2. Need for Regional Planning in India / भारत में क्षेत्रीय नियोजन की आवश्यकता

Need for Regional Planning in India 

भारत में क्षेत्रीय नियोजन की आवश्यकता

Need for Regional Planning in India 

परिचय

   भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है जहाँ भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक असमानताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। विकास की प्रक्रिया में कुछ क्षेत्र अत्यधिक विकसित हो गए हैं, जबकि कई क्षेत्र आज भी पिछड़े हुए हैं। इस असंतुलन को दूर करने तथा संतुलित एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रीय नियोजन (Regional Planning) की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्षेत्रीय नियोजन का अर्थ

    क्षेत्रीय नियोजन का तात्पर्य किसी विशिष्ट क्षेत्र (Region) के संसाधनों, जनसंख्या, पर्यावरण एवं आर्थिक गतिविधियों का समन्वित एवं संतुलित विकास करना है, ताकि उस क्षेत्र की समस्याओं का समाधान हो सके और उस क्षेत्र का सम्पूर्ण विकास संभव हो।

भारत में क्षेत्रीय नियोजन की आवश्यकता

1. क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना:-

     भारत में क्षेत्रीय असमानताएँ आर्थिक, सामाजिक एवं अवसंरचनात्मक स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। कुछ राज्य जैसे महाराष्ट्र, गुजरात एवं तमिलनाडु अत्यधिक विकसित हैं, जबकि बिहार, झारखंड एवं ओडिशा जैसे राज्य अपेक्षाकृत पिछड़े हुए हैं। इन क्षेत्रों में आय, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं एवं रोजगार के अवसरों में भारी अंतर पाया जाता है।

    ऐसी असमानताएँ सामाजिक असंतोष एवं प्रवासन को बढ़ावा देती हैं। क्षेत्रीय नियोजन का मुख्य उद्देश्य इन विषमताओं को कम करके संसाधनों का संतुलित वितरण सुनिश्चित करना है, ताकि सभी क्षेत्रों का समावेशी एवं संतुलित विकास हो सके और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ किया जा सके।

2. संसाधनों का संतुलित उपयोग:- 

     भारत में प्राकृतिक संसाधनों का वितरण असमान है – कुछ क्षेत्रों में खनिज प्रचुर मात्रा में हैं (जैसे झारखंड), जबकि अन्य क्षेत्रों में उपजाऊ कृषि भूमि या जल संसाधन अधिक हैं (जैसे पंजाब और गंगा का मैदान)। इस असमानता के कारण कई क्षेत्रों में संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है, जबकि अन्य क्षेत्र संसाधनों के अभाव में पिछड़े रह जाते हैं।

     क्षेत्रीय नियोजन इन संसाधनों के संतुलित एवं समुचित उपयोग को सुनिश्चित करता है, जिससे सभी क्षेत्रों का समान विकास संभव हो सके। साथ ही, यह सतत विकास को बढ़ावा देता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण भी करता है।

3. जनसंख्या दबाव का प्रबंधन:-   

     भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है, जिससे कुछ क्षेत्रों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जबकि अन्य क्षेत्र अपेक्षाकृत खाली रहते हैं। विशेष रूप से गंगा के मैदान जैसे क्षेत्रों में अधिक जनसंख्या के कारण भूमि, जल, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं पर दबाव बढ़ जाता है। इससे बेरोजगारी, गरीबी, आवास संकट और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

     क्षेत्रीय नियोजन के माध्यम से औद्योगिक विकास, अवसंरचना विस्तार और रोजगार के अवसरों को पिछड़े एवं कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में बढ़ावा दिया जाता है, जिससे जनसंख्या का संतुलित वितरण संभव होता है और सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।

4. शहरीकरण की समस्याओं का समाधान:-

    भारत में तीव्र शहरीकरण के कारण महानगरों पर अत्यधिक दबाव बढ़ गया है, जिससे झुग्गी-झोपड़ियाँ, प्रदूषण, यातायात जाम, जल संकट और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। क्षेत्रीय नियोजन इन समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह छोटे एवं मध्यम शहरों के संतुलित विकास को प्रोत्साहित करता है और औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र की गतिविधियों को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाता है।

    इससे महानगरों पर दबाव कम होता है तथा क्षेत्रीय संतुलन स्थापित होता है। साथ ही, बेहतर आधारभूत संरचना और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर जीवन स्तर में सुधार लाया जा सकता है।

5. कृषि एवं औद्योगिक संतुलन:- 

    भारत में क्षेत्रीय असंतुलन का एक प्रमुख कारण कृषि और उद्योगों का असमान विकास है। कुछ क्षेत्र मुख्यतः कृषि आधारित हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियाँ अधिक केंद्रित हैं। इससे आय, रोजगार और विकास के अवसरों में अंतर उत्पन्न होता है। क्षेत्रीय नियोजन के माध्यम से कृषि और उद्योगों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है, जैसे कृषि आधारित उद्योगों (Agro-based industries) को ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ावा देना। इससे स्थानीय रोजगार सृजन, किसानों की आय में वृद्धि और ग्रामीण-शहरी अंतर को कम करने में मदद मिलती है, जिससे समावेशी और संतुलित विकास सुनिश्चित होता है।

6. अवसंरचना (Infrastructure) का विकास:- 

    भारत में क्षेत्रीय नियोजन की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों में अवसंरचना का विकास असमान है। कई पिछड़े क्षेत्रों में सड़क, बिजली, जल आपूर्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, जिससे आर्थिक विकास बाधित होता है।

    क्षेत्रीय नियोजन के माध्यम से इन क्षेत्रों में संतुलित रूप से अवसंरचना का विकास किया जाता है, जिससे उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा मिलता है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, जीवन स्तर सुधरता है और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में मदद मिलती है।

7. पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास:- 

     भारत में क्षेत्रीय नियोजन पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। अनियोजित औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन से वनों की कटाई, जल संकट, भूमि क्षरण तथा प्रदूषण जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। क्षेत्रीय नियोजन के माध्यम से संसाधनों का संतुलित उपयोग, हरित क्षेत्रों का संरक्षण और पर्यावरण अनुकूल विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।

    यह स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजनाएँ बनाकर प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को भी कम करता है। इस प्रकार क्षेत्रीय नियोजन आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हुए सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

8. आपदा प्रबंधन में सहायता:- 

    भारत के विभिन्न क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप और चक्रवात से प्रभावित होते हैं। क्षेत्रीय नियोजन इन आपदाओं के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अंतर्गत संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, भूमि उपयोग की उचित योजना, सुरक्षित अवसंरचना का विकास तथा आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया जाता है।

     उदाहरण के लिए, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में तटबंध निर्माण और जल निकासी व्यवस्था सुधारी जाती है। साथ ही, स्थानीय समुदायों को जागरूक बनाकर आपदा के समय त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित की जाती है। इस प्रकार क्षेत्रीय नियोजन जीवन और संपत्ति की हानि को कम करने में सहायक होता है।

9. क्षेत्रीय पहचान एवं सांस्कृतिक संरक्षण:- 

    भारत विविधताओं का देश है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट भाषा, परंपराएँ, रीति-रिवाज, कला एवं सांस्कृतिक धरोहर है। क्षेत्रीय नियोजन इन सांस्कृतिक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए विकास की रूपरेखा तैयार करता है, जिससे आधुनिकीकरण के साथ-साथ स्थानीय पहचान सुरक्षित रह सके।

     उदाहरण के रूप में, पर्यटन विकास में स्थानीय संस्कृति, हस्तशिल्प और परंपराओं को बढ़ावा दिया जाता है। यदि क्षेत्रीय नियोजन न हो, तो अंधाधुंध विकास से सांस्कृतिक क्षरण की संभावना बढ़ जाती है। अतः संतुलित क्षेत्रीय नियोजन सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

10. राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना:- 

    भारत में क्षेत्रीय नियोजन राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक, सामाजिक एवं अवसंरचनात्मक असमानताएँ कम होती हैं, तो लोगों में असंतोष और क्षेत्रवाद की भावना घटती है। संतुलित विकास से सभी क्षेत्रों को समान अवसर मिलते हैं, जिससे समावेशी विकास (Inclusive Growth) को बढ़ावा मिलता है।

    इससे पिछड़े क्षेत्रों में भी विश्वास और भागीदारी बढ़ती है। परिणामस्वरूप, क्षेत्रीय असंतुलन के कारण उत्पन्न होने वाले तनाव, अलगाववाद एवं सामाजिक विभाजन कम होते हैं और देश की अखंडता एवं एकता सुदृढ़ होती है।

भारत में क्षेत्रीय नियोजन के उदाहरण 

1.  पंचवर्षीय योजनाएँ:- 

     भारत में पंचवर्षीय योजनाएँ आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए बनाई गई दीर्घकालीन योजनाएँ थीं, जिन्हें Planning Commission द्वारा 1951 से लागू किया गया। इन योजनाओं का उद्देश्य कृषि, उद्योग, रोजगार, गरीबी उन्मूलन एवं क्षेत्रीय संतुलन को बढ़ावा देना था। प्रथम योजना में कृषि पर जोर दिया गया, जबकि द्वितीय योजना में औद्योगीकरण को प्राथमिकता दी गई।

     समय के साथ इन योजनाओं ने हरित क्रांति, बुनियादी ढाँचे और मानव संसाधन विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 2015 में पंचवर्षीय योजनाओं को समाप्त कर NITI Aayog की स्थापना की गई, जो नीति निर्माण में सहयोग करता है।

  2. नीति आयोग:-  

    नीति आयोग की स्थापना 1 जनवरी 2015 को की गई, जिसने Planning Commission का स्थान लिया। यह भारत सरकार का प्रमुख नीति निर्माण एवं थिंक टैंक है, जिसका उद्देश्य सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देना और राज्यों को विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाना है।

     नीति आयोग दीर्घकालिक नीतियाँ, रणनीतियाँ एवं योजनाएँ तैयार करता है तथा नवाचार, सतत विकास और समावेशी वृद्धि पर जोर देता है। इसके प्रमुख कार्यक्रमों में आकांक्षी जिला कार्यक्रम शामिल है, जो पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर केंद्रित है।

 3. क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम:- 

     भारत में क्षेत्रीय विकास कार्यक्रमों का उद्देश्य पिछड़े एवं अविकसित क्षेत्रों का संतुलित विकास सुनिश्चित करना है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाया जाता है। NITI Aayog द्वारा संचालित आकांक्षी जिला कार्यक्रम इसका प्रमुख उदाहरण है, जो देश के पिछड़े जिलों को तेजी से विकसित करने पर केंद्रित है।

    इसके अलावा ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़क निर्माण तथा जल संसाधन विकास जैसी योजनाएँ भी शामिल हैं। ये कार्यक्रम क्षेत्रीय असमानताओं को कम कर समावेशी एवं सतत विकास को बढ़ावा देते हैं, जिससे राष्ट्रीय विकास की गति तेज होती है।

क्षेत्रीय नियोजन की चुनौतियाँ:

  • राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन बाधित होता है।
  • वित्तीय संसाधनों की कमी से विकास परियोजनाएँ अधूरी रह जाती हैं।
  • क्षेत्रों के बीच गहरी आर्थिक एवं सामाजिक असमानताएँ संतुलन बनाना कठिन बनाती हैं।
  • सटीक डेटा एवं वैज्ञानिक योजना निर्माण की कमी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
  • केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच समन्वय का अभाव योजनाओं को कमजोर करता है।
  • स्थानीय स्तर पर जागरूकता एवं भागीदारी की कमी से योजनाएँ सफल नहीं हो पाती हैं।

सुधार के उपाय: 

  • विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देकर स्थानीय स्तर पर प्रभावी योजना निर्माण सुनिश्चित करना।
  • आधुनिक तकनीक (GIS, Remote Sensing) का उपयोग कर सटीक और डेटा-आधारित योजना बनाना।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
  • पिछड़े क्षेत्रों में अवसंरचना (सड़क, बिजली, जल) का तीव्र विकास करना।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को प्रोत्साहित कर निवेश बढ़ाना।
  • सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप पर्यावरण-संवेदनशील योजना लागू करना।

निष्कर्ष: 

   इस प्रकार भारत में क्षेत्रीय नियोजन अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह न केवल आर्थिक विकास को संतुलित करता है, बल्कि सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय एकता को भी सुनिश्चित करता है। यदि क्षेत्रीय असमानताओं को दूर नहीं किया गया, तो विकास असंतुलित रहेगा। अतः प्रभावी क्षेत्रीय नियोजन भारत के सम्पूर्ण और सतत विकास की कुंजी है।

23. Petro-Chemical Complexes with Reference to India / पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स : भारत के संदर्भ में

Petro-Chemical Complexes with Reference to India 

पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स : भारत के संदर्भ में

Petro-Chemical Complexes

परिचय:

     पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स वे एकीकृत औद्योगिक परिसर हैं जहाँ कच्चे तेल (Crude Oil) अथवा प्राकृतिक गैस से विभिन्न आधारभूत एवं उच्च मूल्य के रासायनिक उत्पादों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। ये कॉम्प्लेक्स आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के केंद्रीय स्तंभ माने जाते हैं, क्योंकि इनके उत्पाद प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर, रबर, उर्वरक, डिटर्जेंट, पेंट, दवा, पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल तथा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करते हैं।

     भारत में पेट्रोकेमिकल उद्योग का विकास 1960 के दशक में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से प्रारंभ हुआ, परंतु 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र की भागीदारी और विदेशी निवेश के कारण इस क्षेत्र में तीव्र वृद्धि हुई। आज भारत विश्व के प्रमुख पेट्रोकेमिकल उपभोक्ता और उत्पादक देशों में सम्मिलित है।

पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स की संरचना 

    पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स सामान्यतः तीन स्तरों में विभाजित होते हैं:

(1) अपस्ट्रीम (Upstream):-

     इस चरण में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का अन्वेषण एवं उत्पादन किया जाता है। रिफाइनरी में कच्चे तेल का आसवन कर विभिन्न अंश प्राप्त किए जाते हैं, जैसे- नेफ्था, एलपीजी, एथेन आदि। यही पदार्थ आगे पेट्रोकेमिकल उत्पादन के लिए फीडस्टॉक के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

(2) मिडस्ट्रीम (Midstream):-

     इस चरण में क्रैकिंग प्रक्रिया द्वारा नेफ्था या गैस को तोड़कर एथिलीन, प्रोपिलीन, ब्यूटाडीन जैसे ओलेफिन तथा बेंजीन, टोल्यून, जाइलिन जैसे एरोमैटिक्स तैयार किए जाते हैं। ये आधारभूत रसायन आगे पॉलीमर उत्पादन में प्रयुक्त होते हैं।

(3) डाउनस्ट्रीम (Downstream):-

     इस चरण में पॉलीइथिलीन (PE), पॉलीप्रोपिलीन (PP), पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC), सिंथेटिक रबर, पॉलिएस्टर फाइबर, प्लास्टिक उत्पाद आदि का निर्माण होता है। यही उत्पाद उपभोक्ता वस्तुओं और औद्योगिक उत्पादों में उपयोग किए जाते हैं।

भारत के प्रमुख पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स

1. जामनगर (गुजरात):-

     जामनगर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित भारत का सबसे प्रमुख रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। यहाँ विश्व के सबसे बड़े एकीकृत रिफाइनरी परिसरों में से एक स्थापित है, जिसका संचालन Reliance Industries द्वारा किया जाता है। जामनगर परिसर में दो विशाल रिफाइनरियाँ तथा उन्नत पेट्रोकेमिकल इकाइयाँ कार्यरत हैं।

     इस कॉम्प्लेक्स की प्रमुख विशेषता Oil-to-Chemicals (O2C) मॉडल है, जिसमें कच्चे तेल को रिफाइन कर सीधे उच्च मूल्य वाले रसायनों और पॉलिमर उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है। यहाँ एथिलीन, प्रोपिलीन, पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपिलीन, एरोमैटिक्स तथा विभिन्न स्पेशलिटी केमिकल्स का उत्पादन होता है।

      जामनगर की तटीय स्थिति और आधुनिक बंदरगाह सुविधा के कारण कच्चे तेल का आयात और तैयार उत्पादों का निर्यात अत्यंत सुगम है। यह परिसर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात आय और औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

      उन्नत तकनीक, डिजिटल नियंत्रण प्रणाली और पर्यावरणीय मानकों के पालन के कारण जामनगर पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी माना जाता है। यह भारत को विश्व पेट्रोकेमिकल मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान दिलाने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

2. पानीपत (हरियाणा):-   

     पानीपत हरियाणा राज्य में स्थित उत्तर भारत का एक प्रमुख रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। यहाँ स्थित पानीपत रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स का संचालन Indian Oil Corporation (IOCL) द्वारा किया जाता है। यह भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन एवं रिफाइनिंग कंपनी है।

    पानीपत कॉम्प्लेक्स की विशेषता इसकी नाफ्था क्रैकर इकाई है, जो एथिलीन और प्रोपिलीन जैसे आधारभूत पेट्रोकेमिकल्स का उत्पादन करती है। इन्हीं रसायनों से पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपिलीन और अन्य पॉलिमर तैयार किए जाते हैं, जो प्लास्टिक, पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल, वस्त्र एवं उपभोक्ता उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग होते हैं।

    यह कॉम्प्लेक्स राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और उत्तर भारत के औद्योगिक बाजारों के निकट स्थित है, जिससे तैयार उत्पादों की आपूर्ति सुगम होती है। साथ ही, यह क्षेत्र रेल और सड़क नेटवर्क से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

     पानीपत पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स ने क्षेत्रीय आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और औद्योगिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आधुनिक तकनीक, ऊर्जा दक्षता और पर्यावरणीय मानकों के पालन के कारण यह भारत के प्रमुख एकीकृत पेट्रोकेमिकल परिसरों में गिना जाता है।

3. दाहेज (गुजरात):-

      दाहेज गुजरात राज्य के भरूच (Bharuch) जिले में खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) के तट पर स्थित है। इसकी समुद्री स्थिति इसे एक प्रमुख औद्योगिक और बंदरगाह केंद्र बनाती है। यहाँ गहरे पानी का बंदरगाह (Deep Draft Port) उपलब्ध है, जिससे बड़े जहाज सीधे कच्चा माल और तैयार माल का परिवहन कर सकते हैं।

  अर्थात Dahej क्षेत्र को PCPIR (Petroleum, Chemicals and Petrochemical Investment Region) के रूप में विकसित किया गया है। यह क्लस्टर आधारित औद्योगिक मॉडल का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ LNG टर्मिनल, बंदरगाह सुविधा और अनेक केमिकल इकाइयाँ स्थित हैं। यह भारत के सबसे बड़े निवेश आकर्षण क्षेत्रों में से एक है।

4. हल्दिया (पश्चिम बंगाल):-

    हल्दिया पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले में स्थित एक प्रमुख औद्योगिक एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। यहाँ Haldia Petrochemicals Limited कार्यरत है, जो पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपिलीन तथा अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्माण करती है। हल्दिया बंदरगाह (Haldia Dock Complex) की उपलब्धता के कारण कच्चे माल का आयात और तैयार उत्पादों का निर्यात सुगम है। यह पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी भारत के लिए पेट्रोकेमिकल आपूर्ति का महत्वपूर्ण आधार है तथा क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

5. हजीरा (गुजरात):- 

      हजीरा गुजरात राज्य के सूरत जिले में अरब सागर के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण औद्योगिक एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। इसकी तटीय स्थिति और विकसित बंदरगाह सुविधा इसे कच्चे माल के आयात तथा तैयार उत्पादों के निर्यात के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है।

     हजीरा में गैस आधारित पेट्रोकेमिकल इकाइयाँ प्रमुख हैं। यहाँ Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) की गैस प्रसंस्करण इकाइयाँ तथा अन्य निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ कार्यरत हैं। प्राकृतिक गैस की उपलब्धता के कारण यहाँ एथिलीन, प्रोपिलीन तथा विभिन्न पॉलिमर उत्पादों का निर्माण होता है।

    हजीरा औद्योगिक क्षेत्र दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर (DMIC) से जुड़ा हुआ है, जिससे परिवहन एवं लॉजिस्टिक सुविधाएँ मजबूत हुई हैं। यह क्षेत्र गुजरात को भारत का अग्रणी पेट्रोकेमिकल हब बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    इसके अतिरिक्त, हजीरा क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रबंधन, आधुनिक अवसंरचना तथा ऊर्जा आपूर्ति की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध है, जिससे यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेश के लिए आकर्षक केंद्र बना हुआ है।

पेट्रो-केमिकल कॉम्प्लेक्स के प्रमुख उत्पाद:

✍️ प्लास्टिक और पॉलिमर: पॉलीइथाइलीन (PE), पॉलीप्रोपाइलीन (PP), पॉलिविनाइल क्लोराइड (PVC), पॉलीस्टाइनिन (PS)।

✍️ सिंथेटिक फाइबर: पॉलिएस्टर, नायलॉन, ऐक्रेलिक (कपड़ा उद्योग के लिए)।

✍️ सिंथेटिक रबर: टायर और ऑटोमोबाइल पार्ट्स के लिए।

✍️ औद्योगिक रसायन: एथिलीन ग्लाइकॉल, एसिड, एसीटोन, और सॉल्वैंट्स।

✍️ अन्य: उर्वरक (यूरिया), डिटर्जेंट, पेंट, और डिटर्जेंट के लिए कच्चे माल।

    इन परिसरों में नेफ्था या गैस को स्टीम क्रैकिंग प्रक्रिया के माध्यम से इन उत्पादों में बदला जाता है, जो आधुनिक विनिर्माण की नींव हैं।

भारत के प्रमुख पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के स्थान चयन के कारक:

(i) कच्चे माल की उपलब्धता – नेफ्था, प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल की निकटता उत्पादन लागत को कम करती है।

(ii) तटीय स्थिति एवं बंदरगाह – आयात–निर्यात सुविधा हेतु गहरे पानी के बंदरगाह आवश्यक होते हैं (जैसे गुजरात तट)।

(iii) ऊर्जा संसाधन – पेट्रोकेमिकल उद्योग ऊर्जा-गहन है, इसलिए बिजली एवं गैस की निरंतर आपूर्ति जरूरी है।

(iv) जल उपलब्धता – शीतलन (Cooling) एवं औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त जल की आवश्यकता होती है।

(v) परिवहन सुविधा – सड़क, रेल, पाइपलाइन एवं बंदरगाह नेटवर्क से जुड़ाव लागत घटाता है।

(vi) बाजार की निकटता – तैयार उत्पादों की खपत के लिए बड़े औद्योगिक एवं शहरी बाजार महत्वपूर्ण हैं।

(vii) सरकारी नीतिगत समर्थन – PCPIR /Petroleum, Chemicals and Petrochemicals Investment Region, औद्योगिक कॉरिडोर और कर प्रोत्साहन स्थान चयन को प्रभावित करते हैं।

(viii) भूमि एवं अवसंरचना – बड़े भू-क्षेत्र और विकसित औद्योगिक ढाँचा आवश्यक होता है।

आर्थिक महत्व:

✍️ विनिर्माण GDP में महत्वपूर्ण योगदान।

✍️ प्लास्टिक, ऑटोमोबाइल, वस्त्र, पैकेजिंग एवं फार्मा उद्योग को कच्चा माल उपलब्ध कराना।

✍️ निर्यात आय में वृद्धि।

✍️ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन।

✍️ MSME / Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises क्षेत्र को किफायती कच्चा माल।

✍️ औद्योगिक आत्मनिर्भरता और आयात प्रतिस्थापन को बढ़ावा।

सरकारी नीतियाँ:

✍️ PCPIR (Petroleum, Chemicals & Petrochemical Investment Region) नीति।

✍️ मेक इन इंडिया पहल।

✍️ आत्मनिर्भर भारत अभियान।

✍️ उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ।

✍️ विदेशी निवेश (FDI) को प्रोत्साहन।

✍️ औद्योगिक कॉरिडोर (DMIC आदि) का विकास।

पर्यावरणीय प्रभाव:

✍️ वायु प्रदूषण (SOx, NOx, CO₂ उत्सर्जन)।

✍️ जल प्रदूषण एवं रासायनिक अपशिष्ट।

✍️ ठोस एवं खतरनाक कचरा।

✍️ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन।

✍️ समुद्री एवं तटीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव।

✍️ समाधान हेतु ग्रीन टेक्नोलॉजी और रीसाइक्लिंग की आवश्यकता।

चुनौतियाँ: 

✍️ कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव।

✍️ उच्च पूंजी निवेश की आवश्यकता।

✍️ वैश्विक प्रतिस्पर्धा।

✍️ पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन।

✍️ तकनीकी निर्भरता और नवाचार की कमी।

✍️ प्लास्टिक उपयोग पर वैश्विक प्रतिबंधों का प्रभाव।

भविष्य की संभावनाएँ:  

✍️ Oil-to-Chemicals (O2C) मॉडल का विस्तार।

✍️ स्पेशलिटी केमिकल्स उत्पादन में वृद्धि।

✍️ बायो-पेट्रोकेमिकल्स का विकास।

✍️ निर्यात उन्मुख उत्पादन रणनीति।

✍️ डिजिटल ऑटोमेशन और ऊर्जा दक्षता।

✍️ सर्कुलर इकोनॉमी और ग्रीन टेक्नोलॉजी को अपनाना।

निष्कर्ष:

      पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स भारत की औद्योगिक संरचना के महत्वपूर्ण आधार हैं। ये न केवल आर्थिक विकास को गति देते हैं, बल्कि रोजगार, निर्यात और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को भी सुदृढ़ करते हैं। उचित नीति, पर्यावरण संतुलन और तकनीकी नवाचार के माध्यम से भारत इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

1. River Valley Regions (नदी घाटी क्षेत्र)

1. River Valley Regions

(नदी घाटी क्षेत्र)



        नदी घाटी क्षेत्र एक ऐसी घाटी होती है जो नदी द्वारा आसपास के परिदृश्य को काट कर बनाई जाती है, जिससे V-आकार का रूप बनता है। यह क्षेत्र कृषि, जल संसाधन और परिवहन के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं।

नदी घाटी क्षेत्र की विशेषताएं:-

(i) V-आकार की घाटी:-

        नदी के पानी में बहने वाली चट्टानें नदी के तल को काटती हैं, जिससे V-आकार की घाटी बनती है।

(ii) कृषि के लिए उपजाऊ:-

        नदी के किनारे की मिट्टी जिसे खादर कहते है, काफी उपजाऊ होती है। यह मिट्टी कृषि के लिए उपयुक्त होती है।

(iii) जल संसाधन:-

        नदियाँ पीने और सिंचाई के लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

(iv) परिवहन:-

       नदियाँ परिवहन के लिए भी महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वे जलमार्ग प्रदान करती हैं।

(v) सभ्यता का विकास:-

       कई प्राचीन सभ्यताएँ नदी घाटियों में ही विकसित हुई हैं, जैसे कि सिंधु घाटी सभ्यता।

भारत में नदी घाटी परियोजनाएँ:

     भारत में कई नदी घाटी परियोजनाएँ जो कि बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ हैं। ये मुख्यतः बिजली उत्पादन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण, नौ संचालन, मत्स्य पालन जैसे उद्देश्यों के लिए बनाई गई हैं। 

जैसे- दामोदर नदी घाटी परियोजना, नर्मदा नदी घाटी परियोजना, भाखड़ा नांगल परियोजना, इडुक्की परियोजना, उकाई परियोजना, ऊपरी कृष्णा परियोजना, कोसी परियोजना, गण्डक परियोजना आदि। 
River Valley Regions

नदी घाटी क्षेत्र की संकल्पना:

      नदी घाटी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र है जिसे क्षेत्रीय विकास नियोजन में एक इकाई के रूप में लिया जा सकता है। इसमें मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रवाहित क्षेत्र शामिल है। यह भौतिक और सामाजिक रूप से एकीकृत क्षेत्र है और इसे नियोजन क्षेत्र की एक आदर्श इकाई के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

    नदी घाटी नियोजन विकास और संरक्षण दोनों को एक साथ लाने का एक पारिस्थितिक रूप से सुदृढ़ और आर्थिक रूप से लागत प्रभावी साधन है। संपूर्ण नदी बेसिन को विकसित करने में शामिल विचार क्षेत्रवार आधार पर विकास को प्रेरित करना है ताकि सभी प्राकृतिक संसाधन बेसिन की सभी उप-इकाइयों को स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हों। इसलिए नदी बेसिन नियोजन की अवधारणा को क्षेत्रीय विकास दृष्टिकोण के एक भाग के रूप में देखा जाता है।

नदी घाटी क्षेत्र के लिए अलग नियोजन:

    भारत के सिंचाई आयोग (1972) ने नदी बेसिन योजना के निर्माण के लिए निम्नलिखित नीति की सिफारिश की है-

(i) बेसिन योजना को क्षेत्रीय और स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए भूमि-जल संसाधनों की एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करनी चाहिए।

(ii) मांग के अनुसार जरूरतों को पूरा करने के लिए बेसिन में विभिन्न इंजीनियरिंग कार्य किए जाने चाहिए। जैसे- जल संसाधनों का प्राथमिकता के अनुसार उपयोग, परियोजनाओं की प्राथमिकता।

(iii) योजना की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए तथा बदलती जरूरतों और आपूर्ति के मद्देनजर आवश्यकतानुसार इसमें संशोधन किया जाना चाहिए।

       यह अर्थव्यवस्था को प्रेरित करने के लिए जल प्रेरित विकास पर आधारित है तथा अंतरराज्यीय नदी बेसिन के लिए सहयोग की आवश्यकता है।

उद्देश्य:

      नदी घाटी क्षेत्र नियोजन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जल संसाधनों का उचित प्रबंधन:-

      नदी घाटी क्षेत्र में जल की उपलब्धता, उपयोग और वितरण को योजनाबद्ध तरीके से प्रबंधित करना ताकि सभी क्षेत्रों और उपयोगों के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो सके।

(ii) बाढ़ नियंत्रण:-

     बाढ़ के खतरों को कम करने और बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए बांध, तटबंध और अन्य संरचनाओं का निर्माण करना।

(iii) समुचित सिंचाई की व्यवस्था करना:-

      कृषि के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सिंचाई प्रणालियों का विकास करना, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सके।

(iv) बिजली उत्पादन:-

       जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से बिजली का उत्पादन करना जो ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करता है।

(v) भूमि उपयोग योजना:-

    नदी घाटी क्षेत्र में भूमि के विभिन्न उपयोगों (जैसे कृषि, उद्योग, आवास) को योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थित करना, ताकि संसाधनों का अधिकतम और प्रभावी उपयोग हो सके।

(vi) पर्यावरण संरक्षण:-

       नदी घाटी क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करना, ताकि भविष्य में भी इनका लाभ उठाया जा सके।

(vii) सामाजिक-आर्थिक विकास:-

       नदी घाटी क्षेत्र के निवासियों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, जैसे कि रोजगार सृजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार।

(viii) मत्स्य पालन और पर्यटन:-

      नदी घाटी क्षेत्र में मत्स्य पालन और पर्यटन को बढ़ावा देना, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार और आय के अवसर मिल सकें।

नदी घाटी क्षेत्र की समस्याएं:

1. विभिन्न फसलों के लिए भूमि और जल की उपयुक्तता और उपयोग के लिए उचित भूमि-जल प्रबंधन नहीं होना।

2. वैकल्पिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभाव।

3. बाढ़, फसलों की अनिश्चितता, जीवन और संपत्ति।

4. प्रति हेक्टेयर कम उत्पादन।

5. वर्षा पर कृषि की निर्भरता।

6. ग्रामीण संरचनात्मक सुविधाओं का अभाव।

7. वर्षा जल की बर्बादी।

8. मृदा अपरदन।

9. पेयजल की समस्या।

10. वन अपरदन।

11. फसल की उपयुक्तता के लिए मिट्टी के वैज्ञानिक परीक्षण और उचित नियोजन का अभाव

योजना और संभावनाएँ:

(i) कृषि

(ii) मत्स्य पालन

(iii) जलीय कृषि

(iv) उद्योग

(v) जल विज्ञान शक्ति

      बाढ़ प्रतिरोधी फसलें- अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, मनीला द्वारा 2004 में “स्वर्ण जलमग्नता-I” के रूप में विकसित चावल की किस्म और ढाका में चावल अनुसंधान द्वारा प्रचलित।

     एक नदी बेसिन का जल निकासी बेसिन योजनाबद्ध विकास के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य, शारीरिक रूप से एकीकृत और व्यापक रूप से स्वीकृत क्षेत्रीय इकाई साबित हुआ है।

     नदी बेसिन एक प्राकृतिक अपेक्षाकृत आसानी से परिभाषित क्षेत्र है। इसमें संसाधन संपदा के कई तत्व हैं, जो अधिकांश भाग में सांस्कृतिक और पारिस्थितिक प्रक्रिया से जुड़े हैं, सतह विन्यास, मिट्टी, वनस्पति और जलवायु उन तत्वों में से हैं जो जल निकासी बेसिन के भीतर पानी से जुड़े हैं।

     नदी बेसिन को पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका में क्षेत्रीय नियोजन के लिए एक इकाई के रूप में 1933 में लिया गया था जब टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA- टेनेसी घाटी प्राधिकरण) की स्थापना की गई थी।

    भारत में मार्च, 1948 में दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) को नदी बेसिन विकास के उद्देश्य से एक केंद्रीय सरकारी एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ को नियंत्रित करना और सिंचाई, बिजली उत्पादन, नौवहन, जल आपूर्ति, मृदा संरक्षण, मत्स्य विकास आदि के लिए प्रावधान करना था।

वाटरशेड क्षेत्र

      वाटरशेड एक भौगोलिक क्षेत्र है जो वर्षा जल को एक सामान्य बिंदु पर बहा देता है। अर्थात वाटरशेड भूमि का वह क्षेत्र होता है जिसका समस्त अपवाहित जल एक ही बिंदु से होकर गुजरता है। वर्षा जल का आकार इसके आगे के वर्गीकरण का आधार बनता है।

      वाटरशेड क्षेत्र को आकार के अनुसार कई प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। जैसे-

(i) मिनी-वाटरशेड (Mini-Watershed):

      यह सबसे छोटा प्रकार का वाटरशेड है, जिसका क्षेत्र 1 से 100 हेक्टेयर तक होता है।

(ii) माइक्रो-वाटरशेड (Micro-Watershed):

      इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 100 से 1000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(iii) मिली-वाटरशेड (Milli-Watershed):

       इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 1000 से 10,000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(iv) सब-वाटरशेड (Sub-Watershed):

        इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 10,000 से 50,000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(v) मैक्रो-वाटरशेड (Macro-Watershed):

      यह सबसे बड़ा प्रकार का वाटरशेड है, जिसका क्षेत्र 50,000 हेक्टेयर से अधिक होता है।

योजना का उद्देश्य:

1. जल संरक्षण

2. वर्षा जल संचयन

3. पेयजल का समाधान

4. सिंचाई सुविधाएँ

5. वानिकी और मत्स्य पालन

6. कृषि और जलीय कृषि

नियोजन के लिए एक इकाई के रूप में नदी घाटी क्षेत्र: समस्याएं

⇒ इसमें भौतिक, सामाजिक और आर्थिक एकरूपता नहीं है और इसलिए इसे बहु-स्तरीय नियोजन की आवश्यकता है।

⇒ इसकी बहु-राष्ट्रीय सीमाएँ हो सकती हैं।

विकास की गति में असमानता

⇒ अंतर-राज्यीय विवाद

2. Metropolitan Regions (मेट्रोपोलिटन क्षेत्र)

    2. Metropolitan Regions

(मेट्रोपोलिटन क्षेत्र)



     मेट्रोपोलिटन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘महानगर’ अर्थात बड़े नगरों को ही महानगर कहा जाता है।

     भारतीय संविधान के 74वें संशोधन में महानगरीय क्षेत्र को “दस लाख या उससे अधिक की आबादी वाला क्षेत्र, जो एक या एक से अधिक नगर पालिकाओं के अंतर्गत आता हो और दो या अधिक नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायत या अन्य समीपवर्ती क्षेत्रों से मिलाकर बना हो, जिसे राज्य प्रमुख द्वारा लिखित अधिसूचना द्वारा महानगरीय क्षेत्र घोषित किया गया हो” के रूप में परिभाषित किया गया है।

      इस प्रकार भारत में दस लाख से अधिक आबादी वाले नगर महानगर कहलाता हैं। वर्तमान समय में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से महानगरीय प्रदेश का महत्त्वपूर्ण स्थान है। विश्व के प्रायः सभी देशों में देश के आर्थिक विकास में महानगरीय प्रदेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रदेश में नगर के आस-पास का क्षेत्र भी सम्मिलित रहता हैं। महानगरीय प्रदेश के विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण कारक यातायात के साधनों का विकास है। महानगरीय प्रदेश अर्थात् मेट्रोपोलिटन प्रदेशों में नगरों और उसके आस-पास के क्षेत्रों के बीच पारस्पारिक एवं अन्योनाश्रित संबंध रहता है।

     कोई भी वृहत् नगर अपने आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में फैलता जाता है। नगरों के आकार में वृद्धि होने के साथ ही नगरों के क्रिया-कलापों में भी वृद्धि होने लगती हैं। इसके बाद नगरों के बाहर 20-30 कि.मी. की परिधि में स्थित सभी गांवों और छोटे-छोटे नगरों को मिला लिया जाता हैं। इस प्रकार नगर तथा नगर के संपूर्ण सम्मिलित नगरीय तथा ग्रामीण भाग को महानगरीय (Metropolitan) प्रदेश के नाम से जाना जाता हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली NCR मेट्रोपोलिटन प्रदेश, मुम्बई मेट्रोपोटन प्रदेश, कोलकाता, चिन्नई, अहमदाबाद नगर के मेट्रापोलिटन प्रदेशों का नाम लिया जा सकता हैं।

     इस प्रदेश को नियोजन कहना अधिक उचित होगा क्योंकि संपूर्ण मेट्रोपोलिटन प्रदेश का वातावरण एक सा रहता है। अतः उसके विकास कार्य के लिए समस्त क्षेत्रों का समान रूप से विकास करने की आवश्यकता है। डिकिन्सन के शब्दों में यह महानगर प्रदेश आर्थिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण स्थान रखता हैं क्योंकि बड़े नगर आस-पास के छोटे नगरों पर अपना प्रभाव डालता है। पटना महानगर प्रदेश में स्थित दानापुर, फुलवारी, फतुहा आदि छोटे नगर प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार दिल्ली मेट्रोपोलिटन प्रदेश में स्थित रोहतक, पानीपत सोनीपत, मेरठ, गजियाबाद, बुलंदशहर, फरीदाबाद, गुड़गांव, अलबर, रिवाड़ी आदि नगर दिल्ली से प्रभावित होते हैं।

नगरीकरण की प्रवृति:

      भारत में नगरीकरण की प्रवृति में तीव्रता आयी हैं। वर्ष 1981 ई. में भारत में 12 महानगर थे जो बढ़कर 1991 ई. में 23 और 2001 में 35 और 2011 में 53 हो गये। इन महानगरों में भारत की कुल नगरीय जनसंख्या का 1991 ई. में 32.54% तथा 2001 ई. में 37. 8% 2011 में 64.4% निवास करती है। 1981-91 के बीच इसकी जनसंख्या में 67.76% जबकि 1991-2001 में 52.69% की वृद्धि हुई है। 1941-51 में यह वृद्धि 121.56% हुई थी, 1981 ई. में इन 12 महानगरों की कुल जनसंख्या 42121700 थी जबकि 1991 ई. में यह बढ़कर 23 महानगरों में 70661259 तथा 2001 ई. में 35 महानगरों में 107881836 हो गयी और अब  2011 में 53 महानगरों में 16,07,00,000 (16.07 करोड़) हो गई।

     जनसंख्या का इतनी अधिक वृद्धि के कारण नगरों में अनेक समस्याओं का जन्म हुआ साथ ही नगर नियोजन भी असफल हो गया। नगर नियोजन का मुख्य उद्देश्य नगर के पुराने क्षेत्रों की दशा सुधारना होता है, जबकि मेट्रोपोलिटन प्रदेश में नये क्षेत्रों का समावेश होता है। अतः अब महानगरों की दशा सुधारने के साथ-साथ उसके आस-पास के क्षेत्रों की, जिसे मेट्रोपोलिटन प्रदेश (Metropolitan Region) कहते हैं, दशा में सुधार लाने की आवश्यकता समझी जाने लगी है।

     महानगर के पुराने क्षेत्र तथा नगरीय प्रदेश के नये क्षेत्रों की सेवाओं और सुविधाओं में काफी अंतर दिखने लगा है क्योंकि नये विकसित क्षेत्र में सुधार की संभावनायें अधिक पायी जाती है जबकि पुराने नगर के क्षेत्रों में सुधार लाने के लिए परिवर्तन की आवश्यकता हो जाती है जो बहुत ही कठिन हो जाता है। इसके विकास के लिये कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक हैं।

1. महानगरों तथा महानगरीय प्रदेशों का योजनाबद्ध एवं सीमाबद्ध विकास कार्य किये जाय जिससे नये तथा पुराने दोनों क्षेत्रों का समुचित विकास हो सके।

2. कार्य एवं उपयोगिता के आधार पर इन प्रदेशों की भूमि का उपयोग होना चाहिए।

3. विकास के लिए पूर्व निश्चित योजना बनायी जाय।

4. गंदी बस्तियों को नहीं पनपने दिया जाय।

5. नगर तथा उस प्रदेश की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नियोजन कार्य किये जाय।

      किसी मेट्रापोलिटन प्रदेश में तीन संरचनात्मक कटिबंध (पेटी) होते हैं –

1. नगरीय क्षेत्र (Urban area)

2. ग्रामीण-नगर उपांत् (Rural-urbanfringe) तथा

3. समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र (Peripheral rural area),

      मेट्रोपोलिटन प्रदेश में नगर का विस्तार सड़क तथा रेल के किनारे तीव्र गति से होता हैं फिर भी महानगरीय सीमा का निर्धारण एक कठिन समस्या है। अनेक विद्वानों ने इस प्रदेश का सीमांकन को अलग-अलग ढंग से किया है। भारत में इस प्रदेश की जनसंख्या दस लाख से अधिक मानी गयी हैं। इसमें नगर के आस-पास जितने भी छोट-छोटे नगर हैं तथा उससे सटे गांव है, उन सभी को मिलाकर महानगर (मेट्रापोलिटन प्रदेश) कहा गया है। भारत में वर्त्तमान (2015 ई.) समय में 57 महानगर है। इन महानगरों का प्रभाव क्षेत्र की आर्थिक एवं सामाजिक विशेषताऐं भी अलग-अलग रहती हैं। जैसे-

(i) महानगरों में मकानों की भीड़ तथा ऊँचे-ऊँचे मकान रहती है।

(ii) नगरीय जीवन में भी भारी गिरावट आ जाती हैं। इतना ही नहीं, नगरों के अधिकांश भाग जल, वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से ग्रसित हो जाते हैं।

(iii) रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड, हवाई अड्‌डे तथा मुख्य बाजारों में भारी भीड़ रहती हैं।

(iv) नगरों में दिनों-दिन पानी तथा बिजली आपूर्ति की समस्या जटिल होती जाती हैं।

(v) महानगरों में मनोरंजन स्थल का अभाव होने लगता है।

(vi) भूमि तथा मकानों के दामों में तेजी से बढ़ोतरी होने लगती है।

(vii) यातायात मार्गों पर नगर उपांत की बढ़ोतरी में तीव्रता आ जाती है।

(viii) नगरों में छोड़े गये उद्योग के लिए भूमि का अतिक्रमण होना प्रारंभ हो जाता है।

(ix) सामाजिक ढांचे के बदलाव की प्रवृति होने लगती हैं। लोग अपने काम में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि उनके लिए अपने पड़ोसियों से बात करना कठिन हो जाता है। बहुत आवश्यक हुआ तो उनसे टेलिफोन पर बातें कर लेते हैं।

(x) टेलिफोन यहां की आवश्यक वस्तु हो जाती हैं तथा सभी मध्यमवर्ग के लोगों के लिए टेलिफोन सुविधा अनिवार्य हो जाती है। वर्तमान समय में टेलिफोन का स्थान मोबाइल ने ले लिया है।

(xi) नगर के मध्य भाग में आबादी का घनत्त्व बहुत रहता है। काम करने वालों में लगभग 50% लोग नगर के बाहर से अर्थात ग्रामीण नगरीय उपांत एवं ग्रामीण-नगरीय क्रमबद्धता (Rural Urban Fringe or Rural Urban Continuum) और सीमावर्ती क्षेत्र (Peripheral zone) से आते हैं, और रात में वे पुनः अपने-अपने घर लौट जाते है।

(xii) महानगरों में सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों से जनसंख्या का प्रवास तीव्र गति से होता है क्योंकि लोगों की यह धारणा रहती हैं कि नगरीय क्षेत्र में रोजगार की कमी नहीं रहती हैं।

(xiii) नगरीय सीमा के आस-पास अधिक किराया देने से बचने के लिए शयनागार (Dormitory) नगर का विकास होता है।

(xiv) महानगरों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में दिनों-दिन घटती जाती है। जबकि महानगरों से सटे छोटे नगरों में बड़े नगरों की तुलना में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि सीमावर्ती क्षेत्रों से पुरुष श्रमिकों का पलायन तीव्र गति से होता है। महिलायें घर में रहती हैं और पुरुष रोजगार की तलाश में बाहर चला जाता हैं।

(xv) अन्य नगरों की भांति महानगर भी उस प्रदेश की सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्थितियों का सही प्रतिनिधित्त्व करता है क्योंकि किसी भी महानगर का अस्तित्व महानगरीय प्रदेश के प्रभाव क्षेत्र पर निर्भर करता है जो नगर से 20-30 कि. मी. की दूरी तक चारों ओर फैला रहता हैं। महानगर ही इस प्रदेश को आर्थिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

      यहां कई छोटे-बड़े सेवा केन्द्र विकसित होते हैं। जैसे- दिल्ली महानगर के आस-पास गाजियाबाद, गुड़गांव, सोनीपत, फरीदाबाद, आदि नगरों में अनेक प्रकार के उद्योग विकसित हुए हैं। यहां के उद्योग के विकास में दिल्ली महानगर का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि दिल्ली में बाजार की सुविधा उपलब्ध हैं इसलिए आस-पास के नगरों में उद्योगों का विकास हुआ है। यही स्थिति प्रायः सभी महानगरों में तथा उसके सीमावर्ती प्रदेशों के साथ लागू होता है। यहां आवागमन की सुविधा का विकास होता है जिससे लोग कम खर्च एवं कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान तक आ जा सकते हैं। यहां झुग्गी-झोपड़ी की सख्या में भी तीव्रता से बढ़ोतरी होती है। दिल्ली से दूर-दूर तक व्यापारी लोग सामान ले जाते हैं। इसलिए दिल्ली के आस-पास के नगरों में उद्योग का विकास हुआ है।

    इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि महानगर से 20-30 कि.मी. की दूरी तक चारों तरफ महानगरीय प्रदेश (Metropolitan Region) का विस्तार रहता है, जहां से लोगों का रोजाना संपर्क बना रहता है। लोग रेल अथवा सड़क मार्ग से संपर्क बनाये रखते हैं।

    इस प्रकार महानगर तथा महानगरीय प्रदेश के बीच पारस्पारिक संबंध बना रहता है। महानगर के आस-पास से दूध, जलावन, हरी सब्जी, फल, अनाज आदि नगरों में आता है और सीमावर्ती क्षेत्र के लोग चिकित्सा, शिक्षा, मनोरंजन, बाजार आदि की सुविधा महानगरों से प्राप्त करते हैं। कुछ वर्षों में सीमावर्ती भाग महानगर में विलीन हो जाता है और पुनः महानगरीय प्रदेश का विस्तार होता है। जो महानगर जितना अधिक बड़ा होता हैं उसका महानगरीय प्रदेश भी उतना ही विकसित एवं विस्तृत होता है। महानगर के केन्द्र से जैसे-जैसे दूर जाते हैं लिंग अनुपात तथा जनसंख्या के घनत्त्व में कमी आ जाती है। महानगरीय प्रदेश में अनेक गहन कटिबंध (Zones) का विकास होता है जिसकी आर्थिक विशेषतायें अलग-अलग होती है।

    मुम्बई महानगर के आस-पास अनेक उपनगर पाये जाते हैं जहां विभिन्न प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है। इन उपनगरों से नगर में दूध, अंडा, मुर्गा, फल, सब्जी आदि भी आता है। 1991, 2001 तथा 2011 ई. में मुम्बई भारत का सबसे बड़ा नगर हो गया है। यहां 1991 ई. 35 लाख तथा 2001 ई. 56 लाख से भी अधिक जनसंख्या गंदी बस्तियों में रहती है। 20% जनसंख्या के रहने के लिए आवास नहीं है। एक लाख से अधिक लोग फुटपाथ पर रहते हैं।

      इस प्रकार महानगरीय प्रदेशों का आर्थिक महत्त्व बहुत ही अधिक है। यहां की 75% कार्यरत जनसंख्या अकृषित कार्य में लगी रहती हैं। महानगरीय प्रदेश किसी देश अथवा प्रदेश की नगरीकरण का द्योतक होता है। यह देश के आर्थिक विकास का सूचक है क्योंकि महानगरों के विकास पर औद्योगिकरण का प्रभाव पड़ता है। उद्योग वाले क्षेत्र में नगरीकरण की प्रवृति बहुत ही तीव्र रहती है। उसके साथ महानगरीय प्रदेश (Metropolitan Region) भी विकसित होता है। लोग गांवों से नगरों की ओर प्रवास करते हैं क्योंकि वहां यातायात, सुरक्षा, चिकित्सा, रोजगार, शिक्षा आदि की सुविधा रहती है। कुछ विद्वान महानगरीय प्रदेश को प्रभाव क्षेत्र (Umland) कहते हैं पर प्रभाव क्षेत्र का विस्तार बहुत अधिक दूर तक रहता है पर मेट्रोपोलिटन प्रदेश का विस्तार अपेक्षाकृत कम रहता है।

वृहत् मुम्बई (Greater Mumbai) प्रदेश (Metropolitan Region of Mumbai):-

     वृहत् मुम्बई की जनसंख्या 1991 में 12571720 थी जो बढ़कर 1995 में 151 लाख हो गयी। वर्त्तमान समय में मुम्बई का स्थान विश्व में सबसे बड़े नगरों में पांचवां है। इससे बड़ा दिल्ली महानगर है। यह भारत का एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह है। अभी देश का लगभग 42% विदेशी व्यापार इसी बंदरगाह से होता है। यह देश के सबसे अधिक विकसित वृहत् नगरीय प्रदेश है। यहाँ अधिकांश वित्तीय संस्थायें तथा बैंकों का प्रधान दफ्तर (Head Office) केन्द्रित है। इस प्रदेश में राज्य का लगभग 69.2% नगरीय जनसंख्या निवास करती है। कुल औद्योगिक श्रमिकों का 2/5वां हिस्सा इसी प्रदेश में कार्यरत है। इसकी पृष्ठभूमि भी काफी विकसित है।

    मुम्बई सात द्वीपों में फैला हुआ हैं जहां पहले किसान तथा मछुआरे रहा करते थे। प्रारंभ में इसके सातों द्वीपों को परस्पर जोड़ दिया गया था तथा दो द्वीपों के बीच समुद्र के छिछले तथा संकरे गढ्ढे को भर दिया गया था। 1853 ई. में मुम्बई तथा थाने को रेल मार्ग द्वारा जोड़ दिया गया था। भारत के पश्चिमी तट पर मुम्बई एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह है। यहां की जलवायु भी मातदिल है। दिसम्बर से फरवरी तक यहां का तापमान लगभग 20 से. रहता है तथा मार्च में मुम्बई का मौसम शुष्क हो जाता है। मई के बाद लगभग चार महीने तक वर्षा ऋतु का मौसम रहता है।

    बसीन, विरार, कल्याण, उड़ान, अरनाल, सतपती आदि मुम्बई के उपनगर है जो नगर को मछली, साग-सब्जी, दूध, अण्डे तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति करता हैं। मुम्बई नगरीय प्रदेश में प्रायः सभी उपनगर शयनागार नगरों के रूप में हैं। थाने, जो पहले उपनगर था, अब वह मुम्बई महानगर का मुख्य औद्योगिक क्षेत्र बन गया है। अतः वर्तमान समय में, महानगरीय प्रदेश में अनेक प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है। यहां से आस-पास के क्षेत्रों से कच्चा माल प्राप्त कर उद्योगों से तैयार माल देश तथा विदेशों के बाजार में भेजा जाता है। यहां रोजगार की भी सुविधा है और बाजार की भी है। इस प्रदेश में धन का भी अभाव नहीं है। इसलिए यह देश के महत्त्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है।

     मुम्बई महानगर में जनसंख्या में भी तीव्र गति से वृद्धि हुई है। कहा जाता है पुर्तगाल के समय यहां लगभग दस हजार जनसंख्या थी बाद में अंग्रेजों के समय यह संख्या बढ़कर 60 हजार हो गयी। 1901 ई. यहां की आबादी 7.7 लाख थी जो बढ़कर 1951 ई. 23.2 लाख हो गयी। जनसंख्या की वृद्धि निम्न तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है।

तालिका

वृहत् मुम्बई प्रदेश की जनसंख्या

वर्ष  जनसँख्या हजार में वृद्धि % प्रति दशक
1901 928
1911 1139 +23.8
1921 1380 +20.2
1931 1398 +1.3
1941 1801 +28.4
1951 2994 +66.2
1961 4152 +38.7
1971 5971 +43.8
1981 8243 +42.2
1991 12572 +52.5
2001 16368 +30.1
2011 18414 +30.1

       मुम्बई के आस-पास के उपनगरों की जनसंख्या में काफी वृद्धि हुई है। 1991 ई. में वृहत् मुम्बई की जनसंख्या 9910 हजार तथा 2001 ई. में 11914 हजार थी। शेष जनसंख्या इसके उपनगरों में थी। 1971 में 52% जनसंख्या नगरीय द्वीप में 28% भीतरी उपनगर में और 20% बाहरी उपनगर में थी। 1991 ई. में कुल जनसंख्या का 49% मुख्य द्वीपीय नगर में 29% भीतरी उपनगर में और 22% बाहरी उपनगर में थी। 1971 ई. में यहाँ जनसंख्या का घनत्व 13.6 हजार प्रतिवर्ग कि. मी. थी जो 1991 ई. में बढ़कर 16.4 एवं 2001 ई. 20. 3 हजार हो गयी थी। 2011 में 21000 प्रति वर्ग कि. मी. हो गयी।

     इस महाप्रदेश में लगभग 70% जनसंख्या शिक्षित है। 1981 ई. यहां प्रति 1000 पुरुष में 773 महिलायें थी जो बढ़कर 1991 ई. में 829 और 2001 में 823 हो गयी। जनसंख्या के वृद्धि के कारण यहां अनेक समस्यायें उत्पन्न हो गयी हैं। इन समस्याओं का निदान नहीं करने पर इस प्रदेश में जनसंख्या की वृद्धि अविवेक पूर्ण हो जायगी।

मुम्बई मेट्रोपोलिटन प्रदेश 3361 वर्ग कि. मी. में फैला हुआ हैं इसके उत्तर में शंसा नदी घाटी, दक्षिण में पाटल गंगा नदी, पूर्व में माठेरन पहाड़ी तथा पश्चिम में समुद्र है। यहां की जनसंख्या का 89% नगरीय है जिसमें 28 नगर और 847 गांव है। कुल मिलाकर यहां दस तहसील (तालुका) है।

      वृहत् मुम्बई में 1991 ई. में 1981 ई. की तुलना में 52.5 तथा 2001 ई. 1991 की तुलना में 30.1% जनसंख्या की वृद्धि हुई। यही वृद्धि यदि पूरे मुम्बई मेट्रोपोलिटन प्रदेश में मान ली जाय तो इस प्रदेश में जनसंख्या बहुत अधिक हो जायेगी जिसके कारण कई समस्यायें उत्पन्न होती है। जैसे-

1. मकानों की कमी तथा प्रति कमरा घनत्त्व में वृद्धि

2. औद्योगिक केन्द्रों का असमान वितरण

3. वायु एवं ध्वनि प्रदुषण में वृद्धि

4. विद्युत एवं पेयजल की आपूर्ति में कमी

5. भूमि की कीमतों में वृद्धि

6. मनोरंजन तथा खुले स्थानों की कमी

7. अभिगमनकर्त्ताओं में वृद्धि

8. हरी-पेटी के क्षेत्र में ह्रास तथा उस पर सड़क एवं मकानों का अतिक्रमण

9. नगरीय जीवन में भारी गिरावट

10. रेलवे स्टेशन, हवाई, अड्‌डा, बन्दरगाह जैसे सार्वजनिक स्थानों पर जनसंख्या का भारी जमाव

11. नगर के बाहरी क्षेत्रों में औद्योगिक केन्द्रों द्वारा भूमि का अविवेकपूर्ण अतिक्रमण

12. सामाजिक ढांचे में आपसी मेल का अभाव

13. द्रुतगामी आवागमन के साधनों में कमी

14. अपराधों में वृद्धि

15. रेल तथा सड़क दुर्घटना में वृद्धि

16. गंदी बस्तियों का विस्तार

17. पर्यावरण के संतुलन में ह्रास

     इस प्रकार मुम्बई महानगरीय प्रदेश में इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इस प्रदेश का नियोजन करना चाहिए अन्यथा प्रदेश का अनियंत्रित विकास होने पर समस्यायें विकराल रूप धारण कर सकती है जिसका समाधान संभव नहीं होगा। नगरीय जीवन स्तर बिगड़ता चला जायेगा। गंदी बस्तियां बढ़ती चली जायगी और आर्थिक एवं सामाजिक स्तर गिरता चला जाएगा। नगरीय सुविधाओं का असमान वितरण होगा।

     इन्हीं सभी दुष्परिणामों से बचने के लिये मुम्बई महानगरीय प्रदेश के नियोजन की आवश्यकता है जिससे इस प्रदेश का संतुलित विकास हो सके। इस कार्य के लिए कुछ नये कदम उठाने की आवश्यकता है। जिसमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण है।

1. बढ़ती हुई जनसंख्या के लिये नये आवास कॉलनी बनाने की आवश्यकता पर बल देना होगा।

2. औद्योगिक ईकाईयों की स्थापना प्रदेश के प्रायः सभी क्षेत्रों में करनी होगी जिससे औद्योगिक ईकाईयों के वितरण में संतुलन बना रहे। ऐसा करने से उस प्रदेश में जनसंख्या का वितरण संतुलित हो सकेगा।

3. नगर में आर्थिक क्रियाओं के विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता है जिससे जनसंख्या का खिंचाव एक जगह केन्द्रित नहीं हो बल्कि अनेक केन्द्रों की ओर आकर्षित हो।

4. अभिगमनकर्त्ताओं (Daily Commuters) की संख्या में कमी करने के लिए आर्थिक क्रियाओं का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है तथा अभिगमनकर्त्ताओं की संख्या में कमी लाने का भी प्रयास करना आवश्यक हो जाएगा। यह भी उद्योग एवं आर्थिक क्रियाओं के विकेन्द्रीकरण से ही संभव है।

5. नये बन्दरगाह का निर्माण किया जाना चाहिए जिससे जनसंख्या का संतुलित वितरण हो सके।

6. पूरे प्रदेश में नगर तथा नगरीय प्रदेश के बीच यातायात की सुविधा में विकास करने की आवश्यकता है।

7. प्रदेश में अनेक नये नगरों का विकास करना होगा जिससे जनसंख्या का संतुलित वितरण हो सके।

8. प्रदेश में मुम्बई की तरह अन्य नगरों का भी विकास करने की आवश्यकता है।

9. सामाजिक विषमता को दूर करने का भी प्रयास आवश्यक है।

10. कल्याण, कोलशेट, बालखून, खौपौली मीरा-ममडार आदि नगरों को औद्योगिक नगर के रूप में विकसित करना भी इस प्रदेश के नियोजन में शामिल किया जाना चाहिये।

11. नये बन्दरगाह बनाकर उसके पास नया मुम्बई नगर की स्थापना भी इस नियोजन में शामिल है क्योंकि इससे मुम्बई नगर पर बढ़ते दबाव को रोका जा सकता है।

    मुम्बई महानगरीय प्रदेश नियोजन के अंतर्गत नये मुम्बई नगर की (New, Mumbai) स्थापना की गयी है। यह नगर थाने की संकरी घाटी के पूर्वी किनारे पर बसायी गयी हैं। इसके एक ओर कोल्बा बेलपुर सड़क मार्ग है तथा दूसरी ओर आवासीय क्षेत्र विकसित किया गया है। मुम्बई से पूना जाने वाली सड़क मार्ग इस नगर के मध्य से जाता है जो थाने के संकरी खाड़ी पर बने पुल से होता हुआ गुजरता है। इस नये नगर के आवासीय क्षेत्र को कई सेक्टर में बांटा गया है। प्रत्येक सेक्टर में हर प्रकार की नगरीय सुविधायें उपलब्ध है।

      यहां तीन बड़े व्यापारिक क्षेत्र हैं- उत्तरी भाग, दक्षिणी भाग तथा मध्य भाग। हरी-पेटी के निकट पार्क बनाये गये हैं तथा खुला मैदान भी छोड़ दिया गया है जहां लोग शाम अथवा सुबह में खुली हवा का आनन्द ले सकते हैं। यहां न्हेवा-शेवा नाम का एक नया बंदरगाह विकसित किया गया है जिससे इस नये नगर को विकसित होने में मदद मिल सकेगी।

    प्रशासन से संबंधित कुछ कार्यालय को जो मुम्बई में स्थित था, उसे नये नगर में स्थानान्तरित किया गया है जिससे पुराने मुम्बई नगर पर जनसंख्या के दबाव को कम किया जा सके। यह नया नगर 5000 हेक्टयर भूमि में विकसित किया गया हैं जिसकी लम्बाई 20 कि. मी. है। इस नये नगर को मुम्बई नगर की तरह हर प्रकार की सुविधायें प्रदान की जाती हैं और भविष्य में भी ऐसी सुविधायें मिलती रहेगी जिससे अंर्त्तराष्ट्रीय स्तर पर भी यह नया मुम्बई नगर पुराने मुम्बई महानगर की तरह महत्त्वपूर्ण रह सकेगा।



नोट:

1. नगरीय क्षेत्र (Urban area):-

            नगरीय क्षेत्र का तात्पर्य उस सामूहिक अधिवासीय स्थल से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  में संलग्न रहती है। यहाँ पर द्वितीय एवं तृतीय कार्यों का तात्पर्य उद्योग, निर्माण, विनिर्माण, परिवहन, वाणिज्य व व्यापार एवं सेवा क्षेत्र से है।

2. ग्रामीण-नगर उपांत् (Rural-Urban Fringe):-

        “ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र” का शाब्दिक अर्थ है- नगरों की सीमाओं पर स्थित वह क्षेत्र जहाँ ग्रामीण एवं नगरीय भूदृश्य की विशेषताएँ देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में उपान्त क्षेत्र वह क्षेत्र है जो नगर और ग्रामीण बस्ती के बीच में विकसित होते हैं तथा वहाँ पर नगरीय और ग्रामीण आर्थिक-क्रियाकलाप साथ-2 चलते रहती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1942 ई० में बेहरबिन महोदय ने किया था।

           ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को ग्रामीण नगरीय सांतत्य शब्द से संबोधित किया जाता है। इस संकल्पना में बताया गया है कि नगर के केन्द्र में विशुद्ध रूप से नगरीय संस्कृति होती है लेकिन ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूर जाते हैं त्यों-2 नगरीय संस्कृति या नगरीय विशेषता में कमी आते जाती है और ग्रामीण विशेषताएँ बढ़ने लगती हैं।

              दूसरे शब्दों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र मुख्यतः दो शब्दों का संग्रह है- उसमें से एक ग्रामीण उपान्त क्षेत्र एवं दूसरा नगरीय उपान्त क्षेत्र है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण- नगरीय उपान्त अतिक्रमण क्षेत्र का प्रतीक है। यह नगर के चारों ओर एक ऐसी संक्रमण पेटी का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो पूर्णतया ग्रामीण है और न ही पूर्णतया नगरीय। इस प्रकार के संक्रमण पेटी में ग्रामीण एवं नगरीय दोनों प्रकार का वातावरण देखने को मिलता है।

3. समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र (Peripheral rural area):-

         पेरिफेरल रूरल एरिया का मतलब है, “शहर के बाहर में स्थित ग्रामीण क्षेत्र” अर्थात शहरों के बाहरी इलाके में स्थित ग्रामीण इलाकों को ही समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र कहते हैं।

भारत के 53 महानगरों की सूची:

  1. मुंबई

  2. दिल्ली

  3. कोलकाता

  4. चेन्नई

  5. बेंगलुरु

  6. हैदराबाद

  7. अहमदाबाद

  8. पुणे

  9. सूरत

  10. जयपुर

  11. कानपुर

  12. लखनऊ

  13. नागपुर

  14. इंदौर

  15. भोपाल

  16. पटना

  17. लुधियाना

  18. आगरा

  19. वाराणसी

  20. मेरठ

  21. प्रयागराज (इलाहाबाद)

  22. गाज़ियाबाद

  23. नोएडा

  24. फरीदाबाद

  25. गुरुग्राम

  26. अमृतसर

  27. जालंधर

  28. देहरादून

  29. हरिद्वार

  30. चंडीगढ़

  31. पंचकूला

  32. मोहाली

  33. श्रीनगर

  34. जम्मू

  35. रांची

  36. जमशेदपुर

  37. धनबाद

  38. बोकारो

  39. दुर्ग–भिलाई

  40. रायपुर

  41. बिलासपुर

  42. विशाखापट्टनम

  43. विजयवाड़ा

  44. गुंटूर

  45. तिरुपति

  46. कोयंबटूर

  47. मदुरै

  48. तिरुचिरापल्ली

  49. सलेम

  50. कोच्चि

  51. तिरुवनंतपुरम

  52. कोझिकोड

  53. मल्लापुरम

1. Problem regions: Hilly regions (समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)

 1. Problem regions: Hilly regions

(समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)



परिचय:-

     पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी समस्याएँ उत्पन्न होते हैं जो कि मैदानी क्षेत्रों की समस्याओं से अलग और विशिष्ट होते हैं। पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो गया है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव ने कई तरह से तनाव और दबाव पैदा किया है और हालात ऐसे चरण में पहुँच रहे हैं जहाँ गंभीर उपायों की आवश्यकता है। सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक विविधताओं के अलावा भूभाग की विविधताओं के कारण नियोजन की पूरी तरह से अलग पद्धति तैयार करने की आवश्यकता है।

     देश के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट विकास रणनीतियों के निर्माण के लिए बुनियादी पूर्व शर्त के रूप में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं, संसाधन संपदा (मानव और भौतिक दोनों), विकास क्षमता और उनकी विशेष समस्याओं के बारे में विस्तृत जानकारी की आवश्यकता होती है।

      पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम के मार्गदर्शक सिद्धांत बुनियादी जीवन समर्थन प्रणाली को बढ़ावा देने और समग्र परिप्रेक्ष्य में भूमि, जल, खनिज और जैविक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग (पहाड़ी और मैदानी दोनों के हितों पर विचार करते हुए) पर आधारित हैं। पूरी रणनीति लोगों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में उनकी सक्रिय भागीदारी पर केंद्रित होनी चाहिए। “सामाजिक बाड़बंदी” का तात्पर्य स्थानीय स्तर पर समाज के संसाधनों के प्रबंधन में स्वैच्छिक और स्व-लगाए गए अनुशासन से है।

पहाड़ी क्षेत्र:-

     भारत में पहाड़ी क्षेत्र देश के कुल भू-भाग का लगभग 17% हिस्सा हैं। ये क्षेत्र मोटे तौर पर दो श्रेणियों में आते हैं:-

(i) वे क्षेत्र जो राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं के साथ-साथ विस्तृत हैं, और

(ii) वे जो राज्य का हिस्सा बनते हैं।

     पहली श्रेणी में उत्तर पूर्वी क्षेत्र के राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। इन्हें “विशेष श्रेणी के राज्य” कहा जाता है, जिनके व्यय को केंद्रीय सहायता से पूरा किया जाता है। उत्तर पूर्वी क्षेत्र के इन पहाड़ी राज्यों के एकीकृत विकास के लिए, केंद्र सरकार ने संसद के एक अधिनियम द्वारा 1971 में उत्तर पूर्वी पहाड़ी परिषद” की स्थापना की है।

     परिषद अपनी विकास योजना के तहत एक से अधिक राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों और पूरे क्षेत्र के लिए समान हित की योजनाओं को आगे बढ़ाती है। इसने बिजली उत्पादन, सड़कों के निर्माण, कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन आदि के अंतर-क्षेत्रीय कार्यक्रमों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह अनुसंधान और प्रयोगात्मक परियोजनाओं का भी समर्थन करता है।

      असम, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में उप-हिमालयी क्षेत्र में बड़े मिश्रित राज्य का हिस्सा बनने वाले पहाड़ी क्षेत्र हैं। इनमें असम के कार्बी आंगलोंग और उत्तरी कैचर जिले (15,200 वर्ग किमी), पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले (2400 वर्ग किमी) और उत्तराखंड के देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, चमोली, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल जिले (51,100) वर्ग किमी शामिल हैं।

    अन्य महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र पश्चिमी घाटों तक फैले हुए हैं, जिनमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल (1,34,500 वर्ग किमी) के 132 तालुका शामिल हैं। यहाँ उप-योजना की अवधारणा की शुरूआत से पहले विकास कार्यक्रमों के लिए केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

प्रमुख समस्याएँ:-

(i) वनों की कटाई,

(ii) मिट्टी का कटाव,

(iii) बाढ़ का खतरा,

(iv) कम उत्पादकता,

(v) वन आधारित उत्पादों में कमी,

(vi) भूमि-जल प्रबंधन का अभाव और

(vii) बढ़ती गरीबी।

पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान कार्यक्रम:-

(i) 5वीं पंचवर्षीय योजना- उपयोजना अवधारणा की शुरुआत

(ii) छठी पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी और विकास

(iii) 7वीं पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी विकास, पारिस्थितिकी संरक्षण

(iv) 8वीं पंचवर्षीय योजना- आधुनिक कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग, भूमि-जल संसाधन, लोगों की भागीदारी

     इन पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की है। हालांकि, दूसरी पंचवर्षीय योजना के बाद से केंद्रीय सहायता की आवश्यकता महसूस की गई है। पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (एचएडीपी) के लिए केंद्रीय सहायता 5वीं पंचवर्षीय योजना के बाद से क्षेत्र और जनसंख्या को समान महत्व देते हुए घटक राज्यों को दी जा रही है।

    विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) गाडगिल फार्मूले के अनुसार विनियमित पहाड़ी क्षेत्रों के बीच आवंटित की जा रही है।

गाडगिल फार्मूला (1969-70):

      गाडगिल फार्मूला, वर्ष 1969 में धनंजय रामचंद्र गाडगिल ने तैयार किया था। इस फार्मूले के तहत भारत में राज्यों को योजनाओं के लिए केंद्र सरकार से सहायता राशि मिलती है। इसका इस्तेमाल 4थी और 5वीं पंचवर्षीय योजनाओं में किया गया था

      गाडगिल फार्मूला के तहत राज्यों को सहायता राशि देने का तरीका:

(i) 60 % राशि जनसंख्या के आधार पर दी जाती है।

(ii) 10 % राशि टैक्स एफर्ट के आधार पर दी जाती है।

(iii) 10 % राशि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर दी जाती है।

(iv) 10 % राशि राज्य की खास समस्याओं के आधार पर दी जाती है।

(v) 10 % राशि सिंचाई और बिजली परियोजनाओं के लिए दी जाती है।

संशोधित गाडगिल फॉर्मूला (1980):   

     संशोधित गाडगिल फार्मूला, राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) ने अगस्त 1980 में मंजूरी प्रदान की थी। यह फार्मूला छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) से लेकर सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) तक आवंटन का आधार बना। वर्ष 1990-91 में वार्षिक योजना के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया।

     संशोधित गाडगिल फार्मूला में ये बदलाव किए गए थे:

(i) 55% जनसंख्या के आधार पर

(ii) 25% PCI (प्रति व्यक्ति कर संग्रहण) के आधार पर

(iii) 5% राजकोषीय प्रबंधन के आधार पर।

(iv) 15% विशेष विकास समस्याओं के आधार पर।

योजना और कार्यक्रम:-

   पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, बागवानी, कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, वानिकी, मृदा संरक्षण और उपयुक्त ग्राम उद्योगों के विकास के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए कार्यक्रमों के माध्यम से पहाड़ियों के स्वदेशी संसाधनों के दोहन पर पर्याप्त जोर देते हैं। मुख्य रूप से उन गतिविधियों के पैकेज पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जिन्हें स्थानीय लोगों द्वारा अवशोषित किया जा सकता है। सहकारी समितियों या किसान समितियों को बहुत महत्व दिया गया है।

कार्यक्रम:-

(i) भूमि क्षरण को रोकना और फसल उत्पादकता बढ़ाना और भूमि जोतों का समेकन करना।

(ii) जनसंख्या नियंत्रण उपाय- परिवार नियोजन कार्यक्रम।

(iii) पूंजी और भौतिक योजनाओं की निगरानी के माध्यम से विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में सुधार करना।

(iv) स्थानीय स्व-निकायों और अन्य के माध्यम से वनरोपण।

(v) कृषि-जलवायु क्षेत्रों, मिट्टी की उपयुक्तता परीक्षण के माध्यम से कृषि प्रथाओं में सुधार।

(vi) झूमियों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए हैं- झूम खेती को रोकने और उन्हें स्थायी कृषि प्रथाओं में पुनर्वासित करने के लिए।

(vii) रबड़ और कॉफी के बागान विकसित करने तथा ऐसे बागानों में झुमियों का पुनर्वास करने के लिए कृषि को प्रोत्साहित किया गया है।

(viii) पशुधन, चारागाह और वन की उपलब्धता को देखते हुए पशुपालन/पशुधन को प्रोत्साहित किया गया है।

(ix) कार्यक्रमों में वैज्ञानिक प्रजनन दृष्टिकोण, मजबूत सुरक्षात्मक और उपचारात्मक पशु स्वास्थ्य कवर तथा उत्पाद का प्रसंस्करण और विपणन भी शामिल है।

(x) वानिकी कार्यक्रमों में, बागान (कॉफी, चाय, मसाले आदि), कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी जैसे वानिकी उत्पादन पर जोर दिया गया है।

(xi) बागवानी कार्यक्रम में, बागों (सेब, अंगूर और केला) के विकास और उनके विपणन पर जोर दिया गया है।

(xii) पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे उद्योग विकसित किए जा सकते हैं, जिनमें प्रदूषण रहित वातावरण, उच्च कौशल और उच्च मूल्य संवर्धन पर आधारित ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है- इलेक्ट्रॉनिक्स, घड़ी निर्माण, ऑप्टिकल ग्लास, फर्नीचर, दवाएँ और औषधियाँ। कालीन निर्माण और हथकरघा जैसे कुटीर उद्योग भी उपयुक्त गतिविधियाँ हैं।

(xiii) ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों का विकास।

(xiv) परिवहन और संचार के साधनों का विकास।

(xv) सुरक्षित उत्खनन और खनन।

(xvi) पर्यटन सबसे महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है, जिसका समुचित विकास किया जाना चाहिए।

(xvii) जैवमंडल रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के माध्यम से मूल्यवान वनस्पतियों और जीवों की प्रस्तुति के लिए एक एकीकृत रणनीति बनाई जानी चाहिए।

(xviii) पर्यावरण संबंधी मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए गतिविधियों में लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया जाना चाहिए।

(xix) पहाड़ी क्षेत्रों में कोई भी गतिविधि करते समय पारिस्थितिकी संरक्षण को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक पेपर प्रोजेक्ट में वनरोपण की लागत शामिल होनी चाहिए और इसके अनुसार इसकी आर्थिक व्यवहार्यता निर्धारित की जानी चाहिए।

(xx) पहाड़ी क्षेत्रों की वैज्ञानिक योजना के लिए उपलब्ध संसाधनों-मिट्टी, पानी, खनिज, वनस्पति आदि के बारे में जानकारी आरएस और जीआईएस के माध्यम से प्राप्त की जानी चाहिए।

(xxi) पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम लाभ प्राप्त करने और संबंधित क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकास रणनीतियों को अपनाना होगा।

सिफारिशें:-

1. विकासात्मक क्षेत्र:

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्राकृतिक संसाधन दोहन और संरक्षण के बीच संतुलन उत्तरार्द्ध के पक्ष में होना चाहिए। उपयुक्त गतिविधियों के लिए क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए जैसे कि:-

(i) बर्फ, अल्पाइन, उप-अल्पाइन क्षेत्रों और संरक्षित परिदृश्यों के क्षेत्रों को किसी भी कीमत पर संरक्षित किया जाना चाहिए, महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के प्रवाह को बनाए रखने और धर्म-सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान और संरक्षण करने के लिए।

(ii) सभी प्राकृतिक जल क्षेत्रों (ग्लेशियर, नदियाँ, झीलें और झरने) को सख्ती से संरक्षित किया जाना चाहिए। किसी भी क्षेत्र में ऐसी गतिविधियाँ जो किसी भी तरह से प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक झरने हैं, उन्हें “स्प्रिंग अभयारण्य” में परिवर्तित किया जाना चाहिए और इस अवधारणा को सभी नियोजन में शामिल किया जाना चाहिए।

(iii) वन क्षेत्र को पर्यावरण सेवाओं और जैव विविधता मूल्यों के लिए संरक्षित और संवर्धित किया जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र टिकाऊ जैव और Non-timber forest products (NTFPs) के लिए भी उपलब्ध होने चाहिए, जिसमें बांस, पूर्वेक्षण और इको-पर्यटन शामिल हैं

(iv) निचले इलाकों में उपजाऊ नदी घाटियों के क्षेत्रों का उपयोग कृषि उत्पादन को अधिकतम करने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसे क्षेत्रों में कृषि भूमि को अन्य उपयोगों में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जिन क्षेत्रों में स्थानान्तरित या सीढ़ीनुमा कृषि की जाती है, उन्हें विशिष्ट फसलों, जैविक कृषि, बागवानी, कृषि-वानिकी तथा बेहतर प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने के लिए चिन्हित किया जाना चाहिए।

(v) घरेलू तथा लघु उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकेंद्रीकृत विद्युत उत्पादन हेतु नदी क्षेत्रों को चिन्हित किया जाना चाहिए।

2. सड़क, रेल तथा हवाई सम्पर्क: 

     टास्क फोर्स ने दो लूप रेलवे लाइनों की सिफारिश की है, एक पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के लिए जो जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को जोड़ेगी और दूसरी उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लिए। इन दो लूपों को उत्तर और पूर्वी रेलवे के मौजूदा राष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से एक दूसरे से जोड़ा जाना चाहिए।

     उपर्युक्त कार्यों को करने के लिए International Health Regulations (IHR) के सड़क नेटवर्क को उचित स्थानों पर रेल नेटवर्क से जोड़ा जाना चाहिए। सड़क नेटवर्क को हवाई सेवाओं से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि जल्दी खराब होने वाले सामान और आपातकालीन स्वास्थ्य की आवश्यकता वाले लोगों को देश के बाकी हिस्सों या बाहर तक पहुँचने के अवसर प्रदान किए जा सकें।

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्रत्येक IHR राज्य में बड़े हेलीकॉप्टरों और छोटे उड़ान भरने और उतरने वाले विमानों को स्वीकार करने के लिए कम से कम एक छोटी हवाई पट्टी होनी चाहिए।

अन्य अनुशंसाएँ:

1. पर्वतीय परिप्रेक्ष्य और संवेदनशीलता

2. शिक्षा और कौशल विकास

3. प्राकृतिक संसाधन विश्लेषण और परामर्श केंद्र

4. रणनीतिक पर्यावरण मूल्यांकन

5. वित्तीय प्रोत्साहन, पुरस्कार और छूट

6. IHR राज्यों के बीच संसाधन साझा करना

7. जलमार्ग और रोपवे

8. अपशिष्ट प्रबंधन

9. आपदा तैयारी और शमन

10. उद्योग

11. जलवायु परिवर्तन

12. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन



नोट

पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (Hill Area Development Programme):-

     पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (HADP) 5वीं पंचवर्षीय योजना में आरम्भ हुआ जिसमें  उत्तराखण्ड, मिकिर पहाड़ी और असम की उत्तरी कछार की पहाड़ियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला तथा तमिलनाडु के नीलगिरि इत्यादि को मिलाकर कुल 15 जिलों को शामिल किया गया हैं। पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए बनी राष्ट्रीय समिति ने सन् 1981 में सिफारिश किया था कि देश के उन सभी पर्वतीय क्षेत्रों को पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल कर लिया जाए जिनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक है और जिनमें जनजातीय उपयोजना लागू नहीं है।

      राष्ट्रीय समिति ने पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए जो सुझाव दिए, उनमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा गया था:-

(i) कार्यक्रम का लाभ पहाड़ी क्षेत्र के सभी लोगों तक पहुँच सके।

(ii) स्थानीय संसाधनों तथा प्रतिभाओं का विकास हो सके।

(iii) पहाड़ी लोग अपनी जीविका-निर्वाह अर्थव्यवस्था को निवेश-उन्मुखी बनाएँ व कुछ लाभ कमाना सीखें।

(iv) अन्तः प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े अर्थात् पर्वतीय क्षेत्रों का शोषण न होने पाए।

(v) पिछड़े क्षेत्रों की बाजार व्यवस्था में पर्याप्त सुधार करके श्रमिकों को लाभ पहुँचाना।

(vi) पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाए रखना।

     इस कार्यक्रम के तहत पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की योजनाएँ बनाते समय उनकी स्थलाकृति, पारिस्थितिकी व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखा गया था।

उद्देश्य:-

    इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, मृदा संरक्षण, वृक्षारोपण तथा उद्यान खेती इत्यादि का प्रशिक्षण देकर तथा उन्हें इन कार्यक्रमों में शामिल करके स्थानीय संसाधनों का दोहन करना था।

1. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत (Weber’s theory of industrial localization)

1. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत 

(Weber’s theory of industrial localization)


बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत

प्रश्न प्रारूप 

1. औद्योगिक स्थानीयकरण सिद्धांत की चर्चा करें। 

2. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धत की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करें तथा वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता की चर्चा करें। 

औद्योगिक अवस्थिति का सिद्धांत

                     उद्योगों के स्थानीयकरण पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। इनमें कच्चा माल, बाजार, परिवहन, श्रमिक, तकनीकी उपलब्धता, ऊर्जा और अन्य संरचनात्मक सुविधाएँ प्रमुख हैं। सभी उद्योगों पर इन सभी कारकों का एक समान प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी असमानता को देखते हुए कई भूगोल‌वेताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने उद्योगों के स्थानीयकरण की प्रवृति को सैद्धांतिक रूप देने का प्रयास किया है। इनमें से बेबर, हुबर, लॉश, फेटर, हौर्टलीन तथा स्मिथ का सिद्धांत प्रमुख हैं। इनमें से बेबर का सिद्धांत सबसे पुराना है। इस सिद्धांत को बेबर ने 1909 में दक्षिणी जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्रों का अध्ययन कर प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:- 

मान्यताएँ :- 

         बेबर ने बताया कि मेरा सिद्धांत वहीं पर लागू होगा जहाँ-

(1) एकाकी प्रदेश होगा तथा वह संपूर्ण प्रदेश एक ही प्रशासन के अन्तर्गत होगा।

(2) सम्पूर्ण प्रदेश में एक ही जलवायु, एक ही संस्‌कृति और एक समान जनसंख्या उपलब्ध हो या सम्पूर्ण प्रदेश में भौगोलिक समरूपता एक समान हो।  

(3) एक समय में एक ही उद्योग की स्थानीयकरण का विश्लेषण किया जाता हो। 

(4) कच्ची सामाग्री के स्रोत और इसकी भौगोलिक अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो। 

(5) बाजार की अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो।

(6) श्रम उपलब्धता निश्चित हो तथा उसकी पूरी जानकारी हो।

(7) परिवहन लागत भार और दूरी के सापेक्ष में वास्तविक वृद्धि हो।

सिद्धांत / परिकल्पना

        बेबर के अनुसार औद्योगिक स्थानीकरण सिद्धांत को न्यूतम परिवहन लागत का सिद्धांत कहते है। बेबर के अनुसार “न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान ही न्यूनतम उत्पादन लागत वाला स्थान होता है और न्यूनतम लागत वला स्थान ही उद्योगों की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान होता है।”

      बेबर ने दूसरा परिकल्पना भी प्रस्तुत किया है। जैसे- “सस्ता श्रम और संरचनात्मक सुविधाएं इत्यादि उद्योगों के स्थानीयकरण को न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान से विचलित करता है।” अर्थात न्यूनतम  श्रम लागत और संरचनात्मक सुविधाएं उद्योगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

स्थानीयकरण का मॉडल

             ऊपर वर्णित मान्यताओं और परिकल्पनाओं के संदर्भ में बेबर ने प्रयोगों के स्थानीयकरण की दो परिस्थितियाँ बतायी है-

(1) प्रथम स्थिति में एक ही कच्चे माल पर उद्योग आधारित होता है। 

(2) दूसरी परिस्थिति में एक से अधिक कच्चे माल पर उद्योग आधारित होते हैं।

I. पहली दश एक बाजार और एक कच्चा माल (R1) 

                       एक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का स्थानीयकरण की तीन प्रवृति होती हैं-

(1) वैसा उद्योग जिसका कच्चा माल सर्वत्र उपलब्ध है। ऐसी स्थिति है। उद्योगों की स्थापना बजार के केन्द्र में होती है, क्योंकि वहाँ पर परिवहन लागत नगण्य होता है। जैसे- जूता मरम्मत उद्योग, छाता मरम्मत उद्योग।   (2) दूसरी परिस्थिति के अनुसार कच्चा माल अशुद्ध हो तथा स्थानीय हो तो वैसी स्थिति में उद्योगों की स्थापना माल के केन्द्र में होती है क्योंकि परिष्कृत समान की दुलाई कच्चे माल की दुलाई के तुलना में परिवहन लागत कम होता है। जैसे:- चीनी उद्योग।

नोट:- यहाँ अशुद्ध का तात्पर्य वजन ह्रास वाले उद्योग से है।

(3) तीसरी परिस्थिति के अनुसार वैसे उद्योग आते हैं जिनका कच्चा माल शुद्ध हो और स्थानीय तौर पर उपलब्ध हो। ऐसी उद्योगों की स्थापना बाजार क्षेत्र या कच्चे माल के क्षेत्र में किया जा सकता है। जैसे- वस्त्र उद्योग, रेडिमेट गार्मेन्ट उद्योग। 

II. दूसरी दशा:- एक बाजार तथा दो से अधिक कच्चा माल (R2)

              एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योग के लिए बेबर ने त्रिभुजाकार मॉडल प्रस्तुत किया है। वेबर ने कहा है कि कई ऐसे उद्योग हैं जिसमें एक से अधिक कच्चे माल का प्रयोग होता है। जैसे लौह-इस्पाल उद्योग में लौह अयस्क, चूना पत्थर, कोयला, मैंगनीज, क्रोमियम जैसे खनिजों का प्रयोग होता है।

           बेबर के अनुसार ऐसे उद्योगों का स्थानीयकरण सभी कच्चे माल से प्रभावित नहीं होता बल्कि कुछ ‌कच्चे माल उद्योगों के स्थानीयकरण को प्रभावित करते हैं। जैसे- लौह-इस्पात उद्योग को लौह अयस्क एवं कोयला,  सीमेन्ट उद्योग को चूना पत्थर एवं कोयला, एल्युमिनियम उद्योग को बॉक्साइट एवं विद्युत इत्यादि।

           एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों की स्थानीयकरण की व्याख्या करने हेतु दो परिस्थिति की चर्चा किया है।- 

(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में 

(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में

(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में

           लौह-इस्पात उद्योग, सीमेन्ट उद्योग इत्यादि इसके अच्छे उदा० है। वजन द्वास उद्योग के अन्तर्गत सर्वाधिक अनुकूल स्थान दो कच्चे माल के बीच त्रिभुज के अन्तर्गत होता है। इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है-बेबर के औद्योगिक

            उपरोक्त त्रिभुजाकार मॉडल सही अर्थों में लौह इस्पात उद्योग के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अधिकांश लौह इस्पात उद्योग का विकास इसी अवधारणा के अनुसार हुआ है। जमशेदपुर का कौह इस्पात केन्द्र इस मॉडल का एक अच्छा उदा० है।

          वेबर ने अपने त्रिभुजाकार मॉडल में बताया कि अगर उद्योग वजन ह्रास वाला है तो उसका स्थानीयकरण कच्चे माल के क्षेत्र से नजदीक होता है। जैसे-

(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में

            बेबर ने वजन वृद्धि वाले उद्योग के स्थानीयकरण का व्याख्या करते हुए बताया कि ऐसे उद्योगों का स्थानीयकारण भी त्रिभुजाकार मॉडल के अनुरूप ही होगा लेकिन ऐसे उद्योग नगर से नजदीक होते हैं। जैसे- बेकरी उद्योग, सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग, वस्त्र उद्योग। 

             बेबर ने स्वयं यह बताया है कि ऊपर वर्णित उद्योगों के स्थानीयकरण में दो कारणों से विचलन हो सकता-

(1) यदि किसी स्थान पर श्रमिक अत्यधिक सस्ते हो तो उस स्थिति में उद्योग न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान पर स्थापित न होकर न्यूनतम मजदूरी लागत वाला स्थान पर स्थापित होता है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला स्थान के निर्धारण हेतु उन्होंने Isodapane Line खींचा है। यह एक ऐसी काल्पनिक रेखा है जो उन सभी बिन्दुओं को मिलाती है जहाँ न्यूनतम परिवहन लागत केन्द्र से परिवहन लागत में समान वृद्धि होती है। जैसे-

बेबर के औद्योगिक

बेबर का Isodapane Line

            वह आइसोडापेन रेखा जिसपर न्यूनतम श्रम लागत आता है उसी स्थान पर उद्योगों की स्थापना की जाती है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला आइसोडापेन लाइन को Critical Isodapane Lime कहते हैं।     

             इसका सबसे अच्छा उदहारण USA में देखने को मिलता है। जैसे – USA में सूती वस्त्र उद्योग का विकास न्यू इंगलैण्ड क्षेत्र में हुआ लेकिन सस्ते श्रम के कारण यह उद्योग स्थानांतरित होकर टेक्सॉस एवं अल्वामा जैसे राज्यों में चला गया है। इसी तरह से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं साफ्टवेयर उद्योग सस्ते श्रम वाले क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं।
 
(2) बेबर के अनुसार संरचनात्मक सुविधाएँ भी उद्योगों के स्थानीयकरण को न्यूनतम परिवहन लागत वाले स्थानों से विचलित करते हैं। ये सुविधाएँ भारी उद्योगों को प्रभावित नहीं कर पाते हैं बल्कि छोटे एवं हल्के उद्योगों को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। खासकर फूटलूज उद्योग। जैसे – सौंदर्य प्रशाधन उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, माँग आधारित उद्योग, रेडिमेट गार्मेन्ट उद्योग इत्यादि। दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों में इस तरह के उद्योगों का विकास न्यूनतम परिवहन लागत के कारण नहीं बल्कि संरचनात्मक सुविधाओं के कारण हुआ है।

नोट: फुटलुज उद्योग – वैसा उद्योग जिसकी स्थापना कहीं भी की जा सकती है जहाँ संरचनात्मक सुविधाएँ उपलब्ध हो।

आलोचना

                 बेबर के द्वारा प्रस्तुत न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत के आलोचकों में हुबर, हॉटलीन फेटर, और स्मिथ अग्रणी है।

1. हुबर न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान न्यूनतम उत्पादन लागत का स्थान नहीं हो सकता क्योंकि उद्योगों के स्थानीयकरण को न केवल परिवहन प्रभावित करता है बल्कि तकनीकी लागत, श्रमिक लागत, ऊर्जा लागत इत्यादि का भी प्रभाव पड़ता है।

हूबर – दो से अधिक कच्चे माल का प्रयोग करने वाले उद्योगों का स्थानीयकरण त्रिभुज के अन्दर हो यह कोई जरूरी नहीं है। आज विश्व में अधिकांश इस्पात उद्योगों का विकास समुद्र के तटवर्ती क्षेत्र में हो रहा है न कि बेबर के त्रिभुजाकार मॉडल के अनुसार। 

            फेटर, हाटलीन और स्मिथ जैसे आचारपरक भूगोलवेताओं ने कहा है कि उद्योगों का स्थानीयकरण उपभोक्ताओं की इच्छा और क्रय क्षमता पर निर्भर करता है। हॉटलीन एवं फेटर ने मियामी बिच (USA) के पास विकसित आइसक्रीम उद्योगो का हवाला देते हुए यह बताया है कि यहाँ पर आइसक्रीम उद्योग विश्व का सर्वाधिक लागत वाला उद्योग है। फिर भी पर्यटकों के व्यवहार (मांग) के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ है।

            अनेक आलोचकों ने बेबर के मान्यता को ध्यान में रखकर आलोचना किया है। जैसे- वर्तमान समय में कोई प्रदेश एकाकी प्रदेश नहीं हो सकता है और न ही उसमें भौगोलिक समरूपता पायी जा सकती है। इसी तरह बढ़ते दूरी एवं भार के अनुसार परिवहन मूल्य (भाड़ा) में सापेक्षिक वृद्धि भी नहीं हो सकती है। 

आलोचनात्मक मूल्यांकन

         इन आलोचनाओं के बावजूद बेबर के सिद्धांत का अपना महत्व है क्योंकि आज भी यह सिद्धांत चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, खाद्य सामाग्री उद्योग के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या करता है। कुछ भूगोलवेताओं का यह भी कहना है कि समुद्री तट के किनारे विकसित होने वाले इस्पात उद्योग वर्तमान समय में बेबर के सिद्धांत के अनुरूप ही हो रहा है। जैसे- भारत का विशाखापतनम, जापान कोबे, USA का बाल्कि मोर इसके अच्छे उदाहरण हैं। भारत का विशाखापतनम कारखाना, बेलाडीला और डॉलीराजहरा से लौह-अयस्क प्राप्त करता है। और कोयला  का आयात न्यूनतम परिवहन लागत के कारण विदेशों से ही किया जाता है। इस तरह विशाखापतनम न्यूनतम परिवहन लागत इस्पात का प्रमुख केन्द्र बना है।

निष्कर्ष : 

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ खामियों के बावजूद बेबर का न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत चिरसंवतकालीन सिद्धांत है। यह सिद्धांत सुती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योगो, लौह- इस्पात उद्योगों के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या कने में सक्षम है।

1. मानव विकास सूचक / Human Development Index

1. मानव विकास सूचक 

(Human Development Index)


मानव विकास सूचक⇒मानव विकास सूचक

             मानव विकास सूचक का प्रथम प्रकाशन 1990 में यू.एन.डी.पी. (U.N.D.P. United Nation Development Programme) द्वारा प्रकाशित किया गया। इस सूचक का विकास संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से चार अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा मिलकर किया गया है। जैसे:-

(i) WRI – World Resource Institute

(ii) UNEP – United Nation Invironmental Programme

(iii) UNDP – United Nation Development Programme

(iv) WB – World Bank

        यह प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है जो विश्व के विभिन्न प्रदेशों में मानव विकास की स्थिति को बताता है यह सूचक तीन महत्वपूर्ण चरों पर आधारित है-

(i) जीवन प्रत्याशा या आयु (Longevity) 

(ii) ज्ञान (Knolwledge) – आयु के आधार पर दो वर्गों में बांटा गया है – 0-15 वर्ष की आयु के बच्चों का जीवन प्रत्याशा और 15 से अधिक (Adult Literaney level)

(iii) रहन-सहन का स्तर या जीवन स्तर (Standary of Living) – यह तीन P पर आधारित है – Purchasing, Power and Parity.

          मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार जीवन प्रत्याशा अप्रत्यक्ष रूप से खान-पान स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं को बताता है। ज्ञान किसी भी समाज के जागरूकता और चेतना को बताता है जो संसाधनों के विकास पारिस्थतिकी संरक्षण और स्वास्थ्य जीवन शैली में सहायक हो सकता है।

        जीवन स्तर वह आधार है जो किसी भी देश के क्रय क्षमता को अंतर्राष्ट्रीय बाजार के संदर्भ में बताता है। वर्तमान उदारीकरण के युग में सकल राष्ट्रीय उत्पाद की तुलना में क्रय क्षमता अधिक उपयोगी सूचक है।

             मानव विकास रिपोर्ट – 1995 में, 174 देशों को इन दोनों चरों से संबंधित सूचनाएं प्राप्त हो सकी। अतः मानव विकास रिपोर्ट 174 देशों के लिए तैयार की गई। 1996 और 1997 का रिपोर्ट भी 174 देशों पर आधारित था। यह रिपोर्ट तीनों ही सूचनाओं को मिलाकर संयोजित सूचक (Composite Index) विकसित करता है।

       इस मापक को विकसित करने के लिए तीनों चरों को अधिकतम और न्यूनतम मान लिया गया है और देश विशेष के संदर्भ में विचलन विधि का प्रयोग करते हुए साख्यिकी मान निकाला गया है। तीनों ही चरों को सांख्यिकी मान को जोड़ कर उस तीन से भाग दिया गया है और भागफल ही सूचक मान है।

    मानव विकास सूचक विकसित करने के बाद विश्व के देशों को तीन वर्गों में बांटा गया है:-

(i) L.H.D. (Low Human Development Country) 

(ii) MHD (Mean Human Develoment Country) 

(ii) HHD (High Human Development Country)

          L.H.D का सूचक मान < 0.5 अर्थात् 0.5 से कम है। इसके अंतर्गत 1995 के अनुसार 58 देश है – प्रमुख देशों में भारत, मोरक्को एवं गेबोन सहित अधिकतर अफ्रीकी देश, द० एशिया के सभी देश आते हैं। 

       MHD का सूचक मान 0.5 से 0.8 है। इसके अंतर्गत भी 8 देश है जिसमें ब्राजील, चीन, टर्की, द० अफ्रीका, रूस, सऊदी अरबिया, मिस्र और अल्जीरिया जैसे देश है। पूर्वी यूरोप तथा मध्य एशियाई गणतंत्र इसी वर्ग में आते है।  पू० एशिया के भी अधिकतर देश, मध्य अमेरिका और द० अमेरिका के अधिकतर देश इसी वर्ग में है। 

         HHD का सूचक माग (above > 0.800) है। इसके अंतर्गत सभी विकसित देशों के अलावे ब्रुनेई, UAE. कतार, मेक्सिको, क्यूबा, बहामास, टोबैगो, मारिशस जैसे देश इस वर्ग में आते है। 

       ब्रुनेई, कतार और U.A.E तेल निर्यात आधारित देश है जिसने मानव विकास पर पर्याप्त खर्च किया है। मेक्सिको उन देशों में है जहां प्रतिव्यक्ति आय कम होने के बावजूद मानव विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी गई है। 

       मानव विकास की वार्षिक रिपोर्ट की अनिवार्यता इसलिए महसूस की गई है कि विश्व के आर्थिक सामाजिक विषमता तेजी से बढ़ रहा थी। इसे दूर करने के लिए आवश्यक है कि वैसे देशों की पहचान की जाए जहाँ कि मानव विकास के लिए निवेश आवश्यक है और इस दिशा में अधिक आय वर्ग के देश, बहुराष्ट्रीय कंपनियां तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं (जैसे WHO, UNICEF) सकारात्मक सहयोग दे सकती है।

        इस दिशा में कई कदम उठाए गए है जैसे IDA (International Development Agencies) ने निर्णय लिया है कि उन देशों को ऋण नहीं दिए जाएंगे जिनका Standard of Living उच्च या प्रति व्यक्ति आय 400 से अधिक है। इसी प्रकार W.H.O. और Unicef निम्न मानव विकास के देशों में अपने कार्यों को प्राथमिकता दे रहा है।

        मानव विकास रिपोर्ट में धन के वितरण की विषमता पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। 1995 के रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 225 अति धनी (Ultra rich) व्यक्ति है जिनकी कुल सम्पत्ति One Milion Dollar है जो विश्व के 2.5 व्यक्ति की आय के बराबर है।

       इसी प्रकार से यह रिपोर्ट बताता है कि विश्व के मात्र 20% जनसंख्या के पास विश्व का 34.75 GNP (Gross National Product) इसी 20% जनसंख्या का 84.7% के व्यापार का लाभ मिलता है। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार इन विषमताओं का अंत मात्र आर्थिक विकास, निवेश, उदारीकरण के द्वारा नहीं वन् सफल मानव विकास के द्वारा संभव है।

19. Applied Geomorphology / अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान

19. Applied Geomorphology

(अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान)


Applied Geomorphology 

अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान ⇒

1. परिचय
2. व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान की विषय वस्तु
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य
2.2 भू-आकृति विज्ञान तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट
2.3 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमिगत जल का अध्ययन
2.4 भू-आकृति विज्ञान तथा तटीय स्थलाकृति का अध्ययन
2.5 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमि उपयोग
2.6 भू-आकृति विज्ञान तथा पर्यावरण प्रबंधन
2.7 भू-आकृति विज्ञान तथा प्रादेशिक विकास
2.8 भू-आकृति विज्ञान तथा सैन्य क्षेत्र
3. निष्कर्षApplied Geomorphology

 1. परिचय 

         व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान का विकास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ है। डब्ल्यू.एम.डेविस, बाल्थर पेंक और एल.सी. किंग जैसे भूगोलवेताओं ने भूआकृति विज्ञान का विकास दार्शनिक एवं सैद्धांतिक तत्वों के आधार पर किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मात्र वही विषय जीवित रह सके जो प्रत्यक्ष उपयोगिता रखता था या वे विषय जिन्होंने समय के अनुसार अपने विषय वस्तु में परिवर्तन कर लिया। इसी का परिणाम था कि भूआकृति विज्ञान में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान का विकास किया गया। इसके कारण भू आकृति विज्ञान की उपयोगिता एवं महत्व और बढ़ गयी।
        व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग थॉर्नबरी महोदय के द्वारा 1954 ई० में किया गया था। उन्होंने 1954 में “प्रिंसिपल्स ऑफ ज्योमॉरफोलोजी” नामक पुस्तक लिखा जिसके अंत में एक अध्याय था जिसका शीर्षक ‘व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान’ था। थॉर्नबरी महोदय ने कहा कि “भूआकृति विज्ञान का अध्ययन मात्र सजावट की भाँति है। यदि इसके व्यावहारिक पक्ष को स्थापित नहीं किया गया तो यह अजयघर की वस्तु हो जाएगी।” थॉर्नबरी की इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए 1956 में अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक यूनियन एक समिति का गठन किया इसी तरह 1968 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के द्वारा भी एक आयोग का गठन किया गया। इन दोनों आयोगों ने भूआकृति विज्ञान के उपयोग के संबंध में एक समान विचार प्रकट किए। इन दोनों ने सिफारिश किया कि व्यवहारिक भूआकृति विज्ञान का अध्ययन एवं अध्यापन अनिवार्य रूप से कराया जाना चाहिए। 1960-70 के दशक में कनाडा, जर्मनी, इंग्लैंड, पूर्व सोवियत संघ और जापान जैसे देशों में अध्ययन अध्यापन का कार्य प्रारंभ हो गया। भारत में इसका अध्ययन 1980 के दशक से माना जाता है। इसका श्रेय पूणा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दीक्षित और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सविंद्र सिंह को जाता है। इसके अलावे दिल्ली स्कूल आफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर एस.के. पाल का विशेष योगदान है।
          जर्मनी के प्रोफेसर ब्रून्स डेन ने 1985 ई० में भू आकृति विज्ञान के सर्वाधिक मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रस्तुत किया। यह परिभाषा आर.जे.जोहानटन के द्वारा प्रतिपादित पुस्तक “द फ्यूचर ऑफ ज्योग्राफी” में प्रकाशित हुआ। ब्रून्स डेन ने अपनी परिभाषा एक अनुसंधान प्रपत्र में “ज्योमोरफोलॉजी इन द साइंस ऑफ सोसाइटी” के रूप में प्रस्तुत किया था। इस अनुसंधान प्रपत्र को ही जॉनस्टन महोदय ने अपनी पुस्तक में शामिल किया था।
ब्रून्स डेन- “व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक ऐसा विषय वस्तु है जो स्थलाकृति विशेषताओं की सूचनाओं के आधार पर पृथ्वी के सीमित संसाधनों की खोज, मूल्यांकन, प्रबंधन तथा उनके संरक्षण में सहायक होता है। इसके अध्ययन के द्वारा पर्यावरण का पतन तथा प्राकृतिक विपदाओं के संभावनाओं का आकलन कर प्रभाव को कम किया जा सकता है।”
          जब से भूगोल में सुदूर संवेदन प्रणाली का प्रयोग किया जाने लगा है तब से भूआकृति विज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग को और बढ़ावा मिला है। इस नवीन तकनीक के द्वारा भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) का विकास किया गया है। जिससे भूआकृति विज्ञान के व्यवहारिक प्रयोग में व्यावहारिकता का आगमन हुआ है।
2. व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान की विषय वस्तु 
            Verstaphen महोदय ने अनुप्रयुक्त भू आकृति विज्ञान के 6 विषय वस्तु का उल्लेख किया है-
(1) प्राकृतिक संसाधनों का स्थलाकृतिक मानचित्र तथा सभी प्रकार के तथ्यों से पूर्ण मानचित्र का निर्माण करना- इन दोनों ही कार्यों के लिए उच्चावच का अध्ययन अनिवार्य है। इसका अध्ययन भूआकृति विज्ञान में ही होता है। उच्चावच के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि किस ऊँचाई पर किस प्रकार के वृक्ष या कृषि कार्य किया जा सकता है। अधिक उच्चावच वाले क्षेत्र में तीव्र अपरदन की संभावना है। ऐसे में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान अधिक उच्चावच वाले क्षेत्रों का मानचित्रण कर लोगों को सचेत कर सकता है।
(2) प्राकृतिक विपदाओं (जैसे -भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी क्रिया, बाढ़, सुखाड़) का वैज्ञानिक विश्लेषण भू आकृति विज्ञान में किया जाता है। ऐसे में इनका पूर्ण अध्ययन कर मानव एवं अन्य जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है।
(3) स्थलाकृति विकास की प्रक्रियाओं का प्रभाव ग्रामीण विकास और नियोजन के कार्यों पर पड़ता है। ऐसे में ग्रामीण विकास और नियोजन कार्य प्रारंभ करने के पहले स्थलाकृतिक विकास का अध्ययन अनिवार्य है।
(4) नगरीय योजनाएँ भी व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान के अंग है। अर्थात नगर उसी स्थान पर विकसित होते हैं जहाँ पर स्थलाकृतिक परिस्थितियाँ विकास में मदद करती है।
(5) व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन खनन क्रिया को प्रारंभ करने के लिए या खनन कार्य के संभावित क्षेत्रों के सीमांकन के लिए अत्यंत ही आवश्यक है।
(6) व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अभियंताओं के लिए भी आवश्यक है। जैसे- नदियों पर बाँध बनाने में, अन्य जलाशयों के निर्माण में भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है।
           ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक उपयोगी विज्ञान है और यह अपना पहचान धीरे-धीरे स्थापित कर रहा है। वर्सटापेन के अलावे भारतीय भूगोलवेताओं ने इसके 8 विषय वस्तु निर्धारित किये हैं। जैसे:-
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य
2.2 भू-आकृति विज्ञान तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट
2.3 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमिगत जल का अध्ययन
2.4 भू-आकृति विज्ञान तथा तटीय स्थलाकृति का अध्ययन
2.5 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमि उपयोग
2.6 भू-आकृति विज्ञान तथा पर्यावरण प्रबंधन
2.7 भू-आकृति विज्ञान तथा प्रादेशिक विकास
2.8 भू-आकृति विज्ञान तथा सैन्य क्षेत्र 
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य-                  व्यवहारिक भू-आकृति वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि भू-आकृति का वृहद अध्ययन खनिजों के संभावित क्षेत्र और उसके उपयोग की संभावनाओं को बता सकता है। सुदूर संवेदन प्रणाली इस कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। जैसे यदि कोई प्रदेश मंद रूप से वलित हो और उसके विभिन्न स्तरों में चुना प्रधान चट्टान पाए जा रहे हैं तो वहां पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मिलने की संभावना होती है। जैसे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर खनिज तेल की खोज की गई थी।
       यदि जलोढ़ प्रक्रिया का सही अध्ययन किया गया हो तो यह बताया जा सकता है कि किस नदी में किस प्रकार के खनिज मिल सकते हैं? औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने स्वर्ण रेखा और कोयल नदी के स्रोत क्षेत्र का अध्ययन कर यह बताया था कि इन नदियों के बालू में सोना पाए जाते हैं।
       ऋतुक्षरण प्रक्रिया और ऋतुक्षरण के प्रभाव क्षेत्र के आधार पर खनन संभावनाओं को बताया जा सकता है। जैसे- यदि लैटेराइट संरचना के क्षेत्र का अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि उसमें अपक्षालन(Leaching) की क्रिया अधिक होती है जिसके तहत लोहा एवं एल्युमिनियम जैसे खनिज पदार्थ के संचित भंडार मिलने की संभावना होती है। 
2.2 भू-आकृति तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट-
           भूआकृति विज्ञान इंजीनियरिंग कार्य और भूमिगत जल संसाधन के निर्धारण में भी मदद करता है। जैसे- अभियंता लोग बड़े-बड़े बांधों का निर्माण उन्हीं क्षेत्रों में करना पसंद करती है जिस प्रदेश की ढाल तीव्र हो और नदी घाटियाँ सँकरी हो। इसी तरह आस्ट्रेलिया में अर्टिजियन उत्सुप्त कूआँ विशिष्ट भौगोलिक आकृति के कारण ही पाए जाते हैं।
       भू आकृति विज्ञान के आधार पर तटीय स्थलाकृतियों का अध्ययन किया जा सकता है और बड़े बंदरगाहों के निर्माण की संभावनाएं ढूँढ़ी जा सकती है।
        भू आकृति विज्ञान के अध्ययन कर भूमि उपयोग और पर्यावरण प्रबंधन तथा प्रादेशिक विकास में संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
       अक्सर सेनाओं को विषम भौगोलिक प्रदेशों में कार्य करना पड़ता है। ऐसे में प्रादेशिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन उनके लिए अनिवार्य है।
       सम्म (Schumm) महोदय ने भूआकृति विज्ञान के तीन उपयोग जलोढ़ स्थलाकृति का अध्ययन कर बताया है। इसी तरह से अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान में नित्य-प्रतिदिन नए-नए महत्त्व सामने उभरकर आ रहे हैं।

3. निष्कर्ष:-

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भू-आकृति विज्ञान का यह नवीन शाखा कार्यिक महत्व रखने के कारण आने वाले वर्षों में अंतर विषय विषय-वस्तु के रूप में और भी महत्व प्राप्त कर सकता है।


Read More:

error: