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28. Non-Conventional Sources of Energy (ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोत)

Non-Conventional Sources of Energy

(ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोत)



    Non-Conventional Sources of Energy

     ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्त्रोत वे हैं जो प्राकृतिक रूप से नवीकरणीय होते हैं तथा जिनका उपयोग ऊर्जा के स्रोत के रूप में किया जा सकता है। जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा, बायोमास, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, लहर ऊर्जा आदि। 

    ये स्रोत पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं और पारंपरिक स्रोतों की तुलना में बहुत कम प्रदूषण करते हैं।

   आज विकासशील देशों में बढ़ते हुए औद्योगिकरण के कारण जीवाश्म ईंधन संसाधन जैसे कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा एक सीमित संसाधन के रूप में रह गये हैं।

     ब्रून्श ने तो कोयला और खनिज तेल को लुटेरा संसाधन बताया है। वह दिन दूर नहीं है जब विश्व में इन संसाधनों के संचित भण्डार समाप्त हो जायेंगे। इसी डर के कारण आज विश्व के देश ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों पर निर्भर रहने लगे हैं।

    ऊर्जा के इन स्त्रोंतों का प्रयोग होने से न केवल जीवाश्म ईंधन की बचत होगी वरन् बहुत कुछ विदेशी मुद्रा भी बचेगी।

(i) सौर ऊर्जा (Solar Energy):-

       यद्यपि सौर ऊर्जा विश्व के सभी देशों में उपलब्ध है परन्तु सौर ऊर्जा की सर्वाधिक सम्भावता उष्ण कटिबंधीय देशों में है जहाँ सूर्य की किरणें सालोंभर अधिक तेज पड़ती हैं। विषुवत रेखा से उत्तर और दक्षिण बढ़ने के बाद सूर्यातप कम होने लगता है।

     सबसे अधिक सूर्याताप की सम्भावना मरूस्थलीय क्षेत्रों में होती है। सूर्य की किरणों से ऊर्जा तब प्राप्त होती है जब सीधी किरणें फोटो-वोल्टिक सैल (Photo-Voltaic-Cells) से टकराती हैं फिर उससे ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस विधि द्वारा ऊर्जा दो प्रकार से उत्पन्न की जाती है-

(i) फोटोवोल्टिक ऊर्जा इस विधि द्वारा ऊर्जा सूर्य की किरणों से (Semi-conductor device) द्वारा उत्पन्न होती है। लेकिन इस विधि द्वारा उत्पन्न ऊर्जा काफी महँगी पड़ती है। आज अनेक शोधों द्वारा फोटो वोल्टिक विधि से ऊर्जा बनाने की विधि को सस्ता किया गया है।

   इस विधि से सौर की किरणों को बड़े-बड़े आतिशी शीशों, लेंसों अथवा रिफ्लेक्टरों की सहायता से बड़ी मात्रा में एकत्र किया जाता है।

(ii) दूसरी विधि से सौर ऊर्जा से सीधे विद्युत बनाई जाती है। इसके लिये विभिन्न प्रकार के सिलिकॉन सैलों का प्रयोग किया जाता है।

    ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों में विश्व ऊर्जा का 0.5% सौर ऊर्जा से प्राप्त होता है। सौर ऊर्जा के उत्पादन की सम्भावनाएँ भारत और चीन में पर्याप्त हैं। यहाँ सौर ऊर्जा से पानी गर्म करने, सौर कुकर बनाने तथा फसल पकाने आदि की तकनीकी विकसित की जा चुकी है।

भारत-

     यहाँ सौर ऊर्जा के विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। ऊर्जा मंत्रालय ने 25 से 100 kW की तीन प्रकार की सौर फोटो-वोल्टिक ऊर्जा परियोजनाएँ स्थापित की हैं-

(i) सार्वजनिक भवनों की छत पर प्रणाली लगाना ताकि प्रमुख शहरी क्षेत्रों में पीक लोडिंग सेविंग हो सके।

(ii) सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रिड के अन्तिम भाग के लिये ही एण्ड स्पोर्ट प्रणाली की व्यवस्था।

(iii) दूर दराज क्षेत्रों में डीजल की बचत करने वाला लगाना।

    भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले में 140 MW की एक समन्वित सौर शक्ति संयुक्त चक्र बिजली सहित 35 MW की ताप ऊर्जा प्रणाली की स्थापना का प्रस्ताव भी है। भारतवर्ष में 10 ग्रिड इंसेंटिव एस. पी. वी. परियोजनाएँ लगाई जा रही हैं जिनकी कुल क्षमता 925 kW है।

चीन-

    यहाँ सौर ऊर्जा से लगभग 20,000 Heat Collectors तैयार किये जाते हैं।

  सौर ऊर्जा की ओर विश्व के अन्य देश जैसे श्रीलंका, इण्डोनेशिया, यू. एस. ए. प्रयत्नशील हैं। यू एस. ए. में तो कैलीफोर्निया में 600 MW का एक संयंत्र स्थापित किया गया।

   वैज्ञानिकों की योजना है कि सूर्यातप को इस्पात नलिकाओं में एकत्रित करके आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सके। इसके लिये नलिकाओं में नाइट्रोजन प्रवाह करना होगा, जो इस ताप को गलित लवणों के टैंकों में परिवहित कर देंगी। यह टैंक बहुत दिनों तक ताप को बनाये रखते हैं, आवश्यकता पड़ने पर इसे टरबाइन जेनरेटर और परम्परागत बायलर में विद्युत उत्पादन के लिये प्रयोग किया जा सकेगा।

   आज अन्तरिक्ष उपग्रहों का भी सहयोग इसके लिये लिया जा रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया और फ्लोरिडा में वाणिज्यिक स्तर पर सौर हीटरों का प्रचलन है। सौर कुकर, हीटर, ड्रायर, सिलिकन आदि सौर तापीय उपकरण विकसित किये गये हैं।

    विश्व की विषालतम सौर भट्टी लॉस एंजिलिस से 140 मील उत्तर-पूर्व की ओर है। यह मोजाब मरूस्थल में लूज में स्थापित है। इससे 10 विशाल सौर विद्युत उत्पादक संयंत्र संचालित होते हैं।

(ii) पवन ऊर्जा (Wind Energy):-

    पवन ऊर्जा, जिसे विंड एनर्जी भी कहते हैं। इसमें हवा की गतिज ऊर्जा का उपयोग करके बिजली का उत्पादन किया जाता है।

    पवन चक्कियों का प्रयोग ऊर्जा के रूप में बहुत समय से किया जा रहा है। ईरान में अन्न पीसने के लिये पहले पवन चक्कियों का प्रयोग होता है। इंग्लैण्ड में हल के निकट सन् 1186 में पवन चक्कियाँ स्थापित की गई थीं। आज हालैण्ड में पवन चक्कियों का प्रयोग ऊर्जा उत्पादन में होता है। इंग्लैण्ड की सबसे पुरानी पवन चक्की सन् 1670 की आज भी स्थित है।

     इस विधि द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने में पवन द्वारा गतिज (Kinetic) ऊर्जा का प्रयोग टरबाइन के माध्यम से विद्युत उत्पादन में होता है।

    पवन द्वारा ऊर्जा उत्पादन सबसे अधिक जर्मनी में होता है। यहाँ सन् 2000 तक 9.369 पवन टरबाइन लगे हुए थे जिनसे 6,094.8 MW विद्युत उत्पादन होता है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका का दूसरा स्थान है। यहाँ सन् 1999 तक 2,502 MW पवन ऊर्जा का उत्पादन हुआ। किसी समय तो अमेरिका के पश्चिमी मैदान में जल की पंपिंग के लिए पवन चक्की का प्रयोग होता था। यहाँ अधिकतर पवन ऊर्जा उत्पादन केन्द्र कैलीफोर्निया राज्य में हैं। यहाँ लगभग 15,000 टरबाइन ऊर्जा उत्पादन में कार्यरत हैं। जबकि डेनमार्क विश्व में तीसरा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है। यहाँ सन् 2000 तक 2,417 MW विद्युत का उत्पादन हुआ।

     ग्रेट ब्रिटेन यहाँ सन् 2001 में 69 पवन फार्म थे जिनमें 941 टरबाइन लगे हुए थे तथा इनमें 473.6 MW विद्युत उत्पादित होती है।

    भारत भी पवन ऊर्जा के उत्पादन में पीछे नहीं हैं। भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन में तेजी से वृद्धि हो रही है। भारत में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 2023 में 42.633 गीगावाट थी, और देश दुनिया में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता के मामले में चौथे स्थान पर है। 

    एशिया की विशालतम 150 MW उत्पादन क्षमता परियोजना मुप्पंडाल (तमिलनाडु) में है। इस समय देश में 179 विण्ड मैपिंग और 83 विण्ड मोनीटरिंग स्टेशन कार्यरत हैं। तामिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में लगभग 80 स्थानों की पहचान की जा चुकी है।

(iii) भूतापीय शक्ति (Geo-thermal Energy):-

    पृथ्वी के आन्तरिक भाग में गहराई के अनुसार तापमान में वृद्धि होती है। ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी के आंतरिक भाग का तापमान 4,500°C है जहाँ पर लोहा तथा निकिल जैसे भारी धात्विक पदार्थ भी तरल अवस्था में हैं।

    पृथ्वी की परत के धरातल पर दरार पड़ने के कारण मैग्मा बाहर आ जाता है। इसके ताप को एकत्रित करके विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। यही विद्युत उत्पादन भूतापीय शक्ति कहलाता है।

    विशेषज्ञों का मत है कि इस ऊर्जा का उपयोग कूप खोदकर तथा शीत जल को पम्प द्वारा इस विभंगित शैल में प्रवाहित किया जाता है यह जल शैल की ऊष्मा से 350°F तक गर्म होकर संवहन द्वारा धरातल की ओर, को उठेगा, तब इसकी ऊर्जा को टरबाइनों में चलाने के लिये प्रयोग किया जायेगा।

     एक अन्य विचारधारा के अनुसार भूतापीय ऊर्जा के उपयोग के लिये दो कूपों (Shafts) को बनाया जाए। एक कूप जल को पम्प से नीचे की ओर भेजेगा जब जल अत्याधिक गर्म हो जायेगा तो दूसरे कूप से इसे ऊपर खींच लिया जायेगा और विद्युत शक्ति के उत्पादन में प्रयोग किया जायेगा।

     भूतापीय ऊर्जा प्रदूषण मुक्त एवं सस्ती होती है। न्यूजीलैण्ड, आइसलैण्ड और इटली में प्राकृतिक रूप से प्राप्त ऊष्मा का प्रयोग काफी पहले से किया जा रहा है। इटली के ट्यूस्केनी प्रान्त में फ्लोरेन्स के दक्षिण-पश्चिम में लारडेरेल्लो का प्राकृतिक वाष्प क्षेत्र सन् 1913 से विद्युत उत्पादन कर रहा है।

    भारतवर्ष में भी भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा देश भर में 340 भूतापीय गर्म झरनों की पहचान कर ली गई है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में तातापानी भूतापीय क्षेत्रों में 300 kW क्षमता का भूतापीय बिजली संयंत्र लगाने की मंजुरी दी गई है।

    इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में पूगा, भूतापीय क्षेत्रों में जलाशय की क्षमता का मूल्यांकन करने तथा बिजली संयंत्र लगाने की संभाव्यता की जाँच का काम राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान हैदराबाद द्वारा किया गया है।

    कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) में मणिवर्ण स्थान पर भूतापीय ऊर्जा पर आधारित एक कोल्ड स्टोरेज और एक बिजलीघर स्थापित किया गया है।

(iv) ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy):-

    ज्वारीय ऊर्जा, जिसे टाइडल एनर्जी भी कहा जाता है, समुद्र के ज्वार-भाटे के प्राकृतिक उतार-चढ़ाव से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का एक नवीकरणीय रूप है।

   वर्तमान समय में ज्वार ऊर्जा द्वारा भी विश्व के कई देशों में विद्युत उत्पादन किया जाता है। विश्व में सर्वप्रथम ज्वार ऊर्जा उत्पादक प्लाण्ट फ्रांस के  ब्रिटनी में रेन्स नदी की एस्चुअरी पर स्थापित किया गया। इनमें ब्रिटेनी तट पर समुद्री टरबाइन लगे हैं जो ज्वार शक्ति से चालित होते हैं।

     इसी प्रकार कनाडा के न्यू ब्रुसविक और संयुक्त राज्य अमेरिका के मेन राज्य में पुंडी की खाड़ी के विभिन्न क्षेत्रों में जहाँ ज्वार 10 से 25 मीटर तक ऊँचे उठते हैं। ज्वार शक्ति से विद्युत उत्पादित की जाती है।

   रूस की किशलाया खाड़ी में भी इसी प्रकार के प्लाण्ट स्थापित किये गये हैं, भारतवर्ष में खम्भात की खाड़ी तथा सुन्दरवन इसके संभावित क्षेत्र हैं। यहाँ उत्पादित क्षमता 8,000-9,000 kW तक है।

(v) शहरी और औद्योगिक कचरे से ऊर्जा (Energy from Urban and Industrial Waste):-

     नगरों एवं औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले कूड़े-कचरे से पर्यावरण दूषित होता है। इस कूड़े-कचरे का उपचार करके न केवल पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है वरन् ऊर्जा उत्पादन में भी वृद्धि की जा सकती है। बड़े-बड़े महानगरों में यह कार्यक्रम विकसित किया जा रहा है।

      इस ऊर्जा से विद्युत के साथ-साथ गैस भी उत्पादित की जा सकती है। भारतवर्ष में सन् 1995 से शहरी, नगरपालिका और औद्योगिक कचरे से ऊर्जा प्राप्ति का राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहा है।

(vi) बायोमास ऊर्जा (Biogas Energy):-

      इसके अन्तर्गत कृषि और वन्य अवशेषों का उपयोग किया जाता है। इससे विद्युत के अतिरिक्त गैस भी उत्पन्न की जाती है। भारतवर्ष में बायोमास गैसीय कार्यक्रम के अन्तर्गत औद्योगिक उपयोगों के लिए ताप ऊर्जा उत्पन्न करने, पानी की पंपिंग और 500 kW तक बिजली पैदा करने के लिये बायोमास गैसीफायर विकसित किये गये हैं।

     इन गैसीफायर में लकड़ी के टुकड़ों और दूसरी वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। भारतवर्ष में 53.1 मेगावाट की क्षमता के बायोमास, गैसीफायर अब तक विकसित किये जा चुके हैं।

     इसके अतिरिक्त नई ऊर्जा प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत फ्यूज सेल्स, जिसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैसों के बीच अभिक्रिया के जरिये बिजली पैदा होती है।

    हाइड्रोजन ऊर्जा, इसका प्रयोग व्यापक रूप से जीवाश्म ईंधन के रूप में किया जाता है। जैव ईंधन आदि का प्रयोग भी विद्युत उत्पादन में किया जाता है।

26. The Idustrial Regions of USA (संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश)

The Idustrial Regions of USA

(संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप Q. संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश पर प्रकाश डालें ।

(What light on the Idustrial regions of USA)

उत्तर- संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों में से एक है, जिसका इतिहास औद्योगीकरण और तकनीकी उन्नति से भरा हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका में अनेक औद्योगिक क्षेत्र हैं जो विभिन्न उद्योगों में काफी अधिक विशेषज्ञता रखते हैं। 

       संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र निम्नलिखित हैं:-

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड औद्योगिक क्षेत्र

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी औद्योगिक क्षेत्र

(iv) डेट्रॉयट औद्योगिक क्षेत्र

(v) वृहद झील औद्योगिक क्षेत्र

(vi) दक्षिणी अप्लेशिया औद्योगिक क्षेत्र

(vii) पूर्वी टेक्सास औद्योगिक क्षेत्र

(viii) प्रशांत तटीय औद्योगिक क्षेत्र

(ix) रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ सूती वस्त्र (Cotton Textile)- सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Textile) के लिए बोस्टन (Boston) प्रसिद्ध है।

⇒ ऊनी वस्त्र (Woolen Textile)- ऊनी वस्त्र उद्योग के लिए लोवेल (Lowel) और प्रोविडेंस (Providence) प्रसिद्ध है।

⇒ हार्टफोर्ड (Hartford)- बीमा उद्योग का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (International Center of Insurance Industry) हार्टफोर्ड (Hartford) में स्थित है।

⇒ पैटरसन (Paterson)- सिल्क सिटी (Silk City) पैटरसन (Paterson) को कहा जाता है। क्योंकि पैटरसन में रेशम का अत्यधिक उत्पादन होता है।

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है। 

⇒ यह क्षेत्र पेंसिल्वेनिया के पूर्वी भाग, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, फिलाडेल्फिया, और मैरीलैंड राज्यों में फैला हुआ है। 

⇒ यह क्षेत्र अपने कुशल श्रम शक्ति, जल-विद्युत, रेल परिवहन, मशीनों और निकटवर्ती बाजार की सुविधाओं के कारण औद्योगिक गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है।  

⇒ स्टील (Steel)- स्टील उद्योग (Steel) के लिए स्पैरो पोइंट (Sparrows Point) व मोरिसविल्ले (Morrisville) प्रसिद्ध है।

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ यह औद्योगिक प्रदेश मध्य अटलांटिक तटीय औद्योगिक प्रदेश तथा मिशीगन औद्योगिक प्रदेश के बाद तीसरा महत्व औद्योगिक प्रदेश है।

⇒ यह क्षेत्र लोहा-इस्पात के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ यहां यंग्सटाउन, बिहलिंग तथा जॉन्सटाउन द्वारा बनाए गए त्रिभुज के अंदर उद्योगों का केंद्रीकरण है।

⇒ इस त्रिभुज के मध्य में पिट्सबर्ग है। यह त्रिभुज धातु उद्योग, लोहा इस्पात तथा इंजिनियरिंग उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(iv) डेट्रॉयट औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ यह अमेरिका का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल विनिर्माण क्षेत्र है, जिसका केंद्र डेट्रॉयट है।

⇒ यह शहर पहले वैगन और कैरिज-निर्माण का केंद्र था, जिसके बाद इस क्षेत्र में ऑटोमोबाइल की असेंबली होने लगी।

⇒ यह फोर्ड, क्रिसलर और जनरल मोटर्स सहित कई विशाल मोटर निगमों का मुख्यालय है।

(v) वृहद झील औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ महान झील प्रदेश को ही मिडवेस्ट प्रदेश कहा जाता है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश स्टील (Steel) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में पीट्सबर्ग (Pittsburgh)- पेन्सिलवेनिया राज्य (Pennsylvania State), डुलुथ (Duluth), क्लीवलेंड (Cleveland), बफैलो (Buffalo)- न्यूयॉर्क राज्य (New York State), गैरी (Gary) स्थान स्टील उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में शिकागो (Chicago) स्थान मांस प्रसंस्करण (Meat Processing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में डेट्रॉइट (Detroit) स्थान ऑटोमोबाइल (Automobile) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। 

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में एक्रोन (Akron) स्थान सिंथेटिक रबर (Synthetic Rubber) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(vi) दक्षिणी अप्लेशिया औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ दक्षिणी अप्लेशियन औद्योगिक क्षेत्र एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है। 

⇒ इस क्षेत्र में कोयला, लकड़ी, और अन्य संसाधनों की प्रचुरता है, जिसके कारण यह वस्त्र, रसायन, और धातु उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया है।

⇒ लौह इस्पात (Iron and Steel)- लौह इस्पात उद्योग के लिए अलबामा राज्य में बर्मिंघम प्रसिद्ध है।

(vii) गल्फ तटीय प्रदेश या पूर्वी टेक्सास औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश को ही गल्फ तटीय प्रदेश कहा जाता है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश तेल रिफाइनरी (Oil Refineries) और हवाई जहाज (Aircraft) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश या गल्फ तटीय प्रदेश में डलास (Dallas), ह्यूस्टन (Houston), न्यू आर्लीन्स (New Orleans) स्थान तेल रिफाइनरी के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश या गल्फ तटीय प्रदेश में फोर्टवर्थ (Fort Worth) स्थान हवाई जहाज उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(viii) प्रशांत तटीय औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में सिएटल (Seattle) स्थान वायुयान निर्माण (Aircraft Manufacturing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में पोर्टलैंड (Portland) स्थान जहाज निर्माण (Ship Manufacturing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में सेनफ्रांसिस्को (San Francisco) और सेन डीएगो (San Diego) सूचना एवं प्रौद्योगिकी (Information Technology- IT Industry) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ सेनफ्रांसिस्को को सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) भी कहा जाता है।

सेनफ्रांसिस्को क्षेत्र कैलीफोर्निया (California) में स्थित है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में लॉस एंजिलीस (Los Angeles) स्थान हॉलीवुड़ (Hollywood) (फिल्म उद्योग) के लिए प्रसिद्ध है।

(ix) रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र:-

     रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र उत्तरी अमेरिका में एक व्यापक क्षेत्र है जो रॉकी पर्वत श्रृंखला के पूर्वी ढलान और उसके आसपास के इलाकों में स्थित है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि, पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्योगों के लिए जाना जाता है।

निष्कर्ष:

    निष्कर्षत: कहा जा सकता कि संयुक्त राज्य अमेरिका का औद्योगिक प्रदेश एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जो कि देश की अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, और समाज को आकार देता है। यह विभिन्न उद्योगों, प्राकृतिक संसाधनों, और श्रम शक्ति के कारण विश्व भर में एक प्रमुख औद्योगिक शक्ति है।



नोट:

संक्षेप में

USA का प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र:

1. उत्तर-पूर्वी क्षेत्र:

   इस क्षेत्र में पिट्सबर्ग, क्लीवलैंड, डेट्रायट, शिकागो, ओहियो, मिशिगन और विस्कॉन्सिन जैसे प्रमुख स्थान शामिल हैं। यह क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे पुराना और सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है, जिसमें विनिर्माण उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान है।

2. मध्य-पश्चिमी क्षेत्र:

   इसमें मुख्यतः शिकागो-गैरी, पिट्सबर्ग-लेक एरी, सेंट लुइस, कैनसस सिटी, ओमाहा, सिनसिनाटी, इंडियानापोलिस क्षेत्र शामिल है। यह क्षेत्र कृषि, परिवहन, और विनिर्माण उद्योगों के लिए जाना जाता है।

3. दक्षिण क्षेत्र:

     इसमें मिसिसिपी, टेनेसी, जॉर्जिया, फ्लोरिडा, अलबामा, ओक्लाहोमा और टेक्सास जैसे जगह शामिल हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक उत्पादों में कपड़ा, खाद्य और पेय पदार्थ, तंबाकू, फर्नीचर, पेट्रोकेमिकल्स, विमान और भारी रसायन शामिल हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि, तेल, और गैस उद्योगों के लिए जाना जाता है।

4. पश्चिमी क्षेत्र:

    इसमें व्योमिंग, यूटा, कोलोराडो, नेवादा और एरिजोना राज्य शामिल हैं। यह क्षेत्र प्रौद्योगिकी, पर्यटन, और फिल्म उद्योगों के लिए जाना जाता है। 

नोट :

विनिर्माण: कच्चे पदार्थ को मूल्यवान उत्पाद में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण या वस्तु निर्माण कहा जाता है।

23. The Industrial Regions of Japan (जापान के औद्योगिक क्षेत्र)

23. The Industrial Regions of Japan

(जापान के औद्योगिक क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. जापान के औद्योगिक क्षेत्र पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Industrial regions of Japan.)

उत्तर-

जापान के औद्योगिक प्रदेश-

    उद्योगों की स्थापना की दृष्टि से जापान प्राचीन काल से ही एक विकसित देश रहा है, जहाँ पहले परम्परागत हस्त उद्योगों में उत्पादन होता था लेकिन 1870 के बाद जापान के उद्योगों में स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन कार्य होने लगा। प्राचीन उद्योग रेशमी वस्त्र, चीनी मिट्टी के बर्तन, पोशाक, खिलौने, हस्त कलाकारी की वस्तुओं आदि का उत्पादन हाथ के बजाय स्वचालित मशीनों द्वारा होने लगा।

     निर्मित माल की विदेशों में बढ़ती हुई माँग को देखते हुए जापान सरकार ने 1930 के बाद भारी उद्योगों की स्थापना पर अधिक बल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के समय में जापान में लोह इस्पात तथा विविध इंजीनियरिंग उद्योगों का विकास तीव्र गति से हुआ। सूती वस्त्र उद्योग जापान का प्राचीन उद्योग है जिसमें स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन होने के कारण जापान का मुख्य उद्योग बन गया।

    1945 में आणविक बम विस्फोटों से अधिकतर उद्योग नष्ट हो गए थे लेकिन 1950 के बाद जापान सरकार की औद्योगिक नीति के द्वारा उद्योगों का सर्वाधिक विकास हुआ। जापान विश्व में संयुक्त राज्य तथा रूस के बाद तीसरा और एशिया में औद्योगिक विकास की दृष्टि से प्रथम स्थान रखता है।

    विविध खनिज पदार्थों की कमी होते हुए भी जापान विदेशों से आयातित कच्चे पदार्थों के आधार पर एक विकसित औद्योगिक देश बन गया है जिसके लिए द्विपीय स्थिति के कारण सस्ता जल परिवहन, कुशल श्रमिक, सघन जनंसख्या, तटीय स्थिति आदि सुविधाओं का प्रमुख योगदान है। जापान में उद्योगों के लिए कच्चा माल अन्य देशों से आयात करने के कारण उद्योगों की स्थापना महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में अधिक हुई है। जापान के निम्नांकित पाँच औद्योगिक प्रदेश प्रमुख हैं-

1. क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश

3. किंकी औद्योगिक प्रदेश

4. किता क्यूशू औद्योगिक प्रदेश

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश

The Industrial Regions of Japan

1. क्वान्तो या टोकियो-याकोहामा औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो प्रदेश जापान के दक्षिण-पूर्व में स्थित जापान का सबसे बड़ा मैदान है जो प्रशान्त महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित है। क्वान्तो जापान का सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है जहाँ टोकियो, याकोहामा, कावासाकी, चीबा, इथिकावा; काबागुची, हिताची, मितो, उरावा, कोगा, कोनोसू, ओमिया, ताबिकावा, तनावा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    क्वान्तो प्रदेश में पर्वतीय क्षेत्र से बहकर आने वाली नदियों से जल की प्राप्ति, तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण जल परिवहन की सुविधा जिसके द्वारा कच्चे पदार्थों के आयात तथा निर्मित माल के निर्यात का प्रमुख यातायात साधन है। सस्ते तथा कुशल श्रमिकों की व्यवस्था, उच्च तकनीकि सुविधाएँ, श्रमिकों की अपने कार्य के प्रति वफादारी, सघन जनसंख्या जिसके कारण पर्याप्त श्रमिक तथा स्थानीय बाजार की व्यवस्था तथा टोकियो जापान की राजधानी होने के साथ-साथ सबसे बड़ा आर्थिक सांस्कृतिक नगर है तथा रेलमार्गों द्वारा जापान के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है।

     इन विभिन्न सुविधाओं के कारण यह क्षेत्र जापान का प्रमुख औद्योगिक प्रदेश बन गया है। इस क्षेत्र में लौह-इस्पात, वायुयानों का निर्माण, वस्त्र उद्योग, कृषि यन्त्र, रासायनिक पदार्थ, कागज आदि उद्योग इस क्षेत्र में सघन रूप से अवस्थित हैं।

     टोकियो, कावासाकी, चीता तथा इथिकावा में लौह इस्पात, योकोहामा कावासाकी में भारी धातु निर्माण उद्योग, टोकियो-याकोहामा, कावासाकी उकागा में जलपोत निर्माण, ताविकावा-मिआमी तथा तनावा में वायुयान निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश के पश्चिम में जापान के दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्र में नगोया औद्योगिक प्रदेश स्थित है जहाँ नगोया, गिफू, ओकाजाकी, आकोशी, अन्जो, इशीकी, तायोहाशी, हिकोने, कामेयामा, तजू, ओका, तोबा प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं। जापान का यह औद्योगिक प्रदेश वस्त्र निर्माण उद्योगों की स्थापना के लिए प्रसिद्ध है जहाँ सूती, ऊनी, रेशमी तथा कृत्रिम रेयन वस्त्रों के निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

      वस्त्र उद्योग के अतिरिक्त, मशीन निर्माण, भारी धातु निर्माण, वायुयान तथा जलयान निर्माण, रसायन उद्योग, बिजली के सामान तथा रेल के डिब्बे तथा रेल इंजन निर्माण उद्योग भी अवस्थित हैं। नगोया-वाकायामा जापान के वस्त्र निर्माण के प्रमुख केन्द्र हैं जहाँ वर्तमान में वस्त्र निर्माण के अतिरिक्त मशीन निर्माण उद्योगों की स्थापना भी की गयी है।

     वायुयान निर्माण मिताका तथा इनाबागून में, जलपोत निर्माण उरागा में, मिट्टी के बर्तन गनोया में तथा यातायात के साधनों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग नगोया तथा शिगा में स्थित हैं। इस क्षेत्र में उद्योग स्थापित होने का प्रमुख कारण समतल भूमि, तटीय स्थिति तथा सघन जनसंख्या है।

3. किंकी या कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश:-

     नगोया औद्योगिक प्रदेश के पश्चिमी भाग में तटीय क्षेत्र में स्थित कोबे-ओसाका तथा क्योटो नगरों में किंकी औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। अतः इसे कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश भी कहते हैं। ओसाका, कोबे-क्योटो, हिमेजी, सकाई फ्यूजे, वाकायामा, नारा, किजू, यवाता, यासू, अवाजी, ओमिजो, अमागासाकी, निशिनोमिया इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    इस क्षेत्र में लोह इस्पात उद्योगों की प्रधानता है। इसके अतिरिक्त ओसाका में सूती, ऊनी, रेशमी, वस्त्र निर्माण उद्योगों की प्रधानता है जिसके कारण इसे जापान का मेनचेस्टर कहा जाता है। जलयान, वायुयान, रासायनिक पदार्थ, मशीन निर्माण तथा खाद्य पदार्थों के निर्माण उद्योग भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र में ओसाका खाड़ी पर स्थित होने के कारण स्वच्छ जल की प्राप्ति तथा सघन जनसंख्या के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध हैं।

4. किता क्यूशू या मौजी नागासाकी औद्योगिक प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में समुद्र तटीय क्षेत्र में इस औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। यह प्रदेश जापान में लौह-इस्पात उद्योगों की दृष्टि से अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है जहाँ जापान के कुल लौह-इस्पात में उत्पादन का 50 प्रतिशत उत्पादित होता है। तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण तथा एशियाई देशों के समीप स्थित होने के कारण लौह अयस्क, कोयला आदि कच्चे पदार्थ जल परिवहन द्वारा आसानी से आयात कर लिया जाता है।

    निर्मित पदार्थों को जलयानों द्वारा विदेशों में निर्यात कर दिया जाता है। अतः यह प्रदेश पूर्णतया आयातित कच्चे पदार्थों पर आधारित है। क्यूशू-केमोगी-यावाता-कोकुश-वाकामात्सु-शिमोनो-सेकी-मोजी-ऊबे-फुकुओका-सासेबे-नागासाकी इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश हैं जहाँ लौह इस्पात के अतिरिक्त धातु निर्माण उद्योग, इंजीनियरिंग पदार्थों का निर्माण, सीमेंट, मोटर गाड़ियाँ, जलयान निर्माण तथा रासायनिक पदार्थों से सम्बन्धित उद्योग भी पाए जाते हैं।

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में किंकी तथा किता-क्यूशू औद्योगिक प्रदेशों के मध्यवर्ती भाग में इस प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। हिरोशिमा-कुरे-नोमी ओकायामा-मत्सूयामा-ताकामात्सू-कूबा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं जहाँ लौह इस्पात भारी धातु निर्माण-जलयान पेट्रो शोधन कारखाने-यंत्र निर्माण-बिजली के सामान तथा विविध रासायनिक पदार्थों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग पाए जाते हैं। जापान के ये सभी औद्योगिक प्रदेश दक्षिणी क्षेत्र में स्थित हैं।

     इनके अतिरिक्त उत्तर में सेन्दाई क्षेत्र तथा होकैडो द्वीप के दक्षिणी भाग में भी लघु औद्योगिक क्षेत्र हैं जहाँ केवल सामान्यतः उपभोक्ता वस्तुओं का ही उत्पादन किया जाता है। इस क्षेत्र में जलवायु दशाएँ प्रतिकूल तथा कच्चे पदार्थों की कमी के कारण जनसंख्या भी न्यूनतम ही पायी जाती है। अतः औद्योगिक विकास वर्तमान में अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही है।



नोट:

जापान में औद्योगिक उन्नति के कारण

     जापान एशिया महाद्वीप का अकेला ऐसा देश है जो औद्योगिक विकास की उस चरम सीमा तक पहुँच गया है, जहाँ तक पहुँचना साधन सम्पन्न विकसित देशों के लिए भी बहुत कठिन है। यह विश्व का प्रमुख औद्योगिक राष्ट्र है। 20वीं शताब्दी में जापान ने अद्वितीय औद्योगिक विकास किया है। जापान की औद्योगिक उन्नति के निम्नलिखित कारण हैं-

(1) भौगोलिक स्थिति- जापान की स्थिति द्वीपीय होने के कारण इसका जलमार्गों द्वारा विभिन्न देशों से सम्पर्क स्थापित हो सका है। जापान के लिए कच्चे माल के स्रोत एशियाई देश इसके बहुत समीप हैं।

(2) अनुकूल जलवायु- इस देश की जलवायु रेशम, कपास आदि के उत्पादन के लिए अनुकूल है। अक्षांशीय विस्तार अधिक होने के कारण इसके उत्तरी व दक्षिणी भागों में जलवायुवीय भिन्नता पायी जाती है।

(3) कच्चे माल की प्राप्ति- यद्यपि जापान में लोहा, कोयला, कपास आदि कच्चे मालों की कमी है फिर भी जापान अति तीव्र गति से औद्योगिक विकास हो रहा है। इसका प्रमुख कारण विदेशों से सस्ते कच्चे माल का प्राप्त होना है।

(4) जल-विद्युत- औद्योगिक शक्ति के साधन कोयले की कमी सस्ती जल-विद्युत द्वारा पूरी कर दी जाती है। यदि जापान में जल विद्युत उत्पादन की अनुकूल भौगोलिक दशाएँ न होर्ती तो जापान औद्योगिक दृष्टि से बहुत अधिक पिछड़ा हुआ होता।

(5) कुशल श्रमिक- देश की अधिकांश जनसंख्या के औद्योगिक क्षेत्रों में निवास करने से पर्याप्त मात्रा में सस्ते व कुशल श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।

(6) बाजार की समीपता- जापान द्वारा निर्मित माल को इसके समीप दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश आयात कर लेते हैं।

(7) सामुद्रिक स्थिति- जापान के चारों ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण यहाँ जल यातायात द्वारा कच्चा माल आयात करने तथा तैयार माल निर्यात करने की बहुत सुविधा है।

(8) परिवहन की सुविधाएँ- जापान की अधिकांश जनसंख्या का जमाव तटीय भागों में है। अतः यहाँ उद्योगों का विकास भी तटीय केन्द्रों पर ही हुआ है।

(9) सरकारी सहयोग- जापान की सरकार ने औद्योगिक विकास के लिए अनेक प्रकार सहयोग किया है। यहाँ सरकार द्वारा नवीन उद्योगों को संरक्षण दिया जाता है तथा वित्तीय सहायता दी जाती है। यहाँ सरकार औद्योगिक नीति को उदार और प्रगतिशील रखकर अनुकूल वातावरण प्रदान करती है।

(10) आधुनिक मशीनरी का प्रयोग- यहाँ कारखानों में आधुनिकतम मशीनरी का प्रयोग किया जाता है तथा ऐसी विधियों का प्रयोग किया जाता है जिनसे श्रम की बचत होती है। ये मशीनें सुविधाजनक भी होती हैं। आधुनिक मशीनरी के विकास की ओर जापान में विशेष ध्यान दिया जाता है।

(11) औद्योगिक सम्बन्ध- यहाँ उद्योगों का विकास निराले ढंग से किया गया है। बड़े उद्योगों की कुटीर उद्योगों से प्रतिस्पर्धा न करके बड़े उद्योगों और कुटीर उद्योगों में सम्पर्क रखा गया है।

(12) चीन-जापान संघर्ष- जब चीन तथा जापान का संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जापान में वस्त्र व वस्त्र निर्माण उद्योगों का विकास प्रारम्भ हुआ।

(13) प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध- विश्व युद्ध में शामिल हो जाने के कारण जापान को सैनिक तथा आम जनता की माँग की पूर्ति के लिए सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, रेशमी वस्त्र, जलयान, वायुयान, मशीनरी आदि के निर्माण में वृद्धि करनी पड़ी।

40. SCALES OF MEASUREMENT (मापन के पैमाने)

SCALES OF MEASUREMENT

(मापन के पैमाने)



      भौगोलिक आँकड़ों के मापन का तात्पर्य नियमों के अनुसार आँकड़ों का वर्गीकरण, विश्लेषण और मानचित्रण है। आँकड़ों में अन्तरनिहित समरूपता के आधार पर आँकड़ों का कई तरह से प्रदर्शन ही मापक कहा जाता है। सामान्यतया भौगोलिक आँकड़ों के मापन स्तर के 4 वर्ग हैं।

1. नामिक मापक (Nominal Scale):-

     इसे प्रतीक मापक कहा जा सकता है क्योंकि यह आँकड़ों की किसी उल्लेखनीय विशेषता के आधार पर उनका वर्णन नहीं करता है। केवल प्रतीक रूप में वर्गीकरण और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जैसे- पशुओं का गाय, बैल, भैंस, बकरी में विभाजन या यौनानुपात में स्त्री-पुरुष, मिट्टी विभाजन में दोमट, बलुई आदि नामिक मापक के उदाहरण है।

    इस मापक से आँकड़ों के वास्तविक मूल्य का बोध नहीं होता है, बल्कि उनके प्रतीकों का बोध होता है। भौगोलिक विश्लेषण में बहुलक (Mode) का प्रयोग इसके आधार पर किया जाता है।

2. क्रमसूचक मापक (Ordinal Scale):-

      इसके अन्तर्गत विभिन्न आँकड़ों को अधिकतम और न्यूनतम परिमाण के आधार पर आरोही अथवा अवरोही क्रमों में रखते हैं। इस तरह आँकड़ों में अन्तर का आधार उनकी मात्रा (Quantity) रहती है। जैसे आकार के आधार पर नगरों, गाँवों का वर्गीकरण, दुकानों की संख्या, खुलनशीलता के आधार पर वर्गीकरण, उत्पादन के अनुसार विभिन्न इकाइयों का वर्गीकरण इसके उदाहरण हैं।

   इस प्रकार के आँकड़ों के विश्लेषण में अनेक सांख्यिकीय विधियों, आरेख और मानचित्र उपयोगी हैं। जैसे नगरों या गाँवों के वितरण में क्रमशः आकार के अनुसार वर्गीकरण, उच्चावचन में अधिक ऊँचा, मध्यम या न्यून ऊँचा क्षेत्र आदि है।

3. अन्तराल मापक (Interval Scale):-

    अन्तराल मापन समान इकाई मापक के आधार पर आँकड़ों का वर्णन करता है। इसमें क्रमसूचक मापक के अनुसार आँकड़ों के बीच का अन्तराल परिवर्तनशील होता है। इससे असंख्य आँकड़ों को संक्षेप में व्यवस्थित कर लेते हैं और आँकड़ों का क्रम भी बना रहता है। जैसे- < 5, 5-10, 10-15, 15-20 आदि। इसमें 0 से 20 तक जितने भी प्रेक्षण हैं, सभी किसी भी अन्तराल वर्ग में रखे जा सकते हैं। इस पर माध्य, मानक विचलन, सहसम्बन्ध आदि अनेक सांख्यिकीय विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं।

4. आनुपातिक मापक (Ratio Scale):-

    आनुपातिक मापक का प्रयोग करके बड़ी संख्या में आँकड़ों को लघुतम रूप में व्यक्त कर सकते हैं। जैसे 10/100 को 1/10, 5/50, 2/20 आदि रूप में व्यक्त कर सकते हैं। अधिकांश भौगोलिक आँकड़े आनुपातिक मापक पर ही पाये जाते हैं।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

(i) नाममात्र पैमाना (Nominal Scale):-

     नाममात्र पैमाना मापन का सबसे सरल और प्रारंभिक पैमाना है। इसमें आँकड़ों को केवल नाम या श्रेणी के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें संख्याएँ केवल पहचान (Identification) के लिए होती हैं

✍️ न तो क्रम होता है और न ही परिमाण

✍️ गणितीय क्रियाएँ संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ भूमि उपयोग के प्रकार (कृषि, वन, बंजर)

✍️ मिट्टी के प्रकार

✍️ जलवायु के प्रकार

✍️ धर्म, भाषा, जाति

महत्व

     नाममात्र पैमाना भूगोल में वर्गीकरण और मानचित्रण के लिए उपयोगी है, जैसे- भूमि उपयोग मानचित्र।

(ii) क्रमिक पैमाना (Ordinal Scale):-

    क्रमिक पैमाने में आँकड़ों को क्रम या रैंक के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें क्रम (Order) होता है

✍️ परंतु दो मानों के बीच का अंतर ज्ञात नहीं होता

✍️ केवल तुलना संभव होती है

भूगोल में उदाहरण

✍️ जनसंख्या घनत्व: उच्च, मध्यम, निम्न

✍️ विकास स्तर: विकसित, विकासशील, अविकसित

✍️ नगरीय श्रेणीकरण

महत्व

     यह पैमाना भूगोल में क्षेत्रीय तुलना और स्तरीकरण (Ranking) के लिए अत्यंत उपयोगी है।

(iii) अंतराल पैमाना (Interval Scale):-

     अंतराल पैमाने में आँकड़ों के बीच समान अंतर होता है, परंतु पूर्ण शून्य (True Zero) नहीं होता।

विशेषताएँ

✍️ क्रम और अंतर दोनों मौजूद

✍️ शून्य केवल सांकेतिक होता है

✍️ गुणा और भाग संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ तापमान (सेल्सियस, फारेनहाइट)

✍️ तिथियाँ और वर्ष

✍️ ऊँचाई (समुद्र तल के सापेक्ष)

महत्व

    यह पैमाना भौतिक भूगोल में-

✍️ जलवायु विश्लेषण

✍️ तापमान प्रवृत्ति

✍️ समय आधारित अध्ययन के लिए उपयोगी है।

(iv) अनुपात पैमाना (Ratio Scale):- 

    अनुपात पैमाना मापन का सबसे उन्नत और पूर्ण पैमाना है। इसमें समान अंतर के साथ-साथ पूर्ण शून्य भी होता है।

विशेषताएँ

✍️ क्रम, अंतर और अनुपात तीनों मौजूद

✍️ सभी गणितीय क्रियाएँ संभव

✍️ सबसे विश्वसनीय पैमाना

भूगोल में उदाहरण- जनसंख्या, वर्षा की मात्रा, दूरी, क्षेत्रफल, उत्पादन

महत्व

     अनुपात पैमाना भूगोल में-

✍️ सांख्यिकीय विश्लेषण

✍️ मॉडल निर्माण

✍️ पूर्वानुमान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मापन के पैमानों का तुलनात्मक सार

पैमाना क्रम अंतर पूर्ण शून्य
नाममात्र
क्रमिक
अंतराल
अनुपात

भूगोल में मापन पैमानों का महत्व

✍️ भौगोलिक आँकड़ों की वैज्ञानिक व्याख्या

✍️ उपयुक्त सांख्यिकीय विधि का चयन

✍️ मानचित्रण एवं मॉडलिंग

✍️ क्षेत्रीय योजना और नीति निर्माण

✍️ शोध एवं परियोजना कार्य

निष्कर्ष 

       मापन के पैमाने भूगोल में सांख्यिकीय अध्ययन की आधारशिला हैं। ये आँकड़ों को अर्थपूर्ण, तुलनात्मक और विश्लेषण योग्य बनाते हैं। प्रत्येक पैमाने की अपनी सीमाएँ और उपयोगिता है। भूगोल के छात्र के लिए इन पैमानों की स्पष्ट समझ आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना सांख्यिकीय विश्लेषण अधूरा माना जाता है।

22. What is language? Origin and classification of languages ​​in India (भाषा क्या है? उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकरण)

What is language? Origin and classification of languages ​​in India

(भाषा क्या है? उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकरण)



     भाषा अभिव्यक्ति का सबसे उत्तम साधन है। यदि मानव के पास भाषा न होती तो उसके आविष्कारों का विस्तार एवं प्रसार अत्यन्त सीमित हो जाता। मानव की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक उन्नति का प्रमुख कारण आविष्कार है और आविष्कार को प्रसारित करने का सबसे अधिक श्रेय मनुष्य की भाषा शक्ति को है।

    भाषा द्वारा मानव अपने मन के भाव प्रकट करता है, सामाजिक आदान-प्रदान या अन्तःक्रिया में भाग लेता है। संगीत रचना करता है और गाता है, साहित्य की सृष्टि करता है और आविष्कारों का प्रसार मानवीय धरातल में करता है।

    भाषा का अर्थ बोलना है, क्योंकि इसका मुख्य प्रयोग बोलकर ही किया जाता है, किन्तु दूरस्थ व्यक्ति को विचार लिखकर ही व्यक्त किए जाते हैं।

परिभाषा

स्टर्टीवेण्ट के अनुसार, “भाषा मुंह से उच्चारण किए जाने वाले संकेतों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग तथा अन्तः क्रिया करते हैं।”

पतंजलि मुनि के अनुसार, “जिस व्यापार में वाणी द्वारा वर्ण व्यक्त किए जाते हैं। वह व्यक्त वाक् अर्थात् भाषा है।

हर्सकोविट्ज के अनुसार, “भाषा मुंह से उच्चारण किए जाने वाले संकेतों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग तथा अन्तः क्रिया करते हैं और जिसके माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को सफल बनाया जाता है तथा जीवन की एक विधि विशेष को निरन्तरता एवं परिवर्तनशीलता दोनों ही प्राप्त होती हैं।”

भाषा की उत्पत्ति:-

      भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा की उत्पत्ति उन परिस्थितियों का परिणाम है जिनमें प्रारम्भिक काल में मानव निवास करता था। उस समय प्राकृतिक वस्तुएं एवं घटनाएं देखकर अनायास मुंह से आवाजें निकल पड़ती थीं।

     धीरे-धीरे आवाजें निकालकर ही वह अपने भावों को दूसरों तक पहुंचाता था। धीरे-धीरे सामाजिक अन्तः क्रिया के दौरान एक-एक विशिष्ट आवाज एक-एक विशेष प्रकार के संकेत के रूप में स्थापित व क्रियाशील हुई। इन्हीं संकेतों के क्रमिक विकास से भाषा की उत्पत्ति हुई।

      भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में द्वितीय मत यह है कि मानव ने बोलने की प्रेरणा प्रकृति से ही ली है। प्रारम्भिक समय में मानव ने प्रकृति में कुछ आवाजें सुनीं जिनकी नकल की जिससे बाद में संकेतों का जन्म हुआ तथा भाषा की उत्पत्ति हुई।

     भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में तृतीय सिद्धान्त प्राणीशास्त्रीय है। मानव में कुछ प्राणीशास्त्रीय विशेषताएं पाई जाती हैं जिनके कारण वाणी अथवा भाषा की उत्पत्ति होती है।

भाषाओं का वर्गीकरण:-

    भारत में बोली जाने वाली भाषाएं निम्नांकित चार परिवारों से सम्बन्धित हैं:

(1) ऑस्ट्रिक (Ausric)

(2) द्रविण (Dravidian)

(3) चीनी-तिब्बती (Sino-Tibetan)

(4) इण्डो-यूरोपियन (Indo-European)

(1) ऑस्ट्रिक:-

    इसकी दो शाखाएं हैं-

(ⅰ) ऑस्ट्रो-एशियाटिक शाखा एवं

(ii) ऑस्ट्रोनेशियन शाखा।

   ऑस्ट्रो-एशियाटिक शाखा के अन्तर्गत मध्य एवं पूर्वी भारत की कोल एवं मुण्डा बोलियां, निकोबार द्वीप समूह की बोली तथा थाईलैण्ड और वियतनाम की भाषाएं सम्मिलित हैं जबकि ऑस्ट्रोनेशियन शाखा के अन्तर्गत इण्डोनेशिया की राष्ट्रभाषा तथा मलाया, माइक्रोनेशिया, मैलेनेशिया तथा पोलिनेशिया, आदि की भाषाएं सम्मिलित हैं। इनमें सबसे बड़ा भाग सन्थाली बोलने वालों का है।

(2) द्रविण:-

     इसके सदस्य मध्य और दक्षिणी भारत में रहते हैं। इसके अन्तर्गत निम्नांकित चार साहित्यिक भाषाएं आती हैं-तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालय। द्रविण समूह में निम्नांकित तीन समूह हैं-

(i) दक्षिणी द्रविण,

(ii) मध्य द्रविण तथा

(iii) उत्तरी द्रविण।

     दक्षिणी द्रविण समूह में दक्षिणी भारत का बड़ा भाग सम्मिलित है जिसमें तमिल, मलयालम तथा कन्नड़ भाषाएं बोली जाती हैं। मध्य द्रविण में तेलुगु तथा गोंडी भाषाएं सम्मिलित हैं जबकि उत्तरी द्रविण समूह में कुराख (ओरांव) तथा माल्टो हैं।

(3) चीनी-तिब्बती:-

      इसे भाषाओं का किरात समूह भी कहा जाता है। इस भाषा परिवार में हिमालय के दक्षिणी ढालों, उत्तरी पंजाब से भूटान, उत्तरी तथा पूर्वी बंगाल और असम में पाई जाने वाली इण्डो मंगोलाइड प्रगति के लोगों में प्रचलित भाषाएं आती हैं। भारत में तिब्बती भाषा बोलने वालों की निम्नांकित शाखाएं हैं:-

(i) तिब्बत-हिमालयी,

(ii) उत्तरी असम,

(iii) असम म्यांमारी। (बर्मी)।

      तिब्बत-हिमालयी शाखा में भूटिया समूह तथा हिमालयन समूह हैं। भूटिया समूह में तिब्बत, बेल्टी, लद्दाखी, लाहुली, शेरपा तथा सिक्किम भूटिया सम्मिलित हैं। हिमालयन समूह में चम्बा, कनौरी तथा लेप्चा हैं।

     उत्तरी असम समूह में अका, इफला, अबोर, मिरी, मिशमी तथा निशिंग हैं। इनमें मिरी सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है।

    असम म्यांमारी भाषा को पुनः निम्नांकित उपविभागों में विभाजित किया जा सकता है-बोडा, नागा, कचिन, कुकिचिन, म्यांमार।

(4) इण्डो यूरेपियन:-

      इसके अन्तर्गत दो मुख्य शाखाएं हैं:

(i) डारडिक तथा

(ii) इण्डो-आर्यन।

    डारडिक समूह में दारदी, शिना, कोहिस्तानी तथा कश्मीरी, आदि हैं। इनमें कश्मीरी सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है।

    इण्डो-आर्यन शाखा को पुनः उत्तर-पश्चिमी, दक्षिणी, पूर्वी, पूर्वी-मध्य, मध्य तथा उत्तरी समूहों में उपविभाजित किया जाता है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. भाषा क्या है? इसकी उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकण कीजिए।

21. Fundamental Concepts in Human Geography (मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)

Fundamental Concepts in Human Geography

(मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)



अवधारणाएँ (Concepts):-

      अवधारणाएँ किसी भी विषय का एक महत्वपूर्ण अंग होती है, क्योंकि वे उस विषय को एक अलग पहचान देने का काम करती है। जबकि एक विषय की मौलिक अवधारणाएँ उस विषय में अध्ययन किए गए तथ्यों की प्रकृति और उन तथ्यों का अध्ययन करने हेतु अपनाए गए परिप्रेक्ष्य या दृष्टिकोण पर निर्भर करती है, क्योंकि पृथक् पृथक् विषय तथ्यों के पृथक् पृथक् समूहों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और पृथक पृथक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग करते है इसलिए उनके पास अवधारणाओं का उनका अपना विशिष्ट समूह होता है।

    मानव भूगोल की कुछ अवधारणाएँ तो अभिन्न अंग है जो मानव भूगोल की विशिष्ट प्रकृति को चरित्रित करने में उपयोगी है। इसी कारण इन्हें मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं के रूप में जाना जाता है। मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाएँ समय (काल), स्थान/जगह, अवस्थिति, स्थानिक वितरण, स्थानिक अंत: क्रिया और स्थानिक संगठन मानव भूगोल की अपनी मूल अवधारणाएँ है।

     जबकि दूसरी ओर समय (काल), समाज, संस्कृति, धारणा, व्यवहार, विकास और असमानता जैसी अवधारणाएँ व्युत्पन्न अवधारणाएँ है। अतः मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं का विस्तृत अध्ययन निम्न प्रकार है-

(1) मापक (Scale):-

    मानचित्र का मापक मानचित्र पर दूरी तथा धरातल पर वास्तविक दूरी का अनुपात है। जैसे मानचित्र पर 1 इंच धरातल पर 20 मील को प्रदर्शित कर सकता है। द्वितीय मापक का विश्लेषण किसी क्षेत्रीय इकाई के आकार के रूप में करता है जिस पर किसी समस्या का विश्लेषण किया जाता है, जैसे- देश, राज्य या जिला स्तर।

    तथ्य विषयक/ परिघटनात्मक मापक का मतलब उस आकार से है जिस पर भौगोलिक संरचनाएँ उपलब्ध है अथवा जिस पर भौगोलिक प्रक्रिया संसार में काम कर रही है। विद्वानों द्वारा अध्ययन किए गए तथ्य-विषयकों/परिघटना को सूक्ष्म, समष्टि या वृहत् स्तर पर देखा जा सकता है। यह स्थानीय, प्रादेशिक या वैश्विक स्तर पर भी उपलब्ध हो सकते है। जैसे- एक समुदाय द्वारा बोली जाने वाली बोली स्थानीय स्तर पर मिलती है जबकि एक भाषा प्रादेशिक स्तर या वैश्विक स्तर पर मिलती है।

(2) समय/काल और जगह/स्थान (Time/Period and Place/Space):-

      समय तथा जगह दोनों पृथ्वी की सतह पर किसी भी वस्तु के अस्तित्व की दो मूलभूत वास्तविकताएँ है। काण्ट (1724-1804) का मत था कि समय (काल) और जगह स्थान मानव अनुभव की सम्पूर्ण परिधि को भरते है। मानव सहित समस्त कुछ समय (काल) और जगह स्थान के अन्तर्गत होता है।

   समय (काल) और जगह दोनों को रोजमर्रा के शब्दों के रूप में जाना जाता है, क्योंकि हम समस्त अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में समय एवं जगह सम्बन्धी तथ्यों का सामना करते हैं। फलस्वरूप, हम सभी को इन शब्दों के बारे में सामान्य समझ है। इसके बावजूद इन अवधारणाओं को परिभाषित करना मुश्किल है। समय के साथ दो लगातार घटित घटनाओं का पृथक्‌करण है। जबकि जगह को दो स्थानों के मध्य पृथक्‌करण के रूप में माना गया है।

     इतिहास समय (काल) के साथ सम्बन्धित है। इसी कारण इतिहासकार वास्तविकता के लौकिक या सामयिक आयाम से सम्बन्ध रखते है। वे मुख्य रूप से समाज के लौकिक या सामयिक क्रम विकास का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं। मानव इतिहास में अब तक जो कुछ घटित हुआ है, वह केवल विशिष्ट स्थानों पर हुआ है जबकि भूगोल का सम्बन्ध जगह से है। इसलिए भूगोलवेत्ता वास्तविकता के स्थानिक आयामों से सम्बन्ध रखते है। अतः भूगोल को एक क्षेत्र या स्थानिक विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया है।

      समय एवं जगह की अवधारणाओं की परस्पर अन्तनिर्भरता इतिहास और भूगोल के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध की वकालत करते है। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस (485-428 ई. पू.) का मत है कि “सम्पूर्ण इतिहास को भौगोलिक रूप से देखना चाहिए और सम्पूर्ण भूगोल को ऐतिहासिक रूप से देखना चाहिए।”

(3) क्षेत्र, स्थान और प्रदेश (Area, Place and Region):-

     कई विद्वानों ने संसार को समझने हेतु क्षेत्र, स्थान एवं प्रदेश की अवधारणा को विकसित किया है। क्षेत्र शब्द सामान्यतः किसी स्थान के एक भाग या पृथ्वी की सतह के एक भाग के रूप में माना गया है जिसका एक निश्चित विस्तार एवं सीमा होती है, परन्तु यह किसी आकार का हो सकता है। यह एक सामान्य अवधारणा है, परन्तु इसकी कोई निश्चित अवस्थिति नहीं होती है।

    वहीं दूसरी ओर एक स्थान अपनी भौतिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं या कार्यों के रूप में विशिष्टता व विलक्षणता के कारण निश्चित या अनिश्चित सीमा का क्षेत्र है। किसी स्थान की भौतिक विशेषताओं में भू-आकृतियाँ, जलाशय, मिट्टी, तापमान, वर्षा, वायु, जीव एवं वनस्पति तथा जीवन आदि सम्मिलित है। जबकि सांस्कृतिक विशेषताओं में मानव अधिवास, कारखाने, अस्पताल, विद्यालय, रक्षा प्रतिष्ठान, सड़कें, रेलवे, भाषा, धर्म आदि सम्मिलित है।

(4) तंत्र (Mechanism):-

     तंत्र एक-दूसरे से अंतः परस्पर या एक-दूसरे से जुड़े तत्वों का समूह है या जुड़े हुए सिरों का समूह तंत्र है। पृथ्वी की सतह पर अवस्थित या वितरित तत्व स्थानिक तत्व है। परिवहन तंत्र स्थानिक तंत्र की व्यापक श्रेणी से सम्बन्धित है। जबकि जैविक प्रणाली, सामाजिक तंत्र, कार्यालय व्यवस्थान गैर-स्थानिक तंत्र के उत्तम उदाहरण है। भूगोल विशेषज्ञ अधिकतर स्थानिक तंत्र में ध्यान केन्द्रित रखते है।

     एक तंत्र एवं उसकी संयोजकता का प्रतीकात्मक प्रदर्शन रेखाचित्र के रूप में होता है। यह संधियों द्वारा जुड़े असंधियों या किनारों का एक समूह होता है। स्थानिक तंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व शीर्ष (Vertex) और छोर (edge or link) है। एक असंधि एक रेखाचित्र का एक अंतिम बिंदु या प्रतिच्छेदन बिंदु है। परिवहन तंत्र में असंधि (nodes) का उत्तम उदाहरण सड़क का चौराहा या परिवहन टर्मिनल है।

    मानव भूगोल के प्रमुख विद्वान मानव के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक तत्वों को पृथ्वी की सतह पर व्यवस्थित और संरचित करने के तरीकों के अध्ययन में रुचि लेते हैं। इनमें सड़क तंत्र, रेलवे तंत्र, बिजली तंत्र, संचार तंत्र, सामाजिक एवं संपर्क तंत्र आदि प्रमुख है।

(5) स्थानिक अंतः क्रिया (Spatial Interaction):

     स्थानिक अंतःक्रिया द्वारा पृथ्वी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इसलिए एक स्थान के व्यक्ति दूसरे स्थान के व्यक्तियों से सम्पर्क एवं सम्बन्ध स्थापित करते हैं। गाँव से गाँव के मध्य, गाँव से शहरों के मध्य, शहरों का शहरों के मध्य और बन्दरगाह एवं आन्तरिक प्रदेशों के मध्य अन्त: क्रिया होती है। व्यक्ति वस्तुओं, सेवाओं, पैसा, सूचना और विचारों का संचार तथा आदान-प्रदान के कारण स्थानों के मध्य स्थापित अंतर्निर्भरता का सम्बन्ध स्थानिक अंत: क्रिया कहा जाता है।

(6) अवस्थिति एवं स्थानिक वितरण (Location and Spatial Distribution):-

     मानव भूगोल में भूगोलवेत्ता पृथ्वी पर स्थानों, परिघटनाओं की अवस्थिति एवं वितरण की व्याख्या करते हैं, जबकि मानव भूगोल में प्रयुक्त होने वाली अवस्थिति और वितरण की अवधारणा को जानने हेतु सर्वप्रथम स्थानिक, वितरण, अवस्थिति, परिघटना और परिमाण की अवधारणाओं को जानना होगा। गॉर्डन जे. फील्डिंग (1974) ने इन शब्दों की अवधारणाओं के मध्य अन्तर स्पष्ट किया है। स्थानिक शब्द इंगित करता है कि एक परिघटना पृथ्वी की सतह के एक हिस्से को अधिग्रहित करती है। जबकि वितरण एक-दूसरे से सम्बन्धित परिघटनाओं का संयोजन है और वितरण एक प्रकार की परिघटना की व्यवस्था है।

(7) पदानुक्रम और स्थानिक व्यवस्थापन (Hierarchy and Spatial Organisation):-

    पदानुक्रम (Hierarchy) आकार, कार्य या महत्व के किसी अन्य आधार पर वस्तुओं को क्रमबद्ध या श्रेणीबद्ध किया जाता है। स्थानिक शब्द में कल्पना की जाती है कि संसार का आकार, कार्यात्मक महत्व या भौगोलिक महत्व का पदानुक्रम में व्यवस्थित करता है। पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों और वस्तुओं की श्रेणी या क्रम को स्थानिक पदानुक्रम में रखा जाता है। जैसे भारत में बस्तियों का पदानुक्रम।

     जनसख्या के आधार पर भारत में बस्तियों सबसे बड़ी इकाई (महानगर) से लेकर सबसे छोटी इकाई (पल्ली गाँव) तक होती हैं। इसके अलावा भारत की जनगणना के आधार पर शहरी बस्तियों के पदानुक्रम में रखा गया है। स्थानिक पदानुक्रम का एक उत्तम उदाहरण प्रादेशिक पदानुक्रम है। एक प्रदेश समान श्रेणी के प्रदेशों के पदानुक्रम में एक नियत स्थान रखता है। जैसे भारत का सम्पूर्ण क्षेत्र 6 जल संसाधन प्रदेशों में बंटा है। प्रत्येक जल संसाधन प्रदेश में अनेक द्रोणियाँ है। एक द्रोणी कई जलग्रहण क्षेत्रों के मिलने से बनती है एक जलग्रहण क्षेत्र में कई उप-जलग्रहण क्षेत्र होते हैं। एक उप-जलग्रहण क्षेत्र कई वाटरशेड में विभाजित होते है।

    मानवीय बस्तियों का आकार मुख्यतः उनके मध्य अन्तः क्रिया का स्तर निर्धारित करता है। कम जनसंख्या वाली बस्तियों की तुलना में अधिक जनसंख्या वाली बस्तियों के मध्य से सम्बन्धित है। जबकि देहरादून दूरी के कारण दिल्ली के निकट है मुम्बई-देहरादून की तुलना में दिल्ली से अधिक दूर होने पर भी यहाँ स्थानिक पदानुक्रम की अवधारणा का प्रयोग देश के प्रशासन और विकास की योजना का निर्धारण होता है। जैसे-प्रशासनिक उद्देश्य हेतु देश राज्यों और जिलों में बाँट दिया जाता है।

(8) अन्तर्सम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Inter-relationship):-

   इसे पार्थिव एकता की संकल्पना के नाम से भी जाना जाता है। विश्व के सभी भौगोलिक तत्व चाहे वे प्राकृतिक हो या मानवीय एक-दूसरे से किसी-न-किसी रूप में सम्बन्धित होते है और किसी भी तत्व का अकेले तथा स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। सभी तथ्य एक-दूसरे को प्रभावित करते है।

    अतः किसी प्रदेश का वास्तविक भृदृश्य वहाँ के सभी तथ्यों के मिले-जुले प्रभावों का परिणाम होता है। किसी प्रदेश में मानव जीवन के विवेचन के लिए वहाँ की भौगोलिक दशाओं का अध्ययन आवश्यक हो जाता है, क्योंकि मानव जीवन उनसे निश्चित रूप से सम्बन्धित तथा प्रभावित होता है। इसी कारण मानव भूगोल को “मानव पारिस्थितिकी” का अध्ययन माना जाता है।

    जर्मन विद्वान फ्रेडरिक रैटजेल ने “पार्थिव एकता के सिद्धान्त” को ही प्रमुखता प्रदान की थी। इनके अलावा ब्लाश, बूंश, डिमांजिया आदि भूगोलविदों ने भी ‘पार्थिव एकता या अन्तर्सम्बन्धों के सिद्धान्त’ को मानव भूगोल का प्रमुख सिद्धान्त माना है।

(9) कालिक परिवर्तन की संकल्पना (Concept of Temporal Change):-

    कालिक परिवर्तन की संकल्पना को ‘क्रियाशीलता का सिद्धान्त’ के नाम से भी जाना जाता है। विश्व में कोई तत्व पूर्णतः स्थायी नहीं है. क्योंकि यह दुनिया ही परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पर्यावरण के सभी तत्व चाहे वे प्राकृतिक हों या सास्कृतिक, जड़ हो या चेतन सभी परिवर्तनशील हैं। उनमें परिवर्तन की क्रिया निरन्तर क्रियाशील रहती है। बूंश के शब्दों में “हमसे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु परिवर्तित हो रही है, प्रत्येक वस्तु बढ़ रही है या घट रही है। वास्तव में कुछ भी बिना परिवर्तन के नहीं है।” प्रत्येक जीव अथवा वस्तु सभी अपनी उत्पत्ति से विनाश तक जीवन चक्र में परिवर्तित होती रहती है।

(10) सांस्कृतिक भूदृश्य की संकल्पना (Concept of Cultural Landscape):-

    किसी प्रदेश में भू-आकृत्तियों, वनस्पतियाँ, जलाशयों, मानव भूमि उपयोग तथा अन्य प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों के सम्पूर्ण योग को भूदृश्य कहा जाता है। तत्वों की प्रकृति के अनुसार उन्हें प्राकृतिक भूदृश्य और सांस्कृतिक भूदृश्य में बाँटा जाता है। भूदृश्य की संकल्पना परम्परागत भूगोल का अभिन्न अंग रही है। जर्मन भाषा में भूदृश्य के समानार्थी ‘लैण्डशाफ्ट’ (Landschaft) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

    अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्ल सावर ने भूदृश्य की व्याख्या की है और उन्होंने कहा है कि सम्पूर्ण भूदृश्य में प्राकृतिक तत्वों के समुच्चयिक स्वरूप को प्राकृतिक भूदृश्य और मानवकृत तत्वों के समुच्चयक स्वरूप को सांस्कृतिक भूदृश्य कहा जा सकता है। मानव द्वारा निर्मित गृह, ग्राम, नगर, मार्ग, सड़क, खेत, बाग-बगीने, फसलें, कल-कारखाने, खेल के मैदान, पार्क आदि सांस्कृतिक भूदृश्य के प्रमुख घटक है।

(11) नियतिवाद की संकल्पना (Concept of Determinism):-

     भूगोल में मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधो का अध्ययन हेतु अनेक पद्धति एवं वैचारिक सम्प्रदाय का विकास हुआ। उनमें से एक विचार निश्चवादी के नाम से जाना जाता है। भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध तक निश्चयवादी विचार का प्रभाव बना रहा। निश्चयवादी विचार का तात्पर्य है- समय का इतिहास, सभ्यता, जीवनशैली, संस्कृति एवं राष्ट्र की सभी धारणाएँ पर्यावरण के द्वारा निर्धारित एवं संचालित होती है।

    भौतिक दशाओं के अनुसार ही मानव के शारीरिक गठन, उसके भोजन, वस्त्र, आवास आदि प्राथमिक आवश्यकताओं, व्यवसायी तथा सामाजिक व सांस्कृतिक क्रियाओं का निर्धारण होता है। इसमें प्रकृति की प्रबलता पर बल दिया है और मनुष्य को प्रकृति का दास माना है। जर्मन भूगोलवेत्ता रैटजेल इस विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। इस विद्यारधारा को पर्यावरणवाद या पर्यावरणीय नियतिवाद के नाम से भी जाना जाता है।

(12) सम्भववाद की संकल्पना (Concept of Possibilism):-

    ‘सम्भववाद’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता लुसियन फैबे (1922) ने किया था, लेकिन इसका प्रतिपादन इससे पूर्व विडाल डी ला ब्लाश के द्वारा किया जा चुका था। अधिकतर फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने मानव की स्वतन्त्रता और उसके कार्यों को बल दिया तथा नियतिवाद विचारधारा की कटु आलोचना की। ब्लाश के अनुसार, “प्राकृतिक वातावरण मानव को सम्भावनाएँ प्रदान करता है, उसके बदले में मानव अपनी आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा क्षमताओं के आधार पर उनका उपयोग करता है।” एक अन्य स्थान पर ब्लाश ने लिखा है, “प्रकृति असंख्य सम्भावनाएँ प्रदान करती है तथा इन सम्भावनाओं का उपयोग मानवीय छांट पर निर्भर करता है।”

(13) नवनिश्चयवाद की संकल्पना (Concept of Neodeterminism):-

    नवनिश्चयवाद, नियतिवाद की संशोधित विचारधारा है, जो व्यावहारिक जगत् के अधिक पास है। इसका प्रतिपादन अमेरिकन भूगोलवेत्ता ग्रिफ्थ टेलर ने किया। टेलर ने इस विचारधारा को ‘वैज्ञानिक निश्चयवाद’ तथा रुको और जाओ निश्चयवाद की संज्ञा दी। टेलर का मानना था कि न तो प्रकृति का मानव पर पूर्ण नियन्त्रण है और न ही मानव का प्रकृति पर। दोनों में एक सक्रिय क्रियात्मक अन्तर्सम्बंध है।

(14) व्यवहारपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Behavioural Geography):-

    यह मानव भूगोल की एक नवीन संकल्पना है। इस विचारधारा का प्रारम्भ अमेरिकन भूगोलवेत्ता विलियम किर्क द्वारा प्रकाशित लेख ‘Historical Geography and the Concept of Behavioural Environment’ के माध्यम से हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अन्तरविषयक अध्ययन का दौर प्रारंभ हुआ। अन्तरविषयक अध्ययन के परिणाम स्वरूप भूगोल में कई क्रांतियों का आगमन हुआ जिनमें मात्रात्मक क्रांति और आचारपरक या व्यावहारात्मक क्रांति प्रमुख था।

    आचारपरक क्रांति का अभ्युदय मात्रात्मक क्रांति के विरोध में हुआ क्योंकि मात्रात्मक क्रांति ने मानव को पूर्णतः मशीनीकृत बना दिया था। मात्रात्मक क्रांति ने मानवीय चेतना, बौद्धिकता, व्यवहार, सौंदर्य, श्रृंगार रस इत्यादि को कोई महत्व नहीं दिया था। अर्थात मात्रात्मक क्रांति ने भूगोल को एक निर्जीव विषय बना दिया था। इस तरह भूगोल में मनोविज्ञान तथ्यों का अध्ययन प्रारंभ किया गया ताकि भूगोल को मानवीय चेतनाओं से मुक्त विषय बनाया जाय।

(15) अतिवादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Radical Geography):-

    अतिवादी भूगोल को उग्र सुधारवाद या अमूल्य चुल परिवर्तनवादी क्रांतिकारी उपागम के नाम से जानते है। अतिवादी भूगोल का जन्म 1960-70 ई० के दशक में USA में हुआ। भूगोल में अतिवाद का उदय मात्रात्मक क्रांति और स्थानिक विश्लेषण के विरोध में हुआ। यह साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है लेकिन इसका उद‌य साम्यवादी या समाजवादी देशों में न होकर पूँजीवादी देश USA में हुआ है।

    अतिवादी भूगोल के विचारधारा को विकसित करने में अमेरिका के क्लार्क विश्वविद्यालय और वहाँ से प्रकाशित होने वाला पत्रिका ‘एंटीपोड’ का विशेष योगदान है। व्यक्तिगत रूप से डेविड हार्वे और जे.आर. पीट जैसे भूगोलवेताओं का योगदान रहा है। इस विचारधारा का विकास मूलतः पूर्व संस्थापित नियमो की नकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था जिसका केन्द्र बिन्दु मानव कल्याण से सम्बद्ध सामाजिक मूल्यों का प्रश्न है।

        निष्कर्षतः जा सकता है कि मात्रात्मक कांति, व्यावहारात्मक क्रांति,  प्रत्यक्षवादी दर्शन, भूगोल को मानवीय समस्याओं के समाधान से दूर रखकर इसके आधार को ही समाप्त कर रहे थे लेकिन अतिवादी भूगोल ने सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर भूगोल में नई दृष्टि का सूत्रपात्र किया।

(16) मानवतावादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Humanistic Geography):-

    मानवतावादी भूगोल प्रत्यक्षवाद के भी विरुद्ध है क्योंकि प्रत्यक्षवाद उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे आँखों से देखा जा सके। लेकिन मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम वैसे तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे मात्र अनुभव किया जा सके। ‘मानवतावादी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1976 में ‘तुआन’ ने किया था।

     मानववाद का सर्वप्रथम आरम्भ 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ब्लाश के नेतृत्व में फ्रांसीसी विद्वानों ने किया था। भौगोलिक अध्ययनों में मानवतावादी दृष्टिकोण का समावेश 1970 के दशक में प्रारम्भ हुआ। मानवतावादी विचारधारा भौगोलिक अध्ययनों में मानवीय जागरूकता, मानवीय चेतना तथा मानवीय क्रियात्मकता को केन्द्रीय एवं सक्रिय भूमिका प्रदान करती है। इस विचारधारा से अनुप्रेरित मानववादी भूगोल अपने भौगोलिक अध्ययनी में मानवीय अनुभवो, मानवीय मूल्यों के आकलन एवं मूल्यांकन की महत्व प्रदान करता है।

(17) कल्याणपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Welfare Geography):-

      मानव भूगोल की इस अभिनव प्रवृत्ति के अन्तर्गत विकसित इस विचारधारा ने मानव भूगोल की एक नवीन शाखा को उद्धृत किया है, जिसे परिवर्तनवादी भूगोल अथवा क्रान्तिकारी भूगोल की संज्ञा दी जा रही है। यद्यपि मानव कल्याणपरक भूगोल से सम्बन्धित अध्ययन सन् 1960 के बाद ही प्रारम्भ हो गये थे, किन्तु सन् 1971 में लन्दन में प्रकाशित ‘एरिया’ शोध पत्रिका में डेविड स्मिथ के क्रान्तिकारी भूगोल पर लेख प्रकाशित हुए। सन् 1977 में इससे सम्बन्धित दो पुस्तके प्रकाशित हुई।

    वर्तमान में मानव कल्याणपरक विचारधारा विकराल रूप लेती जा रही मानवीय समस्याओं, जैसे गरीबी, भुखमरी, अकाल, युद्ध, जाति-भेद, रंग-भेद, नैतिक मूल्यों में गिरावट, पर्यावरण प्रदूषण आदि से सम्बन्धित है। इसके अन्तर्गत हम समाज के कल्याण पर विभिन्न भौगोलिक नीतियों के सम्भावित प्रभावों का अध्ययन करते है। यह संकल्पना ‘सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय’ की अवधारणा पर आधारित है।

1. River Valley Regions (नदी घाटी क्षेत्र)

1. River Valley Regions

(नदी घाटी क्षेत्र)



        नदी घाटी क्षेत्र एक ऐसी घाटी होती है जो नदी द्वारा आसपास के परिदृश्य को काट कर बनाई जाती है, जिससे V-आकार का रूप बनता है। यह क्षेत्र कृषि, जल संसाधन और परिवहन के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं।

नदी घाटी क्षेत्र की विशेषताएं:-

(i) V-आकार की घाटी:-

        नदी के पानी में बहने वाली चट्टानें नदी के तल को काटती हैं, जिससे V-आकार की घाटी बनती है।

(ii) कृषि के लिए उपजाऊ:-

        नदी के किनारे की मिट्टी जिसे खादर कहते है, काफी उपजाऊ होती है। यह मिट्टी कृषि के लिए उपयुक्त होती है।

(iii) जल संसाधन:-

        नदियाँ पीने और सिंचाई के लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

(iv) परिवहन:-

       नदियाँ परिवहन के लिए भी महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वे जलमार्ग प्रदान करती हैं।

(v) सभ्यता का विकास:-

       कई प्राचीन सभ्यताएँ नदी घाटियों में ही विकसित हुई हैं, जैसे कि सिंधु घाटी सभ्यता।

भारत में नदी घाटी परियोजनाएँ:

     भारत में कई नदी घाटी परियोजनाएँ जो कि बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ हैं। ये मुख्यतः बिजली उत्पादन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण, नौ संचालन, मत्स्य पालन जैसे उद्देश्यों के लिए बनाई गई हैं। 

जैसे- दामोदर नदी घाटी परियोजना, नर्मदा नदी घाटी परियोजना, भाखड़ा नांगल परियोजना, इडुक्की परियोजना, उकाई परियोजना, ऊपरी कृष्णा परियोजना, कोसी परियोजना, गण्डक परियोजना आदि। 
River Valley Regions

नदी घाटी क्षेत्र की संकल्पना:

      नदी घाटी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र है जिसे क्षेत्रीय विकास नियोजन में एक इकाई के रूप में लिया जा सकता है। इसमें मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रवाहित क्षेत्र शामिल है। यह भौतिक और सामाजिक रूप से एकीकृत क्षेत्र है और इसे नियोजन क्षेत्र की एक आदर्श इकाई के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

    नदी घाटी नियोजन विकास और संरक्षण दोनों को एक साथ लाने का एक पारिस्थितिक रूप से सुदृढ़ और आर्थिक रूप से लागत प्रभावी साधन है। संपूर्ण नदी बेसिन को विकसित करने में शामिल विचार क्षेत्रवार आधार पर विकास को प्रेरित करना है ताकि सभी प्राकृतिक संसाधन बेसिन की सभी उप-इकाइयों को स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हों। इसलिए नदी बेसिन नियोजन की अवधारणा को क्षेत्रीय विकास दृष्टिकोण के एक भाग के रूप में देखा जाता है।

नदी घाटी क्षेत्र के लिए अलग नियोजन:

    भारत के सिंचाई आयोग (1972) ने नदी बेसिन योजना के निर्माण के लिए निम्नलिखित नीति की सिफारिश की है-

(i) बेसिन योजना को क्षेत्रीय और स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए भूमि-जल संसाधनों की एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करनी चाहिए।

(ii) मांग के अनुसार जरूरतों को पूरा करने के लिए बेसिन में विभिन्न इंजीनियरिंग कार्य किए जाने चाहिए। जैसे- जल संसाधनों का प्राथमिकता के अनुसार उपयोग, परियोजनाओं की प्राथमिकता।

(iii) योजना की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए तथा बदलती जरूरतों और आपूर्ति के मद्देनजर आवश्यकतानुसार इसमें संशोधन किया जाना चाहिए।

       यह अर्थव्यवस्था को प्रेरित करने के लिए जल प्रेरित विकास पर आधारित है तथा अंतरराज्यीय नदी बेसिन के लिए सहयोग की आवश्यकता है।

उद्देश्य:

      नदी घाटी क्षेत्र नियोजन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जल संसाधनों का उचित प्रबंधन:-

      नदी घाटी क्षेत्र में जल की उपलब्धता, उपयोग और वितरण को योजनाबद्ध तरीके से प्रबंधित करना ताकि सभी क्षेत्रों और उपयोगों के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो सके।

(ii) बाढ़ नियंत्रण:-

     बाढ़ के खतरों को कम करने और बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए बांध, तटबंध और अन्य संरचनाओं का निर्माण करना।

(iii) समुचित सिंचाई की व्यवस्था करना:-

      कृषि के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सिंचाई प्रणालियों का विकास करना, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सके।

(iv) बिजली उत्पादन:-

       जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से बिजली का उत्पादन करना जो ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करता है।

(v) भूमि उपयोग योजना:-

    नदी घाटी क्षेत्र में भूमि के विभिन्न उपयोगों (जैसे कृषि, उद्योग, आवास) को योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थित करना, ताकि संसाधनों का अधिकतम और प्रभावी उपयोग हो सके।

(vi) पर्यावरण संरक्षण:-

       नदी घाटी क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करना, ताकि भविष्य में भी इनका लाभ उठाया जा सके।

(vii) सामाजिक-आर्थिक विकास:-

       नदी घाटी क्षेत्र के निवासियों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, जैसे कि रोजगार सृजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार।

(viii) मत्स्य पालन और पर्यटन:-

      नदी घाटी क्षेत्र में मत्स्य पालन और पर्यटन को बढ़ावा देना, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार और आय के अवसर मिल सकें।

नदी घाटी क्षेत्र की समस्याएं:

1. विभिन्न फसलों के लिए भूमि और जल की उपयुक्तता और उपयोग के लिए उचित भूमि-जल प्रबंधन नहीं होना।

2. वैकल्पिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभाव।

3. बाढ़, फसलों की अनिश्चितता, जीवन और संपत्ति।

4. प्रति हेक्टेयर कम उत्पादन।

5. वर्षा पर कृषि की निर्भरता।

6. ग्रामीण संरचनात्मक सुविधाओं का अभाव।

7. वर्षा जल की बर्बादी।

8. मृदा अपरदन।

9. पेयजल की समस्या।

10. वन अपरदन।

11. फसल की उपयुक्तता के लिए मिट्टी के वैज्ञानिक परीक्षण और उचित नियोजन का अभाव

योजना और संभावनाएँ:

(i) कृषि

(ii) मत्स्य पालन

(iii) जलीय कृषि

(iv) उद्योग

(v) जल विज्ञान शक्ति

      बाढ़ प्रतिरोधी फसलें- अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, मनीला द्वारा 2004 में “स्वर्ण जलमग्नता-I” के रूप में विकसित चावल की किस्म और ढाका में चावल अनुसंधान द्वारा प्रचलित।

     एक नदी बेसिन का जल निकासी बेसिन योजनाबद्ध विकास के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य, शारीरिक रूप से एकीकृत और व्यापक रूप से स्वीकृत क्षेत्रीय इकाई साबित हुआ है।

     नदी बेसिन एक प्राकृतिक अपेक्षाकृत आसानी से परिभाषित क्षेत्र है। इसमें संसाधन संपदा के कई तत्व हैं, जो अधिकांश भाग में सांस्कृतिक और पारिस्थितिक प्रक्रिया से जुड़े हैं, सतह विन्यास, मिट्टी, वनस्पति और जलवायु उन तत्वों में से हैं जो जल निकासी बेसिन के भीतर पानी से जुड़े हैं।

     नदी बेसिन को पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका में क्षेत्रीय नियोजन के लिए एक इकाई के रूप में 1933 में लिया गया था जब टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA- टेनेसी घाटी प्राधिकरण) की स्थापना की गई थी।

    भारत में मार्च, 1948 में दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) को नदी बेसिन विकास के उद्देश्य से एक केंद्रीय सरकारी एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ को नियंत्रित करना और सिंचाई, बिजली उत्पादन, नौवहन, जल आपूर्ति, मृदा संरक्षण, मत्स्य विकास आदि के लिए प्रावधान करना था।

वाटरशेड क्षेत्र

      वाटरशेड एक भौगोलिक क्षेत्र है जो वर्षा जल को एक सामान्य बिंदु पर बहा देता है। अर्थात वाटरशेड भूमि का वह क्षेत्र होता है जिसका समस्त अपवाहित जल एक ही बिंदु से होकर गुजरता है। वर्षा जल का आकार इसके आगे के वर्गीकरण का आधार बनता है।

      वाटरशेड क्षेत्र को आकार के अनुसार कई प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। जैसे-

(i) मिनी-वाटरशेड (Mini-Watershed):

      यह सबसे छोटा प्रकार का वाटरशेड है, जिसका क्षेत्र 1 से 100 हेक्टेयर तक होता है।

(ii) माइक्रो-वाटरशेड (Micro-Watershed):

      इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 100 से 1000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(iii) मिली-वाटरशेड (Milli-Watershed):

       इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 1000 से 10,000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(iv) सब-वाटरशेड (Sub-Watershed):

        इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 10,000 से 50,000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(v) मैक्रो-वाटरशेड (Macro-Watershed):

      यह सबसे बड़ा प्रकार का वाटरशेड है, जिसका क्षेत्र 50,000 हेक्टेयर से अधिक होता है।

योजना का उद्देश्य:

1. जल संरक्षण

2. वर्षा जल संचयन

3. पेयजल का समाधान

4. सिंचाई सुविधाएँ

5. वानिकी और मत्स्य पालन

6. कृषि और जलीय कृषि

नियोजन के लिए एक इकाई के रूप में नदी घाटी क्षेत्र: समस्याएं

⇒ इसमें भौतिक, सामाजिक और आर्थिक एकरूपता नहीं है और इसलिए इसे बहु-स्तरीय नियोजन की आवश्यकता है।

⇒ इसकी बहु-राष्ट्रीय सीमाएँ हो सकती हैं।

विकास की गति में असमानता

⇒ अंतर-राज्यीय विवाद

39. Relief and Slope Analysis / उच्चावच एवं ढाल विश्लेषण

Relief and Slope Analysis

(उच्चावच एवं ढाल विश्लेषण)



उच्चावच (Relief)

     धरातल के किसी भूभाग का सबसे अधिक तथा सबसे कम ऊँचाई में जो अन्तर होता है, वह उस भूभाग का उच्चावच (Relief) कहलाता है। उच्चावच कई विधियों द्वारा दर्शाया जाता है, जैसे समुद्रतल स्थल की ऊँचाई (Spot height), समोच्च रेखायें (Contour lines), छाया (Shading) एवं रंग (Colouring)।

    “धरातलीय मानचित्र में Spot height किसी स्थान का समुद्रतल से ऊंचाई दिखता है। नीचे चित्र में Spot height, समोच्च रेखा द्वारा, छाया द्वारा तथा रंग द्वारा दिखाया गया है। यह रंग भारत के सर्वेक्षण विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त है। मैदानी भाग को हरा रंग से, अधिक ऊँचे भाग को भूरा, पठारी भाग को पीला तथा जलीय भाग को नीला रंग से प्रदर्शित किया जाता है।

    समोच्च रेखा द्वारा धरातल पर विद्यमान अनेक भूआकृतियों को दिखाया जाता है। यह समोच्च रेखा का मान, उसकी आकृति दो समोच्च रेखा के बीच की दूरी से पता चलता है कि धरातल पर कौन-सा पहाड़ी भाग है और कौन सा मैदानी भाग कहाँ झील है तो कहाँ जलप्रपात तो कहाँ पर घाटी है। अतः भू-आकृतियों को प्रदर्शित करने का यह उत्तम विधि है।

    समोच्च रेखा के माध्यम से धरातल की ढाल तथा उसकी दिशा की भी जानकारी होती है। किस स्थान की ढाल कैसी है, इसकी जानकारी भी समोच्च रेखा देती है। जहाँ समोच्च रेखा सटी-सटी रहती है, वहाँ की ढाल तीव्र होती है तथा जहाँ पर समोच्च रेखा दूर-दूर पर रहती है, वहाँ की ढाल कम रहती है।

     ऐसे तो हैश्यूर विधि (Hachure Method), ब्लॉक आरेख (Block diagram) द्वारा भी उच्चावच प्रदर्शित किया जाता है। परन्तु समोच्च रेखा सबसे अधिक उपयुक्त है। समोच्च रेखा द्वारा किसी क्षेत्र का प्रोफाइल (Profile) बनाया जाता है।

ढाल (Slope)

   मानचित्र (Map) में भूमि की ऊँचाई गहराई तथा पृथ्वी की सतह की सूक्ष्म स्थलाकृतियों (Details of topography) को मुख्यतः समोच्च रेखाओं (Contours lines) के द्वारा दिखलाया जाता है। इसीलिए समोच्च्च रेखाओं की आकृति (Shape) और पारस्परिक समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी (Relative distance) की सहायता से मानचित्र में विभिन्न स्थल रूपों (Land forms) को पहचाना जाता है।

     प्रत्येक स्थलरूप को दिखाने के लिए समोच्च रेखाओं की एक निश्चित आकृति होती है और प्रत्येक में उनकी पारस्परिक दूरी भी विशेष प्रकार की होती है। उदाहरण स्वरूप एक गुम्बद (Dome), एक शंक्वाकार पहाड़ी (Conical hill) दोनों में समोच्च रेखायें लगभग गोलाकार (Round) होती है परन्तु इन स्थलरूपों में उनकी पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है।

     इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की समोच्च रेखायें एक-दूसरे के लगभग समानान्तर होती है। परन्तु उनकी पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है। जहाँ भूमि की ढाल अधिक होती है (जैसे एक कगार (Escarpment), वहाँ समोच्च रेखायें लगभग समानान्तर और एक-दूसरे के बहुत समीप होती है।

    दूसरी ओर जहाँ भूमि की ढाल बहुत कम होगी वहाँ भी समोच्च रेखायें लगभग समानान्तर परन्तु एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर पर होती है। इसी प्रकार सम ढाल (Regular slope), असमान ढाल (Irregular slope) सोपान ढाल (Terraced slope), नतोदर ढाल (Concave slope) तथा उन्नतोदर ढाल (Convex slope) इत्यादि में समोच्च रेखाओं की पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है।

     मानचित्र में स्थल रूपों को पहचानने तथा उनका वर्णन और व्याख्या करने के लिए समोच्च रेखाओं की आकृति तथा उनकी पारस्परिक दूरी का विश्लेषण करना आवश्यक है। मानचित्र के किन्हीं दो स्थानों के बीच की ढाल की गणना (Calculation) करने के लिए दो तथ्यों की आवश्यकता होती है-

(1) दोनों स्थानों के बीच की ऊँचाई का अन्तर (Difference of elevation), जिसे लम्बवत् अन्तर (Vertical interval) कहा जाता है।

(2) दोनों स्थानों के बीच की क्षैतिजीय दूरी (Horizontal distances) जिसे क्षैतिजीय अन्तर अथवा क्षैतिजीय तुल्यांक (Horizontal equivalent) कहा जाता है।

      मान लिया जाए कि एक पहाड़ी की चोटी A की ऊँचाई समुद्रतल से 3275 मीटर है और उसके नीचे स्थित नदी घाटी का निम्नतल (Bottom) B की ऊँचाई समुद्रतल से 2475 मीटर है। A और B बिन्दुओं के बीच की ढाल ज्ञात करना है।

      सबसे पहले A और B के बीच लम्बवत् अन्तर 3275-2475 = 800 मीटर हुआ। यदि मानचित्र में इन स्थानों की दूरी 8 सेन्टीमीटर है और मानचित्र का मापक 1 सेमी. = 5 किमी. है तो A और B की वास्तविक दूरी अर्थात् उनके बीच क्षैतिजीय दूरी 40 किमी. होगी।

     A और B स्थानों के बीच की ढाल को निम्नलिखित अनुपात से व्यक्त किया जा सकता है-

Relief and Slope Analysis

     यहाँ ध्यान देने की एक आवश्यक बात यह है कि ढाल व्यक्त करने वाले भिन्न में अंश (Numerator), हमेशा इकाई (Unit) में होता है और अंश (Numerator) तथा हर (Denominator) दोनों मापन की एक ही इकाई (Unit of measurement), होती है।

    उपरोक्त उदाहरण में ढाल व्यक्त करने वाला भिन्न है, जिसमें अंश (Numerator) ‘एक’ है और हर (Denominator) ‘पचास’ है। दोनों मापन की 50 एक ही इकाई ‘मीटर’ में है। इस सम्बंध को एक अनुपात (Ratio) के रूप में अर्थात् 1: 50 में व्यक्त किया जा सकता है।

    ढाल व्यक्त करने वाले भिन्न 1/50 अथवा अनुपात 1:50 से यह समझना चाहिए कि 50 मीटर की क्षैतिजीय दूरी पर भूमि पहले की अपेक्षा एक मीटर नीची हो जाती है। इस नियम का उल्लंघन करके ढाल को ‘फीट प्रति मील’ अथवा ‘सेंटीमीटर प्रति किलोमीटर’ में व्यक्त करने का प्रचलन सा हो गया है।

     जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि ढाल का क्षैतिज रेखा से कोणीय दूरी (Angular distance) अर्थात् अंशों (Degrees) में भी व्यक्त किया जाता है। उपरोक्त उदाहरण में वर्णित दो स्थानों को यदि चित्र में A और B मान लिया जाए तो AB रेखा की लम्बाई 2 मील है। A से AC लम्ब है जो A और B के बीच के लम्बवत् अन्तर अर्थात् 4750 फीट का प्रतिनिधित्व करती है। C पर AB, के बराबर और समानान्तर CB1 रेखा खींची गयी है तथा A और B के बीच के क्षैतिजीय दूरी है। CB को मिला दिया। यह AB से AB’ की झुकाव अर्थात् A और B के बीच की ढाल का प्रतिनिधित्व करती है।

     ABC एक समकोण त्रिभुज है, जिसका आधार AB 2 मील है तथा लम्ब AC = 4750 फीट है।

 

    अब साधारण tan टेबुल से जिस कोण का tan मान (Value) .4481 है, उसका मान Log Table द्वारा अंशों में निकाल लिया जा सकता है।

जैसे- .44981 का tan का मान 24°12′ होता है। अर्थात् AB की ढाल 24°12′ की हुई है।

2. Metropolitan Regions (मेट्रोपोलिटन क्षेत्र)

    2. Metropolitan Regions

(मेट्रोपोलिटन क्षेत्र)



     मेट्रोपोलिटन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘महानगर’ अर्थात बड़े नगरों को ही महानगर कहा जाता है।

     भारतीय संविधान के 74वें संशोधन में महानगरीय क्षेत्र को “दस लाख या उससे अधिक की आबादी वाला क्षेत्र, जो एक या एक से अधिक नगर पालिकाओं के अंतर्गत आता हो और दो या अधिक नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायत या अन्य समीपवर्ती क्षेत्रों से मिलाकर बना हो, जिसे राज्य प्रमुख द्वारा लिखित अधिसूचना द्वारा महानगरीय क्षेत्र घोषित किया गया हो” के रूप में परिभाषित किया गया है।

      इस प्रकार भारत में दस लाख से अधिक आबादी वाले नगर महानगर कहलाता हैं। वर्तमान समय में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से महानगरीय प्रदेश का महत्त्वपूर्ण स्थान है। विश्व के प्रायः सभी देशों में देश के आर्थिक विकास में महानगरीय प्रदेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रदेश में नगर के आस-पास का क्षेत्र भी सम्मिलित रहता हैं। महानगरीय प्रदेश के विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण कारक यातायात के साधनों का विकास है। महानगरीय प्रदेश अर्थात् मेट्रोपोलिटन प्रदेशों में नगरों और उसके आस-पास के क्षेत्रों के बीच पारस्पारिक एवं अन्योनाश्रित संबंध रहता है।

     कोई भी वृहत् नगर अपने आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में फैलता जाता है। नगरों के आकार में वृद्धि होने के साथ ही नगरों के क्रिया-कलापों में भी वृद्धि होने लगती हैं। इसके बाद नगरों के बाहर 20-30 कि.मी. की परिधि में स्थित सभी गांवों और छोटे-छोटे नगरों को मिला लिया जाता हैं। इस प्रकार नगर तथा नगर के संपूर्ण सम्मिलित नगरीय तथा ग्रामीण भाग को महानगरीय (Metropolitan) प्रदेश के नाम से जाना जाता हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली NCR मेट्रोपोलिटन प्रदेश, मुम्बई मेट्रोपोटन प्रदेश, कोलकाता, चिन्नई, अहमदाबाद नगर के मेट्रापोलिटन प्रदेशों का नाम लिया जा सकता हैं।

     इस प्रदेश को नियोजन कहना अधिक उचित होगा क्योंकि संपूर्ण मेट्रोपोलिटन प्रदेश का वातावरण एक सा रहता है। अतः उसके विकास कार्य के लिए समस्त क्षेत्रों का समान रूप से विकास करने की आवश्यकता है। डिकिन्सन के शब्दों में यह महानगर प्रदेश आर्थिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण स्थान रखता हैं क्योंकि बड़े नगर आस-पास के छोटे नगरों पर अपना प्रभाव डालता है। पटना महानगर प्रदेश में स्थित दानापुर, फुलवारी, फतुहा आदि छोटे नगर प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार दिल्ली मेट्रोपोलिटन प्रदेश में स्थित रोहतक, पानीपत सोनीपत, मेरठ, गजियाबाद, बुलंदशहर, फरीदाबाद, गुड़गांव, अलबर, रिवाड़ी आदि नगर दिल्ली से प्रभावित होते हैं।

नगरीकरण की प्रवृति:

      भारत में नगरीकरण की प्रवृति में तीव्रता आयी हैं। वर्ष 1981 ई. में भारत में 12 महानगर थे जो बढ़कर 1991 ई. में 23 और 2001 में 35 और 2011 में 53 हो गये। इन महानगरों में भारत की कुल नगरीय जनसंख्या का 1991 ई. में 32.54% तथा 2001 ई. में 37. 8% 2011 में 64.4% निवास करती है। 1981-91 के बीच इसकी जनसंख्या में 67.76% जबकि 1991-2001 में 52.69% की वृद्धि हुई है। 1941-51 में यह वृद्धि 121.56% हुई थी, 1981 ई. में इन 12 महानगरों की कुल जनसंख्या 42121700 थी जबकि 1991 ई. में यह बढ़कर 23 महानगरों में 70661259 तथा 2001 ई. में 35 महानगरों में 107881836 हो गयी और अब  2011 में 53 महानगरों में 16,07,00,000 (16.07 करोड़) हो गई।

     जनसंख्या का इतनी अधिक वृद्धि के कारण नगरों में अनेक समस्याओं का जन्म हुआ साथ ही नगर नियोजन भी असफल हो गया। नगर नियोजन का मुख्य उद्देश्य नगर के पुराने क्षेत्रों की दशा सुधारना होता है, जबकि मेट्रोपोलिटन प्रदेश में नये क्षेत्रों का समावेश होता है। अतः अब महानगरों की दशा सुधारने के साथ-साथ उसके आस-पास के क्षेत्रों की, जिसे मेट्रोपोलिटन प्रदेश (Metropolitan Region) कहते हैं, दशा में सुधार लाने की आवश्यकता समझी जाने लगी है।

     महानगर के पुराने क्षेत्र तथा नगरीय प्रदेश के नये क्षेत्रों की सेवाओं और सुविधाओं में काफी अंतर दिखने लगा है क्योंकि नये विकसित क्षेत्र में सुधार की संभावनायें अधिक पायी जाती है जबकि पुराने नगर के क्षेत्रों में सुधार लाने के लिए परिवर्तन की आवश्यकता हो जाती है जो बहुत ही कठिन हो जाता है। इसके विकास के लिये कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक हैं।

1. महानगरों तथा महानगरीय प्रदेशों का योजनाबद्ध एवं सीमाबद्ध विकास कार्य किये जाय जिससे नये तथा पुराने दोनों क्षेत्रों का समुचित विकास हो सके।

2. कार्य एवं उपयोगिता के आधार पर इन प्रदेशों की भूमि का उपयोग होना चाहिए।

3. विकास के लिए पूर्व निश्चित योजना बनायी जाय।

4. गंदी बस्तियों को नहीं पनपने दिया जाय।

5. नगर तथा उस प्रदेश की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नियोजन कार्य किये जाय।

      किसी मेट्रापोलिटन प्रदेश में तीन संरचनात्मक कटिबंध (पेटी) होते हैं –

1. नगरीय क्षेत्र (Urban area)

2. ग्रामीण-नगर उपांत् (Rural-urbanfringe) तथा

3. समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र (Peripheral rural area),

      मेट्रोपोलिटन प्रदेश में नगर का विस्तार सड़क तथा रेल के किनारे तीव्र गति से होता हैं फिर भी महानगरीय सीमा का निर्धारण एक कठिन समस्या है। अनेक विद्वानों ने इस प्रदेश का सीमांकन को अलग-अलग ढंग से किया है। भारत में इस प्रदेश की जनसंख्या दस लाख से अधिक मानी गयी हैं। इसमें नगर के आस-पास जितने भी छोट-छोटे नगर हैं तथा उससे सटे गांव है, उन सभी को मिलाकर महानगर (मेट्रापोलिटन प्रदेश) कहा गया है। भारत में वर्त्तमान (2015 ई.) समय में 57 महानगर है। इन महानगरों का प्रभाव क्षेत्र की आर्थिक एवं सामाजिक विशेषताऐं भी अलग-अलग रहती हैं। जैसे-

(i) महानगरों में मकानों की भीड़ तथा ऊँचे-ऊँचे मकान रहती है।

(ii) नगरीय जीवन में भी भारी गिरावट आ जाती हैं। इतना ही नहीं, नगरों के अधिकांश भाग जल, वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से ग्रसित हो जाते हैं।

(iii) रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड, हवाई अड्‌डे तथा मुख्य बाजारों में भारी भीड़ रहती हैं।

(iv) नगरों में दिनों-दिन पानी तथा बिजली आपूर्ति की समस्या जटिल होती जाती हैं।

(v) महानगरों में मनोरंजन स्थल का अभाव होने लगता है।

(vi) भूमि तथा मकानों के दामों में तेजी से बढ़ोतरी होने लगती है।

(vii) यातायात मार्गों पर नगर उपांत की बढ़ोतरी में तीव्रता आ जाती है।

(viii) नगरों में छोड़े गये उद्योग के लिए भूमि का अतिक्रमण होना प्रारंभ हो जाता है।

(ix) सामाजिक ढांचे के बदलाव की प्रवृति होने लगती हैं। लोग अपने काम में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि उनके लिए अपने पड़ोसियों से बात करना कठिन हो जाता है। बहुत आवश्यक हुआ तो उनसे टेलिफोन पर बातें कर लेते हैं।

(x) टेलिफोन यहां की आवश्यक वस्तु हो जाती हैं तथा सभी मध्यमवर्ग के लोगों के लिए टेलिफोन सुविधा अनिवार्य हो जाती है। वर्तमान समय में टेलिफोन का स्थान मोबाइल ने ले लिया है।

(xi) नगर के मध्य भाग में आबादी का घनत्त्व बहुत रहता है। काम करने वालों में लगभग 50% लोग नगर के बाहर से अर्थात ग्रामीण नगरीय उपांत एवं ग्रामीण-नगरीय क्रमबद्धता (Rural Urban Fringe or Rural Urban Continuum) और सीमावर्ती क्षेत्र (Peripheral zone) से आते हैं, और रात में वे पुनः अपने-अपने घर लौट जाते है।

(xii) महानगरों में सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों से जनसंख्या का प्रवास तीव्र गति से होता है क्योंकि लोगों की यह धारणा रहती हैं कि नगरीय क्षेत्र में रोजगार की कमी नहीं रहती हैं।

(xiii) नगरीय सीमा के आस-पास अधिक किराया देने से बचने के लिए शयनागार (Dormitory) नगर का विकास होता है।

(xiv) महानगरों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में दिनों-दिन घटती जाती है। जबकि महानगरों से सटे छोटे नगरों में बड़े नगरों की तुलना में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि सीमावर्ती क्षेत्रों से पुरुष श्रमिकों का पलायन तीव्र गति से होता है। महिलायें घर में रहती हैं और पुरुष रोजगार की तलाश में बाहर चला जाता हैं।

(xv) अन्य नगरों की भांति महानगर भी उस प्रदेश की सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्थितियों का सही प्रतिनिधित्त्व करता है क्योंकि किसी भी महानगर का अस्तित्व महानगरीय प्रदेश के प्रभाव क्षेत्र पर निर्भर करता है जो नगर से 20-30 कि. मी. की दूरी तक चारों ओर फैला रहता हैं। महानगर ही इस प्रदेश को आर्थिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

      यहां कई छोटे-बड़े सेवा केन्द्र विकसित होते हैं। जैसे- दिल्ली महानगर के आस-पास गाजियाबाद, गुड़गांव, सोनीपत, फरीदाबाद, आदि नगरों में अनेक प्रकार के उद्योग विकसित हुए हैं। यहां के उद्योग के विकास में दिल्ली महानगर का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि दिल्ली में बाजार की सुविधा उपलब्ध हैं इसलिए आस-पास के नगरों में उद्योगों का विकास हुआ है। यही स्थिति प्रायः सभी महानगरों में तथा उसके सीमावर्ती प्रदेशों के साथ लागू होता है। यहां आवागमन की सुविधा का विकास होता है जिससे लोग कम खर्च एवं कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान तक आ जा सकते हैं। यहां झुग्गी-झोपड़ी की सख्या में भी तीव्रता से बढ़ोतरी होती है। दिल्ली से दूर-दूर तक व्यापारी लोग सामान ले जाते हैं। इसलिए दिल्ली के आस-पास के नगरों में उद्योग का विकास हुआ है।

    इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि महानगर से 20-30 कि.मी. की दूरी तक चारों तरफ महानगरीय प्रदेश (Metropolitan Region) का विस्तार रहता है, जहां से लोगों का रोजाना संपर्क बना रहता है। लोग रेल अथवा सड़क मार्ग से संपर्क बनाये रखते हैं।

    इस प्रकार महानगर तथा महानगरीय प्रदेश के बीच पारस्पारिक संबंध बना रहता है। महानगर के आस-पास से दूध, जलावन, हरी सब्जी, फल, अनाज आदि नगरों में आता है और सीमावर्ती क्षेत्र के लोग चिकित्सा, शिक्षा, मनोरंजन, बाजार आदि की सुविधा महानगरों से प्राप्त करते हैं। कुछ वर्षों में सीमावर्ती भाग महानगर में विलीन हो जाता है और पुनः महानगरीय प्रदेश का विस्तार होता है। जो महानगर जितना अधिक बड़ा होता हैं उसका महानगरीय प्रदेश भी उतना ही विकसित एवं विस्तृत होता है। महानगर के केन्द्र से जैसे-जैसे दूर जाते हैं लिंग अनुपात तथा जनसंख्या के घनत्त्व में कमी आ जाती है। महानगरीय प्रदेश में अनेक गहन कटिबंध (Zones) का विकास होता है जिसकी आर्थिक विशेषतायें अलग-अलग होती है।

    मुम्बई महानगर के आस-पास अनेक उपनगर पाये जाते हैं जहां विभिन्न प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है। इन उपनगरों से नगर में दूध, अंडा, मुर्गा, फल, सब्जी आदि भी आता है। 1991, 2001 तथा 2011 ई. में मुम्बई भारत का सबसे बड़ा नगर हो गया है। यहां 1991 ई. 35 लाख तथा 2001 ई. 56 लाख से भी अधिक जनसंख्या गंदी बस्तियों में रहती है। 20% जनसंख्या के रहने के लिए आवास नहीं है। एक लाख से अधिक लोग फुटपाथ पर रहते हैं।

      इस प्रकार महानगरीय प्रदेशों का आर्थिक महत्त्व बहुत ही अधिक है। यहां की 75% कार्यरत जनसंख्या अकृषित कार्य में लगी रहती हैं। महानगरीय प्रदेश किसी देश अथवा प्रदेश की नगरीकरण का द्योतक होता है। यह देश के आर्थिक विकास का सूचक है क्योंकि महानगरों के विकास पर औद्योगिकरण का प्रभाव पड़ता है। उद्योग वाले क्षेत्र में नगरीकरण की प्रवृति बहुत ही तीव्र रहती है। उसके साथ महानगरीय प्रदेश (Metropolitan Region) भी विकसित होता है। लोग गांवों से नगरों की ओर प्रवास करते हैं क्योंकि वहां यातायात, सुरक्षा, चिकित्सा, रोजगार, शिक्षा आदि की सुविधा रहती है। कुछ विद्वान महानगरीय प्रदेश को प्रभाव क्षेत्र (Umland) कहते हैं पर प्रभाव क्षेत्र का विस्तार बहुत अधिक दूर तक रहता है पर मेट्रोपोलिटन प्रदेश का विस्तार अपेक्षाकृत कम रहता है।

वृहत् मुम्बई (Greater Mumbai) प्रदेश (Metropolitan Region of Mumbai):-

     वृहत् मुम्बई की जनसंख्या 1991 में 12571720 थी जो बढ़कर 1995 में 151 लाख हो गयी। वर्त्तमान समय में मुम्बई का स्थान विश्व में सबसे बड़े नगरों में पांचवां है। इससे बड़ा दिल्ली महानगर है। यह भारत का एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह है। अभी देश का लगभग 42% विदेशी व्यापार इसी बंदरगाह से होता है। यह देश के सबसे अधिक विकसित वृहत् नगरीय प्रदेश है। यहाँ अधिकांश वित्तीय संस्थायें तथा बैंकों का प्रधान दफ्तर (Head Office) केन्द्रित है। इस प्रदेश में राज्य का लगभग 69.2% नगरीय जनसंख्या निवास करती है। कुल औद्योगिक श्रमिकों का 2/5वां हिस्सा इसी प्रदेश में कार्यरत है। इसकी पृष्ठभूमि भी काफी विकसित है।

    मुम्बई सात द्वीपों में फैला हुआ हैं जहां पहले किसान तथा मछुआरे रहा करते थे। प्रारंभ में इसके सातों द्वीपों को परस्पर जोड़ दिया गया था तथा दो द्वीपों के बीच समुद्र के छिछले तथा संकरे गढ्ढे को भर दिया गया था। 1853 ई. में मुम्बई तथा थाने को रेल मार्ग द्वारा जोड़ दिया गया था। भारत के पश्चिमी तट पर मुम्बई एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह है। यहां की जलवायु भी मातदिल है। दिसम्बर से फरवरी तक यहां का तापमान लगभग 20 से. रहता है तथा मार्च में मुम्बई का मौसम शुष्क हो जाता है। मई के बाद लगभग चार महीने तक वर्षा ऋतु का मौसम रहता है।

    बसीन, विरार, कल्याण, उड़ान, अरनाल, सतपती आदि मुम्बई के उपनगर है जो नगर को मछली, साग-सब्जी, दूध, अण्डे तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति करता हैं। मुम्बई नगरीय प्रदेश में प्रायः सभी उपनगर शयनागार नगरों के रूप में हैं। थाने, जो पहले उपनगर था, अब वह मुम्बई महानगर का मुख्य औद्योगिक क्षेत्र बन गया है। अतः वर्तमान समय में, महानगरीय प्रदेश में अनेक प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है। यहां से आस-पास के क्षेत्रों से कच्चा माल प्राप्त कर उद्योगों से तैयार माल देश तथा विदेशों के बाजार में भेजा जाता है। यहां रोजगार की भी सुविधा है और बाजार की भी है। इस प्रदेश में धन का भी अभाव नहीं है। इसलिए यह देश के महत्त्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है।

     मुम्बई महानगर में जनसंख्या में भी तीव्र गति से वृद्धि हुई है। कहा जाता है पुर्तगाल के समय यहां लगभग दस हजार जनसंख्या थी बाद में अंग्रेजों के समय यह संख्या बढ़कर 60 हजार हो गयी। 1901 ई. यहां की आबादी 7.7 लाख थी जो बढ़कर 1951 ई. 23.2 लाख हो गयी। जनसंख्या की वृद्धि निम्न तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है।

तालिका

वृहत् मुम्बई प्रदेश की जनसंख्या

वर्ष  जनसँख्या हजार में वृद्धि % प्रति दशक
1901 928
1911 1139 +23.8
1921 1380 +20.2
1931 1398 +1.3
1941 1801 +28.4
1951 2994 +66.2
1961 4152 +38.7
1971 5971 +43.8
1981 8243 +42.2
1991 12572 +52.5
2001 16368 +30.1
2011 18414 +30.1

       मुम्बई के आस-पास के उपनगरों की जनसंख्या में काफी वृद्धि हुई है। 1991 ई. में वृहत् मुम्बई की जनसंख्या 9910 हजार तथा 2001 ई. में 11914 हजार थी। शेष जनसंख्या इसके उपनगरों में थी। 1971 में 52% जनसंख्या नगरीय द्वीप में 28% भीतरी उपनगर में और 20% बाहरी उपनगर में थी। 1991 ई. में कुल जनसंख्या का 49% मुख्य द्वीपीय नगर में 29% भीतरी उपनगर में और 22% बाहरी उपनगर में थी। 1971 ई. में यहाँ जनसंख्या का घनत्व 13.6 हजार प्रतिवर्ग कि. मी. थी जो 1991 ई. में बढ़कर 16.4 एवं 2001 ई. 20. 3 हजार हो गयी थी। 2011 में 21000 प्रति वर्ग कि. मी. हो गयी।

     इस महाप्रदेश में लगभग 70% जनसंख्या शिक्षित है। 1981 ई. यहां प्रति 1000 पुरुष में 773 महिलायें थी जो बढ़कर 1991 ई. में 829 और 2001 में 823 हो गयी। जनसंख्या के वृद्धि के कारण यहां अनेक समस्यायें उत्पन्न हो गयी हैं। इन समस्याओं का निदान नहीं करने पर इस प्रदेश में जनसंख्या की वृद्धि अविवेक पूर्ण हो जायगी।

मुम्बई मेट्रोपोलिटन प्रदेश 3361 वर्ग कि. मी. में फैला हुआ हैं इसके उत्तर में शंसा नदी घाटी, दक्षिण में पाटल गंगा नदी, पूर्व में माठेरन पहाड़ी तथा पश्चिम में समुद्र है। यहां की जनसंख्या का 89% नगरीय है जिसमें 28 नगर और 847 गांव है। कुल मिलाकर यहां दस तहसील (तालुका) है।

      वृहत् मुम्बई में 1991 ई. में 1981 ई. की तुलना में 52.5 तथा 2001 ई. 1991 की तुलना में 30.1% जनसंख्या की वृद्धि हुई। यही वृद्धि यदि पूरे मुम्बई मेट्रोपोलिटन प्रदेश में मान ली जाय तो इस प्रदेश में जनसंख्या बहुत अधिक हो जायेगी जिसके कारण कई समस्यायें उत्पन्न होती है। जैसे-

1. मकानों की कमी तथा प्रति कमरा घनत्त्व में वृद्धि

2. औद्योगिक केन्द्रों का असमान वितरण

3. वायु एवं ध्वनि प्रदुषण में वृद्धि

4. विद्युत एवं पेयजल की आपूर्ति में कमी

5. भूमि की कीमतों में वृद्धि

6. मनोरंजन तथा खुले स्थानों की कमी

7. अभिगमनकर्त्ताओं में वृद्धि

8. हरी-पेटी के क्षेत्र में ह्रास तथा उस पर सड़क एवं मकानों का अतिक्रमण

9. नगरीय जीवन में भारी गिरावट

10. रेलवे स्टेशन, हवाई, अड्‌डा, बन्दरगाह जैसे सार्वजनिक स्थानों पर जनसंख्या का भारी जमाव

11. नगर के बाहरी क्षेत्रों में औद्योगिक केन्द्रों द्वारा भूमि का अविवेकपूर्ण अतिक्रमण

12. सामाजिक ढांचे में आपसी मेल का अभाव

13. द्रुतगामी आवागमन के साधनों में कमी

14. अपराधों में वृद्धि

15. रेल तथा सड़क दुर्घटना में वृद्धि

16. गंदी बस्तियों का विस्तार

17. पर्यावरण के संतुलन में ह्रास

     इस प्रकार मुम्बई महानगरीय प्रदेश में इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इस प्रदेश का नियोजन करना चाहिए अन्यथा प्रदेश का अनियंत्रित विकास होने पर समस्यायें विकराल रूप धारण कर सकती है जिसका समाधान संभव नहीं होगा। नगरीय जीवन स्तर बिगड़ता चला जायेगा। गंदी बस्तियां बढ़ती चली जायगी और आर्थिक एवं सामाजिक स्तर गिरता चला जाएगा। नगरीय सुविधाओं का असमान वितरण होगा।

     इन्हीं सभी दुष्परिणामों से बचने के लिये मुम्बई महानगरीय प्रदेश के नियोजन की आवश्यकता है जिससे इस प्रदेश का संतुलित विकास हो सके। इस कार्य के लिए कुछ नये कदम उठाने की आवश्यकता है। जिसमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण है।

1. बढ़ती हुई जनसंख्या के लिये नये आवास कॉलनी बनाने की आवश्यकता पर बल देना होगा।

2. औद्योगिक ईकाईयों की स्थापना प्रदेश के प्रायः सभी क्षेत्रों में करनी होगी जिससे औद्योगिक ईकाईयों के वितरण में संतुलन बना रहे। ऐसा करने से उस प्रदेश में जनसंख्या का वितरण संतुलित हो सकेगा।

3. नगर में आर्थिक क्रियाओं के विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता है जिससे जनसंख्या का खिंचाव एक जगह केन्द्रित नहीं हो बल्कि अनेक केन्द्रों की ओर आकर्षित हो।

4. अभिगमनकर्त्ताओं (Daily Commuters) की संख्या में कमी करने के लिए आर्थिक क्रियाओं का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है तथा अभिगमनकर्त्ताओं की संख्या में कमी लाने का भी प्रयास करना आवश्यक हो जाएगा। यह भी उद्योग एवं आर्थिक क्रियाओं के विकेन्द्रीकरण से ही संभव है।

5. नये बन्दरगाह का निर्माण किया जाना चाहिए जिससे जनसंख्या का संतुलित वितरण हो सके।

6. पूरे प्रदेश में नगर तथा नगरीय प्रदेश के बीच यातायात की सुविधा में विकास करने की आवश्यकता है।

7. प्रदेश में अनेक नये नगरों का विकास करना होगा जिससे जनसंख्या का संतुलित वितरण हो सके।

8. प्रदेश में मुम्बई की तरह अन्य नगरों का भी विकास करने की आवश्यकता है।

9. सामाजिक विषमता को दूर करने का भी प्रयास आवश्यक है।

10. कल्याण, कोलशेट, बालखून, खौपौली मीरा-ममडार आदि नगरों को औद्योगिक नगर के रूप में विकसित करना भी इस प्रदेश के नियोजन में शामिल किया जाना चाहिये।

11. नये बन्दरगाह बनाकर उसके पास नया मुम्बई नगर की स्थापना भी इस नियोजन में शामिल है क्योंकि इससे मुम्बई नगर पर बढ़ते दबाव को रोका जा सकता है।

    मुम्बई महानगरीय प्रदेश नियोजन के अंतर्गत नये मुम्बई नगर की (New, Mumbai) स्थापना की गयी है। यह नगर थाने की संकरी घाटी के पूर्वी किनारे पर बसायी गयी हैं। इसके एक ओर कोल्बा बेलपुर सड़क मार्ग है तथा दूसरी ओर आवासीय क्षेत्र विकसित किया गया है। मुम्बई से पूना जाने वाली सड़क मार्ग इस नगर के मध्य से जाता है जो थाने के संकरी खाड़ी पर बने पुल से होता हुआ गुजरता है। इस नये नगर के आवासीय क्षेत्र को कई सेक्टर में बांटा गया है। प्रत्येक सेक्टर में हर प्रकार की नगरीय सुविधायें उपलब्ध है।

      यहां तीन बड़े व्यापारिक क्षेत्र हैं- उत्तरी भाग, दक्षिणी भाग तथा मध्य भाग। हरी-पेटी के निकट पार्क बनाये गये हैं तथा खुला मैदान भी छोड़ दिया गया है जहां लोग शाम अथवा सुबह में खुली हवा का आनन्द ले सकते हैं। यहां न्हेवा-शेवा नाम का एक नया बंदरगाह विकसित किया गया है जिससे इस नये नगर को विकसित होने में मदद मिल सकेगी।

    प्रशासन से संबंधित कुछ कार्यालय को जो मुम्बई में स्थित था, उसे नये नगर में स्थानान्तरित किया गया है जिससे पुराने मुम्बई नगर पर जनसंख्या के दबाव को कम किया जा सके। यह नया नगर 5000 हेक्टयर भूमि में विकसित किया गया हैं जिसकी लम्बाई 20 कि. मी. है। इस नये नगर को मुम्बई नगर की तरह हर प्रकार की सुविधायें प्रदान की जाती हैं और भविष्य में भी ऐसी सुविधायें मिलती रहेगी जिससे अंर्त्तराष्ट्रीय स्तर पर भी यह नया मुम्बई नगर पुराने मुम्बई महानगर की तरह महत्त्वपूर्ण रह सकेगा।



नोट:

1. नगरीय क्षेत्र (Urban area):-

            नगरीय क्षेत्र का तात्पर्य उस सामूहिक अधिवासीय स्थल से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  में संलग्न रहती है। यहाँ पर द्वितीय एवं तृतीय कार्यों का तात्पर्य उद्योग, निर्माण, विनिर्माण, परिवहन, वाणिज्य व व्यापार एवं सेवा क्षेत्र से है।

2. ग्रामीण-नगर उपांत् (Rural-Urban Fringe):-

        “ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र” का शाब्दिक अर्थ है- नगरों की सीमाओं पर स्थित वह क्षेत्र जहाँ ग्रामीण एवं नगरीय भूदृश्य की विशेषताएँ देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में उपान्त क्षेत्र वह क्षेत्र है जो नगर और ग्रामीण बस्ती के बीच में विकसित होते हैं तथा वहाँ पर नगरीय और ग्रामीण आर्थिक-क्रियाकलाप साथ-2 चलते रहती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1942 ई० में बेहरबिन महोदय ने किया था।

           ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को ग्रामीण नगरीय सांतत्य शब्द से संबोधित किया जाता है। इस संकल्पना में बताया गया है कि नगर के केन्द्र में विशुद्ध रूप से नगरीय संस्कृति होती है लेकिन ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूर जाते हैं त्यों-2 नगरीय संस्कृति या नगरीय विशेषता में कमी आते जाती है और ग्रामीण विशेषताएँ बढ़ने लगती हैं।

              दूसरे शब्दों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र मुख्यतः दो शब्दों का संग्रह है- उसमें से एक ग्रामीण उपान्त क्षेत्र एवं दूसरा नगरीय उपान्त क्षेत्र है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण- नगरीय उपान्त अतिक्रमण क्षेत्र का प्रतीक है। यह नगर के चारों ओर एक ऐसी संक्रमण पेटी का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो पूर्णतया ग्रामीण है और न ही पूर्णतया नगरीय। इस प्रकार के संक्रमण पेटी में ग्रामीण एवं नगरीय दोनों प्रकार का वातावरण देखने को मिलता है।

3. समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र (Peripheral rural area):-

         पेरिफेरल रूरल एरिया का मतलब है, “शहर के बाहर में स्थित ग्रामीण क्षेत्र” अर्थात शहरों के बाहरी इलाके में स्थित ग्रामीण इलाकों को ही समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र कहते हैं।

भारत के 53 महानगरों की सूची:

  1. मुंबई

  2. दिल्ली

  3. कोलकाता

  4. चेन्नई

  5. बेंगलुरु

  6. हैदराबाद

  7. अहमदाबाद

  8. पुणे

  9. सूरत

  10. जयपुर

  11. कानपुर

  12. लखनऊ

  13. नागपुर

  14. इंदौर

  15. भोपाल

  16. पटना

  17. लुधियाना

  18. आगरा

  19. वाराणसी

  20. मेरठ

  21. प्रयागराज (इलाहाबाद)

  22. गाज़ियाबाद

  23. नोएडा

  24. फरीदाबाद

  25. गुरुग्राम

  26. अमृतसर

  27. जालंधर

  28. देहरादून

  29. हरिद्वार

  30. चंडीगढ़

  31. पंचकूला

  32. मोहाली

  33. श्रीनगर

  34. जम्मू

  35. रांची

  36. जमशेदपुर

  37. धनबाद

  38. बोकारो

  39. दुर्ग–भिलाई

  40. रायपुर

  41. बिलासपुर

  42. विशाखापट्टनम

  43. विजयवाड़ा

  44. गुंटूर

  45. तिरुपति

  46. कोयंबटूर

  47. मदुरै

  48. तिरुचिरापल्ली

  49. सलेम

  50. कोच्चि

  51. तिरुवनंतपुरम

  52. कोझिकोड

  53. मल्लापुरम

44. Major tribal groups of India (भारत की प्रमुख जनजातीय समूह)

  44. Major tribal groups of India

(भारत की प्रमुख जनजातीय समूह) 



       जनजातियाँ मुख्यतः वह मानव समुदाय हैं जो कि एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। सामान्य अर्थों में कहें तो जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज यहाँ तक कि देवी-देवता भी अलग होते हैं। ये प्राय: प्रकृति पूजक होते हैं।

     भारत की जनजातियाँ देश के प्राय: सभी राज्यों में फैली हुई है। अलग-अलग राज्यों में इनके रीति-रिवाज और रहन सहन भी प्राय: अलग होते हैं। जनजातियाँ, भारतीय आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के संविधान में इसके लिए अनुसूचित जनजाति (ST) शब्द का प्रयोग हुआ है, इसलिए इसके लिए कुछ विशेष प्रावधान लागू किए गए हैं।

     जनजाति, भारत के आदिवासियों के लिए इस्‍तेमाल होने वाला एक वैधानिक शब्द भी है तो दूसरी ओर, इन्हें अन्य कई नामों से भी जानते है जैसे- आदिवासी, आदिम-जाति, वनवासी, प्रागैतिहासिक, असभ्य जाति, असाक्षर, निरक्षर तथा कबीलाई समूह इत्यादि।

मुख्य प्रजातीय विभाजन:

     प्रजातीय विशेषताओं के आधार पर, गुहा (1935) का मानना है कि वे निम्नलिखित तीन प्रजातियों से संबंधित हैं।

(i) मोगोलोइड्स

      उत्तर एल्पाइन या मंगोलियन गोल सिर के होते हैं। इनके बाल सीधे और चपटे, चेहरा और जबड़ा नतोदर होता है। नाक पतली और संकरी, रंग हल्का पीला-सा खुमानी रंग का होता है। ये विशेषताएं भोटिया (मध्य हिमालय), वांचू (अरुणाचल प्रदेश), नागा (नागालैंड), खासी (मेघालय), आदि के बीच पाई जाती हैं।

(ii) प्रोटो ऑस्ट्रलॉयड्स

    इस प्रजाति का सिर लम्बा और उभरा हुआ होता है। बाल पूर्णतः घुंघराले और त्वचा का रंग गहरे काले से लेकर कत्थई तथा हल्का पीला होता है। जबड़े कुछ निकले हुए और नाक साधारण रूप से चौड़ी होती है। ये विशेषताएं गोंड (मध्य प्रदेश), मुंडा (छोटानागपुर), हो (झारखंड) आदि में पाई जाती है।

(iii) नेग्रिटो

      इस प्रजाति का रंग लाल चाकलेटी से लेकर काला कत्थई तक होता है। इनका डील-डौल नाटा (5 फुट से कम) होंठ काफी मोटे, नाक चौड़ी और चपटी होती है। इनके बाल चपटे, फीते के समान और घने होते हैं। वे आपस में लिपटकर गांठ का निर्माण करते हैं। इनमें जबड़े और दांत आगे निकले होते हैं। इस समय कुछ ही हजार नीग्रिटो जीवित हैं। उनमें अन्य जातियों के रक्त का मिश्रण हो गया है। ये विशेषताएं कादर (केरल), ओंगे (लिटिल अंडमान), जारवा (अंडमान द्वीप) आदि के बीच पाई जाती हैं।

जनजातियों का भौगोलिक वितरण

     वर्तमान समय में भी भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक जनजातियों के साथ-साथ संस्कृति का विविधीकरण भी देखने को मिलता है। सम्पूर्ण भारत में जनजातियों की वास्तविक स्थिति उनके भौगोलिक वितरण को समझकर आसानी से लिया जा सकता है।

     भौगोलिक आधार पर भारत की जनजातियों को विभिन्न भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(i) उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र:-

            उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय के तराई क्षेत्र, उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड तथा पूर्वोत्तर के सभी राज्य इस क्षेत्र में आते हैं। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से बकरवाल, गुर्जर, थारू, बुक्सा, राजी, जौनसारी, शौका, भोटिया, गद्दी, किन्नौरी, गारो, खासी, जयंतिया इत्यादि जनजातियाँ निवास करती हैं।

(ii) मध्य क्षेत्र:-

        मध्य क्षेत्र प्रायद्वीपीय भारत के पठारी तथा पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। मध्य प्रदेश, दक्षिण राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा आदि राज्य इस क्षेत्र में आते हैं जहाँ मुख्यतः भील, गोंड, रेड्डी, संथाल, हो, मुंडा, कोरवा, उरांव, कोल, बंजारा, मीणा, कोली आदि जनजातियाँ रहती हैं।

(iii) दक्षिण क्षेत्र:-

           दक्षिणी क्षेत्र के अंतर्गत कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्य आते हैं जहाँ मुख्य रूप से टोडा, कोरमा, गोंड, भील, कडार, इरुला आदि जनजातियाँ बसी हुई हैं।

(iv) द्वीपीय क्षेत्र:-

        द्वीपीय क्षेत्र में अंडमान एवं निकोबार की जनजातियाँ आती हैं। जहाँ मुख्य रूप से सेंटिनलीज, ओंग, जारवा, शोम्पेन इत्यादि।

भारत की जनजातीय जनसँख्या

       भारत में अनुसूचित जनजातियों (ST) की जनसँख्या 10.42 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 8.6% है। भारत में जनजातीय जनसंख्या अलग-अलग हिस्सों में फैली हुई है। देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कई इलाकों में आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं।

    भारत में अधिकतम जनजातीय जनसँख्या वाले पाँच राज्य है-

(i) मिजोरम (जनसंख्या का 94.4%)

(ii) लक्षद्वीप (94%)

(iii) नागालैंड (86.5%)

(iv) मेघालय (86.1%)

(v) अरुणाचल प्रदेश (68.79%)

      इसके अलावा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, असम और पश्चिम बंगाल में भी महत्वपूर्ण जनजातीय बस्तियाँ हैं। 

भारत में पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियाँ

      भारत की सबसे अधिक ज्ञात जनजातियों में गोंड, भील, संथाल, मुंडा, गारो, खासी, अंगामी, भूटिया, चेंचू, कोडाबा और ग्रेट अंडमानी जनजातियाँ शामिल हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, इन सभी जनजातियों में, भील आदिवासी समूह,  भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। यह देश की कुल अनुसूचित जनजातीय आबादी का करीब 38% है।

      नीचे राज्य और उनमें निवास करने वाले जनजातियों के समूहों के बारे में जानकारी दी जा रही है-

 राज्य  निवास करने वाली प्रमुख जनजातियाँ
झारखण्ड संथाल, असुर, बैगा, बन्जारा, बिरहोर, गोंड, हो, खरिया, खोंड, मुंडा, कोरवा, भूमिज, मल पहाडिय़ा, सोरिया पहाडिय़ा, बिझिया, चेरू लोहरा, उरांव, खरवार, कोल, भील।
बिहार  बैंगा, बंजारा, मुण्डा, भुइया, खोंड।
मध्य प्रदेश   भील, मिहाल, बिरहोर, गडावां, कमार, नट।
उड़ीसा बैगा, बंजारा, बड़होर, चेंचू, गड़ाबा, गोंड, होस, जटायु, जुआंग, खरिया, कोल, खोंड, कोया, उरांव, संथाल, सओरा, मुन्डुप्पतू।
मेघालय  खासी, जयन्तिया, गारो।
अरुणाचल प्रदेश अबोर, अक्का, अपटामिस, बर्मास, डफला, गालोंग, गोम्बा, काम्पती, खोभा मिसमी, सिगंपो, सिरडुकपेन।
असम व नगालैंड बोडो, डिमसा गारो, खासी, कुकी, मिजो, मिकिर, नगा, अबोर, डाफला, मिशमिस, अपतनिस, सिंधो, अंगामी।
तमिलनाडु टोडा, कडार, इकला, कोटा, अडयान, अरनदान, कुट्टनायक, कोराग, कुरिचियान, मासेर, कुरुम्बा, कुरुमान, मुथुवान, पनियां, थुलया, मलयाली, इरावल्लन, कनिक्कर,मन्नान, उरासिल, विशावन, ईरुला।
कर्नाटक  गौडालू, हक्की, पिक्की, इरुगा, जेनु, कुरुव, मलाईकुड, भील, गोंड, टोडा, वर्ली, चेन्चू, कोया, अनार्दन, येरवा, होलेया, कोरमा।
आंध्र प्रदेश चेन्चू, कोचा, गुड़ावा, जटापा, कोंडा डोरस, कोंडा कपूर, कोंडा रेड्डी, खोंड, सुगेलिस, लम्बाडिस, येलडिस, येरुकुलास, भील, गोंड, कोलम, प्रधान, बाल्मिक।
छत्तीसगढ़ कोरकू, भील, बैगा, गोंड, अगरिया, भारिया, कोरबा, कोल, उरांव, प्रधान, नगेशिया, हल्वा, भतरा, माडिया, सहरिया, कमार, कंवर।
त्रिपुरा  लुशाई, माग, हलम, खशिया, भूटिया, मुंडा, संथाल, भील, जमनिया, रियांग, उचाई।
जम्मू-कश्मीर गुर्जर, भरवर वाल।
गुजरात कथोड़ी, सिद्दीस, कोलघा, कोटवलिया, पाधर, टोडिय़ा, बदाली, पटेलिया।
उत्तर प्रदेश बुक्सा, थारू, माहगीर, शोर्का, खरवार, थारू, राजी, जॉनसारी।
उत्तरांचल भोटिया, जौनसारी, राजी।
महाराष्ट्र  भील, गोंड, अगरिया, असुरा, भारिया, कोया, वर्ली, कोली, डुका बैगा, गडावास, कामर, खडिया, खोंडा, कोल, कोलम, कोर्कू, कोरबा, मुंडा, उरांव, प्रधान, बघरी।
पश्चिम बंगाल होस, कोरा, मुंडा, उरांव, भूमिज, संथाल, गेरो, लेप्चा, असुर, बैगा, बंजारा, भील, गोंड, बिरहोर, खोंड, कोरबा, लोहरा।
हिमाचल प्रदेश गद्दी, गुर्जर, लाहौल, लांबा, पंगवाला, किन्नौरी, बकरायल।
मणिपुर  कुकी, अंगामी, मिजो, पुरुम, सीमा।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह औंगी आरबा, उत्तरी सेन्टीनली, अंडमानी, निकोबारी, शोपन।
केरल  कडार, इरुला, मुथुवन, कनिक्कर, मलनकुरावन, मलरारायन, मलावेतन, मलायन, मन्नान, उल्लातन, यूराली, विशावन, अर्नादन, कहुर्नाकन, कोरागा, कोटा, कुरियियान,कुरुमान, पनियां, पुलायन, मल्लार, कुरुम्बा।
पंजाब गद्दी, स्वागंला, भोट।
राजस्थान मीणा, भील, गरसिया, सहरिया, सांसी, दमोर, मेव, रावत, मेरात, कोली।
सिक्किम लेपचा।

भारत की जनजातियों के प्रमुख समस्याएँ

        भारत की जनजातियों में आदिम विशेषताएं, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े समुदाय से संपर्क में संकोच और पिछड़ापन की प्रमुख मुद्दे है। परिणामस्वरूप, उन्हें अपने सम्पूर्ण जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

      भारत में जनजातीय समस्याएँ निम्नलिखित है:-

(i) सामाजिक समस्याएँ:-

      सामाजिक समस्याओं की बात की जाय तो ये आज भी सामाजिक संपर्क स्थापित करने में अपने-आप को सहज नहीं पाते हैं। इस कारण ये सामाजिक-सांस्कृतिक अलगाव, भूमि अलगाव, अस्पृश्यता की भावना महसूस करती हैं। 

(ii) धार्मिक समस्याएँ:-

      धार्मिक अलगाव भी जनजातियों की समस्याओं का एक बहुत बड़ा पहलू है। इन जनजातियों के प्राय: अपने अलग देवी-देवता होते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है समाज में अन्य वर्गों द्वारा इनके प्रति छुआछूत का व्यवहार रखना। अगर हम थोड़ा पीछे जायें तो पाते हैं कि इन जनजातियों को अछूत तथा अनार्य मानकर समाज से बेदखल कर दिया जाता था, सार्वजनिक मंदिरों में प्रवेश तथा पवित्र स्थानों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था। आज भी इनकी स्थिति ले-देकर यही है।

(iii) शैक्षिक समस्याएँ:-

        आज भी जनजातीय समुदायों का एक बहुत बड़ा वर्ग निरक्षर है जिससे ये आम बोलचाल की भाषा को समझ नहीं पाती हैं। सरकार की कौन-कौन सी योजनाएँ इनके लिये हैं इसकी जानकारी तक इनको नहीं हो पाती है जो इनके शैक्षिक रूप से पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण है। 2001 से 2011 तक, ST के लिए साक्षरता दर में 11.86 प्रतिशत अंक और पूरी आबादी के लिए 8.15 प्रतिशत अंक की वृद्धि देखने को मिला है।

(iv) स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ:-

         स्वास्थ्य सेवा के मामले में जनजातीय आबादी के बीच संदिग्ध मुद्दे हैं। सबसे कमजोर कड़ी अनुसूचित जनजातियों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ हैं। अनुसूचित क्षेत्रों में काम करने के लिए इच्छुक, प्रशिक्षित और सुसज्जित स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की कमी जनजातीय आबादी को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण बाधा है। अनुसूचित क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में डॉक्टरों, नर्सों, तकनीशियनों और प्रबंधकों के बीच कमी, रिक्तियाँ, अनुपस्थिति या उदासीनता है।

     स्वास्थ्य क्षेत्र में नीतियों को आकार देने, योजना बनाने या सेवाओं को लागू करने में अनुसूचित जनजातियों के लोगों या उनके प्रतिनिधियों की भागीदारी का लगभग पूर्ण अभाव, अनुसूचित क्षेत्रों में अनुचित तरीके से डिजाइन किए गए और खराब तरीके से संगठित और प्रबंधित स्वास्थ्य सेवा के कारणों में से एक है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) जैसे चिकित्सा बीमा कवरेज अनुसूचित क्षेत्रों में बहुत कम हैं। इसलिए, जनजातीय लोग भयावह और गंभीर बीमारियों के प्रति सुरक्षा के बिना रहते हैं। जनजातीय लोगों में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 44 से 74 के बीच होने का अनुमान है।

(v) आर्थिक समस्याएँ:-

       इनके आर्थिक रूप से पिछड़ेपन की बात की जाए तो इसमें प्रमुख समस्या गरीबी तथा ऋणग्रस्तता है। आज भी जनजातियों के समुदाय का एक बड़ा तबका ऐसा है जो दूसरों के घरों में काम कर अपना जीवनयापन कर रहा है। माँ-बाप आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं पाते हैं तथा पैसे के लिये उन्हें बड़े-बड़े व्यवसायियों या दलालों को बेच देते हैं। बच्चे या तो समाज के घृणित से घृणित कार्य को अपनाने हेतु विवश हो जाते हैं या तो उन्हें मानव तस्करी का सामना करना पड़ता है।

      रही बात लड़कियों की तो उन्हें अमूमन वेश्यावृत्ति जैसे घिनौने दलदल में धकेल दिया जाता है। दरअसल जनजातियों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण उनका आर्थिक रूप से पिछड़ापन ही है जो उन्हें उनकी बाकी सुविधाओं से वंचित करता है।

(vi) तम्बाकू और शराब का सेवन:-

    एक्सा कमेटी रिपोर्ट 2014 के आंकड़ों से स्पष्ट पता चलता है कि 15 से 54 वर्ष की आयु के पुरुष काफी अधिक मात्रा में तम्बाकू का सेवन करते हैं, या तो धूम्रपान करते हैं या चबाते हैं। जनजातियों के लगभग 72 % और गैर-जनजातियों के 56 % लोगों में तम्बाकू का सेवन प्रचलित था।

    नशाखोरी ने इन आदिवासियों के पारिवारिक आर्थिक एवं सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है। प्रत्येक आदिवासी परिवार त्योहार, विवाह आदि उत्सवों पर खूब शराब, गांजा, भांग व अन्य नशीले पदार्थ का सेवन करते है। शराब पीने से उनकी आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो जाती है।

(vii) गरीबी और ऋणग्रस्तता:-

      अधिकांश जनजातियाँ गरीब हैं। जनजातियाँ अल्पविकसित तकनीक पर आधारित कई तरह के सरल व्यवसायों में संलग्न हैं। अधिकांश व्यवसाय प्राथमिक व्यवसाय हैं जैसे- शिकार करना, लकड़ी इकट्ठा करना और कृषि करना। 

     विभिन्न जनजातियों के 60 प्रतिशत से अधिक परिवार किसी न किसी रूप में ऋणग्रस्त हैं। जन्म, मृत्यु, विवाह, सामूहिक भोज जैसे अवसरों के लिए ली गई ऋण की राशि द्वारा जनजातीय लोग भारत की सांस्कृतिक धरोहर जनजातियाँ अपने दायित्वों को पूरा करते हैं। यद्यपि सरकार की विभिन्न संस्थाओं आई.टी.डी.ए., सहकारी समितियों, बैंकों व जनजातीय कल्याण विभाग द्वारा नाममात्र के ब्याज पर ऋण की सुविधा उपलब्ध कराई गई है किन्तु अशिक्षा, अज्ञानता के कारण जनजातीय लोग अपनी जनजाति या महाजनों से ही ऋण लेना पंसद करते हैं। ऋणग्रस्तता के लिए निम्न कारण उत्तरदायी हैं-

⇒ नई वन नीति के कारण वन सम्पदा के उपयोग से वंचित,

⇒ जनजातीय कृषि भूमि का छोटा आकार व अनुपजाऊ होना,

⇒ उत्पादित वस्तुओं का उचित मूल्य प्राप्त ना होना,

⇒ खेतिहर मजदूरों की संख्या में वृद्धि होना,

⇒ मद्यपान व आय से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति,

⇒ ऋण लेने के लिए सरकारी संस्थाओं की अपेक्षा स्थानीय महाजनों पर निर्भरता।

     ऋणग्रस्तता की समस्या के कारण जनजातीय समाज का निरंतर विघटन हो रहा है क्योंकि गरीबी के कारण उचित मात्रा में भोजन का अभाव अनेक रोगों को जन्म देता है। साथ ही चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव होने के कारण बच्चों को शिक्षा प्राप्त नहीं होती। बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी और कृषि भूमि से बेदखल होने की समस्याएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं।

यातायात के साधनों का अभाव:-

     अधिकांश जनजातियाँ पहाड़ों, जंगलों और दूरवर्ती दुर्गम क्षेत्रों में निवास करती हैं जहां उनका अन्य लोगों से सम्पर्क नहीं हो पाता क्योंकि आवागमन के साधनों का अभाव है। अतः उन्हें जीवनयापन के उचित अवसर उपलब्ध नहीं होते हैं।

वन सम्पदा पर रोक:-

     जनजातीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की वन सम्पदा जैसे कीमती लकड़ी, फल-फूल, जड़ी-बूटियाँ, चाय बागान आदि प्रचुरता में उपलब्ध हैं जिनके कारण अनेक उद्योगों का विकास हुआ किन्तु इसका दुष्प्रभाव दो रूपों में पड़ा। बाह्य लोगों जैसे व्यापारी, महाजन, ठेकेदार, प्रशासक, पुलिस अधिकारियों के साथ समायोजन व्यवहार की समस्या तथा इनकी गरीबी व अशिक्षा का लाभ उठाकर बाह्य लोगों द्वारा इनका शोषण किया गया।

प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर रोक:-

      ब्रिटिश शासन से पूर्व ये जनजातियां राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र इकाइयां थीं। वन खनिज संपदा पर इनका एकाधिकार था किन्तु अंग्रेजों द्वारा सम्पूर्ण देश में एक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित कर जनजातियों के अधिकार सीमित कर दिए गए और प्राकृतिक सम्पदा के उपभोग पर रोक लगा दी गई। नई प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था से संतुलन बनाने में जनजातीय समाज को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

धर्म परिवर्तन की समस्या:-

     ब्रिटिश शासनकाल में ही ईसाई मिशनरियों द्वारा उनके विकास, कल्याण के नाम पर आर्थिक प्रलोभन देकर उनका धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनाया गया जिसके फलस्वरूप अनेक आर्थिक व परसंस्कृति ग्रहण सम्बम्धी समस्याओं का विकास हुआ। मजूमदार तथा मदन के अनुसार भारतीय जनजातियों की अधिकांश समस्याएं उनके भौगोलिक पृथक्करण और नए सांस्कृतिक सम्पर्क का परिणाम हैं।

जनजातियों के उत्थान के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदम

       भारतीय संविधान में जहाँ एक ओर अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है तो वहीं दूसरी ओर, अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध भी है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के अंतर्गत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे।    

      जनजातियों के उत्थान के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं-

शिक्षा

(i) एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) की स्थापना करके दूर-दराज के इलाकों में आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही है।

(ii) अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति (पीएमएस) और राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप जैसी योजनाएँ चलाई जा रही हैं।

(iii) आदिवासी क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की जाती है।

आर्थिक विकास

(i) जनजातीय उत्पादन के विपणन को बढ़ावा दिया जाता है।

(ii) प्रधानमंत्री पीवीटीजी (Particularly Vulnerable Tribal Groups) विकास मिशन के तहत, कमजोर जनजातीय समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का काम किया जाता है।

सामुदायिक स्थिरता

(i) आदिवासी भूमि और संस्कृतियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।

(ii) आदिवासी उप-योजना क्षेत्रों में आश्रम स्कूलों की स्थापना की जाती है।

(iii) आदिवासी महिलाओं और लड़कियों में साक्षरता के स्तर में अंतर को कम करने का काम किया जाता है।

     इनके अलावा, ग्राम पंचायतों और लोकसभाओं, विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण का भी प्रावधान किया गया है। 

1. Problem regions: Hilly regions (समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)

 1. Problem regions: Hilly regions

(समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)



परिचय:-

     पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी समस्याएँ उत्पन्न होते हैं जो कि मैदानी क्षेत्रों की समस्याओं से अलग और विशिष्ट होते हैं। पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो गया है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव ने कई तरह से तनाव और दबाव पैदा किया है और हालात ऐसे चरण में पहुँच रहे हैं जहाँ गंभीर उपायों की आवश्यकता है। सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक विविधताओं के अलावा भूभाग की विविधताओं के कारण नियोजन की पूरी तरह से अलग पद्धति तैयार करने की आवश्यकता है।

     देश के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट विकास रणनीतियों के निर्माण के लिए बुनियादी पूर्व शर्त के रूप में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं, संसाधन संपदा (मानव और भौतिक दोनों), विकास क्षमता और उनकी विशेष समस्याओं के बारे में विस्तृत जानकारी की आवश्यकता होती है।

      पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम के मार्गदर्शक सिद्धांत बुनियादी जीवन समर्थन प्रणाली को बढ़ावा देने और समग्र परिप्रेक्ष्य में भूमि, जल, खनिज और जैविक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग (पहाड़ी और मैदानी दोनों के हितों पर विचार करते हुए) पर आधारित हैं। पूरी रणनीति लोगों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में उनकी सक्रिय भागीदारी पर केंद्रित होनी चाहिए। “सामाजिक बाड़बंदी” का तात्पर्य स्थानीय स्तर पर समाज के संसाधनों के प्रबंधन में स्वैच्छिक और स्व-लगाए गए अनुशासन से है।

पहाड़ी क्षेत्र:-

     भारत में पहाड़ी क्षेत्र देश के कुल भू-भाग का लगभग 17% हिस्सा हैं। ये क्षेत्र मोटे तौर पर दो श्रेणियों में आते हैं:-

(i) वे क्षेत्र जो राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं के साथ-साथ विस्तृत हैं, और

(ii) वे जो राज्य का हिस्सा बनते हैं।

     पहली श्रेणी में उत्तर पूर्वी क्षेत्र के राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। इन्हें “विशेष श्रेणी के राज्य” कहा जाता है, जिनके व्यय को केंद्रीय सहायता से पूरा किया जाता है। उत्तर पूर्वी क्षेत्र के इन पहाड़ी राज्यों के एकीकृत विकास के लिए, केंद्र सरकार ने संसद के एक अधिनियम द्वारा 1971 में उत्तर पूर्वी पहाड़ी परिषद” की स्थापना की है।

     परिषद अपनी विकास योजना के तहत एक से अधिक राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों और पूरे क्षेत्र के लिए समान हित की योजनाओं को आगे बढ़ाती है। इसने बिजली उत्पादन, सड़कों के निर्माण, कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन आदि के अंतर-क्षेत्रीय कार्यक्रमों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह अनुसंधान और प्रयोगात्मक परियोजनाओं का भी समर्थन करता है।

      असम, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में उप-हिमालयी क्षेत्र में बड़े मिश्रित राज्य का हिस्सा बनने वाले पहाड़ी क्षेत्र हैं। इनमें असम के कार्बी आंगलोंग और उत्तरी कैचर जिले (15,200 वर्ग किमी), पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले (2400 वर्ग किमी) और उत्तराखंड के देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, चमोली, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल जिले (51,100) वर्ग किमी शामिल हैं।

    अन्य महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र पश्चिमी घाटों तक फैले हुए हैं, जिनमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल (1,34,500 वर्ग किमी) के 132 तालुका शामिल हैं। यहाँ उप-योजना की अवधारणा की शुरूआत से पहले विकास कार्यक्रमों के लिए केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

प्रमुख समस्याएँ:-

(i) वनों की कटाई,

(ii) मिट्टी का कटाव,

(iii) बाढ़ का खतरा,

(iv) कम उत्पादकता,

(v) वन आधारित उत्पादों में कमी,

(vi) भूमि-जल प्रबंधन का अभाव और

(vii) बढ़ती गरीबी।

पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान कार्यक्रम:-

(i) 5वीं पंचवर्षीय योजना- उपयोजना अवधारणा की शुरुआत

(ii) छठी पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी और विकास

(iii) 7वीं पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी विकास, पारिस्थितिकी संरक्षण

(iv) 8वीं पंचवर्षीय योजना- आधुनिक कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग, भूमि-जल संसाधन, लोगों की भागीदारी

     इन पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की है। हालांकि, दूसरी पंचवर्षीय योजना के बाद से केंद्रीय सहायता की आवश्यकता महसूस की गई है। पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (एचएडीपी) के लिए केंद्रीय सहायता 5वीं पंचवर्षीय योजना के बाद से क्षेत्र और जनसंख्या को समान महत्व देते हुए घटक राज्यों को दी जा रही है।

    विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) गाडगिल फार्मूले के अनुसार विनियमित पहाड़ी क्षेत्रों के बीच आवंटित की जा रही है।

गाडगिल फार्मूला (1969-70):

      गाडगिल फार्मूला, वर्ष 1969 में धनंजय रामचंद्र गाडगिल ने तैयार किया था। इस फार्मूले के तहत भारत में राज्यों को योजनाओं के लिए केंद्र सरकार से सहायता राशि मिलती है। इसका इस्तेमाल 4थी और 5वीं पंचवर्षीय योजनाओं में किया गया था

      गाडगिल फार्मूला के तहत राज्यों को सहायता राशि देने का तरीका:

(i) 60 % राशि जनसंख्या के आधार पर दी जाती है।

(ii) 10 % राशि टैक्स एफर्ट के आधार पर दी जाती है।

(iii) 10 % राशि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर दी जाती है।

(iv) 10 % राशि राज्य की खास समस्याओं के आधार पर दी जाती है।

(v) 10 % राशि सिंचाई और बिजली परियोजनाओं के लिए दी जाती है।

संशोधित गाडगिल फॉर्मूला (1980):   

     संशोधित गाडगिल फार्मूला, राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) ने अगस्त 1980 में मंजूरी प्रदान की थी। यह फार्मूला छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) से लेकर सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) तक आवंटन का आधार बना। वर्ष 1990-91 में वार्षिक योजना के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया।

     संशोधित गाडगिल फार्मूला में ये बदलाव किए गए थे:

(i) 55% जनसंख्या के आधार पर

(ii) 25% PCI (प्रति व्यक्ति कर संग्रहण) के आधार पर

(iii) 5% राजकोषीय प्रबंधन के आधार पर।

(iv) 15% विशेष विकास समस्याओं के आधार पर।

योजना और कार्यक्रम:-

   पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, बागवानी, कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, वानिकी, मृदा संरक्षण और उपयुक्त ग्राम उद्योगों के विकास के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए कार्यक्रमों के माध्यम से पहाड़ियों के स्वदेशी संसाधनों के दोहन पर पर्याप्त जोर देते हैं। मुख्य रूप से उन गतिविधियों के पैकेज पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जिन्हें स्थानीय लोगों द्वारा अवशोषित किया जा सकता है। सहकारी समितियों या किसान समितियों को बहुत महत्व दिया गया है।

कार्यक्रम:-

(i) भूमि क्षरण को रोकना और फसल उत्पादकता बढ़ाना और भूमि जोतों का समेकन करना।

(ii) जनसंख्या नियंत्रण उपाय- परिवार नियोजन कार्यक्रम।

(iii) पूंजी और भौतिक योजनाओं की निगरानी के माध्यम से विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में सुधार करना।

(iv) स्थानीय स्व-निकायों और अन्य के माध्यम से वनरोपण।

(v) कृषि-जलवायु क्षेत्रों, मिट्टी की उपयुक्तता परीक्षण के माध्यम से कृषि प्रथाओं में सुधार।

(vi) झूमियों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए हैं- झूम खेती को रोकने और उन्हें स्थायी कृषि प्रथाओं में पुनर्वासित करने के लिए।

(vii) रबड़ और कॉफी के बागान विकसित करने तथा ऐसे बागानों में झुमियों का पुनर्वास करने के लिए कृषि को प्रोत्साहित किया गया है।

(viii) पशुधन, चारागाह और वन की उपलब्धता को देखते हुए पशुपालन/पशुधन को प्रोत्साहित किया गया है।

(ix) कार्यक्रमों में वैज्ञानिक प्रजनन दृष्टिकोण, मजबूत सुरक्षात्मक और उपचारात्मक पशु स्वास्थ्य कवर तथा उत्पाद का प्रसंस्करण और विपणन भी शामिल है।

(x) वानिकी कार्यक्रमों में, बागान (कॉफी, चाय, मसाले आदि), कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी जैसे वानिकी उत्पादन पर जोर दिया गया है।

(xi) बागवानी कार्यक्रम में, बागों (सेब, अंगूर और केला) के विकास और उनके विपणन पर जोर दिया गया है।

(xii) पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे उद्योग विकसित किए जा सकते हैं, जिनमें प्रदूषण रहित वातावरण, उच्च कौशल और उच्च मूल्य संवर्धन पर आधारित ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है- इलेक्ट्रॉनिक्स, घड़ी निर्माण, ऑप्टिकल ग्लास, फर्नीचर, दवाएँ और औषधियाँ। कालीन निर्माण और हथकरघा जैसे कुटीर उद्योग भी उपयुक्त गतिविधियाँ हैं।

(xiii) ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों का विकास।

(xiv) परिवहन और संचार के साधनों का विकास।

(xv) सुरक्षित उत्खनन और खनन।

(xvi) पर्यटन सबसे महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है, जिसका समुचित विकास किया जाना चाहिए।

(xvii) जैवमंडल रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के माध्यम से मूल्यवान वनस्पतियों और जीवों की प्रस्तुति के लिए एक एकीकृत रणनीति बनाई जानी चाहिए।

(xviii) पर्यावरण संबंधी मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए गतिविधियों में लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया जाना चाहिए।

(xix) पहाड़ी क्षेत्रों में कोई भी गतिविधि करते समय पारिस्थितिकी संरक्षण को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक पेपर प्रोजेक्ट में वनरोपण की लागत शामिल होनी चाहिए और इसके अनुसार इसकी आर्थिक व्यवहार्यता निर्धारित की जानी चाहिए।

(xx) पहाड़ी क्षेत्रों की वैज्ञानिक योजना के लिए उपलब्ध संसाधनों-मिट्टी, पानी, खनिज, वनस्पति आदि के बारे में जानकारी आरएस और जीआईएस के माध्यम से प्राप्त की जानी चाहिए।

(xxi) पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम लाभ प्राप्त करने और संबंधित क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकास रणनीतियों को अपनाना होगा।

सिफारिशें:-

1. विकासात्मक क्षेत्र:

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्राकृतिक संसाधन दोहन और संरक्षण के बीच संतुलन उत्तरार्द्ध के पक्ष में होना चाहिए। उपयुक्त गतिविधियों के लिए क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए जैसे कि:-

(i) बर्फ, अल्पाइन, उप-अल्पाइन क्षेत्रों और संरक्षित परिदृश्यों के क्षेत्रों को किसी भी कीमत पर संरक्षित किया जाना चाहिए, महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के प्रवाह को बनाए रखने और धर्म-सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान और संरक्षण करने के लिए।

(ii) सभी प्राकृतिक जल क्षेत्रों (ग्लेशियर, नदियाँ, झीलें और झरने) को सख्ती से संरक्षित किया जाना चाहिए। किसी भी क्षेत्र में ऐसी गतिविधियाँ जो किसी भी तरह से प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक झरने हैं, उन्हें “स्प्रिंग अभयारण्य” में परिवर्तित किया जाना चाहिए और इस अवधारणा को सभी नियोजन में शामिल किया जाना चाहिए।

(iii) वन क्षेत्र को पर्यावरण सेवाओं और जैव विविधता मूल्यों के लिए संरक्षित और संवर्धित किया जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र टिकाऊ जैव और Non-timber forest products (NTFPs) के लिए भी उपलब्ध होने चाहिए, जिसमें बांस, पूर्वेक्षण और इको-पर्यटन शामिल हैं

(iv) निचले इलाकों में उपजाऊ नदी घाटियों के क्षेत्रों का उपयोग कृषि उत्पादन को अधिकतम करने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसे क्षेत्रों में कृषि भूमि को अन्य उपयोगों में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जिन क्षेत्रों में स्थानान्तरित या सीढ़ीनुमा कृषि की जाती है, उन्हें विशिष्ट फसलों, जैविक कृषि, बागवानी, कृषि-वानिकी तथा बेहतर प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने के लिए चिन्हित किया जाना चाहिए।

(v) घरेलू तथा लघु उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकेंद्रीकृत विद्युत उत्पादन हेतु नदी क्षेत्रों को चिन्हित किया जाना चाहिए।

2. सड़क, रेल तथा हवाई सम्पर्क: 

     टास्क फोर्स ने दो लूप रेलवे लाइनों की सिफारिश की है, एक पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के लिए जो जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को जोड़ेगी और दूसरी उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लिए। इन दो लूपों को उत्तर और पूर्वी रेलवे के मौजूदा राष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से एक दूसरे से जोड़ा जाना चाहिए।

     उपर्युक्त कार्यों को करने के लिए International Health Regulations (IHR) के सड़क नेटवर्क को उचित स्थानों पर रेल नेटवर्क से जोड़ा जाना चाहिए। सड़क नेटवर्क को हवाई सेवाओं से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि जल्दी खराब होने वाले सामान और आपातकालीन स्वास्थ्य की आवश्यकता वाले लोगों को देश के बाकी हिस्सों या बाहर तक पहुँचने के अवसर प्रदान किए जा सकें।

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्रत्येक IHR राज्य में बड़े हेलीकॉप्टरों और छोटे उड़ान भरने और उतरने वाले विमानों को स्वीकार करने के लिए कम से कम एक छोटी हवाई पट्टी होनी चाहिए।

अन्य अनुशंसाएँ:

1. पर्वतीय परिप्रेक्ष्य और संवेदनशीलता

2. शिक्षा और कौशल विकास

3. प्राकृतिक संसाधन विश्लेषण और परामर्श केंद्र

4. रणनीतिक पर्यावरण मूल्यांकन

5. वित्तीय प्रोत्साहन, पुरस्कार और छूट

6. IHR राज्यों के बीच संसाधन साझा करना

7. जलमार्ग और रोपवे

8. अपशिष्ट प्रबंधन

9. आपदा तैयारी और शमन

10. उद्योग

11. जलवायु परिवर्तन

12. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन



नोट

पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (Hill Area Development Programme):-

     पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (HADP) 5वीं पंचवर्षीय योजना में आरम्भ हुआ जिसमें  उत्तराखण्ड, मिकिर पहाड़ी और असम की उत्तरी कछार की पहाड़ियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला तथा तमिलनाडु के नीलगिरि इत्यादि को मिलाकर कुल 15 जिलों को शामिल किया गया हैं। पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए बनी राष्ट्रीय समिति ने सन् 1981 में सिफारिश किया था कि देश के उन सभी पर्वतीय क्षेत्रों को पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल कर लिया जाए जिनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक है और जिनमें जनजातीय उपयोजना लागू नहीं है।

      राष्ट्रीय समिति ने पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए जो सुझाव दिए, उनमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा गया था:-

(i) कार्यक्रम का लाभ पहाड़ी क्षेत्र के सभी लोगों तक पहुँच सके।

(ii) स्थानीय संसाधनों तथा प्रतिभाओं का विकास हो सके।

(iii) पहाड़ी लोग अपनी जीविका-निर्वाह अर्थव्यवस्था को निवेश-उन्मुखी बनाएँ व कुछ लाभ कमाना सीखें।

(iv) अन्तः प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े अर्थात् पर्वतीय क्षेत्रों का शोषण न होने पाए।

(v) पिछड़े क्षेत्रों की बाजार व्यवस्था में पर्याप्त सुधार करके श्रमिकों को लाभ पहुँचाना।

(vi) पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाए रखना।

     इस कार्यक्रम के तहत पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की योजनाएँ बनाते समय उनकी स्थलाकृति, पारिस्थितिकी व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखा गया था।

उद्देश्य:-

    इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, मृदा संरक्षण, वृक्षारोपण तथा उद्यान खेती इत्यादि का प्रशिक्षण देकर तथा उन्हें इन कार्यक्रमों में शामिल करके स्थानीय संसाधनों का दोहन करना था।

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India (भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India

(भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)



            मृदा (मिट्टी) पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिये प्राकृतिक स्रोत के रूप में पोषक तत्त्व, जल एवं अन्य खनिज लवण प्रदान करती है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जीवांश का एक मिश्रण है जो लाखों वर्षों में निर्मित हुई है।

सामान्यतः मिट्टी की कई परतें होती हैं, जिसमें सबसे ऊपरी परत में छोटे मिट्टी के कण, सड़े-गले हुए पेड़-पौधों एवं जीवों के अवशेष होते हैं। यह परत फसलों की पैदावार के लिये बहुत उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण होती है।

इस तरह मृदा शैलों के अपक्षयण व विघटन से उत्पन्न भूपदार्थों, मलवा और विविध जैव सामग्रियों का सम्मिश्रण होती है, जो पृथ्वी की सतह (भू-पर्पटी की सतह) पर विकसित होती है।

दूसरी परत महीन कणों (जैसे-चिकनी मिट्टी) की होती है, जिसके नीचे विखंडित चट्टानें एवं मिट्टी का मिश्रण होता है तथा इसके नीचे अविखंडित सख्त चट्टानें होती हैं। यह कुछ सेमी. से लेकर कई मीटर तक हो सकती हैं।

पौधों की वृद्धि सामान्यतः 6.0-7.0 pH मान वाले मृदा में होती है। इसी pH मान के मध्य पौधे अपनी सारी क्रियाएँ करते हैं। अधिक अम्लीय अथवा क्षारीय मृदा पौधों के लिये हानिकारक होती है।

ह्यूमस, खनिज तत्व, जल एवं वायु मृदा के मुख्य घटक होते हैं। इन घटकों का संयोजन (अनुपात) मृदा के प्रकार को निर्धारित करता है।

मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile):- 

     धरातल के ऊपरी सतह से जब नीचे की ओर बढ़ते हैं तो आधारभूत शैल तक मृदा के संघटकों तथा रासायनिक भौतिक गुणों में क्रमशः परिवर्तन होता जाता है। इन परिवर्तनों के आधार पर समस्त मृदामंडल को विशिष्ट स्तरों (distinct layers) में बाँटा गया है। ये स्तर ‘मृदा संस्तर’ (soil horizons) कहलाते हैं।

     ये संस्तर मोटे तौर पर मृदा-सतह के समानांतर एवं क्षैतिज अवस्था में होते हैं। मृदा के वैसे लम्बवत् खण्ड (vertical section), जिसमें मृदा के समस्त संस्तर शामिल हों, ‘मृदा परिच्छेदिका’ कहलाते हैं। मृदा परिच्छेदिका को मुख्य रूप से तीन संस्तरों में विभाजित किया जाता है:-

(i) जैविक संस्तर,

(ii) खनिज संस्तर एवं

(iii) आधार शैल संस्तर।

(i) जैविक संस्तर (Organic horizons):-

     मृदा परिच्छेदिका का सबसे ऊपरी संस्तर जैविक संस्तर कहलाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अन्य संस्तरों की तुलना में इसमें जैविक पदार्थों की बहुलता होती है। इस संस्तर को दो भागों में बाँटा जाता है:-

(क) O1 संस्तर:-

    यह सबसे ऊपरी संस्तर है जिसमें जीवित जैविक पदार्थ (वनस्पति एवं जंतु) के अलावा अनपघटित एवं आंशिक रूप से अपघटित जैविक पदार्थों की बहुलता होती है।

(ख) O2 संस्तर:-

    यह O1 के नीचे पाया जाने वाला संस्तर है। इसमें भी जैविक पदार्थों की अधिकता होती है, लेकिन ये अपघटित एवं ह्यूमस रूप में पाए जाते हैं। इसी कारण, इसे ‘ह्यूमस संस्तर’ भी कहा जाता है।

(ii) खनिज संस्तर (Mineral horizons):-

      यह जैविक संस्तर के नीचे पाया जाता है। इस संस्तर को तीन भागों में बाँटा जाता है-A संस्तर, B संस्तर एवं C संस्तर।

(क) A संस्तर:-

    यह खनिज संस्तर का सबसे ऊपरी स्तर है। इसमें सिलिकेट, एल्युमिनियम, लौह अयस्क, क्ले आदि खनिजों के साथ अल्प मात्रा में अपघटित जैविक तत्व भी पाए जाते हैं। इस संस्तर से खनिज पदार्थों का नीचे की और स्थानांतरण या अपवहन होता है, अतः इसे ‘अपवहन मंडल’ (eluviation zone) भी कहा जाता है।

(ख) B संस्तर:-

     संस्तर A से अपवहित होते खनिज पदार्थ इस संस्तर में आकर विनिक्षेपित या जमा हो जाते हैं, अतः इस संस्तर को ‘विनिक्षेपण मंडल’ (illuviation zone) भी कहा जाता है।

(ग) C संस्तर:-

     इस संस्तर में आधार शैल के ऋतुक्षरित चट्टानी टुकड़े असंगठित रूप में पाए जाते हैं। इस संस्तर को ‘अद्योस्तर संस्तर’ (subsurface horizon) एवं ‘ग्ले परत’ भी कहा जाता है।

(iii) आधार शैल संस्तर (Parent rock horizons):-

       इसे ‘D’ या ‘R’ से संबोधित किया जाता है। ऋतुक्षरण का प्रभाव यहाँ नहीं पड़ता है। अतः आधारभूत चट्टान संगठित एवं दृढ़ रूप में पायी जाती है।

     उपर्युक्त वर्णित मृदा-परिच्छेदिका एक आदर्श मृदा परिच्छेदिका का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसी परिच्छेदिका का विकास अत्यंत लम्बी अवधि के बाद तब होता है, जब मृदा-निर्माण की प्रक्रिया अपने आधार शैल क्षेत्र में ही सम्पन्न होती है। एक आदर्श मृदा-परिच्छेदिका में निम्न विशेषताएँ पाई जाती हैं:-

(i) मृदा-परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर जैविक पदार्थों (जीवित पदार्थ, मृत-अनपघटित या अपघटित पदार्थ तथा ह्यूमस) की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(ii) ऊपर से नीचे जाने पर वायु की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(iii) ऊपर से नीचे जाने पर खनिज पदार्थों की मात्रा एवं प्रकार में वृद्धि होती जाती है।

(iv) ऊपर से नीचे जाने पर जल की मात्रा में वृद्धि या हास की कोई निश्चित प्रवृत्ति (trend) नहीं पायी जाती है। किसी भी गहराई पर जल की मात्रा में ह्रास या वृद्धि हो सकती है।

Types of Soil

मृदा का प्रकार (Types of Soil)

     भारत एक विशाल देश है, जहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं। यहाँ की मिट्टी के क्षेत्रीय वितरण में असमानता का मुख्य कारण वनस्पति, उच्चावच, तापमान, वर्षा तथा आर्द्रता जैसे जलवायविक तत्त्वों में भिन्नता का होना है।

⇒ मिट्टी में पौधे एवं जंतु निरंतर सक्रिय रहते हैं, जिससे मिट्टी में परिवर्तन होता रहता है इसलिये मिट्टी को गतिशील कार्बनिक एवं खनिज पदार्थों का प्राकृतिक समुच्चय भी कहते हैं।

⇒ मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में उच्चावच, जनक सामग्री (चट्टानें), जलवायु, वनस्पति, समय इत्यादि हैं। मानवीय क्रियाएँ भी मृदा को प्रभावित करती हैं। भिन्न-भिन्न भौगोलिक वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदा पाई जाती है।जो निम्न हैं:-

1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil):-

     जलोढ़ मृदा मूलतः हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपों से या सागर द्वारा पश्चगमन (पीछे हटने) के उपरांत छोड़े गए गाद से बनी है। इसे ‘काँप मृदा’ या ‘कछारी मिट्टी’ भी कहते हैं।

⇒ भारत के उत्तरी मैदान में जलोढ़ मृदा का सर्वाधिक विकास हुआ है। इसके अतिरिक्त, तटीय मैदान एवं प्रायद्वीपीय भारत के नदी बेसिन एवं डेल्टाई भागों में भी यह मृदा पाई जाती है।

⇒ इस मिट्टी का विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किलोमीटर तक है। भारत में सबसे अधिक भू-भाग पर जलोढ़ मिट्टी ही पाई जाती है।

⇒ विभिन्न स्रोतों से प्राप्त अवसादों के निक्षेपण से इस मृदा का विकास होने के कारण अन्य मिट्टियों की अपेक्षा इसमें खनिज विविधता भी अधिक होती है, जो कृषि के लिये अधिक उपयोगी होती है। इस प्रकार की मृदा पर प्रायः गहन कृषि की जाती है।

⇒ इसमें पोटाश (सर्वाधिक मात्रा) एवं चूने की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है, जबकि फॉस्फोरस, नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की कमी होती है।

⇒ जलोढ़ मृदाएँ गठन में बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी (मृत्तिका दोमट) की प्रकृति की पाई जाती हैं।

बलुई दोमट मृदा की जलधारण क्षमता सबसे कम होती है, क्योंकि इसमें भारी मात्रा में रवे होते हैं जबकि चिकनी जलोढ़ मिट्टी में जल धारण की क्षमता सबसे अधिक होती है।

⇒ भारत में जलोढ़ मृदा के अधिकांश क्षेत्र का संबंध अर्द्ध शुष्क जलवायु प्रदेश से होने के कारण ही इनके ऊपर की परतों में क्षारीय तत्त्वों की अधिकता रहती है। इसका रंग हल्के धूसर से राख धूसर जैसा होता है जो निक्षेपण की गहराई, गठन व निर्माण में लगने वाली समयावधि पर निर्भर करता है।

⇒ सतलज-यमुना का मैदान, पंजाब, हरियाणा तथा ऊपरी गंगा के मैदान में प्राचीन जलोढ़ मिट्टी (बांगर) पाई जाती है। मध्य एवं निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ के कारण मृदा का नवीनीकरण होता है। इसे ‘नवीन जलोढ़ मृदा’ अथवा ‘खादर’ कहते हैं। गंगा के मैदानी भागों में इसकी गहराई लगभग 2,000 मीटर तक है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः गेहूँ, गन्ना, जौ, दालें, तिलहन और गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जूट की फसलें उगाई जाती हैं।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः मृदा संस्तर (Soil Profile) नहीं पाया जाता है।

⇒ जलोढ़ मृदा को सामान्यतः 4 वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) भाबर,

(ii) तराई,

(iii) बांगर,

(iv) खादर

2. लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil):-

    यह भारत की दूसरी प्रमुख मृदा है, जिसका विकास दक्कन के पठार के पूर्वी तथा दक्षिणी भाग में कम वर्षा वाले उन क्षेत्रों में हुआ है, जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें (ग्रेनाइट तथा नीस) पाई जाती हैं।

⇒ इसके अतिरिक्त पश्चिमी घाट के गिरिपद क्षेत्रों, ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भागों तथा मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी भागों में भी इस मृदा का विकास हुआ है।

⇒ प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश क्षेत्रों में इस मिट्टी का विकास होने के कारण इसे ‘मंडलीय मृदा’ भी कहते हैं।

⇒ लोहे के ऑक्साइड (मुख्यतः फेरिक ऑक्साइड) की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग लाल होता है।

⇒ इस मृदा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश एवं ह्यूमस की कमी होती है। यह स्वभाव से अम्लीय प्रकृति की होती है।

⇒ महीन कण वाली लाल व पीली मृदाएँ सामान्यतः उर्वर होती हैं, जबकि मोटे कणों वाली मृदाएँ अनुर्वर होती हैं।

⇒ लाल मृदा ऊँची भूमियों पर बाजरा, मूंगफली और आलू की खेती के लिये उपयोगी है, जबकि निम्न भूमियों पर इसमें चावल, रागी, तंबाकू तथा सब्जियों आदि की खेती की जाती है।

3. काली/रेगुर मृदा (Black/Regur Soil):-

    इस मृदा का निर्माण दरारी उद्दभेदन से निकले लावा पदार्थों (बेसाल्ट चट्टान) के विखंडन से हुआ है।

⇒ यह भारत की तीसरी प्रमुख मृदा है। इसका सर्वाधिक विकास महाराष्ट्र के ‘दक्कन ट्रैप’ के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में हुआ है। इसके अलावा यह मध्य प्रदेश के मालवा पठार, गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप, कर्नाटक के बंगलूरू-मैसूर पठार, तमिलनाडु के कोयंबटूर पठार, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना के पठार और छोटानागपुर के राजमहल पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है।

⇒ यह मिट्टी कपास की खेती के लिये अधिक उपयोगी एवं विख्यात है, इसलिये इसे ‘काली कपासी मिट्टी’ या ‘रेगुर’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त इसे ‘उष्ण कटिबंधीय चेरनोज़म’ व ‘ट्रॉपिकल ब्लैक अर्थ’ भी कहते हैं। उत्तर प्रदेश में इस मृदा को ‘करेल’ की संज्ञा दी जाती है। कपास के अतिरिक्त यह मृदा गन्ना, गेहूँ, प्याज और फलों की खेती करने के लिये अनुकूल है।

⇒ काली मृदा मृणमय, गहरी और अपारगम्य होने के कारण, गीली होने पर चिपचिपी हो जाती है तथा शुष्क होने पर इसमें बड़ी-बड़ी दरारें बन जाती हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी स्वतः जुताई हो गई है इसलिये इसे ‘स्वतः जुताई वाली मृदा’ के नाम से भी जाना जाता है।

⇒ इस मृदा की जलधारण क्षमता अत्यधिक होती है, जिसके कारण सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है। इसकी एक अन्य विशेषता यह है कि शुष्क ऋतु में भी यह मृदा अपने में नमी बनाए रखती है। यही कारण है कि शुष्क प्रदेशों में भी काली मृदा की उपस्थिति के कारण नमी आधारित फसलें उत्पादित की जाती हैं।

⇒ ह्यूमस, एल्युमीनियम एवं लोहा के टाइटेनीफेरस मैग्नेटाइट यौगिक की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग ‘काला’ होता है।

⇒ इस मिट्टी में (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व जैव तत्त्वों की मात्रा कम) होती है तथा पोटाश, एल्युमीनियम, मैग्नीशियम कार्बोनेट की पर्याप्त मात्रा) पाई जाती है।

4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil):-

     इस मृदा का विकास उन क्षेत्रों में होता है, जहाँ उच्च तापमान एवं भारी वर्षा होती है। अधिक वर्षा के कारण जल के साथ चूना और सिलिका का निक्षालन हो जाता है तथा लोहे के ऑक्साइड और एल्युमीनियम के यौगिक मृदा में शेष बचे रहते हैं।

⇒ यह साधारणतः लाल-भूरे रंग की होती है एवं मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के पर्वतों के गिरिपद क्षेत्रों में एक लंबी पट्टी के रूप में केरल (मालाबार प्रदेश), कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा के पठारी क्षेत्रों, राजमहल पहाड़ी क्षेत्रों, छोटानागपुर के पठार, असम के पहाड़ी क्षेत्रों एवं मेघालय के पठार में पाई जाती है।

⇒ उच्च तापमानों में आसानी से पनपने वाले जीवाणु, ह्यूमस की मात्रा को तीव्र गति से नष्ट या समाप्त कर देते हैं, जिसके कारण इसमें जैव पदार्थ, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और कैल्शियम की कमी होती है।

⇒ यह मृदा रबड़ और कॉफी की फसल के लिये सबसे अच्छी मानी जाती है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः चाय, कहवा, रबड़, सिनकोना, काजू, मोटे अनाजों एवं मसालों की कृषि की जाती है परंतु इसे कृषि के दृष्टिकोण से कम उपजाऊ मृदा की श्रेणी में रखते हैं।

⇒ यह मृदा सूखने के बाद बहुत कड़ी तथा पथरीली हो जाती है, इसलिये लैटेराइट मृदा का प्रयोग मकान निर्माण के प्रयोग में आने वाले ‘ईंटों’ के निर्माण में भी किया जाता है।

5. पर्वतीय मृदा (Hilly Soil):-

    हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी भाग तथा प्रायद्वीपीय भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा के निर्माण पर पर्वतीय पर्यावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। पर्वतीय पर्यावरण में परिवर्तन के अनुरूप मृदा की संरचना व संघटन में भी परिवर्तन होता है। घाटियों में प्रायः यह दुमटी तथा ऊपरी ढालों पर इनकी प्रकृति मोटे कणों वाली होती है; साथ ही ऊपरी ढालों की अपेक्षा निचली घाटियों में ये मृदाएँ अधिक उर्वर होती हैं।

⇒ पर्वतीय मृदा का विकास सामान्यतः पर्वतों के ढालों पर होता है तथा मृदा अपरदन की समस्या से प्रभावित होने के कारण यह पतली परतों के रूप में पाई जाती है। अतः साधारणतया यह अप्रौढ़ (Immature) मृदा है।

⇒ पर्वतीय मृदा अम्लीय प्रकृति की होती है, क्योंकि यहाँ जीवाश्मों की अधिकता होने के बावजूद भी जीवाश्मों का अपघटन नहीं हो पाता है। इसमें पोटाश, फॉस्फोरस एवं चूने की कमी होती है।

⇒ इस मृदा में गहराई कम होती है तथा यह संरध्रयुक्त होती है।

⇒ पहाड़ी ढालों पर विकसित होने के कारण यह मृदा बागानी कृषि, जैसे-चाय, कहवा, मसालों एवं फलों की खेती के लिये बहुत उपयोगी होती है।

6. शुष्क अथवा मरुस्थलीय मृदा (Arid or Desert Soil):-

    शुष्क मृदा का विकास अत्यधिक तापमान वाले शुष्क जलवायवीय क्षेत्रों में हुआ है। इन क्षेत्रों में नगण्य वर्षा व अत्यधिक वाष्पीकरण के कारण मृदा में कम नमी तथा कार्बनिक तत्त्वों की अल्पता होने से ह्यूमस का अभाव पाया जाता है। अतः इसे कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है।

⇒ यह मृदा देश की कुल मृदाओं का लगभग 4.32 प्रतिशत है।

⇒ पश्चिमी राजस्थान, द‌क्षिणी पंजाब, पश्चिमी हरियाणा व उत्तरी गुजरात के शुष्क प्रदेशों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा में रेत सर्वाधिक मात्रा में पाई जाती है। इसमें कैल्शियम, लोहा और फॉस्फोरस भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं किंतु नाइट्रोजन एवं ह्यूमस का अभाव होता है, जिसके कारण यह संरचना के दृष्टिकोण से बलुई तथा प्रकृति के दृष्टिकोण से क्षारीय/लवणीय मृदा होती है, जो फसलों के लिये अनुपजाऊ होती है।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः कम जल की आवश्यकता वाली फसलों को उगाया जाता है, जैसे-ज्वार, बाजरा, रागी, तिलहन आदि।

7. लवणीय मृदा (Saline Soil):-

    लवणीय मृदा का विकास शुष्क व अर्द्धशुष्क जलवायु तथा जलाक्रांत व अनूप क्षेत्रों में होता है। ये मृदा संरचना की दृष्टि से बलुई से लेकर दोमट तक हो सकती है। चूँकि इनमें लवणों की अधिकता होती है, अतः इनमें सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के अनुपात की अधिकता तथा नाइट्रोजन व चूने की अल्पता पाई जाती है।

⇒ लवणीय मृदा को कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है, साथ ही इनमें वनस्पतियों का अभाव भी पाया जाता है।

⇒ लवणीय मृदा का अधिकतर प्रसार पश्चिमी गुजरात, पूर्वी तट के डेल्टाओं व सुंदरबन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अलावा कच्छ के रन में भी लवणीय मृदा का प्रसार पाया जाता है, जिसके लिये दक्षिणी-पश्चिमी मानसून प्रमुख रूप से उत्तरदायी है।

⇒ शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में गहन कृषि के कारण सिंचाई के अतिरेक से केशिकत्व क्रिया को बढ़ावा मिलता है, जिसमें मृदा के ऊपरी परत पर सोडियम, पोटैशियम एवं कैल्शियम के लवणों एवं क्षारों का जमाव होता है। फलतः मृदा न केवल लवणीय मृदा में परिवर्तित हो जाती है बल्कि इसकी उर्वरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

⇒ पंजाब व हरियाणा के क्षेत्रों में अतिरेक सिंचाई के कारण लवणीय मृदा के प्रसार में वृद्धि हो रही है। जिससे उपजाऊ जलोढ़ मृदा अनुर्वर मृदा में परिवर्तित होती जा रही है। यहाँ इस प्रकार की मृदा को रेह, ऊसर एवं कल्लर कहते हैं।

जिप्सम तथा पाइराइट का प्रयोग कर लवणीय मिट्टियों को कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

⇒ भारत के हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में नहरों के आस-पास लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी में अधिक तेजी से वृद्धि हुई है, जिसके कारण बंजर भूमि की समस्या उत्पन्न हुई है।

⇒ इस प्रकार की मृदाओं में बरसीम, धान, गन्ना, अमरूद, आँवला, फालसा तथा जामुन जैसी लवण प्रतिरोधी फसलें व फल वृक्ष लगाये जाते हैं।

8. पीट एवं जैव मृदा (Peat and Biotic Soil):-

    इस मृदा का निर्माण नदियों के द्वारा निर्मित डेल्टाई क्षेत्रों में जल का भराव होने के कारण हुआ है।

⇒ इस मृदा में भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन नगण्य होने के कारण अविघटित कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण मृदा की अम्लीयता भी अपेक्षाकृत अधिक हो जाती है। यह उच्च लवणीय मृदा है, लेकिन इसमें पोटाश तथा फॉस्फेट की कमी होती है।

⇒ ये अम्लीय स्वभाव की होती है तथा फेरस आयरन होने से प्रायः इनका रंग नीला होता है।

⇒ भारत में पीट मृदा वाले क्षेत्रों में ही ‘मैंग्रोव वनस्पति’ का अधिक विकास हुआ है।

⇒ यह भारत में मुख्यतः केरल के अलप्पुझा ज़िला, उत्तराखंड के अल्मोड़ा एवं सुंदरबन डेल्टा में पाई जाती है।

⇒ यह हल्की उर्वरता वाली फसलों हेतु उपयुक्त मृदा है।

⇒ उपयुक्त दशा में वनस्पति की संवृद्धि के कारण इसमें जीवाश्म के अंश एवं ह्यूमस अधिक मात्रा में पाये जाते हैं, जिस कारण यह मृदा गहरे काले रंग की होती है।

मृदा अवकर्षण (Degradation):-

      मृदा में उर्वरता के ह्रास को ही ‘मृदा अवकर्षण’ कहते हैं।

⇒ इसमें मृदा का पोषण स्तर गिर जाता है तथा मृदा के दुरुपयोग एवं अपरदन के कारण मृदा की गहराई या परत की मोटाई कम हो जाती है।

⇒ मृदा अवकर्षण की दर भू-आकृतिक संरचना, पवनों की गति तथा वर्षा की मात्रा के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न भिन्न होती है।

मृदा अपरदन (Soil Erosion):-

     ‘मृदा अपरदन’ का तात्पर्य मृदा के ऊपरी संस्तरों का विनाश है। प्राकृतिक व मानवीय गतिविधियों से अपरदनात्मक प्रक्रियाओं द्वारा मृदा की ऊपरी परत का क्षरण होता है, जिसे ‘मृदा अपरदन’ की संज्ञा दी जाती है।

⇒ प्राकृतिक रूप से होने वाले मृदा अपरदन व मृदा निर्माण प्रक्रिया में एक प्रकार का संतुलन पाया जाता है किंतु मानवीय हस्तक्षेप द्वारा इस संतुलन में अव्यवस्था उत्पन्न होने से मृदा अपरदन की दर में वृद्धि होती है।

⇒ मृदा अपरदन के लिये उत्तरदायी अपरदनात्मक कारकों में परिवहित जल, प्रवाहित पवन, कृषि व पशुचारण की अवैज्ञानिक पद्धतियाँ, मानव बस्तियों का निर्माण, खनन व अन्य मानवीय गतिविधियों को शामिल किया जाता है।

मृदा अपरदन के कारण (Causes of Soil Erosion)

(i) निर्वनीकरणः-

     वन, पानी के बहाव तथा वायु की गति को कम करता है। वृक्षों की जड़ें मिट्टी को जकड़कर रखती हैं किंतु वृक्षों के अविवेकपूर्ण दोहन तथा कटाई से अपरदन की तीव्रता बढ़ती है।

(ii) अत्यधिक पशुचारणः-

     इससे मिट्टी का गठन ढीला हो जाता है। फलतः जलीय एवं वायु अपरदन तीव्र हो जाता है।

(iii) जलीय अपरदनः-

     जल द्वारा मिट्टी के घुलनशील पदार्थों को घुलाकर एक स्थान से दूसरे स्थान के लिये परिवहित करना जलीय अपरदन कहलाता है। जल के भार/चोट से उत्पन्न दबाव के कारण मिट्टी का स्थानांतरण ‘जलगति क्रिया’ कहलाती है। इसमें वर्षा की प्रमुख भूमिका होती है, क्योंकि अत्यधिक वर्षा वाले स्थानों में वर्षा के जल तथा बाढ़ से समस्याग्रस्त होने के बाद मृदा अपरदन की संभावना सर्वाधिक होती है।

(iv) वायु अपरदनः-

     तीव्र पवनों द्वारा सूक्ष्म कणों को अपने साथ उड़ाकर ले जाना ‘अपवहन’ कहलाता है। मृदा अपरदन चक्रवातों द्वारा भी होता है, जिसमें चक्रवात मिट्टी को उड़ाकर छोटे गर्त बना देते हैं।

     भारत में मई तथा जून माह में रबी की फसलों की कटाई के पश्चात् सतलुज-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान की उपजाऊ मिट्टी का भी पवन द्वारा पर्याप्त मात्रा में दोहन/अपरदन होता है।

(v) हिमानी अपरदनः-

      हिमालय में हिमरेखा के नीचे बहने वाले बर्फ तथा जल को हिमनद कहा जाता है। ये चट्टानों एवं मिट्टी को काटकर निचली घाटी में जमा कर देते हैं, जिन्हें ‘हिमोढ़’ कहते हैं।

(vi) झूम कृषिः-

     झूम कृषि के दौरान जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर कृषि करने के लिये वृक्षों का कटाव किया जाता है तो वनों के कटाव से अपरदन की दर में वृद्धि हो जाती है तथा मिट्टी के पोषक तत्त्व बह जाते हैं।

(vii) भूस्खलन अपरदनः-

     भूस्खलन अपरदन पहाड़ी सतह या पर्वतीय ढालै के नीचे धसने के कारण होता है। सामान्यतः भूस्खलन, ढालों पर कटाई, खुदाई या कमजोर भूगर्भ ढाल होने के कारण होता है।

मृदा संरक्षण के उपाय (Methods for Soil Conservation)

     मृदा संरक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत न केवल मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है बल्कि उसमें सुधार की भी कोशिश की जाती है।

⇒ देश में मृदा अपरदन व उसके दुष्परिणामों पर नियंत्रण के लिये 1953 में ‘केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड’ का गठन किया गया जिसका कार्य राष्ट्रीय स्तर पर मृदा संरक्षण के कार्यक्रमों का संचालन करना है।

यांत्रिक उपाय (Engineering Method):-

⇒ मेड़बंदी के अंतर्गत बड़े-बड़े जोत के खेतों में मेड़ बनाकर जल के प्रवाह को कम किया जा सकता है तथा वायु के तेज  प्रवाह से होने वाले अपरदन को रोकने में भी यह सहायक होता है।

⇒ मृदा समतलीकरण से जल के बहाव तथा वायु के तेज गति का प्रभाव कम पड़ता है।

⇒ सम्मोच्च रेखीय जुताई पहाड़ों के सबसे ऊँचे ढाल पर की जाती है। इस पद्धति में पहाड़ों से बहने वाले जल को रोकने के लिये समान ऊँचाई वाली रेखाओं से एक प्राकृतिक रूकावट बनाई जाती है, जिससे मृदा का संरक्षण होता है।

⇒ पत्थर के मेड़ चट्टान बांध के अंतर्गत पानी को तेजी से बहने से रोकने के लिये चट्टानों के द्वारा अवरोधक बनाए जाते हैं। चट्टानी बांध बनाने से नालियों की रक्षा होती है तथा मृदा का क्षय भी नहीं होता है।

⇒ बेसिन लिस्टिंग के अंतर्गत ढालों पर एक नियमित अंतराल के बाद लघु बेसिन या गर्त का निर्माण किया जाता है, जो जल प्रवाह को नियंत्रित रखने तथा जल को संरक्षित करने में सहायक होते हैं।

जैविक उपाय (Biological Method):-

     फसल चक्र के अंतर्गत अपरदन को कम करने वाली फसलों का अन्य फसल के साथ चक्रीकरण कर अपरदन को रोका जा सकता है। इससे मृदा की उर्वरता भी बढ़ती है।

⇒ पट्टीदार खेती के अंतर्गत इसमें बड़े जोतों के खेतों में पट्टी बनाकर जल प्रवाह के वेग को कम किया जाता है, जिससे मृदा अपरदन कम-से-कम हो।

⇒ पलवार या मल्चिंग के अंतर्गत खेतों में फसल अवशेष की 10-15 सेमी. पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जा सकता है। इससे मृदा का संस्तर सुरक्षित रहता है।

⇒ वर्मी कम्पोस्ट प्राचीन काल से ही किसानों का सबसे हितकारी प्रयोग रहा है क्योंकि यह पूरी तरह से केंचुए पर आधारित है। केंचुए को ‘किसानों का मित्र’ कहा जाता है। ये केंचुए मिट्टी में मौजूद घासफूस और अन्य खरपतवार को खाकर उन्हें खाद बनाते हैं तथा साथ ही मिट्टी को मुलायम और उपजाऊ भी बनाते हैं।

⇒ हरी एवं जैविक खाद के अंतर्गत मृदा संरक्षण को बनाए रखने के लिये खेत में हरी खाद का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाता है। परंपरागत रूप में प्रचलित उड़द, सैजी, सनई, कैंचा, मूंग, लोबिया आदि को खेत में बोया जाता है और खड़ी फसल के बीच खेत की जुताई की जाती है। इससे खेत में विभिन्न प्रकार के जैविक तत्त्वों का समावेश हो जाता है, जिससे फसलों की उत्पादकता बढ़ती है। सैजी और सनई की फसल का हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन प्राप्त होता है।

⇒ कृषि वानिकी के अंतर्गत खेत के चारों तरफ मेड़ों पर दो या तीन पंक्तियों में एक निश्चित दूरी में फसलों के साथ वृक्षों को रोपित किया जाता है। इससे भी मृदा अपरदन को रोकने में सहायता मिलती है।

⇒ वृक्षों की जड़ें मृदा पदार्थों को बांधे रखती है, जो मृदा संरक्षण में सहायक है। अतः सरकार द्वारा सार्वजनिक मार्गों, नहरों, रेल पटरियों इत्यादि के दोनों ओर तीव्र गति से बढ़ने वाली प्रजातियों के वृक्षों को रेखीय पट्टियों के रूप में रोपित कर वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सामाजिक उपाय (Social Method):-

     अत्यधिक चराई से पहाड़ी ढालों की मृदा ढीली पड़ जाती है और पानी का बहाव इस ढीली मृदा को बड़ी आसानी से बहा ले जाती है। मृदा अपरदन को रोकने के लिये इन क्षेत्रों में नियोजित चराई से वनस्पति के आवरण को बचाया जा सकता है, जिससे मृदा संरक्षण में सकारात्मक सहयोग हो सके।

⇒ हमारे सामाजिक परिवेश में वृक्षों का कटाव व अत्यधिक दोहन भी मृदा अपरदन का एक कारक है। वनों के कटाव व दोहन का निम्नीकरण करके मृदा संरक्षण में सहयोग किया जा सकता है।

⇒ झूम खेती में जंगलों को काटकर व जलाकर खेती की जाती है, जिससे मृदा की बहुत हानि होती है। इस पर पूर्णतया रोक लगायी जानी चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण हो सके।

⇒ लोक सहभागिता के माध्यम से ग्राम पंचायतों से लेकर शहरों तक वृक्षारोपण के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। गैर सरकारी संस्थाओं को भी इस अभियान से जोड़ना होगा व मृदा संरक्षण के प्रति सराहनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण को प्रोत्साहन मिल सके।

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