Archives June 2024

36. World Fishing (विश्व मत्स्यन)

36. World Fishing

(विश्व मत्स्यन)



1. मत्स्यन किस प्रकार की आर्थिक क्रिया है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) चतुर्थक

[read more] (a) प्राथमिक [/read]

2. व्यापारिक रूप से मत्स्य पालन का व्यवसाय क्या कहलाता है?

(a) विटीकल्चर

(b) सेरीकल्चर

(c) एपीकल्चर

(d) पिसीकल्चर

[read more] (d) पिसीकल्चर [/read]

3. नीली क्रांति (Blue revolution) निम्न में से किससे सम्बन्धित है?

(a) अन्तरिक्ष अनुसंधान

(b) मत्स्य पालन

(c) नील की खेती

(d) इनमें से कोई नहीं

[read more] (b) मत्स्य पालन [/read]

4. प्लैंकटन (Plankton) है-

(a) वन

(b) धूमकेतु

(c) कृत्रिम उपग्रह

(d) समुद्री मछलियों का भोजन

[read more] (d) समुद्री मछलियों का भोजन [/read]

5. मछलियों का सबसे अधिक केन्द्रीयकरण छिछले तटीय जल में पाया जाता है क्योंकि इन भागों में सहयोगी कारक है-

(a) गर्म जल

(b) स्वच्छ जल

(c) अत्यधिक प्लैंकटन

(d) समुद्री जलधाराओं से सुरक्षा

[read more] (c) अत्यधिक प्लैंकटन [/read]

6. हेरिंग पॉण्ड (Hering Pond) के नाम से जाना जाता है-

(a) प्रशान्त महासागर

(b) अटलांटिक महासागर

(c) हिन्द महासागर

(d) आर्कटिक महासागर

[read more] (b) अटलांटिक महासागर [/read]

7. मत्स्य उद्योग के विशेष रूप से उत्तरी गोलार्द्ध में ही विकसित होने का कारण है-

(a) उथले सागर

(b) स्थल खण्डों की अधिकता

(c) गर्म एवं ठंडी जल धाराओं का सम्मिलन

(d) उपर्युक्त सभी

[read more] (d) उपर्युक्त सभी [/read]

8. संसार के प्रमुख मत्स्य ग्रहण क्षेत्रों में सम्मिलित नहीं है-

(a) उत्तर पश्चिम प्रशांत महासागर

(b) उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर

(c) उत्तर पूर्वी अटलांटिक महासागर

(d) दक्षिणी हिन्द महासागर

[read more] (d) दक्षिणी हिन्द महासागर [/read]

9. विश्व का लगभग एक तिहाई मत्स्योत्पादन प्राप्त होता है-

(a) उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर से

(b) उत्तर पूर्व अटलांटिक महासागर से

(c) उत्तर पश्चिम प्रशान्त महासागर से

(d) दक्षिण पूर्व प्रशान्त महासागर से

[read more] (c) उत्तर पश्चिम प्रशान्त महासागर से [/read]

10. मत्स्य उद्योग की दृष्टि से कौन-सा देश महत्वपूर्ण है?

(a) चीन

(b) नार्वे

(c) इण्डोनेशिया

(d) भारत

[read more] (b) नार्वे [/read]

11. विश्व का वृहत्तम मत्स्य आहरण क्षेत्र है-

(a) कैरेबियन सागर

(b) चेसापीक खाड़ी

(c) ग्रैंड बैंक

(d) नोवा-स्कोशिया

[read more] (c) ग्रैंड बैंक [/read]

12. प्रसिद्ध मत्स्य क्षेत्र ‘ग्रैंड बैंक’ स्थित है-

(a) प्रशान्त महासागर में

(b) अटलांटिक महासागर में

(c) हिन्द महासागर में

(d) आर्कटिक महासागर में

[read more] (b) अटलांटिक महासागर में [/read]

13. विश्व का एक प्रमुख मत्स्यन क्षेत्र ‘डॉगर बैंक’ कहाँ स्थित है?

(a) बाल्टिक सागर में

(b) उत्तरी सागर में

(c) बोथनिया की खाड़ी में

(d) इंगलिश चैनल में

[read more] (b) उत्तरी सागर में [/read]

14. चेसापीक खाड़ी जो कि ओयस्टर पकड़ने के लिए प्रसिद्ध है, स्थित है-

(a) फ्रांस के तट के निकट

(b) नार्वे के तट के निकट

(c) यू०एस०ए० के तट के निकट

(d) कनाडा के तट के निकट

[read more] (c) यू०एस०ए० के तट के निकट [/read]

15. विश्व में स्वच्छ जल की मछली का सबसे बड़ा उत्पादक देश है-

(a) चीन

(c) बांग्लादेश

(b) भारत

(d) इण्डोनेशिया

[read more] (a) चीन [/read]

16. विश्व में स्वच्छ जल की मछली के उत्पादक देशों का सही अवरोही क्रम है-

(a) चीन, बांग्लादेश, भारत, इण्डोनेशिया

(b) चीन, भारत, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया

(c) भारत, चीन, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया

(d) भारत, बांग्लादेश, चीन, इण्डोनेशिया

[read more] (b) चीन, भारत, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया [/read]

17. अटलांटिक महासागर के मत्स्य उत्पादन में कमी आने का मुख्य कारण है-

1. अति मत्स्यन

2. जल प्रदूषण

3. माँग में कमी

4. ग्लोबल वार्मिंग

कूट :

(a) 1 एवं 2

(b) 2 एवं 3

(c) 1, 2 एवं 3

(d) 1, 2, 3 एवं 4

[read more] (a) 1 एवं 2 [/read]

18. मत्स्य ग्रहण क्षेत्र अधिकतर उच्च अक्षांशों में स्थित होते हैं, कारण-

I. तटरेखा का अत्यधिक लंबा होना

II. महाद्वीपीय मग्नतटों का अधिक विस्तार

III. सागरीय जल के तापमान का 20°C से कम होना

IV. कम जनसंख्या

कूट :

(a) I, II एवं III

(b) II, III एवं IV

(c) I एवं II

(d) II एवं IV

[read more] (a) I, II एवं III [/read]

19. उष्ण कटिबंधीय महासागरों में मत्स्य उद्योग का विकास काफी कम हुआ है। इसका कारण है-

(a) छिछले सागरों का अभाव

(b) माँग की कमी

(c) संरचनात्मक सुविधाओं का अभाव

(d) उपर्युक्त सभी

[read more] (d) उपर्युक्त सभी [/read]

20. ग्रैंड बैंक है-

(a) संयुक्त राज्य अमेरिका का केन्द्रीय बैंक

(b) ग्रेट ब्रिटेन का सुरक्षित खाद्य भंडा

(c) गल्फस्ट्रीम तथा लैब्रोडो धाराओं का संगम स्थल

(d) इंगलिश चैनल के दोनों तट

[read more] (c) गल्फस्ट्रीम तथा लैब्रोडोर धाराओं का संगम स्थल [/read]

9. Eco-Tourism (पारिस्थैतिक पर्यटन)

Eco-Tourism

(पारिस्थैतिक पर्यटन)



           यह दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- पारिस्थैतिकी और दूसरा- पर्यटन। पारिस्थैतिकी का तात्पर्य उस समस्त भौगोलिक तत्त्व से है जो धरातल पर या उसके चारों ओर जैविक एवं अजैविक घटकों के रूप में मौजूद है। पुनः पर्यटन का तात्पर्य स्वेच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर घूमना-फिरना है।

       सदियों से लोग सांस्कृतिक तत्वों को समझने हेतु पर्यटन का सहारा लेते रहे हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में पारिस्थैतिकी के प्रति दिलचस्पी रखने वाले लोग पारिस्थैतिक केन्द्र की ओर आकर्षित होने लगे हैं, जिसे “पारिस्थैतिकी पर्यटन” कहते हैं। भूगोल में पारिस्थैतिकी पर्यटन का विशेष महत्व है क्योंकि एक ओर कई पर्यटक स्थल अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से प्रदूषित हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए पारिस्थैतिक पर्यटन की आवश्यकता पड़ती है। पारिस्थैतिक पर्यटन के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्त्वों पर जोर दिया जाता है:-

(1) जैविक, अजैविक तथा सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण दिया जाता है।

(2) पारिस्थैतिकी पर्यटन (Eco-Tourism) स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध करने में सहायक होती है।

(3) पारिस्थैतिक पर्यटन सतत् विकास की अवधारणा के बढ़ावा देता है।

(4) पर्यटन में स्थानीय लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करता है।

(5) पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव की प्राथमिकता दी जाती है।

(6) इस प्रकार के पर्यटन में भौतिक वस्तुओं के कम से कम प्रयोग को बढ़ावा दिया जाता है।

(7) वनस्पति, जीव-जन्तु एवं विभिन्न प्रकार के भौगोलिक स्थलाकृति पारिस्थैतिक पर्यटन के केन्द्र बिन्दु होता है।

      कुछ देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पारिस्थैतिक पर्यटन विशेष योगदान दिया है। जैसे- कोस्टारिका, इक्वेडोर, मेडागास्कर तथा नेपाल इत्यादि। “पारिस्थैतिक पर्यटन संकल्पना” का उदय 1980 के दशक से माना जाता है। भारत में इस प्रकार के पर्यटन का तेजी से विकास हो रहा है। UNO ने वर्ष 2002 को पारिस्थैतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए “पारिस्थैतिकी पर्यटन अन्तरर्राष्ट्रीय वर्ष” की घोषणा की थी।

    भारत में पारिस्थैतिकी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई स्थानीय पहल किये जा रहे हैं:-

(1) जम्मू-कश्मीर सरकार ने लद्दाख के कई गाँवों में पर्यटकों के लिए स्थानीय घरों में रहने की व्यवस्था की है। इससे जो आमदनी होती है, उससे ग्रामीण विकस और पर्यावरण के संरक्षण पर खर्च की जाती है।

(2) नागालैण्ड में कोहिमा के पास एक स्थानीय संस्था के द्वारा पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास हेतु पर्यटकों को प्रशिक्षण देती है।

(3) केरल के पेरियार बाघ संरक्षित क्षेत्र में वन विभाग के अधिकारियों ने “इको- टूरिज्म योजना” का निर्माण कर लागू की है ताकि लोग नजदीक से बाघों की मुआयना करें तथा पर्यावरण को भी हानि नहीं पहुंचे।

(4) सिक्कीम खनचेनजोंगा जीव मण्डल संरक्षित क्षेत्र में लेवचा समुदाय के लोग “पारिस्थैतिकी पर्यटन समिति” चला रहे हैं जो लोगों के प्राकृ‌तिक वातावरण में प्रकृति के साथ रहने के लिए प्रेरित करते हैं।

(5) पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन के डेल्टा पर अवस्थित कुछ गाँव के लोगों में ने “वन्य जीव संरक्षण समाज” की स्थापना की है। यह समाज पारिस्थैतिक पर्यटन की दिशा में सराहनीय कार्य कर रही है।

(6) सरकार विज्ञापनों के मध्यम से पारिस्थैतिक पर्यटन के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ विज्ञापनों से देती है।

(7) राष्ट्रीय जैविक उद्यान, जैवमंडल, अभ्यारण, सफारी इत्यादि निर्माण का एक ओर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के इन घटकों को बचाने के लिए भी कई प्रयास किये जा रहे हैं। जैसे- पर्यटक स्थलों पर प्लास्टिक वस्तुओं के प्रयोग पर रोक, बैटरी चालित वाहनों का प्रयोग, कचड़ा प्रबंधन केन्द्रों की स्थापना की जा रही है।

पारिस्थैतिक पर्यटन का प्रभाव

     पारिस्थैतिक पर्यटन के कारण दो प्रकार के प्रभाव देखे जा सकते हैं।

(A) सकारात्मक प्रभाव:-

(1) पारिस्थैतिक के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है।

(2) पारिस्थैतिक तत्वों का संरक्षण एवं उनका विकास हो रहा है।

(B) नकारात्मक प्रभाव:-

(1) ऐसे पर्यटन से पारिस्थैतिक तत्वों का व्यापारीकरण होने लगा है जिसके कारण स्थानीय लोगों के विस्थापन और मौलिक अधिकारों के हनन को बढ़ावा मिला है।

(2) पारिस्थैतिक पर्यटन नीतियों का निर्धारण तो ठीक से करती हैं लेकिन, उसे  धरातल पर आदर्श रूप में लागू नहीं कर पाती है जिसके कारण पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़‌ता है।

(3) पारिस्थैतिक केन्द्रों को अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से विभिन्न प्रकार के प्रदुषण की समस्या भी जन्म ले रही है।

(4) पारिस्थैतिक पर्यटन का बूरा प्रभाव जीव-जगत पर पड़ रहा है। जैसे- पशुओं को देखने के लिए, अनका चित्र उतारने के लिए उनसे छेड़-छाड़ करते हैं।

(5) पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास से अछूते एवं अप्रयुक्त जंगली, पहाड़ी भूमि का अतिक्रमण होने लगा है।

(6) इस तरह के पर्यटन से याता‌यात साधनों बेहताशा वृद्धि होती है जिसका स्पष्ट प्रभाव जैविक विविधता पर पड़‌ती है।

(7) जंगली जानवरों के व्यापार तथा तस्करी को बढ़ावा मिलता है।

(8) स्थानीय संस्कृति खतरे में पड़ जाती है।

(9) स्थानीय लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(10) पर्यटन स्थलों का सही तरीके से प्रबंधन न होने पर कई प्रकार के सामजिक और आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती है।

निष्कर्ष:

       इस तरह ऊपर के तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पारिस्थैतिक पर्यटन का उद्देश्य भले ही सकारात्मक है लेकिन, इसके कई नकारात्मक प्रभाव पड़े है। अत: इन नकारात्मक समस्याओं से निपटने हेतु ऐसी योजना और रणनीति की आवश्यकता है जो सतत् विकास (पर्यावरण को बिना हानि पहुँचाये) की अवधारणा को आदर्श रूप में लागू क सके। यह उद्देश्य तभी हासिल हो सकेगा जब पारिस्थैतिक पर्यटन में स्थानीय सहभागिता को बढ़ाया जाएगा। प्रशिक्षित गाइड को उतारा जाएगा एवं पर्यावरण संक्षण कार्यक्रमों को भली- भाँति लागू किया जायेगा।

8. Liberalization (उदारीकरण)

Liberalization

(उदारीकरण)



      भारत द्वारा वर्ष 1991 ई० में आर्थिक सुधार नीति के तहत उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्विकरण की नीति को अपनाया गया था। उदारीकरण की नीति मुख्यतः उद्योगों से जुड़े हुए थे। 1991 ई० के औद्योगिक नीति का मुख्य उद्देश्य दो थे-

(4) भारत का तेजी से आर्थिक विकास करना।

(2) अर्थव्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के योग्य बनाना।

    जब 1995 में WTO की स्थापना हुई तो भारतीय उदारीकरण को विशेष बल प्राप्त हुआ। भारत के द्वारा अपनायी गयी उदारीकरण की प्रक्रिया की मुख्य विशेषता निम्नलिखित हैं:-

(1) 1991 के औद्योगिक नीति में घोषणा की गई थी कि औद्योगिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोला जायेगा।

उद्योगों में सरकार का प्रशासनिक हस्तक्षेप कम होगा और देश में प्रतिस्पर्द्धात्मक महौल बनाया जायेगा। इसी घोषणा का पालन करते हुए उदारीकरण के नीति को अपनाया गया।

(2) उदारीकरण नीति को अपनाते हुए सरकार ने सभी उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया लेकिन तीन उद्योगों के आरक्षित उद्योग घोषित किया। जैसे- नाभिकीय ऊर्जा, रेल तथा अन्तरिक्ष।

(3) उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया।

(4) प्रतिबंधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1991 में सुधार लाकर विदेशों से पूंजी लाने की सीमा को समाप्त कर दिया गया तथा देशी कंपनियों के अधिग्रहण तथा समावेशन पर से प्रतिबंध हटा दिये गये।

(5) आयात एवं निर्यात से जुड़े हुए प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया गया।

(6) विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया।

(7) सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश की प्रक्रिया प्रारंभ की गई।

(8) कृषि को उद्योग का दर्जा देते हुए देश में संगठित कृषि तथा ठेका कृषि की शुरुआत की गई।

(9) श्रम कानून और कर संरचना में सुधार लाया गया।

उदारीकरण के प्रभाव

     उदारीकरण की उपयुक्त विशेषताओं के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर चतुर्दिक प्रभाव पड़ा है। प्रभाव को लेकर अर्थशास्त्रियों के मध्य दो तरह के विचार है:-

      प्रथम विचार इसका समर्थन करता है और दूसरा विचार इसका विरोध करता है। फिर भी, उदारीकरण के प्रभाव को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है-

(1) प्रत्याक्ष विदेशी निवेश में तेजी से वृद्धि हुई है। इसका अनुमान बढ़ते हुए विदेशी मुद्रा भण्डार से लगाया जा सकता है।

(2) अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि का अनुमान बढ़ते हुए शेयर बाजार के सूचकांक से लगाया जा सकता है।

(3) सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि 1990-91 ई० में GDP का विकास दर 4% था जो 2023-24 में बढकर 8.2% हो गई।

(4) मंदी का कम प्रभाव-

     पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है फिर भी, भारत की अर्थव्यवस्था का विकास  7.5% दर से हो रहा है।

(5) रोजगार में वृद्धि-

     उदारीकरण नीति के कारण देश में शिक्षित एवं अशिक्षित लोगों को नए-2 रोजगार के अवसर प्रदान हो रहे हैं।

(6) आधारभूत संरचना का विकास-

     देशी एवं विदेशी निवेश के कारण आधारभूत संरचनाओं का विकास तेजी से हो रहा है।

(7) प्रादेशिक असंतुलन में वृद्धि-

      देश का आर्थिक विकास तेजी से हो रहा है लेकिन, विकसित क्षेत्र और विकसित होने जा रहे हैं तथा पिछड़े क्षेत्र और पिछड़ते जा रहे हैं।

(8) कुटीर एवं लघु उद्योगों पर बूरा प्रभाव पड़ रहा है।

(9) मंहगाई पर नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रही है।

(10) विदेशों से उच्च तकनीक एवं आगमन बड़े पैमाने पर हो रहा है।

(11) आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता में कमी आई है।

(12) कृषि क्षेत्र की उपेक्षा अभी जारी है।

(13) संगठित कृषि, ठेका कृषि और SEZ के कारण लगातार विवाद बढ़ते जा रहे है।

निष्कर्ष:

     इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि उदारीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ रहे हैं फिर भी, सकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील एवं प्रतिस्पर्द्धात्मक स्वरूप प्रदान कने में सक्षम हो रही है।

7. Nano Technology (नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)

Nano Technology

(नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)



प्रश्न प्रारूप

Q. नैनो टेक्नोलॉजी से आप क्या समझते है? उसके संभावित उद्योग पर विस्तार से चर्चा करें या प्रकाश डालें।

उत्तर- नैनो टेक्नोलॉजी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1974 ई० में जापानी विद्वान नोरियो तनीगुची ने किया था। लेकिन यह शब्द 1980 के आस-पास काफी लोकप्रिय हुआ। इस शब्दों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय एरिक ड्रेक्सलर को जाता है। क्योंकि डेक्सलर महोदय ने “इंजन ऑफ क्रिएशन नामक पुस्तक में ‘नैनो टेक’ शब्द का प्रयोग किया और कई संभावित एवं काल्पनिक उपयोग पर प्रकाश डाला।

        ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ शब्द दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- नैनो और द्वितीय- टेक्नोलॉजी। नैनो एक ग्रीक शब्द है जिसका तात्पर्य बौना होता है। यहाँ पर नैनो शब्द नैनो मीटर (10-9 मी०) का संक्षिप्त भाग है। किसी भी एक इकाई (जैसे- 1m या 1 sec या 1g) का अरबवाँ हिस्सा ‘नैनो मीटर’ या नैनो सकेण्ड या ‘नैनो ग्राम’ कहलाता है। दूसरी ओर टेक्नोलोजी का तात्पर्य उस तकनीक या प्रौद्योगिकी से है, जिसके माध्यम से नवीन भौतिक उत्पादों को जन्म दिया जाता है।

       अतः नैनो टेननोलॉजी का तात्पर्य उस तकनीक से है जिसके माध्यम से हम नैनो स्तर के भौतिक उत्पादों का निर्माण कर सकते हैं। विश्व की सबसे प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका (Science) ने नैनो टेक्नोलोजी को वर्ष 2001 का तथा 21वीं शताब्दी की सबसे बड़ा उपलब्धि माना है।

      वैज्ञानिकों के द्वारा नैनो स्तर पर ही सूक्ष्म निर्माण की दिशा में प्रयोग करने का कारण यह है कि जब स्कूल स्तर से सूक्ष्म स्तर की ओर जाते हैं तो पदार्थों के विशेषताओं में एक खास स्तर तक कोई परिवर्तन नहीं होता है लेकिन एक नियत स्तर के बाद गुणों में परिवर्तन होने लगता है। यह स्तर है- नैनो इकाई (10-9 इकाई)।

        दूसरे शब्दों में परमाणु का औसत का स्तर 10-9 मी० होता है। अतः कोई भी स्थूल पदार्थ जब परमाण्विक स्तर पर (10-9 मी०) अते हैं तो उनके गुण धर्म में परिवर्तन होने लगता है। इसी स्तर को मानकर किया जा रहा शोध एवं अनुसंधान कार्यों से संबंधित प्रक्रिया, निर्मित उत्पाद इत्यादि को नैनो टेक्नोलॉजी कहा जाता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के विकास होने से कई प्रकार के संभावित उपयोग किये जाने की संभावना है। जैसे-

(1) नैनो टेक्नोलोजी के प्रयोग के द्वारा विभिन्न यौगिक के बंधन संरचना को बदलकर और उन्हें आपस में मिलाकर एक नये पदार्थ का निर्माण किया जा सकता है। जैसे- प्रयोगशाला में कोयला को हीरे में परिवर्तन किया जा सकता है। इसी तरह हवा, धूल, और पानी के अणुओं को दुबारा समायोजन करके फुल, फल इत्यादि बनाया जा सकता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से दुनिया भर के लोगों को स्वस्थ्य, शिक्षित और प्रदूषण रहित वातावरण प्रदान किया जा सकता है। इसका समुचित विकास हो जाने पर टिकाऊ विकास, सुरक्षित तथा कुशल उत्पादों का निर्माण, दूर संचार, परिवहन, दवा, कृषि तथा उद्योगों हेतु किया जा सकता है। यह तकनीक उन सारे चीजों को संभव बना सकता है जो अभी कल्पना के स्तर पर है।

        जैसे- नैनो टेक्नोलोजी और बायोटेक्नोलोजी के संयोग से मानव को विलुप्त किया जा सकता है। गंतव्य स्थान पर कुछ सेकेण्ड में भेजा जा सकता है तथा उन्हें पुनः प्रकट किया जा सकता है। इच्छा के अनुसार किसी भी वस्तु के आकार को बदला जा सकता है तथा कम लागत में अच्छे गुणो वाले उत्पादों के निर्माण किया जा सकता है।

     वर्तमान समय में विश्व के अलग-2 देशों में नैनो टेक्नोलॉजी पर अनुसंधान का कार्य चल रहा है। यह टेक्नोलॉजी जहाँ एक ओर विकास की नवीन द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी ओर संभावित खतरे उत्पन्न करेंगे। जैसे- अगर किसी भी पदार्थ के कण को नैनो स्तर (109 मी०) पर विभाजित किया जाता है तो उसे पुनः विभक्त कर और नष्ट नहीं कि जा सकता है।

      नैनो कण मानव के शरीर में सांस के जरिये, गले के जरिये, त्वचा एवं इंजेक्शन के जरिये शरीर के कोशिका में पहुंचकर अनेक प्रकार के बीमारियाँ उत्पन्न कर सकती है। ये कण किसी जीव के अन्दर पहुंचकर किस तरह का व्यवहार करेंगें? यह अभी अज्ञात है।

        ये कण शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर सकते हैं। शरीर में इन्जाइम, प्रोटीन और DNA के निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण स्वरूप वैज्ञानिकों ने कार्बन पर आधारित एक कार्बन नैनो ट्यूब का निर्माण किया है। इसमें कार्बन-60 नामक समस्थानिक का प्रयोग किया गया है। यह समस्थानिक काफी रेडियो सक्रिय होता है। अगर कहीं पर कार्बन ट्यूब का प्रयोग किया जाता है तो वह उत्पाद रेडियो सक्रियता से कैसे बच सकता है।

     नैनो टेक्नोलॉजी से कई प्रकार के पर्यावरणीय संबंधी खतरे उत्पन्न हो सकते है। जैसे- पर्यावरण में नैनो पार्टिकिल के माध्यम/मौजूदगी से वायु, जल, अंतरीक्ष, मृदा इत्यादि प्रदूषित हो सकते हैं।

उपलब्धि

(1) कार्बन नैनो ट्यूबश (CNTs):-

     नैनो तकनीक से विकसित किया गया यह एक ऐसा निर्वात नली है जो शीशे के बजाए कार्बन अणुओं से बनी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन के अणु काफी अभिक्रियाशील होते हैं। वे दूसरे पदार्थों के सम्पर्क में आकर उनके साथ किसी तरह के प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। अतः कार्बन ट्यूब का प्रयोग आदर्श कन्टेनर के रूप में किया जा सकता है। इनमें कोई पदार्थ भरकर इन्हें शीलबन्द कि जा सकता और उन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है।

      CNTs को जोड़‌कर तार जैसी संरचना बनायी जा सकती है और कई पदार्थों का आसानी से परिवहन किया जा सकता है। शरीर के अन्दर किसी विशेष जगह पर केन्सर की दवा नैनो ट्यूबश के माध्यम से आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद अल्ट्रा वॉयलेट तरंग के जरिये उन नलिकाओं को तोड़‌कर दवा को सही स्थान पर फैलाया जा सकता है।

(2) प्रकाश अथवा कण माधारित पैनी टेक्नोलोजी:-

     यह ज्ञात है कि प्रकाश कण और तरंग दोनों की तरह व्यवहार करते हैं। अगर इस टेक्नोलॉजी की विकास हो जाता है तो इसके जरिये बिना तार के इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान संभव हो जायेगा। परमाणु के प्रत्येक इलेक्ट्रॉन को अपनी इच्छानुसार तोड़ा-मड़ोड़ा जा सकता है।

(3) नैनों क्रिस्टल:-

     ध्वनि तरंगों के साथ नैनो कण प्रतिक्रिया करना प्रारंभ कर देगी। नैनो- क्रिस्टल किसी दृश्यमान स्रोत को रंग बदलकर विलुप्त कर देगी। नैनो क्रिस्टल का प्रयोग गाड़ियों के विभिन्न पार्ट्स बनाने में किया जा सकेगा। इससे ऑटोमोबाइल क्षेत्र में नवीन क्रान्ति का युग प्रारंभ होने वाला है।

(4) DNA कम्प्यूटिंग:-

     DNA नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से किसी भी जीव के DNA में मनचाहा परिवर्तन करके नये-2 जीवों में विकास किया जा सकता है।

(5) क्वांटम नैनो टेक्नोलॉजी:-

      नैनो टेक्नोलॉजी वस्तुततः क्वांटम टेक्नोलॉजी ही है। इसके माध्यम से परमाणु के इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का नियंत्रण संभव हो जायेगा। इसी तरह से रेडिकल नैनो टेक्नोलॉजी, आण्विक नैनो टेक्नोलॉजी इत्यादि का भी विकास किया जा रहा है।

     विश्व के अलग-2 देशों में नैनो- टेक्नोलॉजी पर इसके संभावना को देखते हुए कई तरह के कार्यक्रम चल रहें है। भारत में इस पर अनुसंधान हैदराबाद तथा बंगलोर में किया जा रहा है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि नैनो टेक्नोलॉजी भविष्य में जहाँ कई संभावित द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी और कई विसंगतियों को जन्म देगा। अतः इस तकनीक को सावधानी पूर्वक विकसित करने की आवश्यकता है।

6. Export Processing Zone (निर्यात संवर्धन क्षेत्र)- EPZ

Export Processing Zone

(निर्यात संवर्धन क्षेत्र-EPZ)



       विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात हेतु “निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र” का विकास किया गया है। EPZ की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य देश से निर्यातित वस्तुओं के लिए उपयुक्त वातवरण उत्पन्न करना है ताकि वे अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपना स्थान बना सके। EPZ स्थापना की संकल्पना चीन से ली गई है। निर्यात संवर्धन क्षेत्र 1981 ई० में निर्यातों उन्मुख योजना के रूप में शुरू की गई थी। आगे चलकर निर्यातों उन्नमुख इकाई योजना को निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र के रूप में बदला गया और पुनः निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र को आगे चलकर विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में बदलने की योजना है।

    EPZs के अन्तर्गत कई विशिष्ट सुविधाएँ और मानदण्डों को अपनाया गया है जैसे:-

(1) EPZ वाले क्षेत्र में सरकार के द्वारा निर्धारित मानदण्ड के अनुरूप ही उत्पादन का कार्य किया जा सकता है।
(2) उत्पादन हेतु कच्चे माल आप देशी एवं विदेशी दोनों स्रोतों से मंगाकर उपयोग कर सकते हैं।

(3) निर्यात के लिए बंदरगाह की सुविधा दी जाती है।

(4) परियोजनाओं के लिए बड़े-2 भूखण्ड सरकार उपलब्ध करवाती है ताकि वैसे स्थानों पर आधारभूत औद्योगिक ढाँचा खड़ा किया जा सके।

(5) EPZs में दक्ष व्यक्ति उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाता है।

(6) EPZs में निर्यातों-उन्मुख उत्पादन का कार्य किया जाता है।

       निर्यातोंन्मुख उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों के सह‌योग से अगस्त 1994 ई० में EPZs और Export Promotion/Processing Industrial Park (EPIP) योजना प्रारंभ की। ऐसी सुविधाओं के विकास हेतु राज्य सरकार को केन्द्र सरकार 75% अनुदान देती है वशर्ते उसका लागत 10 करोड़ रुपया से अधिक न हो।

     भारत में अब तक 8 EPZs की  स्थापना हो चुकी है। जैसे-

(1) कांडला- गुजरात

(2) सूरत- गुजरात 

(3) सान्ताक्रुज- मुम्बई

(4) कोची- केरल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(7) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(8) विशाखापत्तनम- आन्ध्रप्रदेश

      निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र का निर्माण निर्यात प्रोत्साहन हेतु एक प्रभावी घटक के रूप में स्थापित किया गया था। लेकिन निर्यात के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी। भारत का योगदान निर्यात क्षेत्र में लगातार घटता ही जा रहा है। जैसे- भारत सरकार के द्वारा जारी जून 2009 के आँकड़े बताते हैं कि निर्यात में 11% से अधिक की कमी आ चुकी है। EPZ निर्यात के लिए प्रभावी घटक नहीं बन सका। क्योंकि-

(1) EPZs के विविध प्रकार के नियंत्रणों और अनुमतियों के दौर से गुजरना पड़ता है।

(2) EPZs में अभी तक विश्व स्तरीय आधारभूत ढाँचा का विकास नहीं किया जा सका है।

(3) अस्थिर वित्तीय व्यवस्था से भी प्रभावित होते रहे हैं।

       उपरोक्त सीमाओं के बावजूद निर्यात को बढ़ावा देने के दिशा में उठाया गया एक सकरात्मक कदम था। आज चीन जैसा साम्यवादी देश EPZ का प्रयोग कर निर्यात को बढ़ावा दे सकता है तो भारत भी ऐसा क्यों नहीं कर सकता है?

नोट: वर्तमान में सभी आठ निर्यात संवर्द्धन/प्रसंस्करण क्षेत्र (ईपीजेड) कांडला तथा सूरत (गुजरात), सांताक्रूज (महाराष्ट्र), कोची (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), फाल्टा (पश्चिम बंगाल) और नोएडा (उत्तर प्रदेश) में स्थित हैं, को विशेष आर्थिक क्षेत्रों में परिवर्तित क दिया गया है।

Export Processing Zone

5. Trade Balance and Trade Policy (व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)

Trade Balance and Trade Policy

(व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)



      उत्पादों का उत्पादनकर्ताओं के द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की प्रक्रिया को व्यापार कहते हैं। व्यापार तृतीय क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। व्यापार का कार्य स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर सम्पन्न होते हैं। मोटे तौर पर व्यापार को दो भागों में बाँटते है।:-

(1) देशी व्यापार और

(2) विदेशी व्यापार।

       जब कोई उत्पाद विदेशों में भेजा जाता है तो उसे निर्यात कहते हैं और जब विदेशों से कोई वस्तु/उत्पाद देश में मंगायी जाती है तो उसे आयात कहते हैं। आयात एवं निर्यात के रूप में उत्पाद किसी वस्तु या सेवा के रूप में हो सकता है। आयात और निर्यात से संबंधित सभी आँकड़े बंदरगाहों एवं एयरपोर्ट पर रिकॉर्ड किये जाते हैं और उसका मौद्रिक मूल्य में तब्दील किये जाते हैं।

      व्यापार में प्रयुक्त होने वाले वस्तु जो हमें दिखाई देते हैं उन्हें दृश्य वस्तु कहते हैं। वस्तुओं को छोड़‌कर सेवा क्षेत्र जो कि हमें दिखाई नहीं देते हैं उसे अदृश्य मद कहते हैं। जब किसी देश के निर्यात और आयात की मौद्रिक मूल्य बराबार होता है तो उसे व्यापार संतुलन कहते हैं। जब निर्यात अधिक और आयात कम होता है तो उसे अनुकूल व्यापार कहते है। इसी तरह निर्यात कम हो और आयात ज्यादा हो तो उसे प्रतिकूल व्यापार कहते हैं।

     आजादी के पूर्व भारत में अनुकूल व्यापार की स्थिति थी जबकि आजादी के बाद से प्रतिकूल व्यापार की स्थिति रही है। संतुलित व्यापार एक आदर्श स्थिति है जिसे सभी राष्ट्र प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नीचे के तालिका में विदेशी व्यापार से संबंधित आँकड़े प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जैसे:-

वर्ष निर्यात (करोड़ रू० में) आयात (करोड़ रू० में) कुल व्यापार (करोड़ रू० में) व्यापार घाटा (करोड़ रू० में)
1950-51 606 608 1214 -2
1960-61 642 1122 1764 -480
1970-71 1535 1634 3169 -99
1980-81 6710 12549 19259 -99
1990-91 32558 43193 75751 -10635
2000-01 203571 230873 434444 -27302
2005-06 45798 630527 1085444 -175727

स्रोत- योजना 2008, जून-जुलाई

     ऊपर के तालिका से स्पष्ट है कि भारत में आजादी के बाद से कभी भी व्यापार संतुलन की स्थिति नहीं रही है। भारत सरकार व्यापार संतुलन की स्थिति प्राप्त करने के लिए समय-समय पर कई उपाय करती रही है। जैसे-

(1) मुद्रा का अवमूल्यन,

(2) मुद्रा के विनिमय पर नियंत्रण,

(3) मुद्रा के संकुचन एवं विस्तार,

(4) राजकोषीय घाटे से कम करना,

(5) निर्यात को बढ़ावा देने हेतु EPZ और SEZ की स्थापना,

(6) आयात पर नियंत्रण,

(7) पर्यटन का विकास,

(8) विदेशी ऋण एवं सहायता लेना,

(9) समय-2 प व्यापार नीति की घोषणा।

व्यापार नीति

    भारतीय व्यापार विभिन्न प्रकार के अधिनियमों एवं नियमों के द्वारा निर्देशित होता है। भारत सरकार के पहली आयात-निर्यात नीति (Exim Policy/Trade Policy) अर्थात् एक्जिम नीति तत्कालीन वाणिज्य मंत्री श्री वी.पी. सिंह ने 12 अप्रैल, 1985 को घोषणा की। इस नीति की तीन प्रमुख विशेषता थी-

(1) औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भारतीय उद्योगों की कच्चे माल, उच्च तकनीकी, यंत्रों एवं पूँजी तक पहुँच सुनिश्चित करना था।

(2) उद्योगों के आधुनिकीकरण एवं तकनीकी संवर्धन को बढ़ावा देना।

(3) भारतीय उद्योगों को उत्तरोत्तर (लगातार) अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बनाना।

      वर्तमान समय में 31 अगस्त 2004 को घोषित आयात-निर्यात नीति के तहत विदेशी व्यापार संचालित हो रहा है। भारत सरकार भारत को विश्व स्तर पर एक प्रमुख निर्यातक देश के रूप में स्थापित करना चाहती है। अत: 2004 की व्यापार नीति में व्यापक दृष्टिकोण समाहित करते हुए “पंचवर्षीय (2004-09) नीति” की घोषणा की थी। इस नीति के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित थे-

(1) अगले 5 वर्षों में वस्तुगत व्यापार को बढ़ाकर दुगुना करना है।

(2) विदेशी व्यापार को आर्थिक विकास और रोजगार सृजन का प्रभावी हाथियार बनाया जायेगा।

(3) उपरोक्त उद्देश्यों के पूर्ति हेतु निमलिखित रणनीति पर कार्य की जायेगी-

(ⅰ) विभिन्न प्रकार के नियंत्रणों को समाप्त कर उद्योगपतियों और व्यापारियों की आन्तरिक उद्यमशीलता को प्रोत्साहित किया जायेगा।

(ii) विदेशी व्यापार से जुड़े सभी कार्यों को सरलीकृत किया जायेगा।

(iii) निर्यात लागत को कम किया जायेगा।

(iv) भारत को विनिर्माण, व्यापार और सेवाओं का वैश्विक केंद्र बनाया जयेगा।

(v) वैसे क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जायेगा जो ग्रामीण एवं अर्द्धनगरीय क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा दे सकेंगें।

(vii) देश के व्यापार को विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्द्धी बनाया जायेगा।

(viii) तकनीक, पूँजी और आधुनिक यंत्रों के आयात को बढ़ावा दिया जायेगा।

(ix) घरेलू व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न देशों से मुक्त व्यापार समझौता एवं अधिमान्य व्यापार समझौता के द्वारा व्यापार घाटा पाटने का प्रयास होगा।

(x) व्यापार बोर्ड की भूमिका को पुनः परिभाषित की जायेगी।

(xi) देश की निर्यात रणनीति के निष्पादन में भारतीय दूतावासों की भूमिका सुनिश्चित की जायेगी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यमों का अधिक से अधिक प्रयोग किया जा सकेगा।

     ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में घोषित व्यापार नीति में कई उल्लेखनीय तथ्यों को शामिल किया गया है। वर्तमान समय में इन नीतियों का व्यापार पर सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके पीछे मंदी का दौर/आर्थिक मंदी को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है। मंदी समाप्त होते ही भारतीय व्यापार पर इसका सारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

41. Applied Geography (व्यावहारिक भूगोल)

 Applied Geography

(व्यावहारिक भूगोल)



प्रश्न प्रारूप

Q. व्यवहारिक भूगोल पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Applied Geography.)    

उत्तर- समाज में भौगोलिक ज्ञान को व्यवहार में प्रयुक्त कर समस्याओं का समाधान करना व्यावहारिक भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है। बहुत समय तक भूगोलवेत्ता खनिज-उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन संबन्धी अध्ययनों में व्यस्त रहे। वे समाज कल्याण और सामाजिक-न्याय जैसी महत्त्वपूर्ण समस्याओं की ओर से आँखें मूंदे रहे।

    व्यावहारिक भूगोलवेत्ताओं का तर्क विषय में शोध कार्य के प्रति था विशिष्ट को उजागर बनाना, और अध्यापन का भी जोर मानव व प्रकृति के बीच सामंजस्य की ओर था, न कि विषय में विद्वता हासिल करना।

    व्यावहारिक भूगोल आर्थिक संपन्नता पर नहीं, सामाजिक दृष्टि से स्वास्थ्यप्रद विकास में विश्वास व्यक्त करता है। वह कार्यक्षमता और निपुणता के स्थान पर समानता पर और साज-समान की मात्रात्मक बढ़ोतरी के स्थान पर जीवन की गुणवत्ता पर ध्यानाकर्षित कराने वाला विषय है।

    व्यावहारिक भूगोल के बारे में पहली बार विस्तृत व्याख्या डडले स्टाम्प ने 1960 में प्रस्तुत किया। वह भूगोलवेत्ता का अनूठा योग मानव और वातावरण के बीचे ‘समस्तता’ का दृष्टिकोण (Holistic Approach) विकसित कराना जानता था। इस प्रकार का दृष्टिकोण विकसित बनाने में भौगोलिक सोपानों में मुख्य पद हैं-

(i) क्षेत्र का प्रेक्षण, अवलोकन कार्य, और

(ii) वस्तुनिष्ठता से व्यवस्थित तथ्यों का संकलन।

   अर्थात संग्रहीत आंकड़ों व सूचनाओं को मानचित्र में अंकित कर वैज्ञानिक रूप से उनका अध्ययन करना। यह निवर्चन-अध्ययन विश्व की महत्त्वपूर्ण समस्याओं के अवबोध के लिए आवश्यक है। इससे भूमि पर जनसंख्या का दबाव जैसी समस्या, आर्थिक विकास, रहन-सहन संबन्धी स्तर में असमानताएँ और प्रादेशिक नियोजन के बारे में यथार्थ स्थिति प्रकट बनती हैं।

   स्वयं डडले स्टाम्प ने ग्रेट ब्रिटेन का भू-उपयोग सर्वे कार्य कर Land of Britain: Its Use and Misuse पुस्तक प्रकाशित की जो Applied Geography में मील का पत्थर साबित हुई।

  डडले स्टाम्प के इस प्रयास ने अनेक भूगोलवेत्ताओं को केन्द्रीय व स्थानीय निकायों में नियोजन-अधिकारी पद पर आसीन बनाने हेतु सक्षम बनाया। 

    युद्धकाल में भी अनेक लोगों को राष्ट्रीय सरकारी कार्यालयों और सैन्य-कौशल व खुफिया विभागों में रोज़गार मिला। वायव्य मानचित्रों के निवर्चन और दूर-संवेदन एजेन्सी में भी भूगोल के ज्ञाताओं को प्रशिक्षित बनाने की नींव पड़ी। ये विधियाँ आजकल भूगोल में अति महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर गयी हैं। सर्वे कार्य और मानचित्रण क्रिया के ये महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं।

    1960 के उपरान्त भूगोल की तकनीक और अभिगमों में विकास आया। मात्रात्मक क्रांति से परिवर्तन आए और तदुपरान्त भौगोलिक सूचना-तंत्र (Geographic Information System- GIS) ने व्यावहारिक भूगोल के योगदान की दिशा में वृद्धि की। इससे अनेक सरकारी व गैर सरकारी सेक्टर में लोगों को रोज़गार मिला।

    भूगोलवेत्ताओं का ध्यान वातावरणीय आपदाओं और पुनर्वास जैसी गंभीर समस्याओं की ओर आकर्षित किया। सन् 1981 में Journal of Applied Geography की स्थापना हुई। Coppock ने अब भूगोल के अन्तर्गत ‘सार्वजनिक नीति’ (Public Policy) को स्थान दिया। विषय में बाजारी-कौशल (Marketable Skills) में वृद्धि व विकास हेतु व्यावहारिक भूगोल के विद्वानों ने GIS तथा दूरस्थ संवेदन तकनीक के भरपूर उपयोग पर जोर दिया।

    यूरोपीय देशों की तुलना में इस दिशा में उत्तरी अमेरिका आगे था जहाँ भूगोल ने विश्वविद्यालयों के बाहर आकर समाज की संस्थाओं, कार्यालयों में उपयोगी योगदान दिया। इसमें The Association of American Geographers का योगदान सक्रिय था जिसके अधीन व्यावहारिक भूगोल का विशेष दल संगठित था।

    व्यापारिक निजी फर्मों के अन्तर्गत अनेक निविदाएं भूगोल ज्ञाताओं को मिलने लगीं। पूर्वी यूरोप के समाजवादी व्यवस्था वाले देशों और पूर्ववर्ती USSR में 1950 और 2000 ई. के दौरान व्यावहारिक भूगोल के ज्ञान का सदुपयोग तत्कालीन आर्थिक समस्याओं के हल में और वातावरणीय समस्याओं के निराकरण में पूंजीवादी विश्व की तुलना में अधिक हुआ।

     कतिपय भूगोलवेत्ताओं ने व्यावहारिक भूगोल का विघटन कर उसे संकुचित दायरे में समस्याओं के हल-हेतु प्रयोग किया जैसे-

(i) ‘स्थानिक विश्लेषण’ जो प्रत्यक्षवाद पर आधारित बन GIS द्वारा अवस्थितिक आबंटन की समस्याओं को हल करने पर जोर देता है,

(ii) ‘मानवतावादी भूगोल’ का केन्द्रीय बिन्दु मानव एजेन्सी है और

(iii) आमूल परिवर्तनवादी भूगोल का प्रमुख उद्देश्य लोगों का ध्यान उस समाज के प्रति जाग्रत बनाना था जिसमें वे दिन काट रहे थे, और उससे उन्हें मुक्त कराने हेतु उसकी पुनर्रचना पर जोर है।

    स्टोडार्ट (Stoddart, 1987) ने व्यावहारिक भूगोल की आलोचना करते हुए उसे अत्यन्त तुच्छ व नगण्य प्रश्नों में केन्द्रित कहा है। उसका मत है कि व्यावहारिक भूगोल के स्थान पर भूगोलवेत्ताओं को अपना ध्यान यथार्थ समस्याओं के भूगोल में लगाना चाहिए और मानव-वातावरण से संबन्धित मत्वपूर्ण समस्याओं पर केन्द्रित करना चाहिए।

भूगोल और सार्वजानिक नीति

     भूगोल को विश्वविद्यालयों में स्थान 19वीं सदी के आरम्भिक दशकों से मिलना प्रारम्भ हुआ। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में भूगोल विभागों के अधीन विषय का विकास हुआ। वह अनेक वैचारिक, दार्शनिक एवं पद्धति-विषयक समस्याओं में भी उलझा रहा और विषय सुनिश्चित रूप में कलेवर ग्रहण करने हेतु संघर्षरत बना रहा। भौगोलिक साहित्य, दर्शन एवं विधियों में व्यक्तिगत धारणाएँ एवं राजनीतिक तंत्र, सामाजिक आवश्यकताएँ व क्षेत्रीयता छायी रही। विगत पच्चीस वर्षों की अवधि में वृहत् रूप से भौगोलिक सामग्री रची गयी। गैर-सरकारी और सरकारी संगठनों के लिए तथा अध्ययन-अध्यापन में उपयोगी भूगोल-सामग्री प्रत्यक्ष बनी।

       द्वितीय विश्व युद्ध तक भूगोल मुख्यतः धरातल, प्राकृतिक आकृतियों, मौसम व जलवायु, पर्वतों, नदियों, मार्गों, नगरों व शहरों और बन्दरगाहों विषयक सामान्य सूचनाएँ प्रदान करने का विषय ही समझा जाता था। सामान्य जनता इसे सामान्य ज्ञान कराने का विषय ही मानती थी। परन्तु निकट भूतकाल से भूगोल की नवीन योजना-नीति (New Strategy) उभरी है, और विषय का पुनर्संगठन व पुनर्रचना हुई है।

    भूगोल में नए विषयों को स्थान दिया गया और समाज कल्याण की दष्टि से स्थानीय चेतना जाग्रत बनाने हेतु पर्यावरण, स्थानीय भौगोलिक बोध, प्रदेश-जगत् की गहन जानकारी तथा विश्व वातावरण एवं संबन्धों को अध्ययन हेतु अपनाया गया।

    वातावरण के प्रबन्ध, नियोजन तथा प्रदूषण की समस्याओं के प्रति ध्यानाकर्षण कराकर भूगोल को सार्वजनिक और लोक-हित का विषय बनाने के अथक प्रयास आरम्भ हो गए है।

   लोक-कल्याण के उद्देश्य और निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु भूगोल में सामाजिक पिछड़ेपन और जीवन-स्तर के विभिन्न सोपानों, गरीब एवं बेरोजगारी के संबन्ध में भौगोलिक व्याख्या स्थान प्राप्त करने लगी है। ऐसे भौगोलिक आधार पर प्रस्तुत निवर्चनों से स्थानीय निकायों और राजकीय प्रशासन को लाभ मिला है।

    अन्तर्राज्यीय एवं अंतर्प्रदेशी समस्याएँ न केवल प्रत्यक्ष बनीं, अपितु उनकी यथार्थता का बोध हुआ है। इनके हल के आधार प्रत्यक्ष बने हैं, और प्रादेशिक असमानताएँ व जीवन संबन्धी गुणवत्ता के सुधार में भूगोल का योगदान महत्वपूर्ण बना है। दृश्य-वस्तुओं के पुनर्वितरण की आवश्यकता प्रत्यक्ष बनाने में भौगोलिक स्थानिक विश्लेषण महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

    नौकरी-पेशा और रोजगार की दृष्टि से भूगोल आरम्भ में विकसित देशों में भी केवल अध्यापन का विषय (Teaching Subject) था। तीसरी दुनिया के देशों में तो आजतक भी भूगोल को देश की योजनाओं एवं विकास प्रक्रिया में सक्रिय स्थान नहीं मिला है। शोध-ग्रंथ-भूगोल अभी तक पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाते देखे जा सकते हैं, उनका विकास योजनाओं हेतु सदुपयोग नहीं होता है। दुर्भाग्यवश, विशेषतः भारत में नियोजक-नीति- निर्धारक आज तक भी स्थानिक विमियों (Spatial Dimensions) विषयक समस्याओं से मुख-मोड़े बैठे हैं। उनमें आजतक यही धारणा घर कर बैठी हुई है कि भूगोल सामान्य- ज्ञान कराने मात्र की पूर्ति करने का विषय है, उसका कोई अन्य उपयोग नही है। इसका दोष भूगोलवेत्ताओं का ही है, क्योंकि उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में कोई सार्थक योगदान नहीं दिया, और न ही प्रदेश के स्थानिक संगठन हेतु विकल्प व नीति-निर्धारक तथ्यों को इंगित किया।

      केवल विगत तीन दशकों में विषय की विधि-तंत्र, सोच और प्रसंगों के चयन में परिवर्तन प्रकट हुए भूगोलवेत्ताओं का ध्यान अब प्रधान रूप से गरीबी, भुखमरी, प्रदूषण, प्रजातीय भेदभाव, समाजिक ऊंच-नीच अथवा न्याय, पर्यावरण प्रदूषण और संसाधनों के उपयोग व दुरुपयोग आदि समस्याओं के प्रति जागरूक बना है। इसमें कतिपय उल्लेखनीय कार्यों में Geography of Crimes, Black-Ghetto, और Geography of Social Well-being हैं। यह एक उत्साहवर्द्धक परिवर्तन है कि आजकल विश्व के सभी भागों में नव-शोध की दिशा भूगोल में लोक-प्रशासन से जुड़ी समस्याओं पर आधारित है। सामाजिक समस्याओं के निराकरण हेतु जन-कल्याणकारी (Human Well-being) प्रसंगों में शोध आरम्भ हो चुकी है। असमानताओं की खाई को पाटने की दिशा में मानव भूगोल अब कदम उठा चुकी है। वस्तुतः कल्याणकारी भूगोल का ध्येय अब ऐसी सामाजिकता के विकास की आवश्यकता है जो भौगोलिक विकल्पों द्वारा रची जा सके और जनता की मूल सुविधाओं पर आधारित बने।

     उपयोगितावादियों (Pragmatists) का मत है कि मात्रात्मक क्रांति के वैज्ञानिक विधि-विधानों (प्रत्यक्षवाद) का प्रयोग मानवीय समस्याओं के निराकरण हेतु किया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में David M.Smith ने कल्याणकारी अभिगम के अपनाने पर जोर दिया है। मानव भूगोल का भविष्य ऐसी ही समस्याओं के विश्लेषण में निहित है जो मानव-कल्याण की ओर उन्मुख है।

    कल्याणकारी भूगोल को भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न रूपों से परिभाषित किया। मिशान (Mishan) के अनुसार सैद्धांतिक कल्याणकारी भूगोल अध्ययन की वह शाखा है जो अच्छे-बुरे का निर्णय करने वाले मापक द्वारा उपलब्ध भौगोलिक परिस्थितियों के विकल्पों को श्रेणी दे सके।

    नाथ (Nath) के अनुसार कल्याणकारी भूगोल ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जिसमें समाजकल्याण हेतु विभिन्न भौगोलिक नीतियों को परखा जा सकें। स्मिथ (Smith) ने इसे स्थानिक संदर्भ में परिभाषित करते हुए व्यक्त किया कि- कल्यणकारी भूगोल इसका अध्ययन है- “कौन, क्या, कहाँ और कैसे प्राप्त करता है। 

      तात्पर्य यह है कि कल्याणकारी भूगोल ऐसी भौगोलिक स्थिति अथवा दिशा इंगित करता है जिसमें संसाधनों, आय और जन-कल्याण के अन्य स्रोतों का स्थानिक विनियोजन अथवा आवंटन सम्भव हो सके।

    स्मिथ की व्याख्या का प्रयोग गरीबी एवं अन्य सामाजिक समस्याओं के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों से भी जुड़ा है जैसे उद्योगों के अवस्थितिजन्य प्ररूप जनसंख्या-वितरण, सामाजिक सेवा-सुविधाएँ की अवस्थिति, यातायात-जाल, मानवों व माल की ढुलाई आवागमन-प्ररूप तथा विभिन्न भौगोलिक दशाओं के मध्य जीवन की गुणवत्ता स्थापित करने के प्रयास। इन सभी के तले ऐसी सामाजिक व्यवस्था जो आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक संरचनाओं को उत्पन्न कर सार्वजनिक कल्याण का विकास कर सके।

      कल्याणकारी अभिगम मानव इतिहास के विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न राष्ट्रों व समाजों ने भिन्न स्वरूप में अपनाया। यहूदियों, क्रिस्तानियों, मुसलिमों, कन्फ्यूशियनों, हेलिनीयों, मार्क्सवादियों, यथार्थवादियों, अस्तित्ववादियों आदि ने इस अवधारणा को अपनी-अपनी नीतियों और सामाजिक रीतियों व वातावरण में ही ग्रहण किया।

    मानव-दिशाओं में सुधार और मानव-कल्याण की अनुभाविक पहचान (Empirical Identification) इलाकों के स्तर पर जाना महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसी दिशा में शोध भी करना जरुरी है। परन्तु दुर्भाग्यवश विकासशील देशों में, विशेषतः भारत में इलाकों के स्तर पर (On Territorial Levels) इस दिशा में न तो प्रयास हुए, और न शोधकार्य किए गए हैं। विभिन्न इलाकों के सभी प्रकार के भौगोलिक प्रारूपों को जाँच कर वहाँ अधिकतम लाभ और न्यूनतम लागत के आधार पर ही जनकल्याण की सार्वजनिक नीति अपनायी जाने की आवश्यकता है। कल्याणकारी नुस्खा प्रदेश अथवा राज्य की बदली हुई तस्वीर के लिए विकल्प सिद्ध हो, न कि घिसे-पिटे परम्परागत सुझावों में जकड़ा कोई स्थिर-स्थायी ढाँचा।

    नवीन अथवा विकल्प बने नुस्खे से इसका उत्तर स्पष्टतः मिलना चाहिए कि ‘किसे, क्या, और कहाँ से कितना मिले?’ पहले बनी हुई अवांछनीय दशा में विकल्प के लागू करने के उपरान्त नई-दिशा बेहतर परिणाम दे यह आवश्यक है।

    भूगोलवेत्ता का बदले वातावरण को (गुणकारी और बेहतर) उत्पन्न करने में उसका योगदान और उस रूप में उसकी हैसियत क्या होनी चाहिए, यह निर्णय किया जाना आवश्यक है। किसी क्षेत्र (Space) में विनियोजन अथवा आवंटन की क्षमता का निर्धारण कर और वहाँ के संसाधनों का विश्लेषण और संश्लेषण के आधार पर भूगोलवेत्ता सार्वजनिक नीति-निर्धारण में योगदान दे सकते हैं।

    भारत जैसे विकासशील देशों में घोर रूप में आन्तरिक असमानताएँ व्याप्त हैं। तीसरी दुनिया के देशों में पूंजी और अधिकार शक्ति (Wealth and Power) केवल कुछ ही शहरी लोगों और भूमिधरों के हाथों में केन्द्रित बनी है। दक्षिणी अफ्रीका इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

    भारत में भी आधे से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन-निर्वाह कर रही है, और कुल राष्ट्रीय परिसम्पत्ति (National Assets) का 50 प्रतिशत से भी अधिक भाग केवल दो दर्जन परिवारों के हाथों में सीमित है। यहाँ, यद्यपि गांवों में 70 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, परन्तु अधिकांश आर्थिक क्रिया महानगरी नाभियों (Metropolitan Cores) में संचालित बनी है।

    नगरोन्मुख औद्योगिक एवं सामाजिक पक्षपातपूर्ण नीति हमारे नियोजकों के मस्तिष्क में घर कर चुकी है। इससे शहरी व ग्रामीण जनसंख्या के बीच और अमीर-गरीब के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा व आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भी लोक-कल्याण के स्तरों में स्थानिक अन्तर पाया जाता है। सामान्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका में भौतिक- जीवन का स्तर विश्व के अन्य देशों की तुलना में बहुत ऊँचा है। परन्तु लाखों अमेरिकी, विशेषतः वहाँ के नीग्रो, गरीबी में शहरों की उपेक्षित बस्तियों (Ghettos) में जीवन काट रहे हैं।

     संयुक्त राज्य के दक्षिणी ग्रामीण भागों (टेक्सास, जार्जिया, आदि) में जन-जीवन की दशाएँ उतनी ही बदतर बनी हैं जैसी कि दक्षिणी अफ्रीकी भागों में हैं। वहाँ की नगरी गंदी बस्तियों (Slums) में अपराध, नशाखोरी आदि कुकृत्यों की दर पर्याप्त ऊँची है। यह U.S.A. की पूंजीवादी व्यवस्था और आर्थिक विकास का खोखलापन और असफलता ही है जहाँ लगभग 12 प्रतिशत (2.6 करोड़) लोग संयुक्त राज्य के जनगणना ब्यूरो (U.S. Census Bureau) के अनुसार, अधिकृत निर्धारित गरीबी रेखा की सीमा से नीचे की आय वाले हैं। वस्तुतः यह दयनीय आर्थिक स्थिति इसलिए भी विस्फोटक बनी है क्योंकि नगरी- पक्षपाती और धनिकोन्मुख नीति ने राज्य व समाज को जकड़ रखा है। इससे आर्थिक व सामाजिक असन्तुलन व असमानताएँ उत्पन्न हो रही हैं।

    प्राकृतिक अवरोधों जैसे अकाल, बाढ़, सूखा, तूफान, मरुस्थल आदि वातावरणीय विभीषिकाओं को पूर्णतः मिटाया नहीं जा सकता, हाँ कम कम किया जा सकता है। भूगोलवेत्ताओं का दायित्व ऐसी स्थितियों में और भी अधिक महत्त्वपूर्ण बन उठता है। वह समाज की आवश्यकताओं के अनुसार संसाधनों के संरक्षण और पुन: आबंटन से जीवन की गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं। समानता को चरणबद्ध अर्जित कर लोक कल्याण के लक्ष्य पूर्ति के प्रयास में योगदान दे सकते हैं।

     भूगोलवेत्ता अन्य ज्ञान के विद्वानों की तुलना में वातावरण के प्रबन्धन में अधिक सक्षम सिद्ध हो सकते हैं। वे स्थानिक दृष्टि से समस्याओं को उजागर करने में और स्थानिक रूप से वितरित सूचनाओं व आंकड़ों का विश्लेषण करने में योग्य सिद्ध हो सकते हैं।

    वातावरण के प्रति चेतना और स्थानिक विमीय के अवबोध का अनुभव भूगोलवेत्ता जितना उचित व्याख्या कर सकता, अन्य विशिष्ट विषयों में केन्द्रित विज्ञान नहीं कर सकते। आपूर्ण- स्थानिक वातावरण में भूगोलवेत्ता की पैठ विश्वसनीय होती है क्योंकि वह समस्तता (Wholeness) से जुड़ी होती हैं।

    कल्याणकारी समाज की आवश्यकता आवश्यक वस्तुओं के बेहतर आवंटन, बेहतर वितरण और उत्पादन के साधनों के बेहतर विनियोग में निहित है। इनके द्वारा ही व्यक्तियों, वर्गों में और विभिन्न स्थानों में सुविधाएँ उपलब्ध कराकर लोक- कल्याण की मंजिल तक बढ़ा जा सकता है।

     अनेक देशों में भूगोलवेत्ता अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर लोकनीतियों के निर्धारण में सक्रिय बने हैं। वे संसाधनों के लाभकारी प्रभावों को सभी वर्गों के लोगों तक उपलब्ध बनाने में व्यस्त हैं।

     स्वीडन, नार्वे, नीदरलैण्ड, इजरायल, डेनमार्क, रूस, फ्रांस, न्यूज़ीलैण्ड व आस्ट्रेलिया के देशों में भूगोलवेत्ताओं व अन्य वैज्ञानिकों के मध्य अच्छा तालमेल बना है। इससे नियोजन द्वारा वहाँ मानव और वातावरण के बीच अन्तक्रिया को लोकनीति व कल्याणकारी दिशा में अपनाया गया है। शोध कार्य के उद्देश्य भी सर्वजनहितों के लिए निर्धारित हैं।

     भारत के भूगोलवेत्ता भी निरन्तर वृद्धि प्राप्त क रही जनसंख्या के लिए अनेक सामाजिक व आर्थिक समस्याओं और रोजगार विषयक संकट का सामना व्यावहारिक योजनाओं (Pragmatic Proposals) को अपनाकर हल कर सकते हैं।



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39. Model and Its Types (प्रतिरूप एवं इसके प्रकार)

Model and Its Types

(प्रतिरूप एवं इसके प्रकार)



प्रश्न प्रारूप

Q. प्रतिरूप की परिभाषा दीजिए एवं इसके प्रकार की विवेचना करें।

(Define model and discuss its types.)

उत्तर- भिन्न-भिन्न भूगोलवेत्ताओं ने ‘मॉडल’ को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है।

स्किलिंग के अनुसार “मॉडल एक सिद्धांत, नियम, परिकल्पना अथवा संरचित विचार है। भौगोलिक दृष्टि से इसमें विश्व की यथार्थता के बारे में तर्कसंगत सोच को सम्मिलित कर सकते हैं। यह स्थान व काल के सन्दर्भ में दृश्य-जगत् (प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक) के विषय में सुरचित विचार है। इसे योग, संबंध अथवा समीकरण में व्यक्त करते है।”

अकॉफ के अनुसार “किसी सिद्धांत अथवा नियम को तर्कसंगत उपकरणों, सेट-सिद्धांत और गणित का प्रयोग कर औपचारिक प्रस्तुतीकरण मॉडल कहा जा सकता है”।

हेंस, यंग एवं पेच ने मॉडल का अभिप्राय किसी ऐसी विधि अथवा यांत्रिक उपायों को मॉडल कहा जो पूर्वानुमान उत्पन्न करे। तात्पर्य यह है कि मॉडल रचना एक ऐसी प्रक्रिया है जो सिद्धान्तों का तर्कसंगत ढंग से परीक्षण करती है।

       इस प्रकार भौगोलिक यथार्थ, भू-दृश्य व मानव-प्रकृति संबंध को सरल बनाकर आदर्शों में प्रस्तुतिकरण ही मॉडल कहलाती है।

मॉडल/प्रतिरूप का महत्त्व 

     भूगोल में पृथ्वी एक ऐसा आलेख (डॉक्यूमेंट) है जो मानव संबंधों का अध्ययन कराती है। यह संबंध जटिल बना है, और सरलता से नहीं समझा जा सकता है, क्योंकि पृथ्वी तल पर प्राकृतिक सांस्कृतिक वैविध्य की विषमता का विकास हुआ है। इस विविधता को जो समय व स्थानानुसार परिवर्तनशील बनी है, सरल ढंग से समझने के अनेक साधन हैं।

     मॉडल एक ऐसा साधन है जो पृथ्वी की सतह पर विकसित जटिलताओं को परिकल्पनाओं व सिद्धांतों के परीक्षण द्वारा सरल बनाता है। मॉडल पूर्वानुमान का उपाय है।

भूगोल में मॉडल-रचना की आवश्यकता

      भूगोल में मॉडल-रचना की आवश्यकता के पक्ष में अनेक कारण हैं-

1. भावी अनुमानों, दृश्य-सत्ता के अनुरूपण (Simulation), अन्तर्वेशन (Interpolation), आंकड़ों के प्रजनन व आकलन के लिए मॉडलों का उपयोग लाभदायक है। इनकी सहायता से जनसंख्या के घनत्व और भावी विकास, भूमि-उपयोग व फसली- गहनता, जनसंख्या के प्रवास-प्रारूप, औद्योगीकरण, नगरीकरण, अवांछित बस्तियों का विकास जैसी घटनाएँ सरल ढंग से व्यक्त की जा सकती हैं। ये मौसम की भविष्यवाणी करने, जलवायु परिवर्तन, समुद्रतल के परिवर्तनों, पर्यावरण प्रदूषण, मिट्टी-अपरदन व मिट्टी क्षरण व भूमि की आकृतियों के विकास में भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।

2. मॉडल के द्वारा व्याख्या, विश्लेषण और भौगोलिक तंत्र को सरल ढंग से व्यक्त किया जाता है। उद्योगों संबन्धी अवस्थितिजन्य सिद्धांतों, कृषि भूमि उपयोग के कटिबंधन, प्रवास-प्रारूप व भू-आकारों के विकास के सोपानों के बारे में समझबूझ और इनके पूर्वानुमानों में मॉडल सहायता प्रदान करते हैं।

3. भौगोलिक आंकड़ों की विविधता, विस्तार एवं उनके चयन तथा उनमें सहसंबन्धों की खोज में तथा उनके संगठित व संरचित करने में मॉडल-रचना सहायक क्रिया है।

4. तंत्रों के प्रतिनियुक्त प्रेक्षणों (Surrogate Observations) के लिए ‘विकल्पीय मॉडल’ (Alternative Models) प्रयोग किए जा सकते हैं। इन प्रेक्षणों को जो प्रत्यक्ष रूप में अवलोकित नहीं किए जा सकते व्यक्त करने हेतु विकल्पीय मॉडल रचे जाते हैं।

5. एक तंत्र के प्रधान व गौण लक्षणों को और उनका पर्यावरण के साथ संबन्ध को समझने में मॉडल उपयोगी विधि है।

6. औपचारिक रूप से व्यक्त सैद्धांतिक कथनों की आनुभविक यथार्थता को मॉडल का ढांचा स्पष्ट बनाता है।

7. मॉडल-क्रिया एक प्रकार की सूक्ष्म-भाषा है, इसे भौगोलिक एवं सामाजिक वैज्ञानिक समझते हैं।

8. मॉडलों द्वारा सामान्य एवं विशिष्ट नियमों का निर्माण एवं सिद्धांतों की रचना में सहायता मिलती है।

मॉडल/प्रतिरूप के लक्षण (Feature of a Model)

     मॉडल में मुख्य लक्षण सम्मिलित हैं:-

1. मॉडल विश्व में पृथ्वी की सतह व मानव-पर्यावरण के जटिल संबन्ध की यथार्थता को अथवा विश्व के किसी भाग को व्यक्त करने का साधन है।

2. मॉडलों से कुछ लक्षण अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ गौण-रूप में व्यक्त होते हैं, क्योंकि वह चयन-क्रिया पर आधारित हैं।

3. मॉडलों में सामान्यानुमानों के सुझाव निहित होते हैं। वस्तुतः मॉडल यथार्थ जगत् के पूर्वानुमान ही हैं।

4. मॉडलों को ‘अनुरूपताएँ’ (Analogies) भी कह सकते हैं। ये यथार्थ जगत् से भिन्न परन्तु उसकी मिलती-जुलती तस्वीर हैं।

5. मॉडल परिकल्पनाओं की रचना के लिए हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं।

6. मॉडल यथार्थ जगत् के कुछ ऐसे लक्षणों को सरलरूप में अवगत बनाता है जिससे निष्कर्ष निकाले जा सकें।

7. मॉडल सूचनाओं को परिभाषित करने, संग्रह करने व संरचित बनाने का ढाँचा प्रस्तुत करता है।

8. उपलब्ध आंकड़ों से अधिकतम सूचनाएँ निचोड़ लेने में मॉडल सहायक बनते हैं।

9. कोई विशेष घटना अथवा दृश्य-वस्तु किस भाँति पृथ्वीतल पर स्थित बनी, इसको स्पष्ट करने में मॉडल सहायक हैं।

10. मॉडल समान प्रकार के दृश्य-वस्तुओं के समूहों की तुलना में सहायक हैं।

11. दृश्य-वस्तुओं की विषमताओं के बीच में से इच्छित दृश्य-वस्तु समूह को दृष्टिपात कराने के साधन ‘मॉडल’ हैं।

12. सिद्धांत-रचना व नियम-निरूपण की प्राथमिक सीढ़ी का मॉडल काम करते हैं।

मॉडलों/प्रतिरूपों के प्रकार

        मॉडलों के विभाजन का एक पक्ष उन्हें (1) विवरणात्मक और (2) नियामक में विभक्त करता है।

       विवरणात्मक (Descriptive) मॉडल रीतिबद्ध विवरण द्वारा जगत् की यथार्थता प्रकट करते हैं। नियामक (Normative) मॉडल के द्वारा निश्चित परिस्थितियों अथवा मानी गई दशाओं के अधीन क्या कुछ घटित होना चाहिए, इसे प्रकट किया जाता है।

     विवरणात्मक मॉडल में आनुभविक सूचनाओं को संघटित करते हैं। इसमें आंकड़ों का वैज्ञानिक वर्गीकरण संभव होता है, अतः इन्हें प्रायोगिक डिजायन भी कहते हैं। इसमें अनुमानित परिस्थितियों के आधार पर संरचना होती है। अतः, विवरणात्मक में व्यक्त यथार्थता जगत् की अनुमानित तस्वीर है।

   मॉडलों को आंकड़ों की प्रकृति के आधार पर भौतिक (Hardware), प्राकृतिक अथवा प्रयोगमूलक (Physical or Experimenta) में विभक्त करते हैं। ये मॉडल मूर्तिनुमा (Iconic) हैं, और दृश्य-जगत् के यथार्थ की ज्यों-की-त्यों तस्वीर मापक परिवर्तन पर प्रस्तुत करते हैं। इनमें सार्थक लक्षण यथार्थ-जगत् के ही निहित होते हैं। इनके उदाहरण मानचित्र, ग्लोब और भू-गर्भीय मॉडल हैं। इन्हें भौतिक अथवा प्रयोगमूलक भी कहते हैं।

       मॉडल सादृश्य (Analogue) भी हो सकते हैं जो यथार्थ-जगत् के गुणों से रचे जाते हैं। परन्तु इनकी सादृश्यता यथार्थ जगत् के अनुरूप होते हुए भी, इनकी रचना में भिन्न लक्षणों का प्रयोग करते हैं। इसलिए ये मॉडल अनुकरण-मॉडल (Simulation Model) भी कहलाते हैं। इनका यथार्थ-जगत्-अनुरूपण एक स्वांग अथवा नकल ही होता है। इनको सांकेतिक विधि द्वारा व्यक्त किया जाता है और इन्हें तर्क गणितीय भाषा में भी व्यक्त किए जाते हैं।

मॉडलों/प्रतिरूपों का सामान्य वर्गीकरण (General Classification of Models)

     भौगोलिक भू-दृश्यों और भौगोलिक अवस्थाओं की जटिलता इस प्रकार की है कि भूगोल के अध्ययन में प्रतिरूपों का विशेष महत्त्व है। भूगोलवेत्ताओं द्वारा अनेकों प्रकार के मॉडलों की रचना की जा रही है। अतः, निम्न-परिच्छेदों में इनको सामान्य वर्गों में विभक्त कर स्पष्ट कर सकते हैं-

मापक ‘अनुमाप’ मॉडल (Scale Models)

     इनको ‘हार्डवेयर मॉडल (Hardware Models) भी कहते हैं। वे सरल होते हैं और लघुमापक पर यथार्थता को प्रत्यक्ष रूप में व्यक्त करते हैं। ये ‘स्थिर’ जैसे भूगर्भीय-मॉडल अथवा ‘सक्रिय’ जैसे नदी-अवनालिका (River Flume) आदि जैसे भौतिक गुणों को रीतिबद्ध कर व्यक्त किए जाते हैं। भूगोल में सक्रिय मॉडलों की महत्ता व रोचकता विकसित है। इसमें इनके कारगर-प्रक्रिया का नियंत्रण सम्भव है।

    सक्रिय मॉडल में प्रत्येक चर (Variable) का अध्ययन अलग-अलग कर सकते हैं। किसी तरंग- सरोवर में उसका भौतिक आकार, तरंग-लम्बाई, ढाल शुद्धतः मापी जा सकती है। इस हेतु दो चरों को स्थिर (Constant) बनाकर तीसरे को परिवर्तनीय रखते हैं। इस विधि पर आधारित मॉडल में दोनों स्थितियों से उपलब्ध संबंध-बिन्दु लगभग सीधे रेखा पर अथवा बिखराव (Scatter) में प्रकट होते हैं।

     यदि संबंध लगभग सीधी रेखा पर है तो महत्त्वपूर्ण बना है, अन्यथा बिखराव की स्थिति में न्यून अथवा कोई संबंध व्यक्त नहीं करता।

     ऐसे मॉडलों/प्रतिरूपों में एक दोष यह है कि इनसे स्वाभाविक स्थिति व्यक्त नहीं हो सकती। किसी वृहत् प्रोजेक्ट के बारे में कुछ कहने से पूर्व इंजीनियर उसका अनुमाप-मॉडल तैयार कर परीक्षण करते देखे जाते हैं। इनका प्रयोग अधिकतर भौतिक भूगोल में भू-आकार-वैज्ञानिक द्वारा किया जाता है। वे नदियों की क्रियाओं, हिमानियों की गति, वायु-अपरदन, समुद्री-क्रियाओं व भूगर्भीय-आवरण-क्षय जैसी प्रक्रियाओं को मापक-माडलों – द्वारा अपने शोध कार्यों में प्रयोग करते देखे जाते हैं।

मानचित्र (Maps)

    मानचित्र भी मॉडल हैं। इनका प्रयोग भूगोलवेत्ताओं द्वारा बहुतायत से किया जाता है। ये भी अनुमाप-मॉडल की एक विशेष जाति हैं। इसमें मापक जैसे-जैसे छोटा होता जाता है, इसमें यथार्थता समाप्त होती जाती है।

      परन्तु, सूचनाएँ विस्तृत मात्रा में अंकित होती हैं और यह अमूर्त बनता जाता है। इसके एक सिरे पर अनुलम्ब वायुव्य चित्र (Vertical Air Photograph) हैं जो यथार्थ- जगत् का सही मापक मॉडल प्रदान करते हैं। बड़े मापक पर रचे मानचित्र में यद्यपि सूचनाएँ सीमित दर्शायी जाती है, परन्तु इमारतें, सड़कें व अन्य आकृतियाँ सही-सही प्रकट होती हैं। लघुतर मापक पर सूचनाएँ अधिक सांकेतिक बन जाती है, और मापक भी विकृत हो जाता है। यथार्थ-जगत् के सादृश्य-मॉडल की तुलना में मानचित्रों में क्षेत्रों का विस्तार अधिक प्रकट किया जाता है। इनमें स्थानिक परस्पर संबंधों की जानकारी सम्भव होती है। इन्हें तुलनात्मक स्वरूप में समझ-बूझ सकते हैं, वास्तविक धरातल पर समझना संभव नहीं होता है।

     मानचित्रों का एक बड़ा दोष यह है कि वे क्षेत्र, दूरियों व दिशाओं के दृष्टिकोण से विकृत बने होते हैं। यह विकार इसलिए है कि गोलाभ पृथ्वी की वक्राकार सतह को चौकोर कागज पर उतारा गया है। इसका सही रूप ग्लोब है। परन्तु, ग्लोब भूगोल में उपयोग में कम आ सकता है। बड़े मापक ग्लोब तो अध्ययन कक्ष में समा भी नहीं सकता।

अनुकरण अथवा अनुरूपण और ‘स्टॉ‌क्स्टिक’ मॉडल (Simulation and Stochastie Models)

       किसी स्थिति के व्यवहार का अनुकरण का मॉडल रचने को अनुरूपण (Simulation) कहते हैं। यह अनुरूपण सादृश्य-स्थिति द्वारा अथवा उपकरण की सहायता से किया जा सकता है। स्टॉकस्टिक (Stochastic) से तात्पर्य बेतरतीव निर्धारित सम्भावना (Randomly Determined Probability) है। इसको सांख्यिकीय विधि द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं, परन्तु इसका पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता।

     ये मॉडल गतिशील अथवा परिवर्तनशील स्थितियों को प्रकट करने के लिए विकसित हुए और मानचित्र (जो स्थिर स्थितियों का प्रदर्शन है) से भिन्न होते हैं। इनकी रचना किसी प्रक्रिया के अनुकरण को बेतरतीव चयनों द्वारा की जाती है। इसके घटित होने के अवसर हैं भी, अथवा नहीं भी हैं। जलप्रवाह का प्रारूप कैसा विकसित होगा, यह सम्भावना निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। इन सम्भावनाओं का चयन बेतरतीव ही निर्धारित है। आकस्मिक चयन (Chance-Choice) की पुनरावृत्ति से जल प्रवाह प्रक्रिया का एक पूर्ण जाल प्रकट हो जाता है। यह जाल बहुत कुछ स्वाभाविक प्रवाह प्रारूप (Nature Drainage Pattern) के अनुरूप है।

    बेतरतीव सम्भावित अनुरूपण मानव भूगोल में भी सफलता पूर्वक उपयोग किए गए हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के भू-दृश्यों के स्थानिक विसरण प्रक्रिया (Spatial Diffusion Process) को व्यक्त करने में इनका प्रयोग किया जा सकता है, जैसे जनसंख्या में मलेरिया विसरण, चेचक-रोग, क्षय-रोग, एड्स आदि। नवोन्मेष तकनीकों- मशीन, ट्रैक्टरों, रासायनिक उर्वरक, कीटाणुनाशक रसायन आदि के विसरण की संभावना प्रकट करने के लिए इन मॉडलों का उपयोग उपयुक्त ठहरता है। ‘मॉण्टे कार्लो’ और मारकोव चेन इसके उच्छे उदाहरण हैं। ये दोनों मॉडल भौगोलिक शोध के अनेक क्षेत्रों में व्यवहार में लाए गए हैं।

गणितीय मॉडल/प्रतिरूप (Mathematical Models)

      गणितीय मॉडल अधिक विश्वसनीय होते हैं। परन्तु, इनकी रचना कठिन है। इन मॉडलों से अनेक मानवीय मूल्य ओझल बन जाते हैं, अनेक प्रासंगिक व नियामक प्रश्नों और अभिवृत्तियों विषयक समस्याएँ भी अनुत्तरित रह जाती है। फिर भी, गणितीय मॉडल तर्कसंगत रूप से संकेत-भाषा में कथनों का सटीक विवेचन करते हैं। उदाहरण के लिए

(1) ‘A’ बड़ा है ‘B’ से और (2) ‘B’ बड़ा है ‘C’ से। अत: (1) व (2) के सम्मिलित आधार पर यह निष्कर्ष (Theorem) बना कि ‘A’ बड़ा है ‘C’ से ।

  इस निष्कर्ष की तर्कसंगत सार्थकता काल-परिवर्तन से भी नहीं बदलती है। तार्किक रूप से यह निष्कर्ष ई. पू. 3000 में भी सत्य था, 2000 ई. पू. में भी सत्य बना रहा, और 2025 ई. पू. व आगे भी सत्य ही बना रहेगा। तात्पर्य यह है कि इस निष्कर्ष की सार्थकता ऐतिहासिक अवधि पर निर्भर नहीं होती है। यह शाश्वत बनी सार्थकता है, और गैर-ऐतिहासिक है।

      इसी प्रकार सिद्धान्त की तार्किक यथार्थता स्थानिक रूप से भी शाश्वत है। यह तर्क संयुक्त राज्य अमेरिका में सार्थक है, जर्मनी, रूस, चीन, फ्रांस, भारत आदि सभी स्थानों में भी सार्थक है।

      गणितीय मॉडल को आगे उनकी संभाविता की मात्रा के आधार पर विभक्त किया जा सकता है- वे नियतिवादिता (Deterministic) और अनिश्चित-संभावना (Stochastic) प्रकार के हो सकते हैं।

     गणितीय मॉडल विशिष्ट प्रक्रियाओं के समीकरणों को हल करने के साधन हैं। इसके लिए सशक्त ज्ञान चाहिए जिससे भौतिक प्रक्रियाएँ जुड़ी हैं। अतः, यह मुख्यतः भौतिक विज्ञान के विद्वानों द्वारा उपयोग में आते हैं। जे. एफ.नाए ने ‘हिमानी-प्रवाह’ का गणितीय मॉडल रचा। उसने मूल अवधारणा को सरल बनाया और एक हल किए जाने योग्य सरल समीकरण की रचना की। हिमानी के तल (Bed) को U- आकार का एक चतुर्भुज माना जो समान आकार व विशेष उबड़-खबड़ (Specific Rougness) का है। हिम को दबाव के प्रति सुनम्र (Plastic) माना।

     मानव भूगोल में इनका चलन संभव बना, परन्तु वहाँ इनका स्वरूप अवकलन- समीकरणों में व्यक्त नहीं करते। यहाँ सम्बन्धों की प्रकृति भिन्न है और प्रायः ‘आनुभविक’ परीक्षा विश्व के अनेक भागों में की जा सकती है। प्रायः Double Log Scale पर यह लगभग रेखीय (Linear) सम्बन्ध है।

    गणितीय मॉडल अर्थशास्त्री भूगोल में Linear Programming है जो समस्या का अनुकूलतम हल (Optimum Solution) प्रस्तुत करते हैं। किसी Factory की आवश्यकताओं में श्रमिक, कच्चा माल,  यातायात, बाजार (माल की खपत क्षेत्र) आदि मुख्य हैं। ऐसी प्रतीक दशाओं की गणितीय समीकरणों को ग्राफ पर सीधी रेखाओं द्वारा व्यक्त करते हैं। ये सभी अंकित करके एक अनुकूलतम-बिन्दु ज्ञात हो जाता है जो उस Factory के लिए लाभदायक ‘अवस्थिति’ (Location) होगी।

अनुरूप मॉडल/प्रतिरूप (Analogue Models)

     अनुरूप मॉडल संकेतों व समीकरणों के स्थान पर दृश्य-जगत् के आकृति से मिलते-जुलते तुल्य रूप सादृश्य का अनुमान कर रचे जाते हैं। एक सुपरिचित परिस्थिति का प्रयोग कर कम परिचित परिस्थिति का मॉडल ‘अनुरूप मॉडल’ (Analogue Models) हैं। ऐसे मॉडल का मूल्य वह शोधकर्ता पहचानता है जो दो परिस्थितियों के समानुमानों की पहचान कर सकता है। समानुमानों के घटक सार्थक (Positive) होने चाहिए, और निरर्थक घटकों को नज़रन्दाज किया जा सकता है।

    सादृश्य की संकल्पना (Concept of Analogy) का भूगोल में बहुत समय से प्रयोग करते आ रहे हैं। जॉन हट्टन ने 1795 में ही. भू-दृश्य के उत्कर्ष और अपकर्ष में सामग्री के संरचण की तुलना शरीर में रक्त-परिसंचरण से करके दोनों में सादृश्यता की पहचान की। ऐसी सादृश्यता जलीय चक्र में भी देखी जा सकती है। डेविस के अपरदन-चक्र (Cycle of Erosion) और रेटजेल के ‘राज्य एक जैविक जीव’ (State as a Living Organism) संकल्पनाएँ अच्छे उदाहरण हैं जो राज्य एवं भूदृश्य को जैव-जगत् के सादृश्य मानते हैं।

     सादृश्य-मॉडल द्वारा किसी समस्या को बिल्कुल दूसरी स्थिति में बदल कर समझाने का प्रयास किया जाता है, जैसे गतिमूलक लहरों के अध्ययन से सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों की भीड़-भाड़ को स्पष्ट बनाना, नदियों में बाढ़ के दौरान पत्थरों के टुकड़ों का वहन अथवा हिमानी-प्रोथ (Glacier Snout) पर प्रोतकर्ष के निर्माण को समझाना आदि-आदि।

    मानव भूगोल में अनेक समस्याएँ सादृश्यों द्वारा समझायी जाने की चेष्टा हुई है। इसका अच्छा उदाहरण ‘गुरुत्व मॉडल’ (Gravity Model) है। इसका तात्पर्य दो पिण्डों के मध्य गुरुत्व बल, उनके मात्रा के गुणक फल को उनके मध्य अन्तर के वर्ग से विभाज्य द्वारा ज्ञात करते हैं। यह गुरुत्व बल उन दो पिण्डों अथवा स्थानों में घटित क्रिया अथवा कार्य-विवरण बना है। इसी प्रकार अन्य भौतिक संबंधों का उपयोग भी ‘अनुरूप मॉडलों’ की ‘उष्मा-गतिकी’ के द्वितीय नियम आदि को भी अनुरूप मॉडलों में सम्मिलित किया जा सकता है।

सैद्धांतिक मॉडल/प्रतिरूप (Theoretical Models)

      सैद्धांतिक मॉडल दो श्रेणियों में विभक्त किए जा सकते हैं- संकल्पनात्मक (Conceptual) और सिद्धान्त (Theory)।

    संकल्पनात्मक किसी समस्या विशेष के लिए ऐसे सिद्धान्त में से निसृत किए (Deduced from a Theory) विचार हैं जो यथार्थ जगत् में मेल रखते हैं, जैसे समुद्र तल का तट पर ऊँचा उठना व नीचे गिरना और इसका तट पर प्रभाव। यह मान्यता है कि समुद्री लहरें किसी निश्चित गहराई तक चट्टानों का अपरदन करती हैं। यह सीमा 13 मीटर (40 फीट) के लगभग है। इसके नीचे लहरों का प्रभाव चट्टानी प्लेटफॉर्म पर नगण्य होता है। इस क्रिया में ढाल का आरंभिक भाग अधिक ढालू होता है। लहरों की यह क्रिया कालान्तर में पर्याप्त चौड़ा प्लेटफॉर्म का निर्माण करती है।

      सैद्धांतिक रूप से विभिन्न दशाओं के अधीन तटीय कटिबंध के विभिन्न स्वरूप स्थापित किए जा सकते हैं, और इनकी तुलना वास्तविक तटीय कटिबंधों से कर सकते हैं। इस संकल्पना का विस्तार आगे ‘ढाल पार्श्विका विकास’ (Slope Profile Evolution) के अध्ययन में कर सकते हैं। ऐसे अध्ययनों का आधार भिन्न-भिन्न ढाल प्रक्रियाओं के ज्ञात अथवा संकल्पित प्रभाव होते हैं।

     इस प्रकार के मॉडलों से विकास-चरणों के क्रमों की स्थापना की जा सकती है, और इस विभिन्न चरणों में सैद्धांतिक ढाल की वास्तविक ढालों से तुलना की जा सकती है। सैद्धांतिक मॉडल का दूसरा वर्ग ‘सिद्धांत’ (Theory) शब्द से संबंधित है। यह विषय के सम्पूर्ण जगत् का ढाँचा इंगित करता है (Framework of Whole Discipline) और सरल रचा गया है।

     यह मॉडल इतना दुर्गम्य अथवा जटिल (Rigid) नहीं होता है कि विषय को अवरुद्ध करे। यह लचीला ढाँचा भूगोल के विस्तार को समाए हुए हैं। विस्तृत होते हुए भी यह विषय को उद्देश्यपरक और सुसंगत बनाए रखता है। इस सिद्धांतपरक श्रेणी में मॉडल भूगोल के लिए मूल्यवान बन उठे हैं, क्योंकि वे विषय की सभी शाखाओं के लिए लागू हैं। अतः ये मॉडल विषय को एकता प्रदान करते हैं।

Model and Its Types

चित्र: भौगोलिक मॉडल का सैद्धांतिक ढाँचा

      विस्तृत भौगोलिक आंकड़ों का विश्लेषण-तकनीक हेतु किस भाँति सुसंगठित किया जाता है, इसका दिग्दर्शन ऊपर के आरेख में किया गया है। भूगोल का सैद्धांतिक ढाँचा एक पाँच-मंजिली इमारत के समान है। इसकी प्रत्येक मंजिल अपनी निचली मंजिल द्वारा सहायता प्राप्त करती है, और अपने से ऊपर स्थित मंजिल को सहायता पहुँचाती है।

(1) सबसे निचली आधारभूत मंजिल भौगोलिक अध्ययन की अव्यवस्थित सामग्री, अर्थात् आंकड़ों का समूह है।

(2) आंकड़ों के ऊपर स्थित दूसरी मंजिल उनको उपयुक्त विधि द्वारा सुसंगठित बनाने की है जिससे विश्लेषण में सरलता हो।

(3) विश्लेषण-तकनीक के लिए तीसरी मंजिल है जो अपनाए गए मॉडल (सिद्धांत) पर आधारित बनी है।

(4) चौथी मंजिल विश्लेषण से उपलब्ध सिद्धान्तों की है।

(5) अंतिम शीर्ष पर स्थित मंजिल सिद्धान्तों प आधारित नियम-निर्माण से संबंधित है। यही भौगोलिक विधि का लक्ष्य है।



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40. Paradigrms in Geography (भूगोल में प्रतिमान)

Paradigrms in Geography

(भूगोल में प्रतिमान)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में प्रतिमान की विवेचना करें।

(Discuss the Paradigrms in Geography.)

उत्तर- भूगोल विवरणात्मक सीढ़ी को लांघकर मॉडल निर्माण में उसी भाँति जा उतरी जैसे कि मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र विषय उतरे। यह प्रक्रिया 19वीं सदी में आरम्भ हुई और 20वीं सदी के साठ-सत्तर शताब्दियों में तेज होती गई। भूगोल में परिवर्तन ‘वर्णनीय-स्तर’ से ‘वर्गीकरण’ में और आगे ‘नियम-निर्धारण’ स्तरों से गुजरा है। निकट भूतकाल में भूगोल का स्वरूप सिद्धान्त-निरूपण व मॉडल-रचना में लोकप्रिय बना। अब विषय में सर्वव्यापी नियमों को लागू करना उसी भाँति आरम्भ हो गया जैसे प्रकृति के नियम लागू हैं।

     ‘गुरुत्व का प्राकृतिक नियम’ Law of Gravitation भारत, यूरोप अथवा अमेरिका, सर्वत्र उपयोगी बना। यह परीक्षण के लिए सभी देशों में उपलब्ध बना और असंख्य स्थितियों में समान रूप से प्रामाणिक सिद्ध हुआ। वर्तमान सदी के सामाजिक वैज्ञानिकों ने भी अनुभव किया कि Stochastic नियमों की भाँति ही (जो सर्वमान्य व बहुमत की सोच है) उनके विषय में भी नियमों का निर्धारण संभव है।

     जब एक व्यक्ति के व्यवहार को भी एक सामान्य नियम में बांध सकते हैं। गोलेज व अमादी (Golledge and Amadee) ने एक रोचक बात यह कही कि ‘नियम’ की कोई एक मात्र स्वीकार बनी परिभाषा नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि सम्भावित नियम, अनुप्रस्थ काट नियम, समस्थितिक नियम, ऐतिहासिक नियम, विकास-नियम, सांख्यिकीय नियम, गणितीय नियम, आदि अनेक नियमों की रचना होती है।

       भूगोल क्योंकि प्रयोगशाला का विज्ञान नहीं है, इसके नियम प्राकृतिक विज्ञानों जैसे नहीं हो सकते। भौगोलिक नियमों की परख क्षेत्र में ही संभव हो सकती है, वहाँ प्रयोगशाला की भाँति दशाएँ नियंत्रित नहीं की जा सकतीं।

       भूगोल में जैसे क्रियाओं सम्बन्धी नियम (Principle of Activity) लागू होता है। इसका तात्पर्य है कि दृश्य-जगत् की वस्तुओं में परस्पर क्रिया घटित हुई है, और यह प्रक्रिया स्थान व कालानुरूप बदलाव उत्पन्न करती है। भूगोल में विधि प्रादेशिक एवं नियमबद्ध (Regional and Systematic) दानों पक्षों की बनी होने के कारण नियम व सिद्धान्त प्राकृतिक विज्ञानों से भिन्न हैं और अनेक स्थितियों में तो यह सामाजिक विज्ञानों के नियमों से भी अलग है।

      यहाँ आगे परिच्छेदों में कुछ प्रकाश भौगोलिक नियमों व प्रतिमानों पर डाला गया है। भूगोल, कुहन के अनुसार, अव्यवस्था के दौर से गुजर कर शांति की ओर बढ़ता विषय है। अन्य विषयों के विकास में भी अशांति-शांति के दौर आए।

कुहन का प्रतिमान (Kuhn’s Paradigm):-

       अमेरिका के थॉमस कुहन (S. Thomas Kuhn) ने विज्ञान के विकास के बारे में एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उसके अनुसार विज्ञान कोई अच्छी प्रकार नियमित बनी क्रिया नहीं है जिसके परिणामों को प्रत्येक पीढ़ी स्वचालित होकर अपनाती चली गई। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें उतार-चढ़ाव, अशांति-शांति के क्रम घटित होते रहते हैं।

     ज्ञान संग्रह-काल की स्थिति में शांतिकालीन अवधियों का विकास देखा जाता है। परन्तु यह संकटकालीन अवधि आने से विलग हो जाता है। यह संकट विषय में उभार द्वारा परिवर्तन से आता है, और विकास क्रम की निरन्तरता (Continuity) को भंग कर देता है।

Paradigrms in Geography

कुहन के विज्ञान के विकास-सिद्धान्त का चित्रात्मक निवर्चन (हेनरिकसन के आधार पर, 1973)

     इस प्रक्रिया को व्यक्त करने के लिए कुहन ने एक मॉडल ‘विज्ञान का प्रतिमान’ रचा। वह कहता है- “प्रतिमान एक ऐसा मॉडल है जो काल विशेष में सर्वव्यापी बनी सर्वमान्य वैज्ञानिक उपलब्धि है। वह अभ्यासी समुदाय के लिए सामान्य समस्याएँ व हल प्रदान करता है। हैगेट इसी को एक प्रकार का सुपर-मॉडल कहता था।

      दूसरे सरल शब्दों में कहें तो प्रतिमान वैज्ञानिक क्रियाओं एवं पद्धतियों का ऐसा सिद्धान्त है जो अधिकांश भूगोलविदों के शोध कार्य को नियंत्रण में रखता है, अर्थात् जहाँ दो वर्ग के भूगोलवेत्ताओं में प्रतिमानों के विषय में मतभेद हैं, वहाँ भी यह दिशा निर्धारित करता है।”

      यह प्रतिमान शोधार्थियों को बताता है कि उन्हें क्या खोजना है, और किस विधि से खोजना है तथा इस विशेष स्थिति में कौन-सी विधियाँ भौगोलिक हैं। कुहन अपने अभिधारणा (Postulate) में विज्ञान के विकास में नई अवस्थाओं को इंगित करता है जैसे प्रतिमान-पूर्व अवस्था, व्यवसायीकरण, प्रतिमान अवस्था 1, 2, 3 आदि-आदि। इस अवधारणा को हेनरिकसन ने भौगोलिक दृष्टि से रचा जो उपरोक्त चित्र में प्रकट है।

      वैज्ञानिक ज्ञान एक पठार की भाँति विकसित होता है। इसमें एकाएक महापरिवर्तन आते हैं (Sudden Upheavals) और तब आकस्मिक खड़ा विकास देखा जाता है जो बाद में धीमे और समान प्रगति में बदल जाता है। वैज्ञानिक विकास की पहली अवस्था अनेक भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के विचारों के विवाद से ग्रस्त रहती है। इस अवधि में आंकड़ों का संकलन बेतरतीव रूप में विस्तार से होता है। इस संकलन में विशिष्ट कोटि के संकलन का स्तर निचला ही देखा जाता है। इसमें अनेक सम्प्रदायों के विचारों का समागम है, और कोई भी एक सम्प्रदाय दूसरे से अपनी स्थिति अधिक वैज्ञानिक नहीं समझता।

   पहली अवस्था से आगे बढ़कर वैज्ञानिक विकास-मार्ग व्यवसायीकरण-अवस्था पकड़ता है। इसमें एक सम्प्रदाय अन्य सम्प्रदायों पर अपना वर्चस्व प्रकट करता है। इस दौरान अनेक समस्याओं के हल स्पष्ट होते हैं। संप्रदाय विशेष के विचारों व नवीन खोजों से प्रगति होती है। खगोल विज्ञान और गणित विधियाँ पीछे छूटती जाती हैं। और सामाजिक विज्ञानों में बदलाव आता-जाता है।

      तीसरी अवस्था प्रतिमान अवस्था है। इस दौरान सिद्धान्त स्थापित कर समस्याग्रस्त विशेष क्षेत्र में क्रियाएँ सम्पन्न बनती हैं। इससे सामान्य विज्ञान (Normal Science) की स्थापना हो जाती है। सहज विज्ञान की स्थापना के उपरान्त शोध कार्य में ठहराव और अवरोध आता है जो संकट व हलचल की स्थिति उत्पन्न करता है। अस्थायी रूप से यह अन्धकार जैसी अवस्था है जिसमें ज्ञान-विज्ञान का विकास नहीं होता। यही संकट और हलचल प्रतिमान अवस्था 2 के लिए शोधकर्ता को उत्साहित करती है। यह क्रम-हलचल, क्रांति और नवीन प्रतिमान, विज्ञान के इतिहास में घटित होकर समाजों के विकास एवं अवसान में सहायक बनता है।

      नए प्रतिमानों का क्रम संग्रहीत समस्याओं का निपटारा करने के साथ सिद्धान्त निरूपण में सहायक बना है। संकटकालीन व हलचल की स्थिति पूर्व में संग्रह की गई सूचनाओं और आँकड़ों का पुनर्वीक्षण व पुनर्मूल्यांकन करने की ही अवस्था है। इससे नवीन सैद्धान्तिक सोच को जन्म मिलता है। इससे आधारभूत दार्शनिक विचारों के परिसंवाद आरम्भ हो जाते हैं। इस वाद-विवाद में कार्य-पद्धति से अनेक प्रश्नों व समस्याओं का हल प्रकट हो जाते हैं। इसकी समाप्ति पर पुनः बदस्तूर सहज-विज्ञान की अवस्था स्थापित होती है।

      यदि सन्तोषप्रद हल नहीं निकलता है, तो शोध-क्रिया जारी बनी रहती है। नया प्रतिमान स्थापित होने की अवस्था ही सकंट का अन्त और अनेक शोध कर्मियों में विकास की दिशा है। नए प्रतिमान में प्रवेश करने का अर्थ ही पुरानी समस्याओं का हल हो जाना है, और आगे शोध कार्य के लिए भूमि तैयार हो जाती है। इसमें शोध कर्मियों की नई-पौध की संख्या कार्य करने में आकर्षित बन उठती है।

      नए युवा पीढ़ी के वैज्ञानिक पुराने प्रौढ़-वैज्ञानिकों को सन्तुष्ट तो प्रायः नहीं कर पाते, फिर भी नए सोच व शोध के सम्मुख पुराने शोध मंद बनते जाते हैं। प्रौढ़ व पुराने वैज्ञानिकों के गुजर जाने पर उनके समर्थित सोच भी कमजोर बन जाते हैं।

       एक प्रतिमान (पुराने) के बदले में दूसरा प्रतिमान (नया) स्वीकार करने का अर्थ पूर्णतः यह नहीं है कि वह सौदा बुद्धिमानी व तर्कों से भरा उच्च कोटि का हुआ है। अर्थात् यह आवश्यक है कि नए प्रतिमान से सभी समस्याओं का हल खोज लिया गया।

     नया प्रतिमान उस समस्या का हल तो है जिसे पुराना प्रतिमान नहीं हल कर सका, परन्तु सभी समस्याओं का हल नहीं सिद्ध हो सकता। उनके लिए शोध को सतत् बनाए रखना आवश्यक है। अतः, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि प्रत्येक नवीन प्रतिमान पूर्व में सीधे पुराने प्रतिमानों की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध होगा।

      सच बात तो यह है कि नए प्रतिमान को अनेक प्रासंगिक मूल्य, नियम, लालित्य-विचार आदि प्रभावित बना सकते हैं। उसे सरल व अधिक सुरुचिपूर्ण बनाने के उत्साह में नवीन प्रतिमान पूर्व पुराने से भी घटिया हो सकता है। नए युवा शोध – कर्मियों के निजी स्वार्थ और अपने पूर्वकालीन बड़ों से आगे निकलने का आर्थिक उत्साह मौजूदा वैज्ञानिक विचारों में अनावश्यक परिवर्तन लाने की अनेक बार चेष्टा देखी जाती है। यह प्रयास वैज्ञानिक विकास के लिए अनुकूल नहीं है।

       कुहन का प्रतिमान वैज्ञानिक ज्ञान की शुद्धि की अवस्थाओं की एक अच्छी व वैज्ञानिक व्याख्या है। इसमें भी अन्य मॉडलों की भाँति गुण-दोष हैं, परन्तु यह युवा शोध कर्मियों को नए सिद्धांतों के अभिधारण का अवसर देता है।

        युवा शोध कर्मी बिना किसी परीक्षण के अपने प्रतिमान को वस्तुनिष्ठ बताते हैं। वह प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण व वैज्ञानिक शोध के विरुद्ध हो सकता है। फिर भी, यह तो विवाद रहित है कि नए प्रतिमान में दोष और कर्मियों के होते हुए भी, कुहन के सैद्धांतिक विचारों का आधुनिक विज्ञान पर सार्थक प्रभाव है। उनके विचार नवीन सिद्धांतों को स्वीकार करने में मदद करते हैं। वे हमारा प्रत्यक्ष-बोध विस्तृत बनाते हैं। परन्तु, यदि शोध कार्य में नौसिखिए व अयोग्य व्यक्ति हस्तक्षेप करने लेगेंगे तो प्रतिमान का प्रभाव शोध में उल्टा भी हो सकता है।

       कुहन का प्रतिमान विज्ञान-दर्शन में अच्छा मार्ग दर्शक है जो विषय के ऐतिहासिक विकास को नष्ट बनाने में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है। यह नहीं मान बैठना चाहिए कि वह पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करता है, परन्तु वह शोध कार्य नवीनता लाने के लिए एक अनूठा साधन है। कुहन के प्रतिमान के प्रकाश में भूगोल के इतिहास को आने की पंक्तियों द्वारा समझने में सरलता होगी।

       भौगोलिक विकास की कथा वर्णनात्मक व उद्देश्य मूलक अवस्था कर आगे मात्रात्मक, मूल सुधारवादी और द्वन्द्वात्मक सांसारिकता जैसी अवस्था में पहुँच चुकी है। उसने अनेक पद्धतियों को अपना लिया है। अपने विश्लेषण में भूगोल ने स्थानों का विवरण विश्वसनीय साहित्यिक भाषा में तथा मात्रात्मक, गणितीय भाषा में भी करना आरम्भ किया है। इससे विषय में वैज्ञानिक सूक्ष्मता और व्यवस्था प्रकट हुई है। परन्तु, अभी तक विषय के स्वरूप और उसकी प्रकृति के बारे में भूगोलवेत्ताओं में एकमत विकसित नहीं हो सका है। उसके नियमों, सिद्धांतों एवं प्रतिमानों के बारे में भी विद्वान अभी एकमत नहीं हैं।

भौगोलिक नियम प्राकृतिक नियमों की भाँति सुनिश्चित और संक्षिप्त नहीं बने हैं। प्राकृतिक नियम सर्वव्यापी एवं सर्वमान्य हैं। अधिकांश भूगोल-नियम आनुभाविक हैं, और उन्हें प्राकृतिक नियमों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वे विशेष स्थान व काल में ही यथार्थ बने रहते हैं, और अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति वे विशिष्ट मॉडल अथवा संरचित-विचार अथवा प्रतिमान हैं। उनकी सर्वव्यापी मान्यता नहीं है, और सभी विद्वान उनके बारे में एकमत भी नहीं हैं।

   हार्वे (Harvey) नियम व सिद्धांत को विस्तृत महत्ता प्रदान करता है। वह उन्हें तीन-पदीय श्रेणी (Three-Fold Hierarchy) में बंधा मानता है। सिद्धांत की अवधारणा पहले स्तर पर तथ्यों में व्यवस्थित बने कथन (Systematized Factual Statements) है। इनकी मध्यम अवस्था अनुभवाश्रित व्यापक बने सामान्य नियम की (Empirical Generalizations or Laws) है, और तीसरी अवस्था में यह सैद्धांतिक नियमों (Theoretical Laws) का रूप लेते हैं। पिछले डेढ़ सौ वर्षों में भूगोल में कई प्रकार के मॉडलों का विकास हुआ। इनकी जानकारी रोचक विषय है।

       कार्ल रिटर आकड़ों की व्याख्या आगमनात्मक पद्धति द्वारा करके सरल अनुभवाश्रित व्यापक बने सामान्य निष्कर्षों पर पहुँचने का विश्वासी था। वह प्रयोजनवादी (Teleologist) था। वह दृश्य-वस्तुओं का क्षेत्र में मानव मात्र के लिए ईश्वरीय योजना व प्रयोजनानुसार वितरण मानता था। उसके सोच-दर्शन का अनुभवों के आधार पर परीक्षण करना संभव नहीं था। इसलिए यह सोच वैज्ञानिक व्याख्या नहीं है। फिर भी एक प्रतिमान उदाहरण तो है। जीवों में पार्थिव प्रकृति की एकता है। जैविक संबंध ‘समस्तता अथवा संयुक्त बनी’ (Holistic- Synthesis) प्रयोजनानुसार एकता का ही प्रतिमान है।

Organic relationships on earth are in holistic-synthesis and represent teleological explanatory models.

       रिटर के पश्चात् डार्विन ने भूगोल में नियतिवादी कार्य-कारण (Cause and Effect) दृष्टिकोण पर जोर दिया। उसका सोच अथवा प्रतिमान समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को प्राकृतिक परिस्थितियों द्वारा निर्धारित मानता था।

     इसके बाद आगमनात्मक विश्लेषण के स्थान पर निगमनात्मक विधियों (Deductive Methods) पर आधारित व्याख्या पर जोर दिया जाने लगा। नियमों का परीक्षण किया जाने लगा। उनको प्रयोगों में कसा जाने (Testing Through Experiment) के बाद ही स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाता था।

      डेविस का सामान्य अपरदन चक्र (Normal Cycle of Erosion) और मेकिण्डर का ‘हृदय-स्थल सिद्धांत’ (Heartland Theory) इसी प्रकार के प्रतिमान अथवा मॉडल थे। ऐसे नियमों द्वारा भूगोल की पहचान विज्ञानों में की जाने लगी थी।

      इन परिस्थितियों में विडाल-डि-ला-ब्लाश और उसके अनुयायियों का उदय हुआ। ब्लाश ने ‘सम्भववाद’ पर जोर दिया। विडालियन-सम्प्रदाय मनुष्य को निष्क्रिय-कारक नहीं मानता था। मनुष्य समाज के भाग्य को निर्धारित करने में मुख्य कारक था, और उसको आकार देने में उसका योगदान महत्वपूर्ण था।

     ब्लाश के सोच को ‘क्षेत्र वर्णिनीय’ अथवा ‘प्रादेशिक विज्ञान’ बनाया। ब्लाश के नवीन प्रतिमान पूर्णतः नियतिवादी मॉडल को नहीं हटा पाए और सम्भववाद के साथ-साथ नियतिवादी व्याख्या भी जीवित चलती रही। कुहन इस अवधि को ‘क्रांतिकारी अवस्था’ कहता था।

     जार्ज चाबोत (George Chabot) के मतानुसार ‘भूगोल में केन्द्र-बिन्दु ‘प्रादेशिक भूगोल’ बन उठा जिसके चारों ओर अन्य सभी कुछ अभिमुख है। प्रादेशिक भूगोल का प्रतिमान फ्रांस में फला-फूला और आस-पास के देशों में विसरित हो गया। परन्तु, बाद में यह विचार भी प्रादेशिक व्यक्तित्व को पूर्णतः व्यक्त करने में असमर्थ सिद्ध हुआ। इससे भूगोल में संकट काल (A Period of Crisis) विकसित हुआ। इसी संकट की प्रेरणा थी जिसने भूगोल में मात्रात्मक क्रांति और क्रियात्मक दृष्टिकोण विकसित बनाया। मानव भूगोल में भूगोल के विद्वान ‘मॉडलों’ का प्रयोग करने लगे और तंत्र-विश्लेषण पर जोर देने लगे।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त तथ्यों से सपष्ट है कि भूगोल में पूर्ण-क्रांति उत्पन्न नहीं हुई थी। भूगोलवेत्ता अनेक प्रकार के विचारों में, जैसे प्रत्यक्षवाद, उपयोगितावाद, दृश्य-प्रपंच-शास्त्र, अस्तित्ववाद, आदर्शवाद, यथार्थवाद, सांसारिक द्वन्द्वात्मकवाद आदि में गोते लगाहे थे और विभक्त बन उठे थे। विषय की क्रांति के दौरान भूगोल में इस संकट ने पुनः एक नवीन प्रतिमान की अवस्था को जन्म दिया।


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38. Pragmatism in Geography (भूगोल में उपयोगितावाद)

Pragmatism in Geography

(भूगोल में उपयोगितावाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में उपयोगितावाद पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Pragmatism in Geography.)

उत्तर- उपयोगितावाद एक दार्शनिक दृष्टिकोण है जो अनुभव द्वारा अर्थपूर्ण विचारों को जन्म देता है। यह सोच अनुभवों, प्रयोगात्मक खोजबीन और सत्य के आधार पर परिणामों का मूल्यांकन करता है। अनुभवों पर आधारित क्रियाओं के फल अर्थपूर्ण व ज्ञानप्रद हैं। इसकी जाँच समस्याग्रस्त स्थितियों के हल में निहित है। समस्याओं में जकड़ी स्थितियों से समायोजन कर लेना और उन्हें उपयोग में लाना ही अर्थपूर्ण है, वही सत्य है।

        उपयोगितावाद भी प्रत्यक्षवाद सोच का संशोधित स्वरूप है। यह भी वैज्ञानिक विधि के प्रयोग करने पर जोर देता है, अन्तर केवल इतना ही है कि उपयोगितावादी मानव समस्याओं के समाधान के प्रयास का आन्दोलन है। मूल्यों पर आधारित वैज्ञानिक पद्धति से समाज की व्यावहारिक, प्रयोगात्मक (Practical) समस्याएँ हल करना उपयोगितावाद का मुख्य लक्षण है। सामाजिक समायोजन ही वस्तुतः भौगोलिक यथार्थता है।

     स्थानिक परिस्थितियों की समस्याओं से घिरे समाज में मानव का समायोजन खोज लेना ही अर्थपूर्ण है, सत्य है औग यथार्थ है। शोध कार्य इसीलिए किए जाते हैं कि वे तुरंत जन्मी स्थानिक समस्याओं को अर्थपूर्ण हल खोज निकालें जो परिणामतः वहाँ जनसमुदाय के लक्ष्यों की पूर्ति कर सकने में सक्षम बन सकें। इसमें शोधकर्ता के सुझाव और उसकी क्रियाएँ परिणामों को लागू करने (उपयोग में लाकर) में अभिकर्ता (Action Agent) बन उठते हैं।

      भूगोल में उपयोगितावाद-अधिगम एक नियोजित क्रिया (Planned Action) है न कि केवल नियोजन के लिए सोच। इसमें परिणामों पर आधारित क्रियाओं के चरण सम्मिलित हैं। लक्ष्यों की पूर्ति के साधन जुटाना, मानवीय उपयोग के तथा जन-कल्याण से जुड़ी क्रियाओं का मूल्यों के आधार पर समाधान इसकी वास्तविकता है।

     अमेरिका के गृह-युद्ध (Civil War) के उपरान्त वहाँ उपयोगितावाद विकसित बना जिसने वहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध तक सामाजिक व बौद्धिक परिवर्तन समाज में आए। इसके समर्थकों की एक अच्छी संख्या पश्चिमी यूरोपीय देशों में भी पायी जाती हैं।

      इस दार्शनिक सोच की एक सामान्य विशेषता इसका व्यावहारिक समस्याओं (Practical Problems) से निपटना ही है। अतएव इसका जोर उपयोगिता और प्रयोगात्मकता पर है। उपयोगितावादी का विश्वास सामने खड़ी वास्तविक (Concrete) स्थिति के हल के क्रिया में है। इसके वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित ही वह जगत् को समझने-बुझने में सक्रिय है। इस प्रक्रिया में उसके लिए ‘निरपेक्ष’ अथवा ‘सामान्य’ नियमों व सिद्धान्तों का योग भी महत्त्वपूर्ण निर्देशांक हैं।

     तात्पर्य यह है कि उपयोगितावादी सैद्धांतिक सोच एवं प्रयोगात्मक स्थितियाँ, दोनों ही क्रियाओं से जुड़ी है। सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रयासों को सुसंगठित बनाना, प्रेरित बनाना और क्रियान्वयन की आवश्यकता पर भूगोलवेत्ताओं की रणनीति टिकी है। उपयोगितवाद के प्रधान-लक्षण में सम्मिलित हैं-

(1) वास्तविकता का अभाव अथवा अपूर्णता:-

        उपयोगितावादियों का विश्वास बना है कि इस काल में ‘वास्तविकता’ विषयक ज्ञान अपूर्ण है, और उसमें त्रुटियाँ हैं।

(2) ज्ञान की भ्रामक विचार वीथी:-

      जगत् के प्रति वास्तविकता के बारे में हमारे मस्तिष्क में भ्रम उत्पन्न हैं। अतः, प्रयोगों से प्राप्त परिणामों में त्रुटियाँ विकसित हैं। भविष्य में सफलता संदिग्ध है, क्योंकि हमारे सोच भूतकाल की त्रुटियों से ग्रसित रहते हैं। अतः, परिकल्पनाओं व वर्तमान धारणाओं में बदलाव और उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

(3) वैज्ञानिक पद्धति और परिकल्पना पर आधारित:-

       निगमनात्मक मॉडल सर्वोत्तम विधि है जिसका शोध कार्य में प्रयोग करना आवश्यक बन उठा है।

(4) समस्याओं को तार्किक आधार पर ही हल किया जाना चाहिए। समस्याएँ भी मानव-कल्याण विषयक चयन की जानी चाहिए, और वे व्यावहारिक (Practical) हों तथा जिनके हल मानव कल्याण के विकास में योग दे सकें।

      इन आधारों पर उपयोगितावादियों ने मूल्यविहीन प्रत्यक्षवाद को नकारा घोषित किया। उससे समाज का न तो कल्याण हो सकता है, और न वह जगत् की सम्पूर्ण वास्तविकता का ज्ञान करा सकता है।

     उपयोगितावाद ने भूगोल में प्रयोगात्मक (Applied) पक्ष का समर्थन कर प्रयोगात्मक भूगोल (Applied Geography) को जन्म दिया। प्रयोगात्मक भूगोल की नीतियाँ जन-कल्याण से सम्बन्धित मूल्यों पर आधारित बनायी जानी चाहिए। वे चाहे वातावरण में समायोजित बनाने हेतु परिवर्तन हों, चाहे समाज की आर्थिक, शैक्षिक, आवासीय, स्वास्थ्य विषयक असमानताओं के मेटने के प्रयास अथवा सांस्कृतिक दृश्य-जगत् का संरक्षण हो, सामाजिक मूल्यों पर आधारित किए जाने चाहिए। उनको जन-कल्याण हेतु उपयोगिता के आधार पर ही विकसित करना Pragmatism की मूल भावना है।

     उपयोगितावादी भूगोलवेत्ताओं के लिए परिकल्पनाओं की रचना हेतु ढाँचा प्रस्तुत करने के लिए तर्क-संगत स्थानिक नियमों (Spatial Laws) की आवश्यक होती है। ये निगमनात्मक परिकल्पनाएँ आनुभविक प्रमाणों द्वारा परीक्षण कर एवं संशोधित बनाकर अपनायी जानी चाहिए।

      उपयोगितावादी का लक्ष्य मानवीय घटक पर जोर देने से जुड़ा हुआ है। इसकी पूर्ति हमारे कार्यों को प्रेरित करता है। हमारे कार्यों का स्त्रोत विगत काल के जगत् की प्रकृति है। मानव, यहाँ केन्द्रीय स्थान ग्रहण किए रहता है। ये विचार विडाल-डि-ला ब्लाश (फ्रांसीसी सम्प्रदाय का अग्रणीय भूगोलवेत्ता) द्वारा व्यक्त मत से मिलते-जुलते हैं।

      मानवतावादी भूगोल में, मानव और विज्ञान को समन्वित बना दिया है। भूगोल में आधुनिक मानवतावाद का प्रधान ध्येय सामाजिक विज्ञान व मानव की सामंजस्यता है। इसी में वस्तुनिष्ठता और व्यक्तिनिष्ठता का भौतिकवाद और आदर्शवाद का और तर्क व वास्तविकता का समन्वय है। ऊपर जो कुछ व्यक्त हुआ है, इस आधार पर उपयोगितावादी भूगोल के कतिपय लक्षणों व घटकों की पहचान निम्न आधारों पर की जा सकती है:-

(i) भौगोलिक-स्थान ज्ञान और भ्रांतियों द्वारा संयुक्त बनी परिकल्पना है।

(ii) भौगोलिक-स्थान परिवर्तनशील है। इसके परिवर्तन का बोध और इसको परिवर्तन बनाने की दिशा के लिए हमारे ज्ञान और हमारी सोच के मापकों को परिशुद्ध बनाना आवश्यक प्रक्रिया है।

(iii) भौगोलिक-स्थान काल-अवधि के दौरान विकसित ‘मानवीय घटकों’ का विवरण है।

(iv) प्रयोगात्मक मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए भूगोल की संरचना और पुनर्रचना आवश्यक है।

(v) स्थानिक वास्तविकता मानवीय अनुभवों की संयुक्त बनी परिकल्पना है।

(vi) परिकल्पनाओं की रचना के लिए स्थानिक नियमों की आवश्यकता होती है। परन्तु साथ-साथ हमारे ज्ञान व काल के सन्दर्भ में इनमें संशोधन भी किया जाना चाहिए।

(vii) भौगोलिक अध्ययन वस्तुतः प्रयोगात्मक समस्याओं से संबंधित है औ प्रायोगिक समस्याएँ (Practical Problems) स्थानिक रूप से मानव के कल्याण से जुड़ी हैं। इनका अध्ययन वैज्ञानिक रीति-नीति से किया जाना चाहिए।



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3. Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

(Climatology and Oceanography)

(Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course MDC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MDC-2: Multidisciplinary Course)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the sections as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) All activity related to climate happens in this layer of atmosphere:

(a) Stratosphere

(b) Troposphere

(c) Ionosphere

(d) None of the above

मौसम सम्बन्धी सभी घटनाएँ, वायुमण्डल के इस परत में होती है:

(a) समतापमण्डल

(b) क्षोभमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) क्षोभमण्डल

(ii) Which layer protect the Earth from Sun’s harmful rays?

(a) Oxygen layer

(b) Ozone layer

(c) Nitrogen layer

(d) Green house gas

कौन-सी परत पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है?

(a) ऑक्सीजन परत

(b) ओजोन परत

(c) नाइट्रोजन परत

(d) ग्रीन हाउस गैस

उत्तर- (b) ओजोन परत

(iii) Which among the following is

(a) Hailstorm 

(b) Shower

(c) Thunderstorm

(d) All of the above

इनमें से कौन वर्षा का एक रूप है?

(a) ओलावृष्टि

(b) बौछार

(c) तूफान

(d) उपरोक्त से सभी

उत्तर- (d) उपरोक्त से सभी

(iv) As one gaes above in the atmosphere, the air pressure :

(a) Increases

(b) Decreases

(c) Remain same

(d) None of the above

वायुमण्डल में ऊपर की तरफ बढ़ने पर, वायुदाब:

(a) बढ़ता है

(b) घटता है

(c) एक जैसा रहता है

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) घटता है

(v) This is a local wind of India:

(a) Loo

(b) Chinook

(c) Siroco

(d) Harmattan

यह भारत की स्थानीय पवन है:

(a) लू

(b) चिनूक

(c) सिरोको

(d) हरमट्टान

उत्तर- (a) लू

(vi) Where do temperate cyclones come?

(a) 5o – 10o north latitude

(b) 5o – 15o north latitude

(c) 5o – 10o south latitude

(d) 5o – 15o south latitude

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात कहाँ आते हैं?

(a) 5o – 10o उत्तरी अक्षांश

(b) 5o – 15o उत्तरी अक्षांश

(c) 5o – 10o दक्षिणी अक्षांश

(d) 5o – 15o दक्षिणी अक्षांश

उत्तर- शीतोष्ण चक्रवात दोनों गोलार्द्धों में 35o से 65o अक्षांशों के बीच मध्य-अक्षांशीय क्षेत्र के ऊपर सक्रिय होते हैं।

(vii) Find out the wrong pair:

(a) China Sea – Typhoon

(b) India – Cyclone

(c) Eastern Island – Hurricane

(d) Australia-Tornado

गलत जोड़ा बताइए :

(a) चीन सागर – टाइफून

(b) भारत – चक्रवात

(c) पूर्वी द्वीप समूह – हरीकेन

(d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

उत्तर- (d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

(viii) Highest saline sea in the world is:

(a) Salt lake

(b) Red sea

(c) Dead sea

(d) Sambher lake

विश्व के सबसे अधिक खारे सागर का नाम है:

(a) साल्ट झील

(b) लाल सागर

(c) मृत सागर

(d) सांभर झील

उत्तर- (c) मृत सागर

(ix) Going from equator to pole the salinity:

(a) Decreases

(b) Increases

(c) Remain same

(d) None of the above

विषुवतरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर लवणता:

(a) घटती है

(b) बढ़ती है

(c) समान रहती है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) घटती है

(x) Andaman-Nikobar ridge is situated in:

(a) Indian Ocean

(b) Pacific Ocean

(c) Atlantic Ocean

(d) Arctic Ocean

अंडमान-निकोबार कटक स्थित है:

(a) हिन्द महासागर में

(b) प्रशान्त महासागर में

(c) अन्ध महासागर में

(d) आर्कटिक महासागर में

उत्तर- (a) हिन्द महासागर में

Semester-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. State the importance of ozone layer in the atmosphere.

वायुमण्डल में ओजोन परत का महत्त्व बताइए।।

Discuss the composition of atmosphere.

वायुमडण्ल के संघटन की चर्चा कीजिए।

4. Why does Antarctic Bottom water have more nutrient than North Atlantic Bottom water?

उत्तर अटलाण्टिक नितल जल की तुलना में अन्टार्क्टिक तलीय जल में अधिक पोषक तत्व क्यों होते हैं?

5. Explain different air pressure belts on Earth.

पृथ्वी पर पायी जाने वाली विभिन्न वायुदाब की पेटियों को समझाइए।

6. Write the characteristics of anticyclone.

प्रतिचक्रवात की विशेषताओं को लिखिए।

7. Describe the general characteristics of ocean bottom.

महासागरीय तली की सामान्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe the structure and composition of atmosphere
with suitable diagram.

वायुमंडल की संचना एवं संघटन का सचित्र वर्णन कीजिए।

9. Discuss the different types of rainfall.

वर्षा के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

10. Describe the mechanism of cyclone.

चक्रवात की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

11. Explain Ocean bottom relief of either Pacific or Indian ocean.

प्रशान्त अथवा हिन्द महासाग के महासागरीय तल उच्चावच की व्याख्या कीजिए।

12. What is Ocean Salinity? Describe its different sources.

महासागरीय खारापन क्या होता है? इसके विभिन्न स्रोतों का वर्णन कीजिए।

37. Positivism in Geography (भूगोल में प्रत्यक्षवाद)

Positivism in Geography

(भूगोल में प्रत्यक्षवाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में प्रत्यक्षवाद की विवेचना करें।

(Discuss the Positivism in Geography.)

उत्तर- प्रत्यक्षवाद एक प्रकार का दार्शनिक आन्दोलन है। यह धर्म और परम्पराओं के विरुद्ध खड़ा हुआ सोच है। इसका वैज्ञानिक आधार और वैज्ञानिक विधि ज्ञान का स्रोत है। यह तथ्यों (आंकड़ों) और मूल्यों (सांस्कृतिक) में भेद व्यक्त करने वाला सोच है।

     ऑगस्ट कॉम्टे (Auguste Comte) ने अध्यात्म (Metaphysics) और कोरे बुद्धिवाद को जाँच व अन्वेषण की एक निरर्थक शाखा बताया है। वह मानवता के विकास के लिए सामाजिककता को वैज्ञानिक धरातल पर स्थापित करने का पक्षपाती था।

     प्रत्यक्षवाद को अनुभववाद (Empiricism) भी कहते हैं। इस दार्शनिक सोच में ज्ञान का आधार तथ्य है। तथ्यों को प्रेक्षण (Observation) द्वारा अनुभव कर उनमें संबंधों पर आधारित ज्ञान प्रत्यक्षवाद का मुख्य उद्देश्य है। इसमें आनुभविक प्रश्नों का हल यथार्थ के दृष्टिकोण पर आधारित है। यथार्थ स्थिति के विषय में ‘तथ्य स्वयं साधन’ बनते हैं। (Facts Speak for Themselves)। विज्ञान का नाता भी वस्तुपरक तथ्यों से है।

    व्यक्तिपरकता (Subjective View Point) का इसमें कोई स्थान नहीं है। यथार्थ वही है जो प्रत्यक्ष में दिखता है। हमारी इन्द्रियाँ जो कुछ अनुभव कर रही हैं, वही ज्ञान है, वही वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वस्तुपरक, सत्य से पूर्ण बना और तटस्थ होता है। प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक एकता के हामी हैं। वे यथार्थ के बारे में सामान्यानुभावों, सामान्य वैज्ञानिक भाषा और प्रेक्षणों की पुनरावृत्ति को सुनिश्चित बनाने की विधि के विश्वासी हैं।

     वैज्ञानिक विधि इन्हीं लक्षणों के एकीकरण से बना व्यापक विज्ञान है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि विज्ञान का आपूर्ण तंत्र भौतिकी, रसायन, जीव, मनोविज्ञान व सामाजिक विज्ञानों के नियमों के अन्तर्गत तार्किक रूप से जुड़ा तंत्र है।

    अतएव प्रत्यक्षवाद-दर्शन एक प्रकार से आदर्शवाद का विरोधी है, क्योंकि आदर्शवाद केवल मानसिक अथवा बुद्धिपरक है। वह नियामक और नीतिपरक भी नहीं है।

     मानव-मूल्यों, विश्वास, आस्था, अभिवृत्ति, पूर्वाग्रह, पक्षपात, रीति-रिवाज, परम्परा, रुचि, लालित्य व सौन्दर्यपरक मूल्यों से जुड़े प्रश्नों व समस्याओं में प्रत्यक्षवादी शोध नहीं करता क्योंकि इनका निर्णय व्यक्तिवादिता से ग्रसित होता है। ये नैतिक मापदण्ड देश, काल, समाजों के साथ-साथ बदलते रहते हैं, और इनके बारे में निर्णय वैज्ञानिक आधारों पर सम्भव नहीं है।

    प्रत्यक्षवाद का दर्शन वस्तुपरक, निष्पक्षता, तटस्थता पर आधारित विज्ञान है। प्रत्यक्षवाद में व्याख्या व कथनों का आधार-

(i) आनुभविक अर्थात् प्रत्यक्ष अनुभवों (जो कुछ हमारे सामने दृश्य-जगत्) से जुड़ा होता है।

(ii) वह एकीकृत बनी वैज्ञानिक विधि है।

(iii) वह अनुभवजन्य वैज्ञानिक नियमों व सिद्धांतों से जुड़ा है।

(iv) वह नियामक, नीति संगत, नैतिकता से मुक्त स्वतंत्र प्रेक्षण है।

(v) वह अपरिवर्तनीय, शाश्वत वैज्ञानिक व्यवस्था है जिसमें वैज्ञानिक नियमों के विकास-क्रम की एकीकृत बनी लोकव्यापी पद्धति सम्मिलित है।

     ऐतिहासिक रूप से इसका उदय फ्रांस की क्रांति के उपरान्त हुआ, और ऑगस्त कॉप्टे ने इसे स्थापित किया। क्रांति से पूर्व प्रचलित बना यह निषेधवादी-दर्शन (Negative Philosophy) की प्रतिक्रिया स्वरूप जन्मा वैज्ञानिक प्रत्यक्षवादी सोच था। निषेधवादी दर्शन न तो रचनात्मक था, और न प्रयोगात्मक (Practical)। वह भावना-प्रधान था जो काल्पनिक विकल्पों द्वारा वर्तमान प्रश्नों के हल खोजने में डूबा था।

     अतः, निषेधवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षवाद एक प्रकार से खण्डन-मण्डनी वाद-विवादों से लैस हथियार सिद्ध हुआ। प्रत्यक्षवाद का आन्दोलन घिसे-पिटे निषिद्ध कर्मों व धार्मिक प्रपंचों के विरुद्ध खड़ा हुआ था।

    प्रत्यक्षवाद सामाजिक संबंधों को वैज्ञानिक धरातल पर उतरने में विश्वास व्यक्त करता है। वह सामाजिक-विज्ञान (Social Science) को भी प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति शाश्वत नियमों में ढालने का पक्षपाती था। कॉम्टे के अनुसार सामाजिक विकास तीन चरणों में घटित हुआ-

(i) ईश्वर मीमांसा (Theological) का पहला चरण जब मानव प्रत्येक घटना अथवा दृश्य को ईश्वरीय सत्ता व ईश्वरीय समझकर व्याख्या करता था,

(ii) दूसरे चरण में सामाजिक व्यवस्था का विकास तात्विक, बुद्धिपरक, अभौतिक (Metaphysical) विचारों द्वारा व्याख्या, और

(iii) तीसरे चरण में सामाजिक क्रियाओं व विकास के आधार के कार्य-कारण संबंध का जुड़ाव (Causal Connection)।

     मानव अपने निर्णयों को संबंधित कारणों के आधार पर सुनिश्चित बना कर अपनाता है। ऐसे कारकों की पहचान की जा सकती है। प्रत्यक्षवादी सोच अधिनायकवादी शासनों (Dictatorial Regimes) में विकसित सोच के विरुद्ध है।

    सन् 1930 में वियना (यूरोप) में ‘वियना-सर्किल’ की स्थापना हुई। वह तर्कसंगत प्रत्यक्षवादियों का समूह था। ये वैज्ञानिक उन सभी विचारों का विरोध करते थे जो आनुभविक रूप से परीक्षण नहीं किए जा सकते और जो नियंत्रित बनी पद्धतियों से नहीं खोजे जा सकते। नाजीवादी सोच (Nazism) को प्रत्यक्षवादी तर्कशून्य, पक्षपाती और हठधर्मितापूर्ण मानते थे।

   मानव भूगोल में किए गए प्रत्यक्षवादी सोच पर आधारित कार्यों की मार्क्सवादियों और यथार्थवादियों ने आलोचना की। ये कार्य ऐसे नियमों की खोज थे जो साधन सामग्री (Infrastructure) प्रक्रिया से नहीं जुड़े थे। वे अस्तित्वहीन ऐसे ढाँचे के नियम थे जो संसाधनों के ताम-झाम में बदलाव लाने में विश्वासी नहीं थे ।

    मानवतावादियों ने भी प्रत्यक्षवादी सोच की आलोचना की है क्योंकि उसमें मूल्यों व आदर्शों को कोई स्थान नहीं था। मानव जीवन उनके अभाव में अधूरा होता है। मार्क्सवादियों, व्यवहारवादियों और वैज्ञानिक प्रेक्षकों के अनुसार मूल्य विहीन, मात्रात्मक-गणितीयकरण व नियम-निरूपण एवं विवेचन सम्भव नहीं हैं। परन्तु, प्रत्यवादियों की मान्यता है कि प्रत्येक समस्या का तकनीकी हल संभव है और मूल्यविहीन शोध ही वैज्ञानिक है। परन्तु, व्यवहार में यह देखा गया है कि शोध कार्य अनेक स्थलों पर व्यक्तिनिष्ठता से प्रभावित बन जाता है।

     शोध विषय के चयन से लेकर दृश्य-वस्तुओं के वितरण व प्रारूपों की पहचान और निष्कर्ष-निर्धारण प्रक्रियाओं में कुछ न कुछ अंश में व्यक्तिनिष्ठता प्रवेश कर जाती है। जैसे ही परिणाम ज्ञात हो जाते हैं, मौजूदा वितरण के विवरण निर्णयकत्ताओं के सोच को प्रभावित करना आरम्भ कर देते हैं कि भावी वितरण कैसा होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि वैज्ञानिक प्रक्रिया स्वयं ही यथार्थता का स्वरूप लेने लगी है। शोधकर्त्ता उदासीन और तटस्थ या वैज्ञानिक नहीं रह पाता।

     विज्ञानों में एकता भी आलोचना का पात्र है। सामाजिक वैज्ञानिकों में एकता का विकास सम्भव नहीं हो सका है। प्रत्येक विषय (समाज शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति विज्ञान, भूगोल आदि) के अपने-अपने अलग सोच व अभिगम हैं जिनके आधार पर वस्तुओं-दृश्य-जगत् आदि का विश्लेषण करते देखे जाते हैं। वे यथार्थता को अपनी-अपनी पद्धतियों, विधियों, अभिगमों आदि द्वारा व्यक्त करते हैं।

     एक अत्यन्त संगीन आलोचना प्रत्यक्षवाद की इस तथ्य पर आधारित है कि प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों की प्रकृति ही एक जैसे नहीं हैं। दोनों अलग प्रकृति की वैज्ञानिक-शाखाएँ हैं। वे प्रायोगिक दृष्टि से समान नहीं हैं। उनकी प्रयोगात्मक प्रक्रियाएँ (Experimental Processes) अलग-अलग हैं। उनको एक समान कोटि की विधियों द्वारा नहीं पूरा कर सकते हैं।

    सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु का केन्द्र ‘मानव’ है जिसे ‘वस्तु’ मानकर पदार्थवत् आकलन नहीं कर सकते क्योंकि उसका नीजी सोच व बुद्धि-कौशल है। मानव-व्यवहार अन्य जीवों के व्यवहार से भी अलग हैं। उसकी कल्पनाएँ, धारणाएँ, अभिवृत्ति, रुचि, आस्था आदि को प्राकृतिक विज्ञानों के वस्तु-जगत् की भाषा में नहीं बदला जा सकता। अतएव-व्यवहार प आधारित मानव भूगोल एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों के नियम-निरूपण में व्यक्तिनिष्ठता का घटक समाया रहता है।



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