मध्य इसका विस्तार अधिक है।

(5) महासागरीय गर्त (Ocean Deeps)

        अटलांटिक महासागर में प्रमुख 19 गर्त पाए जाते हैं। इनमें प्यूर्टोरिको गर्त सबसे गहरा है जिसकी गहराई 4812 फैदम है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरेबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है। अटलांटिक महासागर के तटों के सहारे अभिनव वलन की अनुपस्थिति के कारण गर्त कम पाए जाते हैं। 19 प्रमुख गर्तों में रोमांश गर्त, नरेस गर्त, बाल्डीबिया गर्त, बुचानन, मोसले, चुन, दक्षिणी सैनविच गर्त है।

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधता पूर्ण विशेषताएँ देखने को मिलती है।


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3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियन

3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियनSubmarine Canyons



Submarine Canyons ⇒

                       स्थल  की भाँति महाद्वीपीय मग्नतट एवं महाद्वीपीय ढाल पर भी सँकरी, गहरी एवं खड़ी दीवाल से युक्त घाटियाँ पाई जाती है। ऐसे ही घाटियों को सागरीय कंदरायें कहते हैं। महासागरीय जल में डूबे होने के कारण इसे अंतः सागरीय कंदरायें कहते हैं।

विशेषताएँ

◆ समुद्री कंदरायें महाद्वीपीय मग्नतट और मग्नढाल पर वहीं मिलती है जहाँ पर बड़ी-बड़ी नदियों के मुहाना पाई जाती है।

◆ अंत: सागरीय कंदराएँ अधिकतर महासागरीय तटीय भागों के सहारे लंबवत रूप से पाए जाते है।

◆ समुद्री कंदराओं के पार्श्व का ढाल बिल्कुल खड़ा होता है इसका का अनुप्रस्थ काट V-आकार की घाटी के समान होता है।

◆ समुद्री कंदरा में ज्यों-ज्यों स्थलीय भाग से गहन सागरीय क्षेत्र की ओर जाते हैं त्यों-त्यों उसकी गहराई एवं ढाल में वृद्धि होती जाती है। सामान्यत: इसकी गहराई 2000 – 3000 फीट तक होता है।

◆ अंत: सागरीय कंदरा के तली में रेत, सिल्का, सिल्ट एवं बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

◆ निर्माण प्रक्रम के आधार पर अंत: सागरीय कंदराएँ दो प्रकार के होती है –

(i) हिमानी के द्वारा निर्मित कंदरायें

(ii) अन्य प्रक्रम के द्वारा निर्मित कंदरायें

उत्पत्ति

           हिमानी के द्वारा निर्मित कंदराओं को फियोर्ड कहते हैं। फियोर्ड का निर्माण प्रायः महाद्वीपीय एवं पर्वतीय हिमानी के अचानक समुद्र में उतरने के कारण होता है। फियोर्ड को कुछ समुद्रीवेता समुद्री कंदरा के श्रेणी में नहीं रखते। क्योंकि उनका मानना है कि इसका अध्ययन हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति के अंतर्गत किया जाना चाहिए।

            अन्य प्रक्रम से निर्मित कंदराओं की उत्पत्ति के सम्बंध में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। जैसे :-

(1) पटलविरूपणी या वलन सिद्धान्त (Diastrophic Theory) –

             इस सिद्धांत के अनुसार महाद्वीपीय मग्नतट एवं मग्नढाल पर भूसंचलन की क्रिया के कारण निर्मित वलन या भ्रंशन के कारण समुद्री कंदराओं का निर्माण हुआ है। कैलिफोर्निया और हडसन की खाड़ी के तट पर इसी क्रिया से निर्मित समुद्री कंदरायें मिलती है।

(2) भू-पृष्ठीय अपरदन का सिद्धांत  –

             इसे डाना (1863) और शेफर्ड (1941) ने इस मत को प्रतिपादित किया था। इनके अनुसार स्थल भाग के निमग्न (डूबने) हो जाने के कारण स्थल पर मिलने वाली नदियाँ भी निमग्न हो गई। अंततः उन पर सागरीय जल का फैलाव हो गया। कालांतर में वही नदियाँ अंत: समुद्री कंदरायें कहलाए।

(3) पंक तरंग सिद्धान्त (Turbidity Current Theory) –

             इस मत का प्रतिपादक डेविस, डेली जैसे भूगोलवेत्ता है। इनके अनुसार तट की ओर चलने वाले तीव्र पवनों के कारण तटीय भागों में बड़ी मात्रा में जलराशि एकत्रित हो जाती है जिसमें पंक (कीचड़) मिला होता है। यही पंक जब पुनः समुद्र की ओर लौटती है तो उनके अपरदन से अंतः सागरीय कंदराओं का निर्माण होता है। यही सिद्धांत सर्वाधिक मान्यता रखता है।

वितरण 

             बियर्ड एवं शेफर्ड महोदय ने विश्व के 102 कन्दराओं पर शोध किया और पाया कि कंदराएँ सर्वत्र पाई जाती है। अटलांटिक महासागर में यू.एस.ए. के पूर्वी तट पर चेसापिक कैनियन और कनाडा में हडसन कैनियन प्रमुख है। फ्रांस के दक्षिण पश्चिम तट पर बिस्फे की खाड़ी में केप ब्रिटेन कैनियन, पुर्तगाल के पश्चिमी तट पर नजारे कैनियन, अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कांगो कैनियन विश्व प्रसिद्ध है।

             इसी तरह प्रशांत महासागर के तट पर भी कई कैनियन मिलते हैं। जैसे- आलास्का तथा कनाडा के तट पर कोलंबियन कैनियन पाई जाती है।

            हिंद महासागर में गिरने वाली लगभग सभी प्रमुख नदियों के मुहानों पर कैनियन का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष

        निष्कर्षत: इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से कहा जा सकता है कि अंत: सागरीय कंदराएँ या कैनियन महाद्वीपीय मग्नतट और महाद्वीपीय मग्नढाल पर मिलने वाली एक विशिष्ट सागरीय स्थलाकृति है।


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2. Ocean Bottom Relief / महासागरीय नितल उच्चावच

2. Ocean Bottom Relief 

(महासागरीय नितल उच्चावच)


 महासागरीय नितल उच्चावच⇒

       प्रारंभ में ऐसी मान्यता थी कि महासागरीय सतह तश्तरी के समान होते हैं अर्थात इसके किनारे में ऊँचाई अधिक और बीच में सबसे गहरा क्षेत्र होगा। लेकिन चैलेंजर अभियान (1884,1888) के बीच खोजों से कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए। जैसे पूरे धरातल का 70.8 प्रतिशत भूभाग पर समुद्र और शेष 29.2 प्रतिशत भाग पर स्थल का फैलाव है। समुद्र में सबसे गहरा भाग किनारे पर है। विश्व का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला अटलांटिक महासागर में अवस्थित है। वस्तुतः इस अभियान के बाद यह मान्यता विकसित हुई कि पृथ्वी के भूपटल का अध्ययन दो भागों में बांट कर किया जाना चाहिए:-

(1) समुद्री स्थलाकृति

(2) स्थलीय स्थलाकृति

      क्योंकि समुद्री स्थलाकृति में भी वे सभी जटिलताएँ पाई जाती है जो स्थलीय स्थलाकृति में पाई जाती है। जिस प्रकार स्थलीय स्थलाकृति के विकास में भू-संचलन, अपरदन, निक्षेपन जैसे अंतर्जात एवं बहिर्जात बल का प्रभाव पड़ता है। ठीक उसी प्रकार समुद्री भूपटल पर भी पड़ता है। चैलेंजर अभियान के बाद समुद्री वैज्ञानिकों ने सोनार नामक वैज्ञानिक यंत्र का प्रयोग करके समुद्री उच्चावच का निर्धारण करने का प्रयास किया। वर्तमान में यह कार्य कृतिम उपग्रह के माध्यम से किया जा रहा है।

        अधिकतर समुद्री वैज्ञानिकों ने समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु उच्चतादर्शी वक्र (Hypsographic Curve Method)  को महत्वपूर्ण मानते हैं। इस दिशा में कोसीना (1921), Severdrup (1942) का कार्य सबसे महत्वपूर्ण है। Severdrup महोदय ने समुद्री भूपटल के क्षेत्रफल का प्रतिशत के रूप में X-अक्ष पर और ऊँचाई को Y-अक्ष पर लेते हुए उच्चतादर्शी वक्र को खींचा।

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        Severdrup ने अपने अध्ययन में बताया कि समुद्र की औसत ऊँचाई 3800 मीटर और स्थल की औसत ऊँचाई 840 मीटर है। समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु समुद्री भूपटल को छ: प्रमुख समुद्री स्थलाकृति के रूप में विभाजित कर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि।

        उपरोक्त स्थलाकृतियों को एक काल्पनिक Hypsographic Curve के द्वारा दिखाया गया है-

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(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelves)

         यह महाद्वीप का ही भाग है जो सागर में डूबा होता है। यह ग्रेनाइट जैसे चट्टान से निर्मित होता है। यहाँ सागर छिछला होता है। इसका निर्माण धँसान या उत्थान से या अपरदन क्रिया से संभव होता है। डेली जैसे समुद्रीवेता के अनुसार “प्लीस्टोसीन कल्प में हिमानीयुग के अंत होने के बाद समुद्र के सतह में 150m का उत्थान हुआ।” इसका तात्पर्य है कि प्लीस्टोसीन काल तक महाद्वीपीय मग्नतट स्थलखंड के ही प्रत्यक्ष भूभाग थे। इसका ढाल समुद्र की ओर होता है। इसका औसत ढाल 1°/ Km या 17 फीट/मील बताया जाता है। संपूर्ण समुद्री क्षेत्रफल का 8.6 प्रतिशत भाग महाद्वीपीय मग्नतट के अंतर्गत आता है।

   महाद्वीपीय मग्नतट का वितरण अत्यंत ही असमान है। इसका सर्वाधिक विस्तार उत्तरी अटलांटिक महासागर में हुआ है। यहाँ इसका विस्तार हडसन की खाड़ी से लेकर नार्वेजियन सागर तक लगभग लगातार हुआ है। इसका प्रमुख कारण इस प्रदेश में समुद्री प्लेटफार्म का अवस्थित होना है। ये प्लेटफॉर्म प्लीस्टोसीन युग में हिमानी के पिघलने के बाद बढ़े हुए समुद्री जलस्तर के अपरदन से निर्मित हुआ है।

    अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सर्वाधिक सँकरे मग्नतट मिलते हैं। विश्व का सबसे सँकरा महाद्वीपीय मग्नतट अफ्रीका महाद्वीप में नामीबिया के अंगोला तट के मध्य मिलता है (चौ० 10 से 15 मीटर)। पुनः ब्राजील के तट, ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट, अफ्रीका के पूर्वी तट सँकरे महाद्वीपीय मगनतट का निर्माण करते हैं। इसका प्रमुख कारण भू-भ्रंश क्रिया है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी एवं दक्षिणी भाग और उत्तरी भाग में मग्नतट चौड़ा है। इसका प्रमुख कारण निक्षेपन का कार्य बताया जाता है। दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट या एंडीज तट सँकरे है। इसी तरह उत्तरी अमेरिका का प्रशांत तट सँकरा है। इसका प्रमुख कारण दो प्लेटो का प्रत्यावर्तन (टकराना) है। अधिकतर छिछले सागर में महाद्वीपीय मग्नतट काफी चौड़ा हैं। इसका प्रमुख कारण अपरदन को बताया जाता है। यूरोप का उत्तरी सागर एक छिछला सागर है। यही कारण है कि उस सागर में विश्व के बड़े-बड़े मछलियों के बैंक अवस्थित है। जैसे- डागर बैंक

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

      यह महाद्वीपीय मग्नतट का अग्र भाग है। यह तीव्र ढाल का क्षेत्र है। यह ग्रेनाइट से निर्मित होता है। इसे महाद्वीपों का अंतिम किनारा माना जाता है। इसमें बेसाल्ट से निर्मित चट्टानें मिलने लगती है। औसतन 200 से 300 मीटर की गहराई तक महाद्वीपीय मग्नढाल मिलते हैं लेकिन चिली और पेरू का तट इसका अपवाद है। यहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल 3700 मीटर की गहराई तक मिलते हैं। महासागरीय क्षेत्रफल का 8.5 प्रतिशत भूभाग इसके अंतर्गत आता है। इसका औसत ढाल 2° से 4.2°/Km होता है। ढालों का निर्माण धँसान क्रिया या प्लेटों के प्रत्यावर्तन से हुआ है। अफ्रीका के किनारे तथा उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिण अमरिका के पश्चिमी तट पर प्रत्यावर्तन क्रिया के कारण ही ढाल तीव्र पाए जाते हैं। 

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

          यह एक ऐसी स्थलाकृति है जिसकी ऊँचाई समुद्री भूपटल से समुद्र तल तक या उससे नीचे भी हो सकता है। यह एक पहाड़ीनुमा स्थलाकृति है जिसमें चोटियाँ पाई जाती है और पार्श्व का ढाल तीव्र होता है। संरचना के दृष्टिकोण से रेखीय होते हैं। इसमें बेसाल्टिक चट्टानों की प्रधानता होती है। महासागरीय कटक का निर्माण प्लेटों के अपसरण सीमा के सहारे हुआ है। अपसरण सीमा के सहारे प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती है और दरार का निर्माण करती है। इन दरारों से ही मैग्मा पदार्थ मैग्मा चैंबर से बाहर आकर शीतल होती है और कटकों का निर्माण करती है।

       विश्व का सबसे लंबा समुद्री कटक अटलांटिक महासागर में स्थित है जिसकी लंबाई 14400 किलोमीटर है जिसका आकार अंग्रेजी अक्षर ‘S’ के समान है। इसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड से लेकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक हुआ है। यह पृथ्वी पर का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला के रूप में जाना जाता है। इसकी औसत ऊँचाई 2000 से 4000 मीटर तक है। कई स्थानों पर समुद्र से बाहर आकर छोटे-छोटे द्वीपों का निर्माण किया है। इसे उत्तरी अटलांटिक महासागर में विविल थॉमसन कटक और डॉल्फिन कटक कहते हैं जबकि दक्षिणी अटलांटिक में विषुवत रेखा के पास चैलेंजर कटक कहते हैं।

       हिंद महासागर में भी कई समुद्री कटक मिलते हैं जिसकी लंबाई 9000 किलोमीटर है जिसका विस्तार लक्षद्वीप से लेकर अंटार्कटिका तक है। इसका औसत ऊंचाई 2000 मीटर है। इसी कटक पर मालद्वीप, सेल्सेस, मॉरीशस जैसे द्वीप स्थित है। इसके कई स्थानीय नाम है। जैसे- लक्का द्वीप चैगोस, सेंटपॉल चैगोस, एमस्टरडम सेंटपॉल कटक, करगुएलेन गॉसबर्ग कटक।

      प्रशांत महासागर में भी कई कटक मिलते हैं। जैसे- लॉर्डहोवे कटक, टुआमाई कटक, एलबेडरॉस कटक, कोकस कटक, हवाईयन कटक इत्यादि के नाम से प्रसिद्ध है।

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

       समुद्र के अंदर मिलने वाले सपाट मैदान को महासागरीय बेसिक या गहन सागरीय मैदान कहते हैं। सेवरडरूप ने बताया कि महासागरीय कटक के दोनों ओर महासागरीय मैदान का निर्माण हुआ है। यह मैदान 3000 से 6000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। हैरिहेस महोदय ने इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण महासागरीय नितल प्रसार को बताया है।

       विश्व के सभी प्रमुख महासागर में महासागरीय मैदानों का प्रमाण मिलता है। जैसे अटलांटिक महासागर में अटलांटिक कटक के पश्चिमी भाग में चार गहन सागरीय मैदान मिलते हैं। जैसे- लैब्राडोर का मैदान, उत्तरी अमेरिकी बेसिन, ब्राजीलियन बेसिन, अर्जेंटीना बेसिन तथा अटलांटिक कटक के पूर्वी भाग में कुल सात मैदान मिलते हैं। जैसे – स्पेनिश मैदान, केपवर्डे मैदान, केनारी मैदान, गिनी मैदान, अंगोला मैदान, केप बेसिन, अगुल्हास बेसिन मिलते हैं।

      इसी तरह हिंद महासागर में ओमान बेसिन, अरब बेसिन, सोमाली बेसिन, मॉरीशस बेसिन, अंडमान बेसिन, अंटार्कटिक बेसिन, जैसे गहन सागरीय मैदान मिलते हैं।

     इसी तरह प्रशांत महासागर में कैलिफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिण-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत बेसिन मिलते हैं।

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

        महासागरीय या समुद्री गर्त समुद्र का सबसे गहरा भाग होता है। इसकी औसत गहराई 6000 मीटर से अधिक होता है। यह एक रेखीय एवं सँकरी संरचना वाली आकृति है। इसके किनारे का ढाल काफी तीव्र होता है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण प्लेटों का प्रत्यावर्तन है। कुल समुद्री क्षेत्रफल का 7% भाग इसके अंतर्गत आता है।

    विश्व में प्रमुख 57 समुद्री गर्त है। विश्व का सबसे गहरा समुद्री गर्त मेरियाना गर्त (11.02 Km) है जो फिलीपींस द्वीप के पूर्वी भाग में अवस्थित है। विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 फैडम) जो दक्षिण प्रशांत महासागर में अवस्थित है। प्रशांत महासागर में प्रमुख 57 गर्तों में 32 गर्त और अटलांटिक महासागर में 19 गर्त तथा हिंद महासागर में 6 गर्त पाए जाते हैं।

   अटलांटिक महासागर का सबसे गहरा गर्त प्यूर्टोरिको गर्त है जबकि हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरीबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है जिसकी औसत गहराई 4622 फैदम है। सुंडा गर्त इंडोनेशिया में सुमात्रा एवं जावा के मध्यवर्ती भाग में अवस्थित है जिसका औसत गहराई 3826 फैदम है।

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि

     समुद्री भूपटल पर कई स्थालाकृतियाँ भी मिलते हैं। जैसे- चूना पत्थर से युक्त जीव-जंतुओं के निक्षेप से प्रवाल भित्तियों का प्रमाण मिलता है। ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी-पूर्वी भाग में विश्व का सबसे लंबा प्रवाल भित्ति ग्रेट बैरियर रीफ मिलता है।   

        अन्य समुद्री स्थलाकृतियों में समुद्री कंदरा का विशेष स्थान प्राप्त है। यह ‘V’ आकृति का होता है। इसका निर्माण समुद्री तरंगों के अपरदन से महाद्वीपीय मग्नढाल पर होता है।

    समुद्री पहाड़ी (Sea Mount) तथा ग्योट दो विशिष्ट प्रकार के समुद्री स्थलाकृति है। सी माउंट का आकार गुंबदाकार पहाड़ी के समान होता है। जब सी माउंट का ऊपरी भाग टूटकर या अपरदित होकर सपाट हो जाता तो उसे ग्योट कहते हैं।

निष्कर्ष

   इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचनाओं वाली भूपटल है।


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1. Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन

1. Change in Sea Level 

(समुद्र तल में परिवर्तन)


Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन⇒Change in Sea Level

        समुद्री जल का तल (S.L.) समुद्री वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू है। यद्यपि पृथ्वी तंत्र के कुल जल की मात्रा निश्चित है। लेकिन समय-समय पर जल के अवस्था में परिवर्तन के कारण समुद्र तल में भी परिवर्तन होता है। समुद्र तल का परिवर्तन कई कारकों का परिणाम है। जैसे-

◆ हिमयुग के आगमन से समुद्र तल में गिरावट आती है और जब हिमयुग की समाप्ति होती है तथा वातावरण का तापमान अधिक हो जाता है तो स्थलीय हिम पिघलकर समुद्र में आ जाते हैं और जल स्तर ऊँचा हो जाता है।

भूगर्भिक प्रक्रियाएँ भी समुद्र के जलस्तर में परिवर्तन लाते हैं। जैसे अगर भूगर्भिक हलचल के कारण समुद्री नितल का धँसान होता है तो जल स्तर गिरती है और जब उत्थान होता है तो जलस्तर बढ़ती है। जैसे- कई स्थलीय भूभागों पर समुद्री जीवाश्म के प्रमाण मिलते हैं जो यह बताता है कि कभी वहाँ पर समुद्री जल रहा होगा और जब वहाँ समुद्र रहा होगा तो निश्चित रूप से एक समुद्री जलस्तर भी रहा होगा। जब उस भू-भाग का उत्थान हो जाता है तो समुद्र का जलस्तर ऊपर की ओर खिसक जाता है लेकिन यह एक सापेक्षिक घटना है।

नोट : अगर समुद्र नितल का धँसान होता है तो जलस्तर नीचे चली जाती है और जब समुद्र नितल का उत्थान होता है तो समुद्र जलस्तर बढ़ जाता है।

विभिन्न जलवायु विज्ञान एवं समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों ने समुद्र तल में होने वाले परिवर्तन को गत्यात्मक मानते हुए यह माना है कि समुद्र तल में परिवर्तन जल के आयतन में बढ़ोतरी या कमी से होती है।

         उपरोक्त तीनों कारकों में से प्रथम कारक है समुद्र तल परिवर्तन के लिए सबसे उत्तरदायी कारक है।

         विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि समुद्र तल में 110 से 140 मीटर तक परिवर्तन हुआ है। प्रायः सभी हिम युग में समुद्र का तल 100 से 150 मीटर के बीच नीचे चले गए थे। प्लीस्टोसीन के अंतिम हिमानी युग के अंत में समुद्र का तल वर्तमान तल से 110 मीटर नीचे पहुँच गया था। फेयरब्रिज के अनुसारमुद्रतल में सतत सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं।” लेकिन 1800 ई० के बाद में इसमें काफी स्थिरता आई है। हालाकि औद्योगिक क्रांति के बढ़ते प्रभाव के कारण 1970 के दशक से वातावरण में तापमान के बढ़ोतरी से समुद्र तल में भी बढ़ोतरी होने लगी है। सामान्य नियम के अनुसार 1℃ वायुमंडलीय तापमान के बढ़ने से 0.55 mm समुद्री तल में वृद्धि होती है। “विश्व जलवायु विज्ञान संस्था” के अनुसार 1985 से 1997 के बीच औसत तापमान में बढ़ोतरी 0.37℃ हुआ है।

परिणाम
        अनेक पारिस्थैतिक वैज्ञानिकों के अनुसार 2030 ई० तक समुद्रतल में 3 मीटर तक वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में विश्व के कई द्वीपीय देश पूर्णत: जलमग्न हो सकते हैं। मालदीप तथा दक्षिणी प्रशांत महासागर के कई द्वीप समुद्र में डूब जाएँगे। कई तटीय महासागर जैसे मुंबई, न्यूयार्क, टोकियों, मैक्सिको सिटी, रियो डे जेनेरियो पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कई प्रवाल भित्ति जलमग्न हो जाएंगे। अधिक समुद्री तल के परिवर्तन से जलवायु पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। नदियों के मुहाने पर समुद्री ज्वार के कारण बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाएगा। कई तटीय मैंग्रोव या ज्वारीय वनस्पति विलुप्त हो जाएंगे। केवल बांग्लादेश में ही 1.5 करोड़ जनसंख्या को विस्थापित होना पड़ेगा। अर्थात समुद्रतल में हो रहे परिवर्तन का विनाशकारी प्रभाव अवश्य संभावी है। 

उपाय

         भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र तल में हो रहे बढ़ोतरी का अध्ययन करवाया है। इन दोनों के बीच पाए जाने वाले सह संबंध को देखते हुए एक आपातकालीन योजना बनाने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत लगभग एक करोड़ आबादी को तटीय क्षेत्र से विस्थापित कर सुरक्षित स्थान पर बसाने का कार्य किया जा रहा है। इसी तरह विश्व के कई देश ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन पर नजर टिकाए हुए हैं। समुद्र तल में परिवर्तन न  हो इसके लिए कई देशों ने शिखर बैठक कर पृथ्वी सम्मेलन के दस्तावेज पर, क्योटो प्रोटोकॉल पर, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर अपना सहमति व्यक्त किया है ताकि एक ओर वायुमंडल को गर्म होने से बचाया जाय वहीं दूसरी ओर समुद्री तल में हो रहे परिवर्तन को भी रोक जाय।


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