Category Environmental Geography (पर्यावरण भूगोल)

14. Gobal Consequences of Climatic Change (जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणाम)

14. Gobal Consequences of Climatic Change

(जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणाम)



           जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणामों को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत वर्णन किया जा सकता है- 

1. विश्व में फसल प्रारूप और उत्पादन में परिवर्तन होना:-

         मौसम वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक शोध में पाया कि पर्यावरण में हो रहे तापमान में परिवर्तन का प्रभाव फसलों की पैदावार पर भी पड़ सकता है। यह प्रभाव विभिन्न स्थानों के लिये अलग-अलग होंगे। इस अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि “ग्लोबल वार्मिंग” के कारण विश्व के गरीब और विकासशील देशों की फसलों की पैदावार के ऊपर इसके नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेंगे, वहीं कुछ विकसित देशों की फसलों के पैदावार में इससे वृद्धि की सम्भावना है।

      मौसम वैज्ञानिक महेन्द्र शाह की रिपोर्ट के अनुसार वायुमण्डल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण आने वाले 70 वर्षों में विश्व की कुल फसलों की पैदावार में वृद्धि होगी। साथ ही भूमध्य रेखा के पास के देशों की फसलों की पैदावार पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। भूमध्य रेखा के पास ज्यादातर गरीब या विकासशील देश हैं, जिसके कारण करीब-करीब करोड़ों लोगों की इससे प्रभावित होने की आशंका है।

      ब्राजील, भारत और दूसरे अफ्रीकी देशों की फसलों की पैदावार कम होने की आशंका है जबकि रूस, चीन, कनाडा तथा अर्जेन्टाइना की फसलों की पैदावार में वृद्धि होने की सम्भावना व्यक्त की गयी है। इन मौसम वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के लिये पृथ्वी को लगभग 2.2 मिलियन छोटे हिस्सों में बाँट लिया। फिर उनमें से प्रत्येक हिस्से से सम्बन्धित आंकडों, जिनमें मौसम, मिट्टी के प्रकार, भू-प्रदेश, फसलों के प्रकार आदि का अध्ययन किया, फिर इसकी तुलना उन्होंने मौसम परिवर्तन के प्रचलित तीन मॉडलों से की। इसके बाद उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि भूमध्य रेखा के पास का क्षेत्र भविष्य में और गर्म होता जायेगा, जिससे कि वर्तमान में जो फसल उगाई जा रही है, उनकी पैदावार मुश्किल हो जायेगी।

        वहीं उत्तरी अमेरिका, रूस तथा चीन के तापमान में भी बढ़ोत्तरी होगी, पर फिर भी वे ठंडे प्रदेश बने रहेंगे, जिससे कृषि का इन उत्तरी हिस्सों में विकास सम्भव हो पायेगा। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन उन देशों को अपनी फसलों के विकल्प खोजने में सहायक सिद्ध होगा, जिन देशों की फसलों को पैदावार के लिये फसलों का चयन कर पायेंगे। सन् 2003 को सदी का सबसे गर्म वर्ष माना गया है।

2. मरुभूमि में वृद्धि होगी:-

        एक अध्ययन के बाद यह पता चला है कि 19वीं शताब्दी की तुलना में 20वीं सदी में पृथ्वी का औसत तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। सन् 1860 जब से वैश्विक तापमान का रिकार्ड रखा जा रहा है, के बाद से पाया गया कि बीती सदी में 90 का दशक सर्वाधिक गर्म वर्ष रहा है जिसमें 1998 में गर्मी के सभी रिकार्ड टूट गये। पिछले 200 वर्षों में वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ गयी। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के इस बढ़ते स्तर को देखते हुए वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि सन् 2100 सदी के उत्तरार्द्ध तक पृथ्वी का औसत तापमान आज की अपेक्षा 1.00 से 3.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा।

    वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग के नए खतरों में धरती पर बढ़ते रेगिस्तान को भी जोड़ रहे हैं। मस्थलीकरण का विस्तार इतनी तीव्र गति से बढ़ रहा है कि दुनिया के 110 देशों में रेगिस्तान पांव फैला चुका है। इनमें अल्पविकसित, विकासशील और विकसित सभी तरह के देश शामिल हैं। हर वर्ष मानवीय गतिविधियों के कारण लगभग पांच लाख हेक्टेयर भूमि रेगिस्तान में बदल जाती है। इसके कारण वायुमण्डल के तापमान में अस्थिरता आ जाती है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बहुत बढ़ जाता है।

      अगर हमारे वातावरण का तापमान इसी तरह चढ़ता रहा तो आने वाली सदी में एक ओर विश्व के अधिकांश हिस्से ग्लेसियरों की बर्फ पिघलने के कारण जलमग्न हो जायेंगे तो साथ ही दूसरी ओर शेष बची दुनिया मरुस्थल से आच्छादित हो जायेगी और दोनों ही परिस्थितियाँ मनुष्य के जीवन के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं हैं।

3. जैव विविधता में परिवर्तन:-

     जलवायु परिवर्तन का जैव विविधता प्रभाव दो रूपों में दिखलाई देता है-

(1) धनात्मक प्रभाव,

(2) ऋणात्मक प्रभाव।

(1) धनात्मक प्रभाव-

       तापमान वर्षा परिवर्तन से कुछ जातियों को लाभ हुआ है। जैसे वे जातियाँ जो अनुकूलन करने में सक्षम हैं या विश्व के अन्य स्थानों में फैलकर आवास बना लिये हैं अथवा जिन जातियों में मनुष्य लाभ के प्रति प्रभावी हुआ है अथवा मनुष्य का संग-साथ प्रभावी हो गया है। जैसे- चूहा (Mice), कबूतर, घरेलू चिड़ियाँ आदि। इसी प्रकार CO2 की वृद्धि पर वनस्पति जगत में वृद्धि हुई है।

(2) ऋणात्मक प्रभाव-

      जलवायु परिवर्तन से विश्व में ऊष्मीकरण हुआ है। ताप वृद्धि को बहुत से जीव सह नहीं पाते हैं। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण उन जातियों की क्षति हुई जो प्राचीन अवशेष मात्र रह गयी हैं अथवा स्थान विशेष पर ही थोड़ी मात्रा में पायी जाती हैं अथवा आनुवांशिक जैव विविधता कम है अथवा जिनकी वृद्धि दर न्यून है अथवा स्थानान्तरित करने वाले जीवों को जलवायु परिवर्तन से क्षति हुई है। जैसे- भारत में शीत ऋतु में साइबेरिया से कुछ पक्षी आते हैं। यदि कहीं भी जलवायु परिवर्तन होता है तो इनका क्षतिग्रस्त होना स्वाभाविक है।

4. ध्रुवीय हिमखण्ड पिघलेंगे:-

      पृथ्वी के तापमान में बढ़ोत्तरी होने के कारण ध्रुवों पर जमे हिम खण्डों और हिमाचल के हिमनदों के पिघलने की प्रक्रिया में तेजी आयी है। इन हिमखण्डों के पिघलने से समुद्रों के जल स्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। एक ओर अंटार्कटिका की बर्फ की सतह में दरारें उभर आयी हैं, तो दूसरी ओर आर्कटिक महासागर की चालीस प्रतिशत बर्फ पिछले पचास वर्षों में पिघल चुकी है। अंटार्कटिका की तीन बर्फीली परतें- दक्षिणवर्ती, दक्षिण लार्सन और प्रिंस गुस्तव तो पूरी तरह पिघल कर गायब हो चुकी हैं।

     ओस्लो में चल रहे एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे बांग्लादेश और नीदरलैंड सहित विश्व के अनेक देशों के तटीय इलाकों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। विशेषज्ञों ने बताया है कि बर्फ पिघलने के कारण आल्प्स पर्वतमाला के ग्लेशियर पिछले दो दशकों में 20 प्रतिशत से ज्यादा सिकुड़ गये हैं।

     दुनिया के सबसे सघन हिमालयी ग्लेशियर श्रृंखला की ऐन तलहटी में अवस्थित भारत के अनेक राज्यों में इस परिघटना ने खतरे की घंटी बजा दी है।

       वैज्ञानिकों ने चेताया है कि इस प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिये समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गये तो जान-माल की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक परियोजना में किये गये अध्ययन के अनुसार, वाहनों, फैक्ट्रियों और बिजलीघरों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के कारण दुनिया का तापमान सन् 2100 तक 1.4 से 5.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। ऐसा विद्वानों के दूसरे वर्ग का अनुमान है।

     उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और काठमांडू स्थित ईसीमॉड संस्थान के एक संयुक्त परियोजना में हिमालय के तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों पर गहरी चिन्ता व्यक्त की गयी थी। परियोजना में नेपाल और भूटान हिमालय के 4000 ग्लेशियरों तथा 5000 बर्फानी झीलों का व्यापक जमीनी और उपग्रहीय अध्ययन किया गया। इसके निष्कर्षो में बताया गया था कि नेपाल और भूटान की दर्जनों बर्फीली झीलें ग्लेशियरों के पिघलने के कारण खतरनाक हद तक फूल गयी हैं और आगामी पाँच वर्षों के भीतर कभी भी फट सकती हैं। अध्ययन में सम्भावना जतायी गयी है कि झीलों में लगातार बढ़ रहें जलस्तर के कारण हिमालय और इसकी तलहटी के क्षेत्र भीषण बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं।

       संयुक्त राष्ट्र अध्ययन में कहा गया था कि हिमालय का सबसे बड़ा हिस्सा भारत में पड़ता है लेकिन भारतीय क्षेत्र में पड़ने वाले ग्लेशियरों की स्थिति का आंकलन अभी तक नहीं किया गया है। हालांकि भारत भूगर्भीय सर्वेक्षण विभाग के अध्ययनों से पता चला है कि भारतीय हिमालय में पड़ने वाले ग्लेशियर पिघलने के कारण 15 मीटर प्रतिवर्ष की गति से सिकुड़ रहे हैं। पिछले दिनों तिब्बत की पारि छू नदी में बन गयी कृत्रिम झील के कारण हिमाचल प्रदेश में अब तक खतरा बना हुआ है।

    अनेक विशेषज्ञ कृत्रिम झील बनने की परिघटनाओं को ग्लेशियरों के पिघलने से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की सम्भावनाएँ तलाशे जाने के मद्देनजर ग्लेशियरों के पिघलने और इसके परिणामस्वरूप बर्फानी झीलों के फटने की प्रवृत्ति को गम्भीरता से लिये जाने की जरूरत बतायी है।

5. निचले द्वीप व देशों का अस्तित्व संकटमय होगा:-

        विश्व के दो सबसे छोटे असइलैंड देशों कीरीबती एवं तुवेलू का अस्तित्व संकट में है। समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण वे डूबने ही वाले हैं। इन देशों का अस्तित्व संकट में हैं, वैज्ञानिकों की चेतावनी के बाद भी न सँभलने का मालद्वीप एवं बंगाल की खाड़ी के ‘सागर-द्वीपसमूह’ में पाँच में से तीन द्वीपों का अस्तित्व संकट में है।

       आइसलैंड फोरम की नौरा में हाल ही सम्पन्न बैठक में तुवेलू के मामले में चर्चा हुई, जो कि समुद्र तल से सिर्फ पाँच मीटर ऊँचा है। यह देश कब डूब जाए, कहा नहीं जा सकता। इससे 12 हजार लोगों की जान खतरे में है।

6. जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य संकट होगा-

      पर्यावरणविद् या मौसम वैज्ञानिक वार्मिंग के अनुसार कई तरह की बीमारियों के पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। साथ ही इसका हमारे पर्यावरण पर भी बहुत बुरा असर देखने को मिल रहा है। ब्रिटेन जैसे विकसित देश में भी जलवायु के कारण बदलते मौसम ने कई समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि अमेरीका व अन्य चुनिंदा देशों की तरह ब्रिटेन की भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से अग्रणी भूमिका रही है। ब्रिटेन के नागरिक भी अब गरीब देशों की समझी जाने वाली उष्ण कटिबन्धीय बीमारियों की चपेट में आने लगे हैं।

      ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस तरह के आकलन में पाया कि हर वर्ष गर्मी के मौसम के तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है, जो यहाँ नागरिकों को मलेरिया और डेंगू के अलावा जोड़ों की बीमारियाँ दे रहा है। ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह चेतावनी दी है कि अगले 20 वर्षों में यहाँ के वायुमण्डल के तापमान में जो बढ़ोत्तरी होगी, उससे ग्रीष्मकाल के दौरान अनुमानतः आधे इंग्लैण्ड में महामारियों का संकट उठ खड़ा होगा। इसके अलावा विषाक्त भोजन के मामले में भी बढ़ोत्तरी हो रही है।

      एक अनुमान के अनुसार ग्रीष्माकाल में ब्रिटेन में भोजन विषाक्त के दस हजार, लू के दो हजार और त्वचा कैंसर के पांच हजार नये रोगियों की संख्या हर वर्ष बढ़ जायेगी। ग्लोबल वार्मिंग का ऐसा प्रभाव इस रूप में देखने को मिलेगा कि गर्मियों के बाद भीषण शीत, हृदयघात से मरने वालों की संख्या बढ़कर 80 हजार तक पहुँच जायेगी। इसके बाद सन् 2020 तक इस संख्या में 15 हजार और सन् 2050 तक पाँच हजार नये रोगियों के बढ़ने की आशंका वैज्ञानिक जता चुके हैं।

       ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय के वैज्ञानिक प्रो. डोनाल्डसन तो और भी भयावह तस्वीर पेश करते हैं। उनके अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण देश में जटिल किस्म की उष्ण कटिबन्धीय बीमारी “नील फीवर” का प्रसार हो सकता है।

निष्कर्ष

    संक्षेप में, जलवायु परिवर्तन के पृथ्वी प प्रभाव के बारे में हो सकता है कि हम अधिक आँक हे हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि हम वास्तविकता से कम आँक रहे हैं, इसलिये जरूरी है कि ग्रीन हाउस गैस सान्द्रता को घटाने के लिये हम प्रभावशाली कदम बढ़ायें।

13. Climatic Change (जलवायु परिवर्तन)

13. Climatic Change

(जलवायु परिवर्तन)



      हरितगृह प्रभाव, प्रदूषण एवं अन्य भौतिक परिवर्तनों से पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन उल्लेखनीय मात्रा में हो रहे हैं। पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन का बहुत बड़ा कारण ग्रीन हाउस गैस (कार्बन डाइ ऑक्साइड, जलवाष्प, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) की सतत् वृद्धि से बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय उपमहाद्वीप की लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन पानी में समा जायेगी।

      अकेले बांग्लादेश की ही 13 मिलियन आबादी प्रभावित होगी। चावल उत्पादन में 16 प्रतिशत की कमी आ जायेगी, क्योंकि बाग्लादेश में चावल उत्पादन के लिए उपाजाऊ जमीन का 17.5 प्रतिशत हिस्सा सागरों में समा जायेगा। बढ़े हुए तापमान के कारण पेड़ों तथा जमीन की ऊपरी सतह नमी के वाष्पीकरण में तेजी से वृद्धि होगी। अमेरीका की सम्मानित संस्था ईपीए के अनुसार तापमान में 4ºC वृद्धि से वाष्पीकरण में 30 से 40 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, जिससे एशिया तथा अफ्रीका के अर्द्धशुष्क प्रदेश पूर्ण शुष्क प्रदेशों में बदल जायेंगे। घास के बड़े-बड़े मैदानों में तेजी से कमी आयेगी, जिससे पशुओं के चारे, पानी की समस्या विकराल रूप लेगी।

    संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अफ्रीका, मध्य पूर्व तथा दक्षिण यूरोप में पीने के पानी की समस्या और बढ़ेगी। विश्व की औसत वर्षा में वृद्धि होगी पर इसके वितरण में असमानता बढ़ती जायेगी। तापमान में वृद्धि के कारण वातावरण के निचले स्तर में शक्तिशाली प्रदूषक “ओजोन” की मात्रा में वृद्धि हो रही है। तापमान के साथ-साथ मच्छरों से फैलने वाले रोग जैसे- मलेरिया, पीला बुखार, डेंगू आदि में वृद्धि होगी। सन् 2001 तक अमरीका में उद्योगों से उत्सर्जित होने वाली कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा सन् 1990 के स्तर से 8.3 प्रतिशत बढ़ चुकी थी।

        जलवायु परिवर्तन के निम्नलिखित कारक जिम्मेदार है-

1. प्रदूषण:-

     प्रदूषण आज की अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन चुका है। जलवायु परिवर्तन में प्रदूषण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बढ़ती आबादी के कारण विभिन्न क्षेत्रों में पर्यावरण असन्तुलित हो रहा है। महानगरीय क्षेत्रों में औद्योगीकरण एवं जनसंख्या विस्फोट के कारण तापमान द्वीप, प्रदूषण, गुम्बद तथा ‘ओजोन परत में छेद’ आदि के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है जिससे प्रदूषण क्षेत्र न्यून वर्षा के गर्म क्षेत्र बन जाते हैं। वायुमण्डल में ओजोन परत में छेद होने के कारण आगत वर्षों में पराबैंगनी किरणों का प्रभाव 8 से 15 प्रतिशत और बढ़ जायेगा। महानगरीय सीमेंट के जंगलों में एक विशेष जलवायु परिवर्तन हो जाया करता है जिससे उच्च तापमान द्वीप बनते हैं। 

2. भौतिक परिवर्तन-

       अलनिनो प्रभाव इस भौतिक परिवर्तन में उल्लेखनीय है। दक्षिणी अमेरीकी महाद्वीप के तटवर्ती प्रशांत महासागर में तापमान असमान रूप से बढ़ जाने से मौसम में बदलाव आता है। इसका सीधा असर भारत के दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पर पड़ता है जो भारत में 80 प्रतिशत वर्षा से अधिक के लिये जिम्मेदार है। यह मानसून मई से सितम्बर तक सक्रिय रहता है।

   भारत, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान में अलनिनो का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अर्थात् भारतीय महाद्वीप में अलनिनो ने भारतीय मानसून को अत्यधिक प्रभावित किया ही है। साथ ही आस्ट्रेलिया और दक्षिणी चीन में अनावृष्टि की है।

अलनिनो का प्रभाव-

     अलनिनो प्रशांत महासागर में पैदा होने वाली गर्म जलधाराओं का प्रभाव है जो पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा सकता है। यह गर्म जलधारा मात्रा प्रशांत महासागर में इसलिए पैदा होती है क्योंकि इस क्षेत्र पर सूर्य की सीधी किरणों के कारण समुद्र का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। जलवायविक वैज्ञानिकों का मानना है कि अलनिनो के कारण पैदा होने वाली हवाएँ पूरब से पश्चिम की ओर जिस भी क्षेत्र से गुजरती है वहाँ पर जलवायु के विपरीत प्रभाव डालती हैं। अलनिनो के कारण इंडोनेशिया में सूखा पड़ा। भारत में भी अलनिनो के प्रभाव से मानसून अस्थिरता की पराकाष्ठा पर पहुँच गया है।

3. वनों का ह्रास-

       वनों की आग का प्रभाव आस्ट्रेलिया और इण्डोनेशिया के जंगलों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। वन भूमि पर कृषि भूमि का दबाव भारत में सबसे अधिक वन विनाश का प्रभाव जलवायु पर और जलवायु का प्रभाव वन विनाश पर स्पष्ट है। विश्व सन्दर्भ में तापमान की बढ़ोत्तरी जलवायु परिवर्तन का मुख्य बिन्दु है।

   विगत अनुमान से जलवायु परिवर्तन विशेषतः दुगना बढ़ रहा है। निरंतर जलवायु का पृथ्वी पर खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है। यह जैसा सोचा गया था, उससे कहीं अधिक घातक है। पृथ्वी को इस भयावह प्रभाव से बचाने की सख्त जरूरत है। ये चेतावनी संयुक्त राष्ट्र द्वारा गत माह “मौसम परिवर्तन” पर तीसरी अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए “Inter Governmental Panel on Climate Change” डॉ. राबर्ट वाटसन ने दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी का तापमान पूर्वानुमानों की तुलना में दुगुनी गति से बढ़ रहा है। मौसम परिवर्तन पर्यावरण से जुड़ा यह गम्भीर मुद्दा है।

      अध्ययन दल से जुड़े एक अन्य सदस्य ने भूमण्डल का तापमान बढ़ने का पर्यावरण के लिये महासंकट की भविष्यवाणी की है। संयुक राष्ट्र की ताजी रिपोर्ट तीन हजार वैज्ञानिकों के कठिन परिश्रम के बाद तैयार की गयी है। कम्प्यूटर आधारित गणना के आधार पर दावा है कि शताब्दी के अन्त तक तापमान में 5.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस स्थिति के लिये वे प्रकृति को नहीं, बल्कि इंसानी गतिविधियों को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि औद्योगिक प्रदूषण और गैसों का निस्तारण हालात बिगाड़ने में सर्वाधिक दोषी हैं। पृथ्वी के पर्यावरण पर मँडरा रहे खतरे के लिए संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिकी रूप से समृद्ध देश जिम्मेदार हैं। 

     औद्योगिक प्रदूषण एवं उद्योगों से निकली गैसों के वायुमण्डल में मिलने से पृथ्वी क तापमान बढ़ रहा है। मौसम विज्ञान अध्येता डॉ. आर. वाटसन का कहना है कि “मौसम के पृथ्वी पर प्रभाव के बारे में हो सकता है कि हम अधिक आंक रहे हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि हम वास्तविकता से कम आंक रहे हैं। इसलिये जरूरी है कि ग्रीन हाउ गैस सान्द्रता को घटाने के लिये हम प्रभावशाली कदम बढ़ाएँ।” उनका विश्वास है कि यह गैस औद्योगिक रूप से समृद्ध देश ही सर्वाधिक बढ़ रहे हैं।

      विश्व सन्दर्भ में जलवायु परिवर्तन को संक्षेप में लिखा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन से मुख्य आशय तापमान की बढ़ोत्तरी है जिसे डॉ. दिनेश मणि ने अपने शोध लेख ‘पृथ्वी की गरमाहट’ में बतलाया कि भारत और अन्य देशों में 2010 से 2070 ई० तक की अवधि में हरित ग्रह प्रभाव के कारण मानसून में भारी वृद्धि होगी तथा नीचे के इलाके जलमग्न एवं बाढ़ग्रस्त हो जायेंगे। छोटे द्वीप डूब जायेंगे और समुद्र के तट नष्ट हो जायेंगें और कृषि भूमि एवं मछलियाँ कम हो जायेंगी। विश्व का तापमान बढ़ने से मलेरिया, कालाजार, मस्तिष्क शोध, नेत्र रोग, आदि बढ़ सकते हैं।

     अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण संगठन की रिपोर्ट से भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इथोपिया आदि देशों में मलेरिया, कालाजार की वापसी इसका प्रमाण है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार आगामी वर्षों में विश्व के औसत तापमान में प्रति दशक 0.3 प्रतिशत की वृद्धि होगी और इस प्रकार विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि सन् 2100 के अन्त तक 3.6 सेल्सियस तापमान बढ़ जायेगा।

     वाशिंगटन स्थिति प्रसिद्ध अनुसंधान केन्द्र ‘Climate Institute’ ने एशिया में जलवायु परिवर्तन नामक नवीन प्रतिवेदन में बतलाया कि हरित ग्रह गैसों की अधिकता के कारण भारत, लक्षद्वीप, पाकिस्तान, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, फिलीपीन्स, ब्रिटेन (आइसलैण्ड) आदि देशों में तापमान और समुद्र सतह में उठाव का संकट निकट भविष्य में है।

       प्रतिवेदन के अनुसार यदि ग्रीन हाउस गैसों में ज्यादा वृद्धि होती है तो इन देशों के समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से 3 डिग्री और मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस से 4.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में समुद्र का जलस्तर 15 सेमी. से 90 सेमी. तक बढ़ सकता है। यदि ग्रीन हाउस गैसों में मध्यम स्तर की वृद्धि होती है तब समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.3 डिग्री और मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है।

     जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से फलोत्पादन एवं कृषि उत्पादन में अंतर आना स्वाभाविक है। कार्बन डाई ऑक्साइड की सान्द्रता के कारण वायुमण्डल में नमी बढ़ती है और वर्षा की सम्भावना बढ़ जाती है। कीटजनित रोगों के लिए अनुकूल होते हैं तो खाद्य समस्या को प्रत्यक्ष प्रभावित करते हैं

      सर्वात्रिक परिसंचरण मॉडल सन् 2030 तक विश्व तापमान में 1.5 से 5.2 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होने का संकेत देते हैं। ये मॉडल ऊपरी वायुमण्डल के ठण्डा होने के साथ-साथ सतह के गर्म होने का संकेत भी देते हैं। खासकर ऊपरी तथा मध्य अक्षांशों में तापमान में सर्वाधिक परिवर्तन होने की सम्भावना है।

       शरदकाल में तापमान की वृद्धि औसत परिवर्तन में दुगुनी या उससे भी ज्यादा हो सकती और यह वृद्धि बड़ी तेजी से होगी। दुगनी कार्बन डाइ ऑक्साइड सान्द्रता के साथ जलचक्र 10 प्रतिशत अधिक तीव्रता से काम करेगा, वायुमण्डल के तापमान में 5.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि औसत उसकी जलवह क्षमता की लगभ 40 प्रतिशत तक बढ़ा देगी जो कि जलवायु में भारी परिवर्तन का संकेत है।

12. Examples for man Made Disasters in India (भारत में मानव जनित आपदाओं का उदाहरण)

12. Examples for man Made Disasters in India

(भारत में मानव जनित आपदाओं का उदाहरण)



          भारत में मानवजनित आपदाओं को निम्न उदाहरण द्वारा देख सकते है।

(1) भोपाल गैस त्रासदी, 1984 (Bhopal Gas Tragedy)

       भोपाल में 2-3 दिसम्बर, सन् 1984 को हुई गैस दुर्घटना प्राणघातक गैसों के रख-रखाव में मनुष्य की असावधानी से उत्पन्न आपदापन्न प्रकोपों का ज्वलंत उदाहरण है। भोपाल स्थित अमेरिकन यूनियन कार्बाइड कारखाने के गैस संयंत्र से 2-3 दिसम्बर (1984) की शीत रात्रि में जहरीली मिक गैस (MIC= Methyle Iso-Cynate) के अचानक फूट निकलने के कारण वायु प्रदुषण की वृहत्तम दुर्घटना घट गयी। आधिकारिक सूचना के कारण इस प्रलयकारी गैस दुर्घटना के कारण कुछ घण्टों में ही 2500 व्यक्ति कालकवलित हो गये जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इस दुर्घटना से मरने वालों की संख्या 5000 से अधिक बतायी गयी है।

       भोपाल स्थित इस अमेरिकी यूनियन कार्बाइड कारखाने में कीटनाशी रसायन के निर्माण के लिए मिक गैस का उत्पादन किया जाता था तथा उसका भूमिगत कंटेनरों में भण्डारन किया जाता था। 2-3 दिसम्बर की रात में इन्हीं कंटेनरों से मिक गैस का अचानक रिसाव (लीकेज) प्रारम्भ हुआ तथा यह रिसाव 40 मिनट तक चलता रहा।

       प्रातः कालीन वायु के प्रभाव से यह जहरीली गैस पुराने भोपाल नगर के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में तेजी से फैल गयी तथा पलक झपकते हजारों लोगों को निगल गयी। इसके अलावा हजारों निवासी इस विषाक्त गैस से बुरी तरह प्रभावित हो गये एवं हजारों जानवरों ने प्राण त्याग दिये। इस गैस मे पेय जल, मिट्टियों, तालाबों तथा जलाशयों के जल को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया तथा गर्भस्थ शिशुओं (भ्रूणों), नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं आबाल-वृद्ध लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया।

     गैस त्रासदी के समय जन्मे बच्चों, जो बाद में मर गये, के जिगर में नीले धब्बे पड़ गये वे खाँसी तथा अस्थमा के रोगी हो गये तथा अधिकांश की आँखों की रोशनी चली गयी। भोपाल गैस त्रासदी को घटित हुए एक लम्बा समय बीत गया है परन्तु आज भी पुराने भोपाल के खांसते, आँख, मलते तथा लंगड़ाते लोग मानव-कृत जानलेवा आपदा की घटना को ताजा कर जाते हैं।

(2) चसनाला कोयला खदान आपदा, 1975 (Chasnala Coal Mine Disaster)

       झारखण्ड राज्य के धनबाद जिले में स्थित चसनाला कोयला खदान में 27 दिसम्बर, 1975 को एक हृदय विदारक (Heart Shaking) ऐसी आपदा घट गयी जिस कारण खदान में कार्यरत 372 लोगों की जान चली गयी। चसनाला की गहरी खदान में सैकड़ों खननकर्ता (Miners) कार्य कर ही रहे थे कि एक विस्फोट करने पर खादान के एक चैम्बर की छत अचानक भर भराकर गिर गया और उसमें 272 दबकर मर गए।

(3) संरचनात्मक विफलता (structural failure)

     संरचनात्मक विफलता के कई ऐसे उदाहरण हैं जो भवनों के उनके निर्माण के समय ही ध्वस्त होने को दर्शाते हैं। अर्थात् अपने निर्माण की अवस्था में ही कई भवन भरभरा कर ढह जाते हैं (गिर पड़ते हैं)। उदाहरण: अप्रैल 2013 में महाराष्ट्र के थाणे जिला में 7 मंजिला भवन जिसका बिना सरकारी अनुमति के गैरकानूनी रूप से निर्माण कराया जा रहा था, भरभरा कर गिर गया।

      इस दुर्घटना में 39 व्यक्ति मारे गये तथा 72 घायल हो गये। उस समय राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF– National Disaster Response Force) की टीम ने अतिरिक्त 25-30 लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जतायी थी। इसी तरह 2013 में ही महाराष्ट्र में संरचनात्मक विफलता की दुर्घटना सितम्बर महीने में घट गयी। मुम्बई में एक 4 मंजिला रिहायसी (Residential) भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर गया, जिस कारण 61 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी।

(4) संरचनात्मक अग्निकांड दुर्घटना आपदा (Structural Fire accidents Disaster)

    विभिन्न उपयोगों वाले भवनों यथा प्राइवेट एवं पब्लिक सेक्टर के कार्यालय, सिनेमा हाल, शापिंग माल, रिहायसी तथा वाणिज्यिक काम्प्लेक्स, धार्मिक शिविर, कारखाना तथा मिल आदि में आग लगने से जानलेवा मानव जनित आपदायें उत्पन्न हो जाती हैं, जिनसे जान-माल की भारी क्षति होती है।

     भवनों में आगजनी की दुर्घटनायें प्रायः शार्ट-सर्किटिंग, मशीनों एवं उपकरणों में खराबी, पावर स्टेशनों का खराब अनुरक्षण (रख-रखाव Maintenance), खराब एवं पुरानी वायरिंग, तोड़-फोड़ (Sabotage), आतंकी हमला, लापरवाही, सुरक्षा मानकों तथा फायर फाइटिंग मैनुअल की नजर अन्दाजी (Avoidance), अग्निशामकों (Fire Extinguishers) का अभाव होने पर या खराब अनुरक्षण, अपर्याप्त फायरटेण्डर या इनका पूर्णतया अभाव, आग बुझाने में लगे लोगों का समुचित प्रशिक्षण न होना एवं प्रशिक्षित फायरमैन की पर्याप्त संख्या का अभाव, जल की खराब आपूर्ति आदि के कारण होती हैं।

      जून 1997 में उपहार सिनेमाहाल में आग की दुर्घटना का निम्न उदाहरण सुरक्षा के अनुपालन में मानवीय लापरवाही की कहानी कह देता है:

          ‘बार्डर फिल्म’ के प्रीमियर प्रदर्शन के समय नई दिल्ली में ग्रीन पार्क के निकट अवस्थित ‘उपहार सिनेमा हाल’ में 13 जून, 1977 को दिल को दहला देने वाली आपदापन्न भीषण अग्निकाण्ड की दुर्घटना घट गयी। सिनेमा हाल में फंसे 59 व्यक्तियों की घने धुंए में दम घुटने से मृत्यु हो गयी। आग लगने की घटना से भगदड़ (Stampede) मच गयी, जिसमें अफरा-तफरी में 103 लोग गम्भीर रूप से घायल हो गये। भवन के तहखाने (Basement) में लगे 1000 KVA के विद्युत ट्रान्सफार्मर में अचानक ब्लास्ट (घमाका) होने से अग्निकाण्ड की यह आपदा हुई थी।

      उल्लेखनीय है कि भवन का तहखाना केवल सीमित संख्या में कार पार्किंग के उपयोग के लिए था। अन्य किसी भी प्रकार का उपयोग वर्जित था। उस दिन अनुमन्य कार पार्किंग के नियम का उल्लंघन करके 36 कारों की पार्किंग की गयी थी। तहखाने में स्थित बिजली के ट्रांसफार्मर के अनुरक्षण (Maintenance) में लापरवाही बरती गयी थी।

      ट्रांसफार्मर में अचानक ब्लास्ट होने से लगी आग ने 20 कारों को अपने चपेट में ले लिया। परिणामस्वरूप आग की लपटें तथा धुएं तेजी से फैलने लगे। देखते-देखते आग तथा धुंआ 5-मंजिला भवन में फैल गया। अधिकांश पीड़ित व्यक्ति बालकनी में फंस गये थे, तथा बाहर निकलने के दरवाजे के बन्द होने के कारण वे बाहर नहीं जा सके। परिणामस्वरूप दम घुटने (Suffocation) के कारण 59 लोगों की मृत्यु हो गयी।

(5) शिवकाशी आतिशबाजी आपदा, भारत, 2012

      तमिलनाडु में शिवकाशी से 13 किमी. दूर मुदालीपट्टी की एक आतिशबाजी (Fireworks) फैक्टरी में 5 सितम्बर, 2012 को आतिशबाजी की एक हृदयविदारक त्रासदी घट गयी, जिसमें 38 श्रमिक (2 महिलायें तथा अधिकांश बच्चे) मृत्यु के शिकार हो गये।

      उल्लेखनीय है कि सामान्य रूप से तमिलनाडु और मुख्य रूप से शिवकाशी भारत में आतिशबाजी का सर्वाधिक निर्माता है। परन्तु अराजकता, सुरक्षा एवं बचाव के उपायों की उपेक्षा एवं अनुपालन करने में लापरवाही राज्य सरकार की उपेक्षा तथा श्रमिकों की लापरवाही के कारण आतिशबाजी तथा पटाखों की फैक्टरियों एवं गोदामों में आये दिन आगजनी तथा विस्फोटों की दुर्घटनायें होती रहती हैं, जिस कारण आतिशबाजी तथा पटाखा बनाने के काम में लगे श्रमिकों, जिनमें अधिकतर बच्चे होते हैं (यह नियम विरुद्ध है) से कई मौत के शिकार हो जाते हैं।

      तमिलनाडु में शिवकाशी और उसके आस-पास के क्षेत्रों में आतिशबाजी, पटाखा एवं दियासलाई बनाने की कई इकाइयां हैं। इनमें से कई गैरकानूनी हैं तथा गावों एवं निजी घरों में स्थापित हैं। इनमें काम करने वाले श्रमिक पटाखों के निर्माण में काम आने वाले विस्फोटकों तथा अन्य खतरनाक सामग्रियों को हैण्डिल करने के लिए अच्छी तरह प्रशिक्षित नहीं हैं। साथ ही साथ कच्चे पदार्थों खासकर विस्फोटकों (बारूद) तथा निर्मित पटाखों के उचित भण्डारन की समुचित व्यवस्था एवं सुविधाओं का अभाव है। इन सभी के कारण भारत, पाकिस्तान तथा बांगलादेश में आतिशबाजी से जानलेवा दुर्घटनायें तथा जनहानियाँ होती रहती हैं। विकसित देशों में भी सुरक्षा उपायों के बावजूद आतिशबाजी की दुर्घटनायें होती हैं।

     शिवकाशी में 5 सितम्बर, 2012 की आतिशबाजी की दुर्घटना श्रमिकों एवं फैक्टरी के मालिकों की लापरवाही के कारण विस्फोट होने से हुई थी। धमाका इतना प्रबल था कि फैक्टरी की 30 कंक्रीट छतें पटरा हो गयीं तथा 38 लोग कालकवलित हो गये। यह दुर्घटना आतिशबाजी की एक प्राइवेट ओम शक्ति फैक्टरी में घटी थी।

(6) उल्लेखनीय है कि प्रति 12वें वर्ष महाकुम्भ के पवित्र स्नान पर्व के समय  प्रयागराज में गंगा, यमुना एवं अदृश्य सरस्वती नदियों के पवित्र संगम पर विश्व का सबसे बड़ा जन समुदाय एकत्रित होता है जिसमें कई करोड़ श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं।

      सन् 2013 में महाकुम्भ स्नान पर्व के समय 10 फरवरी को लगभग 4 करोड़ श्रद्धालुओं का संगम की रेती पर जमघट लग गया परन्तु राज्य एवं केन्द्र की सरकारों ने इस भारी भीड़ का इतना सुनियोजित ढंग से प्रबन्धन किया कि विश्व समुदाय के सामने भीड़ प्रबन्धन का यह सफल मॉडल एक नजीर बन गया विश्व की कई लब्धप्रतिष्ठ शैक्षिक संस्थाओं ने इस महाकुम्भ के दौरान भीड़ प्रबन्धन की भारतीय विधि का अध्ययन करने के लिए अपनी-अपनी विशेषज्ञों की टोलियाँ इलाहाबाद भेजी थीं।

      भीड़-भगदड़ मुख्य रूप से अफवाह फैलने पर दहसत में लोगों के सम्बन्धित स्थान से भाग निकलने के प्रयास में होती है। भीड़-भगदड़ के स्थानों में पूजा स्थल, खेल-कूद स्थल, सिनेमा हाल, शापिंग माल, धार्मिक मेला, रेलवे स्टेशन, संकरे पुल, व्यापारिक केन्द्र व बाजार, धार्मिक एवं राजनीतिक सभायें आदि प्रमुख हैं। भीड़-भगदड़ के समय अधिकांश मौत दम घुटने (Suffocation) तथा सिर एवं सीने में चोट लगने से होती है।

      भगदड़ पूर्वकथनीय नहीं है। अर्थात् भारी भीड़ में भगदड़ की सम्भावना तो रहती है, परन्तु यह पता नहीं होता है कि कब भगदड़ मचेगी। अतः भगदड़ आपदा के प्रबन्धन का एकमात्र तरीका उसकी प्रायिकता (Probability) का आंकलन कना तथा विषम परिस्थितियों में भीड़ का प्रबन्धन करने के लिए पहले से सावधान हना तथा सभी आवश्यक उपायों एवं साधनों को तैयार स्थिति में रखना है।


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11. Man-made disaster and its types (मानव जनित आपदा एवं उसके प्रकार)

11. Man-made disaster and its types
(मानव जनित आपदा एवं उसके प्रकार)



        मनुष्य के कार्यों, जो जानबूझ कर या अनजाने में किए जाँय तथा जिनसे जान-माल की भारी क्षति होती है, को मानवकृत (मानव जनित) आपदा कहते हैं। ऐसे इच्छित या अनिच्छित (Intentional or unintentional, deliberate indeliberate) कार्यों द्वारा जनित आपदाओं से मानव मृत्यु के अलावा सरकारी तथा निजी सम्पत्तियों को भारी हानि होती है। मानव जनित आपदा की इस परिभाषा का और अधिक विस्तरण किया जा सकता है:

      मनुष्य की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, इच्छित या अनिच्छित क्रियाओं, उसकी असावधानी, लापरवाही, अज्ञानता (Ignorance), गलती या मानव-निर्मित तंत्रों की विफलता के कारण उत्पन्न आपदाओं घटनाओं या दुर्घटनाओं (Accidents), जिनसे मानव के जान-माल की भारी क्षति होती है, को मानव जनित आपदा कहते हैं। निम्नलिखित कतिपय उदाहरणों द्वारा मानवकृत आपदाओं की अवधारणा को स्पष्ट किया जा सकता है:

(1) जानबूझकर/इच्छित कार्य (Deliberate and intentional acts):

⇒ द्वितीय विश्व युद्ध के समय सन् 1945 में अमेरिका सेना द्वारा जापान के हीरोशिमा एवं नागासाकी नगरों पर एटम बम गिराया जाना।

⇒ सन् 2001 में आतंकवादियों द्वारा 11 सितम्बर को संयुक्त राज्य के विश्व ट्रेड सेन्टर के दो टावरों तथा पेण्टागन पर हवाई जहाजों से हमला।

(2) लापरवाही के कार्य (Acts of negligence):

⇒ सन् 1986 में युक्रेन के चर्नोबिल स्थित परमाणु शक्ति संयन्त्र का मेल्टडाउन।

⇒ 3/4 दिसम्बर, 1984 को भारत की भोपाल गैस त्रासदी।

(3) अनिच्छित कार्य (Unintentional Act):

⇒ भूमण्डलीय ऊष्मण्न (Global Warming) तथा जलवायु परिर्वतन।

⇒ पर्यावरण प्रदूषण

⇒ तेज दर से मृदा अपरदन (Accelerated rate of soil erosion)

⇒ भीड़, भगदड़ (Crowd Stampede), यथा: भारत के मध्य प्रदेश के दतिया जिले में रतनगढ़ स्थित माता देवी मन्दिर में श्रद्धालुओं की लाखों की भीड़ में 13 अक्टूबर, 2013 को मची भगदड़ में 115 भक्तों की मृत्यु हो गयी। यह भगदड़ पुल टूटने की अफवाह तथा जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण हुई थी।

(4) लापरवाही तथा बदइन्तजामी (Negligence and Mishanding) के सम्मिलित कार्य:

⇒ रेल दुर्घटनायें

⇒ सड़क दुर्घटनायें

⇒ हवाई दुर्घटनायें

⇒ सागरों में जलयानों की दुर्घटनायें।

       मनुष्य के कुछ कार्य प्राकृतिक आपदाओं को तेज तथा प्रेरित करते हैं, यथा: विफलता, आकस्मिक बाढ़, जल भण्डार-प्रेरित भूकम्पीय घटनायें (Reservoir-induced seismic events), भूस्खलन (वनविनाश तथा सड़क निर्माण द्वारा), तीव्र मृदा अपरदन (Accelerated soil erosion) आदि।

मानवजनित आपदायें: प्रकारिकी

(Man-Made Disasters: Typology)

       उल्लेखनीय है कि मानवकृत आपदाओं को निश्चित वर्गों में विभाजित करने के लिए कोई निर्धारित मानक क्रिया नहीं है। इसेक बावजूद कुछ ने मानव जनित आपदाओं को विशद रूप में विभिन्न प्रकारों/वर्गों में विभाजित करने का प्रयास किया है, जो निम्न प्रकार हैं:

(1) प्रौद्योगिकीय आपदायें (Technological Disasters):

(i) औद्योगिक प्रकोप तथा आपदायें

⇒ खतरनाक तत्वों के प्रक्रमण तथा भण्डारन (Processing and storage) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

⇒ कच्चे पदार्थों के निष्कासन (Extraction) तथा खनन (Mining) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

⇒ खतरनाक वस्तुओं, यथाः पेट्रोकेमिकल्स, पटाखा आदि, का उत्पादन करने वाली इकाइयों की दुर्घटनायें, आदि।

(ii) संरचना की विफलता तथा आग लगना (Structural failure and fire)।

(iii) बिजली का अत्यधिक उपयोग तथा खतरनाक वस्तुओं का विस्फोट, यथा: पटाखों के भण्डार में विस्फोट सम्बन्धी दुर्घटनायें

(iv) रेडियेशन सन्दूषण (Contamination)।

(v) खतरनाक जैविक पैथोजेन (वैक्टीरिया, वाइरस तथा परजीवी)।

(vi) रासायनिक, जैविक, रेडियोलाजिकल तथा परमाणु (CBRNS) तत्वों (Substances) से सम्बन्धित दुर्घटनायें आदि।

(2) परिवहन आपदायें (Transportation disasters):

(i) हवाई दुर्घटनायें

(ii) सड़क दुर्घटनायें

(iii) रेल दुर्घटनायें

(iv) स्पेस दुर्घटनायें

(v) तेलवाहक जलयानों से तेल का रिसाव तथा आयल स्लिक

(vi) समुद्री यात्रा की दुर्घटनायें

(3) सामाजिक आपदायें (Sociological Disasters):

(i) अपराध

(ii) लूट-मार

(iii) नागरिक उपद्रव (Civil disturbance)

⇒ धरना प्रदर्शन (Demonstration)

⇒ हड़ताल

⇒ दंगा-फसाद (Riots)

⇒ अपराधिक कार्य

⇒ सरकारी व्यवस्था की अवमानना

(4) आतंकवाद की आपदायें (Terrorism Disasters):

(i) राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद / अलगाववाद का आतंक

(ii) राष्ट्र-प्रायोजित आतंकवाद

(iii) धार्मिक आतंकवाद

(iv) वामपंथी आतंकवाद

(v) दक्षिणपंथी आतंकवाद

(vi) अराजकवादी (Anarchist) आतंकवाद

(Vii) साइबर आतंकवाद

(Viii) नार्को आतंकवाद

(5) भीड़ भगदड़ आपदा (Crowd Stampede disaster):

(i) धार्मिक मेला / स्नान/प्रार्थना / अनुष्ठान के समय भगदड़।

उदाहरण: महाकुंभ धार्मिक मेला/स्नान, 2013 (इलाहाबाद), मक्का में धार्मिक भीड़ भगदड़, प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में भगदड़ आदि।

(ii) स्पोर्ट्स आयोजनों के समय भगदड़।

(iii) राजनीतिक बड़ी सभाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के समय भगदड़।

(6) राजनीतिक एवं धार्मिक आपदायें:

(i) युद्ध, यथा: प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध।

(ii) गृह युद्ध (Civil Wars) यथा: रूसी गृह युद्ध- 1917 से 21, अमेरिकी गृह युद्ध- 1861 से 1865, द्वितीय सूडानी गृह युद्ध- 1562 से 1598, नाइजेरियन गृह युद्ध- 1967 से 1970 आदि।

(iii) धार्मिक युद्ध, यथा: फ्रेंच धार्मिक युद्ध- 1562 से 1598।

(iv) नीति सम्बन्धित आपदायें, यथा: युक्रेन में रूस की होमोलोडोर पॉलिसी के कारण विकट अकाल पड़ने से लगभग 1,000,000 लोग भुखमरी से मर गये चीन की लीप फारवर्ड पॉलिसी के कारण चीन के उत्तरी प्रान्तों में व्यापक भुखमरी से कई मिलियन लोग मौत के शिकार हो गये। भारत में सन् 1942 में बंगाल चावल अकाल से सम्बन्धित ब्रिटिश शासन की नीति के कारण लाखों लोग भुखमरी से मर गये।

(v) नरसंहार (Genocides), जहरखुरानी (Poisioning), नजरबन्दी शिविर (Concentration camps) की आपदायें।

(7) मानव-प्रेरित प्राकृतिक आपदायें (Man-Induced Natural Disasters):

(i) बांध विफलता बाढ़ (Dam Failure floods)।

(ii) जलभण्डार- प्रेरित भूकम्पीय घटनायें (RIS, Reservoir induced seismic events)।

(iii) तीव्र मृदा अपरदन तथा अवसादीकरण (Accelerated soil erosion and sedimentation)।

(iv) प्रदूषण एवं पर्यावरण अवनयन (Environmental Degradation)।

(v) भूमण्डलीय ऊष्मन/तापन तथा जलवायु परिवर्तन।

 प्रौद्योगिकीय एवं औद्योगिक आपदायें

Technological and Industrial disasters

        प्रौद्योगिकीय आपदाओं के अंतर्गत निम्न को शामिल किया जाता है:

(i) औद्योगिक दुर्घटना

(ii) संरचनात्मक विफलता (भवनों का ध्वस्त होना)

(iii) घरों, कारखानों, तथा भवनों में आग लगना

(iv) विद्युत विफलता (Power failure) तथा बिजली संकट

(v) खतरनाक वस्तुओं में विस्फोट (यथा पटाखा दुर्घटना)

(vi) खतरनाक जैविक तत्वों के भण्डारण, रख-रखाव तथा उनके इस्तेमाल के समय जैव प्रयोगशालाओं तथा स्वास्थ्य केन्द्रों में दुर्घटनायें।

(viii) रासायनिक, जैविक, रेडियोलाजिकल तथा परमाणु ( CBRNs) तत्वों (Substances) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

(viii) परमाणु शक्ति संयंत्रों में रियक्टरों का मेल्टडाउन तथा रेडियेशन का रिसाव

औद्योगिक प्रकोप तथा आपदायें:-

       औद्योगिक अवस्थितियाँ (Sites), यथा कारखाने, मिल आदि, सदा दुर्घटना प्रकोप तथा आपदाओं के लिए सुभेद्य (Vulnerable) होती हैं। इन दुर्घटनाओं से मनुष्यों एवं पशुओं की मृत्यु हो जाती है, मानव सम्पत्ति तथा पर्यावरण को भारी क्षति होती है। ये औद्योगिक दुर्घटनायें मानव की असावधानी, लापरवाही तथा नासमझी के कारण ही होती हैं। उल्लेखनीय है कि औद्योगिक उत्पादनों में मशीनों द्वारा कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों (Steps) का संचालन मनुष्य द्वारा ही किया जाता है।

      अतः खनिजों के खनन (Mining), फैन्रीकेशन प्रक्रमण (Processing), भण्डारन (Storage), उत्पादित वस्तुओं के परिवहन तथा वितरण आदि सभी चरणों में मुनष्य का हाथ रहता है। अतः औद्योगिक उत्पादन, खतरनाक पैथोजेन की हैण्डलिंग तथा अन्य खतरनाक तत्वों एवं वस्तुओं के रख-रखाव एवं हैण्डलिंग के प्रत्येक चरण पर जोखिम एवं खतरे की सम्भावना बनी रहती है।

       औद्योगिक प्रकोपों एवं आपदाओं के कई कारक होते है जैसा कि नीचे दिया गया है:

 पदार्थों की स्वयं खतरनाक तथा आपदापन्न प्रकृति, यथा: माइक्रोबायोलाजी प्रयोगशालाओं, अस्पतालों तथा औषधि निर्माण करने वाले कारखानों (Pharmaceutical factories) में पैथोजेन का उपयोग।

 बिजली उत्पादन हेतु परमाणु शक्ति संयंत्रों में परमाणु खनिजों का उपयोग।

 पटाखा निर्माण करने वाले कारखानों में विस्फोटकों (Explosives) का उपयोग।

मानक सुरक्षा एवं बचाव के उपायों का अभाव (खासकर रासायनिक कारखानों, परमाणु शक्ति संयंत्रों, पेट्रो-केमिकल इकाइयों, पाइपलाइन द्वारा प्राकृतिक गैस वितरण आदि में) आदि।

      इस प्रकार औद्योगिक आपदाओं के कारकों को निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

असावधानी के कारण सुरक्षा एवं बचाव के उपायों को नजर अन्दाज करना या जानबूझ कर इन उपायों का अनुपालन न करना।

  बिजली की ढीली फिटिंग, परिणामस्वरूप शार्ट सर्किट होने से आग लगना।

 आवस्थापना की सुविधाओं की विफलता (Failure of infrastructure Facilities)।

 उपकरणों तथा मशीनों की हैण्डलिंग करते समय मानवीय भूल तथा गलतियां या जानबूझ कर आतंकियों द्वारा तोड़-फोड़ (Sabotage) तथा औद्योगिक कार्यों में व्यवधान करना।

 अनिच्छित दुर्घटनायें आदि।

      निम्नलिखित खतरनाक प्रकोप तथा आपदाओं के क्षेत्र हैं, जिनपर अधिक ध्यान केन्द्रित करने तथा देख-भाल की आवश्यकता होती है:

 औद्योगिक प्रतिष्ठान जहां पर अत्यन्त ज्वलनशील तथा विस्फोटक सामग्रियों का महत्वपूर्ण सामरिक उपकरणों के निर्माण करने में उपयोग किया जाता है।

 परमाणु शक्ति, जलविद्युत एवं ताप शक्ति (Nuclear, hydel and thermal power) उत्पन्न करने के स्थान।

 खाद्यान्नों में खनिजों के खनन में डायनामाइट द्वारा ऊपर स्थित चट्टानों को उड़ाने वाले स्थल।

खतरनाक सामग्रियों के स्थल, यथा: मिलिट्री प्रतिष्ठापन (Installation) स्थल, परमाणु भण्डारन स्थल तथा परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण स्थल,

खतरनाक सामग्रियों के परिवहन के मार्ग (सड़कें तथा रेल रोड),

 कच्चे पदार्थों के प्राप्ति स्थल, यथा: खदानें (कोयला खदानें, लौह अयस्क खदानें आदि) आदि।

    रासायनिक कारखानों में खतरनाक रसायनों से सम्बन्धित दुर्घटनाओं, परमाणु शक्ति संयंत्रों की दुर्घटनाओं तथा रेडियेशन रिसाव, खदानों आदि की दुर्घटनाओं से सम्बन्धित औद्योगिक आपदाओं, जिनके द्वारा भारी जान-माल की क्षति हुई है, के कतिपय उदाहरणों द्वारा औद्योगिक आपदाओं के खतरों तथा उनसे होने वाली हानियों की व्यापकता को दर्शाया जा सकता है।

भोपाल गैस त्रासदी, 1984

(Bhopal Gas Tragedy)

 भोपाल गैस त्रासदी:

      भोपाल में 2-3 दिसम्बर, सन् 1984 को हुई गैस दुर्घटना प्राण घातक गैसों के रख-रखाव में मनुष्य की असावधानी से उत्पन्न आपदापन्न प्रकोपों का ज्वलंत उदाहरण है। भोपाल स्थित अमेरिकन यूनियन कार्बाइड कारखाने के गैस संयंत्र से 2-3 दिसम्बर (1984) की शीत रात्रि में जहरीली मिक गैस (MIC= Methyle Iso-Cynate) के अचानक फूट निकलने के कारण वायु प्रदुषण की वृहत्तम दुर्घटना घट गयी। आधिकारिक सूचना के कारण इस प्रलयकारी गैस दुर्घटना के कारण कुछ घण्टों में ही 2500 व्यक्ति कालकवलित हो गये जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इस दुर्घटना से मरने वालों की संख्या 5000 से अधिक बतायी गयी है।

     भोपाल स्थित इस अमेरिकी यूनियन कार्बाइड कारखाने में कीटनाशी रसायन के निर्माण के लिए मिक गैस का उत्पादन किया जाता था तथा उसका भूमिगत कंटेनरों में भण्डारण किया जाता था। 2-3 दिसम्बर की रात में इन्हीं कंटेनरों से मिक गैस का अचानक रिसाव (लीकेज) प्रारम्भ हुआ तथा यह रिसाव 40 मिनट तक चलता रहा। प्रातः कालीन समीर के प्रभाव से यह जहरीली गैस पुराने भोपाल नगर के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में तेजी से फैल गयी तथा पलक झपकते हजारों लोगों को निगल गयी। इसके अलावा हजारों निवासी इस विषाक्त गैस से बुरी तरह प्रभावित हो गये एवं हजारों जानवरों ने प्राण त्याग दिये।

       इस गैस ने पेय जल, मिट्टियों, तालाबों तथा जलाशयों के जल को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया तथा गर्भस्थ शिशुओं (भ्रूणों), नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं अबला वृद्ध लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया।

संरचनात्मक विफलता तथा अग्निकांड आपदा

(Structural failure and fire disasters)

     यहां पर संरचना की विफलता का तात्पर्य है मानव-निर्मित स्थायी संरचनाओं, यथा बहुमंजिला भवन, शापिंग माल, सिनेमा हाल, स्पोर्ट्स स्टेडियम, रिहायसी बहुमंजिला एपार्टमेण्ट्स, पुल, फुट ओवर पुल, कार्यालय, शिक्षा भवन आदि का ध्वस्त होना।

     आगजनी का तात्पर्य मानव-निर्मित प्रतिष्ठानों, यथाः मल्टीप्लेक्स, सिनेमा हाल, कार्यालय रिहायसी भवन, शापिंग माल, औद्योगिक प्रतिष्ठान, शिक्षण भवन आदि में विभिन्न कारणों से आग लगने की दुर्घटनाओं से है।

       संरचनात्मक विफलता के फलस्वरूप मानव-निर्मित संरचनायें निम्न प्राकृतिक एवं मानव जनित कारकों द्वारा ध्वस्त होकर भरभरा कर गिर जाती हैं:

प्राकृतिक कारकः

(1) जलवायु की दशायें:

     अत्यधिक आर्द्रता; मेघ प्रस्फोट (Cloud Burst) तथा मूसलाधार वर्षा; वायुमण्डलीय तूफान, यथा: टारनैडो, चक्रवात (ओडिशा तथा आन्ध्र प्रदेश में अक्टूबर, 2013 में फेलिन चक्रवात की घटना), टारनैडो, टाइफून आदि तथा इनसे उत्पन्न बाढ़। इन सबके कारण भवन तथा उनकी नींव (Foundation) कमजोर हो जाती हैं। ज्ञात रहे कि इन कारकों द्वारा मानव-निर्मित केवल लकड़ी, टिन तथा मिट्टी के बने भवन ही ध्वस्त होते हैं।

(2) भ्वाकृतिक दशायें (Geomorphological Conditions):

      धरातल, स्थलाकृति, धरातलीय ढाल, भूपदार्थों की मजबूती / शक्ति (Strength of geomaterials), अवस्थितियां (Locational sites, यथा: तटीय निम्न क्षेत्र, बाढ़ मैदान, तीव्र पहाड़ी ढाल, पर्वत आदि।

(3) भूकम्पीय घटनायें / दशायें (Seismicity):

       भूकम्प की दृष्टि से अधिक क्रियाशील क्षेत्र भवन निर्माण के लिए अत्यधिक सुभेद्य (Vulnerable) होते हैं। बहुमंजिली इमारतें भूकम्पीय झटकों से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। कमजोर धरातलीय क्षेत्रों में भूकम्प के साधारण झटकों से ही कमजोर भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर पड़ते है।

मानव-जनित कारकः

⇒ भवनों की खराब डिजाइन या स्थापत्य सम्बन्धी त्रुटि (Architectural flaw)।

⇒ भवन निर्माण की सामग्रियों, यथा- सीमेण्ट, रेत, लोहा, ईंट आदि की गुणवत्ता।

⇒ सुरक्षा एवं बचाव के उपायों का अनुपालन।

⇒ बिल्डिंग कोड।

⇒ भवनों का रख-रखाव (maintenance) या अनुरक्षण।

    संरचनात्मक विफलता के कई ऐसे उदाहरण हैं जो भवनों के उनके निर्माण के समय ही ध्वस्त होने को दर्शाते हैं। अर्थात् अपने निर्माण की अवस्था में ही कई भवन भरभरा कर ढह जाते हैं। उदाहरण: अप्रैल 2013 में महाराष्ट्र के थाणे जिला में 7 मंजिला भवन, जिसका बिना सरकारी अनुमति के गैरकानूनी रूप से निर्माण कराया जा रहा था, भरभरा कर गिर गया। इस दुर्घटना में 39 व्यक्ति मारे गये तथा 72 घायल हो गये।

     उस समय राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF- National Disaster Response Force) की टीम ने अतिरिक्त 25-30 लोगों के मलवे में दबे होने की आशंका जतायी थी।

    इसी तरह 2013 में ही महाराष्ट्र में संरचनात्मक विफलता की दुर्घटना सितम्बर महीने में घट गयी। मुम्बई में एक 4 मंजिला रिहायसी (Residential) भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर गया, जिस कारण 61 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी।

    सन् 2013 में ही बांगलादेश में एक 8 मंजिला वाणिज्यिक (Commercial) भवन अप्रैल में ध्वस्त (Collapse) होकर पटरा हो गया (Flattened) जिस कारण 397 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी तथा 2,500 लोगों को मामूली चोटें लगीं।

    भवनों, पुलों तथा अन्य स्थायी संरचनाओं (यथाः फुटओवर पुल, पैदल मार्ग, बांध, स्ट्रीट वायाडक्ट, टावर आदि) के ध्वस्त होने के प्रमुख कारकों में निम्न को सम्मिलित किया जाता है:

⇒ भवन निर्माण की त्रुटिपूर्ण खराब डिजाइन

⇒ स्थापत्य की त्रुटि (Architectural defects)

⇒ भवन निर्माण की खराब सामग्री

⇒ खराब कार्यकुशलता (Poor Workmanship)

⇒ सुरक्षा मानकों को नजरअन्दाज (Avoidance) करना

⇒ मानक भवन कोड का अनुपालन न करना

     सन् 1995 में दक्षिण कोरिया में खराब एवं त्रुटिपूर्ण भवन डिजाइन के कारण साउथ कोरियन माल का ‘सैम्यूंग डिपार्टमेण्टल स्टोर’ ध्वस्त हो गया, जिस कारण 500 लोगों की बेशकीमती जानें चली गयीं। हजारों लोग घायल हो गये। लगभग 900 ग्राहकों (Shoppers) को गम्भीर चोटें लगीं।

परमाणु रेडियेशन रिसाव आपदा

(Nuclear Radiation leaks disastes)

      परमाणु प्रकोप तथा आपदायें निम्न रूपों में जनित होती हैं:

⇒ युद्ध के समय परमाणु अस्त्रों के उपयोग द्वारा, यथाः द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिकी सेना द्वारा जापान के नागासाकी एवं हीरोशिमा नगरों पर सन् 1945 में एटम बमों के गिराने से उत्पन्न भयानक आपदा।

⇒ परमाणु शक्ति संयंत्रों (Nuclear Power Plants); परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण स्थलों (Nuclear Wastes Disposal Sites); परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण के समय; परमाणु अस्त्रों के अनुरक्षण (Maintenance) के समय रेडियेशन रिसाव द्वारा।

⇒ परमाणु पनडुब्बियों (Submarines) की दुर्घटनाओं के समय परमाणु तत्वों (Substances) के रिसाव द्वारा।

⇒ रक्षा उद्देश्यों के लिए परमाणु अस्त्रों के परिवहन एवं भण्डारण (Storage) के दौरान दुर्घटनायें होने पर परमाणु रेडियेशन के रिसाव द्वारा आदि।

     परमाणु शक्ति संयंत्रों के रियेक्टरों से रेडिएशन का रिसाव सम्बन्धित क्षेत्र के मानव सहित सभी जीवों के घातक तथा जानलेवा होता है। युक्रेन में चर्नोबिल परमाणु संयंत्र से सन् 1986 में तथा जापान के डयेची फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से सन् 2011 में रेडिएशन के व्यापक रिसाव की दो घटनायें विभिन्न उद्देश्यों हेतु एटामिक खनिजों (युरेनियम) के उपयोग से उत्पन्न खतरों की भयावहता तथा परिणाम को भलीभांति प्रदर्शित करती हैं।

     उल्लेखनीय है कि परमाणु ऊर्जा के उत्पादन की उपयोगिता एवं उसकी त्रुटिरहित सुरक्षा को लेकर आम जनता सदा से आशंकित रही है। परमाणु वैज्ञानिकों एवं सरकारों द्वारा सदा से परमाणु ऊर्जा को सर्वाधिक सुरक्षित ऊर्जा संसाधन बताया जाता रहा है, परन्तु परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से रेडिएशन के रिसाव की सम्भवना सदैव बनी रहती है।

     एक प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक तथा पर्यावरणविद बेन्जामिन के. सोवाकूल के अनुसार विश्व परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में 99 दुर्घटनायें हुई हैं; सन् 1986 में चर्नोबिल परमाणु संयंत्र आपदा के बाद से 57 परमाणु दुर्घटनायें हो चुकी हैं, इनमें से 57 प्रतिशत दुर्घटनायें अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में हैं।

युद्ध विषाक्तन एवं नरसंहार आपदायें

(Wars, Poisoning and Genocide Disasters)

        निम्न कारणों के फलस्वरूप आन्तरिक वाह्य संघर्ष, गृहयुद्ध, विभिन्न आयाम (Dimension) के युद्ध, नरसंहार तथा सर्वनाश सम्बन्धी खतरनाक आपदायें उत्पन्न होती हैं:

⇒ परस्पर विरोधी धारायें (Conflicting Ideologies)

⇒ राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियाँ 

⇒ प्रतिद्वन्द्विता (Rivalaries)

⇒ शक्ति सर्वोच्चता (Power Supremacy)

⇒ धार्मिक प्रतिद्वन्द्विता तथा घृणा

⇒ क्षेत्रीय विस्तार की नीति

⇒ आर्थिक विषमता

⇒ संसाधनों को हड़पना (Grabing of resources)

⇒ राजनीतिक नीतियाँ 

⇒ क्रान्तियाँ आदि।

      दो देशों के बीच या विभिन्न देशों के समूहों के मध्य (प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध) संघर्ष एवं युद्ध के दौरान लाखों सेनानियों एवं नागरिकों की पिछले इतिहास में मृत्यु हो चुकी है।

    संघर्षों एवं युद्धों के कारण श्रृंखलाबद्ध समस्यायें पैदा हो जाती हैं, यथाः भारी संख्या में जनहानि (Human Casualties); बड़ी संख्या में शरणार्थी एवं बेघर लोग (Refugees and Homeless); अनाथ बच्चे एवं व्यक्ति; अपंग सैनिक एवं नागरिक; धार्मिक भावना/विद्वेष से प्रताड़ित लोग; खाद्य पदार्थों के अभाव का संकटः रोग तथा बीमारियाँ; महामारियाँ(Epidemics) एवं सर्वव्यापी रोग (Pandemics); जल की कमी; शरण शिविरों, स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं, मौलिक तथा आवश्यक सेवाओं का संकट आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक तंत्रों का विघटन (Disruption); धार्मिक एवं जातीय (Ethnic) संघर्ष एवं घृणा आदि।


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10. What do you understand by Soil Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures. (मृदा प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)

10. What do you understand by Soil Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures.

(मृदा प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)



       जब मिट्टी में भौतिक और रासायनिक तत्व मिलकर मिट्टी को कृषि के दृष्टिकोण से अनुपयुक्त बना देते हैं अथवा उसका समुचित उपयोग नहीं हो पाता है तो वह मिट्टी प्रदूषित मानी जाती है। मिट्टी के प्रदूषित होते ही वृक्षों की जीवन शक्ति भी घट जाती।

     मृदा प्रदूण से फसलों का रूप- रंग, आकार, प्रारूप, उत्पादन सभी कुछ कुप्रभावित होना स्वाभविक ही है। मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता में ह्रास, खरपतवार में वृद्धि और कीटाणुनाशकों का अत्यधिक उपयोग भारत के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। खरपतवार नाशकों का उपयोग अवांछित वनस्पतियों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। जिससे मिट्टी को मिलने वाली जीवांश की मात्रा भी भविष्य में घट जाती है। कीटनाशक पदार्थ और औद्योगिक निसृति पदार्थों से बहुत से स्थानों की मिट्टियाँ अम्लीय अथवा क्षारीय हो गयी हैं जिससे वनस्पति जगत प्रत्यक्षतः प्रभवित हुआ है।

    रासायनिक प्रदूषण मृदा के सन्दर्भ में सबसे अधिक भयावह है। औद्योगिक अपशिष्ट मृदा में ऐस खनिज लवणों की मात्रा बढ़ा देते हैं जिससे कोई वनस्पति उगने ही नहीं पाती। साथ ही रासायनिक पदार्थ मृदा में उपस्थित सहजीवी जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं जिससे नाइट्रोजन यौगिकीकरण प्रभावित होता है। एक बार प्रयोग किये गये रसायन अनेक वर्षों तक मृदा में विद्यमान रहते हैं।

      मिट्टी की उपयोगिता और गुणवत्ता में ह्रास, मानवीय एवं प्राकृतिक क्रियाओं का सम्मिलित परिणाम है। यथा वनों का निरन्तर ह्रास, खनन, अनियन्त्रित पशुचारण, भू-क्षरण से बीहड़ भूमि (खड्ड भूमि) का उद्भव हुआ है।

     भारत के विशेष संदर्भ में भू-क्षरण, जलमग्नता (जलाक्रान्त) एवं ऊसर भूमि की समस्या उल्लेखनीय है- देश की कुल कृषि भूमि का 28 प्रतिशत क्षेत्र इन समस्याओं से ग्रसित हैं, वर्षा में औसतन 20 टन मिट्टी प्रति हेक्टेयर वह जाती है। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष अनुमानत: 53.340 लाख टन मिट्टी का क्षरण हो रहा है यानि 2800 करोड़ रुपये का नुकसान है।

       इस प्रकार भू-क्षरण एक स्थायी नुकसान है। आज भी भारत की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। लगभग 70 प्रतिशत लोग तथा 45 प्रतिशत भूमि अप्रत्यक्षतः कृषि में लगी है। यदि इसमें कृषि, कृषक मजदूर, आलिया, व्यापारी, पल्लेदार आदि को भी जोड़ ले तो यह प्रतिशत लगभग 75 पहुँच जाता है। देश के 76 प्रतिशत लोग ग्रामों में रहते हैं, जिनका मुख्य उद्यम कृषि है।

      राष्ट्रीय आय का लगभग 33 प्रतिशत भाग कृषि से ही संबद्ध उत्पाद है। कृषि निर्यात व्यापार में 32 प्रतिशत का योगदान रखता है। यहाँ के प्रमुख बड़े उद्योग कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर ही निर्भर हैं। इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरूदंड कृषि और बोये गये 14 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में से लगभग 8 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र न्यूनाधिक रूप से भू-क्षरण से ग्रसित है। कृषि भूमि के 60 प्रतिशत भू-भाग को संरक्षण की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से जल एवं वायु दोनों के द्वारा मृदा अपरदन हो रहा है।

     जल भू-क्षरण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों- तिस्ता, हुगली, गण्डक, गंगा, यमुना और चम्बल नदियों के किनारे सर्वाधिक हो रहा है। योजना आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार महाराष्ट्र- 138.6, आन्ध्र प्रदेश- 90.9, कर्नाटक- 80.9 तथा गुजरात का 73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र अनुपजाऊ हो गया है। गहरे चम्बल के बीहड़ों से लगभग 18 लाख एकड़ भूमि अनुपयोगी हो चुकी है। इसमें से 6 लाख हेक्टेयर भूमि भिण्ड, मुरैना तथा ग्वालियर जिलों में आवास तक के लिये अनुपयुक्त हो गयी है।

       एक इंच मिट्टी को बनाने में प्रकृति को 100 से 500 वर्ष तक लग जाते हैं। नाली कटाव इस प्रकार भविष्य में भूमि उपजाऊ शक्ति, मृदा की किस्म, भूमि-जल स्तर, वनस्पति और कृषि को कुप्रभावित करेगा। गंगा-यमुना के उपजाऊ दोआब से नदियाँ धीरे-धीरे मैदानों में गहरी नालियाँ बनाकर मिट्टी की उर्वरा शक्ति का ह्रास कर रही हैं। दोआब में तीव्र सतही कटाव देखा जा सकता है।

     भारत का लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र भू-क्षरण से क्षतिग्रस्त हो गया है। इस समस्या से ग्रसित राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान तथा गुजरात हैं । चम्बल, यमुना, माही, साबरमती और उसकी सहायक नदियों के किनारे लगभग 50 से 60 लाख हेक्टेयर भूमि इससे प्रभावित हुई तथा चम्बल के प्रवाह क्षेत्र के 10 प्रतिशत गाँव उजड़ गये। आशंका है कि भारत कृषि भूमि का एक-तिहाई भाग अगले 20 वर्षों मे भू-भाग समस्या ग्रस्त हो जायेगा।

मृदा प्रदूषण के कारण

(Causes of Soil Pollution)

     जब मृदा अपने मूल स्वभाव वनस्पति जनन में अथवा कृषि कार्य के लिए अनुपयुक्त हो जाती है तो मृदा प्रदूषित कहलाती है। यहाँ मृदा की गुणवत्ता क्षय दो तरह से हो सकता है-

ऋणात्मक क्षय-

      इसमें मृदा के महत्त्वपूर्ण अंग खनिज जल में घुलकर अथवा जीवांश ग्रहणकर निकल जायें जिससे मृदा उपजाऊपन घट जाता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक कारकों से होती है।

धनात्मक क्षय-

      जब मृदा में कोई विजातीय तत्व मिलकर उसकी गुणवत्ता में अवनयन कर दें। यह मानवीय, नगरीय अथवा औद्योगिक क्रिया-कलाप के परिणामस्वरूप होता है। इस प्रकार प्रदूषण के कारकों को दो वृहद् वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-

1. भौतिक कारक,

2. मानवीय कारक।

1. भौतिक कारक- जलवायु एवं भौगोलिक स्थिति में अनुरूप होता है। इसके अन्तर्गत-

(अ) भू-क्षरण,

(ब) जलमग्नता,

(स) कांस घास,

(द) उच्च तापमान।

(अ) भू-क्षरण- इसके दोनों सतही एव नालीदार कटाव में मृदा की ऊपरी परत का क्षरण हो जाता है। नालीदार कटाव से समस्त क्षेत्र “मृत भूमि” में बदल जाता है। जैसे- म. प्र. में चम्बल के बीहड़।

(ब) जलाक्रान्त (जलमग्नता)- जब भू-जल स्तर भू-सतह पर आ जाता है तो स्थायी दलदल हो जाता है और भूमि कृषि के अयोग्य हो जाती है। जैसे उ. प्र. के तराई क्षेत्र।

Soil Pollution

जललग्नता (Waterlogging)

(स) कांस घास- वे ऐसी घास है कि अपने सिवाय किसी और वनस्पति को पैदा नहीं होने देती, साथ ही इसका विस्तार भी तेजी से होता है। इसे उ.प्र. के महोबार जिले में देखा जा सकता है।

कांस घास

(द) अति तापमान- तापमान की न्यूनता तथा अधिकता मृदा में उपस्थित जीवाणुओं के लिए हानिकारक है जिससे उनकी क्रियाशीलता कम हो जाती है और मृदा कृषि के अयोग्य हो जाती है। राजस्थान के मरूस्थल से लगे क्षेत्र बाड़मेर, बीकानेर तथा जैसलमेर जिलों में यह देखा जा सकता है।

2. मानवीय कारक-

       वर्तमान में कृषि और उद्योग यन्त्रीकरण के आधिक्य से अधिकाधिक उत्पादन में लगे हैं। इसलिए कृषि में रासायनिक खादें, कीटानुनाशकों का उपयोग, अत्यधिक सिंचाई के कारण कृषि सह-उत्पादक बढ़ गये हैं। नगरीकरण, औद्योगिकरण, बढ़ती जनसंख्या, प्रति व्यक्ति अधिक उपयोग, व्यर्थ पदार्थ, आधुनिक रहन-सहन के कारण मृदा में अकार्बनिक विषैले यौगिक कीटनाशी एवं कवकनाशी तथा रेडियो सक्रिय अपशिष्ट, परिवहन के साधनों से निकला धुआँ, नगरों से निकले ठोस अपशिष्ट से मृदा प्रदूषित हो गयी है।

(i) कृषि कार्य-

     अवैज्ञानिक, सिंचाई, अत्यधिक जुताई, झूमिंग कृषि, अत्यधिक कीटनाशकों के उपयोग से रासायनिक खादों से मृदा प्रदूषित हो रही है।

(अ) रासायनिक खादों से मृदा अम्लीय अथवा क्षारीय होकर कालान्तर में अनुपयोगी हो जाती है।

(ब) कीटनाशकों के उपयोग से मृदा के मित्र जीव एवं बैक्टीरिया मर जाते हैं। कुछ कीटनाशक दीर्घकाल तक मृदा में रहने से समस्त पारिस्थितिक को कुप्रभावित करते हैं। आर्गेनाक्लोरीन वर्ग के कीटनाशकों का स्थायित्व काल लम्बा होता है। इनके नाम हैं- D.D.T. क्लोरेडेन, आर्सेनिक, यूरिया आदि।

(ii) औद्योगिक कार्य-

     औद्योगिक अपशिष्ट जैसे ताप विद्युत गृहों की राख (फ्लाईऐश), कोयले के कण, नाभिकीय कचरा, रासायनिक कचरा, औद्योगिक कचरा, किसी भी तरह का ठोस जिसका पुनर्चक्रीकरण न हो अथवा देर से हो, मृदा के लिए घातक होता है। औद्योगिक अपजल से मृदा प्रदूषित होती है।

(iii) नगरीय कार्य-

       परिवहन नगरीय अपशिष्ट एवं खनन उत्पाद, सह-उत्पाद तथा अपजल भी मृदा को प्रदूषित करते हैं। परिवहन के साधनों से निकली सल्फर डाइ-ऑक्साइड अम्लीय वर्षा के लिए उत्तरदायी है। सभी प्रदूषण अन्त में जल अथवा मृदा में मिलकर प्रदूषित करते हैं। नगरीय अपजल एवं वाहित मल से मृदा और जल सन्दूषित हो जाये तो ये तत्व मिट्टी की भौतिक दशा को भी बिगाड़ते हैं। वाहित मल-जल के कारण मिट्टी के रन्ध्र अवरूद्ध हो जाते हैं जिससे मृदा बेकार पड़ जाती है।

       खनन के सह उत्पादक तथा खनन अपजल से मृदा में धातुओं की अधिक मात्रा में संचित होने से भूमि प्रदूषित हो जाती हैं। कैडमियम, मरकरी तथा लैड ये तीनों भारी धातुएँ न पौधों के लिए आवश्यक हैं और न ही जानवरों के लिये अर्थात इनकी परिस्थितियों से न केवल मृदा प्रदूषित होती है, समस्त पर्यावरण के लिए हानिकारक है।

      कुछ विषैली धातुएँ यथा- बेरीलियम, कोबाल्ट, निकिल, ताम्र, जिंक, एण्टीमनी, बिस्मथ आदि में मृदा भी जहरीली हो जाती हैं। तेल तथा प्राकृतिक गैस के उत्पादन के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में खारा जल निकलता है जो दूर-दूर तक फैल कर भूमि के अन्य जल स्त्रोतों को प्रदूषित करता है।

      संक्षेप में, खानों की खुदाई से मृदा प्रदूषण होना सामान्य बात है अथवा उत्खनन से मृदा अवनयन होता है। जैसे- उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले में ईंटों के निर्माण के कारण भोगतीपुर पुखराया में भूमि अवनयन उल्लेखनीय है।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव

(Effects of Soil Pollution)

1. मृदा पर-

       मल-जल से सिंचाई करने पर मृदा में नाइट्रोजन तथा कार्बनिक पदार्थ में वृद्धि होती है किन्तु निरन्तर सिंचाई से मृदा का PH मान, रन्ध्राकाश धनायन अधिशोषण मृदा, पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्य मृदा तथा पौधों द्वारा अवशेषण होता है जो हानिकारक अवस्था में पहुँचती है। जिसमें कैडमियस युक्त जल सिंचाई के लिए अनुपयुक्त है। वाहित मल-जल से सिंचाई करने पर हरी पत्तीदार सब्जियों की और अन्य फसलों की उपज तो अच्छी होगी किन्तु भारी धातुओं के अवशोषण से ये उत्पाद मनुष्यों और पशुओं द्वारा प्रयोग करने पर अस्वास्थ्यजनक होगा। मैंगनीज की अधिक मात्रा पौधों में विषाक्तता के लिए जिम्मेदार है।

2. सतही जल पर-

       प्रदूषित मृदा से सतही तथा भूजल स्त्रोत प्रत्यक्ष प्रभावित होते हैं। अतः प्रदूषित मृदा से जल को भी प्रदूषित करने की धातुओं का आधिक्य तथा संदूषित जल पेय जल को प्रदूषित जल में बदल देगा।

3. भौम जल पर-

      भौम जल एवं प्रदूषण का निकट का संबंध है, जब मृदा प्रदूषित होती है तथा भौम जल में प्रदूषिकों की सान्द्रता 2 से 3 गुना तक हो जाती है। यदि यह क्षेत्र औद्योगिक या नगरीय हुआ तो कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, कॉपर, लौह, लेड, मैंगनीज तथा पारे की उपस्थिति से भौम जल इन धातुओं के प्रवेश से प्रदूषित हो जाता है।

4. वन स्थितियों पर-

       प्रदूषित मृदा जो भारी धातुओं से हुई है। मृदा में इन धातुओं की अधिक सान्द्रता से पौधों की वृद्धि रूक जाती है और कभी-कभी पौधे मर भी जाते हैं। लेड, जिंक, कैडमियम, और ताप की अधिकता से पौधे की वृद्धि इसलिए रूक जाती है क्योंकि पर्णहरित (Chlorophyll) घट जाता है। निम्नलिखित सारणी भी मृदा प्रदूषण के प्रभाव दिखाती है।

मृदा प्रदूषक स्त्रोत एवं वनस्पतियों पर ऋणात्मक प्रभाव
क्रम मृदा प्रदूषक तत्व स्त्रोत प्रभाव
1. कैडमियम (Cd) जिंक उत्पादन, मानव मल- जल, खनन उद्योग, बैटरी, कॉस्मेटिक उद्योग  पर्णरहित घट जाना, वृद्धि रूक जाना, पत्तियों की नसों के मध्य पीले सफेद धब्बे पड़ना।
2. जिंक (Zn) मल-जल एवं संदूषित जल पत्तियों के सिरे मुड़कर मृत होना, पर्णहरित घटना, वृद्धि रूकना, पत्तियाँ सफेद, बौने रूप में आना।
3. क्रोमियम (Cr) औद्योगिक अपजल, खनन तथा संदूषित जल से पत्तियाँ पीली पड़ जाना, प्रारम्भ में उत्पन्न पत्तियों में शुष्क मृत धब्बे पड़ना।
4. मैंगनीज (Mn) वाहित मल जल उपयोग एवं औद्योगिक अपजल से मुड़ी, मृत, पर्णहरित पत्तियाँ,  किनारे मृत युक्त पत्तियाँ।
5. कोबाल्ट (Co) इलेक्ट्रॉनिक उद्योग पतियों पर सफेद मृत धब्बे पड़ना, पत्तियों पर श्वेत मृत धब्बे, असामान्य वृद्धि।
6. निकिल (Ni)
7. मोलिब्डिनम (Mo) खनन से वृद्धि रूक जाना।

5. मानव स्वास्थ्य पर-

        मृदा प्रदूषण में जो धातुएँ अत्यन्त विषैली हैं साथ ही सहज उपलब्ध हैं उनमें बेरीलियम, कोबाल्ट, निकिल, ताम्र, जिंक, टिन, कैडमियम, पारा, लेड, एंटीमनी आदि हैं। मृदा की ऊपरी सतह पर औसतन 0.18 पी. पी. एम. (पार्टस पर मिलियन) कैडमियम पाया जाता है। प्रदूषण की स्थिति में यकृत तथा गुदों में यह जमा हो जाता है। जो गुर्दों में पथरी के लिए उत्तरदायी होता है। यह मटर, मूली, चौलाई आदि के माध्यम से शरीर में पहुंचता है।

      विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि तीसरी दुनिया में होने वाले ढेर सारे रोगों एवं अनपेक्षित मौतों के मूल में जहरीले कीटनाशकों की घातक भूमिका है। सीसा एवं आर्सेनिक संचयी विष हैं। सीसे के विष की अधिकता से उल्टी, शरीर पर एनीमिया जैसे रोग हो जाते हैं। मिट्टी में पहुँचने पर पौधे इसे अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेते है। जिससे फलियों पर इनका प्रभाव परिलक्षित होता है जैसे- सेम मटर आदि। पौधे जमीन से मोलिब्डिनम का अवशोषण करते हैं।

     संक्षेप में कह सकते हैं कि पौधों द्वारा विषैली धातुएँ अवशोषित की जाती हैं। इन पौधों को खाद्य में प्रयुक्त करने पर मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव होता है। उ. प्र., बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों में कीटनाशकों से सामूहिक मौतें तक हो चुकी हैं।

6. पशुओं पर-

      मल जल संदूषित जल प्रयोग से पशुओं में अनेक रोग फैल जाना स्वाभाविक हैं। पोलीथिन में रखे खाद्य से पशुओं की मृत्यु सामान्य बात है। कृषि अपजल से सतही जल स्त्रोत प्रदूषित होते हैं जिससे जलीय जीवों में मृत्यु भी हो जाती है। कीटाणुनाशक से मृदा में मिले जीव (केंचुआ) जैसे अन्य मित्र जीव, बैक्टीरिया मृत हो जाते हैं। इस प्रकार प्रदूषण से जैव विविधता का ह्रास होता है।

मृदा प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

(Measures to control soil pollution)


1. भू-क्षरण हेतु वृक्षारोपण- बांध-बंधियां बनाना, समोच्च रेशा के समान्तर, जुताई, सिंचाई करने से भू-क्षरण रुकेगा जलवायु के अनुरूप वृक्षारोपण सबसे कारगर उपाय है।

2. नगरीय उपान्त क्षेत्र- ठोस अपशिष्ट से प्रदूषित हो रहे हैं। इनका वैज्ञानिक उपयोग हो।

3. उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के बाद किया जाये। जैविक खादों का अधिक उपयोग हो।

4. कीटनाशकों का सम उपयोग हो।

5. मल जल संयन्त्रों की स्थापना हो।

6. जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग से मृदा प्रदूषण रूक जाता है। बहुत से पौधे प्रदूषण को पी लेते हैं। पोलीथिन एवं कीटभक्षी का पता लग गया है। केंचुए मनुष्य के मित्र हैं। यह रबड़, प्लास्टिक, कांच एवं धातुओं को छोड़ सभी कार्बनिक गंदगी खाकर उर्वक मृदा बनाता है।

7. गहरी जुताई से कांस भूमि की समस्या हल हो जाती है।

8. मृदा प्रदूषण उचित प्रबन्ध से हल हो सकती है।



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(जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)


        जल प्रदूषण से आशय उसमें कोई रंग, गंध, स्वाद या जैविकीय परिवर्तन है जो मानवीय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है अर्थात् स्वच्छ जल रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, पारदर्शक, जीवाणु, विषाणु रहित होता है। जब इस मूलभूत गुणों में ऋणात्मक परिवर्तन हो जाते हैं, जो मानवीय सहनक्षमता से अधिक हो तो यह प्रदूषण के अन्तर्गत आ जाता है।

        दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जिसमें अशुद्धियाँ या खनिज इतनी अधिक मात्रा तक मिल गयी हों जो मानवीय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो गयी हो अथवा उनकी मात्रा इतनी कम हो जो पर्याप्त पोषक न दे सके तब जल को प्रदूषित कहा जा सकता है।   

गिलपिन के अनुसार, “जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में होने वाले परिवर्तन, जो मनुष्य तथा जलीय जीवों पर हानिकारक प्रभाव छोड़ते हैं।” जल प्रदूषण को अन्य ढंग से भी परिभाषित किया जा सकता है-

1. जल में अनावश्यक पदार्थों का अत्यधिक मात्रा में मिलना जिससे मनुष्य, जन्तु तथा जलीय जीव क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

2. जल के संघटन (Composition) में कोई विपरीत परिवर्तन होता है जिससे वह उस कार्य के अनुपयुक्त हो जाता है जिस कार्य के लिए प्राकृतिक अवस्था में उपयुक्त होता है।

       जल जीवन्त जगत की आत्मा है। इसके प्रदूषित होते ही समस्त प्राण संकटग्रस्त हो जायेंगे। जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में ऐसा परिवर्तन जो उसके स्वरूप, गंध और स्वाद के कारण जन स्वास्थ्य, पशुओं, जल-जीवों तथा वाणिज्यिक, औद्योगिक तथा कृषि कार्यों के लिये हानिकारक हो। यह परिवर्तन जल में सीवर नलिका के मिलने, गैस तरल अथवा ठोस पदार्थों के मिलने से होता है।

      प्राकृतिक जल में किसी बाह्य घुलनशील अथवा अघुलनशील वस्तुओं के मिलने के साथ ही प्रदूषण प्रारम्भ हो जाता है। अर्थात् मानवीय हस्तक्षेप के कारण जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में ह्रास हो तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं। प्रायः रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, उदासीन, गुणवत्ता वाले जल में जब कोई मानवीय क्रियाओं के कारण विजातीय पदार्थ मिलते हैं तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं।

         जल में स्वतः शुद्धीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। जल में उपस्थित विभिन्न प्रकार के जलीय पौधे; जैसे- एल्गी (काई) सूर्य की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण द्वारा पानी में ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं जो जलीय जीव-जन्तुओं और जीवाणुओं के द्वारा अपघटन के कार्यों में प्रयुक्त ऑक्सीजन की क्षतिपूर्ति करते रहते हैं। ऑक्सीजन का उपयोग और उत्पादन में सन्तुलन होने से जल प्रदूषित होने से बचा रहता है किन्तु जब इस सीमा से अधिक विजातीय पदार्थ या कूड़ा-करकट जलागारों में पहुँचता है तो वायुजीवी जीवाणु द्विगुणित होकर पानी में घुलनशील और तैरते हुए कूड़े को हजम करते हुए पानी में घुलित ऑक्सीजन का उपयोग संश्लेषण द्वारा पानी में पुनः ऑक्सीजन घोल देते हैं। इस प्रकार से स्वतः शुद्धिकरण की प्रक्रिया चलती रहती है।

जल प्रदूषण के प्रकार

Kinds of Water Pollution

        विभिन्न आधारों पर इसे वर्गीकृत किया जा सकता है। जैसे- जल गुणवत्ता के आधार पर इसे तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(1) भौतिक प्रदूषण

(2) रासायनिक प्रदूषण

(3) जैविक प्रदूषण

(1) भौतिक प्रदूषण-

        इसमें जल में भौतिक गुणों में परिवर्तन होता है, जैसे रंग, स्वाद, पारदर्शिता (गंदलापन), गन्ध, विद्युत चालकता एवं सूक्ष्म जीव आदि।

(2) रासायनिक प्रदूषण-

       इसमें जल की अम्लीयता, क्षारीयता, घुलित ऑक्सीजन में परिवर्तित होती है। यह कार्बनिक प्रदूषकों या अकार्बनिक प्रदूषकों या दोनों द्वारा होता है। ये पतनशील और अपतनशील (Non-Biodegradable) दोनों हो सकते हैं। उदासीन अथवा पेय जल का pH मान 7 होता है। जैसे-जैसे यह मान घटता है जल की प्रकृति अम्लीय तथा pH मान बढ़ने पर क्षारीय हो जाती है। पेय जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 14.5 मिलीग्राम प्रति लीटर (शून्य डिग्री से. पर) से 7.5 मिली ग्राम प्रति लीटर (30°C पर) तक होती है।

         प्रदूषित जल में रासायनिक एवं जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (C.O.D. – Carbon Oxygen Demand और B.O. D. – Biological Oxygen Demand) बढ़ जाती है जो प्रदूषण की मात्रा का सूचक है। कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिये आवश्यक ऑक्सीजन को C.O.D. कहते हैं। सूक्ष्म जीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिये आवश्यक ऑक्सीजन को B.O.D. कहते हैं। प्रदूषित जल में ये मांगे बढ़ जाने से घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है।

(3) जैविक प्रदूषण- जीवाणु प्रदूषण को जैविक प्रदूषण कहते हैं जो मनुष्य, पालतू एवं जंगली पशुओं से उत्सर्जित पदार्थों के छोड़े जाने से होता है। जैविक प्रदूषित जल संदूषित होकर जीवों की आँतों में संक्रमित रोग जैसे- दस्त, उलटी (Vomiting), हैजा, आंत्र शोध आदि उत्पन्न करते हैं।

जल प्रदूषण के कारण

Causes of Water Pollution

         मुख्यतः जल प्रदूषण के निम्नलिखित कारण हैं-

(1) प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा,

(2) मानवीय प्रक्रमों द्वारा।

(1) प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा-

         प्राकृतिक प्रक्रमों में सड़ी-गली वस्तुएँ, जीव-जन्तु, वनस्पति पदार्थ जल स्रोत में मिल जाते हैं, जिससे जल की प्रकृति प्रदूषित हो जाती है।

(2) मानवीय प्रक्रमों द्वारा जैसे-

(i) अपमार्जन-

       निवास स्थानों एवं अन्य स्थानों में बर्तन साफ करने में प्रयुक्त पाउडर, कीटाणुनाशक, फिनायल, डिटोल एवं अन्य नहाने में और कपड़े धोने में प्रयुक्त साबुन, अपमार्जक जल के साथ नालियों तथा नालों से होता हुआ तालाबों, झीलों तथा नदियों में पहुँचकर प्रदूषित करते हैं।

(ii) वाहित मल-

       नगरों तथा कस्बों के मकानों से निकला मल-मूत्र, कूड़ा-करकट आदि नालियों तथा नालों द्वारा नदियों, तालाबों और झीलों में डाल दिया जाता है जिसके फलस्वरूप जल प्रदूषित हो जाता है। दिल्ली में यमुना और भोपाल में छोटी झील का जल मानवीय उपयोग का नहीं रहा है। आगरा, कानपुर और पटना में भी यही हाल है।

(iii) कृषि उपयोगी पदार्थों का जल में मिलना-

        अधिक उपज लेने हेतु जब खेतों में कीटनाशी, कवकनाशी, खरपतवार नाशी तथा उर्वरक मिलाये जाते हैं तो इन पदार्थों का अधिकांश भाग मिट्टी में मिल जाता है, जो कि अंतत: बहकर नदी-नालों में पहुँच जाता है तथा कल-कारखानों से निकलने वाले जल में अनेक प्रकार की कार्बनिक तथा अकार्बनिक अशुद्धियाँ विद्यमान रहती हैं। यह जल नदियों में डाल दिया जाता है जिससे नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।

(iv) ईंधनों का जल में मिलना-

         भिन्न प्रकार के ईंधनों जैसे- कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि के जलने से कई प्रकार की विषैली गैसें निकलती हैं जो वर्षा जल में घुलकर नदियों, तालाबों व झीलों में पहुँचकर जल को प्रदूषित करती हैं।

(v) रेडियोधर्मी पदार्थ-

        रेडियोधर्मी पदार्थ ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रक्रम में जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। उपरोक्त प्रक्रम से निकलने वाले विकिरण जल में घुल जाते हैं तथा प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके साथ-साथ समुद्री जल में भी नाभिकीय विस्फोट किये जाते हैं। इससे अनेक प्रकार के घातक विकिरण निकलते हैं जो कि जल को प्रदूषित करते हैं।

(vi) जल का शोधन करने में-

      अशुद्ध जल को शुद्ध जल बनाने हेतु विभिन्न प्रकार के विषैले रासायनिक यौगिक मिलाये जाते हैं। यदि ये यौगिक अधिक मात्रा में मिला दिये जायें तो भी जल प्रदूषित हो जाता है।

जल प्रदूषण के प्रभाव 

Effect of Water Pollution

 1. पेड़-पौधों पर प्रभाव-

     यदि खेतों की सिंचाई प्रदूषित एवं संदूषित जल से की जाए तो पौधे संदूषित हो जाते हैं अर्थात् रोगग्रस्त हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप उनके विकास व वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यदि मनुष्य या जीव-जन्तु इन प्रदूषित पौधों को या इनके फलों को लें तो स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

2. जीव-जन्तुओं पर प्रभाव-

     यदि जल प्रदूषित होता है तो उसमें ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिसके फलस्वरूप उसमें पलने वाली मछलियाँ या अन्य जीव-जन्तुओं पर घातक प्रभाव पड़ता है तथा उनकी मृत्यु तक हो सकती है। जब नदी, तालाब आदि के जल में निलम्बित पदार्थ तली में बैठ जाते हैं तो शैवाल तथा जड़ वाले पौधे नष्ट हो जाते हैं।

3. पारिस्थितिक तत्व पर प्रभाव-

      चूँकि प्रदूषित जल के सेवन से पेड़-पौधे, जीवन-जन्तु, मनुष्य सभी कुप्रभावित होते हैं। अतः पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। इससे पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जैसे- वर्षा समय पर न होना, अधिक गर्मी या सर्दी का होना जिससे समस्त जल परितंत्र और जलचक्र प्रभावित हो जाता है। मध्य प्रदेश की न्यूनतम प्रदूषित नर्मदा नदी में रायसेन जिले की फैक्टरी से निकले रसायन युक्त जल के कारण विगत् वर्षों में मछलियाँ मरी थीं। म. प्र. की सबसे प्रदूषित नदी सोन है। उसके जल से वनों पर संकट उल्लेखनीय है।

4. मनुष्यों पर प्रभाव-

       यदि मनुष्य प्रदूषित जल का सेवन करता है तो वह विभिन्न प्रकार के रोगों; जैसे- हैजा, पेचिश, पीलिया, टायफाइड, पक्षाघात, पोलियो आदि से ग्रसित हो जाता है। विषैले धातुयुक्त जल के सेवन से हृदय, गुर्दा, फेफड़े, मस्तिष्क आदि के रोग हो जाते हैं। रेडियोधर्मी पदार्थों से कैंसर, अपंग सन्तानें उत्पन्न हो जाती हैं।

       जल में लोहा, मँगनीज, नाइट्रेट, आर्सेनिक, क्रोमियम, पारा, सीसा, फ्लोराइड, डी.डी.टी., एल्ड्रिन, डाइएल्ड्रिन, हेप्टाक्लीन, बी. एच. सी. और एंडोसल्फान आदि हानिकारक तत्व पहुँचने लगे हैं। इनके लगातार अधिक मात्रा में प्रयोग से चर्मरोग, हैजा, आंत्रशोध, टायफाइड, पीलिया, गैस्ट्रोएण्यइटिस, ब्लू बेबी रोग, अस्थि, गुर्दे, यकृतीय एवं स्नायुतन्त्रीय सम्बन्धित बीमारियाँ आदि प्रमुख रूप से पायी जा रही हैं। एक अनुमान के अनुसार अशुद्ध जल की वजह से 10,500 गाँवों में लगभग 1 करोड़ 22 लाख लोग आर्थराइटिस (जोड़ों का दर्द) नामक बीमारी से 5 करोड़ वयस्क एवं बच्चे अन्य जलजन्य बीमारियों से पीड़ित हैं।

       देश में प्रदूषित जल के सेवन से होने वाले रोगों के कारण 7 करोड़ 30 लाख जीवन नष्ट हो रहे हैं। बीमारियों के इलाज में 1600 करोड़ से भी अधिक रूपये खर्च हो रहे हैं। विश्वभर में अशुद्ध जल का सेवन करने वाले लगभग 18 प्रतिशत अर्थात् 1 अरब 10 करोड़ लोग हैं। इसी कारण विश्वभर में लगभग 62 प्रतिशत मौत प्रदूषित जल के सेवन से हो रही है।

       विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के अनुसार स्वच्छ जल उपलब्ध होने पर 50 प्रतिशत अतिसार एवं 90 प्रतिशत तक हैजा में कमी लायी जा सकती है। अर्थात् भारत में होने वाली दो-तिहाई बीमारियाँ प्रदूषित जल से होती हैं। पेय जल के साथ रोगवाहक बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ एवं कृमि मानव शरीर में पहुँचकर हैजा, टायफाइड, पेचिस, पीलिया, अतिसार, एक्जीमा, जियार्डियता, नारू, एकाकायलो, स्टोमियरा, सटाजिवाईडियोसिस, लेप्टोस्पाइरोसिस जैसे भयंकर रोग उत्पन्न करते हैं।

5. घटते जल संसाधनों पर प्रभाव-

       औद्योगिक एवं नगरीय अपशिष्ट से आज कुमायूँ, हिमालय की सबसे बड़ी झील, ताल (नैनीताल) म. प्र. का भोपाल ताल सिकुड़ रहे हैं। छोटी झीलें व तालाब गाद जमाव से जल क्षेत्र घट रहा है। अकेले कर्नाटक में 25,000 झीलें में से अब मात्र 10,000 तक सिमट कर रह गयी हैं। उत्तरांचल में पर्यटन में प्रमुख स्थान रखने वाले नैनीताल की प्रसिद्ध साल्ट लेक जो 80 वर्ग किमी. में फैली थी, वर्तमान में आधी से भी कम रह गयी है।

       इसी प्रकार बंगलौर में 262 में से 181 तालाब सूख चुके हैं और मैसूर में 25 तालाब और झीलों में मात्र 10 हजार ही शेष बचे हैं। देश के अन्य स्थानों पर भी तालाबों, झीलों तथा अन्य वर्षा जल संग्रहकर्ता दयनीय स्थिति में हैं। पूरे देश में तालाबों, झीलों, पोखरों आदि की परम्परा को पुनर्जीवित करना बहुत आवश्यक है।

जल प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

Control measures of water pollution

       भारत सरकार ने जल प्रदूषण नियंत्रण एवं संरक्षण कानून सन् 1974 में बनाया, किन्तु अशिक्षा, स्वार्थपरता, अनिवार्य आर्थिक विकास एवं जनसंख्या में वृद्धि के कारण जल प्रदूषित हुआ। रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, सस्ता सहज उपलब्ध जल प्रकृति के इस उपहार की प्राकृतिक गुणवत्ता संरक्षित करने के निम्नलिखित उपाय हैं:

1. प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण-

       प्रदूषण पैदा करने वाले कारखानों, उद्योगों पर कानून का कठोर नियंत्रण अनिवार्य है जो प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण को प्रदर्शित करते हैं अथवा औद्योगिक अपजल ओर अपशिष्ट बिना उपचार के नदियों और तालाबों में छोड़ते हैं। अतः प्रदूषण स्रोत पर ही नियंत्रण अपरिहार्य हो जाता है। जिस तरह एक उद्योगपति उपचार संयंत्रों में व्यय राशि को उत्पादित मूल्य में जोड़ता है और उद्योगपति उपचार पर व्यय नहीं करते वे बाजार में तुलनात्मक रूप में सस्ते दामों पर उत्पाद बेचता है। परिणामस्वरूप स्वार्थी उद्योगपति अधिक लाभ पा जाते हैं। अतः सभी पर कठोर नियंत्रण होना चाहिये। विगत दशकों में आर्थिक विकास को बहुत अधिक बल दिया गया है।

      अत: जब औद्योगिक कचड़ा एवं नगरीय संदूषित अपजल उपचार के बाद ही जलागारों में मिलाये जाने पर ध्यान देना होगा। समय-समय पर औद्योगिक अपजल का परीक्षण होना चाहिये। संदूषित जल में मैथागोनिक बैक्टीरिया से पेयजल स्रोतों को दूर रखने के लिये उपचारित जल में क्लोरिन मिला देनी चाहिये। वरना ये मुख्य नदी के जीव और वनस्पति की भी कुप्रभावित करेंगे।

2. जनमानस की जल प्रदूषण के प्रति जागरूकता पैदा करना-

     रेडियो, टेलीविजन, समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से जल प्रदूषित होने के कारण और उनके कुप्रभावों को विज्ञापित करते रहना चाहिए। प्राथमिक पाठशालाओं, विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में शोध परिचर्चा, संगोष्ठी, कार्यशालाओं एवं प्रदर्शनी के माध्यम से आगत पीढ़ी में जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिए।

3. प्रदूषक जन्य कारकों से रक्षा-

      नगरीय क्षेत्रों में सघन जनसंख्या के सैप्टिक टैंकों से प्राप्त संदूषित जल के शोधन हेतु प्रति 6 मिलोमीटर पर उपचार केन्द्र हों, ताकि मल-जल उपचारित होने पर ही मुख्य जल स्रोतों से मिल सकें। यदि विभिन्न केन्द्र से थोड़ी मात्रा में अपजल मिलता है तो नदी स्वशुद्धकरण क्षमता के कारण थोड़ी दूर जाकर शुद्ध हो जाती है। यदि बड़ी मात्रा में नगरीय अपजल प्राप्त हुआ तो बड़ी नदियाँ भी प्रदूषित हो जाती हैं। जैसे बिहार में गंगा नदी के साथ हुआ। इसलिये बड़ी मात्रा में नगरीय क्षेत्रों में मल-जल शोधन केन्द्रों की स्थापना अनिवार्य है। नहीं तो गंगा जैसी नदयाँ भी जीवाणु प्रदूषित हो जाती हैं।

4. प्रदूषण निवारण हेतु नयी तकनीकी के विकास से-

       सीवेज वाटर को पेयजल में बदला जा सकता है। फायनेंशियल टाइम्स लन्दन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार,  आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी मेमटेक ने एक पर्यटक नगर के समुद्र तट को साफ स्वच्छ कर दिया है और दावा किया है कि उसने जो माइक्रो फिल्ट्रेशन तकनीक विकसित की है, उससे मल कीचड़युक्त जल न केवल उद्योगों में पुनः काम में लिया जा सकेगा, वरन् उससे बाग-बगीचे भी सींचे जा सकेंगे और उसका पेयजल की तरह उपयोग भी हो सकेगा ही नहीं यह पेयजल उन सारे बैक्टीरिया और वायरस से मुक्त होगा, जो हम आज पानी के साथ पी रहे हैं। कीचड़ अलग निकलेगा, वह खेतों के लिए उपयोगी और उपजाऊ खाद देगा।

       उल्लेखनीय है कि ऐसी ही जल शुद्धिकरण प्रक्रिया से जापान में गोल्फ के मैदान और बाग-बगीचे कई वर्षों से सींचे जा रहे हैं। जापान में यह भी प्रयोग किया गया कि अपजल को घुमावदार रास्तों से लाकर नदी में या खेतों के मध्य में मिलने दिया जाये, जिससे प्रदूषण का 50 प्रतिशत भाग कम हो गया। इस विधि का प्रयोग सस्ता, सरल और सुगम है। इस प्रकार की योजनाएँ भागोल के छात्र स्थानीय परिवेश के अनुसार सरलता से सुझा सकते हैं।

        इसको क्रमशः तीव्र ढंग से किया जा सकता है।

(i) शुद्धिकरण क्षमता का उपयोग-

        घरेलू अपजल को घुमावदार लम्बे मार्गों से ले जाने पर धूप, हवा, मिट्टी, पेड़ पौधे, जीव-जन्तु भी जल को शुद्ध करते हैं। साथ ही प्रदूषण स्रोत से दूर जाने पर जल को स्वयं शुद्धिकरण क्षमता के कारण प्रदूषण घटते घटते समाप्त हो जाता है। अतः संदूषित जल को घुमावदार मार्गों से ले जाकर जलाशयों में छोड़ना चाहिये।

(ii) ऑक्सीजन ताल-

        मल जल की गन्दगी को शैवाल द्वारा खुले तालाबों में प्रविष्ट कराया जाता है। इन तालाबों को ऑक्सीकरण या निरीक्षण ताल कहते हैं। इन तालाबों में गन्दे जल को भरा जाता है जिससे ठोस निलम्बित कण बैठ जाते हैं। इन कृत्रिम तालाबा मे विषाक्त पदार्थों को रासायनिक विधि से तथा कार्बनिक पदार्थों को जीवाणुओं की क्रिया द्वारा विघटित कराते हैं। यह ऑक्सीकरण द्वारा किया जाता है। ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति कृत्रिम विधियों से की जाती है। इसमें हरे शैवालों का उपयोग होता है जो जल में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। यह कार्य जीवाणु और शैवाल की सहजीविता द्वारा सम्पन्न होता है।

(iii) शैवाल का पृथक्करण-

       जल में नीला थोथा (कापर सल्फेट) मिलाने से शैवाल नष्ट हो जाते हैं। सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में भी शैवाल की वृद्धि रूक जाती। अतः जल को सार्वजनिक उपयोग हेतु ढक कर रखा जाता है।

5. जल की किस्म का परीक्षण एवं पेय जल स्रोत का चयन-

        इस सन्दर्भ में भूगोल का विद्यार्थी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है। सतही जलागारों को पानी की किस्म के अनुसार अ, ब, स और द वर्गों में विभाजित कर सकते हैं ताकि उन जलागारों का अनुकूल उपयोग सम्भव हो सके। जल की किस्म का परीक्षण होने से वैज्ञानिक और स्थानीय जनता बचाव के साधन खोज सकती है। पेयजल स्थानों के चयन नदी की ऊपरी धारा से किये जाने चाहिए वृक्षारोपण जल प्रदूषण का एक प्रभावी उपाय है। पारिस्थितिक संतुलन में वृक्षों की भूमिका अहम् है। वनस्पतियों में काई से लेकर बड़े वृक्ष तक प्रदूषण मुक्ति में सहायता करते हैं।

       वैज्ञानिक प्रमाणित कर चुके हैं कि वायु, ध्वनि, मृदा और जल प्रदूषण को वृक्ष रोकते हैं, अन्य उपायों में कीटाणुनाशकों का न्यूनतम उपयोग, शहरों में सीवर की सुविधा और शैवाल जल के ऐसे पौधे हैं जो जल को शुद्ध रखन में सहायक होते हैं। ऐसे शैवालों को जल में बढ़ने देना चाहिये।

      प्रदूषण की रोकथाम के लिये नाभिकीय विखण्डन, मृत जीव-जन्तुओं को नदी में बहाने और धार्मिक उत्सवों में निस्त पूजा सामग्री को विसर्जित करने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिये। इसके साथ दो नगरों एवं कस्बों के मकानों से निकलने वाला मल-मूत्र तथा कूड़ा-करकट सड़, गल कर कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित हो जाता है जिसे खेतों में खाद के रूप में डालना अधिक हितकारी होगा। घरों, उद्योगों आदि से निकलने वाले अपमार्जन पदार्थ तथा विषैले पदार्थों को नदियों, तालाबों, झीलों आदि में डालने से पूर्व शुद्ध करना चाहिये। इस प्रकार जल प्रदूषण की रोकथाम हो सकती है। इस दिशा में शासन द्वारा कार्य प्रारम्भ किया गया है।

6. जैव नियंत्रकों की खोज-

        अभी हाल में ही आस्ट्रेलिया के डेविड वूर्ने ने नदी के पानी में रिफन्गोमोनास वंश के एक ऐसे जीवाणु की खोज की है जिससे तीव्र एन्जाइम्स बनते हैं। एक एन्जाइम्स जिसे माइक्रो सिस्टेम नाम दिया गया है, की आकृति बदलकर मारक क्षमता प्रदान करता है। आस्ट्रेलिया के लोग इस जीवाणु की उत्पत्ति प्रदूषित जल को साफ कराने हेतु कर रहे हैं।

       जैव प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत कछुआ प्रदूशित जल को साफ करने में भविष्य में उललेखनीय भूमिका निभाएँगे तथा चम्बल के कछुए प्रदूषित गंगा के जल को श्री शुद्ध करने के लिये भेजे जाने की योजना है क्योंकि कछुए पानी को साफ करते हैं। चम्बल का जल इन्हीं कछुओं के कारण शुद्ध रहता है।

7. अपशिष्ट उपचार (Waste Treatment)-

      प्रदूषित जल में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों के उपचार परम्परागत तरीके से काफी खर्चीले हैं। नीरी NEERI (नागपुर) के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो कम व्यय पर उच्च क्षमता रखती है, जैसे- घरेलू अथवा औद्योगिक अपशिष्ट को उथले तालाब में कुछ दिनों के लिये रखते हैं जिससे जीवाणु तेजी से कार्बनिक अपशिष्टों को नष्ट कर देते हैं। इस प्रका यह जल सिंचाई के लिए प्रयुक्त हो जाता है।



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8. What do you understand by Air Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures (वायु प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)

8. What do you understand by Air Pollution? Throw light on its Classification, Causes, Effects and Control Measures.

(वायु प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)



        वायु प्रदूषण से आशय वायु में प्रदूषक तत्व ठोस, द्रव अथवा गैसीय रूप में इस सीमा अथवा इस सान्द्रता तक मिल जायें जो मनुष्य, जीव-जन्तु, वनस्पति, सम्पत्ति के लिए हानिकारक हो, साथ ही प्रदूषक तत्व मानवीय स्वास्थ्य एवं क्षमता पर विपरीत प्रभाव छोड़े, उसे वायु प्रदूषण के अन्तर्गत माना जाता है।

     दूसरे शब्दों में, “वायु प्रदूषण से आशय वायु का प्राकृतिक गुणवत्ता में प्रतिकूल परिवर्तन है। वायु के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में ऐसा कोई भी ऋणात्मक परिवर्तन या ह्रास जिसके द्वारा स्वयं मनुष्य तथा अन्य जीव-जन्तुओं के जीवन, परिस्थितियों, औद्योगिक प्रक्रमों तथा सांस्कृतिक सम्पत्ति को हानि पहुँचे, वायु प्रदूषण कहलाता है।”

पार्किन्स हेनरी के अनुसार, “वायुमण्डल में गैसें निश्चित मात्रा तथा अनुपात में होती हैं। जब वायु अवयवों में अवांछित तत्व प्रवेश कर जाते हैं तो उनका मौलिक संगठन बिगड़ जाता है। वायु के दूषित होने की यह प्रक्रिया वायु प्रदूषण कहलाती है।” वायुमण्डल में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन (N2), 21 प्रतिशत ऑक्सीजन (O2) तथा 0.03 प्रतिशत (CO2) शेष निष्क्रिय गैसें हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, “वायु प्रदूषण एक ऐसी स्थिति है जिसमें बाह्य वातावरण में मनुष्य और उसके पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले तत्व सघन रूप से एकत्रित हो जाते हैं।”

“वायु प्रदूषण उन परिस्थितियों तक सीमित रहता है जहाँ बाहरी परिवेशी वायुमण्डल में दूषित पदार्थों अथवा प्रदूषकों की सान्द्रता जीवों को हानि पहुँचाने की सीमा तक बढ़ जाते हैं।”

प्रदूषक- हमारे द्वारा उपयोग में लाये गये पदार्थों के अवशेष या बनाये गये पदार्थ पर्यावरण को किसी न किसी प्रकार प्रदूषित करते हैं। ऐसे पदार्थों को प्रदूषक कहते हैं। वायु प्रदूषकों को उनकी उत्पत्ति, रासायनिक गठन, प्रदूषक स्रोतों के आधार पर तीन प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है।

वायु प्रदूषण का वर्गीकरण (Classification of Air Pollution)

1. उत्पत्ति के आधार पर- 

              उत्पत्ति के आधार पर वायु प्रदूषकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(क) प्राथमिक प्रदूषक- वे प्रदूषक हैं जो लम्बी प्राकृतिक एवं कृत्रिम प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न होकर सीधे वायुमण्डल में जा मिलते हैं जैसे कार्बन डाइ-ऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य हाइड्रोकार्बन।

(ख) द्वितीयक प्रदूषक- वे हैं जो प्राथमिक प्रदूषकों के साथ वातावरण के अन्य तत्वों से प्रतिक्रिया करके कुछ यौगिक बनाते हैं और क्षेत्र को गहन प्रदूषित क्षेत्रों में परिवर्तित कर देते हैं। उदाहरणार्थ- सल्फर डाइ-ऑक्साइड वर्षा ऋतु में जल वाष्प से मिलने पर गन्धक का अम्ल बनाकर अम्लीय वर्षा करके समस्त पर्यावरण को अत्यधिक क्षतिग्रस्त करती है।

2. रासायनिक गठन के आधार पर-

        वायु प्रदूषकों को रासायनिक गठन के आधार पर निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है-

(क) कार्बनिक प्रदूषक- जैसे- कार्बन, हाइड्रोजन, परागकण आदि।

(ख) अकार्बनिक प्रदूषक- जैसे- नाइट्रोजन, सल्फर, धातुकण आदि।

3. प्रदूषक स्वरूप के आधार पर-

           वायु प्रदूषकों को उनके स्वरूप के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(क) सूक्ष्म लम्बित कण,

(ख) वाष्पीय,

(ग) गैसीय प्रदूषक।

(क) सूक्ष्म लम्बित कण या कणिकाएँ-

        यह विभिन्न पदार्थों के सूक्ष्मतम कण हैं, जो वायुमण्डल में नयूनतम भार के कारण वातावरण में लटके रहते हैं। जैसे- धूल, ज्वालामुखी राख, धुँआ, फ्लाईऐश आदि विभिन्न कार्बनिक पदार्थ जलने से तथा अधजले ईंधन से खनिज पदार्थों के सूक्ष्म कण जो वायु में लटके रहते हैं। इन कणों की अधिकता पर्यावरण को प्रदूषित करती है। अर्द्धजलित ईंधन, वेंजोपाइरिन जो कारसैनोजैनिक (कैंसर कारक) पदार्थ है। यह कैंसर कारक पदार्थ हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में विगत दशकों में सर्वाधिक पाया गया था। भारतवर्ष में मुम्बई में यह सर्वाधिक है जहाँ यह 30 U.G./M3 हैं। जबकि निर्धारित मात्रा 200 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है।

      दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई आदि मेट्रोपोलिटन शहरों में डीजल, ईंधन दहन से भी अतिरिक्त कार्बनिक पदार्थ वायुमण्डल में सुबह-शाम बड़ी मात्रा में मिलते हैं। सूक्ष्म लम्बित कणों की अधिकता से वातावरण धुंधला हो जाता है और परस्पर दृश्यता घट जाती हैं जो वायु परिवहन को कुप्रभावित करती है। कोयला, चूना और अन्य खनन प्रक्रियाओं से वातावरण में सूक्ष्म कणिकायें संख्या में बढ़ जाती हैं। वातावरण में इनकी अधिकता से कोहरा, धुंध आदि भी अधिक गहन होती है। इन कणों की अधिकता से वस्त्रों, घरों एवं शारीरिक स्वच्छता पर भी अधिक व्यय होता है।

        कानपुर, भिलाई, सतना, मैहर आदि में यह व्यय स्पष्ट दिखाई देता है। म. प्र. की खुली खदान, कोयला उत्पादन क्षेत्र सिंगरौली एवं जयन्त कालरी की उड़ी धूल के प्रदूषित क्षेत्र में आम और नींबू के उत्पादन में विगत 8-10 वर्षों में कमी हो गई है। इसी प्रकार चूना भट्टी क्षेत्र एवं सीमेंट, औद्योगिक क्षेत्रों (सतना, मैहर) में मिट्टी, जल एवं हवा की प्राकृतिक गुणवत्ता में ऋणात्मक परिवर्तन या ह्रास हुआ है जो वनस्पति में ह्रास से प्रमाणित होता है। दिल्ली में धूल (लम्बित कणों) की मात्रा सर्वाधिक 700 U.G/M3 है।

      भारत में ग्रामों, कस्बों में भी सुबह-शाम धूल कणों की मात्रा रहती है। जबकि न्यूयार्क, लन्दन और पश्चिमी देशों में तुलनात्मक दृष्टि से लम्बित कणों की मात्रा कम है।

(ख) वाष्प-

       सामान्यतः द्रव या ठोस में पाये जाने वाले पदार्थ की गैसीय अवस्था वाष्प कहलाती है। उदाहरणार्थ नन्हीं-नन्हीं जल की बूंदें (Droplets), कोहरा (Fog), धूम्र (Smoke) तथा ओस जल के वाष्पीय रूप का संघनन है।

(ग) गैस-

      द्रव्य की तीन अवस्थाओं में से यह एक है जिसका कोई स्वतंत्र आकार तथा आयतन नहीं होता तथा फैलने की असीमित क्षमता रखती हैं, वह गैस कहलाती है। पारिस्थितिक संतुलन के लिए सभी गैसों का प्राकृतिक रूप निर्धारित मात्रा में पाया जाना अति आवश्यक है, उपयोगी है। इसके विपरीत इनकी मात्रा में अधिकता अथवा न्यूनता दोनों ही घातक हैं।

(i) सल्फर डाइ-ऑक्साइड (SO2)-

        कोयला, कोक या तैलीय ईंधन के रूप में जलाये जाने पर यह गैस बड़ी मात्रा में निकलती है। अनुमानतः 100 टन कोयला जलाने पर 3 टन सल्फर डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है। गन्धक युक्त ईंधन के दहन से 78 प्रतिशत गैस, कोयले से 18 प्रतिशत, तेल तथा अनेक औद्योगिक प्रक्रियाओं से शेष 4 प्रतिशत उत्पन्न होती हैं। तापीय विद्युत गृहों जैसे मिर्जापुर तापीय विद्युत गृह में 9000 मीट्रिक टन कोयला प्रतिदिन प्रयुक्त होता है। इससे 45 से 182 मीट्रिक टन सल्फर डाइ-ऑक्साइड निकटवर्ती पर्यावरण में प्रतिदिन मिलती है। इसके निकटवर्ती क्षेत्र में इसके प्रभाव से डोलोमाइट चट्टानें शीघ्रता से अपरक्षित हो रही हैं। तापीय विद्युत गृह के अति निकट की वनस्पति में पर्णहरित (क्लोरोफिल) की मात्रा कम गयी है तथा पत्तियों के नुकीले सिरे मुड़कर सूख गये हैं।

      इस गैस के प्रभाव से पेड़-पौधों की पत्तियों के किनारे तथा मध्य शिरा का स्थान सूख जाता है और इसकी मात्रा अधिक हुई तो पेड़-पौधों की कोशिकाएँ मर जाती हैं। आम के वृक्षों पर इसका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। साथ ही यहाँ की मिट्टी भी अम्लीय हो गयी है। जिससे मिट्टी में खनिज तत्व असंतुलित हो गया है। अपघटन की प्रक्रिया बाधिक हो गयी है और अति अम्लीय मिट्टी एवं दलदली क्षेत्रों में अपक्षय की प्रक्रिया तीव्र हो गयी है। अम्लीयता की इस वृद्धि के फलस्वरूप प्रकाश को कम करती है जिससे कृषि जगत को हानि पहुँचती है। अत: संक्षिप्त में कह सकते हैं कि यह एक विषैली गैस है। आँख, नाक, गले में खराश तथा श्वसन रोगों की वृद्धि करती है। दमा, ब्रोंकाइटिस जैसे रोगों को बढ़ाती हैं। इसलिए महानगरीय भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में चिकित्सक के आँखों में जलन न हो इसीलिए वाहन चालकों को चश्मा लगाने की सलाह देते हैं। इसमें निहित बेन्जोपाइरीन कैंसर जैसी भयानक बीमारियों को जन्म देती है।

(ii) कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)-

         75 प्रतिशत कार्बन मोनोऑक्साइड परिवहन के साधनों से विशेषकर पेट्रोल इंजन से निकलती है। जीवाश्म ईंधन के अधूरे जलने पर यह अधिक मात्रा में उत्पन्न होती है जैसा कि मोटर वाहनों में प्रायः देखने को मिलता है। विगत दशकों में मोटर गाड़ियों तथा स्कूटर्स की महानगरीय क्षेत्रों में इतनी अधिक वृद्धि हुई है कि इनका कुप्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होने लगा है। कार्बन मोनोअक्साइड की थोड़ी मात्रा भी खतरनाक है, यह हीमोग्लोबिन (मानव रक्त में पाया जाने वाला ऑक्सीजन वाहक) पर अपना प्रभाव ऑक्सीजन की तुलना में 200 गुना तेजी से डालती है। इसकी भयावहता की कल्पना करें कि यदि हम ऐसे पर्यावरण में रहे जिसके 100 भाग में ऑक्सीजन एवं एक भाग में कार्बन मोनोऑक्साइड हो तो ऐसी स्थिति में हमारे रक्त में कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा ऑक्सीजन की तुलना में दूनी होगी। इससे हमारे शरीर में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है।

       यह तंत्रिकातंत्र (Nervous System) को कुप्रभावित करती है। फेफड़ों को जख्मी बनाती है। रक्त में हीमोग्लोबिन घटकर सिरदर्द, बेहोशी तथा मृत्यु के लिये उत्तरदायी है। हृदय रोगी के लिये घातक है। इसके दुष्परिणाम, अत्यधिक जनसंख्या, भीड़-भाड़ वाले चौराहों जहाँ आधुनिक परिवहन के साधन हों तथा कोयले का बड़ी मात्रा में प्रयोग हो ऐसे क्षेत्रो में देखने को मिलती हैं। चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिस के सिपाही पर इसका सबसे घातक प्रभाव होता है।

3. कार्बन डाइ ऑक्साइड (CO2)-

         कार्बन मोनोऑक्साइड स्वतंत्र अवस्था में नहीं रह पाती, इसीलिए कार्बन डाइ-ऑक्साइड में बदल जाती है। वर्तमान में कोयला, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस, लकड़ी बड़ी मात्रा में जलायी जा रही है। अति नगरीकरण, औद्योगीकरण और जनसंख्या वृद्धि से विगत किसी भी सभ्यता की तुलना में अधिक कार्बन डाइ-ऑक्साइड उत्पन्न हो रही है। प्रौद्योगिक क्रान्ति के बाद CO2 की मात्रा में 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है जबकि 1958 के बाद 11 प्रतिशत। यदि इसी प्रकार से वृद्धि होती रही तो अगले 30-40 वर्षों में तापमान 30 से 50 डिग्री से अधिक हो जायेगा। जिससे हरित गृह प्रभाव से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। विभिन्न ग्रहों का तापमान कार्बन डाइ ऑक्साइड की सान्द्रता पर निर्भर करता है।

       विगत शताब्दियों की तुलना में आज के औद्योगिक युग में कार्बन डाइ-ऑक्साइ दुगनी मात्रा में निकल रही है। जिसको सन् 1980 में सर्वाधिक माध्य तापमान सन् 1930 की तुलना में 20 डिग्री सेल्सियस अधिक हो गया। साथ ही CO2 के अधिभार का प्रभाव वनस्पतियों पर दो प्रकार से होगा। CO2 की बढ़ी मात्रा में प्रजनन प्रक्रिया बढ़ेगी और वानस्पतिक उत्पादन बढ़ेगा। दूसरे तापमान से जलवायु बदलेगी जिससे फसल प्रारूप शस्य तीव्रता समय व क्षेत्रों में परिवर्तन होगा। इसके अतिरिक्त हानिकारक गैसें सिल्वर ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड हैं जो पवन स्टेशनों से निकलती हैं। विद्युत केन्द्रों से निकलने वाली अधूरी ज्वलनशील गैसों को पूर्ण रूप से जलाने के लिए विद्युत केन्द्रों में “द प्लेयर” नामक उपकरण लगाकर कार्बन मोनोऑक्साइड से छुटकारा पाया जा सकता है।

4. हाइड्रोकार्बन-

       हाइड्रोकार्बन का मुख्य स्रोत परिवहन के साधनों से 56 प्रतिशत, उद्योगों से 16 प्रतिशत, कार्बन विलायकों से 9 प्रतिशत तथा अन्य द्वारा 8 प्रतिशत होता है। पेट्रोल (गैसोलिन) के दहन से पैराफीन तथा एरोमेटिक्स जैसे हाइड्रोकार्बन निकलते हैं जो अन्य गैसों के सहयोग से विषाक्त हो जाते हैं। इनमें बेन्जोपायरिन बहुकेन्द्रित हाइड्रोकार्बन निकलते हैं जो अन्य गैसों के सहयोग से विषाक्त हो जाते हैं। इनमें बेन्जोपायरिन बहुकेन्द्रित हाइड्रोकार्बन मुख्य हैं। ये पदार्थ वायुमण्डल में स्वतंत्र अणुओं के रूप में विद्यमान रहते हैं तथा वाहक कणों द्वारा अवशोषित होकर फेफड़ों तक पहुँच कर कैंसर के लिए उत्तरदायी हैं। यह अर्धजलित जीवाश्म ईंधन, फेफडों में पायी जाने वाली श्लेष्मा झिल्ली को क्षतिग्रस्त करता है। साथ ही सड़ने, गलने से मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड गैसें उत्पन्न होती हैं। वाहनों से निसृत होने वाले हाइड्रोकार्बन से मुक्ति पाने के लिये यदि मोटर कार में “रिसाईकलर” लगवा दिये जायें तो हाइड्रोकार्बन से छुटकारा मिल सकता है। एक अन्य उपकरण जो महँगा है “मफलर” से 90 प्रतिशत प्रदूषण समाप्त किया जा सकता है।

5. कार्बनिक प्रदूषक (Organic Pollutants)-

      भूसा, कार्बन के कण, परागकण तथा विशेष दुर्गन्धयुक्त पौधे भी पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। सेमल, अकडआ, यूकेलिप्ट, फर्न, आम और अन्य फलों के परागकण मौसम विशेष में एलर्जी उत्पन्न करते हैं।

वायु प्रदूषण के कारण (Causes of Air Pollution)

                    वायु प्रदूषण के निम्नलिखित कारण है:-

1. परिवहन के साधन-

       बस, ट्रक, टेम्पो, कारें, स्कूटर्स, चलती-फिरती लघु फैक्ट्रि ही हैं जो दिन-रात घूम-घूम कर विभिन्न क्षेत्रों में प्रदूषक तत्वों को फैलाती रहती हैं। नगरीय वायु में वाहन प्रदूषण सर्वप्रमुख स्रोत हैं। नगरों के बढ़ते आकार और अनियन्त्रित जनसंख्या वृद्धि से परिवहन के साधनों की संख्या अत्यधिक तेजी से बढ़ रही है। मोटर वाहन कार्बन मोनोऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड के सबसे बड़े उत्पादक हैं। मोटर वाहनों में मुख्यतः एक्जॉस्ट पाइप, क्रेक केश, कार्बोरेटर एवं ईंधन की टंकी प्रदूषण के मुख्य अंग हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार निकास पाइप से निकलने वाला हाइड्रोकार्बन लगभग सारी कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा सीसा 55 प्रतिशत, टंकी व कार्बोरेटर से हाइड्रोकार्बन (20 प्रतिशत) तथा क्रेश टैंक से निकलने वाला (25 प्रतिशत) पदार्थ प्रदूषण का कारक होता है। कार से कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा 3 प्रतिशत निकलती है जबकि दुपहियों से 45 प्रतिशत।

      पेट्रोल वाहनों में डीजल की तुलना में अधिक प्रदूषण होता है क्योंकि पेट्रोल वाहन कार्बन मोनो-ऑक्साइड तथा सीसा अधिक छोड़ते हैं। जबकि डीजल से हाइड्रोकार्बन व नाइट्रोजन की मात्रा पेट्रोल वाहनों में घूँए के बराबर होती है। दिल्ली में पहले से 20 लाख मोटर गाड़ियाँ अधिक थीं। इसी कारण फ्लाई ओवर ब्रिज बनाये जा रहे हैं। दिल्ली में पिछले दशक में 10 लाख 70 हजार वाहनों की वृद्धि दर्ज की गयी है। अनुमान है कि प्रत्येक कार्य दिवस पर 600 से 800 गाड़ियाँ बढ़ जाती हैं। वाहन महानगरीय जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।

     वित्त विशेषज्ञों के अनुसार आज देश का सकल घरेल उत्पाद (डी.जी.पी.) 7.5 प्रतिशत से 8 प्रतिशत है जिससे मध्यम और मध्यम-उच्च वर्ग की क्रय शक्ति 12 से 18 प्रतिशत के मध्य बढ़ी है। इसी कारण भारत में सन् 1999-2000 में 17,61,439 मोटर साइकिलें बिकी थीं वहीं 2002-03 में 37,05,893 ज्यादा बिकी हैं। उस पर भी 85 प्रतिशत ऋण सुविधा है।

      अत: एक अनुमान के अनुसार 550 टन प्रदूषक तत्य प्रतिदिन मुम्बई के पर्यावरण में मिलाये जा रहे हैं। मुम्बई में लगभग 4,00,000 मोटर गाड़ियाँ हैं और लगभग 100 वाहन प्रतिदिन अथवा 4 वाहन प्रति मिनट जुड़ रहे हैं। इनमें लगभग 15 हजार गाड़ियाँ तथा 6 हजार ट्रक प्रतिदिन आते-जाते हैं। इस प्रकार मुम्ब नगर में 48.5 प्रतिशत प्रदूषण मोटर गाड़ियों से मिल रहा है। विश्व में वर्तमान में 51 प्रतिशत वायु प्रदूषण आधुनिक परिवहन के साधनों से हो रहा है। भारत में 60 प्रतिशत वाहन प्रदूषण की दृष्टि से अयोग्य हैं जो प्रदूषण फैला रहे हैं।

2. औद्योगिक क्रिया-कलाप-

       वायु प्रदूषण में एक अहम् भूमिका का निर्वाह औद्योगिक क्रिया-कलाप करते हैं। कदाचित आज के युग में वायु प्रदूषण का यह प्रमुख स्रोत है जिससे सभी प्रकार का प्रदूषण पैदा होता है। प्रदूषण उद्योगों की प्रकृति पर निर्भर है। कच्चा माल, शक्ति के साधन और प्रक्रिया प्रदूषण की मात्रा और रूप को तय करती है। ऊर्जा के लिये कोयला, आणविक विखण्डन, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा विद्युत का उपयोग होता है । इन उद्योगों से बड़ी मात्रा में निसृत गहरा काला धुँआ प्रमुख प्रदूषक तत्व हैं।

      औद्योगिक प्रक्रिया में निसृत गैसें विखण्डन तथा घिसाई पिसाई से निकले विभिन्न पदार्थ पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। यद्यपि सभी उद्योगों में थोड़ी मात्रा में प्रदूषण होता है किन्तु कुछ ऐसे उद्योग हैं जिनसे बहुत बड़ी मात्रा में पर्यावरण हास होता है; यथा- सीमेन्ट, रासायनिक उर्वरक, चमड़ा, कागज, सूती वस्त्र, शक्कर, डिस्टिलरी उद्योग आदि हैं। वायु प्रदूषण के घातक परिणाम वस्तुतः उद्योगों के साथ प्रारम्भ छुआ है।

     वर्तमान में उद्योगों की प्रतिस्पर्धा से वायुमण्डल में निरन्तर द्रव व ठोस तत्व छोड़े जा रहे हैं। धूल, राख, कार्बन कण, हाइड्रोकार्बन तथा जहरीली गैसें उत्पन्न होती हैं। उद्योगों से होने वाला प्रदूषण वर्तमान में कुल प्रदूषण का 14 प्रतिशत है।

3. ईंधन उपयोग-

          लकड़ी, कोयला, पेट्रोल आदि जीवाश्म ईंधन का उपयोग हमें ऊर्जा एवं ऊष्मा प्राप्ति के लिए करना पड़ता है। सर्वप्रथम घरेलू कार्यों के लिये अथवा मनुष्य अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लकड़ी गोबर (उपले), लकड़ी का कोयला, पत्थर का कोयला, मिट्टी का तेल, गोबर गैस (मीथेन) और कुकींग गैस (मीथेन), ईथेन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइ ऑक्साइड, सल्फर डाइ-ऑक्साइड, हाइड्रोजन साइनाइट जैसी गैसें तथा ईंधन के अपूर्ण दहन के फलस्वरूप अनेक हाइड्रोकार्बन तथा साइक्लिक पाइरिन यौगिक उत्पन्न होते हैं।

     ऑक्सीजन का बड़ी मात्रा में उपयोग होता है और कार्बन डाइ-ऑक्साइड उससे भी अधकि मात्रा में पैदा होती है जिससे पर्यावरण में असन्तुलन उत्पन्न होता है। घरेलू ईंधन का दहन कुल प्रदूषण के 10 प्रतिशत के लिये उत्तरदायी है।

4. अपशिष्ट पदार्थ के सड़ने से (Decomposition of the waste material)-

         इससे तीन प्रतिशत वायु प्रदूषित होकर प्रदूषण फैलाती है।

5. कृषि कार्य (Agriculture Work)-

           संयुक्त राज्य अमेरिका में तथा अन्य पश्चिमी देशों में कीटाणुनाशक दवाइयों का छिड़काव हेलीकॉप्टर से प्रारम्भ हुआ जिससे पश्चिमी देशों में कीटाणुनाशक विषाक्त पदार्थ जैसे डी.डी.टी., हवा में उड़ने वाले पदार्थों ने पर्यावरण को और विशेषकर वायु प्रदूषण को जन्म दिया। कृषि एवं अन्य ईंधन दहन से 15 प्रतिशत वायु प्रदूषित होती है ।

6. धूल-

        परिवहन, उद्योगों और औद्योगिक कार्यों से बड़ी मात्रा में धूल उड़कर पर्यावरण प्रदूषित करती है। ग्रीष्म ऋतु में लम्बित कणों की मात्रा निर्धारित मानक से तिगुनी-चौगुनी हो जाती है।

वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution)

         वायु प्रदूषण के स्पष्ट प्रभाव निम्नलिखित बिन्दुओं में व्यक्त किये जाते हैं।

1. स्वास्थ्य पर प्रभाव-

        वायु में उपस्थित सूक्ष्मतल धूल कण, गैसें तथा धात्विक कण विभिन्न बौमारियों के जनक हैं। सीसा विषाक्तता, शिशुओं की मस्तिष्क क्षमता को क्षति पहुँचाता हुआ मृत्यु की ओर खींच ले जाता है तथा प्रौढ़ों के तन्त्रिका तन्त्र को निर्बल बनात है। गैसोलिन के धुंए से बड़ी मात्रा में सीसा वातावरण में मिलता है जो श्वसन सम्बन्धी रोग को जन्म देता है। संक्षेप में सीसा जो पेट्रोल दहन से मिलता है स्वास्थ्य के लिए अत हानिकारक है। इससे रक्त में हीमोग्लोबिन (जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है) की मात्रा प्रभावित होती है। खून में सीसे का स्तर बढ़ जाने से एनीमिया होने की आशंका बढ़ जाती है और कभी भी एन्जाइम्स तत्व प्रभावित हो सकते हैं, सीसा की मात्रा कैडमियम श्वसन तन्त्र के लिए विष है । यह उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगों को बढ़ाता है।

      गुर्दे एवं यकृत में एकत्र होने पर वृहद, तनाव (हाइपरटेन्सन), फेफड़े के रोगा को बढ़ावा देता है । वातावरण में पारा की अधिकता, दृष्टि दोष, मासंपोशियों में शैथिल्य, लकवा, पागलपन, बेहोशी तथा मृत्यु तक ला सकता है। एस्बेस्टस के रेशे क्रोनिक फेफड़ों की बीमारियों, कैंसर तथा यकृत की बीमारियों के लिए उत्तरदायी है। सल्फर डाइऑक्साइड फेफड़ों की बीमारियों को बढ़ाती है। गंधक फेफड़ों में खिरजराहट (Irritation) पैदा करता है।

          गैस रूप में दमा, ब्रोंकाइट्स बढ़ाता है । नाइट्रिक ऑक्साइड जो ऑटोमोबाइल के अपूर्ण दहन से उत्पन्न होती है, यह रक्त में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता का ह्रास करती है। नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड (N2O2) फेफड़ों को क्षतिग्रस्त तथा आँखों में खुजली उत्पन्न करती है। कुछ हाइड्रोकार्बन विशेषताओं वाले बेन्जापायोरीन अणु वायु से मिलकर कैंसर उत्पन्न कर मृत्यु की ओर धकेलते हैं। हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड रासायनिक क्रिया कर पान (PAN-Pyorine and itric Oxide) जैसे यौगिक बनाते हैं जो आँखों और फेफड़ों को कुप्रभावित करते हैं।

        कार्बन मोनोऑक्साइड एक विषाक्त गैस है जो वर्तमान में जीवाश्म ईंधन के अपूर्ण दहन से उत्पन्न होती है और शीघ्र ही हानिकारक प्रभाव छोड़ती हुई वातावरण से ऑक्सीजन अवशोषित कर कार्बन डाइ ऑक्साइड में बदल जाती है। आधुनिक परिवहन के साधन इस गैस को नगरों के सघन जनसंख्या के क्षेत्र में छोड़ते हैं। जिससे महानगरीय भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में हीमोग्लोबिन की क्षति से सिर दर्द, मानसिक क्षमता ह्रास तथा बेहोशी तक अनुभूत होती है।

       इसी प्रकार ओजोन गैस आँखों में पीड़ा, सीने में दर्द तथा खाँसी उत्पन्न करती है। लोहे की खानों में काम करने वाले मजदूरों को लौह एवं सिलिका को धूल मिलकर “साईडोसिलिकोसिस’ रोग हो जाता है। लगभग 24 प्रतिशत खनिज मजदूर इस रोग से ग्रसित हो जाते हैं।

         कोयला की खदानों में काम करने वाले खनिकों को “फुफ्फस धूलमयता” रोग हो जाता है। धनबाद कोयला खदान में किये परीक्षण के अनुसार 3.7 प्रतिशत खनिक इस रोग से पूर्णतया प्रसित पाये गये एवं 11.7 प्रतिशत खनिकों को इसकी आशंका थी। इसी प्रकार झरिया कोयला क्षेत्र के खनिकों में 19 प्रतिशत लोग इस रोग से ग्रस्त थे। मध्य प्रदेश में सिंगरौली खुली खदान से उड़ी धूल तथा धुंआ से प्रभावित होकर सुबह काले रंग के कफ निकलने की शिकायत करते हैं।

       सतना में हर सातवाँ व्यक्ति एलर्जी अथवा दमे का रोगी है, यहाँ लम्बित कण चौक तथा कोतवाली के पास अपने निर्धारित मापदण्ड से दुगुने और तिगुनी मात्रा में पाये जाते हैं। इसी प्रकार सागर में 996.29 माइक्रोग्राम पाए गये हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में धूल से हर वर्ष 16 हजार नये रोगी बन जाते हैं। यहाँ 1044.02 माइक्रोग्राम से अधिक रिकार्ड की गयी है। रायपुर मार्ग सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र है ।

       संक्षेप में, सीसा विषाक्त जो पेट्रोल से वायुमण्डल में मिलता है, स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक है। इससे रक्त में होमोग्लोबिन (जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है) की मात्रा प्रभावित होती है। खून में सीसे का स्तर बढ़ जाने से एनीमिया की आशंका बढ़ जाती है और इसकी कमी से एन्जाइम तन्त्र प्रभावित होते हैं। सीसा की मात्रा बढ़ जाने से गुर्दे भी फेल हो सकते हैं तथा बच्चों का कद भी छोटा रह जाने का डर बना रहता है। उक्त शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर प्रदूषण हानिकारक प्रभाव छोड़ता है जिससे मानसिक समस्यायें जन्म लेती हैं ।

2. पेड़-पौधों पर प्रभाव-

         बहुत से पौधे वायु प्रदूषण के प्रति मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों से भी अधिक सुग्राही हैं। इसलिए इनको प्रदूषक सूचक पौधे भी कहा जाता है जो हानिकारक सन्दूषण को प्रदर्शित करते हैं। गन्धक और गन्धक के ऑक्साइड का प्रभाव अंगूर, कपास, सेव के पौधों में स्पष्ट देखा जा सकता है जहाँ इनकी संख्या और उत्पादन घट जाता है । इसी प्रकार नाइट्रोजन के ऑक्साइड पेड़-पौधों की वृद्धि को रोक देते हैं।

     फ्लोरीन (Flourine) तीसरा तत्व है जो पेड़-पौधों को कुप्रभावित करता है। ओजोन से पत्तियों के ऊतक जल जाते हैं जिससे सब्जियाँ, फल, फूल तथा वन वृक्ष भी क्षतिग्रस्त होते हैं। तम्बाकू की पत्तियाँ ओजोन के प्रति बड़ी सुग्राही होती हैं। (राव, सी.एस.जी., 1972) प्रदूषक कण पत्तियों के ऊपर जम जाते हैं जिससे पेड़ों की जैविक क्रियाएँ प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाने की क्रिया विशेषतः बाधित हो जाती है। कालान्तर में पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं। मार्गों एवं महानगर में सड़कों के किनारे लगे वृक्षों के पत्तों को देखकर यह तथ्य प्रमाणित हो जाता है।

    वायु प्रदूषण का प्रत्यक्ष प्रभाव आम, पीपल, जामुन के पेड़ों पर और उसके उत्पादन की किस्म को देखकर किया जा सकता है। तापीय विद्युत गृहों के निकट इनके फल, पत्तियाँ छोटे तथा कम हो गये, साथ ही आम समय पर बौराया (फूला) नहीं।

3. पर्यटन स्थलों पर प्रभाव-

        औद्योगिक केन्द्रों से निकले रासायनिक धुँए से शैल एवं भित्तिचित्रों पर सफेद रंग की पर्त जम जाती है जो कालान्तर में क्षरण होता है। म. प्र. में मण्डीदीप (भोपाल) की औद्योगिक इकाइयों से निकलते धुएँ ने भीम बैठका की 750 गुफाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया है। आगरा में विश्व प्रसिद्ध ताजमहल एवं वह महल जहाँ शाहजहाँ कैद रहा. के सफेद संगमरमर में पीलापन दिन-प्रतिदिन बढ़ना विवाद का विषय है।

4. मौसम पर प्रभाव-

         हम भली-भाँति जानते हैं कि सघन महानगरीय क्षेत्र (सी.बी. डी.) तथा सघन आवासीय क्षेत्रों का तापमान उपनगरीय और उपान्त क्षेत्रों की तुलना में अधिक रहता है। महानगरों के मध्य का तापमान धूल, धुंआ और जैविकीय प्रक्रियाओं से दो-तीन डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है। औद्योगिक क्षेत्रों में आमेनिया सल्फेट और न्य के अम्ल वाष्प या कुहरा लम्बवत् तापमान को प्रभावित करता है।

5. अर्न्तदृश्यता पर प्रभाव-

         कार्बन के कण धूल, धुंआ, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा सल्फर के ऑक्साइड वातावरण में प्रकाश को कम कर अन्तर्दृश्यता घटा देते हैं। अन्तर्दृश्यता का ह्रास आर्थिक क्रिया-कलापों, परिवहन में बाधा तथा मनोवैज्ञानिक मानसिक दबाव प्रदूषण, भय की आशंका बढ़ाती है। इससे हवाई अड्डों, बन्दरगाहों और परिवहन मार्गों पर महानगरों में दुर्घटनाओं की आशंकाएँ बढ़ जाती हैं। कोहरे के कारण जाड़ों में उत्तर से आने वाली ट्रेन प्रायः देरी से चलने लगती हैं।

6. पर्यावरणीय संकटों की तीव्रता पर प्रभाव-

        वायु प्रदूषक (एरोसोल) बादल, तापमान तथा वर्षण को प्रभावित करते हैं । औद्योगिक एवं परिवहन से निसृत कार्बन डाइ-ऑक्साइड के हरित गृह प्रभाव उल्लेखनीय हैं। क्लोरोफ्लोरो कार्बन के ओजोन पर्त के ह्रास के दुष्परिणामों की चर्चा पिछले 25 वर्षों से हो रही है।

7. अन्य प्रभाव-

     ओजोन सूती वस्त्रों के रंग को उड़ा देती है। सल्फर प्रदूषण पेन्ट्स को | उड़ा देते हैं तथा रबड़ से दरारों के लिए उत्तरदायी है। फ्लोराइट्स तथा आर्सेनिक यदि वायु में अधिक मात्रा में हो जाता है जो कालान्तर में घासों और पत्तियों पर जमते हैं जिसे पशु-पक्षी खाकर बीमार हो जाते हैं। इस प्रकार पशुओं को भी वायु प्रदूषण से क्षति होती है। यथा-भोपाल गैस काण्ड में मुर्गी, बकरी तथा गायों का मरना तथा प्रजनन क्षमता में हास प्रत्यक्ष प्रमाण है।

वायु प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय (Control Measures of Air Pollution)

        वायु प्रदूषण को व्यावहारिक रूप से पूर्णतः नियंत्रित करना कठिन है क्योंकि आधुनिक जीवन के कई क्रिया-कलापों से वायु प्रदूषण होता है; जैसे- बिना प्रदूषण उत्पन्न किये वाहनों, उद्योगों एवं सौन्दर्य प्रसाधन आदि का प्रयोग न करना सम्भव नहीं है।

        वायु प्रदूषण का नियंत्रण स्रोत पर ही सम्भव है। विकसित देशों में इस समस्या के समाधान के लिये प्रदूषण स्रोत पर ही सैकड़ों नियंत्रक उपायों को अध्यारोपित किया गया। है। द्वितीय वायु प्रदूषण की मात्रा एवं हानिकारक तत्वों की जाँच समय-समय पर होती रहे। सहनीय क्षमता तथा वस्तु की स्थिति की तुलनात्मक जानकारी का प्रकाशन होता रहना चाहिए, जिससे क्षेत्रीय सन्दर्भ में इसका समाधान किया जा सके।

     भारत में सर्वप्रथम नीरी (नागरपुर) में 10-12 बड़े नगरों का अध्ययन कर निष्कर्ष दिया कि कुछ क्षेत्रों में वर्ष के कुछ समय में यहाँ वायु प्रदूषण भयावह रूप धारण करता है। भारत सरकार ने National Committee of Environmental Planning and Co-ordination विभिन्न शहरों में प्रदूषण निवारक मण्डलों की स्थापना की है जो पर्यावरणीय प्रदूषण नियन्त्रण हेतु विभिन्न क्रिया-कलाप सम्पादित करती है। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण हेतु निम्नलिखित उपाय सुझाये जा सकते हैं-

1. वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु कटिबन्ध बनाकर।

2. वायु प्रदूषण स्रोत पर नियंत्रण।

3. चिमनियों की ऊँचाई बढ़ाकर ताकि ऊँचाई पर प्रदूषक छोड़े जा सकें।

4. वनस्पति उगाकर।

5. उपकरणों के संशोधन, तकनीकी के परिवर्तन से।

6. सीसा रहित पेट्रोल।

7. सी. एन. जी. गैस का उपयोग।

8. शिक्षा से।

9. जागरूकता से।

1. वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु कटिबन्ध बनाकर-

        नगरों की कटिबन्ध निर्धारण योजना से बसे नगर यथा चण्डीगढ़, ओरेबिल, भोपाल, (भेल-गोविन्दपुरी) तथा भिलाई जैसे नगरों में उद्योगों को उस भाग में जिस दिशा में वायु नगर में न आती हो, उस दिशा में खुले स्थान पर जहाँ परिवहन की, जल शक्ति के साधन की सुविधा सुलभ हो, स्थापित किया गया है। जिससे औद्योगिक प्रदूषण से नगरवासियों को बचाया जा सके, नगर नियोजन के समय सी.बी.डी. (सेन्ट्रल बिजनिस डिस्ट्रिक्ट) औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र आदि में विभक्त कर नगर के विकास की योजना प्रस्तुत की जाती है। इसके विपरीत पुराने बसे नगर जैसे- ग्वालियर, उज्जैन, जबलपुर, सतना मैहर में भूमि का अवैज्ञानिक असंगत उपयोग के कारण प्रदूषण है। वर्तमान में इसके दो तथ्य और ध्यान में रखे जाने चाहिये।

(अ) उद्योगों का उत्पादन क्या है और कौन-सा प्रदूषण कितनी मात्रा में होता है।

(ब) उद्योग में कार्य करने का ढंग और पर्यावरण कैसा होता है और उसे किस चीज की आवश्यकता है। परिवहन, कच्चा माल, बना माल एवं प्रक्रिया इनमें से कहाँ पर , कौन-सा प्रदूषण तत्व निकलेगा, इस आधार पर उद्योगों का स्थान नियत करना आवश्यक है। यह क्षेत्रीय पर्यावरण से समुचित सन्तुलन स्थापित कर प्रदूषण को जनसंख्या के बसे क्षेत्रों से दूर रख सकेगा।

2. प्रदूषण स्रोत पर नियंत्रण स्रोत पर ही प्रदूषण नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय हो सकते हैं-

(अ) कच्चे माल में परिवर्तन,

(ब) प्रक्रिया में संशोधन,

(स) उपकरणों में विकल्प

(द) तकनीकी में परिवर्तन,

(इ) स्रोत पर कठोर कानूनी नियंत्रण।

(अ) कच्चे माल में परिवर्तन-

      यदि किसी उद्योग का कच्चा माल ही प्रदूषण कारक है तो कच्चे माल का विकल्प प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि उसका विकल्प न हो तो उस प्रक्रिया को खुले और दूरवर्ती स्थानों पर स्थानान्तरित कर उद्योग क्षेत्र में लाना चाहिए।

(ब) प्रक्रिया में संशोधन-

        बहुत से उद्योग निर्माण प्रक्रिया के द्वारा प्रदूषण तत्व ह में छोड़ते हैं, ऐसी प्रक्रिया में नवीन तकनीकी प्रयोग कर प्रदूषण रहित करने का प्रयत्न करना चाहिए ।

(स) उपकरणों में विकल्प-

     प्रायः पुराने घिसे-पीटे उपकरण और पुरानी तकनीकी के यन्त्रों में से अधिक प्रदूषण की आशंका रहती है। नवीन मशीनें, उपकरण और वाहन अपेक्षाकृत कम प्रदूषण छोड़ते हैं, अतः नयी मशीनों की क्रय प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिये।

(द) तकनीकी में परिवर्तन-

      पेट्रोल इंजन के स्थान पर डीजल इंजनों को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि इनसे कम मात्रा में घातक प्रदूषक निसृत होते हैं। सौर्य ऊर्जा से संचालित वाहनों से वायु प्रदूषण बिल्कुल नहीं होता अतः इन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। अभी कोटा इंजीनियरिंग कॉलेज, राजस्थान ने एक सोलन साइकिल का निर्माण किया है जो एक आदमी को 25 किमी एक दिन में ले जा सकती है और जिसे विशेष परिस्थितियों में 80 किमी. प्रति घण्टे की गति दी जा सकती है।

         इसी प्रकार एच.ई. भोपाल ने सौर्य ऊर्जा संचालित एक चार पहिया वाहन भी बनाया है जिसकी गति निःसन्देह कम है, किन्तु प्रदूषण रहित है। जैसे सीसा रहित पेट्रोल के उपयोग पर बल दिया जा रहा है। जहाँ पर यह उपलब्ध नहीं है वहाँ केटिलिटिक कनवर्टर कारों में लगाये जा रहे हैं जो उत्सर्जित धुएँ में उपस्थित CO व हाइड्रोकार्बन को CO2 में बदल देता है। इससे जहरीले कार्बन मोनोऑक्साइड का वायु में आना रूक जाता है। बिना जले हाइड्रोकार्बन को पूर्ण दहन कर CO2 में बदल देता है।

(इ) स्रोत पर कठोर कानूनी नियंत्रण-

       कठोर नियंत्रण से ही प्रदूषण निवारक महंगे उपकरणों का उपयोग उद्योगों में हो सकेगा। शासन को दुपहिया वाहन के स्रोत पर नियंत्रण कठोर करना होगा।

3. वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु ऊँची चिमनियाँ बनाकर-

        यदि स्रोत पर थोड़ी मात्रा में प्रदूषक तत्व निसृत हो रहे हों तब उन्हें ऊँची-ऊँची चिमनियाँ बनाकर निकटवर्ती बसे लोगों को बचाया जा सकता है। उस स्थिति में वायुमण्डल का तापमान, वायु की गति एवं उसकी दिशा उल्लेखनीय महत्त्व रखती है। विशेषज्ञों की राय में चिमनियों की ऊंचाई निर्मित इमारतों से ढाई गुना अधिक ऊँची होनी चाहिये। साथ ही निकलने वाली गैसें धुंआ की गति 20 मीटर प्रति सेकण्ड से अधिक नहीं होना चाहिये एवं हल्के और उड़नशील होने चाहिये।

4. प्रदूषण नियंत्रण के लिए वनस्पति उगाकर-

        यह प्रमाणित सत्य है कि पेड़-पौधे प्रदूषण को रोकते हैं एवं हजम करते हैं। प्रकृति के इस संसाधन का अधिकतम उपयोग करना चाहिये अतः औद्योगिक क्षेत्रों सघन परिवहन केन्द्रों तथा अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में उपवनों, पार्कों और वृक्षों को लगाना चाहिये। कुछ वृक्ष विशेष प्रदूषकों को ग्रहण करते हैं। अतः उन क्षेत्रों में वे विशेष वृक्ष रोपित करना जरूरी है। सड़कों के किनारे वे वृक्ष लगाये जायें जो परिवहन से हुए प्रदूषण का अधिक मात्रा में अवशोषित कर सकें अथवा बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन को नित कर सकें। जैसे नीम, पीपल, बरगद आदि।

5. शिक्षा एवं जागरूकता-

        भारत जैसे विशाल देश में जहाँ आर्थिक विकास सर्वोपरि है और वायु प्रदूषण का मापन कठिन है (जो कुशल तकनीकी लोगों द्वारा ही सम्भव लक्ष्य है।) अत: पर्यावरण शिक्षा एवं जागरूकता से ही यह समस्या का समाधान ढूँढ़ा जा सकता हूँ। ताकि लोग व्यक्तिगत स्तर पर प्रदूषण न फैलायें और उससे बच सकेँ।

       पश्चिम के नागरिक पर्यावरण प्रदूषण के प्रति विशेष जागरूक है। जैसे एम्सटरडम नगर के मध्य में मोटरगाड़ियों को छोड़ कर वहाँ के निवासी साइकिल पर चलना पसन्द करते हैं। भारत के पुराने बसे महानगरीय क्षेत्रों के लिये यह अनुकरणीय होगा। पर्यावरणीय शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये पाठ्यक्रम में आवश्यक विषय वस्तु एवं क्रियाओं का समावेश किया जाना चाहिये। रेडियो, टी.वी., समाचार पत्र-पत्रिकायें, संगोष्ठी और परिचर्चा, शोध और उनका विज्ञापन जागरूकता के लिये विशेष महत्त्व रखता है।

6. सीसा रहित पेट्रोल-

      विश्व बैंक सीसा युक्त पेट्रोल का भारी मात्रा में उपयोग करने वाले देशों से आह्वान कर रहा है कि पहले चरण में पेट्रोल में सीसे की मात्रा 0.15 ग्राम या उससे कम प्रति लीटर के हिसाब से कम करें। विश्व बैंक के अनुसार दूसरे चरण में सीसा युक्त पेट्रोल के उपयोग को कम कर समाप्त करें। सीसा रहित पेट्रोल की कटौती लाने के उद्देश्यों से किये जा रहे नीतिगत और जनचेतना के प्रयासों में सक्रिय भूमिका का निर्वाह हो रहा है । सीसा युक्त पेट्रोल की कटौती के प्रयास मुख्य तौर पर मध्य एवं पूर्वी यूरोप, दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं लैटिन अमेरिका में किये जा रहे हैं।

7. सी. एन. जी. का उपयोग-

       कोयला तथा खनिज तेल प्राथमिक ईंधन हैं। इनके जलने से कई वायु प्रदूषक उत्पन्न होते हैं। इनके द्वारा होने वाले वायु प्रदूषण से बचने के लिये सी. एन. जी. का प्रयोग किया गया है। यह पूर्णतः जल जाती है। इसका प्रयोग दिल्ली में बहुत सफल रहा है। भारत में प्राकृतिक गैस प्रचुर मात्रा में मौजूद है। इसीलिए सी. एन.जी. (Compressed Natural Gas) के उपयोग से प्रदूषण निवारण में मदद मिलेगी। पश्चिम में एथनॉल को डीजल में मिलाकर भी एक प्रयोग किया गया जो आर्थिक दृष्टि से सस्ता और पर्यावण के लिए लाभदायक हैं।

7. Environmental Pollution and Degradation (पर्यावरण प्रदूषण एवं अवनयन)

7. Environmental Pollution and Degradation

(पर्यावरण प्रदूषण एवं अवनयन)



            विश्व की तीन प्रमुख समस्याएँ हैं जिन्हें Three-P के नाम से सम्बोधित किया जाता है वो है- Population (जनसंख्या), Poverty (गरीबी) और Pollution (प्रदूषण)।

      इनमें Pollution वर्तमान युग की सबसे विकट समस्या है जो मानवीय अस्तित्व को भी खतरे में डाल सकती है। प्रदूषण से आशय विशेष दूषण या दोष से है। दूषण = दोष। ‘प्र’ उपसर्ग  है जो प्रखरता के लिये प्रयुक्त किया जाता है।

         हवा, पानी व मिट्टी सभी अपने आप में निसर्ग की ओर से शुद्ध व ग्रहण करने योग्य है और जीवन के संवाहक है। जब इनमें कोई पदार्थ इस सीमा तक मिल जाता है कि उसके नैसर्गिक गुणों का ह्रास होने लगता है, ये सभी तत्व अपनी प्राकृतिक अवस्था में रंगहीन, गन्धहीन, स्वादहीन होते हैं।

         परन्तु जब इनमें कोई रंग, गन्ध, स्वाद जुड़ जाता है जिससे उसके भौतिक, रासायनिक और जैविक गुण बदल जाते हैं और इन विजातीय पदार्थों की वजह से वह अपनी प्राकृतिक गुणवत्ता को छोड़ देते हैं। इससे जीवों को क्षति होने लगती है तो यह मानवीय स्वास्थ्य, सम्पत्ति और कार्यक्षमता कुप्रभावित करती है अथवा जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों तथा पर्यावरण के घटकों पर कुप्रभाव पड़ता है तो उसे प्रदूषण के अन्तर्गत लिया जायेगा।

      अथवा जब पर्यावरणीय संसाधनों में नकारात्मक परिवर्तन अथवा ह्रास होने लगता है तो इसको प्रदूषण के अन्तर्गत माना जाता है। संक्षेप में किसी भी तथ्य की अधिकता और न्यूनता जो कार्यक्षमता को कुप्रभावित करती है, प्रदूषण के अन्तर्गत आती है।

पर्यावरण अवनयन से आशय:-

    पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रति निकट पर्यावरणीय अवनयन शब्द है। अतः इसे भी समझना अनिवार्य है। पर्यावरण अवनयन से अभिप्राय जैव मंडल के पारिस्थितिक तत्वों की विभिन्न प्रक्रियाओं में अवरोध उत्पन्न हो जाना है। प्राकृतिक चक्रों में बाधाएँ पड़ने लगती हैं और नैसर्गिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है। साथ ही प्रजातियों का विलुप्तीकरण बढ़ जाता है।

“पृथ्वी के उपग्रहीय तंत्र में अनगिनत प्रक्रियाओं एवं सक्रियताओं के सन्तुलन में दीर्घकालीन आसंजन को पर्यावरणीय अवनयन तथा प्रदूषण के रूप में जाना जाता है जिसकी सार्थकता जैविक, वातावरणीय जलीय एवं रासायनिक (लियो) चक्रों को इंगित करती है।”

    इस प्रकार, संक्षेप में लिख सकते हैं कि पर्यावरण अवनयन मानवीय एवं प्राकृतिक क्रियाओं से जो प्रदूषक (Pollutant) उत्पन्न होते हैं उनका आधिक्य प्रदूषण निर्मित करता है जिससे पारिस्थितिक तंत्र और प्राकृतिक चक्रों में बाधा पड़ती है, इसे पर्यावरण अवनयन कहते हैं। प्रदूषण की प्राथमिक अवस्था पर्यावरण अवनयन है।

अमेरीकी राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अनुसार- “प्रदूषण जल, वायु या भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में होने वाला कोई भी अवांछनीय परिवर्तन है जिससे मनुष्य अन्य जीवों, औद्योगिक प्रक्रियाओं या सांस्कृतिक तत्वों तथा प्राकृतिक संसाधनों को कोई हानि हो या होने की आशंका हो।”

     प्रदूषण वृद्धि का कारण मनुष्य द्वारा वस्तुओं के प्रयोग करने के बाद फेंक देने की प्रवृत्ति और मनुष्य की बढ़ती जनसंख्या के कारण आवश्यकताओं में वृद्धि है। अर्थात् कहा जा सकता है कि “प्रकृति के अवयवों में कोई भी विजातीय पदार्थ का मिलना जो जीव सम्पदा को क्षति पहुँचाए, प्रदूषण के अन्तर्गत आते हैं अर्थात् पर्यावरण में प्रदूषकों की अत्यधिक वृद्धि जो सहनीय क्षमता से अधिक हो प्रदूषण कहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के पर्यावरण सम्मेलन में संसाधनों को हानि पहुँचाने वाले पदार्थों को प्रदूषण के अन्तर्गत माना है।”

    प्रदूषण वायु, जल और स्थल की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का अवांछनीय परिवर्तन है, जो मनुष्य और उसके लिए नुकसानदायक है। दूसरे जन्तुओं, पौधों, औद्योगिक संस्थानों एवं कच्चे माल आदि को किसी भी रूप में हानि पहुँचाता है। अवांछित तत्वों की मौजूदगी पर्यावरण प्रदूषण कहलाती है।

      इन्हीं तत्वों को ई. पी. ओडम (E.P. Odam) के अनुसार– “हवा, जल और मृदा के भौतिक रासायनिक, जैविक गुणों के ऐसे अवांछनीय परिणामों से जिससे मनुष्य स्वयं को तथा सम्पूर्ण परिवेश प्राकृतिक, जैविक और सांस्कृतिक तत्वों को हानि पहुँचाता है, प्रदूषण कहते हैं।

       दूसरी परिभाषा के अनुसार उस दशा या स्थिति को प्रदूषण कहते हैं जब मानव द्वारा पर्यावरण में विभिन्न तत्वों और ऊर्जा का इस सीमा तक सान्द्रण हो जाये कि पारिस्थितिक तंत्र द्वारा आत्मसात करने की क्षमता से अधिक हो तो इसे प्रदूषण कहा जाता है।

    “नि:संदेह पारिस्थितिक तंत्र स्वंय शुद्धीकरण की क्षमता से अलंकृत है। जब स्वयं शुद्धीकरण की इस प्राकृतिक क्षमता में ह्रास होता है तो इसे प्रदूषण कहते हैं।”

एम. वाल्टर के अनुसार, “प्रदूषण पर्यावरण में पायी जाने वाली अवांछित अपद्रव्यताएँ (Unwanted impurifiers) हैं। इन्हें प्रकृति स्वतः शुद्धि नहीं क पाती है इसीलिए यह प्रदूषण के अन्तर्गत आती हैं।”


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6. The Conservation of Biodiversity in India (भारत में जैव विविधता के संरक्षण)

6. The Conservation of Biodiversity in India

(भारत में जैव विविधता के संरक्षण)



        जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि यदि कल्पना करें कि पैनिसिलियम या सिनकोना (Pennicillium or Cinchona) का विलुप्तीकरण इनके महत्त्व के आविष्कार से पहले ही हो गया होता तो क्या होता? इसलिये सभी जातियाँ चाहे वे आर्थिक रूप से उपयोगी हों या न हों, पारिस्थितिकी तंत्र की उन्नति के लिये उपयोगी हैं क्योंकि वन्य पौधे एवं जन्तु पारिस्थितिक तंत्र की उन्नति के लिये आनुवंशिक पदार्थ प्रदान करते हैं।

      भारत के जंगली तरबूज (Wild Melon) से कैलीफार्निया (यू. एस. ए.) में तरबूज फसल (Melon crop) पर होने वाले मिल्ड्यू (Mildew) रोग के प्रतिरोध (resistance) के लिए जीन्स (Genes) प्राप्त की गयी हैं। इसी प्रकार 1963 में उत्तर प्रदेश में वन्य चावल (Wild rice) एकत्र किया गया जिससे प्राप्त जीन ने ग्रासी स्टण्ट वायरस (Grassy Stunt Virus) से होने वाले 30 मिलियन धान की फसल वाले खेत (Paddy) को संक्रमित होने से बचाया। इण्डोनेशिया की कांस घाल (Kans-grass-Saccharum) से गन्ने के रैड रॉट रोग (Red Rot disease) के प्रतिरोध की जीन्स प्राप्त की जाती हैं।

       वर्तमान में कुछ प्रमुख फसल किस्मों के अत्यधिक उपयोग में किस्मों की विविधता या फसल की विविधता को कम कर दिया है। एक आंकलन के अनुसार 1950 में भारतीय किसान चावल की लगभग 30 हजार किस्मों को उगाता था। सन् 2000 तक यह संख्या घटकर 50 रह गई और आगे केवल 10 किस्में ही 75 प्रतिशत कृष्य क्षेत्र (75% Cultivated area) को आच्छादित करेंगी। अब फसलों की रूढ़िवादी एवं भूमि प्रजातियों (Traditional and land races) की कृषि अधिकांश जनजातियों की समाज तक ही सीमित रह गयी हैं। अतः स्पष्ट है कि संरक्षण की अति आवश्यकता है।संरक्षण के दृष्टिकोण से इसे दो भागों में बाँट सकते हैं-

सरंक्षण (Conservation)

1.  संस्थितिक (In-Situ) संरक्षण

⇒ Sanctruaries

⇒ National Park

⇒ Biospher reservoirs

⇒ National reservoirs

⇒ National Monument

⇒ Cultural Landscape

2. असंस्थितिक संरक्षण (Ex-Situ)

⇒ Seed bank

⇒ Gene bank

⇒ Germplas Bank

⇒ Cryopreservation

⇒ Zoo-Captive breeding

⇒ Botanical gardens

⇒ Relative genetic Bank

      जाति का संरक्षण उसके मूल आवासों (Original habitats Means in sittu of on sit) में ही किया जाता है। एक्स सीटू संरक्षण के अन्तर्गत जाति का संरक्षण उनके मूल आवासों से दूर ले जाकर (Away from their original natural habitat means ex-situ or off Situ) किया जाता है। दोनों ही प्रकार के संरक्षण एक-दूसरे के पूरक (Complementary) हैं।

(A) संस्थितिक संरक्षण (In-Situ Conservation):-

       देश में वन्य जीवन नीतियाँ के निर्धारण हेतु 1952 में इण्डियन बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ (Indian Board of Wild Life) की स्थापना की गयी। इसकी पहली मीटिंग में भारत में वन्य जीवन के संरक्षण के लिए एक एकीकृत कानून बनाने की अनुशंसा की गयी।

       1972 में वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्सन एक्ट लागू किया गया जिसे सभी राज्यों द्वारा माना गया। 15वीं मीटिंग में 1982 में स्व. प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के समय वैज्ञानिक रूप से प्रबन्धित सुरक्षित क्षेत्रों की स्थापना पर बल दिया गया। जैसे- राष्ट्रीय उद्यान (National Park), अभ्यारण्य (Sanctuaries), जीवनमंडल रिजर्व (Biosphere Reserve) और अन्य क्षेत्र।

      वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट को ठीक तरह से लागू करने के लिए चार क्षेत्रों नई दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता और चेन्नई में एक-एक उपनिदेशक (Deputy Director) नियुक्त किये गये। ये कन्वेन्सन ऑन इन्टरनेशनल ट्रेड इन एनडेन्जर्ड स्पीशीज CITES (Convention on International Trade in Endangered Species) के लागू करने के लिये उत्तरदायी होते हैं। CITE राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संकटापन्न जातियों के आयात/निर्यात पर रोक लगाती है। ये चारों स्थानीय अधिकारियों (Local Officers) की वन्यजीवन संरक्षण में सहायता भी करते हैं।

1. विश्व स्तर पर विश्व बैंक (World Bank) और संयुक्त राष्ट्र एजेन्सी द्वारा प्रत्येक वर्ष 1.5 विलियन अमेरीकी डॉलर विश्वव्यापी पर्यावरण (Global Environment) के लिए दिये जाते हैं। 1989 में WCMC ने पूरे विश्व में 4,545 संरक्षित क्षेत्र चुने हैं जो 4,846, 300 Km2 क्षेत्र को घेरे हुए हैं जो पृथ्वी के भू-तल का 3.2% क्षेत्र हैं। जिसमें से केवल 2% क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यानों और (वैज्ञानिक रिसर्च) बायोस्फीयर के रूप में दृढ़ता से संरक्षित (Strictly Protect) है। विश्व का सबसे बड़ा उद्यान “ग्रीनलैण्ड” है जो 7,00,000 Km2 को घेरे हुए हैं। 1970 में संरक्षित क्षेत्र में सबसे अधिक वृद्धि हुई थी।

     भारत में 1981 में केवल 19 राष्ट्रीय पार्क और 202 अभ्यारण्य थे। वर्तमान में भारत में 75 राष्ट्रीय पार्क, 421 अभ्यारण्य हैं जो लगभग 1.4 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र घेरते । यह मैन एण्ड बायोस्फीयर समिति (Natural Man and Biosphere Committee, MAB) ने ले लिया। MAB 1979 ने भारत में 13 पारिस्थितिकी तन्त्रों को बायोस्फीयर रिजर्व के रूप में सुरक्षित करने की योजना बनायी है।

2. राष्ट्रीय उद्यान (National Park)-

     प्राकृतिक सौन्दर्य, वन्य जीवन, लोगों के मनोरंजन तथा ऐतिहासिक महत्त्व के कारण आरक्षित किया जाने वाला एक विशेष क्षेत्र है। जहाँ किसी विशेष जानवर (Genetic Orientation) जैसे टाइगर (Tiger), शेर (Lion), राइनो (Rhino) आदि को उनके आवासों में सुरक्षित किये जाते हैं। इनकी सीमा कानून द्वारा निर्धारित होती है। बफर क्षेत्र (Buffer zone) के अतिरिक्त राष्ट्रीय उद्यान में कभी भी जैव हस्तक्षेप (Biotic interference) नहीं होता। यहाँ पर्यटन की आज्ञा है। इसमें जीनपूल (Genepool) और इसके संरक्षण पर ध्यान दिया जाता है। वर्तमान में देश में 75 राष्ट्रीय उद्यान हैं।

भारत के प्रमुख राष्‍ट्रीय उद्यान और अभ्‍यारण्‍य

क्रम प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान/अभ्यारण  राज्य
1. कैमूर वन्य जी अभ्यारण बिहार
2.  गिर राष्ट्रीय उद्यान गुजरात
3.  नल सरोवर अभ्यारण गुजरात
4.  जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड
5.  दुधवा राष्ट्रीय उद्यान उत्तर प्रदेश
6.  चन्द्रप्रभा अभ्यारण उत्तर प्रदेश
7.  बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान कर्नाटक
8.   भद्रा अभ्यारण कर्नाटक
9.   सोमेश्वर अभ्यारण कर्नाटक
10.   तुंगभद्रा अभ्यारण कर्नाटक
11.  नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान कर्नाटक
12. पाखाल वन्य जीव अभ्यारण तेलंगाना
13. कावला वन्य जीव अभ्यारण  तेलंगाना
14. मानस राष्ट्रीय उद्यान  आसम
15. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान  आसम
16. घाना पक्षी विहार राजस्थान
17. रणथम्भौर अभ्यारण राजस्थान
18.  कुंभलगढ़ अभ्यारण राजस्थान
19. पेंच राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश
20. तंसा अभ्यारण महाराष्ट्र
21. वोरीविली रा० उद्यान महाराष्ट्र
22. पलामू (बेतला) अभ्यारण झारखंड
23. दाल्मा वन्य जीव अभ्यारण  झारखंड
24. हजारीबाग वन्य जीव अभ्यारण झारखंड
25. चिल्का अभ्यारण  ओडीशा
26. सिमलीपाल अभ्यारण  ओडीशा
27. वेदान्तगल अभ्यारण तमिलनाडु
28. इंदिरा गाँधी अभ्यारण तमिलनाडु
29. मुदुमलाई अभ्यारण तमिलनाडु
30. कान्हा किसली रा० उद्यान मध्य प्रदेश
31. पंचमढ़ी अभ्यारण मध्य प्रदेश
32. बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान  मध्य प्रदेश
33. डाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान जम्मू कश्मीर
34. किश्तवाड़ राष्ट्रीय उद्यान जम्मू कश्मीर
35. पेरियार अभ्यारण केरल
36. पराम्बिकुलम अभ्यारण केरल
37. पखुई वन्य जीव अभ्यारण्य अरुणाचल प्रदेश
38. अबोहर अभ्यारण पंजाब
39. सुल्तानपुर झील अभ्यारण्य हरियाणा
40. रोहिला राष्ट्रीय उद्यान हिमाचल प्रदेश
41. सुन्दरवन राष्ट्रीय उद्यान पश्चिम बंगाल
42. भगवान महावीर उद्यान गोवा
43. नोंगरवाइलेम अभ्यारण्य मेघालय
44. डाम्फा अभ्यारण मिजोरम
45.   कीबुल लामजाओ रा० उद्यान मणिपुर

3. अभ्यारण्य या शरणस्थली (Sanctuaries)-

     विशेष जाति (Species Oriented) से सम्बन्धित होते हैं। जैसे- सिट्रस, पिचर प्लाण्ट, इण्डियन बस्टर्ड सामान्यतः विशेष आनुवंशिक पदार्थों और लक्षणों (Specific, Genetic, Material and Characters) वाले पौधों को सुरक्षित रखा जाता है। अतः किसी एक संकटापन्न जाति या जातियों के समूह के लिए अभ्यारण्यों का निर्माण सबसे अच्छा होता है। जैसे- मेघालय की खासी पहाड़ियों में नेपेन्थीस (Nepenthes) के लिए, सिक्किम में रोडोडेन्ड्रेन (Rhododendron) व प्रिमूलस के लिये, मेघालय में सिट्रस पौधे के लिये अभ्यारण्य स्थापित किये हैं। यहाँ सीड बैंक तथा जीन बैंक की स्थापना भी की जाती है। भारत में 421 अभ्यारण्य स्थापित किये जा चुके हैं।

4. बायोस्फीयर रिजर्व (Biosphere Reserve)-

     वे प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जो किसी भी प्रकार के शोरगुल से पूर्णतः मुक्त होते हैं और ये पारिस्थितिक तन्त्र (Ecosystem orented) से सम्बन्धित होते हैं। इसमें चार चीजों को शामिल किया गया है-

(1) संरक्षण (Conservation),

(2) अनुसंधान (Research),

(3) शिक्षण (Education) और

(4) स्थानीय सहभागिता (Local Involvement)।

       1985 में विश्व के 65 देशों में 243 बायोस्फीयर रिजर्ववायर बनाने का लक्ष्य था जिसमें से 90 स्थापित हो चुके हैं शेष बचे 103 का निर्माण होना है। भारत में 13 बायोस्फीयर रिजर्ववायर है। भारत में सबसे पहला बायोस्फीयर 1986 में नीलगिरी बायोस्फीयर स्थापित किया गया है जो कर्नाटक, केरल व तमिलनाडु में फैला है। मध्य प्रदेश में सबसे पहले कान्हा राष्ट्रीय उद्यान को बायोस्फीयर के रूप में चिन्हित किया गया।

भारत के प्रमुख  जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र 

क्रम नाम  राज्य
1. मन्नार की खाड़ी  तमिलनाडु 
2.  सुन्दर वन पश्चिम बंगाल
3.  मानस असम
4.  ग्रेट निकोबार अण्डमान एण्ड निकोबार
5.  नन्दा देवी   उत्तरांचल
6.  नोक्रेक मेघालय
7.  नीलगिरि कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु
8.   सिमलीपाल उड़ीसा
9.   डिब्रू सेखोवा असम
10.   दिहांग देबंग अरुणाचल प्रदेश
11.  पंचमढी मध्य प्रदेश
12. कंचनजंगा सिक्किम
13. अगस्तस्य मलाई केरल

       पिछले कुछ वर्षों में भंगुर पारिस्थितिक तन्त्र (Fragile Ecosystem) जैसे 16 बैटलैण्ड, 15 [मैव क्षेत्र और 4 कोरल रीफ के लिए भी सुरक्षा कार्यक्रम बनाये गये हैं।

(B) असंस्थितिक संरक्षण (Ex-Situ Conservation):-

      जब इन सीटू (In-Situ) संरक्षण में किसी जाति के पौधे के बने रहने की सम्भावना कम हो जाती है और उसके विलुप्त होने की आशंका होती है तो ऐसी स्थिति में उसके संरक्षण की विधि संयुक्त एक्स-सीटू (Ex- Situ) होती है अर्थात् मूल आवास से दूर ले जाकर (Away from their Original natural habitat means ex-sita or off situ) करते हैं। इसमें जाति की DNA पदार्थ या उसके genetic पदार्थ का संरक्षण किया जाता है। इसकी मुख्यतः तकनीक है-

(i) जीन बैंक (Gene banks),

(ii) सीड बैंक (Seed Bank).

(iii) इनविट्रों तथा इन विवो (Invitro and in-vivo) में संरक्षण,

(iv) ऊतक सम्बन्धी आनुवंशिक बैंकों की स्थापना,

(v) आनुवंशिक वर्धन केन्द्रों की स्थापना,

(vi) चिड़ियाघर तथा बगीचों (Botanical gardens) में वृद्धि,

(vii) कारावासी बीडिंग (Captive beeding) की जाती है।

       इसे मोटे तौर पर निम्न प्रकार से वर्णित कर सकते हैं-

(1) जीन बैंक (Gene Bank)-

      जीव जन्तुओं या पौधों को जब चिड़ियाघरों (Zoo) या वानस्पति बगीचों में बीज के साथ-साथ DNA को भी एकत्रित कर रखा जाता है तो इसे जीन बैंक कहते हैं । साथ ही कारावासी (Captive) के रूप में उनको रखकर उनकी ब्रीडिंग (Breeding) कराते हैं। उपरोक्त परिस्थिति आने पर इन्हें पूर्व मूल निवास स्थान पर छोड़ा जाता है। भारत में 33 वनस्पति उद्यान और 33 विश्वविद्यालयों में जैव विज्ञानी उद्यान, 107 चिड़ियाघर, 49 मृग उद्यान, 24 प्राकृतिक प्रजनन केन्द्र हैं।

(2) बीज बैंक (Seed Bank)-

     ऐसे पौधे जिनक बीजों को दीर्घ अवधि तक संरक्षित कर रखा जा सकता है उनके लिए बीज बैंक बनाये गये हैं। यहाँ बीज का लेन-देन (Exchange) तथा वितरण किया जाता है। इन्हें जीवन क्षम (Vibal) बनाये रखने के लिये NBPGR के ग्रीन बैंक में संचित (Stored) किया जाता है। भारत में इस प्रकार के चार केन्द्र स्थापित किये गये हैं-

(i) शिमला- भारत के उत्तरी भाग के पहाड़ी स्थानों से जर्मप्लाज्मा या बीज को (Collect) इकट्ठा कर संरक्षित किया जाता है। 

(ii) अमरावती- भारत के केन्द्रीय क्षेत्रों से प्राप्त जर्मप्लाज्मा, पादप पदार्थ या बीज को संग्रहित कर संरक्षित किया जाता है।

(iii) जोधपुर- इस केन्द्र पर शुष्क प्रदेशों के जर्मप्लाज्मा, पादप पदार्थ या बीज को संचय कर संरक्षित किया जाता है।

(iv) शिलांग- उत्तर-पूर्वी भारत के विभिन्न क्षेत्रों के पादप पदार्थ या बीज को संचय कर संरक्षित किया जाता है।

(3) निम्नताप संरक्षण (Cryopreservation)-

      कुछ पौधों के बीज ऊष्मा और ठण्डक (Cooling) को सही नहीं पाते इसलिये इसके लिये बीज बैंक उपयुक्त नहीं होता है। इन्हें दुःशय बीज कहते हैं। जब इसमें व्यापारिक महत्त्व के पौधे आ जाते हैं; जैसे- चाय (Tea) और नारियल (Coconut) के पौधे इसके (In-situ) संचय को बढ़ावा दिया जाता है और पौधे के बीज के स्थान पर उनके परागकण (Pollen grains) और स्पोर (Spore) का संचय निम्न ताप पर किया जाता है।

       अतः संक्षेप में कह सकते हैं कि संकटापन्न जीवों के संरक्षण में अप्राकृतिक (Ex-Situ) संरक्षण की तुलना में प्राकृतिक संरक्षण (In-Situ) अधिक उपयुक्त होता है। इसलिए जीवों को उनके पर्यावरण में संरक्षित करना चाहिए क्योंकि यदि उन्हें कैप्टिव (कैद कर जैसे चिड़ियाघर या प्रयोगशाला में) बीडिंग कर उनकी संख्या बढ़ाकर उन्हें पुनः उनके आवास में स्थापित करना कठिन होता है। इसका करण है कि वे जंगली जीवों से अपनी रक्षा नहीं कर पाते हैं और अपना भोजन भी नहीं ढूंढ पाते हैं। इस कारण से अधिकांश की मृत्यु हो जाती है। साथ ही अप्राकृतिक संरक्षण (Ex-Situ) में अत्यधिक लागत आती है। इसलिए हमें अधिक से अधिक प्राकृतिक (In-Situ) संक्षण को बढ़ावा देना चाहिए।


5. Discuss The Scope of Environmental Geography (पर्यावरणीय भूगोल की विषयवस्तु की विवेचना)

5. Discuss The Scope of Environmental Geography

(पर्यावरणीय भूगोल की विषयवस्तु की विवेचना)


          पर्यावरणीय अध्ययन की विषय-वस्तु पर्यावरण और मानव के अंतर्संबंधों की व्याख्या है। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है की पर्यावरण का मानव पर प्रभाव और मानव का पर्यावरण पर प्रभाव की विवेचना ही पर्यावरण अध्ययन है। मानवीय क्रिया-कलाप से पर्यावरण की प्राकृतिक गुणवत्ता में जो अवनयन (Degradation) हुआ है, उस अवनयन के मानवीय कार्यक्षमता पर प्रभाव की व्याख्या पर्यावरणीय अध्ययन की विषय-वस्तु है।

       पर्यावरणीय अध्ययन का केन्द्र बिन्दु पर्यावरण की प्राकृतिक गुणवत्ता का ह्रास और इस ह्रास के प्रभावों की व्याख्या करना पर्यावरण अध्ययन की विषय-वस्तु है। पर्यावरणीय समस्याओं के दुष्परिणाम, मानवीय स्वास्थ्य, प्राकृतिक सौन्दर्य और संसाधन पर देखना पर्यावरणीय अध्ययन का विषय क्षेत्र है।

      पर्यावरणीय अध्ययन के विषय क्षेत्र को समझने के लिए इसको छः उपवर्गों में विभक्त कर समझ सकते हैं:

(1) पर्यावरणीय समस्याएँ एवं संकट (Environmental Problems and Hazards)

(2) संसाधन ह्रास (Degradation of Resources),

(3) पारिस्थिति तंत्र में बाधा (Disturbance in Ecosystem),

(4) जैव विविधता ह्रास (Degradation or Bio-Diversity),

(5) प्राकृतिक चक्रों में बाधा (Disturbance of Natural Cycle),

(6) पर्यावरण अवनयन (प्रदूषण) (Environmental Degradation)।

(1) पर्यावरणीय समस्याएँ एवं संकट:-

          प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप जन्य समस्याएँ, संसाधनों के अत्यधिक शोषण अर्थात् कुप्रबन्धन से उत्पन्न समस्याएँ और उच्च तकनीक के विकास से संबंधित समस्याएँ। इसके अन्तर्गत अम्लीय वर्षा, पृथ्वी के रक्षा कवच, ओजोन परत का ह्रास, हरित गृह प्रभाव आदि का अध्ययन सम्मिलित है। साथ ही प्राकृतिक प्रकोप भूकम्प, ज्वालामुखी, भूस्खलन, भू-क्षरण तथा जलवायु समस्याएँ, बाढ़, सूखा, चक्रवात, गर्म एवं ठण्डी हवाएँ, झंझावात, सुनामी लहरें एवं मरुस्थलीकरण आदि का अध्ययन सम्मिलित है।

(2) संसाधन ह्रास:-

         वन, जल, खनिज, भूमि, पशु, कृषि, उद्योग एवं ऊर्जा संसाधन के शोषण के दुष्परिणाम और शोषण के कारण तथा समाधान इसके अध्ययन में सम्मिलित हैं।

(3) पारिस्थिति तंत्र में बाधा:-

    इसके अन्तर्गत पारिस्थितिक पिरामिड में व्यतिक्रम, पारिस्थितिक अनुक्रम में बाधा, आहार श्रृंखला, ऊर्जा प्रवाह में बाधा आदि कारणों का विवेचन किया जाता है।

(4) जैव विविधता ह्रास:-

         प्रजातियों का विलुप्तीकरण, जीव पिरामिड में व्यतिक्रम के कारण और संरक्षण के उपायों की विवेचना की जाती है।

(5) प्राकृतिक चक्रों में बाधा:-

         जल चक्र, गैसीय चक्र, ऑक्सीजन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, जीव चक्र आदि का अध्ययन इसके अन्तर्गत किया जाता है।

(6) पर्यावरण अवनयन (प्रदूषण):-

       वायु, जल, मृदा, समुद्री ताप एवं आणविक प्रदूषण के कारण मानवीय स्वास्थ्य एवं समृद्धि पर दुष्प्रभाव, कारक एवं निदानों का अध्ययन आज के पर्यावरणीय अध्ययन की प्रमुख विषय-वस्तु है।

     उपर्युक्त मूल विषय वस्तु के अन्तर्गत इन समस्याओं के कारकों जैसे- जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण, औद्योगिकरण, उच्च वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास, पुनः चक्रीकरण एवं जैव असंतुलन का अध्ययन भी सम्मिलित है। पर्यावरणीय अध्ययन की पूर्णता हेतु इसकी विषय-वस्तु में पर्यावरण नियोजन, पर्यावरण प्रबन्ध, पर्यावरण संरक्षण, संसाधन आरक्षण, सम्पोषित विकास, जैव विविधता संरक्षण और जैव प्रौद्योगिकी का विकास भी पर्यावरणीय अध्ययन की विषय-वस्तु में सम्मिलित है।

     अतः संक्षेप में कह सकते हैं कि पर्यावरणीय अध्ययन की विषय-वस्तु में पर्यावरण के विभिन्न अवयवों और इनके पारिस्थितिकी प्रभावों, मानव और पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों के संदर्भ में पर्यावरणीय अवनयन (प्रदूषण), पर्यावरणीय समस्याएँ, संसाधन एवं जैव विविधता ह्रास औद्योगीकरण, नगरीकरण, जनसंख्या वृद्धि के पर्यावरणीय प्रभावों, संसाधन, उपयोग एवं पर्यावरणीय समस्या तथा संकट के अध्ययन के साथ पर्यावरण संरक्षण, प्रबन्धन और नियोजन के विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है।

      पर्यावरण का अध्ययन पारिस्थितिकी शास्त्र और भूगोल का मूल विषय रहा है। वनस्पति विज्ञान, मृदा विज्ञान, मानव भूगोल और मानव पारिस्थितिकी शास्त्र में पर्यावरण अध्ययन विशिष्टता के साथ विगत् समय में किया गया है, किन्तु आज पर्यावरण नगरीय, औद्योगिक और अति सघन क्षेत्रों में नये आयामों में परिवर्तित होकर प्रभावित कर रहा है।

      इसलिए वर्तमान में पर्यावरणीय अध्ययन को अलग शास्त्र के रूप में अध्ययन की आवश्यकता अनुभव की गई है। संसाधनों के अतिशोषण से पर्यावरण की प्राकृतिक गुणवत्ता में ह्रास हुआ है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र में बाघा तथा जैव विविधता को क्षति पहुँची है। इसलिए पर्यावरणीय अध्ययन नये विषय के रूप में उभर कर सामने आया है। पर्यावरणीय अध्ययन की प्रकृति की पाँच मुख्य विशेषताएँ हैं-

(1) पर्यावरणीय अध्ययन अन्तरानुशासनिक अथवा बहु-विषयक (Inter-disciplinary) है।

(2) इसकी विषय-वस्तु का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से होता है।

(3) इसकी विषय-वस्तु और प्रभाव दोनों ही गत्यात्मक हैं।

(4) अधिप्रभाव स्थान और क्षेत्र से प्रत्यक्ष संबंध रखते हैं।

(5) प्रभावों की व्याख्या वैज्ञानिक दृष्टिकोण से होने पर भी वर्णनात्मक अथवा व्याख्यात्मक होती है। अर्थात् वैज्ञानिक विवेचना क्यों और कारणों सहित होती है।

     समस्त शास्त्र और संसार के समस्त शोध शाश्वत सत्य की खोज है और मानव के हित में लगे हुए हैं अर्थात् मानव हित सर्वोपरि लक्ष्य है। इसलिए उच्च अध्ययन में लगभग सभी शास्त्र और शोध बहु-विषयक प्रकृति के हो जाते हैं और सभी शास्त्रों को सांख्यिकीय आँकड़ों से अपने उपलब्ध सत्यों को प्रमाणित करना पड़ता है। इसी प्रकार पर्यावरणीय अध्ययन भी बहु-विषयक प्रकृति रख कर अपने अध्ययन संपादन करता है।

     पर्यावरण अध्ययन को सभी विज्ञान और शास्त्र महत्त्व दे रहे हैं। इसलिए विविध शास्त्रों में एक शाखा या प्रश्न-पत्र के रूप में इसको पढ़ाया जाने लगा है। जैसे- रसायन विज्ञान में ‘पर्यावरणीय रसायन’, भूगोल में ‘पर्यावरणीय भूगोल’, अर्थशास्त्र में पर्यावरणीय अर्थशास्त्र’, मनोविज्ञान में ‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान’, समाजशास्त्र में ‘पर्यावरणीय समाजशास्त्र, विधि में ‘पर्यावरणीय नियम’, वाणिज्य में ‘व्यावसायिक पर्यावरण’ के रूप में पर्यावरण का अध्ययन होता है। अतः पर्यावरणीय अध्ययन विषय की भी इन्हीं विषयों से अपनी विषय-सामग्री प्राप्त करता हुआ बहु-विषयक प्रकृति रखता है।

     ‘पर्यावरण’ शब्द अनेक प्रभावशील कारकों का सम्मिलित नाम है। अतः पर्यावरण के प्रभाव के अध्ययन अत्यधिक व्यापक और विस्तीर्ण हैं। इसलिए पर्यावरण अध्ययनकर्ता को विविध विषयों का विशद् ज्ञान होना चाहिए। पर्यावरण के विद्यार्थी को समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, रसायन, वनस्पति शास्त्र, पारिस्थितिकी शास्त्र, नीतिशास्त्र, कृषि विज्ञान आदि का ज्ञान होना चाहिए; क्योंकि पर्यावरणीय अध्ययन की प्रकृति बहु-विषयक है।

     अतः संक्षेप में कह सकते हैं कि पर्यावरणीय अध्ययन विभिन्न विषयों से अपनी अध्ययन सामग्री जुटाता है। साथ ही समस्याओं की वैज्ञानिक विवेचना करता है और पर्यावरण के प्रभावों की देश काल और समाज के संदर्भ में विवेचना करने के काण इसकी प्रकृति बहु-विषयक हो गई है।


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4. What do you understand by ecosystem? Discuss its types (पारिस्थितिक तंत्र से आप क्या समझते है? इसके प्रकार की विवेचना करें।)

4. What do you understand by ecosystem? Discuss its types.

(पारिस्थितिक तंत्र से आप क्या समझते है? इसके प्रकार की विवेचना करें।)



       इकोसिस्टम (Eco-system) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम इंग्लैंड के एक इकोलोजिस्ट ए. जी. टेन्सले ने सन् 1935 में किया था। टेन्सले के अनुसार इकोसिस्टम वातावरण के सभी जैवकि एवं अजैविक घटकों के पूर्ण समन्वय से बनी प्रणाली (system) है।

“The system resulting form the intergration or all the living and non-living factors of the environment.”

      इकोसिस्टम शब्द में Eco शब्द से अभिप्राय वातावरण से है तथा System का अर्थ है परस्पर क्रियाशील तथा परस्पर जटिल तंत्र। दूसरे शब्दों में, “वातावरण के जैविक एवं अजैविक घटकों जीवों एवं वातावरण की अंतर्क्रियाओं के फलस्वरूप बने तंत्र को ही पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं।”

       विभिन्न Ecologists द्वारा Ecosystem के लिए कुछ अलग प्रकार के शब्दों का भी उपयोग किया गया है। ये शब्द निम्नलिखित हैं-

(i) बायोसीनोसिस (Biocoenosis)- यह शब्द कार्ल मोबियस (Karl Mobias, 1879) द्वारा प्रयोग में लाया गया था।

(ii) माइक्रोकोस्म (Microcosm)- यह शब्द सफोर्बस (Saforb, 1887) द्वारा प्रयोग में लाया गया था।

(iii) जियोबायोसीनोसिस (Geobiocoenosis)- यह शब्द व्ही. व्ही. डकशेव (V. V. Dokuchaev, 1846 & 1903) द्वारा प्रयोग में लाया गया था।

(iv) होलोसीन (Holocoen)- इस शब्द को फ्रेडरिकस (Friedericsh, 1930) ने दिया था।

(v) बायोसिस्टम (Biosystem)- थीनमेन (Thienemann, 1939) द्वारा इस शब्द का प्रयोग किया गया था।

(vi) बायोइनर्ट बॉडी (Bioenert Body)- वरनाड्स्की (Vernadsky. 1944) ने इस. शब्द का प्रयोग किया था।

(vii) इकोकॉस्म (Ecocosm)- आर. मिश्रा (R. Mishra, 1968) ने यह शब्द दिया था।

       उपरोक्त शब्दों का अधिक प्रचलन तंत्र नहीं है। Ecosystem ही सर्वाधिक प्रचलित शब्द है।

     पृथ्वी एक विशाल पारिस्थितिक तंत्र है। यहाँ पर जैविक एवं अजैविक घटक समान रूप से एक-दूसरे से अंतर्क्रिया करते हैं जिसके कारण इस पारिस्थितिक तंत्र में संरचनात्मक एवं क्रियात्मक परिवर्तन होते हैं। पृथ्वी के विशाल पारिस्थतिक तंत्र को जैव मंडल (Biosphere) कहते हैं। जैव मंडल का अध्ययन करना अत्यन्त कठिन होता है। इस कारण अध्ययन की सुविधा के लिये इसे कृत्रिम रूप से छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित कर अध्ययन किया जाता है। ये इकाइयाँ स्थलीय, जलीय तथा मानव निर्मित पारिस्थितिक तंत्र की हो सकती हैं।

      इस प्रकार एक Ecosystem एक छोटा तालाब हो सकता है, एक खेत हो सकता है, एक मरुस्थल हो सकता है, एक जंगल हो सकता है अथवा एक महासमुद्र हो सकता है। बहुत बड़े पारिस्थितिक तंत्र को बायोम (Biome) कहते हैं; जैसे- सागर, महासागर, सम्पूर्ण वन क्षेत्र आदि। सबसे छोटा पारिस्थतिक तंत्र एक वृक्ष या एक जल की बूँद हो सकती है। Ecosystem सामान्यतः एक खुला तंत्र होता है जिसमें सामग्री (materials) एवं ऊर्जा (energy) का निरंतर प्रवाह (influx) एवं हानि (loss) होता रहता है।

पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार (Types of Ecosystem)

      Ecosystem को निम्नलिखित दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

(1) प्राकृतिक पारिस्थतिक तंत्र

(2) कृत्रिम (मानव निर्मित) पारिस्थितिक तंत्र

(1) प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Natural Ecosystem):-

      इस प्रकार के Ecosystem प्राकृतिक दशाओं में कार्य करते हैं तथा इनमें मनुष्य का हस्तक्षेप नहीं होता है या बहुत ही कम होता है। प्राकृतिक आवास के आधार पर प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को निम्न दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

(A) स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र (Terrestrial Ecosystem)-

           यह Ecosystem स्थल पर विकसित होता है। कुछ प्रमुख स्थलीय Ecosystem निम्नलिखित हैं-

(i) घास भूमि पारिस्थितिक तंत्र,

(ii) वन पारिस्थितिक तंत्र,

(iii) मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र,

(iv) पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र।

(B) जलीय पारिस्थितिक तंत्र (Aquatic Ecosystem)-

        यह जल में विकसित होता है। इसे निम्न दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

(i) स्वच्छ जल पारिस्थितिक तंत्र (Fresh Water Ecosystem)-

       ऐसा जल जिसमें लवणों की मात्रा नहीं पायी जाती है, स्वच्छ जल कहलाता है। नदी, तालाब, झील, दलदल आदि का Ecosystem स्वच्छ जल पारिस्थतिक तंत्र होता है। झरना,

(ii) सामुद्रिक जल पारिस्थितिक तंत्र (Marine Water Ecosystem)-

        यह लवणीय जल में विकसित होता है। समुद्र तथा महासागर का पारिस्थितिक तंत्र सामुद्रिक जल पारिस्थितिक तंत्र होता है।

(2) कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र (Artificial Ecosystem):-

       इस प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण मनुष्य स्वयं अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये करता है। इस कारण इसे मानव निर्मित पारिस्थितिक तंत्र भी कहते हैं। इसके उदाहण निम्नलिखित हैं-

(i) कृषि पारिस्थितिक तंत्र (Agro Ecosystem)

(ii) जल जीवशाला पारिस्थितिक तंत्र (Water Aquarium Ecosystem)


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3. What do you understand by environment? Discuss its components. (पर्यावरण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख घटक की विवेचना करें।)

3. What do you understand by environment? Discuss its components.

(पर्यावरण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख घटक की विवेचना करें।)



भूगोल परिभाषा कोश के अनुसार, “चारों ओर उन बाहरी दशाओं का योग, जिसके अन्दर एक जीव अथवा समुदाय रहता है या कोई वस्तु रहती है।”

ए. जी. टेन्सले के अनुसार, “प्रभावकारी दशाओं का सम्पूर्ण योग, जिसमें जीव रहते हैं, पर्यावरण कहलाता है”

विद्वान रॉस के अनुसार, “पर्यावरण वह बाह्य शक्ति है, जो प्रभावित करती हैं।”

भूगोलवेत्ता डडले स्टाम्प के अनुसार, “पर्यावरण प्रभावों का ऐसा योग है, जो जीव के विकास एवं प्रकृति को परिवर्तित तथा निर्धारित करता है ।”

हर्सकोविट्स के अनुसार, “वातावरण उन सब बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग है, जो प्राणी के जीवन और विकास पर प्रभाव डालते हैं।”

        संक्षेप में हम कह सकते हैं कि पर्यावरण में वे सभी प्राकृतिक एवं मानव निर्मित कारक सम्मिलित हैं, जो चारों ओर से घेरे हुए हैं और प्रभावित करते हैं।

      दूसरे शब्दों में, पर्यावरण के अन्तर्गत भौतिक, सांस्कृतिक अथवा जैविक-अजैविक प्रभावशील घटकों को सम्मिलित किया जाता है, जो जीव की दशाओं और कार्यों को प्रभावित करता है। इस प्रकार भौतिक कारक के अलावा सांस्कृतिक कारकों के प्रभावों को भी सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार पर्यावरण को पाँच बिन्दुओं में विश्लेषित किया जा सकता है-

(1) पर्यावरण बाह्य शक्ति है।

(2) ये शक्तियाँ परस्पर संबंधित हैं।

(3) इन शक्तियों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है।

(4) ये शक्तियाँ गत्यात्मक (परिवर्तनशील) हैं।

(5) इन शक्तियों का जीव पर प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

      पर्यावरण को दो प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

1. भौतिक पर्यावरण (Physical Environment):-           

        भौतिक पर्यावरण प्रकृति का अनुपम उपहार है। इसका कोई विकल्प नहीं है। यह अमूल्य संसाधन सहज सभी को उपलब्ध है। भौतिक पर्यावरण से तात्पर्य उन भौतिक अथवा प्राकृतिक कारकों से है, जिन पर प्रकृति का सीधा नियंत्रण है, जिन्हें भगवान ने बनाया अर्थात् मानव का हस्तक्षेप इसके निर्माण में नहीं है।

        यदि मनुष्य को इस पृथ्वी से हटा लिया जाय, तो जिन क्रियाओं-प्रक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं पर कोई अन्तर न आये, उन सब कारकों को भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जाता है। इसका आशय यह है कि जिसका निर्माण और नियंत्रण मनुष्य से परे है, जो प्रकृति प्रदत्त है, वह सब कुछ भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आता है, जैसे- सूर्य ताप, ऋतु परिवर्तन स्थिति, भू-वैज्ञानिक संरचना, धरातल, भूकंप, ज्वालामुखी, खनिज, मिट्टियाँ, वनस्पति, जलराशियाँ, जीव-जन्तु ऐसे कारक हैं, जो प्रकृति जन्य हैं। इसलिए उक्त सभी कारकों को प्राकृतिक अथवा भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जाता है।

2. सांस्कृतिक पर्यावरण (Cultural Environment):-               

        सांस्कृतिक पर्यावरण मानव निर्मित होता है तथा मानव का इस पर पूर्ण नियंत्रण होता है। जैसे- संविधान, धर्म, दर्शन, संस्कृति, प्रतिमान, आदर्श मूल्य, सामाजिक परम्पराएँ, रीति-रिवाज, सामाजिक संबंध। इन अमूर्त तथ्यों के अलावा मूर्त कारक भी सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आते हैं, जैसे- सड़कें, पुल, भवन, तालाब, आवास, शहर, सुरक्षा, चिकित्सा, शिक्षा केन्द्र, परिवहन स्थान, मनोरंजन स्थल आदि। मनुष्य पहले इनका निर्माण करता है और फिर इनसे प्रभावित होता है। नगरीय एवं औद्योगिक स्थलों पर सांस्कृतिक पर्यावरण विशेष प्रभावी होता है।

       शिक्षा केन्द्र और सुरक्षा केन्द्रों पर भी सांस्कृतिक कारक अत्यधिक प्रभावी होते हैं जबकि पर्यटन स्थलों पर भौगोलिक और सांस्कृतिक दोनों कारक प्रभावी होते हैं। सांस्कृतिक पर्यावरण वस्तुतः मनुष्य के भौतिक कारकों के प्रति अनुकूलन, समायोजन, संघर्ष आदि की प्रतिक्रिया-अनुक्रिया के परिणामस्वरूप जन्मा है; जो कृषि, उद्योग के साथ-साथ संस्कृति में भी देखा जा सकता है।

पर्यावरण के अवयव (घटक)

(Components of Environment)

      पर्यावरण अनेक अवयवों से मिलकर बना है। स्थूल रूप में अध्यात्म में इसे जड़ और चेतन कहा गया है। जिसे आधुनिक वैज्ञानिक अजैविक एवं जैविक कह कर विभाजित करते हैं। इसे भौतिक एवं अभौतिक अवयवों में विभक्त किया जा सकता है। इन घटनों की सर्वप्रथम वैज्ञानिक विवेचना 1948 में वनस्पतिशास्त्री ओस्टिंग ने की और निम्नलिखित प्रमुख घटकों में विभाजित किया-

1. पदार्थ (मिट्टी+पानी),

2. दशाएँ (ताप+प्रकाश)

3. बल (पवन+गुरुत्व)

4. जीव (जन्तु+वनस्पति)

5. काल (ऋतु+समय)।

      पर्यावरणविद् डौरेनमिर (1954) ने पर्यावरण के कारकों को सात वर्गों में विभाजित किया है-

1. मिट्टी,

2. हवा,

3. पानी,

4. आग,

5. ताप,

6. रोशनी,

7. जीव-जन्तु।

      संक्षेप में, पर्यावरण अध्ययन को सरल करते हुए पर्यावरण घटकों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

1. भौतिक कारक (Physical Factor)

A. पार्थिक कारक (Terrestrial factors):-

(i) भू रचना- (भूवैज्ञानिक संरचना खनिज, चट्टानें एवं मृदा)।

(ii) धरातल- (उच्चावच पर्वत, पठार, मैदान)।

(iii) स्थिति- (अवस्थिति, ज्यामिति परिस्थिति एवं क्षेत्र के संदर्भ में स्थिति)

2. सांस्कृतिक घटक (Cultural Factor):-

(i) आर्थिक घटक- कृषि, उद्योग, तथा व्यापार।

(ii) सामाजिक घटक-  संस्कृति, दर्शन, व्यवहार और आदर्श।

(iii) धार्मिक घटक- संस्कार तथा परम्पराएँ।

(iv) राजनैतिक घटक- नीतियाँ औ चेतना।


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