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37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व



      भूमि की आवश्यकतानुसार सिंचाई द्वारा पानी उपलब्ध कराने के लिए जिस प्रारूप, संयंत्र तथा तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, उसे ही सिंचाई व्यवस्था कहते हैं। देश के विभिन्न भागों में सिंचाई प्रणाली वहाँ के भू संरचना, जलवायु, जल की उपलब्धता आदि विभिन्न परिस्थितियों द्वारा निर्देशित होती है। इसलिए देश के विभिन्न भागों में सिंचाई की पद्धतियों में पर्याप्त असमानता पायी जाती है, हमारे देश में सिंचाई के जिन विविध साधनों का प्रयोग किया जाता है उनका संक्षिप्त वर्णन एवं महत्व निम्नानुसार है:-

1. कुएं एवं नलकूप

2. तालाब

3. नहरें

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ

1. कुआँ एवं नलकूप:-

       भारत में पानी के लिए कुओं का प्रयोग प्राचीन समय से ही होता आ रहा है और वर्तमान में भी यह जल प्राप्त करने या सिंचाई का एक महत्वपूर्ण साधन है। वर्तमान में हमारे देश में लगभग 89.6 लाख कुआँ हैं, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र के लगभग 21.1 प्रतिशत भाग की सिंचाई करते हैं, कुआँ प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं-

(i) कच्चा कुआँ

(ii) पक्का कुआँ,

      कच्चे कुओं को बनवाने के लिए कम खर्च करना पड़ता है, जबकि पक्के कुओं के निर्माण का खर्च अधिक है, कुआँ सिंचाई का सस्ता एवं सुगम साधन होने के कारण भारतीय किसान इसका उपयोग आमरूप में करता है, कुओं से गुजरात के कुल सिंचित क्षेत्र के 73 प्रतिशत, महाराष्ट्र के 60 प्रतिशत, राजस्थान के 46 प्रतिशत व मध्य प्रदेश के 37 प्रतिशत भाग की सिंचाई की जाती है।

      इस तरह उत्तर प्रदेश के 23.2 प्रतिशत, आन्ध्र प्रदेश के 6 प्रतिशत, तमिलनाडु 11 प्रतिशत, कर्नाटक 3 प्रतिशत तथा केरल के 4 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई कुओं के द्वारा की जाती है, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उड़ीसा व हरियाणा कुओं द्वारा सिंचाई करने वाले देश के अन्य राज्य हैं।

      ट्यूबवैल या नलकूप सिंचाई का एक नवीनतम साधन है, जिनका प्रयोग 1930 से आरम्भ किया गया था। यह एक अत्यधिक गहरा (30 फीट से 500 फीट तक) एवं संकरा छिद्र होता है (जिसकी खुदाई मशीन के द्वारा की जाती है) जिससे बिशेष यंत्र या विद्युत् मोटरों की सहायता से पानी निकाला जाता है

       ये प्रायः ऐसे कुएँ होते हैं जिनसे निरन्तर जल प्राप्त होता है पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात नलकूपों द्वारा सिंचाई करने वाले प्रमुख भारतीय राज्य हैं राज्यों के सिंचित क्षेत्र का 51.6 प्रतिशत उत्तर प्रदेश, 26 प्रतिशत पंजाब तथा 20.6 प्रतिशत हरियाणा में नलकूपों द्वारा सिंचाई की जाती है इस प्रकार उत्तर प्रदेश नलकूपों से सिंचाई करने वाला देश का अग्रणी राज्य है।

         पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान नलकूपों से सिंचाई करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं। इस समय ट्यूबवैल या नलकूपों से लगभग 14.3 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र का 29.9 प्रतिशत है।

नलकूपों या ट्यूबवैलों का महत्व:-

(i) नलकूपों द्वारा कम वर्षा वाले देश के ऐसे भागों में सिंचाई की जा सकती है, जहाँ का जल स्तर नीचा हो वहाँ सिंचाई के अन्य साधन उपलब्ध न हों

(ii) नलकूपों द्वारा किसान फसलों को इच्छित समय में पानी दे सकता है

(iii) नलकूपों के जल में ऐसे कई रसायन होते हैं, जो फसलों के लिए उपयोगी होते हैं

(iv) नलकूपों के संचालन व्यवस्था का व्यय कम होता है

(v) नलकूपों द्वारा फसलों को आवश्यकतानुसार कम या अधिक जल दिया जा सकता है।

2. तालाब:-

      तालाब से आशय मानव या प्रकृति निर्मित उन जलाशयों से होता है जिसमें वर्षा का जल एकत्रित हो जाता है, तालाबों का आकार छोटे नालों या पोखरों से लेकर बड़ी-बड़ी झीलों के रूप में हो सकता है ये दो प्रकार के हो सकते हैं-

(i) कृत्रिम तालाब,

(ii) प्राकृतिक तालाब।

      कृत्रिम तालाब भूमि खोदकर तथा बांध बनाकर वर्षा का जल एकत्र करके बनाये जाते हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे तथा गहरे होते हैं। जब प्राकृतिक गड्ढों में जल एकत्र हो जाता है तो प्राकृतिक तालाब बन जाते हैं, ये बड़े व छिछले होते हैं।

        तालाब द्वारा देश के प्रायद्वीपीय भाग में जहाँ की भूमि पथरीली, असमतल तथा कुएँ एवं नहरों के निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है, इसी साधन से सिंचाई की जाती है। देश के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 6.8 प्रतिशत भाग की सिंचाई तालाबों द्वारा की जाती है तालाबों द्वारा सिंचाई करने वाले राज्यों में तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं पश्चिमी बंगाल प्रमुख हैं। इसके अलावा दक्षिणी झारखंड, दक्षिणी मध्य प्रदेश, द. छत्तीसगढ़ एवं दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के कुछ भागों में तालाबों द्वारा सिंचाई की जाती है।

       इस समय देश में लगभग 5 लाख बड़े और 60 लाख छोटे तालाब है, निजाम सागर (आन्ध्र प्रदेश), कृष्णराज सागर (कर्नाटक), जयसमन्द, उदय सागर एवं फतेह सागर (राजस्थान) आदि सिंचाई तालाबों के प्रमुख उदाहरण हैं जयसमन्द सबसे बड़ा तालाब है।

तालाबों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) ऐसे भागों में जहाँ भूमि तल कठोर होता है, तालाब बनाना उपयुक्त रहता है।

(ii) इससे वर्षा जल का उचित उपयोग हो जाता है एवं पानी बेकार नहीं जाता।

(iii) तालाबों से सिंचाई के साथ-साथ मत्स्य पालन भी किया जा सकता है, जिससे कुछ सीमा तक खाद्य समस्या हल करने में सहायता मिल सकती है।

(iv) तालाबों द्वारा बिना मोटरों या पम्पों के बिना ही कुछ सीमा तक सिंचाई की जा सकती है।

(v) तालाबों का निर्माण ऐसे भागों में भी किया जा सकता है जहां कुएँ खोदना एवं नहर निकालना सम्भव नहीं होता।

      तालाबों द्वारा सिंचाई केवल वर्षा पर निर्भर रहती है, किसी-किसी वर्ष जब वर्षा कम होती है तो तालाब सूख जाते हैं और फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती है।

3. नहरें

       नहरें भारत में सिंचाई का सबसे बड़ा व प्रमुख साधन हैं, जिससे देश की लगभग 35.7 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई की जाती है इस समय देश में लगभग 1 लाख 50 हजार किमी लम्बी नहरें हैं जिससे 163.9 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है भारत की नहर प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी नहर प्रणाली है। नहरों का विस्तार देश में प्रमुख रूप से उत्तरी भारत में मिलता है

        सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से 20 प्रतिशत नहरों द्वारा सिंचाई केवल उत्तर प्रदेश में होती है आन्ध्र प्रदेश 10 प्रतिशत, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ 9.8 प्रतिशत, राजस्थान 8.3 प्रतिशत, पंजाब 8 प्रतिशत तथा हरियाणा 8 प्रतिशत, नहरों द्वारा सिंचाई प्राप्त करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं।

      भारत में नहरें तीन प्रकार की पायी जाती हैं:-

(i) बारहमासी नहरें- ये वे नहरें हैं जो पूरे वर्ष बहती हैं। इनका निर्माण नदियों में बांध बनाकर किया जाता है।

(ii) बरसाती नहरें- इन नहरों में पानी केवल बरसात में ही रह पाता है इनका निर्माण मुख्य रूप से नदियों में बाढ़ के अतिरिक्त जल की निकासी के लिए किया जाता है।

(iii) स्टोरेज वर्क्स- इस प्रकार की नहरें पहाड़ी घाटियों में बांध बनाकर वर्षा का पानी एकत्र करके निकाली जाती हैं इन नहरों का उपयोग तालाबों की तरह ही किया जाता है। इन्दिरा गांधी नहर (राजस्थान), सरहिन्द नहर (पंजाब), ऊपरी गंगा नहर, निचली गंगा नहर, मध्य गंगा नहर, पूर्वी यमुना नहर आदि सिंचाई नहरों के उदाहरण हैं।

नहरों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) नहरों द्वारा खेतों को पानी देना सस्ता एवं सरल है

(ii) बाढ़ के समय नदियों के पानी को नहरों में छोड़ा जा सकता है और बाढ़ से उत्पन्न संकट से निपटा जा सकता है।

(iii) नहरों को आन्तरिक परिवहन के साधन के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।

(iv) नहरों के किनारे वृक्षारोपण करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(v) भारत की अधिकांश नहरें बारहमासी हैं, अतः किसान आवश्यकतानुसार कभी भी अपने खेत में सिंचाई कर सकता है।

        नहर सिंचाई से जहाँ एक ओर अनेक लाभ हैं वहीं दूसरी और सिंचित क्षेत्र के जलमग्न होने का भय भूमि की क्षारीयता, अन्तिम छोर में पानी की कमी, पानी सम्बन्धी आपसी विवाद जैसी कई समस्याएँ भी हैं।

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ-

         भारत में विभिन्न उद्देश्यों जैसे- सिंचाई, बाढ़ नियन्त्रण, पेयजल आपूर्ति, जल विद्युत उत्पादन, नहर परिवहन, पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण इत्यादि की पूर्ति बहुउद्देशीय परियोजनाओं के तहत् की जाती है इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने इन परियोजनाओं को “आधुनिक भारत का मंदिर” की संज्ञा दी है

          भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ निम्नलिखित हैं-

(i)  कोसी परियोजना 

(ii) दामोद घाटी परियोजना 

(iii) रिहन्द बाँध परियोजना

(iv) हीराकुण्ड बाँध

(v) भाखड़ा नांगल परियोजना

(vi)  गंडक परियोजना

(vii) तुंग भद्रा परियोजना इत्यादि

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है?



       वर्षा के अभाव में खेतों को कृत्रिम ढंग से जल पिलाने की क्रिया को सिंचाई करना कहा जाता है। भारत एक उष्ण कटिबन्धीय देश है जिसमें कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है, किन्तु इस वर्षा की प्रकृति एवं उसके वितरण में कई दोष पाये जाते हैं। इन दोषों को दूर करने एवं नियमित कृषि करने का सर्वोत्तम उपाय सिंचाई की व्यवस्था करना है।

सिंचाई की आवश्यकता के कारण

(1) वर्षा की अनिश्चितता (Uncertainty of Rainfall):-

         भारत में वर्षा समय एवं स्थान की दृष्टि से अनिश्चित होती है तथा विभिन्न क्षेत्रों में उसकी मात्रा भी भिन्न होती है। मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है कि प्रत्येक 7 वर्ष में दो बार सूखा पड़ जाता है। अकाल सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को क्षत-विक्षत कर देते हैं। कभी तो समय से बहुत पहले ही वर्षा हो जाती है और कभी लम्बे अन्तराल पर इसी कारण नियमित रूप में कृषि करने के लिए सिंचाई अनिवार्य है।

(2) वर्षा का असमान वितरण (Unequal Distribution of Rainfall):-

      यद्यपि देश में वर्षा का औसत 100 सेण्टीमीटर है, किन्तु इसका क्षेत्रीय वितरण असमान है। उदाहरण के लिए पश्चिमी तटीय क्षेत्रों और असम प्रदेश में 250 सेण्टीमीटर से भी अधिक वर्षा होती है। उत्तरी मैदान और प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में यह 100 से 200 सेण्टीमीटर ही होती है। पंजाब के मैदान और दक्षिण प्रायद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों में वर्षा की मात्रा केवल 25 से 100 सेण्टीमीटर होती है।

        गंगा नदी के पूर्वी मैदान तथा पश्चिमी समुद्री तट को छोड़ कर अन्य सभी भागों में वर्षा की कमी से सदैव अकाल का संकट बना रहता है। राजस्थान, हरियाणा और दक्षिणी पंजाब में तो बहुत कम वर्षा होने से सिंचाई के बिना खेती करना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार दक्षिणी पठार के मध्यवर्ती एवं आन्तरिक भागों में कृषि बिना समुचित सिंचाई के सम्भव नहीं है, क्योंकि इन प्रदेशों में या तो सूखा पड़ता है या फिर वर्षा बहुत कम होती है।

(3) वर्षा का कुछ ही महीनों में सीमित होना (Restriction of Rainfall to few months):-

       भारत के सभी भागों में एक ही मौसम में वर्षा नहीं होती। शीतकाल में केवल दक्षिण-पूर्वी भाग में ही वर्षा होती है और शेष भाग सूखे रहते हैं। वर्षा का 74% जून से सितम्बर के महीनों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा प्राप्त होता है, शेष का एक भाग शीत ऋतु में उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकालीन चक्रवातों द्वारा ऐसी स्थिति में वनस्पति अथवा कृषि उत्पादन के लिए लम्बे शुष्क काल में सिंचाई आवश्यक हो जाती है।

(4) जनसंख्या में वृद्धि (Growth in Population):-

      भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 121 करोड़ है। प्रतिवर्ष बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अधिकाधिक मात्रा में खाद्यान्नों की आवश्यकता पड़ती है। देश में इनका उत्पादन कम होने से अभाव के वर्षों में अनाज आयात करना पड़ता है।

           अतः आयात बन्द करने के लिए अतिरिक्त उत्पादन, गहरी खेती और प्रति हेक्टेअर एक से अधिक फसले उगाने से ही सम्भव है। इसके लिए सिंचाई करना अनिवार्य है। ऐसा अनुमान है कि यदि गेहूँ और धान उत्पादक क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था बराबर की जा सके तो इन अनाजों का अतिरिक्त उत्पादन प्रतिवर्ष 1 करोड़ से 1.5 करोड़ टन तक बढ़ाया जा सकता है।

(5) विशेष फसलों के लिए अधिक जल की आवश्यकता (Some Special Crops Require more Water):-

       चावल, गन्ना, जूट, मिर्ची, प्याज, लहसुन, आलू, आदि फसलों के लिए नियमित रूप से अधिक जल की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल की फसलें और बरसीम आदि के लिए प्रतिवर्ष 90 सेण्टीमीटर, रसदार फलों के लिए 100 सेण्टीमीटर तथा कठोर फलों के लिए 75 सेण्टीमीटर अतिरिक्त वर्षा की आवश्यकता पड़ती है। अतः अतिरिक्त जल की पूर्ति सिंचाई द्वारा की जाती है।

(6) मिट्टी की प्रकृति (Nature of Soil):-

       उत्तरी मैदान तथा नदियों के डेल्टाओं में उपजाऊ कांप मिट्टी पायी जाती है। जिससे थोड़ी सिंचाई करने से ही उत्पादन बढ़ जाता है। अन्य भागों में बलुई और दोमट मिट्टी अधिक समय तक जल रोकने में असमर्थ रहती है, अतः उसे कृषि योग्य बनाए रखने के लिए बार-बार सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है।

(7) चारागाहों के विकास के लिए (For Development (of Pastures):-

        पशु पालन और दुग्ध व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के लिए प्राकृतिक चारागाहों की रक्षा करना आवश्यक है तथा नए चारागाहों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता होना आवश्यक है।

(8) व्यावसायिक फसलों में वृद्धि के लिए (For Increas- ing Commercial Crops):-

         कृषि के अन्तर्गत कुल क्षेत्र के 20% पर व्यावसायिक फसलें पैदा की जाती हैं, जिनसे कृषि उत्पादन के कुल मूल्य का 35% प्राप्त होता है। इन फसलों के अन्तर्गत केवल 16% भाग को ही सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। चूंकि व्यावसायिक फसलों के निर्यात द्वारा भारत को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में लगभग 9% विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है और देश के उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है, अतः इनके उत्पादन में वृद्धि करने के लिए सिंचाई की विशेष आवश्यकता पड़ती है।

(9) भारत में वर्षा प्रायः तेज बौछारों के रूप में होती है जो कृषि के लिए हितकर नहीं है। इससे वर्षा का जल भूमि में रिस नहीं पाता और भूमि प्यासी रह जाती है। निरन्तर फसलों के उत्पादन के लिए तब सिंचाई कना अनिवार्य हो जाता है।


प्रश्न प्रारूप

1. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? विवेचना कीजिये।

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश



        भारत एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु यहाँ कृषि की दशा संतोषजनक नहीं है। भारत की जनसंख्या का लगभग 70% भाग कृषि कार्य में लगा हुआ है लेकिन इसके उपरान्त भी भारतीय कृषक की दशा अच्छी नहीं है। निम्न स्तर पर सीमित विकास के बावजूद आज भी भारतीय कृषक परम्परावादी हैं।

        भारतीय किसान कृषि कार्य को एक व्यवसाय के रूप में नहीं करता है, बल्कि जीविकोपार्जन के लिए करता है। कृषि की पुरानी विधियों, पूँजी की कमी, भूमि सुधार की कमी, विपणन एवं वित्त सम्बन्धी कठिनाइयों आदि के कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता अत्यन्त न्यून है। अब नई पीढ़ी में शिक्षा एवं कृषि को कमाई का साधन मानने की प्रवृत्ति से भी कृषि एवं कृषक की आर्थिक दशा में कुछ सुधार आने लगा है। भारतीय कृषि की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं, जिनसे भारतीय कृषि शताब्दियों से पीड़ित है-

(1) भूमि पर जनसंख्या का निरन्तर बढ़ता हुआ भार:-

     भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है, अतः भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रतिव्यक्ति उपलब्ध भूमि का औसत कम होता जा रहा है। 1921 में यह 0.8 हेक्टेयर था, 1931 में 0.72, 1941 में 0.64, 1951 में 0.75 तथा 1981 में घटकर यह 0.18 एवं 2011 में 0.12 हेक्टेयर हो गया, जबकि विश्व का यह औसत 0.2 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है। विश्व के कुछ देशों में जैसे- कनाडा में 2.12 है, अर्जेन्टाइना में 1.25 है, रूस में 1.03 है, सं. रा. अमेरीका में 0.89 तथा आस्ट्रेलिया में 3.39 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है।

(2) भूमि का असमान वितरण:-

       भारत में भूमि का वितरण बहुत ही असमान एवं असन्तुलित है। देश में आज भी 62 प्रतिशत कृषि भूमि केवल 10 प्रतिशत किसानों के पास है तथा शेष 38 प्रतिशत भाग ही 90 प्रतिशत किसानों के पास है। इस तरह एक ओर जहाँ बड़े किसान अपनी भूमि क्षमता का समुचित उपयोग नहीं कर पाते वहीं दूसरी ओर छोटे किसान अपनी गुजर बसर करने में असमर्थ रहते हैं। यद्यपि भारत में 1952 में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया जा चुका है, लेकिन स्थिति में आशाजनक सुधार अभी तक नहीं हो पाया है।

(3) कृषि जोतों का बिखराव एवं भूमि का विभाजन:-

       भारत में उत्तराधिकार के नियमों के कारण भूमि का बंटवारा होता रहता है। इस कारण खेतों का आकार बहुत छोटा हो गया है। छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए रहते हैं। इस कारण आधुनिक यंत्रों के द्वारा उन्नत कृषि नहीं की जा सकती है।

(4) कृषि की न्यून उत्पादकता:-

       1970 तक देश के अधिकांश भागों में औसत उत्पादन स्तर अधिकांश विकसित व कई विकासशील देशों (मैक्सिको, ब्राजील, फिलीपीन्स) से भी काफी कम रहा, लेकिन अब हरित क्रांति एवं सरकारी प्रयत्नों से स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है। गेहूँ, चावल, तिलहन, दलहन आदि फसलों के प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हुई है।

(5) सिंचाई के साधनों की कमी:-

       भारतीय कृषि अधिकतर मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है और मानसून हमेशा अनियमित बना रहता है। ऐसी स्थिति में सिंचाई के साधनों की अत्यधिक आवश्यकता होती है, किन्तु दुर्भाग्य है कि आज भी सिंचाई के पर्याप्त साधनों का अभाव है। सिंचाई के साधनों के अभाव में आधुनिक ढंग से कृषि कार्य करना कठिन होता है। अतः आज भी भारतीय कृषि की दशा में सुधार नहीं हो सकी।

(6) कृषि आदानों का अभाव:-

       भारतीय कृषकों के पास कृषि आदानों (कृषि सामाग्रियों) का हमेशा अभाव बना रहता है, जिससे वे अच्छे बीज, खाद, सिंचाई, कृषि यंत्र आदि का उपयोग नहीं कर पाते हैं। इन साधनों के अभाव में कृषि कार्य करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है।

(7) साख सुविधाओं की कमी:-

        भारतीय कृषकों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, इस कारण उनके सामने हमेशा आर्थिक संकट बना रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में साख-सुविधाओं का आज भी अभाव है। अतः कृषकों को वित्त पूर्ति के लिए गांव के महाजन एवं साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। साहूकार ऊँची ब्याज दर वसूल करता है एवं कृषकों के साथ धोखाधड़ी करता रहता है। इस प्रकार एक बार जो कृषक साहूकार के चंगुल में फंस जाता है फिर उसका बाहर निकलना कठिन होता है। ये देशी महाजन बड़ी मात्रा में कृषकों का शोषण करते हैं, फलतः कृषक अपनी दीन-हीन दशा के कारण कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दे पाता।

(8) मृदा अपरदन:-

        मृदा अपरदन के कारण कृषि भूमि को क्षति पहुंचती है, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। जहां प्रतिवर्ष विस्तृत क्षेत्रों में भूमि का ह्रास हो जाता है वहां भूमि कृषि योग्य नहीं रहती है।

(9) धार्मिक एवं सामाजिक कारण:-

      भारतीय कृषक भाग्यवादी एवं अंधविश्वासी होता है। वह कृषि के विकास पर व्यय करने की अपेक्षा शादी, मृत्यु-भोज, सामाजिक रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है। इस प्रकार कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

(10) कृषि बीमा का अभाव:-

        भारत में कृषि बीमा का अभाव है। किसानों को किसी-किसी वर्ष बाढ़, सूखा एवं विभिन्न प्रकार के कृषि रोगों से कृषि उत्पादन में भारी क्षति उठानी पड़ती है, यहाँ तक कि उस आय से वह उत्पादन का खर्च भी प्राप्त नहीं कर पाता और उनकी स्थिति इतनी दयनीय हो जाती है कि वे आत्महत्या तक के लिए विवश हो जाते हैं। ऐसी अनिश्चितताओं के कारण भारतीय किसान फसलों का व्यावसायिक उत्पादन करने से डरता है, यदि देश में कृषि बीमा का सर्वव्यापीकरण हो जाए तो कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।

(11) विपणन व्यवस्था का अभाव:-

        विपणन व्यवस्था का अभाव भारतीय किसान की एक महत्वपूर्ण समस्या है, क्योंकि इसके अभाव में किसान को अपने फसल उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है। विपणन की व्यवस्था नगरों या कस्बों तक सीमित है, जबकि फसलों का अधिकांश उत्पादन गाँव में ही होता है। अतः उसे अपना माल मण्डियों तक ले जाने के लिए अतिरिक्त परिवहन व्यय की आवश्यकता पड़ती है, विवश होकर वह अपना माल गाँव में कम मूल्य पर ही बिचौलियों को बेच देता है जिससे उसे कम लाभ प्राप्त होता है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से ग्रस्त है, और आज भी विकसित देशों की तुलना में काफी पिछड़ी स्थिति में है, इसके विकास के लिये अनेकानेक कारग कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश पर प्रकाश डालिए।


32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



      राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

      बाढ़ के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है जिसकी चर्चा नीचे के शीर्षक में किया जा रहा है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

          मानसून अपने अनिश्चिता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। अति अनुकूल मानसून के स्थिति में भारी वर्षा होती है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। मानसून के अनिश्चितता की व्याख्या करने के लिए तापीय सिद्धांत, पछुआ हवा सिद्धांत, जेट स्ट्रीम सिद्धांत और एल-नीनो सिद्धांत दिया गया है। लेकिन अंतिम दो सिद्धांत ज्यादा प्रासंगिक है।

(ii) वनों का विनाश और मृदाक्षरण-

        वनों के विनाश से सतह की मिट्टी कमजोर होती है और कमजोर होने की स्थिति में वर्षा के बाद मिट्टी का तेजी से अपरदन होता है जिससे चट्टानें नग्न अवस्था में आ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप नग्न चट्टानों में ग्राहय क्षमता निम्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में जब पुनः वर्षा होती है तो बहाव तेज हो जाता है और बेसिन क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। शिवालिक प्रदेश में और मुख्यतः हिमाचल प्रदेश में जलस्तर का गिरना और पंजाब में बाढ़ आने की समस्या इससे जुड़ी हुई है।

       उत्तर-पूरब भारत और गढ़वाल क्षेत्र में भी इसी के कारण गंभीर समस्या उत्पन्न हुई है। हाल के वर्षों में राजस्थान और गुजरात आदि जैसे राज्यों में भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती रही है। यह निम्न वर्ष का क्षेत्र है लेकिन जब आकस्मिक तीव्र वर्षा होती है तो नग्न चट्टानों पर जल का बहाव तेजी से होता है और आकस्मिक बाढ़ की स्थिति को उत्पन्न करता है।

(iii) नदी के ताली में मालवों का जमाव-

          खास करके मैदानी भारत में नदियों का ढाल अत्यंत ही निम्न है। ऐसी स्थिति में चौड़ी घाटी के तली पर मलवे का जमा हो जाता है और मानसून ऋतु में जलस्तर तेजी से ऊपर उठ जाता है और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में आने वाले बाढ़ इसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

(iv) नदियों के स्रोत क्षेत्र में भारी वर्षा का होना-

      हिमालय का दक्षिणी ढाल पर वर्षा अत्यधिक होती है। इसका परिणाम यह है कि मैदानी क्षेत्र में कम वर्षा के बावजूद बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। जैसे वर्षा नेपाल में होने के कारण उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(v) नदियों के मोड़दार प्रवाह-

       मोड़दार नदियों के प्रवाह से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। यह स्थिति मुख्यत: पूर्वी गंगा के मैदान में देखने को मिलती है। पश्चिमी पंजाब और हरियाणा में समानांतर बहने वाली नदियों का जल वृहत क्षेत्र में नहीं फैलता है जबकि पूर्वी भारत की मोड़दार नदियां जल को बहुत क्षेत्र में फैला देती है।

(vi) उच्च ज्वार-

      तटवर्ती क्षेत्रों में चक्रवात के साथ आने वाले उच्च ज्वार भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। ऐसी स्थिति में नदी का मुहाना बंद हो जाता है और नदी का जल पीछे धकेला जाने लगता है जिससे नदियों के जलस्तर में उछाल आता है। उठता हुआ जल वृहत क्षेत्र में फैल जाता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। इसी प्रक्रिया से गोदावरी, महानदी, कृष्ण, कावेरी आदि के बेसिन क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(vii) भूस्खलन-

       उत्तरी-पूर्वी भारत के हिमाचल प्रदेश में भू-स्खलन से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े भूस्खलित होकर नदियों में चली जाती है और मार्गों को अवरुद्ध कर देती है जिससे नदियों के ऊपरी भाग में पानी फैल कर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। हिमाचल प्रदेश में तिब्बत की ओर से आने वाली पारछु नदी के कारण कुछ वर्ष पहले ही गंभीर बाढ़ की समस्या उत्पन्न हुई थीपरिछु नदी

(viii) नदियों के द्वारा मार्ग परिवर्तन-

          पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव के कारण मैदानी भारत की नदियां मार्ग परिवर्तन करती रहती है क्योंकि उत्तर भारत की नदियां प्राय: उत्तर से दक्षिण की तरफ बहती है लेकिन घूर्णन गति पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। ऐसी स्थिति में बड़ी नदियों के जाल में घूर्णन के विपरीत दिशा में प्रवाह की प्रवृत्ति विकसित होती है, जिसे नदियों के पश्चिमी तट का अपरदन अधिक होता है। ऐसी स्थिति में नदी में स्थानांतरण की प्रवृत्ति होती है जिससे कई नदियों के द्वारा पुराना मार्ग का निर्माण हो जाता है। वहां वर्षा के दिनों में जल जमाव की स्थिति होती है जो की बाढ़ की स्थिति का दो तक द्योतक है।

(ix) पठारीय स्थित-

        पठारीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों में भी बाढ़ आती है। यहां धरातल पर अगम्य चट्टानों की उपस्थिति तथा तीव्र वर्षा के कारण बार की स्थिति उत्पन्न होती है। लेकिन बाढ़ की अवधि लंबी नहीं होती है। नदियों के ढाल तीव्र होते हैं, इसलिए पानी तुरंत बह जाती है।

(x) गंगा द्वारा सहायक नदी के जल स्रोतों में अवरोध-

         गंगा मैदानी भारत की रीढ़ के समान एक विशाल नदी है जिसमें उत्तर एवं दक्षिण दिशा से आकर अनेक नदियां मिलती है। जब गंगा का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर रहा होता है, ठीक उसी समय अगर सहायक नदियों का भी जलस्तर ऊपर उठने लगता है तो सहायक नदी के जल को गंगा ग्रहण नहीं कर पाती है जिसके परिणामस्वरुप सहायक नदियों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी तरह नदियों के संगम वाले स्थान पर सहायक नदी गंगा के स्वतंत्र जल के प्रवाह को बाधित करती है, जिसके कारण ऊपरी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(xi) उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र की बनावट-

         उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के बीच कभी टेथिस सागर का गर्त रहा है। इसी में मालवा के जमाव से मैदानी क्षेत्र का यहाँ निर्माण हुआ है। यह क्षेत्र आज भी टेथिस सागर के छाड़न क्षेत्र के रूप में जो वर्षा ऋतु में अस्थाई समुद्र में बदलकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(xii) मानवीय कारण-

         मानव निर्मित बड़े-बड़े बांधों का जलस्तर जब ऊपर उठने लगता है तो अचानक जल को छोड़ दिया जाता है जिसके कारण निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। फरक्का बांध के कारण बांग्लादेश में बाढ़ आती है। मैटूर डैम के कारण कावेरी के डेल्टाई क्षेत्रों में बाढ़ आती है। टिहरी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में बाढ़ आने की संभावना रहती है।

         आधुनिक युग में नगरीय बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होने लगी है जो पूर्ण रूपेण मानवीय कर्ण के कारण उत्पन्न होती है। जैसे नगरों में मकानों के जंगल कंक्रीट के द्वारा खड़ा किया जा रहा है। जल रिचार्ज वाले क्षेत्रों पर मकान बना दिए गए हैं। नालियों में पॉलिथीन के जमाव के कारण प्रवाह रुक जाने से आकस्मिक वर्षा होने पर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

बाढ़ वाले क्षेत्रों का वितरण

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार भारत में 342 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र मुख्यतः पूर्वी भारत में स्थित है। गहनता के दृष्टि से असम सर्वाधिक प्रतिकूल क्षेत्र है लेकिन वास्तविक हानी के दृष्टि से उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य प्रमुख है।

     राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ आते हैं। कुल हानि का दो-तिहाई भाग उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश में होता है। 60% बाढ़ प्रभावित क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र में स्थित है और बाढ़ के विभिषका के लिए कभी कोसी, दामोदर, ब्रह्मपुत्र आदि नदियां प्रसिद्ध थी। कभी कोसी बिहार का शोक तो दामोदर को बंगाल का शोक कहा जाता था लेकिन वर्तमान समय में कुछ नवीन नदियां भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को विस्तार दिए हैं जिसमें महानदी और तीस्ता नदी प्रमुख है।

          बाढ़ के प्रभाव का समय सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं होता है। सबसे लंबी अवधि ब्रह्मपुत्र के मैदान में होती है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ का प्रभाव 6 सप्ताह तक या अधिक रहता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में इसका प्रभाव 4 से 6 सप्ताह होते होता है।

       पूर्वी तटवर्ती मैदानी और डेल्टाई क्षेत्रों में इसका प्रभाव 1 से 3 सप्ताह तक रहता है तथा पंजाब, नर्मदा और ताप्ती के घाटियों में सामान्यत: इसका प्रभाव एक सप्ताह होता है और आकस्मिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में गुजरात, राजस्थान और पूर्व के पर्वतीय क्षेत्र में इसका प्रभाव एक सप्ताह से कम होता है। लेकिन उत्तर-पूर्वी भारत में बाढ़ के बारंबारता अधिक होने के कारण कुल प्रभाव का समय 4 सप्ताह से अधिक हो जाता है। बाढ़ प्रणव क्षेत्र को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।-

भारत में

समाधान हेतु किया गया प्रयास-

           आजादी के पूर्व इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया था। जो भी प्रयास हुए हैं वह आजादी के बाद के हैं। इन प्रयासों में नदी घाटी प्रदेश के विकास की एकीकृत योजना सबसे प्रमुख है। इसके अंतर्गत बहुउद्देशीय नदी घाटी योजना सबसे प्रमुख है। यह ऐसी योजना है जो बाढ़ और सुखे दोनों ही समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। दामोदर पर डीवीसी और कोसी पर हनुमान नगर में, गंडक पर भैंसा लोटन में बांध बनाकर बाढ़ की समस्या एवं प्रभाव को कम किया गया है।

         इस योजना के साथ वनों का विकास, वृक्षारोपण तथा मृदा संरक्षण जैसी भी एकत्रित योजनाएं चल रही है। सामाजिक वानिकी का कार्यक्रम संपूर्ण भारत में चलाया जा रहा है। वन रोपण कार्यक्रम में नदी के स्रोत क्षेत्र में प्रमुख रूप से वृक्ष लगाए जा रहे हैं ताकि मृदा कटाव को रोककर बार की समस्या को कम कर सके।

      बाढ़ नियंत्रण के लिए अनेक विशिष्ट कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रमों में मृदा संरक्षण हेतु बेडिंग तथा कंटूर कृषि का विकास किया जा रहा है। बेडिंग के तहत छोटी-छोटी सरिताओं के प्रवाह को बाधित करने का प्रयास किया जाता है जबकि कन्टूर कृषि के तहत पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च रेखा के सहारे जुताई का कार्य किया जाता है ताकि मृदा का अपरदन न हो सके।

      भारत में पर्वतीय क्षेत्रों एवं वन्य क्षेत्रों में झूम कृषि के द्वारा वनों का विनाश हो रहा है। अतः इसे रोकने के लिए 1976 ई० में ही “झूम प्रीवेंशन फार्मिंग एक्ट” का निर्माण किया गया था। इससे वनों का संरक्षण होगा और बंजर भूमि का विकास नहीं होगा इससे बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी।

       बाढ़ के प्रभाव को रोकने के लिए बाढ़ के पूर्व सूचना देने का भी प्रयास किया जा रहा है और इस दिशा में विशेष कार्य भारतीय बाढ़ आयोग और भारतीय मौसम विज्ञान ने किया है। वर्तमान समय में कृत्रिम उपग्रहों का सहारा लेकर सात केन्द्रों पर बड़े और 147 स्थानों पर छोटे भविष्यवाणी केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनका 57% भविष्यवाणी सही रहता है। बड़े केंद्र के रूप में है- भुवनेश्वर में महानदी पर, दिल्ली में यमुना नदी पर, गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पर, जलपाईगुड़ी में तीस्ता नदी पर, लखनऊ में गोमती नदी पर, पटना में गंगा पर और सूरत में ताप्ती नदी पर स्थापित किया गया है।

          बाँध, तटबंध, विशिष्ट प्रकार के खुले पूल और जल निकासी का विकास कार्य भी वृहत स्तर पर किया गया है। जिसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा है। इन बचाव कार्यक्रम के तहत 1954 से 1987 के बीच 14511 किलोमीटर तटबंधों का निर्माण किया गया था। 2838 किलोमीटर जल निकासी का विकास किया गया था।

          नदी के तली से मलवों को निकालने का कार्यक्रम बहुत खर्चीला है। सामान्यत: यह कार्य उन क्षेत्रों में किया जा रहा है जहाँ नदी का उपयोग नावों के लिए किया जाता है।

        ऊपर वर्णित कार्यक्रमों के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं में बाढ़ हेतु विशिष्ट राशियों का आवंटन होता है। जैसे प्रथम पंचवर्षीय योजना में 13.77 करोड रुपए आवंटित किए गए थे। जबकि आठवीं में 1623 करोड रुपए जारी किए गए थे।

        बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई तात्कालिक कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इसके लिए पैसों का आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवीं वित्त आयोग के अनुसार हानि की समीक्षा का कार्य केंद्र सरकार का होगा। केंद्र द्वारा समीक्षा कर केंद्रीय सहयोग शुरू किया जाएगा। सरकार बाढ़ संभावित वाले क्षेत्र से बचाकर सुरक्षित स्थानों पर ले जाती है।

        बाढ़ आ जाने पर बाढ़ राहत कार्यक्रम चलती है। हेलीकॉप्टर, गोताखोरों, प्लास्टिक बोट का सहारा लेती है। भोजन के पैकेट का वितरण करती है। पेयजल हेतु जलापूर्ति किया जाता है। मवेशियों हेतु चारा उपलब्ध कराए जाते हैं। बाढ़ समाप्त होने पर अनेक संक्रामक बीमारियों से बचाव हेतु टीका, दवा का प्रबंध करती है। जल निकासी, संचार व्यवस्था और परिवहन आदि का प्रबंध किया जाता है। केंद्र एवं राज्य सरकारों के अलावे स्वंय सेवी संस्थाओं का भी सहारा लिया जाता है।

सुझाव-

        यद्यपि बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई प्रयास किया जा रहा है फिर भी समस्या लगभग यथावत है। अतः इस समस्या से निपटने हेतु और अधिक पेनिट्रेटिव योजनाओं की जरूरत है। पुनः टिकाऊ विकास नीति के अंतर्गत ऐसी योजनाओं की जरूरत है जिसमें पर्यावरण के असंतुलन किए बगैर इन समस्याओं का समाधान किया जा सके।

      बाढ़ एवं जल जमाव वाले क्षेत्रों में ऐसी कृषि का विकास किया जाए जो बाढ़ के स्थिति में भी उग सके। जैसे चावल के ऐसे किस्म विकसित किए जाए जो 15 से 20 दिन तक चल मग्न रहने पर भी स्वस्थ रहें। द्वितीय जल कृषि का विकास किया जाए। इसके लिए मखाने, सिंघाड़े की खेती किया जा सकता है तथा बड़े पैमाने पर मछली का पालन किया जा सकता है।

        बाढ़ वाले क्षेत्रों में निर्माण तकनीक को विकसित किया जाए। बाढ़ वाले क्षेत्रों में सीमेंट एवं ईट से मकान निर्माण की गतिविधि को प्रोत्साहित किया जाए।

       बाढ़ वाले क्षेत्रों में ऐसे पुल निर्माण तकनीक पर बल दिया जाए जिससे जल ऊपर एवं नीचे दोनों से आसानी से बह सके। इसके लिए खुला पुल का निर्माण सर्वाधिक उपयोगी होगा। इसके साथ ही वानिकी कार्यक्रम और अन्य विकास कार्यक्रम को भी तीव्रता से लागू करने की आवश्यकता है।

         भारत में बाढ़ नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधा नेपाल से आने वाली नदियों के जल को रोका जाना है। अतः इस कार्य के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानून को पालन करना पड़ता है। ऐसे में भारत सरकार एवं राज्य सरकारें नेपाल से आने वाली नदियों को अनेक चैनलों में विभाजित कर गंगा नदी में जल को गिराकर समाधान का प्रयास करना चाहिए।

      बाढ़ प्रणव वाले क्षेत्रों में कृत्रिम उपग्रह के माध्यम से सूचना तंत्र को और प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है।

       भूमि जल रिचार्ज करने वाले तकनीक को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसके लिए जोहार, आहरा, कच्चे कुआं एवं तालाब, पाइन इत्यादि को पुर्नोद्धार किया जाए।

        बाढ़ राहत कार्यक्रम को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सही तरीके से चलाया जाए। अंततः क्रांति के तहत नदी जोड़ो कार्यक्रम को अतितीव्र गति से कार्य रूप दिया जाए। जहां आवश्यक हो वहां पर बड़े बांध और छोटे बांधों का निर्माण किया जाए। नगरों में “वाटर हार्वेस्टिंग” को अनिवार्य गतिविधि के रूप में शामिल किया जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. भात में बाढ़ के काण, प्रभावित क्षेत्र, समाधान के दिशा में किया गया प्रयास एवं सुझाव की चर्चा करें।

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



परिभाषा- 

          भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने सूखा को परिभाषित करते हुए बतलाया है की मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 सेमी० या उससे कम हो, सूखा की स्थिति कहलाएगी। यही समयावधि मानसून के आगमन का है, इसीलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है। यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है।

कारण-

       सूखे की स्थिति के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

        इसे फ्लोन का विषुवतीय पछुआ सिद्धांत, जेट स्ट्रीम व एल-नीनो से स्पष्ट किया जा सकता है।

(ii) वनों की कटाई व मृदा का अपरदन-

        वनों की कटाई से वायुमंडलीय आर्द्रता में कमी और तापमान में वृद्धि होती है, जिससे बादल निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है और वर्षा के अभाव में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

       मृदा अपरदन से मिट्टी का ऊपरी सतह अपरदित हो जाता है और नग्न चट्टाने दृष्टिगत होने लगती है। नग्न चट्टानों की जल ग्राहय क्षमता कम होती है। इससे प्रदेश का भूमिगत जलस्तर नीचे चला जाता है और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

       पुन: मिट्टी के नमी में कमी आने से फसल मारी जाती है। ऐसी समस्या झारखंड के चतरा और पलामू बिहार के भभुआ और नवादा आदि जिलों में पाई जाती है। ऐसी ही समस्या चंबल, बेतबा और केन नदी के बेसिनों में भी मिलती है।

(iii) तापमान में वृद्धि-

        यह कारक मूलत: जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। इससे वायुमंडलीय तापमान में लगातार वृद्धि की स्थिति है। नग्न चट्टानें सूर्याताप के प्रभाव में आ जाती है और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया तेजी से होने लगती है और अधिक ताप के ही वाष्प संघनित नहीं हो पाते हैं, जिससे वर्षा नहीं हो पाती है। उत्तर भारत के पठारीय क्षेत्रों में सूखे के स्थिति का प्रमुख कारण यही है। साथ ही चंबल घाटी से लेकर झारखंड के चतरा जिला के बीच सूखा के लिए यही कारण प्रमुख है।

(iv) असमान वर्षा का वितरण-

          संपूर्ण भारत में वर्षा का वितरण असमान होने के कारण भी सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। न्यून वर्षा क्षेत्रों में इसकी प्रबलता तत्काल दृष्टिगोचर होती है।

सूखा जनित समस्याएँ

⇒ कृषि कार्य हेतु जलजमाव की समस्या

⇒ तापमान वृद्धि की समस्या

⇒ वन ह्रास व मृदा अपरदन की समस्या

⇒ पेय जल की समस्या

⇒ जलस्तर में गिरावट व भू-आर्द्रता में कमी

⇒ संक्रमण व बिमारियों के प्रकोप में वृद्धि

⇒ सरकारी व निजी कार्यों के संचालन में बाधा

वितरण-

       भारत में सुखा प्रभावित क्षेत्र मुख्यत: पश्चिम भारत में स्थित है। IMO के अनुसार 13 राज्यों के 67 जिलों में लगभग स्थायी तौर पर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। भारत का मध्यवर्ती राज्य व पठारीय भाग इसके अंतर्गत आते है। लेकिन भौगोलिक वितरण के दृष्टि से अगर देखा जाए तो 50 सेमी० वार्षिक वर्षा से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में लगभग प्रत्येक वर्ष सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भारत के सिंचाई अयोजनानुसार यह दायरा 75 सेमी० से कम वर्षा वाले क्षेत्र तक है। 75 सेमी० वर्षा रेखा भारत को सुखा व आर्द्र दो भागों में बांटता है। सूखा आगमन की बारंबारता के दृष्टिगत 100 सेमी० से कम वर्षा वाला क्षेत्र सूखे की सबसे अधिक संभावित क्षेत्र है।

भारत में सूखा के कारण

चित्र: भारत में वर्षा का सामान्य वितरण

         100 सेमी० से 150 सेमी० के बीच वाले क्षेत्रों में एक विशिष्ट स्थिति होती है। यहां कभी बाढ़, कभी सुखाड़ या बाढ़ एवं सुखाड़ की वैकल्पिक स्थिति देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का उल्लेख किया जा सकता है। प्राय: 150 सेमी० से अधिक वर्षा वाला क्षेत्र अधिक वर्षा के बाद जद में क्षेत्र की लहलहाती फसलों को डूबो देती है और अंतत: सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देती है।

सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए किए गए विकास कार्य:-

     इस दिशा में पहली योजना भारत में 1863 ई० में बनी थी जो आकाल आयोग के रिपोर्ट पर आधारित थी। इसके अंतर्गत नदियों से कुछ प्रत्यक्ष नहर निकले गए जिसमें सरहिंद नहर प्रमुख था। पंजाब राज्य में संप्रति नहर। परंतु, सुख से निजात हेतु वास्तविक प्रयास स्वतंत्रता के बाद किए गए। जिसके तहत दो महत्वपूर्ण स्वीकृत प्रयास थे- 

1. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना

2. वानिकी व बंजर भूमि सुधार योजना

      बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना में कावेरी जल कमान एरिया और भाखड़ा नांगल परियोजना प्रमुख था। कावेरी जल कमान एरिया तमिलनाडु के तंजौर जिला में स्थित है। पहले यह जिला सूखाग्रस्त था लेकिन आज हरित क्रांति का क्षेत्र बन चुका है। इस प्रकार भाखड़ा नांगल परियोजना से पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कृषि कार्य में तेजी आई।

        वानिकी एवं बंजर भूमि की योजना द्वारा तापीय प्रभाव को कम किया गया है जिससे आर्द्रता में वृद्धि हुई। वानिकी एवं बंजर भूमि विकास योजना के द्वारा मिट्टी के नमी क्षमता में वृद्धि करने का प्रयास किया जा रहा है। 1967 ई० के सूखे के बाद सिंचाई संदर्भ को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। 

       पांचवीं पंचवर्षीय योजना में “कमांड क्षेत्र विकास योजना” और “सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास योजना” (DPADP) प्रारंभ की गई। प्रथम के तहत 97 कमांड क्षेत्र चिह्नित किए गए जैसे चंबल कमांड क्षेत्र, सोन कमांड क्षेत्र, इंदिरा कमांड क्षेत्र आदि। इसके अंतर्गत 189 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचाई की व्यवस्था है।     

        DPADR संपूर्ण भारत में चलाए जा रहे हैं। शुष्क कृषि विकास, स्थानीय जल संसाधन का उचित प्रबंध, वैज्ञानिक भू-उपयोग पद्धति का विकास, ग्रामीण स्तर पर वानिकी व पशुपालन को प्रोत्साहन इस योजना के प्रमुख लक्ष्य है। सूखे की स्थिति में भी फसल कम से कम प्रभावित हो इसके लिए विशेष किस्म के बीज तैयार किया जा रहे हैं। जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उगाने हेतु कपास के PRS72, PRS73, PRS74 नमक बीज विकसित किया गया है। राजस्थान के लिए 100 दिन में उपजा लिए जाने वाले चावल के बीच तैयार किए गए हैं। इस क्षेत्र में नित नए शोध कार्य जारी है।

       सूखे से निजात हेतु आपातकालीन कार्यक्रम भी चलाए गए हैं। जिसका आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवें वित्त आयोग के अनुसार सूखाग्रस्त क्षेत्र में हुए हानि का जायजा व सहायतार्थ कार्य केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।

सुझाव-

     यद्यपि सूखाग्रस्त की समस्या के समाधान हेतु कई स्तरों पर प्रयास किए गए हैं, लेकिन यह समस्याएं आज राष्ट्रीय समस्या के रूप में कायम है। आज अधिक पेनेट्रेटिव योजनाओं, पर्यावरण हितैषी टिकाऊ विकास नीति, मानसून का सही आंकलन पर विशेष जोर देने की जरूरत है। नदी जोड़ योजना कार्य में तेजी लाने की आवश्यकता है।

⇒ बड़ी परियोजनाओं पर पुनः विचार करने की जरूरत है क्योंकि गहन आंकलन के बाद जयपुर पर्यावरण अध्ययन केंद्र ने संकेत दिया था की बड़ी परियोजनाएं मानसूनी जलवायु को बदल सकती है।

⇒ सूखाग्रस्त इलाकों में पशुपालन कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि चारा उत्पादन हेतु अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। यह कार्यक्रम राजस्थान में सफल भी हो रहे हैं। स्थानीय जल सुविधा व वर्षा जल संरक्षण पर विशेष ध्यान व जागरूकता लाने की जरूरत है।

⇒ बिहार राज्य प विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि यहां नह के बदले ट्यूबवेल सिंचाई अधिक समीचीन है।

          अंततः सुखा का सामना सामूहिक प्रयास से ही संभव है। 

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात



भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात  

         जब किसी निम्न वायुदाब केंद्र के चारों ओर तीव्र गति से हवा घुमने की प्रवृति रखती है तो उसे चक्रवात कहते है। फेरल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में यह परिसंचरण घड़ी की सुई के उल्टी दिशा में और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा में होती है।

      उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 8º से 20º अक्षांश के बीच होती है। यह उष्ण कटिबंधीय प्रदेश की चक्रवात है। इसकी उत्पत्ति एक निम्न वायु दाब केंद्र के बनने से प्रारंभ होता है जिसे आँख या आवर्त (Vertex) कहा जाता है।

              उष्ण चक्रवात के उत्पत्ति के लिए दो प्रकार के वायु राशि की आवश्यकता पड़ती है। ये दोनों वायु राशि अलग-अलग विशेषताओं के होते है लेकिन तापीय प्रभाव अधिक होने के कारण वायु तेजी से गर्म हो जाती है और अंततः प्रारंभिक गुणों को छोड़ तेजी से ऊपर उठने लगती है और निम्न वायुदाब केंद्र का निर्माण करती है। इस निम्न वायुदाब केंद्र को ठंडी वायु चारों ओर से भरने के लिए दौड़ती है लेकिन पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव में वायु घुमने लगती है और चक्रवात को जन्म देती है।

     भारतीय  उपमहाद्वीप पर आने वाले चक्रवात को पश्चिम बंगाल में नार्वेस्टर, बिहार में आंधी, पंजाब एवं हरियाणा में तूफान कहते है। इसका केंद्र सामान्यत: बंगाल की खाड़ी या उसके तटवर्ती क्षेत्र में होता है। प० तट पर चक्रवातीय प्रभाव सिर्फ गुजरात में देखने को मिलता है। भारत में आनेवाले उष्ण चक्रवात को समय के दृष्टि से तीन भागों भागों में बांटते है-

(1) मानसून पूर्व चक्रवात 

(2) मानसून काल के दौरान आने वाला चक्रवात

(3) मानसून के बाद का चक्रवात

         मानसून पूर्व चक्रवात का आगमन मुख्यत: 15 अप्रैल से जून के प्रथम सप्ताह के बीच आता है। इसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यत: गोदावरी नदी के उत्तरी भाग में होता है। इसका प्रारंभिक केंद्र (15 अप्रैल से 15 मई के बीच) महाद्वीप या स्थलखंड के ऊपर होता है लेकिन 15 मई के बाद यह तट के किनारे अवस्थित होते है।

           प्रारम्भिक चक्रवात कम विनाशकारी होते है जबकि तटीय चक्रवात अधिक विनाशकारी होते है। प्रारंभिक चक्रवात का केंद्र प० बंगाल के ऊपरी मैदान (सामान्यत: मालदा से दिनाजपुर के बीच) में होती है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण मैदान की तुलना में आस-पास के क्षेत्र का उच्च भार क्षेत्र है उच्च भार का क्षेत्र मेघालय का पठार, छोटानागपुर का पठार, उपरी गंगा का मैदान, बंगाल की खाड़ी व हिमालय के ऊपर होता है। इसी चक्रवात को नार्वेस्टर या कालबैशाखी कहते है। इसकी प्रमुख विशेषता है पहले शुष्क तेज वायु चलती है फिर वर्षा होती है। 

           लेकिन मई के उतरार्द्ध में परिस्थितियाँ बदलने लगती है। सम्पूर्ण महाद्वीप क्षेत्र एक गर्म वायु राशि क्षेत्र में बदल जाता है जबकि बंगाल की खाड़ी दूसरी गर्म महासागरीय वायु राशि का निर्माण करती है।

         तापीय प्रभाव के अनिश्चितता के कारण तटवर्ती क्षेत्र में और मुख्यत: दो वायु राशि के बीच मध्य तटवर्ती क्षेत्र में निम्न भार केंद्र का विकास होता है और दो वायु राशियाँ इसी केंद्र के चारों तरफ घुमने लगती है। बंगाल की खाड़ी की वायुराशि बाधा रहित होती है अत: तेजी से महाद्वीपीय क्षेत्र के ऊपर प्रहार करती जो भारी वर्षा और विनाश को जन्म देता है। यह सही अर्थों में प्राकृतिक विपदा के समान होता है। 

अरब सागर में उत्पन्न होने वाले चक्रवात

            अरब सागर भी एक गर्म महासागरीय उष्ण वायु राशि का निर्माण करते है लेकिन यहाँ चक्रवातीय परिस्थितियाँ नहीं बनती है क्योंकि चक्रवातीय परिस्थिति के लिए दो अलग-अलग विशेषताओं की वायु राशि का निर्माण होना आवश्यक है। भारत का पश्चिमी तट अत्यंत ही संकरा एवं रेखीय है जो स्थलीय और समुद्री समीर के लिए तो अनुकूल है लेकिन समान विशेषता की वायु राशि के निर्माण के लिए अनुकूल नहीं है।

           इस संकरे प्रदेश पर पर्वतीय और महासागरीय वायु की विशेषताओं का प्रभाव पड़ जाता है और वे वायु राशि के रूप में काम नहीं कर पाते है। यही कारण है कि भारत के पश्चिमी तट पर चक्रवात की उत्पत्ति नहीं होती है लेकिन गुजरात के काठियावाड़ का प्रायद्वीप एक अपवाद है जहाँ चक्रवातीय प्रभाव पड़ते है लेकिन चक्रवातीय बारंबारता कम होती है।

         गुजरात का क्षेत्र लगभग मैदानी या सपाट है। अत: यह महाद्वीपीय उष्ण गर्म वायु राशि बनाते है। जब भी ये दो गर्म वायु राशियाँ एक-दूसरे के ऊपर दबाव उत्पन्न करती है तो चक्रवात का आगमन होता है लेकिन चक्रवात की कम दबाव बारम्बारता का मूल कारण इस प्रदेश में चलने वाली सन्मार्गी वायु है। सन्मार्ग्री वायु दोनों वायु की दिशा एक तरफ कर देती है। विश्व के सभी उष्ण मरुस्थल सन्मार्ग्री वायु के स्रोत होते है।

        राजस्थान मरुस्थल से चलने वाली वायु का प्रभाव गुजरात प्रदेश पर भी पड़ता है। यही कारण है कि चक्रवातीय प्रवाह तब तक उत्पन्न नहीं होते जब तक कि गुजरात के तटवर्ती क्षेत्र में तापीय प्रभाव अत्यधिक गहन नहीं हो जाता है।

          अधिक तापीय प्रभाव से जब संवहनीक क्रिया होती है तो गुजरात प्रदेश की वायु गर्म होकर विषुवतीय निम्न भार की तरफ न जाकर लम्बवत रूप से ऊपर उठ जाती है। इससे सन्मार्ग्री वायु का प्रवाह बाधित होता है। इसके बाद प्रवाह के मध्य निम्न भार केंद्र उभर जाते है और वायु अपनी दिशा बदल लेती है और चक्रवात को जन्म देती है।

भारत में उष्णकटिबंधीय

            मानसून के समय भी उष्ण चक्रवात उत्पन्न होती है जिसके कारण चक्रवातीय वर्षा होती है। प्रारंभ में यह अवधारणा थी कि मानसूनी वर्षा पर्वतीय वर्षा है लेकिन 1977 के MONEX Expedition के समय से ही यह निश्चित हो चूका है कि भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में मानसूनी वर्षा चक्रवातीय होती है।

          पर्वतीय वर्षा का क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत, हिमालय  और उत्तर का मैदानी क्षेत्र है लेकिन उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र के आंतरिक भागों में अधिकत्तर वर्षा चक्रवातीय होती है।

        सामान्यत: यह देखा जाता है कि उड़ीसा के तटीय क्षेत्र से लेकर शिमला तक तथा उड़ीसा के तटीय क्षेत्र से प० राजस्थान तक ऐसे अक्ष का निर्माण होता है, जिसके अनुरूप निम्न वायुदाब का क्षेत्र स्थानान्तरित होता है और इसी स्थानांतरण के साथ गर्म वायु उठ कर संतृप्त होती है और इन प्रदेशों में वर्षा लाती है।

         मानसून के बाद चक्रवात का आगमन मुख्यत: गोदावरी नदी के द० में देखने को मिलती है। ये चक्रवात 15 अक्टूबर से दिसम्बर के प्रथम सप्ताह के बीच आते है। इसका प्रभाव मुख्यतः दक्षिण आंध्रप्रदेश तथा तमिलनाडू में देखने को मिलता है। इसकी उत्पत्ति का मूल कारण दो गर्म वायु का एक-दूसरे के विपरीत दिशा में अपवाहित होना है। इनसे गर्म वायु राशियों का निर्माण द०-प० मानसूनी वायु तथा उ०-पू० मानसूनी वायु द्वारा होता है।

        प्रायद्वीपीय भारत के द०-पू० तट पर जब ये दो वायु राशि मिलते है तो चक्रवातीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है लेकिन नवम्बर के अंत आते-आते द०-प० मानसून वायु पूर्णत: पीछे हट जाती है और ऐसी स्थिति में उ०-पू० मानसूनी वायु ही सम्पूर्ण महाद्वीपीय क्षेत्र पर अपवाहित होने लगते है। इससे तमिलनाडु में पर्वतीय वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। यही काण है कि दिसंब में चक्रवात नहीं आते है।        

भारत में उष्णकटिबंधीय

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

       34.भारत की प्राकृतिक वनस्पति



भारत की प्राकृतिक वनस्पति

           प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उगने वाले वनस्पतियों के समुच्य को “प्राकृतिक वनस्पति” कहते हैं। दूसरी ओर वैसी वनस्पति जो मानवीय हस्तक्षेप से विकसित होती हैं उन्हें “मानव जनित वनस्पति” कहते हैं। जैसे- बाग-बगीचा, उद्यान आदि।

       प्राकृतिक वनस्पतियों के ऊपर जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। कोपेन के अनुसार उपरोक्त तीनों कारकों में सर्वाधिक प्रभाव जलवायु का पड़ता है। उन्होंने बताया कि- “वनस्पति जलवायु का सूचकांक होता है।”

     प्राकृतिक वनस्पति में पुनर्नवीनीकरण का गुण पाया जाता है। इसका तात्पर्य है कि यदि पृथ्वी को 25 वर्षों तक स्वतंत्र छोड़ दिया जाय तो यह पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों से भर जायेगी। पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों में अनुकूलन की क्षमता भी पायी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार

     भारत की प्राकृतिक वनस्पति प्राकृतिक वातावरण में रहते हुए विविध रूपों में रूपान्तरित हो चुकी है। भारत में लगभग 30 हजार से अधिक प्रकार के वनस्पति पाये जाते हैं। इन वनस्पत्तियों को वर्षा और तापीय स्थिति के आधार पर छ: भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

(4) ज्वारीय वनस्पति

(5) उपोषण पर्वतीय वनस्पति

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति-

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति की तुलना ‘विषुवतीय वनस्पति’ से की जाती है। इसकी सामान्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

(i) इसकी वृक्ष की लम्बाई 30-60 मी० तक होती है।

(ii) इसकी जड़े बहुत गहराई तक नहीं पहुँच पाते हैं क्योंकि धरातल पर ही उन्हें पर्याप्त वर्षा जल प्राप्त हो जाती है।

(iii) पौधों में शाखाएँ कम पायी जाती हैं जिसके कारण इसका बितान कम चौड़ा होता है।

(iv) इसका तना काफी कठोर होता है।

(v) पत्तियाँ चौड़ी होती हैं क्योंकि सूर्य की रोशनी प्राप्त करने के लिए पौधों में प्रतिस्पर्धा चलती है।

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति में विविध प्रकार के वृक्ष एक साथ मिलते हैं। वृक्षों के ऊपर बड़े पैमाने पर अधिपादप (Ekiphyte) पाये जाते हैं। वृक्ष सालोंभर हरे-भरे रहते हैं। ये एक ही बार में सभी पत्तियों को नहीं गिराते, इसीलिए इसे “चिरहरित सदाबहार वनस्पति” कहते हैं। प्रमुख वृक्षों में महोगनी, बालनट, आबनूस, कब्रेका, सिनकोना, गाटापार्चा, एबोनी, रबड़, तेलताड़, सीडर, रोजवुड, आयरन वुड आदि हैं।

       उष्णार्द्र सदावहार वनस्पति सामान्यतः वैसे क्षेत्र में विकसित होती है, जहाँ वर्षा सालों भर होती है। तापमान अति उच्च रहता है। वर्षा 130-250 cm के बीच होती है। औसत तापमान 22°- 27°C, वायुमण्डलीय आर्द्रता 70% तथा तापान्तर 10°C से कम रहता है।

        भारत में विषुवतीय वनस्पति के तीन प्रमुख क्षेत्र है-

(i) अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह,

(i) मालाबार और कोंकण तट,

(iii) उ.-पू. भारत

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

         भारत के मानसूनी जलवायु क्षेत्रों में उगने वाले वनस्पति को मानसूनी वनस्पति कहते हैं। मानसून क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दो शुष्क एवं आर्द्र जलवायु पायी जाती है। उष्णार्द्र मानसूनी वनस्पति शुष्क मौसम में पत्तियाँ गिरा देती है जिसे “पतझड़ मानसूनी वन” कहते हैं। जैसे- शीशम, पीपल, सागवान, इमली, अमलतास, एक्सल, सेमल आदि। मानसूनी प्रदेश में कुछ ऐसे भी वृक्ष मिलते हैं जो एक ही बार पत्तियों को नहीं गिराते हैं। जैसे- आम, अमरूद, बरगद इत्यादि। मानसूनी वनस्पति की जड़े विषुवतीय वनस्पति की तुलना में लम्बी होती है। तना मोटा होता है। बितान चौड़ा होता है। पतियों की चौड़ाई सामान्य होती है। वृक्षों के छाल काफी मोटे होते हैं। शुष्कता से बचने के लिए ही पौधे पत्तियों को गिराती है।

       मानसूनी वनस्पति मानसूनी जलवायु के प्रभाव में उगने वाली वनस्पति है। यहाँ न्यूनतम तापमान 18ºC अधिकतम तापमान 35°C, वर्षा ऋतु में वर्षा की मात्रा 60-130 cm नवम्बर से मई महीने तक मौसम शुष्क पायी जाती है।

        मानसूनी वनस्पति का विस्तार गंगा के मैदानी क्षेत्र, शिवालिक पर्वत, असम के मैदान, कोयम्बटूर के पठार, मध्यवर्ती भारत में हुआ है। भारत में मानसूनी वनस्पति का विस्तार सबसे अधिक क्षेत्र पर हुआ है।

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

          शुष्क जलवायु प्रदेशों में उगने वाले वनस्पति को “शुष्क और अर्द्धशुष्क वनस्पति” कहते हैं। सामान्यतः ऐसे वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं-

(i) अर्द्ध शुष्क वनस्पति

(i) पूर्ण शुष्क वनस्पति

           अर्द्ध शुष्क वनस्पति में घासभूमि और झाड़ियाँ बड़े पैमाने पर मिलती है। झाड़ियों की ऊँचाई 6-9 मी० तक होती है। जबकि पूर्ण शुष्क वनस्पति में कंटीले या कैक्टस वनस्पति का विकास बड़े पैमाने पर होता है। खेजड़ी अर्द्धशुष्क प्रदेश की प्रमुख वृक्ष हैं। जबकि पूर्ण शुष्क प्रदेश में नागफनी, बबूली, खजूर जैसे वृक्ष मिलते हैं। शुष्क वातावरण होने के कारण पौधों की जड़ें जलग्रहण करने हेतु काफी लम्बी हो जाती है। पत्तियाँ काँटों में रूपान्तरित हो जाती है। पति और तना के ऊपर मोम जैसे परत विकसित हो जाते हैं। कीटों को आकर्षित करने हेतु फूलों के रंग काफी चटकदार हो जाते हैं।

       50-100 cm वर्षा वाले क्षेत्रों में अर्द्धशुष्क वनस्पति का विकास होता है। जबकि 50 cm ये कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पूर्ण शुष्क वनस्पति का विकास होता है। शुष्क मानसूनी वनस्पति का विकास वहीं होता है जहाँ 8-11 माह तक शुष्क मौसम रहती है। तापमान और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया अधिक होती है।

        अरावली पर्वत के पूर्वी भाग में, द. भारत के वृष्टिछाया प्रदेश में तथा लेह लद्दाख क्षेत्र में ‘अर्द्धशुष्क वनस्पत्ति’ पायी जाती है। जबकि थार मरुस्थलीय क्षेत्र में “पूर्ण शुष्क वनस्पति” पायी जाती है।

(4) ज्वारीय वनस्पति

        इसे ‘गरान’ या ‘मैंग्रोव वनस्पति’ भी कहा जाता है। इसका विकास तटीय क्षेत्रों में हुआ है। चूँकि तटीय क्षेत्रों में लवण की मात्रा अधिक पायी जाती है। इसलिए लवणीय वातावरण के साथ इनका अनुकूलन हुआ है। ज्वारीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वारीय प्रवाह क्षेत्र के वन-

        इसे सुन्दर वन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सुन्दरी, केन और बेंत नामक वृक्ष मिलते हैं। इन वृक्षों की ऊँचाई 30 मी० तक होती है। लकड़ियाँ काफी नाजुक होती है।

(ii) ज्वारीज प्रवाह से मुक्त प्रदेश की वनस्पति-

         यहाँ ताड़ और नारियल जैसे वृक्ष प्रमुख हैं। इनकी लम्बाई बहुत अधिक होती है। तना में रेशम पायी जाती है जिसके कारण लकड़ियाँ काफी मजबूत होती है।

     ज्वारीय वनस्पति मुख्य रूप से विषुवतीय वातावरण में उगने वाली वनस्पति है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में अधिक लवण पाये जाने के कारण अनुकूलन की क्षमता पायी जाती है। जैसे- धरातल के ऊपर आ जाते हैं ताकि श्वसन की क्रिया आसानी से हो सके।

      भारत में ज्वारीय वनस्पति का विकास तटवर्ती क्षेत्रों में स्थित ज्वारनदमुख, नदियों के मुहानों, संकरी खाड़ियों या निवेशिकाओं में हुआ है। गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा मैन्ग्रोव वनस्पति का क्षेत्र है।

(5) उपोष्ण पर्वतीय वनस्पत्ति

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति का विकास वैसे क्षेत्रों में हुआ है जहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है। लेकिन, ऊँचाई के कारण जलवायु में परिवर्तन हुई है और यह उपोष्ण जलवायु में बदल चुकी है। उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते है। जैसे-

(i) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति और

(ii) आर्द्र शीतोष्ण पहाड़ी वनस्पति

      आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति 1070-1525 मी० की ऊँचाई पर मिलती है। जबकि आर्द्र शीतोष्ण वनस्पति 1525 से भी अधिक ऊँचाई पर मिलती है। ऐसे वनस्पति को ‘सोलास वन या शोला वन के नाम से भी जानते हैं। उपरोक्त दोनों प्रकार के वनों में मिलने वाले वृक्ष सदाबहार प्रकार के होते हैं। ज्यों-2 ऊँचाई बढ़ती जाती है त्यों-2 लकड़ी गुलायम तथा पते की चौड़ाई कम होते जाती हैं। चेस्टनट, रोजवुड, यूकेलिप्टस, देवदार, पाइन इत्यादि वृत मिलती हैं।

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति उपोष्ण जलवायु क्षेत्र में पायी जाती हैं। यह प्रायद्वीपीय भारत की वनस्पति है। जो अरावली, विन्ध्यन, सतपुड़ा, अजन्ता, पूर्वी घाट, प० धाट, नीलगिरि, अन्नामलाई की पहाड़ियों पर 1070 मी० से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलते हैं।

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

         इसे अल्पाइन वनस्पति भी कहते हैं। हिमालय प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति पर निम्न कारकों का प्रभाव पड़ा है। उच्चावच, पवन, वर्षा की मात्रा, ऊँचाई के साथ तापीय परिवर्तन, अक्षांश और ढाल का।

     हिमालय का उत्तरी ढाल मंद और द० ढाल तीव्र है जिसके कारण उत्तरी ढालों पर वनों का विस्तार अधिक तथा दक्षिणी ढालों पर वनों का विस्तार कम हुआ है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर कश्मीर हिमालय में मिलने वाले घास को ‘गुलमर्ग’ और ‘सोनमर्ग’ तथा कुमायूँ हिमालय में बुग्याल और ‘प्यायर’ कहते हैं। यह एक शीतोष्ण प्रकार के मुलायम घास है जिसका प्रयोग पशुचारे के रूप में किया जाता है।

       अक्षांशीय प्रभाव के आधार पर भी हिमालय के वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं।

 (i) पूर्वी हिमालय की वनस्पति और

(ii) पश्चिमी हिमालन की वनस्पति।

        पूर्वी हिमालय निम्न अक्षांश पर है। अतः यहाँ आर्द्रता अधिक, वर्षा 200 cm तक और सूर्य की लम्बवत किरणें मिलती है। जबकि पश्चिम हिमालय अपेक्षाकृत उच्च अक्षांश पर स्थित है जिसके कारण आर्द्रता कम, वार्षिक वर्षा 75 से कम और सूर्य की लम्बवत किरणों का प्रभाव कम पड़ता है। पूर्वी हिमालय में पतझड़ वन मिलते है जबकि प० हिमालय में नहीं। इसी तरह प० हिमालय में शीतोष्ण शुष्क वनस्पति मिलती है जबकि पूर्वी हिमालय में नहीं।

        हिमालय प्रदेश की वनस्पति पर उच्च्वाच का व्यापक प्रभाव पड़ा है। ऊँचाई के अनुसार ताप में परिवर्तन होते है और उसी के अनुरूप वनस्पति बदलते हैं जिसे नीचे के चित्र में दिखाया गया है।

भारत की प्राकृतिक

चित्र: भारत के प्राकृतिक वनस्पति

            इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में अनेक प्रकार के प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती हैं। इन वनस्पतियों पर जलवायु, उच्चावच, ढाल, मिट्टी, सूर्याताप, समुद्र से दूरी इत्यादि भौगोलिक काकों का प्रभाव पड़ा है। इन कारकों में सबसे ज्यादा प्रभाव जलवायु का पड़ा है। इसलिए कोपेन का कथन सत्य प्रतीत होता है कि “भारतीय वनस्पतियाँ जलवायु के सूचकांक होती हैं।”

प्रश्न प्रारूप

1. “भातीय प्राकृतिक वनस्पतियाँ जलवायु के सूचक हैं।” विवेचना करें।

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?



पश्चिमी विक्षोभ

     पश्चिमी विक्षोभ जाड़े की ऋतु में भूमध्यसागरीय भाग में उत्पन्न होने वाली एक शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात है जो पछुआ हवा के द्वारा पूरब की ओर ढकेल दिया जाता है। यह मार्ग में वर्षा कराते चलती है। यही हवा भारत के पंजाब, हरियाणा और गंगा घाटी क्षेत्र में प्रवेश कर वर्षा करती है जिससे इसमें बची-खुची नमी समाप्त हो जाती है।

         वर्षा के पश्चात् जब शुष्क हवा हिमालय के तलहट्टियों से पूरब की ओर बहती है तो वहाँ भीषण हिमपात होती है। परंतु, जब यह हवा मैदानी भाग में पुरब की ओर बढ़ती है तो राजस्थान के रेगिस्तानी प्रदेश की शीतलता को अपने साथ लेकर चलती है जिससे मैदान का तापमान काफी कम हो जाता है। इसे स्थानीय भाषा में “शीतलहर” कहा जाता है।

         चूँकि भूमध्यसागर की अक्षांशीय स्थिति 37°N अक्षांश है और भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ से 37°6’N अक्षांश है। उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटी 30°N से 35°N अक्षांश के बीच स्थित है। चूँकि पछुवा हवा 35°N से 60°N अक्षांश के बीच द०-प० से उ०-पू० की सोर चलती है।

        जब पछुआ हवा उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी से चलती है तो वह भूमध्य सागर से नमी ग्रहण करते हुए उ०-पू० दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं लेकिन उसके मार्ग में अवरोधक के रूप में भूमध्यसागर के उत्तर में आल्प्स पर्वत से लेकर पूरब में हिमालय पर्वत तक पर्वतों की लगातार लम्बी श्रृंखला मिलती है। फलस्वरूप पछुआ हवा इन पर्वतों के दक्षिणी ढाल के सहारे पश्चिम से पूरब दिशा में प्रवाहित होने लगती है जिसे “पछुआ विक्षोभ” कहते हैं। इसी पछुआ विक्षोभ से भारत के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भागों में जाड़े के दिनों में वर्षा होती है।

पछुआ विक्षोभ का आर्थिक प्रभाव

         भारत के आर्थिक जीवन में पछुआ विक्षोभ का प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ता है। जैसे-

(1) कृषि पर प्रभाव⇒

          पछुआ विक्षोभ के कारण जाड़े की ऋतु में वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ की फसल के लिए काफी फायदेमंद होती है। पंजाब में यह वर्षा जनवरी तथा फरवरी महीने में होती है। वहाँ की कृषि के लिए इस वर्षा का काफी महत्व है क्योंकि रबी फसल की सफलता इसी वर्षा पर निर्भर करती है।

     चूँकि पछुआ हवा जब राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों की शीतलता को अपने साथ लेकर मैदानी भागों में प्रवेश करती है तो यहाँ के तापमान में गिरावट आती है। फलतः यहाँ के जायद फसल एवं मसूर के फसलों में पाला लग जाती है और वे बर्बाद होने लगते हैं।

(2) पशुपालन पर प्रभाव⇒

        पछुवा हवा के कारण जाड़े की ऋतु में उत्तर भारत में शीतलहरी पड़ने लगती है जिसके कारण कई पशुओं को ठण्डा लग जाता है और उनकी मृत्यु भी हो जाती हैं। फलत: पशुपालकों को इससे हानि हो जाती हैं।

(3) उद्योगों पर प्रभाव⇒

      पछुआ विक्षोभ के प्रवेश करने से उत्तर भारत में काफी ठण्ड पड़ने लगती है। फलत: ठण्ड से बचने के लिए लोग ऊनी वस्त्रों का इस्तेमाल करते हैं। इसी के निर्माण के लिए पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि में ऊनी वस्त्र उद्योगों का विकास किया गया है।

        पंजाब, हरियाणा में गेहूँ का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है जिसमें पछुआ विक्षोभ का फाफी योगदान होता है। फलतः उत्तर भारत में गेहूँ, दलहन, तेलहन आदि की मीलों का विकास काफी संख्या में की गई है।

(4) पर्यटन उद्योग पर प्रभाव⇒

       जम्मू और कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ के कारण बड़े पैमाने पर बर्फ-बारी होती है। इसी का आनन्द उठाने के लिए यहाँ काफी संख्या में पर्यटक लोग आते हैं। इन पर्यटकों से जम्मू और कश्मीर को काफी आमदनी होती है। यहाँ पर्यटन पर आधारित कई उद्योगों का विकास किया गया है। जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पर्यटन उद्योग पर ही आधारित है।

(5) परिवहन पर प्रभाव⇒

        जम्मू और कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ के कारण जब काफी मात्रा में कई दिनों तक बर्फ-बारी होने लगती है तो सड़कें बर्फ से ढक जाते हैं। फलस्वरूप परिवहन मार्गों में बाधा उत्पन्न हो जाती है।

(6) शादी-विवाह पर प्रभाव⇒

        जब पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा के कारण पंजाब, हरियाणा में रबी फसल का उत्पादन काफी मात्रा में होती है तो किसानों की आमदनी बढ़ जाती है। फलत: जवान बेटा-बेटियों की विवाह काफी धूम-धड़ाके से की जाती है। इस अवसर पर आरकेस्ट्रा, नर्तकी, गायक, बैण्ड बाजा, भोज-भण्डार आदि का बड़े पैमाने पर आयोजन होता है। ‘तिलक’ में वृद्धि हो जाती है। हालाँकि तिलक लेना बहुत बड़ा पाप और अपराध है। मैं ऐसा कभी नहीं करूँगा।

(7) प्रबंधन पर प्रभाव⇒

         जब किसानों को फसलों के उत्पादन से काफी आमदनी होने लगती है तो वे अपने बच्चों को MCA, BCA, MBA मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन करवाते है जिसके कारण प्रबंधकों की आय में वृद्धि होती है।

(8) शिक्षण संस्थानों पर प्रभाव⇒

       जब पछुआ विक्षोभ के कारण होने वाली वर्षा से किसानों की फसलों की पैदावार काफी अच्छी होती है। तब वे अपने बच्चों को उच्च स्तर की पढ़ाई के लिए बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों में नामांकन दर्ज करवाते हैं जिसके कारण शिक्षण संस्थानों की आमदनी बढ़ जाती है।

(9) बैंकिंग पर प्रभाव⇒

       जब अच्छी पैदावार के कारण किसानों की आमदनी बढ़ती है तो वे अनाज को बेचकर बैंक में रुपये जमा करते हैं। यदि पछुवा विक्षोभ के कारण उनकी फसल बर्बाद होती है तब उन्हें पूँजी एवं अन्य कार्य के लिए बैंकों से ऋण लेनी पड़ती है। इससे बैंकों को ब्याज के रूप में आमदनी होती है।

(10) शेयर बाजार पर प्रभाव⇒

       जब किसान एवं व्यवसायियों की आमदनी काफी बढ़ने लगती है तो वे अपना पैसा शेयर बाजार में लगाते है, जिसके कारण शेयर बाजार के सूचकांक में उत्तर एवं चढ़ाव आता है।

(11) स्वास्थ्य पर प्रभाव⇒

        जाड़े की ऋतु में पछुआ विक्षोभ के कारण उत्तर भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगती है जिसके कारण कई लोग सर्दी-जुकाम से पीड़ित हो जाते हैं। कई बुढ़ा-बुढ़ी इसके शिकार भी हो जाते हैं।

(12) बाजार पर प्रभाव⇒

          जब पछुआ विक्षोभ के कारण उत्तरी भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगती है तो लोग इससे बचने के लिए ऊनी वस्त्र, कम्बल, रजाई, हीटर आदि का प्रयोग करते हैं। ये सभी वस्तुएँ बाजार से ही खरीदी जाती हैं। दूसरी तरफ जब फसलों के उत्पादन से किसानों की आमदनी बढ़ती है तो वे बाजार से अन्य कई उपयोगी वस्तुएँ खरीदतें हैं। फलत: बाजार में चहल-पहल का महौल बना रहता है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त आर्थिक गतिविधियों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पछुआ विक्षोभ खासकर उत्तर भारत के कई आर्थिक क्रियाकलापों को सकारात्मक एवं नाकारात्मक दोनों रूपों से प्रभावित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. पश्चिमी जेट प्रवाह जाड़े के दिनों में किस प्रकार पश्चिमी विक्षोभ को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने में मदद कता है? भारत के आर्थिक जीवन पर पछुआ विक्षोभ का क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।



हिमालय के आर्थिक महत्व

हिमालय की उत्पति:-

        हिमालय की उत्पत्ति की व्याख्या हैरीहेस के द्वारा दिया गया सिद्धांत प्लेट विवर्तनिक के सिद्धांत से करते है। प्रारंभ में सारे महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे और उनके चारों ओर अवस्थित महासागर पैन्थालासा कहलाया। मेसोजोइक काल में पैंजिया के धसान से टेथीस महासागर बना।

        टेथिस महासागर के उत्तरी भाग वाला प्लेट अंगारा प्लेट और दक्षिण भाग वाला प्लेट गोंडवाना प्लेट कहलाया। उन प्लेटों से होकर लाखों लाख वर्ष तक नदियाँ गुजरती रही और निक्षेपण का कार्य चलता रहा। इन निक्षेपण के परिणामस्वरूप भूपटल पर अत्याधिक मात्रा में अवसाद जमा हो गया, इन अवसादों के जमाव से भूपटल का भार बढ़ गया, गति उत्पन्न होने लगी, गोंडवाना प्लेट खिसकने लगा परिणामस्वरूप गोंडवाना का अग्रिम भाग बुल्डोजर के समान टेथिस सागर के ऊपर जमा मलवा पर दबाव बनाने लगा। जिसके कारण टेथिस सागर के मलवा के ऊपर बुल्डोजर विस्थापित हो गये, परिणामतः हिमालय की उत्पति हुई।

हिमालय का आर्थिक महत्व:

      हिमालय पर्वत के निर्माण से भारत के भौतिक, आर्थिक एवं जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ा। हिमालय का आर्थिक महत्व निम्नलिखित है:-

(1) हिमालय पर्वत साइबेरिया और रूस की ओर से आनेवाली ठण्डी एवं शुष्क पवन से रक्षा करती है। जब अत्याधिक ठंडी हवा को हिमालय रोकती है तो इसका सीधा प्रभाव हमारे देश के आर्थिक क्रियाकलाप पर पड़ता है जैसे-

       भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ के अधिकतर लोग कृषक है और जब कृषक है तो वे अपने खेत-खलीहान में कार्य करते है। जब वे कार्य करने हेतु खेत को प्रस्थान करते हैं तो मौसम को अपने ध्यान में रखते हुए यदि अत्याधिक ठंड पड़े तो कृषक लोग खेत में कैसे काम करेंगें, परिणामत: हमारे उत्पाद पर असर पड़ेगा। इसलिए हिमालय साइबेरिया से आने वाली ठंडी हवा को रोककर हमारे वातावरण को सामान्य बनाये रखता है।

(2) हिमालय पर्वत भारत के मौसम विज्ञान पर भी गहरा प्रभाव डालता है। हिमालय की उत्तंग हिम चोटियाँ उत्तरी भारत के तापमान एवं आर्द्रता को प्रभावित करती है। अपनी ऊँचाई और अवस्थिति के कारण ही यह अधिकांशत: आर्द्रता को हिम और हिम से जल रूप देती है। हिमालय के हिम क्षेत्रों से अनेक हिमानियाँ विकसित होती है। इससे ही सदानीरा नदी का उद्गम होता है, यहाँ के ढाल पर होने वाली वर्षा और झरना से मिलकर असंख्य नदियों को जन्म देती है।

         गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को जन्म देकर हिमालय अपना सब कुछ उसे अर्पित कर देती है अर्थात हिमालय पर एकत्रित हिम पानी का रूप लेकर इन नदियों में प्रवाहित होकर अपने उत्तमता का प्रमाण दिलाता है। इन नदियों के साथ बहाकर लायी गयी बारीक कांप मिट्टी मैदानों में फैला देती है और यदि कांप मिट्टी जिस मैदान में मिल गया उसकी उर्वरा शक्ति को कहने क्या है? हिमालय की नदियाँ जो बहती हुई भारत के अनेक क्षेत्रों तक जाती है उसका महत्व तो अकथनीय है।

       अतः हिमालय से दूसरी बड़ी फायदा है कि यह भारत वर्ष के लिए सालों भर जल का आपूर्ति कराती है जिसमें बड़े-बड़े शहरों की जलापूर्ति की समस्या को आसानी पूर्वक हल कर देती है। बड़े-बड़े फैक्ट्री में आवश्यक जल की पूर्ती करती है। कृषि प्रधान भारतवर्ष के कृषकों के लिए सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराती है।

(3) हिमालय के हिम आच्छादित शिखर का दर्शन तो ना जाने कैसे कैसे कौतुहल पैदा करता है। उन हिम आच्छादित शिखर और प्राकृतिक सुन्दरता के कारण इस हिमालय का महत्व बहुत अधिक है। उन स्थानों पर भ्रमण करने के लिए लाखों लाख की संख्या में लोग पहुँचते हैं विशेषकर हिमालय के निचले भागों में आते है।

          यहाँ ग्रीष्मावकाश में तो लोग शिमला, कुल्लू, मनाली, कांगड़ी, नैनीताल, मसूरी, देहरादून, चकराता, चम्बा, मुक्तेश्वर, अलमोड़ा, रानी खेत, भुवाली, कसौली, पहलगाँव, लेह, श्रीनगर, दार्जिलिंग का सैर करते हो।

       यहाँ स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक, धार्मिक व सामाजिक वातावरण का लुत्फ उठाते है और ये सब एक दिन में संभव नहीं है। इसके लिए वे होटल में रहते है अर्थात यहाँ का प्रमुख व्यवसाय होटल, ढाबा, परिवहन के साधन, आवश्यक चीज की पूर्ति हेतू छोटे-छोटे दुकान अपनी प्राकृतिक छटा बिखेरती हिमालय ना जाने कितने लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। इससे यहाँ के स्थापित व्यवसाय से कर के रूप में सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है।

(4) हिमालय की घाटियों में जहाँ वृक्षों की सीमा समाप्त और हिम रेखा आरंभ होती है वहाँ छोटे-छोटे चारागाह पाये जाते है जिसे कश्मीर मे मर्ग जैसे- सोनमर्ग, गुलमर्ग और कुमायूँ में बुग्याल या प्यामार कहते हैं। इसमें कश्मीरी और लामा गड़ेरिये, भेड़े, बकरी चराते हैं। अर्थात इन चारागाह स्थल की अवस्थिति है हिमालय में जहाँ भेड़, बकरी के चारागाह उपलब्ध है और इन्हें पालने वाले ऊन, मांस, चमड़े आदि को बेच देते है। जिससे यहाँ के लोगों को जीविकोपार्जन होता है।

(5) पुराण को यदि माने तो हिमालय को देवता स्वरूप माना गया है। इसी के पर्वत श्रेणी में कैलाश, अमरनाथ, मानसरोवर, केदारनाथ, बद्रीनाथ, वैष्णों देवी, तारादेवी, उत्तरकाशी, लक्ष्मण झुला, हरिद्वार आदि प्रमुख तीर्थ स्थल है जहाँ दर्शन हेतु अनेक लोग आते है और इससे भारत सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है।

(6) जलवायु की विभिन्नता और ऊँचाई के कारण हिमालय पर्वत पर विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती है। हिमालय पर्वत के ऊँचे ढालों पर सिल्वर फ्रूट, स्प्रूस, देवदार, बर्च, लार्च, चीड़ आदि वृक्ष मिलते हैं। यहाँ पर अनेक प्रकार के जड़ी-बूटी, कच्चा माल एवं वन्य प्राणियों का आजायबघर है। इन सब उत्पाद से हमारे आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है।

         यहाँ वैसे-वैसे जड़ी-बूटी मिलते है जो शायद ही दूनियाँ में कहीं मिल सके। ऐसे जड़ी-बूटी का उपयोग आज के प्रचलित दवा में मिश्रित कर के हो रहा है। यहाँ अनेक प्रकार के वन्य जीव देखने को मिलते हैं और उन्हें आजायबघर में रखा जाता है लोग इसे देखते है।

(7) बाहरी हिमालय श्रेणी पर असम से लेकर हिमाचल प्रदेश तक चाय और फल की खेती होती है। दार्जीलिंग असम के चाय के कहने क्या है? यहाँ के लोगों के जीविका के मुख्य साधन में से एक है। यह चाय निर्यात किया जाता है जिससे भारत को काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित होता है।

        यहाँ फल की खेती में सेब, बादाम, अंगूर, चेरी, खूवानी, आडू, अखरोट, नाशपाती आदि की खेती होती है। चाय के बाद सेब, अंगूर, चेरी, पूरे भारतवर्ष को उपलब्ध कराता है। इससे भी आय होते हैं।

     इन क्षेत्र में जहाँ कहीं भी समतल भूमि मिल गई वहाँ चावल, गेहूँ, मिर्च, अदरक की खेती होती है। जिससे यहाँ के लोग अपने खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग करते है।

(8) यहाँ पर पेट्रोलियम, सीसा, ताँबा, निकिल, जस्ता, चाँदी, सोना, टंगस्टन, एंटीमनी, मैग्नेसाइट, चूना-पत्थर, बहुमूल्य-पत्थर, रत्न भंडार आदि खनिज पदार्थ के मिलने से इन पर्वतों का आर्थिक महत्व और भी बढ़ गया है। असम में खनिज तेल, भूटान एवं सिक्किम में ताम्बा अयस्क व कोयले के भण्डार पाये गये है।

         यहाँ की जो खनिज की क्षमता है वह भी हिमालय की विशेषता को ही बताता है। इन खनिज की उपलब्धता से भारत दुनिया में अपना सर उठा कर बात करता है। इन खनिज के निष्कासन के लिए बड़ी संख्या में लोगों की आवश्यकता पड़ती है जिससे रोजगार की खाली होती संभावना को यह क्षेत्र पुर्ण करता है। इन खनिज उत्पाद से भारत तरह-तरह के समान बनाता है। अपना आवश्यकता पूरा करता है और अधिशेष को निर्यात कर विदेशी मुद्रा भी अर्जित करता है।

(9) हिमालय से निकलने वाली नदियों के मार्गों में पड़ने वाले जल-प्रपातो से सस्ती जल-विद्युत उत्पन्न की जाती है। सतलज पर भाखड़ा नांगल बाँध परियोजना अंतर्गत बाँध बनाकर जल विद्युत उत्पादन किया जाता है जिससे हमें विद्युत आपूर्ति होती है। इससे बड़ी मात्रा में कोयले का जलना बंद हो जाता है। सीमित संसाधन के वचाव का एक तरीका इन नदियों की उपस्थिति से ही संभव है।

      टोंस, शारदा, गंडक, कोसी आदि नदियों का उपयोग भी जलशक्ति उत्पादन के लिए किया गया है।

    अतः हम कह सकते है कि हिमालय भारत की रक्षा के लिए वचनबद्ध है। क्षा के साथ-साथ आर्थिक उपयोगिता दर्शाते हुए भातवर्ष विकास के किए तत्पर है। हमें आवश्यकता है सही तकनीक दृष्टि डालकर उपयोग करने का।


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9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश


हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

            हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत है जो भारत के उत्तर में एक चाप के रूप में अवस्थित है। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज/दर्रा से लेकर  ब्रह्मपुत्र गॉर्ज(नामचा बरबा) के मध्य हुआ है। इसकी लम्बाई लगभग 2500Km है। कश्मीर में इसकी चौड़ाई सबसे अधिक (450Km) और अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौड़ाई सबसे कम (150 Km ) है। इस पर्वत में विश्व की कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। ये चोटियाँ सालोंभर हिम से आच्छादित रहती है। इसलिए इसे हिमालय कहते हैं।

          हिमालय का निर्माण अल्पाइन भूसंचलन से तृतीयक काल में हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इसमें तीन प्रमुख श्रृंखलाएँ मिलती हैं। लेकिन पश्चिम से पूर्व की ओर जाने पर स्थलाकृतिक विशेषता के आधार पर इसे चार भागों में वर्गीकृत करते हैं। जैसे-

(1) पंजाब हिमालय / कश्मीर हिमालय / हिमाचल हिमालय

(2) कुमायूँ हिमालय

(3) नेपाल हिमालय

(4) असम हिमालय

हिमालय के स्थलाकृतिक

चित्र: हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

(1) पंजाब हिमालय:- 

        इसे “कश्मीर हिमालय” हिमालय भी कहते हैं। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से लेकर सतलज गॉर्ज (शिपकिला दर्रा) के मध्य हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 560 Km है। यह हिमालय का सबसे चौ० भाग है। चौड़ा होने का प्रमुख कारण हिमालय के साथ-2 ट्रांस हिमालय का पाया जाना है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर क्रमश: काराकोरम, जास्कर श्रेणी, महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय पायी जाती है।

             लघु हिमालय को कश्मीर में पीरपंजाल के नाम से जानते हैं। कश्मीर हिमालय अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस हिमालय में कई क्षेत्रीय विशेषताएं भी पायी जाती हैं। जैसे- ट्रांस हिमालय का निर्माण मुख्य हिमालय के निर्माण से पहले हुआ है। ट्राँस हिमालय पर सालोभर बर्फ, जमी रहती है। हिमानी के अपरदन से सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास हुआ है। यह पूर्णत शीतोष्ण अर्द्धमरुस्थल का भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

            कश्मीर हिमालय में अवस्थित सभी श्रृंखलाओं का उत्तरी ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है। महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में कश्मीर की घाटी अवस्थित है जिसमें डल वुलर झील से होकर झेलम नदी प्रवाहित होती है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मुलायम घास के क्षेत्र मिलते हैं जिसे सोनमर्ग  और गुलमर्ग कहते हैं। पीरपंजाल हिमालय पूर्णतिः वनस्पतियों, जंगलों से ढका हुआ है। इसी पर्वत में पीरपंजाल दर्रा पायी जाती है जिस दर्रे से होकर कुलगाँव से कोठी पहुंचा जाता है।

            बनिहाल दर्रे जम्मू को श्री नगर से जोड़ता है। इसी दर्रा में जवाहर सुरंग का निर्माण किया गया है। महान हिमालय में बुर्जिला और जोजिला जैसे प्रमुख दर्रे मिलते हैं। ट्रांस हिमालय और महान हिमालय में कई हिमानी का प्रमाण मिलता है। जैसे-  काराकोरम श्रेणी का सियाचीन हिमानी सबसे प्रमुख हैं।

(2) कुमायूँ हिमालय:-

        इसका विस्तार सतलज गॉर्ज से लेकर काली नदी के बीच हुआ है। इसका विस्तार हिमाचल प्रदेश और उतराखण्ड में देखा जा सकता है। इसकी लम्बाई मात्र 320Km है। यह हिमालय का सबसे कम लम्बाई वाला हिस्सा है। यहाँ पर महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय तीनों स्पष्ट रूप से पायी जाती है। महान हिमालय में माना और नीति दो प्रसिद्ध कॉल पाये जाते हैं। इसके अलावे नदियों के द्वारा निर्मित कई दर्रे पाये जाते हैं। जैसे थागला दर्रा, लिपुलेख, पिथौरागढ़ दर्रा सबसे प्रमुख है। महान हिमालय में यमुनोत्री, गंगोत्री, मिलाम, पिण्डारी जैसे प्रसिद्ध हिमानी पाले जाते हैं।

          कुमायूँ हिमालय में नंदादेवी (7817m) और कामेट (7756m) जैसे ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मिलने वाले वनस्पति को बुग्याल और पैय्यार कहते हैं। लघु हिमालय को इस क्षेत्र में धौलाधर, मसूरी पहाड़ी और कुमायूँ पहाड़ी के नाम से भी जानते हैं। लघु हिमालय पर नैनीताल, मसूरी, अल्मोड़ा जैसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थल पायी जाती है। लघु हिमालय के दक्षिण से शिवालिक हिमालय अवस्थित है जिसकी ऊँचाई बहुत कम है।

         लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय के बीच में मिलने वाले घाटी को दून के नाम से पुकारते हैं जिसमें ‘देहरादून की घाटी’ सबसे प्रसिद्ध है। यह अनुदैर्ध्य घाटी का अच्छा उदाहरण है। पीरपंजाल और धौलाधर पर्वत एक ही क्रम में स्थित है। इन दोनों के बीच में कुल्लू और मनाली की घाटी अवस्थित है जो अनुप्रस्थ घाटी का उदहारण है।

नोट: नन्दादेवी (7817m) कुमायूँ हिमालय की सर्वोच्च चोटी है। गंगा और यमुना नदी कुमायूँ हिमालय से ही निकलती है।

(3) नेपाल हिमालय:-

            इसका विस्तार नेपाल और सिक्कीम में काली नदी से तिस्ता नदी के बीच में हुआ है। यह हिमालय का सबसे लम्बा भाग है जिसकी लम्बाई 800km है। इसमें भी हिमालय की तीनों श्रृंखलाएँ स्पष्ट रूप से पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिण में तिब्बत का पठार स्थित है। महान हिमालय के दक्षिण में लघु हिमालय स्थित है। जिसे महाभारत श्रेणी के नाम से जानते हैं।

             महान हिमालय और महाभारत श्रेणी के बीच में काठमाण्डु की घाटी अवस्थित है। जो अनुद्धैर्य घाटी का एक उदा० प्रस्तुत करता है। इन क्षेत्र में महान हिमालय पर कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। जैसे- माउण्ट एवरेस्ट (8850m), कंचनजंघा (8598m) इत्यादि। ये क्रमश: हिमालय के प्रथम एवं द्वितीय सबसे ऊँची चोटियाँ हैं। इसके अलावे धौलागिरी, अन्नापूर्णा, मनसालू, गौरीशंकर और मकालू जैसे भी ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती है।

            मध्य हिमालय के दक्षिण में शिवालिक हिमालय स्थित है। अपरदन क्रिया के कारण इसकी ऊँचाई बहुत कम हो चुकी है। यह एक विखण्डित श्रृंखला है। नेपाल और बिहार के सीमा पर शिवालिक पर्वत को ही ‘सोमेश्वर की पहाड़ी’ (874- मी0) कहते हैं। 

(4) असम हिमालय:-

           इसका विस्तार असम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान में हुआ है। इसका सीमांकन तिस्ता नदी से नामचा बरबा गॉर्ज के बीच किया जाता है। इसकी इसकी लम्बाई 750 km है। यहाँ महान हिमालय लगभग 9 महीने तक बर्फ से शिवालिक ढका रहता है और मध्य हिमालय ही पायी जाती है। यहाँ शिवालिक हिमालय की श्रृंखला विलुप्त हो चुकी है। लघु हिमालय को मिश्मी और डाफला नाम से जानते हैं। लघु हिमालय यहाँ पर कई भागों में विभक्त हो चुकी है। लघु हिमालय के दक्षिण में धँसान क्रिया के फलस्वरूप ब्रह्मपुत्र रेम्प घाटी का विकास हुआ है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय की प्रत्येक स्थलाकृतिक प्रदेश अपने-2 विशिष्ट लक्षणों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में मानवीय हस्तक्षेप के कारण भू-दृश्य में तेजी से परिवर्तन हो हा है। अतः आवश्यकता है कि इस प्रदेश के भूदृश्य को विश्व धरोहर में शामिल कर इसे अक्षुण्ण बनाये रखा जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय को स्थलाकृतिक प्रदेशों में विभक्त कीजिए और प्रत्येक प्रदेश के विशिष्ट लक्षणों का वर्णन कीजिए।

11. गंगा का मैदान

11. गंगा का मैदान


गंगा का मैदान

          गंगा भारत की सबसे प्रमुख नदी है जो गंगोत्री हिमानी से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गंगा हरिद्वार के पास मैदानी क्षेत्र में प्रविष्ट करती है। और उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और बांगलादेश से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। गंगा नदी की कई सहायक नदियाँ हैं जो हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से आकर गंगा नदी में मिल जाती है। गंगा का मैदान मूलतः जलोढ़ मिट्टी के निक्षेपण से बना है। इस मैदान में जलोढ़ मिट्टी की गहराई 20oo m है।

          बुर्राड के अनुसार इस मैदान का निर्माण रिफ्ट घाटी में मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर यह मैदान कई भागों में बँटा है। जैसे:-

उत्तरी गंगा का मैदान

(1) रोहिल खण्ड का मैदान

(2) अवध का मैदान

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान

(4) मिथलांचल के मैदान के रूप में विभक्त है।

         जबकि दक्षिणी गंगा का मैदान

(1) बुंदेलखण्ड

(2) इलाहाबाद

(3) भोजपुर

(4) मगध और

(5) अंग के मैदान के रूप विभक्त है।

            भूगोलवेताओं ने गंगा के मैदान को प्रादेशिक स्तर पर तीन भागों में वर्गीकृत करके अध्ययन करने का प्रयास किया है।:-
(1) ऊपरी गंगा का मैदान

(2) मध्य गंगा का मैदान

(3) निम्न गंगा का मैदानगंगा का मैदान(1) ऊपरी गंगा का मैदान

          इसका विस्तार पश्चिम में अरावली पर्वत से लेकर पूरब में इलाहाबाद तक हुआ है। इस मैदान में उत्तर से दक्षिण की ओर गंगा और यमुना नदी प्रवाहित होती है जबकि दक्षिण से उत्तर की ओर और पुनः पश्चिम से पूरब की ओर चम्बल नदी प्रवाहित होती है। इस मैदान के उत्तर में भावर, बाँगर, तराई जैसी संरचनाएँ मिलती है। जबकि दक्षिणी भाग में उत्खात भूमि का निर्माण करता है। यह क्षेत्र पश्चिम उत्तर प्रदेश का भाग है। उपजाऊ मिट्टी का क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र अन्न भण्डार के रूप में प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र की सबसे प्रमुख आर्थिक गतिविधि कृषि कार्य हैं। गंगा और यमुना के दोआब क्षेत्र सदियों से कृषि के लिए प्रसिद्ध रही है।

(2) मध्य गंगा का मैदान

         इसका विस्तार इलाहाबाद से राजमहल की पहाड़ी तक हुई है। पूर्वी उतर प्रदेश और संपूर्ण बिहार मध्य गंगा के मैदान में स्थित है। इस मैदान की औसत ऊँचाई 50-100 m तक है। इस क्षेत्र में नदियाँ मोड़ लेकर प्रवाहित होती है जिसके कारण नदियों के किनारे पर गोखुर झील का निर्माण होती है। जगह-2 पर दियारा क्षेत्र का विकास हुआ है। मध्य गंगा के मैदान में पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र का विकास हुआ है। पुन: बाढ़ से मोकामा के बीच में टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। 

        कोशी, बागमती, गण्डक जैसी नदियाँ हमेशा मार्ग बदलने के लिए प्रसिद्ध है। इन नदियों के पुराने मार्गों को चौर कहा जाता है। उत्तर बिहार के लोग मछली पालन, तालमखाना की खेती करते हैं।

           मध्य गंगा का मैदान कृषि के लिए प्रसिद्ध है। नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। तराई वाले क्षेत्र में गन्ना की खेती की जाती है। गंगा नदी के उत्तरी किनारे पर केला, परबल, तरबूज, खीरा, ककड़ी इत्यादि की खेती की जाती है। पुन: चौर क्षेत्र में मछली और तालमखाना की खेती होती है। पुर्णिया, कटिहार, किशनगंज के क्षेत्र जूट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। मध्यवर्ती गंगा के मैदान का दक्षिणी भाग चावल, गेहूँ, दलहन, तेलहन, सब्जी इत्यादि के उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में बरौनी एक मात्र औद्योगिक नगर

(3) निम्नगंगा का मैदान

          इसका विस्तार राजमहल की पहाड़ी से गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा तक हुआ है। इस मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। यह मूलत: पश्चिम बंगाल और बांगलादेश में विस्तृत है। इस मैदान का ऊपरी भाग ‘बारिन्द क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता है। जबकि इसका दक्षिण भाग डेल्टा के लिए प्रसिद्ध है। इसी मैदान में विश्व का सबसे बड़ा गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा स्थित है। इसका निर्माण खादर मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इस क्षेत्र में नदियाँ कई वितरिकाओं (शाखाओं) में बँटकर प्रवाहित होती है। समुद्री ज्वार के कारण डेल्टाई क्षेत्रों में दलदली भूमि का भी विकास हुआ है।

        निम्नगंगा के मैदान आर्थिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। जैसे डेल्टाई क्षेत्र मैंग्रोव/ सुन्दरवन / ज्वारीय वनस्पति के लिए प्रसिद्ध है। इसमें सुंदरी, बेंत इत्यादि वृक्ष बड़े पैमाने पर मिलते हैं। हुगली नदी घाटी के किनारे वाला भाग जूट उत्पादनों के लिए प्रसिद्ध है जबकि शेष भाग चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। पुन: इस मैदान का ऊपरी क्षेत्र (दार्जलिंग वाला क्षेत्र) उत्तम किस्म के चाय बाँस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

निष्कर्ष:

          इस तह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के उत्तर में अवस्थित गंगा का मैदान अपने विशिष्ट भौतिक एवं आर्थिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है।

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास



हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास 

        कई पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन के कारण प्राचीन टेथिस सागर में नदियों के द्वारा लाकर मलवा जमा किये जाने तथा उनमें पड़े वलन की क्रिया से हिमालय जैसे पर्वत का निर्माण हुआ है। भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय पर्वत का निर्माण केनोजोइक महाकल्प के तृतीयक काल में हुए अल्पाइन भूसंचलन से हुआ है। पुन: भूवैज्ञानिकों के अनुसार ओलीगोसीन में महान हिमालय, मायोसीन में मध्य हिमालय तया प्लायोसीन एवं प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक हिमालय का निर्माण हुआ।

       हिमालय पर्वतीय क्षेत्र के उत्पान और विकास का स्पष्ट प्रभाव नदी के प्रतिरूप पर पड़ा है। जैसे:-   

    कई प्रसिद्ध भूवैज्ञानिकों का मत है कि तृतीयक काल में लघु हिमालय के दक्षिण में उसके समानान्तर एक विशालकाय नदी थी जो पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती थी। यह नदी उत्तर-पश्चिम भारत में जाकर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुड़ जाती थी। पैस्को और पिल्ग्रीम जैसे भूगोलवेताओं ने इस प्राचीन नदी का नाम शिवालिक नदी या ‘इण्डो ब्रह्मा नदी’ दिया है।

       जब इस नदी में हिमालय के नदियों द्वारा मलवा का लगातार निक्षेपण होता रहा तो इसकी तली में दबाव की क्रिया के कारण इस मलवा में पुन: उत्थान की क्रिया सम्पन्न हुई। इस उत्थान से शिवालिक नदी का जल ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने से कई अनुवर्ती नदियों का जन्म हुआ। ये नदियाँ काफी छोटी-2 हैं और मे उत्तर भारत की मुख्य नदियों की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

       सिन्धु, सतलज, कोसी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ पूर्ववर्ती नदी के उदाहरण है। पूर्ववर्ती नदी तात्पर्य वैसे नदी से है जिसका निर्माण किसी भी प्रदेश के उत्थान के पूर्व से ही नदी की प्रवाह जारी है। उपरोक्त पूर्ववर्ती नदी के बारे में भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय के उत्थान का दर नदी के अपरदन के दर से कम था जिसके कारण उपरोक्त पूर्ववर्ती नदियों ने हिमालय पर्वत को जगह-2 पर अपरदित करके गहरे गॉर्ज और दर्रों का निर्माण की हैं।

         जैसे- सिन्धु नदी नंगा पर्वत के पास काटकर विश्व का सबसे गहरा गॉर्ज सिन्धु गॉर्ज 5200 मी० गहरा का निर्माण करती है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी नामचा बरबा के पास गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है। सतलज नदी महान हिमालय को काटकर शिपकीला दर्रा का निर्माण करती है।

        शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र के दक्षिण में ‘बोल्डर क्ले’ के जमाव से भावर प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण की प्रक्रिया भी हिमालय के विकास से जुड़ा हुआ है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जब भावर प्रदेश से गुजरती हैं तो मे विलुप्त हो जाती है जिससे ‘खण्डित अपवाह तंत्र’ का निर्माण करती है। पुनः ये नदियाँ मैदानी क्षेत्र में दृष्टिगत होने लगती है और ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने की प्रवृति रखती हैं जिसके कारण “समानान्तर प्रतिरूप” का विकास करती हैं। पुनः हिमालय से निकलने वाली नदियाँ समुद्र में मिलने से पहले कई वितरिकाओं में विभक्त हो जाती है जिससे गुंफिट या जालीदार प्रतिरूप का विकास होता है।

         हिमालय पर्वत का अक्ष एक चाप के समान है जो पूरब से पश्चिम दिशा की ओर स्थित है। हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढाल तीव्र और उत्तरी ढाल मंद है। वलन की क्रिया से हिमालय पर्वत में कई अनुप्रस्थ एवं अनुद्धैर्य घाटियों का विकास हुआ है। अनुद्धैर्य घाटियों से होते हुए नदियाँ प्रवाहित होती थीं लेकिन जब हिमालय का विकास या उत्थान होने लगा तो अनुद्धैर्य घाटियों में प्रवाहित होने वाली जल प्रवाह बाधित हो गई, जिसके कारण इन अनुद्धैर्य घाटियों में कई बड़े-2 झीलों का निर्माण हुआ।

          इन झीलों में जब जल की मात्रा अधिक हो गई तो पहाड़ों के ऊपर से प्रवाहित होने लगी। जिसके फलस्वरूप बहते हुए जल से कई स्थानों पर हिमालय पर्वत को काटकर अनुप्रस्थ घाटियों का निर्माण कर ली। इन संपूर्ण परिघटना से हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों में समान आयताकार अपवाह तंत्र का विकास हुआ है। जैसे- कोसी नदी अपने उद्‌गम क्षेत्र में आयताकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

        हिमालय के उत्थान के पूर्व कई ऐसी नदियाँ थी जो भिन्न-2 दिशाओं से आकर टेथिस सागर में आकर गिरती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के बाद बड़ी-बड़ी नदियों ने छोटी-2 नदियों के जल को अपहरण कर लिया जिससे क्रमहीन अपवाह तंत्र का विकास हुआ। जैसे- ब्रह्मपुत्र नदी ने लोहित एवं दिवांग नदी के जल को अपहृत कर ‘क्रमहीन अपवाह तंत्र’ का विकास किया है।

       भूगर्भशास्त्रियों का अनुमान है कि प्राचीन काल में सतलज और यमुनी नदी राजस्थान से होकर बहती थी। पुन: सरस्वती नामक पौराणिक नदी प्रयागराज के पास आकर गंगा से मिलती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के दौरान उ०-प० भारत में हुए उत्थान से सतलज नदी का अपवाह क्षेत्र खिसक कर उ०-प० की तरफ चला गया और सरस्वती एवं यमुना नदी आपस में मिलकर एक नदी के रूप में प्रवाहित होकर मिलने लगी। इस तरह हिमालय के उत्थान एवं विकास से उ०-प० भारत के नदी तंत्र में कई परिवर्तन हुए।

निष्कर्ष

     उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय से निकलने वाली नदियों के ऊप हिमालय के उत्थान एवं विकास का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। यही काण है कि हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में नदी के अनेक प्रतिरूप दिखाई देते है।

हिमालय के विकास के संदर्भ

चित्र: हिमालय की उत्पत्ति एवं विकास

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास की विवेचना करें।

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