21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

(Poly or Multi Cycle Topography)



बहुचक्रीय स्थलाकृति

     बहुचक्रीय स्थलाकृति को पुनर्युवनित भूआकृति या नवोन्मेष के नाम से जानते हैं। इस शब्द का प्रथम प्रयोग डेविस महोदय ने किया था। प्रारंभ में उन्होंने एक चक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। लेकिन जब इनकी आलोचना होने लगी तो बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। डेविस ने बताया कि एक चक्रीय अपरदन चक्र वहीं पर चल सकता है। जहाँ पर:-

(i) समुद्र तल या आधारतल में लम्बी समय तक परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

(ii) भूसंचलन की क्रिया नहीं हो रहा हो।

(iii) जलवायु के दशाओं में परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

        तीनों ही कारकों का लम्बे समय तक स्थिर रहना असंभव है। वस्तुतः भूसंचलन या जलवायु परिवर्तन आने से आधारतल में परिवर्तन होने से पूर्व से चले आ रहे अपरदन चक्र की क्रिया बाधित होती है और नवीन अपरदन चक्र की क्रिया प्रारंभ होती है। नवीन अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है। इसलिए इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते हैं। छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में बहुचक्रीय स्थलाकृति का प्रमाण मिलता है।

         आधारतल में परिवर्तन लाने वाले कारकों को नवोन्मेष कहते हैं। नवोन्मेष के कारण कोई भी भूखण्ड का पुनरुत्थान होता है जिसे पुनर्युवनित कहते हैं। नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते हैं।

       किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन संभावना है-

(i) आन्तरिक क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) बाह्य क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) स्थैतिक नवोन्मेष

        आन्तरिक क्रिया के अन्तर्गत भूसंचलन को शामिल करते हैं। भूसंचलन के कारण भूखण्डों का पुनरुत्थान हो सकता है। जिससे नवीन अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

आतंरिक बल के कारण नवोन्मेष या गतिक नवोन्मेष

        बाह्य नवोन्मेष में जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों को शामिल करते हैं।

बाह्य क्रिया द्वारा नवोन्मेष या सुस्थैतिक नवोन्मेष

       कभी-2 बिना आधारतल में परिवर्तन के भी अपरदन की गति में परिवर्तन होता है। जैसे- अगर किसी कारणवश बहता हुआ जल में कंकड़-पत्थर, बालू, जैसे जलोढ़ पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है तो तलीय अपरदन एवं क्षैतिज अपरदन में वृद्धि हो जाती है जिसे स्थैतिक नवोन्मेष कहते हैं।

स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण:-

           किसी भौगोलिक प्रदेश में बहुचक्रीय स्लाथाकृतियों की पहचान 5 प्रकार के स्थलाकृतियों से करते हैं।

(1) निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिकाएं (River Terraces)

(3) अध: कर्ति विसर्प (INCISED OR ENTRENCHED MEANDERS)

(4) संगत शिखर

(5) अपरदन सतह

(1) निक प्वाइन्ट

         जब किसी नदी मार्ग का ऊपरी भाग उठ जाय या निचली भाग धँस जाय तो धँसान या उत्थान रेखा के सहारे तीव्र ढाल का विकास होता है। ऐसे तीव्र ढाल वाले रेखा को निक प्वाइन्ट कहते हैं। ऐसे ढाल पर नदी का पानी तेजी से नीचे गिरने लगता है जिससे जलप्रपात का निर्माण होता है।

उत्थान से निर्मित निक प्वाइंट

धंसान से निर्मित निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिका

         अगर नदी का अनुप्रस्थ काट लेते हैं तो नदी का किनारा सीढ़ी के समान दिखाई देता है।

जैसे:-

बहुचक्रीय स्थलाकृति

           जब नदी वृद्धावस्था के दौर से गुजरती है तो V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। लेकिन जब वृद्धावस्था के दौरान ही पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो तलीय अपरदन में वृद्धि से कम खुली हुई V-आकार की घाटी का निर्माण होता है। जिसके कारण घाटी के अन्दर घाटी का निर्माण होता है जिसे नदी वेदिका कहते हैं। जैसे- वोल्गा नदी और दामोदर नदी घाटी में।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प

        अन्तिम प्रौढ़ावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है जिसे विसर्प कहते है। जब पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो नदी के मोड़ पर तलीय अपरदन की वृद्धि से मोड़ पर घाटी के अन्दर मोड़ लेती हुई घाटी विकसित होती है। जिसे अध: कर्तिक विसर्प कहते हैं। जैसे- हजारीबाग के पठार पर दामोदर नदी कई अध: कर्तिक विसर्प का निर्माण की है।

(4) संगत शिखर

          अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे संगत शिखर कहते हैं। संगत शिखर का निर्माण अलग-2 काल में भूपटल के उत्थान एवं धँसान से होता है। दो संगत शिखर वाले पर्वतों के बीच में बहने वाली नदी घाटी संकरी होती है। इसका प्रमाण स्कॉटलैण्ड के स्कैन्डिनेवियन पर्वतीय क्षेत्र में देखा जा सकता है।

(5) अपरदन सतह

        डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अंतिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते हैं। जैसे-छोटानागपुर का पठार एक उत्थित समप्राय मैदान का उदाहरण है। इस पठार पर तीन बार हुए उत्थान का प्रमाण मिलता है। जिसके कारण पात का पठार, राँची का पठार, कोडरमा या हजारीबाग का पठार नामक अपरदन सतह का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष: पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है। 

नोट: 

नवोन्मेष / पुनर्युवन:- एक सक्रिय चक्र में बाधा उत्पन्न होने पर स्थलखण्ड पर नये चक्र का प्रारंभ होना नवोन्मेष पुनर्युवन कहलाता है।

बहुचक्रीय स्थलाकृति:- एक से अधिक अपरदन चक्रों द्वारा निर्मित स्थलाकृति को बहुचक्रीय स्थलाकृति कहा जाता है।

    नवोन्मेष तीन प्रकार के होते है:-

(i) गत्यात्मक नवोन्मेष, जैसे- स्थलखण्ड का उत्थान

(ii) सुस्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- साग तल का नीचा होना

(iii) स्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- नदी के बोझ में कमी, नदी अपहरण, अधिक वर्षा से नदी जल में वृद्धि होना।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




बहुचक्रीय स्थलाकृति

          जब नवीन अपरदन चक्र और पूर्व  के अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है तो उसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते है। इसका प्रमाण छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में मिलता है। बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत सर्वप्रथम डेविस महोदय ने दिया था।

           नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते है। इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति के नाम से भी जानते है।

नवोन्मेष के प्रकार 

             किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन प्रकार की संभावनाएँ होती है जिसे चित्रों द्वारा समझा जा सकता है-

(1) गतिक नवोन्मेष

(2) सुस्थैतिक नवोन्मेष

(3) स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण

(1) निक प्वाइंट-

            जिस तीव्र ढाल के सहारे नदी मार्ग का उत्थान या धंसान होता है, उसे निक प्वाइंट कहते है।

(2) नदी वेदिका-

            जब नदी के वृद्धा अवस्था में पुनरुत्थान होता है और इसके बाद घाटी के अन्दर घाटी घाटी का निर्माण होता है, जिसे नदी वेदिका कहते है।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प-

           अंतिम प्रौढावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है इस अवस्था में जब पुनरुत्थान होता है तो नदी विसर्प के अन्दर विसर्प का निर्माण करती है तो उसे अद्य: कर्तिक विसर्प कहते है।

(4) संगत शिखर-

            अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे सांगत शिखर कहते है।

(5) अपरदन सतह/ उत्थित समप्राय मैदान- 

              डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते है।

निष्कर्ष:

          उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष या पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है।



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20. Peneplain (समप्राय मैदान)

20. समप्राय मैदान (Peneplain)


समप्राय मैदान (Peneplain)⇒

           समप्राय मैदान (Peneplain) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिकी भूगोलवेत्ता डेविस ने किया था। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल अपरदन का प्रमुख दूत होता है। बहता हुआ जल अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में एक लगभग समतल मैदान का निर्माण करती है जिसे समप्राय मैदान कहते है। इस तरह डेविस ने स्पष्ट किया कि समप्राय मैदान के विकास के लिए भूमि का उत्थान और उस पर अपरदन चक्र का सक्रिय होना आवश्यक है। 

     पेंक के अनुसार अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में जो समप्राय मैदान विकसित होते हैं उसे इन्ड्रम्प और प्राइमारम्प कहते हैं। इन्ड्रम्प अपादन चक्र की अन्त में बनने वाला समप्राय मैदान है जबकि प्राइमारम्प उत्थान के पूर्व की अवस्था है।

       क्रीकमे महोदय ने समप्राय मैदान को परिभाषित करते हुए कहा यह एक ऐसा मैदान है जिसमें अपरदन एवं निक्षेपण दोनों कार्यों से निर्मित होता है। क्रीकमे ने अपनी संकल्पना सवाना प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया और इन्होंने समप्राय मैदान को पैनप्लेन (Panplain) से सम्बोधित किया।

        L.C. किंग महोदय ने बताया कि समतल मैदान के साथ जब कहीं कठोर चट्टानें मिलती हैं तो वैसे भूभाग को समप्राय मैदान कहते हैं। इनके अनुसार समप्राय मैदान का निर्माण केवल अपरदन से होता है। L.C. किंग ने समप्राय मैदान को पेडीप्लेन (Pediplain) से सम्बोधित किया है। इन्होंने अनी संकल्पना मरुस्थलीय क्षेत्र के संदर्भ में प्रस्तुत किया था।

Peneplainसमप्राय मैदान की विशेषताएँ:-

(1) यह लगभग समतल मैदान होता है।

(2) V- आकार की घाटी अत्यन्त खुली हुई होती है।

(3) उच्चावच अत्यन्त न्यून होता है।

(4) जलविभाजक के स्थान पर कठोर चट्टानें लम्बवत दिखाई देती हैं जिसे डेविस ने मोनैडनॉक और पेंक एवं L.C. किंग ने इन्सेलबर्ग से सम्बोधित किया है।

(5) समप्राय मैदान में बहने वाली मुख नदी अपने आधार तल को प्राप्त कर होती है। जबकि पेंक के अनुसार इन्ड्रम्प सम्प्राय मैदान में मुख नदी और प्राइमारम्प अवस्था में मुख्य नदी के साथ-2 सहायक नदियाँ भी अपने आधारतल को प्राप्त कर लेती है।

समप्राय मैदान के प्रकार:-

          समप्राय मैदान चार प्रकार के होते हैं।

(1) स्थानीय समप्राय मैदान- प्रमाण नहीं

(2) प्रादेशिक समप्राय मैदान- प्रमाण नहीं

(3) उत्थित समप्राय मैदान- छोटानागपुर का पठार, स्कैण्डेनेवियन का पठार

(4) अध्यारोपित समप्राय मैदान- SHEMAN क्षेत्र (USA)

          अंतिम दो समप्राप्त मैदान का प्रमाण मिलता है। लेकिन, प्रथम दो का प्रमाण नहीं मिला है। छोटानागपुर का पठार और स्कैण्डेनेविय‌न पठार उत्थित समप्राय मैदान के उदाहरण है जबकि USA के वायोमिंग राज्य में स्थित SHEMAN क्षेत्र अध्यारोपित समप्राय मैदान का उदाहरण है।

           चूँकि स्थानीय और प्रादेशिक समप्राय मैदान का प्रमाण नहीं मिलता है। इसलिए समप्राय मैदान की संकल्पना की कटु आलोचना की जाती है। स्थलाकृतिक वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक कोरी कल्पना है। लेकिन डेविस महोदय ने कहा कि यदि समुद्रत लम्बी अवधि तक स्थिर हो तो स्थानीय प्रादेशिक समप्राय मैदान भी विकसित होंगें। वर्तमान में समुद्रतल की आयु 5½ हजार वर्ष है। इतने कम समय में समप्राय मैदान का विकास संभव नहीं है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद अपदन की प्रवृत्ति यह इशारा करती है कि अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में लगभग समतल मैदान या समप्राय मैदान का विकास होता है।


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8. Sea Floor Spreading Theory / सागर नितल प्रसार का सिद्धांत

8. Sea Floor Spreading Theory

(सागर नितल प्रसार का सिद्धांत)



Sea Floor Spreading Theory

          सागर नितल प्रसार सिद्धान्त 1960 ई०  में हैरीहेस महोदय के द्वारा प्रस्तुत किया गया था यह सिद्धान्त उन्होंने समुद्री नितल का 5 वर्षों तक अनुसंधान करने के बाद प्रस्तुत किया था। हैरिहेस से पहले ऑर्थर होम्स महोदय ने सागरीय नितल के प्रसार के संबंध में संभावना व्यक्त किया था इसके संबंध में कोई विशेष मत प्रकट नहीं किया।  कालांतर में जब प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त का आगमन हुआ तो उससे भी सागर नितल सिद्धान्त पर प्रकाश पड़ा।

                हैरिहेस महोदय ने अपना समुद्री नितल प्रसार सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर प्रस्तुत किया:-

1. हैरिहेस ने अपना सिद्धान्त तभी प्रस्तुत किया जब यह पूर्णत: स्पष्ट हो गया कि महासागरीय भूपटल की सामान्य मोटाई 6-7 KM और महाद्विपीय भूपटल की मोटाई 30-40 KM है । उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महासागरीय भूपटल का तात्पर्य बेसाल्टिक चट्टानों से है और महाद्विपीय भूपटल का तात्पर्य ग्रेनाइट चट्टानों से है।

2. सभी महासागरों में महासागरीय कटक पाये जाते है जो बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित हैं और  महासागरीय नितल मैदान से इसकी सामान्य ऊंचाई 2-3 KM है।

3. हैरिहेस ने अपना मत तभी प्रस्तुत किया जब यह ज्ञात हो गया कि महासागरीय भूपटल की चट्टानें महाद्विपीय भूपटल की तुलना में कम आयु के है । महाद्विपीय चट्टानों के अधिकतम आयु 4600 मिलियन वर्ष और महासागरीय भूपटल की आयु 160 मिलियन वर्ष अनुमानित की गयी।

            इन्हीं तीन मान्यताओं के आधार पर हैरिहेस महोदय ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हैरिहेस ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हुए कहा कि “समुद्र का नितल सतत प्रसार की अवस्था मे है”।

सिद्धांत की व्याख्या   

     हैरिहेस ने महासागरीय नितल प्रसार का केंद्र महासागरीय कटक को माना है उन्होंने ऑर्थर होम्स की संवहन तरंग सिद्धान्त को आधार मानते हुए यह विचार प्रस्तुत किया कि मध्य महासागरीय कटक के पास संवहन तरंग लम्बवत रूप से ऊपर उठती है और अपनी ऊर्जा का उत्सर्जन करती है। लम्बवत ऊर्जा उत्सर्जन के कारण ही ज्वालामुखी की क्रिया होती है और उसी ज्वालामुखी क्रिया से महासागरीय कटक का निर्माण होता है। पुनः उन्होंने यह भी बताया की लम्बवत रूप से निकलने वाली संवहन तरंग का कुछ भाग भू-पटल के नीचे ही क्षैतिज रूप से प्रवाहित होने लगती है। इन्ही क्षैतिज तरंगों के कारण भू-पटल दो दिशाओं में खिसकने लगती है। ज्यों-ज्यों भूपटल का खिसकाव बढ़ता जाता है त्यों-त्यों लावा उत्सर्जन की मात्रा बढ़ने लगती है। यह क्रिया सतत सक्रिय रहती है। अतः उन्होंने बताया कि प्रत्येक महासागरीय कटक के पास नवीन भू-पटल का निर्माण होता है और उसी के साथ समुद्री नितल का प्रसार भी होता है।

          हैरिहेस महोदय ने बताया कि जब समुद्र नितल के प्रसार हो रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि पृथ्वी के परिधि में भी वृद्धि हो रही है। वास्तव में महासागरीय कटक के सहारे जब नवीन भूपटल का निर्माण होता है तो महासागरीय भूपटल का दूसरा किनारा महाद्वीपीय भूपटल से अभिसरण करता है। महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक होने के कारण महाद्वीपीय भू-पटल में प्रविष्ट कर जाता और गहराई में जाकर पिघलने की प्रवृत्ति रखता है। अतः यह सम्भव है कि महाद्वीपीय भूपटल की तुलना में महासागरीय भूपटल नवीन चट्टानों से निर्मित है।

सिद्धान्त के पक्ष में प्रमाण

      समुद्री नितल प्रसार के संबंध में प्रस्तुत किये गए प्रमाणों को दो वर्गों में बांटते है।

(A) हैरीहेस के द्वारा एकत्रित किये गए प्रमाण

(B) 1960 ई०के बाद नवीन अनुसंधानों के द्वारा एकत्रित प्रमाण

(A) हैरीहेस के द्वारा एकत्रित किये गए प्रमाण

      हैरिहेस महोदय ने अपने परिकल्पना के समर्थन में कुल 9 प्रमाण एकत्रित किये है-

1.चाट्टानो की आयु से संबंधित प्रमाण:–

       हैरिहेस के अनुसार महासागरीय भू-पटल में महासागरीय कटक के पास सबसे कम आयु के चट्टान और जहाँ पर महासागरीय भूपटल महाद्वीपीय भूपटल में प्रविष्ट कर रहा है वहां पर अधिक उम्र के चट्टानें मिलती है। पुनः उन्होंने यह भी कहा कि ज्यों-ज्यों गर्त से कटक की ओर जाते है त्यों -त्यों चट्टानों की आयु में कमी होती जाती है।  ऐसा तभी सम्भव है जब समुद्री नितल का प्रसार हो रहा हो।

2. महासागरीय नितल पर Sea mount और गयॉट जैसी अवशिष्ट पहाड़ियां मिलती है। ये दोनों स्थलकृतियाँ बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित है। हैरिहेस के अनुसार ये अवशिष्ट पहाड़ियां कभी महासागरीय कटक के शिखर थे । लेकि प्रसार प्रक्रिया के कारण ये महासागरीय कटक से दूर हट गए है । यह तभी संभव है जब महासगरीय नितल का प्रसार हो रहा हो।

3. हैरिहेस महोदय ने अपने अनुसंधान में पाया कि महासागरीय नितल पर अनेक अंत: नितल दरार पाये जाते है। अमेरिका के कैलिफोर्निया तट से रूस के कमचटका प्रायद्वीप तक ऐसे लगभग 2 दर्जन दरारें है। इन्ही दरारों से मैग्मा पदार्थ बाहर निकलकर ज्वालामुखी द्वीपों का निम्न करती है। इन दरारों का निर्माण होना सागरीय नितल प्रसार के संबंध में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है।

4. महासागरीय नितल के किनारे महासागरीय गर्त का पाया जाना नितल प्रसार के पक्ष में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करता है। हैरिहेस के अनुसार समुद्री गर्तों का निर्माण प्लेटों के प्रत्यावर्तन से संभव है  और प्रत्यावर्तन तभी संभव है जब समुद्री नितल का प्रसार हो रहा हो।

5. तटीय वलित पर्वतों के निर्माण भी महासागरीय नितल प्रसार का महत्वपूर्ण प्रमाण है। वस्तुतः प्रसारित हो रहे समुद्री नितल के दबाव से ही महाद्वीपीय चट्टाने मुड़कर किनारों पर वलित पर्वत का निर्माण करते है।

6. पुरा-चुम्बकीय प्रमाण:-

      यह साबित हो चुका है कि प्रति तीन लाख वर्ष के बाद चुम्बकीय दिशा में परिवर्तन हो जाता है। ऐसा तभी सम्भव है जब भूपटल के गर्भ से मैग्मा पदार्थ बाहर निकल रहे हो । नवीन चट्टानों के निर्माण कर रहे हो और भूपटल एक दूसरे के सापेक्ष में प्रसारित हो रहे हो।

7. महासागरीय नितल और तटवर्ती क्षेत्रों में होने वाली विवर्तनिकी क्रियाएं भी महासागरिय नितल प्रसार की पुष्टि करते है। अभिसरण और अपसरण के क्षेत्र में ही अधिकांश भूकंप एवं ज्वालामुखी की क्रियाएँ होती है जो समुद्री नितल प्रसार की पुष्टि करते है। 

8. विभिन्न महाद्वीपों के विस्थापन तथा अनेक प्रवाली द्वीपों का विस्थापन भी नितल प्रसार को पुष्टि करता है।

9. महासागरीय मैदान के सतह पर परतदार चट्टान का न पाया जाना भी महासागरीय नितल का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

(B) 1960 ई०के बाद नवीन अनुसंधानों के द्वारा एकत्रित प्रमाण

             हैरिहेस महोदय सागर नितल प्रसार के संबंध में विशेष अनुसंधान कार्य किया था जिस पर प्रकाश डालने के लिए 1960 ई० के बाद कई और वैज्ञानिकों ने साक्ष्य इक्कठे किये। जैसे-

1. 1962 ई० में Mason(मासोन) महोदय ने प्रशांत महासागर के नितल का पुराचुम्बकीय अध्धयन किया जिसके आधार पर उन्होंने बताया कि प्रशांत महासागर कर नितल का प्रसार जारी है।

2. 1963 ई० में F.J. Vine और D.H. Mathus के द्वारा हिन्द महासागर का पुरचम्बकीय अध्ययन किया गया जिसके आधार पर उन्होंने बताया कि हिन्द महासागर में अवस्थित महासागरीय कटक के सहारे समुद्री नितल का प्रसार हो रहा है।

3. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है कि अपसरण सीमा के सहारे समुद्री नितल का प्रसारहो रहा है और अभिसरण सीमा के सहारे पुराने नितल का विनाश हो रहा है।

4. 1981 ई० में C.D. Ollier महोदय ने विवर्तनिकी एवं भूआकृति नामक पुस्तक लिखा जिसमें महासागरीय नितल प्रसार के संबंध में कई प्रमाण प्रस्तुत किये। जैसे- उन्होंने बताया कि अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड के बीच एक महासागरीय कटक है जहाँ महासागरीय नितल का फैलाव 6 मीटर प्रतिवर्ष के दर से हो रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि जुरासिक काल के पहले दो ही महासागर थे– प्रथम अटलांटिक महासागर दूसरा प्रशांत। हिन्द महासागर का निर्माण जुरासिक काल के बाद सागरीय नितल प्रसार के परिणामस्वरूप ही हुआ है।

5. 1968 ई० में Joides Report प्रस्तुत  किया गया जिसका पूरा नाम Joint Oceanography Institution  of Deep Earth  Shivling  इस अंनुसन्धान Report  ने समुद्र नितल के 84 स्थानों पर अनुसंधान का कार्य किया। अपने अनुसंधान कर्यों में इसने भी समर्थन किया कि समुद्र नितल का प्रसार हो रहा है।

6. 2003 में NASA  उत्तरी अमेरिका अनुसंधान के एक रिपोर्ट के द्वारा लाल सागर के मध्य बैसाल्टिक संरचना का अध्ययन किया गया जिससे यह साबित हुआ कि लाल सागर का प्रसार हो रहा है।

          अतः स्पष्ट है कि अधिकतम नवीन प्रमाण हैरिहेस के परिकल्पना की पुष्टि करते है लेकि अभी इससे जुड़ी हुई कई समस्याएं है जैसे– पहला सबसे बड़ी समस्या यह है कि महासागरीय नितल के ऊपर विशाल जल राशि मौजूद होने के वाबजूद कैसे संतुलित बना हुआ है। दूसरी आलोचना प्लेट विवर्तनिकी से संबंधित है जो कहता है समुद्री नितल का प्रसार नहीं हो रहा है बल्कि प्लेटो का विस्तार/प्रसार हो रहा है।

निष्कर्ष 

          इन आलोचना के वाबजूद साग नितल प्रसार सिद्धान्त को व्यापक मान्यता प्राप्त है। इस पर किया गया अनुसंधान कार्य भूगर्भशास्त्र में अनुसंधान हेतु सन्दर्भ बिन्दु का कार्य करता है।



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19. Applied Geomorphology / अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान

19. Applied Geomorphology

(अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान)


Applied Geomorphology 

अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान ⇒

1. परिचय
2. व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान की विषय वस्तु
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य
2.2 भू-आकृति विज्ञान तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट
2.3 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमिगत जल का अध्ययन
2.4 भू-आकृति विज्ञान तथा तटीय स्थलाकृति का अध्ययन
2.5 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमि उपयोग
2.6 भू-आकृति विज्ञान तथा पर्यावरण प्रबंधन
2.7 भू-आकृति विज्ञान तथा प्रादेशिक विकास
2.8 भू-आकृति विज्ञान तथा सैन्य क्षेत्र
3. निष्कर्षApplied Geomorphology

 1. परिचय 

         व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान का विकास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ है। डब्ल्यू.एम.डेविस, बाल्थर पेंक और एल.सी. किंग जैसे भूगोलवेताओं ने भूआकृति विज्ञान का विकास दार्शनिक एवं सैद्धांतिक तत्वों के आधार पर किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मात्र वही विषय जीवित रह सके जो प्रत्यक्ष उपयोगिता रखता था या वे विषय जिन्होंने समय के अनुसार अपने विषय वस्तु में परिवर्तन कर लिया। इसी का परिणाम था कि भूआकृति विज्ञान में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान का विकास किया गया। इसके कारण भू आकृति विज्ञान की उपयोगिता एवं महत्व और बढ़ गयी।
        व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग थॉर्नबरी महोदय के द्वारा 1954 ई० में किया गया था। उन्होंने 1954 में “प्रिंसिपल्स ऑफ ज्योमॉरफोलोजी” नामक पुस्तक लिखा जिसके अंत में एक अध्याय था जिसका शीर्षक ‘व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान’ था। थॉर्नबरी महोदय ने कहा कि “भूआकृति विज्ञान का अध्ययन मात्र सजावट की भाँति है। यदि इसके व्यावहारिक पक्ष को स्थापित नहीं किया गया तो यह अजयघर की वस्तु हो जाएगी।” थॉर्नबरी की इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए 1956 में अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक यूनियन एक समिति का गठन किया इसी तरह 1968 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के द्वारा भी एक आयोग का गठन किया गया। इन दोनों आयोगों ने भूआकृति विज्ञान के उपयोग के संबंध में एक समान विचार प्रकट किए। इन दोनों ने सिफारिश किया कि व्यवहारिक भूआकृति विज्ञान का अध्ययन एवं अध्यापन अनिवार्य रूप से कराया जाना चाहिए। 1960-70 के दशक में कनाडा, जर्मनी, इंग्लैंड, पूर्व सोवियत संघ और जापान जैसे देशों में अध्ययन अध्यापन का कार्य प्रारंभ हो गया। भारत में इसका अध्ययन 1980 के दशक से माना जाता है। इसका श्रेय पूणा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दीक्षित और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सविंद्र सिंह को जाता है। इसके अलावे दिल्ली स्कूल आफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर एस.के. पाल का विशेष योगदान है।
          जर्मनी के प्रोफेसर ब्रून्स डेन ने 1985 ई० में भू आकृति विज्ञान के सर्वाधिक मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रस्तुत किया। यह परिभाषा आर.जे.जोहानटन के द्वारा प्रतिपादित पुस्तक “द फ्यूचर ऑफ ज्योग्राफी” में प्रकाशित हुआ। ब्रून्स डेन ने अपनी परिभाषा एक अनुसंधान प्रपत्र में “ज्योमोरफोलॉजी इन द साइंस ऑफ सोसाइटी” के रूप में प्रस्तुत किया था। इस अनुसंधान प्रपत्र को ही जॉनस्टन महोदय ने अपनी पुस्तक में शामिल किया था।
ब्रून्स डेन- “व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक ऐसा विषय वस्तु है जो स्थलाकृति विशेषताओं की सूचनाओं के आधार पर पृथ्वी के सीमित संसाधनों की खोज, मूल्यांकन, प्रबंधन तथा उनके संरक्षण में सहायक होता है। इसके अध्ययन के द्वारा पर्यावरण का पतन तथा प्राकृतिक विपदाओं के संभावनाओं का आकलन कर प्रभाव को कम किया जा सकता है।”
          जब से भूगोल में सुदूर संवेदन प्रणाली का प्रयोग किया जाने लगा है तब से भूआकृति विज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग को और बढ़ावा मिला है। इस नवीन तकनीक के द्वारा भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) का विकास किया गया है। जिससे भूआकृति विज्ञान के व्यवहारिक प्रयोग में व्यावहारिकता का आगमन हुआ है।
2. व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान की विषय वस्तु 
            Verstaphen महोदय ने अनुप्रयुक्त भू आकृति विज्ञान के 6 विषय वस्तु का उल्लेख किया है-
(1) प्राकृतिक संसाधनों का स्थलाकृतिक मानचित्र तथा सभी प्रकार के तथ्यों से पूर्ण मानचित्र का निर्माण करना- इन दोनों ही कार्यों के लिए उच्चावच का अध्ययन अनिवार्य है। इसका अध्ययन भूआकृति विज्ञान में ही होता है। उच्चावच के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि किस ऊँचाई पर किस प्रकार के वृक्ष या कृषि कार्य किया जा सकता है। अधिक उच्चावच वाले क्षेत्र में तीव्र अपरदन की संभावना है। ऐसे में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान अधिक उच्चावच वाले क्षेत्रों का मानचित्रण कर लोगों को सचेत कर सकता है।
(2) प्राकृतिक विपदाओं (जैसे -भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी क्रिया, बाढ़, सुखाड़) का वैज्ञानिक विश्लेषण भू आकृति विज्ञान में किया जाता है। ऐसे में इनका पूर्ण अध्ययन कर मानव एवं अन्य जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है।
(3) स्थलाकृति विकास की प्रक्रियाओं का प्रभाव ग्रामीण विकास और नियोजन के कार्यों पर पड़ता है। ऐसे में ग्रामीण विकास और नियोजन कार्य प्रारंभ करने के पहले स्थलाकृतिक विकास का अध्ययन अनिवार्य है।
(4) नगरीय योजनाएँ भी व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान के अंग है। अर्थात नगर उसी स्थान पर विकसित होते हैं जहाँ पर स्थलाकृतिक परिस्थितियाँ विकास में मदद करती है।
(5) व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन खनन क्रिया को प्रारंभ करने के लिए या खनन कार्य के संभावित क्षेत्रों के सीमांकन के लिए अत्यंत ही आवश्यक है।
(6) व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अभियंताओं के लिए भी आवश्यक है। जैसे- नदियों पर बाँध बनाने में, अन्य जलाशयों के निर्माण में भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है।
           ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक उपयोगी विज्ञान है और यह अपना पहचान धीरे-धीरे स्थापित कर रहा है। वर्सटापेन के अलावे भारतीय भूगोलवेताओं ने इसके 8 विषय वस्तु निर्धारित किये हैं। जैसे:-
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य
2.2 भू-आकृति विज्ञान तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट
2.3 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमिगत जल का अध्ययन
2.4 भू-आकृति विज्ञान तथा तटीय स्थलाकृति का अध्ययन
2.5 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमि उपयोग
2.6 भू-आकृति विज्ञान तथा पर्यावरण प्रबंधन
2.7 भू-आकृति विज्ञान तथा प्रादेशिक विकास
2.8 भू-आकृति विज्ञान तथा सैन्य क्षेत्र 
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य-                  व्यवहारिक भू-आकृति वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि भू-आकृति का वृहद अध्ययन खनिजों के संभावित क्षेत्र और उसके उपयोग की संभावनाओं को बता सकता है। सुदूर संवेदन प्रणाली इस कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। जैसे यदि कोई प्रदेश मंद रूप से वलित हो और उसके विभिन्न स्तरों में चुना प्रधान चट्टान पाए जा रहे हैं तो वहां पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मिलने की संभावना होती है। जैसे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर खनिज तेल की खोज की गई थी।
       यदि जलोढ़ प्रक्रिया का सही अध्ययन किया गया हो तो यह बताया जा सकता है कि किस नदी में किस प्रकार के खनिज मिल सकते हैं? औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने स्वर्ण रेखा और कोयल नदी के स्रोत क्षेत्र का अध्ययन कर यह बताया था कि इन नदियों के बालू में सोना पाए जाते हैं।
       ऋतुक्षरण प्रक्रिया और ऋतुक्षरण के प्रभाव क्षेत्र के आधार पर खनन संभावनाओं को बताया जा सकता है। जैसे- यदि लैटेराइट संरचना के क्षेत्र का अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि उसमें अपक्षालन(Leaching) की क्रिया अधिक होती है जिसके तहत लोहा एवं एल्युमिनियम जैसे खनिज पदार्थ के संचित भंडार मिलने की संभावना होती है। 
2.2 भू-आकृति तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट-
           भूआकृति विज्ञान इंजीनियरिंग कार्य और भूमिगत जल संसाधन के निर्धारण में भी मदद करता है। जैसे- अभियंता लोग बड़े-बड़े बांधों का निर्माण उन्हीं क्षेत्रों में करना पसंद करती है जिस प्रदेश की ढाल तीव्र हो और नदी घाटियाँ सँकरी हो। इसी तरह आस्ट्रेलिया में अर्टिजियन उत्सुप्त कूआँ विशिष्ट भौगोलिक आकृति के कारण ही पाए जाते हैं।
       भू आकृति विज्ञान के आधार पर तटीय स्थलाकृतियों का अध्ययन किया जा सकता है और बड़े बंदरगाहों के निर्माण की संभावनाएं ढूँढ़ी जा सकती है।
        भू आकृति विज्ञान के अध्ययन कर भूमि उपयोग और पर्यावरण प्रबंधन तथा प्रादेशिक विकास में संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
       अक्सर सेनाओं को विषम भौगोलिक प्रदेशों में कार्य करना पड़ता है। ऐसे में प्रादेशिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन उनके लिए अनिवार्य है।
       सम्म (Schumm) महोदय ने भूआकृति विज्ञान के तीन उपयोग जलोढ़ स्थलाकृति का अध्ययन कर बताया है। इसी तरह से अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान में नित्य-प्रतिदिन नए-नए महत्त्व सामने उभरकर आ रहे हैं।

3. निष्कर्ष:-

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भू-आकृति विज्ञान का यह नवीन शाखा कार्यिक महत्व रखने के कारण आने वाले वर्षों में अंतर विषय विषय-वस्तु के रूप में और भी महत्व प्राप्त कर सकता है।


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18. Coastal Topography / समुद्र तटीय स्थलाकृति

18. Coastal Topography

(समुद्र तटीय स्थलाकृति) 

Coastal Topography


             स्थलाकृति के विकास के पांच प्रमुख दूतों में से एक दूत समुद्री तरंग है। समुद्री तरंग के द्वारा स्थलाकृतियों का निर्माण तटीय क्षेत्रों में होता है। इसीलिए समुद्री तरंग से निर्मित स्थलाकृति को तटीय स्थलाकृति कहते हैं। समुद्री तरंग के द्वारा अपरदित एवं निक्षेपित दोनों प्रकार के स्थलाकृति का निर्माण होता है। समुद्री तरंग प्रायः ऊपरी भागों का अपरदन करती है जबकि निचली भागों में निक्षेपण का कार्य करती है। समुद्री तरंग अपरदन का कार्य मुख्यतः 5 प्रक्रियाओं से करती है। जैसे-
(1) संक्षारण
(2) अपघर्षण
(3) सन्निघर्षण
(4) जल गतिक दबाब
(5) टूटते हुए लहरों के दवाब द्वारा इत्यादि।
                 
                तटीय भागों में अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे-
(i) तटीय भाग में प्रहर करने वाले तरंगों की आकार एवं उसमें व्याप्त ऊर्जा की मात्रा पर
(ii) तटीय प्रदेश की ढाल पर
(iii) तट रेखा की ऊँचाई पर
(iv) तटीय प्रदेशों की चट्टानों की संरचना पर
(v) तटीय प्रदेश में जल की गहराई पर
(vi) कहीं-कहीं तटीय क्षेत्रों में कई जीव-जंतु छिद्र बनाकर निवास करते हैं। ऐसी जीव तटीय क्षेत्रों में अपरदन के लिए अनुकूल परिस्थिति का निर्माण करते हैं।
               समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में दो प्रकार की स्थलाकृति विकसित होते हैं-
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति और
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति 
(1) गल्फ और खाड़ी (Bay)-
   
              तटीय क्षेत्रों में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का वैकल्पिक जमाव समुद्री तरंग के सापेक्ष में दो प्रकार से संभव है।
(i) अगर कठोर एवं मुलायम चट्टान वैकल्पिक रूप से समुद्री तरंग के सापेक्ष में समानांतर अवस्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर खाड़ी का निर्माण करती है। जैसे- बंगाल की खाड़ी
       
         बंगाल की खाड़ी के पूर्वी भाग में मलाया प्रायद्वीप और पश्चिमी भाग में प्रायद्वीपीय भारत रूपी कठोर चट्टानें अवस्थित है। इन दोनों के बीच अवस्थित मुलायम चट्टानों को हिंद महासागर का जल अपरदित कर बंगाल की खाड़ी का निर्माण किया है। इसे नीचे चित्र में देखा जा सकता है।
(ii) दूसरी परिस्थिति के अनुसार तटीय क्षेत्रों में समुद्री तरंग के सापेक्ष में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का जमाव लम्बवत हो तो समुद्री तरंग के प्रहार से पहले कठोर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिकों का विकास होता है निवेश का सेजल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घोष कर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिका का विकास होता है। निवेशिका से जल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घुसकर चट्टानों को अपरदित कर देती है और गल्फ का निर्माण करती है। जैसे- परसियन गल्फ। इसे इस चित्र में देखा जा सकता है- 
(2) समुद्री क्लिफ और तरंग घर्षित प्लेटफार्म-
            समुद्री तरंग तटीय भागों में अपने प्रहार के कारण चट्टानों को अपरदित करते रहती है। समुद्री तरंगों का जब तटीय भागों में स्थित खड़ी चट्टानों पर सतत प्रहार चलता रहता है तो उनके अपरदन से एक क्लिपनुमा संरचना का निर्माण होता है जिसे समुद्री क्लिप कहते हैं। जब समुद्री क्लिप का ऊपरी भाग असंतुलित होकर नीचे गिर जाती है तो “वेव कट प्लेटफार्म” का निर्माण करती है। समुद्री क्लिप सतत पीछे की ओर हटने की प्रवृत्ति रखती है जबकि वेव कट प्लेटफार्म सतत विस्तृत होने की प्रवृत्ति रखती है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-
(3) समुद्री गुफा- 
       जब तटीय भागों में कठोर चट्टानों के बीच-बीच में मुलायम चट्टान भी खड़ी अवस्था में स्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर गुफानुमा स्थलाकृति का विकास करती है, जिसे समुद्री गुफा कहते है।
(4) समुद्री मेहराव एवं तटीय स्तंभ- 
         तटीय भागों में चट्टानों काफी दूर तक कहीं-कहीं घुँसे हुए दिखाई देते हैं। अगर समुद्र में घुसे हुए चट्टान के बीच-बीच में मुलायम चट्टान और उसके चारों और कठोर चट्टान स्थित हो तो समुद्री तरंग उस प्रक्षेपित चट्टान के दोनों ओर प्रहार कर अपरदित कर देती है और मेहरावनुमा स्थलाकृति का निर्माण करती है जिसे “समुद्री मेहराव”कहते हैं। 
           जब समुद्री मेहराव का ऊपरी भाग असंतुलित होकर गिर जाता है तो चिमनी के समान कठोर चट्टाने समुद्र में खड़े दिखाई देते हैं जिन्हें समुद्री स्तंभ(Skerries) कहते हैं। इसे चित्र में देखा जा सकता है। 
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति- 
          जब समुद्री तरंग तटीय क्षेत्रों से टकराकर पीछे की ओर लौटने लगती है तो वह जहाँ एक ओर कमजोर हो जाती है वहीं दूसरी ओर तटीय क्षेत्रों को काटकर लाई जा रही मलवा का निक्षेपण मंद ढाल वाले क्षेत्रों में प्रारंभ कर देती है। चट्टानों के निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई स्थलाकृति विकसित होते हैं। जैसे-
(1) स्पीट
(2) बालू रोधिका
(3) लैगून
स्पीट- 
       स्पीट बालू और पत्थर के टुकड़ों से बना बाँधनुमा स्थलाकृति है जो तट के लंबवत स्थित होता है। इसका एक भाग तट से जुड़ा होता है जबकि दूसरा भाग समुद्र की ओर प्रक्षेपित रहता है। अगर इसका आकार सीधा हो तो उसे सामान स्पीट कहते हैं। लेकिन जब समुद्री तरंगों के प्रहार की दिशा में परिवर्तन हो तो उससे टेढ़ी स्पीट का निर्माण होता है जिसे हुक कहते हैं।
         
             जब किसी एक ही स्थान पर सामान्य स्पीट और हुक स्थित मिलते हैं तो उसे संयुक्त या मिश्रित स्पीट कहते हैं।
बालू रोधिका & लैगून- 
         कभी-कभी जलमग्न तटीय भागों में समुद्री तरंगें बालू एवं कंकड़-पत्थर का निक्षेपण तट के समानांतर करती है लेकिन तट से थोड़ा अलग होती है तो वैसे निर्मित स्थलाकृति को बालू रोधिका कहते हैं। बालू रोधिका और तट के बीच के पीछे अवस्थित जलाशय को लैगून कहते हैं। भौगोलिक स्थिति के अनुसार बालू रोधिका तीन प्रकार का हो सकता है। जैसे – 
(i) संयोजक रोधिका- इसमें बालू रोधिका का दोनों किनारा स्थल से जुड़ा होता है। जैसे – केरल के एर्नाकुलम के पास। 
(ii) लुप रोधिका- जब किसी द्वीप के चारों ओर बालू रोधिका का विकास हो तो उसे लूप रोधिका कहते हैं। 
(iii) टोम्बोलो रोधिका- जब बालू रोधिका का एक भाग तट से और दूसरा भा किसी द्वीप से जुड़ा हुआ हो तो उसे टोम्बोलो रोधिका कहते हैं। 
निष्कर्ष-

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री तरंगों द्वारा किए गए अपरदन एवं निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई विशिष्ट स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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17. Karst Topography / कार्स्ट स्थलाकृति

17. Karst Topography

(कार्स्ट स्थलाकृति)



चुना प्रधान वाले क्षेत्रों को कार्स्ट प्रदेश के नाम से जानते हैं। कार्स्ट प्रदेश शब्द एड्रियाटिक सागर के पूर्वी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त मैदान से लिया गया है। युगोस्लाविया के लोग ही चुना पत्थर (limestone) मैदान को कार्स्ट नाम से संबोधित करते हैं।  

        कार्स्ट प्रदेश में भूमिगत जल (underground water)अपरदन का सबसे प्रमुख दूत (agent) होता है। कार्स्ट प्रदेश में बनने वाले स्थलाकृतियों का सबसे पहले 1911 ई०  में जे.डब्ल्यू. बीड  एवं 1918 ई० में जे. स्वीजिक  ने अध्ययन किया था। कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण उन्हीं प्रदेश में होता है जहाँ निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ रहती है:-

(i) जहाँ विलियन (soluble) करने वाली चुना प्रधान चट्टाने पाई जाती हो।

(ii) चुना प्रधान चट्टानों में संरोध (Joints) का विकास हुआ हो।

(iii) चुना प्रधान चट्टानों के नीचे अपारगम्य चट्टान (Impermeable) पाई जाती हो तथा उसके अंदर पर्याप्त ढाल का विकास हुआ हो।

        कार्स्ट स्थलाकृति में निम्नलिखित अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है-

अपरदित स्थलाकृति

(1) लैपिज (Lapies)

(2) विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) और घोलरन्द्र (Sink Holes)

(3) डोलाइन (Doline)

(4) युवाला (Uvalas)

(5) पोल्जे (Polje) 

(6) पोनोर (Ponor)

(7) अंधी घाटी (Blind Valley)

(8) पोल्जे (Polje)

(9) कार्स्ट खिड़की (Karst Window)

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

अपरदित स्थलाकृति

लैपिज (Lapies):

     लैपिज स्थलाकृति की तुलना यारदांग से की जा सकती है। यह यारदांग के समान उबड़-खाबड़ स्थलाकृति है। लैपीज का विकास उसी चूना पत्थर प्रदेश में होता है जहाँ संरोध का विकास नहीं हो पाता है। संरोध के अभाव में चूना पत्थर जल के साथ घुल कर प्रवाहित हो जाती हैं और धरातल पर उबड़-खाबड़ स्थलाकृति का विकास होता है, जिसे लैपीज कहते हैं।

विलियन रन्ध्र और घोलरन्द्र:   

         जिस चूना प्रधान प्रदेश में संरोध का विकास होता है उन प्रदेशों में संरोध के ऊपरी भाग में चूना पत्थर युक्त चट्टान जल में घुलकर भूमिगत हो जाती है जिससे घोलरन्ध्र (Sink Holes) का निर्माण होता है। घोलरन्द्र का आकार एक कीप के समान होता है। लेकिन जब चुना पत्थर चट्टान का विलियन तेजी से होता है तो घोलरन्ध्र के स्थान पर विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) का निर्माण होता है। विलियन रन्ध्र का आकार एक बेलन के समान होता है।

डोलाइन (Doline):

      डोलाइन घोलरन्ध्र का ही विकसित रूप है। इसका ऊपरी व्यास 30 फीट से 40 फीट तक होता है। इसकी गहराई 6 से 75 फीट तक होता है। डोलाइन एक अस्थायी झील के समान होता है। कुछ समय के बाद इसके जल संरोध के सहारे भूमिगत हो जाते हैं और झील सूख जाती है। युगोस्लाविया से अलग हुए सर्बिया राज्य में डोलाइन के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

 

पोनोर (Ponor):

        डोलाइन के नीचे स्थित संरोध के सहारे जब जल भूमिगत होती है तो संरोध के किनारे स्थित चूना पत्थर का विलियन हो जाता है जिसके कारण संरोध काफी चौड़ा हो जाता है। इसी चौड़े संरोध वाले स्थलाकृति को पोनोर कहते हैं। अर्थात् पोनोर एक प्रकार का संरचनात्मक पाइप है, जो डोलाइन एवं उपसतही (Subsurface Cave) के मध्य विकसित होता है। इसका विकास भी संरोध के सहारे होता है। इसे गुफा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

 

युवाला (Uvalas):

    डोलाइन भी क्रमशः बड़ा होता जाता है। जब दो डोलाइन आसपास होते हैं तो बढ़ते-बढ़ते उनके बीच की दीवार टूट कर गिर जाती है और वे आपस में मिल जाते हैं। इससे एक वृहद् गड्ढे का निर्माण होता है, जो युवाला (Uvalas) कहलाता है।

      अर्थात् जब दो या दो से अधिक डोलाइन आपस में मिल जाते हैं तो एक विस्तृत गर्तनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है जिसे युवाला कहते हैं। युवाला का व्यास कई किलोमीटर तक हो सकता है। जल से भर जाने पर यह एक वृहद् झील के रूप में नजर आता है।

 
पोल्जे (Polje)

      अंधी गुफा के ऊपरी छत में घोलरन्ध्र के सहारे विकसित संरोध विलयन की क्रिया से चौड़ा होकर कार्स्ट खिड़की का निर्माण करती है। जब अंधी घाटी का ऊपरी छत धँस जाता है तो धँसान से निर्मित गर्त को पोल्जे कहते हैं।

      पोनोर के सहारे जब विलियन की क्रिया अति तीव्र हो जाती है तो धरातल और अपारगम्य चट्टान के बीच एक चौड़ी गुफानुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे अंधी घाटी या अंधी गुफा कहते हैं। दूसरे शब्दों में, पोनोर का ही अति विस्तृत भाग अंधी घाटी या अंधी गुफा कहलाता है।

कार्स्ट खिड़की (Karst Window):

     गुफा स्तंभ के अभाव में जब कभी गुफा की छत का कुछ भाग ध्वस्त होकर गिर जाता है तो गुफा की छत में वृहद् छिद्र का निर्माण हो जाता है, जो ‘कार्ट खिड़की’ के नाम से जाना जाता है। इसे खिड़की इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा घरातल के ऊपर से भूमिगत जल-प्रवाह एवं अन्य उपसतही स्थल रूपों को देखा जा सकता है।

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

      चुना प्रधान प्रदेशों में निक्षेपण की प्रक्रिया दो स्थानों पर संभव है:-

(i)  धरातल के ऊपर और

(ii) गुफा के अंदर।

     धरातल के ऊपरी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त चट्टानें घुलकर किसी निम्न प्रदेशों में निक्षेपित हो जाती है तो चूना पत्थर युक्त मिट्टी के मैदान का निर्माण करती है। चुना पत्थर युक्त मिट्टी को ही टेरारोसा कहते हैं और निर्मित मैदान को टेरारोसा का मैदान कहते हैं।

         ब्राजील के दक्षिणी पूर्वी भाग में टेरारोसा मैदान का विकास हुआ है। इसी मैदान में वहाँ बड़े पैमाने पर कहवा की खेती की जाती है।

     गुफा के अंदर निम्न प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति विकसित होते हैं।

(i)  स्टैलेक्टाइट

(ii) स्टैलेगमाइट

(iii) कन्दरास्तम्भ

(iv) ट्रेवर्टाइन (Travertine)

         स्टैलेगटाइट का निर्माण गुफा के छत के सहारे होता है जबकि स्टैलेगमाइट का निर्माण गुफा के निचली सतह पर होता है।

         जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट आपस में मिल जाते हैं तो उससे स्तंभ का निर्माण होता है। जब अंधी गुफा के ऊपरी क्षेत्र में स्थित संरोध के सहारे जल भूमिगत होती है तो चूना पत्थर युक्त जल गुफा के सतह पर बूंद-बूंद टपकने की प्रवृत्ति रखती है। धरातल पर चुनायुक्त जल के गिरते ही जल वाष्पीकृत हो जाता है और चुना का निक्षेपण हो जाता है तो उससे निर्मत गुम्बदाकार स्थलाकृति को स्टैलेगमाइट कहते हैं।

     जब गुफा (कन्दरा) में गुफा के छत के सहारे निर्मित संरोध के सहारे भूमिगत होने वाले जल का रफ्तार काफी धीमी हो तो चुना का निक्षेपण मधुमक्खी के छत के समान गुफा के छत के सहारे हो जाता है जिसे स्टैलेगटाइट करते हैं।

  Karst Topography

     कालांतर में जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट मिल जाते हैं तो उसे कन्दरा स्तम्भ करते हैं। जब गुफा के अन्दर चूना पत्थर प्रधान वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य  चलता रहता है तो अंत में “अपरदन सह निक्षेपित मैदान” मैदान का निर्माण होता है जिसे कार्स्ट मैदान के नाम से जानते हैं। इसे समप्राय मैदान से तुलना की जा सकती है।

ट्रेवर्टाइन (Travertine):

     गुफा की सतह पर निक्षेपित चूना-प्रधान मलबों कोट्रेवर्टाइनकहते हैं। ये प्रायः सफेद, हल्का पीला या पीला-भूरा होते हैं। चूना या कार्बोनेट खनिज की प्रधानता के कारण ये मुलायम एवं पारगम्य होते हैं। बाद में, इन्हीं निक्षेपित मलबों द्वारा कार्स्ट मैदान का निर्माण होता है।

        समप्राय मैदान के समान ही यहाँ भी कठोर चट्टान के टीले मिलते हैं जिसे यूरोप के लोग हम्स (Hums), क्यूबा के लोग मेंगॉट या Hay Stack तक कहते हैं।

निष्कर्ष:

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि चुना पत्थर वाले प्रदेश में भूमिगत जल से अनेक प्रकार के अपरादित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

नोट: सर्वप्रथम अमेरिकी भूगर्भवेत्ता जे.डब्ल्यू. बीडे (J.W. Beede) ने सन् 1911 ई. में “कार्स्ट प्रदेश में अपरदन चक्र की संकल्पना” प्रस्तुत की थी। बाद में सन् 1918 ई. में, साइबेरियाई भूगोलवेत्ता जोवान स्वीजिक (Jovan Cvijic) ने यूगोस्लाविया के कार्स्ट क्षेत्र के अध्ययन के आधार पर “कार्स्ट चक्र की संकल्पना” को व्यवस्थित ढंग से सामने रखा।

बिहार के रोहतास पठार पर पायी जाने वाली गुप्त-धाम कंदरा भी अंतर्भौम गुफा का एक प्रमुख उदाहरण है।



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16. Arid Topography / पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति

16. Arid Topography

(पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति)



पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति⇒Arid Topography             वैसे भौगोलिक क्षेत्र जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेमी० से कम होती है, उसे शुष्क प्रदेश या मरुस्थलीय प्रदेश कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, पश्चिम आस्ट्रेलिया, मध्य एशिया, गोबी, थार, सोनोरान, अटाकामा, पेटागोनिया मरुस्थल इत्यादि।

        डेविस के अनुसार किसी भी भौगोलिक प्रदेश में दिखाई देने वाले विशिष्ट स्थलाकृतियों के समूह को भूदृश्य / भूआकृति या भ्वाकृतिक कहते हैं। भ्वाकृतियों या स्थलाकृतियों के विकास पर प्रक्रम का प्रभाव पड़ता है। प्रक्रम का तात्पर्य अपरदन के दूतों से है। शुष्क प्रदेश में अपरदन के दो प्रमुख प्रक्रम सक्रिय रहते हैं। जैसे:

(1) शुष्क वायु

(2) बहता हुआ जल (आकस्मिक वर्षा)

       ये दोनों प्रक्रम शुष्क प्रदेशों में अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण का कार्य करते रहते हैं।

अपरदन – शुष्क वायु अपरदन की क्रिया तीन प्रकार से करती है-

(i) अपवाहन (Deflation)- अपवाहन क्रिया में वायु चट्टान-चूर्ण उड़ाकर अपरदन का कार्य करती है।

(ii) अपघर्षण(Abrasion)- तीव्र वेग से वायु के साथ उड़ते हुए रेत व धूलकण मार्गवर्ती शैलों को रगड़ते एवं घिसते हैं।

(iii) सन्निघर्षण (Attrition)- वायु के साथ उड़ते हुए धूल व रेत कण परस्पर टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं।

    शुष्क वायु अपरदन को प्रभावित करने वाले कारक:-

(i) वायु की गति

(ii) वायु में रेत व धूलकणों की मात्रा

(iii) शैलों की संरचना

(iv) जलवायु

परिवहन- जब वायु अपरदन किए हुए चट्टान-चूर्ण को अपने साथ लेकर प्रवाहित होती है तो उसे परिवहन कहते हैं।

निक्षेपण- जब चट्टान-चूर्ण के साथ उड़ते हुए वायु के मार्ग में कोई अवरोधक  मिलता है तो उसकी वहन क्षमता कम जाती है और चट्टान-चूर्ण का जमा होने लगता है, जिसे निक्षेपण कहते हैं।

शुष्क वायु द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति

1. वात गर्त/अपवाहन बेसिन

2. ज्यूगेन

3. यारडांग

4. गारा

5. छत्रक शिला

6. भूस्तंभ

7. मरुस्थलीय खिड़की

8. मरुस्थलीय पूल या मेहराव

9. ड्राई कान्टर

10. मरुस्थलीय बेसिन/अपवाह बेसिन

11. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग

निक्षेपित स्थलाकृति

1. बालुका स्तूप

(i) बरखान

(ii) सीफ

2. उर्मिल मैदान

3. लोएस मैदान

आकस्मिक व भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति

1. जलोढ़ पंख

2. जलोढ़ शंकु

3. बाजदा

4. बालसन

5. प्लाया

6. सेलीनॉस

7. पेडीमेंट/पेडीप्लेन

8.अंत: प्रवाही नदी

अपरदित स्थलाकृति

1. ज्यूगेन:-

        जब शुष्क प्रदेश में कठोर एवं मुलायम चट्टान क्षैतिज एवं वैकल्पिक रूप में पायी जाती है। यदि सतह पर कठोर चट्टान हो तो तापीय प्रभाव से उसमें दरारें पड़ जाती है। उन दरारों के माध्यम से वायु प्रविष्ट कर मुलायम चट्टानों के अपरदन प्रारम्भ कर देती है, जिससे दवातनुमा स्थलाकृति बनती है, उसे ज्यूगेन कहते है।

जैसे – USA के कोलरेडो, दक्षिण कैलिफोर्निया क्षेत्र में

2. यारडांग:- 
        कठोर एवं मुलायम चट्टान लम्बवत एवं वैकल्पिक रूप में हो तो शुष्क वायु चट्टान के ऊपरी भाग मुलायम चट्टानों का अपघर्षण के माध्यम से अपरदित कर देती है और कठोर चट्टान यथावत रह जाता है, इसे यारडांग कहते है।
3. गारा एवं छत्रक शिला:- 
        मरुस्थलीय भागों में यदि कठोर शैल के रूप में ऊपरी आवरण के नीचे कोमल शैल लंबवत रूप में मिलती है तो इस कारण पवन द्वारा निचले भाग में अत्यधिक अपघर्षण द्वारा आधार कटने लगता है जबकि उसका ऊपरी भाग अप्रभावित रहता है। इस आकृति को गारा एवं छत्रक शिला कहा जाता है। 
* यदि पवन एक ही दिशा से चलती है तो कटाव एक ही दिशा में होती है- गारा 
* पवन कई दिशाओं में- छत्रक शिला
4. भूस्तम्भ:- 
         शुष्क प्रदेशों में जहाँ पर असंगठित एवं कोमल शैल के ऊपर कठोर तथा प्रतिरोधी शैल का आवरण होता है, वहाँ कठोर शैलों के नीचे कोमल शैलों का अपरदन नहीं हो पाता है परंतु समीप के कोमल चट्टानों का अपरदन हो जाता है। जैसे- कालाहारी एवं कोलरैडो
5. मरुस्थलीय खिड़की तथा मरुस्थलीय मेहराव/पुल:- 
    मरुस्थलीय क्षेत्रों में कांग्लोमरेट चट्टानों की प्रधानता होती है। इन चट्टानों की सामान्य विशेषता है कि कठोर भाग के मध्य में मुलायम चट्टानें भी मिलती है। मुलायम चट्टानें अपरदित होने के बाद खिड़की जैसी आकृति का निर्माण होता है जिसे मरुस्थलीय खिड़की कहते है।  जैसे- पेंटागोनिया मरुस्थल
 
      मरुस्थलीय खिड़की के विस्तृत रूप को ही मरुस्थलीय मेहराव/पुल कहा जाता है
6. अपवाह बेसिन/वात गर्त:- 
        सतह के ऊपर असंगठित तथा कोमल शैलों  के ढीले कणों को उड़ा ले जाती है जिस कारण छोटे-छोटे गर्तों का निर्माण होता है, जिसे अपवाह बेसिन कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, यूएसए के पश्चिमी शुष्क प्रदेश
7. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग:- इसके निर्माण में जलीय प्रक्रम का अधिक योगदान होता है। 
* एल.सी. किंग- मरुस्थलीय प्रदेश के अंतिम अवस्था में अपरदन एवं निक्षेपण के परिणामस्वरूप लगभग समतल मैदान को- पेडिप्लेन 
* जगह-जगह मिलने वाले कठोर चट्टानों (लम्बवत) को- इंसलबर्ग कहते है 
8. ड्राइकांटर:- पथरीले मरुस्थल में सतह पर पड़े शीलाखंडों पर पवन के अपरदन द्वारा शिलाखंड चतुष्फलक आकृति का बन जाता है तो उसे ड्राइकांटर कहते हैं।
निक्षेपित स्थलाकृति 
1.बालुका स्तुप:- 
        जब चलती हुई शुष्क वायु के मार्ग में कोई अवरोधक मिल जाता है तो इन्हीं अवरोधकों  से टकराकर शुष्क वायु धूलकण निक्षेपण करने की प्रवृत्ति रखती है जिससे बालुका स्तूप का निर्माण होता है। वेगनौल्ड महोदय ने बालुका स्तूप को दो भागों में बाँटा है-
* अनुप्रस्त बालुका स्तूप- बरखान
* अनुधैर्य- सीफ
2. बरखान:- इसमें वायु का निक्षेपण अवरोधक के दोनों किनारों पर होता है जिसके कारण अर्धचंद्राकार आकृति बन जाती है, जिसे बरखान कहा जाता है।
3. सीफ:- जब बरखान का एक बाँह की लंबाई बढ़ जाती है तो देखने पर हॉकी स्टिक के समान लगता है जिसे सीफ कहते हैं।
4. उर्मिल मैदान:- जब बालू एवं धूलकणों का निक्षेपण तरंगित मैदान के रूप में होता है तो उसे उर्मिल मैदान कहते है
5. लोएस का मैदान:- आर्द्रता ग्रहण करने के कारण शुष्क वायु वहन क्षमता खो देती है। जैसे- चीन के मंचूरियन प्रांत- टकलामकान तथा गोबी  मरुस्थल के मैदान बालू से निर्मित है
 
आकस्मिक या भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति
1. बाजदा:- प्लाया और पर्वतीय अग्रभाग के मध्य मंद ढाल वाले मैदान को बाजदा कहते है। इसका निर्माण मलवा के निक्षेपण से होता है
2. बालसन:- रेगिस्तानी भागों में पर्वतों से गिरी बेसिन को वालसन कहते हैं।
3. प्लाया:- बालसन के नीचे गर्त में महीन बालू कण, घुलनशील चट्टानों और जलयुक्त अस्थायी झील को प्लाया कहते हैं।
4. सेलिनॉस:- जब प्लाया झील का जल वाष्पीकृत होकर उड़ जाता है तो प्लाया झील बालसन का हिस्सा बन जाता है।
* कभी-कभी प्लाया झील सूखने के बाद नमक की परत दिखाई देती है वैसी परिस्थिति में उसे सेलिनॉस कहते हैं।
5. I आकार की घाटी:- USA के कोलरेडो पठार पर- I आकार की घाटी – ग्रैंड कैनियन
6. पेडीमेंट/पेडीप्लेन:-
       जब किसी उत्थित भूखंड पर आकस्मिक वर्षा होती है तो उत्थित भूखंड के ढाल पर स्थित ऋतुक्षरित चट्टानें  बहते हुए जल के साथ नीचे गिर जाती है। फलत: उत्थित भूभाग का ऊपरी भाग पूर्णत: नग्न हो जाता है जिसे पेडीमेंट/ पेडीप्लेन कहा जाता है।
7. अंत: प्रवाही नदी:- 
         मरुस्थलीय प्रदेशों में जब तीव्र वर्षा होती है तो छोटी-छोटी सरिताओं का विकास होता है लेकिन यह नदियाँ समुद्र से जाकर नहीं मिलती है। इसीलिए इसे अंत: प्रवाही नदी कहते है

निष्कर्ष:-   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि मरुस्थलीय अथवा शुष्क प्रदेशों में शुष्क वायु, आकस्मिक भारी वर्षा के द्वारा कई विशिष्ट अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

विश्व के मरुस्थलीय क्षेत्र



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  15. GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS / हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप

 15. GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS 

(हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप)



विश्व में हिमानी के दो प्रमुख क्षेत्र है- 

(1) ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र (High mountainous regions)      

(2) ध्रुवीय क्षेत्र (Polar regions)

        नदी के समान प्रवाहित हो रहे हिम को हिमानी या हिमनद कहते है। नदियों की तरह हिमानी भी तीन प्रकार के कार्यों में संलग्न रहती है। 

(1) अपरदन (Erosion)

(2) परिवहन (Transportaion)

(3) निक्षेपण (Deposion)

     हिमानी अपरदन का कार्य कई तरह से सम्पादित करती है। जैसे-

(1) उत्पाटन (Plucking):- 

      जब हिमानी अपने मार्ग से गुरुत्वाकर्षण बल या हिमानी दबाव के कारण प्रवाहित होती है तो वैसी परिस्थिति में अगर कोई कठोर चट्टान मिल जाता है तो उसे हिमानी उखाड़कर फेंक डालती है, उसे उत्पाटन (Plucking) कहते है।

(2) तुषार अपरदन (Frost Erosion):- 

           जब ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में या ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थित चट्टानों के संधि या दरारों में जल जमकर हिम के रूप में बदल जाता है तो हिम के आयतन बढ़ने से चट्टानों के ऊपर दबाव बल कार्य करने लगता है फलतः चट्टानें कमजोर होकर टूटने लगती है। इसे ही तुषार अपरदन (Frost Erosion) कहते है।

(3) अपघर्षण (Abrasion):-  

       हिमनद में छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते है। ये कंकड़ पत्थर ही अपरदन के यंत्र होते है। इन्हीं कंकड़-पत्थर की सहायता से हिमानी तलीय एवं क्षैतिज अपरदन का कार्य करती है।

(4) प्रसर्पण (Sweeping):-  

     वास्तव में नदी जल और हिमानी के गति में अंतर होता है। नदी जल में महीन तथा बारीक धूलकण नदी जल में लटककर और बड़े चट्टानी कण तली में लुढ़कते हुए चलते है। जबकि  हिमानी में सभी आकार के चट्टान एक ही साथ आगे बढ़ते है। जब हिम और सभी आकार के चट्टानी कण किसी ढ़ाल के सहारे एक ही साथ फिसलते हुए आगे बढ़ते है तो उसे प्रसर्पण कहते है।

(5) जलीय अपरदन (Water erosion):-

         हिमानी हिमरेखा (Snow line) के बाद पिघलना प्रारंभ हो जाती है जिसे अधोहिमानी (Subglacial) कहते है। अधोहिमानी में जहां एक ओर हिम के द्वारा अपरदन का कार्य होता है वहीं बहता हुआ जल भी अपरदन कार्यों में संलग्न रहती है। 

        जब हिमानी ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के सहारे आगे बढ़ती है तो उसमें मौजूद चट्टानी कणों को हिमोढ़ (Moraine) कहते है। हिमानी के द्वारा हिमोढ़ को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पर ले जाना, परिवहन कहलाता है। पुनः जब हिमानी पिघलने लगता है तो उसकी वहन क्षमता समाप्त हो जाती है जिसके फलस्वरूप हिमोढ़ का बड़े क्षेत्रों पर जमाव हो जाता है, जिसे निक्षेपण कहते है।

        हिमानी मुख्यतः तीन प्रकार के होते है:-

(1) पर्वतीय हिमानी/अल्पाइन हिमानी (Mountain Glaciers)

(Continental Glaciers

(2) महाद्वीपीय हिमानी (Continental Glaciers)

(3) पर्वतपदीय हिमानी (Piedmont Glaciers)

     पर्वतीय हिमानी का उदाहरण हिमालय पर्वत, आल्पस पर्वत, रॉकी एवं एंडिज पर्वत के ऊपरी भाग में मिलती है। 

(1) पर्वतीय हिमानी में गुरुत्वाकर्षण बल के कारण बर्फ ऊपर से नीचे की ओर आने की प्रवृति रखती है। 

(2) महाद्वीपीय हिमानी का प्रमाण ध्रुवीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। महाद्वीपीय हिमानी में हिम का प्रवाह बहुत ही मन्द होता है।

(3) पर्वतपदीय हिमानी का प्रमाण पेंटागोनिया के पठार पर मिलता है क्योंकि एंडिज पर्वत के पदीय भाग में स्थित होने के कारण इसे पर्वत पदीय हिमानी कहते है।

हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति

      स्थलाकृति के विकास में पर्वतीय & महाद्वीपीय हिमानी का मुख्य योगदान होता है।

      पर्वतीय हिमानी के द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृतियों का विकास होता है :-

पर्वतीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति

(1) U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) & लटकती हुई घाटी (Hanging Valley)

(2) हिमगहवर/सर्क (Cirque)

(3) एरेट (Arete)

(4) कॉल (Col)

(5) पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn)

(6) अनुव्रती सोपान (Follow-up steps)

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति

(1) नुनाटक (Nunatak)

(2) रॉशमुतौनी (Roche Moutonnee)

(3) रॉक बेसिन (Rock Basins)

(4) टॉर्न (Tarn)

(5) अंगुलीनुमा झील (Finger Lake)

⇒ U-आकार की घाटी & लटकती हुई घाटी

        यह पर्वतीय हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका अनुप्रस्थ काट U-आकार का होता है। जब पर्वतीय हिमानी ऊपरी भाग से नीचे की ओर खिसकती है तो हिम टुकड़ों के द्वारा तली पर एक समान अपरदन की क्रिया होती है। इसके अलावे हिम के द्वारा अपघर्षण का भी कार्य होता है। जिसके परिणामस्वरूप U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) विकसित होता है।

        जब कोई मुख्य हिमानी में सहायक हिमानी मिलती है तो उसमें भी छोटी U-आकार की घाटी विकसित होती है। लेकिन संगम स्थल पर मुख्य हिमानी की तुलना में सहायक हिमानी की तली ऊपरी भाग में लटका हुआ दिखाई देता है जिसके कारण उसे लटकती हुई घाटी कहते है।

⇒ हिमगहवर/सर्क/कोरी

        यह पर्वतीय हिमानी द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति है। इसका आकार  एक आरामकुर्सी के समान होता है। इसका निर्माण पर्वतपदीय क्षेत्र में होता है। क्योंकि जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों से बर्फ (हिम) नीचे गिरती है तो हिम दबाव के कारण भूपटल का कुछ भाग अपरदित हो जाता है और अपरदन से आरामकुर्सी के समान गर्त का निर्माण होता है। इसी गर्त को हिमगहवर (Cirque) कहते है।

⇒ एरेट,कॉल तथा पिरामिडल हॉर्न

       जब किसी पर्वत के दोनों ढालों पर श्रृंखलाबद्ध अनेक सर्क का विकास हो जाय/ साथ ही कालांतर में दोनों ढालों पर विकसित सर्क आपस में मिल जाये तो ऐसी स्थिति में पहाड़ी के आर-पार अनुप्रस्थ घाटी का निर्माण हो जाता है। इन्हीं अनुप्रस्थ घाटियों को कॉल (Col) कहते है। इसकी तुलना दर्रा से भी की जाती है। दर्रा एवं कॉल में एक सामान्य अंतर यह है कि कॉल का निर्माण हिमानी अपरदन से होता है जबकि दर्रा का निर्माण नदी के अपरदन से होता है।

         दो कॉल के बीच स्थित कठोर चट्टान पिरामिड के समान दिखाई देते है जिन्हें पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn) कहा जाता है। जब कोई लम्बी पर्वतीय श्रृंखला के कटक पर स्थित मुलायम चट्टानों को हिमानी के द्वारा अपरदित कर दिया जाता है तो कठोर  चट्टानें एक श्रृंखला में या कंघी के समान दिखाई देते है। ऐसे ही कंघीनुमा पर्वतीय कटक को एरेट/अरेट (Arete) कहते है।

◆ स्वीटजरलैंड में मैटरहॉर्न पर्वत पर अरेट, पिरामिडल हॉर्न एवं कॉल का प्रमाण मिलता है।

कुमायूँ हिमालय में स्थित माना एवं नीति कॉल का उदाहरण है।

अनुवर्ती सोपान (Follow-up steps)

        यह एक सीढ़ीनुमा स्थलाकृति है। यह पर्वतीय हिमानी की लम्बवत घाटी है। अर्थात पर्वतीय हिमानी (स्रोत) से समुद्र तट (मुहाना) तक निर्मित हिमानी के अनुवर्ती घाटी को अनुवर्ती सोपान / हिमसोपान (Glacial Stairway) कहते है। अनुवर्ती सोपान की उत्पति के सम्बंध में तीन प्रमुख विचार प्रकट किए गए है।

प्रथम विचारजब हिमानी के मार्ग में कठोर एवं लम्बवत चट्टानें मिल जाती है तो हिमानी उसे अपरदन नहीं कर पाता है जिसके कारण सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास होता है।

दूसरा विचारधारा- जब कोई मुख्य हिमानी में आकर सहायक हिमानी मिलती है तो उस परिस्थित में हिम का मात्रा बढ़ जाने के कारण संगम स्थल से आगे तलीय अपरदन और बढ़ जाता है। पुनः जब एक और सहायक हिमानी मिलती है तो पुनः अपरदन में होने वाले वृद्धि से सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास होता है।

तीसरे विचार- ऐसी सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास भूतल उत्थान एवं धंसान से भी हो सकता है।

      अनुवर्ती सोपान का उदाहरण नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, ग्रीनलैण्ड में देखने को मिलता है।

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति

          महाद्वीपीय हिमानी में पर्वतीय हिमानी के समान घाटी का निर्माण नहीं होता है बल्कि विस्तृत क्षेत्र के हिम रेंगते हुए धीमी गति से गुरुत्वाकर्षण ढाल के अनुरूप आगे बढ़ते है। ऐसी स्थिति में महाद्वीपीय हिमानी के द्वारा कई स्थलाकृति का विकास होता है। 

       जब महाद्वीपीय हिमानी के मार्ग में कोई कठोर चट्टान या अवरोधक मिल जाता है तो हिमानी अपना मार्ग न बदलकर उसी कठोर चट्टान के ऊपर से पार कर जाता है जिसके कारण महाद्वीपीय हिमानी के बीच-बीच में उभरा हुआ भाग दिखाई देता है जिसे नुनाटक कहते है।

रॉशमुतौनी / भेड़शैलपीठ / मेशशिलापीठ

           यदि किसी महाद्वीपीय हिमानी के मध्य कठोर चट्टान की पहाड़ी मिल जाती है तो हिमनी अपना मार्ग न बदलकर उस कठोर चट्टान के ऊपर चढ़कर पार करने की प्रवृति रखती है जिधर से हिमानी चढ़ने की प्रवृति रखती है उधर वाला भाग अपघर्षण से चिकना हो जाता है। लेकिन पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद हिमानी दूसरे ढाल पर गुरुत्वाकर्षण के कारण हिम टूटकर नीचे गिरती है और पहाड़ी के दूसरी ढाल पर उबड़-खाबड़ सतह के निर्माण करती है। जिसके कारण भेड़ के समान स्थलाकृति का विकास होता है जिसे रौशमुतौनी/भेड़शैलपीठ (Roche Moutonnee) कहते है।

रॉक बेसिन/ टॉर्न तथा अंगुलीनुमा झील

             यदि हिमनी के सतह पर कोई छोटी कठोर एवं उत्थित चट्टान मिलती है तो उसे हिमानी उखाड़ फेंकती है। चट्टानों के उखड़ जाने से जिस गर्त का निर्माण होता है उसे रॉक बेसिन (Rock Basins) कहते है। रॉक बेसिन के निर्माण होते ही उसमें बर्फ भर जाता है और हिमानी के प्रवाह की दिशा में उसका अग्र भाग अपरदित होकर टॉर्न का निर्माण करती है। जब टॉर्न का लम्बी अवधि तक अपरदन होता है तो अंगुलीनुमा झील का निर्माण होता है ऐसी स्थलाकृति का उदाहरण फिनलैण्ड और कनाडा में बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है।

फियोर्ड (Fiords)

         यह भी हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका निर्माण महाद्वीपीय एवं पर्वतीय दोनों हिमानी से होता है। फियोर्ड का निर्माण प्रायः समुद्रतलीय क्षेत्रों में होता है क्योंकि जब पर्वतीय या महाद्वीपीय हिमानी समुद्र में उतरती है तो किनारों पर अपरदन का कार्य अधिक होता है और ज्यों-ज्यों किनारे से समुद्र की ओर जाते है त्यों-त्यों तलीय अपरदन का कार्य कम होता है। फलतः फियोर्ड में किनारे में अधिक गहरा और समुद्र की ओर जाने पर उसकी गहराई घटते जाती है। ऐसी स्थलाकृति का प्रमाण नार्वे तट पर अधिक देखने को मिलता है। 

⇒ नार्वे के तट को फियोर्ड तट के नाम से जानते है।

⇒ विश्व के सबसे लंबा फियोर्ड सोगनी फियोर्ड है।

हिमानी के द्वारा निर्मित निक्षेपित स्थलाकृति

         अपरदन के अन्य दूत के समान हिमानी भी कई प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण करते है। जब हिमानी आगे की ओर बढ़ती है तो वह भी पर्याप्त मात्रा में चट्टान, धूलकण, गाद, बोल्डर क्ले इत्यादि को लेकर आगे बढ़ती है। हिमानी के द्वारा ले जाया जाने वाले मलवों के समूह को हिमोढ़ कहते है। हिमोढ़ के निक्षेपण से दो प्रकार के स्थलाकृति विकसित होती है :-

1. अस्तरित  स्थलाकृति (Unstratified Topography)

2. स्तरित स्थलाकृति (Stratified Topography)

             हिमनी अपरदन से बोल्डर क्ले का विकास बड़े पैमाने पर होता है जिनका स्तरीकरण संभव नहीं हो पाता है उससे विकसित स्थलाकृति को अस्तरित स्थलाकृति कहते है। 

              लेकिन जब हिमानी के मलवे आपस में चूना पत्थर, क्ले, गाद इत्यादि के कारण एक-दूसरे से जुड़ जाते है तो स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

            अस्तरित स्थलाकृति का विकास हिमरेखा के ऊपरी भाग में जबकि हिमरेखा के नीचे स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

⇒ हिमरेखा- ऐसी रेखा जहाँ से बर्फ पिघलकर हिम के साथ-साथ पानी भी प्रवाहित होने लगती है।

अस्तरित स्थलाकृति

        जब हिमानी अपने घाटी मार्ग से आगे की ओर बढ़ती है तो बड़े पैमाने पर हिमोढ़ का जमाव करते हुए आगे प्रवाहित होती है। जब हिमोढ़ का जमाव तलीय भाग में होता है तो तलीय हिमोढ़ (Ground Moraines) कहते है। जब हिमोढ़ का जमाव किनारों पर होता है तो उसे पार्श्व हिमो (Lateral Moraines) कहते है। जब दो हिमानी के मिलन बिंदु पर हिमोढ़ का जमाव होता है तो उसे मध्य हिमोढ़ (Medial Moraines) कहते है और जब हिमानी अपने मुहाना पर हिमोढ़ का जमाव करती है तो उसे अंतिम हिमोढ़ (Terminal Moraines) कहते है।

         अंतिम हिमोढ़ के बाद कभी-कभी हिमोढ़ का निक्षेपण उल्टे हुए नाव के समान होता है जिसे ड्रमलिन (Drumlin) या अंडों की टोकरी वाली स्थलाकृति कहते है। इसका अक्ष हिमनी प्रवाह की दिशा में होता है।

        जब महाद्वीपीय हिमानी आगे की ओर प्रवाहित होती है तो बड़े क्षेत्रों में या हजारों किमी. भूभाग में बोल्डर क्ले का निक्षेपण कर देती है जिससे निर्मित स्थलाकृति को टिल प्लेन (Till Plain or Till Sheet) कहते है।

अमेरिका का प्रेयरी मैदान और साइबेरिया का मैदान (रूस) टिल प्लेन का उदाहरण है।

 स्तरित स्थलाकृति

          स्तरित स्थलाकृति का निर्माण हिम रेखा के बाहर होता है। ऐसी स्थलाकृति में बोल्डर क्ले एवं अन्य चट्टानी कण एक-दूसरे से जुड़ जाती है। स्तरित स्थलाकृति में सबसे प्रमुख अवक्षेप का मैदान, केम, केटल (Kettles), सन्दूर घाटी एवं एस्कर है।

         जब हिमरेखा के बाहर बर्फ पिघलना प्रारंभ होता है तो हिम के द्वारा लाये गए हिमोढ़ एवं क्ले का निक्षेपण बड़े क्षेत्रों में किया जाता है तो अवक्षेप मैदान (Outwash Plain) का निर्माण होता है।

         हिम रेखा के बाहर जब बर्फ पिघलने लगती है तो नदी के समान ही कई शाखाओं में बंटकर हिमजल उपसरिताओं में बहने लगती है। ये उपसरिताएँ ही सन्दूर घाटी (Sandur Valley) कहलाती है।

         संदूर घाटी के बीच-बीच में मिलने वाले डेल्टानुमा स्थलाकृति को केम (Kame) कहते है।

         कभी-कभी जब महाद्वीपीय हिमानी प्रवाहित होती है तो उसके मार्ग में मिलने वाला गर्त बर्फ से भर जाता है तथा उसके चारों ओर हिमोढ़ का जमाव हो जाता है। कालांतर में जब बर्फ पिघलता है तो चित्र के अनुरूप स्थलाकृति का विकास होता है। इसे केम-केटल स्थलाकृति कहते है।GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS

        जब महाद्वीपीय हिमानी का बर्फ पिघलने लगता है तो हिमानी के तली पर जलोढ़ एवं हिमोढ़ का जमाव एक तटबंधनुमा स्थलाकृति के रूप में होता है, जिसे एस्कर (Easker) कहा जाता है। कभी-कभी एस्कर का आकार माला के समान हो जाता है, इसीलिए इसे मालाकार एस्कर (Garland eskar) भी कहा जाता है। 
निष्कर्ष 

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमानी के अपरदन एवं निक्षेपण से हिमरेखा के अंदर एवं बाहर कई स्थलाकृतियों का विकास होता है।


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  14. River Landforms / नदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति

  14. River Landforms

(नदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति)



River Landforms

        बहते हुए जल को नदी की संज्ञा दी जाती है। जहाँ से नदी निकलती है उसे स्रोत क्षेत्र और जहाँ नदी समुद्र में मिलती है उसे मुहाना कहते है। अपरदन के दूतों में बहता हुआ जल सबसे प्रमुख अपरदन का दूत है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता डब्लु० एम० डेविस ने सबसे पहले नदी से निर्मित स्थलाकृतियों की विवेचना अपरदन चक्र सिद्धान्त के माध्यम से करने का प्रयास किया था।

          डेविस के अनुसार नदी द्वारा अपरदन का कार्य चक्रिय होता है। नदी हमेशा आधारतल तक अपरदन का कार्य करती है। आधारतल तक नदी अपरदन समाप्त करती है तो ही नई उत्थान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। जिससे पुनः नया अपरदन चक्र प्रारम्भ होती है। नदी के द्वारा ऊपरी भाग में अपरदित और निचले भाग में निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है। नदी निम्नलिखित अपरदित स्थलाकृति का निर्माण करती है।

1. नदी घाटी का विकास–

(i) I- आकार की घाटी 

(ii) V- आकार की घाटी 

(iii) गॉर्ज तथा कैनियन

2. जलप्रपात

3. उच्छल्लिका/क्षिप्रिका एवं जलगर्तिका & अवनमन कुण्ड 

4. नदी वेदिका

5. नदी विसर्प (River terraces)

6. समप्राय मैदान और मोनाडनॉक (Monadanox)

नदी घाटी का विकास– 

(i) I- आकार की घाटी तथा

(ii) V- आकार की घाटी 

      डेविस महोदय ने बतलाया कि उत्थान के तत्काल बाद लघु सरिताएँ ढ़ाल के अनुरूप बहने लगती है जिसके कारण तलीय अपरदन का कार्य तीव्र गति से होने लगता है जिसके कारण I- आकार की घाटी विकसित होती है। इसी घाटी में कुछ समय के बाद तलीय अपरदन कम और क्षैतिज अपरदन अधिक हो जाने के कारण V- आकर की घाटी का निर्माण होता है। 

            

(iii) गॉर्ज तथा कैनियन

      गॉर्ज तथा कैनियन दोनों ही V-आकार की घाटियों के रूप में होते है जिनमें किनारे की दीवाल अत्यंत खड़े ढ़ाल वाली होती है तथा चौड़ाई की अपेक्षा गहराई बहुत अधिक होती है। जब नदियाँ कठोर चट्टानों को काटती है तो निर्मित गहरी घाटी गॉर्ज तथा जब मुलायम चट्टानों को काटती है तो निर्मित गहरी घाटी कैनियन कहलाता है। जैसे- सिंधु नदी द्वारा निर्मित सिंधु गॉर्ज (जम्मू कश्मीर में गिलगिट के पास) तथा कोलरैडो नदी द्वारा निर्मित ग्रांड कैनियन (USA)।

2. जलप्रपात

      जब नदियाँ अधिक ऊँचाई से खड़े ढाल के ऊपरी भाग से नीचे की ओर गिरती है तो जलप्रपात का निर्माण करती है। इसमें कठोर एवं मुलायम चट्टान क्षैतिज व्यवस्थित होती है। उदाहरण भारत मे शरावती नदी पर निर्मित जोग जलप्रपात (कर्नाटक)।

3. उच्छल्लिका/क्षिप्रिका

      जब नदी अपने मार्ग से प्रवाहित हो रही हो और इस क्रम में इसके तल पर अगर कठोर चट्टानों एवं मुलायम चट्टानों लम्बवत व्यवस्थित हो तो मुलायम चट्टानों का तो तो अपरदन कर देती है लेकिन कठोर चट्टान के अपरदन न कर पाने के कारण चट्टानों पर जल उछलते हुए बहने की प्रवृति रखती है। इसे ही उच्छल्लिका/क्षिप्रिका कहते हैं। उदाहरण- USA का सेंट लौरेंस नदी पर स्थित नियाग्रा जलप्रपात विश्व का सबसे बड़ा Rapid  का उदाहरण है।

जलगर्तिका & अवनमन कुंड (Potholes and Plunge pools)

      नदी की तली में स्थित चट्टानों को जब नदी उखाड़कर फेंक देती है तो निर्मित गर्तों को जलगर्तिका (Potholes) कहते है। जब जलगर्तिका की गहराई तथा व्यास अधिक हो जाता है तो उसे अवनमन कुंड (Plunge pools) कहते है।

4. नदी वेदिका

        नदी की घाटी के दोनों किनारों पर स्थित जलस्तर में परिवर्तन के कारण या भूपटल के उत्थान एवं पतन के कारण सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे नदी वेदिका की संज्ञा दी जाती है।

5. नदी विसर्प 

      जब नदी प्रौढ़ावस्था से गुजर रही होती है तो नदियाँ मोड़ लेकर बहने लगती है जिसे नदी विसर्प कहा जाता है। मोड़ लेती हुई नदी के जलस्तर में या आधारतल में किसी तरह का परिवर्तन होता है तब मोड़ के अंदर मोड़ विकसित होता है। इसे अधःकर्तित विसर्प कहते है।

6. समप्राय मैदान और मोनाडनॉक

        डेविस के अपरदन चक्र की अंतिम अवस्था में नदियों द्वारा लम्बवत अपरदन नहीं हो पाता है। निरपेक्ष तथा सापेक्ष उच्चावच दोनों न्यूनतम होते है। घाटियाँ उथली तथा अत्यधिक चौड़ी हो जाती है इस पर नदियाँ मियांडर बनाती हुई विस्तृत बाढ़ के मैदानों का निर्माण करती है, लगभग इस समतल मैदान को डेविस ने सम्प्राय मैदान (पेनिप्लेन) का नाम दिया है। इस सतह पर कठोर चट्टान के लम्बवत टुकड़े यत्र-तत्र दिखाई पड़ते है इन अवशिष्ट पहाड़ियों को ही डेविस ने मोनाडनॉक कहा है।

नदी द्वारा निर्मित निक्षेपित स्थलाकृति

नदी  निम्नलिखित निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण करती है-

1. जलोढ़ शंकु

2. जलोढ़ पंख

3. प्राकृतिक तटबन्ध

4. बाढ़ का मैदान

5. गोखुर झील (Ox-bow lake)

6. डेल्टा

1. जलोढ़ पंख और जलोढ़ संकु-

      पहाड़ी भाग में नदियाँ संकीर्ण एवं ढलवाँ भाग को छोड़कर ज्यों ही मैदानी भाग में प्रवेश करती है तो ढ़ाल में कमी होने के कारण नदी जल की गति घट जाती है। जिसके कारण पहाड़ी क्षेत्र से लाये गए मलवा का निक्षेपण प्रारंभ हो जाता है। बड़े आकार के चट्टानों के निक्षेपण अगले भाग में होता है। साथ ही छोटी-छोटी सरिताएँ मार्ग बदलते हुए इधर-उधर प्रवाहित होते रहती है जिस कारण शंकुनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसे जलोढ़ शंकु कहते है। जैसे- शिवालिक पर्वत के दक्षिणी ढ़ाल पर।

      कई जलोढ़ शंकु जब आपस में मिल जाते है तब जलोढ़ पंख का निर्माण होता है।  

जलोढ़ पंख

2. प्राकृतिक तटबंध और बाढ़ का मैदान

      वर्षा ऋतु में जब बाढ़ आती है तो नदी जल के साथ लाये गए मलवा को नदी किनारे पर  समतल क्षेत्र में फैला देती है जिससे एक चौरस मैदान का निर्माण होता है, उसे जलोढ़ मैदान या बाढ़ का मैदान कहते है। अगर बाढ़ के दिनों में नदी के जल के प्रवाह में अचानक वृद्धि हो जाये तो मैदानी क्षेत्र में पहले से फैले पानी स्थिर रह जाते है, जिसके कारण नदी के किनारों पर एक उत्थित स्थलाकृति का निर्माण होता है, जिसे प्राकृतिक तटबंध कहते है। गंगा नदी के द्वारा पटना के पास, ब्रह्मपुत्र नदी के द्वारा गुवाहाटी के पास, चीन का ह्वांगहो नदी और गुजरात के पास, ताप्ती नदी प्राकृतिक तटबंध का निर्माण करती है। 

3. गोखुर झील-

               जब नदियाँ मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है तो मोड़ लेकर बहने लगती है जिसे विसर्प (Meander) कहते है।                         

            कालान्तर में एक समय ऐसा आता है जब नदी के दो मोड़ आपस में मिल जाते है और मुड़ा हुआ भाग अलग हो जाता है, चूंकि इसकी आकृति गाय के खुर के समान होता है, इसीलिए इसे गोखुर झील कहा जाता है। गंगा के मैदानी क्षेत्र में इसके कई प्रमाण मिलते है। 

4. डेल्टा-

      जब नदी जल समुद्र के शांत पानी में प्रवेश करती है तो नदी का प्रवाह रुक सा जाता है जिसके कारण नदी के मुहाने पर मलवा के निक्षेपण से त्रिभुजाकार स्थलाकृति का निर्माण होता है जो डेल्टा कहलाता है। 

• डेल्टा शब्द की उत्पति मिस्र से हुई है।

• डेल्टा शब्द का प्रथम प्रयोग ‘हेरोडोटस’ के द्वारा किया गया था। 

• डेल्टा आकार के दृष्टिकोण से यह कई प्रकार का होता है-

         चापाकार डेल्टा (नील नदी का डेल्टा, गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा), पंजाकर डेल्टा (मिसौरी तथा मिसीसिपी का डेल्टा), एश्चुअरी डेल्टा (इसका निर्माण जलमग्न नदियों के मुहाने पर एश्चुअरी के किनारों पर जमाव के कारण होता है- भारत की नर्मदा एवं ताप्ती नदियाँ)

निष्कर्ष

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि बहते हुए जल से आर्द्र प्रदेश में विशिष्ट अपदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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13. NORMAL CYCLE OF EROSION / सामान्य अपरदन चक्र का सिद्धान्त – By W.M. DEVIS

13. NORMAL CYCLE OF EROSION

(सामान्य अपरदन चक्र का सिद्धान्त – By W.M. DEVIS)



NORMAL CYCLE OF EROSION

    जब समुद्रतल से ऊपर उठा हुआ कोई भी भूभाग बाह्य शक्ति या अपरदन के दूतों  के द्वारा काँट- छाँट कर एक अकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण किया जाता है तो इस समयावधि को अपरदन चक्र कहते है।

     पृथ्वी का भूपटल दृढ़ भूखण्डों से निर्मित है जिसे प्लेट कहते है। पृथ्वी के भूपटल पर आंतरिक एवं बाह्य दो प्रकार की शक्तियाँ सतत कार्यरत रहती है। आंतरिक शक्तियों में ज्वालामुखी, भूकम्प एवं भूपटल को विरूपित करने वाले अन्य शक्ति (जैसे- संवहन तरंग) को शामिल करते है। जबकि बाह्य शक्तियों में जलवायु, बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग, इत्यादि को शामिल करते है।

     आंतरिक शक्तियाँ भूपटल में विषमता (उत्थान, धंसान, वलन) उत्पन्न करती है । जबकि बाह्य शक्तियां भूपटल में उतपन्न विषमता को समाप्त कर समतल मैदान के रूप में बदलने का प्रयास करती है अर्थात बाह्य शक्तियां  प्राकृतिक कैंची के समान है जो अपरदन के माध्यम से धरातल को अपरदित कर समतल करते रहती है

        अपरदन चक्र की संकल्पना सर्प्रथम स्कॉटलैंड के भूगोलवेत्ता जेम्स हटन ने प्रस्तुत किया था। इन्होनें भूपटल का भूवैज्ञानिक अध्ययन कर अपना मत प्रस्तुत किया कि “भूपटल पर न तो आदि का लक्षण है और न ही अंत की कोई आशा” जेम्स हटन के इसी विचार ने अपरदन चक्र की संकल्पना को जन्म दिया। जेम्स हटन के बाद अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस और जर्मन भूगोलवेत्ता पैंक ने अपरदन चक्र पर अलग-अलग मत प्रस्तुत किया।

      प्रारम्भ में डेविस महोदय ने “सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त” प्रस्तुत किया। बाद में जब उनकी आलोचना होने लगी तो उन्होनें कहा कि जब पहले से एक अपरदन चक्र चल रहा हो तो बीच में आंतरिक एवं बाह्य शक्तियां आधार तल में परिवर्तन ला सकती है। जिसके कारण पूर्व का अपरदन चक्र बाधित हो जाता है और नवीन अपरदन चक्र प्रारम्भ हो जाता है। इस तरह किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में एक से अधिक अपरदन चक्र के स्थलाकृति का प्रमाण मिलने वाले क्षेत्र को “बहुचक्रिय स्थलाकृति क्षेत्र” से सम्बोधित किया।

      इस तरह डेविस को बहुचक्रीय  स्थलाकृति की संकल्पना प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है। कालान्तर में जर्मन भूगोलवेत्ता वाल्थर पैंक और एल्बर्ट पैंक (फादर) ने डेविस के सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त का आलोचना करते हुए संशोधित एवं आधुनिक अपरदन चक्र का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस तरह आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान का जन्मदाता पैंक (फादर- बेटा) को माना जाता है।

डेविस का सामान्य अपरदन चक्र 

          डेविस का सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त भौगोलिक चक्र का सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस ने 1889 ई० में “Geographical Essay” नामक पुस्तक में अपरदन चक्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

          डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धान्त को परिभाषित करते हुए कहा कि “अपरदन चक्र समय की वह अवधि है जिसके अंतर्गत एक उत्थित भूखण्ड अपरदन क्रिया द्वारा प्रभावित होकर एक आकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण करती है।”  

     डेविस ने बताया कि किसी समतल भूखण्ड के उत्थान के बाद उस पर तीन कारकों का प्रभाव पड़ता है –

(i) संरचना (Structure)

(ii) प्रक्रम (Process) और

(iii) समय (Time or Stage)।

       इसी आधार पर डेविस ने यह परिकल्पना प्रस्तुत किया कि किसी भौगोलिक क्षेत्र का “भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और समय का फलन होता है।” A landscape is a function of structure, process and time इस परिकल्पना को डेविस का त्रिकट (Trio of Devis) के नाम से जानते है। 

       अपरदन  चक्र आर्द्र प्रदेश में, शुष्क प्रदेश में, चुना पत्थर प्रधान क्षेत्रो में, समुद्र तलीय क्षेत्र में,एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में सतत चलता रहता है। डेविस ने अपना सिद्धान्त आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल/नदी अपरदन का दूत होता है। बहता हुआ जल सम्पूर्ण प्रदेश को अपरदन क्रिया से प्रभावित करता है और प्रदेश में अपरदन चक्र को संचालित करता है। आर्द्र प्रदेश में अपरदन की क्रिया चक्रीय रूप से सक्रिय रहती है।

      डेविस ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया है। जैसे एक मानव जन्म के बाद युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से होकर गुजरते हुए अपने जीवन लीला को समाप्त करता है और पुनः जन्म लेता है ठीक उसी प्रकार से सामान्य अपरदन चक्र उपरोक्त तीनों अवस्थाओं से होकर गुजरती है। उन्होंने पुनर्जन्म को पुनरुत्थान से तुलना किया है। 

मान्यताएँ (Assumptions):-

     डेविस का अपरदन  चक्र सिद्धांत निम्नलिखित तीन मान्यताओं पर आधारित है-

1. अपरदन चक्र के लिए उत्थान अति आवश्यक है तथा उत्थान में समय बहुत कम लगता है।

2. जब उत्थान के कार्य पूरा हो जाता है तब अपरदन का कार्य प्रारंभ होता है।

3. उत्थित भूखण्ड में तीव्र ढ़ाल होती है जिसके कारण उसमें अनियमितताएँ आती है तथा बहता हुआ जल अनेक स्थलाकृति को जन्म देती है।

          डेविस के अनुसार जो भी स्थलखंड तीन मान्यताओं को पूरा करती है वहाँ पर अपरदन चक्र सक्रिय रहता है। किसी भी प्रदेश का अपरदन चक्र निम्नलिखित अवस्थाओं से पूरा होती है:-

(1) युवावस्था/तरुणावस्था (Youth Stage)

(2) प्रौढावस्था (Mature Stage)

(3) वृद्धावस्था (Old Stage)

          उपरोक्त तीनों अवस्थाओं का निम्नलिखित विशिष्टाएँ है:-NORMAL CYCLE OF EROSION

 (1) युवावस्था (Youth Stage)

         युवावस्था में भूपटल के उत्थान के बाद अपरदन की क्रिया प्रारंभ हो जाती है। इसीलिए इस अवस्था को अपरदन की अवस्था कहते है। युवावस्था में निम्नलिखित विशिष्ट स्थलाकृतिक का विकास होता है। 

• सरिताएँ I- आकर की घाटी का निर्माण करती है।

• छोटे-छोटे सरिताओं का विकास होता है।

• युवावस्था में तलीय कटान अधिक और क्षैतिज कटान बहुत कम होता है जिससे सँकरी एवं गहरी घाटी (गॉर्ज) का विकास होता है।

• क्षैतिज कटान कम होने के कारण जलविभाजक रेखा चौड़ी होती है।

• इस अवस्था में सरिता अपहरण की घटना होती है। जिसके कारण जगह-जगह पर मृत नदी घाटी या सुस्त नदी घाटी दिखाई देता है।NORMAL CYCLE OF EROSION• तलीय अपरदन के कारण उच्छल्लिका (Rapids) का निर्माण होता है। उच्छल्लिका का निर्माण उस वक्त होता है जब नदी मार्ग के नीचे कोई लम्बवत कठोर चट्टान मिलती है। जब नदी के नीचे मिलने वाला कठोर चट्टान पूर्णतः क्षैतिज होता है तो जलप्रपात का निर्माण होता है।

• अगर नदी मार्ग में मिलने वाला कठोर चट्टान छोटा एवं हल्का हो तो उसे नदी उखाड़कर फेंक देती है और जलगर्तिका का निर्माण करती है।NORMAL CYCLE OF EROSION

          इस अवस्था के प्रारम्भ में उच्चावच कम होती है। लेकिन अवस्था के अंत में तलीय कटान के कारण उच्चावच अधिकतम हो जाती है।

(2) प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)

            प्रौढ़ावस्था को दो भागों में बाँटा जाता है।

(i) प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था

(ii) अंतिम प्रौढ़ावस्था

     प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था में  क्षैतिज अपरदन का कार्य तेजी से होने लगता है और तलीय अपरदन कम होने लगता है। क्षैतिज अपरदन से V– आकार का घाटी का निर्माण होता है। जल विभाजक रेखा को चौड़ाई घटने लगता है। 

      अंतिम प्रौढ़ावस्था में V-आकर की घाटी और खुलने लगती है। जल विभाजक की  चौड़ाई में और कमी आने लगती है। अंतिम प्रौढ़ावस्था में अपरदन और निक्षेपण दोनों साथ-साथ होती है। इसीलिए उच्चावच और ढ़ाल में कमी आने लगती है। तलीय अपरदन न्यून हो जाता है। कम ढ़ाल के कारण नदियाँ गाद लेकर प्रवाहित होने लगती है। अंतिम प्रौढ़ावस्था में नदियाँ बाढ़ का मैदान गोखुर झील और प्राकृतिक बांध का निर्माण करती है। इन स्थलाकृतियों को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है। NORMAL CYCLE OF EROSION(3) वृद्धावस्था (Old Stage)

       डेविस ने बताया कि वृद्धावस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। नदियाँ वितरिका में बँटने लगती है। जल विभाजक की चौड़ाई न्यूनतम हो जाती है। “खुली हुई V-आकार की घाटी” का निर्माण करती है। मुहाना पर डेल्टा का निर्माण होता है। वृद्धावस्था के अंत में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान (Peneplain) कहते है। समप्राय मैदान में कहीं कहीं कठोर चट्टाने दिखाई देती है। जिसे मोनाडनौक (Monadnock) कहते है।

    डेविस ने अपरदन चक्र के विभिन्न अवस्थाओं में बनने वाले घाटी, समप्राय मैदान, मोनाडनौक और अवस्था का नीचे के मॉडल से समझाया है।NORMAL CYCLE OF EROSION

         डेविस के अनुसार जब कोई उत्थित भौगोलिक भूखण्ड वृद्धावस्था से गुजर रहा होता है तो तभी उसमें पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो उसके बाद पुनः नवीन अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है। डेविस ने पुनरुत्थान की क्रिया को मानव के पुनर्जन्म से तुलना किया था। 

आलोचना (Criticism)

      डेविस के अपरदन चक्र सिद्धांत की कई आधारों पर आलोचना की गई है:-

1. डेविस ने माना कि उत्थान के बाद अपरदन होता है तो इस पर प्रश्न उठाया जाता है कि क्या भूखण्ड के उत्थान होने तक अपरदन के दूत निष्क्रिय रहते है।

2. डेविस ने बताया कि उत्थान में समय बहुत कम लगता है लेकिन वास्तव में उत्थान बहुत लंबी अवधि तक चलने वाली क्रिया है। 

3. डेविस ने यह भी कहा था कि जलखण्ड के उत्थान हो जाने के बाद लंबे समय तक स्थिर है लेकिन यह मान्य नहीं है।

4. डेविस ने यह नहीं बताया कि भूखंडों का उत्थान क्यों होता है?

5. जर्मन विद्वान वाल्थर पेंक ने कहा है कि कोई भी अपरदन चक्र अवस्था का फलन नहीं होता है बल्कि दशाओं (Phase) का फलन होता है। 

6. डेविस ने एक भी समप्राय मैदान का उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया है और न ही वैसे क्षेत्रों का उदाहरण दिया है जहां पर अपरदन चक्र चल रही हो। ऐसे में यह सिद्धान्त काल्पनिक जान पड़ता है।

7. जर्मन विद्वानों ने इसके नामाकरण पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

8. जर्मन विद्वान ओमाल ने कहा है कि यह एक अत्यंत सरलीकृत परिकल्पना है।

निष्कर्ष

         इन आलोचनाओं के बावजूद डेविस के सिद्धांत को व्यापक मान्यता प्राप्त है क्योंकि इस दिशा में उसके द्वारा किया गया प्रथम प्रयास था। बाद में डेविस के ही अपरदन चक्र सिद्धान्त को आधार मानकर पेंक ने अपना विचार प्रकट किया।



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12. Earthquake Region in India / भारत में भूकम्पीय क्षेत्र

12. Earthquake Region in India

(भारत में भूकम्पीय क्षेत्र)


Earthquake Region in India⇒

Earthquake Region in India
                   भारत के अधिकांश भूकम्प भ्रंशघाटी के सहारे आते है। ये भ्रंशघाटी हिमालय पर्वतीय क्षेत्र एवं प्रायद्वीपीय भारत दोनों में स्थित है। भारत में भूकम्पीय पेटी को प्रायः तीन पेटी में बांटकर अध्ययन करते है:-
1) हिमालय भूकम्पीय पेटी-
         यहाँ प्रायः भीषण भूकम्प आते है क्योंकि यहाँ यूरोपियन एवं इंडियन प्लेट अभिसरण के स्थिति में है। प्लेटों के अभिसरण के कारण हिमालय क्षेत्र में कई भ्रंश रेखा का निर्माण हुआ है। जैसे– 
Earthquake Region in India              हिमालय प्रदेश में सर्वाधिक भूकम्प कुमायूं हिमालय में आती है। 1991 ई० में आया उत्तर काशी का भूकम्प सबसे प्रसिद्ध है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 2006 ई० में मुज़फ़्फ़राबाद का भूकम्प प्रसिद्ध है।
2) उत्तरी मैदानी क्षेत्र- 
       यह हिमालय से सटा हुआ है। यहाँ पर भयंकर भूकम्प की संभावना बनी रहती है। 1934 में आया भयंकर भूकम्प का केंद्र बिन्दु दरभंगा में अवस्थित था। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में भूकम्प आने का प्रमुख कारण शिवालिक हिमालय के दक्षिण भाग में Front Fault/अग्र भ्रंश का पाया जाना है।
3) प्रायद्वीपीय भारत–
       प्रायद्वीपीय भारत प्रायः भूकम्प रहित क्षेत्र है क्योंकि यह प्राचीनतम चट्टानों से निर्मित दृढ़ भूखण्ड है। फिर भी यहाँ पर अपवाद स्वरूप कई भूकम्प रिकॉर्ड किये गए है। जैसे -1956 में कच्छ का भूकम्प, 1967 में कोयना का भूकम्प, 1993 में लातूर (महाराष्ट्र) का भूकम्प, 1997 में जबलपुर का भूकम्प, 26 जनवरी 2001 को आया भूज का भूकम्प प्रसिद्ध है।
           प्रायद्वीपीय भारत में छोटे-छोटे कई घाटी मिलते है। जैसे- सोन के सहारे सोन भ्रंश, नर्मदा के नर्मदा भ्रंश, दामोदर के दामोदर भ्रंश, गोदावरी के सहारे गोदावरी भ्रंश, कृष्णा के सहारे कृष्णा भ्रंश, कावेरी के सहारे ग्रेट म्योर भ्रंश, महाराष्ट्र में कोयना & कुदिवाड़ी भ्रंश, और असम में मेघालय पर्वत के सहारे कोपील भ्रंश पाये जाते है। 

          इन्हीं भ्रंशों के सहारे अकसर भूकम्प आते रहते है।


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11. Earthquake / भूकंप

 11. Earthquake / भूकंप



Earthquake / भूकंप

Earthquake

भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है- भू + कम्प

भू = भूपटल 

कम्प = कम्पन

      इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र या भूकंप मूल या हाइपोसेंटर (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र-
       भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)-

      अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है । जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

★ बिहार में औसतन प्रत्येक 17 वर्ष पर भूकम्प आता है।

सिस्मोग्राफ

     सिस्मोग्राफ भूकम्पीय तरंगों के प्रवृति को रेखांकन करने वाला यन्त्र है।

समभूकम्प रेखा

      समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समभूकम्पीय रेखा  (Isoseismal line) कहते है।

सहभूकम्प रेखा

     एक ही समय पर पहुँचने वाले भूकम्पीय तरंगों को मिलाने वाली सरल रेखा को सहभूकम्प रेखा (Homoseismal line) कहते है।

 भूकम्प के प्रकार

     भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

(A) गहराई के आधार पर

       गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

(i) सामान्य गहराई के भूकंप– फोकस 50 KM से ऊपर होता है।

(ii) मध्यम गहराई के भूकंप– फोकस 50-250 KM के बीच

(iii) अधिक गहराई के भूकंप– फोकस 250-700 KM के बीच

(B) समय के आधार पर

       समय के आधार पर भूकम्प दो प्रकार के होते है:-

(i) धीमा भूकम्प

(ii) अचानक भूकम्प

धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वत का निर्माण होता है।

विश्व में सर्वाधिक कम गहराई वाले भूकंप या छिछले उदगम वाले भूकम्प आते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

 भूकम्प के कारण

      भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) मानवीय कारण

(B) प्राकृतिक कारण

(A) मानवीय कारण:-

(i) परमाणु विस्फोट

(ii) मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य

(iii) बड़े-बड़े बाँधों का निर्माणEarthquake

(iv) पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण इत्यादि।

(B) प्राकृतिक कारक:-

    ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है तो भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए है:-

(1) प्रत्यास्थ पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)

       इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था। इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्थ चट्टानों से निर्मित है। जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।

(2) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

        इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैरीहेस महोदय है। इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है। यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है। प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है। भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है–

(i) अपसरण सीमा

(ii) अभिसरण सीमा

(iii) संरक्षी सीमाEarthquake

       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-

जैसे:-

(i) चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल

(ii) एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना

(iii) पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

(iv) दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग

      प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है। जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।

जैसे- अटलांटिक कटक के सहारेEarthquake

    जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है। 
Earthquake
       जब दो प्लेट आपस में समांतर रूप से रगड़ खाते है तो वैसे स्थानों पर संरक्षी सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को संरक्षी गति कहते है। जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे द्वीप समूह संरक्षी सीमा पर अवस्थित है। यही कारण है कि यहां सबसे अधिक भूकम्प रिकॉर्ड किया जाता है।
Earthquake
        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।

भूकम्प का वितरण

        विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर–

       विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र–

        यह क्षेत्र यूरेशियन प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक- 

     अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोबेट द्वीप तक हुआ है।

भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन

       भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है। वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है–

1. मार्सेली पैमाना

2. रिचर पैमाना

3. आधुनिक- आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw)

मार्सेली पैमाना

        मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था। इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया। इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।

रिचर पैमाना

     रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था। इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता का मापन 1 से 9/10 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन स्केल पर अंकित हर अगला अंक अपने ठीक पिछले अंक की तुलना में 10 गुना अधिक तीव्र होता है।

रिचर पैमाना पर तीव्रता प्रभाव
1 केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2 केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3 चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है
4 केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है
5 अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं
6 विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7 दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8 इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9 सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
     
     अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है। 
आधुनिक- आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw)
      आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw) का उपयोग भूकम्पों की तीव्रता मापने के लिए किया जाता है, जिसमें भूकंप के स्रोत से निकलने वाली कुल ऊर्जा को मापा जाता है। इसे रिक्टर पैमाने के अद्यतन रूप के रूप में 1979 में थॉमस हेंक्स और हिरो कानामोरी द्वारा विकसित किया गया था, क्योंकि यह बड़े और छोटे दोनों प्रकार के भूकंपों के लिए अधिक सटीक परिणाम देता है, जबकि रिक्टर पैमाने बड़े भूकंपों के लिए सटीक नहीं था। Mw भूकंप के आकार (यानी, आकार, विस्थापन और कठोरता) का सबसे विश्वसनीय अनुमान देता है।  

भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता

      भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-

(A) प्रमुख तरंग 

1. P तरंग

2. S तरंग

3. L तरंग

(B) गौण तरंग

1. P* तथा S*

2. Pg तथा Sg

(A) प्रमुख तरंग 

P तरंग 

     P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य तथा गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र / फोकस से होती है। 

S तरंग

     S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है। इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है। यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है। भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है। S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र / फोकस से होती है।

P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है। S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।

L तरंग 

      L तरंग को सतही तरंग भी कहा जाता है। L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है। L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है। इसी तरंग के कारण सर्वाधिक क्षति होती है। L तरंग की गति काफी अनियमित होती है। 

भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow Zone)

       भूकंप लेखी यंत्र (सिस्मोग्राफ) पर दूर के क्षेत्रों से आने वाली भूकंपीय तरंग अंकित होती हैं, परन्तु कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है, ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र कहते है।

भूकंप अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है।  यह क्षेत्र दोनों प्रकार की तरगों के लिए छाया क्षेत्र (Shadow zone) हैं।

105° के परे पूरे क्षेत्र में ‘S’ तरंगें नहीं पहुँचतीं।

‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘P’ तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक विस्तृत है।

भूकंप अधिकेंद्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी (Band) के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है।

‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवल विस्तार में बड़ा है, वरन् यह पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अधिक है। 

(B) गौण तरंग

P* & S* तरंग 

        पृथ्वी  का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:-

(1) ग्रेनाइट तथा

(2) बैसाल्ट चट्टान

P* & S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।

P* की गति=6-7 Km/Sec

S* की गति=3-4 Km/Sec

      ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है। इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था। इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।

Pg & Sg तरंग 

        ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है। इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।

Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec

Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec

       Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है। 

निष्कर्ष:-

       इस तह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।



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