Archives 2023

7. भू-राजनीति का अर्थ तथा इसका विकास

7. भू-राजनीति का अर्थ तथा इसका विकास



राजनीति का अर्थ     

   भू-राजनीति मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाख है। वर्तमान राजनीतिक भूगोल इसी का पूर्ण विकसित रूप है। इसके अन्तर्गत राज्य की अवस्थिति, संसाधन व समाज क उसकी राजनीतिक प्रक्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है, जिससे राज्य की शक्ति व नीति निर्धारित होती है और उस पर राज्य की प्रगति व कल्याण निर्भर करता है।

     भू-राजनीति की अवधारणा रैटजेल की जैविक राज्य संकल्पना तथा जेलेन की ज्योपोलिटिक संकल्पनाओं पर आधारित है। प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के पश्चात् जर्मनी के विद्वानों, विचारकों व सैन्य अधिकारियों द्वारा पराजय के कारणों का विश्लेषण किया गया। इस प्रक्रिया में विस्तारवादिता की नीति से जर्मनी की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के प्रयास किए गए।

      भू-राजनीति शब्द जर्मन भाषा के Geopolitik से व्युत्पन्न अंग्रेजी के Geopolitics से लिया गया है।

परिभाषा (Definition)- भू-राजनीति को विद्वानों ने इस प्रकार परिभाषित किया है:-

रूडोल्फ जेलेन के अनुसार, “भू-राजनीति राज्य के प्राकृतिक पर्यावरण से सम्बन्धित है। यह स्पष्ट करता है कि राज्य ऐतिहासिक एवं यथार्थ वास्तविकता में गहराई से प्रविष्ट है। यह जीव की भांति विकसित होता है और जीवधारी रचना का एक प्रमुख प्रकार है। जिस प्रकार एक मनुष्य होता है।”

हॉशोफर के अनुसार, “भू-राजनीति ‘क्षेत्र’ को राज्य के रूप में देखता है अर्थात् इसका समस्त अध्ययन ‘क्षेत्र’ पर ही केन्द्रित रहता है।”

ओटोमाल के अनुसार, “भू-राजनीति राज्य की क्षेत्रीय आवश्यकताओं से सम्बन्धित है, जबकि राजनीतिक भूगोल केवल राज्य की स्थानिक पारिस्थितियों का परीक्षण करता है।”

भूराजनीति का विकास-

       भूराजनीति के विकास में मुख्यतः जर्मन भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान रहा है। इनके अनुसार राज्य एक भूराजनीतिक जीव है तथा इसे जीवित रखने के लिए क्षेत्र की आवश्यकता होती है। राज्य के विकास के अनुसार क्षेत्र विस्तार की आवश्यकता में वृद्धि होती जाती है। फ्रेडरिक रैटजेल इस विचार के जनक रहे हैं।

     स्वीडिश विद्वान जेलेन ने रैटजेल के विचारों को स्पष्ट भी किया है और इनकी पुष्टि भी की है। जेलेन के अनुसार राज्य रूपी जीव का शरीर क्षेत्र है, सीमाएं अंतस्थ अंग हैं, उत्पादन क्षेत्र भुजाएं हैं, परिवहन के साधन रक्त तन्त्र है तथा राजधानी उसका मस्तिष्क, हृदय तथा फेफड़ा हैं। भूराजनीति में इन विचारों को और अधिक विकसित करने में जर्मन भूराजनीतिज्ञ होशोफर का भी सक्रिय एवं व्यावहारिक योगदान रहा है।

रैटजेल का योगदन (1844-1904)-

      यदि काण्ट को राजनीतिक भूगोल का जनक कहा जा सकता है तो रैटजेल को इसके पोषक एवं पालनकर्ता के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। यद्यपि रेटजेल जर्मन विदेश नीति से सम्बन्धित समस्याओं से पृथक रहे और उन्होंने केवल राज्य-विकास सम्बन्धी सैद्धान्तिक विचार प्रस्तुत किए फिर भी इनके विचारों ने न केवल राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में राष्ट्र शक्ति दृष्टिकोण को जन्म दिया अपितु अप्रत्यक्ष रूप में भू-राजनीतिक विचारों को भी जन्म दिया।

    रैटजेल के अनुसार राज्य के पोषण क्षेत्र को ही लैबेन्स् रॉम अर्थात् निर्वाह क्षेत्र कहा जाता है। जिसे प्राप्त करने के लिए राज्य को सदैव संघर्षरत रहना पड़ता है तथा अस्तित्व के लिए किया गया संघर्ष क्षेत्र संघर्ष में परिवर्तित हो जाता है। इतिहास में संघर्ष सदैव प्रभावकारी कारक रहा है। राज्य विकास के लिए क्षेत्र चेतना एवं राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से उपयोगी क्षेत्रों पर नियन्त्रण आवश्यक होता है। उसने बताया कि राज्य क्षेत्र के प्रसारण तथा संकुचन के अनुसार सीमान्त परिवर्तित होते रहते हैं और ये राज्य प्रसार, शक्ति तथा परिवर्तन को प्रतिबिम्बित करते हैं।

      सीमान्त की चौड़ाई संलग्न राज्यों की प्रकृति पर निर्भर करती है अर्थात् यदि विकसित एवं कम विकसित राज्यों के मध्य सीमान्त की चौड़ाई सर्वाधिक होती है तो समान रूप से विकसित राज्यों के मध्य न्यनूतम । साथ ही सीमावर्ती समुदाय अपनी परिधीय स्थिति के कारण स्वतन्त्रता की अभिलाषा रखते हैं। रैटजेल के अनुसार राज्य एक जैविक सत्ता है जो मानवीय एवं धरातलीय अंशों से निर्मित है। राज्य का प्रारम्भिक क्षेत्र नाभि क्षेत्र कहलाता है तथा इसी क्षेत्र से राज्य का क्षेत्रीय प्रसार होता है।

जेलेन का योगदान-

      जेलेन ने रैटजेल के विचारों को और अधिक स्पष्ट किया तथा भूराजनीति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। जेलेन ने राज्य के अध्ययन हेतु भूराजनीति, जनसंख्या राजनीति, आर्थिक संसाधन राजनीति, समाज राजनीति और राज्य प्रशासन विषयों का विश्लेषण आवश्यक माना। रैटजेल की भांति इन्होंने राज्य को न केवल एक जैविक इकाई ही माना अपितु नैतिक तथा बौद्धिक गुण सम्पन्न चेतन सत्ता के रूप में देखा। रैटजेल के अनुरूप जेलेन की भी यह मान्यता थी कि राज्य विकास का अन्तिम उद्देश्य शक्ति संग्रहण है। इनकी यह भी मान्यता थी कि शक्ति संग्रहण केवल क्षेत्रीय प्रसार के सरल जैविक नियमों के अनुसार ही नहीं होता है अपितु इसके लिए आधुनिक प्रगति एवं तकनीकी विकास की भी आवश्यकता होती है।

    राज्य शक्ति के विकास हेतु बाह्य दृष्टिकोण से प्राकृतिक सीमान्त एवं आन्तरिक दृष्टिकोण से समन्वित एकता प्राप्त करना आवश्यक है। विश्व राजनीति के क्षेत्र में भविष्यवाणी करते हुए इन्होंने कहा था कि सामुद्रिक शक्ति पर आधारित साम्राज्यों की सत्ता के स्थान पर महाद्वीपीय शक्ति पर आधारित साम्राज्य अधिक शक्ति सम्पन्न हो जाएंगे जो कालान्तर में समुद्रों पर भी नियन्त्रण करेंगे। इनके साथ ही इन्होंने यह भी कहा कि अन्त में कुछ विशालकाय राज्यों का उद्भव एवं विकास होगा जिनमें यूरोप, अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में जर्मनी महान शक्ति के रूप में उभरेगा।

       ग्रेट ब्रिटेन के वयोवृद्ध अनुभवी तथा बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न भूगोलवेत्ता मेकिण्डर ने सार्वभौम स्तर पर राज्यशक्ति विकास की व्याख्या हेतु महाद्वीपीय शक्ति सम्बन्धी नवीन विचार प्रस्तुत किए। मेकिण्डर ने 1919 में अपनी हृदय स्थल सम्बन्धी अवधारणा को निम्न शब्दों में प्रस्तुत किया-

जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, वही हृदय स्थल को नियंत्रित करेगा।

जो हृदय स्थल पर शासन करेगा, वही विश्व द्वीप को नियंत्रित करेगा।

जो विश्व द्वीप पर शासन करेगा, वही विश्व को नियंत्रित करेगा।

      मेकिण्डर के समकालीन जर्मन भूराजनीतिज्ञ कार्ल होशोफर मेकिण्डर के विचारों से न केवल प्रभावित हुए अपितु उन्होंने अपने भूराजनीतिक विचारों की पुष्टि हेतु इनके विचारों का प्रयोग किया। स्पष्ट है कि मेकिण्डर ने अपने विचारों द्वारा जर्मन भूराजनीति को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित किया।

       दो विश्वयुद्धों के मध्य के काल को भूराजनीति के विकास का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। इस काल में जेलेन द्वारा स्थापित भूराजनीति को कार्ल होशोफर और उनके अनुयायियों ने और भी अधिक सुदृढ़ बनाया। होशोफर के विचारों ने जर्मन विदेश नीति को प्रभावित करने के साथ हिटलर की युद्ध एवं प्रसार नीति को भी प्रभावित किया। भूराजनीति किसी एक विद्वान के विचारों की उपज नहीं है, अपितु अनेक विद्वानों के विचारों का फल है।

       रैटजेल, महान, मेकिण्डर जेलेन, आदि विद्वानों ने भूराजनीति सम्बन्धी विचार सैद्धान्तिक स्तर पर प्रस्तुत किए तो कार्ल होशोफर ने उन विचारों को शाब्दिक अभिव्यक्ति एवं व्यावहारिक सन्दर्भ प्रदान करने के साथ-साथ उनका प्रचार एवं प्रसार भी किया। फलस्वरूप जर्मन भूराजनीति के रूप में यह राजनीतिक भूगोल से अलग हटकर राज्य के क्षेत्रीय विस्तार के अधिकार को दर्शाने वाली संकल्पना के रूप में विकसित हुई।

कार्ल होशोफर का योगदान (1869-1946)-

      होशोफर जेलेन तथा मेकिण्डर के समकालीन थे। भूराजनीति के क्षेत्र में इनका चिन्तन यद्यपि जापान प्रवास काल से ही प्रारम्भ हो गया। था फिर भी म्यूनिख विश्वविद्यालय में जाने के पश्चात् ही इनका भूराजनीतिक अध्ययन परिपक्वता प्राप्त कर सका। यहाँ इन्होंने Institut fur Geopolitik नामक संस्था की स्थापना की एवं 1924 में ओटोमोल एवं एरिक ओबस्ट के साथ Zeitschrift fur Geopolitik नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन प्रारम्भ किया। कार्ल होशोफर के भूराजनीति सम्बन्धी विचार निष्कर्ष रूप में निम्नांकित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किए जा सकते हैं-

⇒ उनके अनुसार राज्य एक जैविक सत्ता है। राज्य के लिए क्षेत्र अथवा रॉम प्रथम आवश्यकता है।

⇒ निर्वाह क्षेत्र (लैबेन्स् रॉम) का विचार होशोफर द्वारा विकसित भूराजनीति का केन्द्र बिन्दु माना जाता है।

⇒ राज्य शक्ति के उपार्जन हेतु क्षेत्र विस्तार अपरिहार्य है तथा जर्मनी के लिए क्षेत्र विस्तार पूर्व दिशा में स्लाव क्षेत्र में ही सम्भव है।

⇒  राज्य के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता (ओटोरकी) आवश्यक है जिसकी प्राप्ति क्षेत्रीय प्रसार द्वारा ही सम्भव है।

⇒ भूराजनीतिक दृष्टि से प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

⇒ जर्मनी के लिए ग्रेट ब्रिटेन की शक्ति का विनाश आवश्यक है। पूर्वी गोलार्द्ध में अमेरिकी हस्तक्षेप अवांछनीय है। जर्मनी के नेतृत्व में सोवियत संघ, भारत, चीन तथा जापान के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध वांछनीय है तथा सोवियत संघ से जर्मनी का संघर्ष अनुचित है।

⇒ मेकिण्डर द्वारा वर्णित धुरी क्षेत्र के कारण भी जर्मनी का सोवियत संघ से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखना आवश्यक है, क्योंकि वह क्षेत्र शक्ति आधार रूप में है।

⇒ जर्मन भूराजनीतिज्ञों ने हृदय स्थल में आर्थिक और सैन्य समझौतों के माध्यम से मैत्रीपूर्ण ढंग से प्रवेश करने और उसके क्षेत्रों को जर्मन प्रभुत्व में लाने पर बल दिया।

      होशोफर के अनुसार भूराजनीति एक गतिक विज्ञान है जो राज्य के असीमित प्रसार की इच्छा को व्यक्त करता है तथा विश्वव्यापी परिवर्तनशील अवस्थाओं का क्षेत्र अनुप्राणित दृष्टि से अध्ययन करता है। इसके विपरीत राजनीतिक भूगोल स्थितिक एवं विवरणात्मक अध्ययन मात्र ही है। उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि होशोफर के भूराजनीतिक विचार जर्मन राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत किए गए थे।

     यह उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के साथ ही होशोफर और उनके साथियों द्वारा परिश्रम से निर्मित भूराजनीति का प्रासाद ध्वस्त हो गया एवं पर्याप्त समय तक भूगोलवेत्ता तथा राजनीतिशास्त्रियों द्वारा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

    ग्लोबीय सम्बन्धों का भूराजनीतिक अध्ययन अमेरिकी राजनीति शास्त्री स्पाइकमेन एवं ब्रिटिश भूगोलवेत्ता फेअरग्रीव ने मेकिण्डर के हृदय स्थल सिद्धान्त के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। जेम्स फेअरग्रीव ने अपनी पुस्तक The Geography of World Power के प्रथम संस्करण में अपने विचार प्रस्तुत किए एवं कुछ समय पश्चात् अपने विचारों में संशोधन करते हुए हृदय स्थल, सामुद्रिक शक्ति एवं इन दोनों के मध्य सन्तुलन मण्डल का उल्लेख किया।

निकोलस जे. स्पाइकमेन (1893-1943)-

       इन्होंने मेकिण्डर की हृदय स्थल अवधारणा का खण्डन अपने परिधीय स्थल-खण्ड (Rimland) सिद्धान्त के माध्यम से किया। स्पाइकमेन ने अपने सिद्धान्त की व्याख्या निम्नांकित शब्दों में अभिव्यक्त की-

जो परिधीय स्थल खण्ड पर नियंत्रण करता है,

वही यूरेशिया पर शासन करेगा,

जो यूरेशिया पर शासन करेगा, वही विश्व निर्यात को नियंत्रित करेगा।

   स्पाइकमेन राष्ट्र शक्ति एवं विदेशी नीति की दृष्टि से विश्व में राज्य की स्थिति का अध्ययन आवश्यक मानते हैं। इसी कारण से कहा जाता है कि स्पाइकमेन के विचार राष्ट्र शक्ति दृष्टिकोण पर आधारित होने के साथ-साथ भूराजनीतिक भी हैं, क्योंकि ये विचार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रकट किए गए हैं।

      स्पाइकमेन की इस भूराजनीतिक अवधारणा का अभिप्राय यह था कि हृदय स्थल के आन्तरिक पेटी के समुद्रीय राष्ट्र अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन पर नियंत्रण करने वाला राज्य ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महान शक्तिशाली बन सकता है। स्पाइकमेन की यही अवधारणा आगे चलकर संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति का आधार बनी।

     स्पष्ट है कि जर्मन भूराजनीति का संकल्पनात्मक विकास रैटजेल की राज्य विकास की जैवीय अवधारणा, जेलेन की भूराजनीति और लैबेन्स् रॉम एवं खिसकते सीमान्त की विचारधाराओं तथा मैकिण्डर की हृदय स्थल के सिद्धान्त को आधार मानकर ही हुआ।

     द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् भूराजनीति की पुनर्स्थापना के अतिरिक्त ग्लोबीय सम्बन्धों का भूराजनीतिक अध्ययन ईस्ट, मीनिंग, डाल, डीसेवेरस्की, ईस्ट एवं मूडी, सूजन, आदि विद्वानों द्वारा प्रस्तुत किया गया। इन विद्वानों द्वारा किया गया अध्ययन मुख्य रूप से मेकिण्डर तथा स्पाइकमेन द्वारा प्रतिपादित हृदय स्थल एवं परिधीय स्थल-खण्ड सिद्धान्तों के पुनरावलोकन के रूप में है। भूराजनीति के अध्ययन में शक्ति विश्लेषण उपागम का प्रयोग अधिक किया गया।

      इस उपागम के अनुसार राज्य के आन्तरिक एवं बाह्य सम्बन्ध शक्ति उपार्जन एवं संगठन से सम्बन्धित हैं तथा राज्य को शक्ति क्षेत्र की दृष्टि से देखा जाता है। राज्य संगठन ही राज्य शक्ति है एवं राज्य शक्ति ही संगठन है। इस उपागम के प्रतिपादकों ने राज्य के विकास की जैवीय प्रक्रिया का अनुकरण करते हुए सामाजिक डार्विनवाद को अपनाया और यह माना गया कि सबसे शक्तिशाली राज्य ही अपने अस्तित्व को बनाए रख सकता है। इसके लिए राज्य के विभिन्न प्राकृतिक और मानवीय तत्वों का शक्ति के निर्धारक रूप में वर्णन किया जाने लगा। इस उपागम के परिणामस्वरूप जर्मन भू-राजनीति ब्रिटिश तथा अमेरिकी विद्वानों ने अपने-अपने देश के सन्दर्भ में भूराजनीतिक दृष्टिकोणों की परिकल्पना की।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-राजनीति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके विकास को समझाइए।



6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

प्रवास अथवा प्रव्रजन

     प्रवास को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं। इनमें समय, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार कभी कोई तत्व प्रभावशाली रहता है, तो कभी कोई दूसरा। वास्तव में प्रवास को प्रभावित करने में आकर्षण व प्रत्याकर्षण का महत्व होता है। एक स्थान से लोग दूसरे स्थान को तभी प्रवास करते हैं, जब उनके अपने स्थान में कोई आकर्षण नहीं होता है। इस प्रकार प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-

(1) आकर्षक कारक (Pull factors)

(2) प्रत्याकर्षण कारक (Push factors)

(1) आकर्षक कारक

       लोगों का कम विकसित क्षेत्रों, ग्रामों, आदि से ऐसे क्षेत्रों में जाना, जहाँ उनको उन्नति के अधिक अवसर मिलते हैं। ऐसे अवसरों को आकर्षक कारक के रूप में रखा जाता है। यह अवसर निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(i) आर्थिक प्रगति के अधिक अवसर,

(ii) रोजगार के अवसर,

(iii) उच्च शिक्षा प्राप्ति का अवसर,

(iv) वैज्ञानिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के अवसर,

(v) सुरक्षा व न्याय के अवसर,

(vi) जीवन स्तर सुधारने के अवसर,

(vii) राजनीतिक स्थायित्व होना,

(viii) स्वास्थ्यप्रद वातावरण में रहने के अवसर।

       प्रवास को आकर्षित करने वाले कारकों में प्रवाहित क्षेत्र की विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था, अनुकूल आवास कानून, कृषि भूमि की उपलब्धता, आदि महत्वपूर्ण हैं। जापान में श्रमिकों की कमी ने बड़ी संख्या में प्रवासियों को अपने यहाँ आवासित होने के लिए आकर्षित किया है। इन आवासियों में अधिकांश लोग कम वेतन पर ऐसे खतरे वाले काम करते हैं जिन कामों को जापान के मूल निवासी नहीं करते हैं।

(2) प्रत्याकर्षण कारक

    जब लोग अपने निवास स्थान में रहना नहीं चाहते। वहाँ उन्हें अपना जीवन निराशाजनक लगता है। ऐसा निम्नलिखित परिस्थितियों में सम्भव होता है।
(i) रोजगार सुविधाओं का अभाव,

(ii) स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,

(iii) गरीबी, निम्न जीवन स्तर का होना,

(iv) सुरक्षा व न्याय की कम सुविधाएं,

(v) राजनीतिक अलगाववाद का प्रभाव और गृह भूमि पर युद्ध की आशंका,

(vi) उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा सुविधा का अभाव,

(vii) परम्परावादी व रूढ़िवादी संस्कृति का प्रभाव,

(vii) रोजगार की कठिन परिस्थितियों का होना,

(viii) प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव (सूखा एवं अकाल)।

     1929-1939 की अवधि में संयुक्त राज्य अमेरिका में आया महान मंदी का दौर (Great Depression) प्रत्याकर्षण का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका में आवासन की अपेक्षा प्रवसन अधिक हुआ। इसी प्रकार 1980-90 के दशक में अकाल एवं युद्ध के कारण हजारों अफ्रीकन लोग अपने मूल स्थान से प्रवासित होकर पड़ोसी देशों में आवासित होने को मजबूर हुए।

     सामान्य तौर पर प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों में निम्नलिखित महत्व होते है:-

1. प्राकृतिक कारक (Natural Factors)-

       प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकम्प, ज्वालामुखी, बाड़, सूखा, तूफान, भूस्खलन, जलवायु की कठोरता, आदि के कारण लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास कर जाते हैं। विश्व के विभिन्न भागों में मौसमीय प्रवास (Transhumance) मानवीय समूहों द्वारा जलवायु की कठोरता के दुष्प्रभाव से बचने तथा रोजगार जुटाने के उद्देश्य से किया जाता है। समुद्रतटीय भागों में तूफान से प्रभावित क्षेत्रों तथा नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से लोग सुरक्षित स्थलों पर प्रवास कर जाते हैं। वास्तव में वह क्षेत्र जो किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा की आशंका से ग्रस्त होते हैं, लोग सुरक्षित क्षेत्रों पर प्रवास कर जाते हैं।

2. आर्थिक कारक (Economic Factors)-

      विश्व के अधिकांश प्रवासों को प्रभावित करने में आर्थिक कारकों का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। नए-नए क्षेत्रों में कृषि का विस्तार, नई-नई खानों का पता लगना, उद्योग धन्धों का विस्तार होना, यातायात सुविधाओं में सुधार होना, आदि विशेषताएं रोजगार के नए-नए अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होती हैं। इसी कारण लोग रोजगार के नए क्षेत्रों में आकर बस जाते हैं। पिछली तीन शताब्दियों में यूरोपीय लोगों का विश्व के विभिन्न भागों में रोजगार की तलाश में वहाँ जाकर बसना, वर्तमान में अनेक भारतीयों का अमेरीका तथा विश्व के अन्य भागों में रोजगार के कारण बस जाना, बिहार के श्रमिकों का पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश में मजदूरी कार्यों के लिए प्रवास करना, आर्थिक कारकों का ही परिणाम है।

3. सामाजिक व सांस्कृतिक कारक (Social and Cultural Factors)-

      सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक व सांस्कृतिक सम्पर्क, धर्म प्रचार, आदि ऐसे सामाजिक कारक हैं, जिनके कारण लोग अपना जन्म स्थान छोड़ने को बाध्य हो जाते हैं। धार्मिक श्रद्धा लोगों को धर्म स्थल पर बसने के लिए प्रेरित करती है। धार्मिक आयोजन मेले व विशेष पर्व पर लोग प्रवास करते हैं।

       लाखों हज यात्री प्रतिवर्ष मक्का व मदीना धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं। उच्च व तकनीकी शिक्षा की प्राप्ति, उच्च चिकित्सा हेतु भी लोग प्रवास करते हैं। खेलों का आयोजन, जैसे क्रिकेट, हॉकी टूर्नामेन्ट, कुम्भ मेला, विशेष तिथि पर लगने वाले बड़े-बड़े मेले, नौचन्दी मेला, वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए प्रतिवर्ष लाखों भक्तजनों का जाना, आदि ऐसे कारक हैं, जो किसी न किसी रूप में अस्थायी प्रवास के साथ-साथ स्थायी प्रवास को बढ़ावा देते हैं।

4. राजनीतिक कारक (Political Factors)-

      इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक कारकों ने प्रवास को सबसे अधिक प्रभावित किया है तथा प्रवास की आवश्यक मजबूरी बनाया है। भारत-पाक विभाजन, दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति, पड़ोसी देश से राजनीतिक सम्बन्धों में बिगाड़ के कारण सीमा क्षेत्र पर युद्ध स्थिति बने रहना, आदि तत्व जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कर रहे हैं।

       वर्तमान में लंका में जातीय संघर्ष के कारण श्रीलंकाई तमिल भारत के तमिलनाडु तट में आकर बस रहे हैं। तिब्बत से बौद्ध लोगों का भारत आकर बसना भी राजनीतिक प्रवास का उदाहरण है। 18वीं व 19वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरीका व ब्रिटेन के लोगों ने दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड, आदि देशों के मूल निवासियों को बलपूर्वक वहाँ से खदेड़ दिया तथा वहाँ पर नए राष्ट्रों की स्थापना की।

     कई बार सरकारी नीतियाँ भी प्रवास को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए मध्य-पूर्व के देशों ने आवास को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में आवासीय लोगों को मुफ्त में कृषि योग्य भूमि प्रदान की गई है। 1990 में जापान ने लेटिन अमेरिका से आए लोगों को रोजगार के अधिकार एवं आवासीय सुविधाएं प्रदान की।

5. जनांकिकी कारक (Demographic Factors)-

      इसके अन्तर्गत कृषि भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या का दबाव, कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या, नगर के भीतरी भाग से नगर के बाहरी छोरों पर लोगों का बसना, उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों से कम घनत्व वाले क्षेत्रों की ओर लोगों का जाकर बसना, आदि तत्व शामिल हैं। इनके अलावा साक्षरता की दर, विशेष जाति या धर्म के लोगों को कहीं अधिक प्रोत्साहन मिलना, असन्तुलित लिंग अनुपात, आदि बातें भी प्रवास को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करती हैं। आस्ट्रेलिया व दक्षिण अफ्रीका की रंग भेदी नीतियों ने काले लोगों के प्रवास पर रोक लगा दी थी।

       वर्तमान में रूस व यूक्रेन के बीच युद्ध, इजराइल व फिलीस्तीन के बीच मतभेद, आदि जनांकिकी प्रवास को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहे हैं। एक राज्य का दूसरे राज्य के लोगों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार भी जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कता है।

प्रश्न प्रारूप

1.  प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।



5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)

5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)



प्रव्रजन

         मानव का वह कार्यकलाप, जिसके द्वारा वह अपने निवास स्थान से कहीं अन्यत्र स्थान पर एक निश्चित लम्बी अवधि लिए कुछ विशेष उद्देश्य के साथ बस जाता है, तो उसे स्थानान्तरण कहते हैं।

     इसमें मानव का अस्थायी रूप से अन्य स्थान पर जाना, मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करना, नगर में रोजाना अन्य नगरों व उपान्त क्षेत्रों से आना जाना, श्रमिकों का फसल मौसम में एक स्थान से दूसरे स्थानों पर जाना, नगर के भीतर निवास परिवर्तन, आदि को स्थानान्तरण की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। यह सभी अस्थाई प्रवास संचरण (Circulation) की श्रेणी में शामिल किए जाते हैं।

     जनसंख्या स्थानान्तरण की विशेषताओं को इस प्रकार रखा जा सकता है:

(1) निवास स्थान व नवीन स्थान के बीच समुचित दूरी होना।

(2) नवीन स्थान पर रुकने की अवधि दीर्घकालिक होना।

(3) नवीन स्थान पर किसी विशेष उद्देश्य से जाकर बसना।

(4) नवीन बसे स्थान के कार्यकलापों का निवास-स्थान के कार्यकलापों से भिन्न होना।

(5) नवीन स्थान पर बसने वाले लोगों का अपने आपको बेहतर स्थिति में अनुभव करना।

प्रवास के प्रकार (TYPES OF MIGRATION)

     प्रवास को वर्गीकृत करने के अनेक आधार हैं। इन आधारों में समय, दूरी, स्थान, उद्देश्य उल्लेखनीय हैं।

(1) दूरी के आधार पर

⇒ जब स्थानान्तरण थोड़ी-सी दूरी के लिए होता है, तो उसे छोटी दूरी (short distance) स्थानान्तरण कहते हैं।

⇒ जब स्थानान्तरण लम्बी दूरी के प्रवास से जुड़ता है तो उसे लम्बी दूरी (long distance) स्थानान्तरण कहते है।

(2) क्षेत्र के आधार पर

1. राष्ट्रीय प्रवास:-

       इसे आन्तरिक प्रवास भी कहते हैं। यह प्रवास एक राष्ट्र के भीतर किसी भी स्थान के लिए बिना किसी रोकटोक के होता है। यह आन्तरिक प्रवास चार वर्गों में बांटा जा सकता है-

(i) गांवों से नगरों की ओर प्रवास,

(ii) नगरों से गांवों की ओर प्रवास,

(iii) गांवों से गांवों की ओर प्रवास,

(iv) नगरों से नगरों की ओर प्रवास।

        इनमें गांवों से नगरों की ओर तथा छोटे नगरों से महानगरों की ओर लोगों का प्रवास अधिक संख्या में होता है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास:-

      इसे बाह्य प्रवास भी कहते हैं। इसमें प्रवास एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के लिए होता है। यह प्रवास स्थानान्तरण किए जाने वाले राष्ट्र की प्रवास नीतियों पर निर्भर करता है।

(3) समय या काल के आधार पर

       प्रवास अध्ययन के काल पक्ष के अन्तर्गत प्रवासन या आवासन समय को महत्वपूर्ण माना गया है। इस दृष्टि से इसका अध्ययन निम्नांकित रूप में किया जा सकता है।

(i) दीर्घकालीन प्रवास:-

      इसमें प्रव्रजन की कालिक प्रवृत्ति दीर्घकालीन होती है। ऐसे प्रव्रजन प्रायः अन्तर्महाद्वीपीय व अन्तर्राष्ट्रीय हुआ करते हैं। 18-19वीं शताब्दी में यूरोप महाद्वीप से उत्तरी अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका, आदि महाद्वीपों में जाकर बसे एवं विकास कार्य किए। कुछ देशों में भी लोग राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, आदि कारणों से दीर्घकालीन प्रवास व आवासन करते रहते हैं।

(ii) अस्थायी या मौसमी प्रवास:-

      अस्थायी प्रव्रजन अल्पकालिक होता है इसके अन्तर्गत जनसंख्या किसी देश अथवा स्थान में स्थायी रूप से बसती नहीं है। बल्कि अपने उद्देश्यों की पूर्ति के पश्चात् पुनः अपने मूल स्थान को प्रत्यावर्तित हो जाती है। इसी के अन्तर्गत एक अन्य तरह का प्रवास होता है जिसे मौसमी प्रवास (Transhumance) की संज्ञा दी जाती है। ऐसे प्रवास क्षेत्रीय उच्चावच व जलवायु से प्रभावित होते हैं।

       इस प्रकार के प्रवास का सुन्दर उदाहरण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों के बकरवाल, भोटिया, बछी आदि पशुचारकों से लिया जा सकता है जो ग्रीष्म ऋतु में पर्वतों पर जाकर पशुचारण करते हैं तथा शीत ऋतु में मैदानी भागों की ओर वापस आ जाते हैं। ऐसे उदाहरण विश्व के अनेक क्षेत्रीय पशुचारक जन-जातियों से ग्रहण किए जा सकते हैं।

(iii) दैनिक प्रवास:-

      इस प्रकार का प्रव्रजन पूर्णरूपेण अस्थायी होता है। ऐसे प्रव्रजन के अन्तर्गत बड़े-बड़े नगरों, कस्बों, आदि में ग्रामीण क्षेत्रों से मजदूरी करने, दूध, शाक-सब्जी बेचने एवं अध्ययन अध्यापन व अन्य कार्यों से आना जाना होता है जिसकी अवधि मात्र दिनभर की होती है।

(4) उद्देश्य के आधार पर

       स्थानान्तरण जिस उद्देश्य से किया जाता है, वह निम्न चार प्रकार का होता है-

(i) आर्थिक प्रवास,

(ii) सामाजिक प्रवास,

(iii) धार्मिक प्रवास,

(iv) राजनीतिक प्रवास।

       एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में जाने वाले व्यक्ति को आप्रवासी या आगन्तुक (Immigrants) कहते हैं। जिस राष्ट्र से वह व्यक्ति दूसरे राष्ट्र को जाता है, उस राष्ट्र की दृष्टि से यह बहिर्गन्तुक (Emmigrants) या प्रवासी कहलाता है।

       ब्राइडे ने अपनी पुस्तक ‘Human Geography : Principles, Processes and Pattern’ में प्रवास को दो प्रमुख वर्गों में रखा है:

1. अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास (Inter-continental migra tion)-

      विश्व में एक देश से दूसरे देश अथवा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप के देशों की प्रवास अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास कहलाता है।

2. आन्तरिक प्रवास (Internal migration)-

      यह चार प्रकार के होते हैं:

(a) अन्तप्रदेशीय प्रवास (Inter-regional migration)-

      जब किसी देश के एक भाग से दूसरे भाग में लोग काम की तलाश में जाकर बस जाते हैं, तो ऐसे प्रवास को अन्तप्रदेशीय प्रवास कहते हैं। सामान्यतया कम विकसित क्षेत्रों से लोग विकसित क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

(b) सामयिक या मौसमी प्रवास (Periodic or seasonal migration)-

     जब प्रवास किसी समय विशेष पर आधारित हो। जैसे शीतकाल में चरवाहे लोग ऊंचे पहाड़ी भागों से निम्न भू-भागों में चले जाते हैं और ग्रीष्मकाल में पुनः वापस पहाड़ी भागों में आ जाते हैं।
(c) ग्रामीण-नगरीय प्रवास (Rural-urbanmigration)-

      वह प्रवास जिसमें लोग रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्र से नगरों में जाकर बस जाते हैं।

(d) कार्य-यात्रा प्रवास (Work-travel migration)-

       जब लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को काम कने के लिए रोजाना इधर से उधर आते जाते हैं, तो इसे कार्य यात्रा प्रवास कहते हैं। सैकड़ों कार्यकर्ता रोजाना सुबह बड़े महानगरों में विभिन्न साधनों से जाते हैं औ शाम वापिस अपने घरों को लौट जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration) किसे कहते है? प्रवास के प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिये।



4. जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र

जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र


प्रश्न प्रारूप

1. जनसंख्या भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

जनसंख्या भूगोल की

       जनसंख्या भूगोल मानव भूगोल की एक शाखा है, जिसमें मानव संख्या के मात्रात्मक एवं गुणात्मक पहलुओं का और इनके वितरण से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः जनसंख्या भूगोल मानव का अध्ययन है, चूंकि मानव ही किसी क्षेत्र की विशेषताएँ एवं विभिन्नताएँ प्रदान करता है, अतः जनसंख्या भूगोल में मानव संख्या के वितरण में व्याप्त क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन एवं समीक्षा कारण सहित की जाती है।

⇒ जे. आई. क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या के वितरण, संघटन, प्रवास और वृद्धि में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। साथ ही ये स्थानिक भिन्नताएं क्षेत्र विशेष की प्रकृति में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं से किस प्रकार से सम्बन्धित होती हैं, का भी अध्ययन किया जाता है।

       इस प्रकार जनसंख्या भूगोल का सम्बन्ध स्थानिक भिन्नताओं के साथ-साथ क्षेत्र के भौतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक घटकों से है। क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल जनसंख्या में प्रादेशिक अन्तरों को उसके भौतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सन्दर्भ में समझने का प्रयास करता है।

⇒ विल्वर जेलिंस्की के अनुसार जनसंख्या भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो किसी क्षेत्र की जनसंख्या के विविध पहलुओं का अध्ययन उस क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में करता है। इनके अनुसार जनसंख्या के विभिन्न लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण में पायी जाने वाली समानताओं एवं असमानताओं हेतु उत्तरदायी कारकों का और जनसंख्या की दृष्टि से क्षेत्रों का वर्तमान भौगोलिक स्वरूप कैसे बना है, इन सभी का अध्ययन जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जे. व्युजे गारनियर ने फ्रांसीसी भाषा में लिखी गई अपनी पुस्तक जिसका अनुवाद बीवर ने Geography of Population के नाम से किया है, में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल वर्तमान वातावरण के सन्दर्भ में जनांकिकी तथ्यों का वर्णन है। साथ ही जनांकिकी तथ्यों के कारणों, मूलभूत विशेषताओं और संभावित परिणामों का अध्ययन भी जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जी. जे. डैम्को ने अपने द्वारा सम्पादित पुस्तक Population Geography : A Reader में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल, भूगोल की वह शाखा है जिसमें किसी क्षेत्र के जनांकिकी लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का विश्लेषण किया जाता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय दशाओं की आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया से उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक प्रतिफलों का अध्ययन भी किया जाता है। इन सभी पक्षों पर चूंकि समय का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है इसलिए समयानुसार जनसंख्या वितरण के क्षेत्रीय प्रारूप को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है। डैम्को ने ऐसे मॉडल विकसित करने पर भी जोर दिया। जिनके द्वारा किसी क्षेत्र के समस्त जनसंख्या लक्षणों को निर्धारित करने वाली प्रक्रियाओं को भली-भांति समझा जा सके।

      निष्कर्षतः जनसंख्या का अध्ययन भौगोलिक अध्ययन का मुख्य केन्द्र बिन्दु है। वस्तुतः मानव (जनसंख्या) वह संदर्भ बिन्दु अथवा केन्द्र बिन्दु है जिसको केन्द्र में रखते हुए क्षेत्रीय लक्षणों का अवलोकन और निर्धारण किया जाता है। ज्ञातव्य है। कि मानव (जनसंख्या) से ही अन्य भौगोलिक तत्वों को अर्थ एवं महत्व मिलता है।

       उदाहरण के लिए मानव के संदर्भ में ही किसी स्थान विशेष की जलवायु को अर्थपूर्ण नाम एवं महत्व मिल पाता है। इसी प्रकार से किसी भी प्राकृतिक पदार्थ की संसाधनता भी मानव उपयोगिता के संदर्भ में ही अस्तित्व में आ पाती है। जनसंख्या भूगोल में जनांकिकी प्रक्रियाओं और इन प्रक्रियाओं के परिणामों का अध्ययन पर्यावरणीय संदर्भ में किया जाता है।

     स्पष्टतः जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या की संरचना, वृद्धि और स्थानान्तरण में मिलने वाली स्थानिक विभिन्नताओं (Spatial Variation) का अध्ययन और इन स्थानिक विभिन्नताओं के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

जनसंख्या भूगोल का अध्ययन क्षेत्र (Scope of Population Geography)

       जनसंख्या भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है:

⇒ भूतकाल की जनसंख्या सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन।
⇒ जनसंख्या के वितरण के अध्ययन के अन्तर्गत महाद्वीपों तथा उसके विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या वितरण प्रतिरूप, विश्व में बसे हुए और बिना बसे हुए क्षेत्रों का वितरण, जनसंख्या का अन्तर्प्रदेशीय और अन्तर्सामयिक वितरण, बस्तियों का आकार, वितरण एवं उनमें परस्पर दूरियों का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के घनत्व के अध्ययन में विभिन्न प्रकार के घनत्व, स्थानीय स्तर से लेकर विश्व स्तर तक जनघनत्व की विशेषताएं, घनत्व वितरण का स्थानिक प्रतिरूप तथा उनको प्रभावित करने वाले कारक, प्रवास के नियम एवं परिणाम तथा शिक्षित एवं योग्य मानव श्रम का कम विकसित देशों से अधिक विकसित देशों को स्थानान्तरण आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या वृद्धि के अन्तर्गत जनसंख्या वृद्धि का मापन, जन्म-दर, मृत्यु-दर, जनसंख्या वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक, वृद्धि प्रतिरूप का वितरण, जनसंख्या वृद्धि के सिद्धान्त तथा जनसंख्या वृद्धि भावी अनुमान आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के संघटन के अन्तर्गत जाति, धर्म, भाषा, आयु, लिंग, कार्यकर्ता-आश्रित तथा कार्यशील जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के लक्षणों के अन्तर्गत जनसंख्या की साक्षरता एवं साक्षरता के स्तर को प्रभावित करने वाले कारकों तथा विश्व में साक्षरता का प्रतिरूप आदि का अध्ययन।

⇒ ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या की सभी प्रकार की विशेषताएँ एवं लक्षण, नगरीकरण की प्रक्रिया एवं उस पर प्रभाव डालने वाले कारक तथा विश्व एवं उसके राष्ट्रों में नगरीकरण का प्रतिरूप का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या संसाधन अनुपात में जनसंख्या वृद्धि तथा संसाधन विकास, जनसंख्या का बढ़ता दबाव, संसाधन एवं जनसंख्या अनुपात, संसाधनों पर आधारित जनसंख्या के सिद्धान्त, संसाधन एवं जनसंख्या प्रतिरूप, जनसंख्या क्षमता, अधिकतम जनसंख्या, अल्प जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या आदि का अध्यय


30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।

30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


           भूगोल एक ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) है, भूगोल के इस स्वरूप को प्रतिपादित करने का मुख्य श्रेय जर्मनी के दो प्रमुख निम्न भूगोलवेत्ताओं को जाता है:

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen)

2. अल्फ्रेड हैटनर (A. Hettner)

     इन दोनों भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के अध्ययक्ष क्षेत्र (scope) की व्याख्या भी की थी और अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों (systematic science) के साथ भूगोल के सम्बन्धों का विश्लेषण (analysis) और संश्लेषण (synthesis) भी किया था।

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen 1833-1905):-

        यद्यपि रिचथोफेन की शिक्षा भूगर्भ विज्ञान या भौमिकी (Geology) में हुई थी, परन्तु यह एक प्रसिद्ध भौतिक भूगोलवेत्ता (Physiographer) थे और साथ ही उन्होंने भूगोल के मानवीय पक्ष का भी ध्यान रखा था। वे बोन, लीपजिंग तथा बर्लिन विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे थे। सर्वप्रथम उनके अन्वेषण आल्पस क्षेत्र में आस्ट्रिया के टिरोल (Tyrol) प्रदेश में हुए थे तत्पश्चात् वह ट्रांसिल्वानिया तक बढ़ा और पूर्वी चीन में जाकर रहा।

        चीन में उसने व्यापक विस्तृत क्षेत्र अध्ययन करके सन् 1882 में ‘चीन का भूगोल’ नामक पुस्तक तथा उसकी मानचित्रावली (Atlas) प्रकाशित की। रिचथोफेन ने चीन के शान्टुग और किआओचाऊ क्षेत्रों में कोयले के भण्डारों को बताया था। वह संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलीफोर्निया भी गया था जहाँ उसने सोने के भण्डारों की भी खोज की थी।

     रिचथोफेन चीन में भू-विज्ञानी (Geologist) होकर गया था और वहाँ से भूगोलवेत्ता (Geographer) बनकर लौटा था। चीन के भूगोल पर रिचथोफेन की ग्रन्थमाला कुछ उसके जीवनकाल में और कुछ उसकी मृत्यु के बाद सन् 1877 से 1912 तक प्रकाशित हुई थी उसमें 5 ग्रन्थ थे। इस ग्रन्थमाला के प्रकाशन से रिचथोफेन विश्वविख्यात हो गया था। प्रथम ग्रन्थ पर ही उसको ‘Royal Geographical Society’ के संस्थापक का पदक मिला था। जर्मनी में वापस आने के बाद बोन विश्वविद्यालय में और फिर लीपजिग विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई। तत्पश्चात् वह बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए थे।

    कई वर्षों तक वह ‘Berlin Geographical Society’ के अध्यक्ष भी रहे थे। उन्होंने महासागरीय संस्थान (Oceanographical Institute of Berlin) को ठोस वैज्ञानिक आधार पर स्थापित किया था।

       रिचथोफेन का मुख्य कार्य भौतिक भूगोल में विशेष भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) के क्षेत्र में है। सर्वप्रथम उसने रिया तटों (Ria Coasts) और फियोर्ड (Fiord Coasts) का अन्तर समझाया था। बाद में उसने प्रदेशों का अध्ययन करके सामान्य तुलनात्मक भूगोल (General Comparative Geography) की स्थापना की थी।

      जर्मनी में रिचथोफेन का निकटतम शिष्य अल्ब्रेट पेंक (Albrecht Penck) था। जर्मनी से बाहर उसके ग्रन्थों की प्रशंसा ब्लाश ने बहुत अधिक की, परन्तु उसका सबसे अधिक प्रमुख सहायक कार्यकर्ता अमेरिकन भौतिक भूगोलशास्त्री डेविस (W. M. Davis) था।

     वॉन रिचथोफेन ने भूगोल को ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) सिद्ध किया था अर्थात् भूगोल में पृथ्वीतल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं (Areal Variations) का अध्ययन होता है। उसने अपने लेखों में कहा था कि भूगोल की अध्ययन सामग्री में अनेक प्रकार के तथ्यों की बहुत बड़ी संख्या होती है, उस सब तथ्यों को मिलाकर एक विषय के अन्तर्गत अध्ययन करने के लिए अध्ययन की विधि को तय करना बहुत अधिक आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता (Areal diversity) का विषय है। रिचथोफेन के अनुसार भौगोलिक अध्ययन में क्षेत्रीय सिद्धान्त (Areal principle) अनिवार्य था।

       “इस प्रकार भूगोल को ‘क्षेत्रीय विज्ञान’ का स्वरूप देने का मुख्य श्रेय वॉन रिचथोफेन को ही है।”

2. अल्फ्रेड हैटनर (Alfred Hettner 1859-1941):-

      हैटनर महोदय बीसवीं शती के अग्रगण्य रीति-विधायक (Methodologist) माने जाते हैं। हैटनर ने अन्य भूगोलवेत्ताओं की अपेक्षा सबसे अधिक मात्रा में भूगोल को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार प्रदान किया था। उसने भूगोल की एक प्रमुख अनुसन्धान पत्रिका (Research Journal) को प्रकाशित किया था। साथ ही कई ग्रन्थ भी लिखे, जिनमें प्रमुख ग्रन्थ भूगोल के विधि तंत्र (Methodology) पर और प्रादेशिक भूगोल पर थे और लगभग 30 व्यक्तियों को डाक्ट्रेट की उपाधि के लिए शोधकार्य कराया था।

भूगोल एक क्षेत्र
      हैटनर भूगोल के ही विद्यार्थी थे। वे रिचथोफेन तथा रेटजेल के शिष्य थे। उनकी नियुक्ति हाइडिलबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर थी। वह मूलतः भौतिक भूगोलवेत्ता तथा प्रादेशिक भूगोलवेत्ता थे। उन्होंने बहुत सी भौगोलिक यात्राएं भी की थीं।

        भौतिक भूगोल पर उसके बहुत से शोध पत्र (Research papers) भी प्रकाशित हुए थे जो 1919 से आगे के वर्षों में 4 खण्डों में छपे थे। यूरोप के भूगोल की पुस्तक 1907 में छप चुकी थी, परन्तु उसका संशोधित संस्करण शेष विश्व के भूगोल के साथ सन् 1923 में प्रकाशित हुआ था। हैटनर की विशेष ख्याति भौगोलिक विधि तंत्र(Geographical methodology) पर लिखे गए ग्रन्थ द्वारा हुई थी जो सन् 1927 में प्रकाशित हुआ था।

      हैटनर ने अपने लेखों में काण्ट द्वारा प्रस्तुत भूगोल की परिभाषा का पुनरावर्तन किया और उस ढांचे के अन्दर हम्बोल्ट, रेटजेल एवं पेशेल के द्वारा लिखे गए क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) को तथा रिचथोफेन, रिटर एवं मार्थे के द्वारा लिखे गए प्रादेशिक अध्ययनों को परस्पर शामिल करके भूगोल को एक समबद्ध पूर्ण (Coherent whole) विषय बना दिया है।

     उसने एक भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zeitschrift’ सन् 1895 में प्रकाशित की थी। वास्तव में हैटनर की विचारधारा का प्रकाशन उस पत्रिका की प्रस्तावना में, उसके बाद सन् 1898 में भूगोल का प्रोफेसर होने के प्रारम्भिक भाषण में, तत्पश्चात् भौगोलिक विधि-तंत्र पर प्रकाशित पुस्तक में हुआ है।      

   अलफ्रेड हैटनर के अनुसार भूगोल सामान्य भू-विज्ञान नहीं है, वरन् पृथ्वी तल का क्षेत्रीय विज्ञान है। “Geography is a Chorological Scinece of the earth’ Surface.”

      इसका सम्बन्ध प्रमुख रूप से प्रकृति और मनुष्यों के बीच पारस्परिक क्रियाओं से होता है इसके अन्तर्गत स्थानिक सम्बन्धों का मूल्यांकन भी होता है। भूगोल का प्राथमिक रूप से उद्देश्य क्षेत्रों या प्रदेशों का अध्ययन करना है। हैटनर ने सामान्य भूगोल एवं विशेष भूगोल अथवा प्रादेशिक भूगोल के अन्तर को भी समझाया है। सामान्य भूगोल के अन्तर्गत भूतल पर विभिन्न भौगोलिक परिघटनाओं (Phenomena) के वितरण का क्रमबद्ध (Systematic) वर्णन होता है। दूसरे विशेष या प्रादेशिक भूगोल (Landerkunde) के अन्तर्गत प्रदेशों के भौगोलिक तत्वों का अध्ययन होता है।

       सन् 1905 में हैटनर ने भूगोल की परिभाषा में कहा, कि भूगोल पृथ्वी का क्षेत्रीय विज्ञान है, जिसमें क्षेत्रों का अध्ययन उनकी विभिन्नताओं और स्थानिक सम्बन्धों के प्रसंग में होता है।

       क्षेत्रों (Area) के अध्ययन में हैटनर ने प्रकृति और मनुष्य दोनों को सम्मिलित किया है। इन दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

   अलफ्रेड हैटनर के भौगोलिक विधि तंत्र (Methodology) पर लिखे गए शोध प्रबन्ध, जिनको वह विधि विहार (Methodological rambles) कहकर सम्बोधित करते थे तथा जलवायु एवं उच्चावचन (relief) पर उनके विवेचन आज भी भौगोलिक ज्ञान और प्रस्तुतीकरण (Presentation) में उच्च स्थान पर हैं। उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zetschrift’ का लेखन सम्पादन निरन्तर नियमित रूप से किया था। सन् 1905 में सोवियत संघ के भूगोल पर एक श्रेष्ठ पुस्तक, सन् 1907 में यूरोप का भूगोल और सन् 1915 में ब्रिटेन का मूल्यांकन हैटनर महोदय ने प्रकाशित कराया था।

        उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका में, पुस्तक के रूप में अपने भू-प्राकृतिक अध्ययन- महाद्वीपों की स्थलाकृति (The terrain Features of the continents) और विश्व के सांस्कृतिक भूगोल (The march of culture over the world) की पुस्तकें भी छपवाई थीं।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगो एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञा (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना

 29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना



            क्षेत्रीय विभेदन भूगोल की आत्मा स्वरूप है। अन्तर्सम्बन्ध की प्रक्रिया तो मात्र यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्य कैसे एक जैविक इकाई की तरह परस्पर ससंजित एवं क्रियाशील हैं, लेकिन इन तथ्यों की जिनमें प्राकृतिक वातावरण एवं मनुष्य आते हैं, अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं।

     यदि हम पृथ्वी की सतह को देखें तो पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा जल है एवं एक-तिहाई भाग थल है। थल पर मिट्टी की असमान परत है तथा अनेक भू-आकृतियाँ हैं, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ एवं उसके विविध रूप। जल भी अनेक छोटे-बड़े सागरों, नदियों, झीलों में विभक्त है। थल पर नदियाँ, हिमानी, झरने, भूमिगत जल, अन्तरादेशीय प्रवाह प्रणालियाँ, जंगल, घास के मैदान, पशुजीवन, मरुस्थल, कृषि क्षेत्र आदि दृष्टव्य हैं।

       जल की सतह पर कोरल रीफ, जल से प्राप्त पदार्थ, थल से प्राप्त पदार्थ, जलीय वनस्पतियाँ, मछलियाँ, कछुए आदि अनेक जीव हैं। वायुमण्डल भी पृथ्वी की सतह का अंग है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23°30′ अंश झुकी है एवं सूर्य की परिक्रमा करती है। वायुमण्डल भी उसके साथ घूमता है। पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप का वितरण असमान है जो सूर्य से सापेक्ष स्थिति के अनुसार बदलता है। इससे पृथ्वी की जलवायु में विविधता आती है। इस तरह वैभिन्न्य पृथ्वी की सतह की मूल विशेषता है।

      दूसरी ओर मनुष्य हैं। मनुष्य अकेला नहीं होता। वह वस्तुतः समाज में रहता है। आज भी पृथ्वी की सतह पर आदिवासी जनजातियाँ हैं जो परस्पर युद्धरत रहती हैं। पशुचारण करने वाले समूह भी हैं। उन्नत समाज स्थायी कृषि करते हैं और उद्योग, व्यापार परिवहन में रत रहते हैं। उनके अधिवास हैं जो कहीं बिखरे हैं तो कहीं सघन हैं, ग्राम एवं नगर हैं, ये सब भी स्थान घेरते हैं।

     उपरोक्त दोनों तथ्य कैसे एक-दूसरे से एक जीव की तरह अन्तर्सम्बन्धित हैं, यह ऊपर विवेचित है। इस तरह यह अन्तर्सम्बन्धित वैविध्य पृथ्वी की सतह पर पहचाना जा सकता है तथा इसके छोटे-बड़े क्षेत्र दृष्टव्य होते हैं। उदाहरणार्थ ध्रुवीय क्षेत्र के एस्किमों निवासियों को अपना स्पष्ट क्षेत्र है, तो अफ्रीका के पिग्मी एवं कलाहारी के बुशमैन का अपना रहन-सहन एवं स्पष्ट क्षेत्र है।

        इतना ही नहीं असम घाटी में धान की खेती, कनाडा में गेहूँ की खेती के विस्तृत क्षेत्र, अर्जेन्टाइना में पशुचारक प्रदेश, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं जापान में औद्योगिक प्रदेश सब वैभिन्य से परिपूर्ण होते हुए भी क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में पहचाने जाते हैं। इस तरह, समाज एवं वातावरण के अन्तर्सम्बन्ध की परिणति क्षेत्रीय इकाई में होती है। ऐसी क्षेत्रीय इकाइयों का अध्ययन भूगोल का उद्देश्य है।

    यहीं से भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का समावेश होता है। पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय वैभिन्न्य का विषम स्वरूप पृथ्वी को विभिन्न प्रखण्डों में बांट देता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान का धरातल, जलप्रवाह, मिट्टियाँ, मानव अधिवास, आदि मिलकर एक विशिष्ट जीवन पद्धति का गठन करते हैं। यह कृषि प्रधान क्षेत्र कहा जा सकता है, सीमांकित किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रदेश में जीवन पद्धति की एकरूपता या समरूपता मिलती है। इस समरूपता के आधार पर इसे गंगा-यमुना प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

       इसी तरह, पहाड़ी प्रदेश, पर्वतीय क्षेत्र, भूमध्यसागरीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय प्रदेश आदि सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपने आन्तरिक क्षेत्रीय विस्तार में एक रूप होते हैं। इसलिए इन्हें प्रदेश कहते हैं।

     प्रदेश की संकल्पना भूगोल का क्रोड है। प्रदेश की परिभाषा, प्रदेश की पहचान एवं सीमांकन आदि सब अपने आप में विवेचना की विषय-वस्तु हैं। प्रदेश भौगोलिक भी होते हैं तथा प्रदेश की पहचान कराने वाले एक या अधिक तत्वों पर आधारित भी होते हैं। इस तरह प्रदेश अतिव्यापित भी हो सकते हैं।

     भूगोल के सैद्धान्तिक स्वरूप के उपरोक्त दोनों तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अन्तर्सम्बन्ध पृथ्वी की सतह के तथ्यों को संसंजित करता है तथा क्षेत्रीय वैभिन्न्य भौगोलिक तथ्यों के स्थानिक प्रसार एवं उनके भौगोलिक व्यक्तित्व एवं अन्तर्निहित समरूपता को स्थापित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल में क्षेत्रीय विभेद अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना को विवेचित कीजिए।

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना



        मानव समाज के स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन का अध्ययन आर्थिक एवं सामाजिक भूगोल में अध्ययन की मुख्य विषय-वस्तु है। पृथ्वी सतह पर या उसके साथ विभिन्न मानव समाजों की होने वाली अन्तर्क्रिया ही स्थानिक व्यवस्था का आधार है। स्थानिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य इस स्थानिक व्यवस्था की संरचना और क्रियाविधि का परीक्षण करते हुए मानवीय गतिविधियों के स्थानिक प्रारूपों एवं प्रक्रियाओं को पहचानना है।

         मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप उत्पन्न स्थानिक प्रारूपों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है, यथा:

(i) अवस्थिति- जो पृथ्वी सतह पर बिन्दु के रूप में है।

(ii) अन्तर्क्रिया- जो संचरण की रेखाएँ हैं जिनके सहारे माल, मनुष्य, विचारों और सेवाओं का वहन होता है।

(iii) प्रदेश- जो पृथ्वी सतह के समरूपी विशेषता वाले स्वरूपी या कर्मोपलक्षी क्षेत्र हैं।

      इन प्रारूपों को जन्म देने वाली स्थानिक प्रक्रियाएँ बड़ी जटिल हैं जिन्हें स्थानिक अन्तर्क्रिया द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इन स्थानिक अन्तर्क्रियाओं में माल और सेवाओं का प्रवाह, प्रवसन, अल्पकालीन संचरण (जैसे- खरीददारी, वासस्थल से कार्यस्थल तक की यात्रा), सामाजिक संचरण, सूचनाओं का प्रसरण, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

      इन प्रक्रियाओं के स्पष्टीकरण में मानवीय व्यवहार के अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विशेषकर इस बात पर कि मानव व्यवहार उन माध्यमों से कैसे प्रभावित होता है। जिन माध्यमों से उसने अपने स्थान का अवबोध या प्रत्यक्षीकरण किया है। इस प्रकार के प्रारूप एवं प्रक्रियाएँ स्थानिक पर्यावरण में उत्पन्न होते हैं, जो बढ़ती दूरी के साथ घटते प्रभाव के कारण स्थानिक अन्तर्क्रिया को बाधित या नियंत्रित करते हैं, लेकिन जिस स्थान में मानव अपनी गतिविधियों को संचालित करता है, वह स्थान सापेक्षिक है, क्योंकि यह स्थान दूरियों पर आधारित है और दूरी सापेक्षिक होती है तथा निरन्तर परिवर्तनशील है।

        स्थानिक संगठन एक जटिल प्रक्रिया है। मानव प्रतिदिन अपने आवास स्थल से अपने कार्यस्थल को जाता है। यह कार्यस्थल खेत हो सकता है, कार्यालय हो सकता है, कोई कारखाना या शिक्षण संस्थान या व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि हो सकता है। इस संचरण (Movement) के फलस्वरूप मार्गों का निर्माण होता है। इस प्रकार, मनुष्य के आवास एवं कार्यस्थल में पारस्परिक रूप से कर्मोपलक्षी अन्तर्प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। कृषि कार्य का क्षैतिज प्रसार अधिक होता है अतः ग्रामीण क्षेत्रों का स्थानिक संगठन ग्रामीण संस्कृति से प्रभावित होता है। उद्योग या व्यापार केन्द्राधारित (Nodal) होते हैं। इन केन्द्रों पर मनुष्य का गमनागमन एक भिन्न प्रतिरूप को जन्म देता है। मार्ग संगम बिन्दुओं पर केन्द्रस्थलों (Central Places) की स्थापना होती है।

           केन्द्रस्थल तृतीयक क्रियाकलापों के केन्द्र होते हैं तथा भूवैन्यासिक संगठन में इनकी प्रमुख भूमिका होती है। गमनागमन के मार्ग पगडंडी, कच्ची सड़क, पक्की सड़क, राज्य मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, आदि स्तरों के होते हैं। इनके संगम बिन्दुओं पर स्थापित केन्द्र स्थल भी अपने कर्मोपलक्षी रूप में छोटे एवं बड़े होते हैं। इसे केन्द्र स्थलों का पदानुक्रम (Hierarchy) कहते हैं। यह स्थानिक संगठन की संरचना का आधार होता है। उपभोक्ता अपनी आवश्यकतानुसार किसी केन्द्र स्थल पर आता-जाता है। इसे उपभोक्ता व्यवहार कहते हैं।

           उपभोक्ता किसी केन्द्र स्थल के चयन का निर्णय मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से करता है। इसके साथ ही निवास या कार्यस्थल से केन्द्र स्थल की दूरी का प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार एवं गमनागमन प्रतिरूप पर पड़ता है। यह सार्वभौमिक प्रवृत्ति होती है कि मानव न्यूनतम श्रम (लागत) से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहता है। साथ ही बढ़ती दूरी के अनुरूप ही केन्द्र स्थलों का प्रभाव घटता भी जाता है। इस प्रकार स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन के मूल तत्व कार्यस्थल, गमनागमन, परिवहन मार्ग, अन्तर्सम्बन्ध, केन्द्र स्थल, पदानुक्रम, दूरी क्षय, आदि हैं।

     स्थानिक संगठन की संरचना गमनागमन की बारम्बारता, केन्द्र स्थल के पदानुक्रमीय वर्ग एवं इनके बीच होने वाली अन्योन्याश्रित प्रक्रिया से सम्बन्धित है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र स्थल कर्मोपलक्षी रूप से छोटे एवं बड़े होते हैं। केन्द्र स्थलों का पदानुक्रमीय महत्व गमनागमन प्रतिरूप एवं बारम्बारता को प्रभावित करता है। इसी आधार पर प्रत्येक केन्द्र स्थल के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है। केन्द्र स्थल सिद्धान्त के अनुसार ये कर्मोपलक्षी प्रदेश षटकोणीय होते हैं तथा न्यूनतम श्रम से अधिकतम लाभ के सिद्धान्त का अनुपालन करते हैं। किसी भी क्षेत्र का स्थानिक संगठन वहाँ की भूमि के मूल्य से प्रभावित होता है।

      स्थानिक संगठन की प्रथम अवस्था में कोई गाँव या नगर दूरी पर स्थित होता है। धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ने से उसका प्रमुख कार्यक्षेत्र नगर के मध्य में स्थित होता है तथा जनसंख्या का बहाव बाहर की तरफ बढ़ता जाता है। इससे संलग्न ग्रामीण क्षेत्र की भूमि का उपयोग नगरीय कार्यों में होने लगता है, अतः इसका मूल्य बढ़ने लगता है। मानव अपनी बुद्धि चातुर्य के द्वारा परिवहन और संचार साधनों का विकास कर स्थानिक पर्यावरण को विशिष्टता प्रदान करता है।

        परिवहन और संचार साधनों के विकास द्वारा पृथ्वी सतह पर माल, सेवाओं, मनुष्यों और सूचनाओं के वहन में वृद्धि हुई है। समय और लागत दूरी को कम करके आपूर्ति एवं माँग के क्षेत्रों को समीप लाकर आर्थिक स्थानों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इसी प्रकार दूरसंचार और शिक्षा द्वारा स्थान के सम्बन्ध में किए गए अवबोधों में विद्यमान अन्तरों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

     इस प्रकार भूवैन्यासिक संगठन के संकल्पना सूत्र से भौगोलिक चिन्तन को न केवल सुनिश्चित दिशा मिली वरन् भौगोलिक अध्ययन मात्र वर्णनात्मक न रहकर प्रक्रिया विश्लेषण, सामान्यीकरण तथा सिद्धान्त प्रतिपादन के सोपानों से बढ़ता हुआ भविष्य के प्रक्षेपण (Projection) तथा पुनर्गठन के स्तर तक पहुँच गया। सभी गुण किसी विषय के सही अर्थ में वैज्ञानिक होने के दावे को स्थापित करते हैं। स्वाभाविक है कि इस स्तर तक पहुँचने में परम्परागत मानचित्र विवेचन के साथ-साथ सशक्त सांख्यिकीय विश्लेषण एवं प्रक्रियात्मक विवेचन की विधि बड़े पैमाने पर अपनाई गई। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय आयामयुक्त व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण तथा समन्वित क्षेत्रीय विकास में अन्य विशेषज्ञों के साथ हाथ बंटाने में अधिक आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हुए।

प्रश्न प्रारूप

1. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना का संक्षिप्त में विवण दीजिए।


27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।

27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।



     अमेरीका में स्कूल व कॉलेजों में भूगोल का अध्ययन मध्य उन्नीसवीं सदी में यूरोपियनों द्वारा प्रारम्भ किया गया। हार्वर्ड , डार्टमाउथ, याले, मेरी, कोलम्बिया, प्रिन्स्टन व पेंसिलवेनिया आदि विश्व विद्यालयों में गणितीय भौतिक व ऐतिहासिक भूगोल की शिक्षा वैसे 1795 से दी जाने लगी थी। आरनोल्ड गुयोट (Arnold Guyot) अमेरीका में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था।

     अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया है, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):-

        मानव भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान है। अमेरीका में सैम्पुल (E. C. Semple), हंटिंगटन (E. Huntington), बोमैन (I. Bowman), ग्रिफिथ टेलर (G. Tailor) जैसे दिग्गज मानव भूगोलवेत्ता हुए हैं। इन्होंने मानव भूगोल की परिभाषा दी व उसका विषय-क्षेत्र निर्धारित किया।

        सैम्पुल की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक Influence of Geographical Environment सन् 1911 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक वातावरण निश्चयवाद का कट्टर समर्थन करती थी। पुस्तक का प्रारम्भ ही इन शब्दों से हुआ है:-

“मनुष्य का जन्म पृथ्वी से हुआ है और वह पृथ्वी का शिशु मात्र ही नहीं है, अर्थात् वह पृथ्वी की धूल का एक पुतला मात्र ही नहीं है वरन् पृथ्वी उसकी माता है, जिसने उसे मातृत्व दिया है, उसका लालन-पालन किया है, उसको भोजन दिया है, उसके कार्यों को नियत किया है, उसके विचारों को निर्देशित किया है, उसके सामने कठिनाइयाँ प्रस्तुत की हैं, जिससे उसका शरीर सुदृढ़ हुआ है तथा उसकी बुद्धि कुशाग्र हुई है।”

      हटिंगटन की प्रसिद्ध पुस्तक Principles of Human Geography है। पुस्तक में हंटिंगटन ने मानव भूगोल की परिभाषा व विषय क्षेत्र निर्धारित करने का प्रयास किया है। साथ ही मानव भूगोल के अन्य पक्षों का भी वर्णन किया है। हंटिंगटन वातावरण निश्चयवाद के समर्थक थे।

   ग्रिफिथ टेलर को मानव भूगोल के क्षेत्र में नव-निश्चयवाद (Neo-Determinism) का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बीसवीं सदी में भूगोल’ (Geography in the Twentieth Century) है।

(ii) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

        भौतिक भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ता डेविस (William Morris Davis) का नाम प्रसिद्ध है। डेविस ने अपरदन चक्र की संकल्पना (Concept of Cycle of Erosion) का प्रतिपादन किया। यह संकल्पना काफी समय तक आदर्श मानी जाती रही। परन्तु पेंक ने इसकी भारी आलोचना की। फिर भी इस संकल्पना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। रोलिन सैलिसबरी, वेलेस स्टाउड भी उच्चकोटि के भौतिक भूगोलवेत्ता थे।

(iii) जलवायु विज्ञान (Climatology):-

      अमेरीका में जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख कार्य जलवायु के वर्गीकरण व जलवायु प्रदेशों के मानचित्र तैयार करने से सम्बन्धित रहा है। थार्नथ्वेट ने 1918 में कोपेन द्वारा प्रस्तुत जलवायु विभाजन की आलोचना की तथा नवीन जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में नए वैज्ञानिक यंत्रों से मदद ली गई।

(iv) स्थानीयकरण सिद्धान्त (Locational Theories):-

       कई अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने स्थानीयकरण सिद्धान्तों में योगदान किया है। सर्वप्रथम 1909 में व्हाइटवेक ने एक शोध पत्र के माध्यम बताया था कि चीनी मिट्टी बर्तनों के उद्योग के लिए मिट्टी की स्थानीय उपलब्धता आवश्यक नहीं। वाल्डर टावर ने 1911 में औद्योगिक स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना की । हूवर ने वेबर के सिद्धान्त में संशोधन किया।

(v) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

          राजनीतिक भूगोल में भी अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रुचि प्रदर्शित की। स्कूलों व कॉलेजों में इसे स्थान दिया गया। जार्ज क्रेसी, प्रेस्टन ई. जेम्स, राबर्ट एस. प्लाट व ईसा बोमैन प्रमुख राजनीतिक भूगोलवेत्ता थे।

         ईसा बोमैन की पुस्तक The New World में विभिन्न देशों के आपसी राजनीतिक सम्बन्धों की चर्चा थी। डी. व्हिटलसी ने एक पुस्तक The Earth and State प्रकाशित कराई। वाल्केनबर्ग की पुस्तक Elements of Political Geography में राजनीतिक भूगोल के विषय क्षेत्र की व्याख्या की गई थी।

(vi) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

      कृषि भूगोल के क्षेत्र में अमेरीका में विशेष कार्य हुआ है। इस दिशा में सर्वप्रथम बरनर सी. फिंच और ओ. ई. वेकर ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। 1917 में इन्होंने ‘संसार का कृषि भूगोल’ एटलस प्रकाशित की। वेकर ने 1921 में ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि उत्पादन के अन्तर पर भौतिक कारकों के प्रभाव का महत्व’ लेख प्रकाशित किया।

1936 में व्हिटलसी ने संसार को कृषि प्रदेशों में विभक्त किया। कृषि व डेरी उद्योग से सम्बन्धित अनेक शोध कार्य किए गए।

(vii) नगरीय-भूगोल (Urban Geography):–

      मार्क जैफरसन (Mark Jafferson) प्रथम अमेरीकी-भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने नगरों की स्थिति (Location) व जनसंख्या पर कार्य किया। उनकी “प्रधान नगर नियम’ संकल्पना” (Law of Primate City, 1939) ने अनेक विद्वानों को आकर्षित किया। सी. डी. हैरिस तथा उल्मान ने अमरीकी नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण किया।

प्रश्न प्रारूप

1. अमेरिकन भौगोलिक विचाधाराओं प प्रकाश डालिए।


40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक



       उद्योगों की स्थापना केवल उन्हीं स्थानों पर होती है, जहाँ इसके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपस्थित हों। उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों में भौगोलिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक महत्वपूर्ण हैं। अतः उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों को दो वर्गों में बाँटा जाता जा सकता है:-

(क) भौगोलिक कारक तथा,

(ख) गैर-भौगोलिक कारक।

(क) भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

      उद्योगों को प्रभावित करने वाले मुख्य भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. कच्चे माल की उपलब्धता:-

       सामान्यतः उद्योग उन्हीं स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं, जहाँ कच्चा माल उपलब्ध होता है। कच्चा माल उद्योगों के लिए चुम्बक का कार्य करता है। भारत में लोहा इस्पात उद्योग केवल उन्हीं स्थानों पर स्थापित किया गया है जहाँ इसमें प्रयोग होने वाला कच्चा माल, जैसे-लौह-अयस्क, कोयला, मैंगनीज आदि प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश तथा बिहार में गन्ने के कारण चीनी उद्योग, महाराष्ट्र तथा गुजरात में कपास के कारण सूती वस्त्र उद्योग, पश्चिम बंगाल में पटसन उद्योग स्थापित किए गए हैं। नाशवान (Perishable) / अल्पकालिक कच्चा माल प्रयोग करने वाले उद्योग तो कच्चे माल के स्रोत से दूर स्थापित हो ही नहीं सकते।

2. शक्ति के साधन:-

     उद्योगों में मशीनें चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। शक्ति के प्रमुख साधन कोयला, पेट्रोलियम, जल-विद्युत्, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा हैं। लौह-इस्पात उद्योग कोयले पर निर्भर करता है, इसलिए यह उद्योग कोयले की खानों के पास ही स्थापित किया जाता है। दामोदर घाटी का प्रमुख लोहा-इस्पात केन्द्र जमशेदपुर अपनी शक्ति की आवश्यकता झरिया तथा रानीगंज से प्राप्त किए गए कोयले से पूरी करता है।

        पंजाब में औद्योगिक विकास का मुख्य कारण भाखड़ा से प्राप्त की गई जल-विद्युत् ही है। ऐलुमिनियम उद्योग के लिए प्रचुर मात्रा में विद्युत् शक्ति की आवश्यकता होती है, इसलिए यह उद्योग जल-विद्युत अथवा ताप-विद्युत् के स्रोत के निकट ही स्थापित किया जाता है। छत्तीसगढ़ का कोरबा तथा उत्तर प्रदेश का रेनूकूट ऐलुमिनियम उद्योग विद्युत् शक्ति की उपलब्धता के कारण ही स्थापित हुआ है।

3. सस्ते दर पर कुशल श्रमिकों की उपलब्धता:-

    यद्यपि आधुनिक युग में स्वचालित मशीनों तथा कम्प्यूटरों जैसे यंत्रों का प्रचलन बढ़ा है फिर भी औद्योगिक विकास में श्रम का महत्व बराबर बना हुआ है। सस्ते तथा कुशल श्रम की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता औद्योगिक विकास का मुख्य कारक है। कुछ उद्योग श्रम पर ही आधारित होते हैं। फिरोजाबाद में शीशा उद्योग, कानपुर में चर्म उद्योग, लुधियाना में हौजरी तथा जालन्धर एवं मेरठ में खेलों का सामान बनाने का उद्योग मुख्यतः सस्ते, कुशल तथा प्रचुर श्रम पर ही निर्भर हैं।

4. परिवहन एवं संचार के साधन:-

      यातायात मार्ग वे शिराएं हैं, जिनमें से होकर उद्योग की धमनियों का रक्त संचार होता है। कच्चे माल को उद्योग केन्द्र तक लाने तथा निर्मित माल को खपत के क्षेत्रों तक ले जाने के लिए सस्ते तथा कुशल यातायात का प्रचुर मात्रा में होना अनिवार्य है। सड़कों तथा रेलों के जंक्शन तथा सागरीय बन्दरगाह अच्छे औद्योगिक केन्द्र बन जाते हैं। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली जैसे महानगरों में औद्योगिक विकास मुख्यतः यातायात के साधनों के कारण ही हुआ है।

       परिवहन की भांति संचार के साधन, जैसे-डाक, तार टेलीफोन, कम्प्यूटर भी औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें उद्योग सम्बन्धी सूचनाएँ जल्दी मिलती हैं।

5. विस्तृत बाजार की उपलब्धता:-

     उद्योग का सारा विकास तब तक व्यर्थ है। जब तक निर्मित माल की खपत के लिए बाजार की उपलब्धता न हो। बाजार की निकटता से यातायात का खर्च कम हो जाता है और उपभोक्ता को औद्योगिक उत्पाद सस्ते दाम पर मिल सकते हैं। शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं को तो अधिक दूर तक ले जाना असम्भव ही होता है। 

6. सस्ती भूमि तथा जलापूर्ति:-

      उद्योगों की स्थापना के लिए सस्ती भूमि का होना भी आवश्यक है। दिल्ली में भूमि का अधिक मूल्य होने के कारण ही इसके उपनगरों में सस्ती भूमि पर उद्योगों ने द्रुत गति से प्रगति की है। लोहा-इस्पात, वस्त्र-निर्माण तथा रसायन कुछ ऐसे उद्योग हैं, जिनको पर्याप्त मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। इसलिए ये उद्योग जल के स्रोत पर स्थापित किए जाते हैं।

7. अनुकूल जलवायु:-

       उद्योग धन्धों में काम करने वाले श्रमिकों की कार्यकुशलता के लिए जलवायु का स्वास्थ्यवर्द्धक होना आवश्यक है। अधिक उष्ण अथवा आर्द्र एवं कठोर शीत जलवायु श्रमिकों के कार्य में बाधा डालती है। उत्तर-पश्चिमी भारत की जलवायु ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त गर्म तथा शीत ऋतु में ठण्डी होती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत, पश्चिमी तटीय भाग की जलवायु वर्ष भर सम रहती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता बनी रहती है। यही कारण है कि देश के 24% आधुनिक कारखाने तथा 30% श्रमिक अकेले महाराष्ट्र-गुजरात क्षेत्र में हैं।

        कुछ उद्योगों के लिए तो जलवायु का विशेष महत्व है। उदाहरणतया, सूती वस्त्र उद्योग के लिए आर्द्र जलवायु चाहिए, क्योंकि शुष्क जलवायु में धागा बार-बार टूटता रहता है। इसलिए सूती वस्त्र बनाने वाली अधिकांश मिलें महाराष्ट्र तथा गुजरात में ही हैं। आजकल कृत्रिम आर्द्र-यन्त्रों (Artificial Humidifiers) की सहायता से देश के अन्य भागों में भी सूती वस्त्र उद्योग लगाए गए हैं, परन्तु यह प्रणाली महंगी है।

(ख) गैर-भौगोलिक कारक (Non-Geographical Factors)

      वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकी विकास के साथ, उद्योग-धन्धों की अवस्थिति में भौगोलिक कारकों की भूमिका पहले की भांति अधिक दृढ़ नहीं रही। अतः कुछ गैर-भौगोलिक कारक भी महत्वपूर्ण बन गए हैं, जिनमें आर्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक कारक उल्लेखनीय हैं। कुछ महत्वपूर्ण गैर-भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. पर्याप्त पूंजी:-

      कोई भी उद्योग बिना पूंजी के नहीं पनप सकता। बिना पूंजी के उद्योगों की स्थापना की कल्पना  बड़े-बड़े नगरों में पूंजीपति उद्योगों में पूंजी लगाते हैं, जिससे उद्योगों का विकास होता है। इसी कारण मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली, आदि बड़े-बड़े नगरों में उद्योग लगे हुए हैं। मोदीनगर में उद्योग स्थापित होने का मुख्य कारण ही मोदी सेठ द्वारा पूँजी निवेश है।

2. सरकार की नीति:-

     सरकार की नीतियाँ उद्योग-धन्धों की अवस्थिति को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। सरकार प्रादेशिक असन्तुलन दूर करने के कई प्रयास कर रही है, जैसे- पिछड़े हुए क्षेत्रों में उद्योग-धन्धों की स्थापना करके, जल, वायु और भूमि के प्रदूषण की रोकथाम द्वारा पर्यावरण का संरक्षण तथा कुछ विकसित प्रदेशों में उद्योग-धन्धों के अतिकेन्द्रण को विकेन्द्रण प्रक्रम द्वारा रोकना आदि। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के नियोजन में इन प्रारूपों का विशेष ध्यान रखा गया है। मथुरा के निकट तेल शोधनशाला, कपूरथला में कोच फैक्ट्री तथा जमशेदपुर में उवर्रक संयन्त्र की स्थापना सरकारी नीतियों का ही परिणाम है।

3. औद्योगिक जड़त्व अथवा प्रारम्भिक संवेग (Industrial Inertia or Momentum of Early Start):-

        कुछ उद्योग भौगोलिक परिस्थितियों के कारण स्थापित हो जाते हैं, परन्तु जब वे भौगोलिक सुविधाएँ वहाँ पर समाप्त हो जाती हैं तब भी वे उद्योग वहाँ पर बने रहते हैं। अलीगढ़ में ताला तथा जबलपुर में बीड़ी बनाने के उद्योग इसके उदाहरण हैं।

4. बैंकिंग सुविधा:-

      उद्योग-धन्धों में रोज करोड़ों रुपए का लेन-देन होता है जो बैंकों द्वारा ही सम्भव है। अतः जिन क्षेत्रों में बैंकों की सुविधा हो, वहाँ उद्योग-धन्धों के विकास में सहायता मिलती है।

5. बीमा की सुविधा:-

     बड़े-बड़े उद्योगों में भारी मशीनों को अचानक क्षति पहुंचने का भय रहता है। इसके अतिरिक्त, श्रमिकों की औद्योगिक दुर्घटना से मृत्यु हो जाती है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए बीमे की सुविधा का होना आवश्यक है।

6. राजनीतिक स्थिरता:-

       उद्योगपति उन्हीं प्रदेशों में उद्योग स्थापित करना पसन्द करते हैं जहाँ राजनीतिक स्थिरता हो।

प्रश्न प्रारूप

1. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित कने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।


Read More:

1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली

(उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)



       भौतिक दृष्टिकोण से भारत एक विशालकाय देश है। उत्तर में हिमालय, पश्चिम भारत में अरावली पर्वत, मध्य भारत में विन्ध्याचल और सतपुड़ा। पुनः प० भारत में पश्चिमी घाट पर्वत जलविभाजक रेखा का निर्माण करती है। जिसे नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।

प्रायद्वीपीय भारत और

       यह महान जलविभाजक रेखा भारतीय नदियों को दो भागों में विभक्त कर देती हैं।-

(1) अरब सागार में गिरने वाली नदियाँ

जैसे- सिन्धु, नर्मदा, ताप्ती, माण्डवी, ज्वारी, शरावती, पेरियार, गायत्री इत्यादि।

(ii) बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ

जैसे- गंगा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादि।

        प्रश्नानुसार उत्तर भारत और द० भारत के बीच जल विभाजक का कार्य विन्ध्याचल और सतपुड़ा पर्वत करती है। उत्तर भारत एवं द० भारत के वदियों में निम्नलिखित अन्तर दृष्टिगत होता है-

विशेषता प्रायद्वीपेत्तर भारत की नदी तंत्र या उ० भारत की नदियाँ  प्रायद्वीपीय भारत की नदी तंत्र या द० भारत की नदियाँ 
1. उद्गम क्षेत्र  (i) हिमालय पर्वत तथा 

(ii) प्रायद्वीपीय भारत का उत्तरी क्षेत्र 

(i) प्रायद्वीपीय भारत के प० घाट पर्वत
2. स्रोत  (i) हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियों का स्रोत कोई न कोई हिमानी है। जैसे- गंगोत्री से गंगा, यमुनोत्री से यमुना (i) सभी नदियों का स्रोत क्षेत्र झील या तालाब या वर्षा जल से है।
3. जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़ा-बड़ा है अपेक्षाकृत छोटा है
4. मुहानों की संख्या (i) केवल दो मुहानों का निर्माण करती है:- सिन्धु नदी का मुहाना और गंगा नदी का मुहाना (i) प्रत्येक नदी अलग-अलग मुहाना का निर्माण करती है
5. ज्वारनदमुख (i) यह ज्वारनदमुख का निर्माण नहीं करती है (i) यद्यपि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ ज्वारनद मुख का निर्माण नहीं करती है लेकिन अरब सागर में गिरने वाली नदी ज्वारनद मुख का निर्माण करती है
6. डेल्टा का निर्माण (i) डेल्टा का निर्माण करती है। गंगा, ब्रह्मपुत्र नदी मिलकर विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा का निर्माण करती है। (i) यद्यपि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ डेल्टा बनाती है जबकि अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती है
7. नदी की लम्बाई एवं चौडाई  (i) लम्बाई और चौडाई अधिक होती है (i) लम्बाई और चौडाई कम होती है
8. मार्ग का परिवर्तन (i) उ० भारत की नदियाँ मार्ग परिवतन के लिए प्रसिद्ध है (i) द० भारत की नदियाँ मार्ग परिवतन नहीं करती है
9. सहायक नदियाँ (i) उ० भारत की नदियाँ सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नामक प्रमुख नदियों में आकर सहायक नदी मिल जाती है  (i) अलग-अलग नदियों के कई सहायक नदी मिलते है
10. उच्छलिका और जलप्रपात (i) उ० भारत की नदियों में केवल स्रोत में झरना एवं उच्छलिका मिलती है (i) द० भारत की नदियों के पुरे मार्ग में इसका प्रमाण मिलता है
11. सदा वाहनीयता (i) उ० भारत की नदियाँ प्राय: सदावाहिनी होती है (i) यह लगभग सभी प्रकार की नदियाँ बरसाती प्रकार की होती है
12. जल का स्तर बढना  (i) मानसून के आगमन के दौरान तथा जून मान में बर्फ के पिघलने से जलस्तर में वृद्धि होती है (i) प्रायद्वीपीय नदियों का जलस्तर द०-प० मानसून और लौटती हुई मानसून के कारण बढ़ती है
13. अवस्था (i) सभी नदियाँ युवावस्था से गुजर रही है (i) यहाँ की नदियाँ प्रौढावस्था और वृद्धावस्था से गुजर रही है
14. अपरदन एवं निक्षेपण की क्षमता  (i) बड़े पैमाने पर अपरदन और निक्षेपण का कार्य होती है। (i) यह कार्य अति अल्प होती है
15. अपवाहतंत्र का प्रतिरूप (i) यहाँ की नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र में वृक्षाकार प्रतिरूप, मैदानी क्षेत्री में समानांतर प्रतिरूप और मुहानों पर जाली प्रतिरूप का निर्माण करती है (i) बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ वृक्षाकार प्रतिरूप और अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ समान्तर प्रतिरूप का निर्माण करती है
16. भ्रंश घटी का निर्माण (i) उ० भारत कि कोई भी नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित नहीं होती है  (i) नर्मदा और ताप्ती नदी को छोडकर कोई भी नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित नहीं होती है 
17. गॉर्ज एवं दर्रा का निर्माण  (i) उ० भारत की नदियाँ गॉर्ज एवं दर्रा का निर्माण के लिए प्रसिद्ध है (i) गोदावरी को छोडकर कोई भी नदी गॉर्ज का निर्माण नहीं करती है

निष्कर्ष :

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तर भारत एवं दक्षिण भात की नदियों पर भौगोलिक कारकों के अलग-अलग प्रभाव के कारण अलग-अलग विशिष्टताएँ पायी जाती है। 


Read More:

1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

33. अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल (Endogenetic and Exogenetic Forces)

33. भू-आकृति विज्ञान में अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल

(Endogenetic and Exogenetic Forces)



अन्तर्जात बल (Endogenetic Forces):-

     पृथ्वी के आन्तरिक भाग अथवा भूगर्भ में सक्रिय बलों को अन्तर्जात बल कहते हैं। इन्हें निर्माणकारी शक्तियाँ (Constructional Forces) भी कहा जाता है। ये बल पृथ्वी में गुप्त रूप से कार्य करते हैं। इनकी उत्पत्ति पृथ्वी के आन्तरिक भाग में होने के कारण इनके विषय में बहुत कम ज्ञान प्राप्त है।

       सम्भवतः इन बलों की उत्पत्ति उष्ण पृथ्वी के क्रमशः शीतल होकर संकुचन, परिभ्रमण गति से ह्रास, रेडियो ऐक्टिव पदार्थों के विघटन से उत्पन्न ताप, संवाहनिक धाराओं, आदि के कारण होती है। पृथ्वी के भीतर उच्च तापमान ही कदाचित भू-पटल में उत्पन्न परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी है। तापीय अन्तर के कारण शैलों में प्रसार एवं संकुचन होता है, इससे शैलें स्थानान्तरित होती हैं। परिणामतः अनेक स्थलरूप उत्पन्न होते हैं।

     अन्तर्जात बल दो प्रकार के होते हैं-

(i) क्षैतिज (Horizontal) अन्तर्जात बल तथा

(ii) ऊर्ध्वाधर/लम्बवत (Vertical) अन्तर्जात बल।

        इनके कारण दो प्रकार की संचलन (Movements) या घटनाएँ होती हैं-

(i) आकस्मिक घटनाएँ या ज्वालामुखी एवं भूकम्प (Volcanism and Earthquakes)

       इस बल से भूपटल पर ऐसी आकस्मिक घटनाओं का आगमन होता है जो विनाशकारी परिणाम वाली होती हैं। इसके प्रमुख उदाहरण हैं- भूकम्प, भूस्खलन, एवलांश तथा ज्वालामुखी।

(ii) पटलविरूपणकारी घटनाएँ (Diastrophism)            

       ये बल पृथ्वी के आन्तरिक भाग में अत्यन्त धीमी गति से क्षैतिज तथा लम्बवत दोनों रूपों में क्रियाशील होते हैं जिससे धरातल पर हजारों वर्षों बाद किसी बड़े स्थलरूप का निर्माण हो जाता है। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से ये पुन: दो प्रकार के होते हैं-

(अ) महादेशीय संचलन (Epierogenetic Movement)-

        यह संलचन भू-गर्भ में लम्बवत दिशा में क्रियाशील रहता है। इस लम्बवत् संचलन को उत्पन्न करने वाले बल को अरीय बल (Radial Force) कहते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी की त्रिज्या की दिशा में ही कार्य करता है। इस संचलन से महाद्वीपीय भागों का निर्माण एवं उसमें उत्थान, निर्गमन तथा निमज्जन की क्रियाएं घटित होती हैं।

        जब महाद्वीपीय भाग या उसका कोई क्षेत्र अपनी सतह से ऊपर उठ जाता है तब उस पर लगने बाले बल को उपरिमुखी संचलन (Upward movement) कहते हैं तथा ऊपर उठने की क्रिया, उभार (Upliftment) के नाम से जानी जाती है।

        इसके विपरीत, जब महाद्वीपीय भागों में धंसाव हो जाता है तो उस पर क्रियाशील बल को अधोमुखी संचलन (Downward Movement) तथा धंसाव की क्रिया को अवतलन (Subsidence) कहा जाता है। धंसाव के दूसरे रूप में स्थलखण्डों का सागरीय जल के नीचे निमज्जन (Submergence) हो जाता है। यह क्रिया तटीय या सागरीय भागों में ही घटित होती है।

(ब) पर्वतीय संचलन (Orogenetic Movement)-

       पृथ्वी के आन्तरिक भाग से क्षैतिज रूप में पर्वतों के निर्माण में सहायक संचलन बल को पर्वतीय संचलन के नाम से जाना जाता है। इस बल को स्पर्शरेखीय बल (Tangential Force) भी कहते हैं। यह बल प्रायः दो रूपों में क्रियाशील होता है-

(i) जब यह बल दो विपरीत दिशाओं में क्रियाशील होता है तो तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसे तनावमूलक बल कहा जाता है। इस बल के परिणामस्वरूप धरातल में भ्रंश (Fault), दरार (Fracture), चटकनें (Cracks), आदि का निर्माण होता है।

(ii) जब पर्वतीय संचलन बल आमने-सामने क्रियाशील होता है तो उससे चट्टानें संपीडित हो जाती हैं। इस बल को संपीडनात्मक बल (Compressional Forces) कहा जाता है। इसके कारण धरातल पर संवलन (Wrap) तथा वलन (Fold) पड़ जाते है।

बहिर्जात बल (Exogenetic Forces):-

        भू-पटल पर अन्तर्जात बलों के सक्रिय होने से अनेक विषमताएँ पैदा हो जाती हैं। इन विषमताओं को दूर करके धरातल को सपाट बनाने की क्रिया भी प्रकृति में सम्पन्न होती रहती है। यह कार्य बहिर्जात बलों द्वारा किया जाता है जिन्हें विध्वंसकारी बल (Destructional Forces) भी कहते हैं। धरातल पर मौजूद स्थलरूपों को काट छांट तथा घिसकर क्षीण बनाने के कारण इन बलों को विनाशकारी बल कहा गया है।

      प्रवाही जल, पवन एवं हिम इसके प्रमुख कारक या साधन (Agents) हैं। इन साधनों को सक्रिय बनाने में तीन प्रमुख कारकों का योगदान हैं-

(i) सूर्यातप (Insolation),

(ii) गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) एवं

(iii) पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation)।

      सूर्यातप ही धरातल पर तापमानों के विषम वितरण का कारण है। तापीय भिन्नताओं से वायुदाब में अन्तर आता है तथा वायु विक्षोभ, पवन, आदि उत्पन्न होते हैं। यही नहीं, शैलों के अपक्षय में भी सूर्यातप प्रभावकारी होता है। गुरुत्व तथा पृथ्वी का घूर्णन पवन तथा हिम के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।

          बहिर्जात बलों को सक्रिय बनाने में किसी न किसी गतिशील साधन का योगदान अवश्य होता है। प्रवाही जल, हिम, पवन, आदि गतिशील साधन ही धरातल पर काट-छांट का कार्य करते हैं। शैलों की काट-छांट, घिसने तथा क्षीण बनाने की क्रिया को अनाच्छादन (Denudation) कहते हैं।

मोन्कहाउस (Monkhouse) के अनुसार- “अनाच्छादन में उन सभी साधनों के कार्य सम्मिलित हैं जिनसे भू-पटल के किसी भाग का पर्याप्त विनाश, अपव्यय तथा हानि होती है। इस उपलब्ध पदार्थ का अन्यत्र निक्षेप होता है तथा इनसे अवसादी शैलों का निर्माण होता है।”

    भूपटल के अनाच्छादन में दो प्रक्रम अथवा शक्तियां मुख्य हैं-

(i) स्थैतिक प्रक्रम एवं

(ii) गतिशील प्रक्रम।

1. स्थैतिक प्रक्रम (Static processes):-

       स्थैतिक प्रक्रिया से अभिप्राय शैलों की अपने ही स्थान पर (in situ) टूट-फूट से है। इसके द्वारा शैलें ढीली पड़ती हैं तथा चट्टानों का चूर्ण बनता है। इस क्रिया को अपक्षय (Weathering) कहते हैं। अपक्षय भी दो प्रकार होता है-

         यांत्रिक अपक्षय में चट्टानों के स्वरूप में विघटन होता है और रासायनिक अपक्षय में चट्टानें वियोजन द्वारा परिवर्तित होती हैं।

2. गतिशील प्रक्रम (Mobile Processes):-

      गुरुत्व प्रवाही जल (वर्षा जल, नदी, भूमिगत जल), पवन, हिमानी, लहरें, आदि साधन शैल पदार्थों को तोड़ते-फोड़ते हैं तथा अपक्षयित पदार्थ उठाकर अन्यत्र ले जाकर निक्षेपित कर देते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत वृहत् क्षरण (Mass Movement) तथा अपरदन (Erosion) सम्मिलित हैं। परिवहन एवं निक्षेप भी अपदन से सम्बद्ध हैं।


Read More:

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव



         हरित क्रांति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्लू. एस. गौड ने खाद्यान्न उत्पादन में आई क्रांति, जो कि गेहूँ के HYV (High Yielding Varieties- उच्च उत्पादकता किस्में) प्रकार के आविष्कार से संभव हुई थी, के लिए किया था। यह क्रांति भारत, पाकिस्तान एवं विकासशील देशों में विद्यमान खाद्यान्न संकट को दूर करने में अत्यन्त मददगार रही। भारत में मुख्य रूप से भारतीय कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन द्वारा निर्देशित थी, जो नॉर्मन ई. बोरलॉग की बड़ी हरित क्रांति पहल का हिस्सा थी, जिसने अविकसित देशों में कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि अनुसंधान और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया था।

      उन्नत किस्म के बीज के अलावा अच्छी सिंचाई की व्यवस्था, आधुनिक यंत्रों का उपयोग, अच्छे उर्वरक का वैज्ञानिक प्रयोग इत्यादि हरित क्रांति के आधार थे। इसमें सस्ते मूल्य पर बिजली उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य बैंकिंग एवं बाजार की सुविधा उपलब्ध करायी गयी। हरित क्रांति की सफलता के दो पक्ष रहे, एक सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक।

सकारात्मक पक्ष

     इस क्रांति से खाद्यान्न की उपज में काफी बढ़ोत्तरी हुई। 1950 में भारत में 50 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर अब 200 मिलियन टन हो चुका है। गेहूँ के उत्पादन में 177 प्रतिशत, चावल में 76 प्रतिशत तथा मक्के में 56 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई। खाद्यान्न में वार्षिक वृद्धि 2.62 प्रतिशत हो गयी, जो पहली बार जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक थी अर्थात् खाद्यान्न संकट दूर हुआ।

      कृषि क्षेत्र में 1961 से 1999 के बीच 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 1960-61 में यह कुल कृषि क्षेत्र का 72 प्रतिशत था, जो 1970-71 में 78 प्रतिशत हो गया, 1980-81 में 81 प्रतिशत और अब 82 प्रतिशत के करीब है। पिछले तीन दशकों में गेहूँ के क्षेत्र में 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसमें 82 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है तथा 95 प्रतिशत HYV के अंतर्गत आता है। चावल क्षेत्र में भी 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

       भारतीय कृषि पहली बार बाजार में लाभदायक व्यापार के रूप में आई क्योंकि अब किसानों के पास अतिरिक्त अन्न मौजूद था। कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों का विकास हुआ तथा कृषि में प्रयुक्त होने वाले यंत्रों के निर्माण में भी लौह एवं यांत्रिक उद्योग को बढ़ावा मिला। भारतीय किसानों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ, भारतीय किसान बढ़ी पैदावार को देखते हुए नवीन कृषि प्रणाली को अपनाने को तुरंत तैयार हो गये और कृषि सहायता से लाभदायक वाणिज्यिकी में परिणत हो गये।

     खाद्यान्न का आयात रुका तथा भारतीय मुद्रा का विदेश गमन भी नियंत्रित हुआ। भारत जैसे विकासशील देश में यह मुद्रा अधः संरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। ग्रामीण रोजगार के भी शुभ अवसर पैदा हुए। घरेलू उद्योग धंधों का भी विकास हुआ तथा मजदूरी में बढ़ोतरी हुई।

नकारात्मक पक्ष

     परंतु हरित क्रांति के नकारात्मक पक्ष भी उभर का सामने आये हैं। हरित क्रांति ने उसी क्षेत्र में सफलता पाई, जहाँ पर पूर्व से ही अधः संरचना का विकास हुआ था, किसान बड़े एवं धनी थे, कुल जोत अधिक थी तथा दूसरी भौगोलिक एवं सामाजिक शर्तें पूरी हो रही थीं। अतः यह पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में तो सफल रही, परन्तु उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि में असफल रही, जिससे आर्थिक विकास में असमानता आयी।

     उत्तर प्रदेश के अंदर ही पूर्वी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास की विषमता दिखती है। इसी तरह कृष्णा, गोदावरी क्षेत्र एवं तेलंगाना और रायल सीमा क्षेत्र में विषमता दिखती है।

        अंतर्वैयक्तिक विषमता का भी जन्म हो गया। क्योंकि बड़े किसान ही इसका भरपूर फायदा उठा सके जबकि छोटे किसान आर्थिक रूप से असफल ही रह गये। गेहूँ और चावल की उपज एवं उपज क्षेत्र में तो बढ़ोत्तरी हुई, परंतु तिलहन एवं दलहन की उपज एवं उपज क्षेत्र दोनों ही घट गये। अंतर्वैयक्तिक विषमता ने बड़े किसानों के समाज में प्रभुत्व को पूर्वस्थापित कर दिया। छोटे किसान अपनी जमीन को बढ़ी कीमत में बेचने पर प्रलोभित हो गये तथा उनकी आर्थिक दुर्गति बढ़ गयी। कृषि में यांत्रिकी के प्रवेश से रोजगार के अवसर भी घट गये।

         हरित क्रांति के सर्वाधिक दुष्परिणाम पर्यावरणीय दृष्टि से उभर कर सामने आये। कृषि में HYV किस्म की आवश्यकता अधिक रहती है। हरित क्रांति के क्षेत्र में अपवाह प्रणाली बेहद खराब है। अतः नहरों से सिंचित क्षेत्र में जल जमाव एवं कूप तथा नलकूप क्षेत्र में लवणता की समस्या का जन्म हो गया। हरियाणा एवं पंजाब के अर्द्धशुष्क भौगोलिक दशा में लवणता को और बढ़ावा मिला।

        कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए वनस्पति का विनाश हुआ, अधिक उर्वरक के प्रयोग से प्राकृतिक उर्वरता का ह्रास तथा कृषि प्रणाली में परिवर्तन (जैसे दलहन का न बोया जाना) आदि प्रयोगों एवं कार्यों से मृदा अपरदन एवं प्रदूषण दोनों बढ़े। एकल कृषि तथा कृषि पारिस्थितिकी पर प्रभाव भी नकारात्मक पड़े। एक ही फसल उपजाने से कृषि पारिस्थतिकी का विनाश हो रहा है।

       रासायनिक खादों के उपयोग से तथा खाद्यान्नों में सीसा, तांबा, जस्ते आदि की मात्रा बढ़ने से यकृत संबंधी रोग तथा जल जमाव से मलेरिया, डेंगू आदि रोग बढ़े। डीडीटी और कीटनाशक दवाओं का दुधारू जानवरों के दूध में पाया जाना भी घातक संकेत है। इस तरह एक तफ तो हरित क्रांति से खाद्यान्न उत्पादन में आशानुरूप वृद्धि हुई तो दूसरी तफ इसने पर्यावरणीय एवं सामाजिक दुर्व्यवस्था को भी जन्म दे दिया।


error: