Category Environmental Geography (पर्यावरण भूगोल)

25. Bio-energy Cycle (जैव ऊर्जा चक्र)

Bio-energy Cycle

(जैव ऊर्जा चक्र)



         मानव सभ्यता के विकास में ऊर्जा का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। ऊर्जा ही वह आधार है जिसके सहारे समाज, उद्योग, कृषि तथा तकनीक का विकास संभव हुआ है। आज विश्व की बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिकीकरण ने ऊर्जा की माँग को अत्यधिक बढ़ा दिया है। परंतु ऊर्जा स्रोतों में जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस) का अत्यधिक प्रयोग पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस प्रभाव तथा संसाधनों की तीव्र क्षय जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर रहा है।

     ऐसे परिप्रेक्ष्य में नवीकरणीय (Renewable) एवं स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर मानव का ध्यान आकर्षित हुआ है। जैव ऊर्जा (Bioenergy) इन्हीं में से एक है, जो प्राकृतिक जैविक स्रोतों से प्राप्त होकर सतत विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।

      जैव ऊर्जा चक्र को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह ऊर्जा प्रकृति में किस प्रकार उत्पन्न, संग्रहित, परिवर्तित और पुनः उपयोग होती है।

परिभाषा

    जैव ऊर्जा वह ऊर्जा है जो जीवित या हाल ही में जीवित रहे जैविक स्रोतों (Biomass) जैसे पौधे, पशु, कृषि अवशेष, वनों से प्राप्त अपशिष्ट, गोबर, समुद्री शैवाल आदि से प्राप्त होती है। यह ऊर्जा सौर विकिरण से उत्पन्न होती है और पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के माध्यम से रासायनिक ऊर्जा के रूप में संग्रहीत होती है।

जैव ऊर्जा चक्र की अवधारणा

    जैव ऊर्जा चक्र को एक प्राकृतिक चक्र के रूप में समझा जा सकता है, जिसमें निम्नलिखित चरण सम्मिलित हैं-

(i) सौर ऊर्जा का अवशोषण:-

⇒ सूर्य से आने वाली ऊर्जा पौधों की पत्तियों में क्लोरोफिल द्वारा अवशोषित होती है।

⇒ प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में यह ऊर्जा ग्लूकोज और अन्य कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में संग्रहीत हो जाती है।

(ii) जैव द्रव्य (Biomass) का निर्माण:-

⇒ पौधे प्रकाश संश्लेषण से कार्बनिक पदार्थ (जैव द्रव्य) बनाते हैं।

⇒ यह जैव द्रव्य खाद्य श्रृंखला के माध्यम से शाकाहारी और मांसाहारी जीवों तक पहुँचता है।

(iii) ऊर्जा का उपभोग:-

⇒ जीवधारी भोजन के रूप में जैव द्रव्य का उपभोग करते हैं और श्वसन (Respiration) के द्वारा ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

⇒ यह ऊर्जा उनकी शारीरिक क्रियाओं, वृद्धि और प्रजनन के लिए प्रयुक्त होती है।

(iv) अपशिष्ट एवं अपघटन:-

⇒ मृत जीव, पत्तियाँ, लकड़ी, गोबर, कृषि अवशेष आदि अपघटक जीवाणुओं और कवकों द्वारा अपघटित होते हैं।

⇒ अपघटन की इस प्रक्रिया में जैविक पदार्थ पुनः अकार्बनिक रूप (CO₂, H₂O, खनिज) में परिवर्तित हो जाता है।

(v) ऊर्जा पुनर्चक्रण (Recycling of Energy):-

⇒ अपघटन से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और खनिज पुनः पौधों द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं।

⇒ इस प्रकार ऊर्जा का प्रवाह और चक्रण निरंतर चलता रहता है। जिसे निम्न चित्रात्मक रूपरेखा में देखा जा सकता है- 

जैव ऊर्जा चक्र – चित्रात्मक रूपरेखा (Flow Diagram)

☀️ सूर्य ऊर्जा
 ↓
पौधे (प्रकाश संश्लेषण)

जैव द्रव्य (Biomass)

उपभोक्ता (Energy Use)

मृत अवशेष / गोबर / अपशिष्ट

अपघटक (बैक्टीरिया, कवक)

CO₂ + H₂O + खनिज

पुनः पौधों द्वारा अवशोषण

♻️ सतत जैव ऊर्जा चक्र

Bio-energy Cycle

जैव ऊर्जा चक्र के प्रमुख स्रोत

⇒ कृषि अपशिष्ट- फसल अवशेष, भूसा, गन्ने की खोई, धान की भूसी।

⇒ वन संसाधन- लकड़ी, पत्तियाँ, झाड़-झंखाड़।

⇒ पशु अपशिष्ट- गोबर, पशु शव।

⇒ औद्योगिक अपशिष्ट- खाद्य उद्योग से निकलने वाला जैविक पदार्थ, चीनी मिलों का अपशिष्ट।

⇒ घरेलू अपशिष्ट- रसोई से निकलने वाला जैविक कचरा।

⇒ जल स्रोत- शैवाल (Algae), जलीय पौधे।

जैव ऊर्जा चक्र में ऊर्जा रूपांतरण की प्रक्रियाएँ

     जैव द्रव्य से ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न रूप हैं:

(i) प्रत्यक्ष दहन (Direct Combustion):-

⇒ लकड़ी, फसल अवशेष आदि को जलाकर ऊर्जा (ऊष्मा) प्राप्त की जाती है।

⇒ पारंपरिक रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में यह सबसे सामान्य तरीका है।

(ii) जैव गैसीकरण (Biogasification):-

⇒ गोबर या अन्य अपशिष्ट से बायोगैस (मुख्यतः मिथेन) का निर्माण होता है।

⇒ यह गैस घरेलू ईंधन एवं बिजली उत्पादन के लिए प्रयोग होती है।

(iii) जैव ईंधन (Biofuels):-

⇒ गन्ने के शीरे से एथेनॉल, वनस्पति तेलों से बायोडीजल तैयार किया जाता है।

⇒ इनका उपयोग पेट्रोल और डीजल के विकल्प के रूप में होता है।

(iv) जैव विद्युत (Bio-electricity):-

⇒ बायोमास को थर्मल पावर प्लांट में जलाकर या बायोगैस से टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है।

जैव ऊर्जा चक्र का पारिस्थितिक महत्व

(i) कार्बन चक्र में योगदान:-

⇒ पौधे CO₂ को अवशोषित कर जैव द्रव्य बनाते हैं और श्वसन/अपघटन से पुनः वायुमंडल में CO₂ लौटती है।

⇒ यह प्रक्रिया ग्रीनहाउस गैसों को संतुलित करने में सहायक है।

(ii) ऊर्जा प्रवाह:-

⇒ उत्पादक (पौधे) → उपभोक्ता (जीव) → अपघटक (बैक्टीरिया, कवक)।

⇒ ऊर्जा एक स्तर से दूसरे स्तर तक प्रवाहित होती है।

(iii) सतत विकास:-

⇒ जैव ऊर्जा अक्षय स्रोत है, क्योंकि इसे बार-बार पुनः उत्पन्न किया जा सकता है।

⇒ यह ग्रामीण आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

जैव ऊर्जा चक्र के लाभ

⇒ नवीकरणीय और सतत स्रोत।

⇒ अनुकूल पर्यावरण, कम कार्बन उत्सर्जन।

⇒ ग्रामीण विकास में सहायक- रोजगार सृजन, ऊर्जा आत्मनिर्भरता।

⇒ कचरे का प्रबंधन- कृषि एवं घरेलू अपशिष्ट का उपयोग।

⇒ ऊर्जा सुरक्षा- जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम।

जैव ऊर्जा चक्र की चुनौतियाँ

⇒ प्रौद्योगिकी की कमी- ग्रामीण क्षेत्रों में उन्नत तकनीक की अनुपलब्धता।

⇒ प्रारंभिक लागत अधिक- बायोगैस संयंत्र, बायोफ्यूल संयंत्र आदि महंगे।

⇒ भूमि एवं संसाधनों पर दबाव- बड़े पैमाने पर बायोफ्यूल उत्पादन के लिए कृषि भूमि की आवश्यकता।

⇒ संग्रहण और भंडारण की कठिनाई।

⇒ जन-जागरूकता की कमी।

भारत में जैव ऊर्जा की स्थिति

       भारत कृषि प्रधान देश है, जहाँ प्रचुर मात्रा में कृषि एवं पशु अपशिष्ट उपलब्ध है।

⇒ बायोगैस कार्यक्रम- ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों परिवारिक बायोगैस संयंत्र स्थापित।

⇒ बायोफ्यूल नीति 2018- एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा, 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य।

⇒ राष्ट्रीय बायो एनर्जी मिशन- बायोमास आधारित ऊर्जा परियोजनाओं को प्रोत्साहन।

⇒ हरित ऊर्जा गलियारा- जैव ऊर्जा को विद्युत ग्रिड से जोड़ने की योजना।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

       विश्व स्तर पर यूरोप, अमेरिका, ब्राजील जैसे देश जैव ऊर्जा के उपयोग में अग्रणी हैं।

⇒ ब्राजील- एथेनॉल उत्पादन और इसके परिवहन में विश्व नेता।

⇒ यूरोप- बायोमास आधारित विद्युत उत्पादन।

⇒ अमेरिका- बायोफ्यूल रिसर्च एवं व्यावसायिक उपयोग में अग्रणी।

निष्कर्ष

     जैव ऊर्जा चक्र प्रकृति में ऊर्जा प्रवाह और पुनर्चक्रण का एक अद्भुत उदाहरण है। यह न केवल पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखता है, बल्कि मानव समाज को एक स्वच्छ, अक्षय और पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा विकल्प भी प्रदान करता है। आज ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना करने में जैव ऊर्जा चक्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    सही नीतियों, तकनीकी विकास, जन-जागरूकता और अनुसंधान से जैव ऊर्जा को मुख्य धारा में लाया जा सकता है। इस प्रकार जैव ऊर्जा चक्र मानवता को ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में आगे ले जाने में सक्षम है।

24. Gas leak (गैस रिसाव)

Gas leak

(गैस रिसाव)



      गैस आधुनिक जीवन और औद्योगिक विकास का अभिन्न अंग हो गया है। घरेलू स्तर पर खाना बनाने से लेकर औद्योगिक स्तर पर ऊर्जा उत्पादन, वाहन संचालन, दवा निर्माण, उर्वरक निर्माण और रासायनिक प्रक्रियाओं में गैस का प्रयोग होता है। हलांकि गैस का उपयोग जितना उपयोगी है, उससे जुड़ा खतरा उतना ही गंभीर भी है। यदि गैस का रिसाव (Gas Leakage) हो जाए तो यह दुर्घटनाओं, आग, विस्फोट, स्वास्थ्य-हानि तथा पर्यावरणीय प्रदूषण का कारण बन सकता है। अतः गैस रिसाव एक गंभीर सामाजिक, औद्योगिक और पर्यावरणीय समस्या है, जिस पर विशेष ध्यान देना आवश्यक हो जाता है।

परिभाषा

   गैस रिसाव वह स्थिति है जब किसी पाइपलाइन, सिलेंडर, टैंक या औद्योगिक संयंत्र से गैस अनियंत्रित रूप से बाहर निकलने लगे। यह गैस प्रज्वलनशील (flammable), विषैली (toxic) अथवा दमघोंटू (asphyxiant) हो सकती है। इस तरह का रिसाव सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण तीनों के लिए खतरनाक होता है।

गैस रिसाव के सामान्य स्रोत

     गैस रिसाव कई कारणों से हो सकता है। इसके प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं-

1. घरेलू स्तर पर:-

  • एलपीजी (Liquefied Petroleum Gas) सिलेंडरों से रिसाव
  • चूल्हे या पाइपलाइन में खराबी
  • रेगुलेटर व नलियों में दरार

2. औद्योगिक स्तर पर:-

  • रासायनिक कारखानों में गैस उत्पादन के दौरान रिसाव
  • भंडारण टैंकों या पाइपलाइन में लीकेज
  • मशीनरी की खराबी या रखरखाव में लापरवाही

3. परिवहन व वितरण प्रणाली में:-

  • गैस टैंकरों से दुर्घटनावश रिसाव
  • लंबी पाइपलाइन नेटवर्क में दरारें
  • दबाव नियामक (Pressure Regulator) की गड़बड़ी

प्रमुख कारण

     गैस रिसाव के पीछे तकनीकी और मानवीय दोनों प्रकार की त्रुटियाँ जिम्मेदार होती हैं।

(i) तकनीकी कारण:-

     पाइपलाइन की जंग लगना, उपकरणों की पुरानी स्थिति, सील या जोड़ों की कमजोरी।

(ii) मानवीय त्रुटियाँ:-

     कर्मचारियों की लापरवाही, सुरक्षा नियमों का पालन न करना, प्रशिक्षण की कमी।

(iii) प्राकृतिक कारण:-

     भूकंप, बाढ़ या अन्य आपदाओं से पाइपलाइन या टैंक का क्षतिग्रस्त होना।

(iv) अनियमित रखरखाव:-

     समय-समय पर निरीक्षण और मरम्मत का अभाव।

गैस रिसाव से होने वाले प्रभाव

          गैस रिसाव (Gas Leakage) एक गंभीर समस्या है, जिसका प्रभाव व्यक्ति, समाज और पर्यावरण सभी पर गहरा पड़ता है। इसके प्रभाव तात्कालिक (तुरंत होने वाले) और दीर्घकालिक (लंबे समय तक बने रहने वाले) दोनों हो सकते हैं। नीचे इसके प्रमुख प्रभाव दिए जा रहे हैं:-

तात्कालिक प्रभाव

(i) मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

  • सिर दर्द, उल्टी, सांस लेने में तकलीफ
  • आंख, नाक व गले में जलन
  • अधिक मात्रा में गैस के संपर्क से बेहोशी और मृत्यु
  • मिथाइल आइसोसाइनेट, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें घातक प्रभाव डाल सकती हैं

(ii)  पर्यावरण पर प्रभाव:-

  • वायुमंडलीय प्रदूषण
  • पौधों और जीव-जंतुओं की मृत्यु
  • जल व मिट्टी का प्रदूषण (यदि रिसी हुई गैस रासायनिक हो)

(iii) सामाजिक व आर्थिक प्रभाव:-

  • आग लगने से जन-धन की हानि
  • बड़े औद्योगिक हादसों से हजारों लोग प्रभावित
  • उत्पादन प्रक्रिया पर प्रतिकूल असर, उद्योग का नुकसान

दीर्घकालिक प्रभाव

  • अगली पीढ़ी पर असर- जहरीली गैसों के कारण जन्म लेने वाले बच्चों में शारीरिक व मानसिक विकलांगता हो सकती है।

  • स्थायी प्रदूषण- प्रभावित क्षेत्र लंबे समय तक प्रदूषित बने रहते हैं।

  • विश्वसनीयता में कमी- दुर्घटना वाले उद्योग और क्षेत्र की छवि खराब हो जाती है, जिससे निवेश और विकास बाधित होता है।

गैस रिसाव से जुड़ी प्रमुख घटनाएँ

(i) भोपाल गैस त्रासदी (1984):-

⇒ भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक हादसा।

⇒ यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव।

⇒ लाखों लोग प्रभावित, हजारों की मौत, दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ।

(ii) विश्व की अन्य घटनाएँ:-

⇒ जर्मनी, रूस और अमेरिका में कई औद्योगिक गैस विस्फोट।

⇒ हाल के वर्षों में भारत में भी सिलेंडर फटने और टैंकर दुर्घटनाओं की घटनाएँ आम हैं।

गैस रिसाव की पहचान

    गैस रिसाव का समय रहते पता लगाना जीवन रक्षक हो सकता है।

(i) गंध से पहचान:-

       एलपीजी जैसी गैसों में गंध मिलाई जाती है ताकि रिसाव होने पर तुरंत पता चले।

(ii) झाग परीक्षण:-

     पाइप या जोड़ पर साबुन का पानी लगाकर बुलबुले उठने से रिसाव का पता चलता है।

(iii) डिटेक्टर उपकरण:-

     औद्योगिक क्षेत्रों में गैस डिटेक्टर मशीनें रिसाव की पहचान करती हैं।

(iv) स्वास्थ्य संकेत:-

      अचानक सिर दर्द, सांस में तकलीफ़, चक्कर आना।

गैस रिसाव से बचाव के उपाय

(i) घरेलू स्तर पर

⇒ गैस सिलेंडर व चूल्हे की नियमित जाँच।

⇒ पाइप व रेगुलेटर समय-समय पर बदलना।

⇒ गैस इस्तेमाल करते समय वेंटिलेशन बनाए रखना।

⇒ गैस रिसाव की गंध आते ही खिड़की-दरवाजे खोलें, बिजली के उपकरण न चलाएँ।

(ii) औद्योगिक स्तर पर

⇒ गैस रिसाव डिटेक्टर और अलार्म सिस्टम लगाना।

⇒ कर्मचारियों को सुरक्षा प्रशिक्षण देना।

⇒ नियमित निरीक्षण व रखरखाव।

⇒ आपातकालीन निकासी योजना (Evacuation Plan) तैयार करना।

(iii) सरकारी व प्रशासनिक उपाय

⇒ औद्योगिक सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन।

⇒ गैस परिवहन के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान।

⇒ दुर्घटनाओं के बाद त्वरित राहत और पुनर्वास।

गैस रिसाव की स्थिति में क्या करें?

⇒ तुरंत सिलेंडर का रेगुलेटर बंद करें।

⇒ सभी खिड़कियाँ और दरवाजे खोलकर वेंटिलेशन बढ़ाएँ।

⇒ किसी भी प्रकार का माचिस, लाइटर या बिजली का स्विच न जलाएँ।

⇒ यदि गंध अधिक हो तो तुरंत घर/स्थान खाली करें।

⇒ निकटतम गैस आपूर्ति एजेंसी या दमकल विभाग को सूचित करें।

निष्कर्ष

    गैस रिसाव एक गंभीर समस्या है जो क्षणभर में भीषण त्रासदी में बदल सकती है। इसके दुष्परिणाम केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहते बल्कि सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय हानि भी पहुँचाते हैं। भोपाल गैस त्रासदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
    इसलिए आवश्यक है कि घरेलू, औद्योगिक और परिवहन-सभी स्तरों पर सावधानी, तकनीकी सुधार और सुरक्षा उपाय अपनाए जाएँ। प्रत्येक नागरिकों को गैस रिसाव की पहचान, बचाव और आपातकालीन कार्यवाही की जानकारी होनी चाहिए।
याद रखना चाहिए कि- सुरक्षा में ही बचाव है।”

24. Natural hazards and disasters (प्राकृतिक खतरे और आपदाएँ)

Natural hazards and disasters

(प्राकृतिक खतरे और आपदाएँ)



    Natural hazards and disasters

       प्राकृतिक खतरों और आपदाओं में उन घटनाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनसे जन-धन की अपार हानि होती है और जिनसे प्रलय एवं विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उल्लेखनीय है कि मानव इन घटनाओं की उत्पत्ति को पूर्णतः नियंत्रित नहीं कर सका है।

    प्राकृतिक खतरों और आपदाओं के अन्तर्गत ज्वालामुखी उद्गार, भूकम्प, भूस्खलन, टारनेडो, हरीकेन, चक्रवात, बाढ़, सूखा, जंगल की आग और ब्लिजार्ड जैसी प्राकृतिक घटनाओं को सम्मिलित किया गया है। ध्यान रहे कि उपरोक्त उल्लेखित सभी घटनाएं उस समय पर्यावरणीय या प्राकृतिक आपदाओं का रूप लेती हैं जब इनसे मानव को भारी हानि होती है।

    स्पष्ट है कि पर्यावरणीय आपदाओं की तीव्रता का निर्धारण उनके द्वारा होने वाली जन-धन की हानि की मात्रा के आधार पर किया जाता है। उदाहरण के लिए, मानव रहित क्षेत्रों में भूकम्प एवं ज्वालामुखी उद्गार कभी भी आपदा के रूप में वर्णित नहीं किया जाता है, लेकिन जब कभी भूकम्प और ज्वालामुखी का उद्‌गार मानव आवासित क्षेत्रों में होता है तो ये प्राकृतिक घटनाएं आपदाओं के रूप में विवेचित की जाती हैं।       

    इसी प्रकार मानव जान-बूझकर भी इन प्राकृतिक घटनाओं से ग्रस्त क्षेत्रों को अपने आवास हेतु चुनता है। विश्व में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां मानव ने भूकम्पग्रस्त एवं बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों को अपने आवास-स्थल के रूप में पसन्द किया है। इस प्रकार के मानवीय निर्णय उसके अवबोध (Perception) से, कि वह किसी भी प्राकृतिक घटना का बोध कैसे करता है, प्रभावित होते हैं।

     ज्ञातव्य है कि मानवीय अवबोध समय और संस्कृति (culture) के साथ बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए, तिमोर सागर के समीपवर्ती क्षेत्रों में चक्रवातों से अपार जन-धन की हानि का भय सदैव बना रहता है।

   1974 के भयंकर चक्रवात से हुई जन-धन की अपार हानि के उपरान्त डार्विन और उत्तरी आस्ट्रेलिया के निवासियों ने इस घटना का बोध कर अपने आवास हेतु अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित स्थलों को चुना है।

    किसी भी प्राकृतिक घटना के बोध द्वारा ही इस बात का निर्धारण होता है कि या तो मानव उस आपदाग्रस्त क्षेत्र को छोड़ दे या फिर उस आपदा से होने वाली हानि को स्वीकार कर उस आपदाग्रस्त क्षेत्र में ही रहे या फिर उस आपदा को कम करने के उपाय करे।

    आपदा को कम करने के उपायों में व्यावहारिक भौतिक भूगोल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो घटना की तीव्रता एवं आवृत्ति, इनकी उत्पत्ति के स्थल और उत्पत्ति के कारकों का ज्ञान करा मानव को इन घटनाओं को नियंत्रित करने के उपायों की ओर प्रवृत्त करती है।

मुख्य प्रकार:

1. बाढ़ (Floods) – अत्यधिक वर्षा या नदी के उफान से जलभराव।

2. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption) – मैग्मा और गैसों का विस्फोट।

3. भूकंप (Earthquake) धरती की सतह पर कंपन। 

4. सुनामी (Tsunami) – समुद्र में भूकंप या ज्वालामुखी से उत्पन्न विशाल लहरें।

5. सूखा (Drought) – लंबे समय तक वर्षा न होना।

6. चक्रवात (Cyclone/Hurricane/Typhoon) – तेज हवाएँ और तूफान।

7. भूस्खलन (Landslide) – पर्वतीय ढलानों से चट्टानों या मिट्टी का खिसकना।

8. अत्यधिक तापमान (Extreme Temperature) – लू, शीतलहर, हीटवेव।

9. जंगल की आग (Forest Fire / Wildfire) – भारत में प्रमुख उदाहरण (जैसे उत्तराखंड या हिमाचल के जंगलों की आग)।

1. बाढ़ (FLOODING)

    पर्यावरणीय अथवा प्राकृतिक आपदा के रूप में बाढ़ एक सामान्य घटना है जो मानव को प्रभावित करती है विशेषकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में। जल की उपलब्धता, समतल भूमि की उपलब्धता, कृषि कार्यों में सुविधा तथा बाढ़ को एक आपदा के रूप में स्वीकार न करने के मानवीय बोध के कारण विश्व जनसंख्या का एक बड़ा भाग बाढ़ के मैदानों में रह रहा है।

    उल्लेखनीय है कि मानव वायुमण्डलीय प्रक्रमों को नियंत्रित नहीं कर सकता है अर्थात् वह हरीकेन और चक्रवातों को तो आने से नहीं रोक सकता है, लेकिन जलवायवीय, भू-आकृतिक, जलीय और जैविक प्रक्रमों के सैद्धान्तिक ज्ञान का उपयोग कर बाढ़ जैसी आपदा को अवश्य नियंत्रित कर सकता है। एक अपवाह बेसिन में ढालों पर क्रियाशील प्रक्रमों और नदियों द्वारा उन प्रक्रमों के प्रति अनुक्रिया के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यही घनिष्ठ सम्बन्ध नदी में बाढ़ को नियंत्रित करने हेतु सैद्धान्तिक आधार प्रदान करता है।

    बाढ़ जैसी आपदा को नियंत्रित करने के लिए वस्तुतः दो प्रकार के उपागमों को व्यवहार में लाया जाता है।

     पहले उपागम (Approach) में बाढ़ को रोकने के सभी उपाय नदियों के उद्गम स्थल तथा ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में क्रियान्वित किए जाते हैं, जैसे:

(i) ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में ढालों को रूपान्तरित (Modified) करना,

(ii) नदी के उद्गम स्थल एवं ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में वृहत् पैमाने पर वृक्षारोपण करना ताकि वर्षा जल का भूमि में अन्तः स्पन्दन (Infilteration) अधिक हो सके, फलतः वाही जल की मात्रा में कमी हो सके और वह विलम्ब से नदियों में पहुंचे।

      वृक्षारोपण द्वारा मृदा अपरदन में कमी होने पर नदियों का अवसाद-भार तो कम होता ही है साथ ही नदियों की जलधारण क्षमता में कमी नहीं आने के कारण बाढ़ की आवृत्ति में भी कमी आती है और बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र का भी विस्तार नहीं हो पाता है।

     दूसरे उपागम (Approach) के अन्तर्गत नदियों के मार्ग में ही बाढ़ को नियंत्रित करने के उपाय किए जाते हैं, जैसे :

(i) नदी के प्रवाह मार्ग में बाढ़ को नियन्त्रित करने हेतु भण्डारण जलाशयों अर्थात् बांधों का निर्माण करना।

(ii) नदियों के विसर्पाकार (Meandering) मार्ग को अभियांत्रिकी की सहायता से सीधा करना।

(iii) बाढ़ के समय अतिरिक्त जल के प्रवाह को निम्न भूमि (Low Land) या कृत्रिम रूप से निर्मित जलवाहिकाओं (Channels) में मोड़ देना।

(iv) जहां आवश्यक हो, वहां अभियांत्रिकी उपायों द्वारा नदियों के किनारों पर कृत्रिम तटबन्धों, डाइक (दीवार जैसी संरचना) और बाढ़-दीवाल (Flood wall) का निर्माण करना।

    उपरोक्त उपायों के द्वारा नदियों में बाढ़ के समय जल के आयतन, उसकी ऊंचाई तथा परिमाण में कमी की जा सकती है। यद्यपि ये उपाय नदी की गति और उसके अपरदन तथा निक्षेपण कार्यों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।

     उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वस्तु को बाढ़-प्रूफ (Flood-Proof) बनाने की बजाय समय पर बाढ़ की भविष्यवाणी और चेतावनी देकर मानव एवं पशुधन को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना अधिक सुविधाजनक एवं सस्ता होता है।

2. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)

     ज्ञातव्य है कि परिप्रशान्त मेखला तथा मध्य महाद्वीपीय मेखला के अन्तर्गत विश्व के 80 प्रतिशत ज्वालामुखी आते हैं और वस्तुतः विश्व के 80 प्रतिशत सक्रिय (Active) ज्वालामुखी विनाशकारी (Destructive) अभिसारी (Convergent) प्लेट किनारों के सहारे पाए जाते हैं।

    यह सत्य है कि ज्वालामुखी के उद्‌गार को रोका तो नहीं जा सकता है, लेकिन उसके भावी उद्गार की भविष्यवाणी करके उसके द्वारा होने वाली जल-धन की हानि को अवश्य कम किया जा सकता है। इस हेतु निम्नांकित उपाय व्यवहार में लाए जा सकते हैं :

(i) सम्भावित ज्वालामुखी उद्‌गार वाले क्षेत्रों में भूकम्प लेखी यंत्र द्वारा भकम्पीय घटनाओं के नियमित मापन से प्राप्त संकेतों के आधार पर भावी ज्वालामुखी उद्गार की भविष्यवाणी की जा सकती है।

(ii) मेग्मा तथा गैसों के भूगर्भ में नीचे से उपर की ओर उठने से धरातलीय सतह में उभार तथा झुकाव के रूप में विरूपण होने लगता है। विरूपण की यह मात्रा ज्वालामुखी उद्गार के पहले बढ़ती जाती है अतः सम्भावित क्षेत्रों में टिल्टमीटर की सहायता से धरातलीय सतह में झुकाव के नियमित मापन से भावी ज्वालामुखी उद्‌गार के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है।

(iii) सम्भावित ज्वालामुखी उद्गार के पहले तापमान में वृद्धि होने लगती है। इस आधार पर क्रेटर झीलों, गर्म जल स्रोतों, गेसर एवं धुंआरों के जल के तापमान के नियमित मापन से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भावी ज्वालामुखी उद्गार की भविष्यवाणी की जा सकती है।

(iv) स्थानीय गुरुत्व तथा चुम्बकीय क्षेत्र के मापन से प्राप्त परिणामों से सम्भावित ज्वालामुखी के उद्‌गार की भविष्यवाणी में सहायता मिलती है। स्मरणीय है कि उपरोक्त उपायों को व्यवहार में लाते हुए 1980 में संयुक्त राज्य अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में हुए सेण्ट हेलेन्स ज्वालामुखी के उद्गार की भविष्यवाणी पहले की जा चुकी थी। इस भविष्यवाणी के आधार पर व्यवहार में लाए गए सुरक्षात्मक उपायों के कारण ही इस ज्वालामुखी उद्गार से जन-धन की हानि अपेक्षाकृत कम हुई।

3. भूकम्प

   भूकम्प प्राकृतिक भू-आकृतिक आपदा है। ज्ञातव्य है कि रचनात्मक प्लेट सीमाओं के सहारे मध्यम परिमाण वाले भूकम्प आते हैं जबकि उच्च परिमाण वाले भूकम्प विनाशी प्लेट सीमाओं के सहारे आते हैं, जहां पर दो अभिसारी प्लेट आपस में टकराते हैं तथा अपेक्षाकृत भारी प्लेट का हल्के प्लेट के नीचे क्षेपण (Subduction) होता है।

    इस दृष्टि से विश्व में परिप्रशान्त मेखला क्षेत्र, अल्पाइन-हिमालय पर्वत श्रृंखला के सहारे स्थित क्षेत्र तथा उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी सीमान्त क्षेत्र भूकम्प की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील हैं।

    यद्यपि प्लेट के किनारों पर स्थित क्षेत्रों में भूकम्पीय घटनाएं सर्वाधिक होती हैं तथापि प्लेट के मध्यवर्ती भागों में भी कभी-कभी भूकम्प आते हैं। ज्वालामुखी उद्‌गार की भांति ही भूकम्प को भी आने से रोका नहीं जा सकता है, किन्तु भूकम्प की दृष्टि से संवेदनशील भागों में मानव बसाव को हतोत्साहित करके भूकम्प द्वारा होने वाली जन-धन की हानि को अवश्य कम किया जा सकता है। साथ ही धरातलीय स्थिरता की दृष्टि से अस्थिर एवं कमजोर क्षेत्रों का निर्धारण करके उन क्षेत्रों में मानव बसाव को रोका जा सकता है।

4. सुनामी (Tsunami)

      सुनामी समुद्र में उत्पन्न होने वाली अत्यधिक ऊँची और तीव्र गति से चलने वाली लहरों की शृंखला होती है। यह एक प्रकार का प्राकृतिक खतरा है जो अक्सर भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, समुद्र के भीतर भूस्खलन या उल्का-पिंड के गिरने जैसी घटनाओं के कारण उत्पन्न होता है। जब यह खतरा मानव जीवन, संपत्ति और पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचाता है, तब यह एक प्राकृतिक आपदा का रूप ले लेता है।

5. सूखा (Drought) 

      सूखा (Drought) एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो लंबे समय तक वर्षा के अभाव या अपर्याप्त वर्षा के कारण उत्पन्न होती है। यह प्राकृतिक खतरा कृषि, जल संसाधनों, पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। सूखा केवल पानी की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक-आर्थिक असंतुलन और पर्यावरणीय संकट का कारण भी बनता है।

6. चक्रवात (Cyclone/Hurricane/Typhoon)

        जब समुद्र की सतह पर अत्यधिक गर्मी और नमी इकट्ठी हो जाती है, तो वायुमंडलीय दबाव कम होने लगता है और तेज़ हवाओं के साथ यह प्रणाली घूमती है। यही प्रक्रिया चक्रवात कहलाती है। चक्रवात एक प्राकृतिक आपदा है जो समुद्री एवं तटीय क्षेत्रों में सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती है। इसके प्रबंधन हेतु पूर्वानुमान, चेतावनी प्रणाली, तटीय सुरक्षा दीवारें और राहत कार्य बेहद ज़रूरी हैं।

7. भूस्खलन (Landslide)

     भूस्खलन (Landslide) प्राकृतिक खतरा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह अचानक होने वाली प्राकृतिक भू-प्रक्रिया है, जिसमें भारी मात्रा में मिट्टी, चट्टानें और मलबा ढलान से नीचे की ओर खिसक जाते हैं। यह घटना अक्सर लोगों, पशुओं और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न करती है। इसी कारण भूस्खलन को प्राकृतिक खतरा (Natural Hazard) की श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि यह मानव जीवन, आजीविका, अवसंरचना और पर्यावरण सभी को प्रभावित करता है।

8. अत्यधिक तापमान (Extreme Temperature)

       अत्यधिक तापमान (Extreme Temperature) को प्राकृतिक खतरा (Natural Hazard) इसलिए माना जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से घटित होने वाली ऐसी चरम स्थिति है जो मानव जीवन, पशु-पक्षियों, कृषि, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है

9. जंगल की आग (Forest Fire / Wildfire) 

  जंगल की आग (Forest Fire / Wildfire) को प्राकृतिक आपदा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होकर बड़े पैमाने पर पर्यावरण, जीव-जंतु, मानव जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुँचाती है। 

निष्कर्ष:

      स्पष्ट है कि प्राकृतिक भू-आकृतिक प्रकोपों के सम्भावित खतरों एवं प्रभावों के निर्धारण, भविष्यवाणी तथा आकलन एवं प्रबन्धन में भू-आकृति विज्ञान से पर्याप्त सहायता मिलती है।

23. Environmental laws (पर्यावरण कानून)

Environmental laws

(पर्यावरण कानून)



      पर्यावरण कानून पानी की गुणवत्ता, वायु गुणवत्ता, लुप्तप्राय वन्य प्राणी, और कई अन्य पर्यावरणीय कारकों से संबंधित कानूनों और विनियमों का एक संग्रह है।

⇒ पर्यावरण कानून कई कानूनों और विनियमों को शामिल करता है, लेकिन वे सभी पर्यावरण के लिए खतरों को कम करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए मानव – प्रकृति की बातचीत को विनियमित करने के एक सामान्य लक्ष्य की दिशा में काम करते हैं।

⇒ जैसा कि हम कल्पना कर सकते हैं कि पर्यावरण कानून व्यापक है क्योंकि प्राकृतिक पर्यावरण में कई पहलू शामिल हैं। इसका मतलब है कि पर्यावरण कानून में हम जिस हवा में सांस लेते हैं, जिस प्राकृतिक संसाधनों पर हम निर्भर करते हैं, पेड़-पौधों और जीवों के लिए जो इस दुनिया को हमारे साथ साझा करते हैं, सब कुछ ध्यान में रखना जरूरी है।

   संक्षेप में पर्यावरण कानून वे नियम और विनियम हैं जो पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण के लिए बनाए गए हैं। ये कानून पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत् विकास को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

⇒ पर्यावरण के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग की आवश्यकता भारत के संवैधानिक ढांचे और भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं में भी परिलक्षित होती है।

⇒ भाग IV क (अनुच्छेद 51A- मौलिक कर्तव्य) के तहत भारतीय संविधान भारत के प्रत्येक नागरिकों पर वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और जीवित प्राणियों के लिए करुणा रखने का कर्तव्य रखता है।  

⇒ इसके अलावा भारत के संविधान के भाग IV (अनुच्छेद 48A- राज्य की नीति निदेशक तत्व) के तहत यह प्रावधान किया गया है कि राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

⇒ भारत की आजादी से पहले भी कई पर्यावरण संरक्षण कानून मौजूद थे। हालांकि, एक अच्छी तरह से विकसित ढांचे को लागू करने के लिए वास्तविक जोर मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (स्टॉकहोम, 1972) के बाद ही आया।  

⇒ स्टॉकहोम (स्वीडन) सम्मेलन के बाद, पर्यावरण से संबंधित मुद्दों की देखभाल के लिए एक नियामक निकाय की स्थापना के लिए 1972 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के भीतर पर्यावरण नीति और योजना के लिए राष्ट्रीय परिषद की स्थापना की गई थी। यह परिषद बाद में एक पूर्ण विकसित पर्यावरण और वन मंत्रालय के रूप में विकसित हुई।

⇒ पर्यावरण और वन मंत्रालय की स्थापना 1985 में हुई थी, जो आज पर्यावरण संरक्षण को विनियमित करने और सुनिश्चित करने के लिए देश में सर्वोच्च प्रशासनिक निकाय है और इसके लिए कानूनी और नियामक ढांचा तैयार करता है।

⇒ 1970 के दशक से, कई पर्यावरण कानून बनाए गए हैं।

⇒ पर्यावरण और वन मंत्रालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अर्थात् केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) मिलकर इस क्षेत्र के नियामक और प्रशासनिक कोर बनाते हैं।

पर्यावरण से संबंधित अन्य कानून

⇒ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972

⇒ जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974

⇒ वन संरक्षण अधिनियम, 1980

⇒ वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981

⇒ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986

⇒ सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम, 1991

⇒ ओजोन – क्षयकारी पदार्थ (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000

⇒ जैविक विविधता अधिनियम, 2002

⇒ राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010

⇒ तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2011

उद्देश्य

1. पर्यावरण संरक्षण:-

    पर्यावरण कानूनों का उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण करना है।

2. प्रदूषण नियंत्रण:-

   पर्यावरण कानून प्रदूषण को नियंत्रित करने और पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए बनाए गए हैं।

3. सतत विकास:-

    पर्यावरण कानून सतत विकास को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय संसाधनों के संरक्षण के लिए बनाए गए हैं।

लाभ

1. पर्यावरण कानून पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण में मदद करते हैं।

2. पर्यावरण कानून जन स्वास्थ्य की रक्षा में मदद करते हैं।

3. पर्यावरण कानून आर्थिक लाभ प्रदान कर सकते हैं, जैसे कि पर्यावरण पर्यटन और हरित प्रौद्योगिकी के विकास के माध्यम से।

चुनौतियाँ

1. अनुपालन:-

   पर्यावरण कानूनों का अनुपालन एक बड़ी चुनौती हो सकती है, खासकर छोटे और मध्यम आकार के उद्योगों के लिए।

2. जागरूकता:-

    पर्यावरण कानूनों के बारे में जागरूकता का अभाव एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

3. वित्तपोषण:-

    पर्यावरण कानूनों के कार्यान्वयन और अनुपालन के लिए वित्तपोषण भी एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

निष्कर्ष:

     निष्कर्षत: भारत में पर्यावरण कानून न केवल देश के मूलभूत कानूनों द्वारा संरक्षित है, बल्कि मानवाधिकार नीतियों में भी शामिल है। प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक मानवाधिकार प्रदूषण-मुक्त वातावरण में रहना है, क्योंकि स्वच्छ पर्यावरण बनाना मानव समाज के लिए आवश्यक है।

      लोगों को सार्वजनिक निकायों, राज्य एवं संघीय प्रशासनों के लिए विकास प्रक्रियाओं के नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों को पहचानना अति आवश्यक है।

     पर्यावरण कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए क्योंकि ये नागरिकों को स्वच्छता को प्राथमिकता देने और प्रदूषण से निपटने के लिए प्रोत्साहित करने का एक प्रभावी साधन हैं।

     हालाँकि, पूरे समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना भी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्व के बिना केवल पर्यावरण कानून ही पर्याप्त नहीं हैं।

22. Sewage disposal (मलजल निपटान)

Sewage disposal

(मलजल निपटान)



     मलजल निपटान (Sewage disposal) का हिंदी अर्थ है मलजल का निस्तारण या अपशिष्ट जल का निपटान अर्थात सीवेज का निपटान (Sewage disposal) का मतलब सीवेज (मलजल) को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से वातावरण में वापस छोड़ने या उसका फिर से उपयोग करने की प्रक्रिया से है।

Sewage disposal

   इसमें सीवेज को इकट्ठा करना, उसको साफ करना और फिर उसे प्राकृतिक जल स्रोतों में छोड़ना या कृषि कार्य, औद्योगिक या अन्य उपयोगों के लिए पुन: उपयोग करना शामिल है।

प्रमुख पहलू:

1. संग्रहण:-

    सीवेज को घरों, व्यवसायों और औद्योगिक क्षेत्रों से सीवर लाइनों के माध्यम से संग्रह किया जाता है।

2. परिवहन:-

    एकत्र किए गए सीवेज को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र) तक पहुंचाया जाता है।

3. उपचार:-

   सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में, सीवेज को विभिन्न चरणों से गुजारा जाता है ताकि उसमें मौजूद प्रदूषकों को हटाया जा सके। 

4. निपटान या पुन: उपयोग:-

    उपचारित सीवेज को या तो नदियों, झीलों या समुद्र जैसे प्राकृतिक जल निकायों में छोड़ दिया जाता है, या फिर इसका उपयोग सिंचाई, औद्योगिक प्रक्रिया या अन्य उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

5. उप-उत्पाद:-

   सीवेज ट्रीटमेंट के दौरान कीचड़ (sludge) जैसे उप-उत्पाद भी बनते हैं, जिनका सुरक्षित रूप से निपटान भी किया जाता है। 

तरीके:

1. सेप्टिक टैंक:-

   ग्रामीण क्षेत्रों या कम आबादी वाले क्षेत्रों में, सेप्टिक टैंक का उपयोग सीवेज को संभालने के लिए किया जाता है। सेप्टिक टैंक एक भूमिगत टैंक होता है जिसमें सीवेज जमा होता है और उसमें मौजूद ठोस पदार्थ अलग हो जाते हैं, जबकि तरल पदार्थ वहीं पर धीरे-धीरे मिट्टी में रिस जाते हैं। 

2. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट:-

   शहरी क्षेत्रों में, सीवेज को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में ले जाया जाता है, जहां इसे विभिन्न चरणों में साफ किया जाता है। 

3. कम्पोस्टिंग शौचालय:-

   कम्पोस्टिंग शौचालय एक शुष्क शौचालय होता है जो मानव मलमूत्र को खाद में बदल देता है।

4. ऑक्सीकरण तालाब:-

    ऑक्सीकरण तालाब उथले तालाब होते हैं जो सीवेज को साफ करने के लिए सूर्य के प्रकाश, शैवाल और ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं।

महत्व:

1. जन स्वास्थ्य:-

     उचित सीवेज निपटान जल जनित बीमारियों के प्रसार को रोकने में मदद करता है। सीवेज में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को हटाकर, सीवेज निपटान सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने का काम करता है।

2. पर्यावरण संरक्षण:-

   सीवेज निपटान जल निकायों और मिट्टी को प्रदूषण से बचाने में मदद करता हैइस प्रकार सीवेज का सुरक्षित निपटान पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाता है।

3. सौंदर्य और मनोरंजक मूल्य:-

   उचित सीवेज निपटान जल निकायों के सौंदर्य और मनोरंजक मूल्य को बनाए रखने में मदद करता है।

4. संसाधनों का पुन: उपयोग:-

    उपचारित सीवेज का पुन: उपयोग पानी और अन्य संसाधनों की कमी को कम करने में मदद करता है।

चुनौतियाँ

1. बुनियादी ढांचा:-

   पुराना या अपर्याप्त सीवेज बुनियादी ढांचा ओवरफ्लो और प्रदूषण का कारण बन सकता है। इसीलिए बुनियादी ढांचा का समय-समय पर निगरानी रखना काफी जरुरी है

2. वित्तपोषण:-

    सीवेज निपटान प्रणालियों के लिए बुनियादी ढांचे और रख-रखाव में महत्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता होती है। अत: सरकार को इसके लिए पर्याप्त वित्तपोषण करना चाहिए

3. जन जागरूकता:-

   उचित सीवेज निपटान के महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण कदम है। इसमें सरकारें, कई सामाजिक संस्थाएं तथा जन सहयोग की सक्रीय भागीदारी जरुरी है

निष्कर्ष:

   इस प्रकार उचित सीवेज निपटान जन स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीवन की गुणवत्ता की रक्षा के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

21. Cleaning of rivers (नदियों की सफाई)

Cleaning of rivers

(नदियों की सफाई)



Cleaning of rivers

    नदियों की सफाई (Cleaning of rivers) एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसे भारत में विशेष रूप से गंगा नदी की सफाई के संदर्भ में देखा जाता है।

   नदियों की सफाई के लिए अनेकों प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें मोटे तौर पर सरकारी, सामुदायिक और व्यक्तिगत प्रयास शामिल हैं। नमामि गंगे कार्यक्रम जैसी राष्ट्रीय योजनाएँ, नदियों को प्रदूषण से बचाने और उनके पुनर्जीवन पर केंद्रित हैं।

    व्यक्तिगत स्तर पर, लोग नदियों में कचरा न डालकर, जल संरक्षण करके और पेड़-पौधे लगाकर नदियों को साफ रखने में योगदान कर सकते हैं।

नदियों की सफाई हेतु प्रमुख प्रयास

1. सरकारी प्रयास

       भारत में नदियों की सुरक्षा और स्वच्छता के लिए सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

(i) गंगा कार्य योजना:-

    गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan) वर्ष 1985 में शुरू की गई एक परियोजना थी जिसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता में सुधार करना था।

इस योजना का प्रमुख पहल प्रदूषण को कम करना और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना था।

(ii) नमामि गंगे कार्यक्रम:-

   यह प्रदूषण को कम करने, जल की गुणवत्ता में सुधार करने और नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को पुन: बहाल कर गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण के लिये एक प्रमुख कार्यक्रम है।

⇒ इसे वर्ष 2014 में 20,000 करोड़ रुपए के बजट के साथ वर्ष 2021 तक की अवधि के लिये लॉन्च किया गया था।

⇒ वर्तमान में यह कार्यक्रम 22,500 करोड़ रुपए (कुल: 42,500 करोड़ रुपए) के साथ मार्च 2026 तक बढ़ा दिया गया है।

(iii) राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना:-

     राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश में नदियों के प्रदूषण को कम करना और पानी की गुणवत्ता में सुधार करना है

⇒ यह योजना गंगा नदी बेसिन को छोड़कर, देश की अन्य प्रमुख नदियों के प्रदूषणग्रस्त हिस्सों पर केंद्रित है

⇒ NRCP के तहत, राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है

(iv) सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP):-

   नदियों में प्रदूषण को कम करने के लिए एसटीपी का निर्माण किया गया है, जो सीवेज को साफ करके नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करते हैं

(v) औद्योगिक अपशिष्ट उपचार:-

   उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करने के लिए नियम बनाए गए हैं अर्थात औद्योगिक अपशिष्ट उपचार, औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाले दूषित पानी को साफ करने की प्रक्रिया है ताकि इसे पर्यावरण में सुरक्षित रूप से छोड़ा जा सके या पुन: उपयोग किया जा सके।

⇒ इसमें विभिन्न प्रकार की भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।

 2. समुदायिक प्रयास

     नदियों की सफाई एक महत्वपूर्ण सामुदायिक प्रयास है जिसमें स्थानीय लोगों, गैर सरकारी संगठनों और विभिन्न सरकारी एजेंसियों को मिलकर काम करना होता है। यह प्रयास नदियों के प्रदूषण को कम करने, जल की गुणवत्ता में सुधार करने और समुदायों के लिए स्वच्छ जल सुनिश्चित करने में काफी मदद करता है। 

(i) स्वयंसेवी सफाई अभियान:-

    इसके तहत लोग नदियों से कचरा उठाते हैं और जागरूकता फैलाते हैं।

(ii) जल संरक्षण अभियान:-

     इसके तहत नदियों को साफ रखने के लिए जल संरक्षण का कार्य किया जाता है।

3. व्यक्तिगत प्रयास

   नदियों की साफ-सफाई के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी कई प्रयास किए जा सकते हैं। जिसमें मुख्य रूप से इधर-उधर कचरा न फैलाना, पेड़-पौधे लगाना, जल संरक्षण का पालन करना, जागरूकता फैलाना और सफाई अभियानों में बढ़-चढ़कर भाग लेना शामिल है। 

(i) कचरा न फैलाना:-

     नदियों में कचरा न डालकर हम प्रदूषण को कम कर सकते हैं।

(ii) पेड़ लगाना:-

     पेड़-पौधे लगाने से मिट्टी का कटाव कम होता है और नदियों में गाद जमा होने से रोका जा सकता है।

(iii) जल संरक्षण का पालन करना:-

    पानी का सीमित उपयोग करके हम नदियों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं।

(iv) जागरूकता फैलाना:-

    नदियों के महत्व के बारे में दूसरों को जागरूक करना अर्थात् नदियों को साफ रखने के लिए हम सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करना होगा।

(v) सफाई अभियान:-

      नदी के किनारे या आस-पास के क्षेत्रों में सफाई अभियान में हमेशा बढ़ चढ़ कर भाग लेना चाहिए। सभी छात्रों को अपने स्कूल, कॉलेज या समुदाय को भी किसी जल निकाय को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता हैं। 

निष्कर्ष:

    इस प्रकार निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि नदियों की सफाई करना एक जटिल समस्या है, इसके लिए सभी जनता के सहयोग और प्रभावी प्रयासों की आवश्यकता है। सरकार, औद्योगिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और आम जनता को मिलकर काम करना होगा ताकि हमारी नदियाँ साफ और स्वस्थ हो सकें।

21. Heat Island (उष्मा द्वीप)

Heat Island

(उष्मा द्वीप)



परिभाषा :-

          नगरीय क्षेत्र ऐसे स्थान होते हैं जिसका तापमान ग्रामीण क्षेत्रों के तापमान से प्राय: अधिक देखने को मिलता है। इस घटना को “नगरीय उष्मा द्वीप” कहा जाता है। यह मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों और नगरीय वातावरण में बड़े-बड़े बहुमंजिले इमारतों, सड़कों और अन्य सतहों द्वारा गर्मी को अवशोषित और धारण करने के कारण होता है

नगरीय ऊष्मा द्वीप के मुख्य कारण:

          नगरीय ऊष्मा द्वीप के मुख्य कारण निम्नलिखित है-

(i) नगरीकरण:-

      नगरीकरण से पेड़-पौधे और हरियाली घटती है, जिससे प्राकृतिक शीतलन (छायांकन व वाष्पोत्सर्जन) कम हो जाता है नगरों में बड़ी-बड़ी और ऊँचे इमारतों, सड़कों और अन्य पक्के सतहों की अधिकता होती है, जो सूर्य की गर्मी को अवशोषित करती हैं और इसे धीरे-धीरे छोड़ती हैं जिससे शहरी वातावरण ग्रामीण वातावरण के अपेक्षा अधिक गर्म हो जाते है

(ii) मानवीय गतिविधियाँ:-

      वाहन, एयर कंडीशनर और औद्योगिक गतिविधियाँ गर्मी उत्पन्न करती हैं, जो ग्रीनहाउस गैसों के कारण फंस जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगरों में यातायात, एयर कंडीशनर, औद्योगिक गतिविधियाँ और ऊर्जा का अधिक उपयोग होता हैं

(iii) हरियाली की कमी:

     नगरीय क्षेत्रों में पेड़ों और अन्य पौधों की कमी होती है, जो गर्मी को अवशोषित करने में मदद करते हैं

(iv) ऊंची इमारतें:

       ये हवा की गति को कम करती हैं, जिससे गर्म हवा फंसी रहती है और उष्मा को रोक देती हैं जिससे तापमान और बढ़ जाता है

(v) सतह का रंग:

         अंधेरी सतहें, जैसे कि कंक्रीट और एस्फाल्ट, सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित करती हैं

नगरीय ऊष्मा द्वीप के प्रभाव

        नगरीय ऊष्मा द्वीप का प्रभाव नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों के तापमान के बीच अंतर में वृद्धि है। इसका मतलब है कि शहर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं। यह प्रभाव मुख्य रूप से नगरीकरण के कारण होता है, जिसमें बहुमंजीले इमारतों, सड़कों और अन्य कठोर सतहों की वृद्धि होती है जो सूर्य की गर्मी को अवशोषित करती हैं और फिर उसे उत्सर्जित करती हैं, जिससे शहर के तापमान में वृद्धि होती है।

     नगरीय ऊष्मा द्वीप के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित है-

(i) स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

    उच्च तापमान लोगों को बीमार कर सकता है, खासकर गर्मी के दिनों में लोगों के स्वास्थ्य पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

⇒ उच्च तापमान के कारण लू लगना, निर्जलीकरण, थकावट और गर्मी से संबंधित अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

⇒ श्वसन संबंधी समस्याओं में वृद्धि हो सकती है।

⇒ तापघात के कारण मृत्यु दर बढ़ सकती है।

(ii) पर्यावरण पर प्रभाव:-

वायु प्रदूषण: नगरीय ऊष्मा द्वीप ओजोन और अन्य प्रदूषकों के उत्पादन को बढ़ा सकता है, जिससे वायु की गुणवत्ता कम हो जाती है।

जल प्रदूषण: शहरी जलमार्गों में तापमान में वृद्धि से पानी में जैव विविधता कम हो सकती है।

ऊर्जा की मांग में वृद्धि: एयर कंडीशनिंग और अन्य कूलिंग उपकरणों की मांग में वृद्धि के कारण ऊर्जा की खपत बढ़ती है, जिससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है।

⇒ जलवायु परिवर्तन: नगरीय ऊष्मा द्वीप ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन को तेज कर सकता है।

(iii) आर्थिक प्रभाव:-

⇒ ऊर्जा की खपत में वृद्धि से बिजली की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।

⇒ गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज पर खर्च बढ़ सकता है।

⇒ शहरीकरण के कारण बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च हो सकता है।

(iv) उच्च तापमान:-

   नगरीय क्षेत्रों में तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक हो सकता है, खासकर रात में क्योंकि पार्थिव विकिरण काफी अधिक उत्सर्जित होती है

(v) ऊर्जा की अधिक खपत:-

    उच्च तापमान के कारण एयर कंडीशनिंग और अन्य ऊर्जा-संवर्धक उपकरणों की आवश्यकता अधिक हो जाती है जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगरों में उर्जा की खपत अधिक होती है

(vi) वायु प्रदूषण:-

   नगरीय क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर भी अधिक हो सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

अन्य प्रभाव:-

⇒ नगरीय क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण वाष्पीकरण की दर बढ़ सकती है, जिससे जल की उपलब्धता कम हो सकती है।

⇒ नगरीय क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण गर्मी से संबंधित बीमारियों की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

⇒ नगरीय ऊष्मा द्वीप के कारण इमारतों और अन्य संरचनाओं पर तापीय तनाव बढ़ सकता है।

नगरीय ऊष्मा द्वीप को कम करने के उपाय:-

(i) हरियाली बढ़ाना:-

    पेड़ों और अन्य पौधों को लगाकर शहरी क्षेत्रों में हरियाली को बढ़ावा देना। पार्क, उद्यान और हरे रंग की छतें (ग्रीन रूफ) शहरों में तापमान कम करने में मदद करते हैं। पेड़ छाया प्रदान करते हैं, हवा का तापमान कम करते हैं और शहरी तापमान को कम करने में मदद करते हैं।

(ii) ऊष्मा-प्रतिरोधी सामग्री का उपयोग:-

     इमारतों और सड़कों के निर्माण में ऊष्मा-प्रतिरोधी सामग्री का उपयोग करना। हल्के रंग के फुटपाथ और सड़कें सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके और गर्मी को अवशोषित करके तापमान को कम करने में मदद करते हैं

(iii) ऊर्जा दक्षता बढ़ाना:-

     ऊर्जा का उपयोग कम करना और ऊर्जा-संवर्धक उपकरणों का उपयोग करना। ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देकर शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा की खपत कम हो सकती है, जिससे गर्मी का उत्सर्जन कम होगा. 

(iv) वाहन प्रदूषण कम करना:-

      लोगों को जागरूक करके वाहनों का उपयोग कम किया जा सकता है साथ ही कम प्रदूषण वाले वाहनों का उपयोग किया जा सकता है। सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करके निजी वाहनों की संख्या को कम किया जा सकता है, जिससे गर्मी का उत्सर्जन कम होगा।

(v) शैक्षिक कार्यक्रम:-

     शिक्षा के माध्यम से लोगों को नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव के बारे में जागरूक किया जा सकता है, जिससे वे अपनी ऊर्जा की खपत को कम कर सकते हैं और अधिक टिकाऊ जीवन शैली अपना सकते हैं

(vi) डिजिटल ट्विन:-

    नगरीय ऊष्मा द्वीप के प्रभाव को मापने और भविष्यवाणी करने के लिए डिजिटल ट्विन का उपयोग किया जा सकता है, जिससे शहर के योजनाकारों को उचित निर्णय लेने में मदद मिलती है 

भारत के नगरीय ऊष्मा द्वीप के संदर्भ में नासा का विश्लेषण:

(i) नासा के अनुसार, दिल्ली के शहरी भागों में नगरीय ऊष्मा द्वीप की घटनाएंँ अधिक हो रही हैं।

(ii) दिल्ली के आसपास के कृषि क्षेत्रों की तुलना में शहरी भागों का तापमान काफी अधिक है।

(iii) नासा के इकोसिस्टम स्पेसबोर्न थर्मल रेडियोमीटर एक्सपेरिमेंट (इकोस्ट्रेस) द्वारा ली गई तस्वीर ने दिल्ली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लाल धब्बे, साथ ही पड़ोसी शहरों जैसे- सोनीपत, पानीपत, जींद और भिवानी के आसपास छोटे लाल धब्बों का खुलासा किया है।

(iii) इकोस्ट्रेस रेडियोमीटर से युक्त उपकरण है जिसे नासा द्वारा 2018 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजा गया था।

(iv) इकोस्ट्रेस मुख्य रूप से पौधों के तापमान का आकलन करने के साथ-साथ उनकी जल की आवश्यकताओं और उन पर जलवायु के प्रभाव को जानने का कार्य करता है।

(v) इकोस्ट्रेस के आंँकड़ों में ये लाल धब्बे नगरीय ऊष्मा द्वीप के अधिक तापमान, जबकि शहरों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कम तापमान की घटनाओं का संकेत देते हैं।

नीतिगत उपाय:

     नगरीय उष्मा द्वीप (Urban Heat Island) प्रभाव को कम करने के लिए, नीतिगत उपाय के रूप में हरित क्षेत्र, ठंडी छतें और हल्के रंग के फुटपाथों को बढ़ावा देना, पेड़ लगाना, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करना, ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना और शहर की योजना में जलवायु को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष:

   इस प्रकार, उपर्युक्त प्रभावों को देखते हुए, उचित रणनीतियों के साथ उनका मुकाबला करना वर्तमान समय की मांग बन गया है। नीति निर्माताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में अवसरों को बढ़ाने के लिए कदम उठाकर अनियोजित विस्तार को कम करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और आगे के विस्तार की योजना बनानी चाहिए। 

नोट:

डिजिटल ट्विन:- डिजिटल ट्विन जिसे डिजिटल डुप्लिकेट भी कहा जाता है, किसी भौतिक वस्तु, प्रक्रिया अथवा प्रणाली का एक आभासी, डिजिटल प्रतिनिधित्व है

     यह भौतिक दुनिया की वस्तु की नकल करता है और वास्तविक समय के डेटा के साथ अपडेट होता है तथा विभिन्न वातावरणों में इसके प्रदर्शन एवं व्यवहार का अनुकरण करने के लिए उपयोग किया जाता है

20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation (पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)

20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation

(पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. पर्यावरण निम्नीकरण के कारणों, परिणामों की चर्चा कीजिए और संबंधित संरक्षण के उपाय पर प्रकाश डालें।

    पर्यावरणीय निम्नीकरण केवल भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की गंभीर समस्यायों में एक है। यह आज की उपभोक्तावादी जीवन, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, अनियोजित विकास, इत्यादि की देन है। प्रत्येक पर्यावरण में जैविक एवं अजैविक घटकों के बीच प्राकृतिक संतुलन का संबंध होता है। जब इस संतुलन में नाकारात्मक परिवर्तन होता है तो उसे ‘पर्यावरणीय निम्नीकरण’ कहते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारक

    पर्यावरणीय निम्नीकरण के कई कारण है जिन्हें हम दो प्रमुख वर्गों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारण

1. प्राकृतिक कारण

(ⅰ) भारी वर्षा, आकिस्मक वर्षाः

(ii) भूस्खलन, हिमस्खलन;

(iii) भूकंप, सूनामी;

(iv) ज्वालामुखी उद्‌गार;

(V) बाढ़, सूखाड़, अकाल;

(1) चक्रवात, हिमपातः

(vii) वायु इत्यादि।

2. मानवीय कारण

(i) वनों की कटाई,

(ii) वृहद बांधों का निर्माण,

(iii) खनन

(iv) औद्योगिकीकरण,

(v) नगरीकरण,

(vⅰ) संचार एवं परिवहन क्रांति

(vii) कीटनाशक एवं उर्वरक के प्रयोग,

(viii) अवैज्ञानिक कृषि,

(ix) अति पशुचारण,

(x) अनियोजित विकास इत्यादि।

1. प्राकृतिक कारण

     भारी या आकस्मिक वर्षा के कारण तीव्र ढाल एवं उबड़-खाबड़ प्रदेशों में तेजी से मृदा अपरदन होती है। जैसे- भारत के चम्बल घाटी क्षेत्र में रील एवं अवनलिका अपरदन के कारण मृदा का क्षरण हुआ है। जबकि महान हिमालय, लघु हिमालय में तीव्र ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के कारण मृदा ह्रास हुआ है।

     भूस्खलन एवं हिमस्खलन से पर्वतीय प्रदेशों में जैविक ह्रास, मृदा क्षरण, स्थलाकृतिक स्वरूप में परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। हिम स्खलन से बेड़-2 हिम और भूस्खलन से छोटे-बड़े चटानें ढाल के सहारे गुरुत्वारण के कारण नीचे गिरते हैं। इससे कई वनस्पति, जीव-जन्तु इत्यादि दब कर नष्ट हो जाते हैं जो पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक कारण है।

    भूकंप के दौरान कई पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं, कितने जीवों की जानें चली जाती हैं जो पर्यावरण निम्निकारण के कारण है। ज्वालामुखी उद्‌गार के समय लावा, राख, जलवाष्प गैस इत्यादि निकलती है जो पर्यावरण को प्रदूषित कर देती हैं। हिमालय क्षेत्र में अधिकतम भूकम्प आते हैं। 1934 में मुंगेर और दरभंगा का भूकम्प, 2001 में कच्छ की भूकम्प इत्यादि उल्लेखनीय है। हिमालय प्रदेश और बैरन द्वीप में ज्वालामुखी की घटना देखने को मिलती है जिससे पर्यावरण निम्नीकरण होती है।

    बाढ़, सूखाड़ और अकाल पर्यावरण निम्नीकरण को जन्म देते हैं। बाढ़ एवं सूखाड़ की बारम्बारता से खाद्य पदार्थ, पेयजल और चारे में कमी आ जाती है। महामारी, अकालमृत्यु, पशुमृत्यु दर बढ़ जाता है। भारत के वृष्टिछाया प्रदेश, द० बिहार, द०-प० उड़ीसा इत्यादि में सूखे के कारण और असम, उत्तरी बिहार इत्यादि में बाढ़ के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई होती है।

     चक्रवात के दौरान वायु की तेज झोंका और तीव्र वर्षा से वृक्ष का गिरना, बड़े भूभाग का जलमग्न होना, बाढ़ आना इत्यादि जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। यह घटना भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

     प्राकृतिक वायु मरुस्थलीय क्षेत्रों से धुलकण को उड़ाकर बाहरी क्षेत्रों में जमा करते रहती है जिसके कारण मरुस्थलीय क्षेत्रों का लगातार विस्तार होता जा रहा है। राजस्थान के थार मरुस्थल से वायु द्वारा धूल कण, बालू उड़ाकर पंजाब, हरियाणा, UP के सीमावर्ती क्षेत्रों में जमा करते रहने से यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

2. मानवीय कारण

     वनों की कटाई पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक प्रमुख कारण है। बढ़ती हुई आबादी के कारण कृषि एवं अधिवास के लिए वनों की कटाई की जा रही है। इसके कारण वनस्पति के विभिन्न प्रजातियों का विलोपीकरण, जैविक विविधता में ह्रास हो रही है और आहार-श्रृंखला पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भूमिगत जल स्तर तेजी से नीचे गिरता है।

       वृहत बांधों के निर्माण भी कई पर्यावरणीय निम्नीकरण को जन्म देते हैं। जैसे- बांधो के पीछे बनाये गये जलाशयों में वनीय भूमि, अधिवासीय क्षेत्र के आ जाने से उनका ह्रास होता है। आस-पास के क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर बढ़ जाने से पेयजल प्रदूषित हो जाता है। खनन से न केवल ऊर्जा संसाधनों का बल्कि अनेक प्रकार के खनिजों का दोहन किया जा रहा है। उन खनिजों पर कई छोटे-बड़े उद्योगों का विकास किया गया है। इससे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण इत्यादि की समस्या उत्पन्न हुई हैं।

     औद्योगिकीकरण और नगरीकरण साथ-2 चलने वाली प्रक्रिया है। आज विश्व के कई नगर महानगर में बदल चुके हैं। केवल भारत में ही 35 महानगर पाये जाते हैं। ये नगर अत्याधिक जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्र है। इन नगरों में जहाँ एक ओर ध्वनि और वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या है। वहीं अवशिष्ट पदार्थी के जलाशयों में छोड़ दिये जाने से जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है।

     संचार एवं परिवहन क्रांति के युग में सड़कों पर परिवहन साधनों का बाढ़ आ चुका है। ये परिवहन साधन जीवाश्म ऊर्जा का उपयोग करते हैं जिससे ग्रीन हाउस गैसों का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन हो रहा है। इसके कारण अनेक प्रकार के पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

     रासायनिक उर्वरक एवं किटनाशकों का प्रयोग खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने हेतु किया जा रहा है। इसके चलते मृदाक्षरण, जल प्रदूषण, सूक्ष्मजीवों के ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है।

    अवैज्ञानिक कृषि, अतिपशुचारण, अनियोजित विकास, मिसाइल तकनीक, आण्विक तकनीक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी इत्यादि के कारण अनेक गंभीर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

परिणाम

    उपरोक्त पाकृतिक एवं मानवीय कारणों से पर्यावरणीय निम्नीकरण की कई गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुई है। जैसे-

Causes

   इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण निम्नीकरण एक गंभीर परिणाम के रूप में उभर रहे हैं। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण करना अति आवश्यक है। इस दिशा में 1992 ई० में विश्व स्तर पर महत्त्वपूर्ण कदम रियो द जेनरियो में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन में उठाये गये। भारत सरकार भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके लिए उन्होंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना किया है जो कई कामक्रमों के माध्यम से इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके अलावे निम्नलिखित उपाय सुझाए जा सकते हैं:-

(i) वनोन्मूलन से बचाव हेतु वनीय नीति और वन संरक्षण कानून के क्रियान्वयन पर सख्ती से ध्यान दिया जाय। सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी, वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाय।

(ii) वन्य जीवों के शिकार पर कठोर प्रतिबंध लगायी जाय।

(iii) खेतों में रासायनिक उर्वरक की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाय।

(iv) जीवाश्म ऊर्जा के जगह पर सौर ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा एवं अन्य वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग पर जोर दिया जाय।

(v) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम से कम किया जाय।

(vi) विस्फोट पदार्थों का कम से कम प्रयोग किया जाय।

(vii) वैज्ञानिक कृषि पर जोर दिया जाए।

(viii) विकास का कार्य सतत् विकास की अवधारणा पर किया जाय।

(ix) पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जन-जागरण बढ़ायी जाय इत्यादि।

     उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पर्यावण निम्नीकरण एक गंभीर समस्या है। यह कई प्रकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न होती है। इसके कई भयानक परिणाम आ रहे हैं। इसलिए ‘पर्यावरण संरक्षण’ की दिशा में कई कार्य किये जा रह हैं और कई कार्य और भी किये जाने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी पूर्ण सफलता आमलोगों की सहभागिता, राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर भी निर्भर कती है।

18. What is biodiversity? Its importance and types (जैव विविधता क्या हैं? इसके महत्त्व एवं प्रकार)

18. What is biodiversity? Its importance and types

(जैव विविधता क्या हैं? इसके महत्त्व एवं प्रकार)



            ‘जैव विविधता’ दो शब्दों से बनी है: पहला ‘जैव’, जिसका अर्थ है जीव विज्ञान या जीवित जीवों से संबंधित, और दूसरा ‘विविधता’, जिसका अर्थ है विभिन्न चीजों या विविधता की एक श्रृंखला से। इस प्रकार जैव विविधता आनुवंशिक, प्रजाति और पारिस्थितिकी तंत्र स्तरों पर भिन्नता है। जैव विविधता सभी जीवित चीजों की विविधता है: विभिन्न पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव, उनमें मौजूद विभिन्न आनुवंशिक जानकारी और उनके द्वारा बनाए गए विविध पारिस्थितिक तंत्र।

     ‘जैव विविधता’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1986 में वाल्टर जी. रॉसेन ने किया एवं जैव विविधता को निम्नलिखित शब्दों में समझाया- “पादपों, जन्तुओं एवं सूक्ष्म जीवों के विविध प्रकार और विभिन्नता ही जैव विविधता है।” निश्चित ही जैव विविधता जातियों की विपुलता (पादपों, जन्तुओं और सूक्ष्म जीवों) है, जो एक अन्योन्य क्रिया तन्त्र की तरह एक निश्चित आवास में उत्पन्न होते हैं।

      पृथ्वी पर विभिन्न जीव समुदाय की विभिन्न जातियाँ पायी जाती है। स्थानिक अवस्थिति के बदलते ही पारिस्थितिक तंत्र की प्रकृति भी बदल जाती है जिससे जातियों में विविधता आ जाती है। इन जातियों की संख्या एवं विभिन्नता ही जैव विविधता कहलाती है। पिछले 25 वर्षों में मनुष्य ने विश्व के पौधे और जीव-जन्तुओं के संरक्षण में गहन रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया है। इसके अन्तर्गत पृथ्वी सम्मेलन सन् 1992 अति महत्त्वपूर्ण रहा, जिसके अन्तर्गत 1993-94 से 2003-04 को अन्तर्राष्ट्रीय जैव विविधता दशक मनाये जाने का निर्णय लिया और विभिन्न महत्त्वपूर्ण संगठनों ने अपना कार्य प्रारम्भ किया।

      सन् 2002 में जोहान्सबर्ग में सतत् विकास पर विश्व सम्मेलन में जैव विविधता और महत्त्वपूर्ण विषय हो गया है। लाखों वर्षों में उत्पन्न हुआ जैविक समुदाय आधुनिक मानव द्वारा संसाधनों के शोषण के कारण नष्ट हो रहा है। जैव विविधता ह्रास का मुख्य कारण जीवों के आवासीय क्षेत्र को क्षति  पहुंचाना है; जैसे- वन संसाधनों का शोषण (वन भूमि का घटता क्षेत्र), चारागाहों तथा घास के मैदानों पर कृषि भूमि का दबाव, जन्तु जगत और वनों का अत्यधिक शोषण (शिकार) एवं वृक्षों की कटाई एवं पशुपालन आदि है।

      जैव विविधता समस्त पारिवारिक तंत्र के संचालन के लिए अपरिहार्य हैं, जैव विविधता अपने मुख्य दो कार्यों के कारण समस्त पारिस्थितिक तंत्र को पुष्ट करती है।

1. जैवमण्डल का स्थायित्व (Biosphere sustainability) जैव विविधता पर निर्भर करता है। ये जल, मृदा, वायु की रासायनिक संरचना को स्थिर रखती है। इस प्रकार जैव मण्डल के सम्पूर्ण स्वास्थ्य को दृढ़ता प्रदान करती है।

2. जैव विविधता उन वस्तुओं का भी स्रोत है जिन पर जीव अपने भोजन, चारा, ईंधन तथा औषधि आदि के लिए निर्भर होती है।

“जैव विविधता जातियों की विपुलता (जन्तुओं, सूक्ष्म जीवों और पौधों) है जो एक अन्योन्याश्रित क्रिया तंत्र की तरह एक-दूसरे से संबंद्ध है और एक निश्चित आवास में उत्पन्न होते हैं।”

अथवा, “पर्यावरण में जीव-जन्तु, पौधों और सूक्ष्म जीवों के बीच आनुवंशिक (Genetic) जातिगत (Species), और पारिस्थितिक (Ecological) स्तर पर पायी जाने वाली विविधता को जैव विविधता कहते हैं।”

U.S. Office of technology Assessment (1987) के अनुसार जैव विविधता को निम्न प्रकार से पारिभाषित किया गया है- “The variety and variability among living organisms and the ecological complexes in which they occur is called Biodiversity.”

      सरल शब्दों में, हम यह कह सकते हैं कि पृथ्वी पर विद्यमान प्रत्येक जाति के जीवों में विविधता, जातियों के मध्य विविधता तथा पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता ही जैव विविधता है।

Biodiversity शब्द Biological Diversity का संक्षिप्त रूप है जो पृथ्वी पर जीवन के विविध रूपों को व्यक्त करता है। वर्तमान में पृथ्वी पर जीवों की जो भी जातियाँ पायी जाती हैं, उनके अस्तित्व का कारण लम्बे समय से परिवर्तित होती आ रही दशाओं में स्वयं को अनुकूलित करते रहना है। ये जातियाँ परस्पर क्रियाशील तथा एक-दूसरे से संबंध रखती हैं। जीवों की जातियों का परस्पर संबंध तथा जातियों एवं पर्यावरण का परस्पर संबंध पारिस्थितिक तंत्र को गति एवं दृढ़ता प्रदान करता है।

       किसी भी क्षेत्र में पाये जाने वाली जीवों की जातियाँ एक जैविक समुदाय बनाती है जो विभिन्न जातियों के जटिल खाद्य जालों के रूप में होता है। जैविक समुदाय के किसी भी हिस्से में आये व्यवधान से समुदाय के सभी भागों के सदस्यों पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र को सुचारू रूप से चलाने एवं उसकी दृढ़ता बनाए रखने के लिए जैव विविधता का होना अत्यन्त आवश्यक है।

       जैव विविधता एक ऐसा संसाधन है, जिसे पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता है अर्थात् जो जातियाँ विलुप्त हो जाती हैं उन्हें पुन: उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। जातियों के विलुप्तीकरण के अनेक कारण हैं; जैसे प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना, विदेशी जातियों का अनियोजित प्रवेश, पादप तथा जन्तु संसाधनों का अधिक मात्रा में उपयोग तथा प्रदूषण।

    ऐसा अनुमानित किया गया है कि प्रतिदिन जीवों की कई जातियाँ विलुप्त हो रही हैं। यह विलुप्तीकरण एक गम्भीर विषय है। इस संदर्भ में सन् 1992 में रियो डि जेनेरियो (ब्राजील) में पृथ्वी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में भारत सहित 168 देशों ने जैव विविधता पर प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते में जैव विविधता के संरक्षण तथा उसकी वृद्धि करने के प्रयासों पर जोर दिया है।

जैव विविधता के प्रकार

   जैव विविधता के प्रकार को प्रायः तीन मुख्य तथा दो गौण स्तरों में बाँटा जा सकता है-

मुख्य प्रकार

(1) आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity)-

  आनुवंशिक स्तर पर एक जाति के सदस्यों में पायी जाने वाली विविधता आनुवंशिक विविधता कहलाती है। यह विविधता एक स्थान पर एक जाति की जनसंख्या के व्यक्तिगत जीवों में या इसी जाति के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में वितरित जनसंख्या में हो सकती है; तथा गेहूँ, धान, कपास की विविध किस्में अपने रूप रंग, आकार, स्वाद में मिले होते हुए भी एक ही जीन्स या जाति के हैं।

(2) जातिगत विविधता (Species Diversity)-

    पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी प्रकार के जीवों (बैक्टीरिया से लेकर बड़े पौधों एवं जन्तुओं तक) की जातियों की विविधता, जातिगत विविधता कहलाती है। जैसे—घोड़ा, बकरी, भैंस, शेर, कुत्ता विभिन्न जातियों के जीव हैं।

(3) पारिस्थितिक विविधता (Ecological Diversity)-

    बड़े स्तर पर जैव विविधता के अन्तर्गत पारिस्थितिक तंत्र के जैविक समुदायों में पायी जाने वाली विविधता पारिस्थितिक विविधता कहलाती है। एक पारिस्थितिक तंत्र एक विशेष प्रकार के जीव-जन्तुओं के प्रारूप को बनाता है। इसलिए पारिस्थितिक तंत्र की विविधता भी जैव विविधता को जन्म देती है; जैसे- विभिन्न भौगोलिक प्रदेशों के जीवों में विविधता मिलती हैं। यथा- भू-रेखीय प्रदेशों या मरुस्थलीय प्रदेशों के जीव-जन्तु।

गौण प्रकार

(1) घरेलू विविधता (Domesticated Biodiversity)-

     पालतू पशु एवं घरेलू पेड़-पौधों के जीन्स में मानवीय हस्तक्षेप से अलग तरह के जीव एवं फसलों में विविधता आ रही हैं। यथा- मुर्गियों, बकरियों, गायों आदि की विभिन्न नस्लें या तिलहन, धान, गेहूँ आदि की विभिन्नतायें मानवीय हस्तक्षेप जीन्स में होने से विविधता दिखती है।

(2) सूक्ष्मजीवीय विविधता-

       एक सूई की नोंक पर 3-4 करोड़ जीवाणु होना, जैव विविधता समृद्धि ही उल्लेखनीय है।

जैव भौगोलिक प्रदेश (Bio-Geographical Regions)

     विभिन्न प्रदेशों में पाये जाने वाले प्राणिजात (fauna) और वनस्पति-जात (flora) की समानताओं तथा विभिन्नताओं के आधार पर विश्व को निम्न छः जैव भौगोलिक क्षेत्रों में उपविभाजित किया गया है-

(i) पेलिआर्कटिक परिमण्डल (palearctic realm) या पुरानी दुनिया,

(ii) निआर्कटिक परिमण्डल (Nearctic realm) या उत्तरी अमेरिका,

(iii) इथियोपी परिमण्डल (Ethiopian realm) या सहारा मरुस्थल से दक्षिण का सम्पूर्ण अफ्रीका,

(iv) प्राच्य परिमण्डल (Oriental realm) या हिमालय से दक्षिण तक का क्षेत्र,

(v) निओट्रॉपिकल परिमण्डल (Neotrapical realm) या दक्षिण तथा केन्द्रीय अमरीका, और

(vi) आस्ट्रेलियाई परिमण्डल (Austrollan realm) या आस्ट्रेलिया एवं संबंधित द्वीपसमूह।

      इन छः परिमण्डलों को विश्व के मानचित्र पर नीचे दिखलाया गया है। इन जैव भौगोलिक क्षेत्रों में से अधिकांश समुद्रों, मरुस्थलों और पर्वतों द्वारा एक-दूसरे से पृथक हैं।

What is biodiversity

भारत का जैव भौगोलिक वर्गीकरण

     भारत क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से विश्व का सातवाँ बड़ा क्षेत्रफल वाला देश हैं। विश्व की 2.4 प्रतिशत भूमि भारत के अन्तर्गत है। यह उत्तर से दक्षिण 3214 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम 2933 किलोमीटर है। वृहत् क्षेत्रफल 32,87,782 वर्ग किमी० विविध जलवायु और मृदा प्रदेशों के कारण विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों का उद्भव और विकास हो गया है जिससे वनस्पति और जैव जगत में अत्यधिक भिन्नता आ गयी है। साथ ही जैव विविधता के दृष्टिकोण से देश संपन्न हो गया है। यहाँ विश्व की 8 प्रतिशत जैव जातियाँ पायी जाती हैं। जैव विविधता भारत का एक महत्त्वपूर्ण संसाधन और शक्ति है। विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों के आधार पर भारत को निम्नलिखित 10 जैव भौगोलिक क्षेत्रों में वर्गीकृत कर सकते हैं-

1. ट्रांस हिमालय क्षेत्र
2. हिमालयी क्षेत्र
3. रेगिस्तान क्षेत्र
4. अर्ध शुष्क क्षेत्र
5. पश्चिमी घाट क्षेत्र
6. डेक्कन पठार क्षेत्र
7. गंगा के मैदान
8. तटीय क्षेत्र
9. उत्तर पूर्व क्षेत्र
10. द्वीप

1. ट्रांस हिमालय क्षेत्र:-

      इस क्षेत्र के अंतर्गत कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का 5.6% भाग आता है। ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में जम्मू और कश्मीर, उत्तरी सिक्किम, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के स्पीति और लाहौल क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र की विशेषता अल्पाइन वनस्पति है और यह जंगली बकरियों और भेड़ों की सबसे बड़ी आबादी का घर है। यहाँ पाए जाने वाले जानवरों में हिम तेंदुए और प्रवासी काली गर्दन वाले सारस सबसे लोकप्रिय हैं। इस क्षेत्र में ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र का अत्यंत नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र शोधकर्ताओं के लिए अद्वितीय और उल्लेखनीय है।

2. हिमालयी क्षेत्र:-

        हिमालय क्षेत्र वनस्पतियों और जीवों के मामले में एक समृद्ध क्षेत्र है और इस क्षेत्र के अंतर्गत कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का 6.4 प्रतिशत हिस्सा आता है। यह कुछ सबसे ऊँची चोटियों का भी घर है। इस क्षेत्र में अल्पाइन और उप-अल्पाइन वन, पर्णपाती वन और घास के मैदान शामिल हैं जो कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों, जैसे- भरल, आइबेक्स, मार्खोर, हिमालयी तहर और ताकिन का घर हैं। अन्य लुप्तप्राय प्रजातियाँ जैसे हंगुल और कस्तूरी मृग को भी इस क्षेत्र में देखा जा सकता है।

3. रेगिस्तान क्षेत्र:-

      रेगिस्तानी क्षेत्र कुल भारतीय भौगोलिक विस्तार का लगभग 6.6% हिस्सा है और इसमें कच्छ और थार रेगिस्तान शामिल हैं। यह काराकल, भेड़िये, रेगिस्तानी बिल्लियों आदि सहित कुछ लुप्तप्राय स्तनधारियों का घर है। इस क्षेत्र में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और होउबारा बस्टर्ड जैसे कुछ पक्षी भी संरक्षण में हैं। घास के मैदानों का विस्तृत विस्तार इस क्षेत्र में लुप्तप्राय स्तनधारियों के अस्तित्व का समर्थन करता है।

4. अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र:-

      अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र का विस्तार कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 16.6% है। यह पश्चिमी घाट के घने जंगलों और रेगिस्तानों के बीच एक संक्रमण क्षेत्र भी है। प्रायद्वीपीय भारत में जलवायु की दृष्टि से दो बड़े अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में कई प्राकृतिक और दलदली भूमि और कृत्रिम झीलें हैं। स्वादिष्ट झाड़ियों की परतें और उल्लेखनीय घास के मैदान इस क्षेत्र की विशेषता हैं जो कुछ लुप्तप्राय वन्यजीवों को भोजन और आश्रय देते हैं, जिनमें चीतल और सांभर की गर्भाशय प्रजातियाँ शामिल हैं। शेर (गुजरात तक सीमित), सियार, भेड़िया और कैराकल भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं।

5. पश्चिमी घाट क्षेत्र:-

       यह कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का 4% है और भारत का एक उल्लेखनीय उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन है। यह भारत के कुल चार में से एक आधिकारिक जैव विविधता हॉटस्पॉट भी है। पश्चिमी घाट में विभिन्न प्रकार की कशेरुक आबादी है, जिनमें से कई प्रकृति में लुप्तप्राय प्रजातियाँ हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में एक विशिष्ट और समृद्ध जीव-जंतु तत्व है जो इस क्षेत्र की विशेषता है।

      इस क्षेत्र की मूल निवासी महत्वपूर्ण प्रजातियों में नीलगिरि लंगूर, ग्रिजल्ड जाइंट स्क्विरेल और मालाबार ग्रे हॉर्नबिल शामिल हैं। लायन टेल्ड मकाक, मालाबार सिवेट और नीलगिरि तहर भी पश्चिमी घाट को अपना घर कहते हैं। त्रावणकोर कछुआ और केन कछुआ दो लुप्तप्राय प्रजातियाँ हैं जो मध्य पश्चिमी घाट में पाई जाती हैं।

6. डेक्कन पठार क्षेत्र:-

      कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 42% हिस्से पर फैले दक्कन का पठार देश का सबसे बड़ा जैव-भौगोलिक क्षेत्र है। यह पश्चिमी घाट के वृष्टि छाया क्षेत्र में पड़ता है। यह एक अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र है और भारत के मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र राज्यों में कुछ बेहतरीन जंगल हैं। इस क्षेत्र में अधिकांश वन पर्णपाती प्रकार के पाए जाते हैं।

       हालाँकि, दक्कन के पठार के पहाड़ी क्षेत्रों में अन्य प्रकार के जंगल भी हैं। ख़राब झाड़ियाँ और पर्णपाती और कांटेदार जंगल कई लुप्तप्राय प्रजातियों को आश्रय प्रदान करते हैं। इस क्षेत्र में सांभर, चीतल, चौसिंघा और बार्किंग हिरण जैसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। अन्य प्रजातियाँ जो यहाँ देखी जा सकती हैं उनमें गौर, हाथी, जंगली भैंसा और दलदली हिरण शामिल हैं।

7. गंगा के मैदान:-

      यह क्षेत्र कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 10.8% है। इसकी सैकड़ों किलोमीटर तक एक समान स्थलाकृति है। यह क्षेत्र अपनी विविध वनस्पतियों और जीवों के लिए जाना जाता है जो इस क्षेत्र की अद्वितीय विशेषता हैं। इस क्षेत्र के जीवों में भैंस, गैंडा, हाथी, हॉग हिरण, दलदली हिरण और हिस्पिड खरगोश शामिल हैं।

8. तटीय क्षेत्र:-

      यह कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 2.5% है जिसमें मैंग्रोव, रेतीले समुद्र तट, मूंगा चट्टानें और मिट्टी के फ्लैट शामिल हैं। यह क्षेत्र समुद्री एंजियोस्पर्म के लिए भी लोकप्रिय है जो इस क्षेत्र को अद्वितीय और समृद्ध बनाता है। गुजरात से सुंदरबन तक के क्षेत्र का हिस्सा कुल समुद्र तट 5,423 किमी० का विस्तार है। लक्षद्वीप कुल 25 मूंगा द्वीपों से बना है और इसमें एक विशिष्ट रीफ लैगून प्रणाली है जो इसे समुद्री जैव विविधता से समृद्ध बनाती है। हालाँकि, लक्षद्वीप में कोई प्राकृतिक वनस्पति नहीं दिखती है।

9. उत्तर पूर्व क्षेत्र:-

        कुल जैव-भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 5.2% को इसमें शामिल करते हुए, उत्तर-पूर्व भारत-मलायन, भारतीय और भारत-चीनी जैव-भौगोलिक क्षेत्रों के बीच संक्रमण क्षेत्र है। यह प्रायद्वीपीय भारत और हिमालय पर्वतों का जंक्शन भी है। इस प्रकार, पूर्वोत्तर देश की जैव विविधता हॉटस्पॉट होने के अलावा भारत की अधिकांश वनस्पतियों और जीवों का प्रवेश द्वार है। इस क्षेत्र में पाई जाने वाली जानवरों की कई प्रजातियाँ इस क्षेत्र की विशेषता हैं या खासी पहाड़ियों की मूल निवासी हैं । यहाँ पाए जाने वाले जीवों के सबसे लोकप्रिय उदाहरणों में से एक एक सींग वाला गैंडा है जो एक लुप्तप्राय प्रजाति है जो मुख्य रूप से असम में पाई जाती है।

10. द्वीप:-

     लगभग 0.3% क्षेत्र इसके अंतर्गत आता है, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत में कुल तीन में से एक उष्णकटिबंधीय नम सदाबहार वन का घर है। यह क्षेत्र समृद्ध और विविध वनस्पतियों का घर है जिसमें भारत के कुछ सदाबहार वन शामिल हैं। निकोबार द्वीप समूह में केवल जनजातियाँ ही पाई जाती हैं।

17. Throw light on the ozone layer (ओजोन परत पर प्रकाश डालें।)

17. Throw light on the ozone layer

(ओजोन परत पर प्रकाश डालें।)



        विश्व ओजोन दिवस हर साल 16 सितंबर को ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने की याद में मनाया जाता है। यह संधि 16 सितंबर 1987 में हुआ था।  इसी तथ्य को मद्देनजर रखकर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 16 सितम्बर को प्रतिवर्ष ओजोन दिवस मनाने का फैसला किया है।

       गत 12 दिसम्बर को विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने ओजोन मण्डल के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट जारी की। इसके अनुसार ओजोन मण्डल के सुराख का आकार पिछले वर्ष की अपेक्षा दूना हो गया है। अब इसका क्षेत्रफल लगभग एक करोड़ वर्ग किमी. अर्थात् यूरोप महाद्वीप के क्षेत्रफल के लगभग बराबर है। ओजोन मण्डल का यह छिद्र अंटार्कटिका क्षेत्र के ऊपर स्थित है, जिसके आकार में जुलाई के अन्त से सितम्बर की शुरूआत के दौरान प्रतिदिन एक प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

       पृथ्वी से लगभग 15 किमी. की ऊँचाई पर 24 किमी. मोटी ओजोन गैस की परत है। ओजोन छतरी सूर्य से विकरित पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है। वायुमण्डल में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन है और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन दोनों ही आणविक स्थिति में मौजूद होते हैं लेकिन फिर भी ऑक्सीजन के अणु पराबैंगनी किरणों की उपस्थिति में ओजोन में बदल जाते हैं। अत्यधिक क्रियाशील होने के कारण ओजोन नाइट्स ऑक्साइड से मिलकर एक नया रूप धारण कर लेता है। यह क्रिया स्वाभाविक रूप से समताप मण्डल में चलती रहती है परंतु जब वायुमण्डल में कुछ विजातीय परमाणु का आगमन होता है तब इस प्रक्रिया में बाधा भी आ जाती है।

    ओजोन परत में छेद हो जाने की जानकारी सर्वप्रथम 1973 में मिली जब कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक  डॉ. शेरी रालैण्ड एवं डा. मैरियो मोलिना को सी. एफ. सी. द्वारा उत्सर्जित क्लोरीन परमाणु के भक्षक प्रकृति का पता चला। सन् 1975 में इस सूचना को जन-सामान्य के लिये भी उपलब्ध करा दिया गया।

   वर्ष 1985 में जब ब्रिटिश अंटार्कटिका सर्वेक्षण दल ने तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर ओजोन मण्डल में छिद्र होने की घोषणा की तो सब स्तब्ध रह गये। ओजोन छतरी में छिद्र के आकार में वृद्धि चिन्ताजनक है क्योंकि ओजोन परत में एक प्रतिशत कमी आने का तात्पर्य है कि पृथ्वी पर पहुँचने वाली पराबैंगनी किरणों की मात्रा में 1.3 से 1.5 प्रतिशत की वृद्धि अर्थात् त्वचा कैंसर एवं मोतियाबिन्द की सम्भावना में 2.6 से 3 प्रतिशत की वृद्धि।

    पृथ्वी को सूर्य की नुकसानदेह किरणों से बचाने वाली वातावरण की ओजोन परत में चीन के क्षेत्रफल के दो गुने के बराबर छिद्र हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के अनुसार अंटार्कटिका के ऊपर स्थित यह छिद्र करीब 2 करोड़ 20 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है जो चीन के क्षेत्रफल के दोगुने से भी ज्यादा है।

   ओजोन परत को रेफ्रिजरेशन में इस्तेमाल होने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन (सी.एफ.सी.) जैसे रसायनों के कारण नुकसान पहुँच रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक क्लाउस टायफर ने कहा कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले रसायनों और गैसों के इस्तेमाल पर अंकुश लगाकर ओजोन परत की क्षति कम की गयी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन् 2050 तक ओजोन परत सन् 1980 के पहले वाली स्थिति में पहुँच जायेगी।

    ओजोन परत में छेद हो जाने से सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणें सीधे पृथ्वी पर पहुँचने लगीं, जो मनुष्य, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों तथा समुद्री जीवों को भी नुकसान पहुँचायेंगी। इस वर्ष का संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण पुरस्कार नोबल पुरस्कार विजेता मारियो जे. मोलिना को दिया गया है जो ओजोन पर्त के रसायनशास्त्र की ही विशेषज्ञ हैं।

पृथ्वी का रक्षा कवच- ओजोन परत

      सूर्य प्रकाश में सात रंगबैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी और लाल होते हैं। वस्तुतः यह सूर्य की किरणों का एक भाग है जिसे हमारी आँखें देख सकती हैं। सूर्य की किरणों का दूसरा अदृश्य भाग जो लाल रंग के बाद होता है अवरक्त या (Infra-Red) किरण कहलाता है। इसी प्रकार बैंगनी रंग के परे जो अदृश्य भाग होता है उन्हें पराबैंगनी या अल्ट्रा वायलेट किरण कहते हैं, जिनकी तरंगदैर्ध्य क्रमश: 7500 A से ऊपर तथा 4000 A से कम होती है।

      सामान्यतः सभी पराबैंगनी विकिरण जीवों के लिए हानिकारक हैं। परंतु अपने दुष्प्रभावों के आधार पर इन्हें भी A, B और C तीन श्रेणियों में बाँटा गया है। C श्रेणी के पराबैंगनी विकिरण अत्यन्त घातक होते हैं किन्तु B और C श्रेणी के विकिरण पृथ्वी की सतह तक पहुँच ही नहीं पाते। हमारे वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर स्थित ओजोन गैस की परत इन्हें रोक लेती है अन्यथा ये धरती पर विनाश कर देते। इस प्रकार गैस का यह ऊपरी घोल पृथ्वी के लिये सुरक्षा कवच, चादर या छतरी का काम करता है।

    संतरे के छिलके की तरह पृथ्वी के चारों ओर 800 किमी. मोटी वायुमण्डल की परत है। पृथ्वी का वायुमण्डल गुरुत्वाकर्षण की शक्ति के कारण पृथ्वी से पृथक नहीं हो पाता।

     पृथ्वी सतह से 16 किमी. की ऊँचाई के ऊपर समताप मण्डल में उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी प्रकाश किरणों की उपस्थिति में ऑक्सीजन के तीन अणुओं से ओजोन के दो अणुओं का निर्माण होता है। ओजोन हमारी प्राणवायु का ही एक अन्य रूप है। साधारण ऑक्सीजन गैस के एक अणु में दो परमाणु होते हैं जबकि ओजोन गैस के एक अणु में तीन परमाणु होते हैं।

     यद्यपि ऑक्सीजन और ओजोन एक ही प्रकार के परमाणुओं से मिलकर बने होते है परंतु ऑक्सीजन का ओजोन में परिवर्तन आसान नहीं है। हाँ, B श्रेणी के पराबैंगनी विकिरण यह काम जरूर कर सकते हैं। अतः सूर्य किरणों में उपस्थित इन किरणों को सोखकर ऑक्सीजन ओजोन में बदल जाती है। यही ओजोन अब C श्रेणी के तेज विकिरणों को सोखकर पुनः ऑक्सीजन में बदल जाती है। वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर यह प्रक्रिया सतत् चलती रहती है।

      प्राकृतिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ऊँचाई पर ओजोन का अनुपात बढ़ता जाता है। ओजोन गैस 23 से 30 किमी. तक की ऊँचाई में सघन रूप में पायी जाती है। यद्यपि ओजोन गैस 48 किमी. तक विरल मात्रा में मिलती है। अपने स्वभाव के अनुसार यह गैस सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है। यह अवशोषण 20 से 40 किमी. ऊँचाई के मध्य सबसे अधिक होता है जिससे इस परत का तापमान प्रति किमी. ऊँचाई पर 16 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है। पृथ्वी पर जीवन ही नहीं होता यदि यह रक्षाकवच वायुमण्डल में नहीं होता।

      विश्व में अंटार्कटिका महाद्वीप (दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र) के ऊपर ओजोन परत में बढ़ता छिद्र सन् 1985 से चिन्ता का विषय बना हुआ है। इसी वर्ष बढ़ते क्षेत्र को प्रमाणित ब्रिटिश वैज्ञानिक जे. फोरमेन ने किया था। नवीनतम शोधों के अनुसार पता लगता है कि यह छेद और बड़ा होता जा रहा है, साथ ही कनाडा, पश्चिमी यूरोप, रूस, न्यू इंग्लैण्ड के उत्तरी भाग, स्केन्डिनेविया, प्रायद्वीप में नार्वे और स्वीडन के ऊपर भी विशाल क्षेत्र बनने की आशंका पैदा हो गयी है।

      आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार पृथ्वी में ओजोन मण्डल का ह्रास जारी है। ह्रास की यह दर प्रति दशक उत्तरी और दक्षिणी मध्य अक्षांश में लगभग पाँच प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरण में क्लोरीन गैस के स्तर का निरंतर बढ़ना जारी है, हालांकि यह दर 1980 में 2.9 प्रतिशत की तुलना में 1994 में अपेक्षाकृत 1.6 प्रतिशत ही बढ़ी।

ओजोन परत का ह्रास : कारण और प्रभाव

      ओजोन मण्डल के ह्रास में निरंतर कमी आने की वजह अन्तर्राष्ट्रीय दबाव रहा है। यह समस्या मांट्रियल समझौते के बावजूद बनी हुई है क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र में क्लोरीन गैस की प्रचुरता 1998 तक अत्यधिक होने की आशंका व्यक्त की गई है और उसके बाद स्थिति के पूर्ववत् होने में लगभग 50 वर्ष तक लग जाएंगे। इसके साथ ही विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि माँट्रियल समझौते का व्यावहारिक कार्यान्वयन नहीं किया गया तो क्लोरीन गैस का स्तर आगामी 50 वर्ष में समताप मण्डल पर लगभग नौ प्रतिशत तक बढ़ जाएगा।

     पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार ओजोन मण्डल के स्तर में 1.3 प्रतिशत ह्रास का परिणाम धरातल पर सूर्य का हानिकारक पराबैंगनी विकिरण का 1.8 प्रतिशत की वृद्धि होना है।

the ozone layer

भारत और ओजोन परत-

       वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि भारत के ऊपर ओजोन परत अभी तो सुरक्षित है परंतु दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में पराबैंगनी किरणें काफी मात्रा में बढ़ रही हैं। भारतीय वैज्ञानिक दक्षिण भारत के तटीय इलाकों में बढ़ती पराबैंगनी किरणों से चिंतित हैं। उनकी राय में पराबैंगनी किरणों की अधिकता ओजोन परत में कमी या छेद होने का संकेत देती है। हालांकि एक विचार यह भी है कि पराबैंगनी किरणों का कारण भौगोलिक स्थिति है न कि ओजोन स्तर में कमी। 

      भारत में ओजोन का स्तर 240 से 350 डॉब्सन यूनिट के बीच है। जबकि अन्य देशों में ओजोन परत में बहुत अधिक कमी आयी है। वहाँ ओजोन का स्तर 110 से 115 डाब्सन यूनिट के बीच पहुँच गया है। ओजोन नेटवर्क के पाँच स्टेशन- श्रीनगर, दिल्ली, वाराणसी, पुणे, त्रिवेन्द्रम में हैं जो कुल ओजोन को मापने के लिये जमीन के उपकरण का इस्तेमाल करते हैं।

      सतही ओजोन की लगातार रिकार्डिंग करने के लिये इन पाँच स्टेशनों में से तीन स्टेशन (दिल्ली, पुणे और त्रिवेन्द्रम) ऐसे हैं जो ओजोन वितरण का लम्बात्मक स्वरूप जानने के लिये गुब्बारे वाली ओजोन सोडे का इस्तेमाल करते हैं। देश में वायु प्रदूषण की पृष्ठभूमि की मानीटरिंग करने के लिये दस स्टेशन खोले गये हैं जिनका उद्देश्य वायुमण्डलीय तत्त्वों के जमाव से सम्बन्धित क्षेत्रीय स्वरूपों का पता लगाना है। इस विभाग की सहायता से भारतीय प्रौद्योगिकीय संस्थान, नई दिल्ली में स्थित वायुमण्डलीय विज्ञान केन्द्र भारत पर वायुमण्डलीय स्थिति, ओजोन और वायु प्रदूषण के क्षेत्रों में विभिन्न अध्ययन कर रहा है।

क्लोरोफ्लोरो कार्बन और ओजोन परत-

      इसके अन्तर्गत कार्बन से जुड़े हुए हाइड्रोजन, क्लोरीन, फ्लोरीन के परमाणु होते हैं, जब ये वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर पहुँचता है तब सूर्य की पराबैंगनी किरणें सी. एफ. सी. अणुओं को तोड़ती हैं। फलस्वरूप क्लोरीन तथा अन्य परमाणुओं से अलग होते हैं जो ओजोन परत के लिए घातक हो जाते हैं। क्लोरीन का एक परमाणु ओजोन के अणुओं से प्रतिक्रिया कर इसे ऑक्सीजन में बदल देता है। यह प्रक्रिया एक श्रृंखला के रूप में चलती है।

      इस तरह क्लोरीन परमाणु ओजोन अणुओं को लगातार तोड़ते रहते हैं अर्थात् क्लोरोफ्लोरोकार्बन का एक अणु, ओजोन गैस के एक लाख अणुओं को नष्ट करता है। पृथ्वी के रक्षा कवच (ओजोन परत) में ह्रास से विश्व की यह समस्या भयावह रूप ले रही है। जून 1992 के रीओडीजैनेरो में हुए पृथ्वी सम्मेलन में आये वैज्ञानिकों द्वारा इस सम्बन्ध में भारी चिन्ता व्यक्त की गयी थी।

ओजोन परत को नष्ट करने वाले उद्योग एवं प्रमुख देश-

       क्लोरोफ्लोरो कार्बन का उपयोग औद्योगिक क्षेत्रों में सबसे अधिक किया जाता है। प्रशीतन (रेफ्रिजरेटर), एयर कण्डीशनर, हेयर डाई तथा सुगंध का छिड़काव करने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन निकलती है। वायु विलय (एरोसोल) पेन्ट, उर्वरकों के निर्माण करने वाले कारखानों, प्लास्टिक पैन तैयार करने, धमनकारी के रूप में प्रयुक्त करने पर यह बड़ी मात्रा में निकलती है।

      इसके अतिरिक एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक, ऑप्टीकल तथा फार्मेसी उद्योगों में वृहत् स्तर पर इसका उत्पादन होता है। इसके साथ हवाई जहाजों से भी यह रिसती है। शीत युद्ध के दौरान सुपरसोनिक विमान आसमान में 15-29 किमी. की ऊँचाई पर उड़कर सीएफसी छोड़ते हैं। अणु बम का विस्फोट भी ओजोन परत का घातक है।

      सातवें दशक में विश्व में सीएफसी का वार्षिक उत्पादन मात्र 6 लाख टन के लगभग था। 8वें दशक के अन्त तक यह सोलह गुने से अधिक हो गया अर्थात् 1 अरब टन में हो गया। उपग्रहों ने ओजोन परत के ह्रास के चिन्ताजनक चित्र उपलब्ध कराये हैं।

      वर्तमान विश्व में सीएफसी का वार्षिक उत्पादन 7,50,000 मीट्रिक टन है। इसमें से मात्र विकसित देशों में इसका उत्पादन और उपयोग 88 प्रतिशत से अधिक है। अकेले संयुक्त राज्य अमेरीका 97.4 प्रतिशत, पश्चिमी यूरोप 96.70 प्रतिशत, जापान 12.4 प्रतिशत, पुराने साम्यवादी देश 2.2 प्रतिशत, शेष दुनिया के देश 4.1 प्रतिशत भारत और चीन ओजोन सतह के लिए हानिकारक रसायनों का उत्पादन विश्व के कुल उत्पादन का 3 प्रतिशत ही करते हैं। मिथाइल क्रोमाइड भी ओजोन के लिये अन्य घातक गैस है।

सी. एफ. सी. के उत्पादन का वर्तमान और भविष्य-

       सी. एफ. सी. का वर्तमान वार्षिक उत्पादन 7,50,000 मीट्रिक टन है। अमेरीका में इसका उपयोग 3,000 ग्राम प्रति व्यक्ति है जबकि भारत में प्रति व्यक्ति खपत मात्र 10 ग्राम है। यद्यपि भारत में भी तीव्र औद्योगीकरण हो रहा है जिसमें सी. एफ. सी. का उपयोग-उत्पादन भी होगा। 

       वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वायुमंडल में कुछ ओजोन-घटाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सी.एफ.सी.) की सांद्रता वर्तमान में तेजी से बढ़ रही है, बावजूद इसके कि इन रसायनों के उत्पादन पर 2010 से विश्व स्तर पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

       सी.एफ.सी. का उपयोग आमतौर पर रेफ्रिजरेंट्स, एयरोसोल प्रोपेलेंट और सॉल्वैंट्स में किया जाता था जब तक कि उन्हें ओजोन परत के विनाश के पीछे प्रेरक शक्ति के रूप में नहीं खोजा गया था। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत, उनका उत्पादन 1989 से 2010 तक चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया गया था।

     लेकिन ब्रिटेन के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय में ल्यूक वेस्टर्न एवं उनके सहयोगियों ने 2010 और 2020 के बीच पाँच सी.एफ.सी. रसायनों की वैश्विक वायुमंडलीय सांद्रता में तेज से वृद्धि का खुलासा किया है, जो यह संकेत दे रहा है कि कुछ कारखानों में अभी भी उनका अवैध रूप से उत्पादन किया जा रहा है।

   दुनिया भर के 14 माप स्थलों से डाटा का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि सी.एफ.सी.-112A, सी.एफ.सी.-113, सी.एफ.सी.-113A, सी.एफ.सी.-114A और सी.एफसी.-115 की सांद्रता 2010 के बाद से बढ़ी है, जो 2020 में वायुमंडल में रिकॉर्ड उच्च बहुतायत तक पहुँच गई है। वेस्टर्न ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि उत्सर्जन में बढ़ोतरी से ओजोन परत की रिकवरी में उल्लेखनीय बाधा आने की संभावना नहीं है, जिसके 2060 के दशक तक पूरी तरह से ठीक होने की उम्मीद है , लेकिन सी.एफ.सी. गैसों के ग्रह-वार्मिंग प्रभाव का मतलब है कि परिणाम चिंता का विषय हैं।

ओजोन छेद से निसृत पराबैंगनी किरणों के प्रभाव

1. मनुष्यों पर:-

(i) त्वचा पर-

      यदि ओजोन परत में एक प्रतिशत ओजोन गैस घटती है तो पृथ्वी पर दो प्रतिशत त्वचा कैंसर बढ़ता है। चूँकि ओजोन परत में सबसे बड़ा छेद दक्षिणी ध्रुव के पास है अतः आस्ट्रेलिया में “मेलानोमा कैंसर से मरने वालों की संख्या सर्वाधिक है। किरणें जिनकी तरंगदैर्घ्य 250-350 एन. एम. एस. होती है, त्वचा कैंसर के लिए उत्तरदायी हैं। गोरी चमड़ी वालों पर यह अधिक प्रभावी सिद्ध हुई है।

(ii) आँखों पर-

      मोतियाबिन्द (कैटरिक्ट) आँखों के लैंसों में धुंधलापन तथा आँखों में असाध्य दृष्टि दोष और अंधापन उत्पन्न होता है। सन् 1990-91 से आँखों की बीमारियों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है अर्थात् 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

(iii) प्रतिरोधक तंत्र पर-

       प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होने से संक्रामक रोगों की आशंका बढ़ जाती है।

2. कृषि एवं वनस्पतियों पर:-

    250 से 350 एन. एम. एस. (नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य की इकाई) तरंगदैर्घ्य वाली पराबैंगनी किरणें, यू. बी. बी. सबसे ज्यादा फसलों, मानसून प्रणाली एवं वनस्पतियों को प्रभावित करती हैं। इन किरणों का प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पर प्रभाव पड़ने से फसलें और वनस्पतियाँ नष्ट होंगी जिससे उपज भी कुप्रभावित होती है।

3. समुद्री जीवों पर:-

      विकिरण का कुप्रभाव फाइटोप्लेंकटन पर पड़ता है जो मछलियों का प्रमुख खाद्य पदार्थ है। इसकी संख्या में ह्रास हो जाता है। अतः भविष्य में मछलियों एवं अन्य सामुद्रिक जीवों के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है।

4. स्वास्थ्य पर:-

     हाल ही में की गई एक खोज से पता चला है कि ओजोन स्तर में वृद्धि का सम्बन्ध शहरी क्षेत्रों के लोगों की मौत से है। वाहनों से निकलने वाला धुआँ और पावर स्टेशनों से हुआ प्रदूषण ओजोन का स्तर बढ़ाता है। फलस्वरूप अस्पतालों में अस्थमा और फेफड़ों से सम्बन्धित रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

5. जलवायु पर:-

      धरती से लगभग 20 किमी. के ऊपर ओजोन की परत है जो लगभग 2 प्रतिशत ताप अवशोषित करती है। जिससे इस परत का तापमान ऊपर जाने पर बहुत तेजी से (16 डिग्री सेल्सियस प्रति किमी. की दर से) बढ़ता है। इसी ऊँचाई पर जैट स्ट्रीम (संकरे चैनल) में तेज गति से वायु प्रभावित होती है जो मानसूनी हवाओं को प्रभावित करती है जिससे जलवायु परिवर्तन का क्रम परिलक्षित होता है।

सी. एफ. सी. का विकल्प:-

      कम तरंगदैर्घ्य का यू.बी.सी. (100-280 एम. एम. एस.) पराबैंगनी किरणों को, कार्बन डाइ ऑक्साइड तथा पानी और ऑक्सीजन अवशोषित करती है। इसके साथ ही कुछ और भी गैसें हैं जो पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती हैं। सी. एफ. सी. के अन्य विकल्पों में हाइड्रोक्लोरो कार्बन, हाइड्रो कार्बन तथा अमोनिया गैस है, इसके साथ ही हाइड्रो क्लोरो कार्बन भी है। इसका उपयोग क्रमशः उद्योगों और रेफ्रीजरेटरों में किया जा रहा है।

सी. एफ. सी. पर प्रतिबन्ध:-

     अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सन् 1987 में मांट्रियल प्रोटोकाल के तहत विकसित देशों को सन् 2000 तक 50 प्रतिशत सी. एफ. सी. के उत्पादन में कमी लानी है। दूसरा प्रयास अगस्त 1990 में लंदन में किया गया जिसमें 1995 तक सी. एफ. सी. की पूर्ण समाप्ति के लिये प्रस्ताव रखा गया था। विकासशील देशों को 10 वर्ष का अतिरिक्त समय दिया गया था।

      संशोधन में सी. एफ. सी. के कई अन्य पदार्थ शामिल किये गये। कार्बन ट्रेटा क्लोराइड और क्लोरोफार्म भी इस नई सूची में शामिल किये गये। जून 1992 में रियोडीजैनेरो (ब्राजील) में पश्चिम के देश जैव विविधता के सिद्धांत पर सहमत नहीं हुए। पूरब के देश क्लोरो फ्लोरो कार्बन के उपयोग पर प्रतिबन्ध नहीं चाहते। अतः भविष्य में इसका उत्पादन कम होगा, इसमें आशंका है।

निष्कर्ष:-

      संक्षेप में कहा जा सकता है कि क्लोरो फ्लोरो कार्बन का एक अणु ओजोन गैस के एक लाख अणुओं को नष्ट करता है और यदि ओजोन गैस एक प्रतिशत घटती है तो पृथ्वी पर दो प्रतिशत त्वचा कैंसर और अंधत्व की बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। पराबैंगनी किरण मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और वह साधारण सी बीमारियों का भी मुकाबला नहीं कर पाता।

     पराबैंगनी किरणों का प्रभाव हमारे गुणसूत्रों (जीन्स) पर भी पड़ता है, और आने वाली पीढ़ी विकलांग, मानसिक रोगी अथवा विक्षिप्त भी हो सकती है। यह विकिरण वनस्पति पर भी अपना कुप्रभाव डालते हैं।

     अतः संक्षेप में कह सकते हैं कि पृथ्वी की ओजोन परत तेजी से बिगड़ रही है और वह अपना प्राकृतिक स्वरूप खोती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र से सम्बद्ध मौसम अभिकरण ने यह बात कही है। ज्ञातव्य है कि वायुमण्डल में प्राकृतिक रूप से बनी ओजोन आकाश में अपनी परत और फिर मण्डल बनाकर सूर्य की नुकसानदेह पराबैंगनी किरणों से हमारी एवं जीव-जन्तुओं और मवेशियों तथा सम्पूर्ण वनस्पति जगत की रक्षा करता है।

     संयुक्त राष्ट्र के अभिकरण के अनुसार ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने में उद्योग-धन्धों से निकलने वाली कई गैसें मुख्यतया जिम्मेदार हैं। इसके कारण लोगों में त्वचा कैंसर तथा मोतियाबिन्द का खतरा बढ़ता जा रहा है। ओजोन परत में छेद होने का पता पहली बार नौवें दशक में दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में चला तब से ओजोन स्तर के खराब होने की स्थिति प्रतिवर्ष बदस्तूर बनती जाती है। बताया गया है कि तीव्र सर्दी तथा सूर्य की रोशनी मिल करके ओजोन की परत को सबसे अधिक खराब करती है।

     ओजोन के लिये संयुक्त राष्ट्र मौसम संगठन के सलाहकार डारूमेन बोजकोव के अनुसार ओजोन परत का ह्रास एक खतरनाक मोड़ ले लेता है, जबकि समताप मण्डल का तापमान बहुत कम हो जाता है। ज्ञातव्य है कि वायुमण्डल में ओजोन मण्डल के कम होने से क्लोरीन का स्तर बढ़ जाता है। यह क्लोरो फ्लोरो कार्बन में मिलता है। दक्षिण ध्रुव क्षेत्र में निरीक्षण जांच स्थलों से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विश्व मौसम संगठन के क्षेत्र में सितम्बर और अक्टूबर में ओजोन स्तर के ह्रास का मापन किया।

       विश्व मौसम संगठन के प्रवक्ता एराह डाल गोर ने कहा है कि हम ओजोन परत के बारे में यथासम्भव नया रिकार्ड देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि वायुमण्डल में 17 किमी. की ऊँचाई पर ओजोन की स्थिति काफी चिन्ताजनक है।

      विश्व मौसम संगठन में पर्यावरण अनुसंधान के निदेशक फ्रीडेरिक डेल्सोल ने कहा कि ओजोन मण्डल में मामूली क्षेत्र में बिगड़ाव का उतना दूरगामी प्रतिकूल असर नहीं छोड़ता, परंतु ओजोन स्तर में बिगड़ाव की व्यापक प्रवृत्ति दिख रही है, उन्होंने कहा कि विगत चार वर्षों में ओजोन परत के छिद्र का आकार बढ़कर दो गुना हो गया है। ज्ञातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र का यह अभिकण ओजोन के स्थल की जाँच पिछले चालीस वर्ष से कती आ रही है।


16. What is acid rain? Its causes and effects (अम्लीय वर्षा क्या है? इसके कारण एवं प्रभाव)

16. What is acid rain? Its causes and effects

(अम्लीय वर्षा क्या है? इसके कारण एवं प्रभाव)



        अम्लीय वर्षा’ शब्द का उपयोग सर्वप्रथम रॉबर्ट एंग्स ने सन् 1972 में किया। वर्षा का जल वायुमण्डल में उपस्थित गैसों से रासायनिक क्रिया कर जब अम्लीय होकर बरसता है तो इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं। दूसरे शब्दों में किसी भी प्रकार की वर्षा जिसमें अम्ल की असामान्य उपस्थिति होती है, अम्लीय वर्षा होती है। यह कम पीएच देने वाली बारिश में हाइड्रोजन आयनों की उच्च संख्या को इंगित करता है। अम्लीय वर्षा का जलीय जीवन, पौधों और बुनियादी सुविधाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अम्लीय वर्षा के मुख्य घटक हवा में जल वाष्प अणुओं के साथ उत्सर्जित सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड की प्रतिक्रिया से बनते हैं। 

       सघन औद्योगिक प्रदेशों में वर्षा के पानी की अम्लीयता हानिकारक स्थिति तक पहुँच जाती है। तेजाबी वर्षा का विशेष तथ्य यह है कि कुछ एक राष्ट्रों की चिमनियाँ धुआँ उगलती हैं और दूसरे राष्ट्रों के लोग भी इसके कारण अम्लीय वर्षा झेलते हैं। नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क आदि यूरोपीय राष्ट्र, ब्रिटेन और फ्रांस पर यह आरोप लगा रहे हैं कि उनके कल-कारखानों से निकलने वाले धुएँ से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है तथा उनके देशों में अम्लीय वर्षा हो रही है। पूरे यूरोप, कनाडा, अमेरिका और स्कैण्डिनेवियायी देशों में अम्ल वृष्टि का प्रकोप खतरनाक ढंग से बढ़ता जा रहा है। अब तक स्वीडन की 10 हजार और कनाडा की 40 हजार झीलें अम्लीय हो चुकी हैं।

       अप्रैल 1979 में स्कॉटलैण्ड में अम्लीय वर्षा के कारण नींबू के रस जितनी अम्लीयता (pH-2.2) या सिरके से ज्यादा अम्लीय वर्षा रिकार्ड की गयी। विश्व में उत्तरी-पूर्वी अमेरीका, उत्तरी यूरोप और पश्चिमी तटीय भारत भविष्य के आशंकाग्रस्त क्षेत्र हैं। यू. एस. ए. के लॉस एन्जिल्स और झीलों के देश स्वीडन की झीलों में अम्लीय वर्षा के प्रभाव परिलक्षित हुए।

अम्लीय वर्षा की प्रक्रिया

       वह जल वाष्प जो SO2 (सल्फर डाइ ऑक्साइड) और नाइट्रोजन ऑक्साइड के भूरे भूरे बादलों के रूप में आकाश में मँडराते हैं। ये दोनों ऑक्साइड कारखानों में जलते ईंधन से निकलकर सूक्ष्म कणों के रूप में वायु और मेघों में जमा हो जाते हैं और बाद हैं। में सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड का रूप ले लेते हैं हवा का बहाव कभी-कभी उन्हें अपने मूल स्थान से हजारों किलोमीटर दूर भेज देता है। इस तरह अम्लीय वर्षा के ये बादल विकसित देशों से चलकर देशों में जा पहुँचते हैं।

अम्लीय वर्षा के कारण-

       जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला और पेट्रोल जो उद्योगों एवं आधुनिक परिवहन के साधनों में दहन किया जाता है या बड़ी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। इसके साथ ही कुछ अयस्क जिनमें सल्फर होता है वे भी गरम होने पर सल्फर डाइ-ऑक्साइड बनाते हैं। उच्च तापमान पर सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड जल वाष्प की उपस्थिति में सल्फ्यूरिक एसिड। गन्धक का अम्ल तथा नाइट्रिक एसिड (शोरे का अम्ल) बनाते हैं।

     इसी प्रकार ताप विद्युत गृहों में कोयले के जलने से निसृत क्लोरीन गैस जल से क्रिया करके हाइड्रोक्लोरिक एसिड बनाती है। कार्बन डाइ ऑक्साइड भी कार्बोलिक अम्ल तनु (दुर्लभ) रूप में बनाती है। संक्षेप में तेज धूप में नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन, हाइड्रो कार्बन तथा ऑक्सीजन परस्पर क्रिया करते हैं जिससे रासायनिक कोहरा बनता है। इसी कोहरे के परिणामस्वरूप कालांतर में अम्लीय वर्षा होती है। इस प्रकार विभिन्न स्रोतों से विभिन्न अम्ल बनने की क्रिया रासायनिक सूत्रों द्वारा चित्र में अभिव्यक्त की गयी है।

What is acid rain

     वर्तमान युग में आटोमोबाइल्स एवं औद्योगिक इकाइयों की स्थापना की प्रतिस्पर्धा होने से इनकी संख्या में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है। ताप विद्युत गृहों की संख्या और उनमें कोयला उपयोग की मात्रा में निरंतर वृद्धि होने से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस पैदा हो रही है। कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस अम्लीय प्रकृति की गैस है। अतः जल में घुलकर (तनु) कार्बोलिक अम्ल बनाती है जिससे वर्षा जल की प्रवृत्ति अम्लीय हो जाती है। शुद्ध जल का पी. एच. मूल्य 7 है। जहाँ न पानी अम्लीय होता है और न ही क्षारीय अर्थात् उदासीन होता है। इससे कम होने या पी. एच. मूल्यांक घटाने पर अम्लीयता बढ़ती है तथा पी. एच. मूल्यांक बढ़ने पर क्षारीयता बढ़ती है।

      अम्ल वृष्टि से प्राप्त जल में 1.9 से 5.7 तक पी. एच. मूल्य पाया जाता है। यह मात्रा कोयले के अयस्क में उपस्थित गन्धक की मात्रा के ऊपर निर्भर करती है। कोयले के उपयोग की मात्रा भी इसको प्रभावित करती है। जैसे सिंगरौली के सुपर पावर थर्मल प्लाण्ट में प्रतिदिन 909 मीट्रिक टन कोयला उपयोग कर 45 से 182 मीट्रिक टन सल्फर डाइ-ऑक्साइड पैदा होती है। यदि ऐसी स्थिति में चिमनियाँ ऊँची न हों तो अम्ल वृष्टि क्षेत्रीय समस्या के रूप में भविष्य में उभर सकती है। इसी प्रकार पेट्रोलियम शोधक कारखानें भी सल्फर डाइऑक्साइड को बड़ी मात्रा में उत्पादित कर अम्ल वृष्टि की आशंका को जन्म देती है।

     विगत दशक में यह समस्या यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरीका के सघन औद्योगिक क्षेत्रों में जन्मी तथा वर्तमान में बहुत से औद्योगिक केन्द्र एवं औद्योगिक प्रदेश भी इसकी आशंका से ग्रसित हैं। जैसे कानपुर, कोटा, सिंगरौली, छोटानागपुर का पठार आदि।

अम्ल वृष्टि का प्रभाव:-

     अम्ल वृष्टि का कुप्रभाव जलाशय, वन संसाधनों, मिट्टियों की उत्पादकता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व में भू-दृश्यों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पेयजल स्रोत अम्लीय होकर स्वतः ही प्रदूषण की ओर अग्रसर हो रहा है। अतः मत्स्य संसाधन को भारी क्षति होना स्वाभाविक ही है। मिट्टियाँ अम्लीय हो जाने से अनुत्पादक हो जाती हैं।

     अम्ल वर्षा से सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व के पर्यटन स्थल एवं जलाशय कुप्रभावित हो जाते हैं। इमारतों को भारी क्षति पहुँचती है। जैसे आगरा के उद्योग एवं मथुरा रिफाइनरी की स्थापना के समय यह एक प्रश्नचिह्न उभर कर सामने आया था कि शोधन प्रक्रिया से निकली सल्फर डाइऑक्साइड शीघ्र ही सल्फ्यूरिक अम्ल वृष्टि से ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध इमारत, जो संगमरमर की बनी है, क्षतिग्रस्त होगी।

      ऐसा अनुमान है कि सभी उपाय और सावधानी के बावजूद मन्थरगति से क्षरण का प्रभाव भविष्य में देखा जायेगा। वैसे ताजमहल के सफेद रंग में परिवर्तन अभी से दिखाई पड़ रहा है। यही कारण है कि एक कानून पास कर शासन ने आगरा तथा उसके आसपास के कारखानों को 1992 में बंद करने के आदेश दिये थे।

अम्ल वर्षा का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

     निम्न गैसों की निम्नांकित प्रतिशत से अधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है-

       सल्फर डाइ-ऑक्साइड (SO2)- 3 पी.पी.एम., कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)-100 पी. पी. एम., नाइट्रोजन ऑक्साइड 1.4 पी. पी. एम.।

     इनमें सबसे ज्यादा खतरनाक सल्फर डाइऑक्साइड गैस है। इससे धूम्र कोहरा बढ़ता है, और यदि आर्द्रता अधिक हो तो अस्थमा, ब्रोन्काइटस एवं फेफड़ों के कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। इसके सूक्ष्मकण फेफड़ों में जाते हैं जिससे कोशिकाओं को हानि होती है और कालांतर में घाव बन जाते हैं। इससे फेफड़े के कैंसर की आशंका बढ़ जाती है।

     ‘कार्बन मोनो ऑक्साइड में कोई गन्ध नहीं होती, परंतु यह जहर का काम करती है। एक अध्ययन के अनुसार सन् 1952 में लंदन में मृत्यु दर 250 प्रतिदिन थी जो धूम्र, कुहरे में बढ़कर 750 हो गयी थी। इससे आँखों की तकलीफें बढ़ जाती हैं और ट्रिकोमा, इन्जेक्टीवाईटिस प्राय: ज्यादा धुएँ वाले इलाकों में देखने को मिलते हैं। इससे मानव को न केवल शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य और कार्यक्षमता प्रभावित होती है अपितु परोक्ष रूप से दूसरी बीमारियों का भी जन्म होता है; जैसे- आमाशय कैंसर और तंत्रिका तंत्र की शिथिलता; अम्लीय जल के प्रभाव से चर्मरोग जैसे- खाज-खुजली, एक्जिमा और एलर्जी का प्रकोप बढ़ सकता है।

       दूसरी तरफ गुर्दों से सम्बन्धित बीमारियाँ जन्म लेती हैं जैसे- पथरी पड़ना। अल्सर और पीलिया दूषित पानी से होता है। वैसे अम्लीय वर्षा से स्वास्थ्य पर प्रभाव का कोई प्रामाणिक अध्ययन अभी तक प्रस्तुत नहीं हो सका है न ही अम्ल वर्षा बड़े पैमाने पर वर्तमान में किसी बड़े क्षेत्र में निश्चित रूप से हो रही है किन्तु भविष्य में होने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

अम्ल वर्षा का पेड़-पौधों पर प्रभाव:-

       अम्लीय वर्षा जिसमें सल्फर डाइ-ऑक्साइड की मात्रा होने से प्रकाश संश्लेषण कुप्रभावित होता है और वनस्पति पर कुठाराघात होता है। परिणामस्वरूप वातावरण और दूषित हो जाता है। सल्फर डाइ-ऑक्साइड की अधिकता से पेड़-पौधों के ऊतक जल जाते हैं, पत्तियों के नुकीले हिस्से जलकर टेढ़े हो जाते हैं। इसको महानगरीय सघन परिवहन के क्षेत्र में पेड़-पौधों में देखा जा सकता है, ओजोन गैसे पत्तियों के ऊतकों को नुकसान पहुँचता है। “पराक्लीएसाइल नाइट्रेट” नई कोपलों को नष्ट कर देता है।

     सिनसिनाटी एवं न्यूयार्क नगर में वायु प्रदूषण के एक अध्ययन में पाया गया है कि कार्बन मोनोऑक्साइड का प्रतिशत पार्क और खुले इलाकों की तुलना में औद्योगिक क्षेत्रों में 60 से 70 प्रतिशत अधिक था। यह प्रतिशत पेड़-पौधों के लिए भी बहुत हानिकारक है और पेड़ों के विकास और वृद्धि पर बुरा असर डालता है।

अम्ल वर्षा की आशंका से बचने के उपाय

1. औद्योगीकरण से होने वाले प्रदूषणों पर रोक लगाना।

2. जन चेतना द्वारा जागरूकता पैदा करना।

3. सामूहिक प्रयास।

4. ऊर्जा के ऐसे स्रोतों की खोज जो प्रदूषण न फैलाते हों।

5. निरंतर वायुमण्डल की दशा का अध्ययन।

6. पर्यावण संक्षण कानूनों का कड़ाई से पालन।


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15. Describe the gases causing green house effect (हरित गृह प्रवाह को बढ़ाने वाली गैसों का वर्णन)

15. Describe the gases causing green house effect

(हरित गृह प्रवाह को बढ़ाने वाली गैसों का वर्णन)



      कार्बन डाइ ऑक्साइड के अलावा जल वाष्प, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन और ओजोन अन्य गैसें हैं जो धरती का तापमान बढ़ा रही हैं। इनमें वायुमण्डल में अत्यधिक जीवाश्म ईंधन के दहन से निरंतर कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। पिछले वर्षों में हुए औद्योगीकरण के कारण वायुमण्डल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ गयी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार एक ही वर्ष में 1.8 टन तक कार्बन डाइ ऑक्साइड वायुमण्डल में बढ़ जाती है। अतः आज के औद्योगिक युग में अनुमानतः कार्बन डाइ ऑक्साइड विगत युगों से दुगुनी मात्रा में निकल रही है। प्रत्येक वर्ष 4 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड विलुप्त हो जाती है।

      एक प्रतिवेदन के अनुसार इस समय प्रतिवर्ष 5.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड पेट्रोल और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों को जलाने से वायुमण्डल में पहुँच रही है। इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष दो अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड उष्णकटिबन्धीय वनों के विनाश के कारण वायुमण्डल में पहुँच रही है। इस प्रकार उद्योग और आधुनिक परिवहन के साधनों में ईंधन के दहन के द्वारा 5.7 अरब टन अर्थात् 600 करोड़ टन (6 अरब टन) कार्बन डाइ ऑक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में छोड़ी जाती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मृदा जुताई द्वारा उत्पन्न कार्बन डाइ-ऑक्साइड, 200 करोड़ टन वायुमण्डल में प्रतिवर्ष निकलती है।

       इस प्रकार कुल 7.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड में सिर्फ 3.8 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड ही वायुमण्डल में बची रहती है। शेष करीब 4 टन कार्बन डाइ ऑक्साइड हर वर्ष गायब हो जाती है। इसे लापता कार्बन डाइक्साइड कहते हैं। प्रतिवेदन के अनुसार ऐसा न होने पर वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा एकाएक कई गुना बढ़ जायेगी और ग्रीन हाउस प्रभाव में वृद्धि होने से धरती का तापमान अचानक बढ़ जायेगा। इस आशंका के मद्देनजर वैज्ञानिक लापता कार्बन डाइ ऑक्साइड का पता लगाने के काम में पूरे जोर-शोर से जुटे हैं।

      वैज्ञानिकों के एक वर्ग का अनुमान है कि आधी कार्बन डाइ ऑक्साइड समुद्रों द्वारा अवशोषित हो जाती है तथा आधी वनस्पतियों द्वारा अवशोषित होने पर भी लगभग 3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में जमा हो रही है। कार्बन डाइ-ऑक्साइड की यह मात्रा ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न कर समस्त पृथ्वी को निरंतर गर्म कर रही है। भविष्य में प्रत्येक दशक में तापमान में औसतन 0.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी और परिणामस्वरूप अगले 300 वर्षों में यदि इसी तरह प्रकृति बनी रही तो तापमान 10 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाने का अनुमान है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2025 में पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा और सन् 2050 में 2.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगा।

     सन् 2100 में 5.5 डिग्री तथा सन् 2300 में पृथ्वी का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जायेगा। आज वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड 0.03 प्रतिशत से बढ़कर 0.05 प्रतिशत तक पायी जा रही है। आधुनिक परिवहन के साधन, उद्योग, घटते वन और बढ़ते नगरों से पिछले सौ वर्षों में 36,000 करोड़ टन कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्पन्न की है और इससे अधिक आज उत्पन्न की जा रही है। चीन कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान रखता है। विश्व में सन् 1960 से 1990 के बीच ज्वलनशील ईंधन ने वायुमण्डल में लगभग 14 प्रतिशत कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि कर दी है। इससे तापमान में सन् 1960 से 0.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वृद्धि हुई है। जबकि पूर्व वर्षों में कई सदियों से यह मात्रा लगभग एक-सी रही है और सन्तुलन कायम रहा है। यद्यपि वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की 0.03 प्रतिशत मात्रा पृथ्वी में ऊर्जा सन्तुलन जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों के लिये आवश्यक हैं वनस्पतियों की वृद्धि और विकास के लिए यह वांछनीय है। लेकिन इसकी निरंतर वृद्धि से भविष्य में घातक परिणाम सामने आ सकते हैं जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं। हर वर्ष 110 अरब टन कार्बन डाइ-ऑक्साइड धरती से होने वाली तमाम जैविक प्रक्रियाओं द्वारा वायुमण्डल में पहुँचती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, उद्योगों, मोटर वाहनों, घरेलू उपयोग आदि की ऊर्जा की आवश्यकता के लिये जलाये गये कोयले या पेट्रोल (जीवाश्म ईंधनों) से हर वर्ष 5.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड वायुमण्डल में पहुँच रही है। इसके अलावा हर वर्ष दो अरब टन से भी ज्यादा कार्बन डाइ ऑक्साइड धरती के कहे जाने वाले उष्ण कटिबन्धीय जंगलों के विनाश से (खेती के लिए/ आग जलाकर साफ किये जाने के कारण) वायुमण्डल में पहुँच रही है।

       कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्पन्न करने वाली अनेक प्रक्रियाएँ हैं। इनमें मुख्य हैं ईंधन का दहन, कार्बनिक पदार्थों का विघटन, पेड़-पौधों और जन्तुओं के शरीर में भोजन के कारण और अन्य अप्राकृतिक विधियों से भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन होता है। विभिन्न उद्योग जो कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन पर आश्रित हैं। वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की बढ़ती मात्रा के लिए जिम्मेदार हैं। वनों के जलने और नष्ट होने से यह बढ़ी और औद्योगीकरण के पूर्व में वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा 290 पी. पी. एम. (पार्टस पर मिलियन) या 0.029 प्रतिशत थी। विगत वर्षों में 0.003 प्रतिशत से बढ़कर आज यह 0.38 प्रतिशत हो गयी है। इस प्रकार इसमें लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है।

      कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि यदि इसी दर से पृथ्वी पर होती रही तो आने वाले सौ वर्षों में इसका असर या स्तर औद्योगीकरण के पहले के स्तर से दुगुना हो जायेगा। इस तथ्य का ठीक-ठीक अनुमान लगाये जाने पर विद्वानों में मतभेद है, फिर भी भविष्यवाणी की जा सकती है कि सन् 2030 में सार्वत्रिक माध्यताप (Global Mean Temperature) सन् 1980 की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि सन् 2030 में पृथ्वी इतनी गर्म होगी, जितनी कि पिछले 1,20,000 वर्षों में कभी नहीं रही होगी।

     ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने वाली गैसों में आधी से अधिक कार्बन डाइ-ऑक्साइड ही प्रभावी है। शेष के अधिकांश भाग में क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें हैं। औद्योगीकरण की गति दुगुने से अधिक है। अतः इन गैसों का मिश्रण भविष्य में बढ़ेगा।

     वायुमण्डल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड का होना तथा इससे होने वाली सर्वात्रिक तापन (global warming) वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिये गहन चिन्ता का विषय है। सन् 1989 में प्रकाशित यू. एस. ए. नेशनल रिसोर्सेज, डिफेन्स काउनसलिंग के प्रतिवेदन के अनुसार सार्वत्रिक तापन ध्रुवों पर सबसे अधिक होगा। सात-आठ डिग्री फारेनहाइट की ध्रुव पर 20 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान की वृद्धि कर सकती है। इतने अधिक गरमाहट से कार्बन डाइ ऑक्साइड की बहुत बड़ी मात्रा जो कि अभी मिट्टी और वनस्पति के साथ जमी है, बाहर आयेगी। इससे सार्वत्रिक तापन को और बढ़ावा मिल सकता है। सार्वत्रिक तापन के साथ-साथ बदलती हुई प्रवृत्ति (Inter-Governmental Panel on Climatic Change) के अनुसार सन् 1940 तक गरमाहट प्रदर्शित करती है और इसके पश्चात् सन् 1970 तक शीतलन की प्रकृति परिलक्षित होती है। अब सन् 1970 के बाद फिर से गरमाहट होने का संकेत मिला है अर्थात् वर्तमान में तापमान में वृद्धि हो रही है जो पहले की तुलना में कहीं ज्यादा है। सन् 1980 से 1990 का दशक इस शताब्दी का सर्वाधिक गरम दशक रहा है।

हरित गृह प्रभाव को बढ़ाने वाली अन्य गैसें:-

       स्पष्ट है कि ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करने वाली प्रमुख गैसों की मात्रा वायुमण्डल में आवश्यकता से अधिक होती जा रही है और इसी कारण पृथ्वी का औसत तापमान भी बढ़ता जा रहा है। 1980 के दशक में पृथ्वी पर सबसे अधिक गर्मी पड़ी थी वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो अगले 25 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो यह वृद्धि में पृथ्वी का औसतन तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो यह वृद्धि 5 डिग्री से 7 डिग्री तक भी हो सकती है। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है कि अगले 50 वर्षों में पृथ्वी इतनी गर्म हो जायेगी जितने पिछले एक लाख वर्षों में कभी नहीं रही होगी।

        हरित ग्रह प्रभाव को प्रभावी बनाने वाली निम्नलिखित क्रियाएँ एवं गैसें हैं-

1. जल वाष्प:-

       जल वाष्प एक प्राकृतिक ग्रीन हाउस गैस है। तापमान बढ़ाने में इसकी एक अलग भूमिका है। होता यह है कि ग्रीन हाउस गैसों के कारण तापमान में वृद्धि होने से जल के वाष्पन की दर भी बढ़ जाती है। इससे वायुमण्डल में ज्यादा वाष्प जमा होती है और परिणामस्वरूप तापमान और बढ़ जाता है। इसकी मात्रा स्थान-स्थान के मौसम पर निर्भर करती है।

2. नाइट्स ऑक्साइड:-

       नाइट्रस ऑक्साइड सूक्ष्म विषाणुओं की मिट्टी में क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम है। नाइट्रस ऑक्साइड में उर्वरकों के प्रयोग से और कृषि कार्यों में उत्पन्न चीजों के सड़ने-गलने से नाइट्रोजन निकलती है। यह प्राकृतिक तौर पर जीवाणु की मिट्टी और पानी में क्रिया द्वारा उत्पन्न होती है। नाइट्रस ऑक्साइड भी प्रतिवर्ष 0.25 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन् 2030 में औद्योगिक युग के पूर्व की तुलना में यह 34 प्रतिशत अधिक उत्पन्न होगी। इसका प्रत्येक अणु कार्बन डाइ ऑक्साइड की तुलना में 250 गुना अधिक ताप प्रकट करता है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत उष्ण कटिबन्धीय मिट्टी है जहाँ पर जीवाणु नाइट्रोजन के प्राकृतिक यौगिकों से क्रिया करके नाइट्रस ऑक्साइड पैदा करते हैं। यह नाइट्रस ऑक्साइड के पूरे वायुमण्डलीय उत्सर्जन का 20-30 प्रतिशत इसी क्षेत्र में उत्पन्न होता है।

     कृषि में नाइट्रोजन उर्वरकों के इस्तेमाल, भूमि की सफाई के लिये जलाये गये पेड़-पौधे, नाइट्रोजन वाले ईंधन को जलाने से और नाइलोन उद्योगों द्वारा छोड़ी जाने वाली गैसों के कारण वायुमण्डल में इसकी मात्रा में वृद्धि हुई है। अब अध्ययनों से यह पता चलता है कि इस समय वायुमण्डल में इसकी मात्रा लगभग 0.31 प्रतिशत प्रति दस लाख भाग है।

3. मीथेन गैस:-

       मीथेन एक प्राकृतिक गैस है जो जीवाणुओं और उनकी क्रियाओं के परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में पैदा होती है। अर्थात् वह अपघटों की देन है। वायुमण्डल में अधिकांश मीथेन के स्रोत जैविक हैं। मीथेन गैस धान के खेतों, नम भूमि, दलदल से निकलती है इसलिए यह मार्श गैस भी कहलाती है।

       इसी प्रकार लगभग 36 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर चावल की खेती की जाती है। इस पैदावार के दौरान मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। यह गैस भी प्रमुख ग्रीन हाउस पैदा करने वाली गैसों में एक है। 

      अकेले भारत में मवेशियों की संख्या लगभग 46 करोड़ के आसपास है। जुगाली करने वाले ये जानवर जब भी हवा छोड़ते हैं, मीथेन गैस की कुछ मात्रा वायुमण्डल में मिल जाती हैं। यह सागरों, ताजे पानी, खनन कार्य, गैस ड्रिलिंग, जैविक पदार्थों के सड़ने आदि से उत्पन्न होती है। इस स्रोत के अलावा गाय, भैंस, भेड़-बकरी, घोड़ा, ऊँट, सुअर आदि पशु और लकड़ी खाने वाले कीड़े जैसे दीमक को मीथेन छोड़ने के लिए जिम्मेदार पाया गया है।

      हिमानियों के अंदर पाये गये बुलबुलों के नमूनों और हाल के परीक्षणों से पता चला है कि उन्नसवीं सदी के शुरूआत के साथ वायुमण्डल में मीथेन की मात्रा बढ़ रही है। यह पिछले कुछ दशकों में 0.9 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। पूरे विश्व में वर्तमान में लगभग 52.5 करोड़ टन मीथेन धान के खेतों से उत्पन्न होती है। वायुमण्डल में कार्बन मोना ऑक्साइड और कुछ अन्य प्रदूषक गैसें मीथेन को वायुमण्डल में ज्यादा देर तक रोकने में सहायक हैं। 1990 में इस गैस की वायुमंडल में मात्रा 1.72 भाग प्रति लाख (पी.पी.एम.) पायी गयी है तथा लगभग 11 प्रतिशत प्रतिवर्ष बढ़ रही है। जनसंख्या वृद्धि के साथ समानान्तर वृद्धि से मिथेन की वृद्धि का स्तर बढ़ रहा है। तापमान बढ़ने में इसका प्रत्येक अणु कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक प्रभावी है।

4. क्लोरोफ्लोरो कार्बन:-

       क्लोरोफ्लोरो कार्बन सिन्थेटिक यौगिकों का समूह है। सी. एफ. सी. एस. (CFCs) वायुमण्डल के ऊपरी सतह पर समताप मण्डल में क्लोरीन को मुक्त करती है, जो ओजोन को तोड़ती है। ओजोन परत सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। सी. एफ. सी. एस. तथा सी. एफ. सी. 12 का प्रत्येक अणु कार्बन डाइ-ऑक्साइड की तुलना में 20 हजार गुना ताप रोकती है। इन दोनों की मात्रा 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। यह मनुष्य का अनुसंधान है और प्राकृतिक तौर पर नहीं पायी जाती है। ये यौगिक एयरकण्डीशनरों तथा रेफ्रीजरेटरों में प्रशीतन (Cooling) और छिड़काव यंत्रों में प्रणोदक (Propelent) के रूप में झाग (Foam) को फैलाने और इलेक्ट्रॉनों की घटकों की सफाई और आग बुझाने के आधुनिक यंत्रों में इस्तेमाल होते हैं। पिछले छः दशकों में इसकी खपत में अत्यधिक वृद्धि हुई है और आज 4 प्रतिशत की दर से वायुमण्डल में इसकी मात्रा बढ़ रही है।

5. ओजोन:-

      समताप मण्डल की ओजोन पराबैंगनी विकिरण को सोखकर धरती के जीव-जन्तुओं की रक्षा करती है लेकिन निचले वायुमण्डल में इसका जमाव गर्मी बढ़ाने का काम करती है। यह गैस प्राकृतिक तौर पर निचले वायुमण्डल में बहुत कम मात्रा में मौजूद होती है। यह नाइट्रोजन के ऑक्साइड, मीथेन, हाइड्रोकार्बन और अन्य कार्बनिक यौगिकों के आपसी क्रिया से बनी है। इसकी मात्रा का सही-सही पता नहीं लगाया जा सका है। इसके अलावा समताप मण्डल की ओजोन का क्षय कुल मिलाकर गर्मी बढ़ाता या घटाता है। इस विषय पर भी और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।

6. सर्वत्र औसत तापमान में वृद्धि के प्रभाव:-

      जीवाश्म अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि विगत 14,500 वर्षों में समुद्र स्तर में 100 मीटर से भी अधिक की वृद्धि हुई है। साथ ही पृथ्वी के सर्वत्र औसत तापमान में वृद्धि के अनेक प्रभाव भविष्य में परिलक्षित होंगे। तापमान के बढ़ने से समुद्र में ऊष्णीय प्रसार होगा जिससे इसका तल ऊपर उठ सकता है। अगर पृथ्वी के ध्रुवों पर जमी हुई बर्फ पिघलती है तो इसकी सतह कहीं ज्यादा उठ जाने की सम्भावना है। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले 100 वर्षों में समुद्र की सतह 0.10 से 0.15 सेमी. ऊपर उठ चुकी है और प्रत्येक दशक में जब तापमान 0.3 डिग्री बढ़ेगा तो समुद्र की सतह 6 सेमी, उठेगी, अथवा सागरों के तल में औसत 6 सेमी. की बढ़ोत्तरी भविष्य में हो सकती है। सन् 2030 तक इसमें 17 से 26 सेमी. का उठाव और आ सकता है जिससे समुद्र के किनारे बसे देशों में बाढ़ आ जायेगी। परिमापक के आधार पर बताया गया है कि मात्र 1 मीटर की समुद्र तल में उठाव से मिस्र देश की 12 से 15 प्रतिशत कृषि भूमि तथा बंगलादेश की 25 प्रतिशत से अधिक उपजाऊ भूमि जलमग्न हो जायेगी। सन् 1930 से 1990 के मध्य के 50 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। ताप वृद्धि के परिणामस्वरूप दक्षिण मध्य यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरीका की वायु शुष्कता में वृद्धि हुई और कहीं-कहीं धूल भरी आँधियाँ भी चली हैं।

      वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणियाँ भी की हैं कि पृथ्वी का तापमान वर्तमान ताप से 30 डिग्री और बढ़ जाये तो अटलाण्टिका और आर्कटिक ध्रुवों के विशाल हिमावरण पिघल जायेंगे और समुद्र की सतह 100 मीटर ऊँची हो जायेगी। समस्त तटीय प्रदेश उस जल प्लावन में डूब जायेंगे। उस समय में सिडनी, मियामी, मोंटी कार्लों, कोलकाता और मुम्बई महानगर जलमग्न हो जायेंगे। अलनीनो जो ठण्डी जलधारा दक्षिणी अमेरीका के तट पर बहती थी, आज गर्म हो गयी है और निकटवर्ती वनस्पति और जीव जगत रूपान्तरण के दौ से गुज रहा है।


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