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9. Theory of Optimum Population (अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत)

9. Theory of Optimum Population

(अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत)



अनुकूलतम जनसंख्या का अर्थ एवं परिभाषा 

    “अनुकूलतम जनसंख्या, उस सर्वोत्तम जनसंख्या को कहते हैं, जो किसी देश में एक निश्चित समय पर उपलब्ध साधनों का अधिकतम उपयोग करने अथवा अधिकतम उत्पादन करने के लिए आवश्यक होती है।” 

     इस कथन से स्पष्ट है कि जनसंख्या का आकार तभी अनुकूलतम माना जायेगा, जब प्रति व्यक्ति आय अधिकतम हो। इसका कारण यह है कि साधनों का सर्वोत्तम उपयोग होने पर अथवा उत्पादन के अधिकतम होने की दशा में ही प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है।

प्रमुख परिभाषा

1. प्रो. रॉबिन्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या वह जनसंख्या है, जो अधिकतम उत्पादन को सम्भव बनाती है। 

2. प्रो. डॉल्टन के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या वह है जो अधिकतम प्रति व्यक्ति आय प्रदान करती है।

3. प्रो. बोल्डिंग के अनुसार, “वह जनसंख्या जिस पर जीवन स्तर अधिकतम होता है, अनुकूलतम जनसंख्या कहलाती है।”  

4. प्रो. हिक्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या, जनसंख्या का वह रूप है जिस पर प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम होता है। 

5. प्रो. कार सौण्डर्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या, वह जनसंख्या है जो अधिकतम आर्थिक कल्याण उत्पन्न करती हो। अधिकतम आर्थिक कल्याण का अधिकतम प्रति व्यक्ति आप के समान होना आवश्यक नहीं है, लेकिन व्यवहार में उन्हें उसके बराबर समझा जा सकता है। 

अनुकूलतम जनसंख्या के सिद्धान्त का उद्देश्य:-

      अनुकूलतम जनसंख्या के सिद्धान्त का उद्देश्य यह बताता है कि एक देश के लिए आर्थिक दृष्टि से जनसंख्या का कौन-सा आकार, अनुकूलतम है अर्थात् जनसंख्या का कौन-सा आकार अनुकूलतम होगा, जिसमें प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होगी।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की व्याख्या

      अनुकूलतम जनसंख्या का अभिप्राय जनसंख्या की उस आदर्श मात्रा से है जो किसी देश-काल (Space & Time) में उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग और अधिकतम उत्पादन के लिये आवश्यक होती है।

     किसी निश्चित समय पर उपलब्ध संसाधनों तथा ज्ञात प्रौद्योगिकी की दशा में वह जनसंख्या अनुकूलतम मानी जाती है जिसमें प्रति व्यक्ति आय अथवा प्रति व्यक्ति उत्पादन या अधिकतम प्रतिफल अथवा अधिकतम कल्याण होता है।

      किसी देश की वास्तविक जनसंख्या अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक होने पर अति जनसंख्या और इससे कम होने पर अल्प जनसंख्या कहलाती है। अनुकूलतम जनसंख्या से देश की वास्तविक जनसंख्या कम होने पर उसके संपूर्ण संसाधनों का समुचित प्रयोग तथा विकास नहीं हो पाने से प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम उत्पादन से कम प्राप्त होता है।

    इसके विपरीत जनसंख्या अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक होने पर प्रति व्यक्ति संसाधनों की कमी पड़ने लगती है, जिसमें प्रति व्यक्ति उत्पादन कम होता है। इसका परिणाम यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय में कमी आ जाती है।

      विदित हो कि अनुकूलतम जनसंख्या कभी स्थिर नहीं होती बल्कि गतिशील होती है। इसका आशय यह हुआ कि किसी देश के उत्पादन संसाधनों में परिवर्तन होने से अनुकूलतम जनसंख्या भी परिवर्तित हो जाएगी। यह एक आदर्श की स्थिति है। इसका व्यवहार में प्रयोग संभव नहीं हो सकता क्योंकि इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि अनुकूलतम जनसंख्या कितनी उचित रहेगी और आने वाले समय में वही जनसंख्या भी चाहिये होगी।

   अर्थात अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत, जनसंख्या के उस स्तर को बताता है, जिस पर प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है। यह सिद्धांत ब्रिटिश अर्थशास्त्री हेनरी सिजेविक ने दिया था। 

    दूसरे शब्दों में, प्रारम्भ में उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होता है, लेकिन कुछ समय में एक ऐसा बिन्दु आ जायेगा, जिस पर जनसंख्या का अनुकूलतम अनुपात स्थापित हो जायेगा। इस पर प्रति व्यक्ति आय अधिकतम एवं जनसंख्या अनुकूलतम होगी, लेकिन यदि जनसंख्या इस बिन्दु अनुकूलतम अनुपात समाप्त हो जायेगा और उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होने लगेगा।

Theory of Optimum Population

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ:

(i) अनुकूलतम जनसंख्या, अंडरपॉपुलेशन और ओवरपॉपुलेशन के बीच संतुलन/बैलेंस वाली स्थिति होती है।

(ii) अनुकूलतम जनसंख्या में, जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन/बैलेंस वाली स्थिति होती है।

(iii) अनुकूलतम जनसंख्या में, प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है।

(iv) अनुकूलतम जनसंख्या में, पर्यावरण और समाज को नुकसान नहीं पहुंचता।

(v) अनुकूलतम जनसंख्या में, व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचता।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत के कुछ मापदंड निम्नलिखित है: 

(i) किसी देश के प्राकृतिक संसाधनों का एक समय पर इस्तेमाल होता है।

(ii) उत्पादन की तकनीक में कोई बदलाव नहीं होता है।

(iii) पूंजी का भंडार स्थिर रहता है।

(iv) लोगों की पसंद और स्वाद अपरिवर्तित रहते हैं।

(v) कार्यशील जनसंख्या का कुल जनसंख्या से अनुपात स्थिर रहता है।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की आलोचनाएँ (Criticism of the Optimum Theory of Population):-

      यद्यपि यह सिद्धांत माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण एवं तार्किक है। परन्तु कुछ बिन्दुओं पर इसकी भी आलोचना हुई है जो निम्नलिखित है-

1. यह सिद्धान्त वास्तविक मान्यताओं पर आधारित नहीं है:-

     अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की यह मान्यता है कि जनसंख्या में होने वाली वृद्धि के साथ-साथ कार्यशील जनसंख्या अर्थात् श्रम शक्ति में वृद्धि भी उसी अनुपात में होती है, जबकि वास्तव में यह अनुपात बदलता रहता है। 

    दूसरा, इस सिद्धान्त की यह मान्यता है कि किसी देश में एक समयावधि में प्राकृतिक साधन, तकनीकी स्तर इत्यादि में कोई परिवर्तन नहीं होता, यह पूर्णतया गलत है। किसी देश के लिए अनुकूलतम जनसंख्या का अनुमान लगाना पूर्ण रूप से काल्पनिक जान पड़ता है। 

2. अनुकूलतम बिन्दु ज्ञात करना कठिन है:-

      अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त के प्रतिपादकों ने जनसंख्या के अनुकूलतम बिन्दु का निर्धारण जितना सरल माना है, वास्तव में वह उतना ही कठिन है। अर्थव्यवस्था में होने वाले निरन्तर परिवर्तनों के कारण जनसंख्या के आकार में भी परिवर्तन होता रहता है, जिससे अनुकूलतम आकार का निर्धारण करना सम्भव नहीं हो पाता।

3. यह जनसंख्या का सिद्धान्त न होकर मात्र एक दृष्टिकोण है:-

    आलोचकों के अनुसार, अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त को जनसंख्या का सिद्धान्त कहना ही गलत है, क्योंकि यह इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता कि जनसंख्या किस प्रकार और क्यों बढ़ती है या उसके बढ़ने का क्या नियम है? यह सिद्धान्त तो जनसंख्या के अनुकूलतम बिन्दु की मात्र कल्पना करता है।

4. यह सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के वितरण पक्ष पर कोई ध्यान नहीं देता है:-

     अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के केवल उत्पादन पक्ष पर ध्यान देता है, वितरण पक्ष पर कोई ध्यान नहीं देता। आर्थिक कल्याण का प्रश्न वितरण से सम्बन्ध माना जाता है, जिसकी इस सिद्धान्त ने पूरी तरह से उपेक्षा की है, जो कि आपत्तिजनक है।

5. यह सिद्धान्त जनसंख्या की समस्या का अध्ययन केवल आर्थिक दृष्टिकोण से करता है:-

     आलोचकों का विचार है कि अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त एक भौतिकवादी सिद्धान्त हैं और इसका दृष्टिकोण अत्यन्त संकुचित है। अनुकूलतम जनसंख्या का आकार केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक एवं सैनिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखकर ही निश्चित किया जाना चाहिए।

6. यह सिद्धान्त सामाजिक मूल्यों के प्रति संकुचित दृष्टिकोण अपनाता है:- 

      अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त आर्थिक विकास के लिए प्रति व्यक्ति आय को अधिकतम करने की बात तो करता है, लेकिन जनसंख्या के स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल निर्माण, उच्च बौद्धिक स्तर तथा चरित्र निर्माण पर कोई ध्यान नहीं देता। 

7. इस सिद्धान्त का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है:- 

      अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त, अनुकूलतम जनसंख्या का एक निरपेक्ष कथन मात्र है, जो हमारे लिए जनसंख्या सम्बन्धी नीति के निर्धारण में सहायक सिद्ध नहीं होता, यह सिद्धान्त हमारे सामने जिस ‘आदर्श’ को प्रस्तुत करता है, उस आदर्श को प्राप्त करने में हमारी सहायता नहीं कर पाता। इसलिए अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त का व्यावहारिक महत्व नहीं के बराबर है।

निष्कर्ष:-

     यह अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की आलोचना की गयी है क्योंकि इसके मापन में अनेक कठिनाईयाँ हैं, जिसके कारण इसका व्यवहारिक महत्व कम है। तथापि जनसंख्या और संसाधनों के अंतर्सम्बन्ध की व्याख्या हेतु यह एक महत्वपूर्ण संकल्पना है जिसके संदर्भ में ही अन्य कई संकल्पनाओं की व्याख्या की जा सकती है।

     अनुकूलत जनसंख्या का विचार सरकार द्वारा अपनायी जाने वाली जनसंख्या-नीति के लिए ठोस वस्तुगत आधार प्रदान करता है। यदि देश में जनाधिक्य की स्थिति मौजूद है, तब सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के उपाय लागू करना चाहिए एवं उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम विदोहन की योजनाएँ क्रियान्वित करनी चाहिए।

DECEMBER 2006 UGC NET SOLVED EXAM PAPER

DECEMBER 2006

UGC NET SOLVED EXAM PAPER



द्वितीय प्रश्न-पत्र  (भूगोल)



निर्देश-इस प्रश्न-पत्र में पचास (50) बहुविकल्पीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक हैं, सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. उत्तरी ध्रुव आर्कटिक महासागर के अन्तर्गत अवस्थित है, जबकि दक्षिणी ध्रुव अण्टार्टिका महाद्वीप के अन्तर्गत अवस्थित है। निम्नलिखित में से कौनसा सिद्धान्त इस तथ्य का उपयोग समर्थनकारी तर्क के रूप में करता है?

(A) थियरी ऑफ आइसोस्टेसी  

(B) थियरी ऑफ करेंट टेक्टोनिक्स

(C) कॉन्वेक्टिव करेंट थियरी

(D) टेट्राहेड्रल थियरी

[read more] (D) टेट्राहेड्रल थियरी [/read] 

2. सिन्धु तथा ब्रह्मपुत्र के उदाहरण हैं-

(A) उत्तरवर्ती अपवाह तन्त्र

(B) अध्यारोपित अपवाह तन्त्र

(C) पूर्ववर्ती अपवाह तन्त्र

(D) अनुवर्ती अपवाह तन्त्र

[read more] (C) पूर्ववर्ती अपवाह तन्त्र [/read]

3. दो अनुक्रमिक ज्वारों के बीच का औसत समय अन्तराल

(A) 6 घण्टे, 13 मिनट

(B) 12 घण्टे, 26 मिनट

(C) 24 घण्टे, 52 मिनट

(D) 18 घण्टे, 39 मिनट

[read more] (C) 24 घण्टे, 52 मिनट [/read]

4. स्थान को निर्धारित करने के लिए अक्षांश तथा देशान्तर दोनों को जानना आवश्यक है-

(A) स्थानीय समय

(B) उच्चता

(C) मानक समय

(D) अवस्थिति

[read more] (D) अवस्थिति [/read]

निर्देश (प्रश्न 5 से 8 तक) नीचे दो कथन दिए गए हैं, एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) कहा गया है। नीचे दिए गए कूटों से अपना उत्तर चुनिए-

5. अभिकथन (A): क्षोभमण्डल वायुमण्डल का वह निचला भाग है, जिसमें बादल छाने तथा तूफान उठने जैसी मौसमजन्य घटनाएँ घटित होती हैं।

कारण (R) : क्षोभमण्डल में तापमान ऊँचाई के साथ घटता है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है [/read]

6. कथन (A): समुद्री तलें महाद्वीपीय तलों से कम पुरानी होती हैं।

कारण (R): कम घनत्व वाली तथा फलस्वरूप उत्प्लावक होने के कारण समुद्री तले ‘सबडक्शन जोन’ के ‘मेण्टल’ में धकेली नहीं जाती।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है [/read]

7. कथन (A): भूदृश्य के अपरदन को सम्भव बनाने वाली ऊर्जा का परम स्रोत सूर्य है।

कारण (R) : सौर ऊर्जा भूतलीय जल को वाष्पित करता है, जिसमें से कुछ बाद में वर्षा तथा बर्फ के रूप में पर्वतीय प्रदेशों में गिरता है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (*) [/read]

8. कथन (A) : भूकम्प का आकार-प्रकार अधिकेन्द्र के निकट अधिकतम होता है तथा यह दूरी के साथ घटता जाता है।

कारण (R) : भूकम्प द्वारा निष्कासित ऊर्जा को उसे आकार-प्रकार के द्वारा स्थापित किया जा सकता है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है [/read]

9. क्षेत्रीय रूपांकन के लिए इनमें से किसका उपयोग किया जा सकता है?

(A) ग्रैविटी पोटेन्शियल मॉडल

(B) रैंक-साइज रूल

(C) लोस्च सेटलमेण्ट मॉडल

(D) सेंट्रल प्लेस मॉडल

[read more] (B) रैंक-साइज रूल [/read]

10. क्षेत्रीय असन्तुलन इनमें से किस कारण से उत्पन्न नहीं होता है?

(A) संसाधनों का विषम वितरण

(B) टिकाऊ आर्थिक विकास

(C) संसाधनों का अभाव

(D) प्रौद्योगिकी का अभाव

[read more] (B) टिकाऊ आर्थिक विकास [/read]

11. ‘नोडल रीजन्स’ का परिसीमन किया जाता है?

(A) स्थानिक परस्पर क्रिया के आधार पर

(B) एकरूपता के आधार पर

(C) संसाधन के आधार पर

(D) जिंसों के प्रवाह के आधार पर

[read more] (A) स्थानिक परस्पर क्रिया के आधार पर [/read]

12. लोगों के प्रवास का लाभकारी प्रभाव आरम्भिक समय से ही रहा है। इनमें से महत्वपूर्ण है-

(A) विचारों का विसरण

(B) भाषा का प्रचार-प्रसार

(C) विज्ञान तथा प्रौद्योगिकीय नव-प्रवर्तनों का प्रचार- प्रसार

(D) उपर्युक्त सभी

[read more] (D) उपर्युक्त सभी [/read]

13. ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य रूप से उपलब्ध कराने के लिए छोटे शहर पनपते हैं-

(A) बाजार की सुविधा

(B) शैक्षिक सुविधाएँ

(C) स्वास्थ्य सुविधाएँ

(D) प्रशासनिक सुविधाएँ

[read more] (D) प्रशासनिक सुविधाएँ [/read]

14. भारत में शहरी केन्द्रों के वर्गीकरण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कसौटी है-

(A) स्थल

(B) आकार

(C) आबादी

(D) कार्य

[read more] (C) आबादी [/read]

15. ‘रैंक साइज रूल’ में निम्नतर दर्जा वाले शहर की जनसंख्या के अनुपात में होती हैं-

(A) लघुतम शहर की जनसंख्या

(B) विशालतम शहर की जनसंख्या

(C) मध्यक्रम वाले शहर की जनसंख्या

(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

[read more] (B) विशालतम शहर की जनसंख्या [/read]

16. राजनीतिक भूगोल का जनक किसे कहा जाता है?

(A) रूडोल्फ जेलेन

(B) हैसोफर के.

(C) रेट्जेल एफ.

(D) हार्टशोर्न आर.

[read more] (C) रेट्जेल एफ. [/read]

17. राजनीतिक भूगोल में रिमलैण्ड थियरी की विचारधारा किसकी देन है?

(A) स्पाइकमैन एन. जे.

(B) वार्नर ई.

(C) वेगर्ट एच. डब्ल्यू.

(D) महान ए. टी.

[read more] (A) स्पाइकमैन एन. जे. [/read]

18. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कर सूचियों के नीचे दिए गए कूटों का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए-

सूची-I (भूगोलवेत्ता) सूची-II (सिद्धान्त)

(a) वाइडल दे लेक्लेशे 1. यूनिटी इन डाइवर्सिटी

(b) जीन ब्रुनेहेस 2. सोशल डिटर्मिनेशन

(c) कार्ल रिटर 3. टेरेस्ट्रियल होल

(d) फाइड रैट्जेल 4. इण्टरैक्शन

कूट:

       a b c d

(A) 3 2 1 4

(B) 4 2 1 3

(C) 3 4 1 2

(D) 2 1 3 4

[read more] (B) 4 2 1 3 [/read]

19. वह दार्शनिक दृष्टिकोण जो इस बात का पक्षपोषण करता है कि मनुष्य अपनी प्रकृति के निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है-

(A) पॉजिटिविज्म (वस्तुनिष्ठवाद)

(B) फंक्शनलिज्म (प्रकार्यवाद)

(C) एक्सिस्टेंशियालिज्म (अस्तित्ववाद)

(D) प्रैग्मेटिज्म (व्यावहारिकतावाद)

[read more] (A) पॉजिटिविज्म (वस्तुनिष्ठवाद) [/read]

20. फसल संयोजन का परिकलन के आधार पर किया है-

(A) निवल कृष्यित क्षेत्र का प्रतिशत क्षेत्र

(B) सकल कृष्यित क्षेत्र का प्रतिशत क्षेत्र

(C) एक क्षेत्र में नये फसलों का दर्जाकरण

(D) इनमें से किसी के आधार पर नहीं

[read more] (C) एक क्षेत्र में नये फसलों का दर्जाकरण [/read]

21. झरिया कोयला क्षेत्र कहाँ अवस्थित है?

(A) बिहार में

(B) झारखण्ड में

(C) उड़ीसा में

(D) छत्तीसगढ़ में

[read more] (B) झारखण्ड में [/read]

22. भूगोल के विकास के परिप्रेक्ष्य में प्रमुख ब्रिटिश भूगोल-वेत्ताओं का सही अनुक्रम है-

(A) ए. जे. हर्बर्टसन, एस. डब्ल्यू. वुलरिज, एच. जे. मैकिण्डर, एल. डी. स्टैम्प

(B) एस. डब्ल्यू. वुलरिज, ए. जे. हर्बर्टसन, एल. डी. स्टैम्प, एच. जे. मैकिण्डर

(C) एच. जे. मैकिण्डर, ए. जे. हर्बर्टसन, एस. डब्ल्यू. वुलरिज, एल. डी. स्टैम्प

(D) एल. डी. स्टैम्प, ए. जे. हर्बर्टसन, एस. डब्ल्यू. वुलरिज, एच. जे. मैकिण्डर

[read more] (B) एस. डब्ल्यू. वुलरिज, ए. जे. हर्बर्टसन, एल. डी. स्टैम्प, एच. जे. मैकिण्डर [/read]

23. निम्नलिखित सागरों पर विचार कीजिए-

1. रेड सी 

2. ब्लैक सी 

3. डेड सी 

4. बाल्टिक सी 

   खारापन के अवरोही क्रम के आधार पर इन सागरों का सही अनुक्रम है?

(A) 1, 2, 3, 4

(B) 2, 1, 4, 3

(C) 4, 2, 3, 1

(D) 3, 1, 2, 4

[read more] (D) 3, 1, 2, 4 [/read]

24. ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के नाम से, एक सर्वाधिक सघन संरक्षण प्रयास, भारत में कब शुरू किया गया?

(A) 1963 में

(B) 1967 में

(C) 1973 में

(D) 1977 में

[read more] (C) 1973 में [/read]

25. “रिसोर्सेज आर नॉट टू बिकम.” संसाधन की यह परिभाषा किसने दी?

(A) वॉन थुनेन

(B) जिमरमैन

(C) हार्टशोर्न

(D) सिम्पल

[read more] (B) जिमरमैन [/read]

26. पशुपालन वाणिज्यिक पैमाने पर भलीभाँति विकसित हुआ है-

(A) मानसून क्षेत्रों में

(B) सवाना क्षेत्रों में

(C) प्रेयरी तथा स्टेप्स क्षेत्रों में

(D) साहेल क्षेत्रों में

[read more] (C) प्रेयरी तथा स्टेप्स क्षेत्रों में [/read]

27. भारत में गेहूँ का सबसे अधिक उत्पादन किस राज्य में होता है?

(A) हरियाणा

(B) पंजाब

(C) उत्तर प्रदेश

(D) बिहार

[read more] (C) उत्तर प्रदेश [/read]

28. निम्नलिखित में से कौन एक स्वच्छन्द उद्योग है?

(A) सूत्री वस्त्र

(B) चीनी

(C) सीमेण्ट

(D) हथकरघा

[read more] (A) सूत्री वस्त्र [/read]

29. आइसोडोक्स का सम्बन्ध है-

(A) समतुल्य ऊँचाई की रेखा

(B) समतुल्य वृष्टिमान की रेखा

(C) असमानता की रेखा

(D) समतुल्य परिवहन लागत की रेखा

[read more] (D) समतुल्य परिवहन लागत की रेखा [/read]

30. निम्नलिखित में से कौन किसी परिवहन प्रणाली से सम्बन्धित नहीं है?

(A) वॉन-थुनन थियरी

(B) डिस्टेंस डिके फंक्शन

(C) प्रिन्सिपल ऑफ लीस्ट अफर्ट

(D) सेण्ट्रल प्लेस थियरी

[read more] (B) डिस्टेंस डिके फंक्शन [/read]

31. मंगोलॉइड प्रजाति प्रधान रूप से पायी जाती है-

(A) दक्षिण अफ्रीका

(B) पूर्व एशिया

(C) पश्चिम यूरोप

(D) पूर्व अफ्रीका

[read more] (B) पूर्व एशिया [/read]

32. इनमें से किसका सम्बन्ध जनजातीय अर्थव्यवस्था से है?

(A) स्वच्छन्द उद्योग

(B) व्यवस्थित खेती-बाड़ी

(C) स्थानान्तरण खेती-बाड़ी

(D) औद्योगिक अर्थव्यवस्था

[read more] (C) स्थानान्तरण खेती-बाड़ी [/read]

33. मानव के प्रजातीय विशेष गुणों का अध्ययन किसमें किया जाता है?

(A) जीवाश्म विज्ञान

(B) जल विज्ञान

(C) समाजशास्त्र

(D) मानव विज्ञान

[read more] (D) मानव विज्ञान [/read]

34. ‘हार्टलैण्ड थियरी’ का निरूपण किसने किया?

(A) एच. जे. मैकिण्डर

(B) आर. हार्टशोर्न

(C) पीटर हैगेट

(D) हर्बर्टसन

[read more] (A) एच. जे. मैकिण्डर [/read]

35. आर्द्र वातावरण से अनुकूलित पौधे को कहते हैं-

(A) जलोद्भिद्

(B) मरुद्भिद्

(C) समोद्भिद्

(D) शुष्कार्दोद्भिद्

[read more] (A) जलोद्भिद् [/read]

36. पारिस्थितिक अनुक्रमण सामान्यतया जन्म देता है-

(A) हैबिटाट

(B) बायोमे

(C) क्लाइमेटिक फ्रांटियर

(D) क्लाइमेक्स

[read more] (D) क्लाइमेक्स [/read]

37. निम्नलिखित में से किस एक राज्य को पेट्रो-डॉलर अर्थव्यवस्था ने अधिकतम प्रभावित किया है?

(A) तमिलनाडु

(B) केरल

(C) पंजाब

(D) गुजरात

[read more] (D) गुजरात [/read]

38. भारत में राज्य स्तर पर जनसंख्या के वितरण का उत्तम रीति से प्रतिनिधित्व इनमें से किसके द्वारा किया जाता है?

(A) डॉट मेथड

(B) पाई डायग्राम

(C) कोरोप्लेथ

(D) आइसोप्लेथ

[read more] (A) डॉट मेथड [/read]

39. एक डेटा-शीट में प्रत्यावर्तन मॉडल का उपयोग करने के प्रधान उद्देश्य क्या हैं ?

(A) आश्रित एवं स्वतन्त्र चरों के बीच अनियमितता

(B) आश्रित एवं स्वतन्त्र चरों के बीच सहसम्बन्ध

(C) आँकड़ों में तिरछापन

(D) आँकड़ों में बिखराव

[read more] (B) आश्रित एवं स्वतन्त्र चरों के बीच सहसम्बन्ध [/read]

40. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कर सूचियों के नीचे दिए गए कूटों का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए-

सूची-I

(a) बिखराव के किस माप को निम्नतम तथा अधिकतम मान के बीच अन्तर के रूप में परिभाषित किया जाता है।

(b) यह बिखराव का एक माप है।

(c) यदि वैरिएशन का कोफिसिएण्ट वांछित है, तो आप कौनसे परिसूत्र का प्रयोग करेंगे।

(d) नमूने के वेरिएंस तथा मानक विचलन की गणना में किस औसत का प्रयोग किया जाता है।

सूची-II

1. 3(x‾-Median)

2. S÷X (100)

3. रेंज

4. अंकगणितीय मध्य

5. Σ(α-x‾)÷n

कूट :

       a b c d

(A) 3 2 5 4

(B) 3 5 2 4

(C) 4 1 2 3

(D) 3 1 2 4

[read more] (D) 3 1 2 4 [/read]

41. विश्व के देशों में भारतीय रेल नेटवर्क का दर्जा है-

(A) प्रथम

(B) द्वितीय

(C) तृतीय

(D) चतुर्थ

[read more] (D) चतुर्थ [/read]

42. निम्नलिखित में से किसका सम्बन्ध सूती वस्त्र उद्योग से है?

(A) पुणे

(B) वाराणसी

(C) अहमदाबाद

(D) चण्डीगढ़

[read more] (C) अहमदाबाद [/read]

43. कारगिल के किनारे पर स्थित है।

(A) सिन्धु नदी

(B) झेलम नदी

(C) सुरू नदी

(D) चेनाब नदी

[read more] (C) सुरू नदी [/read]

44. इंफाल की राजधानी है।

(A) मणिपुर

(B) नगालैण्ड

(C) मेघालय

(D) अरुणाचल प्रदेश

[read more] (A) मणिपुर [/read]

45. ‘मैकमोहन लाइन’ किन देशों के बीच अन्तर्राष्ट्रीय सीमा है?

(A) भारत तथा बांग्लादेश

(B) भारत तथा चीन

(C) भारत तथा पाकिस्तान

(D) फ्रांस तथा जर्मनी

[read more] (B) भारत तथा चीन [/read]

निर्देश (प्रश्न 46 से 50 तक) निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए तथा उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

    समृद्ध राष्ट्र प्रधानतया एक-दूसरे के बीच व्यापार करते हैं। प्रवास बहुधा मानव समूहों के बीच होता है, जो लोग अधिक संवाद भेजते हैं, प्रत्युत्तर में वे बहुत सारे सम्पर्क पाते हैं। प्रवाहों में-प्रत्येक गन्तव्य स्थान पर बलशाली रूप में डाले गए प्रभावी खिंचाव के अनुरूप प्राचुर्यता के स्थानों से प्रभावी माँगों के क्षेत्रों की ओर जाने की प्रवृत्ति होती है। प्रवाह जारी रहने के साथ साम्यावस्था की ओर प्रवृत्त होने की प्रवृत्ति आम प्रतीत होती है।

           भौतिक विश्व में सजाए स्थानों के बीच गतिमान होती है, ताकि प्रभविष्णुता सम हो सके। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण जल अधोतम बिन्दु की ओर जाने की चेष्टा करता है और यदि इसे समुद्र स्तर तक जाने की स्वतन्त्रता हो, तो यह ऐसा ही करेगा।

     इसी प्रकार, हवा उच्च दबाव वाले क्षेत्र से निम्न दबाव वाले क्षेत्र की ओर जाएगी. कारक अभिकर्ता के रूप में उच्च दबाव हवा को एक दिशा में अधिक दूरी तक नहीं ले जा सकता। यह हम आम अनुभव से जानते हैं जब हम पंखे की सहायता से किसी कमरे में हवा प्रवाहित करते हैं अथवा माचिस की तीली को कुछ दूरी से फूंक कर बुझाते हैं। एक खिड़की में पंखा लगाकर बाहर हवा फेंकने तथा कमरे की दूसरी ओर एक अन्य खिड़की खोल देने से अधिक हवा फेंकी जाएगी।

       इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझने के लिए धकेलने वाले कारकों पर बल देने की अपेक्षा निम्न दबाव वाले क्षेत्र द्वारा किसी विशेष दिशा में खींची जाने वाली हवा पर विचार करना बेहतर होगा, ठीक उसी प्रकार जैसे पर्वत की चोटी से पानी नीचे गिरता है। इसी प्रकार, मानव से जुड़े क्रियाकलापों में, किसी अन्य स्थान पर अत्यधिक आपूर्ति के परिप्रेक्ष्य में, खिंचाव एक प्रत्यक्ष लगाता है।

       अतः इस बात की व्याख्या करने के लिए, कि क्यों कोई सजा अ से ब की ओर गतिमान होती है, इससे अधिक सहायता मिलेगी कि अ पर धकेल के बनिस्पत ब पर खिंचाव पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाए। अ पर धकेल की दिशात्मकता बहुधा सूचना का गठन नवीन तथ्यों, आँकड़ों, विचारों तथा दिन-प्रतिदिन के संदेशों और विचारों के आदान-प्रदान से होता है। व्यक्तियों, जिंसों तथा सेवाओं की भाँति, सूचना, अपने उत्पन्न होने के स्थान से अपनी माँग के क्षेत्रों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रवाहित होती है. जब हम माँग-क्षेत्रों के बारे में सोचते हैं, तब हमें आवश्यकता के स्थानों के स्थान पर प्रभावी माँग के स्थानों का भ्रम नहीं होना चाहिए।

      लोगों या व्यक्तियों के प्रवाह के सन्दर्भ में, दलित क्षेत्रों की घटती आबादी वाले पिछड़े इलाकों के प्रवास की तुलना में बड़े तथा प्रबल केन्द्रों में आने-जाने का कार्य अधिक बड़ी मात्रा में होता है। जिंसों के लाने-भेजने के परिप्रेक्ष्य में, विकसित देशों से अर्धविकसित देशों के बीच व्यापार की तुलना में विकसित देशों के मध्य एक-दूसरे के बीच व्यापार अत्यधिक बड़ी मात्रा में होता है।

       इसी प्रकार सूचना प्रधानतया एक प्रणाली के सबल विचार-केन्द्रों के मध्य प्रवाहित होती है। इस प्रक्रिया में आलस्य के टापू परे कर दिए जाते हैं, क्योंकि वस्तुतः वे प्रणाली से बाहर होते हैं। अनिर्दिष्ट होती है; जबकि ब पर खिंचाव न केवल अ के लिए बल्कि किसी भी अन्य सम्भावी आपूर्ति-स्रोत के लिए महत्व रखता है।

46. निम्नलिखित में से कौनसा सूचना के प्रवाह को उत्पन्न करने का कारक है?

(A) माँग

(B) उपयोग

(C) गुणवत्ता

(D) मात्रा

[read more] (A) माँग [/read]

47. समृद्ध देशों के बीच जिंसों के विनिमय को प्रधान रूप से प्रभावित करने वाले कारक कौनसे हैं?

(A) उत्पादन का प्राचुर्य

(B) प्रभावी माँग

(C) आर्थिक विकास का स्तर

(D) सूचना का उत्पन्न होना

[read more] (B) प्रभावी माँग [/read]

48. सूचना का उत्पन्न होना निम्नलिखित में से किस पर आश्रित है?

(A) विचारों की प्रकृति

(B) एक प्रणाली में विचार केन्द्रों की शक्ति

(C) विचारों की अवधि

(D) विचारों की प्रभावशीलता

[read more] (B) एक प्रणाली में विचार केन्द्रों की शक्ति [/read]

49. उत्पन्न होने के स्थान से गन्तव्य स्थान तक सूचना मुक्त रूप से निम्नलिखित में से किस कारण से प्रवाहित होती है?

(A) उत्पन्न होने के स्थान पर विकर्षण

(B) गन्तव्य स्थान पर आकर्षण

(C) उत्पन्न होने के स्थान तथा गन्तव्य स्थान के बीच दूरी

(D) उत्पन्न होने के स्थान पर प्रचुरता

[read more] (B) गन्तव्य स्थान पर आकर्षण [/read]

50. उपरिलिखित गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्न लिखित में से कौनसा है?

(A) सेवाओं को प्रवाह

(C) लोगों का प्रवास

(B) जिंसों का प्रवाह

(D) सूचना का प्रवाह

[read more] (D) सूचना का प्रवाह [/read]

20. Human Geography: Definition, Nature and Scope (मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)

        Human Geography: Definition, Nature and Scope

(मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)



      मानव भूगोल मानव समाज और उनके भौतिक पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन है। मानव भूगोल विज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी पर मानव तथ्यों के स्थानिक वितरण के साथ-साथ विभिन्न मानव समूहों और उनके पर्यावरण के बीच क्षेत्रीय कार्यात्मक अंतःक्रियाओं की जांच करती है। यह एक व्यापक अनुशासन है जिसमें कई तरह के विषय शामिल हैं, जैसे:-

 (i) जनसंख्या : मानव जनसंख्या का वितरण, वृद्धि और विशेषताएँ।

(ii) स्थान : स्थानों की भौतिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ।

(iii) संचलन : मानव प्रवास और गतिशीलता के पैटर्न।

(iv) अर्थव्यवस्था : आर्थिक गतिविधियों का स्थानिक वितरण।

(v) संस्कृति : मानव संस्कृतियों की विविधता और उनकी स्थानिक अभिव्यक्ति।

(vi) पर्यावरण : मानव समाज और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच अंतःक्रिया।

मानव भूगोल की परिभाषा

        मानव भूगोल, भूगोल की प्रमुख शाखा हैं जिसके अन्तर्गत मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक उसके पर्यावरण के साथ सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता हैं। मानव भूगोल की एक अत्यन्त लोकप्रिय और बहु अनुमोदित परिभाषा है- “मानव एवं उसका प्राकृतिक पर्यावरण के साथ समायोजन का अध्ययन।”     

      किसी भी विषय को परिभाषित करना हमेशा मुश्किल होता है। ज्ञान के विस्तार और समाज की प्रगति के साथ समय के साथ विषय की अवधारणा बदलती रहती है। यहाँ कुछ भूगोलवेत्ताओं द्वारा व्यक्त मानव भूगोल की कुछ परिभाषाएँ दी गई हैं।

रैटजेल : “मानव भूगोल मानव समाज और पृथ्वी की सतह के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है”

एलेन सी. सेम्पल : “मानव भूगोल अशांत मनुष्य और अस्थिर पृथ्वी के बीच बदलते संबंधों का अध्ययन है”

विडाल डी ला ब्लाश : “मानव भूगोल पृथ्वी और मानव के बीच अंतर्संबंधों की एक नई अवधारणा प्रस्तुत करता है”

ई. हंटिंगटन : “मानव भूगोल को भौगोलिक वातावरण और मानव गतिविधियों और गुणों के बीच संबंधों की प्रकृति और वितरण के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है”

एच. डी. ब्लिज : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग कैसे स्थान बनाते हैं, हम स्थान और समाज को कैसे व्यवस्थित करते हैं, हम स्थानों और अंतरिक्ष में एक-दूसरे के साथ कैसे बातचीत करते हैं, और हम अपने इलाके, क्षेत्र और दुनिया में दूसरों और खुद को कैसे समझ सकते हैं”

रुबेनस्टीन : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग और मानवीय गतिविधियाँ कहाँ और क्यों स्थित हैं”

मानव भूगोल की प्रकृति  

      मानव भूगोल की प्रकृति अत्यधिक जटिल एवं विस्तृत है। जीन ब्रुश के अनुसार जिस प्रकार अर्थशास्त्र का सम्बन्ध कीमतों से, भू-गर्भशास्त्र का सम्बन्ध चट्टानों से, वनस्पति शास्त्र का सम्बन्ध पौधों से है ठीक उसी प्रकार भूगोल का केन्द्र बिन्दु स्थान से है जिसमें कहाँ व क्यों जैसे प्रश्नों के उत्तरों का अध्ययन किया जाता है। मानव भूगोल मानव को केन्द्रीय भूमिका का अध्ययन करता है। फ्रेडरिक रेटजेल, जिन्हें आधुनिक मानव भूगोल का संस्थापक कहा जाता है।

        उन्होंने मानव समाजों एवं पृथ्वी के धरातल के सम्बन्धों के संश्लेषणात्मक अध्ययन पर जोर दिया है। पृथ्वी पर जो भी मानव निर्मित दृश्य दिखाई देते हैं उन सबका अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत आता है। इसी कारण मानव भूगोल की प्रकृति में मानवीय क्रियाकलाप केन्द्रीय बिन्दु के रूप में रहते हैं। इस प्रकार मानवीय क्रियाकलापों के विकास (कब, क्यों, कैसे) को भौगोलिक दृष्टि से प्रस्तुत करना ही मानव भूगोल की प्रकृति को दर्शाता है।

      मानव भूगोल विभिन्न प्रदेशों के पारिस्थितिक समायोजन व क्षेत्र संगठन के अध्ययन पर केन्द्रित रहता है। पृथ्वी पर रहने वाले मानव के जैविक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के लिए वातावरण के उपयोग का अध्ययन व वातावरण में किए गए बदलाबों का अध्ययन मानव भूगोल का आधार है। सारांशत: यह कहा जा सकता है कि मानव भूगोल मानव व वातावरण के जटिल तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव को केन्द्रीय भूमिका के रूप में रखकर अध्ययन कस्ता है।

       मानव भूगोल की प्रकृति को समझने के लिए, निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए:-

(i) मानव भूगोल, भूगोल की एक प्रमुख शाखा है।

(ii) मानव भूगोल में, मानव और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है

(iii) मानव भूगोल में, मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(iv) मानव भूगोल में, मानव की गतिविधियों और पर्यावरण पर उनके प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।

(v) मानव भूगोल में, मानव निर्मित चीज़ों का भी अध्ययन किया जाता है।

(vi) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(vii) मानव भूगोल में, मानव समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और जैविक विकास का अध्ययन किया जाता है।

(viii) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों को समझने के लिए, सामाजिक विज्ञान की सभी शाखाओं का अध्ययन किया जाता है।

Human Geography

     इस प्रकार मानव भूगोल की प्रकृति यह है कि यह दोनों – सक्रिय मानव और अस्थिर पृथ्वी सतह की पारस्परिक क्रिया का अध्ययन करना है जहाँ भौतिक वातावरण में मानव के लिए अवसरों की सम्भावनाएँ प्रदान करने के साथ कई सीमाएँ हैं। और इसके जवाब में मानव प्राकृतिक वातावरण को संशोधित करता है और उस वातावरण में समायोजित होता है।

मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र

      मानव द्वारा अपने प्राकृतिक वातावरण के सहयोग से जीविकोपार्जन करने के क्रियाकलापों से लेकर उसकी उच्चतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किये गये सभी प्रयासों का अध्ययन मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अतर्गत ही आता है। अतः पृथ्वी पर जो भी दृश्य मानवीय क्रियाओं द्वारा निर्मित हैं, वे सभी मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता हैं।

    पृथ्वी तल पर मिलने वाले मानवीय तत्त्वों को समझने व उनकी व्याख्या करने के लिए मानव भूगोल के अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों का अध्ययन भी करना पड़ता है। मानव भूगोल के विषय क्षेत्र, उपक्षेत्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों से मानव भूगोल के सम्बन्धों को निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत किया गया है।

मानव भूगोल के क्षेत्र उप-क्षेत्र अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध
सामाजिक भूगोल व्यवहारवादी भूगोल

सामाजिक कल्याण का भूगोल

सांस्कृतिक भूगोल

लिंग भूगोल

ऐतिहासिक भूगोल

चिकित्सा भूगोल

मनोविज्ञान

कल्याण

अर्थशास्त्र

समाजशास्त्र

मानव विज्ञान

समाजशास्त्र

मानव विज्ञान

महिला अध्ययन

इतिहास

महामारी विज्ञान

नगरीय भूगोल  नगरीय अध्ययन और नियोजन
राजनितिक भूगोल निर्वाचन भूगोल

सैन्य भूगोल

राजनीति विज्ञान

सैन्य विज्ञान

जनसँख्या भूगोल जनांकिकी
आवास भूगोल नगर/ग्रामीण नियोजन
आर्थिक भूगोल संसाधन भूगोल

कृषि भूगोल

उद्योग भूगोल

विपणन भूगोल

पर्यटन भूगोल

अन्तर्राष्ट्री व व्यापार का भूगोल

अर्थशास्त्र

संसाधन अर्थशास्त्र

कृषि विज्ञान

औद्योगिक अर्थशास्त्र

व्यावसायिक अर्थशास्त्र

वाणिज्य पर्यटन और यात्रा प्रबन्धन

अन्तर्राष्ट्री य व्यापार

 

JUNE 2008 UGC NET SOLVED EXAM PAPER

JUNE 2008

UGC NET SOLVED EXAM PAPER



पेपर II (भूगोल)

 

निर्देश इस प्रश्न-पत्र में पचास (50) बहुविकल्पीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक हैं। सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. V-आकार की घाटी निम्न में निर्मित हुई है-

(A) हिमनदीय अपरदन की प्रौढ़ावस्था में

(B) नदीय अपरदन चक्र की जीर्णावस्था में

(C) नदीय अपरदन चक्र की तरुणावस्था में

(D) शुष्क चक्र की जीर्णावस्था में

[read more] (C) नदीय अपरदन चक्र की तरुणावस्था में [/read]

2. ‘पैंजिआ’ का प्रयोग किसके द्वारा किया गया था?

(A) अल्फर्ड वेगनर

(B) ए. एन. स्ट्रालर

(C) शार्प

(D) डब्ल्यू. एम. स्मिथ

[read more] (A) अल्फर्ड वेगनर [/read]

3. वेंगुएला धारा किस महासागर में प्रवाहित होती है?

(A) प्रशान्त महासागर

(B) हिन्द महासागर

(C) अटलाण्टिक (अन्ध) महासागर

(D) आर्कटिक महासागर

[read more] (C) अटलाण्टिक (अन्ध) महासागर [/read]

4. “दृश्यभूमि संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का प्रकार्य (फलन) है” यह अवधारणा किसके द्वारा प्रस्तुत की गयी?

(A) ग्रिफिथ टेलर

(B) डेविस

(C) पेंक

(D) थॉर्नबरी

[read more] (B) डेविस [/read]

5. अम्ल वर्षा किस कारण से होती है?

(A) वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता

(B) वर्षण द्वारा सल्फ्यूरिक एसिड का प्रक्षाल प्रवाह

(C) उष्णकटिबन्धीय वनों से ग्रीन हाउस (हरित गृह) गैसों के उत्सर्जन में अधिकता

(D) वायुमण्डल में गैसों के संयोजन में असाधारण विभिन्नता

[read more] (B) वर्षण द्वारा सल्फ्यूरिक एसिड का प्रक्षाल प्रवाह [/read]

6. नीचे दो कथन दिए गए हैं, एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) नाम दिया गया है। नीचे दिए गए कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिए-

अभिकथन (A): नदी घाटियाँ अपनी तरुण अवस्था में सामान्यतया संकीर्ण आकार की होती हैं।

कारण (R): जलगर्तिका वेधन नदी घाटियों के नीचे की ओर कटाव के लिए उत्तरदायी प्रमुख अपरदनीय प्रक्रिया है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) का सही स्पष्टीकरण नहीं है

(C) (A) सत्य है, परन्तु (R) असत्य है

(D) (A) असत्य है, परन्तु (R) सत्य है

[read more] (B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) का सही स्पष्टीकरण नहीं है [/read]

7. निम्नलिखित में से किस प्रकार के बादल सबसे निचली परत में होते हैं?

(A) स्तरी

(B) कपासी

(C) कपासी वर्षा

(D) पक्षाभ

[read more] (A) स्तरी [/read]

8. प्रदूषण शिखा परिणाम है-

(A) दबाव प्रवणता द्वारा उत्पन्न एक प्रादेशिक वायु का

(B) तापमान के असमान वितरण का

(C) गुप्त ऊष्मा द्वारा उत्पन्न असामान्यताओं का

(D) वायु संहित के विभिन्न प्रकारों के बीच अन्तर्क्रिया का

[read more] (C) गुप्त ऊष्मा द्वारा उत्पन्न असामान्यताओं का [/read]

9. ध्रुवीय वाताग्रीय (पोलर फ्रन्टल) सिद्धान्त किससे सम्बन्धित है?

(A) व्यापारिक पवन क्षेत्र की उत्पत्ति

(B) उष्णकटिबन्धीय चक्रवात की उत्पत्ति

(C) टॉरनेडो की उत्पत्ति

(D) जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति

[read more] (B) उष्णकटिबन्धीय चक्रवात की उत्पत्ति [/read]

10. प्रवाल द्वीप वलय (ऐटॉल) किसकी भिन्न अवस्थाओं में से एक है?

(A) प्राकृतिक जलाशय

(B) दबाव तन्त्र

(C) प्रवाल विकास

(D) महासागर में कार्बन कुण्ड का विकास

[read more] (C) प्रवाल विकास [/read]

11. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिए

सूची-I (भू-आकृतिक प्रदेश) सूची-II (पहाड़ी/श्रेणी)

(a) अरावली  1. मिशमी पहाड़ियाँ

(b) कर्नाटक पठार 2. दिल्ली रिज

(c) सतपुरा पर्वत 3. बाबा बुदन पहाड़ियाँ

(d) हिमालय 4. मेकल श्रेणी

कूट :

       a b c d

(A) 1 2 3 4

(B) 4 3 2 1

(C) 3 2 1 4

(D) 2 3 4 1

[read more] (D) 2 3 4 1 [/read]

12. वॉन थ्यूनेन मॉडल के अनुसार, एकान्तिक क्षेत्र में केन्द्रीय नगर को घेरते हुए, भूमि उपयोग के खण्डों में से चार निम्नलिखित हैं-

1. ईंधन लकड़ी एवं काष्ठ

2. गहन सस्य कृषि (चारण एवं कन्दमूल की फसले)

3. सस्य कृषि (परती और चरागाह के साथ)

4. बाजार बागवानी और ताजा दूध

    नीचे दिए कूटों का उपयोग करते हुए भूमि उपयोग खण्डों का केन्द्र से बाहर की ओर सही अनुक्रम का चयन कीजिए-

कूट :

(A) 1, 2, 3 और 4

(B) 4, 2, 3 और 1

(C) 4, 1, 2 और 3

(D) 3, 2, 4 और 1

[read more] (C) 4, 1, 2 और 3 [/read]

13. क्षेत्रीय भिन्नता की अवधारणा किसने प्रतिपादित की है?

(A) जीन ब्रून्स

(B) रिचर्ड हार्टशॉर्न

(C) डेविड एम. स्मिथ

(D) एच. एस. वैरोज

[read more] (B) रिचर्ड हार्टशॉर्न [/read]

14. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिए-

सूची-I (पुस्तक)

(a) ज्योग्राफिक ह्यूमेन

(b) इन्फ्लुएंस ऑफ ज्योग्राफिक एनवायरमेन्ट

(c) अर्डकुंडे

(d) अल्माजेस्ट

सूची-II (लेखक)

1. टॉलेमी

2. कार्ल रिट्टर

3. जीन ब्रून्स

4. ई. सी. सेम्पुल

कूट :

       a b c d

(A) 3 4 2 1

(B) 4 3 1 2

(C) 1 2 3 4

(D) 2 1 4 3

[read more] (A) 3 4 2 1 [/read]

15. ब्रिटेन में परिमाणात्मक क्रान्ति को मुख्य रूप से किसने लोकप्रिय बनाया?

(A) डेविड एम. स्मिथ

(B) टी. डब्ल्यू. फ्रीमेन

(C) पीटर हैगेट

(D) एल. डडले स्टैम्प

[read more] (C) पीटर हैगेट [/read]

16. भौगोलिक विचारधारा के विकास से सम्बन्धित निम्नलिखित अनुक्रमों में से कौनसा सही है?

(A) कान्ट-वैरेनियस-वाइडल डि ला ब्लाश-हमवोल्ट

(B) वैरेनियस-कान्ट-हमबोल्ट-वाइडल डि ला ब्लाश

(C) वाइडल डि ला ब्लाश-हमबोल्ट-वैरेनियस-कान्ट

(D) हमबोल्ट-वैरेनियस-कान्ट-वाइडल डि ला ब्लाश

[read more] (B) वैरेनियस-कान्ट-हमबोल्ट-वाइडल डि ला ब्लाश [/read]

17. भारत में किसी प्रदेश का अधिवास प्रतिरूप प्रभावित होता है-

(A) सामाजिक अवसंरचना के द्वारा

(B) भौतिक सहलग्नता के द्वारा

(C) जनसंख्या वृद्धि दर के द्वारा

(D) कृषि पद्धतियों के द्वारा

[read more] (D) कृषि पद्धतियों के द्वारा [/read]

18. नगर-प्रदेश की विशेषता है-

(A) अल्पविकास

(B) पिछड़ापन

(C) खनिज संसाधनों की उपलब्धता

(D) संकेन्द्रित विकास

[read more] (D) संकेन्द्रित विकास [/read]

19. भारत में 1991-2000 के बीच दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर थी- 

(A) 20-11%

(B) 26-20%

(C) 23-60%

(D) 21-34%

[read more] (D) 21-34% [/read]

20. किसी स्थान की केन्द्रीयता किसके आधार पर निर्धारित होती है?

(A) उसकी परिवहन प्रणाली

(B) उसका प्रशासनिक स्तर

(C) उसकी प्रकार्यात्मक सुदृढ़ता

(D) शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या

[read more] (B) उसका प्रशासनिक स्तर [/read]

21. रिमलैण्ड सिद्धान्त के प्रतिपादक का नाम बताइए-

(A) मैकिण्डर

(B) स्पाइकमैन

(C) मॉन्कहाउस

(D) हार्टशॉर्न

[read more] (B) स्पाइकमैन [/read]

22. भारत में ग्रामीण विकास के लिए निम्नलिखित में से कौन सा मॉडल उपयुक्त है?

(A) ट्रक-रेलवे-नौप्रेषण-बैलगाड़ी

(B) बैलगाड़ी-ट्रक-रेलवे-जलयान

(C) रेलवे-जलयान-वायु-परिवहन-बैलगाड़ी

(D) बैलगाड़ी-रेलवे-वायु-परिवहन-जलयान

[read more] (B) बैलगाड़ी-ट्रक-रेलवे-जलयान [/read]

23. निम्नलिखित में से किसने शस्य संयोजन विधि को सर्वप्रथम सूत्रबद्ध किया?

(A) नेल्सन

(B) दोई

(C) रफीउल्ला

(D) वीवर

[read more] (D) वीवर [/read]

24. जनसंख्या प्रवास-प्रवाह किसके द्वारा निर्धारित होता है?

(A) राजनीतिक निर्णय

(B) ‘पुश एण्ड पुल’ कारक

(C) ऐतिहासिक घटनाएँ

(D) धार्मिक कारक

[read more] (B) ‘पुश एण्ड पुल’ कारक [/read]

25. हॉयट ने प्रतिपादित किया-

(A) शहर संरचना का खण्डीय मॉडल

(B) कोटि-आकार नियम

(C) प्रमुख (प्राइमेट) नगर की अवधारणा

(D) नगर संरचना का बहुकेन्द्रीय मॉडल

[read more] (A) शहर संरचना का खण्डीय मॉडल [/read]

26. सूची-I का सूची-II के साथ मिलान कीजिए और नीचे दिए कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिए-

सूची-I          सूची-II

(राज्य)    (लौह-अयस्क का संचित भण्डार %)

(a) ओडिशा    1. 0.7

(b) झारखण्ड  2. 18

(c) मध्य प्रदेश  3.26

(d) राजस्थान   4. 22

कूट :

       a b c d

(A) 3 4 2 1

(B) 4 3 1 2

(C) 1 2 3 4

(D) 2 1 4 3

[read more] (A) 3 4 2 1 [/read]

27. जनांकिकी संक्रमण मॉडल निम्नलिखित में से किस क्षेत्र के जनांकिकी अनुभव के आँकड़ों पर आधारित है?

(A) उत्तर-पश्चिमी यूरोप

(B) संयुक्त राज्य अमरीका

(C) दक्षिण-पूर्वी एशिया

(D) दक्षिणी अमरीका

[read more] (A) उत्तर-पश्चिमी यूरोप [/read]

28. नीचे दो कथन दिए गए हैं, एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) नाम दिया गया है। नीचे दिए गए कूटों से अपने उत्तर का चयन कीजिए-

अभिकथन (A): जापान एक विकसित देश है।

कारण (R): देश के विकास के लिए उसके प्राकृतिक संसाधनों का देश के भीतर होना नितान्त आवश्यक है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) का सही स्पष्टीकरण नहीं है

(C) (A) सही है और (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (C) (A) सही है और (R) गलत है [/read]

29. वेबर द्वारा प्रस्तावित औद्योगीकरण के सिद्धान्त का नाम बताइए-

(A) परिवहन लागत सिद्धान्त

(B) संसाधन आधारित सिद्धान्त

(C) स्वच्छन्द (फुटलूज) उद्योग सिद्धान्त

(D) श्रम आधारित सिद्धान्त

[read more] (A) परिवहन लागत सिद्धान्त [/read]

30. कृषि के विविधीकरण की आधुनिक अवधारणा किससे सम्बन्धित है?

(A) फसलों की अधिक संख्या

(B) मूल्यवर्द्धित फसलें

(C) एकल फसलें

(D) पारिस्थितिक रूप से सर्वाधिक उपयुक्त फसलें

[read more] (D) पारिस्थितिक रूप से सर्वाधिक उपयुक्त फसलें [/read]

31. वॉन-थ्युनेन ने किस वर्ष में कृषि भूमि उपयोग के भूमण्डलीकरण का मॉडल विकसित किया है?

(A) 1817

(B) 1826

(C) 1850

(D) 1847

[read more] (B) 1826 [/read]

32. गोंडों का संकेन्द्रण मुख्य रूप से कहाँ है?

(A) भारतीय थार मरुस्थल में

(B) बघेलखण्ड प्रदेश में

(C) बस्तर प्रदेश में

(D) बुन्देलखण्ड प्रदेश में

[read more]  [/read]

33. निम्नलिखित में से कौनसी फसल अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बड़े पैमाने की पूर्ति और माँग के लिए उपयोगी होती है?

(A) मिलेट (ज्वार बाजरा आदि)

(B) चावल

(C) गेहूँ

(D) चना

[read more] (C) गेहूँ [/read]

34. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून की उत्पत्ति मुख्यतः किससे सम्बन्धित है?

(A) एलनिनो और एलनिनो-दक्षिणी दोलन घटनाएँ

(B) स्थल स्थित मौसमी क्षोभ

(C) भारतीय उपमहाद्वीप की आकृति

(D) भारतीय महासागर में समुद्रतलीय तापमान परिवर्तन

[read more] (A) एलनिनो और एलनिनो-दक्षिणी दोलन घटनाएँ [/read]

35. राज्यों का कौनसा अनुक्रम लिंग अनुपात के अधोमुखी क्रम में है?

(A) आन्ध्र प्रदेश-तमिलनाडु-छत्तीसगढ़-केरल

(B) तमिलनाडु-केरल-आन्ध्र प्रदेश-छत्तीसगढ़

(C) केरल-छत्तीसगढ़-तमिलनाडु-आन्ध्र प्रदेश

(D) छत्तीसगढ़-आन्ध्र प्रदेश-केरल-तमिलनाडु

[read more] (C) केरल-छत्तीसगढ़-तमिलनाडु-आन्ध्र प्रदेश [/read]

36. मेघालय राज्य निम्नलिखित में से किस जनजातीय संयोजन के लिए जाना जाता है?

(A) खासी-मिजो

(B) गारो-खासी

(C) नागा-मिजो

(D) खासी-नागा

[read more] (B) गारो-खासी [/read]

37. नीचे दो कथन दिए गए हैं, एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) नाम दिया गया है। नीचे दिए गए कूटों से अपने उत्तर का चयन कीजिए- अभिकथन (A): नये औद्योगिक नगरों में पुरुष-प्रौढ़ जनसंख्या की अधिकता होती है।

कारण (R) : प्रवास आयु एवं लिंग चयनात्मक है।

कूट :

(A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (A) का सही स्पष्टीकरण नहीं है

(C) (A) सही है, परन्तु (R) गलत है

(D) (A) गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] (A) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है [/read]

38. महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट किस नाम से जाना जाता है?

(A) नीलगिरि

(C) अन्नामलाई

(B) कार्डमम् हिल्स

(D) सह्याद्रि

[read more] (D) सह्याद्रि [/read]

39. महासागर और समुद्र की गहराइयाँ दर्शाने वाले मानचित्र को कहते हैं-

(A) मानव जाति मानचित्र

(B) पर्वतीय मानचित्र

(C) अनुगम्भीर मानचित्र

(D) भूवैज्ञानिक मानचित्र

[read more] (C) अनुगम्भीर मानचित्र [/read]

40. निम्नलिखित में से कौन-सा सबसे बड़ा मानचित्रीय मापक है?

(A) 1:500,000

(B) 1:100,000

(C) 1:50,000

(D) 1:10,000

[read more] (D) 1:10,000 [/read]

41. नदी का बेसिन है-

(A) लघु प्रदेश

(B) वृहत प्रदेश

(C) पहाड़ी प्रदेश

(D) पिछड़ा प्रदेश

[read more] (B) वृहत प्रदेश [/read]

42. निम्नलिखित में से कौन-सा नोडल प्रदेश है?

(A) औद्योगिक प्रदेश

(B) जनजातीय प्रदेश

(C) महानगरीय प्रदेश

(D) राज्य में केन्द्रीय क्षेत्र (सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट)

[read more] (D) राज्य में केन्द्रीय क्षेत्र (सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट) [/read]

43. अग्रगामी सहलग्नताएँ सुलभ बनाती हैं-

(A) विविधीकरण को

(B) असन्तुलित विकास को

(C) संसाधनों पर अत्यधिक दबाव को

(D) सामाजिक विकास को

[read more] (A) विविधीकरण को [/read]

44. राष्ट्रीय दूरस्थ संवेदन एजेन्सी (एन.आर.एस.ए.) कहाँ अवस्थित है?

(A) देहरादून में

(B) हैदराबाद में

(C) बंगलुरू में

(D) थुम्बा में

[read more] (B) हैदराबाद में [/read]

45. निम्नलिखित में कौन-सी केन्द्रारेखीय माप है?

(A) मानक दूरी

(B) माध्यिका

(C) समान्तर माध्य

(D) ज्यामितीय माध्य

[read more] (B) माध्यिका [/read]

46. सूची-I का सूची-II के साथ मिलान कीजिए और नीचे दिए कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिए-

सूची-I               सूची-II

(a) गणितीय परम्परा 1. फीनीशियन

(b) अन्वेषण 2. थेल्स

(c) आगमनात्मक प्रणाली 3. हॉमर

(d) साहित्यिक परम्परा 4. अरस्तू

कूट :

       a b c d

(A) 3 4 2 1

(B) 4 3 1 2

(C) 1 2 3 4

(D) 2 1 4 3

[read more] (D) 2 1 4 3 [/read]

निर्देश (प्रश्न 47 से 50 तक) निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए तथा उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

     हरित क्रान्ति का एक खतरा यह है कि इसमें मूल स्थानीय बीजों को वर्जित करके उनकी जगह उच्च उत्पादन हेतु विकसित उन्नत बीजों का उपयोग आवश्यक है। यदि नये उन्नत बीजों पर किसी पादक रोग का आक्रमण हो गया, तो राष्ट्र की सम्पूर्ण फसल एक ही मौसम में नष्ट हो सकती है। शस्य अभिजनन सम्बन्धी वर्तमान शोधों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग किस्मों के विकास पर बल दिया जा रहा है। ये किस्में संक्रामक रोगों से कम प्रभावित होती हैं और फिर भी कम उर्वरकों के उपयोग के साथ अधिक उत्पादन दे सकती हैं। दूसरा खतरा, अधिक दक्षता के उद्देश्य से मशीनी कृषि करने हेतु छोटे खेतों की चकबन्दी करके खेतों के आकार में वृद्धि करने में है। ऐसा करने में कई प्रकार की फसलों का उत्पादन बन्द हो जाता है और जीवनयापन हेतु एक फसल पर निर्भरता हो जाती है। पारम्परिक कृषि पद्धतियों में एशिया का कृषक कई खाद्य फसलों को पैदा करता था, ताकि यदि एक फसल नष्ट हो जाए, तो भुखमरी की स्थिति से बचने के लिए दूसरी फसलों से पर्याप्त खाद्य पदार्थ मिल जाए। अतः, छोटा किसान अधिक दक्ष एक फसली कृषि अपनाने का इच्छुक नहीं है।

     अब यह स्पष्ट लगता है कि उत्पादन में भावी वृद्धि, औद्योगिक मध्य अक्षांशीय तकनीक पर निर्भरता कम करने के लिए हरित क्रान्ति की तकनीकों को संशोधित करके ही प्राप्त की जा सकती है। नये बीजों और कृषि पद्धतियों तथा उर्वरकों का उपयोग इन सभी को प्राचीन कृषि प्रणालियों और स्थानीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों के साथ ज्यादा अनुकूल होना होगा।

      मृदा वैज्ञानिकों ने इंगित किया कि वर्टिसॉल मिट्टी के वृहत् क्षेत्रों की कृषि के अन्तर्गत लाना है। वर्टिसॉल मिट्टियाँ पोषक तत्वों में समृद्ध है, परन्तु उनमें जुताई की कठिनाई को दूर करने के लिए मशीनी कृषि की आवश्यकता होगी। प्राचीन हल एवं कुढाली से इन मिट्टियों में कृषि नहीं की जा सकती। दक्षिण-पूर्वी एशिया में सवाना पर्यावरण वाली अधिकांश कृषि भूमि वर्तमान मानकों के आधार पर पहले ही विकसित की जा चुकी है। अनुर्वर ऑक्सीवॉल मिट्टियों और उष्णकटिबन्धीय मरुस्थलों की सीमा पर स्थित अर्द्धमरुस्थलीय कटिबन्धों में कृषि के किसी बड़े विस्तार की आशा करना अवास्तविक है।

47. ऊपर दिए गए लेखांश की केन्द्रीय विषयवस्तु क्या है?

(A) पारस्परिक कृषि पर बल की आवश्यकता

(B) औद्योगिक मध्य अक्षांशीय प्रौद्योगिकी पर बल की आवश्यकता

(C) हरित क्रान्ति की तकनीकों में सुधार की आवश्यकता

(D) अनुपजाऊ भूमियों के विकास की आवश्यकता

[read more] (C) हरित क्रान्ति की तकनीकों में सुधार की आवश्यकता [/read]

48. हरित क्रान्ति का एक खतरा है-

(A) एक फसली कृषि

(B) बहुफसली कृषि

(C) मशीनों का प्रयोग

(D) खेतों का छोटा आकार

[read more] (A) एक फसली कृषि [/read]

49. वर्तमान शोध अभिमुख है-

(A) नये उर्वरकों और कीटनाशियों के विकास की ओर

(B) स्थानीय दशाओं के लिए उपयुक्त बीजों का विकास

(C) ऑक्सीसॉल वाले क्षेत्रों के विकास की ओर

(D) नई मशीनों के विकास की ओर

[read more] (B) स्थानीय दशाओं के लिए उपयुक्त बीजों का विकास [/read]

50. पारम्परिक एशियाई कृषि बल देती है-

(A) मशीनी कृषि पर

(B) बड़ी मात्रा में उर्वरकों के उपयोग पर

(C) एक फसली कृषि पर

(D) बहुफसली कृषि प

[read more] (D) बहुफसली कृषि प [/read]

MULTIDISCIPLINARY COURSE MDC-3 For Science and Commerce (Theory- Economic Geography) Solved Questions Paper 2024

(MULTIDISCIPLINARY COURSE : MDC-3 For Science and Commerce)

UG (Sem.-III) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

GEOGRAPHY

(Economic Geography)

Time: Three Hours]  [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all sections as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question.[10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) Economic Geography include the study of:

(a) Erosional landform

(b) Ocean deposits

(c) Economic activities

(d) Population

आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत पढ़ा जाता है:

(a) अपरदन द्वारा निर्मित स्थलाकृति

(b) समुद्री निक्षेप

(c) आर्थिक क्रियाकलाप

(d) जनसंख्या

उत्तर- (c) आर्थिक क्रियाकलाप

(ii) Research and Innovation belongs to which group of occupation?

(a) Primary

(b) Secondary

(c) Tertiary

(d) All of the above

शोध एवं नवाचार किस व्यवसाय वर्ग के हैं?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर- (c) तृतीयक

(iii) Economic Geography is a part of:

(a) Human Geography

(b) Practical Geography

(c) Social Geography

(d) Physical Geography

आर्थिक भूगोल शाखा है:

(a) मानव भूगोल

(b) प्रयोगात्मक भूगोल

(c) सामाजिक भूगोल

(d) भौतिक भूगोल

उत्तर- (a) मानव भूगोल

(iv) Lumbering occupation is a part of which group?

(a) Primary

(b) Secondary

(c) Both (a) and (b)

(d) None of the above

लकड़ी काटना व्यवसाय किस वर्ग का हिस्सा है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) दोनों (a) और (b)

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (a) प्राथमिक

(v) Monsoon region practices this occupation:

(a) Agriculture

(b) Mining

(c) Tourism

(d) All of the above

मॉनसून प्रदेश में यह व्यवसाय किया जाता है:

(a) कृषि

(b) खनन

(c) पर्यटन

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर- (a) कृषि

(vi) The largest producer of cotton textile in the world is:

(a) China

(b) Japan

(c) U.S.A.

(d) India

विश्व में सूती वस्त्र का सबसे बड़ा उत्पादक है:

(a) चीन

(b) जापान

(c) सं.रा. अमेरिका

(d) भारत

उत्तर- (a) चीन

(vii) Detroit is famous for which industry?

(a) Motor Car

(b) Cotton Textile

(c) Iron and Steel

(d) None of the above

डेट्राइट किस उद्योग के लिए प्रचलित है?

(a) मोटर कार

(b) सूती वस्त्र

(c) लौह-इस्पात

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (a) मोटर कार

(viii) In India Surat is famous for which industry?

(a) Iron and Steel

(b) Automobile

(c) Cotton Textile

(d) None of the above

भारत में सूरत किस उद्योग के लिए प्रचलित है?

(a) लौहा एवं इस्पात

(b) ऑटोमोबाइल

(c) सूती वस्त्र

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (c) सूती वस्त्र

(ix) The full form of ‘SEZ’ is:

(a) Special Economic Zone

(b) Social Economic Zone

(c) Secure Entry Zone

(d) Super Energy Zone

सेज का पूर्ण रूप है:

(a) विशेष आर्थिक क्षेत्र

(b) सामाजिक आर्थिक क्षेत्र

(c) सुरक्षित प्रवेश क्षेत्र

(d) विशेष ऊर्जा क्षेत्र

उत्तर- (a) विशेष आर्थिक क्षेत्र

(x) The headquarter of WTO is:

(a) Tokyo

(b) Paris

(c) Geneva

(d) London

विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय है:

(a) टोक्यो

(b) पेरिस

(c) जेनेवा

(d) लंदन

उत्तर- (c) जेनेवा

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. Define Economic Geography.

आर्थिक भूगोल को परिभाषित कीजिए।

3. Describe different types of Economic Activities.

विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों को बताइए।

4. What is Commercial Grain Farming?

वाणिज्यिक अनाज कृषि किसे कहते हैं?

5. Discuss important factors for location of industries.

उद्योगों की अवस्थिति के लिए महत्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

6. What is International Trade?

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार किसे कहते हैं?

7. What is Special Economic Zone?

विशेष आर्थिक क्षेत्र क्या है?

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Define the meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के अर्थ एवं क्षेत्र को परिभाषित कीजिए।

9. Discuss the importance of Economics Activates.

आर्थिक क्रियाकलापों के महत्व को बताइए।

10. Explain the production and distribution of cotton textile industry of India or China.

भारत अथवा चीन में सूती वस्त्र उद्योग के उत्पादन एवं वितरण की व्याख्या कीजिए।

11. Discuss the role of WTO in terms of International Trader.

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

12. What do you mean by Special Economic Zone? Discuss the SEZ in India.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? भारत में सेज़ की चर्चा कीजिए।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. Define Economic Geography.

आर्थिक भूगोल को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

3. Describe different types of Economic Activities.

विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों को बताइए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

          मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

         द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

4. What is Commercial Grain Farming?

वाणिज्यिक अनाज कृषि किसे कहते हैं?

उत्तर- यह कम जनसंख्या वाला ऐसा क्षेत्र है जहाँ कृषि का उद्देश्य व्यापार करना होता है। उत्तरी अमेरिका में प्रेयरी, रूस में स्टेपी, अर्जेण्टाइना में पम्पा, आस्ट्रेलिया में मरे-डार्लिंग बेसिन आदि इसी कृषि प्रदेश में आते हैं।

अन्य विशेषतायें-

          सैकड़ों हेक्टेयर के खेत तथा एकाकी मकान इस प्रदेश में कृषि की पहचान होते हैं। फार्मों में व्यापक पैमाने पर यंत्रों का प्रयोग होता है, तथा एक या दो व्यक्ति मिलकर फसल संबंधी सभी कार्य जुताई-बुआई, निराई-गुड़ाई कटाई-महाई, भण्डारण आदि करते हैं। कटाई के समय कभी-कभी अस्थाई श्रमिक भी लगाये जाते हैं।

          यहाँ कीटनाशक दवाओं का प्रयोग, खाद, सिंचाई का प्रयोग पर्याप्त होता है। वर्षा प्राय: 25 से 50 सेमी० तक होती है अतः गेहूँ ही प्रधान फसल है। यहाँ की मिट्टी में नमी पर्याप्त मात्रा में होती है, अतः प्रति इकाई उपज अधिक होती है।

          कृषि व्यापार पर आधारित होती है। विदेशों में माँग कम होने या कीमत गिरने या अत्यधिक उत्पादन होने पर फसल या तो जानवरों को खिलाई जाती है या जला दी जाती है।

5. Discuss important factors for location of industries.

उद्योगों की अवस्थिति के लिए महत्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- किसी भी उद्योग में लागत को कम करने तथा लाभ को बढ़ाने के लिए एक अनुकूल स्थान की आवश्यकता होती है। उ‌द्योगों की स्थापना को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं:

1. भौगोलिक कारक

2. आर्थिक कारक

3. राजनीतिक कारक

1. भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

         इसमें कच्चा माल, शक्ति, श्रम, परिवहन तथा संचार, बाजार, जलवायु, जल आपूर्ति तथा सस्ती भूमि शामिल है।

कच्चा माल (Access to Raw Material):-

       कोई भी उ‌द्योग कच्चे माल के द्वारा ही तैयार माल उत्पन्न करता है और यह कच्चे माल दो प्रकार के होते हैं: वजन ह्रास और बिना वजन ह्रास। सामान्यता उ‌द्योग उन्ही स्थानों पर लगाए जाते हैं अहां कच्चे माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो, जैसे वन, कृषि क्षेत्र तथा समुद्र के निकट आदि। अधिकांश लौह इस्पात उ‌द्योग वहां स्थापित किया जाता है जहां लौह अयस्क और कोयला दोनों ही उपलब्ध हों क्योंकि दोनों वजन हास कच्चे माल है।

       इसी प्रकार निर्माण प्रक्रिया में जिस कच्चे माल का भार घटता है उसे वजन हासमान पदार्थ कहते हैं। कुछ वस्तुएं ऐसी भी होती है जिनके भार का हास नहीं होता, जैसे 1 टन सूत बनाने के लिए 1 टन रुई की आवश्यकता होती है। वजन हास उ‌द्योग है लौह इस्पात उ‌द्योग, गन्ने से चीनी बनाना, लकड़ी से लुग्दी, लुगदी से कागज, लेटेक्स से रबर आदि।

शक्ति (Access to source of Energy):-

       उ‌द्योगों के मशीनों को चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। ये शक्ति के सदन हैं: तापीय शक्ति, पेट्रोलियम ऊर्जा, विद्युत शक्ति, जल विद्युत शक्ति, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा आदि। अधिकांश उ‌द्योग शक्ति के साधनों के निकट ही स्थापित होते हैं।

श्रम (Access to Labour supply):-

       बिना श्रम के किसी भी उ‌द्योग की कल्पना नहीं की जा सकती है, हालांकि पहले यह पूर्णतः मानव श्रम पर आधारित था जबकि अब कंप्यूटर और मशीनों के आ जाने से मानव श्रम की कम जरुरत पड़ती है परंतु अब कुशल मानव श्रम की आवश्यकता बढ़ गई है।

परिवहन तथा संचार के साधन (Transport and communication):-

       कच्चे माल को कारखाना तक लाने और तैयार माल को कारखाना से बाजार भेजने या निर्यात के लिए परिवहन के विकसित साधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए अधिकांश उद्‌द्योग रेलवे लाइन या बंदरगाह के निकट स्थापित होते हैं। परिवहन के साथ ही संचार के साधन जैसे डाक, तार, टेलीफोन और इन्टरनेट व ईमेल इत्यादि सूचनाओं का आदान-प्रदान तीव्र गति से करते हैं जो सहायक सिद्ध होते हैं।

बाजार (Access to Market):-

      उद्योगों का मुख्य उ‌द्देश्य ही है कि तैयार माल को जरूरतमंदों के पास पहुंचाया जाए नहीं तो उत्पादन का खपत नहीं हो पायेगा। इसके लिए एक के अच्छे बाजार की आवश्यकता होती है। इसलिए अधिकांश उद्‌द्योग बाजार के निकट या फिर बाजार से करखाने तक परिवहन के सांधन अच्छा हो तो बाजार से थोड़ी दूर भी स्थापित हो सकता है।

जलवायु (Climate):-

         जलवायु उ‌द्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। बहुत उ‌द्योगों के लिए नम जलवायु की आवश्यकता होती है और बहुत सारे उ‌द्योगों के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है।

जल (Availability of Water):-

      अधिकांश उ‌द्योग भारी मात्रा में जल का उपयोग करते हैं। इसलिए अधिकांश उ‌द्योग जल स्रोतों के निकट स्थापित होते हैं। जैसे टाटा का लौह इस्पात उ‌द्योग खरकई और स्वर्णरेखा नदियों से जल प्राप्त करता है।

भूमि (Availability of Cheap Land):-

       उ‌द्योगों को स्थापित करने के लिए विस्तृत भूमि की आवश्यकता होती है क्योंकि इसमें उत्पादन के लिए मशीन स्थापित करना, कच्चे माल रखने के लिए व्यवस्था करना, उत्पादित माल को सुरक्षित रखना तथा मजदूरों के रहने के लिए व्यवस्था करना आदि में बहुत ज्यादा भूमि की आवश्यकता होती है। इसलिए भूमि सस्ती होनी चाहिए।

2. आर्थिक कारक (Economic Factor)

       इसमें मुख्य रूप से पूंजी, बैंकिंग सुविधा तथा बीमा सुविधा आती है।

पूंजी (Capital Flow):-

     किसी भी उद्‌योग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है। कारखाना लगाने, कच्चे माल खरीदने, मजदूरों को वेतन देने से लेकर बाजार तक पहुंचाने के लिए एक बड़ी रकम की आवश्यकता होती है।

बैंकिंग सुविधा (Banking Facility):-

        कारखाना के लगातार विकास के लिए निरंतर बहुत ज्यादा पूंजी की आवश्यकता पड़ती रहती हैं और इसीलिए बैंक उन्हें ऋण सुविधा के द्वारा यह रकम देते रहते हैं, जिससे उद्‌द्योगों का विकास होता है।

बीमा सुविधा (Insurance Facility):-

       आजकल जीवन के हर क्षेत्र में बीमा एक जरूरत बन गई है। इसी प्रकार किसी उ‌द्योग के लिए भी यह बहुत बड़ी जरूरत बन गई है। भारी मशीनों का बीमा, भूमि का बीमा, कारखाना का बीमा, श्रमिकों का बीमा से लेकर हर चीज का बीमा आवश्यक हो गया है।

3. राजनैतिक कारक (Political Factors)

         इसके अंतर्गत सरकार की नीतियां और राजनैतिक स्थिरता आती है।

सरकार की नीतियाँ (Government Policies):-

         उ‌द्योग की स्थापना में सरकार की नीतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

जैसे यदि किसी देश में सरकार कारखानों का राष्ट्रीयकरण कर रही हो तो वहां पर उद्‌द्योगपति अपने उद्‌द्योग नहीं लगाएंगे इसके विपरीत यदि कहीं टैक्स में छूट दिया जा रहा है तो उ‌द्योगपति वहीं पर अपना कारखाना लगाने लगते हैं।

राजनैतिक स्थिरता (Political Stability):-

        कोई भी कारखाना वहीं स्थापित हो सकता है जहां राजनीतिक स्थिरता हो। युद्ध और अशांति की स्थिति में कोई भी उ‌द्योग विकास नहीं कर सकता।

उ‌द्योगों के बीच लिंक (Access to Agglomeration Economies):-

        कई उ‌द्योगों अपने आस-पास के किसी बड़े या अन्य उ‌द्योगों से लाभान्वित होते हैं। मैं Agglomeration Economies के रूप में जाने जाते हैं। उ‌द्योगों के बीच लिंक होने से बचत भी होती है।

      इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी भी उ‌द्योग के स्थापित होने में कई कारक काम करते है जहां पर उपरोक्त में से अधिकतम कारक मिल पाते हैं उ‌द्योगों की स्थापना नहीं होती है।

6. What is International Trade?

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार किसे कहते हैं?

उत्तर- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान या व्यापार के रूप में संदर्भित किया जाता है। इस तरह का व्यापार विश्व अर्थव्यवस्था में योगदान देता है और उसे बढ़ाता है। सबसे अधिक कारोबार की जाने वाली वस्तुएँ टेलीविज़न सेट, कपड़े, मशीनरी, पूंजीगत सामान, भोजन, कच्चा माल आदि हैं।

       अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में असाधारण वृद्धि हुई है, जिसमें विदेशी परिवहन, यात्रा और पर्यटन, बैंकिंग, भंडारण, संचार, वितरण और विज्ञापन जैसी सेवाएँ शामिल हैं। अन्य समान रूप से महत्वपूर्ण विकास विदेशी निवेश में वृद्धि और एक अंतरराष्ट्रीय देश में विदेशी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन है।

     ये विदेशी निवेश और उत्पादन कम्पनियों को अपने अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के करीब आने में मदद करते हैं, जिससे उन्हें बहुत कम दर पर वस्तुएं और सेवाएं उपलब्ध होती हैं।

     उपरोक्त सभी गतिविधियाँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अंग हैं। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उत्पादन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के दो पहलू हैं, जो दुनिया भर में दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं।

7. What is Special Economic Zone?

विशेष आर्थिक क्षेत्र क्या है?

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

        विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना के कई लाभ हो सकते है:-

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Define the meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के अर्थ एवं क्षेत्र को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

9. Discuss the importance of Economics Activates.

आर्थिक क्रियाकलापों के महत्व को बताइए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसे आर्थिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएँ करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

     मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

    द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

     इसी प्रकार लौह अयस्क का खनन प्राथमिक व्यवसाय है, लेकिन लोहा-इस्पात का निर्माण गौण व्यवसाय है। विभिन्न प्रकार के उद्योग एक-दूसरे के निकट स्थापित हो जाते हैं, क्योंकि एक उद्योग का तैयार माल दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग अनेक प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योगों को विकसित कर सकता है।

     उद्योगों का विकास कच्चे माल, शक्ति, श्रमिक, पूंजी और तैयार माल के लिए बाजार की उपलब्धि पर निर्भर है। इन कारकों के अलावा परिवहन और संचार की सुविधाएं, कच्चे माल और शक्ति का लागत मूल्य, श्रमिकों का वेतन तथा तैयार माल का लागत मूल्य भी उद्योगों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है।

     किसी देश में गौण व्यवसायों में कितनी विविधता है तथा उन व्यवसायों में कितने लोग काम करते हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में औद्योगिक विकास कितना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में प्राथमिक व्यवसायों की तुलना में गौण व्यवसायों में अधिक लोग काम करते हैं।

     उद्योगों में कार्यरत लोगों की संख्या, उपयोग में आने वाली यान्त्रिक शक्ति तथा निर्मित उत्पादों के मूल्य के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते हैं यथा- वृहत् उद्योग, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग।

     दस्तकार स्थानीय पदार्थों का उपयोग करके दस्तकारी की वस्तुएं बनाते हैं। हथकरघा, बुनकर, टोकरी बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, आदि गौण व्यवसायों में लगे हैं। इन गौण व्यवसायों को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग की प्रत्येक इकाई में लोग कम संख्या में काम करते हैं और इनमें यांत्रिक शक्ति का प्रयोग नहीं होता है।

    लघु उद्योग यांत्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं। ये उद्योग बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाने हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुएं बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां जैसे- रेडियो, टी. वी. सेट, प्लास्टिक की वस्तुएं, सामान्यतः लघु उद्योगों की श्रेणी में आते हैं।

Tertiary and Quaternary Economic

प्लास्टिक की वस्तुएं

     वृहत् उद्योगों में सैकड़ों लोग काम करते हैं और इनमें करोड़ों रुपए की पूंजी लगी हुई होती है। इनमें से कुछ उद्योग जैसे मोटर कार उद्योग या दुपहिया वाहन उद्योग अधिक उत्पादन के लिए एसेम्बली लाइन तकनीक का उपयोग करते हैं। एसेम्बली लाइन में अलग-अलग स्थानों पर कच्चे पदार्थ तथा विविध पुर्जों को जोड़ने का कार्य होता है।

     एसेम्बली लाइन पर जैसे-जैसे निर्माणाधीन वस्तु आगे सरकती है, प्रत्येक श्रमिक कोई निश्चित काम करता है, फिर दूसरी निर्माणाधीन वस्तु में वह वही काम करता है। इस तरह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु का निर्माण पूरा हो जाता है और इस प्रकार एसेम्बली लाइन में से निर्मित वस्तु बाहर निकलती है। इस विधि में प्रत्येक श्रमिक किसी एक काम में विशेष दक्ष होता है, जिसे वह बार-बार दोहराता है। निर्माण उद्योगों के परिणामस्वरूप प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, मत्स्य ग्रहण, आदि में भी मशीनों का खूब प्रयोग होने लगा है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

    वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में और विशेषकर विकसित देशों में चतुर्थक व्यवसाय में संलग्न लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस व्यवसाय के लोगों में उच्च वेतनमान और पदोन्नति की चाह में गतिशीलता अधिक पाई जाती है।

    कम्प्यूटर के बढ़ते प्रयोग और सूचना प्रौद्योगिकी ने इस व्यवसाय के महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप औद्योगिक समाज के तकनीकी तत्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गया है और वर्तमान आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से उन अप्रत्यक्ष उत्पादों से प्रभावित हो गए हैं जिनके उत्पादन में ज्ञान, सूचना और संचा अधिक महत्वपूर्ण है।

10. Explain the production and distribution of cotton textile industry of India or China.

भारत अथवा चीन में सूती वस्त्र उद्योग के उत्पादन एवं वितरण की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा रुग्ण उद्योग भी है। भारत में सर्वाधिक कर्मचारी इसी उद्योग में संलग्न है। भारत कभी विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक देश हुआ करता था। लेकिन, इंगलैण्ड में हुए औद्योगिक क्रांति के कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को प्रायोजित तरीके से पीछे कर दिया गया।

विकास / वृद्धि

    सूती वस्त्र उद्योग यद्यपि भारत का सबसे प्राचीन उद्योग है। फिर इसका आधुनिक कारखाना 1818 ई० में कलकता के ‘फोर्ट ग्लोस्टर’ नामक स्थान पर लगाया गया था। लेकिन कच्चे माल के अभाव में असफल रहा। पुनः सफल सूती वस्त्र का कारखाना 1850 ई० में कलकत्ता में स्थापित किया गया। इस सफल प्रयास के बाद इस उद्योग का विकास सतत् जारी है। 

      1905 ई० तक भारत में 206 सूती वस्त्र के मील स्थापित हो चुके थे। 1958ई० तक भारत में मीलों की संख्या 1767 पहुंच गयी थी। वर्तमान समय में इसकी संख्या बढ़कर 2000 से भी अधिक हो चुकी है।

स्थानीयकरण

      बेवर ने अपने न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत में बताया कि सूती वस्त्र उद्योग शुद्ध कच्चा माल पर आधारित एक ऐसा उद्योग है जिसमें हम जितना कच्चा माल लगाते है उतने ही मात्रा में शुद्ध उत्पाद प्राप्त करते है। ऐसे उद्योगों को समभार उद्योग कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्योगों का स्थानीकरण कच्चे माल वाले क्षेत्रों में, बाजार में या दोनों स्थानों पर हो सकता है। जैसे- मुम्बई के आसपास इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है क्योंकि महाराष्ट्र के काली मिट्टी की भूमि पर बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है।

      पुनः इस उद्योग का स्थानीयकरण कोलकाता के आस-पास हुआ है जबकि पूरे पश्चिम बंगाल में कपास की खेती कहीं नहीं की जाती है। अतः कलकत्ता के आस-पास सूती वस्त्र उद्योग विकास बाजार के कारण हुआ है।

विकास के विभिन्न चरण या नवीन प्रवृति या वितरण

    भारत उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाला देश है। इसलिए सम्पूर्ण भारत में सदैव सूती वस्त्र की माँग होती रही है। प्रारंभ में इसके विकास में केन्द्रीयकरण की प्रवृति थी। कालान्तर में यह विकेन्द्रीकृत उद्योग बना। केन्द्रीयकरण से विकेन्द्रीकृत उद्योग बनने में काफी लम्बा समय लगा है। इस समय को चार चरण में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

प्रथम चरण:-

    प्रथम चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास केवल मुम्बई महानगर में हुआ। यहाँ पर इस उद्योग के स्थानीयकरण के चार कारक महत्त्वपूर्ण थे। जैसे-

(1) मुम्बई भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह रहा है।

  • कपास निर्यात करने के लिए यहाँ लाये जाते थे।
  • कपास के व्यापारी मुम्बई में ही रहा करते थे। उनके पास पूँजी और तकनीक पहले से मौजूद थी।
  • पुनः मुम्बई की आर्द्र जलवालु सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती थी।

     यही कारण था कि मुम्बई द्वीप पर सूटी वस्त्र उद्योग का प्रथम विकास हुआ।

(2) चीन में विकसित हो रहे सूती वस्त्र उद्योग में धागा आपूर्ति करने का कार्य ब्रिटिश कंपनियाँ किया करती थी। जब ब्रिटिश कंपनियाँ चीन को पर्याप्त मात्रा में धागा आपूर्ति करने में असफल होने लगी तो उन्होंने भारतीय व्यापारियों के इस क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया।

(3) मुम्बई महानगर में वाणिज्यिक ऊर्जा की कमी थी लेकिन द० अफ्रीका से आयातित कोयला पर मुम्बई के पास तापीय विद्युत केन्द्र की स्थापना की गई तो सुचारू रूप से विद्युत की आपूर्ति होने लगी।

(4) सस्ते श्रमिक और आन्तरिक बाजार की उपलब्धता भी यहाँ पर इस उद्योग के विकास में सहायक रहा।

    ऊपर वर्णित कारकों के कारण 19वीं सदी के अन्त तक मुम्बई द्वीप पर करीब 40 कारखाने विकसित हो चुके थे। इसे “भारत का मैनचेस्टर” या “कपास की महानगरी” भी कहा जाने लगा। स्वेज नहर के पूरब में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला यह सबसे बड़ा केन्द्र बन गया।

दूसरा चरण:-

      1900-23 ईo के मध्य लगे सूती वस्त्र उद्योग को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में उद्योगों का विकास मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में हुआ क्योंकि मुम्बई महानगर में लगातार जमीन का मूल्य बढ़ता जा रहा था। श्रमिक संगठनों का विकास बड़े पैमाने पर हो चुका था। मलीन बस्तियाँ विकसित होने लगी थी। अतः निवेशकों ने मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में पूँजी निवेश का कार्य प्रारंभ किया। इस चरण में स्थानीयकरण की दो प्रवृति थी- प्रथम मुम्बई के ही बाहरी क्षेत्रों में सूती वस्त्र के कारखाने लगाये गये।

     पुनः सूती वस्त्र कारखाना लगाने हेतु मुम्बई के आप-पास के नगरों का चयन किया जहाँ मुम्बई के समान सभी परिस्थितियाँ अनुकूल थी। जैसे- इस चरण में कल्याण, थाणे, पुणे, नासिक, सूरत, बड़ोदरा तथा अहमदाबाद जैसे नगरों में सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ क्योंकि ये सभी केन्द्र अरब सागर के निकट थे जिसके कारण नम जलवायु उपलब्ध थी। बड़ौदरा, सूरत बंदरगाह थे। “टाटा हाइड्रल प्रोजेक्ट” के द्वारा विद्युत की आपूर्ति सुनिश्चित हो चुकी थी। मुम्बई के ही समान सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध थे।

तीसार चरण:-

     1923 से 1947 ई० के बीच लगे उद्योगों को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास दक्कन के लावा के पठारी क्षेत्र तथा मध्यवर्ती पठार पर हुआ। दक्कन के पठार पर पोरबन्दर, राजकोट, सुरेन्द्रनगर (सूरत), भूसावल, अहमदनगर, नागपुर, कोल्हापुर, सोलापुर, गुलवर्गा प्रमुख केन्द्र के रूप में थे। इन केन्द्रों में इस उद्योग का विकास कपास की खेती, सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण हुआ।

      भारत के उ० मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में इस उद्योग का विकास इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, इटारसी, भिलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर में हुआ। इन क्षेत्रों में सूती वस्त्र उद्योग का विकास कई कारणों के चलते हुआ। जैसे-

(1) इन क्षेत्रों में कई बड़े देशी रियासत रहा करते थे। इन रियासतों ने इस उद्योग में रुचि लिया। ब्रिटिश कंपनियों ने भी देशी रजबाड़ों को इस क्षेत्र में आमंत्रित किया। देशी रजबाड़ों ने ब्रिटिश कंपनियों को भूमि दिया तो दूसरी ओर ब्रिटिश कंपनियों ने बड़े पैमाने पर पूंजी तथा तकनीक का निवेश किया। इसके अलावे मैदानी भारत का बाजार, सस्ते श्रमिक उपलब्धता और कपास की खेती ने भी इस उद्योग को आकर्षित किया।

     इसी चरण में कानपुर, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, बंगलोर, विशाखापतन तथा कलकता भी सूती वस्त्र केन्द्र के रूप में उभरे क्योंकि यहाँ की सभी भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल थी तथा सस्ते श्रमिक और बाजार उपलब्ध थे।

   आजादी के बाद भारत में सूती वस्त्र उद्योग

चौथा चरण:-

     आजादी के बाद विकसित हुए सूती वस्त्र उद्योगों को इसमें शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास चार क्षेत्रों में हुआ-

(i) उ०-प० भारत-

   इसमें पंजाब तथा हरियाणा को शामिल करते हैं। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के कारण इन क्षेत्रों में कपास की खेती प्रारंभ की गई। कपास की स्थानीय उपलब्धता के करण जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, चंडीगढ़ अमृतसर तथा गंगानगर जिला सूती वस्त्र उद्योग केन्द्र के रूप में उभरे।

(ii) UP तथा बिहार-

   यहाँ पर सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। UP में मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर, मोदीनगर, मुरादाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर जैसे नगर में और बिहार में गया, डुमराँव, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना इत्यादि में विकसित हुआ। इस क्षेत्रों में सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध होने के कारण इस उद्योग कर विकास हुआ था।

(iii) पूर्वी भारत-

   बाजार की सुविधा, सस्ते श्रमिक, आयात-निर्यात की सुविधा तथा हुगली औद्योगिक प्रदेश में विकसित संरचनात्मक सुविधाओं के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ। यहाँ इस उद्योग के मुख्य केन्द्र कोलकाता, हावड़ा, मानिकपुर, नैहाटी, चन्दन नगर, सियारामपुर, दीमापुर, इम्फाल, गुवाहाटी तथा कटक थे।

(iv) द० भारत-

    यहाँ सस्ते जल विद्युत की अपलब्धता तथा कपास की खेती किए जाने के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। विजयवाड़ा,  बेलगाँव मैसूर, काँचीपुरम्, मदुरई, तिरुचिरापल्ली, पाण्डिचेरी तथा तिरुअनन्तपुरम जैसे नगरों में इस उद्योग का विकास हुआ। कोयम्बटूर को “दक्षिण भारत का मैनचेस्टर” भी कहा जाने लगा। भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र का मील तमिलनाडु राज्य में ही स्थित है।

   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का अभूतपूर्व विकेन्द्रीकरण हुआ है। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र केन्द्रों को नीचे मानचित्र में देखा जा सकता है।

Cotton Textile Industry

चित्र: भारत के प्रमुख सूत्री वस्त्र उद्योग केंद्र

   भारत में सूती वस्त्र का उत्पादन तीन क्षेत्रों में किया जाता है:-

(1) मील 

(2) पावरलूम

(3) हथकरघा / चरखा

   इन तीनों क्षेत्रों में होने वाला उत्पादन को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

क्षेत्र भारत के कुल उत्पादन का प्रतिशत 2005-06 में  (लाख वर्ग मी० में उत्पादन)
मील 3.3% 1656
पावरलूम 82.8% 41044
हथकरघा 12.3% 6108
अन्य 1.6% 769
कुल 100% 49577

           नीचे के तालिका में सूत उत्पादन को प्रदर्शित किया जा रहा है:-     

वर्ष सूत का उत्पादन हजार टन में
1950-51  835
1960-61 1075
1970-71 1050
1980-81 1400
1990-91 1430
2000-01 1600
2010-11 1820

       भारत में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला राज्यों का क्रम इस प्रकार से हैं-

(1) महाराष्ट्र- 39%

(2) गुजरात- 35%

(3) तमिलनाडु- 6.4%

(4) पंजाब- 6%

समस्या तथा संभावना

    सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। जैसे-

(1) कच्चे माल की समस्या-

    भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वस्त्र की माँग लगातार बढ़‌ती ही जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देश पूरा नहीं कर पा रहा है जिसके कारण कपास का मूल्य लगागर बढ़‌ता ही जा रहा है। फलतः भारत को अन्य देशों से कपास आयात करना पड़ता है।

    भारत के पास कपास उत्पादन हेतु विस्तृत काली मिट्टी का क्षेत्र उपलब्ध है। अतः सिंचाई सुविधाओं का विकास कर कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर से निर्भरता कम की जा सकती है।

(2) पुराने मशीन-

    भारत में अधिकांश वस्त्र का उत्पादन पूराने मशीनों से किया जाता है। जबकि USA, चीन, मिस्र, जैसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सूती का उत्पादन करते हैं जिसके कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़‌ता जा रहा है। लेकिन, नई औद्योगिक नीति की घोषणा से यह उम्मीद जगी है कि भारत में नवीन विदेशी तकनीक आगमन होगा।

(3) अनियमित विद्युत की आपूर्ति-

     देश में लगातार ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है। माँग के अनुरूप विद्युत की आपूर्ति न होने के कारण कोई भी कारखाना निर्बाध्य रूप से नहीं चल पाता है। लेकिन, आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि के विकास से इस समस्या से निजात मिल सकेगा।

(4) हड़ताल तथा तालाबंदी-

    सूती वस्त्र उद्योग से जुड़े हुए श्रमिक संगठन काफी मजबूत है। ये संगठन अपने मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं। अगर उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो कंपनी में ताला लटका देते हैं, जिसके कारण उत्पादन में कमी आती है।

     हालांकि न्यापालिका के हस्तक्षेप से और सरकार के बीच-बचाव से इस समस्या में लगातार कमी आ रही है।

(5) कृत्रिम रेशे के साथ प्रतिस्पर्द्धा-

       देश की गरीब जनता कृत्रिम रेसे से बने वस्त्र का उपयोग करते हैं जो अधिक टिकाऊ, सस्ता तथा आकर्षक होता है जबकि सूती वस्त्र कम टिकाऊ तथा महंगा होता है।

(6) घाटे में चल रही मील-

    भारत में सबसे ज्यादा सूती वस्त्र मील तमिलनाडु में है। लेकिन, तमिलनाडू भारत का मात्र 6.4% ही सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। उत्तर भारत में खाद्यान्न फसल की खेती कपास उपजाने वाले भूमि पर की जाने लगी, जिसके कार‌ण कच्चे माल की कमी हो गई। फलतः अधिकांश उत्तर भारत के सूती वस्त्र उद्योग बन्द हो गए। पुनः अधिक आयात शुल्क होने के कारण उसका आयात भी संभव नहीं था। लेकिन नवीन औद्योगिक नीति के कारण इसमें सुधार आने की संभावना है।

निष्कर्ष:

       ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। फिर भी, यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है, इस उद्योग में सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

      यह भारत का पूर्ण रूप से विकेन्द्रित उद्योग है। भारत के पास देशी एवं विदेशी बाजार उपलब्ध है। अतः कहा जा सकता है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का भविष्य काफी उज्ज्वल है।

11. Discuss the role of WTO in terms of International Trader.

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।

12. What do you mean by Special Economic Zone? Discuss the SEZ in India.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? भारत में सेज की चर्चा कीजिए।

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ऐतिहासिक पक्ष

     रॉबर्ट सी हेवर्ड के अनुसार SEZ की अवधारणा काफी प्राचीन है। प्राचीनतम SEZ का प्रमाण यूनान के टायर नगर से मिलता है। 1960 ई० में चीन ने SEZ का निर्माण कर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास किया। जबकि भारत ने अप्रैल 2000 ई० में पहले SEZ नीति की घोषणा की।

प्रकार/वर्गीकरण

      SEZ कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) निर्यात संवर्धन क्षेत्र (Export Prossising Zone), मुक्त क्षेत्र (Free Zone), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Estate), मुक्त बंदरगाह, नगरीय उद्यम क्षेत्र इत्यादि।

उद्देश्य

     SEZ की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य है।

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

स्वरूप एवं विशेषता

      किसी भी एक आदर्श SEZ के अंतर्गत एक हजार हेक्टेयर भूमि पर स्थापित किया जा सकता है और उसमें कम से कम 10 हजार करोड़ रूपये का निवेश होना चाहिए। पुनः उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए:-

(1) SEZ के अंतर्गत कार्य करने वाले इकाइ‌यों के द्वारा वस्तु तथा सेवाओं का मुक्त संचलन होना चाहिए।

(2) विश्व स्तर की आधारभूत संरचना का विकास किया जाना चाहिए।

(3) निर्माण या उत्पादन का कार्य गहन तरीके से होना चाहिए।

(4) निर्यात अभिमुख होना चाहिए।

(5) उन्नत तकनीक होना चाहिए।

(6) उचित प्रबंधन तथा उच्च तकनीक का उपयोग होना चाहिए।

वर्तमान स्थिति एवं महत्त्व

     वर्तमान में 379 SEZs अधिसूचित हैं, जिनमें से 265 चालू हैं। लगभग 64% SEZ पाँच राज्यों- तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित हैं। इससे एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। SEZ पर बाबा कल्याणी समिति की सिफारिशों के अनुसार, SEZ में MSME योजनाओं को जोड़कर तथा वैकल्पिक क्षेत्रों को क्षेत्र-विशिष्ट SEZ में निवेश करने की अनुमति देकर MSME निवेश को बढ़ावा देना है।

      इसके अतिरिक्त सक्षम और प्रक्रियात्मक छूट के साथ-साथ SEZ को अवसंरचनात्मक स्थिति प्रदान करने हेतु वित्त तक उनकी पहुँच में सुधार करके तथा  दीर्घकालिक ऋण को सक्षम करने के लिये भी अग्रगामी कदम उठाए गए। कुछ SEZ के उदाहरण निम्नलिखित है:-

भारत:-

(1) काण्डला तथा सूरत- गुजरात

(2) कोचीन- केरल

(3) सांताक्रुज- मुम्बई

(4) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) विशाखापतनम- आन्ध्र प्रदेश

(7) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(8) इंदौर- मध्य प्रदेश

(9) राजीव गाँधी इंटेफोर्ट पार्क- हिंजेवादी, पूना।

(10) जयपुर- राजस्थान

(11) सिंगुर (टाटा मोटर्स कंपनी)- पश्चिम बंगाल 

नोट: टाटा मोटर्स कंपनी 2008 में सिंगूर परियोजना को छोड़ने के बाद कंपनी ने अपनी विनिर्माण इकाई को साणंद, गुजरात में स्थानांतरित कर दिया।

MULTIDISCIPLINARY COUR

टाटा मोटर्स कंपनी साणंद, गुजरात

(12) नन्दीग्राम (सलीम अली ग्रुप केमिकल फैक्ट्री)- पश्चिम बंगाल

        संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के अनुसार, 2019 तक, 147 देशों ने किसी न किसी तरह के SEZ की स्थापना की थी, दुनिया भर में SEZ की कुल संख्या 5,400 के करीब है।

MULTIDISCIPLINARY COURSE MDC-3 FOR HUMANITIES (Theory- Economic Geography) Solved Questions Paper 2024

(MULTIDISCIPLINARY COURSE : MDC-3 FOR HUMANITIES)

UG (Sem.-III) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

GEOGRAPHY

(Economic Geography)

Time: Three Hours  [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each equestion. Each question carries 2 marks. [2×10=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

1. (i) Economic Geography studies:

(a) Population

(b) Economic activities

(c) Geographical thought

(d) Ocean deposits

आर्थिक भूगोल में अध्ययन किया जाता है:

(a) जनसंख्या

(b) आर्थिक क्रियाकलाप

(c) भौगोलिक चिंतन

(d) समुद्री निक्षेप

उत्तर- (b) आर्थिक क्रियाकलाप

(ii) Industries belongs to which group of occupation?

(a) Primary

(b) Secondary

(c) Tertiary

(d) Quaternary

उद्योग किस व्यवसाय समूह सम्बन्धित है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) चतुर्थक

उत्तर- (b) द्वितीयक

(iii) Economic Geography is a part of:

(a) Physical Geography

(b) Human Geography

(c) Practical Geography

(d) Social Geography

आर्थिक भूगोल शाखा है:

(a) भौतिक भूगोल

(b) मानव भूगोल

(c) प्रयोगात्मक भूगोल

(d) सामाजिक भूगोल

उत्तर- (b) मानव भूगोल

(iv) Banking falls in which category of occupation?

(a) Quaternary

(b) Tertiary

(c) Both (a) and (b)

(d) None of the above

बैंकिंग, व्यवसाय के किस वर्ग में आता है?

(a) चतुर्थक

(b) तृतीयक

(c) दोनों (a) और (b)

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (c) दोनों (a) और (b)

(v) The region of Equatorial belt practices:

(a) Hunting and gathering

(b) Plantation farming

(c) Mining

(d) Dairy farming

विषुवतीय प्रदेश में यह किया जाता है:

(a) शिकार एवं संग्रह

(b) बागवानी कृषि

(c) खनन

(d) दुग्ध उत्पादन

उत्तर- (a) शिकार एवं संग्रह

(vi) Which country is the largest producer of Irom and steel in the world?

(a) China

(b) U.S.A.

(c) Japan

(d) India

कौन-सा देश विश्व में लौह-इस्पात का सबसे बड़ा उत्पादक है?

(a) चीन

(b) संयुक्त राष्ट्र अमेरिका

(c) जापान

(d) भारत

त्तर- (a) चीन

(vii) Manchester is famous for which industry?

(a) Cotton textile

(b) Woolen textile

(c) Iron and steel

(d) Paper industry

मानचेस्टर किस उद्योग के लिए विख्यात है?

(a) सूत्री वस्त्र उद्योग

(b) ऊनी वस्त्र उद्योग

(c) लौह-इस्पात उद्योग

(d) कागज उद्योग

उत्तर- (a) सूत्री वस्त्र उद्योग

(viii) Which continent has the maximum flow of the global trade?

(a) Europe

(b) Asia

(c) North America

(d) Africa

निम्नलिखित महाद्वीपों में से किसका विश्व व्यापार का सर्वाधिक प्रवाह होता है?

(a) यूरोप

(b) एशिया

(c) संयुक्त राज्य अमेरिका

(d) अफ्रीका

उत्तर- (b) एशिया

(ix) The headquarter of WTO is at :

(a) Geneva

(b) Veinna

(c) New York

(d) New Delhi

विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय है:

(a) जिनेवा में

(b) वियना में

(c) न्यूयार्क में

(d) नई दिल्ली में

उत्तर- (a) जिनेवा में

(x) Where is the first special Economic Zone of India is establishment?

(a) Surat

(b) Jaipur

(c) Kandla

(d) Visakhapatnam

भारत का पहला विशेष आर्थिक क्षेत्र कहाँ स्थापित किया गया?

(a) सूरत

(b) जयपुर

(c) कांदला

(d) विशाखापत्तनम

उत्तर- (c) कांदला

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. State the scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के विषय-क्षेत्र को बताइए।

3. Discuss the economic activities under primary occupation.

प्राथमिक व्यवसाय के अन्तर्गत आने वाले आर्थिक क्रियाकलापों की चर्चा कीजिए।

4. What is subsistence agriculture?

जीवन निर्वाह कृषि किसे कहते हैं?

5. Describe the important factor for the establishment of iron and steel industry.

लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

6. What is Bilateral trade?

द्विपक्षीय व्यापार किसे कहते हैं?

7. What is Special Economic Zone?

विशेष आर्थिक क्षेत्र क्या होता है?

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [10×3=30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Define the subject-matter of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के विषय क्षेत्र को परिभाषित कीजिए।

9. Discuss the importance of Economic activities.

आर्थिक क्रियाकलाप का महत्त्व बताइए।

10. Explain the production and distribution of Iron and Textile Industry in the world,

विश्व में लौह-इस्पात उद्योग के उत्पादन एवं वितरण का विवरण दीजिए।

11. Discuss the role of WTO in terms of International trade.

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सन्दर्भ में विश्व व्यापर संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

12. What do you understand by special economic zone? Discuss the SEZ of India.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? भारत के सेज़ की चर्चा कीजिये।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. State the scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के विषय-क्षेत्र को बताइए।

उत्तर- भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

3. Discuss the economic activities under primary occupation.

प्राथमिक व्यवसाय के अन्तर्गत आने वाले आर्थिक क्रियाकलापों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

4. What is subsistence agriculture?

जीवन निर्वाह कृषि किसे कहते हैं?

उत्तर- इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीवन निर्वाह कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीवन निर्वाह कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीवन निर्वाह कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

5. Describe the important factor for the establishment of iron and steel industry.

लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- भारत मे लौह तथा इस्पात उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक:

(i) कच्चा माल:- अधिकांश विशाल एकीकृत इस्पात संयंत्र कच्चे माल के स्रोतों के निकट स्थित हैं, क्योंकि इनमें भारी तथा वज़न में क्षरणीकृत कच्चे माल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। उदाहरण के लिये, छोटा नागपुर क्षेत्र में लौह तथा इस्पात उद्योग का संघनन इसलिये अधिक है क्योंकि वहाँ लौह अयस्क प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। जमशेदपुर स्थित टिस्को संयंत्र को कोयला झरिया की खदानों से और लौह अयस्क, चूना पत्थर, डोलोमाइट तथा मैंगनीज़ की आपूर्ति ओडिशा व छत्तीसगढ़ से होती है।

(ii) बाज़ार:- चूँकि लौह तथा इस्पात से बने उत्पाद भारी और बड़े होते हैं इसलिये इनकी परिवहन लागत अधिक होती है। अतः बाज़ार से निकटता बेहद अहम है, विशेषकर छोटे इस्पात संयंत्रों के लिये तो यह बेहद ज़रूरी है, ताकि परिवहन को न्यूनतम किया जा सके। जमशेदपुर का टिस्को कोलकाता के निकट है, जो एक बड़ा बाज़ार उपलब्ध कराता है। विशाखापत्तनम का इस्पात संयंत्र तटीय क्षेत्र में स्थित है, जहाँ आयात-निर्यात की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

(iii) श्रम:- सस्ते श्रम की उपलब्धता भी महत्त्वपूर्ण है। छोटा नागपुर क्षेत्र के अधिकांश संयंत्रों को इस क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में सस्ता श्रम उपलब्ध होता है।
शीतलन के लिये पानी की उपलब्धता: उदाहरण के लिये- दामोदर नदी के किनारे बोकारो इस्पात संयंत्र, भद्रावती कर्नाटक में विशेश्वर्या इस्पात संयंत्र, भद्रा नदी के समीप भद्रावती (कर्नाटक) में विशेश्वर्या इस्पात संयंत्र, आदि।

(iv) औद्योगिक नगरों से समीपता:- छोटे इस्पात संयंत्रों, जो उत्पादक सामग्री के रूप में स्क्रैप धातुओं का उपयोग करते हैं, के लिये अपशिष्ट धातुओं के पुनर्चक्रण की आवश्यकता होती है। ऐसे संयंत्र ज़्यादातर औद्योगिक नगरों के समीप अवस्थित होते हैं,जैसे – महाराष्ट्र के इस्पात संयंत्र।

(v) सरकारी नीतियाँ:- सरकार उद्योगों को पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित करने के लिये प्रोत्साहित करती है। यह उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने के लिये सब्सिडी, कर में छूट और पूँजी प्रदान करती है। छत्तीसगढ़ में भिलाई इस्पात संयंत्र को क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने के लिये स्थापित किया गया था।

(vi) विद्युत:- विद्युत की उपलब्धता उद्योगों की अवस्थिति का एक अन्य निर्धारक है। टिस्को और बोकारो इस्पात संयंत्र को दामोदर घाटी निगम (DVC) से जलविद्युत की प्राप्ति होती है। भिलाई संयंत्र को कोरबा तापीय स्टेशन से ऊर्जा प्राप्त होती है।

(vii) परिवहन:- कच्चे माल की उपलब्धता वाले स्थानों, बाज़ारों और बंदरगाहों से संपर्क एक अन्य कारक है। टिस्को कोलकाता, मुंबई और चेन्नई के साथ रेलवे के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दुर्गापुर संयंत्र के पास दुर्गापुर से हुगली और कोलकाता बंदरगाह के लिये नौगम्य नहर की सुविधा मौजूद है।

6. What is Bilateral trade?

द्विपक्षीय व्यापार किसे कहते हैं?

उत्तर- जब दो देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान होता है, तो इसे द्विपक्षीय व्यापार कहते हैं। द्विपक्षीय व्यापार का मुख्य उद्देश्य, दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना होता है। इसमें, शामिल देश आपसी सहयोग से अपने बाज़ारों का विस्तार करते हैं।

द्विपक्षीय व्यापार के मुख्य विशेषताएँ:

(i) द्विपक्षीय व्यापार में, शामिल देश व्यापार की शर्तों पर सीधे बातचीत करते हैं।

(ii) द्विपक्षीय व्यापार समझौते में, दोनों देशों को तरजीही व्यापारिक शर्तें मिलती हैं।

(iii) द्विपक्षीय व्यापार समझौते में, टैरिफ़, आयात कोटा, निर्यात प्रतिबंध जैसी व्यापार बाधाओं को कम या खत्म किया जाता है।

(iv) द्विपक्षीय व्यापार से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

(v) द्विपक्षीय व्यापार से, दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश बढ़ता है।

(vi) द्विपक्षीय व्यापार, बहुपक्षीय व्यापार की तुलना में सरल और अधिक लचीला होता है।

7. What is Special Economic Zone?

विशेष आर्थिक क्षेत्र क्या होता है?

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ऐतिहासिक पक्ष

     रॉबर्ट सी हेवर्ड के अनुसार SEZ की अवधारणा काफी प्राचीन है। प्राचीनतम SEZ का प्रमाण यूनान के टायर नगर से मिलता है। 1960 ई० में चीन ने SEZ का निर्माण कर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास किया। जबकि भारत ने अप्रैल 2000 ई० में पहले SEZ नीति की घोषणा की।

प्रकार/वर्गीकरण

      SEZ कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) निर्यात संवर्धन क्षेत्र (Export Prossising Zone), मुक्त क्षेत्र (Free Zone), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Estate), मुक्त बंदरगाह, नगरीय उद्यम क्षेत्र इत्यादि।

उद्देश्य

     SEZ की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य है।

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [10×3=30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Define the subject-matter of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के विषय क्षेत्र को परिभाषित कीजिए।

पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

आर्थिक भूगोल के अध्ययन उपागम एवं विधियाँ

(APPROACHES AND METHODS OF ECONOMIC GEOGRAPHY)

     आर्थिक भूगोल के सन्तुलित अध्ययन के लिए कई उपागमों व अध्ययन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक-दूसरे की पूरक हैं। निम्नांकित चार उपागम अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

(1) वस्तुगत उपागम (Commodity Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं, जैसे- गेहूं, चावल, गन्ना, लोहा, पेट्रोलियम आदि के उत्पादन एवं वितरण का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। किन्तु कुछ विद्वान इस उपागम में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण का विश्लेषण न करके व्यवसाय का वितरण और विश्लेषण करते हैं। जैसे- कृषि व्यवसाय, वस्तु संग्रह एवं आखेट व्यवसाय, खनन व्यवसाय, उद्योग आदि। इस कारण इस उपागम को ‘व्यवसाय उपागम’ (Occupational Approach) भी कहा जाता है।

(2) प्रादेशिक उपागम (Regional Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत सर्वप्रथम विश्व को कुछ बृहत् प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त कर लिया जाता है और प्रत्येक प्रदेश के प्राकृतिक वातावरण तथा विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिरूप का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

(3) सैद्धान्तिक उपागम (Theoretical Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत किसी भी वस्तु या प्रदेश की विशेषताओं एवं वितरण प्रतिरूप का अध्ययन पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के सन्दर्भ में किया जाता है। इस अध्ययन विधि से मुख्यतः सिद्धांतों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जाता है, न कि वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण करना।

(4) क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत वस्तुओं के वितरण की सामान्य विशेषताओं का क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन तीन चरणों में सम्पन्न किया जाता है:-

(1) प्रथम चरण में किसी भी वस्तु की स्थिति तथा वितरण के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय चरण में उस वस्तु विशेष की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(iii) तृतीय चण में उस वस्तु का अन्य प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों से सम्बन्ध का विश्लेषण किया जाता है। ये अन्तर्सम्बन्ध ‘कार्यकरण सम्बन्ध’ (Cause and Effect Relationship), ‘क्रियात्मक सम्बन्ध’ (Functional Relationship) तथा ‘क्षेत्रीय सम्बन्ध’ (Areal Relationship) के रूप व्यक्त किए जाते हैं।

9. Discuss the importance of Economic activities.

आर्थिक क्रियाकलाप का महत्त्व बताइए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसे आर्थिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएँ करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

     मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

    द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

     इसी प्रकार लौह अयस्क का खनन प्राथमिक व्यवसाय है, लेकिन लोहा-इस्पात का निर्माण गौण व्यवसाय है। विभिन्न प्रकार के उद्योग एक-दूसरे के निकट स्थापित हो जाते हैं, क्योंकि एक उद्योग का तैयार माल दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग अनेक प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योगों को विकसित कर सकता है।

     उद्योगों का विकास कच्चे माल, शक्ति, श्रमिक, पूंजी और तैयार माल के लिए बाजार की उपलब्धि पर निर्भर है। इन कारकों के अलावा परिवहन और संचार की सुविधाएं, कच्चे माल और शक्ति का लागत मूल्य, श्रमिकों का वेतन तथा तैयार माल का लागत मूल्य भी उद्योगों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है।

     किसी देश में गौण व्यवसायों में कितनी विविधता है तथा उन व्यवसायों में कितने लोग काम करते हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में औद्योगिक विकास कितना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में प्राथमिक व्यवसायों की तुलना में गौण व्यवसायों में अधिक लोग काम करते हैं।

     उद्योगों में कार्यरत लोगों की संख्या, उपयोग में आने वाली यान्त्रिक शक्ति तथा निर्मित उत्पादों के मूल्य के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते हैं यथा- वृहत् उद्योग, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग।

     दस्तकार स्थानीय पदार्थों का उपयोग करके दस्तकारी की वस्तुएं बनाते हैं। हथकरघा, बुनकर, टोकरी बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, आदि गौण व्यवसायों में लगे हैं। इन गौण व्यवसायों को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग की प्रत्येक इकाई में लोग कम संख्या में काम करते हैं और इनमें यांत्रिक शक्ति का प्रयोग नहीं होता है।

    लघु उद्योग यांत्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं। ये उद्योग बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाने हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुएं बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां जैसे- रेडियो, टी. वी. सेट, प्लास्टिक की वस्तुएं, सामान्यतः लघु उद्योगों की श्रेणी में आते हैं।

Tertiary and Quaternary Economic

प्लास्टिक की वस्तुएं

     वृहत् उद्योगों में सैकड़ों लोग काम करते हैं और इनमें करोड़ों रुपए की पूंजी लगी हुई होती है। इनमें से कुछ उद्योग जैसे मोटर कार उद्योग या दुपहिया वाहन उद्योग अधिक उत्पादन के लिए एसेम्बली लाइन तकनीक का उपयोग करते हैं। एसेम्बली लाइन में अलग-अलग स्थानों पर कच्चे पदार्थ तथा विविध पुर्जों को जोड़ने का कार्य होता है।

     एसेम्बली लाइन पर जैसे-जैसे निर्माणाधीन वस्तु आगे सरकती है, प्रत्येक श्रमिक कोई निश्चित काम करता है, फिर दूसरी निर्माणाधीन वस्तु में वह वही काम करता है। इस तरह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु का निर्माण पूरा हो जाता है और इस प्रकार एसेम्बली लाइन में से निर्मित वस्तु बाहर निकलती है। इस विधि में प्रत्येक श्रमिक किसी एक काम में विशेष दक्ष होता है, जिसे वह बार-बार दोहराता है। निर्माण उद्योगों के परिणामस्वरूप प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, मत्स्य ग्रहण, आदि में भी मशीनों का खूब प्रयोग होने लगा है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

    वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में और विशेषकर विकसित देशों में चतुर्थक व्यवसाय में संलग्न लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस व्यवसाय के लोगों में उच्च वेतनमान और पदोन्नति की चाह में गतिशीलता अधिक पाई जाती है।

    कम्प्यूटर के बढ़ते प्रयोग और सूचना प्रौद्योगिकी ने इस व्यवसाय के महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप औद्योगिक समाज के तकनीकी तत्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गया है और वर्तमान आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से उन अप्रत्यक्ष उत्पादों से प्रभावित हो गए हैं जिनके उत्पादन में ज्ञान, सूचना और संचा अधिक महत्वपूर्ण है।

10. Explain the production and distribution of Iron and Textile Industry in the world,

विश्व में लौह-इस्पात उद्योग के उत्पादन एवं वितरण का विवरण दीजिए।

उत्तर- विश्व में अति प्राचीन काल से लौह खनिज का उपयोग मनुष्य करता रहा है। भारत में लौह खनिज के उपयोग का इतिहास लोहे की खोज के साथ जुड़ा है। दिल्ली में कुतुबमीनार के प्रांगण में स्थित लौह स्तम्भ विदेशी धातु विज्ञानियों के लिए एक आश्चर्यजनक निर्माण है। जंक रहित लोहा बनाने की कला का यह अनूठा प्रयोग है।

       आज लोहा यांत्रिक युग की धुरी बन गया है क्योंकि अधिकांश यंत्र इसी से बनाये जा रहे हैं। इसकी कठोरता, टिकाऊपन और अन्य धातुओं के साथ मिलकर मजबूत बनने की क्षमता के कारण इसका उपयोग दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। लोहे का सक्षम विकल्प अभी तक सामने नहीं आया है।

 लौह अयस्क के प्रकार-

        लौह अयस्क को लोहे के अंश के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया जाता है:

(i) मैग्नेटाइट (Magnetite) Fe3O4: यह सर्वोत्तम किस्म का लौह अयस्क होता है, जिसमें लोहे की मात्रा लगभग 72% होती है। इसमें वाष्प की मात्रा सबसे कम होती है एवं इसका रंग काला होता है।

(ii) हेमाटाइट (Hematite) Fe2O2: यह लोहे का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जिसमें लोहे का अंश लगभग 70 प्रतिशत होता है।

(iii) लिमोनाइट (Limonite) 3Fe2O3 3H2O: इसमें धातु का अंश 60 प्रतिशत तक रहता है। इसका रंग पीला होता है।

(iv) सिडेराइट (Siderite) FeCO3: यह सर्वाधिक निम्न कोटि का अयस्क है, जिसमें लोहे का अंश 48 प्रतिशत होता है।

विश्व में लौह अयस्क का संचित भण्डार-

          पृथ्वी के धरातल के निर्माण में लौह तत्त्व की मात्रा लगभग 5 प्रतिशत है। फलतः यह प्रायः सर्वत्र पाया जाने वाला खनिज है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार 50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत धात्विक सम्पन्नता का लौह खनिज भण्डार 3700 अरब मीटरी टन है।

         संचित भण्डार का 18.9 प्रतिशत यूक्रेन, 16.5 प्रतिशत ब्राजील 15.1 प्रतिशत रूस, 12.4 प्रतिशत चीन, 10.8 प्रतिशत आस्ट्रेलिया 5.1 प्रतिशत कजाकिस्तान, 4.1 प्रतिशत संयुक्त राज्य अमेरिका, 2.6 प्रतिशत भारत 2.1 प्रतिशत स्वीडेन और 1.6 प्रतिशत वेनेजुएला में आँका गया है। इस प्रकार विश्व के दस देश 89 प्रतिशत से अधिक लौह अयस्क भण्डार संजोए हुए हैं। शेष 11 प्रतिशत बाकी विश्व के देशों में पाया जाता है।

         निम्नस्तरीय धातुओं का भण्डार उच्चस्तरीय धातु के अयस्कों से पाँच से छः गुना अधिक है लेकिन उसकी ओर अभी विश्व का ध्यान नहीं है। उत्पादन के दृष्टिकोण से विकसित राष्ट्र आगे है।

लौह अयस्क का उत्पादन

      लौह अयस्क का उत्पादन उपयोग पर आधारित होता है, फलत: विकसित देशों में इसकी माँग अधिक होने से उत्खन्न भी अधिक होता है। 1960 ई० तक विश्व का लौह अयस्क उत्पादन 2565 लाख मीट्रिक टन और 2006 में 18000 लाख मीट्रिक टन हो गया। इससे स्पष्ट है कि दिनोदिन लौह अयस्क की माँग बढ़ती जा रही है।

       विश्व का तीन-चौथाई लौह अयस्क मात्र दस देशों द्वारा उत्पादित होता है, जिसमें चीन, ब्राजील, आस्ट्रेलिया, भारत, रूस, यूक्रेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, कनाडा और स्वीडेन अग्रणी हैं। अन्य प्रमुख उत्पादकों में वेनेजुएला, कजाकिस्तान, ईरान, मैक्सिको और मारुतानिया विशेष उल्लेखनीय हैं।

         विश्व में कच्चे लोहे के उत्पादन में 1975-2006 के बीच लगभग तीन गुने से अधिक की वृद्धि हुई है। कनाडा, जापान, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे उद्योग प्रधान देशों में लोहे का उत्पादन घटा है। ये देश कच्चे लोहे का विकासशील देशों से आयात कर रहे हैं तथा अपने संसाधनों को बचा रहे हैं। यही स्थिति दक्षिण-पूर्व एशिया की भी है।

       संसार का 32.7 प्रतिशत चीन, 17.7 प्रतिशत ब्राजील, 15.3 प्रतिशत आस्ट्रेलिया, 8.9 प्रतिशत भारत और 5.7 प्रतिशत रूस लौह अयस्क का उत्पादन कर रहे हैं, जो विश्व उत्पादन का 78 प्रतिशत है। विश्व में कच्चे लोहे का उत्पादन क्रमशः बढ़ रहा है। विश्व के दस देश कुल उत्पादन का लगभग 93 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित करते हैं।

1. चीन-

      यहाँ सामान्य स्तर के लौह अयस्क का विशाल भण्डार है जिसमें धातु सम्पन्नता चालीस प्रतिशत के आस-पास है। यहाँ का संचित भण्डार अभी परिवहन मार्गो की कमी के कारण उपयोग में नहीं लाया जा रहा है क्योंकि भण्डार दूर-दराज के इलाकों में स्थित है।

        चीन में लौह उत्खनन का तीव्र विकास 1950 के बाद शुरू हुआ जब घरेलु खपत के साथ निर्यात भी उत्पन्न हो गया। वर्तमान सूचनाओं के अनुसार चीन सर्वाधिक 58.8 करोड़ मीटरी टन से अधिक लौह-अयस्क स्थानान्तरित कर रहा है। हाल के वर्षों में तीव्र उत्पादन के कारण वह विश्व का प्रथम बड़ा लौह उत्पादक देश बन गया है। यहाँ का लगभग आधा संरक्षित भण्डार दक्षिणी मंचूरिया में है, जिसमें आशन-चांगलिंग एवं पेन्की क्षेत्र प्रमुख उत्पादक हैं।

2. ब्राजील-

        लौह अयस्क के उत्पादन में ब्राजील विश्व का दूसरा बड़ा उत्पादक देश बन गया है जो इसके उच्चकोटि के लौह अयस्क, विदेशी माँग और अनुकूल परिस्थिति में निक्षेपण के कारण सम्भव हुआ है। 1960 में यह विश्व का दसवाँ बड़ा उत्पादक था लेकिन इसके बाद उत्पादन तीव्र गति से बढ़ा और उछल कर यह दूसरे स्थान पर चला गया। यहाँ विश्व का 17.7 प्रतिशत लौह अयस्क भण्डार मिनास-गेरास राज्य के पठारी भाग में है। यही क्षेत्र उत्पादन में भी अग्रणी है।

3. आस्ट्रेलिया-

      आस्ट्रेलिया में लौह खनिज का उत्पादन उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। 1960 की तुलना में यहाँ का उत्पादन लगभग डेढ़ गुना हो गया है। यह विश्व का लगभग 15.3 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित करता है और विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है।

4. भारत-

       यह विश्व का चौथा बड़ा लौह अयस्क उत्पादक देश हो गया है, जो आन्तरिक खपत और विदेशी माँग के कारण अपने उत्पादन को निरन्तर बढ़ाता रहा है। भारत में चीन के बाद एशिया का सबसे बड़ा लौह अयस्क भण्डार उपलब्ध है। यहाँ का लौह-अयस्क उच्च कोटि का है, जिससे इसकी विदेशी माँग बढ़ती जा रही है। 2006 में भारत का उत्पादन 1600 लाख मीटरी टन से अधिक था, जो विश्व उत्पादन का 8.9 प्रतिशत है।

5. रूस-

        रूस विश्व का सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक रहा है, जो 1958 के बाद निरन्तर अपना प्रथम स्थान बनाये हुए था। यह अकेले विश्व का एक चौथाई से अधिक लोहा उत्खनित करता रहा है। रूस के विघटन के बाद यहाँ विश्व का 15.1 प्रतिशत लौह भण्डार सुरक्षित है। यहाँ 30 क्षेत्रों में उत्खनन कार्य किया जा रहा है।

6. यूक्रेन-

       दक्षिणी यूक्रेन में स्थित क्षेत्रों से उच्च कोटि का हेमाटाइट लौह अयस्क निकाला जाता है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और धात्विक सम्पन्नता के कारण यह पूर्व सोवियत संघ का सर्वश्रेष्ठ खनिज लौह उत्पादक क्षेत्र रहा है, हालांकि कोयले का क्षेत्र (डोनवास) इससे 400 किमी० की दूर है।

         यहाँ का अधिकांश उत्पादन यूक्रेन और मास्को-तुला क्षेत्र में प्रयुक्त होता है। यहाँ का कुछ उत्पादन पूर्वी यूरोप के इस्पात केन्द्रों को भी भेजा जाता रहा है। क्रिबोईराग यूक्रेन का सबसे बड़ा लौह-अयस्क उत्पादन क्षेत्र है। 2006 में यहाँ का उत्पादन विश्व का 4.1 प्रतिशत था।

7. संयुक्त राज्य अमेरिका-

         उच्च कोटि का लौह अयस्क, सुविधाजनक स्थिति, पर्याप्त रक्षित भण्डार, उन्नत प्रावधिकी और पर्याप्त माँग के कारण 1958 तक संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का अग्रणी लौह अयस्क उत्पादक देश था। राष्ट्रीय संरक्षण नीति के कारण इसका उत्पादन नियंत्रित कर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप अब यह विश्व का सातवाँ बड़ा उत्पादक हो गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पाँच क्षेत्र रक्षित भण्डार और उत्पादन दोनों के दृष्टिकोण से अग्रणी हैं। 2006 में यहाँ विश्व का केवल 2.9 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित हुआ था।

8. दक्षिणी अफ्रीका संघ-

        दक्षिणी अफ्रीका संघ में लौह धातु का उत्खनन अप्रत्याशित गति से बढ़ा है। 1960 में यह विश्व का मात्र एक प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित करता था लेकिन 2006 में इसका हिस्सा बढ़कर 2.3 प्रतिशत हो गया है। स्पष्ट है कि लौह अयस्क का उत्पादन व्यापारिक कारणों से अधिक बढ़ा है। यहाँ का अधिकांश लौह अयस्क निर्यात किया जाता है।

         यहाँ की लौह अयस्क की खानें ट्रांसवाल, आरेन्ज फ्री स्टेट और कपेटाउन प्रान्तों में स्थित हैं जो रेल मार्गों से सेवित हैं इन्हीं खानों के निकट मैगनीज और कोयले की खानें भी स्थित हैं।

9. कनाडा-

         कनाडा का लौह खनिज भण्डार उच्च कोटि का है। देश में सीमित माँग के बावजूद संयुक्त राज्य अमेरिका की बढ़ती माँग और जल यातायात की सुविधा के कारण यहाँ का उत्पादन तीव्र गति से बढ़ रहा है। 1948 में यहाँ मात्र चौदह लाख टन लौह खनिज का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर 2006 में 3.4 करोड़ मीटरी टन से अधिक हो गया है। कनाडा की प्रमुख खानें लेब्रोडोर (शेफलतिल) ओन्टोरिया, नेवस्का, क्यूवेक, ब्रिटिश कोलम्बिया तथा न्यूफाउण्डलैण्ड में हैं। यह विश्व का 9वाँ बड़ा उत्पादक है। 2006 में यहाँ विश्व का 1.9 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित हुआ था।

10. स्वीडन-

         स्वीडेन तीव्र उत्पादन के कारण यूरोप का प्रमुख लौह उत्पादक देश बन गया है। 2006 में यहाँ का उत्पादन 236 लाख मीटरी टन था, जो विश्व उत्पादन का 1.3 प्रतिशत है। उच्चकोटि के लौह खनिज के कारण स्वीडेन के लौह खनिज की अधिक माँग है।

11. वेनेजुएला-

         यह विश्व का ग्यारहवाँ प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक देश है, जो 1960 के बाद अपना उत्पादन तीव्र गति से बढ़ाने में सफलता प्राप्त कर सका है। यहाँ का लौह अयस्क उच्चकोटि का है, जिसकी माँग संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों में है। इस देश की आय का लगभग तीस प्रतिशत भाग अयस्क नियत से प्राप्त होता है। 2006 में यहाँ विश्व का 1.3 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित हुआ था। वेनेजुएला में अधिकांश उत्पादन सेन बोलिवार तथा एलपाओ की खानों से प्राप्त किया जाता है ,यहाँ की संचित राशि बहुत अधिक है।

लैटिन अमेरिका के अन्य देश-

         चिली और पेरू लैटिन अमेरिका के अन्य महत्त्वपूर्ण देश है जहाँ लौह अयस्क का उत्पादन तीव्र गति से बढ़ रहा है। इन देशों में कोयले की कमी के कारण अधिकांश उत्खनन निर्यात के लिए किया जाता है। चिली के तटीय भाग में वृन्तोको तथा रामेन्ल क्षेत्रों से अधिकांश लौह अयस्क प्राप्त किया जाता है। पेरू की खाने मारकोना एवं अकोर में हैं। जहाँ उच्चकोटि का लौह-अयस्क प्राप्त किया जाता है।

यूरोप के लौह-अयस्क उत्पादक देश-

         यूरोप के प्रमुख उत्पादकों में स्वीडेन के अतिरिक्त फ्रान्स, स्पेन, पूर्व यूगोस्लाविया और नार्वे विशेष उल्लेखनीय हैं। 1960 तक फ्रांस विश्व का चौथा बड़ा लौह उत्पादक देश रहा है, लेकिन अब यहाँ का उत्पादन बहुत तेजी से घटा है फलस्वरूप अब यह विश्व का सोलहवाँ उत्पादक बन गया है।

        फ्रांस के लौह-अयस्क में धातु की मात्रा चालीस प्रतिशत से कम है लेकिन रक्षित भण्डार बहुत अधिक है। लाँगवी, लान्द्रे, ओटाज ओर्न और नेन्सी प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। इसके अतिरिक्त नारमण्डी, ब्रिटेन एवं मध्यवर्ती पठार में भी छिटपुट जमाव पाया जाता है। स्पेन में उच्चकोटि का अयस्क प्राप्त किया जाता है जिसमें धातु की मात्रा साठ प्रतिशत से अधिक है। यहाँ सबसे अधिक उत्पादन बिलिवाओं क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त पिरेनीज एवं जिब्राल्टर क्षेत्रों में लौह अयस्क प्राप्त किया जाता है।

कजाकिस्तान-

      सोवियत संघ के विघटन के बाद कजाकिस्तान विश्व का तेरहवाँ प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक देश बन गया है, जो 2006 में विश्व का 1.0 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित किया था।

ईरान-

     ईरान विश्व का 1.1 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित कर बारहवें स्थान पर आ गया है।

    विश्व के अन्य प्रमुख उत्पादकों में मैक्सिकों, मारुतानिया, जर्मनी, लाइबेरिया, स्पेन, ब्रिटेन, पेरू, चिली, अल्जीरिया, मोरक्को, ट्यूनिएिशया, मारुतानिया, गैबन, स्वाजीलैण्ड, अंगाला, तुर्की, फिलीपीन्स, मलेशिया एवं इण्डोनेशिया के नाम विशेष उल्लेखनीय है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार-

         वर्ष 1999 में चीन संसार का सबसे बड़ा लौह-आयस्क उत्पादक देश था। इसके बाद ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, भारत तथा रूस का स्थान था। लोहे का विश्व व्यापार काफी बड़ी मात्रा में होता है। ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा एवं भारत लौह अयस्क के प्रमुख निर्यातक देश हैं, जिनका निर्यात व्यापार में हिस्सा 70 प्रतिशत है। अन्य निर्यातक देशों में स्वीडन, लाइबेरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला आदि का नाम आता है।

        जापान विश्व का सबसे बड़ा लौह अयस्क आयातक (45 प्रतिशत) देश है। अन्य आयातक देशों में जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, इटली एवं फ्रांस प्रमुख हैं।

11. Discuss the role of WTO in terms of International trade.

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सन्दर्भ में विश्व व्यापर संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।

12. What do you understand by special economic zone? Discuss the SEZ of India.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? भारत के सेज की चर्चा कीजिये।

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ऐतिहासिक पक्ष

     रॉबर्ट सी हेवर्ड के अनुसार SEZ की अवधारणा काफी प्राचीन है। प्राचीनतम SEZ का प्रमाण यूनान के टायर नगर से मिलता है। 1960 ई० में चीन ने SEZ का निर्माण कर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास किया। जबकि भारत ने अप्रैल 2000 ई० में पहले SEZ नीति की घोषणा की।

प्रकार/वर्गीकरण

      SEZ कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) निर्यात संवर्धन क्षेत्र (Export Prossising Zone), मुक्त क्षेत्र (Free Zone), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Estate), मुक्त बंदरगाह, नगरीय उद्यम क्षेत्र इत्यादि।

उद्देश्य

     SEZ की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य है।

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

स्वरूप एवं विशेषता

      किसी भी एक आदर्श SEZ के अंतर्गत एक हजार हेक्टेयर भूमि पर स्थापित किया जा सकता है और उसमें कम से कम 10 हजार करोड़ रूपये का निवेश होना चाहिए। पुनः उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए:-

(1) SEZ के अंतर्गत कार्य करने वाले इकाइ‌यों के द्वारा वस्तु तथा सेवाओं का मुक्त संचलन होना चाहिए।

(2) विश्व स्तर की आधारभूत संरचना का विकास किया जाना चाहिए।

(3) निर्माण या उत्पादन का कार्य गहन तरीके से होना चाहिए।

(4) निर्यात अभिमुख होना चाहिए।

(5) उन्नत तकनीक होना चाहिए।

(6) उचित प्रबंधन तथा उच्च तकनीक का उपयोग होना चाहिए।

वर्तमान स्थिति एवं महत्त्व

     वर्तमान में 379 SEZs अधिसूचित हैं, जिनमें से 265 चालू हैं। लगभग 64% SEZ पाँच राज्यों- तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित हैं। इससे एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। SEZ पर बाबा कल्याणी समिति की सिफारिशों के अनुसार, SEZ में MSME योजनाओं को जोड़कर तथा वैकल्पिक क्षेत्रों को क्षेत्र-विशिष्ट SEZ में निवेश करने की अनुमति देकर MSME निवेश को बढ़ावा देना है।

      इसके अतिरिक्त सक्षम और प्रक्रियात्मक छूट के साथ-साथ SEZ को अवसंरचनात्मक स्थिति प्रदान करने हेतु वित्त तक उनकी पहुँच में सुधार करके तथा  दीर्घकालिक ऋण को सक्षम करने के लिये भी अग्रगामी कदम उठाए गए। कुछ SEZ के उदाहरण निम्नलिखित है:-

भारत:-

(1) काण्डला तथा सूरत- गुजरात

(2) कोचीन- केरल

(3) सांताक्रुज- मुम्बई

(4) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) विशाखापतनम- आन्ध्र प्रदेश

(7) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(8) इंदौर- मध्य प्रदेश

(9) राजीव गाँधी इंटेफोर्ट पार्क- हिंजेवादी, पूना।

(10) जयपुर- राजस्थान

(11) सिंगुर (टाटा मोटर्स कंपनी)- पश्चिम बंगाल 

नोट: टाटा मोटर्स कंपनी 2008 में सिंगूर परियोजना को छोड़ने के बाद कंपनी ने अपनी विनिर्माण इकाई को साणंद, गुजरात में स्थानांतरित कर दिया।

MULTIDISCIPLINARY CO

टाटा मोटर्स कंपनी साणंद, गुजरात

(12) नन्दीग्राम (सलीम अली ग्रुप केमिकल फैक्ट्री)- पश्चिम बंगाल

        संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के अनुसार, 2019 तक, 147 देशों ने किसी न किसी तरह के SEZ की स्थापना की थी, दुनिया भर में SEZ की कुल संख्या 5,400 के करीब है।

MAJOR CORE COURSE (Theory- Cartograms Map Projection and Surveying) Solved Questions Paper 2024

(MAJOR CORE COURSE : MJC-4)

UG (Sem.-III) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

GEOGRAPHY

(Cartograms Map Projection and Surveying)

Time: Three Hours  [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Attempt all MCQ from this part. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

इस भाग से सभी बहुविकल्पीय प्रश्नों को हल कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. (i) Scale is the ratio between:

(a) Map distance and ground distance

(b) Ground distance and scale distance

(c) Both (a) and (b)

(d) None of the above

मापक किसका पारस्परिक अनुपात है?

(a) मानचित्र की दूरी एवं धरातल की वास्तविक दूरी

(b) धरातल पर दूरी एवं मापक पर दी गयी दूरी

(c) दोनों (a) और (b)

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (c) दोनों (a) और (b)

(ii) Who made the globe of the Earth?

(a) Ptolemy

(b) Crates

(c) Posidonius

(d) Eratosthenese

किसने पृथ्वी को ग्लोब के रूप में दर्शाया?

(a) टॉलमी

(b) क्रेटस

(c) पोसाईडॉनस

(d) ईरास्थनीज

उत्तर- ईरास्थनीज

(iii) The father of Chinese Cartograpy is said to be:

(a) Pie Xiu

(b) Xit Chwang

(c) Chia Shen

(d) None of the above

चीन में कार्टोग्राफी का जनक इनको कहते हैं:

(a) पेई क्सिउ

(b) जिट ज्यांग

(c) चिया शेन

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (a) पेई क्सिउ

(iv) A columnar diagram is called:

(a) Bar diagram

(b) Vertical diagram

(c) Horizontal diagaram

(d) None of these

स्तम्भ आरेख को कहा जाता है:

(a) बार आरेख

(b) लंबवत आरेख

(c) क्षैतिज आरेख

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (a) बार आरेख

(v) The word ‘map’ originated in which language?

(a) Latin

(b) Chinese

(c) Italian

(d) Japanese

‘मानचित्र’ शब्द की उत्पत्ति किस भाषा में हुई?

(a) लैटिन भाषा

(b) चीनी भाषा

(c) इटालियन भाषा

(d) जापानी भाषा

उत्तर- (a) लैटिन भाषा

(vi) Weather maps are:

(a) Daily

(b) Weekly

(c) Monthly

(d) Yearly

मौसम मानचित्र होता है:

(a) दैनिक

(b) साप्ताहिक

(c) मासिक

(d) वार्षिक

उत्तर- (a) दैनिक

(vii) The parallel lines on globe are called:

(a) Latitude

(b) Longitude

(c) Graticule

(d) Map

ग्लोब पर समान्तर रेखाओं को कहते हैं :

(a) अक्षांश

(b) देशान्तर

(c) ग्रेटीक्युल

(d) नक्शा

उत्तर- (a) अक्षांश

(viii) Another name of Shade Method is:

(a) Choropleth Method

(b) Isopleth Method

(c) Both (a) and (b)

(d) None of these

छायांकन विधि का दूसरा नाम है:

(a) कोरोप्लेथ विधि

(b) आइसोप्लेथ विधि

(c) दोनों (a) और (b)

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- 

(ix) What connects points of equal value for a specific variable such as elevation or temperature?

(a) Isopleth

(b) Dot line

(c) Diagram

(d) Projection

किसी विशिष्ट चर, जैसे ऊँचाई या तापमान के लिये समान मान वाले बिन्दुओं को क्या जोड़ता है?

(a) आइसोप्लेथ

(b) बिन्दु रेखा

(c) आरेख

(d) प्रक्षेपण

उत्तर- 

(x) A map projection that is least useful for maps of the world :

(a) Mercator

(b) Cylindrical

(c) Conic

(d) All of these

विश्व को दर्शाने वाला एक प्रक्षेपण जो सबसे कम उपयोगी है:

(a) मरकेटर

(b) बेलनाकार

(c) शंकुधारी

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर- 

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. Define Cartography.

कार्टोग्राफी को परिभाषित कीजिए।

3. What do you understand by a bar diagram? Explain briefly.

दण्ड आरेख से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में बताइये।

4. Give the definition of a map.

मानचित्र को परिभाषित कीजिए।

5. What do you mean by shading method?

छायांकन विधि से आप क्या समझते हैं?

6. What is Map projection?

मानचित्र प्रक्षेपण क्या होता है?

7. Explain different types of projection.

प्रक्षेपण के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Briefly explain the history of cartography from Ancient times to Modern times.

प्राचीन काल से आधुनिक काल तक, कार्टोग्राफी के इतिहास को संक्षेप में बताइये।

9. Describe the developmentof Indian cartography.

भारत में कार्टोग्राफी के विकास का वर्णन कीजिए।

10. Explain the different types of bar diagram, along with their uses.

उपयोगिता के आधार पर, विभिन्न प्रकार के दण्ड आरेख की चर्चा कीजिए।

11. What do you understand by a Map? Classify map on the basis of purpose.

आप मानचित्र से क्या समझते हैं? उद्देश्य के आधार पर मानचित्रों को वर्गीकृत कीजिए।

12. What is the map projection? Classify projection according to the method of construction.

मानचित्र प्रक्षेपण क्या होता है? रचना विधि के आधार पर, प्रक्षेपण को वर्गीकृत कीजिए।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. Define Cartography.

कार्टोग्राफी को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- मानचित्र कला को सामान्यतः मानचित्र की रूपरेखा तैयार करने, रचना करने एवं उत्पत्ति करने की विज्ञान एवं कला समझा जाता है।

⇒ अमेरिकन सोसाइटी ऑफ सिविल इंजीनियर्स के अनुसार, “Cartography is the art of map construction and the science on which it is based. It combines the achievements of the astronomer and mathematician with those of the explorer and surveyor in presenting of the physical characteristics of the earth’s surface.”

⇒ संयुक्त राष्ट्र की सामाजिक कार्य विभाग (1949) के अनुसार, “Cartography is considered as the science of preparing all types of maps and charts, and includes every operation from origional surveys to final printing of copies.” इस प्रकार मानचित्र कला (Cartography) मानचित्र बनाने की कला है एवं वह विज्ञान है जिस पर मानचित्र की रचना आधारित है। यह पृथ्वी की भौतिक विशेषताओं की तस्वीर को मानचित्र पर प्रस्तुत करता है और इस क्रम में खोजकर्त्ता एवं सर्वेक्षणकर्त्ता की उपलब्धियों को खगोलविद् एवं गणितज्ञ की उपलब्धियों के साथ सम्बद्ध करता है।

     मानचित्र कला वह विज्ञान है जो सभी प्रकार के मानचित्र एवं चार्ट को तैयार करता है और इसके अन्तर्गत मौलिक सर्वेक्षण से लेकर मानचित्रों एवं चार्यों की अन्तिम छपाई तक की सभी क्रियाएँ शामिल हैं।

3. What do you understand by a bar diagram? Explain briefly.

दण्ड आरेख से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में बताइये।

उत्तर-

दण्ड-आरेख:-

       किसी वस्तु की मात्रा का वितरण, विभिन्न क्षेत्रों में किसी वस्तु के उत्पादन व्यापार, जनसंख्या वितरण या किसी वस्तु की मात्रा की तुलना आदि जब खड़े या पड़े स्तंभ या दण्ड से दिखाते हैं तो ऐसे आरेख को दण्ड आरेख (Bar Diagram) या स्तंभ आरेख (Columnar Diagram) कहते हैं।

    दण्ड आरेख बनाते समय निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए:

1. सभी स्तंभ या दण्डों की मोटाई एक समान होनी चाहिए।

2. आरेख में सभी दण्ड समान दूरी के अंतर पर बनाने चाहिए। यह दूरी दण्ड की मोटाई से सदैव कुछ कम रखते हैं।

3. एक उपयुक्त मापक (स्केल) निर्धारित करने के बाद ही स्तंभों की रचना करनी चाहिए।

दण्ड आरेख के प्रकार (Types of Bar Diagram)

1. सरल दण्ड आरेख (Simple Bar Diagram):-

    सरल दण्डारेख में एक चित्र के अंतर्गत एक ही वस्तु के आँकड़े प्रदर्शित किये जाते हैं।

2. मिश्रित दण्ड आरेख (Compound Bar Diagram):

    मिश्रित दण्ड आरेख द्वारा आँकड़ों के कुल योग तथा उनके विभिन्न भागों को प्रदर्शित किया जाता है तथा उन्हें एक ही दण्ड में इस प्रकार खींचते हैं कि उससे आँकड़ों के अलग-अलग गुण तथा कुल योग का पता चल जाए।

3. बहुदण्ड आरेख (Multiple Bar Diagram):-

    इसमें दो या अधिक वस्तुओं के आँकड़ें एक साथ प्रदर्शित किये जाते हैं। तुलनात्मक अध्ययन में ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

4. द्विदिशा दण्ड आरेख (Duo-Directional Bar Diagram):-

    जब पदमाला में धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों प्रकार के पदमूल्य दिये हों तो उन्हें द्विदिशा दण्ड आरेख द्वारा प्रदर्शित करते हैं। इसमें आधार रेखा के ऊपर एवं नीचे दोनों तरफ स्तंभ खींचे जाते हैं। ऊपर के स्तंभ धनात्मक (+) तथा नीचे के स्तंभ ऋणात्मक (-) मूल्यों को प्रदर्शित करते हैं।

4. Give the definition of a map.

मानचित्र को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- ‘मानचित्र’ लैटिन भाषा के मैपा (Mappa) शब्द से उत्पन्न मैप (Map) शब्द का पर्यायवाची है, जिसका शाब्दिक अर्थ कपड़े का रूमाल या टुकड़ा होता है। मानचित्र द्वारा विश्व के किसी भाग अथवा विशाल क्षेत्र का प्रदर्शन तथा चित्रण समतल कागज पर सरलता से किया जा सकता है।

     अर्थात् पृथ्वी के समस्त भूभाग अथवा किसी एक भाग को कागज पर सांकेतिक चिन्हों के द्वारा उचित मापक (Scale) तथा प्रक्षेप (Projection) पर चित्रण को ही मानचित्र कहते हैं। और इस प्रकार मानचित्रों के संग्रह को मानचित्रावली अथवा एटलस (Atlas) कहा जाता हैं।

फिन्च तथा टिवार्था के अनुसार ‘मानचित्र धरातल के आलेखी निरूपण होते हैं।

5. What do you mean by shading method?

छायांकन विधि से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- भूगोल में छायांकन विधि का मतलब है, मानचित्र पर किसी भू-आकृति की छाया बनाना। छायांकन विधि से मानचित्र पर उच्चावच को दिखाया जाता है। छायांकन विधि के कुछ उदाहरण हैं: हैश्यूर विधि, पर्वतीय छायाकरण विधि इत्यादि।

     छायांकन विधि की प्रमुख विशेषताएँ:

(i) हैश्यूर विधि में, मानचित्र पर छोटी-छोटी रेखाएं खींचकर उच्चावच को दिखाया जाता है।

(ii) पर्वतीय छायाकरण विधि में, भू-आकृतियों पर उत्तर-पश्चिम दिशा से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है।

(iii) जिस हिस्से में प्रकाश नहीं पड़ता, उसे गहरे रंग से भर दिया जाता है।

(iv) जिस हिस्से में प्रकाश पड़ता है, उसे हल्के रंग से भर दिया जाता है या फिर खाली छोड़ दिया जाता है।

6. What is Map projection?

मानचित्र प्रक्षेपण क्या होता है?

उत्तर- ग्लोब पर स्थित अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के जाल को समतल कागज पर प्रक्षेपित करने की तकनीक को मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) कहते हैं।

परिभाषा

स्टीयर्स⇒ ग्लोब की अक्षांश या देशान्तर रेखाओं को सपाट कागज पर प्रदर्शित करने की विधि को मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) कहते हैं।

इरविन रेज⇒ अक्षांश वृत्तों तथा याम्योत्तर रेखाओं (Meridian) का कोई व्यवस्थित क्रम जिस पर मानचित्र बनाया जा सके प्रक्षेप कहा जाता है।

मैक हाउस⇒ पृथ्वी के अक्षांश वृतों और याम्योत्तर रेखाओं का रेखा जाल के रूप में समतल पर प्रदर्शन प्रक्षेप कहलाता है।

जॉन बीगॉट⇒ ग्लोब की अक्षांश और देशान्तर रेखाओं को कागज पर प्रदर्शित करने की विधि को मानचित्र प्रक्षेप कहते हैं।

मानचित्र प्रक्षेप की आवश्यकता क्यों

      मानचित्र का प्रदर्शन ग्लोब और समतल कागज पर प्रदर्शित करते हैं। लेकिन ग्लोब की तुलना में मानचित्रों का समतल कागज पर प्रदर्शन कई अर्थों में भिन्नता रखता है। जैसे-

(1) ग्लोब पर बने मानचित्र को एक बार में समस्त भाग को नहीं देखा जा सकता। लेकिन समतल कागज पर मानचित्र को एक बार में समस्त भाग को देखा जा सकता है।

(2) ग्लोब पर स्थित दो स्थानों के बीच की दूरी मापना एक कठिन कार्य है जबकि समतल कागज पर यह काम आसानी से किया जा सकता है।

(3) ग्लोब को मानचित्र की तरह मोड़ा नही जा सकता है।

(4) पृथ्वी के छोटे-2 भागों को अलग-2 ग्लोब पर नहीं बनाया जा सकता है।

(5) मानचित्र की तुलना में ग्लोब का रख-रखाव और उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने और ले जाने में अधिक कठिनाई होती है।

7. Explain different types of projection.

प्रक्षेपण के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

उतर-

मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

      प्रकाश या ज्यामितीय विधि द्वारा समतल सतह पर निर्मित अक्षांश व देशांतर रेखाओं के जाल या भू-ग्रिड को मानचित्र प्रक्षेप कहा जाता है। गोलाकार पृथ्वी अथवा इसके किसी बड़े भू-भाग का समतल सतह पर मानचित्र बनाने के लिए मानचित्र प्रक्षेप का प्रयोग किया जाता है। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के जाल को Graticule, Net या Mesh के नाम से भी जाना जाता है।

MAJOR CORE

           पृथ्वी की आकृति का यथार्थ चित्रण केवल ग्लोब के द्वारा ही संभव है एवं कोई भी मानचित्र प्रक्षेप आकार, क्षेत्रफल एवं दिशा, तीनों ही दृष्टि से सही नहीं होता है। परन्तु समक्षेत्र, यथाकृतिक अथवा शुद्ध दिशा के गुणों में से किसी विशेष गुण का प्रक्षेप बनाना संभव है। अतः मानचित्र के उद्देश्य को ध्यान में रखकर उपयुक्त प्रक्षेप का चयन किया जाता है।

    मानचित्र प्रक्षेप को तीन आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

(1) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

(2) गुण के आधार पर

(3) रचना विधि के आधार पर

(I) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

            प्रकाश के प्रयोग के आधार पर प्रक्षेप दो प्रकार के होते हैं:-

(1) संदर्श मानचित्र-प्रक्षेप (Perspective Map Projection or Geometrical Projection):-

         यह एक ऐसा Projection है जिसमें ग्लोब पर स्थित भूग्रिड को समतल कागज पर प्रकाश के माध्यम से प्रक्षेपित करते हैं।

        इस प्रक्षेप में प्रकाश के स्रोत की तीन स्थिति हो सकती है। जैसे-

(1) केन्द्र में,

(2) पृथ्वी के परिधि पर और

(3) अनन्त पर।

          इन तीनों स्थितियों के आधार पर प्रक्षेप तीन प्रकार के होते हैं:-
(i) केन्द्रक प्रक्षेप (Gnomonic Projection)

⇒ इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के केंद्र में होता है।

(ii) त्रिविम प्रक्षेप (Stereograophic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के परिधि पर होता है।

(iii) लम्ब-कोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत अनंत पर होता है।

(2) असंदर्श मानचित्र प्रक्षेप (Non-Perspective Map Projection):-

          इसमें गणितीय विधि के आधार पर भूग्रिड को समतल कागज पर प्रक्षेपित किया जाता है। इस विधि में प्रकाश स्रोत को केन्द्र में स्थिर कर दिया जाता है और समतल कागज को अलग-2 स्थितियों में बदलकर प्रक्षेपण का कार्य किया जाता है। इसके आधार पर यह Projection तीन प्रकार का होता है-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज को ग्लोब के ध्रुव पर फैलाकर रखा जाता है।

(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज विषुवत रेखा को स्पर्श करता है।
(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज ध्रुव और विषुवत रेखा के बीच के किसी स्थान को स्पर्श करता है।

(II) गुण के आधार पर 

             गुण के आधार पर प्रक्षे तीन प्रकार के होते हैं:-

(1) यथाआकृति प्रक्षेप (Orthomorphic Projection)

(2) समक्षेत्र प्रक्षेप (Homolographic Projection or Equal Area Projection)

(3) शुद्ध दिशा प्रक्षेप (Azimuthal Projection)

(III) रचना विधि के आधार पर

           इसमें गणित और प्रकाश दोनों का सहारा अपने सुविधा के अनुसार लिया जाता है।

⇒ रचना विधि के आधार पर प्रक्षेप कई प्रकार के होते हैं:-
(1) शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)

      शंकु प्रक्षेप चार प्रकार का होता है-

(i) One Standard Parallel Conical Projection (एक मानक अक्षांश वाला शंकु-प्रक्षेप)

(ii) Two Standard Parallel Conical Projection (दो मानक अक्षांशों वाला शंकु प्रक्षेप)

(iii) Bonne’s Projection (बोन प्रक्षेप)

(iv) Polyconic Projection (बहुशंकुक प्रक्षेप)

(2) बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)

(i) Cylindrical Equi-Distance Projection (समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप)

(ii) Cylindrical Equal-Area Projection (बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप)

(iii) Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप या यथाकृति प्रक्षेप)

(iv) Gall Projection (गॉल प्रक्षेप)

(3) Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)

        प्रकाशीय स्थिति के आधार पर खमध्य प्रक्षेप तीन प्रकार का होता है:-

(1) Gnomonic Projection (केन्द्रक नोमॉनिक प्रक्षेप)

(ii) Stereograophic Projection (त्रिविम प्रक्षेप)

(ii) Orthographic Projection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)

             खमध्य प्रक्षेप कागज तल स्थिति के आधार पर तीन प्रकार का होता है:-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

(ii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक प्रक्षेप)

(iii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

(4) रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Porojection)

(i) मॉलवीड प्रक्षेप (Mollveide Projection)

(ii) ज्यावक्रीय या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

(iii) गोलाकार प्रक्षेप (Globular Projection)

(iv) विच्छिन्न मॉलवीड प्रक्षेप (Interrupted Mollveide Projection)

(v) विच्छिन्न सैन्सन फ्लैम्स्टीड या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Interrupted Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Briefly explain the history of cartography from Ancient times to Modern times.

प्राचीन काल से आधुनिक काल तक, कार्टोग्राफी के इतिहास को संक्षेप में बताइये।

9. Describe the developmentof Indian cartography.

भारत में कार्टोग्राफी के विकास का वर्णन कीजिए।

10. Explain the different types of bar diagram, along with their uses.

उपयोगिता के आधार पर, विभिन्न प्रकार के दण्ड आरेख की चर्चा कीजिए।

11. What do you understand by a Map? Classify map on the basis of purpose.

आप मानचित्र से क्या समझते हैं? उद्देश्य के आधार पर मानचित्रों को वर्गीकृत कीजिए।

12. What is the map projection? Classify projection according to the method of construction.

मानचित्र प्रक्षेपण क्या होता है? रचना विधि के आधार प, प्रक्षेपण को वर्गीकृत कीजिए।

MAJOR CORE COURSE (Theory- Economic Geography) Solved Questions Paper 2024

(MAJOR CORE COURSE : MJC-3)

UG (Sem.-III) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

GEOGRAPHY

(Economic Geography)

Time: Three Hours]   [Maximum Marks: 70



Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct options from the following questions. Each question carries 2 marks.[10×2=20]

निम्नलिखित प्रश्नों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

 

1. (i) Economic Geography is a branch of:

(a) Human Geography

(b) Physicsl Geography

(c) Urban Geography

(d) Political Geography

आर्थिक भूगोल किस विषय की शाखा है?

(a) मानव भूगोल

(b) भौतिक भूगोल

(c) नगरीय भूगोल

(d) राजनीतिक भूगोल

उत्तर – (a) मानव भूगोल

(ii) Who is known as founder of Economic Geography?

(a) G. Chisholm

(b) E.W. Zommermann

(c) D. Stamp

(d) J.W. Alxander

निम्नलिखित में से किसे आर्थिक भूगोल का जनक माना जाता है?

(a) जी. चिशोल्म

(b) ई. डब्ल्यू जिम्मरमैन

(c) डी. स्टाम्प

(d) जे. डब्ल्यू अलेक्जेण्डर

उत्तर – (a) जी. चिशोल्म

(iii) Which one of the following is not a primary activity?

(a) Transportation

(b) Mining

(c) Agriculture

(d) Hunting

निम्नलिखित में से कौन-सा प्राथमिक क्रियाकलाप नहीं है?

(a) परिवहन

(b) खनन

(c) कृषि

(d) आखेट

उत्तर – (a) परिवहन

(iv) Fishing occupation is of which group?

(a) Primary

(b) Secondary

(c) Tertiary

(d) Quarternary

मत्स्य उत्पादन व्यवसाय किस वर्ग का है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) चतुर्थक

उत्तर – (a) प्राथमिक

(v) In which year Von Thunen develop the model of agricultural land use zonation?

(a) 1817

(b) 1826

(c) 1856

(d) 1860

वॉन थ्यूरेन ने किस वर्ष कृषि भूमि उपयोग मंडलीकरण मॉडल विकसित किया?

(a) 1817

(b) 1826

(c) 1856

(d) 1860

उत्तर – (b) 1826

(vi) Which of the following does not fall under intensive rice cultivation?

(a) South-East Asia

(b) Southern China and Japan

(c) Nile Valley and delta

(d) Costal and Delta areas of India

निम्नलिखित में से कौन-सा गहन चावल उपज के अन्तर्गत नहीं आता है?

(a) दक्षिण-पूर्वी एशिया

(b) दक्षिणी चीन एवं जापान

(c) नील घाटी और डेल्टा

(d) भारत के तटीय एवं डेल्टा क्षेत्र

उत्तर – (c) नील घाटी और डेल्टा

(vii) The theory of Least Cost Location was proposed by:

(a) Losch

(b) Isard

(c) Dicey

(d) Weber

न्यूनतम लागत अवस्थिति का सिद्धान्त किसने दिया था?

(a) लॉश

(b) इजार्ड

(c) डाइसी

(d) वेबर

उत्तर – (d) वेबर

(viii) The leading country of Iron and Steel in the world is:

(a) Japan

(b) India

(c) U.S.A.

(d) China

विश्व में लौह-इस्पात उत्पादन का अग्रणी राष्ट्र है:

(a) जापान

(b) भारत

(c) यू.एस.ए.

(d) चीन

उत्तर – (d) चीन

(ix) The headquarter of World Trade Organisation is at:

(a) Geneva

(b) Vienna

(c) New York

(d) Washington

विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय है:

(a) जेनेवा में

(b) वियना में

(c) न्यूयार्क में

(d) वाशिंगटन में

उत्तर – (a) जेनेवा में

(x) Which country of the world introduced SEZ first?

(a) India

(b) South Korea

(c) China

(d) Pakistan

विश्व के किस देश ने सर्वप्रथम सेज की शुरुआत की?

(a) भारत

(b) दक्षिण कोरिया

(c) चीन

(d) पाकिस्तान

उत्तर – (c) चीन

SECTION-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2 What is the main purpose of Economic Development?

आर्थिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य क्या है?

3. Define Information Technology.

सूचना प्रौद्योगिकी को परिभाषित कीजिए।

4. What is the role of markets in the location of industries?

उद्योगों की स्थापना में बाजारों की भूमिका क्या है?

5. Mention in brief the advantages of Special Economic Zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र का लाभों को संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

6 What is Multilateral Trade?

बहुपक्षीय व्यापार क्या है?

7 What do you mean by Trade Liberalization?

व्यापार उदारीकरण से आप क्या समझते हैं?

 

SECTION-C/खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. of the following.

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe in detail the meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र का विस्तार सहित वर्णन कीजिए।

9. Evaluate the Von Thunen’s Agricultural Location theory.

वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धान्त का मूल्यांकन कीजिए।

10 Discuss the major oceanic routes of the world.

विश्व के प्रमुख सामुद्रिक मार्गों का उल्लेख कीजिए।

11. Explain the factors of localization of industry in a region.

किसी प्रदेश में उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की व्याख्या कीजिए।

12. Clarify the role of World Tade Organization in terms of International Trade.

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सन्दर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What is the main purpose of Economic Development?

आर्थिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर- आर्थिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य किसी क्षेत्र की आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों का अध्ययन करना है। आर्थिक भूगोल के के अंतर्गत  आर्थिक गतिविधियों और आर्थिक विकास के स्थानिक वितरण का अध्ययन किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल का एक महत्वपूर्ण उपसमूह है। आर्थिक भूगोलवेत्ता, आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक आयामों का अध्ययन करते हैं।

      आर्थिक भूगोल के कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक आयामों का अध्ययन करना।

(ii) आर्थिक प्रणालियों और प्रथाओं के विकास की वजहों का पता लगाना।

(iii) आर्थिक विकास का मानव कल्याण पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह पता लगाना।

(iv) आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक आयामों को समझना।

(v) आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और संस्थागत प्रभावों का अध्ययन करना।

(vi) आर्थिक भूगोल के ज़रिए, आर्थिक पैटर्न की पहचान करना।         

3. Define Information Technology.

सूचना प्रौद्योगिकी को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) का मतलब है, सूचना को बनाने, संग्रहीत करने, संचारित करने, और दिखाने के लिए हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करना। यह कंप्यूटिंग और संचार से जुड़ी हर चीज़ को शामिल करती है।

       सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें:-

(i) सूचना प्रौद्योगिकी, आवाज़, डेटा, और वीडियो का इस्तेमाल करके सूचना का प्रबंधन और वितरण करती है।

(ii) यह हमारी दैनिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा है।

(iii) यह व्यावसायिक संचालन, कार्यबल और सूचना तक व्यक्तिगत पहुंच को आसान बनाती है।

(iv) सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य और व्यापार का एक अहम हिस्सा है।

(v) दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख हिस्सा है।

(vi) सूचना प्रौद्योगिकी को आईसीटी (आईटीसीटी) यानी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी भी कहा जाता है।

(vii) सूचना प्रौद्योगिकी में इंटरनेट, वायरलेस नेटवर्क, कंप्यूटर, सॉफ़्टवेयर, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग, सोशल नेटवर्किंग, और अन्य मीडिया अनुप्रयोग शामिल हैं।

4. What is the role of markets in the location of industries?

उद्योगों की स्थापना में बाजारों की भूमिका क्या है?

उत्तर- उद्योगों की स्थापना में बाज़ारों की भूमिका बहुत अहम होती है। बाज़ार की उपलब्धता से उद्योगों का विकास होता है। बाज़ार की उपलब्धता से उत्पादित माल की खपत जल्दी होती है और नया उत्पादन किया जा सकता है।

        उद्योगों की स्थापना में बाज़ार की भूमिका निम्नलिखित है:

(i) बाज़ार की उपलब्धता से उद्योगों का विकास होता है।

(ii) बाज़ार की उपलब्धता से उत्पादित माल की खपत जल्दी होती है।

(iii) बाज़ार की उपलब्धता से नया उत्पादन किया जा सकता है।

(iv) बाज़ार से निकटता उद्योगों के स्थान को प्रभावित करती है।

(v) खराब होने वाले या भारी सामान बनाने वाले उद्योग आम तौर पर बाज़ारों के पास होते हैं.

5. Mention in brief the advantages of Special Economic Zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र का लाभों को संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

        विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना के कई लाभ हो सकते है:-

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

6. What is Multilateral Trade?

बहुपक्षीय व्यापार क्या है?

उत्तर- बहुपक्षीय व्यापार का मतलब है, दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान करना। इसमें दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच व्यापार समझौतों और व्यवस्थाओं का होना शामिल होता है। बहुपक्षीय व्यापार के ज़रिए, देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा दिया जाता है और उनकी अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत किया जाता है

        बहुपक्षीय व्यापार की मुख्य विशेषताएँ :

(i) बहुपक्षीय व्यापार में, दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच व्यापार बाधाओं को कम किया जाता है।

(ii) इससे सीमाओं के पार वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान आसान होता है।

(iii) बहुपक्षीय व्यापार से दुनिया भर के देशों के बीच बातचीत होती है

(iv ) इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण, और दूसरे मकसदों के लिए भी बातचीत होती है

(v) बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के कुछ उदाहरण हैं – विश्व व्यापार संगठन (WTO) और उत्तरी अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता (NAFTA)

(vi) बहुपक्षीय व्यापार, द्विपक्षीय व्यापार से ज़्यादा जटिल होता है

(vii) द्विपक्षीय व्यापार में केवल दो देश शामिल होते हैं, इसलिए इनकी बातचीत करना आसान होता है

7. What do you mean by Trade Liberalization?

व्यापार उदारीकरण से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- व्यापार उदारीकरण का तात्पर्य दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच व्यापार में बाधाओं को हटाना या कम करना है, जैसे टैरिफ और कोटा । व्यापार में कम बाधाएँ होने से आयात करने वाले देशों में बेची जाने वाली वस्तुओं की लागत कम हो जाती है। उदारीकरण प्रक्रिया के द्वारा वैश्वीकरण को बढ़ावा मिलता है। पूंजी और साधन संपन्न राष्ट्र आर्थिक तौर पर पिछड़े देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करते है। परिणामस्वरूप इन गरीब देशों मे पूंजी प्रवाह होता है और इन्हे विकसित होने का अवसर प्राप्त होता है। 

 

SECTION-C/खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. of the following.

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe in detail the meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र का विस्तार सहित वर्णन कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं।

        इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

आर्थिक भूगोल के अध्ययन उपागम एवं विधियाँ

(APPROACHES AND METHODS OF ECONOMIC GEOGRAPHY)

     आर्थिक भूगोल के सन्तुलित अध्ययन के लिए कई उपागमों व अध्ययन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक-दूसरे की पूरक हैं। निम्नांकित चार उपागम अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

(1) वस्तुगत उपागम (Commodity Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं, जैसे- गेहूं, चावल, गन्ना, लोहा, पेट्रोलियम आदि के उत्पादन एवं वितरण का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। किन्तु कुछ विद्वान इस उपागम में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण का विश्लेषण न करके व्यवसाय का वितरण और विश्लेषण करते हैं। जैसे- कृषि व्यवसाय, वस्तु संग्रह एवं आखेट व्यवसाय, खनन व्यवसाय, उद्योग आदि। इस कारण इस उपागम को ‘व्यवसाय उपागम’ (Occupational Approach) भी कहा जाता है।

(2) प्रादेशिक उपागम (Regional Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत सर्वप्रथम विश्व को कुछ बृहत् प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त कर लिया जाता है और प्रत्येक प्रदेश के प्राकृतिक वातावरण तथा विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिरूप का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

(3) सैद्धान्तिक उपागम (Theoretical Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत किसी भी वस्तु या प्रदेश की विशेषताओं एवं वितरण प्रतिरूप का अध्ययन पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के सन्दर्भ में किया जाता है। इस अध्ययन विधि से मुख्यतः सिद्धांतों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जाता है, न कि वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण करना।

(4) क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत वस्तुओं के वितरण की सामान्य विशेषताओं का क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन तीन चरणों में सम्पन्न किया जाता है:-

(1) प्रथम चरण में किसी भी वस्तु की स्थिति तथा वितरण के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय चरण में उस वस्तु विशेष की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(iii) तृतीय चण में उस वस्तु का अन्य प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों से सम्बन्ध का विश्लेषण किया जाता है। ये अन्तर्सम्बन्ध ‘कार्यकरण सम्बन्ध’ (Cause and Effect Relationship), ‘क्रियात्मक सम्बन्ध’ (Functional Relationship) तथा ‘क्षेत्रीय सम्बन्ध’ (Areal Relationship) के रूप व्यक्त किए जाते हैं।

9. Evaluate the Von Thunen’s Agricultural Location theory.

वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धान्त का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर-   वॉन थ्यूनेन एक जर्मन अर्थशास्त्री थे जिन्होंने 1826 ई० में कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत “सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत” के नाम से जाना जाता है। हालांकि यह सिद्धांत 198 वर्ष पूर्व दिया गया था, लेकिन इसकी चर्चा आज भी भूगोल में की जाती है। वर्तमान समय में कृषि का प्रारूप बदल गया है। इसके बावजूद भी इनका सिद्धांत आर्थिक भूगोल में मान्यता रखता है।

मान्यताएँ:-

        वॉन थ्यूनेन का कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत एक चिर सम्मतकालीन सिद्धांत (Classical theory) है जो निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है।

(1) भौगोलिक प्रदेश एकाकी (पृथक) होना चाहिए।

(2) भौगोलिक प्रदेश के बीच में एक केन्द्रीय बाजार होना चाहिए।

(3) इसकी भौगोलिक प्रदेश में सभी भौतिक परिस्थितियाँ (जैसे – स्थलाकृति, जलवायु, मृदा और वनस्पति) एक समान हो।

(4) केन्द्रीय बाजार की एकाकी भौगोलिक प्रदेश में क्रय-विक्रय का केन्द्र हो।

(5) केन्द्रीय बाजार निश्चित बाजार मूल्य पर क्रय-विक्रय का कार्य करता हो।

(6) सम्पूर्ण एकाकी प्रदेश में कृषि उत्पादन लागत एक समान हो, लेकिन दूरी के अनुसार परिवहन मूल्य में परिवर्तन होता हो।

(7) कृषकों को बाजार का पूर्ण ज्ञान हो।

(8) एकाकी भौगोलिक प्रदेश में घोड़ागाड़ी और नौका का प्रयोग परिवहन के रूप में किया जाता हो।

(9) दूरी और भार में वास्तविक वृद्धि के अनुसार परिवहन मूल्य में वृद्धि होता हो।

        ऊपर वर्णित मान्यताएँ जिन भौगोलिक प्रदेशों में लागू होती है वहीं वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धांत लागू होता है।

परिकल्पनाएँ:-

        वॉन थ्यूनेन ने निम्नलिखित दो प्रमुख परिकल्पनाओं का निर्धारण किया है।

(1) केन्द्रीय नगर से ज्यों-2 दूर जाते हैं त्यों-2 फसल विशेष की गहनता में क्रमिक रूप से कमी आती है।

(2) केन्द्रीय नगर से दूरी में ज्यों-2 वृद्धि होती है त्यों-2 भू-उपयोग प्रारूप में संकेन्द्रीय पेटी के रूप में परिवर्तन होता है।

सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत

       वॉन थ्यूनेन के अनुसार केन्द्रीय नगर के चारों तरफ कृषि भूमि उपयोग की 6 संकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास होता है। वॉन थ्यूनेन ने नगरों के चारों ओर विकसित सकेन्द्रीय वलय पेटियों को समझाने हेतु दो मॉडल प्रस्तुत किया है:-

(1) सैद्धांतिक मॉडल

(2) व्यवहारिक मॉडल

        सैद्धांतिक मॉडल पूर्णतः ज्यामितीय है जबकि व्यवहारिक मॉडल पूर्णतः संशोधित है। वॉन थ्यूनेन ने संशोधन के लिए दो करकों को जिम्मेदार ठहराया है।

(1) अधिकतर नगर नदी के किनारे होते हैं और नदी परिवहन प्रभाव के कारण सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ पूर्णतः गोल न होकर नदी प्रवाह की तरफ प्रक्षेपित हो जाती है।

(2) बड़े नगरों के बाहरी क्षेत्रों में भी छोटे केन्द्रीय बस्तियों का विकास हो जाता है जिसके कारण भी सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ निरूपित हो जाती है।

        वॉन थ्यूनेन के द्वारा प्रस्तुत सैद्धांतिक मॉडल एवं व्यवहारिक मॉडल नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का सैद्धांतिक मॉडल

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का व्यवहारिक मॉडल

         वॉन थ्यूनेन के अनुसार नगरों के चारों ओर निम्नलिखित सकेन्द्रीय वलय पेटी का विकास होता है:-

1. फल, सब्जी एवं दुग्ध 

2. ईंधन के लिए लकड़ी/वन

3. गहन खाद्यान कृषि

4. कृषि और पशुपालन

5. तीन खेती प्रणाली

6. पशुपालन (चारागाह)

        वॉन थ्यूनेन ने बताया कि नगर के तत्काल बाहर फल, सब्जी और दुग्ध की कृषि की जाती है क्योंकि ये दैनिक आवश्यकता की वस्तु है तथा शीघ्र विनष्ट होने की प्रवृ‌ति रखते हैं। अगर इसकी खेती नगरों से दूर किया जाता है तो वे बर्बाद हो सकते हैं।

      दूसरी पेटी में जलावन की लकड़ी या वन का विकास होता है क्योंकि यह कम मूल्य का भारी वस्तु है। अत: दूर से इसका परिवहन मंहगी होती है।

     तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल पेटी का विकास होता है क्योंकि फल, सब्जी, दुग्ध मिलने के बाद खाद्य फसल अनिवार्य वस्तु है। नगरों में खाद्यान्न की मांग बहुत अधिक होती है। इसलिए किसान तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल का विकास करते हैं।

       चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल, परती भूमि और पशुचारण साथ-2 की जाती है। चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल की खेती गहनता से नहीं की जाती है क्योंकि एक ओर बाजार से जहाँ दूरी बढ़ जाती है वहीं खाद्यान्न फसलों की माँग में कमी आने लगती है। चौथी पेटी में निवास करने वाले किसान समय-समय पर परती भूमि को छोड़‌ते रहते हैं तथा पशुचारे की कृषि भी करते हैं।

     पाँचवी पेटी में कृषि भूमि का तीन भागों में विभाजन होता है। इसलिए इस पेटी को तीन कृषि पद्धति वाली पेटी कहते हैं। 5वीं पेटी का किसान अपने कुल भूमि के 1/3 भाग पर खाद्यान्न के उत्पादन, 1/3 भूमि पर पशुपालन और शेष 1/3 भूमि परती भूमि के रूप में उपयोग करता है। कृषि भूमि का यह विभाजन फसल चक्र के नियम पर आधारित होता है अर्थात इस पेटी के किसान अपने भूमि पर लगातार 2-3 वर्षों तक कृषि करते है। उसके बाद उसे परती भूमि के रूप में छोड़ देते हैं।

       छठी पेटी में पशुपालन का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है क्योंकि छठी पेटी में जनसंख्या का दबाव बहुत कम होता है और नगर से दूरी बहुत अधिक होती है। किसानों के पास अधिक भूमि रहने के कारण पशुपालन को प्रमुखता प्रदान करते हैं।

सकेन्द्रीय वलय पेटी के निर्धारण की विधि

      वॉन थ्यूनेन महोदय ने एक ग्राफ के माध्यम से सकेन्द्रीय वलय पेटियों का निर्धारण किया है। उन्होंने परिकल्पना में कहा है कि नगर से बढ़ती दूरी के साथ-साथ फसलों की गहनता में कमी आते-जाती है। अतः वह बिन्दु जहाँ आर्थिक लगान किसी भी अन्य फसल की तुलना में अधिक होता है वही बिन्दु उस सकेन्द्रीय वलय पेटी की अंतिम सीमा होती है। इसे नीचे के ग्राफ से समझा जा सकता है।

MAJOR CORE COURSE

आलोचनात्मक मूल्यांकन

         वर्तमान समय में कृषि तकनीक का विकास नगरीकरण में वृद्धि और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने के बावजूद वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं हुआ है।

        1925 में जॉनसन महोदय ने स्टॉकहोम (स्वीडेन) को केन्द्र मानकर और 1932 ई० में बाल्केनबर्ग महोदय ने नगर में उ०-पश्चिमी यूरोप को एक केन्द्र मानकर इनके सिद्धांत को पुष्ट किया। दोनों ने अपने अध्ययन में बताया है कि वॉन थ्यूनेन के मुताबिक ही यहाँ सकेन्द्रीय पेटियों का विकास हुआ है।

          इन पेटियों में थोड़ा बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। जैसे:- पहली पेटी में आज भी दुग्ध और सब्जी की खेती होती है। दूसरी पेटी में खाद्यान्न फसल, तीसरी पेटी में पशुपालन और चौथी पेटी में वानिकी का कार्य होता है। इस परिवर्तन का कारण बताते हुए कहा है कि जीवाश्म ऊर्जा के विकास के कारण ईंधन की लकड़ी का महत्त्व घट गया है, इसलिए यह पेटी अब खिसकर बाहरी क्षेत्र में चला गया है।

भारत के संदर्भ में वॉन थ्यूनेन की कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत

        कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी इनके मॉडल का अध्ययन किया है। 1972 ई० में भी प्रोमिला कुमार ने भोपाल नगर के संदर्भ में इसका अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन सिद्धांत के अनुरूप ही सकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास हुआ है। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के अली मुहम्मद सहित कई लोगों ने UP नगरों के संदर्भ में, जशबीर सिंह (हरियाणा) के संदर्भ में, BL शर्मा (राजस्थान) के संदर्भ में इस मॉडल का अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत के अनुसार ही प्रथम पेटी और तीसरी पेटी का विकास हुआ है लेकिन दूसरी पेटी खिसककर बाहर चला गया है।

      सैद्धांतिक तौर पर इनका सिद्धांत एक आदर्शवादी सिद्धांत प्रतीत होता है। लेकिन इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों पर की जाती है।

आलोचना

(1) वॉन थ्यूनेन ने अपनी संकल्पना (मान्यता) में एकाकी प्रदेश की संकल्पना प्रस्तुत किया है जो गलत है क्योंकि कोई भी प्रदेश वर्तमान समय में एकाकी प्रदेश नहीं रह सकता।

(2) किसी भी प्रदेश में केन्द्रीय नगर ही खरीद-बिक्री का एकमात्र केन्द्र नहीं हो सकता।

(3) भौगोलिक कारकों में समरूपता असंभव है।

(4) बाजार से बढ़ती दूरी के अनुसार वस्तुओं का मूल्य एक समान वृद्धि होना असंभव है।

(5) वर्तमान समय में आधु‌निक परिवहन के साधन विकसित हो चुके हैं। इसलिए नाव एवं घोड़ागाड़ी अव्यवहारिक हो चुका है।

(6) वॉन थ्यूनेन ने कहा है कि फल एवं सब्जी पेटी का विकास नगर के ठीक बाहरी क्षेत्रों में होता है। लेकिन वर्तमान समय में नगर से हजारों किमी० दूर फल, सब्जी एवं दुग्ध की कृषि की जा रही है और नगरों में आपूर्ति की जाती है। जैसे:- अमेरिका के झील प्रदेश में कैलिफोर्निया तथा फ्लोरिडा राज्य से फल एवं सब्जी की आपूर्ति की जाती है।

(7) वॉन थ्यूनेन के अनुसार दूसरी पेटी में ईधन लकड़ी की खेती की जाती है। लेकिन व्यवहारिक रूप में यह पेटी कहीं नहीं पायी जाती।

(8) वॉन थ्यूनेन के अनुसार व्यवहारिक सिद्धांत मॉडल में दो कारणों से संसोधन होता है- (i) नदी एवं (ii) छोटे नगर के कारण। लेकिन वर्तमान समय में उपजाऊ भूमि, नवीन तकनीक, रेल एवं सड़‌क परिवहन इत्यादि भी सकेन्द्रीय वलय पेटी में संशोधन लाते हैं।

निष्कर्ष

    अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान समय के संदर्भ में इस सिद्धांत में कई त्रुटियाँ है। इन त्रुटियों के बावजूद कृषि स्थानीयकरण के संबंध में प्रस्तुत किया गया यह पहला सिद्धांत था, इसीलिए यह आज भी मान्यता रखता है।

10 Discuss the major oceanic routes of the world.

विश्व के प्रमुख सामुद्रिक मार्गों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- जहां पहले महासागरों या समुद्रो को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों को अलग करने वाले अवरोध (barrier) के रूप में जाना जाता था,  वही अब उनको क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण कड़ी समझा जाता है। आज महासागार परिवहन के प्राचीनतम और सबसे सस्ते एवं महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक साधन हैं। मानव के लिए महासागर प्रकृति द्वारा दिए गए ऐसे उपहार हैं जिनको यातायात (transportation) के रूप में प्रयोग करने पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता और न ही सड़कों, रेलमार्गों तथा नहरों की भाँति उनका रख-रखाव करना पड़ता है।

इसके अतिरिक्त इसका उपयोग करने में अपेक्षाकृत कम ऊर्जा की आवश्यकता पहोती है। तथा समुद्री मार्ग में स्थलीय तथा अन्तर्देशीय जलमार्गों (inland waterways) की तरह विभिन्न प्रकार की बाधाओं का सामना भी नहीं करना पड़ता है। सबसे  महत्वपूर्ण बात यह है कि महासागर तथा समुद्र बने-बनाये विश्व-मार्ग हैं, जिन पर किसी राष्ट्र विशेष का अधिकार नहीं होता और ये सभी राष्ट्रों द्वारा प्रयोग किए जा सकते हैं। इसलिए प्रमुख मार्गों के रूप में महासागर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं।

प्राचीनकाल में जहां पालदार जहाजों (sailing ships) के द्वारा व्यापार किया जाता था, वहीं वर्तमान समय में शक्तिशाली इंजनों से चलाए जाने वाले विशाल यात्री जहाज़ और माल वाहक जहाज़ों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बहुत बढ़ावा दिया है। आधुनिक जलयानों की सबसे खास बात यह है कि वे यातायात के अन्य साधनों की अपेक्षा कहीं अधिक सामान ढोते हैं और लम्बी दूरियो तक सामान ढोने का किराया भी बहुत कम होता है।

आजकल तो समुद्री जहाजों में प्रशीतन प्रणाली (refrigeration system) के प्रयोग से नाशवान् (perishable) वस्तुओं-जैसे माँस, फल, मछली, सब्जी, और दूध से बने सामान आदि  के व्यापार में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। बड़े टैंकर वाले समुद्री जहाज तो पेट्रोलियम की विशाल  मात्रा ढ़ोते हैं।

यदि संसार के विभिन्न महासागरीय मार्गों की बात करें तो ये मार्ग विभिन्न प्रकार के कारकों पर आधारित होते हैं। जैसे: दो स्थानों के बीच आने वाले स्टेशनों पर ईंधन की आपूर्ति की व्यवस्था, जहाज पर ले जाए जाने वाले पदार्थ का वजन, रास्ते में हिमशैलों (icebergs)  की उपस्थिति, कोहरा, तूफान, तथा समुद्री जल धाराएं आदि।

        विश्व का अधिकतर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार निम्नलिखित समुद्री मार्गों के द्वारा किया जाता है:-

1. उत्तर अटलांटिक मार्ग (North Atlantic route)

2. भूमध्यसागरीय – हिंद महासागरीय मार्ग (Mediterranean – Indian ocean route)

3. केप ऑफ गुड होप अर्थात् उत्तम आशा अन्तरीप मार्ग (Cape of Good-Hope route)

4. दक्षिणी अटलांटिक मार्ग (South Atlantic route)

5. कैरीबियन सागर व्यापारिक मार्ग (Caribbean sea trade route)

6. प्रशान्त महासागरीय मार्ग (Pacific oceanic route)

7. स्वेज नहर मार्ग (Suez Canal Route)

8. पनामा नहर मार्ग (Suez Canal Route)

1. उत्तर अटलांटिक मार्ग (North Atlantic route):-

       यह  विश्व का सबसे अधिक व्यस्ततम महासागरीय मार्ग है, जो पश्चिमी यूरोपीय देशों तथा उत्तरी अमेरिका के बीच स्थित है। इस महासागरीय मार्ग के दोनों ओर विश्व के प्रमुख औद्योगिक उन्नति वाले देश, यूरोप के पश्चिमी देश तथा संयुक्त राज्य अमेरिका एवं पूर्वी कनाडा स्थित है। इनके बीच व्यापार के अंतर्गत खाद्य पदार्थों, कच्चे मालों तथा उत्पादित सामग्री की मात्रा विश्व के अन्य सभी महासागरीय मार्गो की अपेक्षा अधिक रहती है।

      पूरे विश्व के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग 1/4 भाग इसी मार्ग के द्वारा होता है। इस मार्ग पर सबसे पहले 1938 में स्टीमर जलपोत शुरू हुआ था। तब से लेकर आज तक यहां परिवहन का इतना विकास हुआ है कि अब तक लगभग 300 कंपनियों को जलपोत इस मार्ग पर चलने लगे हैं।

पश्चिमी यूरोप के मुख्य बंदरगाह (अटलांटिक महासागर का पूर्वी तट):  लंदन, लिवरपूल, हैम्बर्ग, ब्रजेन, रॉटरडम एमस्टरडम, दी हेग, रोम, नेपिल्स आदि।

उत्तरी अमेरिका व कनाडा की बंदरगाह (अटलांटिक महासागर पश्चिमी तट):  उत्तरी अमेरिका में हेलीफ़ेक्स, न्यूयार्क, बोस्टन, फिलाडेलफिया, बाल्टीमोर, गेलवेस्टन, चार्ल्सटन, न्यूआर्लियन्स, हाउसटन और कनाडा का क्वेबेक आदि।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

कनाडा से गेहूँ, जौ, मछली, नर्म लकड़ी, काष्ठ मण्ड, कागज, ऐलुमिनियम, ताँबा, टिटेनियम, जस्ता, एस्बेस्टस, पारा, पोटाश, प्लेटिनम, चाँदी और यूरेनियम का निर्यात होता है। 

संयुक्त राज्य अमेरिका से गेहूँ, कपास, रूई, कोयला, पेट्रोलियम, सोयाबीन, तेल, मशीनरी, कृषि यन्त्र, साइन्स के सामान, मोटरकार, वस्त्र, आदि का निर्यात होता है। 

यूरोप से मशीनें, वस्त्र, साइन्स का सामान, आदि का निर्यात होता है।

2. भूमध्यसागरीय – हिंद महासागरीय मार्ग (Mediterranean – Indian ocean route)

       यह विश्व का सबसे अधिक लम्बा महासागरीय व्यापारिक मार्ग है, जो विश्व के मध्य सागर(भूमध्यसागर) से होकर जाता है और विश्व के सबसे बड़े स्थल भाग तथा विश्व की अधिकतम जनसंख्या (3/4 जनसंख्या) की सेवा करता है। यह मार्ग यूरोपीय और अमेरिकन पश्चिमी सभ्यता को भारत, चीन और जापान की पूर्वी सभ्यता से जोड़ता है।

      यह मार्ग पश्चिमी यूरोप से भूमध्यसागर होकर स्वेज़ नहर और लाल सागर को पार करता हुआ, हिन्द महासागर में पूर्वी अफ्रीका, दक्षिणी एशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को चला जाता है। इसी मार्ग की एक शाखा पूर्वी एशिया में चीन, जापान को जाती है।

भूमध्यसागर सागर तट के प्रमुख बंदरगाह – लेनिनग्राद, हेम्बर्ग, एम्स्टर्डम रोडरड्म, लन्दन, साउथेम्पटन, लिवरपूल, लोहेवर, लिस्बन, मार्सेली, जेनोआ, रोम, नेपुल्स, ओदेसा, पोर्ट सईद, आदि।

हिंद महासागर प्रमुख बंदरगाह – मुम्बई, कोलम्बो, सिंगापुर, पर्थ, एडिलेड, सिडनी तथा अफ्रीका के मोम्बासा, जेन्जीबार, डरबन, आदि हैं। सिंगापुर से एक शाखा हाँगकाँग, सिडनी, जापान और फिलिपीन्स को चली जाती है।

3. केप ऑफ गुड होप अर्थात् उत्तम आशा अन्तरीप मार्ग (Cape of Good-Hope route)

      यह  महासागरीय मार्ग उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट और पश्चिमी यूरोपीय देशों को अफ्रीका, दक्षिणी एशिया, पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया से जोड़ता है। स्वेज़ नहर के बन जाने से इस मार्ग का महत्व पहले से कम हो गया है।

पश्चिमी यूरोप से जहाज़ केप वर्डे द्वीपों के पास से होते हुये बृहत्-वृत्त (great circle) द्वारा अफ्रीका के दक्षिण में केप ऑफ गुड होप पहुँचते हैं। वहाँ केप टाउन बन्दरगाह है। केप टाउन बन्दरगाह से इण्डोनेशिया जाने वाले समुद्री जहाज़ बृहत् वृत्त मार्ग से जाते हैं, परन्तु केप टाउन से ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का मार्ग बृहत्-वृत्त से कुछ उत्तर में है, ताकि जहाज़ों के मार्ग में तूफान और हिम खण्ड न आयें। रास्ते में समुद्री जहाज़ों के ईंधन लेने के लिए केपटाउन, पोर्ट एलिज़ाबेथ, ऐडिलेड, मेलबोर्न, सिडनी, आदि बन्दरगाह हैं।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

       दक्षिणी-पूर्वी एशिया से रबर, टिन, पेट्रोलियम, खाद्य पदार्थ, चीनी, कॉफी, नारियल, मसाले ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से ऊन, डेयरी के पदार्थ, खालें तथा, अन्य कच्चे माल जाते हैं। इनके बदले में निर्मित सामग्री आती है।

      अफ्रीका से ताड़ का तेल, आइवरी नट्स, फल, गोंद, मोहेर ऊन, खालें, मक्का, कॉफी, कोको, चीनी, माँस, आदि पदार्थ भेजे जाते हैं। दक्षिणी अफ्रीका के निर्यातों में सोना,कुछ लोह-मिश्र धातुयें का निर्यात होता है। तथा अलोह धातुएँ ताँबा, जस्ता, आदि का निर्यात होता है।

       पूर्वी अफ्रीका से रूई, कॉफी, तम्बाकू और तिलहन का निर्यात होता है। पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका से जो माल अफ्रीका को आता है, उसमें औद्योगिक मशीनरी, खनन मशीनरी, खोदने और रचना करने की मशीनें, कृषि के उपकरण, परिवहन की गाड़ियाँ, रासायनिक पदार्थ, स्वर का सामान, पेट्रोलियम के उत्पादन और बिजली के सामान होते हैं।

4. दक्षिणी अटलांटिक मार्ग (South Atlantic route)

      दक्षिणी अमेरिका में अमेजन बेसिन के  सघन वनों से, ब्राजील के पठार व पेटागोनिया की विस्तृत चरागाहों से, पम्पास के उपजाऊ कृषि प्रदेशसे, और एण्डीज के खनिज भण्डारों से विभन्न उत्पादों को पश्चिमी यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के बृहत् बाजरोंर में निर्यात किया जाता है।

दक्षिणी अटलांटिक मार्ग के प्रमुख बंदरगाह

दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट के बन्दरगाह मोण्टेविडियो और रायो-डि-जेनेरो, सेन्टोस, ब्यूनस आयर्स हैं।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

अर्जेंटीना, ब्राजील और यूरुग्वे से विशाल मात्राओं में गेंहू, मक्का, हिमीभूत माँस, ऊन, चमड़ा और खालें निर्यात होती हैं। कॉफी, चीनी, वनस्पति तेल, चर्वियाँ, मोम, चूर्म शोधक टेनिंग पदार्थ, कपास (रुई), तम्बाकू, उष्ण कटिबन्धीय और उपोष्ण कटिबन्धीय लकड़ी भी निर्यात होती है।

लौह-अयस्क मैंगनीज, क्रोमियम, टंगस्टन, बॉक्साइट, अभ्रक, आदि खनिजों का निर्यात भी बड़ी मात्राओं होता है।

उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप से लौटते हुए जहाजों में लौह-इस्पात, रेलवे-इंजन, रेलवे-वैगन, औद्योगिक मशीनरी, मोटर ट्रक, कार, रासायनिक पदार्थ, वस्त्र तथा अन्य निर्मित सामग्री आते हैं।

पेटागोनिया से ब्यूनस आयर्स को पेट्रोलियम आता है। मध्य अर्जेंटीना से पूर्वी ब्राजील को गेहूँ, आटा, समशीतोष्ण फल और शराब का निर्यात होता है। ब्राजील से अर्जेंटीना को केला, कॉफी, लोह-अयस्क और लकड़ी का निर्यात होता है।

5. कैरीबियन सागर व्यापारिक मार्ग (Caribbean sea trade route)

      कैरीबियन सागर में स्थित पश्चिमी द्वीपसमूहों से तथा वेनेजुएला, गायना, सूरीनाम, आदि देशों से उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तटीय बन्दरगाहों और यूरोप को खाद्य-पदार्थों व खनिज पदार्थों का निर्यात होता है। इन द्वीपों और देशों से चीनी, चीनी का औद्योगिक शीरा, केला, कॉफी, कोको, नारियल, बीन्स, शीतकालीन तरकारियाँ, कठोर वनस्पति-रेशे, कपास, उष्ण कटिबन्धीय लकड़ी का निर्यात होता है। गन्धक, बॉक्साइट, पोटाश, नमक, फॉस्फेट शैल, पेट्रोलियम एवं लौह-अयस्क भी निर्यात होते हैं।

      अमेरिका और यूरोप से आयात किये जाने वाले माल में मुख्यतः खाद्य-पदार्थ, रासायनिक पदार्थ, कागज, वस्त्र, मशीनें और परिवहन गाड़ियाँ होती हैं। इस मार्ग का सम्बन्ध अमेरिका के बन्दरगाहों न्यू ओर्लियन्स, गेल्वेस्टन, हाउसटन, मोरिखविले, स्पेरोज पोइन्ट, फिलाडेलफिया, न्यूयार्क, आदि से है। यूरोप के बन्दरगाहों – लन्दन, लीहेवर, हेम्बर्ग, आदि से यह मार्ग सम्बन्धित है। 

       पनामा नहर का प्रयोग करके यह व्यापारिक मार्ग उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तटीय बन्दरगाहों, सेन फ्रांसिस्को, सीएटल और बैंकूवर से जुड़ा है, तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट से भी जुड़ा है।

6. प्रशान्त महासागरीय मार्ग (Pacific oceanic route)

        हालांकि प्रशान्त महासागर सबसे बड़ा महासागर है, जो पृथ्वी तल के 1/8 भाग पर फैला हुआ है, फिर भी इसमें व्यापारिक परिवहन की मात्रा बहुत कम है। इसके दो कारण हैं-

(i) विश्व के मुख्य औद्योगिक प्रदेश, यूरोप तथा अमेरिका अटलांटिक के तटों पर हैं,  प्रशान्त के तट पर केवल जापान एक ऐसा औद्योगिक उन्नति का देश है। 

(ii) पैसिफिक में कोई ऐसा द्वीप नहीं है जिसका व्यापारिक महत्व हो ।

उत्तरी प्रशान्त मार्ग, उत्तरी अमेरिका तट को एशिया के देशों से जोड़ता है। इसकी दो शाखायें हैं:

(i) एक शाखा – चीन-जापान से पश्चिमी अमेरिका तट को जाने के लिए एल्यूशियन द्वीपों के समीप बृहत्-वृत्त मार्ग का अनुसरण करती है। 

(ii) दूसरी शाखा हवाई द्वीप होकर जाती है, जो एशियाई देशों तथा ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड को जाती है। अमेरिकन बन्दरगाह लॉस ऐंजिलीस, सेन फ्रांसिस्को,सीएटल, पोर्टलैंड, बैंकूवर और प्रिंस रूपर्ट हैं। एशियाई बन्दरगाह टोकियो, योकोहामा, कोबे, ओसाका, शंघाई, टीन्टसिन और हाँगकाँग हैं।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

पश्चिमी अमेरिकी तट से लकड़ी, काष्ठ मण्ड, कागज़, गेहूँ, रूई, पेट्रोलियम, रद्दी इस्पात (स्क्रेप), गन्धक, फॉस्फेट तथा निर्मित सामग्री का निर्यात होता है। चीन, जापान, फिलिपीन्स, आदि से नारियल, चीनी, मनीला-हैम्प (सन), चाय, डिब्बा बन्द मछली, वनस्पति तेल और सूती वस्त्र आते हैं। जापान ने इतनी औद्योगिक उन्नति की है कि अब जापानी बिजली का सामान, कैमरे, वस्त्र, सस्ती कारें और बृहत् जलपोत अमेरिका के बाजारों में बिकते हैं।

7. स्वेज नहर मार्ग (Suez Canal Route)

       स्वेज नहर एक मानव निर्मित अर्थात् कृत्रिम नहर है जो कि भूमध्य सागर और लाल सागर को आपस में जोड़ती है। यह नहर सम्पूर्ण विश्व के लिए एक छोटा व्यापारिक मार्ग उपलब्ध कराता है। इस नहर के बनने से यूरोप, एशियाई देशों, ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी अफ्रीकी देशों के बीच व्यापार में आशातीत प्रगति हुआ है।

स्वेज नहर

स्वेज नहर का निर्माण

     स्वेज नहर का निर्माण  सन 1859 ई० में एक फ्रांसीसी इंजीनियर फर्डिनेंड ने शुरू किया था। इस नहर के बनने और शुरु होने में लगभग 10 वर्ष का समय लग गए थे। यातायात के लिए यह 1869 ई० में खोला गया। इस नहर के बनने में लगभग 1,20,000 मजदूर हैजा तथा अन्य बीमारियों से काल कवलित हो गए थे अर्थात यह नहर काफी अधिक त्याग और तपस्या से बनी थी।

स्वेज नहर की संरचना

     यह नहर की लम्बाई 168 किमी०, चौडाई 60 मीटर और गहराई 10 से 15 मीटर है। इस नहर के भूमध्य सागर वाले उत्तरी छोर पर पोर्ट सईद तथा लाल सागर वाले दक्षिणी छोर पर पोर्ट तौफीक, स्वेज और पोर्ट इब्राहीम स्थित है।

Suez Canal

स्वेज नहर से लाभ

     स्वेज नहर के पहले यूरोप से आने वाले जहाजों को उत्तमाशा अंतरीप का चक्कर लगाना पड़ता था जो कि काफी लंबी दूरी वाला जलमार्ग है। अब उन्हें सीधे भूमध्य सागर से होकर स्वेज नहर होते हुए लाल सागर में प्रवेश करना पड़ता है जो अपेक्षाकृत एक बेहद छोटा मार्ग है।

      स्वेज नहर मार्ग के कारण यूरोप से एशिया और पूर्वी अफ्रीका का सीधा मार्ग खुल गया है और इससे लगभग 6000 मील की दूरी की बचत होती है। इसके कारण अनेक देशों, पूर्वी अफ्रीका, ईरान, अरब, भारत, पाकिस्तान, सुदूर पूर्व एशिया के देशों ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों के साथ व्यापार में बड़ी सुविधा हुई है और व्यापार काफी अधिक बढ़ गया है।

     इस नहर के बन जाने से यूरोप एवं सुदूर पूर्व के देशों के मध्य दूरी काफी कम हो गई है जैसे कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों के साथ व्यापार में बड़ी सुविधा हुई है और व्यापार बहुत बढ़ गया है। इस नहर के बन जाने से यूरोप एवं सुदूर पूर्व के देशों के मध्य दूरी काफी कम हो जाती है जैसे कि लिवरपूल से मुंबई- 7250 किमी०, लिवरपूल से हांगकांग- 4500 किमी० तथा न्यूयार्क से मुंबई- 4500 किमी० की दूरी कम होने से एशियाई तथा यूरोपीय देशों के व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ हुए हैं।

स्वेज नहर से होने वाले व्यापार

    इस नहर के द्वारा फारस की खाड़ी के देशों से खनिज तेल भारत तथा अन्य एशियाई देशों से अभ्रक, लौह अयस्क, मैगनीज, चाय, कॉफी, जुट, रबड, कपास, ऊन, मसाले, चीनी, चमड़ा, खाल, सागवान की लकड़ी, सूती वस्त्र, हैंडीक्राफ्ट आदि पश्चिम यूरोपीय देशों तथा उत्तर अमेरिका को भेजी जाती हैं।

   यूरोपीय देशों तथा उत्तर अमेरिका आदि देशों से रासायनिक पदार्थ, इस्पात, मशीन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औषधियाँ, मोटर गाड़ियाँ, वैज्ञानिक उपकरणों आदि का आयात किया जाता है।

8. पनामा नहर मार्ग (Suez Canal Route)

      पनामा नहर एक कृत्रिम अर्थात् मानव निर्मित जलमार्ग है जो पनामा में स्थित है। यह नहर दो विशाल महासागर प्रशांत तथा अटलांटिक को जोड़ने का काम करती है। यह नहर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख जलमार्गों में से एक है।

   

पनामा नहर से लाभ

      अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच की दूरी इस नहर से होकर गुजरने पर तकरीबन 8,000 मील घट जाती है क्योंकि इसके ना होने की स्थिति में जलयानों को दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी छोर केप हॉर्न अंतरीप से होकर चक्कर लगाते हुए जाना पड़ता था। पनामा नहर को पार करने में जलयानों को 8 घंटे का समय लगता है।

     इस नहर के द्वारा समुद्री मार्ग से न्यूयॉर्क एवं सैन फ्रांसिस्को के मध्य लगभग 13000 किलोमीटर की दूरी कम हो गई है। इसी प्रकार पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी तट, उत्तर पूर्वी और मध्य संयुक्त राज्य अमेरिका और पूर्वी तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के मध्य की दूरी बेहद कम हो गई है।

Panama Canal

पनामा नहर के द्वारा व्यापार

     पनामा नहर जल मार्ग से होकर विश्व के लगभग 5% से अधिक जहाज गुजरते हैं। इस नहर द्वारा अमेरिका, कनाडा, पश्चिमी यूरोप, चीन, कोरिया, और दक्षिण अमेरिका के अन्य देशों की कंपनियों द्वारा ऑटोमोबाइल, खाद्य पदार्थ, वस्त्र, दवाइयाँ, रसायन, मशीनरी, कोयला, पेट्रोलियम आदि विभिन्न उत्पादों का परिवहन किया जाता है। इस नहर का अधिकतम उपयोग अमेरिकी जलयान करते हैं जो चीन, जापान, कोलंबिया तथा साउथ कोरिया को जाते हैं।

11. Explain the factors of localization of industry in a region.

किसी प्रदेश में उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- किसी भी उद्योग में लागत को कम करने तथा लाभ को बढ़ाने के लिए एक अनुकूल स्थान की आवश्यकता होती है। उ‌द्योगों की स्थापना को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं:

1. भौगोलिक कारक

2. आर्थिक कारक

3. राजनीतिक कारक

1. भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

         इसमें कच्चा माल, शक्ति, श्रम, परिवहन तथा संचार, बाजार, जलवायु, जल आपूर्ति तथा सस्ती भूमि शामिल है।

कच्चा माल (Access to Raw Material):-

       कोई भी उ‌द्योग कच्चे माल के द्वारा ही तैयार माल उत्पन्न करता है और यह कच्चे माल दो प्रकार के होते हैं: वजन ह्रास और बिना वजन ह्रास। सामान्यता उ‌द्योग उन्ही स्थानों पर लगाए जाते हैं अहां कच्चे माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो, जैसे वन, कृषि क्षेत्र तथा समुद्र के निकट आदि। अधिकांश लौह इस्पात उ‌द्योग वहां स्थापित किया जाता है जहां लौह अयस्क और कोयला दोनों ही उपलब्ध हों क्योंकि दोनों वजन हास कच्चे माल है।

       इसी प्रकार निर्माण प्रक्रिया में जिस कच्चे माल का भार घटता है उसे वजन हासमान पदार्थ कहते हैं। कुछ वस्तुएं ऐसी भी होती है जिनके भार का हास नहीं होता, जैसे 1 टन सूत बनाने के लिए 1 टन रुई की आवश्यकता होती है। वजन हास उ‌द्योग है लौह इस्पात उ‌द्योग, गन्ने से चीनी बनाना, लकड़ी से लुग्दी, लुगदी से कागज, लेटेक्स से रबर आदि।

शक्ति (Access to source of Energy):-

       उ‌द्योगों के मशीनों को चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। ये शक्ति के सदन हैं: तापीय शक्ति, पेट्रोलियम ऊर्जा, विद्युत शक्ति, जल विद्युत शक्ति, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा आदि। अधिकांश उ‌द्योग शक्ति के साधनों के निकट ही स्थापित होते हैं।

श्रम (Access to Labour supply):-

       बिना श्रम के किसी भी उ‌द्योग की कल्पना नहीं की जा सकती है, हालांकि पहले यह पूर्णतः मानव श्रम पर आधारित था जबकि अब कंप्यूटर और मशीनों के आ जाने से मानव श्रम की कम जरुरत पड़ती है परंतु अब कुशल मानव श्रम की आवश्यकता बढ़ गई है।

परिवहन तथा संचार के साधन (Transport and communication):-

       कच्चे माल को कारखाना तक लाने और तैयार माल को कारखाना से बाजार भेजने या निर्यात के लिए परिवहन के विकसित साधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए अधिकांश उद्‌द्योग रेलवे लाइन या बंदरगाह के निकट स्थापित होते हैं। परिवहन के साथ ही संचार के साधन जैसे डाक, तार, टेलीफोन और इन्टरनेट व ईमेल इत्यादि सूचनाओं का आदान-प्रदान तीव्र गति से करते हैं जो सहायक सिद्ध होते हैं।

बाजार (Access to Market):-

      उद्योगों का मुख्य उ‌द्देश्य ही है कि तैयार माल को जरूरतमंदों के पास पहुंचाया जाए नहीं तो उत्पादन का खपत नहीं हो पायेगा। इसके लिए एक के अच्छे बाजार की आवश्यकता होती है। इसलिए अधिकांश उद्‌द्योग बाजार के निकट या फिर बाजार से करखाने तक परिवहन के सांधन अच्छा हो तो बाजार से थोड़ी दूर भी स्थापित हो सकता है।

जलवायु (Climate):-

         जलवायु उ‌द्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। बहुत उ‌द्योगों के लिए नम जलवायु की आवश्यकता होती है और बहुत सारे उ‌द्योगों के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है।

जल (Availability of Water):-

      अधिकांश उ‌द्योग भारी मात्रा में जल का उपयोग करते हैं। इसलिए अधिकांश उ‌द्योग जल स्रोतों के निकट स्थापित होते हैं। जैसे टाटा का लौह इस्पात उ‌द्योग खरकई और स्वर्णरेखा नदियों से जल प्राप्त करता है।

भूमि (Availability of Cheap Land):-

       उ‌द्योगों को स्थापित करने के लिए विस्तृत भूमि की आवश्यकता होती है क्योंकि इसमें उत्पादन के लिए मशीन स्थापित करना, कच्चे माल रखने के लिए व्यवस्था करना, उत्पादित माल को सुरक्षित रखना तथा मजदूरों के रहने के लिए व्यवस्था करना आदि में बहुत ज्यादा भूमि की आवश्यकता होती है। इसलिए भूमि सस्ती होनी चाहिए।

2. आर्थिक कारक (Economic Factor)

       इसमें मुख्य रूप से पूंजी, बैंकिंग सुविधा तथा बीमा सुविधा आती है।

पूंजी (Capital Flow):-

     किसी भी उद्‌योग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है। कारखाना लगाने, कच्चे माल खरीदने, मजदूरों को वेतन देने से लेकर बाजार तक पहुंचाने के लिए एक बड़ी रकम की आवश्यकता होती है।

बैंकिंग सुविधा (Banking Facility):-

        कारखाना के लगातार विकास के लिए निरंतर बहुत ज्यादा पूंजी की आवश्यकता पड़ती रहती हैं और इसीलिए बैंक उन्हें ऋण सुविधा के द्वारा यह रकम देते रहते हैं, जिससे उद्‌द्योगों का विकास होता है।

बीमा सुविधा (Insurance Facility):-

       आजकल जीवन के हर क्षेत्र में बीमा एक जरूरत बन गई है। इसी प्रकार किसी उ‌द्योग के लिए भी यह बहुत बड़ी जरूरत बन गई है। भारी मशीनों का बीमा, भूमि का बीमा, कारखाना का बीमा, श्रमिकों का बीमा से लेकर हर चीज का बीमा आवश्यक हो गया है।

3. राजनैतिक कारक (Political Factors)

         इसके अंतर्गत सरकार की नीतियां और राजनैतिक स्थिरता आती है।

सरकार की नीतियाँ (Government Policies):-

         उ‌द्योग की स्थापना में सरकार की नीतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

जैसे यदि किसी देश में सरकार कारखानों का राष्ट्रीयकरण कर रही हो तो वहां पर उद्‌द्योगपति अपने उद्‌द्योग नहीं लगाएंगे इसके विपरीत यदि कहीं टैक्स में छूट दिया जा रहा है तो उ‌द्योगपति वहीं पर अपना कारखाना लगाने लगते हैं।

राजनैतिक स्थिरता (Political Stability):-

        कोई भी कारखाना वहीं स्थापित हो सकता है जहां राजनीतिक स्थिरता हो। युद्ध और अशांति की स्थिति में कोई भी उ‌द्योग विकास नहीं कर सकता।

उ‌द्योगों के बीच लिंक (Access to Agglomeration Economies):-

        कई उ‌द्योगों अपने आस-पास के किसी बड़े या अन्य उ‌द्योगों से लाभान्वित होते हैं। मैं Agglomeration Economies के रूप में जाने जाते हैं। उ‌द्योगों के बीच लिंक होने से बचत भी होती है।

      इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी भी उ‌द्योग के स्थापित होने में कई कारक काम करते है जहां पर उपरोक्त में से अधिकतम कारक मिल पाते हैं उ‌द्योगों की स्थापना नहीं होती है।

12. Clarify the role of World Tade Organization in terms of International Trade.

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सन्दर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।

MINOR CORE COURSE (Theory- Economic Geography) Solved Questions Paper 2024

(MINOR CORE COURSE : MIC-3)

UG (Sem.-III) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

GEOGRAPHY

(Economic Geography)

Time: Three Hours]   [Maximum Marks: 70



Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct options from the following questions. Each question carries 2 marks.[10×2=20]

निम्नलिखित प्रश्नों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

1. (i) Which human activity is studied in Economic Geography?

(a) Social activities

(b) Economic activities

(c) Political activities

(d) Biological activities

आर्थिक भूगोल में मानव की किन क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है?

(a) सामाजिक क्रियाएँ

(b) आर्थिक क्रियाएँ

(c) राजनैतिक क्रियाएँ

(d) जैविक क्रियाएँ

उत्तर – (b) आर्थिक क्रियाएँ

(ii) Agricultural Occupation is of which group?

(a) Primary

(b) Secondary

(c) Tertiary

(d) Quarternary

कृषि व्यवसाय किस वर्ग का है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) चतुर्थक

उत्तर – (a) प्राथमिक

(iii) Economic Geography is a part of which branch of Geography?

(a) Population Geography

(b) Agricultural Geography

(c) Human Geography

(d) Transport Geography

आर्थिक भूगोल, भूगोल विषय के किस शाखा से सम्बन्धित है?

(a) जनसंख्या भूगोल

(b) कृषि भूगोल

(c) मानव भूगोल

(d) परिवहन भूगोल

उत्तर – (c) मानव भूगोल

(iv) Hunting and gathering is an important occupation of which area?

(a) Hot desert

(b) Cold desert

(c) Tropical Rain forest

(d) Temperate grassland

शिकार एवं संग्रह किस क्षेत्र का प्रमुख व्यवसाय है?

(a) गर्म मरूस्थल

(b) शीत मरूस्थल

(c) ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वन

(d) शीतोष्ण घास प्रदेश

उत्तर – (c) ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वन

(v) Which of the following falls under the secondary occupation?

(a) Cottage industry

(b) Transport

(c) Mining

(d) Fishing

निम्नलिखित में से कौन द्वितीयक व्यवसाय की श्रेणी में आता है?

(a) कुटीर उद्योग

(b) परिवहन

(c) खनन

(d) मत्स्य पालन

उत्तर – (a) कुटीर उद्योग

(vi) Which of the following does not fall under Intensive subsistence rice cultivation?

(a) South-East Asia

(b) Southern China and Japan

(c) Nile Valley and Delta

(d) Coastal and Delta areas of India

निम्नलिखित में कौन-सा गहन निर्वाह धान कृषि के अन्तर्गत नहीं आता है?

(a) दक्षिण-पूर्व एशिया

(b) दक्षिणी चीन एवं जापान

(c) नील नदी घाटी एवं डेल्टा

(d) भारत का तटीय एवं डेल्टा क्षेत्र

उत्तर – (c) नील नदी घाटी एवं डेल्टा

(vii) Rubber plantation is a type of:

(a) Commercial farming

(b) Intensive farming

(c) Subsistence farming

(d) None of the above

रबर पेड़ का बागान एक प्रकार की….है।

(a) व्यावसायिक कृषि

(b) गहन कृषि

(c) जीवन निर्वाह कृषि

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर – (a) व्यावसायिक कृषि

(viii) Most important factor for cotton textile industry is:

(a) Raw material

(b) Power resources

(c) Cheap labour

(d) All of the above

सूती वस्त्र उद्योग के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है:

(a) कच्चा माल

(b) शक्ति के संसाधन

(c) सस्ता श्रम

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर – (d) उपरोक्त सभी

(ix) Trade between two countries is known as:

(a) Inter country trade

(b) External trade

(c) Bilateral trade

(d) International trade

दो देशों के मध्य व्यापार कहलाता है:

(a) अन्तर्देशीय व्यापार

(b) बाह्य व्यापार

(c) द्विपक्षीय व्यापार

(d) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

उत्तर – (c) द्विपक्षीय व्यापार

(x) When was World Trade Organisation established?

(a) 1948

(b) 1995

(c) 1998

(d) 2000

विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब हुई?

(a) 1948

(b) 1995

(c) 1998

(d) 2000

उत्तर – (b) 1995

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions from the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. Define Economic Geography.

आर्थिक भूगोल को परिभाषित कीजिए।

3. Write a short note on tertiary occupation.

तृतीयक व्यवसाय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

4. What is Subsistence Agriculture?

जीवन निर्वाह कृषि क्या है?

5. Discuss the important factors for the establishment of Iron and Steel Industry.

लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

6. What is meant by International Trade?

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से क्या आशय है?

7. Write the types of special economic zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र के प्रकार लिखिए।

PART-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions from the following. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Explain meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के अर्थ एवं उद्देश्य का वर्णन कीजिये।

9. Discuss different types of Economic activities.

विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों की चर्चा कीजिए।

10. Analyse the distributional pattern of Cotton textile industry in China or India.

चीन या भारत में सूती वस्त्र उद्योग के वितरण प्रतिरूप की विवेचना कीजिए।

11. Briefly discuss the role of WTO in terms of International trade.

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

12. What do you mean by Special Economic Zone?

Describe in brief the special economic zones in the important countries of world.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? विश्व के प्रमुख देशों के विशेष आर्थिक क्षेत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिये।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions from the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. Define Economic Geography.

आर्थिक भूगोल को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

3. Write a short note on tertiary occupation.

तृतीयक व्यवसाय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर-  तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. What is Subsistence Agriculture?

जीवन निर्वाह कृषि क्या है?

उत्तर- इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीवन निर्वाह कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीवन निर्वाह कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीवन निर्वाह कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

5. Discuss the important factors for the establishment of Iron and Steel Industry.

लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- भारत मे लौह तथा इस्पात उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक:

(i) कच्चा माल:- अधिकांश विशाल एकीकृत इस्पात संयंत्र कच्चे माल के स्रोतों के निकट स्थित हैं, क्योंकि इनमें भारी तथा वज़न में क्षरणीकृत कच्चे माल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। उदाहरण के लिये, छोटा नागपुर क्षेत्र में लौह तथा इस्पात उद्योग का संघनन इसलिये अधिक है क्योंकि वहाँ लौह अयस्क प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। जमशेदपुर स्थित टिस्को संयंत्र को कोयला झरिया की खदानों से और लौह अयस्क, चूना पत्थर, डोलोमाइट तथा मैंगनीज़ की आपूर्ति ओडिशा व छत्तीसगढ़ से होती है।

(ii) बाज़ार:- चूँकि लौह तथा इस्पात से बने उत्पाद भारी और बड़े होते हैं इसलिये इनकी परिवहन लागत अधिक होती है। अतः बाज़ार से निकटता बेहद अहम है, विशेषकर छोटे इस्पात संयंत्रों के लिये तो यह बेहद ज़रूरी है, ताकि परिवहन को न्यूनतम किया जा सके। जमशेदपुर का टिस्को कोलकाता के निकट है, जो एक बड़ा बाज़ार उपलब्ध कराता है। विशाखापत्तनम का इस्पात संयंत्र तटीय क्षेत्र में स्थित है, जहाँ आयात-निर्यात की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

(iii) श्रम:- सस्ते श्रम की उपलब्धता भी महत्त्वपूर्ण है। छोटा नागपुर क्षेत्र के अधिकांश संयंत्रों को इस क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में सस्ता श्रम उपलब्ध होता है।
शीतलन के लिये पानी की उपलब्धता: उदाहरण के लिये- दामोदर नदी के किनारे बोकारो इस्पात संयंत्र, भद्रावती कर्नाटक में विशेश्वर्या इस्पात संयंत्र, भद्रा नदी के समीप भद्रावती (कर्नाटक) में विशेश्वर्या इस्पात संयंत्र, आदि।

(iv) औद्योगिक नगरों से समीपता:- छोटे इस्पात संयंत्रों, जो उत्पादक सामग्री के रूप में स्क्रैप धातुओं का उपयोग करते हैं, के लिये अपशिष्ट धातुओं के पुनर्चक्रण की आवश्यकता होती है। ऐसे संयंत्र ज़्यादातर औद्योगिक नगरों के समीप अवस्थित होते हैं,जैसे – महाराष्ट्र के इस्पात संयंत्र।

(v) सरकारी नीतियाँ:- सरकार उद्योगों को पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित करने के लिये प्रोत्साहित करती है। यह उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने के लिये सब्सिडी, कर में छूट और पूँजी प्रदान करती है। छत्तीसगढ़ में भिलाई इस्पात संयंत्र को क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने के लिये स्थापित किया गया था।

(vi) विद्युत:- विद्युत की उपलब्धता उद्योगों की अवस्थिति का एक अन्य निर्धारक है। टिस्को और बोकारो इस्पात संयंत्र को दामोदर घाटी निगम (DVC) से जलविद्युत की प्राप्ति होती है। भिलाई संयंत्र को कोरबा तापीय स्टेशन से ऊर्जा प्राप्त होती है।

(vii) परिवहन:- कच्चे माल की उपलब्धता वाले स्थानों, बाज़ारों और बंदरगाहों से संपर्क एक अन्य कारक है। टिस्को कोलकाता, मुंबई और चेन्नई के साथ रेलवे के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दुर्गापुर संयंत्र के पास दुर्गापुर से हुगली और कोलकाता बंदरगाह के लिये नौगम्य नहर की सुविधा मौजूद है।

6. What is meant by International Trade?

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से क्या आशय है?

उत्तर- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान या व्यापार के रूप में संदर्भित किया जाता है। इस तरह का व्यापार विश्व अर्थव्यवस्था में योगदान देता है और उसे बढ़ाता है। सबसे अधिक कारोबार की जाने वाली वस्तुएँ टेलीविज़न सेट, कपड़े, मशीनरी, पूंजीगत सामान, भोजन, कच्चा माल आदि हैं।

       अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में असाधारण वृद्धि हुई है, जिसमें विदेशी परिवहन, यात्रा और पर्यटन, बैंकिंग, भंडारण, संचार, वितरण और विज्ञापन जैसी सेवाएँ शामिल हैं। अन्य समान रूप से महत्वपूर्ण विकास विदेशी निवेश में वृद्धि और एक अंतरराष्ट्रीय देश में विदेशी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन है।

     ये विदेशी निवेश और उत्पादन कम्पनियों को अपने अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के करीब आने में मदद करते हैं, जिससे उन्हें बहुत कम दर पर वस्तुएं और सेवाएं उपलब्ध होती हैं।

     उपरोक्त सभी गतिविधियाँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अंग हैं। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उत्पादन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के दो पहलू हैं, जो दुनिया भर में दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं।

7. Write the types of special economic zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र के प्रकार लिखिए।

उत्तर-  विशेष आर्थिक क्षेत्र के प्रमुख प्रकार हैं:-

(i) मुक्त-व्यापार क्षेत्र (FTZ)
(ii) निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र (EPZ)
(iii) मुक्त क्षेत्र/मुक्त आर्थिक क्षेत्र (FZ/FEZ)
(iv) औद्योगिक पार्क/औद्योगिक एस्टेट (IE)
(v) नि:शुल्क बंदरगाहों
(vi) बंधुआ रसद पार्क (बीएलपी)
(vii) शहरी उद्यम क्षेत्र

PART-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions from the following. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्त दीजिए।

8. Explain meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के अर्थ एवं उद्देश्य का वर्णन कीजिये।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

9. Discuss different types of Economic activities.

विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसे आर्थिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएँ करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

     मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

    द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

     इसी प्रकार लौह अयस्क का खनन प्राथमिक व्यवसाय है, लेकिन लोहा-इस्पात का निर्माण गौण व्यवसाय है। विभिन्न प्रकार के उद्योग एक-दूसरे के निकट स्थापित हो जाते हैं, क्योंकि एक उद्योग का तैयार माल दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग अनेक प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योगों को विकसित कर सकता है।

     उद्योगों का विकास कच्चे माल, शक्ति, श्रमिक, पूंजी और तैयार माल के लिए बाजार की उपलब्धि पर निर्भर है। इन कारकों के अलावा परिवहन और संचार की सुविधाएं, कच्चे माल और शक्ति का लागत मूल्य, श्रमिकों का वेतन तथा तैयार माल का लागत मूल्य भी उद्योगों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है।

     किसी देश में गौण व्यवसायों में कितनी विविधता है तथा उन व्यवसायों में कितने लोग काम करते हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में औद्योगिक विकास कितना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में प्राथमिक व्यवसायों की तुलना में गौण व्यवसायों में अधिक लोग काम करते हैं।

     उद्योगों में कार्यरत लोगों की संख्या, उपयोग में आने वाली यान्त्रिक शक्ति तथा निर्मित उत्पादों के मूल्य के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते हैं यथा- वृहत् उद्योग, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग।

     दस्तकार स्थानीय पदार्थों का उपयोग करके दस्तकारी की वस्तुएं बनाते हैं। हथकरघा, बुनकर, टोकरी बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, आदि गौण व्यवसायों में लगे हैं। इन गौण व्यवसायों को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग की प्रत्येक इकाई में लोग कम संख्या में काम करते हैं और इनमें यांत्रिक शक्ति का प्रयोग नहीं होता है।

    लघु उद्योग यांत्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं। ये उद्योग बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाने हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुएं बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां जैसे- रेडियो, टी. वी. सेट, प्लास्टिक की वस्तुएं, सामान्यतः लघु उद्योगों की श्रेणी में आते हैं।

Tertiary and Quaternary Economic

प्लास्टिक की वस्तुएं

     वृहत् उद्योगों में सैकड़ों लोग काम करते हैं और इनमें करोड़ों रुपए की पूंजी लगी हुई होती है। इनमें से कुछ उद्योग जैसे मोटर कार उद्योग या दुपहिया वाहन उद्योग अधिक उत्पादन के लिए एसेम्बली लाइन तकनीक का उपयोग करते हैं। एसेम्बली लाइन में अलग-अलग स्थानों पर कच्चे पदार्थ तथा विविध पुर्जों को जोड़ने का कार्य होता है।

     एसेम्बली लाइन पर जैसे-जैसे निर्माणाधीन वस्तु आगे सरकती है, प्रत्येक श्रमिक कोई निश्चित काम करता है, फिर दूसरी निर्माणाधीन वस्तु में वह वही काम करता है। इस तरह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु का निर्माण पूरा हो जाता है और इस प्रकार एसेम्बली लाइन में से निर्मित वस्तु बाहर निकलती है। इस विधि में प्रत्येक श्रमिक किसी एक काम में विशेष दक्ष होता है, जिसे वह बार-बार दोहराता है। निर्माण उद्योगों के परिणामस्वरूप प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, मत्स्य ग्रहण, आदि में भी मशीनों का खूब प्रयोग होने लगा है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

    वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में और विशेषकर विकसित देशों में चतुर्थक व्यवसाय में संलग्न लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस व्यवसाय के लोगों में उच्च वेतनमान और पदोन्नति की चाह में गतिशीलता अधिक पाई जाती है।

    कम्प्यूटर के बढ़ते प्रयोग और सूचना प्रौद्योगिकी ने इस व्यवसाय के महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप औद्योगिक समाज के तकनीकी तत्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गया है और वर्तमान आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से उन अप्रत्यक्ष उत्पादों से प्रभावित हो गए हैं जिनके उत्पादन में ज्ञान, सूचना और संचा अधिक महत्वपूर्ण है।

10. Analyse the distributional pattern of Cotton textile industry in China or India.

चीन या भारत में सूती वस्त्र उद्योग के वितरण प्रतिरूप की विवेचना कीजिए।

उत्तर-

सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा रुग्ण उद्योग भी है। भारत में सर्वाधिक कर्मचारी इसी उद्योग में संलग्न है। भारत कभी विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक देश हुआ करता था। लेकिन, इंगलैण्ड में हुए औद्योगिक क्रांति के कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को प्रायोजित तरीके से पीछे कर दिया गया।

विकास / वृद्धि

    सूती वस्त्र उद्योग यद्यपि भारत का सबसे प्राचीन उद्योग है। फिर इसका आधुनिक कारखाना 1818 ई० में कलकता के ‘फोर्ट ग्लोस्टर’ नामक स्थान पर लगाया गया था। लेकिन कच्चे माल के अभाव में असफल रहा। पुनः सफल सूती वस्त्र का कारखाना 1850 ई० में कलकत्ता में स्थापित किया गया। इस सफल प्रयास के बाद इस उद्योग का विकास सतत् जारी है। 

      1905 ई० तक भारत में 206 सूती वस्त्र के मील स्थापित हो चुके थे। 1958ई० तक भारत में मीलों की संख्या 1767 पहुंच गयी थी। वर्तमान समय में इसकी संख्या बढ़कर 2000 से भी अधिक हो चुकी है।

स्थानीयकरण

      बेवर ने अपने न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत में बताया कि सूती वस्त्र उद्योग शुद्ध कच्चा माल पर आधारित एक ऐसा उद्योग है जिसमें हम जितना कच्चा माल लगाते है उतने ही मात्रा में शुद्ध उत्पाद प्राप्त करते है। ऐसे उद्योगों को समभार उद्योग कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्योगों का स्थानीकरण कच्चे माल वाले क्षेत्रों में, बाजार में या दोनों स्थानों पर हो सकता है। जैसे- मुम्बई के आसपास इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है क्योंकि महाराष्ट्र के काली मिट्टी की भूमि पर बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है।

      पुनः इस उद्योग का स्थानीयकरण कोलकाता के आस-पास हुआ है जबकि पूरे पश्चिम बंगाल में कपास की खेती कहीं नहीं की जाती है। अतः कलकत्ता के आस-पास सूती वस्त्र उद्योग विकास बाजार के कारण हुआ है।

विकास के विभिन्न चरण या नवीन प्रवृति या वितरण

    भारत उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाला देश है। इसलिए सम्पूर्ण भारत में सदैव सूती वस्त्र की माँग होती रही है। प्रारंभ में इसके विकास में केन्द्रीयकरण की प्रवृति थी। कालान्तर में यह विकेन्द्रीकृत उद्योग बना। केन्द्रीयकरण से विकेन्द्रीकृत उद्योग बनने में काफी लम्बा समय लगा है। इस समय को चार चरण में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

प्रथम चरण:-

    प्रथम चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास केवल मुम्बई महानगर में हुआ। यहाँ पर इस उद्योग के स्थानीयकरण के चार कारक महत्त्वपूर्ण थे। जैसे-

(1) मुम्बई भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह रहा है।

  • कपास निर्यात करने के लिए यहाँ लाये जाते थे।
  • कपास के व्यापारी मुम्बई में ही रहा करते थे। उनके पास पूँजी और तकनीक पहले से मौजूद थी।
  • पुनः मुम्बई की आर्द्र जलवालु सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती थी।

     यही कारण था कि मुम्बई द्वीप पर सूटी वस्त्र उद्योग का प्रथम विकास हुआ।

(2) चीन में विकसित हो रहे सूती वस्त्र उद्योग में धागा आपूर्ति करने का कार्य ब्रिटिश कंपनियाँ किया करती थी। जब ब्रिटिश कंपनियाँ चीन को पर्याप्त मात्रा में धागा आपूर्ति करने में असफल होने लगी तो उन्होंने भारतीय व्यापारियों के इस क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया।

(3) मुम्बई महानगर में वाणिज्यिक ऊर्जा की कमी थी लेकिन द० अफ्रीका से आयातित कोयला पर मुम्बई के पास तापीय विद्युत केन्द्र की स्थापना की गई तो सुचारू रूप से विद्युत की आपूर्ति होने लगी।

(4) सस्ते श्रमिक और आन्तरिक बाजार की उपलब्धता भी यहाँ पर इस उद्योग के विकास में सहायक रहा।

    ऊपर वर्णित कारकों के कारण 19वीं सदी के अन्त तक मुम्बई द्वीप पर करीब 40 कारखाने विकसित हो चुके थे। इसे “भारत का मैनचेस्टर” या “कपास की महानगरी” भी कहा जाने लगा। स्वेज नहर के पूरब में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला यह सबसे बड़ा केन्द्र बन गया।

दूसरा चरण:-

      1900-23 ईo के मध्य लगे सूती वस्त्र उद्योग को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में उद्योगों का विकास मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में हुआ क्योंकि मुम्बई महानगर में लगातार जमीन का मूल्य बढ़ता जा रहा था। श्रमिक संगठनों का विकास बड़े पैमाने पर हो चुका था। मलीन बस्तियाँ विकसित होने लगी थी। अतः निवेशकों ने मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में पूँजी निवेश का कार्य प्रारंभ किया। इस चरण में स्थानीयकरण की दो प्रवृति थी- प्रथम मुम्बई के ही बाहरी क्षेत्रों में सूती वस्त्र के कारखाने लगाये गये।

     पुनः सूती वस्त्र कारखाना लगाने हेतु मुम्बई के आप-पास के नगरों का चयन किया जहाँ मुम्बई के समान सभी परिस्थितियाँ अनुकूल थी। जैसे- इस चरण में कल्याण, थाणे, पुणे, नासिक, सूरत, बड़ोदरा तथा अहमदाबाद जैसे नगरों में सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ क्योंकि ये सभी केन्द्र अरब सागर के निकट थे जिसके कारण नम जलवायु उपलब्ध थी। बड़ौदरा, सूरत बंदरगाह थे। “टाटा हाइड्रल प्रोजेक्ट” के द्वारा विद्युत की आपूर्ति सुनिश्चित हो चुकी थी। मुम्बई के ही समान सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध थे।

तीसार चरण:-

     1923 से 1947 ई० के बीच लगे उद्योगों को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास दक्कन के लावा के पठारी क्षेत्र तथा मध्यवर्ती पठार पर हुआ। दक्कन के पठार पर पोरबन्दर, राजकोट, सुरेन्द्रनगर (सूरत), भूसावल, अहमदनगर, नागपुर, कोल्हापुर, सोलापुर, गुलवर्गा प्रमुख केन्द्र के रूप में थे। इन केन्द्रों में इस उद्योग का विकास कपास की खेती, सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण हुआ।

      भारत के उ० मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में इस उद्योग का विकास इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, इटारसी, भिलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर में हुआ। इन क्षेत्रों में सूती वस्त्र उद्योग का विकास कई कारणों के चलते हुआ। जैसे-

(1) इन क्षेत्रों में कई बड़े देशी रियासत रहा करते थे। इन रियासतों ने इस उद्योग में रुचि लिया। ब्रिटिश कंपनियों ने भी देशी रजबाड़ों को इस क्षेत्र में आमंत्रित किया। देशी रजबाड़ों ने ब्रिटिश कंपनियों को भूमि दिया तो दूसरी ओर ब्रिटिश कंपनियों ने बड़े पैमाने पर पूंजी तथा तकनीक का निवेश किया। इसके अलावे मैदानी भारत का बाजार, सस्ते श्रमिक उपलब्धता और कपास की खेती ने भी इस उद्योग को आकर्षित किया।

     इसी चरण में कानपुर, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, बंगलोर, विशाखापतन तथा कलकता भी सूती वस्त्र केन्द्र के रूप में उभरे क्योंकि यहाँ की सभी भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल थी तथा सस्ते श्रमिक और बाजार उपलब्ध थे।

   आजादी के बाद भारत में सूती वस्त्र उद्योग

चौथा चरण:-

     आजादी के बाद विकसित हुए सूती वस्त्र उद्योगों को इसमें शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास चार क्षेत्रों में हुआ-

(i) उ०-प० भारत-

   इसमें पंजाब तथा हरियाणा को शामिल करते हैं। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के कारण इन क्षेत्रों में कपास की खेती प्रारंभ की गई। कपास की स्थानीय उपलब्धता के करण जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, चंडीगढ़ अमृतसर तथा गंगानगर जिला सूती वस्त्र उद्योग केन्द्र के रूप में उभरे।

(ii) UP तथा बिहार-

   यहाँ पर सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। UP में मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर, मोदीनगर, मुरादाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर जैसे नगर में और बिहार में गया, डुमराँव, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना इत्यादि में विकसित हुआ। इस क्षेत्रों में सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध होने के कारण इस उद्योग कर विकास हुआ था।

(iii) पूर्वी भारत-

   बाजार की सुविधा, सस्ते श्रमिक, आयात-निर्यात की सुविधा तथा हुगली औद्योगिक प्रदेश में विकसित संरचनात्मक सुविधाओं के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ। यहाँ इस उद्योग के मुख्य केन्द्र कोलकाता, हावड़ा, मानिकपुर, नैहाटी, चन्दन नगर, सियारामपुर, दीमापुर, इम्फाल, गुवाहाटी तथा कटक थे।

(iv) द० भारत-

    यहाँ सस्ते जल विद्युत की अपलब्धता तथा कपास की खेती किए जाने के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। विजयवाड़ा,  बेलगाँव मैसूर, काँचीपुरम्, मदुरई, तिरुचिरापल्ली, पाण्डिचेरी तथा तिरुअनन्तपुरम जैसे नगरों में इस उद्योग का विकास हुआ। कोयम्बटूर को “दक्षिण भारत का मैनचेस्टर” भी कहा जाने लगा। भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र का मील तमिलनाडु राज्य में ही स्थित है।

   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का अभूतपूर्व विकेन्द्रीकरण हुआ है। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र केन्द्रों को नीचे मानचित्र में देखा जा सकता है।

Cotton Textile Industry

चित्र: भारत के प्रमुख सूत्री वस्त्र उद्योग केंद्र

   भारत में सूती वस्त्र का उत्पादन तीन क्षेत्रों में किया जाता है:-

(1) मील 

(2) पावरलूम

(3) हथकरघा / चरखा

   इन तीनों क्षेत्रों में होने वाला उत्पादन को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

क्षेत्र भारत के कुल उत्पादन का प्रतिशत 2005-06 में  (लाख वर्ग मी० में उत्पादन)
मील 3.3% 1656
पावरलूम 82.8% 41044
हथकरघा 12.3% 6108
अन्य 1.6% 769
कुल 100% 49577

           नीचे के तालिका में सूत उत्पादन को प्रदर्शित किया जा रहा है:-     

वर्ष सूत का उत्पादन हजार टन में
1950-51  835
1960-61 1075
1970-71 1050
1980-81 1400
1990-91 1430
2000-01 1600
2010-11 1820

       भारत में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला राज्यों का क्रम इस प्रकार से हैं-

(1) महाराष्ट्र- 39%

(2) गुजरात- 35%

(3) तमिलनाडु- 6.4%

(4) पंजाब- 6%

समस्या तथा संभावना

    सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। जैसे-

(1) कच्चे माल की समस्या-

    भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वस्त्र की माँग लगातार बढ़‌ती ही जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देश पूरा नहीं कर पा रहा है जिसके कारण कपास का मूल्य लगागर बढ़‌ता ही जा रहा है। फलतः भारत को अन्य देशों से कपास आयात करना पड़ता है।

    भारत के पास कपास उत्पादन हेतु विस्तृत काली मिट्टी का क्षेत्र उपलब्ध है। अतः सिंचाई सुविधाओं का विकास कर कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर से निर्भरता कम की जा सकती है।

(2) पुराने मशीन-

    भारत में अधिकांश वस्त्र का उत्पादन पूराने मशीनों से किया जाता है। जबकि USA, चीन, मिस्र, जैसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सूती का उत्पादन करते हैं जिसके कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़‌ता जा रहा है। लेकिन, नई औद्योगिक नीति की घोषणा से यह उम्मीद जगी है कि भारत में नवीन विदेशी तकनीक आगमन होगा।

(3) अनियमित विद्युत की आपूर्ति-

     देश में लगातार ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है। माँग के अनुरूप विद्युत की आपूर्ति न होने के कारण कोई भी कारखाना निर्बाध्य रूप से नहीं चल पाता है। लेकिन, आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि के विकास से इस समस्या से निजात मिल सकेगा।

(4) हड़ताल तथा तालाबंदी-

    सूती वस्त्र उद्योग से जुड़े हुए श्रमिक संगठन काफी मजबूत है। ये संगठन अपने मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं। अगर उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो कंपनी में ताला लटका देते हैं, जिसके कारण उत्पादन में कमी आती है।

     हालांकि न्यापालिका के हस्तक्षेप से और सरकार के बीच-बचाव से इस समस्या में लगातार कमी आ रही है।

(5) कृत्रिम रेशे के साथ प्रतिस्पर्द्धा-

       देश की गरीब जनता कृत्रिम रेसे से बने वस्त्र का उपयोग करते हैं जो अधिक टिकाऊ, सस्ता तथा आकर्षक होता है जबकि सूती वस्त्र कम टिकाऊ तथा महंगा होता है।

(6) घाटे में चल रही मील-

    भारत में सबसे ज्यादा सूती वस्त्र मील तमिलनाडु में है। लेकिन, तमिलनाडू भारत का मात्र 6.4% ही सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। उत्तर भारत में खाद्यान्न फसल की खेती कपास उपजाने वाले भूमि पर की जाने लगी, जिसके कार‌ण कच्चे माल की कमी हो गई। फलतः अधिकांश उत्तर भारत के सूती वस्त्र उद्योग बन्द हो गए। पुनः अधिक आयात शुल्क होने के कारण उसका आयात भी संभव नहीं था। लेकिन नवीन औद्योगिक नीति के कारण इसमें सुधार आने की संभावना है।

निष्कर्ष:

       ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। फिर भी, यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है, इस उद्योग में सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

      यह भारत का पूर्ण रूप से विकेन्द्रित उद्योग है। भारत के पास देशी एवं विदेशी बाजार उपलब्ध है। अतः कहा जा सकता है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का भविष्य काफी उज्ज्वल है।

11. Briefly discuss the role of WTO in terms of International trade.

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में विश्व व्यापा संगठन की भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।

12. What do you mean by Special Economic Zone? Describe in brief the special economic zones in the important countries of world.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? विश्व के प्रमुख देशों के विशेष आर्थिक क्षेत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिये।

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ऐतिहासिक पक्ष

     रॉबर्ट सी हेवर्ड के अनुसार SEZ की अवधारणा काफी प्राचीन है। प्राचीनतम SEZ का प्रमाण यूनान के टायर नगर से मिलता है। 1960 ई० में चीन ने SEZ का निर्माण कर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास किया। जबकि भारत ने अप्रैल 2000 ई० में पहले SEZ नीति की घोषणा की।

प्रकार/वर्गीकरण

      SEZ कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) निर्यात संवर्धन क्षेत्र (Export Prossising Zone), मुक्त क्षेत्र (Free Zone), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Estate), मुक्त बंदरगाह, नगरीय उद्यम क्षेत्र इत्यादि।

उद्देश्य

     SEZ की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य है।

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

स्वरूप एवं विशेषता

      किसी भी एक आदर्श SEZ के अंतर्गत एक हजार हेक्टेयर भूमि पर स्थापित किया जा सकता है और उसमें कम से कम 10 हजार करोड़ रूपये का निवेश होना चाहिए। पुनः उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए:-

(1) SEZ के अंतर्गत कार्य करने वाले इकाइ‌यों के द्वारा वस्तु तथा सेवाओं का मुक्त संचलन होना चाहिए।

(2) विश्व स्तर की आधारभूत संरचना का विकास किया जाना चाहिए।

(3) निर्माण या उत्पादन का कार्य गहन तरीके से होना चाहिए।

(4) निर्यात अभिमुख होना चाहिए।

(5) उन्नत तकनीक होना चाहिए।

(6) उचित प्रबंधन तथा उच्च तकनीक का उपयोग होना चाहिए।

वर्तमान स्थिति एवं महत्त्व

     वर्तमान में 379 SEZs अधिसूचित हैं, जिनमें से 265 चालू हैं। लगभग 64% SEZ पाँच राज्यों- तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित हैं। इससे एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। SEZ पर बाबा कल्याणी समिति की सिफारिशों के अनुसार, SEZ में MSME योजनाओं को जोड़कर तथा वैकल्पिक क्षेत्रों को क्षेत्र-विशिष्ट SEZ में निवेश करने की अनुमति देकर MSME निवेश को बढ़ावा देना है।

      इसके अतिरिक्त सक्षम और प्रक्रियात्मक छूट के साथ-साथ SEZ को अवसंरचनात्मक स्थिति प्रदान करने हेतु वित्त तक उनकी पहुँच में सुधार करके तथा  दीर्घकालिक ऋण को सक्षम करने के लिये भी अग्रगामी कदम उठाए गए। कुछ SEZ के उदाहरण निम्नलिखित है:-

भारत:-

(1) काण्डला तथा सूरत- गुजरात

(2) कोचीन- केरल

(3) सांताक्रुज- मुम्बई

(4) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) विशाखापतनम- आन्ध्र प्रदेश

(7) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(8) इंदौर- मध्य प्रदेश

(9) राजीव गाँधी इंटेफोर्ट पार्क- हिंजेवादी, पूना।

(10) जयपुर- राजस्थान

(11) सिंगुर (टाटा मोटर्स कंपनी)- पश्चिम बंगाल 

नोट: टाटा मोटर्स कंपनी 2008 में सिंगूर परियोजना को छोड़ने के बाद कंपनी ने अपनी विनिर्माण इकाई को साणंद, गुजरात में स्थानांतरित कर दिया।

MINOR CORE COURSE

टाटा मोटर्स कंपनी साणंद, गुजरात

(12) नन्दीग्राम (सलीम अली ग्रुप केमिकल फैक्ट्री)- पश्चिम बंगाल

        संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के अनुसार, 2019 तक, 147 देशों ने किसी न किसी तरह के SEZ की स्थापना की थी, दुनिया भर में SEZ की कुल संख्या 5,400 के करीब है।

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