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30. Interpretation of Topographical Maps (स्थलाकृतिक मानचित्र का प्रदर्शन)

Interpretation of Topographical Maps

(स्थलाकृतिक मानचित्र का प्रदर्शन)



स्थलाकृतिक मानचित्र का अर्थ:-

         स्थलाकृतिक मानचित्र पृथ्वी की सतह पर दिखाई देने वाली विशेषताओं के विस्तृत चित्रमय एवं सटीक प्रतिनिधित्व को संदर्भित करता है। ये समतल तथा भूगणितीय सर्वेक्षणों पर आधारित ऐसे बहु-उद्देशीय मानचित्र होते हैं जिन्हें वृहत् मापक या मापनी (Large Scale) पर बनाया जाता है। इन्हें सामान्य उपयोग वाले मानचित्र भी कहा जाता है।

    इन मानचित्रों पर प्राकृतिक व सांस्कृतिक विवरण या लक्षणों जैसे- उच्चावच, धरातल, जल-प्रवाह, जलाशय, वनस्पति, गाँव, नगर, सड़कें, नहरें, रेल लाइनें पूजा स्थल आदि को देखा जा सकता है। मानचित्रों पर इन सभी विवरणों को रूढ़ चिह्नों एवं प्रतीकों द्वारा प्रदर्शित किया जाता हैं।

   अर्थात् स्थलाकृतिक मानचित्र ऐसे मानचित्र है जो भौगोलिक विशेषताओं के स्थानों का प्रतिनिधित्व करते है। ये भौगोलिक विशेषताएँ पहाड़, घाटियाँ, मैदानी सतह, जल निकाय और बहुत कुछ हो सकती हैं। अतः स्थलाकृतिक मानचित्र बड़े और मध्यम पैमाने के मानचित्रों को संदर्भित करते हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की जानकारी शामिल होती है।

       स्थलाकृतिक मानचित्र के सभी घटक समान महत्व रखते हैं। किसी विशेष सतह के व्यापक विश्लेषण के कारण ये मानचित्र भू-विज्ञान के क्षेत्र का एक अनिवार्य हिस्सा या भाग हैं। ये मानचित्र सभी देशों की राष्ट्रीय मानचित्र संगठनों द्वारा तैयार एवं प्रकाशित किए जाते हैं।

        उदाहरण के लिए भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भारत में, पूरे देश के लिए स्थलाकृतिक मानचित्र तैयार करता है। भारत में स्थलाकृतिक मानचित्र दो श्रृंखलाओं में तैयार किए जाते हैं- भारत एवं पडोसी देशों की श्रृंखला एवं विश्व के अंतर्राष्ट्रीय मानचित्रों की श्रृंखला।

स्थलाकृतिक मानचित्र को परिभाषित करते हुए फिलिस डिन्क महोदय ने लिखा है- “स्थलाकृतिक मानचित्र दीर्घमापक मानचित्र हैं किन्तु इनका आकार भू-मानचित्रों से छोटा होता है। चूंकि इनका आकार बड़ा होता है अतः ये प्राकृतिक एवं मानव द्वारा निर्मित विभिन्न लक्षणों, जैसे- पर्वतों, नदियों, जंगलों, नगरों, गाँवों, सड़कों, रेलों व नहरों आदि को प्रदर्शित करते हैं। ये मानचित्र यात्री व मोटर चालकों, युद्ध भूमि में सैनिकों तथा किसी क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्ययन में भूगोलवेत्ताओं के लिए गाइड का कार्य करते हैं।

जोन बाइगोट के अनुसार, “स्थलाकृतिक मानचित्र सूक्ष्म सर्वेक्षण पर आधारित वृहद् मापक मानचित्र होते है जिनमें प्राकृतिक एवं मानव निर्मित विभिन्न लक्षणों को विस्तार से प्रदर्शित किया जाता है।”

इरविन रेज के अनुसार, “वृहद् एवं मध्यवर्ती मापनी पर बने सामान्य मानचित्र जिनमें उच्चावच सहित सभी महत्त्वपूर्ण लक्षणों को प्रदर्शित किया जाता है, स्थलाकृतिक मानचित्र कहलाते हैं।”

 भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रकाशित मानचित्र एवं धरातल पत्रक

         भारतीय सर्वेक्षण विभाग (देहरादून) द्वारा प्रकाशित मानचित्र एवं धरातल पत्रक के निम्न प्रकार हैं-

(1) भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला (India and adjacent Countries)

       इस श्रृंखला के मानचित्रों का मापक भी 1:1,000,000 है। इस मापक पर ही भारत और उसके समीपवर्ती देशों के मानचित्र बनाए जाते है। इसमें प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तर है। अतः 4° उत्तरी अक्षांश से 40° उत्तरी अक्षांश तक तथा 44° पूर्वी देशान्तर से 104° पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित क्षेत्र को शामिल किया गया है।

       इसमें सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप जैसे- अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश एवं म्यामार और मध्य पूर्व के देश थाईलैण्ड, वियतनाम, कम्बोडिया, तिब्बत, कैस्पियन सागर का दक्षिणी भाग, तुर्कमिनिस्तान, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, किर्गिजस्तान देश शामिल हैं। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को 4×4 के कुल 106 भागों में विभाजित किया गया है। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र को संख्या में 1 से 106 तक क्रमशः दिया गया है।

       भारतीय क्षेत्र 40 से 92 के बीच क्रम संख्या में पाए जाते हैं। ये संख्याएँ सूचक संख्याएँ (Index Number) कहलाती है। उदाहरण के लिए, 47 व 43 सूचकांक मुम्बई व श्री नगर के पत्रकों के नाम से जाना जाता है। यह श्रृंखला वर्तमान में प्रकाशित नही होती है, परन्तु यह भारत में छपने वाली अन्य सभी श्रृंखलाओं का आधार है। इस श्रृंखला का प्रत्येक मानचित्र 4 डिग्री शीट या एक मिलियन शीट कहलाता है।

Interpretation of Topo

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला (International Series):-

      भारतीय सर्वेक्षण विभाग, अन्तर्राष्ट्रीय समिति 1909 के समझौते के अनुसार अब अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला का प्रकाशन करता है। इस श्रृंखला के मानचित्र 1:1,000,000 मापक पर बनाए जाते हैं। 60° उत्तरी व 60° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्रों के प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 6° देशान्तर है। इस क्षेत्र हेतु 1800 शीटे तैयार की गयी है।

         60° अक्षांश-88° अक्षांश के मध्य स्थित क्षेत्र की 4° अक्षांश तथा 12° देशान्तर विस्तार की 420 सीटे हैं। इसके अतिरिक्त दो अर्धव्यास वाले 2 मानचित्र ध्रुवीय क्षेत्रों के हैं। सम्पूर्ण विश्व के लिए 2222 शीट इस श्रृंखला में हैं। इस श्रृंखला की प्रत्येक शीट एक मिलियन शीट कहलाती है।

स्थलाकृतिक शीट के प्रकार

       भारतीय सर्वेक्षण विभाग के स्थलाकृतिक अंशचित्रों का अंकन ‘भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला’ (India and Adjacent Countries Series) पर आधारित है।

स्थलाकृतिक 

         मानचित्र के पैमाने के आधार पर स्थलाकृतिक शीटों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है।

1. 4×4 डिग्री या मिलियन शीट 

          इस श्रृंखला के सभी मानचित्र 1:1,000,000 मापनी (1 इंच=16 मील) पर तैयार किए गए हैं। इनमें से प्रत्येक मानचित्र 4° अक्षांश व 4° देशांतर (4° x 4°) के बीच स्थित क्षेत्र को प्रदर्शित करता है।

        पहचान के लिए प्रत्येक 1 मिलियन मानचित्र पर उसकी सूचक संख्या (Index Number) जैसे- 51, 52, 53, 54 आदि लिखी होती है। प्रत्येक मिलियन मानचित्र को 16 चौथाई इंच (1″ = 4 मील) अंशचित्रों में, प्रत्येक चौथाई इंच अंशचित्रों को 4 आधा इंच (1″ = 2 मील) अंशचित्रों में तथा प्रत्येक आधा इंच अंशचित्रों को 4 एक इंच (1″ = 1 मील) अंशचित्रों में विभाजित किया गया है।

चित्र: मिलियन शीट या चार डिग्री शीट

नोट: कभी-कभी किसी शीट का नामकरण उस शीट में अंकित प्रमुख नगर के नाम पर किया जाता है। जैसे 43, 47, 53, 57, 72 सूचकांक वाली शीटों को क्रमशः श्रीनगर शीट, बम्बई शीट, दिल्ली शीट, मद्रास शीट एवं पटना के नाम से भी जाना जाता है।

⇒ समोच्च अंतराल 500 मीटर है।

चूंकि, इन मानचित्रों में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है, इसलिए टोपो शीट के रूप में इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया है।

2. एक डिग्री शीट (Degree Sheet):

        किसी 1 इंच = 16 मील मापनी वाले मानचित्र को 1 इंच = 4 मील मापनी वाले 16 अंशचित्रों में विभाजित करने पर, प्रत्येक अंश चित्र 1° अक्षांश x 1° देशांतर क्षेत्र को प्रदर्शित करता है। अतः इन अंशचित्रों को चौथाई इंच शीट कहा जाता है। डिग्री शीटों को सूचित करने के लिए A से P तक के 16 अक्षरों का प्रयोग किया जाता है। इसका R.F. 1:250000 होता है।

एक डिग्री शीट

चित्र: एक डिग्री शीट

     किसी डिग्री शीट का नामकरण करने के लिए उस शीट के अंग्रेजी अक्षर को संबंधित 1 मिलियन मानचित्र की सूचक संख्या के बाद लिख दिया जाता है। जैसे- 53A, 53B, 53C 53P.

⇒ समोच्च अंतराल 250 मीटर है।

3. आधा डिग्री शीट (Half Degree Sheet):-

      इसके अंतर्गत किसी डिग्री शीट को चार आधा डिग्री शीटों में विभाजित किया जाता है। इस शीट की मापनी 1 इंच = 2 मील होती है। अतः इसे आधा इंच शीट भी कहा जाता है। इसका R.F. 1:100000 होता है। इसका विस्तार 30° अक्षांश x 30° देशांतर होता है।

      प्रत्येक आधा इंच शीट की सूचक संख्या में उसकी दिशा के साथ-साथ संबंधित 1 मिलियन की सूचक संख्या व डिग्री शीट का अंग्रेजी अक्षर लिखा जाता है। जैसे : 53 A/NE, 53 A/SE, 53 A/SW, 53 A/NW। अत: यदि किसी शीट की सूचक संख्या 53 A/NE है, तो इसका अर्थ है कि वह शीट 53 सूचक संख्या वाले 1 मिलियन के A अक्षर वाले डिग्री शीट का NE भाग सूचित करता है।

इसका समोच्च अंतराल 100 मीटर है।

चित्र: आधा डिग्री शीट

4. चौथाई डिग्री शीट (Quarter Degree Sheet):-

    इसके अंतर्गत किसी डिग्री शीट को 16 चौथाई डिग्री शीटों में विभाजित किया जाता है। इस शीट की मापनी 1 इंच = 1 मील होती है। अतः इसे एक इंच शीट भी कहा जाता है। इसका विस्तार चौथाई डिग्री (15′ अक्षांश x 15′ देशांतर) होता है। इसका R.F. 1 : 50,000 होता है।

       इस प्रकार किसी 1 मिलियन मानचित्र में 256 डिग्री शीट में 16 तथा आधा डिग्री शीट में 4 एक इंच शीटें होती हैं। किसी एक इंच शीट की सूचक संख्या को उस शीट की संबंधित डिग्री शीट में क्रमांक संख्या के अनुसार निश्चित किया जाता है। जैसे – 53 A/1, 53 A/2, ……..453A/16।

⇒ इसका समोच्च अंतराल 50 मीटर है।

चित्र: चौथाई डिग्री शीट

            इस प्रकार  तीनों एक साथ देखा जा सकता है-

5. नई श्रृंखला टोपो शीट्स:-

            टोपो शीट की यह श्रृंखला चौथाई डिग्री टोपो शीट के भीतर 1/8° अक्षांश (7.5 मिनट) और 1/8° देशांतर (7.5 मिनट) तक फैले क्षेत्र को कवर करती है। जब चौथाई डिग्री शीट को 4 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है, तो हमें बहुत सारी जानकारी के साथ बहुत बड़े पैमाने की टोपो शीट मिलती हैं। इन्हें 53A 1/NE, 53A 1/NW, 53A 1/SE, और 53A 1/SW क्रमांकित किया गया है। इसका स्केल 1:25000 है।

⇒ उद्देश्य और क्षेत्र के आधार पर इसका समोच्च अंतराल 5-20 मीटर के बीच होता है। उदाहरण के लिए, पहाड़ी क्षेत्र की ऊँचाई अधिक है औ समोच्च अंतराल थोड़ा बड़ा होना चाहिए। जबकि मैदानी क्षेत्रों में समोच्च अंतराल छोटा होना चाहिए।


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5. The Concept of Sustainable Development (शाश्वत विकास की अवधारणा) 

5. The Concept of Sustainable Development

(शाश्वत विकास की अवधारणा)



        Sustainable Development

          विश्व में प्रादेशिक विकास की अवधारणा को समय-समय पर राजनीतिक विचारकों ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। वर्तमान समय में प्रादेशिक विकास का जो स्वरूप उभड़ा है, वह विश्वव्यापी राजनीति से ओतप्रोत है। औपनिवेशिक राष्ट्रों का शोषण, अविकसित देशों के संसाधनों का दोहन, विनिर्माण प्रक्रिया एवं सम्पत्ति का शक्तिशाली राष्ट्रों में समूह प्रादेशिक विकास की आड़ में तथा विकास मॉडलों के अविवेकपूर्ण अध्यारोपण से प्रादेशिक विकास के परिणाम प्रभावित हुए हैं। पाकिस्तान आज भी आर्थिक विकास हेतु पराश्रित है । बंगलादेश भी स्वतंत्र होकर उसी दुश्चक्र का अंग बन गया है।

        नेपाल भारत की विरासत एक होते हुए भी नेपाल को अपने प्रच्छन्न व्यक्तित्व के प्रति आगाह करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप के प्रादेशिक विकास को बाधित करने से 20वीं शताब्दी के अंत में सर्वत्र प्रादेशिक विकास एक खोखला नारा बनकर रह गया है। यही हाल ब्राजील, अर्जेण्टाइना, कैरेबियन राष्ट्र तथा अफ्रीकी देशों का है।

         विकास का अंतिम उत्पाद विनाश के रूप में प्रकट हो रहा है। इससे संसाधन विदोहन है। जन संसाधन का दुरुपयोग हुआ है। पर्यावरण की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है तथा हुआ विकास के प्रति अरुचि उत्पन्न हुई हैं। इस परिप्रेक्ष्य में शाश्वत विकास या अक्षुण्ण विकास की प्रक्रिया का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है।

       शाश्वत विकास की संकल्पना भौगोलिक संकल्पना है, जिसमें मानवीय और पारिस्थितिकीय तत्त्वों के अन्तर्क्रियात्मक सम्बन्धों को इस प्रकार व्यवस्थित एवं नियोजित करने पर बल दिया जाता है, जिससे आर्थिक विकास प्रतिरूप वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आगामी पीढ़ियों की आवयकताओं को पूर्ण कर सके।

       पहले यह स्पष्ट किया जा चुका है कि विकास या भौगोलिक सन्दर्भ में प्रादेशिक विकास मानव और उसकी विभिन्न विशेषताओं तथा प्राकृतिक पर्यावरण के तथ्यों के पारस्परिक कार्यात्मक सम्बन्धों का परिणाम है। विकास की प्रक्रिया में कुछ क्षेत्रों में मानवीय क्षमता के अत्यधिक निवेश से पर्यावरण के तथ्यों का अधिकाधिक शोषण हुआ। मनुष्य ने वहाँ कम समय में चरण विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। वहाँ पुनः विकास के लिए संसाधनों की कमी सामने आने लगी है। दूसरी ओर विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों के अत्यधिक ह्रास से पारिस्थितिकीय संतुलन भी बिगड़ने लगा, जिससे मनुष्य के लिये खतरा उत्पन्न हो गया। इसी तरह दूसरे बहुत से क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के अवैज्ञानिक शोषण से भी पारिस्थितिकीय सन्तुलन प्रभावित होने लगा।

        इस विषम परिस्थिति से निजात पाने के लिये ही वर्तमान समय में शाश्वत विकास की संकल्पना का जन्म हुआ है। यह एक विश्वव्यापी नारे के रूप में प्रचलित होती जा रही है जिसमें पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखना और जैवीय विविधता की सुरक्षा पर विशेष बल दिया जा रहा है। सातवें दशक के अंत में और 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस संकल्पना को व्यापक आधार मिला है।

        पारिस्थितिकीय शाश्वत विकास (Ecologically Sustainable Development) का सामान्य हिन्दी अनुवाद पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से उपयुक्त दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहने वाला विकास है। अर्थात् इसमें विकास निर्वाह योग्य माना गया है, जो वर्तमान पीढ़ियों की आववश्यकता को पूर्ण करते हुए भविष्य के लिये भी बना रहे। इसके अन्तर्गत सम्मिलित पारिस्थितिकी है, जो जैव समुदाय और उनके पर्यावरण के पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन है। यह ग्रीक शब्द ‘Oikos’ से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘Living Place’ होता है।

        अर्थात् विभिन्न जैव समुदाय और पर्यावरण के बीच कैसा सन्तुलन विकसित हो, जिससे दोनों का अस्तित्व अनवरत रूप से बना रहे। यह संकल्पना भूगोल विज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में परम्परागत रूप से रही है, क्योंकि पहले से ही भूगोल मानव और प्रकृति के परिवर्तनशील अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता रहा है। इसलिये विकास हेतु विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों का मानव द्वारा इस प्रकार उपयोग किया जाय कि पारिस्थितिकीय सन्तुलन भी बना रहे और मानव अपना विकास भी करता रहे।

       दूसरा शब्द ‘शाश्वतता’ (Sustainability) है, जिसका अर्थ अनवरत रूप से दीर्घकाल तक बना रहना है अर्थात् ऐसा आर्थिक विकास जो दीर्घकाल तक जारी रहे इसे अक्षय विकास भी कह सकते हैं या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यह सामाजिक-आर्थिक प्रत्यावर्तन की ऐसी प्रक्रिया है, जिसके परिणाम समान रूप से वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिये उपलब्ध होते रहें, अर्थात् यह उत्पादन के कारकों और उपभोग के तत्त्वों के बीच संतुलन के स्तर की ओर इंगित करती है।

          सन्तुलन का स्तर इस प्रकार का होना चाहिये कि जिसमें विकास प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सभी चर एक साथ बिना एक-दूसरे से आगे निकले हुए एक-दूसरे के पूरक के रूप में योगदान देते रहें, जब तक क्रमिक रूप में ये चर एक-दूसरे के साथ विकासात्मक रूप से योगदान देते रहेंगे तब तक किसी भी चर का कोई ऋणात्मक प्रभाव नहीं दिखाई देगा।

       इसके विपरीत विभिन्न चरों की पारस्परिक विकासात्मक प्रवृत्ति में यदि कोई एक चर आगे निकल जायेगा अथवा अत्यधिक ह्रास होगा तो सम्पूर्ण सन्तुलन सम बिगड़ जायेगा, जिसका परिणाम भौतिक पर्यावरण पर दृष्टिगोचर होगा। इससे विकास प्रतिरूप भी दीर्घकाल तक नहीं बना रह पायेगा। अर्थात् ‘शाश्वतता’ के अन्तर्गत दो संकल्पनाएँ अन्तर्निहित हैं-

1. मूलभूत आवश्यकता की संकल्पना:-

           इसके अन्तर्गत माना जाता है कि मनुष्य की न्यूनतम मौलिक आवश्यकता को पूर्ण करना ही विकास हैं। वर्तमान समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए भावी पीढ़ियों के लिये भी संसाधनों को सुरक्षित छोड़ देना ही शाश्वत विकास है।

         यहाँ यह उल्लेखनीय है कि विभिन्न क्षेत्रों के मानव समाज में कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ समान रूप से हैं, यथा- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सुविधा आदि लेकिन कई समाजों के उपभोग की परिवर्तनशील प्रवृत्ति और उसको पूरा करने के लिये संसाधनों का अंधाधुंध शोषण जारी रहने पर संसाधनों में ह्रास होगा और उनके दीर्घकालीन तक चलते रहने की संभावना भी समाप्त होगी। इसलिये उपभोग के तत्त्वों के प्रयोग पर नियंत्रण अथवा उनका परिमार्जन इस प्रकार किया जाना चाहिये ताकि विकास को प्रभावित करने वाला चर समाप्त न हो या उसका कोई दुष्प्रभाव न पड़े।

          पश्चिमी देशों की उपभोक्ता संस्कृति इसका उदाहरण है। जहाँ उपभोग हेतु कई जैव प्रजातियों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया है। इससे विश्व में जैव सन्तुलन को खतरा उत्पन्न हो गया है। या यों कह सकते हैं कि विकसित औद्योगिक देशों द्वारा ही उत्सर्जित अपशिष्टों से ओजोन परत को हानि हो रही है। इसलिये शाश्वत के अन्तर्गत मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते हुए उपभोग स्तर को भी नियोजित करना सम्मिलित है। 

2. प्राविधिक स्तर:-

       इसके अन्तर्गत विभिन्न उत्पादनों हेतु प्रयुक्त तकनीकी स्तर हैं। बहुत से देशों में तकनीकी स्तर अत्यन्त उच्च स्तरीय हैं, जिससे वे कम लागत पर विभिन्न साधनों का शोषण करके अपने उपभोग स्तर में वृद्धि करते हैं और इतना ही नहीं वे इसका विपणन भी करते हैं, जबकि अन्य देश अपनी देशी व परम्परागत तकनीक के प्रयोग से धीरे-धीरे यही कार्य करते हैं। भौगोलिक रूप में उत्पादन कार्यों के लिये इस प्रकार की तकनीकों का प्रयोग होना चाहिए, जिससे विकास के अन्य चरों को हानि न पहुँचे।

        तीसरे शब्द का अर्थ है, जैसा पहले विश्लेषित किया जा चुका है कि विकास एक समन्वित प्रक्रिया है, जिससे मानव जीवन के अस्तित्व का एक निश्चित स्तर प्राप्त किया जा सकता है अर्थात् इसमें मानव और प्रकृति के मध्य उत्पादक, व्यवधान रहित और शोषण मुक्त चरों का समन्वित प्रतिरूप सम्मिलित है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि शाश्वत विकास के अन्तर्गत पारिस्थितिकीय तंत्र के विभिन्न चरों का संरक्षण, अभिरक्षण, सुरक्षा एवं अक्षुण्ण रूप से निर्वहन सम्मिलित है।

         इस तरह अक्षुण्ण अर्थात् शाश्वत विकास अर्थव्यव्सथा के विभिन्न प्रतिरूपों (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक) में समन्वय पर बल देते हुए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र से बाँधे रखने पर बल देता है। इस तंत्र को संरक्षित एवं पोषित करने की आवश्यकता है, ताकि विकास प्रक्रिया शाश्वत रूप से जारी रहे। भूगोल में शाश्वत विकास की संकल्पना वर्तमान समय में दो कारणों से आयी है-

1. मानव और पर्यारण तंत्र के असंगत सम्बन्ध ने पारिस्थितिकीय सन्तुलन को झकझोर दिया है। वर्तमान मानव समाज के सम्मुख भोजन, जल, शुद्ध वायु और समुचित जगह आदि अनेक समस्याएँ स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र शोषण से अस्तित्व में आयी हैं। वनों और मिट्टियों का उत्पादक कार्यों में इतनी तीव्र गति से प्रयोग से हो रहा है, जिससे वे तेजी से घटते जा रहे हैं। परिणाम यह है कि मनुष्य के लिये वे अनुपयोगी होते जा रहे हैं। क्योंकि प्रकृति द्वारा वे शीघ्रता से निर्मित नहीं किये जा सकते हैं। पशुचारण और अत्यधिक शस्योत्पादन से अर्थव्यवस्था का स्रोत नष्ट होता जा रहा है। ऊर्जा साधनों का औद्योगीकरण के कारण तेजी से ह्रास हो रहा है।

        आर्थिक विकास के लिये आवश्यक ये तत्त्व प्रकृति द्वारा लाखों करोड़ों वर्षों में निर्मित किये गये हैं। इनको शीघ्रता से पुनर्नवीकृत नहीं किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा से निःसृत रेडियोधर्मिता से जल व वायु प्रदूषित होकर मानव के लिये हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। अनियंत्रित कृषि और तीव्र औद्योगीकरण से धरातल, जल और वायु भी प्रदूषित हो रहे हैं। महासागर जो भावी जनसंख्या के लिये भोजन के स्रोत हैं। एक तरह से कूड़े कचरे के गड्ढे में परिवर्तित हो रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के उपयोग की कोई सीमा नहीं है।

         यह अनुमान किया जा सकता है कि सन् 2050 तक विश्व की 75 प्रतिशत आबादी नगरों में निश्वस करने लगेगी। इससे वर्तमान न समस्याएँ घनीभूत होंगी तथा मलिन बस्तियों का फैलाव होगा। ये सभी तथ्य मानव पर्यावरण के असंगत सम्बन्ध के परिणाम हैं। वर्तमान विकास की संकल्पना इसलिए प्राकृतिक और मानवीय चरों के पारस्परिक विकासात्मक अन्तर्सम्बन्ध को नियोजित करने को प्रेरित करती है।

2. दूसरे कारण में विकास का मात्र उद्देश्य धन का एकत्रीकरण है क्योंकि धन या पूँजी ही मानव के तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है लेकिन वास्तव में विकास के स्थायित्व के लिये अत्यधिक धन या पूँजी प्राप्त करना ही ध्येय नहीं होना चाहिये, क्योंकि जॉन पुश्किन के अनुसार छलपूँजी (illth) जो धनसंचय का परिणाम है- एक ऋणात्मक धन है। यह एक ऐसी पूँजी है जो मानव के लिये पृथ्वी की उपयोगिता समाप्त कर देती है इसलिये प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि अथवा येनकेन राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही विकास का लक्ष्य नहीं होना चाहिये।

         इसलिए अधिक धन संचय, अधिक उत्पादन और अधिक उप का दुष्चक्र भौतिक विकास का आधार है। इस विकास की कोई अन्तिम सीमा नहीं इसकी न्यूनतम सीमा तो मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने तक मानी जा सकती लेकिन ऊपरी सीमा अदृश्य है। इसी अदृश्य सीमा को प्राप्त करने के लिये पश्चिमी समाज संसाधनों का अंधाधुंध शोषण कके पर्यावरण सन्तुलन को विकृत कर हा है। इसके प्रतिकार के लिए ही शाश्वत विकास की संकल्पना का अस्तित्व संभव हुआ है।

प्रश्न प्रारूप 

1. शाश्वत विकास की अवधारणा पर प्रकाश डालें।

5.The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation (जल संसाधन के महत्त्व, वितरण, उपयोगिता एवं संरक्षण)

5. The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation

(जल संसाधन के महत्त्व, स्रोत, उपयोगिता एवं संरक्षण)



Importance of Water

जल संसाधन के महत्त्व

          प्राकृतिक संसाधनों में जल एक ऐसा आधारभूत संसाधन है, जिसके बिना पृथ्वी तल पर जीवन की कल्पना ही असंभव है। मनुष्य, पेड़-पौधे और जीव-जन्तु सभी के लिए जल जीवन का आधार है। पृथ्वी तल पर जल की उपस्थिति के बाद ही जीवन की कल्पना की गई है। जल की उपलब्धता और उसके उपयोग की सुविधा मानव के सांस्कृतिक विकास में सहायक तत्व रहे हैं।

       जल की अधिकता या न्यूनता की तुलना में उसकी सामान्यता और सहज उपलब्धता अधिक आकर्षक रहे हैं। यही कारण है कि नदियों की घाटियों में जहाँ सहजता के साथ जल उपलब्ध था और प्राकृतिक सुविधाएँ प्राप्त थीं, आदि मानव बसने हेतु आकर्षित हुआ, जिससे कुछ घाटियाँ सांस्कृतिक क्रोड़ बन गई। यहाँ सिंचाई, पेय, आखेट और परिवहन के लिए जल संसाधन का प्रथम उपयोग हुआ।

      स्पष्ट है कि जल संसाधन के कारण कृषि, व्यापार और बड़े अधिवासों का विकास सबसे पहले नदी घाटियों में प्रारंभ हुआ। जल संसाधन की सुलभता के कारण समुद्र तटीय क्षेत्र भी आकर्षक रहे। नौका परिवहन का विकास वृहद् व्यापारिक शृंखला का कारण बना। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक जल परिवहन सबसे सस्ता साधन है। समुद्री मार्गों की सुलभता अनेक यूरोपीय देशों की महानता का कारण बताया जाता है।

     नीदरलैण्ड, पुर्तगाल, ब्रिटेन जैसे छोटे देशों के नाविक जल यातायात के माध्यम से विश्व के बड़े और शक्तिशाली देशों पर कब्जा जमाने में सफल हो गये, जबकि स्थल मार्ग से चलने के कारण सिकन्दर अपनी विशाल सेना के बावजूद ऐसी विजय पाने में असफल रहा। आज जल यातायात की सुविधा वाले देश विश्व व्यापार में अग्रणी बन गये हैं, क्योंकि जिस मात्रा में आज का जलयान माल की ढुलाई करता है वैसा किसी अन्य साधन से संभव नहीं है।

            जल संसाधन का उपयोग मत्स्य उत्पादन के दृष्टिकोण से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जल स्रोतों का उपयोग सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन के लिए करके मानव समुदाय ने क्रान्तिकारी कृषि और औद्योगिक विकास किया है। इन सभी लाभों की गिनती में जलीय वनस्पतियों द्वारा अपार ऑक्सीजन गैस का उत्पादन शायद सबसे महत्वपूर्ण है। पारिस्थितिकी के निर्माण में जल की भूमिका का अनुमान मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि मध्य एशिया में जलाभाव के कारण अदिमानव को बाध्य होकर प्रव्रजित होना पड़ा जो मानव प्रजातियों के उद्भव का कारण बना। आज भी जलाभाव के कारण पृथ्वी का आधे से अधिक भाग मानव के लिए अनाकर्षक है।

        आधुनिक मानव समाज अपने अनेक क्रियाकलापों के लिए जल संसाधन का उपयोग पहले से कहीं अधिक करने लगा है और कुछ देशों में तो जल प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, और कुछ क्षेत्रों में जल दोहन को लेकर तनाव पैदा हो गया है।

           आधुनिक समाज में तकनीकी विकास के कारण जल संसाधन का प्रचुर उपयोग सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, जल यातायात आदि के लिए किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में वर्षा जल की कमी है, वहाँ धरातलीय और भूमिगत जल के उपयोग से कृषि का अभूतपूर्व विकास किया गया है। पंजाब एवं हरियाणा अपने सिंचित क्षेत्रों के कारण सबसे सम्पन्न राज्य बन गये हैं, जबकि पड़ोसी राजस्थान जलाभाव के कारण अब भी विपन्न बना हुआ है।

       इसी प्रकार दक्षिणी साइबेरिया में सिंचित क्षमता के विकास के कारण उस क्षेत्र का काया पलट हो गया है। अनेक नगरीय और औद्योगिक केन्द्र जल संसाधन की कमी के कारण समस्याग्रस्त हो गये हैं। स्पष्ट है कि जल संसाधन का समुचित उपयोग मानव समाज की प्रगति का महत्त्वपूर्ण कारक रहा है।

          इस प्रकार कहा जा सकता है कि जल संसाधन मानव जीवन के लिए एक आधारभूत संसाधन है। जहाँ इसकी कमी है वहाँ मानव जीवन संकटमय बनता जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में पेय जल के संकट को हल करने के लिए समुद्र के खारे जल को साफ करने की तकनीक अपनाई जा रही है।

जल संसाधन के स्रोत एवं उपयोग (The Sources and Uses of  Water Resources)

       एक आंकलन के अनुसार पृथ्वी के समस्त जल भण्डार का 97.2 प्रतिशत समुद्रों, 2.15 प्रतिशत हिम सरिताओं, 0.62 प्रतिशत भूमिगत भण्डारों, 0.02 प्रतिशत धरातलीय स्रोतों और अवशेष नमी और आर्द्रता के रूप में पाया जाता है। प्राकृतिक संसाधन के रूप में धरातलीय जल भण्डार, भूमिगत जल भंडार और सागरीय जल का अधिक महत्व है। आर्थिक और मानवीय महत्त्व के दृष्टिकोण से धरातलीय और भूमिगत जल सर्वोपरि है।

         धरातलीय जल और भूमिगत जल वर्षा पर आधारित होता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है वहाँ इसका कुप्रभाव देखा जाता है जिसके कारण जल प्रबंधन की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निरर्थक प्रवाहित होता है। जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्रों में है लेकिन उसका जल खारा होने के कारण मानव के कुछ ही कामों के लिए प्रयुक्त हो पाता है। फिर भी इस भंडार से बनने वाली वाष्प और बादल धरातलीय जल को जन्म देते हैं, जो वर्षा तथा हिमपात के रूप में उसकी प्राप्ति होती है।

        पृथ्वी का लगभग दो तिहाई क्षेत्र समुद्री जल से घिरा है जबकि विश्व के विशाल मरूस्थल जल के अभाव में प्रायः मानव विहीन है। सउदी अरब, कुवैत, ईरान, इराक, जैसे देश हिमशिलाओं को पिघला कर पेय जल प्राप्त कर रहे हैं। इस प्रकार जल संसाधन का क्षेत्रीय स्वरूप बिल्कुल असमान है। विषुवत रेखीय क्षेत्रों में जल की प्रचुरता है तो मरुस्थलीय प्रदेशों में जलाभाव है। वर्षा जल का ठहराव भी जल संसाधन की उपलब्धता का एक प्रमुख पक्ष है। तीव्र ढाल वाले धरातल पर वर्षा होते ही जल बहकर अन्यत्र चला जाता है।

           वर्षा जल का ह्यास, वाष्पीकरण और जल के भूमिगत होने के कारण जल संसाधन की क्षेत्रीय विभिन्नता स्वाभाविक है। विश्व के लगभग एक चौथाई क्षेत्रफल पर न्यूनतम वर्षा होती है जिसका वार्षिक औसत 20 से.मी. से कम है, जैसे- उष्ण मरुस्थलों में पृथ्वी के धरातल के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र पर 25-50 से.मी. वर्षा होती है जिसे अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश कहते है।

      इस प्रकार पृथ्वी के धरातल के आधे से अधिक क्षेत्रफल पर औसत वर्षा होती है (50- 150से.मी.) जबकि शेष 15 प्रतिशत क्षेत्रफल अधिक वर्षा प्राप्त करता है। उपरोक्त सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि पृथ्वी का अधिकांश धरातल वर्षा की कमी अथवा अधिकता के कारण जल संसाधन के दृष्टिकोण से असंतुलित है।

          जल संसाधन का उपयोग जल संसाधन का उपयोग मानव समाज विविध कार्यों क लिए करता है। धरातलीय जल नदियों, झीलों और तालाबों में संचित होता है जो प्रधानत: सिंचाई जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, परिवहन, उद्योग, पेय और मनोरंजन के लिए, उपयोग किया जाता हैं। मानव के सांस्कृतिक विकास को धरातलीय जल ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। आज भी इसकी महत्ता बनी हुई है।

         भूमिगत जल का उपयोग मुख्यत: पेय, सिंचाई और औद्योगिक कार्यों के लिए किया जाता है। सागरीय जल का उपयोग प्रधानतः परिवहन, मत्स्य पालन और नमक प्राप्ति के लिये किया जाता है। नये खोजों से समुद्री जल के विविध उपयोग बढ़ने की संभावना है।

         वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र से भविष्य में मैगनीज, कोबाल्ट, ताँबा, ब्रोमाइड, मैगनीशियम, आयोडीन आदि की प्राप्ति की जा सकती है। इसमें सन्देह नहीं कि नयी तकनीकों के विकास के बल पर मानव सामुद्रिक जल का और अधिक उपयोग कर सकता है।

जल संसाधन के संरक्षण (The Conservation of  Water Resources)

जल अत्याधिक उपयोगी संसाधन है। इसके विविध उपयोग हैं, परन्तु यह सर्वत्र सुलभ या प्रचुर नहीं है। फलतः जल संसाधन संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता है। जिस तरह इसके विभिन्न उपयोग हैं उसी तरह इसका संरक्षण भी विविध रूपों में किया जाना चाहिए।

(i) धरातलीय जल मानव जीवन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, जो वर्षा द्वारा प्राप्त होता है। अतः वर्षा जल को उचित रूप में संग्रह करना और इस जल का अधिकतम उपयोग संरक्षण का मूल मंत्र है। उपयोग में आने वाला जल सदैव समुद्र की ओर जाने को उन्मुख रहता है, अतएव जल के अपवाह को नियमित करना, उसको संचय करना, सतह का निश्चित भंडार बनाना, नदियों पर बाँध बनाकर प्रवाह को नियमित करना, बाढ़ रोकना आदि कार्यों से इसकी उपयोगिता में वृद्धि होती है।

(ii) जल का सदुपयोग भी जल संरक्षण का प्रमुख पक्ष है। अतः घरेलू औद्योगिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जल का सदुपयोग करके, दुरुपयोग को कम किया जा सकता है।

(iii) भूमिगत जल जो कि प्रधानतः संरक्षित जल है, का अत्यधिक शोषण भूमिगत जल के स्तर को नीचा कर देता है। भूमिगत जल की मात्रा क्षेत्र विशेष में सीमित होती है, इसलिये अत्यधिक दोहन से यह भी समाप्त हो सकता है।

         अतः कुओं तथा नलरूपों में जितनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी आपूर्ति भी होती रहनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भूमिगत जल के अत्यधिक शोषण को रोकने की व्यवस्था की जाये तथा जमीन के अंदर अत्यधिक जल प्रवेश हेतु वन तथा मिट्टी से संबंधित तत्त्वों की सुरक्षा की जाये। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जलाशयों के निर्माण की नव तकनीक का विकास करके प्रेरित अन्तः स्रवण द्वारा भूमि जल संचय को बढ़ाया जा सकता है।

(iv) जल को शुद्ध रखना भी जल संरक्षण की प्राथमिक आवश्यकता है। दीर्घकाल से सीवर, उद्योगों, गैस प्लांटों, शोधन शालाओं तथा खानों आदि के विषैले रसायन, हानिकारक पदार्थ और गन्दा जल नदियों और झीलों में गिराये जाने से स्वच्छ जल की प्राप्ति कठिन हो गयी है तथा प्रदूषित जल से मानव एवं पौधों सहित समस्त जन्तु समुदाय को अकथनीय और असाध्य क्षति का सामना करना पड़ता है।

      अतएव सभी प्रकार की औद्योगिक इकाइयों को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वे कारखानों एवं खदानों से निकलने वाले अपशिष्टों एवं मल-जल को बिना शोधित किए नदियों, झीलों या तालाबों में विसर्जित न करें।

      नगरपालिकाओं द्वारा सीवर शोधन संयन्त्रों की व्यवथा की जाये तथा इस प्रकार की तकनीक का विकास किया जाये कि उत्पादकता को प्रभावित किए बिना जल के उपयोग को कम किया जा सके। इससे गन्दे पानी के बहाव की समस्या अवश्य कम होगी। जिससे प्रदूषित जल का प्रयोग कम मात्रा में संभव हो सकेगा।

(v) भू-तापीय जल (एक प्रकार का भूमिगत जल जो काफी गहराई में होता है) का भी प्रयोग किया जाये।

(vi) जिन क्षेत्रों में मीठे जल का अभाव है, वहाँ समुद्री जल के निर्लवणीयकरण की तकनीक विकसित करके मीठे जल की कमी दूर की जा सकती है। कुवैत ने इस दिशा में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है।

(vii) जल संरक्षण के लिये जनजागरुकता सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। समाज को सचेत करने के लिये जनजागरण अभियान चलाना सामयिक आवश्यकता है। इससे जहाँ एक ओर जल के संतुलित उपयोग की आदत विकसित होगी, वहीं दूसरी ओ जल के दुरुपयोग की आदत में सुधा होगा।

6. The Concept of Regional Development (प्रादेशिक विकास की अवधारणा)

6. The Concept of Regional Development

(प्रादेशिक विकास की अवधारणा)



        Regional Development

             भूगोल की संकल्पना में प्रदेश अन्तर्निहित है। वास्तव में प्रदेश भूगोल की आत्मा है। प्रदेश का गठन, उसका संगठन, गत्यात्मकता और विकास ऐसे शब्द हैं, जिनकी उल्लेख भूगोल की प्रत्येक शाखा में किया गया है। कहीं यह उल्लेख प्रत्यक्ष होता है, तो कहीं परोक्ष।

         एक क्षेत्रीय विज्ञान के नाते तथा पृथ्वी सतह से सम्बन्धित होने के कारण भूगोल में मनुष्य एवं पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है। कहीं प्रदेश विधि अथवा उपागम के रूप में स्पष्ट होता है, कहीं किसी प्रदेश का क्रमबद्ध विधि से अध्ययन होता है अथवा क्रमबद्ध अध्ययन का आधार ही प्रदेश है। अतः भूगोल एवं प्रादेशिक विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।

         पर्यावरण के विभिन्न तथ्यों के विस्तृत विवरण का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि सभी भौतिक तथ्य धरातल पर असमान रूप में वितरित है। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक तथ्य मानव निवास के अनुकूल हैं, उन्हीं क्षेत्रों में मानव सृजित वातावरण के तथ्य आसानी से केन्द्रित हो जाते हैं। इस तरह वहाँ मानवीय और भौतिक तथ्यों के बीच अल्पावधि में अन्तर्क्रिया सम्पन्न होती हैं। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा विकास वहाँ पहले दृष्टव्य होता है।

            इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, वहाँ विकास प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होगी, ऐसे क्षेत्रों में भी मानवीय कारकों की प्रधानता रहने पर विकास प्रक्रिया प्रारम्भ अवश्य होगी लेकिन संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों की तुलना में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत देर से प्रारम्भ होगी।

         यही कारण है कि विकास में क्षेत्रीय असमानता मिलती है। भूगोल में इसलिए विकास या आर्थिक विकास को प्रादेशिक विकास कहा जाता है। भौगोलिक रूप में इसको परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि “प्रादेशिक विकास मानवीय क्षमता और प्राकृतिक तथ्यों के गत्यात्मक अन्तर्क्रियात्मक अन्तर्सम्बन्धों के परिणामस्वरूप घटित क्षेत्रीय संरचनात्मक प्रत्यावर्तन से सम्बन्धित हैं।” यह प्रत्यावर्तन मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों स्तरों पर घटित होता है।

           स्पष्ट है कि क्षेत्रीय पक्ष प्रादेशिक आर्थिक विकास का मौलिक पक्ष है। इसलिये यह भौगोलिक अध्ययन का विषय है। लेकिन 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक भूगोलवेत्ताओं ने इस ओर कोई रुचि नहीं ली थी। वास्तव में उस समय भूगोल का उद्देश्य विभिन्न देशों एवं क्षेत्रों की विशिष्टताओं को स्पष्ट करना ही था। इसी विशिष्ट वर्णनात्मक उपागम के कारण भूगोलवेत्ताओं का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विभिन्नता का वर्णन करना था। भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास का अध्ययन द्वितीय महायुद्ध के बाद करना प्रारम्भ किया।

       इस समय लगभग साम्राज्यवाद और औपनिवेशीकरण समाप्त हो गया था। विभिन्न स्वतंत्र देश अपने संसाधनों के आधार पर आर्थिक विकास कर रहे थे। यूरो-अमेरिकी देश अपेक्षाकृत अधिक विकसित हो रहे थे, जबकि नये स्वतंत्र देश विकास प्रक्रिया को प्रारम्भ कर रहे थे।

          ऐसे समय ही विकसित देश विश्व का ‘विकसित’, ‘विकासशील’ और ‘अविकसित’ वर्गों में विभाजन करके विभिन्न विषयों का अध्ययन करने लगे। तत्कालीन भूगोलवेत्ताओं ने भी विकसित और अवकिसित देशों के मध्य विकास प्रतिरूप में अन्तर के कारणों को जानने हेतु आर्थिक विकास का अध्ययन प्रारम्भ किया।

          डडले स्टैम्प, नार्टन गिन्सबर्ग आदि भूगोलवेत्ताओं ने सर्वप्रथम आर्थिक विकास और प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन प्रस्तुत किया। कालान्तर में नार्टन गिन्सबर्ग ने ‘भूगोल एवं आर्थिक विकास’ (Essays on Geography and Economic Development) नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया। यह विभिन्न चरों पर आधारित विश्वस्तरीय आर्थिक विकास का प्रादेशिक वर्गीकरण था।

        इसी तरह अन्य भूगोलवेत्ताओं ने प्रारम्भिक स्तर पर आर्थिक विकास पर पर्यावरण के समग्र प्रभाव का भी वर्णन किया। आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाले विभिन्न चरों के वितरण प्रकृति के आधार पर सामान्यीकरण एवं सिद्धान्त निरूपण केवल कुछ ही भूगोलवेत्ताओं ने किया, जिसमें गिन्सबर्ग, उलमान और हार्टशोर्न उल्लेखनीय हैं। तदुपरांत भारत के भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास के विभिन्न आयामों का भौगोलिक वर्णन करके सामान्यीकरण और मॉडल निर्माण करना प्रारम्भ किया है।

      भारतीय भूगोलवेत्ताओं में आर० पी० मिश्रा, के० वी० सुन्दरम, वी० एल०एस० प्रकाशराव, मुनीस रजा, एल० के० सेन, डी० के० सिंह, जे०के० राउतराय, सुधीर वनमाली, पी०आर० चौहान, वी० के० श्रीवास्तव, नंदेश्वर शर्मा आदि ने भी आर्थिक विकास के विभिन्न पक्षों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया है।

आर्थिक विकास एवं प्राकृतिक- मानवीय तथ्य

       आर्थिक विकास का अध्ययन करते समय भूगोलवेत्ताओं का उद्देश्य उन कारकों का वर्णन करना होना चाहिये, जिससे विकास में असमानता होती है। ऐसे तत्त्वों में सर्वप्रथम प्राकृतिक तत्त्वों यथा- भूमि, जलवायु, खनिज, ऊर्जा संसाधन, वनस्पति आदि में क्षेत्रीय अन्तर मिलता है। ये सभी प्राकृतिक तत्त्व किसी भी क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिये उत्तरदायी हैं लेकिन मात्र इन्हीं के क्षेत्रीय वर्णन से विकास की असमानता का विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

        विश्व में क्षेत्रीय आधार पर वितरित विभिन्न संस्कृति और सभ्यताएँ तंत्र और संसाधनों के दोहन का उद्देश्य प्राकृतिक तत्त्वों की अपेक्षा अधिक सशक्त रूप से विकास की असमानता को स्पष्ट करते हैं। बल्कि भौगोलिक रूप से सच यह है कि प्राकृतिक तत्त्व तो निर्जीव रूप से स्थिर हैं। मानवीय विशेषताएँ ही इन तत्त्वों के दोहन का प्रतिरूप निर्धारित करके विकास प्रतिरूप को अस्तित्व में लाती है। इसलिये भूगोल में आर्थिक विकास के निर्धारकों में प्राकृतिक तत्त्वों से अधिक महत्त्व मानवीय तत्त्वों को दिया जाना चाहिये।

       हार्टशोर्न के अनुसार क्षेत्रीय आधार पर अन्तर इन्हीं तत्त्वों के कारण उत्पन्न होता है। यही कहा जा सकता है कि किसी क्षेत्र विशेष की भौतिक स्थिति, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठन, वहाँ निवास करने वाली जनसंख्या की क्षमता को उसकी आवश्यकताओं और उद्देश्यों को पूरा करने के लिये निर्देशित करते हैं। इसलिये भूगोल में विकास का अध्ययन उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के सन्दर्भ में न करके उत्पादन और जनसंख्या के सन्दर्भ में ही करना चाहिये, क्योंकि आर्थिक विकास का अन्तिम उद्देश्य भी मानव कल्याण हैं।

      विकास प्रतिरूप का भौगोलिक अध्ययन करते समय प्राकृतिक तत्त्वों के साथ-साथ मानव की भौतिक आवश्यकताओं और उनके प्रति उसके दृष्टिकोण का भी अध्ययन होना चाहिए। क्षेत्रीय आधार पर मानव समूहों की कुछ समान आवश्यकताएँ हैं, जैसे- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य आदि। इनकी पूर्ति मानव के हर कार्य का मुख्य उद्देश्य है। इसको प्राप्त करने के लिये मनुष्य संसाधनों से अन्तर्क्रिया करता है। इससे विकास घटित होता है। चूँकि मानव की इच्छाओं, आवश्यकताओं और उसकी क्षमताओं में पर्याप्त वैभिन्य है। इसलिये विकास प्रतिरूप में भी विभिन्नता का मिलना स्वाभाविक है।

       अतः अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, स्थानीय अथवा मानवीय समूह यहाँ तक कि नितान्त व्यक्तिगत स्तर पर विकास का अर्थ अलग-अलग होना अपरिहार्य है। मालकम आदिशेषैया ने सही कहा है कि एक पूर्ण विकसित औद्योगिक समाज में और पारम्परिक समाज में विकास का अभिप्राय अलग-अलग होना निश्चित है क्योंकि दोनों समाजों के मनुष्यों की आवश्यकताएँ, इच्छाएँ, जीवनयापन का ढंग, प्राविधिक स्तर अलग-अलग प्रकार के हैं। आवश्यकताओं एवं इच्छाओं में यह अन्तर विकास हेतु भी विभिन्न प्रकार की तकनीक पर आधारित है। यह तकनीक भी क्षेत्र विशेष की भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित होती है।

       भौगोलिक विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक तत्त्वों के अतिरिक्त विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं। भौतिक (पदार्थगत) तत्त्वों में परिवहन, वित्त, शक्ति के साथ-साथ संसाधन (कच्चे माल) हैं, जबकि अभौतिक तत्त्वों में श्रम, विपणन, उद्यम आदि हैं। ये सभी एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित होकर ही विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं।

      यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि किन्हीं एक या दो तत्त्वों के अभाव से क्षेत्र का विकास प्रभावित नहीं होगा, क्योंकि ऐसे तत्त्वों को आयात करके या उनका विकल्प खोलकर विकास किया जा सकता है। इसीलिये हार्टशोर्न का मत है कि विकास में अन्तर का मिलना प्राकृतिक संसाधनों में अन्तर का ही परिणाम नहीं है बल्कि मानवीय या अभौतिक कारक इस अन्तर के लिये अधिक उत्तरदायी है।

      उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भूगोल में आर्थिक विकास की संकल्पना क्षेत्रीय संदर्भ लेकर ही की जा सकती है। इस तरह प्रादेशिक विकास के रूप में आर्थिक विकास का एक मात्र उद्देश्य भूगोल में प्रति व्यक्ति आय अथवा राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही नहीं है बल्कि इसमें भौतिक और अभौतिक कारकों द्वारा समन्वित रूप में मानव के सन्दर्भ में किया जाने वाला आर्थिक विकास सम्मिलित है। भूगोल का उद्देश्य इन कारकों के वितरण अन्तर, अन्तर्सम्बन्ध और पारस्परिक अन्तरक्रिया का विश्लेषण करके विकास के सम्बन्ध सामान्यीकरण करना होना चाहिये।

निष्कर्ष

      विकास की प्राचीन अवधारणा से लेकर द्वितीय महायुद्धोत्तरकालीन संकल्पना और भूगोल में विकास की संकल्पना के उपर्युक्त विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं:-

(i) विकास अन्तर्विषयक, अन्तरप्रखण्डीय और बहुआयामी शब्द हैं।

(ii) मौलिक रूप में विकास का अभिप्राय आर्थिक विकास ही है। यह आर्थिक विकास भी क्षेत्रीय सन्दर्भ में सामाजिक न्याय और सहभागिता की विशेषता से युक्त है।

(iii) विकास की संकल्पना आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों में एक देश से दूसरे देश, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक समाज से दूसरे समाज अथवा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के सन्दर्भ में अलग-अलग होती हैं।

(iv) विकास के सन्दर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि किसी क्षेत्र का संसाधन आधार ही उसके विकास का एक मात्र कारण नहीं है बल्कि मानवीय तत्त्व की प्रकृति एवं प्रतिरूप अधिक उत्तरदायी हैं।

(v) क्षेत्र विशेष में विद्यमान राजनीतिक तंत्र विकास को निश्चित दिशा देकर उसे नियोजित करते हैं।

(vi) विकास का सर्वप्रमुख उद्देश्य मानव कल्याण है और यह मानव कल्याण भी सम्पूर्ण मानव समुदाय के सन्दर्भ में होना चाहिये इसलिये विकास तभी तक  उपयुक्त एवं प्रासंगिक है, जब तक कि उसमें असमानता न्यूनतम स्तर पर रहती है।

(vii) विकास की संकल्पना गत्यात्मक है। अविकसित और पिछड़े समाज या क्षेत्र के विपरीत विकसित अथवा औद्योगिक समाज के सन्दर्भ में, इसकी संकल्पना अलग-अलग है, क्योंकि दोनों की आवश्यकताओं एवं क्षमताओं में पर्याप्त अन्त मिलता है। इसलिये सामाजिक प्रत्यावर्तन के साथ ही साथ विकास की संकल्पना भी परिवर्तित होती जाती है।

प्रश्न प्रारूप

 1. प्रादेशिक विकास की अवधारणा प प्रकाश डालें।

 4. The problem of regional imbalances into India (भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)

4. The problem of regional imbalances into India

(भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)



        problem of regional

           भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन बड़े पैमाने पर पाया जाता है, हमारे देश में गरीबी एक अभिशाप है किन्तु इससे भी बुरी बात है-आय का असमान वितरण, आर्थिक विकास प्रयत्नों ने जहाँ आय की विषमता को बढ़ाया है, वहीं नियोजित विकास के द्वारा असंतुलन को कम करने के प्रयास भी किये हैं।

        योजनाओं का अन्तिम लक्ष्य समाजवाद की स्थापना करना, किन्तु योजनाओं के कार्यक्रमों का आधार क्रियान्वयन की विधि व संगठन तंत्र इस प्रकार के रहे कि सामाजिक लक्ष्यों की उपलब्धि सम्भव न हो सकी, प्रमुख असफलता आय के वितरण के रूप में सामने आयी, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा किये गये सर्वेक्षण अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में निम्नतम 20 प्रतिशत जनसंख्या की कुल आय का 9 प्रतिशत प्राप्त होता है, जबकि 5 प्रतिशत की कुल आय का 17 प्रतिशत, जनसंख्या के उच्चतम अर्द्धभाग को कुल आय का 60 प्रतिशत, जबकि निम्नतम अर्द्धभाग को कुल आय का केवल 31 प्रतिशत प्राप्त होता है।

      हमारे देश में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है, यहाँ जनसंख्या घनत्व में भी बहुत असमानता है। देश का जनघनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जनघनत्व की दृष्टि से पश्चिम बंगाल प्रथम स्थान पर है, जहाँ जनघनत्व 903 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में जनघनत्व 13 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसी भाँति यहाँ जनसंख्या का लिंगानुपात तथा साक्षरता में भी बहुत असमानता पायी जाती है।

       लिंगानुपात की दृष्टि से प्रथम स्थान पर केरल है, जहाँ लिंगानुपात 1058 है, जबकि राजस्थान में लिंगानुपात सबसे कम है, जो 922 है, साक्षरता की दृष्टि से केरल प्रथम स्थान पर है, जहाँ साक्षरता 90.92 प्रतिशत है, इसके विपरीत सबसे कम साक्षरता वाला राज्य बिहार है, जहाँ साक्षरता 47.0 प्रतिशत है।

        यहाँ कृषि, उद्योग, परिवहन, व्यापार आदि में भी पर्याप्त असन्तुलन पाया जाता है। देश में व्याप्त असन्तुलनों से अनेकानेक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक समस्याएँ उत्पन्न होती है, जिसे निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं-

सामाजिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जो अग्रलिखित हैं-

(1) आय एवं सम्पत्ति की असमानता:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से ग्राम एवं नगरों के मध्य आय तथा सम्पत्ति वितरण में असमानता बहुत है। यह असमानता राज्यों में भी बहुत है। अखिल भारत की प्रति व्यक्ति आय 29,642 (वर्तमान कीमतों पर) रुपये है, जबकि गोवा 70,112 रुपये, दिल्ली में 61,676 रुपये, महाराष्ट्र में 37,081 रुपये है।

       राष्ट्रीय औसत से अधिक आय वाले राज्य केन्द्रशासित गोआ, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हाराष्ट्र मिजोरम एवं पंजाब, चण्डीगढ़, केरल आदि राज्य है, जबकि शेष राज्यों के प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है।

(2) असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि जब लोग समाजिक नहीं होते हैं अर्थात् उनमें ऊँच-नीच दिखाई देती है, तो स्वाभाविक है कि असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

      क्षेत्रीय असन्तुलनों से किसी क्षेत्र विशेष की ओर श्रमिकों का प्रवास बढ़ने लगता है, जिससे भीड़-भाड़ की समस्या, आवास व्यवस्था की समस्या, जलापूर्ति समस्या, बिजली की समस्या तथा गन्दी बस्ती समस्या उत्पन्न होती है। सभी लोगों को रोजगार न मिलने से उनमें रोष व्याप्त होता है, जिससे असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

(3) सामाजिक लागतों में वृद्धि:-

         क्षेत्रीय असन्तुलन होने से किसी क्षेत्र विशेष में औद्योगीकरण अधिक होता है, जबकि किसी में बहुत कम। ऐसी स्थिति में जहाँ औद्योगीकरण अधिक होता है, वहाँ प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। प्रदूषण वाले क्षेत्रों में निवास करने वाले श्रमिकों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होने लग जाती हैं, जिसके उपचार हेतु अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती है।

आर्थिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्न प्रकार की आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं-

(1) साधनों का अपूर्ण उपयोग:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन की सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि इससे देश के संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है। इसका कारण यह है कि जहाँ विकास होता है, वहाँ के संसाधनों का उपयोग हो जाता है किन्तु अनेकानेक दुर्गम क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग नहीं हो पाता है।

(2) बेरोजगारी में वृद्धि:-

       सभी क्षेत्रों में सन्तुलित विकास न होने से कुछ क्षेत्रों में तो रोजगार के अवसर अच्छे होते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में रोजगार का अभाव पाया जाता है। यदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से विकास हो तो रोजगार के अवसर भी समान रूप से मिलेंगे, फलतः बेरोजगारी कम होगी।

(3) साधनों का अनुचित उपयोग:-

       प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में होते हैं। अतः उनका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए तथा उनके संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए। औद्योगिक विकास होने से संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग हो जाता है, जिससे संसाधनों के समाप्त होने की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(4) जीवन स्तर में भिन्नता:-

     क्षेत्रीय असन्तुलन से कुछ क्षेत्रों के लोगों की आय अधिक होती है, जबकि अन्य बहुत कम आय वाले होते हैं। ऐसी स्थिति में उनके जीवन-स्तर में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है। क्षेत्रीय असन्तुलन होने से यह बहुत गम्भीर समस्या उत्पन्न होती है।

राजनैतिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्नांकित राजनैतिक समस्याएँ उत्पन होती हैं-

(1) राजनीतिक अस्थिरता:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से राजनीति में भी स्थिरता नहीं है। जहाँ राजनीतिक अस्थिरता है, वहाँ असन्तुलन है, इस प्रकार दोनों का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। 

(2) क्षेत्रवाद की समस्या:-

      जब किसी क्षेत्र का विकास अधिक तथा किसी का कम होता है तो विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें क्षेत्रवाद की समस्या भी बहुत बड़ी है। ऐसे में क्षेत्रीय भावना जागृत होती है, जो किसी-न-किसी रूप में हानिकारक है।

(3) सुरक्षात्मक समस्या:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो क्षेत्र अधिक विकसित हो जाते हैं, उन पर अन्य पिछड़े क्षेत्रों के गरीब व बेरोजगा हमला बोल देते हैं, वहाँ से धन प्राप्त कते हैं। इससे वहाँ का जन-जीवन असुरक्षित हो जाता है।

4. Major Agriculture Systems in The World (विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)

4. Major Agriculture Systems in The World

(विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)



        Major Agriculture  

         मिट्टी को जोतने-गोड़ने तथा फसल उगाने एवं पशुपालन की कार्यप्रणाली, कला एवं विज्ञान को कृषि कहते हैं। कृषि मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय है, क्योंकि इससे समस्त संसार के भोजन, वस्त्र तथा आवास की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। विद्वानों का विचार है कि कृषि का आरम्भ दक्षिण-पश्चिमी एशिया में लगभग 4000 ईसा पूर्व हुआ।

          कुछ विद्वानों का मत है कि मनुष्य कृषि कार्य पाषाण युग से ही करता आया है।

         कृषि ने मनुष्य को स्थायी आवास की सुविधा दी। कृषि का मशीनीकरण हो जाने से उत्पादन में वृद्धि हुई और कृषि उत्पादों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार शुरू हो गया। आज संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा रूस बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का निर्यात करते हैं जबकि ग्रेट ब्रिटेन, नीदरलैण्ड, डेनमार्क तथा जापान इन वस्तुओं का आयात करते हैं।

कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Systems):-

          भूतल पर विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की भौतिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ पाई जाती हैं जिस कारण अलग-अलग भागों में अलग-अलग कृषि पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि

(Subsistence Agriculture)

2. आधुनिक कृषि

(Modern Agriculture)

3. विस्तृत कृषि

(Extensive Agriculture)

4. वाणिज्य कृषि

(Commercial Farming)

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन

(Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock)

6. डेरी फार्मिंग

(Dairy Farming)

7. ट्रक कृषि

(Truck Farming)

8. उद्यान कृषि

(Horticulture)

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि (Subsistence Agriculture):-

         इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीविकोपार्जी कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीविकोपार्जी कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीविकोपार्जी कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

2. आधुनिक कृषि (Modern Agriculture):-

        इस कृषि में आधुनिक ढंग से फसलें उगाई जाती हैं। कृषि के विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मशीनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक उपज लेने के लिए उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ तथा सिंचाई की उत्तम सुविधा का प्रयोग किया जाता है। विस्तृत कृषि, वाणिज्य कृषि, मिश्रित कृषि, डेयरी फार्मिंग उद्यान कृषि,आदि आधुनिक ढंग से की जाती है। 

3. विस्तृत कृषि (Extensive Agriculture):-

      विस्तृत कृषि एक मशीनीकृत कृषि है जिसमें खेतों का आकार बड़ा, मानवीय श्रम कम, प्रति हेक्टेअर उपज कम और प्रति व्यक्ति तथा कुल उपज अधिक होती है। यह कृषि मुख्यतः शीतोष्ण कटिबन्धीय कम जनसंख्या वाले प्रदेशों में की जाती है। इन प्रदेशों में पहले चलवासी चरवाहे पशुचारण का कार्य करते थे और बाद में यहाँ स्थायी कृषि होने लगी। इन प्रदेशों में वार्षिक वर्षा 30 से 60 सेमी होती है। जिस वर्ष वर्षा कम होती है उस वर्ष फसल को हानि पहुँचती है। यह कृषि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू हुई।

        इस कृषि का विकास कृषि-यन्त्रों तथा महाद्वीपीय रेलमार्गों के विकसित हो जाने से हुआ है। विस्तृत कृषि मुख्यतः रूस तथा यूक्रेन के स्टेपीज (Steppes), कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies), अर्जेण्टीना के पम्पास (Pampas of Argentina) तथा आस्ट्रेलिया के डाउन्स (Downs of Australia) में की जाती है।

       विस्तृत कृषि के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है:

(i) खेत बहुत ही बड़े आकार के होते हैं। इनका क्षेत्रफल प्रायः 240 से 1600 हेक्टेअर तक होता है।

(ii) बस्तियाँ बहुत छोटी तथा एक-दूसरे से दूर स्थित होती हैं। 

(iii) खेत तैयार करने से फसल काटने तक का सारा काम मशीनों द्वारा किया जाता है। ट्रैक्टर, ड्रिल, कम्बाइन, हार्वेस्टर, थ्रेशर और विनोअर मुख्य कृषि यंत्र हैं।

(iv) मुख्य फसल गेहूँ हैं। अन्य फसलें हैं- जौ, जई, राई, फ्लैक्स तथा तिलहन।

(v) खाद्यान्नों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनाए जाते हैं जिन्हें साइलो या एलीवेटर्स कहते हैं। 

(vi) यान्त्रिक कृषि होने के कारण श्रमिकों की संख्या कम होती है।

(vii) प्रति हेक्टेअर उपज कम तथा प्रति-व्यक्ति उपज अधिक होती है।

      जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के कारण विस्तृत कृषि का क्षेत्र घटता जा रहा है। पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्यूनस आयर्स, आस्ट्रेलिया के तटीय भागों तथा यूक्रेन जैसे घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों से लोग विस्तृत कृषि के क्षेत्रों में आकर बसने लगे हैं जिससे कृषि का क्षेत्र कम होता जा रहा है। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में शुरू हुई यह कृषि अब बहुत ही सीमित क्षेत्रों में की जाती है।

4. वाणिज्य कृषि (Commercial Farming):-

      इस कृषि में फसलों को बेचने के लिए पैदा किया जाता है। अतः उत्पादन में फसल विशिष्टीकरण इसकी मुख्य विशेषता है। विश्व में यह दो रूपों में पाई जाती है-

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि तथा

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि।

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि:-

        मध्य अक्षांशों में गेहूँ के उत्पादन में विशिष्टीकरण इस कृषि का मुख्य उदाहरण है। उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी क्षेत्र, यूक्रेन क्षेत्र, पश्चिमी यूरोप, अर्जेण्टीना, आस्ट्रेलिया के दक्षिणी भागों तथा भारत के पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

      इस कृषि में अधिकांश कार्य मशीनों से किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में गेहूँ के कृषि क्षेत्रों में कृषक बाहर से आते जाते हैं। इनके लिए साइडवाक कृषक तथा सूटकेस कृषक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। भारत में वाणिज्य कृषि बड़े पैमाने पर तो नहीं, परन्तु किसी हद तक की जाती है। यहाँ पर मशीनीकरण भी सीमित ही हुआ है।

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि:-

       रोपण कृषि का विकास उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में उपनिवेश काल में यूरोपीय देशों द्वारा किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय देशों को वे कृषि उपजें उपलब्ध कराना था जो केवल उष्ण कटिबन्धीय जलवायु में ही होती हैं। अतः यह एक व्यापारिक कृषि बन गई जिसमें फसलों का विक्रय किया जाता है। भारत में असम व दार्जिलिंग तथा श्रीलंका के चाय बागान, मलेशिया के रवर बागान, ब्राजील के कॉफी बागान इस कृषि के मुख्य उदाहरण हैं।

       प्रारम्भ में पूँजी निवेश उपनिवेशी देशों द्वारा किया गया था। बागानों का प्रबन्ध भी उपनिवेशी देशों के हाथों में ही था, परन्तु बड़े पैमाने पर श्रम स्थानीय मजदूरों या बाहर से लाए गए भाड़े या बन्धुआ मजदूरों द्वारा उपलब्ध कराया गया। इस कृषि में उत्पाद को भी बागान पर ही संसाधित किया जाता है। क्योंकि रोपण कृषि की उपजें मुख्यतः निर्यात के लिए ही होती हैं इसलिए इस कृषि के विकास के लिए सस्ते परिवहन का होना अति आवश्यक है। यही कारण है कि विश्व की अधिकांश रोपण कृषि तटीय भागों में विकसित हुई है या वह सस्ते परिवहन द्वारा तट से जुड़ी हुई है।

      रोपण कृषि के बागान प्रायः बड़े आकार के होते हैं और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पनपते हैं। सामान्यतः इनका आकार 4 से 40 हेक्टेअर तक होता है, परन्तु कहीं-कहीं ये बागान बहुत बड़े होते हैं। उदाहरणतः लाइबेरिया में हरबल नामक स्थान पर फायस्टोन कम्पनी का रबर का बागान 54.4 हजार हेक्टेअर भूमि पर फैला हुआ है।

      उपनिवेशवाद की समाप्ति पर उपनिवेश स्वतन्त्र हो गए और रोपण कृषि की विशेषताओं में परिवर्तन आ गया। उदाहरणतः बागानों का स्वामित्व तथा प्रबन्ध उपनिवेशी देशों से हटकर स्थानीय अधिकारियों के हाथों में आ गया। अब ये बागान अपनी उपजों को निर्यात करने के साथ-साथ स्थानीय बाजारों में भी बेचते हैं।

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन (Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock):-

        इस कृषि में फसलें उगाने तथा पशुओं को पालने का कार्य एक साथ किया जाता है। यह मिश्रित बुआई से भिन्न है। मिश्रित बुआई में एक ही खेत में एक ही समय पर कई फसलें बोई जाती हैं जबकि मिश्रित कृषि में फसलें उगाने के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी किया जाता है। मिश्रित कृषि यूरोप में आयरलैण्ड से रूस तक, उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग, अर्जेण्टीना के पम्पास, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड में की जाती है।

      संयुक्त राज्य अमेरिका का मिश्रित कृषि क्षेत्र मक्के की पेटी है। मक्का खिलाकर पशुओं को मोटा किया जाता है। इसके अतिरिक्त जई, गेहूँ तथा घास भी पैदा की जाती है। अब यहाँ पर सोयाबीन की फसल भी पैदा की जाने लगी है। यह एक प्रोटीनयुक्त फसल है जिसका विस्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। यह कृषि अधिकतर बड़े-बड़े नगरों के आस-पास की जाती है जिससे इसकी उपजों की बिक्री में कोई कठिनाई नहीं होती। उत्तम कृषि विधियाँ, उत्तम परिवहन, शहरी बाजार की निकटता तथा विश्वसनीय वर्षा से इस कृषि को बड़ी सहायता मिलती है।

6. डेरी फार्मिंग (Dairy Farming):-

      डेरी फार्मिंग कृषि का वह विशिष्ट ढंग है जिसमें दूध देने वाले पशुओं के प्रजनन, पशुचारण और नस्ल सुधारने की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुधारू पशुओं, विशेषतया गायों को पाला जाता है। दूध तथा दुग्ध पदार्थ, जैसे- मक्खन, पनीर, क्रीम, संघनित दूध और पाउडर दूध इस कृषि के मुख्य उत्पाद हैं।

डेरी फार्मिंग के क्षेत्र:-

     डेरी फार्मिंग यूरोप (ब्रिटेन, आयरलैण्ड, डेनमार्क, नीदरलैण्ड्स, बेल्जियम, नार्वे, स्वीडन, स्विटजरलैण्ड, फ्रांस, यूक्रेन, लाटविया, लिथुआनिया तथा एस्टोनिया), उत्तरी अमेरिका की विशाल झीलों का क्षेत्र, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में विकसित है।

     भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। | गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

डेरी फार्मिंग की विशेषताएँ

(i) दुधारू पशुओं को पालना डेरी फार्मिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी नस्ल पर विशेष ध्यान दिया जाता है। होलिस्टीन, रेनडेन, जर्सी, गोर्नसे तथा आयर शायर जैसी उच्चकोटि की नस्लों वाली गायें पाली जाती हैं।

(ii) पशुओं की देखभाल वैज्ञानिक तरीकों से की जाती है।

(iii) दूध दोहने और उसे संसाधित करने की क्रियाओं को मशीनों द्वारा किया जाता है।

(iv) डेरी फार्मिंग घने औद्योगिक नगरों की मांग पर आश्रित है इसलिए अधिकांश डेरी फार्मिंग शहरी क्षेत्रों के निकट ही पनपा है।

(v) दूध और दुग्ध पदार्थों को मांग के क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए तीव्र यातायात का प्रयोग किया जाता है।

(vi) नियोजित आवास, मशीन, चारे की मिलों, प्रशीतन तथा संचयन के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है।

7. ट्रक कृषि (Truck Farming):-

     यह एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें साग-सब्जियों की कृषि की जाती है। इन वस्तुओं को प्रतिदिन ट्रकों में भरकर निकटवर्ती नगरीय बाजारों में ले जाकर बेचा जाता है। बाजार से कृषि क्षेत्र की दूरी इस बात पर निर्भर करती है कि ट्रक द्वारा रात-भर चलने में कितनी दूरी तय होती है। इसीलिए इस कृषि का नाम ट्रक कृषि रखा गया है।

प्रदेश- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, डेनमार्क, बेल्जियम, नीदरलैण्ड्स, जर्मनी और फ्रांस), संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तर-पूर्वी भाग, केलीफोर्निया, फ्लोरिडा प्रायद्वीप तथा पूर्वी तटीय भाग) एवं कनाडा के पूर्वी भाग में की जाती है। इन प्रदेशों के शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में ताजी सब्जियों की भारी मांग रहती है और ये वस्तुएँ इन प्रदेशों को ट्रक कृषि से ट्रकों द्वारा प्राप्त होती हैं। अतः इस कृषि का नगरीकरण से गहरा सम्बन्ध है।

      भारत में वातावरण अनुकूल तथा वर्धनकाल लम्बा होने के कारण लगभग सभी भागों में सब्जियाँ उगाई जाती हैं। यहां पर अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और मांस का मूल्य अधिक होने के कारण सब्जियों की मांग अधिक रहती है। इसलिए इस कृषि पर अधिक बल दिया जाता है।

विशेषताएँ- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(i) ट्रक एवं उद्यान कृषि के खेत छोटे होते हैं।

(ii) परिवहन की सुविधा अच्छी रहती है।

(iii) गहन कृषि की जाती है।

(iv) सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होती है।

(v) खादों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

(vi) अधिकांश कार्य हाथों से किया जाता है।

(vii) पेड़ों तथा पौधों को बीमारियों से बचाने के लिए दवाइयों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

8. उद्यान कृषि (Horticulture):-

        यह लगभग ट्रक कृषि जैसी ही है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें साग-सब्जी के स्थान पर फलों तथा फूलों की कृषि की जाती है। फलों और फूलों की मांग नगरों में बहुत होती है।

फल-

       नगरीय क्षेत्रों में फलों की मांग बहुत होती है जिससे कृषक को पर्याप्त आय हो जाती है। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के फल उगाए जाते हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में केला, आम, जामुन, नारियल, काजू, आदि। शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में सेब, आडू, अखरोट, नाशपाती एवं रसबेरी, आदि तथा भूमध्यसागरीय देशों में खट्टे फल, जैसे- सन्तरा, मौसमी, नीबू, आदि मुख्य फल हैं।

फूल-

      फलों की भांति फूलों की भी नगरीय क्षेत्रों में काफी मांग रहती है और फूलों की बिक्री से कृषक को काफी धन प्राप्त होता है। फूलों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी होता है। जार्जिया तथा आर्मीनिया में पैदा किए गए गुलाब के फूल मास्को तथा रूस के अन्य नगरों में भेजे जाते हैं।

        शीत ऋतु में इथोपिया प्याज के फूलों का निर्यात यूरोपीय देशों को करता है। नीदरलैण्ड्स में ट्यूलिप की कृषि विशेष रूप से की जाती है। यहाँ से इनका निर्यात वायुयानों द्वारा यूरोप तथा अमेरिका के बड़े-बड़े नगरों को किया जाता है। भारत में गुलाब तथा गेंदे के फूल अधिक पैदा किए जाते हैं।

       अजमेर के निकट पुष्कर घाटी गुलाब की कृषि के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में भी फूलों की खेती की जाती है। कश्मीर घाटी में विभिन्न प्रकार के फूल उगाए जाते हैं। यहाँ कटेवा भूमि पर केसर की खेती होती है। कन्नौज, जौनपु तथा लखनऊ में फूलों प आधारित सुगन्धित तेल बनाए जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियों (Agriculture Systems) का वर्णन करें।

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)



Multiple Nuclei       

       यद्यपि संकेन्द्रित क्षेत्र और खण्ड क्षेत्र सिद्धान्त को अपनी आकर्षक सरलता का लाभ मिला, किन्तु अधिकांश नगरों की संरचना में इतनी अधिक जटिलता एवं विविधता पाई जाती है कि उसका सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। 1945 में सी. डी. हैरिस और ई. एल. उल्मान ने नगरीय संरचना के विविध प्रारूपों पर लागू होने वाले बहुनाभिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

         इस सिद्धान्त के अनुसार नगर का भूमि उपयोग प्रतिरूप एक ही केन्द्र या नाभि के चारों ओर विकसित न होकर प्रायः कई अलग-अलग केन्द्रों के चारों ओर विकसित होता है। इस प्रकार के विकास से नगर की संरचना कोशिकीय (Cellular) हो जाती है। इस कोशिकीय संरचना का निर्धारण नगर के अवस्थान (Site) सम्बन्धी विलक्षण कारकों और ऐतिहासिक कारकों द्वारा होता है। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार भिन्न-भिन्न केन्द्र या नाभिक कुछ नगरों में उत्पत्ति के समय ही अस्तित्व में आ जाते हैं जबकि कुछ नगरों में इनका विकास नगर की वृद्धि के साथ-साथ होता रहता है। नगरों में भिन्न-भिन्न केन्द्रों या नाभि तथा उन पर निर्भर भूमि उपयोग कटिबन्धों का बनना निम्नलिखित चार कारकों के संयोजन का परिणाम होता है:

(i) कुछ मानवीय क्रियाकलापों को विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होती है, जैसे- खुदरा व्यापार का क्षेत्र नगर में परिवहन की दृष्टि से सर्वाधिक गम्य स्थान के पास, बन्दरगाह अनुकूल सागरीय तट पर तथा विनिर्माण उद्योग विस्तृत भू-भाग और जल, स्थल तथा रेल मार्गों से संयोजित होने जैसी सुविधाओं पर ही विकसित होते हैं।

(ii) कुछ क्रियाएँ साथ-साथ पाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें सम्बद्धता से लाभ प्राप्त होता है। जैसे, वित्तीय संस्थान एवं कार्यालयों के क्षेत्र यातायात एवं संचार सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर होते हैं।

(iii) कुछ भिन्न प्रकृति की क्रियाएं एक-दूसरे के लिए हानिकारक होती हैं। इस दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्र एवं उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का विरोधाभास सर्वविदित है। खुदरा व्यापार क्षेत्र में पैदल चलने वालों, दो पहिया वाहनों और कारों का भारी जमाव पाया जाता है, जो कि थोक व्यापार क्षेत्र के लिए आवश्यक रेल मार्ग सुविधाओं, विस्तृत स्थान एवं भारी सामान को लादने एवं उतारने जैसी क्रियाओं के प्रतिकूल है।

(iv) कुछ क्रियाएँ सर्वाधिक वांछनीय स्थलों को ऊँचा किराया या मूल्य देने में असमर्थ होती हैं। यह कारक इन क्रियाओं के अन्यत्र संयोजन का कार्य करता है। जैसे, थोक व्यापार एवं भण्डारण जैसी क्रियाओं के लिए अधिक कमरों या बहुत अधिक स्थान की आवश्यकता होती है, जो कि केन्द्र के निकट सम्भव नहीं है। इसी प्रकार निम्न आय वर्ग के आवास ऊंचे भूमि मूल्यों के कारण उच्च आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र में स्थापित नहीं होते हैं।

        नाभिकों या केन्द्रों की संख्या विभिन्न नगरों में भिन्न-भिन्न होती है। इनकी संख्या ऐतिहासिक विकास तथा अवस्थिति शक्तियों का परिणाम होती है। नगर जितना बड़ा होता है, उसमें उतने ही अधिक एवं विशिष्ट केन्द्र मिलते हैं। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार नगरों में केन्द्रों के चारों ओर विकसित होने वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र (Wholesale and Light Manufacturing)

3. भारी उद्योग क्षेत्र (Heavy Manufacturing)

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर (Suburb and Satellite)

5. लघु नाभि केन्द्र (Minor Nuclei)

6. आवासीय क्षेत्र (Residential)

7. भारी व्यापारिक पेटी (Heavy Business District)

8. रिहाइशी उपनगर (Residential Suburb)

9. औद्योगिक उपनगर (Industrial Suburb)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र अन्तरानगरीय यातायात सुविधाओं के केन्द्र में स्थित होता है। यह नगर के विभिन्न भागों से यातायात द्वारा जुड़ा होता है और नगर के सभी भागों से गम्य होता है। यहाँ भूमि का मूल्य सर्वाधिक होता है। डिपार्टमेण्टल स्टोर, वेरायटी स्टोर, रेडीमेड वस्त्र स्टोर, सर्वाधिक खुदरा व्यापार एवं सर्वाधिक ग्राहक संख्या इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

      छोटे नगरों में वित्तीय संस्थान और कार्यालय भवन भी खुदरा व्यापार की दुकानों के साथ मिले जुले रूप में मिलते हैं जबकि बड़े नगरों में इनका क्षेत्र खुदरा क्षेत्र के पास, किन्तु अलग स्थित होता है। अधिकांश बड़े नगरों की विषम वृद्धि के कारण केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र अब सामान्यतः नगरों के क्षेत्रीय केन्द्र में स्थित न होकर वास्तव में किसी एक किनारे के पास मिलता है।

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र:-

      थोक व्यापार क्षेत्र प्रायः केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के निकट (किन्तु उसके चारों ओर नहीं) यातायात मार्गों के सहारे सहारे स्थित होता है। यद्यपि इसको कुछ आधार स्वयं नगर से प्राप्त होता है, किन्तु यह प्रमुख रूप से पड़ोसी क्षेत्रों को सेवाएँ प्रदान करता है। अनेक प्रकार के हल्के विनिर्माण उद्योगों के विशिष्ट भवनों की आवश्यकता नहीं होती है। इन उद्योगों को तो अच्छे रेल एवं सड़क यातायात सम्पर्क, बड़े भवनों की उपलब्धि तथा स्वयं नगर के बाजार एवं श्रम से निकटता जैसी सुविधाएँ इन्हें आकर्षित करती हैं।

3. भारी उद्योग क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र नगर के वर्तमान या पूर्ववर्ती बाह्य किनारों के निकट स्थित होता है। भारी उद्योगों को भूमि के बड़े भाग तथा अच्छी रेल, सड़क एवं जल यातायात सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जो कि उन्हें नगर के केन्द्रीय भाग की अपेक्षा सीमावर्ती भाग में आसानी से उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारी मशीनों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण, उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले हानिकारक अपशिष्टों और जान-माल के अन्य खतरों की वजह से भारी उद्योगों को नगर केन्द्र से दूर स्थित होने के लिए बाध्य करते हैं। यही कारण है कि नगरों की बाहरी सीमा पर भारी उद्योगों का स्थानीयकरण मिलता है।

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर:-

       उपनगर चाहे वह आवासीय हो या औद्योगिक, अधिकांश बड़े नगरों की प्रमुख विशेषता है। उपनगर एवं अनुषंगी नगर भी नगरों के विकास में केन्द्रों या नाभि के रूप में कार्य करते हैं। मोटर यातायात तथा उपनगरीय रेल सेवाओं के विकास ने उपनगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है। अनुषंगी नगर केन्द्रीय नगर से कई किमी दूर तथा सामान्य रूप से दैनिक अभिगमन की मात्रा भी कम होने के कारण उपनगर से भिन्न होते हैं। अनुषंगी नगरों की आर्थिक क्रियाएं उनकी केन्द्रीय नगर से निकटता प्रदर्शित करती है।

5. लघु नाभि केन्द्र:-

         नगर के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे केन्द्र पाए जाते हैं जैसे, सांस्कृतिक केन्द्र, बाह्यवर्ती व्यापार केन्द्र तथा छोटे औद्योगिक केन्द्र, आदि। एक विश्वविद्यालय भी किसी नगर में स्वतन्त्र रूप से नाभि या केन्द्र के रूप में कार्य कर सकता है। पार्क एवं अन्य मनोरंजन के क्षेत्र भी, जो कि बेकार पड़ी हुई भूमि को अधिग्रहीत किए हुए होते हैं, कभी-कभी उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र के केंद्र के रूप में विकसित हो जाते हैं। बाह्यवर्ती व्यापारिक क्षेत्र भी कालान्तर में प्रमुख केन्द्र बन जाते हैं, किन्तु छोटी संस्थाओं और हल्के विनिर्माण उद्योगों की व्यक्तिगत इकाइयों जैसे, बेकरी में ऐसी क्षमता नहीं होती है।

6. आवासीय क्षेत्र:-

        सामान्यतः उच्च श्रेणी के आवास अच्छा जल प्रवाह रखने वाले ऊंचे स्थलों पर तथा शोर, धुआं, दुर्गन्ध, रेलमार्ग, आदि से दूर स्थापित होते हैं। निम्न श्रेणी के आवास प्रायः कारखानों तथा रेलमार्गों के निकट स्थापित होते हैं। नगर के अधिक पुराने आवासीय क्षेत्रों जहाँ कि अधिकांश भवनों का ढाँचा जर्जर अवस्था में होता है, में भी निम्न वर्ग के लोगों के आवास होते हैं। यह वर्ग नगर के अन्य भागों में अधिक किराया देने में असमर्थ होता है। उच्च और निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बीच में मध्यम श्रेणी के लोगों का रिहायशी क्षेत्र बन जाता है।

निष्कर्ष:

        यद्यपि वर्तमान समय में कोई भी एक सिद्धान्त नगरों पर पूर्णतया लागू नहीं होता है, किन्तु अधिकांश नगरों में तीनों ही प्रकार के यथा, संकेन्द्रित वलय, खण्ड क्षेत्र और बहुनाभिक क्षेत्र का कोई न कोई रूप अवश्य देखने को मिलता है।

     वस्तुतः एक नगर के विकास के विभिन्न कालों में कार्यरत विभिन्न शक्तियों के कारण ही एक नगर में उपरोक्त वर्णित तीनों सिद्धान्तों का सामंजस्य देखने को मिलता है।

      नगर की प्रारम्भिक वृद्धि केन्द्रीय क्षेत्र और नाभि केन्द्रों के चारों ओर होती है। कालान्तर में होने वाली वृद्धि परिवहन मार्गों के सहारे होती है। यह वृद्धि खण्ड प्रारूप को जन्म देती है। अन्त में भूमि मूल्यों के अनुसार भूमि का उपयोग जो नग के केन्द्र से दूरी के अनुसा निर्धारित होता है, नगरीय भूमि उपयोग को संकेन्द्रित प्रारूप प्रदान करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. नगरीय आकारिकी के सम्बन्ध में प्रतिपादित बहुनाभिक सिद्धांत (Multiple Nuclei Theory) का वर्णन कीजिए।

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)



      Sector Theory

        1939 में अमेरिकी नगरीय अर्थशास्त्री होमर हॉयट ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कुल 142 नगरों के भूमि उपयोग आंकड़ों के आधार पर नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के सम्बन्ध में खण्ड सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हॉयट ने बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त में रही कुछ कमियों को दूर करते हुए अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार नगरीय भूमि उपयोग का प्रारूप परिवहन मार्गों के विन्यास के अनुरूप विकसित होता है।

       नगर के केन्द्र से विभिन्न दिशाओं में जाने वाले परिवहन मार्गों के सहारे भूमि उपयोग और किराया-मूल्यों का प्रारूप खण्डीय रूप (Sectoral Pattern) में विकसित होता है। विकसित हुआ यह खण्ड प्रारूप पुनः नगरीय भूमि उपयोग प्रारूप को प्रभावित करता है।

       हॉयट के अनुसार नगर के एक खण्ड में विद्यमान सर्वाधिक किराया वाले आवासीय क्षेत्र का विस्तार उसी खण्ड में बाह्य भाग की ओर होता है। इसी प्रकार निम्न किराया वाले आवासीय क्षेत्रों का विकास बाह्य भाग की ओर होता है, लेकिन विभिन्न दिशाओं में हो सकता है।

       हॉयट के अनुसार भूमि उपयोग की दृष्टि से नगर कई खण्डों में बंटा होता है, जो कि नगर के केन्द्र से बाहर की ओर फैले रहते हैं। नगर केन्द्र के निकट जिस प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, बाहर की ओर भी उसी दिशा में उसी प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, जैसे नगर के पूर्वी भाग में उच्च आवासीय क्षेत्र नगर के पूर्वी भाग की बाह्य सीमा की ओर ही बढ़ेगा।

       हॉयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड पाए जाते हैं:-

1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र,

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र,

3. निम्न श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

4. मध्यम श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

5. उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र।

       केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र की स्थिति संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की भांति ही नगर के केन्द्र में होती है। थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर दो विभिन्न खण्डों में परिधि की सीमा तक फैला हुआ होता है। निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्र भी विनिर्माण उद्योग खण्ड के सन्निकट दोनों ओर फैले त्रिज्या खण्डों में एवं केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के एक ओर सीमा पर पाए जाते हैं।

      मध्यम वर्ग के आवासीय क्षेत्र उच्च श्रेणी के आवासीय खण्ड के सहारे दोनों तरफ तथा निम्न श्रेणी आवासीय खण्ड के बाहर की ओर पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र एक या एक से अधिक खण्डों की बाहर की सीमा पर बसा मिलता है। आर्थिक स्तर के अनुसार विभिन्न वर्गों के आवासीय क्षेत्र स्थिर न होकर परिवर्तनशील होते हैं, किन्तु सामान्यतः उसी खण्ड की बाह्य सीमाओं की ओर बढ़ते हैं।

      हॉयट के अनुसार श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बढ़ने की प्रवृत्ति निम्नलिखित भागों में पाई जाती है:

(i) अपने उत्पत्ति बिन्दु से प्रमुख मार्गों के सहारे या भवनों की अन्य विद्यमान नाभि या व्यापारिक केन्द्रों की ओर,

(ii) बाढ़ से सुरक्षित ऊंचे धरातल या झील, खाड़ी, नदी और महासागरीय सीमान्त की ओर,

(iii) नगर के उस क्षेत्र की ओर जो खुला हुआ हो,

(iv) सामुदायिक नेताओं और विशिष्ट व्यक्तियों के घरों की ओर,

(v) तीव्रतम यातायात मार्गों के सहारे।

      हॉयट के अनुसार सुसज्जित उच्च आवासीय फ्लेट वाले क्षेत्र, पुराने आवासीय क्षेत्र के व्यापारिक केन्द्र के निकट भी स्थापित होने की प्रवृत्ति रखते हैं। साथ ही जायदाद एवं भूमि सम्पदा व्यवसायी भी उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्रों की वृद्धि की दिशा को मोड़ सकते हैं।

        उच्च किराया आवासीय क्षेत्र हॉयट के सिद्धान्त का आधार है जिसे हॉयट ने 30 अमेरिकी नगरों के उच्च आवासीय क्षेत्रों के आरेखों द्वारा पुष्ट किया है। उच्च किराया आवासीय क्षेत्र नगरीय भूमि उपयोग संरचना के आकार निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाता है। हॉयट ने अपने सिद्धान्त में संकेन्द्रित सिद्धान्त के प्रति उठाई गई आपत्तियों जैसे, उद्योगों की स्थिति एवं यातायात मार्गों पर पूरा ध्यान दिया है साथ ही नगर के भावी विकास एवं विस्तार का भी ध्यान रखा है।

        डब्ल्यू. फायरे ने बोस्टन के भूमि उपयोग का अध्ययन करके खण्ड सिद्धान्त में विद्यमान कमियों को उजागर किया है। इनका कहना है कि धरातलीय दशाएँ और जलीय भाग खण्ड प्रतिरूप को विकृत कर सकते हैं तथा भूमि उपयोग को निर्धारित करते समय सिद्धान्त में सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।

        फायरे ने बोस्टन के बेकोनहिल उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का उदाहरण देकर बताया है कि इसके विकास का कारण इसकी अवस्थिति नहीं है, अपितु सामाजिक काण है। नगरों की सम्पूर्ण संरचना के स्थान प हॉयट ने अपने सिद्धान्त को मात्र आवासीय वृद्धि जैसे विशिष्ट सन्दर्भ में ही लागू किया है। स्वयं हॉयट ने अपने सिद्धान्त का पुनर्मूल्यांकन आधुनिक यातायात के साधनों एवं अन्य परिवर्तनों के सन्दर्भ में 1964 में किया।

प्रश्न प्रारूप

नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के संबंध में प्रतिपादित खंड सिद्धांत (Sector Theory) का समालोचनात्मक वर्णन कीजिए।

20. Concentric Zone Theory (सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)

20.  Concentric Zone Theory

(सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)


        Concentric Zone Theory

        नगरों की सामान्य संरचना अथवा आकारिकी के सम्बन्ध में सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम ई. डब्ल्यू. बर्गेस ने 1927 में किया, जिसे संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है कि एक नगर का विकास केन्द्र से बाहर की ओर संकेन्द्रित क्षेत्रों (पेटियों) की शृंखला बनाते हुए होता है। ये पेटियाँ नगर की वृद्धि के साथ-साथ बाहर की ओर खिसकती जाती है।

        यह सिद्धान्त आदर्श दशाओं में ही लागू होता है अन्यथा प्रतिक्रियात्मक कारकों जैसे, यातायात मार्गों और धरातलीय अवरोध (नदी, झील, समुद्र, हिमनद, खाइयां) के उपस्थित होने पर अपने मूल रूप में लागू नहीं होता है। इस प्रकार बर्गेस का यह सिद्धान्त एक आदर्श संकल्पना है। बर्गेस ने शिकागो का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नगर के संरचनात्मक विकास को निम्नलिखित पांच संकेन्द्रित क्षेत्र (पेटियों) द्वारा समझाया है।

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone)

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र (Zone of Workingmen’s Homes)

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र (Zone of Better Residences)

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र (Commuter’s Zone)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

         नगर के केन्द्र में प्रथम पेटी के रूप में केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र स्थित होता है। यह नगर का हृदय क्षेत्र होता है। यह नगर के वाणिज्य, व्यापार और यातायात का केन्द्र होता है। गगनचुम्बी इमारतें, प्रमुख शोरूम, एम्पोरियम, थिएटर, होटल, नाचघर, क्लब एवं वाणिज्यिक संस्थानों के कार्यालय इसी क्षेत्र में स्थित होते हैं। इसका अधिकांश भाग गैर-आवासीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है।

      शिकागो में इस भाग को लूप (Loop), न्यूयार्क में डाउन टाउन (Down Town) तथा पिट्सबर्ग में गोल्डन टेम्पल (Golden Temple) कहते हैं। बर्गेस ने केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र को भी दो भागों में बांटा है- पहला क्षेत्र केन्द्र में स्थित खुदरा व्यापार क्षेत्र है जो कि वृत्ताकार होता है, दूसरा इसके चारों ओर बाहर की ओर स्थित थोक व्यापार क्षेत्र होता है।

2. संक्रमण क्षेत्र:-

        यह क्षेत्र केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। इसमें व्यापारिक, औद्योगिक और आवासीय उपयोग के क्षेत्र पाए जाते हैं अतः इसे संक्रमण क्षेत्र कहते हैं। इसके आन्तरिक भाग में व्यापारिक संस्थान एवं हल्के विनिर्माण उद्योग का क्षेत्र होता है, तो बाहर की ओर आवासीय क्षेत्र होता है। इसमें अधिकांश भवन पुराने, छोटे एवं गन्दे होते हैं तथा कुछ भागों में गन्दी बस्तियां (Slum) भी होती हैं।

      इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश लोगों का सामाजिक स्तर निम्न होता है। यह क्षेत्र अधिकांशतः आप्रवासियों द्वारा आवासित होता है।

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र:-

          संक्रमण क्षेत्र को घेरे हुए कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र होता है। इसमें औद्योगिक श्रमिकों की संख्या अधिक होती है। ये लोग संक्रमण क्षेत्र में तो रहना पसन्द नहीं करते हैं, लेकिन अपने कार्यस्थल की समीपता को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में रहते हैं अर्थात् इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोग संक्रमण क्षेत्र से ही इस क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र में दूसरी पीढ़ी के आप्रवासी लोगों की संख्या अधिक पाई जाती है। शिकागो में यह क्षेत्र दो मंजिलें भवनों वाला है।

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र:-

       बेहतर आवासीय भवनों अथवा मध्यम या उच्च-मध्यम श्रेणी के लोगों का यह निवास क्षेत्र कार्यशील लोगों के घरों के क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। यह एक उपनगरीय क्षेत्र जैसा होता है। अधिकांश व्यक्ति व्यावसायिक कार्यों में संलग्न होते हैं। इस क्षेत्र में होटल, एक परिवार वाले आवासीय भवन तथा उच्च श्रेणी के फ्लेट वाले भवन मिलते हैं। सभी भवनों में पर्याप्त खुला क्षेत्र होता है।

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र:-

       नगर की बाह्य सीमा पर तीव्र यातायात सुविधाओं के कारण उपनगरीय क्षेत्रों तथा अनुषंगी नगरों का एक क्षेत्र बन जाता है। इसमें उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र नियमित न होकर बिखरे हुए रूप में होते हैं। यह क्षेत्र नगर के आवासीय क्षेत्रों से हरित पट्टी (Green Belt) द्वारा पृथक् होता है। यह पूर्ववर्ती गाँवों का ही क्षेत्र होता है जो कार्यात्मक दृष्टि से नगरीय विशेषताओं से युक्त होता है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश व्यक्ति दिन में काम करने के लिए केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र में जाते हैं तथा रात्रि में पुनः यहां लौट आते हैं अतः इन्हें शयन नगर (Bed-Room Town) भी कहते हैं।

आलोचना

        बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की कुछ सामान्य विशेषताएं शिकागो तथा कुछ अन्य नगरों (भारतीय नगरों में मुजफ्फरपुर का नगर संकेन्द्रित सिद्धान्त के अनुरूप है) में पाई गईं जो कि सिद्धान्त को पुष्ट करती हैं, किन्तु कई विद्वानों ने अधिकांश नगरों पर सिद्धान्त लागू न होने के कारण इसकी आलोचना की है। सिद्धान्त में रही कमियों को आलोचना के रूप में स्पष्ट किया गया है। ये कमियां निम्नलिखित हैं :

(i) एक मात्र संक्रमण क्षेत्र में स्थित कुछ हल्के उद्योगों के अतिरिक्त संकेन्द्रित सिद्धान्त में किसी भी क्षेत्र में उद्योगों एवं औद्योगिक पेटी की स्थिति नहीं बताई गई है। आशय यह है कि औद्योगिक क्रियाकलाप किसी भी पेटी में मिल सकते हैं।

(ii) केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र गोलाकार न होकर प्रायः अनियमित या आयताकार अधिक होता है। आर. ई. डिकिन्सन ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पेरिस, आदि नगर वृत्ताकार प्रतिरूप नहीं रखते हैं। इसी प्रकार थोक व्यापार क्षेत्र कुछ मात्रा में ही केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के किनारे पर मिलते हैं। अधिकांशतः इनकी स्थिति रेलमार्गों के निकट होती है।

(iii) नगर में खुदरा व्यापार का एकमात्र क्षेत्र ही नहीं होता है बल्कि नगर के विस्तार एवं तीव्र परिवहन साधनों के कारण अन्यत्र भी छोटे-छोटे व्यापारिक केन्द्र विकसित हो जाते हैं।

(iv) निम्न आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र एवं गन्दी बस्तियां भी मात्र संक्रमण क्षेत्र में केन्द्रित न होकर नगर के विभिन्न भागों जैसे- औद्योगिक इकाइयों एवं रेलमार्गों के निकट अधिक पाई जाती हैं।

(v) भूमि उपयोग स्वरूप के निर्धारण में परिवहन मार्गों की भूमिका की सिद्धान्त में उपेक्षा की गई है। नगर से निकलने वाली मुख्य सड़कों के किनारे विकसित हुए व्यापार तथा उसके साथ बढ़ते हुए भूमि मूल्यों को बर्गेस ने अपने सिद्धान्त में कोई स्थान नहीं दिया है।

(vi) नगर के बहिवर्ती भाग में जनसंख्या का जमाव प्रमुख मार्गों के सहारे होता है फलतः नगर का आकार संकेन्द्रित न होकर तारानुमा होता है।

(vii) धरातलीय अवरोधों के कारण संकेन्द्रित क्षेत्रों के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। बर्गेस का सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की दशाओं पर आधारित है तथा आदर्श दशाओं के अन्तर्गत ही लागू होता है।

         अतः इस सिद्धान्त को अत्यधिक सामान्यीकृत रूप में ही देखा जाना चाहिए। तीव्र परिवहन साधनों का विकास एवं नगरों में पुनर्विकास जैसी योजनाओं के कारण भी नगरों के भूमि उपयोग स्वरूप में अत्यधिक परिवर्तन आया है। अत्यधिक आलोचना के उपरान्त भी नगरों की आन्तरिक संरचना के सम्बन्ध में प्रथम सिद्धान्त होने के कारण इसका अपना महत्व है।

प्रश्न प्रारूप 

1. नग की आकारिकी अथवा सामान्य संचना के संबंध में प्रतिपादित सकेंद्रित क्षेत्र/पेटी सिद्धांत (Concentric Zone Theory) की विवेचना कीजिये।

29. Minerals (खनिज) तथा खनिजों और चट्टानों के बीच अंतर

29. Minerals (खनिज)



खनिजMinerals

          खनिज निश्चित अनुपात में रासायनिक एवं भौतिक विशिष्टताओं के साथ निर्मित एक प्राकृतिक पदार्थ है। दूसरे शब्दों में, खनिज निश्चित रासायनिक संयोजन एवं विशिष्ट आंतरिक परमाणविक रचना वाले ठोस प्राकृतिक पदार्थ को कहा जाता है। संक्षेप में खान से निकाले गए पदार्थ को खनिज कहते है। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, सोना, लौह अयस्क, अभ्रक, जिप्सम इत्यादि।

        इस प्रकार पृथ्वी में खनिज घटक शामिल हैं जो या तो अकेले या अनेकों प्रकार के संयोजनों में मौजूद हैं जिन्हें यौगिक कहा जाता है। एक खनिज एक परमाणु या अणु से बना होता है जो प्राकृतिक रूप से पाया जाता है एवं इसकी एक विशिष्ट रासायनिक संरचना व संगठित परमाणु संरचना होती है।

खनिजों की विशेषताएँ-
⇒ खनिजों का वितरण असमान होता है। 
⇒ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
⇒ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है। 
खनिजों के प्रकार
         खनिज मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
(i) धात्विक खनिज- 
          वैसे खनिज जिसमें धातु होती है, उसे धात्विक खनिज कहा जाता है। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल, मैंगनीज आदि। पुनः इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है
(क) लौहयुक्त खनिज- 
            जिन धात्विक खनिज में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है उसे लौहयुक्त खनिज कहते हैं, जैसे- लौह अयस्क, निकेल, टंगस्टन।
(ख) अलौहयुक्त खनिज-
           जिन धात्विक खनिज में लोहे की मात्रा न्यून होती है या नहीं होती है, अलौहयुक्त खनिज कहलाते हैं। जैसे- सोना, चाँदी, शीशा, बॉक्साइट ताँबा।
(ii) अधात्विक खनिज-
            वैसे खनिज जिसमें धातु की  मात्रा  नहीं होती है उसे  अधात्विक खनिज कहते है। जैसे-चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम आदि। अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-
(क) कार्बनिक खनिज-
         इसमें जीवाश्म होते हैं, ये पृथ्वी में दबे प्राणी, पादप जीवों के परिवर्तन से बनते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि।
(ख) अकार्बनिक खनिज-
           इसमें जीवाश्म नहीं होते हैं। जैसे- अभ्रक, ग्रेफाइट।
खनिजों के संरक्षण के उपाय:-
     खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है, किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-
(i) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण, 
(ii) उनका बचतपूर्वक उपयोग एवं
(iii) कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

        खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्ण उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। अगर खनिजों के संक्षण के साथ-साथ प्रबंधन प ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।

धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच अंतर एवं तुलना

         धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर एवं तुलना किया जा सकता है:-

धात्विक अधात्विक
1. धात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ होती हैं। अधात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ नहीं होती है।
2. ये कठोर एवं चमकदार होते हैं। ये चमकदार नहीं होते हैं।
3. ये आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं। ये तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।
4. धात्विक खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त की जा सकती है। इन खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त नहीं की जा सकती है।
5. ये खनिज लचीले होते हैं। ये खनिज लचीले और भंगुर नहीं होते हैं।
6. धात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के अच्छे संवाहक होते हैं। अधात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के कुचालक होते हैं।
7. इन खनिजों का गलनांक उच्च होता है। इन खनिजों का गलनांक बहुत कम होता है।
8. लोहा, एल्युमीनियम, सोना, चाँदी आदि के अयस्क धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं। हीरा, स्लेट, पोटाश आदि गैर-धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं।
9. इन्हें पीटकर तार बनाया जा सकता है। ये पीटने पर टूटते नहीं हैं। ये पीटने पर चूर-चूर हो जाते हैं।
10. इन्हें खानों से निकालने के बाद साफ करने की आवश्यकता होती है। इन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती है।
11. ये प्रायः अयस्क (ore) के रूप में पाए जाते है। ये अयस्क के रूप में नहीं पाए जाते हैं

♣ चट्टानों और खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर है-

क्र.सं. चट्टानों खनिजों
1. चट्टानों को उस ठोस द्रव्यमान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो भौगोलिक सामग्रियों से बना होता है। दूसरी ओर, खनिजों को अकार्बनिक रासायनिक यौगिकों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से बनते हैं।
2. चट्टानें खनिजों से बनी होती हैं। खनिज चट्टानों से नहीं बनते।
3. चट्टानें अपनी बनावट में एक समान नहीं होती हैं। खनिज अपनी बनावट में एक समान होते हैं।
4. जेडाइट, रेड बेरिल, ब्लैक ओपल, मसग्रेवाइट आदि चट्टानें कुछ दुर्लभ चट्टानें हैं। पेनाइट एक दुर्लभ खनिज है।
5. चट्टानें सूक्ष्म अर्थात् प्रकृति में छोटी होती हैं। खनिज सूक्ष्मदर्शी नहीं होते और इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
6. पृथ्वी पर चट्टानें ठोस रूप में मौजूद हैं। खनिज पदार्थ पृथ्वी पर खनिज भंडार के रूप में मौजूद हैं।
7. चट्टानों की एक परमाणु संरचना होती है। खनिजों में क्रिस्टलीय और रासायनिक संरचना होती है।
8. चट्टानों का उपयोग सड़क, भवन आदि निर्माण कार्यों के लिए किया जाता है। खनिजों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों जैसे प्रौद्योगिकी, फैशन, निर्माण आदि के लिए किया जाता है।
9. चट्टानों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ चट्टानों

⇒ आकार

⇒ रंग

⇒ आभा

⇒ नमूना

⇒ बनावट

खनिजों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ रंग

⇒ क्रिस्टल

⇒ कठोरता

⇒ भंग

⇒ तप

⇒ गुरुत्वाकर्षण

10. चट्टानों का कोई निश्चित आकार या रंग नहीं होता है। खनिजों का एक निश्चित रंग और आकार होता है।
11. उदाहरण:-

⇒ रेत

⇒ कंकड़

⇒ टुकड़े टुकड़े

⇒ गोले

उदाहरण:-

⇒ जीवाश्म ईंधन

⇒ कोयला

⇒ पेट्रोलियम


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7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन

7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन



      आन्तरिक प्रवास 

      आन्तरिक प्रवास एक राष्ट्र के भीतर स्थान परिवर्तन करने को कहते हैं। इसमें जनसंख्या अपने राष्ट्र की राजनीतिक सीमा को पार नहीं करती है, बल्कि वह अपने मूल स्थान से अन्य सुविधाजनक या इच्छित स्थान पर रहने लगती है, तो ऐसा प्रवास आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

प्रो. डोनाल्ड बोग के अनुसार, “जब कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सीमाओं के अन्तर्गत अपने मूल निवास को छोड़कर दूसरे स्थान पर रहने लगता है, तो ऐसे प्रवास को आन्तरिक प्रवास कहते हैं। यह अन्तर्गमन अन्तर्प्रवास या अन्तर-देशान्तरण (In-migration) कहलाता है।

आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS AFFECTING THE INTERNAL MIGRATION)

        आन्तरिक प्रवास प्रमुखतया आन्तरिक विषमताओं का परिणाम होता है। जब किसी राष्ट्र में आर्थिक स्तर पर असमानताएँ, भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों में भिन्नता स्थापित हो जाती हैं, तो आन्तरिक प्रवास को प्रोत्साहन मिलने लगता है। लोगों की आर्थिक व सामाजिक दशा प्रवास की यात्रा व दिशा को प्रभावित करती है। आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक महत्वपूर्ण है:

1. भूमि पर जनसंख्या का असामान्य दबाव (Abnormal pressure of population on land):-

       देश के जिन भागों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव होता है, तो उन क्षेत्रों के निवासी ऐसे क्षेत्रों में जाकर बसना पसन्द करते हैं, जहाँ जनसंख्या का कम दबाव हो तथा भूमि उत्पादन के लिए सुलभ हो। जहाँ भूमि सुधार की सम्भावना हो, लोग वहाँ जाकर रहने लगते हैं।

2. भूमि मूल्य (Land value):-

       जिन भागों में भूमि का मूल्य इतना अधिक हो जाए, कि वह लोगों की वहन शक्ति से अधिक हो जाए तो ऐसी दशा में लोग सस्ती भूमि वाले भू-भागों की ओर प्रवास कर जाते हैं। नगर के भीतरी भाग में जब रिहाइशी भूमि का मूल्य लोगों की क्रय शक्ति के बाहर हो जाता है, तो लोग नगर के बाहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

3. सामाजिक परिस्थितियां एवं जाति, धर्म संपर्क (Social conditions and caste, religion conflict):-

       देश के वह भाग जहाँ छुआछूत, वर्ग संघर्ष, जाति संघर्ष, धार्मिक भिन्नता, व्यक्तिगत दुश्मनी, आदि बुराइयों के कारण लोगों का रहना कठिन हो जाता है तो यहाँ से लोग उन क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं जहाँ यह नफरत करने वाली सामाजिक बुराइयाँ नही होती अथवा इन सामाजिक बुराइयों का प्रभाव बहुत कम होता है। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग ग्रामीण रूढ़िवादिता के कारण नगरों में जाकर बस जाते हैं।

4. पारिवारिक व्यवस्था (Family system):-

        जब परिवार बड़े-बड़े हो जाते हैं तथा उनका एक स्थान पर मिलकर रहना सम्भव नहीं होता है, तब परिवार के कुछ लोग अन्य स्थानों पर रहना प्रारम्भ कर देते हैं। वर्तमान समय में बड़े ग्रामीण परिवारों के वह लोग जो शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने के लिए नगरों में जाते हैं, वहीं जाकर बस जाते हैं। पारिवारिक कलह के कारण भी बड़े-बड़े परिवार टुकड़ों में बंट जाते हैं तथा परिवार के कुछ लोग अन्यत्र जाकर बस जाते हैं।

5. विवाह (Marriage):-

        भारतीय समाज में विवाह आन्तरिक प्रवास का एक प्रबल कारक है। विवाह के बाद लड़की को लड़के के पैतृक निवास स्थान पर रहना पड़ता है, अतः लड़कियाँ निश्चित तौर पर विवाह के बाद पैतृक निवास स्थान को छोड़कर अपने पति के घर पर जाकर रहने लगती हैं, तो ऐसा प्रवास भी आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

6. ऋणग्रस्तता एवं निम्न आर्थिक स्तर (Indebtness and low economic standard):-

       जिन ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ कम होती हैं, लोगों पर ऋण काफी अधिक हो जाता है, रोजगार में स्थायित्व नहीं होता है, तो ऐसे लोग आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्रों में जाकर बस जाते हैं। ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों से नगरों की ओर पलायन इसी प्रवास का परिणाम है।

7. औद्योगिक नगरों का स्थापन (Establishment of industrial towns):-

        नई-नई औद्योगिक इकाइयों के स्थापन के कारण, जहाँ एक ओर नगरों का विस्तार होने लगता है वहीं दूसरी ओर नए-नए नगर व उपनगर बस जाते हैं और लोग ऐसे स्थानों पर अन्य क्षेत्रों से आकर बसने लगते हैं। मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता के उपनगरों तथा नए-नए औद्योगिक नगरों के स्थापन जैसे मोदीपुरम्, रानीपुर के कारण लोग अन्यत्र स्थानों से आकर वहाँ रहने लगते हैं।

8. प्राकृतिक आपदाएं, मानव निवास की विपरीत परिस्थितियां बन जाना:-

      आँधी, तूफान, भूकम्प, ज्वालामुखी का फटना, सूखा पड़ जाना, अति वृष्टि के कारण बाढ़ आ जाना, आदि प्राकृतिक आपदाएँ लोगों को अन्यत्र बसने को मजबूर कर देती है। यह स्थान मानव निवास के अनुकूल नहीं रह पाते है और लोग सुरक्षित स्थानों में जाकर बसना पसन्द करते हैं। मई 2000 में गुजरात में सूखे के प्रभाव से लोगों को अपने स्थानों को छोड़ना पड़ा।

आन्तरिक प्रवास के प्रकार (TYPES OF INTERNAL MIGRATION)

       भारत में होने वाले आन्तरिक प्रवास को आधार मानकर इसको छः प्रकारों में रखा जा सकता है:-

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास (Inter state migration)

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास (Migration from rural to rural)

3. ग्राम से नगर को प्रवास (Migration from rural to urban)

4. नगर से नगर को प्रवास (Migration from urban to urban)

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास (Migration from urban to adjoining rural areas)

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास (Interrelated migration)

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास:-

        जब एक देश की सीमाओं के भीतर उस देश के नागरिक अपना राज्य छोड़कर अन्य किसी राज्य में रोजगार, सुरक्षा या विवाद सम्बन्धी कारणों से जाकर बस जाते हैं तो ऐसा प्रवास अन्तर्राज्यीय प्रवास कहलाता है। राजस्थान से अनेक मारवाड़ी परिवार व्यापार के कारण पश्चिम बंगाल और असम में जाकर बस गए। यह इस प्रवास का एक उदाहरण है।

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास:-

        ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रवास वर्तमान में काफी महत्व रखता है। छोटे-छोटे गांवों से लोग अपने निकट के उन गांवों, जो केन्द्रीय सुविधाजनक स्थिति होने के कारण अनेक प्रकार की सेवाएँ व सुविधाएँ एकत्रित कर लेते हैं, आकर रहने लग जाते हैं। धीरे-धीरे यह गाँव ग्रामीण सेवा केन्द्र का रूप ले लेते हैं। भारत के ग्रामीण भूदृश्य पर ऐसे केन्द्रों का तेजी से विकास हो रहा है।

3. ग्राम से नगर को प्रवास:-

      वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण घटना नगरीकरण है, जिसका एक कारण ग्रामीण जनसंख्या का रोजगार की सुविधा तथा जीवनोपयोगी सेवाओं का लाभ मिलने की वजह से नगरों में आकर बसना है। वर्तमान में देश के बड़े-बड़े बृहत् महानगरों में जनसंख्या की आकार वृद्धि में इस तरह के प्रवास का महत्वपूर्ण योगदान है।

4. नगर से नगर को प्रवास:-

        भारत के कुल आन्तरिक प्रवास में नगर से नगर की ओर प्रवास का योगदान लगभग 12% रहता है। इस प्रकार का प्रवास प्रायः छोटे नगरों से बड़े नगरों की ओर होता है। लोग बड़े-बड़े नगरों में नौकरी, व्यापार, प्रशासकीय कार्यालयों की सुविधा, आदि के कारण, वहाँ आकर बस जाते हैं। दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई जैसे महानगरों में लोग अनेक छोटे-छोटे नगरों से आकर बस गए हैं। चण्डीगढ़ नगर इसी प्रकार के प्रवास का उदाहरण है। यहाँ की सारी जनसंख्या आन्तरिक प्रवास के फलस्वरूप बसी है। अनेक समीपवर्ती नगरों से लोग यहाँ आकर बस गए।

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास:-

     नगरों में जब जनसंख्या इतनी बढ़ जाती है कि लोगों का वहाँ रहना दूभर हो जाता है, क्योंकि वहाँ पर्यावरण का प्रदूषित होना, भूमि व मकानों की कीमतों में भारी वृद्धि होना, आदि समस्याएँ पनप जाती हैं। जिनके कारण नगर के लोग नगर की बाहरी सीमा पर स्थित ग्रामीण क्षेत्र के खुले वातावरण में रहना पसन्द करते हैं। यह क्षेत्र नगर के समीप भी होते हैं तथा समस्या रहित होते हैं। लोग यहाँ भूमि सस्ती होने के कारण मकान बनाकर रहने लगते हैं। धीरे-धीरे ऐसे मकानों का समूह एक उपनगर का रूप ले लेता है और समय के साथ नगर का अंग बन जाता है।

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास:-

        जब एक व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र से नगर में जाकर बस जाता है तो वह अपने आश्रितों को अपने पास बुला लेता है। यह आश्रित तथा उसके परिवार से सम्बन्धित सभी सदस्य नगर में शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, परिवहन, मनोरंजन, आदि की सुविधा के कारण वहाँ रहने लगते हैं, तो ऐसे प्रवास को सम्बद्धताजन्य प्रवास कहते हैं।

      भारत में कृषि के विकास ने कृषक परिवारों में इस प्रकार की भावना उत्पन्न कर दी है कि उनके एक परिवार का मुखिया नगर में मकान बनाकर रहने लगता है तथा अन्य मुखिए गाँव में खेती का कार्य देखते हैं। इन सब मुखियों के आश्रित नगर में उपरोक्त आकर्षण के कारण रहने लगते हैं। इस प्रका के प्रवास का प्रचलन वर्तमान में तीव्र गति के साथ बढ़ हा है।

28. Representation of Relief

28. Representation of Relief



        किसी भी धरातल या स्थान का उच्चावच (Terrain या relief) उस धरातल की ऊँचाई-निचाई से बनने वाले प्रतिरूप या आकार को कहते हैं। क्षेत्रीय स्तर पर उच्चावच भू-आकृतिक प्रदेशों के रूप में व्यक्त होता है और छोटे स्तर पर यह एक स्थलरूप या स्थलरूपों के एक संयुक्त समूह का प्रतिनिधित्व करता है।

    विभिन्न ढालों की समोच्च रेखाएँ एवं अनुप्रस्थ काट या पार्शिवका बनाने की विधियों के बाद यहाँ कुछ स्थल रूपों की सरलीकृत आकृतियों की समोच्च रेखाएँ बनायी जाती है।

ढाल के प्रकार:

     ढालों को मुख्यतः धीमा/मंद, तीव्र/खड़ा, अवतल, उत्तल, सम एवं विषम भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के ढालों की समोच्च रेखा एक विशिष्ट अंतराल की पद्धति को दर्शाता है। ढाल को डिग्री या कोण में भी व्यक्त किया जाता है।

(i) धीमा/मंद ढाल :

    जब किसी स्थलाकृति के ढाल की डिग्री या कोण बहुत कम होता है, तब ढाल मंद होता है। इस प्रकार की ढालों की समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी बहुत अधिक होती हैं।

Representation of Relief

(ii) तीव्र/खड़ी ढाल :

      जब किसी स्थलाकृति के ढाल का कोण अधिक होता है, तो इनकी समोच्च रेखाओं के बीच की आपसी दूरी बहुत कम होती है. तथा ये खड़ी ढाल को इंगित करते हैं।

(iii) अवतल/नतोदर ढाल:-

          जब उच्चावच स्थलाकृति का निचला भाग मंद ढाल वाला एवं ऊपरी भाग खड़े ढाल वाला हो, तो उसे अवतल ढाल कहा जाता है। इस प्रकार के ढाल में समोच्च रेखाएँ निचले भाग में दूर-दूर तथा ऊपरी भाग में पास-पास होती हैं।

(iv) उत्तल/उन्नतोदर ढाल:-

        अवतल ढाल के विपरीत, उत्तल ढाल का ऊपरी भाग मंद एवं निचला भाग खड़ा होता है। इसके परिणामस्वरूप ऊपरी भाग में समोच्च रेखाएँ दूर-दूर तथा निचले भाग में पास-पास होती हैं।

(v) सम ढाल और (vi) विषम ढाल:-

          दोनों ही ढालों में से प्रत्येक धीमा या तेज कोई भी हो सकते हैं। दोनों की समोच्च रेखाओं में केवल इतना ही अन्तर है कि प्रथम में समोच्च रेखाएँ समान दूरी पर होती है, जबकि द्वितीय में इनकी दूरी का क्रम सर्वत्र असमान रहता है। विषम ढाल में एक साथ तेज एवं धीमा दोनों ही ढाल बिना किसी क्रम के दर्शाये जा सकते हैं, जबकि सम ढाल में ढाल का क्रम सर्वत्र प्राय: एक-सा रहता है।

(vii) सीढ़ीनुमा ढाल:-

          ऐसे ढाल में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सीढ़ियों की तरह प्रवणता बढ़ने से समोच्च रेखाएँ बीच-बीच में समीप आ जाती है। नदी व हिमानी की घाटी में ऐसा ढाल पाया जाता है।

स्थ्लाकृतियों के प्रकार

1. शंक्वाकार पहाड़ी (Conical Hill):-

       समुद्र से 600 मी० ऊँचे खण्ड को पहाड़ी कहते हैं। इनकी समोच्च रेखा बन्द होती है। सभी दशाओं में शंक्वाकार पहाड़ी का ढाल समान होता है, इन रेखाओं की दूरी समान होती है। एक शंक्वाकार पहाड़ी, उसकी समोच्च रेखाएँ एवं विभिन्न ऊँचाई पर घिरे धरातल को दर्शाया गया है। सभी ओर ढाल समान होने से समोच्च रेखाएँ प्रायः वृत्ताकार बनी है। पहाड़ी के शिखर की ऊँचाई मध्य में बिन्दु या त्रिकोण बनाकर भी अंकित की जा सकती है।

       शंक्वाकार पहाड़ियों की भाँति ही अन्य पहाड़ियों की समोच्च आकृति खींची जाती है। पहाड़ी के जिस भाग में ढाल तेज होगा, वहाँ समोच्च रेखाएँ पास-पास एवं ढाल धीमा होने पर दूर-दूर खींची जाती है। चित्र में एक विषम ढाल वाली पहाड़ी का समोच्च रेखाचित्र बनाया गया है। यहाँ चित्र में पहाड़ियों के साथ-साथ उनका अनुप्रस्थ काट (Cross Section) भी स्पष्टता के लिये खींच दिया गया है-

विभिन्न ढाल वाली एक पहाड़ी

2. पठार:-

         एक विस्तृत चपटा उठा हुआ भूभाग, जिसकी ढाल अपेक्षाकृत पार्श्वो पर खड़ी होती है तथा जो आसपास के मैदान या समुद्र से ऊँची उठी होती है, पठार कहलाती है। पठारों को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ सामान्यतः किनारों पर पास-पास तथा भीतर की ओर दूर होती हैं। मध्यवर्ती भाग समोच्च रेखाओं रहित होता है।

3. जलप्रपात:-

        किसी नदी तल पर काफी ऊंचाई से पानी का अचानक उर्ध्वाधर गिरना जलप्रपात कहलाता है। कभी-कभी जलप्रपात सोपानी धारा के रूप में गिरता है, जिसे रैपिड कहा जाता है। मानचित्र पर नदी को पार करती हुई समोच्च रेखाओं के परस्पर मिल जाने से जलप्रपात को पहचाना जा सकता है तथा रैपिड को अपेक्षाकृत दूर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा।

4. भृगु:-

         यह अत्यधिक तीव्र या  खड़े पार्श्वो वाली भू-आकृति है। मानचित्र पर भृगु की पहचान पास-पास बनी समोच्च रेखाओं से की जाती है, जो आपस में जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।

5. V-आकार की घाटी:-

      यह ‘V’ अक्षर की तरह दिखाई देती है। V-आकार की घाटी पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है। V-आकार की घाटी का निचला भाग भीतरी समोच्च रेखाओं के द्वारा दिखाया जाता है, जो पास-पास स्थित होते हैं तथा जिनके समोच्च का मान कम होता है। बाहर की ओर स्थित समोच्च रेखाओं का मान एकसमान रूप से बढ़ता है।

6. U-आकार की घाटी:-

          ऊँचाई पर स्थित हिमानियों के पार्श्व अपरदन के कारण इस प्रकार की घाटी का निर्माण होता है। इसका निचला तल चौड़ा एवं चपटा तथा किनारे खड़े होते हैं, जिसके कारण इसका आकार ‘U’ अक्षर के समान प्रतीत होता है। U-आकार की घाटी के सबसे निचले हिस्से को सबसे भीतर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है तथा इसके दोनों किनारों के बीच का अंतर अधिक होता है। बाहर की ओर स्थित दूसरी समोच्च रेखाओं के लिए एकसमान अंतराल के साथ समोच्च रेखाओं का मान बढ़ता जाता है।

7. महाखड्ड (गार्ज):-

     उच्च भागों में, जहाँ नदियों के द्वारा पार्श्व अपरदन की अपेक्षा ऊर्ध्वाधर अपरदन की क्रिया तीव्र होती है, वहाँ तंग घाटी का निर्माण होता है। ये गहरी तथा संकरी नदी घाटियाँ होती हैं, जिनके दोनों किनारों का हाल बहुत तीव्र होता है। तंग घाटी को पास पास स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसमें भीतरी समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत कम होता है, जो इसके दोनों किनारे को दिखाता है।

8. पर्वतस्कंध:-

       पर्वत श्रृंखलाओं से घाटी की ओर की झुकी हुई उत्तल ढाल वाली आकृति को स्पर या पर्वतस्कंध कहा जाता है। इसे V आकार की समोच्च रेखा के द्वारा दर्शाया जाता है लेकिन विपरीत तरीके से V के दोनों किनारे ऊँचाई वाले भा को दिखाते हैं तथा इसकी चोटी निचले हिस्से को।


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