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27. Atomic Power (परमाणु शक्ति)

Atomic Power

(परमाणु शक्ति)



      परमाणु शक्ति वह शक्ति है जिसे नियंत्रित (गैर-विस्फोटक) नाभिकीय अभिक्रिया से उत्पन्न किया जाता है।   

   इस शक्ति का उपयोग विनाशकारी एवं निर्माणकारी दोनों ही है। इसका अधिक उपयोग सामरिक महत्व की शक्ति के रूप में किया जा रहा है। केवल इससे निःसृत रेडियोधर्मी समस्थानिकों (Radioactive isotopes) का उपयोग विज्ञान के क्षेत्र में किया जा रहा है। भारत भी इस ऊर्जा का उपयोग निर्माणकारी कार्यों में करने के लिए दृढ़ संकल्पित है।

   इसका उपयोग कम कोयला एवं खनिज तेल उत्पादक देशों तथा अन्य ऊर्जा के अभाव वाले देशों में किया जा सकता है।

परमाणु ऊर्जा के स्रोत:-

    इस शक्ति के प्रमुख स्त्रोत यूरेनियम तथा थोरियम खनिज हैं। बेरीलियम, लीथियम तथा जिरकोनियम खनिजों का भी उपयोग होता है। अच्छी यूरेनियम, पिचब्लैंड तथा कानोंटाइट अयस्कों से प्राप्त होती है। यूरेनियम की यूरेनिनाइट ऑक्साइड पिचब्लैंड से प्राप्त होती है और यह परमाणु ऊर्जा उत्पादन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। विश्व के ज्ञात यूरेनियम क्षेत्रों का 70% उत्तरी अमेरिका तथा अफ्रीका महाद्वीपों में उपलब्ध है।

अणु शक्ति का विकास:-

    अणु शक्ति का ज्ञान वर्ष 1930 के लगभग हो गया। इस शक्ति का विनशकारी उपयोग द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के हिरोशिमा नगर पर हुआ। इसके विकास में रेडियो सहधर्मी कणों से सुरक्षा, विखण्डित पदार्थों का निस्तारण तथा अधिक लागत प्रमुख समस्याएँ हैं जिनका समाधान आवश्यक है।

     विश्व के राष्ट्र अणुशक्ति के विकास की होड़ में संलग्न हैं। यूरेनियम एवं थोरियम की कुल उपलब्ध मात्रा 1700 × 10 लाख अरब ब्रिटिश ताप मापक इकाई मानी जाती है।

अणु शक्ति के उत्पादक देश:-

     परमाणु शक्ति का विश्व में वितरण विभिन्न देशों के बीच असमान है। कुछ देशों के पास परमाणु ऊर्जा के उत्पादन और उपयोग के लिए अधिक संसाधन हैं, जबकि अन्य देशों के पास परमाणु शक्ति का उपयोग करने की क्षमता काफी सीमित है

    इस शक्ति के मुख्य उत्पादक देश स्वतंत्र देशों के राष्ट्रमंडल, संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, चीन तथा भारत हैं। कनाडा, इटली, जापान, स्वीडन, चेक गणराज्य, जर्मनी तथा ऑस्ट्रेलिया में भी परमाण्विक शक्ति गृह हैं। इस समय विभिन्न देशों में एक सौ से अधिक अभिक्रियक क्रियाशील हैं।

स्वतंत्र देशों का राष्ट्रमंडल:-

     सर्वप्रथम सन् 1954 में पाँच हजार किलोग्राम की क्षमता का परमाणु शक्ति गृह बनाया गया। इस समय कई परमाणु शक्ति गृह कार्यरत हैं। जिनमें कुछ की क्षमता एक लाख किलोवाट तक है।

   मुख्य केन्द्र नीवो-वोरेनश, बेलीयार्क्सकोया, लेनिनग्राड, कोला तथा बिलविना हैं। मानग्रीश्लाक प्रायद्वीप पर 3.5 लाख किलोवाट का अभिक्रियक है, जो विश्व में सबसे बड़ा केन्द्र है।

नोट: स्वतंत्र राष्ट्रों का राष्ट्रमंडल (CIS) सोवियत संघ के विघटन के बाद 1991 में स्थापित एक अंतर-सरकारी संगठन है। इसमें 12 देश शामिल हैं: रूस, बेलारूस, यूक्रेन, आर्मेनिया, अजरबैजान, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मोल्दोवा, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान।

संयुक्त राज्य अमेरिका-

    वर्ष 1958 में पिट्सबर्ग, नेपिंगनेटा, शिपिंगपोर्ट में आण्विक शक्ति गृह स्थापित हुआ। इसके बाद अणुशक्ति प्रायद्वीप द्वारा कई केन्द्र स्थापित किये गये, जिनमें प्रमुख ओहियो, टेनेसी तथा कोलम्बियो नदी घाटियों में हैं। बर्कले तथा लिवरमोर (कैलिफोर्निया), हैसफोड (वाशिंगटन), लासवेगास (नेवादा), सेनेक्टैडी बुकहेवे (न्यूयार्क), आर्को (इडाहो), लास आलामास (न्यूमेक्सिको) तथा सवाना (जार्जिया) प्रमुख केन्द्र हैं। वर्तमान में यहाँ 7,167.7 अरब यूनिट परमाणु ऊर्जा उत्पादित होती हैं।

ग्रेट ब्रिटेन-

    वर्ष 1957 में कैल्डरहाल विश्व का द्वीतीय आण्विक संयन्त्र स्थापित किया गया, जिसकी उत्पादन क्षमता 65 हजार किलोवाट है। अल्प केन्द्र हटर्सटन, ट्राब्सफिनिड, केले, विण्डस्केल, चैकेलकास, विनफ्रिथ, ओल्डबरी, हिंकले, प्वाइण्ट, साइजवेल तथा डाउनेर हैं। अगले वर्ष तक आवश्यक विद्युत शक्ति का 40% परमाणु शक्ति के उत्पादन का लक्ष्य है।

फ्रांस-

    पश्चिम यूरोप के छः देशों जर्मनी, फ्रांस, इटली, बेल्जियम, नीदरलैण्डस तथा लक्सेम्बर्ग ने यूरेटम (Euratom-European Atomic Energy Community) का गठन किया है जो अणु शक्ति के विकास में प्रयत्नशील है। फ्रांस में मारकूले के निकट 40 मेगावाट क्षमता की अणु भट्टी स्थापित की गयी है।

   अन्य शक्ति केन्द्र तैयार हो रहे हैं। इस देश में सम्पूर्ण विद्युत शक्ति परमाणु शक्ति करने का लक्ष्य है। इस देश के समक्ष शक्ति की गम्भीर समस्या है, क्योंकि 40% शक्ति की आपूर्ति आयातित कोयला एवं खनिज तेल से करनी पड़ रही है।

   यूरोप महाद्वीप के देश इटली में भी वर्ष 1965 से परमाणु शक्ति का उत्पादन हो रहा है। इस समय पाँच कम्पनियाँ अणु गृहों पर कार्य कर रहीं हैं। स्वीडन में अणु शक्ति का विकास जारी है।

चीन-

    इस देश में अणु तथा हाइड्रोजन बमों के कई सफल विस्फोट किये गये है। यहाँ अणु शक्ति का प्रयोग सैनिक कार्यों में किया जा रहा है। अनुमान है कि विश्व परमाणु शक्ति का पाँचवा शक्तिशाली देश चीन है।

भारत-

    विश्व के ऊपर वर्णित पाँच देशों के पश्चात इसका स्थान विश्व में छठवाँ है। अणु शक्ति के उत्पादन का श्रीगणेश वर्ष 1969 में हुआ। प्रथम परमाणु भट्टी तारापुर (महाराष्ट्र) में स्थापित हुई जिसकी क्षमता 420 मेगावाट है। दूसरी इकाई राणा प्रताप सागर (राजस्थान) के रावतभाटा स्थान पर है, जहाँ 220 मेगावाट की दो इकाइयाँ कार्यरत हैं। इनकी कुल क्षमता 440 मेगावाट है। तीसरा केन्द्र कलपक्कम (तमिलनाडु) में है। इसकी क्षमता 470 मेगावट होगी। इसमें केवल भारतीय इंजीनियर तथा वैज्ञानिक कार्यरत हैं। उन तीनों भट्टियों में स्वस्थानिकों का उत्पादन हो रहा है जिनका निर्यात ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, चेक गणराज्य, हांगकांग तथा फिलिपीन्स को हो रहा है।

    नरोरा (उ.प्र). में भी एक अणु शक्ति गृह चालू है। इसकी क्षमता 440 मेगावाट है। इस समय सभी चौदह केन्द्रों की क्षमता 2,720 मेगावट है। 2016 तक भारत में आठ परमाणु ऊर्जा केन्द्रों पर 22 रियक्टर कार्यरत है। जिसकी क्षमता 6780 मेगावाट है। 6 अन्य परमाणु रियक्टर के बन जाने से 4300 मेगावाट क्षमता और बढ़ गयी है।

जापान-

    इस देश में वर्ष 1957 में अभिक्रिया की स्थापना हुई। इबाराकी प्रीफ्रेक्चर में टोकियो से 112 किमीo दूर टोकाई स्थान पर अणु भट्टी की स्थापना संयुक्त राज्य अमेरिका के सहयोग से हुई। सुरूगा में भी एक अणु भट्टी है। इस समय परमाणु शक्ति का उत्पादन 5 लाख किलोवाट है। चार संयंत्र लग रहे हैं। इनका उत्पादन लक्ष्य 780 लाख किलोवाट है। देश की आधी आवश्यकता परमाणु शक्ति से पूरी होने लगी है।

Atomic Power

28. Non-Conventional Sources of Energy (ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोत)

Non-Conventional Sources of Energy

(ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोत)



    Non-Conventional Sources of Energy

     ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्त्रोत वे हैं जो प्राकृतिक रूप से नवीकरणीय होते हैं तथा जिनका उपयोग ऊर्जा के स्रोत के रूप में किया जा सकता है। जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा, बायोमास, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, लहर ऊर्जा आदि। 

    ये स्रोत पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं और पारंपरिक स्रोतों की तुलना में बहुत कम प्रदूषण करते हैं।

   आज विकासशील देशों में बढ़ते हुए औद्योगिकरण के कारण जीवाश्म ईंधन संसाधन जैसे कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा एक सीमित संसाधन के रूप में रह गये हैं।

     ब्रून्श ने तो कोयला और खनिज तेल को लुटेरा संसाधन बताया है। वह दिन दूर नहीं है जब विश्व में इन संसाधनों के संचित भण्डार समाप्त हो जायेंगे। इसी डर के कारण आज विश्व के देश ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों पर निर्भर रहने लगे हैं।

    ऊर्जा के इन स्त्रोंतों का प्रयोग होने से न केवल जीवाश्म ईंधन की बचत होगी वरन् बहुत कुछ विदेशी मुद्रा भी बचेगी।

(i) सौर ऊर्जा (Solar Energy):-

       यद्यपि सौर ऊर्जा विश्व के सभी देशों में उपलब्ध है परन्तु सौर ऊर्जा की सर्वाधिक सम्भावता उष्ण कटिबंधीय देशों में है जहाँ सूर्य की किरणें सालोंभर अधिक तेज पड़ती हैं। विषुवत रेखा से उत्तर और दक्षिण बढ़ने के बाद सूर्यातप कम होने लगता है।

     सबसे अधिक सूर्याताप की सम्भावना मरूस्थलीय क्षेत्रों में होती है। सूर्य की किरणों से ऊर्जा तब प्राप्त होती है जब सीधी किरणें फोटो-वोल्टिक सैल (Photo-Voltaic-Cells) से टकराती हैं फिर उससे ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस विधि द्वारा ऊर्जा दो प्रकार से उत्पन्न की जाती है-

(i) फोटोवोल्टिक ऊर्जा इस विधि द्वारा ऊर्जा सूर्य की किरणों से (Semi-conductor device) द्वारा उत्पन्न होती है। लेकिन इस विधि द्वारा उत्पन्न ऊर्जा काफी महँगी पड़ती है। आज अनेक शोधों द्वारा फोटो वोल्टिक विधि से ऊर्जा बनाने की विधि को सस्ता किया गया है।

   इस विधि से सौर की किरणों को बड़े-बड़े आतिशी शीशों, लेंसों अथवा रिफ्लेक्टरों की सहायता से बड़ी मात्रा में एकत्र किया जाता है।

(ii) दूसरी विधि से सौर ऊर्जा से सीधे विद्युत बनाई जाती है। इसके लिये विभिन्न प्रकार के सिलिकॉन सैलों का प्रयोग किया जाता है।

    ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों में विश्व ऊर्जा का 0.5% सौर ऊर्जा से प्राप्त होता है। सौर ऊर्जा के उत्पादन की सम्भावनाएँ भारत और चीन में पर्याप्त हैं। यहाँ सौर ऊर्जा से पानी गर्म करने, सौर कुकर बनाने तथा फसल पकाने आदि की तकनीकी विकसित की जा चुकी है।

भारत-

     यहाँ सौर ऊर्जा के विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। ऊर्जा मंत्रालय ने 25 से 100 kW की तीन प्रकार की सौर फोटो-वोल्टिक ऊर्जा परियोजनाएँ स्थापित की हैं-

(i) सार्वजनिक भवनों की छत पर प्रणाली लगाना ताकि प्रमुख शहरी क्षेत्रों में पीक लोडिंग सेविंग हो सके।

(ii) सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रिड के अन्तिम भाग के लिये ही एण्ड स्पोर्ट प्रणाली की व्यवस्था।

(iii) दूर दराज क्षेत्रों में डीजल की बचत करने वाला लगाना।

    भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले में 140 MW की एक समन्वित सौर शक्ति संयुक्त चक्र बिजली सहित 35 MW की ताप ऊर्जा प्रणाली की स्थापना का प्रस्ताव भी है। भारतवर्ष में 10 ग्रिड इंसेंटिव एस. पी. वी. परियोजनाएँ लगाई जा रही हैं जिनकी कुल क्षमता 925 kW है।

चीन-

    यहाँ सौर ऊर्जा से लगभग 20,000 Heat Collectors तैयार किये जाते हैं।

  सौर ऊर्जा की ओर विश्व के अन्य देश जैसे श्रीलंका, इण्डोनेशिया, यू. एस. ए. प्रयत्नशील हैं। यू एस. ए. में तो कैलीफोर्निया में 600 MW का एक संयंत्र स्थापित किया गया।

   वैज्ञानिकों की योजना है कि सूर्यातप को इस्पात नलिकाओं में एकत्रित करके आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सके। इसके लिये नलिकाओं में नाइट्रोजन प्रवाह करना होगा, जो इस ताप को गलित लवणों के टैंकों में परिवहित कर देंगी। यह टैंक बहुत दिनों तक ताप को बनाये रखते हैं, आवश्यकता पड़ने पर इसे टरबाइन जेनरेटर और परम्परागत बायलर में विद्युत उत्पादन के लिये प्रयोग किया जा सकेगा।

   आज अन्तरिक्ष उपग्रहों का भी सहयोग इसके लिये लिया जा रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया और फ्लोरिडा में वाणिज्यिक स्तर पर सौर हीटरों का प्रचलन है। सौर कुकर, हीटर, ड्रायर, सिलिकन आदि सौर तापीय उपकरण विकसित किये गये हैं।

    विश्व की विषालतम सौर भट्टी लॉस एंजिलिस से 140 मील उत्तर-पूर्व की ओर है। यह मोजाब मरूस्थल में लूज में स्थापित है। इससे 10 विशाल सौर विद्युत उत्पादक संयंत्र संचालित होते हैं।

(ii) पवन ऊर्जा (Wind Energy):-

    पवन ऊर्जा, जिसे विंड एनर्जी भी कहते हैं। इसमें हवा की गतिज ऊर्जा का उपयोग करके बिजली का उत्पादन किया जाता है।

    पवन चक्कियों का प्रयोग ऊर्जा के रूप में बहुत समय से किया जा रहा है। ईरान में अन्न पीसने के लिये पहले पवन चक्कियों का प्रयोग होता है। इंग्लैण्ड में हल के निकट सन् 1186 में पवन चक्कियाँ स्थापित की गई थीं। आज हालैण्ड में पवन चक्कियों का प्रयोग ऊर्जा उत्पादन में होता है। इंग्लैण्ड की सबसे पुरानी पवन चक्की सन् 1670 की आज भी स्थित है।

     इस विधि द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने में पवन द्वारा गतिज (Kinetic) ऊर्जा का प्रयोग टरबाइन के माध्यम से विद्युत उत्पादन में होता है।

    पवन द्वारा ऊर्जा उत्पादन सबसे अधिक जर्मनी में होता है। यहाँ सन् 2000 तक 9.369 पवन टरबाइन लगे हुए थे जिनसे 6,094.8 MW विद्युत उत्पादन होता है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका का दूसरा स्थान है। यहाँ सन् 1999 तक 2,502 MW पवन ऊर्जा का उत्पादन हुआ। किसी समय तो अमेरिका के पश्चिमी मैदान में जल की पंपिंग के लिए पवन चक्की का प्रयोग होता था। यहाँ अधिकतर पवन ऊर्जा उत्पादन केन्द्र कैलीफोर्निया राज्य में हैं। यहाँ लगभग 15,000 टरबाइन ऊर्जा उत्पादन में कार्यरत हैं। जबकि डेनमार्क विश्व में तीसरा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है। यहाँ सन् 2000 तक 2,417 MW विद्युत का उत्पादन हुआ।

     ग्रेट ब्रिटेन यहाँ सन् 2001 में 69 पवन फार्म थे जिनमें 941 टरबाइन लगे हुए थे तथा इनमें 473.6 MW विद्युत उत्पादित होती है।

    भारत भी पवन ऊर्जा के उत्पादन में पीछे नहीं हैं। भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन में तेजी से वृद्धि हो रही है। भारत में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 2023 में 42.633 गीगावाट थी, और देश दुनिया में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता के मामले में चौथे स्थान पर है। 

    एशिया की विशालतम 150 MW उत्पादन क्षमता परियोजना मुप्पंडाल (तमिलनाडु) में है। इस समय देश में 179 विण्ड मैपिंग और 83 विण्ड मोनीटरिंग स्टेशन कार्यरत हैं। तामिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में लगभग 80 स्थानों की पहचान की जा चुकी है।

(iii) भूतापीय शक्ति (Geo-thermal Energy):-

    पृथ्वी के आन्तरिक भाग में गहराई के अनुसार तापमान में वृद्धि होती है। ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी के आंतरिक भाग का तापमान 4,500°C है जहाँ पर लोहा तथा निकिल जैसे भारी धात्विक पदार्थ भी तरल अवस्था में हैं।

    पृथ्वी की परत के धरातल पर दरार पड़ने के कारण मैग्मा बाहर आ जाता है। इसके ताप को एकत्रित करके विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। यही विद्युत उत्पादन भूतापीय शक्ति कहलाता है।

    विशेषज्ञों का मत है कि इस ऊर्जा का उपयोग कूप खोदकर तथा शीत जल को पम्प द्वारा इस विभंगित शैल में प्रवाहित किया जाता है यह जल शैल की ऊष्मा से 350°F तक गर्म होकर संवहन द्वारा धरातल की ओर, को उठेगा, तब इसकी ऊर्जा को टरबाइनों में चलाने के लिये प्रयोग किया जायेगा।

     एक अन्य विचारधारा के अनुसार भूतापीय ऊर्जा के उपयोग के लिये दो कूपों (Shafts) को बनाया जाए। एक कूप जल को पम्प से नीचे की ओर भेजेगा जब जल अत्याधिक गर्म हो जायेगा तो दूसरे कूप से इसे ऊपर खींच लिया जायेगा और विद्युत शक्ति के उत्पादन में प्रयोग किया जायेगा।

     भूतापीय ऊर्जा प्रदूषण मुक्त एवं सस्ती होती है। न्यूजीलैण्ड, आइसलैण्ड और इटली में प्राकृतिक रूप से प्राप्त ऊष्मा का प्रयोग काफी पहले से किया जा रहा है। इटली के ट्यूस्केनी प्रान्त में फ्लोरेन्स के दक्षिण-पश्चिम में लारडेरेल्लो का प्राकृतिक वाष्प क्षेत्र सन् 1913 से विद्युत उत्पादन कर रहा है।

    भारतवर्ष में भी भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा देश भर में 340 भूतापीय गर्म झरनों की पहचान कर ली गई है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में तातापानी भूतापीय क्षेत्रों में 300 kW क्षमता का भूतापीय बिजली संयंत्र लगाने की मंजुरी दी गई है।

    इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में पूगा, भूतापीय क्षेत्रों में जलाशय की क्षमता का मूल्यांकन करने तथा बिजली संयंत्र लगाने की संभाव्यता की जाँच का काम राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान हैदराबाद द्वारा किया गया है।

    कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) में मणिवर्ण स्थान पर भूतापीय ऊर्जा पर आधारित एक कोल्ड स्टोरेज और एक बिजलीघर स्थापित किया गया है।

(iv) ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy):-

    ज्वारीय ऊर्जा, जिसे टाइडल एनर्जी भी कहा जाता है, समुद्र के ज्वार-भाटे के प्राकृतिक उतार-चढ़ाव से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का एक नवीकरणीय रूप है।

   वर्तमान समय में ज्वार ऊर्जा द्वारा भी विश्व के कई देशों में विद्युत उत्पादन किया जाता है। विश्व में सर्वप्रथम ज्वार ऊर्जा उत्पादक प्लाण्ट फ्रांस के  ब्रिटनी में रेन्स नदी की एस्चुअरी पर स्थापित किया गया। इनमें ब्रिटेनी तट पर समुद्री टरबाइन लगे हैं जो ज्वार शक्ति से चालित होते हैं।

     इसी प्रकार कनाडा के न्यू ब्रुसविक और संयुक्त राज्य अमेरिका के मेन राज्य में पुंडी की खाड़ी के विभिन्न क्षेत्रों में जहाँ ज्वार 10 से 25 मीटर तक ऊँचे उठते हैं। ज्वार शक्ति से विद्युत उत्पादित की जाती है।

   रूस की किशलाया खाड़ी में भी इसी प्रकार के प्लाण्ट स्थापित किये गये हैं, भारतवर्ष में खम्भात की खाड़ी तथा सुन्दरवन इसके संभावित क्षेत्र हैं। यहाँ उत्पादित क्षमता 8,000-9,000 kW तक है।

(v) शहरी और औद्योगिक कचरे से ऊर्जा (Energy from Urban and Industrial Waste):-

     नगरों एवं औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले कूड़े-कचरे से पर्यावरण दूषित होता है। इस कूड़े-कचरे का उपचार करके न केवल पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है वरन् ऊर्जा उत्पादन में भी वृद्धि की जा सकती है। बड़े-बड़े महानगरों में यह कार्यक्रम विकसित किया जा रहा है।

      इस ऊर्जा से विद्युत के साथ-साथ गैस भी उत्पादित की जा सकती है। भारतवर्ष में सन् 1995 से शहरी, नगरपालिका और औद्योगिक कचरे से ऊर्जा प्राप्ति का राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहा है।

(vi) बायोमास ऊर्जा (Biogas Energy):-

      इसके अन्तर्गत कृषि और वन्य अवशेषों का उपयोग किया जाता है। इससे विद्युत के अतिरिक्त गैस भी उत्पन्न की जाती है। भारतवर्ष में बायोमास गैसीय कार्यक्रम के अन्तर्गत औद्योगिक उपयोगों के लिए ताप ऊर्जा उत्पन्न करने, पानी की पंपिंग और 500 kW तक बिजली पैदा करने के लिये बायोमास गैसीफायर विकसित किये गये हैं।

     इन गैसीफायर में लकड़ी के टुकड़ों और दूसरी वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। भारतवर्ष में 53.1 मेगावाट की क्षमता के बायोमास, गैसीफायर अब तक विकसित किये जा चुके हैं।

     इसके अतिरिक्त नई ऊर्जा प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत फ्यूज सेल्स, जिसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैसों के बीच अभिक्रिया के जरिये बिजली पैदा होती है।

    हाइड्रोजन ऊर्जा, इसका प्रयोग व्यापक रूप से जीवाश्म ईंधन के रूप में किया जाता है। जैव ईंधन आदि का प्रयोग भी विद्युत उत्पादन में किया जाता है।

26. The Idustrial Regions of USA (संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश)

The Idustrial Regions of USA

(संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप Q. संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश पर प्रकाश डालें ।

(What light on the Idustrial regions of USA)

उत्तर- संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों में से एक है, जिसका इतिहास औद्योगीकरण और तकनीकी उन्नति से भरा हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका में अनेक औद्योगिक क्षेत्र हैं जो विभिन्न उद्योगों में काफी अधिक विशेषज्ञता रखते हैं। 

       संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र निम्नलिखित हैं:-

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड औद्योगिक क्षेत्र

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी औद्योगिक क्षेत्र

(iv) डेट्रॉयट औद्योगिक क्षेत्र

(v) वृहद झील औद्योगिक क्षेत्र

(vi) दक्षिणी अप्लेशिया औद्योगिक क्षेत्र

(vii) पूर्वी टेक्सास औद्योगिक क्षेत्र

(viii) प्रशांत तटीय औद्योगिक क्षेत्र

(ix) रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ सूती वस्त्र (Cotton Textile)- सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Textile) के लिए बोस्टन (Boston) प्रसिद्ध है।

⇒ ऊनी वस्त्र (Woolen Textile)- ऊनी वस्त्र उद्योग के लिए लोवेल (Lowel) और प्रोविडेंस (Providence) प्रसिद्ध है।

⇒ हार्टफोर्ड (Hartford)- बीमा उद्योग का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (International Center of Insurance Industry) हार्टफोर्ड (Hartford) में स्थित है।

⇒ पैटरसन (Paterson)- सिल्क सिटी (Silk City) पैटरसन (Paterson) को कहा जाता है। क्योंकि पैटरसन में रेशम का अत्यधिक उत्पादन होता है।

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है। 

⇒ यह क्षेत्र पेंसिल्वेनिया के पूर्वी भाग, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, फिलाडेल्फिया, और मैरीलैंड राज्यों में फैला हुआ है। 

⇒ यह क्षेत्र अपने कुशल श्रम शक्ति, जल-विद्युत, रेल परिवहन, मशीनों और निकटवर्ती बाजार की सुविधाओं के कारण औद्योगिक गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है।  

⇒ स्टील (Steel)- स्टील उद्योग (Steel) के लिए स्पैरो पोइंट (Sparrows Point) व मोरिसविल्ले (Morrisville) प्रसिद्ध है।

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ यह औद्योगिक प्रदेश मध्य अटलांटिक तटीय औद्योगिक प्रदेश तथा मिशीगन औद्योगिक प्रदेश के बाद तीसरा महत्व औद्योगिक प्रदेश है।

⇒ यह क्षेत्र लोहा-इस्पात के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ यहां यंग्सटाउन, बिहलिंग तथा जॉन्सटाउन द्वारा बनाए गए त्रिभुज के अंदर उद्योगों का केंद्रीकरण है।

⇒ इस त्रिभुज के मध्य में पिट्सबर्ग है। यह त्रिभुज धातु उद्योग, लोहा इस्पात तथा इंजिनियरिंग उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(iv) डेट्रॉयट औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ यह अमेरिका का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल विनिर्माण क्षेत्र है, जिसका केंद्र डेट्रॉयट है।

⇒ यह शहर पहले वैगन और कैरिज-निर्माण का केंद्र था, जिसके बाद इस क्षेत्र में ऑटोमोबाइल की असेंबली होने लगी।

⇒ यह फोर्ड, क्रिसलर और जनरल मोटर्स सहित कई विशाल मोटर निगमों का मुख्यालय है।

(v) वृहद झील औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ महान झील प्रदेश को ही मिडवेस्ट प्रदेश कहा जाता है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश स्टील (Steel) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में पीट्सबर्ग (Pittsburgh)- पेन्सिलवेनिया राज्य (Pennsylvania State), डुलुथ (Duluth), क्लीवलेंड (Cleveland), बफैलो (Buffalo)- न्यूयॉर्क राज्य (New York State), गैरी (Gary) स्थान स्टील उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में शिकागो (Chicago) स्थान मांस प्रसंस्करण (Meat Processing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में डेट्रॉइट (Detroit) स्थान ऑटोमोबाइल (Automobile) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। 

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में एक्रोन (Akron) स्थान सिंथेटिक रबर (Synthetic Rubber) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(vi) दक्षिणी अप्लेशिया औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ दक्षिणी अप्लेशियन औद्योगिक क्षेत्र एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है। 

⇒ इस क्षेत्र में कोयला, लकड़ी, और अन्य संसाधनों की प्रचुरता है, जिसके कारण यह वस्त्र, रसायन, और धातु उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया है।

⇒ लौह इस्पात (Iron and Steel)- लौह इस्पात उद्योग के लिए अलबामा राज्य में बर्मिंघम प्रसिद्ध है।

(vii) गल्फ तटीय प्रदेश या पूर्वी टेक्सास औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश को ही गल्फ तटीय प्रदेश कहा जाता है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश तेल रिफाइनरी (Oil Refineries) और हवाई जहाज (Aircraft) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश या गल्फ तटीय प्रदेश में डलास (Dallas), ह्यूस्टन (Houston), न्यू आर्लीन्स (New Orleans) स्थान तेल रिफाइनरी के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश या गल्फ तटीय प्रदेश में फोर्टवर्थ (Fort Worth) स्थान हवाई जहाज उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(viii) प्रशांत तटीय औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में सिएटल (Seattle) स्थान वायुयान निर्माण (Aircraft Manufacturing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में पोर्टलैंड (Portland) स्थान जहाज निर्माण (Ship Manufacturing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में सेनफ्रांसिस्को (San Francisco) और सेन डीएगो (San Diego) सूचना एवं प्रौद्योगिकी (Information Technology- IT Industry) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ सेनफ्रांसिस्को को सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) भी कहा जाता है।

सेनफ्रांसिस्को क्षेत्र कैलीफोर्निया (California) में स्थित है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में लॉस एंजिलीस (Los Angeles) स्थान हॉलीवुड़ (Hollywood) (फिल्म उद्योग) के लिए प्रसिद्ध है।

(ix) रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र:-

     रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र उत्तरी अमेरिका में एक व्यापक क्षेत्र है जो रॉकी पर्वत श्रृंखला के पूर्वी ढलान और उसके आसपास के इलाकों में स्थित है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि, पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्योगों के लिए जाना जाता है।

निष्कर्ष:

    निष्कर्षत: कहा जा सकता कि संयुक्त राज्य अमेरिका का औद्योगिक प्रदेश एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जो कि देश की अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, और समाज को आकार देता है। यह विभिन्न उद्योगों, प्राकृतिक संसाधनों, और श्रम शक्ति के कारण विश्व भर में एक प्रमुख औद्योगिक शक्ति है।



नोट:

संक्षेप में

USA का प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र:

1. उत्तर-पूर्वी क्षेत्र:

   इस क्षेत्र में पिट्सबर्ग, क्लीवलैंड, डेट्रायट, शिकागो, ओहियो, मिशिगन और विस्कॉन्सिन जैसे प्रमुख स्थान शामिल हैं। यह क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे पुराना और सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है, जिसमें विनिर्माण उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान है।

2. मध्य-पश्चिमी क्षेत्र:

   इसमें मुख्यतः शिकागो-गैरी, पिट्सबर्ग-लेक एरी, सेंट लुइस, कैनसस सिटी, ओमाहा, सिनसिनाटी, इंडियानापोलिस क्षेत्र शामिल है। यह क्षेत्र कृषि, परिवहन, और विनिर्माण उद्योगों के लिए जाना जाता है।

3. दक्षिण क्षेत्र:

     इसमें मिसिसिपी, टेनेसी, जॉर्जिया, फ्लोरिडा, अलबामा, ओक्लाहोमा और टेक्सास जैसे जगह शामिल हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक उत्पादों में कपड़ा, खाद्य और पेय पदार्थ, तंबाकू, फर्नीचर, पेट्रोकेमिकल्स, विमान और भारी रसायन शामिल हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि, तेल, और गैस उद्योगों के लिए जाना जाता है।

4. पश्चिमी क्षेत्र:

    इसमें व्योमिंग, यूटा, कोलोराडो, नेवादा और एरिजोना राज्य शामिल हैं। यह क्षेत्र प्रौद्योगिकी, पर्यटन, और फिल्म उद्योगों के लिए जाना जाता है। 

नोट :

विनिर्माण: कच्चे पदार्थ को मूल्यवान उत्पाद में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण या वस्तु निर्माण कहा जाता है।

23. The Industrial Regions of Japan (जापान के औद्योगिक क्षेत्र)

23. The Industrial Regions of Japan

(जापान के औद्योगिक क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. जापान के औद्योगिक क्षेत्र पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Industrial regions of Japan.)

उत्तर-

जापान के औद्योगिक प्रदेश-

    उद्योगों की स्थापना की दृष्टि से जापान प्राचीन काल से ही एक विकसित देश रहा है, जहाँ पहले परम्परागत हस्त उद्योगों में उत्पादन होता था लेकिन 1870 के बाद जापान के उद्योगों में स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन कार्य होने लगा। प्राचीन उद्योग रेशमी वस्त्र, चीनी मिट्टी के बर्तन, पोशाक, खिलौने, हस्त कलाकारी की वस्तुओं आदि का उत्पादन हाथ के बजाय स्वचालित मशीनों द्वारा होने लगा।

     निर्मित माल की विदेशों में बढ़ती हुई माँग को देखते हुए जापान सरकार ने 1930 के बाद भारी उद्योगों की स्थापना पर अधिक बल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के समय में जापान में लोह इस्पात तथा विविध इंजीनियरिंग उद्योगों का विकास तीव्र गति से हुआ। सूती वस्त्र उद्योग जापान का प्राचीन उद्योग है जिसमें स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन होने के कारण जापान का मुख्य उद्योग बन गया।

    1945 में आणविक बम विस्फोटों से अधिकतर उद्योग नष्ट हो गए थे लेकिन 1950 के बाद जापान सरकार की औद्योगिक नीति के द्वारा उद्योगों का सर्वाधिक विकास हुआ। जापान विश्व में संयुक्त राज्य तथा रूस के बाद तीसरा और एशिया में औद्योगिक विकास की दृष्टि से प्रथम स्थान रखता है।

    विविध खनिज पदार्थों की कमी होते हुए भी जापान विदेशों से आयातित कच्चे पदार्थों के आधार पर एक विकसित औद्योगिक देश बन गया है जिसके लिए द्विपीय स्थिति के कारण सस्ता जल परिवहन, कुशल श्रमिक, सघन जनंसख्या, तटीय स्थिति आदि सुविधाओं का प्रमुख योगदान है। जापान में उद्योगों के लिए कच्चा माल अन्य देशों से आयात करने के कारण उद्योगों की स्थापना महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में अधिक हुई है। जापान के निम्नांकित पाँच औद्योगिक प्रदेश प्रमुख हैं-

1. क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश

3. किंकी औद्योगिक प्रदेश

4. किता क्यूशू औद्योगिक प्रदेश

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश

The Industrial Regions of Japan

1. क्वान्तो या टोकियो-याकोहामा औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो प्रदेश जापान के दक्षिण-पूर्व में स्थित जापान का सबसे बड़ा मैदान है जो प्रशान्त महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित है। क्वान्तो जापान का सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है जहाँ टोकियो, याकोहामा, कावासाकी, चीबा, इथिकावा; काबागुची, हिताची, मितो, उरावा, कोगा, कोनोसू, ओमिया, ताबिकावा, तनावा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    क्वान्तो प्रदेश में पर्वतीय क्षेत्र से बहकर आने वाली नदियों से जल की प्राप्ति, तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण जल परिवहन की सुविधा जिसके द्वारा कच्चे पदार्थों के आयात तथा निर्मित माल के निर्यात का प्रमुख यातायात साधन है। सस्ते तथा कुशल श्रमिकों की व्यवस्था, उच्च तकनीकि सुविधाएँ, श्रमिकों की अपने कार्य के प्रति वफादारी, सघन जनसंख्या जिसके कारण पर्याप्त श्रमिक तथा स्थानीय बाजार की व्यवस्था तथा टोकियो जापान की राजधानी होने के साथ-साथ सबसे बड़ा आर्थिक सांस्कृतिक नगर है तथा रेलमार्गों द्वारा जापान के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है।

     इन विभिन्न सुविधाओं के कारण यह क्षेत्र जापान का प्रमुख औद्योगिक प्रदेश बन गया है। इस क्षेत्र में लौह-इस्पात, वायुयानों का निर्माण, वस्त्र उद्योग, कृषि यन्त्र, रासायनिक पदार्थ, कागज आदि उद्योग इस क्षेत्र में सघन रूप से अवस्थित हैं।

     टोकियो, कावासाकी, चीता तथा इथिकावा में लौह इस्पात, योकोहामा कावासाकी में भारी धातु निर्माण उद्योग, टोकियो-याकोहामा, कावासाकी उकागा में जलपोत निर्माण, ताविकावा-मिआमी तथा तनावा में वायुयान निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश के पश्चिम में जापान के दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्र में नगोया औद्योगिक प्रदेश स्थित है जहाँ नगोया, गिफू, ओकाजाकी, आकोशी, अन्जो, इशीकी, तायोहाशी, हिकोने, कामेयामा, तजू, ओका, तोबा प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं। जापान का यह औद्योगिक प्रदेश वस्त्र निर्माण उद्योगों की स्थापना के लिए प्रसिद्ध है जहाँ सूती, ऊनी, रेशमी तथा कृत्रिम रेयन वस्त्रों के निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

      वस्त्र उद्योग के अतिरिक्त, मशीन निर्माण, भारी धातु निर्माण, वायुयान तथा जलयान निर्माण, रसायन उद्योग, बिजली के सामान तथा रेल के डिब्बे तथा रेल इंजन निर्माण उद्योग भी अवस्थित हैं। नगोया-वाकायामा जापान के वस्त्र निर्माण के प्रमुख केन्द्र हैं जहाँ वर्तमान में वस्त्र निर्माण के अतिरिक्त मशीन निर्माण उद्योगों की स्थापना भी की गयी है।

     वायुयान निर्माण मिताका तथा इनाबागून में, जलपोत निर्माण उरागा में, मिट्टी के बर्तन गनोया में तथा यातायात के साधनों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग नगोया तथा शिगा में स्थित हैं। इस क्षेत्र में उद्योग स्थापित होने का प्रमुख कारण समतल भूमि, तटीय स्थिति तथा सघन जनसंख्या है।

3. किंकी या कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश:-

     नगोया औद्योगिक प्रदेश के पश्चिमी भाग में तटीय क्षेत्र में स्थित कोबे-ओसाका तथा क्योटो नगरों में किंकी औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। अतः इसे कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश भी कहते हैं। ओसाका, कोबे-क्योटो, हिमेजी, सकाई फ्यूजे, वाकायामा, नारा, किजू, यवाता, यासू, अवाजी, ओमिजो, अमागासाकी, निशिनोमिया इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    इस क्षेत्र में लोह इस्पात उद्योगों की प्रधानता है। इसके अतिरिक्त ओसाका में सूती, ऊनी, रेशमी, वस्त्र निर्माण उद्योगों की प्रधानता है जिसके कारण इसे जापान का मेनचेस्टर कहा जाता है। जलयान, वायुयान, रासायनिक पदार्थ, मशीन निर्माण तथा खाद्य पदार्थों के निर्माण उद्योग भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र में ओसाका खाड़ी पर स्थित होने के कारण स्वच्छ जल की प्राप्ति तथा सघन जनसंख्या के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध हैं।

4. किता क्यूशू या मौजी नागासाकी औद्योगिक प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में समुद्र तटीय क्षेत्र में इस औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। यह प्रदेश जापान में लौह-इस्पात उद्योगों की दृष्टि से अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है जहाँ जापान के कुल लौह-इस्पात में उत्पादन का 50 प्रतिशत उत्पादित होता है। तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण तथा एशियाई देशों के समीप स्थित होने के कारण लौह अयस्क, कोयला आदि कच्चे पदार्थ जल परिवहन द्वारा आसानी से आयात कर लिया जाता है।

    निर्मित पदार्थों को जलयानों द्वारा विदेशों में निर्यात कर दिया जाता है। अतः यह प्रदेश पूर्णतया आयातित कच्चे पदार्थों पर आधारित है। क्यूशू-केमोगी-यावाता-कोकुश-वाकामात्सु-शिमोनो-सेकी-मोजी-ऊबे-फुकुओका-सासेबे-नागासाकी इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश हैं जहाँ लौह इस्पात के अतिरिक्त धातु निर्माण उद्योग, इंजीनियरिंग पदार्थों का निर्माण, सीमेंट, मोटर गाड़ियाँ, जलयान निर्माण तथा रासायनिक पदार्थों से सम्बन्धित उद्योग भी पाए जाते हैं।

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में किंकी तथा किता-क्यूशू औद्योगिक प्रदेशों के मध्यवर्ती भाग में इस प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। हिरोशिमा-कुरे-नोमी ओकायामा-मत्सूयामा-ताकामात्सू-कूबा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं जहाँ लौह इस्पात भारी धातु निर्माण-जलयान पेट्रो शोधन कारखाने-यंत्र निर्माण-बिजली के सामान तथा विविध रासायनिक पदार्थों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग पाए जाते हैं। जापान के ये सभी औद्योगिक प्रदेश दक्षिणी क्षेत्र में स्थित हैं।

     इनके अतिरिक्त उत्तर में सेन्दाई क्षेत्र तथा होकैडो द्वीप के दक्षिणी भाग में भी लघु औद्योगिक क्षेत्र हैं जहाँ केवल सामान्यतः उपभोक्ता वस्तुओं का ही उत्पादन किया जाता है। इस क्षेत्र में जलवायु दशाएँ प्रतिकूल तथा कच्चे पदार्थों की कमी के कारण जनसंख्या भी न्यूनतम ही पायी जाती है। अतः औद्योगिक विकास वर्तमान में अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही है।



नोट:

जापान में औद्योगिक उन्नति के कारण

     जापान एशिया महाद्वीप का अकेला ऐसा देश है जो औद्योगिक विकास की उस चरम सीमा तक पहुँच गया है, जहाँ तक पहुँचना साधन सम्पन्न विकसित देशों के लिए भी बहुत कठिन है। यह विश्व का प्रमुख औद्योगिक राष्ट्र है। 20वीं शताब्दी में जापान ने अद्वितीय औद्योगिक विकास किया है। जापान की औद्योगिक उन्नति के निम्नलिखित कारण हैं-

(1) भौगोलिक स्थिति- जापान की स्थिति द्वीपीय होने के कारण इसका जलमार्गों द्वारा विभिन्न देशों से सम्पर्क स्थापित हो सका है। जापान के लिए कच्चे माल के स्रोत एशियाई देश इसके बहुत समीप हैं।

(2) अनुकूल जलवायु- इस देश की जलवायु रेशम, कपास आदि के उत्पादन के लिए अनुकूल है। अक्षांशीय विस्तार अधिक होने के कारण इसके उत्तरी व दक्षिणी भागों में जलवायुवीय भिन्नता पायी जाती है।

(3) कच्चे माल की प्राप्ति- यद्यपि जापान में लोहा, कोयला, कपास आदि कच्चे मालों की कमी है फिर भी जापान अति तीव्र गति से औद्योगिक विकास हो रहा है। इसका प्रमुख कारण विदेशों से सस्ते कच्चे माल का प्राप्त होना है।

(4) जल-विद्युत- औद्योगिक शक्ति के साधन कोयले की कमी सस्ती जल-विद्युत द्वारा पूरी कर दी जाती है। यदि जापान में जल विद्युत उत्पादन की अनुकूल भौगोलिक दशाएँ न होर्ती तो जापान औद्योगिक दृष्टि से बहुत अधिक पिछड़ा हुआ होता।

(5) कुशल श्रमिक- देश की अधिकांश जनसंख्या के औद्योगिक क्षेत्रों में निवास करने से पर्याप्त मात्रा में सस्ते व कुशल श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।

(6) बाजार की समीपता- जापान द्वारा निर्मित माल को इसके समीप दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश आयात कर लेते हैं।

(7) सामुद्रिक स्थिति- जापान के चारों ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण यहाँ जल यातायात द्वारा कच्चा माल आयात करने तथा तैयार माल निर्यात करने की बहुत सुविधा है।

(8) परिवहन की सुविधाएँ- जापान की अधिकांश जनसंख्या का जमाव तटीय भागों में है। अतः यहाँ उद्योगों का विकास भी तटीय केन्द्रों पर ही हुआ है।

(9) सरकारी सहयोग- जापान की सरकार ने औद्योगिक विकास के लिए अनेक प्रकार सहयोग किया है। यहाँ सरकार द्वारा नवीन उद्योगों को संरक्षण दिया जाता है तथा वित्तीय सहायता दी जाती है। यहाँ सरकार औद्योगिक नीति को उदार और प्रगतिशील रखकर अनुकूल वातावरण प्रदान करती है।

(10) आधुनिक मशीनरी का प्रयोग- यहाँ कारखानों में आधुनिकतम मशीनरी का प्रयोग किया जाता है तथा ऐसी विधियों का प्रयोग किया जाता है जिनसे श्रम की बचत होती है। ये मशीनें सुविधाजनक भी होती हैं। आधुनिक मशीनरी के विकास की ओर जापान में विशेष ध्यान दिया जाता है।

(11) औद्योगिक सम्बन्ध- यहाँ उद्योगों का विकास निराले ढंग से किया गया है। बड़े उद्योगों की कुटीर उद्योगों से प्रतिस्पर्धा न करके बड़े उद्योगों और कुटीर उद्योगों में सम्पर्क रखा गया है।

(12) चीन-जापान संघर्ष- जब चीन तथा जापान का संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जापान में वस्त्र व वस्त्र निर्माण उद्योगों का विकास प्रारम्भ हुआ।

(13) प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध- विश्व युद्ध में शामिल हो जाने के कारण जापान को सैनिक तथा आम जनता की माँग की पूर्ति के लिए सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, रेशमी वस्त्र, जलयान, वायुयान, मशीनरी आदि के निर्माण में वृद्धि करनी पड़ी।

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