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44. Major tribal groups of India (भारत की प्रमुख जनजातीय समूह)

  44. Major tribal groups of India

(भारत की प्रमुख जनजातीय समूह) 



       जनजातियाँ मुख्यतः वह मानव समुदाय हैं जो कि एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। सामान्य अर्थों में कहें तो जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज यहाँ तक कि देवी-देवता भी अलग होते हैं। ये प्राय: प्रकृति पूजक होते हैं।

     भारत की जनजातियाँ देश के प्राय: सभी राज्यों में फैली हुई है। अलग-अलग राज्यों में इनके रीति-रिवाज और रहन सहन भी प्राय: अलग होते हैं। जनजातियाँ, भारतीय आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के संविधान में इसके लिए अनुसूचित जनजाति (ST) शब्द का प्रयोग हुआ है, इसलिए इसके लिए कुछ विशेष प्रावधान लागू किए गए हैं।

     जनजाति, भारत के आदिवासियों के लिए इस्‍तेमाल होने वाला एक वैधानिक शब्द भी है तो दूसरी ओर, इन्हें अन्य कई नामों से भी जानते है जैसे- आदिवासी, आदिम-जाति, वनवासी, प्रागैतिहासिक, असभ्य जाति, असाक्षर, निरक्षर तथा कबीलाई समूह इत्यादि।

मुख्य प्रजातीय विभाजन:

     प्रजातीय विशेषताओं के आधार पर, गुहा (1935) का मानना है कि वे निम्नलिखित तीन प्रजातियों से संबंधित हैं।

(i) मोगोलोइड्स

      उत्तर एल्पाइन या मंगोलियन गोल सिर के होते हैं। इनके बाल सीधे और चपटे, चेहरा और जबड़ा नतोदर होता है। नाक पतली और संकरी, रंग हल्का पीला-सा खुमानी रंग का होता है। ये विशेषताएं भोटिया (मध्य हिमालय), वांचू (अरुणाचल प्रदेश), नागा (नागालैंड), खासी (मेघालय), आदि के बीच पाई जाती हैं।

(ii) प्रोटो ऑस्ट्रलॉयड्स

    इस प्रजाति का सिर लम्बा और उभरा हुआ होता है। बाल पूर्णतः घुंघराले और त्वचा का रंग गहरे काले से लेकर कत्थई तथा हल्का पीला होता है। जबड़े कुछ निकले हुए और नाक साधारण रूप से चौड़ी होती है। ये विशेषताएं गोंड (मध्य प्रदेश), मुंडा (छोटानागपुर), हो (झारखंड) आदि में पाई जाती है।

(iii) नेग्रिटो

      इस प्रजाति का रंग लाल चाकलेटी से लेकर काला कत्थई तक होता है। इनका डील-डौल नाटा (5 फुट से कम) होंठ काफी मोटे, नाक चौड़ी और चपटी होती है। इनके बाल चपटे, फीते के समान और घने होते हैं। वे आपस में लिपटकर गांठ का निर्माण करते हैं। इनमें जबड़े और दांत आगे निकले होते हैं। इस समय कुछ ही हजार नीग्रिटो जीवित हैं। उनमें अन्य जातियों के रक्त का मिश्रण हो गया है। ये विशेषताएं कादर (केरल), ओंगे (लिटिल अंडमान), जारवा (अंडमान द्वीप) आदि के बीच पाई जाती हैं।

जनजातियों का भौगोलिक वितरण

     वर्तमान समय में भी भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक जनजातियों के साथ-साथ संस्कृति का विविधीकरण भी देखने को मिलता है। सम्पूर्ण भारत में जनजातियों की वास्तविक स्थिति उनके भौगोलिक वितरण को समझकर आसानी से लिया जा सकता है।

     भौगोलिक आधार पर भारत की जनजातियों को विभिन्न भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(i) उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र:-

            उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय के तराई क्षेत्र, उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड तथा पूर्वोत्तर के सभी राज्य इस क्षेत्र में आते हैं। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से बकरवाल, गुर्जर, थारू, बुक्सा, राजी, जौनसारी, शौका, भोटिया, गद्दी, किन्नौरी, गारो, खासी, जयंतिया इत्यादि जनजातियाँ निवास करती हैं।

(ii) मध्य क्षेत्र:-

        मध्य क्षेत्र प्रायद्वीपीय भारत के पठारी तथा पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। मध्य प्रदेश, दक्षिण राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा आदि राज्य इस क्षेत्र में आते हैं जहाँ मुख्यतः भील, गोंड, रेड्डी, संथाल, हो, मुंडा, कोरवा, उरांव, कोल, बंजारा, मीणा, कोली आदि जनजातियाँ रहती हैं।

(iii) दक्षिण क्षेत्र:-

           दक्षिणी क्षेत्र के अंतर्गत कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्य आते हैं जहाँ मुख्य रूप से टोडा, कोरमा, गोंड, भील, कडार, इरुला आदि जनजातियाँ बसी हुई हैं।

(iv) द्वीपीय क्षेत्र:-

        द्वीपीय क्षेत्र में अंडमान एवं निकोबार की जनजातियाँ आती हैं। जहाँ मुख्य रूप से सेंटिनलीज, ओंग, जारवा, शोम्पेन इत्यादि।

भारत की जनजातीय जनसँख्या

       भारत में अनुसूचित जनजातियों (ST) की जनसँख्या 10.42 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 8.6% है। भारत में जनजातीय जनसंख्या अलग-अलग हिस्सों में फैली हुई है। देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कई इलाकों में आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं।

    भारत में अधिकतम जनजातीय जनसँख्या वाले पाँच राज्य है-

(i) मिजोरम (जनसंख्या का 94.4%)

(ii) लक्षद्वीप (94%)

(iii) नागालैंड (86.5%)

(iv) मेघालय (86.1%)

(v) अरुणाचल प्रदेश (68.79%)

      इसके अलावा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, असम और पश्चिम बंगाल में भी महत्वपूर्ण जनजातीय बस्तियाँ हैं। 

भारत में पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियाँ

      भारत की सबसे अधिक ज्ञात जनजातियों में गोंड, भील, संथाल, मुंडा, गारो, खासी, अंगामी, भूटिया, चेंचू, कोडाबा और ग्रेट अंडमानी जनजातियाँ शामिल हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, इन सभी जनजातियों में, भील आदिवासी समूह,  भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। यह देश की कुल अनुसूचित जनजातीय आबादी का करीब 38% है।

      नीचे राज्य और उनमें निवास करने वाले जनजातियों के समूहों के बारे में जानकारी दी जा रही है-

 राज्य  निवास करने वाली प्रमुख जनजातियाँ
झारखण्ड संथाल, असुर, बैगा, बन्जारा, बिरहोर, गोंड, हो, खरिया, खोंड, मुंडा, कोरवा, भूमिज, मल पहाडिय़ा, सोरिया पहाडिय़ा, बिझिया, चेरू लोहरा, उरांव, खरवार, कोल, भील।
बिहार  बैंगा, बंजारा, मुण्डा, भुइया, खोंड।
मध्य प्रदेश   भील, मिहाल, बिरहोर, गडावां, कमार, नट।
उड़ीसा बैगा, बंजारा, बड़होर, चेंचू, गड़ाबा, गोंड, होस, जटायु, जुआंग, खरिया, कोल, खोंड, कोया, उरांव, संथाल, सओरा, मुन्डुप्पतू।
मेघालय  खासी, जयन्तिया, गारो।
अरुणाचल प्रदेश अबोर, अक्का, अपटामिस, बर्मास, डफला, गालोंग, गोम्बा, काम्पती, खोभा मिसमी, सिगंपो, सिरडुकपेन।
असम व नगालैंड बोडो, डिमसा गारो, खासी, कुकी, मिजो, मिकिर, नगा, अबोर, डाफला, मिशमिस, अपतनिस, सिंधो, अंगामी।
तमिलनाडु टोडा, कडार, इकला, कोटा, अडयान, अरनदान, कुट्टनायक, कोराग, कुरिचियान, मासेर, कुरुम्बा, कुरुमान, मुथुवान, पनियां, थुलया, मलयाली, इरावल्लन, कनिक्कर,मन्नान, उरासिल, विशावन, ईरुला।
कर्नाटक  गौडालू, हक्की, पिक्की, इरुगा, जेनु, कुरुव, मलाईकुड, भील, गोंड, टोडा, वर्ली, चेन्चू, कोया, अनार्दन, येरवा, होलेया, कोरमा।
आंध्र प्रदेश चेन्चू, कोचा, गुड़ावा, जटापा, कोंडा डोरस, कोंडा कपूर, कोंडा रेड्डी, खोंड, सुगेलिस, लम्बाडिस, येलडिस, येरुकुलास, भील, गोंड, कोलम, प्रधान, बाल्मिक।
छत्तीसगढ़ कोरकू, भील, बैगा, गोंड, अगरिया, भारिया, कोरबा, कोल, उरांव, प्रधान, नगेशिया, हल्वा, भतरा, माडिया, सहरिया, कमार, कंवर।
त्रिपुरा  लुशाई, माग, हलम, खशिया, भूटिया, मुंडा, संथाल, भील, जमनिया, रियांग, उचाई।
जम्मू-कश्मीर गुर्जर, भरवर वाल।
गुजरात कथोड़ी, सिद्दीस, कोलघा, कोटवलिया, पाधर, टोडिय़ा, बदाली, पटेलिया।
उत्तर प्रदेश बुक्सा, थारू, माहगीर, शोर्का, खरवार, थारू, राजी, जॉनसारी।
उत्तरांचल भोटिया, जौनसारी, राजी।
महाराष्ट्र  भील, गोंड, अगरिया, असुरा, भारिया, कोया, वर्ली, कोली, डुका बैगा, गडावास, कामर, खडिया, खोंडा, कोल, कोलम, कोर्कू, कोरबा, मुंडा, उरांव, प्रधान, बघरी।
पश्चिम बंगाल होस, कोरा, मुंडा, उरांव, भूमिज, संथाल, गेरो, लेप्चा, असुर, बैगा, बंजारा, भील, गोंड, बिरहोर, खोंड, कोरबा, लोहरा।
हिमाचल प्रदेश गद्दी, गुर्जर, लाहौल, लांबा, पंगवाला, किन्नौरी, बकरायल।
मणिपुर  कुकी, अंगामी, मिजो, पुरुम, सीमा।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह औंगी आरबा, उत्तरी सेन्टीनली, अंडमानी, निकोबारी, शोपन।
केरल  कडार, इरुला, मुथुवन, कनिक्कर, मलनकुरावन, मलरारायन, मलावेतन, मलायन, मन्नान, उल्लातन, यूराली, विशावन, अर्नादन, कहुर्नाकन, कोरागा, कोटा, कुरियियान,कुरुमान, पनियां, पुलायन, मल्लार, कुरुम्बा।
पंजाब गद्दी, स्वागंला, भोट।
राजस्थान मीणा, भील, गरसिया, सहरिया, सांसी, दमोर, मेव, रावत, मेरात, कोली।
सिक्किम लेपचा।

भारत की जनजातियों के प्रमुख समस्याएँ

        भारत की जनजातियों में आदिम विशेषताएं, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े समुदाय से संपर्क में संकोच और पिछड़ापन की प्रमुख मुद्दे है। परिणामस्वरूप, उन्हें अपने सम्पूर्ण जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

      भारत में जनजातीय समस्याएँ निम्नलिखित है:-

(i) सामाजिक समस्याएँ:-

      सामाजिक समस्याओं की बात की जाय तो ये आज भी सामाजिक संपर्क स्थापित करने में अपने-आप को सहज नहीं पाते हैं। इस कारण ये सामाजिक-सांस्कृतिक अलगाव, भूमि अलगाव, अस्पृश्यता की भावना महसूस करती हैं। 

(ii) धार्मिक समस्याएँ:-

      धार्मिक अलगाव भी जनजातियों की समस्याओं का एक बहुत बड़ा पहलू है। इन जनजातियों के प्राय: अपने अलग देवी-देवता होते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है समाज में अन्य वर्गों द्वारा इनके प्रति छुआछूत का व्यवहार रखना। अगर हम थोड़ा पीछे जायें तो पाते हैं कि इन जनजातियों को अछूत तथा अनार्य मानकर समाज से बेदखल कर दिया जाता था, सार्वजनिक मंदिरों में प्रवेश तथा पवित्र स्थानों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था। आज भी इनकी स्थिति ले-देकर यही है।

(iii) शैक्षिक समस्याएँ:-

        आज भी जनजातीय समुदायों का एक बहुत बड़ा वर्ग निरक्षर है जिससे ये आम बोलचाल की भाषा को समझ नहीं पाती हैं। सरकार की कौन-कौन सी योजनाएँ इनके लिये हैं इसकी जानकारी तक इनको नहीं हो पाती है जो इनके शैक्षिक रूप से पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण है। 2001 से 2011 तक, ST के लिए साक्षरता दर में 11.86 प्रतिशत अंक और पूरी आबादी के लिए 8.15 प्रतिशत अंक की वृद्धि देखने को मिला है।

(iv) स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ:-

         स्वास्थ्य सेवा के मामले में जनजातीय आबादी के बीच संदिग्ध मुद्दे हैं। सबसे कमजोर कड़ी अनुसूचित जनजातियों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ हैं। अनुसूचित क्षेत्रों में काम करने के लिए इच्छुक, प्रशिक्षित और सुसज्जित स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की कमी जनजातीय आबादी को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण बाधा है। अनुसूचित क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में डॉक्टरों, नर्सों, तकनीशियनों और प्रबंधकों के बीच कमी, रिक्तियाँ, अनुपस्थिति या उदासीनता है।

     स्वास्थ्य क्षेत्र में नीतियों को आकार देने, योजना बनाने या सेवाओं को लागू करने में अनुसूचित जनजातियों के लोगों या उनके प्रतिनिधियों की भागीदारी का लगभग पूर्ण अभाव, अनुसूचित क्षेत्रों में अनुचित तरीके से डिजाइन किए गए और खराब तरीके से संगठित और प्रबंधित स्वास्थ्य सेवा के कारणों में से एक है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) जैसे चिकित्सा बीमा कवरेज अनुसूचित क्षेत्रों में बहुत कम हैं। इसलिए, जनजातीय लोग भयावह और गंभीर बीमारियों के प्रति सुरक्षा के बिना रहते हैं। जनजातीय लोगों में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 44 से 74 के बीच होने का अनुमान है।

(v) आर्थिक समस्याएँ:-

       इनके आर्थिक रूप से पिछड़ेपन की बात की जाए तो इसमें प्रमुख समस्या गरीबी तथा ऋणग्रस्तता है। आज भी जनजातियों के समुदाय का एक बड़ा तबका ऐसा है जो दूसरों के घरों में काम कर अपना जीवनयापन कर रहा है। माँ-बाप आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं पाते हैं तथा पैसे के लिये उन्हें बड़े-बड़े व्यवसायियों या दलालों को बेच देते हैं। बच्चे या तो समाज के घृणित से घृणित कार्य को अपनाने हेतु विवश हो जाते हैं या तो उन्हें मानव तस्करी का सामना करना पड़ता है।

      रही बात लड़कियों की तो उन्हें अमूमन वेश्यावृत्ति जैसे घिनौने दलदल में धकेल दिया जाता है। दरअसल जनजातियों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण उनका आर्थिक रूप से पिछड़ापन ही है जो उन्हें उनकी बाकी सुविधाओं से वंचित करता है।

(vi) तम्बाकू और शराब का सेवन:-

    एक्सा कमेटी रिपोर्ट 2014 के आंकड़ों से स्पष्ट पता चलता है कि 15 से 54 वर्ष की आयु के पुरुष काफी अधिक मात्रा में तम्बाकू का सेवन करते हैं, या तो धूम्रपान करते हैं या चबाते हैं। जनजातियों के लगभग 72 % और गैर-जनजातियों के 56 % लोगों में तम्बाकू का सेवन प्रचलित था।

    नशाखोरी ने इन आदिवासियों के पारिवारिक आर्थिक एवं सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है। प्रत्येक आदिवासी परिवार त्योहार, विवाह आदि उत्सवों पर खूब शराब, गांजा, भांग व अन्य नशीले पदार्थ का सेवन करते है। शराब पीने से उनकी आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो जाती है।

(vii) गरीबी और ऋणग्रस्तता:-

      अधिकांश जनजातियाँ गरीब हैं। जनजातियाँ अल्पविकसित तकनीक पर आधारित कई तरह के सरल व्यवसायों में संलग्न हैं। अधिकांश व्यवसाय प्राथमिक व्यवसाय हैं जैसे- शिकार करना, लकड़ी इकट्ठा करना और कृषि करना। 

     विभिन्न जनजातियों के 60 प्रतिशत से अधिक परिवार किसी न किसी रूप में ऋणग्रस्त हैं। जन्म, मृत्यु, विवाह, सामूहिक भोज जैसे अवसरों के लिए ली गई ऋण की राशि द्वारा जनजातीय लोग भारत की सांस्कृतिक धरोहर जनजातियाँ अपने दायित्वों को पूरा करते हैं। यद्यपि सरकार की विभिन्न संस्थाओं आई.टी.डी.ए., सहकारी समितियों, बैंकों व जनजातीय कल्याण विभाग द्वारा नाममात्र के ब्याज पर ऋण की सुविधा उपलब्ध कराई गई है किन्तु अशिक्षा, अज्ञानता के कारण जनजातीय लोग अपनी जनजाति या महाजनों से ही ऋण लेना पंसद करते हैं। ऋणग्रस्तता के लिए निम्न कारण उत्तरदायी हैं-

⇒ नई वन नीति के कारण वन सम्पदा के उपयोग से वंचित,

⇒ जनजातीय कृषि भूमि का छोटा आकार व अनुपजाऊ होना,

⇒ उत्पादित वस्तुओं का उचित मूल्य प्राप्त ना होना,

⇒ खेतिहर मजदूरों की संख्या में वृद्धि होना,

⇒ मद्यपान व आय से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति,

⇒ ऋण लेने के लिए सरकारी संस्थाओं की अपेक्षा स्थानीय महाजनों पर निर्भरता।

     ऋणग्रस्तता की समस्या के कारण जनजातीय समाज का निरंतर विघटन हो रहा है क्योंकि गरीबी के कारण उचित मात्रा में भोजन का अभाव अनेक रोगों को जन्म देता है। साथ ही चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव होने के कारण बच्चों को शिक्षा प्राप्त नहीं होती। बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी और कृषि भूमि से बेदखल होने की समस्याएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं।

यातायात के साधनों का अभाव:-

     अधिकांश जनजातियाँ पहाड़ों, जंगलों और दूरवर्ती दुर्गम क्षेत्रों में निवास करती हैं जहां उनका अन्य लोगों से सम्पर्क नहीं हो पाता क्योंकि आवागमन के साधनों का अभाव है। अतः उन्हें जीवनयापन के उचित अवसर उपलब्ध नहीं होते हैं।

वन सम्पदा पर रोक:-

     जनजातीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की वन सम्पदा जैसे कीमती लकड़ी, फल-फूल, जड़ी-बूटियाँ, चाय बागान आदि प्रचुरता में उपलब्ध हैं जिनके कारण अनेक उद्योगों का विकास हुआ किन्तु इसका दुष्प्रभाव दो रूपों में पड़ा। बाह्य लोगों जैसे व्यापारी, महाजन, ठेकेदार, प्रशासक, पुलिस अधिकारियों के साथ समायोजन व्यवहार की समस्या तथा इनकी गरीबी व अशिक्षा का लाभ उठाकर बाह्य लोगों द्वारा इनका शोषण किया गया।

प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर रोक:-

      ब्रिटिश शासन से पूर्व ये जनजातियां राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र इकाइयां थीं। वन खनिज संपदा पर इनका एकाधिकार था किन्तु अंग्रेजों द्वारा सम्पूर्ण देश में एक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित कर जनजातियों के अधिकार सीमित कर दिए गए और प्राकृतिक सम्पदा के उपभोग पर रोक लगा दी गई। नई प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था से संतुलन बनाने में जनजातीय समाज को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

धर्म परिवर्तन की समस्या:-

     ब्रिटिश शासनकाल में ही ईसाई मिशनरियों द्वारा उनके विकास, कल्याण के नाम पर आर्थिक प्रलोभन देकर उनका धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनाया गया जिसके फलस्वरूप अनेक आर्थिक व परसंस्कृति ग्रहण सम्बम्धी समस्याओं का विकास हुआ। मजूमदार तथा मदन के अनुसार भारतीय जनजातियों की अधिकांश समस्याएं उनके भौगोलिक पृथक्करण और नए सांस्कृतिक सम्पर्क का परिणाम हैं।

जनजातियों के उत्थान के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदम

       भारतीय संविधान में जहाँ एक ओर अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है तो वहीं दूसरी ओर, अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध भी है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के अंतर्गत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे।    

      जनजातियों के उत्थान के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं-

शिक्षा

(i) एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) की स्थापना करके दूर-दराज के इलाकों में आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही है।

(ii) अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति (पीएमएस) और राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप जैसी योजनाएँ चलाई जा रही हैं।

(iii) आदिवासी क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की जाती है।

आर्थिक विकास

(i) जनजातीय उत्पादन के विपणन को बढ़ावा दिया जाता है।

(ii) प्रधानमंत्री पीवीटीजी (Particularly Vulnerable Tribal Groups) विकास मिशन के तहत, कमजोर जनजातीय समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का काम किया जाता है।

सामुदायिक स्थिरता

(i) आदिवासी भूमि और संस्कृतियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।

(ii) आदिवासी उप-योजना क्षेत्रों में आश्रम स्कूलों की स्थापना की जाती है।

(iii) आदिवासी महिलाओं और लड़कियों में साक्षरता के स्तर में अंतर को कम करने का काम किया जाता है।

     इनके अलावा, ग्राम पंचायतों और लोकसभाओं, विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण का भी प्रावधान किया गया है। 

1. Problem regions: Hilly regions (समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)

 1. Problem regions: Hilly regions

(समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)



परिचय:-

     पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी समस्याएँ उत्पन्न होते हैं जो कि मैदानी क्षेत्रों की समस्याओं से अलग और विशिष्ट होते हैं। पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो गया है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव ने कई तरह से तनाव और दबाव पैदा किया है और हालात ऐसे चरण में पहुँच रहे हैं जहाँ गंभीर उपायों की आवश्यकता है। सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक विविधताओं के अलावा भूभाग की विविधताओं के कारण नियोजन की पूरी तरह से अलग पद्धति तैयार करने की आवश्यकता है।

     देश के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट विकास रणनीतियों के निर्माण के लिए बुनियादी पूर्व शर्त के रूप में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं, संसाधन संपदा (मानव और भौतिक दोनों), विकास क्षमता और उनकी विशेष समस्याओं के बारे में विस्तृत जानकारी की आवश्यकता होती है।

      पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम के मार्गदर्शक सिद्धांत बुनियादी जीवन समर्थन प्रणाली को बढ़ावा देने और समग्र परिप्रेक्ष्य में भूमि, जल, खनिज और जैविक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग (पहाड़ी और मैदानी दोनों के हितों पर विचार करते हुए) पर आधारित हैं। पूरी रणनीति लोगों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में उनकी सक्रिय भागीदारी पर केंद्रित होनी चाहिए। “सामाजिक बाड़बंदी” का तात्पर्य स्थानीय स्तर पर समाज के संसाधनों के प्रबंधन में स्वैच्छिक और स्व-लगाए गए अनुशासन से है।

पहाड़ी क्षेत्र:-

     भारत में पहाड़ी क्षेत्र देश के कुल भू-भाग का लगभग 17% हिस्सा हैं। ये क्षेत्र मोटे तौर पर दो श्रेणियों में आते हैं:-

(i) वे क्षेत्र जो राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं के साथ-साथ विस्तृत हैं, और

(ii) वे जो राज्य का हिस्सा बनते हैं।

     पहली श्रेणी में उत्तर पूर्वी क्षेत्र के राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। इन्हें “विशेष श्रेणी के राज्य” कहा जाता है, जिनके व्यय को केंद्रीय सहायता से पूरा किया जाता है। उत्तर पूर्वी क्षेत्र के इन पहाड़ी राज्यों के एकीकृत विकास के लिए, केंद्र सरकार ने संसद के एक अधिनियम द्वारा 1971 में उत्तर पूर्वी पहाड़ी परिषद” की स्थापना की है।

     परिषद अपनी विकास योजना के तहत एक से अधिक राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों और पूरे क्षेत्र के लिए समान हित की योजनाओं को आगे बढ़ाती है। इसने बिजली उत्पादन, सड़कों के निर्माण, कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन आदि के अंतर-क्षेत्रीय कार्यक्रमों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह अनुसंधान और प्रयोगात्मक परियोजनाओं का भी समर्थन करता है।

      असम, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में उप-हिमालयी क्षेत्र में बड़े मिश्रित राज्य का हिस्सा बनने वाले पहाड़ी क्षेत्र हैं। इनमें असम के कार्बी आंगलोंग और उत्तरी कैचर जिले (15,200 वर्ग किमी), पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले (2400 वर्ग किमी) और उत्तराखंड के देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, चमोली, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल जिले (51,100) वर्ग किमी शामिल हैं।

    अन्य महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र पश्चिमी घाटों तक फैले हुए हैं, जिनमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल (1,34,500 वर्ग किमी) के 132 तालुका शामिल हैं। यहाँ उप-योजना की अवधारणा की शुरूआत से पहले विकास कार्यक्रमों के लिए केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

प्रमुख समस्याएँ:-

(i) वनों की कटाई,

(ii) मिट्टी का कटाव,

(iii) बाढ़ का खतरा,

(iv) कम उत्पादकता,

(v) वन आधारित उत्पादों में कमी,

(vi) भूमि-जल प्रबंधन का अभाव और

(vii) बढ़ती गरीबी।

पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान कार्यक्रम:-

(i) 5वीं पंचवर्षीय योजना- उपयोजना अवधारणा की शुरुआत

(ii) छठी पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी और विकास

(iii) 7वीं पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी विकास, पारिस्थितिकी संरक्षण

(iv) 8वीं पंचवर्षीय योजना- आधुनिक कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग, भूमि-जल संसाधन, लोगों की भागीदारी

     इन पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की है। हालांकि, दूसरी पंचवर्षीय योजना के बाद से केंद्रीय सहायता की आवश्यकता महसूस की गई है। पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (एचएडीपी) के लिए केंद्रीय सहायता 5वीं पंचवर्षीय योजना के बाद से क्षेत्र और जनसंख्या को समान महत्व देते हुए घटक राज्यों को दी जा रही है।

    विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) गाडगिल फार्मूले के अनुसार विनियमित पहाड़ी क्षेत्रों के बीच आवंटित की जा रही है।

गाडगिल फार्मूला (1969-70):

      गाडगिल फार्मूला, वर्ष 1969 में धनंजय रामचंद्र गाडगिल ने तैयार किया था। इस फार्मूले के तहत भारत में राज्यों को योजनाओं के लिए केंद्र सरकार से सहायता राशि मिलती है। इसका इस्तेमाल 4थी और 5वीं पंचवर्षीय योजनाओं में किया गया था

      गाडगिल फार्मूला के तहत राज्यों को सहायता राशि देने का तरीका:

(i) 60 % राशि जनसंख्या के आधार पर दी जाती है।

(ii) 10 % राशि टैक्स एफर्ट के आधार पर दी जाती है।

(iii) 10 % राशि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर दी जाती है।

(iv) 10 % राशि राज्य की खास समस्याओं के आधार पर दी जाती है।

(v) 10 % राशि सिंचाई और बिजली परियोजनाओं के लिए दी जाती है।

संशोधित गाडगिल फॉर्मूला (1980):   

     संशोधित गाडगिल फार्मूला, राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) ने अगस्त 1980 में मंजूरी प्रदान की थी। यह फार्मूला छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) से लेकर सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) तक आवंटन का आधार बना। वर्ष 1990-91 में वार्षिक योजना के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया।

     संशोधित गाडगिल फार्मूला में ये बदलाव किए गए थे:

(i) 55% जनसंख्या के आधार पर

(ii) 25% PCI (प्रति व्यक्ति कर संग्रहण) के आधार पर

(iii) 5% राजकोषीय प्रबंधन के आधार पर।

(iv) 15% विशेष विकास समस्याओं के आधार पर।

योजना और कार्यक्रम:-

   पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, बागवानी, कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, वानिकी, मृदा संरक्षण और उपयुक्त ग्राम उद्योगों के विकास के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए कार्यक्रमों के माध्यम से पहाड़ियों के स्वदेशी संसाधनों के दोहन पर पर्याप्त जोर देते हैं। मुख्य रूप से उन गतिविधियों के पैकेज पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जिन्हें स्थानीय लोगों द्वारा अवशोषित किया जा सकता है। सहकारी समितियों या किसान समितियों को बहुत महत्व दिया गया है।

कार्यक्रम:-

(i) भूमि क्षरण को रोकना और फसल उत्पादकता बढ़ाना और भूमि जोतों का समेकन करना।

(ii) जनसंख्या नियंत्रण उपाय- परिवार नियोजन कार्यक्रम।

(iii) पूंजी और भौतिक योजनाओं की निगरानी के माध्यम से विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में सुधार करना।

(iv) स्थानीय स्व-निकायों और अन्य के माध्यम से वनरोपण।

(v) कृषि-जलवायु क्षेत्रों, मिट्टी की उपयुक्तता परीक्षण के माध्यम से कृषि प्रथाओं में सुधार।

(vi) झूमियों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए हैं- झूम खेती को रोकने और उन्हें स्थायी कृषि प्रथाओं में पुनर्वासित करने के लिए।

(vii) रबड़ और कॉफी के बागान विकसित करने तथा ऐसे बागानों में झुमियों का पुनर्वास करने के लिए कृषि को प्रोत्साहित किया गया है।

(viii) पशुधन, चारागाह और वन की उपलब्धता को देखते हुए पशुपालन/पशुधन को प्रोत्साहित किया गया है।

(ix) कार्यक्रमों में वैज्ञानिक प्रजनन दृष्टिकोण, मजबूत सुरक्षात्मक और उपचारात्मक पशु स्वास्थ्य कवर तथा उत्पाद का प्रसंस्करण और विपणन भी शामिल है।

(x) वानिकी कार्यक्रमों में, बागान (कॉफी, चाय, मसाले आदि), कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी जैसे वानिकी उत्पादन पर जोर दिया गया है।

(xi) बागवानी कार्यक्रम में, बागों (सेब, अंगूर और केला) के विकास और उनके विपणन पर जोर दिया गया है।

(xii) पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे उद्योग विकसित किए जा सकते हैं, जिनमें प्रदूषण रहित वातावरण, उच्च कौशल और उच्च मूल्य संवर्धन पर आधारित ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है- इलेक्ट्रॉनिक्स, घड़ी निर्माण, ऑप्टिकल ग्लास, फर्नीचर, दवाएँ और औषधियाँ। कालीन निर्माण और हथकरघा जैसे कुटीर उद्योग भी उपयुक्त गतिविधियाँ हैं।

(xiii) ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों का विकास।

(xiv) परिवहन और संचार के साधनों का विकास।

(xv) सुरक्षित उत्खनन और खनन।

(xvi) पर्यटन सबसे महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है, जिसका समुचित विकास किया जाना चाहिए।

(xvii) जैवमंडल रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के माध्यम से मूल्यवान वनस्पतियों और जीवों की प्रस्तुति के लिए एक एकीकृत रणनीति बनाई जानी चाहिए।

(xviii) पर्यावरण संबंधी मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए गतिविधियों में लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया जाना चाहिए।

(xix) पहाड़ी क्षेत्रों में कोई भी गतिविधि करते समय पारिस्थितिकी संरक्षण को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक पेपर प्रोजेक्ट में वनरोपण की लागत शामिल होनी चाहिए और इसके अनुसार इसकी आर्थिक व्यवहार्यता निर्धारित की जानी चाहिए।

(xx) पहाड़ी क्षेत्रों की वैज्ञानिक योजना के लिए उपलब्ध संसाधनों-मिट्टी, पानी, खनिज, वनस्पति आदि के बारे में जानकारी आरएस और जीआईएस के माध्यम से प्राप्त की जानी चाहिए।

(xxi) पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम लाभ प्राप्त करने और संबंधित क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकास रणनीतियों को अपनाना होगा।

सिफारिशें:-

1. विकासात्मक क्षेत्र:

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्राकृतिक संसाधन दोहन और संरक्षण के बीच संतुलन उत्तरार्द्ध के पक्ष में होना चाहिए। उपयुक्त गतिविधियों के लिए क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए जैसे कि:-

(i) बर्फ, अल्पाइन, उप-अल्पाइन क्षेत्रों और संरक्षित परिदृश्यों के क्षेत्रों को किसी भी कीमत पर संरक्षित किया जाना चाहिए, महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के प्रवाह को बनाए रखने और धर्म-सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान और संरक्षण करने के लिए।

(ii) सभी प्राकृतिक जल क्षेत्रों (ग्लेशियर, नदियाँ, झीलें और झरने) को सख्ती से संरक्षित किया जाना चाहिए। किसी भी क्षेत्र में ऐसी गतिविधियाँ जो किसी भी तरह से प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक झरने हैं, उन्हें “स्प्रिंग अभयारण्य” में परिवर्तित किया जाना चाहिए और इस अवधारणा को सभी नियोजन में शामिल किया जाना चाहिए।

(iii) वन क्षेत्र को पर्यावरण सेवाओं और जैव विविधता मूल्यों के लिए संरक्षित और संवर्धित किया जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र टिकाऊ जैव और Non-timber forest products (NTFPs) के लिए भी उपलब्ध होने चाहिए, जिसमें बांस, पूर्वेक्षण और इको-पर्यटन शामिल हैं

(iv) निचले इलाकों में उपजाऊ नदी घाटियों के क्षेत्रों का उपयोग कृषि उत्पादन को अधिकतम करने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसे क्षेत्रों में कृषि भूमि को अन्य उपयोगों में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जिन क्षेत्रों में स्थानान्तरित या सीढ़ीनुमा कृषि की जाती है, उन्हें विशिष्ट फसलों, जैविक कृषि, बागवानी, कृषि-वानिकी तथा बेहतर प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने के लिए चिन्हित किया जाना चाहिए।

(v) घरेलू तथा लघु उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकेंद्रीकृत विद्युत उत्पादन हेतु नदी क्षेत्रों को चिन्हित किया जाना चाहिए।

2. सड़क, रेल तथा हवाई सम्पर्क: 

     टास्क फोर्स ने दो लूप रेलवे लाइनों की सिफारिश की है, एक पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के लिए जो जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को जोड़ेगी और दूसरी उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लिए। इन दो लूपों को उत्तर और पूर्वी रेलवे के मौजूदा राष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से एक दूसरे से जोड़ा जाना चाहिए।

     उपर्युक्त कार्यों को करने के लिए International Health Regulations (IHR) के सड़क नेटवर्क को उचित स्थानों पर रेल नेटवर्क से जोड़ा जाना चाहिए। सड़क नेटवर्क को हवाई सेवाओं से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि जल्दी खराब होने वाले सामान और आपातकालीन स्वास्थ्य की आवश्यकता वाले लोगों को देश के बाकी हिस्सों या बाहर तक पहुँचने के अवसर प्रदान किए जा सकें।

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्रत्येक IHR राज्य में बड़े हेलीकॉप्टरों और छोटे उड़ान भरने और उतरने वाले विमानों को स्वीकार करने के लिए कम से कम एक छोटी हवाई पट्टी होनी चाहिए।

अन्य अनुशंसाएँ:

1. पर्वतीय परिप्रेक्ष्य और संवेदनशीलता

2. शिक्षा और कौशल विकास

3. प्राकृतिक संसाधन विश्लेषण और परामर्श केंद्र

4. रणनीतिक पर्यावरण मूल्यांकन

5. वित्तीय प्रोत्साहन, पुरस्कार और छूट

6. IHR राज्यों के बीच संसाधन साझा करना

7. जलमार्ग और रोपवे

8. अपशिष्ट प्रबंधन

9. आपदा तैयारी और शमन

10. उद्योग

11. जलवायु परिवर्तन

12. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन



नोट

पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (Hill Area Development Programme):-

     पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (HADP) 5वीं पंचवर्षीय योजना में आरम्भ हुआ जिसमें  उत्तराखण्ड, मिकिर पहाड़ी और असम की उत्तरी कछार की पहाड़ियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला तथा तमिलनाडु के नीलगिरि इत्यादि को मिलाकर कुल 15 जिलों को शामिल किया गया हैं। पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए बनी राष्ट्रीय समिति ने सन् 1981 में सिफारिश किया था कि देश के उन सभी पर्वतीय क्षेत्रों को पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल कर लिया जाए जिनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक है और जिनमें जनजातीय उपयोजना लागू नहीं है।

      राष्ट्रीय समिति ने पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए जो सुझाव दिए, उनमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा गया था:-

(i) कार्यक्रम का लाभ पहाड़ी क्षेत्र के सभी लोगों तक पहुँच सके।

(ii) स्थानीय संसाधनों तथा प्रतिभाओं का विकास हो सके।

(iii) पहाड़ी लोग अपनी जीविका-निर्वाह अर्थव्यवस्था को निवेश-उन्मुखी बनाएँ व कुछ लाभ कमाना सीखें।

(iv) अन्तः प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े अर्थात् पर्वतीय क्षेत्रों का शोषण न होने पाए।

(v) पिछड़े क्षेत्रों की बाजार व्यवस्था में पर्याप्त सुधार करके श्रमिकों को लाभ पहुँचाना।

(vi) पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाए रखना।

     इस कार्यक्रम के तहत पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की योजनाएँ बनाते समय उनकी स्थलाकृति, पारिस्थितिकी व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखा गया था।

उद्देश्य:-

    इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, मृदा संरक्षण, वृक्षारोपण तथा उद्यान खेती इत्यादि का प्रशिक्षण देकर तथा उन्हें इन कार्यक्रमों में शामिल करके स्थानीय संसाधनों का दोहन करना था।

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India (भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India

(भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)



            मृदा (मिट्टी) पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिये प्राकृतिक स्रोत के रूप में पोषक तत्त्व, जल एवं अन्य खनिज लवण प्रदान करती है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जीवांश का एक मिश्रण है जो लाखों वर्षों में निर्मित हुई है।

सामान्यतः मिट्टी की कई परतें होती हैं, जिसमें सबसे ऊपरी परत में छोटे मिट्टी के कण, सड़े-गले हुए पेड़-पौधों एवं जीवों के अवशेष होते हैं। यह परत फसलों की पैदावार के लिये बहुत उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण होती है।

इस तरह मृदा शैलों के अपक्षयण व विघटन से उत्पन्न भूपदार्थों, मलवा और विविध जैव सामग्रियों का सम्मिश्रण होती है, जो पृथ्वी की सतह (भू-पर्पटी की सतह) पर विकसित होती है।

दूसरी परत महीन कणों (जैसे-चिकनी मिट्टी) की होती है, जिसके नीचे विखंडित चट्टानें एवं मिट्टी का मिश्रण होता है तथा इसके नीचे अविखंडित सख्त चट्टानें होती हैं। यह कुछ सेमी. से लेकर कई मीटर तक हो सकती हैं।

पौधों की वृद्धि सामान्यतः 6.0-7.0 pH मान वाले मृदा में होती है। इसी pH मान के मध्य पौधे अपनी सारी क्रियाएँ करते हैं। अधिक अम्लीय अथवा क्षारीय मृदा पौधों के लिये हानिकारक होती है।

ह्यूमस, खनिज तत्व, जल एवं वायु मृदा के मुख्य घटक होते हैं। इन घटकों का संयोजन (अनुपात) मृदा के प्रकार को निर्धारित करता है।

मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile):- 

     धरातल के ऊपरी सतह से जब नीचे की ओर बढ़ते हैं तो आधारभूत शैल तक मृदा के संघटकों तथा रासायनिक भौतिक गुणों में क्रमशः परिवर्तन होता जाता है। इन परिवर्तनों के आधार पर समस्त मृदामंडल को विशिष्ट स्तरों (distinct layers) में बाँटा गया है। ये स्तर ‘मृदा संस्तर’ (soil horizons) कहलाते हैं।

     ये संस्तर मोटे तौर पर मृदा-सतह के समानांतर एवं क्षैतिज अवस्था में होते हैं। मृदा के वैसे लम्बवत् खण्ड (vertical section), जिसमें मृदा के समस्त संस्तर शामिल हों, ‘मृदा परिच्छेदिका’ कहलाते हैं। मृदा परिच्छेदिका को मुख्य रूप से तीन संस्तरों में विभाजित किया जाता है:-

(i) जैविक संस्तर,

(ii) खनिज संस्तर एवं

(iii) आधार शैल संस्तर।

(i) जैविक संस्तर (Organic horizons):-

     मृदा परिच्छेदिका का सबसे ऊपरी संस्तर जैविक संस्तर कहलाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अन्य संस्तरों की तुलना में इसमें जैविक पदार्थों की बहुलता होती है। इस संस्तर को दो भागों में बाँटा जाता है:-

(क) O1 संस्तर:-

    यह सबसे ऊपरी संस्तर है जिसमें जीवित जैविक पदार्थ (वनस्पति एवं जंतु) के अलावा अनपघटित एवं आंशिक रूप से अपघटित जैविक पदार्थों की बहुलता होती है।

(ख) O2 संस्तर:-

    यह O1 के नीचे पाया जाने वाला संस्तर है। इसमें भी जैविक पदार्थों की अधिकता होती है, लेकिन ये अपघटित एवं ह्यूमस रूप में पाए जाते हैं। इसी कारण, इसे ‘ह्यूमस संस्तर’ भी कहा जाता है।

(ii) खनिज संस्तर (Mineral horizons):-

      यह जैविक संस्तर के नीचे पाया जाता है। इस संस्तर को तीन भागों में बाँटा जाता है-A संस्तर, B संस्तर एवं C संस्तर।

(क) A संस्तर:-

    यह खनिज संस्तर का सबसे ऊपरी स्तर है। इसमें सिलिकेट, एल्युमिनियम, लौह अयस्क, क्ले आदि खनिजों के साथ अल्प मात्रा में अपघटित जैविक तत्व भी पाए जाते हैं। इस संस्तर से खनिज पदार्थों का नीचे की और स्थानांतरण या अपवहन होता है, अतः इसे ‘अपवहन मंडल’ (eluviation zone) भी कहा जाता है।

(ख) B संस्तर:-

     संस्तर A से अपवहित होते खनिज पदार्थ इस संस्तर में आकर विनिक्षेपित या जमा हो जाते हैं, अतः इस संस्तर को ‘विनिक्षेपण मंडल’ (illuviation zone) भी कहा जाता है।

(ग) C संस्तर:-

     इस संस्तर में आधार शैल के ऋतुक्षरित चट्टानी टुकड़े असंगठित रूप में पाए जाते हैं। इस संस्तर को ‘अद्योस्तर संस्तर’ (subsurface horizon) एवं ‘ग्ले परत’ भी कहा जाता है।

(iii) आधार शैल संस्तर (Parent rock horizons):-

       इसे ‘D’ या ‘R’ से संबोधित किया जाता है। ऋतुक्षरण का प्रभाव यहाँ नहीं पड़ता है। अतः आधारभूत चट्टान संगठित एवं दृढ़ रूप में पायी जाती है।

     उपर्युक्त वर्णित मृदा-परिच्छेदिका एक आदर्श मृदा परिच्छेदिका का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसी परिच्छेदिका का विकास अत्यंत लम्बी अवधि के बाद तब होता है, जब मृदा-निर्माण की प्रक्रिया अपने आधार शैल क्षेत्र में ही सम्पन्न होती है। एक आदर्श मृदा-परिच्छेदिका में निम्न विशेषताएँ पाई जाती हैं:-

(i) मृदा-परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर जैविक पदार्थों (जीवित पदार्थ, मृत-अनपघटित या अपघटित पदार्थ तथा ह्यूमस) की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(ii) ऊपर से नीचे जाने पर वायु की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(iii) ऊपर से नीचे जाने पर खनिज पदार्थों की मात्रा एवं प्रकार में वृद्धि होती जाती है।

(iv) ऊपर से नीचे जाने पर जल की मात्रा में वृद्धि या हास की कोई निश्चित प्रवृत्ति (trend) नहीं पायी जाती है। किसी भी गहराई पर जल की मात्रा में ह्रास या वृद्धि हो सकती है।

Types of Soil

मृदा का प्रकार (Types of Soil)

     भारत एक विशाल देश है, जहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं। यहाँ की मिट्टी के क्षेत्रीय वितरण में असमानता का मुख्य कारण वनस्पति, उच्चावच, तापमान, वर्षा तथा आर्द्रता जैसे जलवायविक तत्त्वों में भिन्नता का होना है।

⇒ मिट्टी में पौधे एवं जंतु निरंतर सक्रिय रहते हैं, जिससे मिट्टी में परिवर्तन होता रहता है इसलिये मिट्टी को गतिशील कार्बनिक एवं खनिज पदार्थों का प्राकृतिक समुच्चय भी कहते हैं।

⇒ मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में उच्चावच, जनक सामग्री (चट्टानें), जलवायु, वनस्पति, समय इत्यादि हैं। मानवीय क्रियाएँ भी मृदा को प्रभावित करती हैं। भिन्न-भिन्न भौगोलिक वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदा पाई जाती है।जो निम्न हैं:-

1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil):-

     जलोढ़ मृदा मूलतः हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपों से या सागर द्वारा पश्चगमन (पीछे हटने) के उपरांत छोड़े गए गाद से बनी है। इसे ‘काँप मृदा’ या ‘कछारी मिट्टी’ भी कहते हैं।

⇒ भारत के उत्तरी मैदान में जलोढ़ मृदा का सर्वाधिक विकास हुआ है। इसके अतिरिक्त, तटीय मैदान एवं प्रायद्वीपीय भारत के नदी बेसिन एवं डेल्टाई भागों में भी यह मृदा पाई जाती है।

⇒ इस मिट्टी का विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किलोमीटर तक है। भारत में सबसे अधिक भू-भाग पर जलोढ़ मिट्टी ही पाई जाती है।

⇒ विभिन्न स्रोतों से प्राप्त अवसादों के निक्षेपण से इस मृदा का विकास होने के कारण अन्य मिट्टियों की अपेक्षा इसमें खनिज विविधता भी अधिक होती है, जो कृषि के लिये अधिक उपयोगी होती है। इस प्रकार की मृदा पर प्रायः गहन कृषि की जाती है।

⇒ इसमें पोटाश (सर्वाधिक मात्रा) एवं चूने की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है, जबकि फॉस्फोरस, नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की कमी होती है।

⇒ जलोढ़ मृदाएँ गठन में बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी (मृत्तिका दोमट) की प्रकृति की पाई जाती हैं।

बलुई दोमट मृदा की जलधारण क्षमता सबसे कम होती है, क्योंकि इसमें भारी मात्रा में रवे होते हैं जबकि चिकनी जलोढ़ मिट्टी में जल धारण की क्षमता सबसे अधिक होती है।

⇒ भारत में जलोढ़ मृदा के अधिकांश क्षेत्र का संबंध अर्द्ध शुष्क जलवायु प्रदेश से होने के कारण ही इनके ऊपर की परतों में क्षारीय तत्त्वों की अधिकता रहती है। इसका रंग हल्के धूसर से राख धूसर जैसा होता है जो निक्षेपण की गहराई, गठन व निर्माण में लगने वाली समयावधि पर निर्भर करता है।

⇒ सतलज-यमुना का मैदान, पंजाब, हरियाणा तथा ऊपरी गंगा के मैदान में प्राचीन जलोढ़ मिट्टी (बांगर) पाई जाती है। मध्य एवं निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ के कारण मृदा का नवीनीकरण होता है। इसे ‘नवीन जलोढ़ मृदा’ अथवा ‘खादर’ कहते हैं। गंगा के मैदानी भागों में इसकी गहराई लगभग 2,000 मीटर तक है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः गेहूँ, गन्ना, जौ, दालें, तिलहन और गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जूट की फसलें उगाई जाती हैं।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः मृदा संस्तर (Soil Profile) नहीं पाया जाता है।

⇒ जलोढ़ मृदा को सामान्यतः 4 वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) भाबर,

(ii) तराई,

(iii) बांगर,

(iv) खादर

2. लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil):-

    यह भारत की दूसरी प्रमुख मृदा है, जिसका विकास दक्कन के पठार के पूर्वी तथा दक्षिणी भाग में कम वर्षा वाले उन क्षेत्रों में हुआ है, जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें (ग्रेनाइट तथा नीस) पाई जाती हैं।

⇒ इसके अतिरिक्त पश्चिमी घाट के गिरिपद क्षेत्रों, ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भागों तथा मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी भागों में भी इस मृदा का विकास हुआ है।

⇒ प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश क्षेत्रों में इस मिट्टी का विकास होने के कारण इसे ‘मंडलीय मृदा’ भी कहते हैं।

⇒ लोहे के ऑक्साइड (मुख्यतः फेरिक ऑक्साइड) की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग लाल होता है।

⇒ इस मृदा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश एवं ह्यूमस की कमी होती है। यह स्वभाव से अम्लीय प्रकृति की होती है।

⇒ महीन कण वाली लाल व पीली मृदाएँ सामान्यतः उर्वर होती हैं, जबकि मोटे कणों वाली मृदाएँ अनुर्वर होती हैं।

⇒ लाल मृदा ऊँची भूमियों पर बाजरा, मूंगफली और आलू की खेती के लिये उपयोगी है, जबकि निम्न भूमियों पर इसमें चावल, रागी, तंबाकू तथा सब्जियों आदि की खेती की जाती है।

3. काली/रेगुर मृदा (Black/Regur Soil):-

    इस मृदा का निर्माण दरारी उद्दभेदन से निकले लावा पदार्थों (बेसाल्ट चट्टान) के विखंडन से हुआ है।

⇒ यह भारत की तीसरी प्रमुख मृदा है। इसका सर्वाधिक विकास महाराष्ट्र के ‘दक्कन ट्रैप’ के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में हुआ है। इसके अलावा यह मध्य प्रदेश के मालवा पठार, गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप, कर्नाटक के बंगलूरू-मैसूर पठार, तमिलनाडु के कोयंबटूर पठार, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना के पठार और छोटानागपुर के राजमहल पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है।

⇒ यह मिट्टी कपास की खेती के लिये अधिक उपयोगी एवं विख्यात है, इसलिये इसे ‘काली कपासी मिट्टी’ या ‘रेगुर’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त इसे ‘उष्ण कटिबंधीय चेरनोज़म’ व ‘ट्रॉपिकल ब्लैक अर्थ’ भी कहते हैं। उत्तर प्रदेश में इस मृदा को ‘करेल’ की संज्ञा दी जाती है। कपास के अतिरिक्त यह मृदा गन्ना, गेहूँ, प्याज और फलों की खेती करने के लिये अनुकूल है।

⇒ काली मृदा मृणमय, गहरी और अपारगम्य होने के कारण, गीली होने पर चिपचिपी हो जाती है तथा शुष्क होने पर इसमें बड़ी-बड़ी दरारें बन जाती हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी स्वतः जुताई हो गई है इसलिये इसे ‘स्वतः जुताई वाली मृदा’ के नाम से भी जाना जाता है।

⇒ इस मृदा की जलधारण क्षमता अत्यधिक होती है, जिसके कारण सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है। इसकी एक अन्य विशेषता यह है कि शुष्क ऋतु में भी यह मृदा अपने में नमी बनाए रखती है। यही कारण है कि शुष्क प्रदेशों में भी काली मृदा की उपस्थिति के कारण नमी आधारित फसलें उत्पादित की जाती हैं।

⇒ ह्यूमस, एल्युमीनियम एवं लोहा के टाइटेनीफेरस मैग्नेटाइट यौगिक की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग ‘काला’ होता है।

⇒ इस मिट्टी में (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व जैव तत्त्वों की मात्रा कम) होती है तथा पोटाश, एल्युमीनियम, मैग्नीशियम कार्बोनेट की पर्याप्त मात्रा) पाई जाती है।

4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil):-

     इस मृदा का विकास उन क्षेत्रों में होता है, जहाँ उच्च तापमान एवं भारी वर्षा होती है। अधिक वर्षा के कारण जल के साथ चूना और सिलिका का निक्षालन हो जाता है तथा लोहे के ऑक्साइड और एल्युमीनियम के यौगिक मृदा में शेष बचे रहते हैं।

⇒ यह साधारणतः लाल-भूरे रंग की होती है एवं मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के पर्वतों के गिरिपद क्षेत्रों में एक लंबी पट्टी के रूप में केरल (मालाबार प्रदेश), कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा के पठारी क्षेत्रों, राजमहल पहाड़ी क्षेत्रों, छोटानागपुर के पठार, असम के पहाड़ी क्षेत्रों एवं मेघालय के पठार में पाई जाती है।

⇒ उच्च तापमानों में आसानी से पनपने वाले जीवाणु, ह्यूमस की मात्रा को तीव्र गति से नष्ट या समाप्त कर देते हैं, जिसके कारण इसमें जैव पदार्थ, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और कैल्शियम की कमी होती है।

⇒ यह मृदा रबड़ और कॉफी की फसल के लिये सबसे अच्छी मानी जाती है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः चाय, कहवा, रबड़, सिनकोना, काजू, मोटे अनाजों एवं मसालों की कृषि की जाती है परंतु इसे कृषि के दृष्टिकोण से कम उपजाऊ मृदा की श्रेणी में रखते हैं।

⇒ यह मृदा सूखने के बाद बहुत कड़ी तथा पथरीली हो जाती है, इसलिये लैटेराइट मृदा का प्रयोग मकान निर्माण के प्रयोग में आने वाले ‘ईंटों’ के निर्माण में भी किया जाता है।

5. पर्वतीय मृदा (Hilly Soil):-

    हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी भाग तथा प्रायद्वीपीय भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा के निर्माण पर पर्वतीय पर्यावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। पर्वतीय पर्यावरण में परिवर्तन के अनुरूप मृदा की संरचना व संघटन में भी परिवर्तन होता है। घाटियों में प्रायः यह दुमटी तथा ऊपरी ढालों पर इनकी प्रकृति मोटे कणों वाली होती है; साथ ही ऊपरी ढालों की अपेक्षा निचली घाटियों में ये मृदाएँ अधिक उर्वर होती हैं।

⇒ पर्वतीय मृदा का विकास सामान्यतः पर्वतों के ढालों पर होता है तथा मृदा अपरदन की समस्या से प्रभावित होने के कारण यह पतली परतों के रूप में पाई जाती है। अतः साधारणतया यह अप्रौढ़ (Immature) मृदा है।

⇒ पर्वतीय मृदा अम्लीय प्रकृति की होती है, क्योंकि यहाँ जीवाश्मों की अधिकता होने के बावजूद भी जीवाश्मों का अपघटन नहीं हो पाता है। इसमें पोटाश, फॉस्फोरस एवं चूने की कमी होती है।

⇒ इस मृदा में गहराई कम होती है तथा यह संरध्रयुक्त होती है।

⇒ पहाड़ी ढालों पर विकसित होने के कारण यह मृदा बागानी कृषि, जैसे-चाय, कहवा, मसालों एवं फलों की खेती के लिये बहुत उपयोगी होती है।

6. शुष्क अथवा मरुस्थलीय मृदा (Arid or Desert Soil):-

    शुष्क मृदा का विकास अत्यधिक तापमान वाले शुष्क जलवायवीय क्षेत्रों में हुआ है। इन क्षेत्रों में नगण्य वर्षा व अत्यधिक वाष्पीकरण के कारण मृदा में कम नमी तथा कार्बनिक तत्त्वों की अल्पता होने से ह्यूमस का अभाव पाया जाता है। अतः इसे कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है।

⇒ यह मृदा देश की कुल मृदाओं का लगभग 4.32 प्रतिशत है।

⇒ पश्चिमी राजस्थान, द‌क्षिणी पंजाब, पश्चिमी हरियाणा व उत्तरी गुजरात के शुष्क प्रदेशों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा में रेत सर्वाधिक मात्रा में पाई जाती है। इसमें कैल्शियम, लोहा और फॉस्फोरस भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं किंतु नाइट्रोजन एवं ह्यूमस का अभाव होता है, जिसके कारण यह संरचना के दृष्टिकोण से बलुई तथा प्रकृति के दृष्टिकोण से क्षारीय/लवणीय मृदा होती है, जो फसलों के लिये अनुपजाऊ होती है।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः कम जल की आवश्यकता वाली फसलों को उगाया जाता है, जैसे-ज्वार, बाजरा, रागी, तिलहन आदि।

7. लवणीय मृदा (Saline Soil):-

    लवणीय मृदा का विकास शुष्क व अर्द्धशुष्क जलवायु तथा जलाक्रांत व अनूप क्षेत्रों में होता है। ये मृदा संरचना की दृष्टि से बलुई से लेकर दोमट तक हो सकती है। चूँकि इनमें लवणों की अधिकता होती है, अतः इनमें सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के अनुपात की अधिकता तथा नाइट्रोजन व चूने की अल्पता पाई जाती है।

⇒ लवणीय मृदा को कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है, साथ ही इनमें वनस्पतियों का अभाव भी पाया जाता है।

⇒ लवणीय मृदा का अधिकतर प्रसार पश्चिमी गुजरात, पूर्वी तट के डेल्टाओं व सुंदरबन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अलावा कच्छ के रन में भी लवणीय मृदा का प्रसार पाया जाता है, जिसके लिये दक्षिणी-पश्चिमी मानसून प्रमुख रूप से उत्तरदायी है।

⇒ शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में गहन कृषि के कारण सिंचाई के अतिरेक से केशिकत्व क्रिया को बढ़ावा मिलता है, जिसमें मृदा के ऊपरी परत पर सोडियम, पोटैशियम एवं कैल्शियम के लवणों एवं क्षारों का जमाव होता है। फलतः मृदा न केवल लवणीय मृदा में परिवर्तित हो जाती है बल्कि इसकी उर्वरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

⇒ पंजाब व हरियाणा के क्षेत्रों में अतिरेक सिंचाई के कारण लवणीय मृदा के प्रसार में वृद्धि हो रही है। जिससे उपजाऊ जलोढ़ मृदा अनुर्वर मृदा में परिवर्तित होती जा रही है। यहाँ इस प्रकार की मृदा को रेह, ऊसर एवं कल्लर कहते हैं।

जिप्सम तथा पाइराइट का प्रयोग कर लवणीय मिट्टियों को कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

⇒ भारत के हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में नहरों के आस-पास लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी में अधिक तेजी से वृद्धि हुई है, जिसके कारण बंजर भूमि की समस्या उत्पन्न हुई है।

⇒ इस प्रकार की मृदाओं में बरसीम, धान, गन्ना, अमरूद, आँवला, फालसा तथा जामुन जैसी लवण प्रतिरोधी फसलें व फल वृक्ष लगाये जाते हैं।

8. पीट एवं जैव मृदा (Peat and Biotic Soil):-

    इस मृदा का निर्माण नदियों के द्वारा निर्मित डेल्टाई क्षेत्रों में जल का भराव होने के कारण हुआ है।

⇒ इस मृदा में भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन नगण्य होने के कारण अविघटित कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण मृदा की अम्लीयता भी अपेक्षाकृत अधिक हो जाती है। यह उच्च लवणीय मृदा है, लेकिन इसमें पोटाश तथा फॉस्फेट की कमी होती है।

⇒ ये अम्लीय स्वभाव की होती है तथा फेरस आयरन होने से प्रायः इनका रंग नीला होता है।

⇒ भारत में पीट मृदा वाले क्षेत्रों में ही ‘मैंग्रोव वनस्पति’ का अधिक विकास हुआ है।

⇒ यह भारत में मुख्यतः केरल के अलप्पुझा ज़िला, उत्तराखंड के अल्मोड़ा एवं सुंदरबन डेल्टा में पाई जाती है।

⇒ यह हल्की उर्वरता वाली फसलों हेतु उपयुक्त मृदा है।

⇒ उपयुक्त दशा में वनस्पति की संवृद्धि के कारण इसमें जीवाश्म के अंश एवं ह्यूमस अधिक मात्रा में पाये जाते हैं, जिस कारण यह मृदा गहरे काले रंग की होती है।

मृदा अवकर्षण (Degradation):-

      मृदा में उर्वरता के ह्रास को ही ‘मृदा अवकर्षण’ कहते हैं।

⇒ इसमें मृदा का पोषण स्तर गिर जाता है तथा मृदा के दुरुपयोग एवं अपरदन के कारण मृदा की गहराई या परत की मोटाई कम हो जाती है।

⇒ मृदा अवकर्षण की दर भू-आकृतिक संरचना, पवनों की गति तथा वर्षा की मात्रा के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न भिन्न होती है।

मृदा अपरदन (Soil Erosion):-

     ‘मृदा अपरदन’ का तात्पर्य मृदा के ऊपरी संस्तरों का विनाश है। प्राकृतिक व मानवीय गतिविधियों से अपरदनात्मक प्रक्रियाओं द्वारा मृदा की ऊपरी परत का क्षरण होता है, जिसे ‘मृदा अपरदन’ की संज्ञा दी जाती है।

⇒ प्राकृतिक रूप से होने वाले मृदा अपरदन व मृदा निर्माण प्रक्रिया में एक प्रकार का संतुलन पाया जाता है किंतु मानवीय हस्तक्षेप द्वारा इस संतुलन में अव्यवस्था उत्पन्न होने से मृदा अपरदन की दर में वृद्धि होती है।

⇒ मृदा अपरदन के लिये उत्तरदायी अपरदनात्मक कारकों में परिवहित जल, प्रवाहित पवन, कृषि व पशुचारण की अवैज्ञानिक पद्धतियाँ, मानव बस्तियों का निर्माण, खनन व अन्य मानवीय गतिविधियों को शामिल किया जाता है।

मृदा अपरदन के कारण (Causes of Soil Erosion)

(i) निर्वनीकरणः-

     वन, पानी के बहाव तथा वायु की गति को कम करता है। वृक्षों की जड़ें मिट्टी को जकड़कर रखती हैं किंतु वृक्षों के अविवेकपूर्ण दोहन तथा कटाई से अपरदन की तीव्रता बढ़ती है।

(ii) अत्यधिक पशुचारणः-

     इससे मिट्टी का गठन ढीला हो जाता है। फलतः जलीय एवं वायु अपरदन तीव्र हो जाता है।

(iii) जलीय अपरदनः-

     जल द्वारा मिट्टी के घुलनशील पदार्थों को घुलाकर एक स्थान से दूसरे स्थान के लिये परिवहित करना जलीय अपरदन कहलाता है। जल के भार/चोट से उत्पन्न दबाव के कारण मिट्टी का स्थानांतरण ‘जलगति क्रिया’ कहलाती है। इसमें वर्षा की प्रमुख भूमिका होती है, क्योंकि अत्यधिक वर्षा वाले स्थानों में वर्षा के जल तथा बाढ़ से समस्याग्रस्त होने के बाद मृदा अपरदन की संभावना सर्वाधिक होती है।

(iv) वायु अपरदनः-

     तीव्र पवनों द्वारा सूक्ष्म कणों को अपने साथ उड़ाकर ले जाना ‘अपवहन’ कहलाता है। मृदा अपरदन चक्रवातों द्वारा भी होता है, जिसमें चक्रवात मिट्टी को उड़ाकर छोटे गर्त बना देते हैं।

     भारत में मई तथा जून माह में रबी की फसलों की कटाई के पश्चात् सतलुज-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान की उपजाऊ मिट्टी का भी पवन द्वारा पर्याप्त मात्रा में दोहन/अपरदन होता है।

(v) हिमानी अपरदनः-

      हिमालय में हिमरेखा के नीचे बहने वाले बर्फ तथा जल को हिमनद कहा जाता है। ये चट्टानों एवं मिट्टी को काटकर निचली घाटी में जमा कर देते हैं, जिन्हें ‘हिमोढ़’ कहते हैं।

(vi) झूम कृषिः-

     झूम कृषि के दौरान जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर कृषि करने के लिये वृक्षों का कटाव किया जाता है तो वनों के कटाव से अपरदन की दर में वृद्धि हो जाती है तथा मिट्टी के पोषक तत्त्व बह जाते हैं।

(vii) भूस्खलन अपरदनः-

     भूस्खलन अपरदन पहाड़ी सतह या पर्वतीय ढालै के नीचे धसने के कारण होता है। सामान्यतः भूस्खलन, ढालों पर कटाई, खुदाई या कमजोर भूगर्भ ढाल होने के कारण होता है।

मृदा संरक्षण के उपाय (Methods for Soil Conservation)

     मृदा संरक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत न केवल मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है बल्कि उसमें सुधार की भी कोशिश की जाती है।

⇒ देश में मृदा अपरदन व उसके दुष्परिणामों पर नियंत्रण के लिये 1953 में ‘केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड’ का गठन किया गया जिसका कार्य राष्ट्रीय स्तर पर मृदा संरक्षण के कार्यक्रमों का संचालन करना है।

यांत्रिक उपाय (Engineering Method):-

⇒ मेड़बंदी के अंतर्गत बड़े-बड़े जोत के खेतों में मेड़ बनाकर जल के प्रवाह को कम किया जा सकता है तथा वायु के तेज  प्रवाह से होने वाले अपरदन को रोकने में भी यह सहायक होता है।

⇒ मृदा समतलीकरण से जल के बहाव तथा वायु के तेज गति का प्रभाव कम पड़ता है।

⇒ सम्मोच्च रेखीय जुताई पहाड़ों के सबसे ऊँचे ढाल पर की जाती है। इस पद्धति में पहाड़ों से बहने वाले जल को रोकने के लिये समान ऊँचाई वाली रेखाओं से एक प्राकृतिक रूकावट बनाई जाती है, जिससे मृदा का संरक्षण होता है।

⇒ पत्थर के मेड़ चट्टान बांध के अंतर्गत पानी को तेजी से बहने से रोकने के लिये चट्टानों के द्वारा अवरोधक बनाए जाते हैं। चट्टानी बांध बनाने से नालियों की रक्षा होती है तथा मृदा का क्षय भी नहीं होता है।

⇒ बेसिन लिस्टिंग के अंतर्गत ढालों पर एक नियमित अंतराल के बाद लघु बेसिन या गर्त का निर्माण किया जाता है, जो जल प्रवाह को नियंत्रित रखने तथा जल को संरक्षित करने में सहायक होते हैं।

जैविक उपाय (Biological Method):-

     फसल चक्र के अंतर्गत अपरदन को कम करने वाली फसलों का अन्य फसल के साथ चक्रीकरण कर अपरदन को रोका जा सकता है। इससे मृदा की उर्वरता भी बढ़ती है।

⇒ पट्टीदार खेती के अंतर्गत इसमें बड़े जोतों के खेतों में पट्टी बनाकर जल प्रवाह के वेग को कम किया जाता है, जिससे मृदा अपरदन कम-से-कम हो।

⇒ पलवार या मल्चिंग के अंतर्गत खेतों में फसल अवशेष की 10-15 सेमी. पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जा सकता है। इससे मृदा का संस्तर सुरक्षित रहता है।

⇒ वर्मी कम्पोस्ट प्राचीन काल से ही किसानों का सबसे हितकारी प्रयोग रहा है क्योंकि यह पूरी तरह से केंचुए पर आधारित है। केंचुए को ‘किसानों का मित्र’ कहा जाता है। ये केंचुए मिट्टी में मौजूद घासफूस और अन्य खरपतवार को खाकर उन्हें खाद बनाते हैं तथा साथ ही मिट्टी को मुलायम और उपजाऊ भी बनाते हैं।

⇒ हरी एवं जैविक खाद के अंतर्गत मृदा संरक्षण को बनाए रखने के लिये खेत में हरी खाद का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाता है। परंपरागत रूप में प्रचलित उड़द, सैजी, सनई, कैंचा, मूंग, लोबिया आदि को खेत में बोया जाता है और खड़ी फसल के बीच खेत की जुताई की जाती है। इससे खेत में विभिन्न प्रकार के जैविक तत्त्वों का समावेश हो जाता है, जिससे फसलों की उत्पादकता बढ़ती है। सैजी और सनई की फसल का हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन प्राप्त होता है।

⇒ कृषि वानिकी के अंतर्गत खेत के चारों तरफ मेड़ों पर दो या तीन पंक्तियों में एक निश्चित दूरी में फसलों के साथ वृक्षों को रोपित किया जाता है। इससे भी मृदा अपरदन को रोकने में सहायता मिलती है।

⇒ वृक्षों की जड़ें मृदा पदार्थों को बांधे रखती है, जो मृदा संरक्षण में सहायक है। अतः सरकार द्वारा सार्वजनिक मार्गों, नहरों, रेल पटरियों इत्यादि के दोनों ओर तीव्र गति से बढ़ने वाली प्रजातियों के वृक्षों को रेखीय पट्टियों के रूप में रोपित कर वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सामाजिक उपाय (Social Method):-

     अत्यधिक चराई से पहाड़ी ढालों की मृदा ढीली पड़ जाती है और पानी का बहाव इस ढीली मृदा को बड़ी आसानी से बहा ले जाती है। मृदा अपरदन को रोकने के लिये इन क्षेत्रों में नियोजित चराई से वनस्पति के आवरण को बचाया जा सकता है, जिससे मृदा संरक्षण में सकारात्मक सहयोग हो सके।

⇒ हमारे सामाजिक परिवेश में वृक्षों का कटाव व अत्यधिक दोहन भी मृदा अपरदन का एक कारक है। वनों के कटाव व दोहन का निम्नीकरण करके मृदा संरक्षण में सहयोग किया जा सकता है।

⇒ झूम खेती में जंगलों को काटकर व जलाकर खेती की जाती है, जिससे मृदा की बहुत हानि होती है। इस पर पूर्णतया रोक लगायी जानी चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण हो सके।

⇒ लोक सहभागिता के माध्यम से ग्राम पंचायतों से लेकर शहरों तक वृक्षारोपण के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। गैर सरकारी संस्थाओं को भी इस अभियान से जोड़ना होगा व मृदा संरक्षण के प्रति सराहनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण को प्रोत्साहन मिल सके।

9. Theory of Optimum Population (अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत)

9. Theory of Optimum Population

(अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत)



अनुकूलतम जनसंख्या का अर्थ एवं परिभाषा 

    “अनुकूलतम जनसंख्या, उस सर्वोत्तम जनसंख्या को कहते हैं, जो किसी देश में एक निश्चित समय पर उपलब्ध साधनों का अधिकतम उपयोग करने अथवा अधिकतम उत्पादन करने के लिए आवश्यक होती है।” 

     इस कथन से स्पष्ट है कि जनसंख्या का आकार तभी अनुकूलतम माना जायेगा, जब प्रति व्यक्ति आय अधिकतम हो। इसका कारण यह है कि साधनों का सर्वोत्तम उपयोग होने पर अथवा उत्पादन के अधिकतम होने की दशा में ही प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है।

प्रमुख परिभाषा

1. प्रो. रॉबिन्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या वह जनसंख्या है, जो अधिकतम उत्पादन को सम्भव बनाती है। 

2. प्रो. डॉल्टन के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या वह है जो अधिकतम प्रति व्यक्ति आय प्रदान करती है।

3. प्रो. बोल्डिंग के अनुसार, “वह जनसंख्या जिस पर जीवन स्तर अधिकतम होता है, अनुकूलतम जनसंख्या कहलाती है।”  

4. प्रो. हिक्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या, जनसंख्या का वह रूप है जिस पर प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम होता है। 

5. प्रो. कार सौण्डर्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या, वह जनसंख्या है जो अधिकतम आर्थिक कल्याण उत्पन्न करती हो। अधिकतम आर्थिक कल्याण का अधिकतम प्रति व्यक्ति आप के समान होना आवश्यक नहीं है, लेकिन व्यवहार में उन्हें उसके बराबर समझा जा सकता है। 

अनुकूलतम जनसंख्या के सिद्धान्त का उद्देश्य:-

      अनुकूलतम जनसंख्या के सिद्धान्त का उद्देश्य यह बताता है कि एक देश के लिए आर्थिक दृष्टि से जनसंख्या का कौन-सा आकार, अनुकूलतम है अर्थात् जनसंख्या का कौन-सा आकार अनुकूलतम होगा, जिसमें प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होगी।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की व्याख्या

      अनुकूलतम जनसंख्या का अभिप्राय जनसंख्या की उस आदर्श मात्रा से है जो किसी देश-काल (Space & Time) में उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग और अधिकतम उत्पादन के लिये आवश्यक होती है।

     किसी निश्चित समय पर उपलब्ध संसाधनों तथा ज्ञात प्रौद्योगिकी की दशा में वह जनसंख्या अनुकूलतम मानी जाती है जिसमें प्रति व्यक्ति आय अथवा प्रति व्यक्ति उत्पादन या अधिकतम प्रतिफल अथवा अधिकतम कल्याण होता है।

      किसी देश की वास्तविक जनसंख्या अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक होने पर अति जनसंख्या और इससे कम होने पर अल्प जनसंख्या कहलाती है। अनुकूलतम जनसंख्या से देश की वास्तविक जनसंख्या कम होने पर उसके संपूर्ण संसाधनों का समुचित प्रयोग तथा विकास नहीं हो पाने से प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम उत्पादन से कम प्राप्त होता है।

    इसके विपरीत जनसंख्या अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक होने पर प्रति व्यक्ति संसाधनों की कमी पड़ने लगती है, जिसमें प्रति व्यक्ति उत्पादन कम होता है। इसका परिणाम यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय में कमी आ जाती है।

      विदित हो कि अनुकूलतम जनसंख्या कभी स्थिर नहीं होती बल्कि गतिशील होती है। इसका आशय यह हुआ कि किसी देश के उत्पादन संसाधनों में परिवर्तन होने से अनुकूलतम जनसंख्या भी परिवर्तित हो जाएगी। यह एक आदर्श की स्थिति है। इसका व्यवहार में प्रयोग संभव नहीं हो सकता क्योंकि इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि अनुकूलतम जनसंख्या कितनी उचित रहेगी और आने वाले समय में वही जनसंख्या भी चाहिये होगी।

   अर्थात अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत, जनसंख्या के उस स्तर को बताता है, जिस पर प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है। यह सिद्धांत ब्रिटिश अर्थशास्त्री हेनरी सिजेविक ने दिया था। 

    दूसरे शब्दों में, प्रारम्भ में उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होता है, लेकिन कुछ समय में एक ऐसा बिन्दु आ जायेगा, जिस पर जनसंख्या का अनुकूलतम अनुपात स्थापित हो जायेगा। इस पर प्रति व्यक्ति आय अधिकतम एवं जनसंख्या अनुकूलतम होगी, लेकिन यदि जनसंख्या इस बिन्दु अनुकूलतम अनुपात समाप्त हो जायेगा और उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होने लगेगा।

Theory of Optimum Population

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ:

(i) अनुकूलतम जनसंख्या, अंडरपॉपुलेशन और ओवरपॉपुलेशन के बीच संतुलन/बैलेंस वाली स्थिति होती है।

(ii) अनुकूलतम जनसंख्या में, जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन/बैलेंस वाली स्थिति होती है।

(iii) अनुकूलतम जनसंख्या में, प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है।

(iv) अनुकूलतम जनसंख्या में, पर्यावरण और समाज को नुकसान नहीं पहुंचता।

(v) अनुकूलतम जनसंख्या में, व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचता।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत के कुछ मापदंड निम्नलिखित है: 

(i) किसी देश के प्राकृतिक संसाधनों का एक समय पर इस्तेमाल होता है।

(ii) उत्पादन की तकनीक में कोई बदलाव नहीं होता है।

(iii) पूंजी का भंडार स्थिर रहता है।

(iv) लोगों की पसंद और स्वाद अपरिवर्तित रहते हैं।

(v) कार्यशील जनसंख्या का कुल जनसंख्या से अनुपात स्थिर रहता है।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की आलोचनाएँ (Criticism of the Optimum Theory of Population):-

      यद्यपि यह सिद्धांत माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण एवं तार्किक है। परन्तु कुछ बिन्दुओं पर इसकी भी आलोचना हुई है जो निम्नलिखित है-

1. यह सिद्धान्त वास्तविक मान्यताओं पर आधारित नहीं है:-

     अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की यह मान्यता है कि जनसंख्या में होने वाली वृद्धि के साथ-साथ कार्यशील जनसंख्या अर्थात् श्रम शक्ति में वृद्धि भी उसी अनुपात में होती है, जबकि वास्तव में यह अनुपात बदलता रहता है। 

    दूसरा, इस सिद्धान्त की यह मान्यता है कि किसी देश में एक समयावधि में प्राकृतिक साधन, तकनीकी स्तर इत्यादि में कोई परिवर्तन नहीं होता, यह पूर्णतया गलत है। किसी देश के लिए अनुकूलतम जनसंख्या का अनुमान लगाना पूर्ण रूप से काल्पनिक जान पड़ता है। 

2. अनुकूलतम बिन्दु ज्ञात करना कठिन है:-

      अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त के प्रतिपादकों ने जनसंख्या के अनुकूलतम बिन्दु का निर्धारण जितना सरल माना है, वास्तव में वह उतना ही कठिन है। अर्थव्यवस्था में होने वाले निरन्तर परिवर्तनों के कारण जनसंख्या के आकार में भी परिवर्तन होता रहता है, जिससे अनुकूलतम आकार का निर्धारण करना सम्भव नहीं हो पाता।

3. यह जनसंख्या का सिद्धान्त न होकर मात्र एक दृष्टिकोण है:-

    आलोचकों के अनुसार, अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त को जनसंख्या का सिद्धान्त कहना ही गलत है, क्योंकि यह इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता कि जनसंख्या किस प्रकार और क्यों बढ़ती है या उसके बढ़ने का क्या नियम है? यह सिद्धान्त तो जनसंख्या के अनुकूलतम बिन्दु की मात्र कल्पना करता है।

4. यह सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के वितरण पक्ष पर कोई ध्यान नहीं देता है:-

     अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के केवल उत्पादन पक्ष पर ध्यान देता है, वितरण पक्ष पर कोई ध्यान नहीं देता। आर्थिक कल्याण का प्रश्न वितरण से सम्बन्ध माना जाता है, जिसकी इस सिद्धान्त ने पूरी तरह से उपेक्षा की है, जो कि आपत्तिजनक है।

5. यह सिद्धान्त जनसंख्या की समस्या का अध्ययन केवल आर्थिक दृष्टिकोण से करता है:-

     आलोचकों का विचार है कि अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त एक भौतिकवादी सिद्धान्त हैं और इसका दृष्टिकोण अत्यन्त संकुचित है। अनुकूलतम जनसंख्या का आकार केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक एवं सैनिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखकर ही निश्चित किया जाना चाहिए।

6. यह सिद्धान्त सामाजिक मूल्यों के प्रति संकुचित दृष्टिकोण अपनाता है:- 

      अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त आर्थिक विकास के लिए प्रति व्यक्ति आय को अधिकतम करने की बात तो करता है, लेकिन जनसंख्या के स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल निर्माण, उच्च बौद्धिक स्तर तथा चरित्र निर्माण पर कोई ध्यान नहीं देता। 

7. इस सिद्धान्त का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है:- 

      अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त, अनुकूलतम जनसंख्या का एक निरपेक्ष कथन मात्र है, जो हमारे लिए जनसंख्या सम्बन्धी नीति के निर्धारण में सहायक सिद्ध नहीं होता, यह सिद्धान्त हमारे सामने जिस ‘आदर्श’ को प्रस्तुत करता है, उस आदर्श को प्राप्त करने में हमारी सहायता नहीं कर पाता। इसलिए अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त का व्यावहारिक महत्व नहीं के बराबर है।

निष्कर्ष:-

     यह अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की आलोचना की गयी है क्योंकि इसके मापन में अनेक कठिनाईयाँ हैं, जिसके कारण इसका व्यवहारिक महत्व कम है। तथापि जनसंख्या और संसाधनों के अंतर्सम्बन्ध की व्याख्या हेतु यह एक महत्वपूर्ण संकल्पना है जिसके संदर्भ में ही अन्य कई संकल्पनाओं की व्याख्या की जा सकती है।

     अनुकूलत जनसंख्या का विचार सरकार द्वारा अपनायी जाने वाली जनसंख्या-नीति के लिए ठोस वस्तुगत आधार प्रदान करता है। यदि देश में जनाधिक्य की स्थिति मौजूद है, तब सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के उपाय लागू करना चाहिए एवं उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम विदोहन की योजनाएँ क्रियान्वित करनी चाहिए।

DECEMBER 2006 UGC NET SOLVED EXAM PAPER

DECEMBER 2006

UGC NET SOLVED EXAM PAPER



द्वितीय प्रश्न-पत्र  (भूगोल)



निर्देश-इस प्रश्न-पत्र में पचास (50) बहुविकल्पीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक हैं, सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. उत्तरी ध्रुव आर्कटिक महासागर के अन्तर्गत अवस्थित है, जबकि दक्षिणी ध्रुव अण्टार्टिका महाद्वीप के अन्तर्गत अवस्थित है। निम्नलिखित में से कौनसा सिद्धान्त इस तथ्य का उपयोग समर्थनकारी तर्क के रूप में करता है?

(A) थियरी ऑफ आइसोस्टेसी  

(B) थियरी ऑफ करेंट टेक्टोनिक्स

(C) कॉन्वेक्टिव करेंट थियरी

(D) टेट्राहेड्रल थियरी

[read more] (D) टेट्राहेड्रल थियरी [/read] 

2. सिन्धु तथा ब्रह्मपुत्र के उदाहरण हैं-

(A) उत्तरवर्ती अपवाह तन्त्र

(B) अध्यारोपित अपवाह तन्त्र

(C) पूर्ववर्ती अपवाह तन्त्र

(D) अनुवर्ती अपवाह तन्त्र

[read more] (C) पूर्ववर्ती अपवाह तन्त्र [/read]

3. दो अनुक्रमिक ज्वारों के बीच का औसत समय अन्तराल

(A) 6 घण्टे, 13 मिनट

(B) 12 घण्टे, 26 मिनट

(C) 24 घण्टे, 52 मिनट

(D) 18 घण्टे, 39 मिनट

[read more] (C) 24 घण्टे, 52 मिनट [/read]

4. स्थान को निर्धारित करने के लिए अक्षांश तथा देशान्तर दोनों को जानना आवश्यक है-

(A) स्थानीय समय

(B) उच्चता

(C) मानक समय

(D) अवस्थिति

[read more] (D) अवस्थिति [/read]

निर्देश (प्रश्न 5 से 8 तक) नीचे दो कथन दिए गए हैं, एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) कहा गया है। नीचे दिए गए कूटों से अपना उत्तर चुनिए-

5. अभिकथन (A): क्षोभमण्डल वायुमण्डल का वह निचला भाग है, जिसमें बादल छाने तथा तूफान उठने जैसी मौसमजन्य घटनाएँ घटित होती हैं।

कारण (R) : क्षोभमण्डल में तापमान ऊँचाई के साथ घटता है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है [/read]

6. कथन (A): समुद्री तलें महाद्वीपीय तलों से कम पुरानी होती हैं।

कारण (R): कम घनत्व वाली तथा फलस्वरूप उत्प्लावक होने के कारण समुद्री तले ‘सबडक्शन जोन’ के ‘मेण्टल’ में धकेली नहीं जाती।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है [/read]

7. कथन (A): भूदृश्य के अपरदन को सम्भव बनाने वाली ऊर्जा का परम स्रोत सूर्य है।

कारण (R) : सौर ऊर्जा भूतलीय जल को वाष्पित करता है, जिसमें से कुछ बाद में वर्षा तथा बर्फ के रूप में पर्वतीय प्रदेशों में गिरता है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (*) [/read]

8. कथन (A) : भूकम्प का आकार-प्रकार अधिकेन्द्र के निकट अधिकतम होता है तथा यह दूरी के साथ घटता जाता है।

कारण (R) : भूकम्प द्वारा निष्कासित ऊर्जा को उसे आकार-प्रकार के द्वारा स्थापित किया जा सकता है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है [/read]

9. क्षेत्रीय रूपांकन के लिए इनमें से किसका उपयोग किया जा सकता है?

(A) ग्रैविटी पोटेन्शियल मॉडल

(B) रैंक-साइज रूल

(C) लोस्च सेटलमेण्ट मॉडल

(D) सेंट्रल प्लेस मॉडल

[read more] (B) रैंक-साइज रूल [/read]

10. क्षेत्रीय असन्तुलन इनमें से किस कारण से उत्पन्न नहीं होता है?

(A) संसाधनों का विषम वितरण

(B) टिकाऊ आर्थिक विकास

(C) संसाधनों का अभाव

(D) प्रौद्योगिकी का अभाव

[read more] (B) टिकाऊ आर्थिक विकास [/read]

11. ‘नोडल रीजन्स’ का परिसीमन किया जाता है?

(A) स्थानिक परस्पर क्रिया के आधार पर

(B) एकरूपता के आधार पर

(C) संसाधन के आधार पर

(D) जिंसों के प्रवाह के आधार पर

[read more] (A) स्थानिक परस्पर क्रिया के आधार पर [/read]

12. लोगों के प्रवास का लाभकारी प्रभाव आरम्भिक समय से ही रहा है। इनमें से महत्वपूर्ण है-

(A) विचारों का विसरण

(B) भाषा का प्रचार-प्रसार

(C) विज्ञान तथा प्रौद्योगिकीय नव-प्रवर्तनों का प्रचार- प्रसार

(D) उपर्युक्त सभी

[read more] (D) उपर्युक्त सभी [/read]

13. ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य रूप से उपलब्ध कराने के लिए छोटे शहर पनपते हैं-

(A) बाजार की सुविधा

(B) शैक्षिक सुविधाएँ

(C) स्वास्थ्य सुविधाएँ

(D) प्रशासनिक सुविधाएँ

[read more] (D) प्रशासनिक सुविधाएँ [/read]

14. भारत में शहरी केन्द्रों के वर्गीकरण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कसौटी है-

(A) स्थल

(B) आकार

(C) आबादी

(D) कार्य

[read more] (C) आबादी [/read]

15. ‘रैंक साइज रूल’ में निम्नतर दर्जा वाले शहर की जनसंख्या के अनुपात में होती हैं-

(A) लघुतम शहर की जनसंख्या

(B) विशालतम शहर की जनसंख्या

(C) मध्यक्रम वाले शहर की जनसंख्या

(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

[read more] (B) विशालतम शहर की जनसंख्या [/read]

16. राजनीतिक भूगोल का जनक किसे कहा जाता है?

(A) रूडोल्फ जेलेन

(B) हैसोफर के.

(C) रेट्जेल एफ.

(D) हार्टशोर्न आर.

[read more] (C) रेट्जेल एफ. [/read]

17. राजनीतिक भूगोल में रिमलैण्ड थियरी की विचारधारा किसकी देन है?

(A) स्पाइकमैन एन. जे.

(B) वार्नर ई.

(C) वेगर्ट एच. डब्ल्यू.

(D) महान ए. टी.

[read more] (A) स्पाइकमैन एन. जे. [/read]

18. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कर सूचियों के नीचे दिए गए कूटों का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए-

सूची-I (भूगोलवेत्ता) सूची-II (सिद्धान्त)

(a) वाइडल दे लेक्लेशे 1. यूनिटी इन डाइवर्सिटी

(b) जीन ब्रुनेहेस 2. सोशल डिटर्मिनेशन

(c) कार्ल रिटर 3. टेरेस्ट्रियल होल

(d) फाइड रैट्जेल 4. इण्टरैक्शन

कूट:

       a b c d

(A) 3 2 1 4

(B) 4 2 1 3

(C) 3 4 1 2

(D) 2 1 3 4

[read more] (B) 4 2 1 3 [/read]

19. वह दार्शनिक दृष्टिकोण जो इस बात का पक्षपोषण करता है कि मनुष्य अपनी प्रकृति के निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है-

(A) पॉजिटिविज्म (वस्तुनिष्ठवाद)

(B) फंक्शनलिज्म (प्रकार्यवाद)

(C) एक्सिस्टेंशियालिज्म (अस्तित्ववाद)

(D) प्रैग्मेटिज्म (व्यावहारिकतावाद)

[read more] (A) पॉजिटिविज्म (वस्तुनिष्ठवाद) [/read]

20. फसल संयोजन का परिकलन के आधार पर किया है-

(A) निवल कृष्यित क्षेत्र का प्रतिशत क्षेत्र

(B) सकल कृष्यित क्षेत्र का प्रतिशत क्षेत्र

(C) एक क्षेत्र में नये फसलों का दर्जाकरण

(D) इनमें से किसी के आधार पर नहीं

[read more] (C) एक क्षेत्र में नये फसलों का दर्जाकरण [/read]

21. झरिया कोयला क्षेत्र कहाँ अवस्थित है?

(A) बिहार में

(B) झारखण्ड में

(C) उड़ीसा में

(D) छत्तीसगढ़ में

[read more] (B) झारखण्ड में [/read]

22. भूगोल के विकास के परिप्रेक्ष्य में प्रमुख ब्रिटिश भूगोल-वेत्ताओं का सही अनुक्रम है-

(A) ए. जे. हर्बर्टसन, एस. डब्ल्यू. वुलरिज, एच. जे. मैकिण्डर, एल. डी. स्टैम्प

(B) एस. डब्ल्यू. वुलरिज, ए. जे. हर्बर्टसन, एल. डी. स्टैम्प, एच. जे. मैकिण्डर

(C) एच. जे. मैकिण्डर, ए. जे. हर्बर्टसन, एस. डब्ल्यू. वुलरिज, एल. डी. स्टैम्प

(D) एल. डी. स्टैम्प, ए. जे. हर्बर्टसन, एस. डब्ल्यू. वुलरिज, एच. जे. मैकिण्डर

[read more] (B) एस. डब्ल्यू. वुलरिज, ए. जे. हर्बर्टसन, एल. डी. स्टैम्प, एच. जे. मैकिण्डर [/read]

23. निम्नलिखित सागरों पर विचार कीजिए-

1. रेड सी 

2. ब्लैक सी 

3. डेड सी 

4. बाल्टिक सी 

   खारापन के अवरोही क्रम के आधार पर इन सागरों का सही अनुक्रम है?

(A) 1, 2, 3, 4

(B) 2, 1, 4, 3

(C) 4, 2, 3, 1

(D) 3, 1, 2, 4

[read more] (D) 3, 1, 2, 4 [/read]

24. ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के नाम से, एक सर्वाधिक सघन संरक्षण प्रयास, भारत में कब शुरू किया गया?

(A) 1963 में

(B) 1967 में

(C) 1973 में

(D) 1977 में

[read more] (C) 1973 में [/read]

25. “रिसोर्सेज आर नॉट टू बिकम.” संसाधन की यह परिभाषा किसने दी?

(A) वॉन थुनेन

(B) जिमरमैन

(C) हार्टशोर्न

(D) सिम्पल

[read more] (B) जिमरमैन [/read]

26. पशुपालन वाणिज्यिक पैमाने पर भलीभाँति विकसित हुआ है-

(A) मानसून क्षेत्रों में

(B) सवाना क्षेत्रों में

(C) प्रेयरी तथा स्टेप्स क्षेत्रों में

(D) साहेल क्षेत्रों में

[read more] (C) प्रेयरी तथा स्टेप्स क्षेत्रों में [/read]

27. भारत में गेहूँ का सबसे अधिक उत्पादन किस राज्य में होता है?

(A) हरियाणा

(B) पंजाब

(C) उत्तर प्रदेश

(D) बिहार

[read more] (C) उत्तर प्रदेश [/read]

28. निम्नलिखित में से कौन एक स्वच्छन्द उद्योग है?

(A) सूत्री वस्त्र

(B) चीनी

(C) सीमेण्ट

(D) हथकरघा

[read more] (A) सूत्री वस्त्र [/read]

29. आइसोडोक्स का सम्बन्ध है-

(A) समतुल्य ऊँचाई की रेखा

(B) समतुल्य वृष्टिमान की रेखा

(C) असमानता की रेखा

(D) समतुल्य परिवहन लागत की रेखा

[read more] (D) समतुल्य परिवहन लागत की रेखा [/read]

30. निम्नलिखित में से कौन किसी परिवहन प्रणाली से सम्बन्धित नहीं है?

(A) वॉन-थुनन थियरी

(B) डिस्टेंस डिके फंक्शन

(C) प्रिन्सिपल ऑफ लीस्ट अफर्ट

(D) सेण्ट्रल प्लेस थियरी

[read more] (B) डिस्टेंस डिके फंक्शन [/read]

31. मंगोलॉइड प्रजाति प्रधान रूप से पायी जाती है-

(A) दक्षिण अफ्रीका

(B) पूर्व एशिया

(C) पश्चिम यूरोप

(D) पूर्व अफ्रीका

[read more] (B) पूर्व एशिया [/read]

32. इनमें से किसका सम्बन्ध जनजातीय अर्थव्यवस्था से है?

(A) स्वच्छन्द उद्योग

(B) व्यवस्थित खेती-बाड़ी

(C) स्थानान्तरण खेती-बाड़ी

(D) औद्योगिक अर्थव्यवस्था

[read more] (C) स्थानान्तरण खेती-बाड़ी [/read]

33. मानव के प्रजातीय विशेष गुणों का अध्ययन किसमें किया जाता है?

(A) जीवाश्म विज्ञान

(B) जल विज्ञान

(C) समाजशास्त्र

(D) मानव विज्ञान

[read more] (D) मानव विज्ञान [/read]

34. ‘हार्टलैण्ड थियरी’ का निरूपण किसने किया?

(A) एच. जे. मैकिण्डर

(B) आर. हार्टशोर्न

(C) पीटर हैगेट

(D) हर्बर्टसन

[read more] (A) एच. जे. मैकिण्डर [/read]

35. आर्द्र वातावरण से अनुकूलित पौधे को कहते हैं-

(A) जलोद्भिद्

(B) मरुद्भिद्

(C) समोद्भिद्

(D) शुष्कार्दोद्भिद्

[read more] (A) जलोद्भिद् [/read]

36. पारिस्थितिक अनुक्रमण सामान्यतया जन्म देता है-

(A) हैबिटाट

(B) बायोमे

(C) क्लाइमेटिक फ्रांटियर

(D) क्लाइमेक्स

[read more] (D) क्लाइमेक्स [/read]

37. निम्नलिखित में से किस एक राज्य को पेट्रो-डॉलर अर्थव्यवस्था ने अधिकतम प्रभावित किया है?

(A) तमिलनाडु

(B) केरल

(C) पंजाब

(D) गुजरात

[read more] (D) गुजरात [/read]

38. भारत में राज्य स्तर पर जनसंख्या के वितरण का उत्तम रीति से प्रतिनिधित्व इनमें से किसके द्वारा किया जाता है?

(A) डॉट मेथड

(B) पाई डायग्राम

(C) कोरोप्लेथ

(D) आइसोप्लेथ

[read more] (A) डॉट मेथड [/read]

39. एक डेटा-शीट में प्रत्यावर्तन मॉडल का उपयोग करने के प्रधान उद्देश्य क्या हैं ?

(A) आश्रित एवं स्वतन्त्र चरों के बीच अनियमितता

(B) आश्रित एवं स्वतन्त्र चरों के बीच सहसम्बन्ध

(C) आँकड़ों में तिरछापन

(D) आँकड़ों में बिखराव

[read more] (B) आश्रित एवं स्वतन्त्र चरों के बीच सहसम्बन्ध [/read]

40. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कर सूचियों के नीचे दिए गए कूटों का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए-

सूची-I

(a) बिखराव के किस माप को निम्नतम तथा अधिकतम मान के बीच अन्तर के रूप में परिभाषित किया जाता है।

(b) यह बिखराव का एक माप है।

(c) यदि वैरिएशन का कोफिसिएण्ट वांछित है, तो आप कौनसे परिसूत्र का प्रयोग करेंगे।

(d) नमूने के वेरिएंस तथा मानक विचलन की गणना में किस औसत का प्रयोग किया जाता है।

सूची-II

1. 3(x‾-Median)

2. S÷X (100)

3. रेंज

4. अंकगणितीय मध्य

5. Σ(α-x‾)÷n

कूट :

       a b c d

(A) 3 2 5 4

(B) 3 5 2 4

(C) 4 1 2 3

(D) 3 1 2 4

[read more] (D) 3 1 2 4 [/read]

41. विश्व के देशों में भारतीय रेल नेटवर्क का दर्जा है-

(A) प्रथम

(B) द्वितीय

(C) तृतीय

(D) चतुर्थ

[read more] (D) चतुर्थ [/read]

42. निम्नलिखित में से किसका सम्बन्ध सूती वस्त्र उद्योग से है?

(A) पुणे

(B) वाराणसी

(C) अहमदाबाद

(D) चण्डीगढ़

[read more] (C) अहमदाबाद [/read]

43. कारगिल के किनारे पर स्थित है।

(A) सिन्धु नदी

(B) झेलम नदी

(C) सुरू नदी

(D) चेनाब नदी

[read more] (C) सुरू नदी [/read]

44. इंफाल की राजधानी है।

(A) मणिपुर

(B) नगालैण्ड

(C) मेघालय

(D) अरुणाचल प्रदेश

[read more] (A) मणिपुर [/read]

45. ‘मैकमोहन लाइन’ किन देशों के बीच अन्तर्राष्ट्रीय सीमा है?

(A) भारत तथा बांग्लादेश

(B) भारत तथा चीन

(C) भारत तथा पाकिस्तान

(D) फ्रांस तथा जर्मनी

[read more] (B) भारत तथा चीन [/read]

निर्देश (प्रश्न 46 से 50 तक) निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए तथा उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

    समृद्ध राष्ट्र प्रधानतया एक-दूसरे के बीच व्यापार करते हैं। प्रवास बहुधा मानव समूहों के बीच होता है, जो लोग अधिक संवाद भेजते हैं, प्रत्युत्तर में वे बहुत सारे सम्पर्क पाते हैं। प्रवाहों में-प्रत्येक गन्तव्य स्थान पर बलशाली रूप में डाले गए प्रभावी खिंचाव के अनुरूप प्राचुर्यता के स्थानों से प्रभावी माँगों के क्षेत्रों की ओर जाने की प्रवृत्ति होती है। प्रवाह जारी रहने के साथ साम्यावस्था की ओर प्रवृत्त होने की प्रवृत्ति आम प्रतीत होती है।

           भौतिक विश्व में सजाए स्थानों के बीच गतिमान होती है, ताकि प्रभविष्णुता सम हो सके। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण जल अधोतम बिन्दु की ओर जाने की चेष्टा करता है और यदि इसे समुद्र स्तर तक जाने की स्वतन्त्रता हो, तो यह ऐसा ही करेगा।

     इसी प्रकार, हवा उच्च दबाव वाले क्षेत्र से निम्न दबाव वाले क्षेत्र की ओर जाएगी. कारक अभिकर्ता के रूप में उच्च दबाव हवा को एक दिशा में अधिक दूरी तक नहीं ले जा सकता। यह हम आम अनुभव से जानते हैं जब हम पंखे की सहायता से किसी कमरे में हवा प्रवाहित करते हैं अथवा माचिस की तीली को कुछ दूरी से फूंक कर बुझाते हैं। एक खिड़की में पंखा लगाकर बाहर हवा फेंकने तथा कमरे की दूसरी ओर एक अन्य खिड़की खोल देने से अधिक हवा फेंकी जाएगी।

       इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझने के लिए धकेलने वाले कारकों पर बल देने की अपेक्षा निम्न दबाव वाले क्षेत्र द्वारा किसी विशेष दिशा में खींची जाने वाली हवा पर विचार करना बेहतर होगा, ठीक उसी प्रकार जैसे पर्वत की चोटी से पानी नीचे गिरता है। इसी प्रकार, मानव से जुड़े क्रियाकलापों में, किसी अन्य स्थान पर अत्यधिक आपूर्ति के परिप्रेक्ष्य में, खिंचाव एक प्रत्यक्ष लगाता है।

       अतः इस बात की व्याख्या करने के लिए, कि क्यों कोई सजा अ से ब की ओर गतिमान होती है, इससे अधिक सहायता मिलेगी कि अ पर धकेल के बनिस्पत ब पर खिंचाव पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाए। अ पर धकेल की दिशात्मकता बहुधा सूचना का गठन नवीन तथ्यों, आँकड़ों, विचारों तथा दिन-प्रतिदिन के संदेशों और विचारों के आदान-प्रदान से होता है। व्यक्तियों, जिंसों तथा सेवाओं की भाँति, सूचना, अपने उत्पन्न होने के स्थान से अपनी माँग के क्षेत्रों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रवाहित होती है. जब हम माँग-क्षेत्रों के बारे में सोचते हैं, तब हमें आवश्यकता के स्थानों के स्थान पर प्रभावी माँग के स्थानों का भ्रम नहीं होना चाहिए।

      लोगों या व्यक्तियों के प्रवाह के सन्दर्भ में, दलित क्षेत्रों की घटती आबादी वाले पिछड़े इलाकों के प्रवास की तुलना में बड़े तथा प्रबल केन्द्रों में आने-जाने का कार्य अधिक बड़ी मात्रा में होता है। जिंसों के लाने-भेजने के परिप्रेक्ष्य में, विकसित देशों से अर्धविकसित देशों के बीच व्यापार की तुलना में विकसित देशों के मध्य एक-दूसरे के बीच व्यापार अत्यधिक बड़ी मात्रा में होता है।

       इसी प्रकार सूचना प्रधानतया एक प्रणाली के सबल विचार-केन्द्रों के मध्य प्रवाहित होती है। इस प्रक्रिया में आलस्य के टापू परे कर दिए जाते हैं, क्योंकि वस्तुतः वे प्रणाली से बाहर होते हैं। अनिर्दिष्ट होती है; जबकि ब पर खिंचाव न केवल अ के लिए बल्कि किसी भी अन्य सम्भावी आपूर्ति-स्रोत के लिए महत्व रखता है।

46. निम्नलिखित में से कौनसा सूचना के प्रवाह को उत्पन्न करने का कारक है?

(A) माँग

(B) उपयोग

(C) गुणवत्ता

(D) मात्रा

[read more] (A) माँग [/read]

47. समृद्ध देशों के बीच जिंसों के विनिमय को प्रधान रूप से प्रभावित करने वाले कारक कौनसे हैं?

(A) उत्पादन का प्राचुर्य

(B) प्रभावी माँग

(C) आर्थिक विकास का स्तर

(D) सूचना का उत्पन्न होना

[read more] (B) प्रभावी माँग [/read]

48. सूचना का उत्पन्न होना निम्नलिखित में से किस पर आश्रित है?

(A) विचारों की प्रकृति

(B) एक प्रणाली में विचार केन्द्रों की शक्ति

(C) विचारों की अवधि

(D) विचारों की प्रभावशीलता

[read more] (B) एक प्रणाली में विचार केन्द्रों की शक्ति [/read]

49. उत्पन्न होने के स्थान से गन्तव्य स्थान तक सूचना मुक्त रूप से निम्नलिखित में से किस कारण से प्रवाहित होती है?

(A) उत्पन्न होने के स्थान पर विकर्षण

(B) गन्तव्य स्थान पर आकर्षण

(C) उत्पन्न होने के स्थान तथा गन्तव्य स्थान के बीच दूरी

(D) उत्पन्न होने के स्थान पर प्रचुरता

[read more] (B) गन्तव्य स्थान पर आकर्षण [/read]

50. उपरिलिखित गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्न लिखित में से कौनसा है?

(A) सेवाओं को प्रवाह

(C) लोगों का प्रवास

(B) जिंसों का प्रवाह

(D) सूचना का प्रवाह

[read more] (D) सूचना का प्रवाह [/read]

20. Human Geography: Definition, Nature and Scope (मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)

        Human Geography: Definition, Nature and Scope

(मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)



      मानव भूगोल मानव समाज और उनके भौतिक पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन है। मानव भूगोल विज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी पर मानव तथ्यों के स्थानिक वितरण के साथ-साथ विभिन्न मानव समूहों और उनके पर्यावरण के बीच क्षेत्रीय कार्यात्मक अंतःक्रियाओं की जांच करती है। यह एक व्यापक अनुशासन है जिसमें कई तरह के विषय शामिल हैं, जैसे:-

 (i) जनसंख्या : मानव जनसंख्या का वितरण, वृद्धि और विशेषताएँ।

(ii) स्थान : स्थानों की भौतिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ।

(iii) संचलन : मानव प्रवास और गतिशीलता के पैटर्न।

(iv) अर्थव्यवस्था : आर्थिक गतिविधियों का स्थानिक वितरण।

(v) संस्कृति : मानव संस्कृतियों की विविधता और उनकी स्थानिक अभिव्यक्ति।

(vi) पर्यावरण : मानव समाज और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच अंतःक्रिया।

मानव भूगोल की परिभाषा

        मानव भूगोल, भूगोल की प्रमुख शाखा हैं जिसके अन्तर्गत मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक उसके पर्यावरण के साथ सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता हैं। मानव भूगोल की एक अत्यन्त लोकप्रिय और बहु अनुमोदित परिभाषा है- “मानव एवं उसका प्राकृतिक पर्यावरण के साथ समायोजन का अध्ययन।”     

      किसी भी विषय को परिभाषित करना हमेशा मुश्किल होता है। ज्ञान के विस्तार और समाज की प्रगति के साथ समय के साथ विषय की अवधारणा बदलती रहती है। यहाँ कुछ भूगोलवेत्ताओं द्वारा व्यक्त मानव भूगोल की कुछ परिभाषाएँ दी गई हैं।

रैटजेल : “मानव भूगोल मानव समाज और पृथ्वी की सतह के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है”

एलेन सी. सेम्पल : “मानव भूगोल अशांत मनुष्य और अस्थिर पृथ्वी के बीच बदलते संबंधों का अध्ययन है”

विडाल डी ला ब्लाश : “मानव भूगोल पृथ्वी और मानव के बीच अंतर्संबंधों की एक नई अवधारणा प्रस्तुत करता है”

ई. हंटिंगटन : “मानव भूगोल को भौगोलिक वातावरण और मानव गतिविधियों और गुणों के बीच संबंधों की प्रकृति और वितरण के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है”

एच. डी. ब्लिज : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग कैसे स्थान बनाते हैं, हम स्थान और समाज को कैसे व्यवस्थित करते हैं, हम स्थानों और अंतरिक्ष में एक-दूसरे के साथ कैसे बातचीत करते हैं, और हम अपने इलाके, क्षेत्र और दुनिया में दूसरों और खुद को कैसे समझ सकते हैं”

रुबेनस्टीन : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग और मानवीय गतिविधियाँ कहाँ और क्यों स्थित हैं”

मानव भूगोल की प्रकृति  

      मानव भूगोल की प्रकृति अत्यधिक जटिल एवं विस्तृत है। जीन ब्रुश के अनुसार जिस प्रकार अर्थशास्त्र का सम्बन्ध कीमतों से, भू-गर्भशास्त्र का सम्बन्ध चट्टानों से, वनस्पति शास्त्र का सम्बन्ध पौधों से है ठीक उसी प्रकार भूगोल का केन्द्र बिन्दु स्थान से है जिसमें कहाँ व क्यों जैसे प्रश्नों के उत्तरों का अध्ययन किया जाता है। मानव भूगोल मानव को केन्द्रीय भूमिका का अध्ययन करता है। फ्रेडरिक रेटजेल, जिन्हें आधुनिक मानव भूगोल का संस्थापक कहा जाता है।

        उन्होंने मानव समाजों एवं पृथ्वी के धरातल के सम्बन्धों के संश्लेषणात्मक अध्ययन पर जोर दिया है। पृथ्वी पर जो भी मानव निर्मित दृश्य दिखाई देते हैं उन सबका अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत आता है। इसी कारण मानव भूगोल की प्रकृति में मानवीय क्रियाकलाप केन्द्रीय बिन्दु के रूप में रहते हैं। इस प्रकार मानवीय क्रियाकलापों के विकास (कब, क्यों, कैसे) को भौगोलिक दृष्टि से प्रस्तुत करना ही मानव भूगोल की प्रकृति को दर्शाता है।

      मानव भूगोल विभिन्न प्रदेशों के पारिस्थितिक समायोजन व क्षेत्र संगठन के अध्ययन पर केन्द्रित रहता है। पृथ्वी पर रहने वाले मानव के जैविक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के लिए वातावरण के उपयोग का अध्ययन व वातावरण में किए गए बदलाबों का अध्ययन मानव भूगोल का आधार है। सारांशत: यह कहा जा सकता है कि मानव भूगोल मानव व वातावरण के जटिल तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव को केन्द्रीय भूमिका के रूप में रखकर अध्ययन कस्ता है।

       मानव भूगोल की प्रकृति को समझने के लिए, निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए:-

(i) मानव भूगोल, भूगोल की एक प्रमुख शाखा है।

(ii) मानव भूगोल में, मानव और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है

(iii) मानव भूगोल में, मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(iv) मानव भूगोल में, मानव की गतिविधियों और पर्यावरण पर उनके प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।

(v) मानव भूगोल में, मानव निर्मित चीज़ों का भी अध्ययन किया जाता है।

(vi) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(vii) मानव भूगोल में, मानव समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और जैविक विकास का अध्ययन किया जाता है।

(viii) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों को समझने के लिए, सामाजिक विज्ञान की सभी शाखाओं का अध्ययन किया जाता है।

Human Geography

     इस प्रकार मानव भूगोल की प्रकृति यह है कि यह दोनों – सक्रिय मानव और अस्थिर पृथ्वी सतह की पारस्परिक क्रिया का अध्ययन करना है जहाँ भौतिक वातावरण में मानव के लिए अवसरों की सम्भावनाएँ प्रदान करने के साथ कई सीमाएँ हैं। और इसके जवाब में मानव प्राकृतिक वातावरण को संशोधित करता है और उस वातावरण में समायोजित होता है।

मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र

      मानव द्वारा अपने प्राकृतिक वातावरण के सहयोग से जीविकोपार्जन करने के क्रियाकलापों से लेकर उसकी उच्चतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किये गये सभी प्रयासों का अध्ययन मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अतर्गत ही आता है। अतः पृथ्वी पर जो भी दृश्य मानवीय क्रियाओं द्वारा निर्मित हैं, वे सभी मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता हैं।

    पृथ्वी तल पर मिलने वाले मानवीय तत्त्वों को समझने व उनकी व्याख्या करने के लिए मानव भूगोल के अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों का अध्ययन भी करना पड़ता है। मानव भूगोल के विषय क्षेत्र, उपक्षेत्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों से मानव भूगोल के सम्बन्धों को निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत किया गया है।

मानव भूगोल के क्षेत्र उप-क्षेत्र अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध
सामाजिक भूगोल व्यवहारवादी भूगोल

सामाजिक कल्याण का भूगोल

सांस्कृतिक भूगोल

लिंग भूगोल

ऐतिहासिक भूगोल

चिकित्सा भूगोल

मनोविज्ञान

कल्याण

अर्थशास्त्र

समाजशास्त्र

मानव विज्ञान

समाजशास्त्र

मानव विज्ञान

महिला अध्ययन

इतिहास

महामारी विज्ञान

नगरीय भूगोल  नगरीय अध्ययन और नियोजन
राजनितिक भूगोल निर्वाचन भूगोल

सैन्य भूगोल

राजनीति विज्ञान

सैन्य विज्ञान

जनसँख्या भूगोल जनांकिकी
आवास भूगोल नगर/ग्रामीण नियोजन
आर्थिक भूगोल संसाधन भूगोल

कृषि भूगोल

उद्योग भूगोल

विपणन भूगोल

पर्यटन भूगोल

अन्तर्राष्ट्री व व्यापार का भूगोल

अर्थशास्त्र

संसाधन अर्थशास्त्र

कृषि विज्ञान

औद्योगिक अर्थशास्त्र

व्यावसायिक अर्थशास्त्र

वाणिज्य पर्यटन और यात्रा प्रबन्धन

अन्तर्राष्ट्री य व्यापार

 

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