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15. The Dairy farming in the world (विश्व में दुग्ध व्यवसाय)

15. The Dairy farming in the world

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. Discuss the dairy farming in the world.

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय का वर्णन करें।)

उत्तर- दूध पशुपालन विश्व के प्रत्येक देश में कुछ-न-कुछ होता है परन्तु कुछ भागों में यह व्यवसाय व्यापारिक स्तर पर किया जाता है। इन प्रदेशों में बड़े पैमाने पर पशुचारा तथा उनको खिलाने लायक अनाजों का उत्पादन होता है। आधुनिक समय में तीव्रगामी परिवहन तथा प्रशीतलन विधि से यह उद्योग और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। दुग्ध पशुपालन की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) इस प्रकार की कृषि में दुधारु पशुओं का विशेष महत्त्व होता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, प्रचुर श्रम तथा मवेशियों के रखने की वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग होता है।

(iii) कार्य के आकार एवं उपयोग में भिन्नता होती है।

(iv) दूध एवं दूध सामग्रियों का वितरण सापेक्ष दूरी के अनुसार होता है। ताजा दूध निकट के नगरों में तथा मक्खन एवं पनीर दूर के नगरों से प्राप्त किया जाता है।

(v) इस उद्योग में कुछ देशों ने विशेषीकरण प्राप्त कर लिया है।

(vi) इस उद्योग का विकास कम जनसंख्या वाले देशों में हुआ है।

(vii) यह व्यवसाय विश्व के समशीतोष्ण क्षेत्र में ही अधिक विकसित है।

विश्व में दुग्ध उत्पादन

       दूध की प्राप्ति गाय, भैंस, भेड़ तथा बकरी से होती है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1988 में विश्व भर में कुल 53 करोड़ टन दूध का उत्पादन था। विश्व भर में कुल दूध उत्पादन में पिछले तीन दशकों में आश्चर्यजनक रूप से लगभग दोगुना से अधिक की बढ़ोत्तरी हुई है। 30 साल बाद अर्थात 2018 में कुल दुग्ध उत्पादन 84.3 करोड़ टन हो गया है। साधारण शब्दों में कहें तो तीन दशक के भीतर कुल दूध उत्पादन में लगभग 60 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है।

    दूध का उत्पादन विश्व में निम्नलिखित क्षेत्रों से होता है।

विश्व में शीर्ष 10 दुग्ध उत्पादक देश (2019)

क्रम  देश उत्पादन (प्रतिशत में)
1. भारत 21
2. अमेरिका 11
3. पाकिस्तान  06
4. ब्राजील 04
5. चीन  04
6. रूस  04
7. जर्मनी 04
8. तुर्की 03
9. फ्रांस 03
10. न्यूजीलैंड 02

प्रमुख क्षेत्र

    विश्व में पशुपालन के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं-

(1) उत्तरी अमेरिका का U.S.A. तथा कनाडा का मध्य पूर्वी भाग।

(2) पश्चिमी यूरोप का उत्तरी भाग, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, डेनमार्क, ग्रेट ब्रिटेन तथा U.S.S.R का पश्चिमी भाग।

(3) दक्षिणी अमेरिका के अर्जेन्टाइना

(4) आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड

(5) गौण क्षेत्र पश्चिमी U.S.A., मध्य चिली, द० अफ्रीका तथा पूर्वी जापान।

(1) उत्तरी अमेरिका:

     दूध कृषि व्यवसाय U.S.A. तथा कनाडा में विकसित हैं। यहाँ के सभी बड़े नगरों के पास ताजे दूध के लिए यह किया जाता है। इसका सबसे अधिक केन्द्रीकरण U.S.A. के मक्का पट्टी के उत्तर ग्रेट लेक्स तथा सेंट लारेंस प्रदेश में हुआ है। यह घनी शहरी आबादी के पास स्थित है, जहाँ दूध, मक्खन एवं पनीर की बड़ी माँग है। यहाँ भी अनुकूल जलवायु तथा पहाड़ी प्रदेश अन्य कृषि के लिए अनुपयुक्त हैं। यहाँ क्यूवेक एवं ओण्टोरियो में लगभग 4000 से अधिक पनीर बनाने के कारखाने हैं। कनाडा से पनीर ब्रिटेन भेजा जाता है।

    U.S.A. में दूध उत्पादक क्षेत्र अटलांटिक तट से लेकर प० में मिसौरी नदी तक फैला है। न्यू इंगलैंड स्टेट, पेन्सिलवानिया, न्यूयार्क एवं विस्कौन्सिन राज्यों में दूध उत्पादन अधिक होता है। यहाँ दूध उत्पादन के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त हैं-

(i) ऊँची-नीची पहाड़ी भूमि पर पशु-चरण होता है।

(ii) ग्रीष्मकालीन वर्षा तथा कम गर्मी से घासें उगती है।

(iii) निकट की मक्का पट्टी से मकई से साइलेज बनाने की सुविधा।

(iv) निकट के बंदगाह से दूध पदार्थों के निर्यात की सुविधा

(v) समशीतोष्ण जलवायु के कारण दूध खराब नहीं होता है।

(vi) मशीनों का विभिन्न कार्यों में प्रयोग।

(vii) अच्छी नस्लों की जर्सी, गार्न से, आयर शायर आदि से अधिक दूध की प्राप्ति।

(viii) यातायात तथा शीतलन विधि की सुविधा।

     दूध तथा मक्खन के उत्पादन में U.S.A. का स्थान विश्व में रूस के बाद दूसरा तथा पनीर के उत्पादन में प्रथम है। इसने 1981 में विश्व का 15-6% दूध तथा मक्खन एवं 21-3% पनीर का उत्पादन किया।

(2) पश्चिम यूरोपीय प्रदेश:

    यह प्रदेश अच्छी मिट्टी एवं नम जलवायु के मुलायम घासों के लिये प्रसिद्ध है। यह दूध उत्पादन के लिए आदर्श है। यहाँ के दूध क्षेत्र प० फ्रांस, हॉलैंड, डेनमार्क, स्वेडन, ब्रिटेन तथा रूस तक फैला है।

    हॉलैंड में विशाल मैदान, नम जलवायु, उपजाऊ घास तथा उच्च गायों से अधिक दूध मिलता है। हॉलैंड का एडाम पनीर विश्व विख्यात है। डेनमार्क विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। समस्त डेनमार्क एक गऊशाला है। यहाँ दूध की नदी बहती है। यहाँ के लोगों की यह मुख्य पेशा है। यहाँ के दूध विकास के निम्न कारण हैं-

(i) यहाँ खनिजों का अभाव है।

(ii) जलवायु नम एवं अनुकूल।

(iii) छोटे-छोटे खेतों में घास

(iv) खेती के स्थान पर घासों का उत्पादन

(v) यहाँ दुग्ध शालाएँ लगभग 8000 से अधिक सहकारी समितियाँ द्वारा संचालित।

(vi) यहाँ 80% मक्खन तथा 10% पनीर

(viii) गाएँ उत्तम नस्ल की है।

        आधुनिक युग में पशुपालन वैज्ञानिक तरीकों से व्यावसायिक आधार पर हो रहा है। उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र, ब्राजील का पठारी भाग और अर्जेण्टीना में विस्तृत पम्पास घास स्थल, वेनेजुएला का लानोस घास स्थल, दक्षिणी अफ्रीका का वेल्ड क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड की शीतोष्ण घास भूमि, कैस्पियन सागर के पूर्व तथा अरल सागर के उत्तर के विस्तृत भाग व्यापारिक पशुपालन के उल्लेखनीय क्षेत्र हैं।

     व्यापारिक पशुपालन उद्योग पूर्णतया प्राकृतिक चरागाहों पर आश्रित नहीं है। विस्तृत क्षेत्रों में चारे की फसलों और पौष्टिक घासों की खेती की जाती है। पशुओं को सुख-सुविधा सम्पन्न बाड़ों में रखकर खिलाया-पिलाया जाता है। विशेष नस्ल के पशु पाले जाते हैं, जिनकी दूध या मांस उत्पादन क्षमता अत्यधिक होती है। पशुओं के प्रजनन, नस्ल सुधार, रोगों की रोकथाम तथा बीमार पशुओं के इलाज, आदि की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। पशुओं को बड़े-बड़े बाड़ों में रखा जाता है।

      डेनमार्क तथा न्यूजीलैण्ड में बड़े पैमाने पर दुग्ध व्यवसाय होता है। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में भेड़ ऊन तथा मांस के लिए व्यापारिक स्तर पर पाली जाती हैं। व्यापारिक पशुचारण में लोगों को प्रवास नहीं करना पड़ता है। वे एक ही स्थान पर हते हैं। चारे की फसलों की खेती तथा दूध और मांस से संसाधित पदार्थ बनाने के लिए मशीनों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इन संसाधित पदार्थों का बाजा अन्तर्राष्ट्रीय है।

       भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

14. WTO (विश्व व्यापार संगठन) की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्य

14. WTO (विश्व व्यापार संगठन) की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्य



WTO

प्रश्न प्रारूप

Q. विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना के उद्देश्यों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई। विश्व व्यापार संगठन (WTO) का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जिनेवा (Geneva) शहर में स्थित है।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




विश्व व्यापार संगठन

(World Trade Organisation)

परिचय
    विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization) एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार को मुक्त, पारदर्शी, संतुलित और विवाद-रहित बनाना है।

    इसका गठन 1 जनवरी 1995 को किया गया था। इससे पहले विश्व व्यापार व्यवस्था को नियंत्रित करने वाला मुख्य समझौता GATT (General Agreement on Tariffs and Trade – 1948) था, जिसे आगे बढ़ाते हुए WTO की स्थापना की गई।

    WTO आज वैश्विक व्यापार का सबसे प्रभावशाली संस्थान है, जिसमें 160 से अधिक देश सदस्य हैं। यह न केवल व्यापार नियमों को निर्धारित करता है, बल्कि व्यापार से जुड़े विवादों का समाधान भी करता है।

WTO की संरचना एवं कार्यप्रणाली

    WTO एक सदस्य-चालित संगठन है, अर्थात् इसके सभी निर्णय सदस्य देशों की सहमति से लिए जाते हैं। इसकी प्रमुख संस्थाएँ हैं- 

1. मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (Ministerial Conference):

     सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय; हर दो वर्ष में बैठक।

2. सामान्य परिषद (General Council):-

     दैनिक कार्यों का संचालन; यही विवाद निपटान निकाय (DSB) और व्यापार नीति समीक्षा निकाय (TPRB) के रूप में भी कार्य करता है।

3. विभिन्न समितियाँ:-

    कृषि, सेवाएँ, बौद्धिक संपदा (TRIPS), निवेश, प्रतिस्पर्धा आदि।

   WTO सभी सदस्यों पर एक समान नियम लागू करता है। इसका प्रमुख सिद्धांत ‘Most Favoured Nation – MFN’ है, जिसके तहत एक देश किसी सदस्य को जो व्यापार लाभ देता है, वह सभी सदस्यों को देना पड़ता है।

WTO के प्रमुख समझौते

1. GATT–1994 (वस्तु व्यापार):- 

     वस्तुओं पर टैरिफ कम करना, गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना।

2. GATS (सेवाओं पर व्यापार):-

     बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, पर्यटन आदि सेवाओं का उदारीकरण।

3. TRIPS (बौद्धिक संपदा अधिकार):-

     पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क की सुरक्षा।

4. TRIMS (निवेश संबंधी उपाय):-

     निवेश पर भेदभाव खत्म करना।

5. कृषि समझौता (AoA):-

      कृषि सब्सिडी, बाजार पहुंच और निर्यात सब्सिडी का नियमन।

WTO के उद्देश्य

      इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

(ix) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मुक्त प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना।

(x) टैरिफ और अन्य प्रतिबंधों को कम कर व्यापार को सरल और पारदर्शी बनाना।

(xi) व्यापार विवादों का निष्पक्ष समाधान करना।

(xii) विकासशील देशों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखना।

WTO और विकासशील देश

      WTO अपने नियमों में विकासशील और अल्प विकसित देशों को विशेष और भिन्न सुविधा (Special and Differential Treatment) देने की व्यवस्था करता है।

⇒ उन्हें कुछ समझौतों को लागू करने के लिए अधिक समय मिलता है।

⇒ निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

⇒ अल्प विकसित देशों को बाजार पहुंच में विशेष रियायत मिलती है।

     परंतु अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि WTO विकसित देशों के हितों की अधिक रक्षा करता है और विकासशील देशों की आवाज उतनी प्रभावशाली नहीं होती।

WTO और भारत

   भारत WTO का संस्थापक सदस्य है। WTO में भारत की भागीदारी का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में देखा जाता है।

सकारात्मक प्रभाव

1. निर्यात अवसरों में वृद्धि:- सेवाओं के क्षेत्र, विशेषकर IT और BPO (Business process outsourcing) में भारत को भारी लाभ मिला।

2. प्रतिस्पर्धा में वृद्धि:- उद्योगों ने बेहतर तकनीक अपनाई और निर्यात-उन्मुख उत्पादन बढ़ा।

3. कृषि निर्यात में सुधार:- मसाले, चाय, कॉफी, समुद्री उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी।

4. FDI प्रवाह में वृद्धि:- वैश्विक व्यापार मानकों के कारण निवेश में पारदर्शिता आई।

नकारात्मक प्रभाव

1. कृषि क्षेत्र पर दबाव:- विकसित देशों द्वारा भारी सब्सिडी के कारण भारतीय किसानों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा मुश्किल।

2. दवा क्षेत्र में प्रभाव:- TRIPS समझौते के कारण दवाओं पर पेटेंट नियम कड़े हुए, जिससे सस्ती जनरिक दवाओं का उत्पादन सीमित हो सकता है।

3. आयात में वृद्धि:- सस्ते विदेशी उत्पादों के कारण घरेलू उद्योग पर दबाव बढ़ा।

4. निर्णय लेने में असमानता:- WTO में विकसित देशों का प्रभाव अधिक माना जाता है।

WTO की आलोचनाएँ

⇒ यह संगठन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित देशों को अधिक लाभ पहुंचाता है।

⇒ कृषि सब्सिडियों के मामले में असमानता विकसित देश अधिक सब्सिडी देते हैं जबकि विकासशील देशों पर रोक।

⇒ पर्यावरण और श्रम मानकों पर स्पष्ट नियम नहीं।

⇒ TRIPS समझौता गरीब देशों की स्वास्थ्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

⇒ निर्णय-प्रक्रिया बहुत जटिल और धीमी है।

WTO के समक्ष चुनौतियाँ

1. वैश्विक संरक्षणवाद का बढ़ना:-

     कई देश घरेलू उद्योग बचाने के लिए प्रतिबंध बढ़ा रहे हैं।

2. विवाद निपटान तंत्र में संकट:-

     अपीलीय निकाय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में अड़चनें।

3. डिजिटल व्यापार:-

     नए नियम बनाने की आवश्यकता।

4. कृषि सुधार:-

     विकसित देशों की सब्सिडी नीति WTO को चुनौती देती है।

5. बहुपक्षीय वार्ताओं में गतिरोध:- दोहा विकास एजेंडा वर्षों से अधर में।

भारत की मांगें और रुख

⇒ कृषि सब्सिडियों में न्यायसंगत नियम।

⇒ खाद्य सुरक्षा के लिए Public Stockholding व्यवस्था को स्थायी समाधान।

⇒ विकासशील देशों की विशेष सुविधाएँ जारी रहें।

⇒ सेवाओं में Mode-4 (लो-कॉस्ट वर्कफोर्स मूवमेंट) को मजबूत करना।

⇒ भारत WTO में विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।

निष्कर्ष

    WTO वैश्विक व्यापार व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ है, जिसने दुनिया भर में व्यापार को अधिक उदार और पारदर्शी बनाया है। हालांकि इसके सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं विशेषकर विकसित और विकासशील देशों के बीच असमानता, कृषि सब्सिडी, और पेटेंट नियमों के विवाद।

     भारत जैसे विकासशील देशों के लिए WTO एक अवसर और चुनौती दोनों है। सही नीति-निर्माण, सामूहिक कूटनीति और राष्ट्रीय हितों के साथ तालमेल रखते हुए WTO भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाने में सहायक हो सकता है।

नोट:

GATT: The General Agreement on Tariffs and Trade

GATS: The General Agreement on Trade in Services

TRIPS: The Agreement on Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights

TRIMS: The Agreement on Trade-Related Investment Measures

♣ लो-कॉस्ट वर्कफोर्स मूवमेंट (Low-Cost Workforce Movement):-

       यह एक ऐसा श्रम-गतिशीलता (labour mobility) मॉडल है, जिसमें कम लागत पर उपलब्ध श्रमिक एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, या एक देश से दूसरे देश में आर्थिक अवसरों, जीवन-स्तर सुधार और रोजगार सुरक्षा की तलाश में स्थानांतरित होते हैं। यह अवधारणा मुख्यतः वैश्वीकरण, औद्योगिकीकरण और सेवा क्षेत्र के तेज विस्तार से जुड़ी है।

13. Definition and scope of transport geography (परिवहन भूगोल की परिभाषा एवं विषय-क्षेत्र)

13. Definition and scope of transport geography

(परिवहन भूगोल की परिभाषा एवं विषय-क्षेत्र)



scope of transport geography

प्रश्न प्रारूप

Q. परिवहन भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय-क्षेत्र एवं अध्ययन उद्देश्य की विवेचना कीजिए।

उत्तर- मानव भूगोल की उपशाखा आर्थिक भूगोल की एक महत्वपूर्ण सहशाखा परिवहन भूगोल है। 1954 में सर्वप्रथम एडवर्ड उलमान (Edward Ullman) ने यह प्रतिपादित किया कि परिवहन का अध्ययन एक दृष्टिकोण के रूप में किया जाना चाहिए क्योंकि परिवहन विभिन्न क्षेत्रों के मध्य सम्बन्धों का माप होता है।

    इस दृष्टि से यह भूगोल का अपरिहार्य अंग है। परिवहन के द्वारा माल, मनुष्य एवं विचारों का वहन होता है। इस वहन में संचरण एवं गति निहित होती है जो कि परिवहन का मूल है। स्पष्ट है कि परिवहन में माल, मनुष्य एवं विचारों का संचरण होता है और यह संचरण निश्चित उद्देश्यों से होता है। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं द्वारा अठारहवीं शताब्दी में संचरण भूगोल शब्द का प्रयोग किया गया था।

      वस्तुतः परिवहन एक सार्वभौमिक घटना है और वर्तमान आर्थिक वैश्वीकरण के इस दौर में परिवहन के कारण ही अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भरता का स्थान अन्तरनिर्भरता ने ले लिया है। अतः यह कथन सत्य प्रतीत होता है कि परिवहन ने दूरी एवं समय पर विजय प्राप्त कर ली है। उल्लेखनीय है कि मानव की मूलभूत (Basic) एवं उच्चतर (Higher) आवश्यकताएं एक ही स्थान से पूरी नहीं हो सकती हैं।

     इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु या तो मानव को स्वयं दूसरे स्थान पर जाना होता है या उन आवश्यकता वाली वस्तुओं को अपने पास लाना होता है। उपरोक्त दोनों ही स्थितियों में आवश्यकता पूर्ति हेतु परिवहन आवश्यक हो जाता है। इस तरह से परिवहन स्थान उपयोगिता (Place Utility) को भी बढ़ा देता है और समय उपयोगिता (Time Utility) को भी बढ़ा देता है।

     स्पष्ट है कि परिवहन एक भौगोलिक घटना है, जिसमें पारस्परिक प्रतिक्रिया निहित है। यह पारस्परिक प्रतिक्रिया भूतल पर स्थित विभिन्न क्षेत्रों एवं स्थानों के मध्य होती है। हार्टशोर्न के अनुसार, भूतल पर क्षेत्रीय विभिन्नता, क्षेत्रीय पृथकता एवं प्रादेशिक विशिष्टीकरण के कारण ही पारस्परिक प्रतिक्रिया होती है। इन्हीं पारस्परिक प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप भूतल पर मांग एवं पूर्ति के क्षेत्र बन गए हैं जो संचरण को जन्म देते हैं। इस संचरण में चूंकि भूगोल की एक महत्वपूर्ण अवधारणा क्षेत्रीय विभिन्नता एवं क्षेत्रीय सम्बन्ध निहित है, अतः उलमान के अनुसार, क्षेत्रीय प्रतिक्रिया में परिवहन का अध्ययन ही परिवहन भूगोल है।

     यद्यपि भूतल पर पारम्परिक प्रतिक्रिया सामान्यत: जनसंख्या, संसाधनों और संसाधनों के उपयोग के ज्ञान के असमानता होने के कारण उत्पन्न होती है तथापि उलमान ने इस पारस्परिक प्रतिक्रिया के सैद्धान्तिक पहलू का विश्लेषण करते हुए इसके तीन आधार बताए हैं। जिन्हें उलमान के त्रय ((Ullman’s Triod) के नाम से जाना जाता है। ये त्रय हैं। :-

(1) संपूरकता (Complimentarity)

(2) मध्यवती आपूर्ति सुविधाएं (Intervening Opportunities)

(3) स्थानान्तरणशीलता (Transferability)

(1) संपूरकता (Complimentarity):-

      भूतल पर माल, मनुष्य एवं विचारों की क्षेत्रीय विभिन्नता है। यही क्षेत्रीय विभिन्नता मांग और पूर्ति के क्षेत्रों को जन्म देकर संचरण को अस्तित्व में लाती है। अतः स्थानों अथवा क्षेत्रों के मध्य मांग एवं पूर्ति की प्रक्रिया को संपूरकता अथवा परिपूरकता कहते हैं। यह परिपूरकता वस्तु-विशेष के सन्दर्भ में होती है अर्थात् एक प्रदेश में वस्तु-विशेष का आधिक्य हो तथा दूसरे प्रदेश में इस वस्तु-विशेष की मांग हो।

     नगरीय औद्योगिक प्रदेश एवं ग्रामीण कृषि प्रदेश इसी परिपूरकता पर आधारित हैं अर्थात् ये दोनों प्रदेश एक-दूसरे को आदान-प्रदान करके अपनी मांग की पूर्ति करते हैं। इसी प्रकार तकनीकी रूप से विकसित देश विकासशील अथवा अविकसित देशों से औद्योगिक कच्चे माल का आयात कर निर्मित माल का निर्यात मांग वाले देशों को करते हैं।

     इस प्रकार परिपूरकता अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक मौलिक आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि एक ही वस्तु के उत्पादन पैमाने में भिन्नता के कारण भी दो क्षेत्रों में परिपूरकता की दशाएं उत्पन्न हो सकती हैं। यह परिपूरकता कच्चे माल के एकत्रीकरण, अर्द्धनिर्मित माल के वहन एवं विनिर्मित वस्तुओं के वितरण से सम्बन्धित हो सकती है।

(2) मध्यवर्ती आपूर्ति स्रोत अथवा सुविधाएं (Intervening Opportunities):-

      ये वे वैकल्पिक सुविधाएं अथवा स्रोत होती हैं जिनमें दो स्थानों के बीच के मांग एवं पूर्ति के सम्बन्धों को तीसरे किसी अन्य स्थान अथवा स्रोत द्वारा वैकल्पिक सुविधा प्रदान की जाती है और ऐसी स्थिति में इन दो क्षेत्रों के मध्य यह स्थान मध्यवर्ती आपूर्ति स्रोत के नाम से पुकारा जाता है। यह स्रोत अथवा सुविधा अधिक दूर और उत्तम वस्तु के स्थान पर सापेक्ष निकट में और पर्याप्त वस्तु प्रदान करने का विकल्प प्रदान करती है और यह विकल्प चयन के लिए प्रेरित करता है। मध्यवर्ती सुविधाएं एक तरफ तो संचरण को हतोत्साहित करती हैं लेकिन दूसरी तरफ नये स्थानों के बीच संचरण को प्रोत्साहित करती हैं।

(3) स्थानान्तरणशीलता (Transferability):

      परिवहन हेतु उपरोक्त दो कारकों के अतिरिक्त स्थानान्तरणशीलता अर्थात् आर्थिक दृष्टिकोण से परिवहन सम्भव होना चाहिए। यदि दो स्थानों के मध्य परिवहन व्यय इतना अधिक हो कि वस्तु-विशेष निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचने पर अत्यधिक महंगी पड़े तो परिवहन सम्भव नहीं होगा। ऐसी दशा में उस वस्तु के स्थान पर दूसरी वस्तु का प्रतिस्थापन होने लगेगा। स्थान-युग्म के मध्य एक ही परिवहन साधन द्वारा यातायात में भी विभिन्न वस्तुओं की भाड़े की दरें भिन्न-भिन्न होती हैं। अतः विभिन्न वस्तुओं की स्थानान्तरणशीलता वस्तु की परिवहन लागत के साथ-साथ यात्रा समय, सुरक्षा, विश्वसीनयता आदि पर निर्भर करती है।

    उलमान के अनुसार विभिन्न स्थानों के मध्य प्रतिक्रिया उपरोक्त तीनों कारकों के सम्मिलित प्रभाव से निर्धारित, नियंत्रित अथवा नियमित होती है।

     पीटर हैगेट (Peter Hagget) ने संचरण (Movement) के सहारे एक समन्वित प्रादेशिक व्यवस्था के विकास की व्याख्या की है। यह विकास (ⅰ) संचरण (Movement), (ii) जाल (Network), (iii) केन्द्र (Nodes), (iv) श्रेणी क्रम (Hierar- chies) और (v) सतह (Surfaces) के द्वारा होता है।

     एम. ई. ई. हर्स्ट (M. E. E. Hurst) ने केन्द्र (Nodes), कड़ियों (Linkages), साधन व्यवस्था (Modes) और वहन (Flow) के आधार पर अपनी कार्यकलापी अवधारणा प्रस्तुत की है जो कूले (Cooley) के अर्थशास्त्री सिद्धान्त से ली गई है।

    हर्स्ट ने परिवहन को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश में प्रस्तुत किया है क्योंकि ये ही परिवेश परिवहन प्रणालियों के संचालन की दशाएं प्रदान करते हैं।

    इस संचालन परिवेश में किसी भी परिवहन प्रणाली की प्रथम अवस्था में पारस्परिक प्रतिक्रिया की इच्छा होती है और यह पारस्परिक प्रतिक्रिया संचरण उत्पन्न करती है। संचरण प्रधानतः पृथ्वी सतह पर मांग और पूर्ति के क्षेत्रों के स्थानिक असन्तुलन के कारण उत्पन्न होता है। स्थानिक संचरण (Spatial Movement) को प्रोत्साहित करने वाले सकारात्मक घटक (Positive Potentials) परिपूरकता, मध्यवर्ती स्रोत सुविधाएं तथा सांस्कृतिक समानता हैं जबकि स्थानिक संचरण को हतोत्साहित करने वाले नकारात्मक घटक (Negative Potentials) दूरी, परिवहन लागत, स्थानान्तरणशीलता और राजनीतिक अवरोध हैं।

    परिवहन प्रणाली की द्वितीय अवस्था में संचरण निश्चित मार्गों के सहारे होता है जो परिवहन जाल (Network) का विकास करता है। यह परिवहन जाल दृश्यमान और अदृश्यमान दोनों ही प्रकार का होता है। तत्पश्चात् इन मार्गों के जाल के सहारे विभिन्न परिवहन साधनों द्वारा वहन होता है जिनमें वाहन संख्या तथा मार्गों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। ये परिवहन के विभिन्न साधन एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी भी होते हैं और एक-दूसरे के पूरक भी होते हैं।

   इस प्रकार इन सभी के द्वारा माल, मनुष्य एवं विचारों का वहन होता है तथा ये सभी मिलकर एक प्रदेश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हुए उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश को नियंत्रित करते हैं।

   हर्स्ट ने अपनी कार्यकलापी विचारधारा में परिवहन भूगोल के अध्ययन के लिए विभिन्न परिवहन के साधनों को समग्र रूप से अध्ययन करने के साथ-साथ संचरण अवधारणा को निर्धारित करने वाली परिवहन व्यवस्था को विभिन्न अवयवों में विभक्त करके अध्ययन करने का सुझाव दिया। उन्होंने परिवहन व्यवस्था को निम्न अवयवों के रूप में प्रस्तुत किया है:

(1) वस्तु सूची तालिका (Inventory),

(2) परिवहन जाल (Network),

(3) वहन (Flows),

(4) साधन व्यवस्था (Modes),

(5) उपरोक्त चारों अवयवों का अन्तर्सम्बन्ध (Interrelationship)

परिवहन भूगोल का अध्ययन उद्देश्य-

     उलमान के अनुसार, परिवहन भूगोल का अध्ययन निम्न उद्देश्यों के पूर्ति के लिए किया जाता है:-

(i) माल, मनुष्य एवं विचारों के स्थानिक संचरण का, उत्पत्ति एवं निर्दिष्ट स्थलों के बीच संचरण की मात्रा एवं गति का मापन एवं मानचित्रीकरण करना।

(ii) परिवहन लागत तथा लागत-दर संरचना का भौगोलिक विश्लेषण करना।

(iii) परिवहन को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय घटकों (विशेषकर धरातलीय दशाओं, जल प्रवाह, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी) का अध्ययन करना।

(iv) निरन्तर विकासमान अथवा परिवर्तित तकनीक के परिवहन पर प्रभाव का अध्ययन करना।

(v) भूतल पर आर्थिक विकास की प्रक्रियाओं के साथ-साथ विकसित हुए परिवहन मार्ग जाल का अध्ययन करना।

(vi) भूतल पर परिवहन साधनों, परिवहन मार्ग जाल, संयोजकता (Connectivity) औ संगम स्थल अभिगम्यता (Nodal Accessibility) की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन कना।

18. Delimitation and division of cultural regions (सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन)

18. Delimitation and division of cultural regions

(सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन)



Delimitation and division

प्रश्न प्रारूप 

Q. सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन के प्रमुख आधारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- समान गुण एवं समान प्रकृति वाले क्षेत्र को प्रदेश कहते हैं। इस दृष्टि से सांस्कृतिक प्रदेश धरातल का वह भाग है जिसमें सांस्कृतिक लक्षणों में समानता विद्यमान होती है तथा जिस कारण वह अपने निकटवर्ती प्रदेशों से भिन्न होता है।वस्तुतः मानव संस्कृति का उद्भव किसी सूक्ष्म केन्द्र पर होता है, कालान्तर में इसका प्रसरण समीपवर्ती क्षेत्रों में होता है।कुछ समय उपरान्त जब एक विस्तृत क्षेत्र के अन्तर्गत समान सांस्कृतिक लक्षण, तकनीकी तथा संसाधन उपयोग प्रक्रिया का विस्तार हो जाता है तब इसे सांस्कृतिक प्रदेश कहते हैं।

     स्पेन्सर के अनुसार किसी लघु क्षेत्र में रहने वाले मानवों का प्रभाव तथा उनकी संस्कृति निकटवर्ती क्षेत्रों में फैलकर अपना प्रभाव अंकित करती है। उसके सम्पूर्ण प्रभाव क्षेत्र को सांस्कृतिक प्रदेश कहते हैं।

    सांस्कृतिक प्रदेश में सांस्कृतिक तत्वों की समानता, सांस्कृतिक तत्वों का पारस्परिक सम्बन्ध, तथा उसके द्वारा उत्पन्न परिणामों का विशिष्ट पुंज होता है जिसके आधार पर प्रदेशों का विभाजन किया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के विभाजन में सर्वप्रथम महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तत्वों का चयन किया जाता है तथा यह देखा जाता है कि कौन-सा सांस्कृतिक तत्व सबसे अधिक एवं सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रभावी है। सांस्कृतिक तत्व मानवीय विचारों से सम्बन्धित होते हैं, जिनके ज्ञान के लिए सूक्ष्म निरीक्षण की आवश्यकता होती है।

       वह क्षेत्र जिसमें समान संस्कृति विद्यमान होती है, वह एक सांस्कृतिक प्रदेश कहलाता है। संस्कृति प्रदेशों का उल्लेख सर्वप्रथम विस्लर ने अमेरिकी इण्डियन संस्कृतियों के अध्ययन में प्रस्तुत किया था। इस अध्ययन में विस्लर ने सम्पूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों के आधार पर प्रदेशों का विभाजन किया। सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन के समय क्षेत्र के भौतिक लक्षणों को भुला दिया जाता है तथा यह बात भी अमान्य कर दी जाती है कि संस्कृति भौतिक संस्कृति के गुणों पर आधारित होती है।

    बोआस के अनुसार धर्म या सामाजिक संगठन या संस्कृति के किसी अन्य पहलू के आधार पर विभाजित किए गए सांस्कृतिक प्रदेश भौतिक संस्कृति पर आधारित सांस्कृतिक प्रदेशों से मेल नहीं खाते हैं।

     समान सांस्कृतिक गुणों के अधिकाधिक सघन संग्रह मिलते हैं, वही उस संस्कृति-प्रदेश का केन्द्र बनता है। केन्द्र से दूर जब प्रदेश की सीमा को खोजा जाता है, तो वहां पर संस्कृति के भावात्मक तथा निषेधात्मक दोनों गुणों पर ध्यान दिया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन में निम्नलिखित संस्कृति लक्षणों को आधार बनाया जा सकता है। जैसे-

(i) भौतिक दशाओं,

(ii) बसावट प्रारूप,

(iii) जनसंख्या,

(iv) व्यवसाय,

(v) भाषा,

(vi) शिक्षा,

(vii) धर्म,

(viii) रहन-सहन,

(ix) रीति-रिवाज तथा

(x) आचार-विचार   

     सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन के समय निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है ताकि सांस्कृतिक प्रदेशों का यथार्थ विभाजन सम्भव हो सके :

1. संस्कृति क्षेत्र मूलतः एक युक्ति है, जिसका प्रयोग सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता किसी महाद्वीप या द्वीप में संस्कृतियों के विस्तार को दिखाने के लिए करता है। सांस्कृतिक प्रदेश के लिए किसी विस्तृत परिवेश में एक विशिष्ट जीवन-रीतियां विद्यमान हैं, उनकी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिए संस्कृतियों के बीच समानताओं एवं भिन्नताओं का सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक होता है।

2. सांस्कृतिक प्रदेश वह स्थान है, जहां गुणों का संग्रह पाया जाता है, इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए। यह नहीं देखना चाहिए कि किसी क्षेत्र में लोग किस प्रकार समृद्धशाली जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

3. सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन के समय सीमान्त संस्कृति का सूक्ष्मता से निरीक्षण आवश्यक होता है। सीमान्त संस्कृति वह है, जहां कि पड़ोस के क्षेत्र के गुणों को पहचाना जा सके।

4. कभी-कभी किसी क्षेत्र में इतनी अधिक सांस्कृतिक सादृश्यताएं रहती हैं कि सांस्कृतिक-प्रदेशों के क्रम में उनकी भिन्नताएं छिप जाती हैं। ऐस दशा में किसी सामाजिक वर्ग या पेशे वाले समूह के विशिष्ट व्यवहार को मुख्य आधार माना जाता है।

     संस्कृति मण्डल की लघुतर इकाई संस्कृति-परिमण्डल तथा संस्कृति-परिमण्डल की लघुतर इकाई संस्कृति-प्रदेश है। संस्कृति-परिमण्डल के अन्तर्गत जितनी विषमता संस्कृति लक्षणों में विद्यमान होगी, प्रदेशों की इकाई उतनी ही अधिक होगी।

    प्रदेशों की इकाइयों की संख्या संस्कृति-लक्षणों की विषमता पर निर्भर करती है। इन्हीं संस्कृति लक्षणों के आधार प संस्कृति प्रदेशों का स्वरूप विश्लेषित किया जाता है, परन्तु संस्कृति-लक्षणों की संख्या इतनी अधिक होती है कि सभी का विश्लेषण कना सम्भव नहीं होता है।

      ऐसी दशा में महत्वपूर्ण लक्षणों का वर्णन किया जाता है तथा कम महत्व के संस्कृति-लक्षणों को छोड़ दिया जाता है। संस्कृति-लक्षणों के महत्व का आकलन संस्कृति लक्षणों के अन्तर्सम्बन्ध से लगाया गया है। जो संस्कृति लक्षण व्यावहारिक दृष्टि से अधिक सम्बन्धित होते हैं, उनका महत्व अधिक होता है तथा सांस्कृतिक प्रदेशों के अन्तर्गत उसी का विश्लेषण किया जाता है।

17. Definition and scope of ​​cultural geography (सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र)

17. Definition and scope of ​​cultural geography

(सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र)



Definition and scope

प्रश्न प्रारूप 

Q. सांस्कृतिक भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

उत्तर- सांस्कृतिक पर्यावरण मानव के द्वारा निर्मित किया हुआ भूदृश्य होता है जिसमें मानवीय निवास गृह, आवागमन के साधन, सिंचाई के साधन, परिवहन और संचार के साथन, आर्थिक व्यवसाय, श्रम विभाजन, खेत, कारखाने, बैंक, बीमा संस्थान, साहित्यिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक और राजनैतिक संस्थाएं, आदि होती हैं। इनके अतिरिक्त सामाजिक व्यवस्था, श्रम विभाजन, प्रथाएं और जीवन के मूल्य भी इसमें सम्मिलित रहते हैं।

    सांस्कृतिक पर्यावरण के इस निर्माण में मानव की संख्या, उसकी शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता, विकास का स्तर. सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताएं, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी उपलब्धियां आधारी कारक रहे हैं। इन कारकों ने सांस्कृतिक पर्यावरण की कई प्रक्रियाओं को जन्म दिया है जिनमें समाजीकरण और आर्थिकीकरण मुख्य हैं।

     समाजीकरण मानव की वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वह अपने समाज में कुछ निश्चित तौर तरीके अपनाता है तथा अपने को समाज के अनुकूल ढालता है। विभिन्न समाजों के अन्तर्गत मानव अपने जीवन निर्वाह तथा विकास के लिए पर्यावरण के संसाधनों को प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं। मानव की इस प्रक्रिया को आर्थिकीकरण कहते हैं। इसके अन्तर्गत मानव की उत्पादन, वितरण, उपभोग सम्बन्धी मांग-आपूर्ति तथा आय द्वारा समृद्धि से जुड़ी क्रियाएं आती हैं।

     संस्कृति एक ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है जो सांस्कृतिक पर्यावरण और सामाजिक क्रिया का निर्धारण करती है। व्यक्ति विशेष का व्यवहार उस संस्कृति द्वारा नियमित होता है जिसमें वह रहता है। संस्कृति व्यक्ति को एक अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र के वैकल्पिक व्यवहारों में से एक विशेष प्रकार के व्यवहार का चुनाव करने में सहायक सिद्ध होती है, जो उसकी जैविक विरासत द्वारा उसे अनुमत है। यह एक ऐसी जटिल सम्पूर्णता है जिसके अन्तर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा और कई अन्य क्षमताओं तथा आदतों का समावेश होता है जिसे व्यक्ति ने समाज के एक सदस्य के रूप में अर्जित किया है।

   यद्यपि सम्पूर्ण विश्व की मानव जाति की संस्कृतियों में एक आश्चर्यजनक विभिन्नता दिखाई पड़ती है फिर भी प्रत्येक संस्कृति मानव कार्यकलापों के कुछ ऐसे क्षेत्रों को सम्मिलित करती है जिनको संस्कृति के विविध पक्षों के रूप में जाना जाता है। ये पक्ष आसपास के भौतिक पर्यावरण से अनुकूलन करने के साधन हैं।

    इन पक्षों में प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र, सामाजिक संगठन, शिक्षा, राजनीतिक संरचनाएं, विश्वास, प्रथाएं, शक्ति का नियंत्रण, कला, संगीत, नाटक, नृत्य, लोकवार्ता, आदि उल्लेखनीय हैं। किसी समाज द्वारा अपने लिए सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के विशिष्ट तंत्रों को अपनाने का निर्धारण अधिकांशतः उसका भौतिक पर्यावरण ही करता है जिसमें जलवायु, स्थलाकृति, प्राकृतिक संसाधन और अन्य सम्मिलित होते हैं।

सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा

    धरातल पर सांस्कृतिक भूदृश्यों में विभिन्नता का कारण मानव की सांस्कृतिक प्रक्रियाओं में भिन्नता होना है। मानव प्राकृतिक पर्यावरण में प्राविधिकी ज्ञान, सामाजिक संगठन आदि के द्वारा परिवर्तन करता है और सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करता है। प्रत्येक सांस्कृतिक पर्यावरण में भिन्न-भिन्न जीवन तंत्र का विकास होता है। इस जीवन तंत्र का विश्लेषण करना सांस्कृतिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य है।

    फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता डिमांजियां के अनुसार मानव समाज का अध्ययन पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य में करना ही सांस्कृतिक भूगोल है।

   हंटिंगटन के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत भौतिक दशाओं एवं मानवीय प्रतिक्रियाओं के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। इन्होंने जलवायु को मानव की संस्कृति के उत्थान और पतन का कारण माना है।

    कार्ल ओ सावर के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल की वास्तविक योजना सामान्य उद्देश्यों से सम्बन्धित है जो पृथ्वी तल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन करता है। धरातल पर भौतिक पर्यावरण एवं सांस्कृतिक पर्यावरण दोनों विद्यमान हैं, लेकिन सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

     जार्डन तथा रॉवेन्ट्री के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें मानव निवास करता है, की अपेक्षा मानवीय संस्कृति पर विशेष बल दिया जाता है। ये मानवीय संस्कृतियां भिन्न-भिन्न होती हैं, जिससे क्षेत्रीय भिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं। अतः सांस्कृतिक समूहों की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन ही सांस्कृतिक भूगोल है।

     स्पेन्सर तथा थॉमस जूनियर के अनुसार मानवीय प्राविधिक व्यवस्थाओं तथा सांस्कृतिक व्यवहारों, जिसका सम्बन्ध आदिकाल से पृथ्वी के विशिष्ट क्षेत्रों में मानवीय संस्कृति से ही प्रचलित है, का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल है।

सांस्कृतिक भूगोल का उद्देश्य और अध्ययन क्षेत्र

       उपर्युक्त परिभाषा के विश्लेषण के पश्चात प्रमुख तथ्य स्पष्ट होते हैं। जो सांस्कृतिक भूगोल के मूलभूत उद्देश्य है :

1. प्राकृतिक पर्यावरण एवं संस्कृति का प्रभाव मानव जीवन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पर्यावरण संस्कृति पर तथा संस्कृति पर्यावरण पर स्पष्ट प्रभाव डालते हैं। फलस्वरूप दोनों में परिवर्तन घटित होता है। इस परिवर्तन का प्रभाव मानव जीवन स्तर पर पड़ता है। अतः आदिकाल से वर्तमान काल तक के इन्हीं तथ्यों का विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल का उद्देश्य है।

2. धरातल पर प्राकृतिक पर्यावरण तथा भौगोलिक पर्यावरण में भिन्नता एवं विषमता दृष्टिगत है। ये भिन्नताएं तथा विषमताएं मानव समाज में मानसिक एवं सांस्कृतिक भिन्नताएं उत्पन्न कर देती हैं। फलस्वरूप किसी विशिष्ट स्थान का मानव ज्ञान एवं प्राविधिकी का विकास करके अपना जीवन स्तर, दूसरे स्थान के मानव की अपेक्षा सुधार लेता है। अतः इसका विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

3. पूर्वज मानव जब गुफाओं अथवा वृक्षों पर रहता था, तब जंगली फलों, आखेट एवं मछुआ कर्म द्वारा जीविकोपार्जन करता था तथा पशुओं की खालों, वृक्षों की छालों एवं पत्तियों से अपना शरीर ढकता था। अर्थात् इस समय मानव पूर्णरूपेण प्राकृतिक पर्यावरण के अनुसार अपने को ढालते थे, परन्तु मानव ने जब कृषि एवं पशुपालन अपनाया, तब प्राकृतिक वातावरण में सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण किया।

     वर्तमान समय में, मानव ने आविष्कार शक्ति, संचित अनुभव, अन्य समुदायों से लाभ उठाकर, एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तन कर तथा प्राकृतिक पर्यावरण में यथासम्भव परिवर्तन करके अपनी संस्कृति का विकास किया है। पूर्व मानव तथा आधुनिक मानव के क्रियाकलापों का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल का लक्ष्य है।

4. प्राकृतिक पर्यावरण में अनेक सम्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, परन्तु, मानव सम्पूर्ण सम्भावनाओं का पूर्ण उपयोग करे, यह सम्भव नहीं है। यह उपयोग मात्र मानव के सांस्कृतिक विकास पर आधारित होता है। संस्कृति का विकास कम हुआ है तथा इसी क्रम में उसने प्राकृतिक सम्भावनाओं का उपयोग भी किया है। वर्तमान काल में उसका उपयोग हो रहा है। अतीतकाल तथा वर्तमान काल के उपयोग की दर के अन्तर का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल का लक्ष्य है।

5. प्राकृतिक पर्यावरण में सांस्कृतिक विकास की सीमाएं होती हैं। मानव अपने ज्ञान तथा प्राविधिकी कारकों की सहायता से इस सीमा का विस्तार कर लेता है। सांस्कृतिक भूगोल में इन्ही सीमाओं एवं अधिकार क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है।

6. मानव की संस्कृति में निरन्तर परिवर्तन हुआ है। इसके द्वारा सृजित सांस्कृतिक पर्यावरण में धर्म, भाषा, रहन-सहन, वेश-भूषा, आदि में विश्व स्तर पर अनेक भिन्नताएं मिलती हैं। इन सब का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

7. प्राकृतिक पर्यावरण पर मानव का नियंत्रण प्रभावशाली ढंग से हुआ है, परन्तु इसमें कुछ परिवर्तन महत्वपूर्ण तथा तीव्रगामी हैं, जिसे क्रान्ति की संज्ञा प्रदान की जाती है। उदाहरणार्थ- कृषि क्रान्ति, औद्योगिक क्रान्ति, प्राविधिक क्रान्ति, आदि। प्राचीन काल से वर्तमान काल तक, इन क्रान्तियों की भौगोलिक व्याख्या करना सांस्कृतिक भूगोल का मुख्य लक्ष्य है।

सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध-

    सांस्कृतिक लक्षणों तथा मानव प्राविधि तंत्रों का विकास विभिन्न संस्कृति क्षेत्रों में होता है जिसका अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। भौतिक पर्यावरण में मानवीय क्रियाओं द्वारा प्राचीन से अर्वाचीन तक अनेक परिवर्तन घटित हुए हैं। पर्यावरण में परिवर्तन के कारण एक विस्तृत संस्कृति तंत्र का विकास होता है।

     मानव एक सक्रिय तत्व है जो अपने गुण द्वारा विभिन्न संस्कृति तत्वों का विकास करता है। मानव की सृजनात्मक एवं विनाशात्मक प्रवृत्ति के द्वारा पर्यावरण में अन्तःक्रिया तथा  सांस्कृतिक स्थानान्तरण होता है। संस्कृति के प्रत्येक तत्व क्रियाशील होते हैं तथा प्रत्येक तत्व में अन्तर्सम्बन्ध होता है। प्रत्येक तत्व के संगठन की क्रिया के फलस्वरूप किसी विशेष संस्कृति में एकीकरण होता है।

     क्रोबर के अनुसार ‘सांस्कृतिक एकीकरण या मानवीय सामाजिक एकीकरण कुछ लचीला होता  है।’

   मानव जीवन तंत्र की उत्पत्ति, पर्यावरण की विभिन्नता तथा नूतन प्रविधि के द्वारा परिवर्तन, आदि का विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है। नूतन प्रविधि को प्रयोग तथा संस्कृति सृजन में पर्याप्त समय लगता है। संस्कृति का सृजनात्मक स्वरूप, संस्कृति के विभिन्न तत्वों के आपस में सम्मिलन के द्वारा उत्पन्न होता है। ये सभी तत्व एक संगठन के रूप में कार्य करते हैं।

   मेलिनोवस्की के अनुसार संस्कृति एक जटिल यंत्र के समान है, जिसके विभिन्न पक्षों में अन्तर्सम्बन्ध है तथा उन्हें संगठित रूप में कार्य करना पड़ता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वह व्यर्थ सिद्ध होता है। संस्कृति का अध्ययन भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों के सन्दर्भ में होता है।

    स्पेन्सर ने स्पष्ट किया कि किसी संस्कृति का अध्ययन भौतिक जैविक वातावरण के अन्तर्सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य में होता है। विभिन्न मानव समूह अथवा मानव जनसंख्या का अध्ययन, उसका सामाजिक संगठन, विशेष अवस्था प्राप्त प्रविधि और इनके कलात्मक एवं गुणात्मक विकास के रूप में किया जाता है।

     स्थानान्तरणीय प्रवृत्ति के कारण सामाजिक संगठन में विकास की नवीन विधि का उद्भव हुआ है। वर्तमान में अपनी बौद्धिक क्षमता के कारण अधिकांश प्राकृतिक पर्यावरण को मानव ने अपने अधीन कर लिया है। मानव समुदायों में नवीन प्रविधियों के विकास के कारण चेतन तथा अचेतन पदार्थों का समुचित उपयोग करके विकसित मानवीय पर्यावरण का विकास करता है।

    मानव ने संचयात्मक तथा प्रसरण की प्रवृत्ति के फलस्वरूप नवीन प्रविधि का विकास विभिन्न पर्यावरण में किया है। मानव के प्रसार के कारण विभिन्न संस्कृतियों का प्रादुर्भाव हुआ है। वर्तमान संस्कृति ऐतिहासिक धरोहर है, जो विभिन्न मानव समूहों द्वारा विभिन्न कालों तथा स्थानों में अनुभव के सापेक्ष प्रयोग से उद्भूत हुई है। सभी संस्कृतियों में कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य पाया जाता है। सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता का यह कर्तव्य होता है कि संस्कृति के समस्त भौगोलिक तथ्यों के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करें।

    जार्डन तथा रॉवेन्टी ने स्पष्ट किया कि सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता संस्कृति के समस्त तत्वों तथा क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्धों को महत्व देता है। बिना क्षेत्रीय विषमताओं एवं अन्तर्सम्बन्धों के अध्ययन के संस्कृति की प्रक्रिया को समझना अत्यन्त कठिन है। सांस्कृतिक तत्व परस्पर किस प्रकार सम्बन्धित हैं, बिना इसके समझना असम्भव है। सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध के स्पष्टीकरण के लिए, उन कारणों की व्याख्या करना आवश्यक है जिससे सभ्यता, संस्कृति व सामाजिक विकास होता है। स्पेन्सर तथा थॉमस (1973) ने चा स्वतंत्र आधा तथा इनके मध्य छः अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या की है।

चित्र : कार्यात्मक अवधारणाएं तथा अन्तर्सम्बन्ध

        स्पेन्सर के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल का चार अवधारणात्मक अस्तित्व निम्न है :

1. भौतिक-जैविक पर्यावरण-

      इसमें क्षेत्रीय परिवर्तन तथा मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक संसाधन : मिट्टी, जलवायु, वनस्पति, खनिज, आदि का अध्ययन किया जाता है। मानव समुदाय इसका उपयोग करके अपने सन्ततियों की वृद्धि करता है।

2. जनसंख्या-

     मानव समुदायों द्वारा अधिकृत क्षेत्र जिसके संसाधनों का उपयोग करता है, समूहों का विकास, ह्रास तथा उसकी संख्या का अध्ययन किया जाता है।

3. सामाजिक संगठन-

        पूर्वज मानव से वर्तमान मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में प्रयुक्त प्रविधि, सामाजिक इकाइयों : परिवार, जाति, वर्ग तथा संस्था, आदि की संगठनात्मक संरचना तथा श्रम विभाजन का अध्ययन इसके अन्तर्गत किया जाता है।

4. प्रविधियां –

       इसमें नूतन एवं प्राचीन प्रविधियां जिसका प्रयोग मानव भौतिक एवं सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु करता है, का अध्ययन किया जाता है।

32. Cyclone and Anticyclone

32. Cyclone and Anticyclone



चक्रवात (Cyclone)

      चक्रवात को आँग्ल भाषा में Cyclone कहते है। “Cyclone” शब्द यूनानी भाषा से लिया गया है। जिसका शाब्दिक अर्थ है- सर्प की कुंडली। इस शब्द का प्रयोग जलवायु विज्ञान में प्रथम बार पिडिंगटन महोदय ने किया था।

      चक्रवात उस वायुमण्डलीय परिस्थिति को कहते हैं जिसमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृत्ति रखती है। चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब केन्द्र को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई के विपरीत (Anticlock wise) और दक्षिण गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा (Clock wise) में घुमने लगती हैं।

Cyclone and Anticycloneप्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

चक्रवात का वर्गीकरण

     विशेषताओं एवं भौगोलिक स्थिति के आधार प चक्रवात को दो भागों में बाँटते हैं:-

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)

(2) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cylone)

1. उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)- 

     पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों में 8º से 20° अक्षांशों के बीच या उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में किसी निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर तेज गति से घुमते हुए वायु से उत्पन्न मौसमी परिस्थितियों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की विशेषताएँ

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति तथा विकास सागरीय सतह से प्राय: प्रारंभ होती है। इसकी उत्पत्ति हेतु सागर एवं स्थल का मिलन बिन्दु आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।

(2) इसमें एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर हवाएँ घूमती है।

(3) इसमें वायु की औसत गति 100 Km/h होती है।

(4) इसमें समदाब रेखाएँ प्रायः गोलाकार होती है।

(5) इसमें दाब प्रवणता तीव्र होती है।

(6) चक्रवात की तीव्रता दाब प्रवणता पर निर्भर करती है। जब दाब प्रवणता कम होती है तो वायुमण्डलीय अवदाब का निर्माण होता है।

(7) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का विस्तार अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र पर होता है।

(8) प्राय: उष्ण कटिबंधीय चक्रवात पूरब से पश्चिम दिशा की ओर गमन करता है।

(9) इसमें अति अल्प समय में तीव्र गति से एवं अधिक मात्रा में वर्षा होती है।

(10) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केन्द्र को चक्रवात का आँख (चक्षु) कहा जाता है।

(11) यह शीत ऋतु की उपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक उत्पन्न होता है।

(12) चक्रवात में गर्म एवं आर्द्र हवाएँ ऊपर की ओर उठकर संघनन क्रिया के माध्यम से बादल का निर्माण करती है। संघनन क्रिया के द्वारा परित्यक्त गुप्त उष्मा के द्वारा चक्रवात शक्ति ग्रहण करता है।

(13) यह समुद्र से आर्द्रता को स्थल की ओर लाने में मदद करता है।

(14) चक्रवात के कारण बड़े पैमाने पर जान एवं माल की हानि होती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति

    उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्नि दोनों गोलार्द्ध में 8º से 20° अक्षांश के बीच होता है। लेकिन इन्हीं अक्षांशों के बीच द० अटलांटिक महासागर में चक्रवात उत्पन्न नहीं होता है क्योंकि इस क्षेत्र में चक्रवात उत्पन्न करने हेतु स्थलीय भूभाग का अभाव है।

          8º से 20° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्धों में तापीय विषुवत रेखा के सहारे दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा आपस में मिलती है। जब दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा का तापमान एक समान होता है तो वैसी परिस्थिति में आपस में केवल मिलने की प्रवृति रखते हैं अर्थात् चक्रवात की आँख का विकास नहीं होता है।

         8º से 20° अक्षांश के बीच जल एवं स्थल का वितरण काफी अनियमित है। वाणिज्यिक हवाएँ जब स्थलीय भाग से गुजरती हैं तो उसे स्थलीय वायु राशि और समुद्र के ऊपर से गुजरने वाली हवा को समुद्री वायुराशि कहते हैं। जिन स्थानों पर स्थलीय वायुराशि और समुद्री वायुराशि मिलती है वहाँ पर बला आघूर्ण के कारण हवाएँ घुमने लगती हैं और चक्रवात को जन्म देती हैं।

     समुद्री वायुराशि काफी गर्म एवं आर्द्रता से युक्त होती है। जिससे स्वत: समुद्री सतह पर निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास होता है। जबकि इसके तुलना में स्थलीय भाग पर उच्च वायुदाब केन्द्र का विकास होता है।

    तटीय भागों में स्थलीय एवं समुद्री वायुराशि प्राय: मिलने की प्रवृत्ति रखते हैं। प्रारंभ में वाताग्र की स्थिति उत्पन्न करते हैं। लेकिन बला आघुर्ण के कारण वाताग्र ही चक्रवात के आँख के रूप में तब्दील कर जाता है। फलत: उच्च वायुदाब क्षेत्र से आने वाली हवाएँ आँख को समाप्त करने के लिए दौड़ पड़ती है। लेकिन आँख के केंद्र में पहुँचने के पहले ही हवाएं पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आ जाती है और ऊपर की ओर प्रक्षेपित कर दिए जाते है।

     उष्ण एवं आर्द्र हवाएँ उपर जाकर संघनित होती है। जिससे वर्षण का कार्य प्रारंभ हो जाता है। सम्पूर्ण उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति को नीचे के मानचित्र से समझा जा सकता है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की संरचना

      उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की संरचना चक्रीय होती है। जववायु विज्ञानवेताओं ने इसकी संरचना का अध्ययन क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से करते हैं।

(A) क्षैतिज अध्ययन/ संरचना

      क्षैतिज रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कई वलय में विभक्त होता है। सामान्य रूप से एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में कुल 6 रिंग होते हैं। जैसे-

प्रथम रिंग (वलय)⇒

    यह चक्रवात का केन्द्र बिन्दु होता है। इसे चक्रवात की आँख कहते हैं। इसका व्यास 5 से 50 Km तक हो सकता है। आकार में यह लगभग वृत के समान होता है। वायुदाब अति न्यून होता है। वायु गर्म होकर ऊपर जाने की प्रवृत्ति रखती है। ठीक इसके ऊपर बादल का निर्माण नहीं होता है क्योंकि उष्ण एवं आर्द्र वायु जब गर्म होकर ऊपर उठती है तो केन्द्र के मध्य भाग में ठंडी एवं शुष्क व नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती है।

द्वितीय रिंग⇒

      यह चक्रवात के चारों ओर स्थित होता है। इसे आँख की दीवाल (Eye Wal) कहते हैं। इसकी चौड़ाई 10 से 20 Km तक होता है। इस रिंग में हवा तेजी से ऊपर की ओर उठती है और आकाश में Cumulo nimbus cloud का निर्माण करती है और इस द्वितीय रिंग में भारी वर्षा होती है।

तृतीय रिंग⇒

    इसे स्पाइरल बैण्ड या वर्षा बैण्ड कहा जाता है। द्वतीय रिंग में गरज के साथ भारी वर्षा होती है।

चौथा रिंग⇒

     इसे Annular Band कहते हैं। चौथा रिंग में सघन बादल छाये रहते हैं। लेकिन वर्षा बहुत कम होती है। इस रिंग में तापमान उच्च और आर्द्रता निम्न होती है।

पांचवां रिंग⇒

     इसे Outer Convective Band कहते हैं। इसमें बादल बहुत कम पाये जाते है। वर्षा नगण्य होती है।

छठा रिंग⇒

     यह उष्ण चक्रवात का सबसे बाहरी हिस्सा है। इस रिंग में ह‌वाएँ क्षैतिज रूप से केन्द्र की ओर चलती है। लेकिन इसमें अन्य मौसमी परिस्थितियाँ सामान्य रहती है। छठा रिंग को Outer Band कहते हैं।

1. चक्रवात का आंख (Eye of Cyclone) – अति न्यून वायुदाब

2. चक्रवात का दीवाल (Eye Wall)- क्यूम्लो निम्बस बादल का निर्माण तथा भारी वर्षा

3. वर्षा बैण्ड (Rain Band)- गरज के साथ भारी वर्षा

4. एनुलर बैण्ड (Annular Band)- सघन बादल

5. Outer Convective Band- बहुत कम बादल, नगण्य वर्षा

6. Outer Band- उष्ण चक्रवात का बाहरी हिस्सा

(B) लम्बवत संरचना

    मौसम वैज्ञानिकों ने लम्बवत रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को तीन परत में विभक्त करते हैं-

I. In-flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे निचली परत है। इसकी मोटाई घरातल से 3Km ऊँचाई तक होता है। इसमें हवाएँ क्षैतिज रूप से चक्रवात के आँख की ओर अग्रसारित होती है।

II. Middle layer⇒

     यह चक्रवात का सबसे प्रमुख हिस्सा है। इसकी मोटाई 3 से 7 Km तक होती है। इसमें हवाएँ ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है। साथ ही चक्रीय रूप से घुमते हुए चक्रवात के केन्द्र तक पहुँचने का प्रयास करती है।

III. Out flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे ऊपरी परत है। इसका विस्तार 7 km से ऊपर होता है। इस Layer के मध्य में उच्च वायुदाब केन्द्र होता है तथा हवाएं बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। दूसरे शब्दों में इस Layer में प्रतिचक्रवात की स्थिति होती है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

2. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

        मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले चक्रवात को शीतोष्ण चक्रवात कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति का मुख्य आधार उपध्रुवीय निम्न वायु भार का क्षेत्र होता है क्योंकि इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर ध्रुवीय वायु और पछुवा वायु चलने की प्रवृति रखती है। ध्रुवों की ओर से आने वाली वायु प्राय: ठण्डी, भारी, और शुष्क होती है। जबकि पछुआ हवा गर्म, हल्की और आर्द्रता से युक्त होती है। विपरीत दिशाओं से आने वाली तथा अलग-2 भौतिक विशेषता रखने वाली वायु जब आपस में मिलने का प्रयास करती है तो मिश्रण शीघ्र संभव नहीं हो पाता है। इन दो वायु के अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण की स्थिति उत्पन्न करते हैं। संक्रमण का यह क्षेत्र ही वाताग्र (Front) कहलाता है।

    दूसरे शब्दों में ध्रुवीय हवा और पछुआ हवा के अग्र भाग आपस में मिलकर जिस संक्रमण पेटी का निर्माण करते हैं, उस पेटी को वाताग्र कहते है। इसकी चौड़ाई सामान्यतः 5-7 Km तक होती है। कभी-2 इसकी चौड़ाई 2-75 Km तक होती है। धरातल से इसकी ऊँचाई 1½- 2 Km तक होती है और लम्बाई 750 Km तक हो सकती हैं। वाताग्र धरातल के साथ एक निश्चित कोण पर झुका होता है।

ध्रुवीय हवा (ठंडी, शुष्क, भारी)

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

पछुआ हवा (गर्म, आर्द्र, हल्की)

वाताग्र (ल०- 750 किमी०, ऊँ०-1.5 किमी०, चौ०-5-7 किमी०)

           शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति प्रारंभ होना Fronto-genesis (वाताग्र जनन की अवस्था) कहलाता है। जबकि चक्रवात का अन्त/ विनाश Frontolisis (वाताग्र समापन की अवस्था) कहलाता है।

        वाताग्र निर्माण के बाद या संक्रमण स्थिति बनने के बाद वायु में चक्रीय प्रवाह की प्रक्रिया प्रारंभ होती हैं। इसका मुख्य कारण ठण्डी वायु का गर्म वायु राशि क्षेत्र में प्रवेश करना है। जब ठण्डी वायुराशि, गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो ग्रहीय नियमों के अनुरूप प्रवाहित नहीं हो पाती हैं क्योंकि प्रवाहित वायु का लक्ष्य कोई अक्षांशीय निम्न बायुदाब की पेटी न होकर आस-पास की गर्म वायु का केन्द्र होता है।

     अत: प्रविष्ट करने वाली वायु गर्म वायु की दिशा में प्रवाहित होने लगती है और ठण्डी वायु अपना ग्रहीय प्रवाह को छोड़ देती है। प्रवाह का यह विचलन अंततः चक्रीय रूप धारण कर लेती है। इसे चित्र के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

      कई मौसम वैज्ञानिकों ने शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति का अध्ययन किया है। इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य स्वीडीश मौसम वैज्ञानिक जैकोट्स और जर्केंस का है। इन्होंने चक्रवात उत्पत्ति के संबंध में ध्रुवीय वाताग्र सिद्धांत प्रस्तुत किया है। इस सिद्धांत के अनुसार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 6 अवस्थाओं में होती है:-

प्रथम अवस्था – प्रारंभिक अवस्था/ वाताग्र जनन की अवस्था

द्वितीय अवस्था – चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभ की अवस्था

तृतीय अवस्था – उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

चतुर्थ अवस्था – शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

पाँचवा अवस्था – संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

छठा अवस्था – समापन की अवस्था

(1) प्रारंभिक अवस्था (Fronto genesis)/ वाताग्र जनन की अवस्था

       प्रारंभिक अवस्था में ध्रुवीय और पछुआ वायु का अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण पेटी या स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है जिसकी चौड़ाई 5-7 किमी०, ऊँचाई 1.5-2 किमी० और लम्बाई 750 किमी० या उससे अधिक होती है।

        स्थिर वाताग्र के निर्माण के लिए अति अनुकूल क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्य अक्षांशीय क्षेत्र है। सामान्यत: वाताग्र का निर्माण उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र के सहारे होता है। लेकिन, स्थल और समुद्र के असमान वितरण के कारण वाताग्र सीधा न होकर लहरदार होता है या थोड़ा सा मुड़ा होता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्री सतह के अधिकता के कारण लहरदार स्थिर वाताग्र का निर्माण नहीं होता।

(2) चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभिक अवस्था

       इस अवस्था में ग्रहीय वायु (ध्रुवीय वायु) अपने मार्ग से विचलित होती है जिसके परिणामस्वरूप स्थिर वाताग्र का कुछ भाग दक्षिण की ओर अग्रसारित हो जाती है। जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र ठण्डी / ध्रुवीय वायु के कारण जुड़ जाती है। उस भाग को शीत वाताग्र और शेष भाग को उष्ण वाताग्र कहते हैं। गर्म वाताग्र के सहारे मंद ढाल बनाते हुए गर्म वायु स्वतः ठंडी वायु के ऊपर उठने की प्रवृति रखती है। जबकि शीत वाताग्र में तीव्र ढाल के सहारे शीत वायु चक्रीय प्रवाह की प्रवृति खती है।

चित्र: शीत और उष्ण वाताग्र के निर्माण की अवस्था या चक्रीय परिसंचरण की अवस्था

(3) उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था
        इस अवस्था में ठण्डी वायु और भी अधिक निम्न अक्षांश की ओर खिसकते हुए चक्रीय प्रवाह लेने की प्रवृति रखती है जिसके कारण शीत वायु गर्म वायु के वृहत क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित कर लेती है। इतना ही नहीं शीत वाताग्र के अग्रसारित हो जाने से पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत क्षेत्र से खत्म हो जाता है जिसके कारण गर्म वायु एक खण्ड के रूप से बचा रह जाता है जिसे उष्ण खण्ड के नाम से जानते हैं।

चित्र: उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

(4) शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

       इस अवस्था में शीत वाताग्र और आगे बढ़ता है। इस अवस्था में शीत वाताग्र के लगातार आगे बढ़ने के कारण पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत्र क्षेत्र से पूर्णतः कट जाता है। इतना ही नहीं बल्कि गर्म हवा एक संकरे प्रदेश में सिकुड़‌कर रह जाता है तथा शीत वाताग्र को पछुआ हवा और ठण्डी ध्रुवीय हवा दोनों मिलकर दबाव लगाना प्रारंभ कर देती है जिसके कारण शीत वाताग्र तेजी से अग्रसारित होने लगता है।

     दूसरी ओर जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र मुड़ा था उस स्थान पर शीत सीमाग्र और गर्म सीमाग्र के मिलने से आवर्त की स्थिति उत्पन्न होती है। इस अपर्त के चारों ओर गर्म एवं ठण्डी वायु का मिश्रित चक्रीय प्रवाह देखने को मिलता है।

चित्र: शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी की अवस्था

(5) संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

            इस अवस्था में शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र आपस में मिलने की प्रवृति रखती है। लेकिन मिलने की प्रक्रिया वाताग्र के केन्द्र से शुरू होती है। गर्म वाताग्र और शीत वाताग्र मिलकर संरोध वाताग्र (Occluded front) का निर्माण करती है। संरोध वाताग्र एक ऐसा वाताग्र है जिसमें उष्ण एवं शीत दोनों प्रकार की वायु पायी जाती हैं। संरोध वाताग्र दो प्रकार का होता है:-

(i) शीत संरोध वाताग्र

(ii) गर्म संरोध वाताग्र

        शीत संरोध वाताग्र वह स्थिति है जिसमें गर्म वाताग्र समाप्त हो जाता है और शीत वाताग्र गर्म वाताग्र के आगे अवस्थित ठण्डी वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाती है।

चित्र: संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

उष्ण संरोध वाताग्र वह हैं जहाँ पर वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र वाताग्र के केन्द्र प्रभाव में एक छोटे से केन्द्र में रह जाता है।

(6) समापन की अवस्था (Frontolisis)

         समापन की अवस्था को Frontolisis की अवस्था भी कहते हैं। इस अवस्था में उष्ण वाताग्र एवं शीत वाताग्र आपस में पूर्णतः मिल जाते हैं। ध्रुवीय वायु और पछुवा हवा पृथ्वी की घुर्णन गति के प्रभाव में आकर ग्रहीय मार्ग अपना लेती है और चक्रवात की समाप्ति हो जाती है।

 

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की मौसमी दशाएँ एवं वाताग्र के प्रकार

       शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में विभिन्न प्रकार के मौसमी दशाओं का विवेचना निर्मित होने वाले चारों वाताग्र के आधार पर करते हैं। प्रत्येक वाताग्र की अलग-2 विशेषताएँ होती हैं। मौसमी विशेषताओं के आधार पर ही वाताग्र को चार भागों में बाँटते हैं।

(1) स्थिर वाताग्र (Stationary Front)

(2) उष्ण वाताग्र (Warm Front)

(3) शीत वाताग्र (Cold Front)

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

(1) स्थिर वाताग्र

      शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होने के पहले आसमान साफ होता है। ध्रुवीय और पछुआ वायु अपने-2 प्रचलित मार्ग से चलने की प्रवृति रखते हैं। ज्यों ही पछुआ वायु और ध्रुवीय वायु एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं से आकर मिलती है तो स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है। स्थिर वाताग्र में वायु स्थिर रहती है। वर्षा नहीं होती है। लेकिन आसमान धुंधला होने लगता है।

(2) उष्ण वाताग्र

        उष्ण वाताग्र की स्थिति में भी वायु स्थिर बनी रहती है क्योंकि गर्म पछुवा वायु ठण्डी ध्रुवीय वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट करने का प्रयास करती है। लेकिन गर्म वायु प्रविष्ट नहीं कर पाती है। फलत: गर्म वायु मंद ढाल के सहारे ठण्डी वायु के ऊपर धीरे-2 चढ़ने की प्रवृ‌त्ति रखती है जिससे बहुस्तरीय बादलों का निर्माण होता है। जैसे:- उपर से नीचे आने पर क्रमशः Cirrus, Cirro stratus, Alto stratus और Cumulus नामक बादल का निर्माण करती है। इस प्रकार के बादलों से धीरे-धीरे लम्बी अवधि तक वर्षण का कार्य होती है। वर्षा का प्रभाव क्षेत्र भी विस्तृत होता है।

(3) शीत वाताग्र (Cold front)

         शीत वाताग्र की स्थिति में ठण्डी वायुराशि गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण वाताग्र तीव्र ढाल का निर्माण करती है। तीव्र ढाल के सहारे गर्म वायु राशि उपर उठकर संतृप्त हो जाती है और ऊपर से नीचे क्रमशः तीन प्रकार के बादलों का निर्माण करती है। जैसे-

(i) स्तरी बादल (Cirro Stratus)

(ii) कपासी वर्षी बादल (Cumulo Nimbus)

(iii) वर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus)

         शीत वाताग्र वाले क्षेत्र में अति अल्प समय में भारी वर्षा रिकॉर्ड किया जाता है। शीत वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र काफी छोटे क्षेत्रों में होता है। जबकि उस स्थान से शीत वाताग्र गुजर जाता है तो अचानक वर्षा रुक जाती है। शीतलहरी चलने लगती है। तापमान में भारी गिरावट आती है। वायुदाब बढ़ जाती है औ मौसम कष्टकर हो जाता है।

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

      संरोध वाताग्र में कई प्रकार के बादलों का निर्माण होता है। लेकिन इसमें वर्षा तीव्र होती है। संरोध के कारण शीतोष्ण चक्रवात में अंतिम रूप से वर्षा होती है। जब उष्ण वाताग्र और शीत वाताग्र पूर्णतः आपस में मिलते हैं तो उष्ण खण्ड भी समाप्त हो जाता है। ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु पुन: ग्रहीय मार्ग को अपना लेते हैं। आकाश साफ हो जाता है।

      ध्रुवीय वायु औ पछुआ वायु अपने-2 क्षेत्र में रहकर उप-ध्रुवीय भागों में कोरियालिस प्रभाव के कारण ऊपर उठने लगती है। जिससे मौसम पूर्णतः सामान्य हो जाता है। पुनः जब ध्रुवीय वायु पछुवा वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट होने का प्रयास कती है तो पुन: नई चक्रवात का निर्माण प्रारंभ होता है।

16. MAJOR PRESSURE BELTS OF THE WORLD / विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ

16. MAJOR PRESSURE BELTS OF THE WORLD

(विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ)



विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ⇒

           धरातल पर इकाई क्षेत्रफल पर वायु द्वारा लगाया जाने वाला बल को वायुदाब कहते है। धरातल पर औसतन 1013 mb वायुदाब लगता है। विश्व में सर्वाधिक वायुदाब साईबेरिया में स्थित बैकाल झील के ऊपर मापा गया है और सबसे कम वायुदाब उत्तरी अमेरिका में आने वाले टॉरनेडो चक्रवात के केंद्र में मापा गया है। अत: इससे स्पष्ट होता है कि निम्न वायुमंडलीय क्षेत्र में सभी जगह वायुदाब परिस्थितियाँ एक सामान नहीं है। वायुदाब की विषमता मुख्यतः तीन कारणों से उत्पन्न होती है-

1. सूर्य का तलीय प्रभाव

2. कोरियालिसिस प्रभाव

3. स्थलमंडल और जलमंडल के वितरण में विषमता

         ये तीनों कारकों के कारण ही वायुदाब में विषमताएँ उत्पन्न होती है फिर भी ये अक्षांशीय विस्तार को बनाये रखते है। जलवायुवेताओं ने वायुदाब का अध्ययन कर यह बतलाया है की वायुदाब पेटी दो प्रकार के होते है–

(A) निम्न वायुदाब पेटी

1. विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी

2. उ० गोलार्द्ध की उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी

3. द० गोलार्द्ध की उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी

(B) उच्च वायुदाब पेटी 

1.  उ० गोलार्द्ध की ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी 

2.  उ० गोलार्द्ध की उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी

3.  द० गोलार्द्ध की ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी

4.. द० गोलार्द्ध की उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी

MAJOR PRESSURE BELTS

         उपरोक्त वर्गीकरण से स्पष्ट है कि पुरे पृथ्वी पर कुल सात वायुदाब पेटी मिलते हैं जिसमें तीन निम्न और चार उच्च वायुदाब पेटी है। इनका वितरण उपरोक्त चित्र में देखा जा सकता है।

विश्व की प्रमुख वायुदाब प

विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी

        इसका विस्तार 5°N से 5°S के बीच विषुवतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यहाँ प निम्न वायुदाब का प्रमुख कारण सालों भर सूर्य के लम्बवत किरण पड़ने के कारण उच्च तापमान का होना है। इसके परिणाम यह होता है कि दोनों गोलार्द्धों से आने वाली हवा प्रारंभ में आपस में मिलकर अंतरउष्ण अभिसरण (डोलड्रम/शांत पेटी) का निर्माण करती है। उसके बाद सूर्य के तापीय प्रभाव के कारण वायु गर्म होकर ऊपर उठने की प्रवृति रखती है जिससे संवहन तरंग का निर्माण होता है और अंतत: स्थायी निम्न वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है।

उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी

           इसका विस्तार दोनों गोलार्द्धों में 30° से 35° अक्षांश के बीच हुआ है। इसके उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण है-

(i) तुलनात्मक दृष्टि से इस क्षेत्र में कोरियालिसिस प्रभाव और सूर्य के तापीय प्रभाव कम होना है।

(ii) विषुवतीय प्रदेश और उपध्रुवीय प्रदेश से उठने वाली वायु उपरी वायुमंडल में क्षैतिज हो जाती है और ठंडा होकर पुन: इस प्रदेश में बैठने की प्रवृति रखती है। जिसके कारण उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी का निर्माण होता है।

उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी

       इसका निर्माण दोनों गोलार्द्धों में 60° से 65° अक्षांश के बीच हुआ है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण पृथ्वी का घूर्णन गति या कोरियालिसिस प्रभाव है। कोरियालिसिस प्रभाव के कारण पृथ्वी के सतह से सटे वायु के कण ऊपर की ओर ऊठने की प्रवृति रखती है। इसका सर्वाधिक प्रभाव मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में (खासकर 60° से 65°) के बीच होता है।

ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी   

         इसका विस्तार दोनों गोलार्द्धों में 70° से 90° अक्षांश के बीच हुआ है। इसके उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण है-

◆ ध्रुवीय क्षेत्रों में सालोंभर तापमान का निम्न होना।

◆ उपध्रुवीय क्षेत्र से ऊपर उठने वाली वायु का पुन: 70° से 90° के बीच बैठना।

वायुदाब पेटी में मौसमी संशोधन         

        यद्धपि ऊपर में बतलाये गए सभी वायुदाब की पेटियाँ स्थायी प्रकृति की होती है। लेकिन सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने से थोड़ा बहुत अक्षांशीय खिसकाव भी होती है। सामान्तय: यह खिसकाव 2° से 7° अक्षांश तक होता है। लेकिन उत्तरी गोलार्द्ध में यह खिसकाव मौसमी विशेषताओं के दृष्टिकोण से अधिक महत्पूर्ण है। उ० गोलार्द्ध में स्थल एवं जल के असमान वितरण के कारण विरूपित हो जाती है। जबकि द० गोलार्द्ध में जलमंडल के समान वितरण के कारण अपने अक्षांशीय स्थिति को बनाये रखते है।

      उ० गोलार्द्ध में जब गर्मी की ऋतू होती है तो विषुवतीय वायुदाब पेटी उत्तर की ओर खिसकर स्थलीय भागों में 30°N से 35°N अक्षांश के बीच चली आती है। अर्थात सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप और द०पू०, द० USA निम्न वायुदाब क्षेत्र में बदल जाते है जिसके कारण यहाँ कई मौसमी, स्थानीय और चक्रवातीय वायु का निर्माण होता है।

        शीत ऋतु में सूर्य दक्षिणायन हो जाता है जिसके कारण उ० गोलार्द्ध की सभी वायुदाब पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसकने की प्रवृति रखती है। तिब्बत के पठार के अत्यधिक ऊँचाई होने के कारण सम्पूर्ण चीन और साइबेरिया ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी में बदल जाती है। और उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र जाफना प्रायद्वीप के पास पहुँच जाती है। तिब्बतीय क्षेत्र में ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्र के बनने से बुरान,पुर्गा जैसे स्थानीय हवा का जन्म होता है।

       लेकिन द० गोलार्द्ध में इस तरह का कोई परिवर्तन नहीं होता है। 30°S से 35°S अक्षांश के बीच निर्मित होने वाली उपोष्ण उच्च वायुदाब करीब 9 महीने तक स्थिर रहती है। यह विश्व का सर्वाधिक स्थिर वायुदाब पेटी है। इसे अश्व अक्षांश के नाम से भी संबोधित करते है क्योंकि औपनिवेशिक काल में वायुमंडलीय विशेषताओं का पूर्ण ज्ञान नहीं था तो घोड़ा से लदे जहाज डूबने लगते थे तो कुछ घोड़ों को समुद्र में फेंक क जहाज के दबाव को कम क दिया जाता था। इसी कारण से इसे अश्व अक्षांश भी कहते है।

17. Winds (हवाएँ)

17. हवाएँ (Winds)



हवाएँ

       हवा तीन प्रकार के होते है- 

1. प्रचलित हवा

     वैसी हवा जो सलोंभर निश्चित दिशा में बहती है। जैसे- वाणिज्यिक हवा, पछुआ हवा, ध्रुवीय हवा।

2. मौसमी हवा

       वैसी हवा जो मौसमी विशेष में निश्चित दिशा में बहती है।

3. स्थानीय हवा

        वैसी हवा जो स्थानीय परिस्थितियों के प्रभाव से उत्पन्न होती है। ये प्रभाव इसके दिशा निर्धारित करते है। यही कारण है कि अलग-अलग स्थानीय हवा के अलग-अलग दिशा होती है

स्थायी /प्रचलित/ग्रहीय वायु

      उच्च वायुदाब पेटियाँ ही वायु के स्रोत क्षेत्र होते हैं। H.P. से ही वायु L.P. की ओर चला करती है। फेरल नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में वायु दायीं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में वायु बायीं ओर मुड़ जाती है। अपने मार्ग से विचलन का प्रमुख कारण पृथ्वी की घूर्णन गति है। अतः पृथ्वी रूपी ग्रह का प्रभाव वायु पर पड़ता है इसलिए ऐसे वायु को ग्रहीय वायु करते हैं। यह तीन प्रकार के होते हैं

1. वाणिज्यक/व्यापारिक/सन्मार्गी वायु

2. पछुआ वायु

3. ध्रुवीय वायु

1. वाणिज्यक/व्यापारिक/सन्मार्गी वायु-

       इसका स्रोत क्षेत्र उपोष्ण भार का क्षेत्र होता है। उत्तरी गोलार्ध में इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूरब से उत्तर-पश्चिम की ओर होती है। इस हवा का लक्ष्य क्षेत्र विषुवतीय निम्न भार का केंद्र होता है।

      दोनों गोलार्द्धों से चलने वाली वाणिज्यिक हवाएँ विषुवतीय निम्न वायुदाब के अंतर्गत मिलने की प्रवृत्ति रखती है। जिसे अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) कहते हैं। इस अभिसरण के बाद वायुदाब में थोड़ी वृद्धि होती है जिसके कारण वायु में गतिशीलता समाप्त हो जाती है, जिसे शांत पेटी या डोलड्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। डोलड्रम का निर्माण प्रायः समुद्री सतह पर होता है। विषुवतीय क्षेत्र में वायु के अभिसरण से प्रतिरोधी विषुवतीय वायु भी उत्पन्न होती है जिसे विषुवतीय पछुआ हवा कहते हैं।

2. पछुआ वायु

      इस वायु का भी स्रोत क्षेत्र उपोष्ण उष्ण वायुदाब का क्षेत्र होता है लेकिन इसका लक्ष्य क्षेत्र उपध्रुवीय निम्नवायु दाब का क्षेत्र होता है। उतरी गोलार्द्ध में इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में उतर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। यह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली वायु है जिसके  कारण तापमान में सामान्यतः कमी आती है।

      इस वायु का अभिसरण ध्रुवीय वायु से होता है। ध्रुवीय वायु अत्यधिक ठंडा जबकि उसके तुलना में पछुआ वायु गर्म होता है। इसीलिए दोनों मिलकर एक वाताग्र का निर्माण करते है और अंततः वाताग्र के सहारे (शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात) की उत्पति होती है।

      दक्षिण गोलार्द्ध में पछुआ वायु तुलनात्मक दृष्टि से अधिक स्थिर और बाधारहित मार्ग से गुजरती है क्योंकि दक्षिण गोलार्द्ध में समुद्र का विस्तार अधिक हुआ है। जब पछुआ हवा 40° दक्षिण अक्षांश के पास से गुजरती है तो उसे गरजता चालीसा कहते है। 50°S अक्षांश के पास प्रचण्ड पचासा/गरजता पचासा और 60°S अक्षांश के पास चीखता साठा कहलाता है।

3. ध्रुवीय वायु

      इसका स्रोत क्षेत्र ध्रुवीय उच्च वायुदाब का क्षेत्र होता है और लक्ष्य क्षेत्र उपध्रुवीय निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में उतर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूरब से उत्तर-पश्चिम की ओर चलती है। ध्रुवीय वायु की पछुआ वायु से मिलकर शीतोष्ण चक्रवात को जन्म देती है।

निष्कर्ष:

     ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के जलवायु और मौसमी परिस्थतियों के निर्माण में वायुदाब पेटी और स्थायी हवा का विशेष योगदान है।

स्थानीय हवा/LOCAL WINDS

         स्थानीय वायु मौसम विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है क्योंकि ये बादल निर्माण में मदद करते है। यह दो प्रकार का होता है।

(A) गर्म स्थानीय वायु

(B) ठंडी स्थानीय वायु

(A) गर्म स्थानीय वायु 

1. सिरक्को (Sirocco)

◆ यह हवा सहारा मरुस्थल में उत्पन्न होकर भूमध्यसागरीय भागों में प्रवाहित होती है।

◆ तापमान 3.7℃

◆ सापेक्ष आर्द्रता 10-20%

◆ यह हवाएँ लगातार 24 घंटे से 43 घंटे तक चला करती है।

स्रोत क्षेत्र- सहारा मरुस्थल

◆ धूल के कणों से वायुमंडल इतना अंधेरा हो जाता है कि सूर्य भी दिखाई नहीं पड़ता।

◆ यह हवाएँ भूमध्य सागर को पार करके दक्षिण फ्रांस तथा इटली पहुँचती है तो इनमें आर्द्रता की मात्रा अधिक पाई जाती है। इस आर्द्रता को यह भूमध्य सागर से प्राप्त कर लेती है।

◆ इटली में जब बारिश होती है तो इन बालू के कणों के कारण वर्षा की बूँदे लाल रंग की हो जाती है जिसे Blood Rain कहते हैं।

◆ सिरक्को को अलग-अलग देश में अलग-अलग नाम से जानते हैं।

(i) खमसिन

◆ मिस्र के डेल्टा की ओर चलने वाली धूल भरी आँधी है जिसका स्रोत क्षेत्र सहारा है।

◆ प्रायः वसंत ऋतु में ही चलती है।

(ii) लेवेची

◆ स्पेन में सहारा क्षेत्र से चलने वाली हवा।

(iii) लेस्ट

◆ मदिरा तथा कनारी द्वीप समूह में चलने वाले गर्म एवं शुष्क पूर्वी हवाओं को, जो सहारा के उष्ण मरुस्थल से चलती है, लेस्ट के नाम से पुकारा जाता है।

(iv) हरमट्टान

◆ इस पवन की उत्पत्ति शीतकाल में सहारा मरुस्थलीय क्षेत्र में होती है।

◆ यह पश्चिम अफ्रीका के सहारा से उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में चलने वाले गर्म एवं अति शुष्क हवा है।

◆ गिनी के तट पर इसका प्रभाव शीतलकारी होता है।

◆ नाइजीरिया और घाना में इसे डॉक्टर हवा कहते हैं क्योंकि वहाँ के निवासियों को आर्द्र मौसम से राहत देती है।

◆ परंतु सहारा के मरुस्थल में यह पवन ऊँट के काफीलों के लिए काफी कष्टदायक होती है।

2. ब्रिकफील्डर (Brick Filder)

◆ ऑस्ट्रेलिया में मरुस्थलीय प्रदेशों में चलने वाले गर्म एवं शुष्क पवन को ब्रिकफील्डर कहा जाता है।

◆ दक्षिण आस्ट्रेलिया (एडिलेड के पश्चिम) में उत्तर से दक्षिण की ओर चलने वाली हवा है।

3. ब्लैक रोलर

◆ उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदान में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर तेज धूल भरी आँधियाँ चला करती है। जिनसे कभी-कभी मार्ग में पड़ने वाली इमारतें रेत के ढेर के नीचे दब जाती है। इन स्थानीय हवा को ब्लैक रोलर कहा जाता है।

स्रोत क्षेत्र- कोलरेडो के मरुस्थलीय क्षेत्र (न्यू मैक्सिको)

प्रभाव- मिसीसिपी मिसौरी के मध्यवर्ती क्षेत्र में

◆ धूल कण का आकार बड़ा-बड़ा होता है।

4. शामल

◆ मेसोपोटामिया तथा फारस की खाड़ी की ओर उत्तर-पूरब से चलने वाली गर्म हवा को शामिल कहा जाता है।

◆ इराक में चलने वाली हवा है।

◆ वस्तुतः यह सिमूम हवा ही है।

5. नार्वेस्टर

◆ न्यूजीलैंड में वहाँ की पर्वत मालाओं से उत्पन्न गर्म, शुष्क तथा  झोंकेंदार पवन को नॉर्वेस्टर कहा जाता है।

6. गिबली

◆ लीबिया में सहारा क्षेत्र में चलने वाली हवा।

7. चिली

◆ ट्यूनीशिया की स्थानीय हवा जो सहारा क्षेत्र से चलती है।

◆ यह धूल भरी आंधी के समान है।

8. सिमूम

◆ अफ्रीका एवं अरब के मरुस्थलों में गर्म एवं शुष्क आँधियाँ चलती है जिनको सिमूम कहते हैं।

◆ यह अरब मरुस्थल के मध्य से चलने वाली हवा है जो इराक और कुवैत की ओर (पर्शियन गल्फ) चलती है।

◆ इनके साथ रेत की मात्रा अधिक होती है जिससे दृश्यता समाप्त हो जाती है।

◆ यह बवण्डर की तरह उठती है।

◆ यह दमघोंटू हवा है।

9. लू 

◆ गर्मी के महीने में उत्तरी भारत में चलने वाली पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी गर्म तथा अत्यधिक शुष्क वायु को लू कहते हैं।

◆ थार के मरुस्थल से उत्तरी भारत एवं पाकिस्तान के मैदान में मई एवं जून में प्रवाहित होती है।

◆ इनकी गति पर प्रायः 20 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक होती है।

◆ उत्तर में लू दोपहर के थोड़ा पहले से सूर्यास्त तक प्रभावित होती है।

◆ मानसून के आविर्भाव के साथ लू खत्म हो जाती है।

◆ यह गर्म हवा है जिसकी धूलकण बनारस तक और इसका प्रभाव भागलपुर तक रहता है।

तापमान- 40℃ से 50℃

◆ इसे Heat Waves भी कहते हैं।

10. काराबूरान

यह मध्य एशिया के तारिम बेसिन और गोबी मरूस्थल से चलने वाली गर्म हवा है।

यह धूल से भरी वायु है।

मध्य एशिया में लोएस का मैदान का निर्माण इसी वायु से हुआ है।

11.  सांता आना (Santa Ana)

पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित घाटियों में जब ऊँचाई पर एकत्रित वायु पूंज तीव्र गति से नीचे उतरती है, तो उन शुष्क और गर्म हवाओं को फॉल विन्डस (fall winds) की संज्ञा प्रदान की जाती है।

उ० अमेरिका के कैलिफोर्निया में सांताआना कैनियन (घाटी) से होकर तटवर्ती मैदानों (कैलिफोर्निया) की ओर चलने वाली धूल भरी आँधी को सांताआना कहा जाता है।

ये आंधियाँ उत्तर अथवा उत्तर- पू० की ओर से चलती है।

उत्पति का मूल स्थान- ग्रेट बेसिन

शुष्कता अत्यधिक

अत्यधिक शुष्क एवं गर्म हवाओं से कैलीफोर्निया के फल के बगीचों की अपार क्षति होती है।

प्रबल वेग

इन हवाओं से पेड़ सूख जाती है तथा जंगलों में आग लग जाती है।

हवा में रेत की महीन कणों की मात्रा अधिक होने के कारण श्वास लेना भी कठिन हो जाता है।

12. योमा (Yoma)

सांताआना के समान जापान में चलने वाली गर्म हवा को योमा कहा जाता है।

➤  पश्चिमी तट पर ताप को बढ़ा देता है।

यह जाड़े की ऋतु में साइ‌बेरिया से आने वाली ठंडी हवा के प्रभाव को कम करती है।

इसका प्रभाव होन्शू द्वीप पर पड़ता है।

13. जोंडा (zonda)

एंडीज पर्वत से प० पेंटागोनियाँ में चलने वाली स्थानीय हवाओं को जोंडा कहते है।

यह सांताआना के समान है।

पम्पास प्रदेश (द० अमेरिका) में चलने वाली है।

यह पम्पास के मैदान में चारे की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

यह घाटियों से एंडीज पर्वत के पूरब की ओर उतरने वाली हवा है।

14. फॉन (Fochn)

➤ उन पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ चक्रवातीय तुफान चला करते हैं, फॉन नामक गर्म और शुष्क स्थानीय हवायें पायी जाती है।

➤ इनकी उत्पति पर्वतों के वायु विमुख ढाल की ओर वायु के अवतलन के कारण होती है।

➤ यह आल्प्स से उत्तर की ओर चलने वाली हवा है।

➤ चीनूक और फॉन का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से 15 डिग्री सेल्सियस तक होता है इसलिए जाड़े के लिए यह उपयुक्त होती है।

➤ इस स्थानीय हवा को तथा ऑस्ट्रिया तथा जर्मनी में फॉन कहा जाता है।

➤ इसका प्रभाव स्वीटजरलैंड पर भी पड़ता है।

➤ यह हवा सेब, अंगूर की खेती के लिए उपयुक्त होती है।

15. चिनूक (chinook)

➤ संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तरी अमेरिका) में रॉकी पर्वत के पश्चिमी ढाल के सहारे चढ़ती है एवं पूर्वी ढाल के सहारे गर्म होकर उतरती है जो कोलेरेडो से कोलंबिया तक के प्रांतों को प्रभावित करती है।

इन हवाओं को पश्चिमी कनाडा तथा USA में चिनूक कहा जाता है।

ये हवाएं अधिकांशत: जाड़े के ऋतु में प्रभावित होती है।

➤ मृत घाटी सियरा नेवादा के पवन विमुख ढाल पर स्थित है।

➤ फॉन तथा चिनूक हवाओं के गर्म होने के दो प्रमुख कारण है:-

(i) वायु अभिमुख ढाल पर आरोही पवन में संघनन की गुप्त ऊष्मा द्वारा वायु के तापमान में वृद्धि है।

(ii) उन हवाओं के अवरोहण के समय संपीडन के कारण उनके तापमान में अतिरिक्त वृद्धि है।

इसके तापमान बढ़ने की दर 10 से 15 मिनट में 3ºC से 10ºC तक रहती है। 24 घंटे में 12 से 15ºC तापमान बढ़ जाता है।

➤ इसे हिम भक्षिणी Snow Eaters भी कहा जाता है।

➤चिनूक हवा शुष्क रुद्दोष्म दर से गर्म होता है

अन्य गर्म हवा

16. बाग्यो (Bayuio)

➤ फिलिपिंस में चलने वाली उष्ण कटिबंधीय चक्रवातीय हवा है

➤ यह उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात भी है।

17. सुखोवे

➤ रूस एवं कजाकिस्तान में चलने वाली गर्म हवा है।

18. गोरिच

➤ ईरान में प्रवाहित होने वाली गर्म एवं शुष्क पवन है।

19. मारिन

➤ द० फ्रांस में बहने वाली गर्म एवं आर्द्र पवन है।

20. अयाला

➤ फ्रांस के मध्य मैसिफ में चलने वाली गर्म हवा है।

21. कोयम बैग

➤ यह इंडोनेशिया में चलने वाली गर्म हवा है।

➤ इससे तम्बाकू के फसल को हानि होती है।

22. सिस्टन (seistan या 120 दिन की पवन)

➤ पूर्वी ईरान की गर्म हवा है।

23. वीरोजन (virozon)

➤ पेरू तथा चिली के प० तटों पर बहने वाली हवा है।

24. वेन्डावेल्स (vendavales)

➤ जिब्राल्टर तथा स्पेन के पूर्वी तट पर चलने वाली ठंडी हवा को वेन्डावेल्स कहते है।

25. टेम्पोराल्स (Temporals)

➤ मध्य अमेरिका के प्रशांत तट पर की हवा है।

➤ मैक्सिको की भी हवा है।

26. सोमून (Somun)

➤ ईरान में कुर्दिस्तान पर्वत से उत्तर-पश्चिम की हवा है।

27. हबूब (Haboob)

➤ सूडान में उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चलने वाली हवा है।

➤ स्रोत- सहारा मरुस्थल

28. ग्रेगल

➤ पश्चिमी यूरोप में उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चलने वाली हवा है।

29. मेस्ट्रो (Maestro)

➤ भूमध्यसागरीय क्षेत्र से उ०-प० (स्पेन और पुर्तगाल की ओर चलने वाली हवा)

30. बर्ग

➤ द० अफ्रीका में फॉन के समान वायु, जो आंतरिक पठारी भाग से तटवर्ती क्षेत्र की ओर चलती है।

नोट:- प्रमुख गर्म हवाएँ-

फॉन, चिनुक, सिमूम, सिरॉको

ब्रिकफिल्डर, ब्लैक रोलर, काराबुरान, हरमट्टान

खमसिन, गिबली, चिली, जोंडा।

लू, सोलैनो, कोयमबैंग, अयाला।।

शांताआना, योमा, शामल, नार्वेस्टर

बर्ग, बाग्यो, गोरिच, सुखोवे

(B) ठंडी स्थानीय वायु

गुरुत्व पवन (Gravity Winds):-

     समुद्र के तटवर्ती क्षेत्रों में जहां पठार अथवा पर्वतों से घिरे मैदानी भाग है वहां शीत ऋतु में भारी मात्रा में शीतल वायु एकत्रित हो जाती है। इन पठारों अथवा पर्वतों के ढालों से खिसक कर वायु की कुछ राशि घाटियों तथा नदी कंदराओं में एकत्रित हो जाती है।

     साधारण स्थिति में ये हवाएं मंद पवन या समीर के रूप में तट की ओर प्रवाहित होती है। किंतु जब कभी चक्रवातों का आगमन होता है तो न्यून वायु भार व्यवस्था के अंतर्गत शीतल और भारी वायु राशि प्रबल वेग के रूप में तट की ओर प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार के पवनों को अवरोही पवन, गुरुत्व पवन, फॉल विंड्स (Fall Winds), ड्रेनेज विंड्स (Drainage Winds) अथवा केटाबेटिक विंड्स आदि कई नामों से अलंकृत किया जाता है।

    इन अवरोही पवनोंं को विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न से जाना जाता है:-

गुरुत्व पवन (Gravity Winds):-

(i) बोरा (Bora)

➤ बोरा एक शीतल स्थानीय पवन है जो उत्तर/उ०-पू० दिशा से एड्रियाटिक सागर के उत्तरी तट पर चला करता है।

➤ इन पवनों का वेग 128 km/h से लेकर 196 km/h hota है।

➤ तीव्र झोंका के साथ चलने वाली शीतल हवा है।

➤ यह आल्प्स पर्वत की हवा है।

➤ यह आल्प्स पर्वत के दर्रों से आनेवाली हवा है।

➤ यह फॉन का उल्टा हवा है।

➤ यह इटली, यूनान, युगोस्लाविया के तट पर कष्टकर स्थिति उत्पन्न करती है।

➤ रसेदार फसलों के लिए हानिकारक है।

(ii) गिरती पवन (Fall Winds)

नार्वेजियन तट पर इसको गिरती पवन (Fall Winds) कहा जाता है।

(iii) मिस्ट्रल (Mistral)

➤ फ्रांस के भूमध्यसागरीय तट पर गुरुत्व पवन को मिस्ट्रल कहा जाता है।

➤ यह द० फ्रांस की हवा है जो मध्यवर्ती यूरोप से आती है और भूमध्यसागर की ओर बहती है।

➤ रसेदार फसलों के लिए हानिकारक होती है।

हिमझंझा (Blizzard)

➤ अत्यधिक सर्द, वेगवान तथा हिमकणों से युक्त पवन को हिम झंझा कहा जाता है।

➤ प्रारंभ में इस पवन का नामकरण USA स्थित रॉकी पर्वत के पूर्व की ओर मैदानी भागों में चलने वाली बर्फीली आंधियों के लिए किया गया था।

➤ इनकी उत्पत्ति शीतकालीन चक्रवातों के पृष्ठ भाग में स्थित प्रतिचक्रवातों से होती है।

➤ इनमें भारी मात्रा में हिमकण प्रवाहित होती है।

➤ यह जाड़े की ऋतु में उत्तरी अमेरिका में ध्रुवीय प्रदेश से आने वाली हवा है।

➤ कपास, प्याज के लिए हानिकारक साबित होता है।

➤ इससे उत्तरी अमेरिका में पाला पड़ने लगता है।

➤ आजकल उच्च अक्षांशों में चलने वाली पवनों में यदि हिमकण मिश्रित होते है तो उन्हें ब्लिजार्ड कहा जाता है।

➤ अंटार्कटिका में प्राय: ऐसे हिमझंझावत चला करते है जिनमें पवन का वेग कभी-कभी 80 Km/h तथा तापमान -7ºC होता है।

(i) बुरान (Buran)/ पुर्गा

➤ सोवियत रूस तथा मध्य साइबेरिया में उ०-पू० से चलने वाली अत्यधिक सर्द हवाओं को बुरान कहा जाता है तथा बर्फीली आंधियों को पूर्गा (Purga) कहते है।

(ii) बाइज (Bise)/लेवांतर

➤ शीत ऋतु में प्रबल वेग से चलने वाली अत्यधिक ठंडी हवाओं को दक्षिणी फ्रांस में बाइज कहा जाता है तथा स्पेन में लेवांतर (Levanter) कहा जाता है। स्रोत क्षेत्र- Northerly Winds.

➤ तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है जबकि मिस्ट्रल का तापमान हिमांक से ऊपर रहता है।

(iii) पैम्पीरो (Pampero)

➤ द० अमेरिका में अर्जेंटीना के पंपास क्षेत्र में उरुग्वे से प्रचंड वेग वाली सर्द हवाएं चला करती है जिन्हें वहां पैम्पीरो कहते है।

➤ इन हवाओं के साथ धूल भरी आंधियां भी चला करती है।

(iv) पापागायो (Papagayo)

➤ कोस्टा रीका के उत्तरी-पश्चिमी तट तथा समीपवर्ती प्रशांत तटवर्ती क्षेत्रों में पापागायो की खाड़ी में शीतकालीन उत्तर-पूर्वी हवाएं चलती है जिन्हें उस खाड़ी के नाम पर पापागायो कहा जाता है।

➤ ये हवाएं बड़ी प्रचंड होती है।

(v) टेहुयांटिपेकर (Tehuanterpecer)

➤ दक्षिणी मैक्सिको तथा उत्तरी मध्य अमेरिका से जाड़े के मौसम में धूलभरी तेज आंधियाँ चला करती है जिसे टेहुयांटिपेकर कहा जाता है।

➤ कोलेरेडो और ग्रेट बेसिन से जाड़े की ऋतु में चलती है।

(vi) फ्राइजेम (Friagem)

➤ ब्राजील के उष्ण कटिबंधीय कम्पोज तथा मध्य अमेजन घाटी में मई तथा जून के महीनों में भीषण शीत लहरी का प्रकोप हो जाता है, फ्राइजेम कहा जाता है।

➤ इन सर्द हवाओं का प्रकोप 3 से 5 दिन रहता है।

➤ जाड़े की ऋतु में एंडीज पर्वत से नीचे उतरने वाली हवा है।

➤ यह भी आनंददायक हवा है।

सदर्न बस्टर (Southern Buster)

➤ ध्रुवीय प्रदेशों से द० ऑस्ट्रेलिया (न्यू साउथ वेल्स) में प्रवाहित होने वाली हवा है।

नेवाडोह

➤ यह दक्षिणी अमेरिका के एंडीज के हिम क्षेत्रों से इक्वाडोर की उच्च घाटियों में प्रवाहित होने वाली पवन है।

➤ यह एक पर्वत समीर है।

ट्रामोण्टाना

➤ पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में शीत काल में प्रवाहित होने वाली शुष्क एवं शीतल हवा है।

केप डाक्टर

➤ द० अफ्रीका के पठारी क्षेत्र से दक्षिणी तट की ओर बहती है।

➤ इस हवा को टेबल क्लॉथर कहा जाता है क्योंकि यह पवन पर्वतीय क्षेत्रों में बादलों का निर्माण करती है।

नार्दर (Norther)

➤ यह वास्तव में एक ध्रुवीय पवन है जो अवरोध के अभाव के कारण दक्षिण में अमेरिका के टेक्सास एवं खाड़ी तटीय क्षेत्रों तक पहुंच जाती है।

➤ इसका अगला क्रम मध्य अमेरिका में Norte कहलाता है।

विलीवाव (Willywaw)

➤ यह एक गुरुत्व पवन है।

➤ अंटार्कटिका में शीतल और भारी हवाएं पठारी ढालों से नीचे उतरकर तीव्र वेग से चलती है जिसे विलीवाव कहा जाता है।

➤ अलास्का में इस पवन को बिलिबॉब कहते है।

➤ जब सूर्य दक्षिणायन होती है तब यह पवन चलती है।

मौसमी हवा या सामयिक पवन

      मौसम के अनुसार या समय के साथ चलने वाली हवा को मौसमी हवा कहते हैं। यह कुल तीन प्रकार के होते हैं-

1. स्थलीय समीर और सागर समीर 

2. पर्वत समीर और घाटी समीर 

3. मानसून पवनें

1. स्थलीय समीर और सागर समीर (Land Breeze and Sea Breeze)

दिन के समय समुद्र के निकटवर्ती क्षेत्र, समुद्र की तुलना में जल्दी गर्म हो जाते हैं जिससे स्थल पर LP का और समुद्र पर HP का निर्माण हो जाता है जिससे हवा समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने लगती है, इसे सागरीय या समुद्री समीर कहते हैं। 

इसके विपरीत रात के समय पार्थिव विकिरण के कारण स्थलीय भाग सागरीय भाग की तुलना में शीघ्रता से ठंडी हो जाती है जिससे स्थल पर HP एवं समुद्र पर LP का निर्माण होता है, जिसके कारण हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है, इसे स्थलीय समीर कहते हैं।

हवाएँ

स्थलीय समीर और समुद्री समीर की निम्नलिखित विशेषताएँ है-

◆ 24 घंटे में इनकी दिशा में दो बार परिवर्तन होता है।

◆ ये समीर तटीय क्षेत्रों को एक पतली पेटी में प्रभावित करती है।

◆ इसी समीर के कारण तटीय क्षेत्रों में मौसम हमेशा सम बना रहता है। दिन के समय समुद्र से आने वाली हवा के कारण वायु में आर्द्रता की मात्रा अधिक रहती है जबकि स्थालीय समीर के कारण रात के समय मौसम शीतल हो जाता है। यही कारण है कि तटीय क्षेत्रों में अवस्थित नगरों में आर्थिक गतिविधियाँ देर रात तक संचालित होती रहती है।

2. पर्वत समीर और घाटी समीर

ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में दो प्रकार की दैनिक हवाएँ चलती है- पर्वत समीर एवं घाटी समीर।

दिन के समय पर्वतीय ढाल वाला क्षेत्र घाटियों की तुलना में जल्दी एवं अधिक गर्म हो जाते हैं जिससे ढलानों पर LP और घाटी में HP का निर्माण हो जाता है। जिसके कारण पवन का संचरण ढालों के सहारे नीचे से ऊपर की ओर होने लगती है, इसे घाटी समीर कहते हैं।

इसके विपरीत रात्रि के समय बढ़ती ऊँचाई के कारण तापमान में कमी आ जाती है जिससे पर्वतों के ऊपरी क्षेत्रों में हवा ठंडी एवं भारी हो जाती है एवं HP का निर्माण कर लेती है जबकि घाटी में LP की स्थिति बनती है। अतः हवा पर्वतीय ढालों के सहारे नीचे की ओर संचरित होने लगती है, इसे पर्वतीय समीर कहा जाता है।

विशेषताएँ

◆ यह एक दैनिक हवा है जो पर्वतीय ढालों के सहारे चलती है। घाटी समीर ‘एनाबेटिक हवा’ है जबकि पर्वतीय समीर एक ‘केटाबेटिक’ हवा है।

◆ उष्ण एवं शीतोष्ण प्रदेशों में 35° से 50° अक्षांश के बीच इस हवा को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।

◆ यह हेडली सेल के विपरीत कार्य करता है। इसी समीर के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में फलों के बागान, नगरों का विकास, या अधिवासी क्षेत्र का निर्माण न तो घाटी में होता है और न ही पर्वतीय कटकों पर बल्कि इनका विकास पर्वतीय ढलान पर होता है।

3. मानसूनी हवा

      यह मौसम विशेष की हवा है। हेडली महोदय ने इसे परिभाषित करते हुए कहा है कि मानसून एक ऐसी हवा है जो 6 महीने स्थल से समुद्र की ओर और अगले 6 महीने समुद्र से स्थल की ओर चलती है।

विशेषताएँ

◆ मानसून की उत्पत्ति के संबंध में चार सिद्धांत दिए हैं-

(i) तापीय सिद्धांत

(ii) पछुआ हवा सिद्धांत

(iii) जेट स्ट्रीम सिद्धांत और

(iv) अलनीनो सिद्धांत

◆ यह एक अनिश्चिताओं से भरी हुई हवा है क्योंकि इसके आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

◆ इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।

◆ वर्षा का वितरण एवं मात्रा दोनों अनिश्चित है।

◆ बादल विस्फोट की घटना घटित होती है।

◆ इस हवा की उत्पत्ति 8° से 35° अक्षांश के बीच में होती है। इसका विस्तार भारतीय उपमहाद्वीप, उत्तरी-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्वी ब्राजील, दक्षिणी चीन, मेडागास्क, संयुक्त राज्य अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य इत्यादि में हुआ है



हवाओं से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



 

1. व्यापारिक हवाएँ (Trade winds) किन अक्षांशों से किन अक्षांशों की ओर बहती है?

[A] विषुवत रेखा से उष्ण कटिबन्ध की ओर
[B] उष्ण कटिबन्ध से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर
[C] अश्व अक्षांशों से विषुवत रेखा की ओर
[D] उपर्युक्त सभी

[read more] [C] अश्व अक्षांशों से विषुवत रेखा की ओर [/read]

2. उच्च दाब क्षेत्र से भूमध्य सागर की ओर चलने वाली पवनें होती है-

[A] पछुआ हवाएँ
[B] व्यापारिक पवनें
[C] व्यापारिक पवनें
[D] समुद्री पवनें

[read more] [B] व्यापारिक पवनें [/read]

3. व्यापारिक हवाएँ होती है-

[A] नियमित व स्थिर
[B] अनियमित
[C] अंशतः अनियमित
[D] उपर्युक्त में कोई नहीं

[read more] [A] नियमित व स्थिर [/read]

4. पूरे वर्ष एक ही दिशा में प्रवाहित होने वाली पवनें क्या कहलाती है?

[A] स्थानीय पवन
[B] सामाजिक पवन
[C] सनातनी पवन
[D] ध्रुवीय पवन

[read more] [C] सनातनी पवन [/read]

5. उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत रेखीय निम्न दाब की ओर चलने वाली पवनें क्या कहलाती है?

[A] व्यापारिक पवनें
[B] ध्रुवीय पवनें
[C] पछुआ पवनें
[D] गरजता चालीसा

[read more] [A] व्यापारिक पवनें [/read]

6. व्यापारिक पवनें कहाँ से चलती है?

[A] विषुवतीय निम्न दाब से
[B] ध्रुवीय उच्च दाब से
[C] उपोष्ण उच्च दाब से
[D] अधोध्रुवीय निम्न दाब से

[read more] [C] उपोष्ण उच्च दाब से [/read]

7. वे नियमित हवाएँ जो कि ‘गरजता चालीसा’, ‘प्रचण्ड पचासा’ तथा ‘चीखता साठा’ के उपनाम से जानी जाती है, निम्न में से किस प्रकार की हवाएँ है?

[A] ध्रुवीय
[B] पछुआ
[C] चक्रवातीय
[D] व्यापारिक

[read more] [B] पछुआ [/read]

8. दहाड़ता चालीसा क्या है?

[A] 40° दक्षिणी अक्षांश की जलधारा
[B] 40° उत्तरी अक्षांश की जलधारा
[C] दक्षिणी गोलार्द्ध में 40° अक्षांश के पास चलने वाली तेज हवा
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] दक्षिणी गोलार्द्ध में 40° अक्षांश के पास चलने वाली तेज हवा [/read]

9. भयंकर पचासा चलते हैं-

[A] 50° उत्तरी अक्षांश पर
[B] 50° दक्षिणी अक्षांश पर
[C] 50° N से 60° N के मध्य
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [B] 50° दक्षिणी अक्षांश पर [/read]

10. चीखता साठा पवन प्रवाहित होती है-

[A] 60° पूर्वी देशान्तर के निकट
[B] 60° पश्चिमी देशान्तर के निकट
[C] 60° उत्तरी अक्षांश के निकट
[D] 60° दक्षिणी अक्षांश के निकट

[read more] [D] 60° दक्षिणी अक्षांश के निकट [/read]

11. मानसून शब्द का तात्पर्य है-

[A] हवाओं का सदैव एक ओर ही बहना
[B] हवाओं का बहुत तेजी से बहना
[C] हवाओं का बहुत धीमी गति से बहना
[D] हवाओं के रूख का बदलना

[read more] [D] हवाओं के रूख का बदलना [/read]

12. मानसूनी हवाएँ-

[A] उच्च दाब क्षेत्र से उच्च दाब क्षेत्र की ओर चलती है।
[B] उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर चढ़ती है।
[C] निम्न दाब क्षेत्र से उच्च दाब क्षेत्र की ओर चलती है।
[D] निम्न दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर चलती है।

[read more] [B] उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर चढ़ती है। [/read]

13. आल्पस पर्वत के उत्तरी भाग में बहने वाली उष्ण शुष्क स्थानीय हवाओं को क्या कहा जाता है?

[A] खमसिन
[B] सिराँको
[C] चिनूक
[D] फॉन

[read more] [D] फॉन [/read]

14. अर्जेण्टीना के पम्पास क्षेत्र में उरूग्वे की ओर से प्रचण्ड वेग से चलने वाली ठंडी हवाओं को क्या कहा जाता है?

[A] टपीरो
[B] पैम्पीरा
[C] हरमट्टन
[D] काराबुरान

[read more] [B] पैम्पीरा [/read]

15. न्यूजीलैंड में उच्च पर्वतीय क्षेत्रों से उतरने वाली गर्म शुष्क एवं धूल भरी स्थानीय हवा निम्न में से किस नाम से जानी जाती है?

[A] ब्रिक फील्डर
[B] ट्रैमोण्टेन
[C] नारवेस्टर
[D] साण्टाअना

[read more] [C] नारवेस्टर [/read] 

16. सं० रा० अमेरिका के पश्चिमी तट से प्रारम्भ होकर रॉकी पर्वत को पार करके उसके नीचे उतरने वाली गर्म एवं शुष्क हवा किस नाम से जानी जाती है?

[A] फॉन
[B] नार्दन
[C] चिनूक
[D] साण्टाअना

[read more] [C] चिनूक [/read]

17. निम्नलिखित में से कौन सुमेलित नहीं है?

[A] चिनूक- चीन
[B] खमसिन- मिस्र
[C] सिराँको- इटली
[D] गिबिली- लीबिया

[read more] [A] चिनूक- चीन [/read]

18. यूरोप में जूरा पर्वत से जेनेवा झील की तरफ रात्रि में चलने वाली शीतल एवं शुष्क पवन को किस नाम से जाना जाता है?

[A] तालविण्ड
[B] सोलैनी
[C] मिस्ट्रल
[D] जोरान

[read more] [D] जोरान [/read]

19. रॉकी पर्वत के पूर्वी ढालों पर उतरने वाली हवा को संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में क्या कहा जाता है?

[A] सिराँको
[B] चिनूक
[C] खमसिन
[D] हरिकेन

[read more] [B] चिनूक [/read]

20. निम्न में से कौन-सी स्थानीय ठंडी हवा नहीं है?

[A] मिस्ट्रल
[B] बोरा
[C] खमसिन
[D] ब्लिजार्ड

[read more] [C] खमसिन [/read]

21. निम्न में से कौन ठंडी स्थानीय हवा है?

[A] मिस्ट्रल 
[B] पैम्पीरो
[C] बोरा
[D] उपर्युक्त सभी

[read more] [D] उपर्युक्त सभी [/read]

22. निम्नलिखित में से कौन-सी वायु स्विट्‌जरलैंड में उत्तरी आल्पस के विमुख ढाल पर बहती है?

[A] फॉन
[B] मिस्ट्रल
[C] सिराँको
[D] चिनूक

[read more] [A] फॉन [/read]

23. चिनूक है एक-

[A] स्थानीय हवा
[B] स्थायी हवा
[C] सनातनी हवा
[D] समुद्री जलधारा

[read more] [A] स्थानीय हवा [/read]

24. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

[A] मिस्ट्रल- फ्रांस
[B] सिराँको- आस्ट्रेलिया
[C] यामो- जापान
[D] खमसिन- मिस्र

[read more] [B] सिराँको- आस्ट्रेलिया [/read] 

25. सुमेलित कीजिए-

सूची-I (स्थानीय हवा)  सूची-II (देश)

a. चिनूक 1. सं० रा० अ०

b. सिराँको 2. आस्ट्रेलिया

c. ब्रिक फील्डर 3. फ्रांस

d. मिस्ट्रल 4. इटली

कूट: a b c d

[A] 1 4 2 3
[B] 1 4 3 2
[C] 4 1 2 3
[D] 4 1 3 2

[read more] [A] 1 4 2 3 [/read]

26. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थानीय पवन इटली में ‘रक्त की वर्षा’ लाती है?

[A] सिमूम
[B] सामून
[C] सिराँको
[D] शामल

[read more] [C] सिराँको [/read]

27. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थानीय पवन ‘हिम भजी’ के नाम से जानी जाती है?

[A] चिनूक
[B] फॉन
[C] हरमट्टन
[D] सिरॉको

[read more] [A] चिनूक [/read]

28. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थानीय पवन को ‘डाक्टर वायु’ भी कहा जाता है?

[A] फॉन
[B] चिनूक
[C] हरमट्टन
[D] सिरॉको

[read more] [C] हरमट्टन [/read]

29. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थानीय पवन अफ्रीका में गिनी तट के लोगों को आर्द्र मौसम से राहत प्रदान करती है?

[A] मिस्ट्रल
[B] हरमट्टन
[C] खमसिन
[D] सिमूम

[read more] [B] हरमट्टन [/read] 

30. निम्नलिखित में से कौन-सी गर्म स्थानीय पवन कैलिफोर्निया में फल के बगीचों को काफी नुकसान पहुँचाती है?

[A] जोण्डा
[B] सान्ताअना
[C] नार्दर
[D] चिनूक

[read more] [B] सान्ताअना [/read]

31. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थानीय पवन मध्य यूरोप के पर्वतीय क्षेत्र से यूगोस्लाविया के एड्रियाटिक तट की ओर प्रवाहित होती है?

[A] मिस्ट्रल
[B] फॉन
[C] बोरा
[D] बुरान

[read more] [C] बोरा [/read]

32. निम्नलिखित में से कौन ठंडी स्थानीय पवन नहीं है?

[A] जूरन
[B] जोण्डा
[C]  बुरान
[D] पापाग्यो

[read more] [B] जोण्डा [/read]

33. निम्नलिखित में से कौन ठंडी स्थानीय पवन है?

[A] खमसिन
[B] सिरॉको
[C] हरमट्टन
[D] फ्राइजेम

[read more] [D] फ्राइजेम [/read]

34. सुमेलित कीजिए-

सूची-I (स्थानीय पवन) सूची-II (देश)

a. खमसिन 1. मिस्र

b. चिली 2. ट्यूनीशिया

c. गिबिली 3. लीबिया

d. लेवेच 4. स्पेन

कूट: a b c d

[A] 1 2 3 4 
[B] 2 1 3 4
[C] 1 2 4 3
[D] 4 2 3 1

[read more] [A] 1 2 3 4 [/read]

35. सुमेलित कीजिए-

सूची-I (स्थानीय पवन)  सूची-II (देश)

a. सिरॉको 1. फिलीपीन्स

b. ब्रिक फिल्डर 2. आस्ट्रेलिया

c. सामून 3. ईरान

d. बाग्यो 4. इटली

कूट: a b c d

[A] 1 2 3 4
[B] 2 1 3 4
[C] 4 2 3 1
[D] 4 3 2 1

[read more] [C] 4 2 3 1 [/read]

35. Metrological Instruments : Functions of Wind Vane, Anemometer, Barometer, Rain Gauge and Dry and Wet Bulb Thermometer

Metrological Instruments: Functions of

Wind Vane, Anemometer

Barometer, Rain Gauge

and Dry and Wet Bulb Thermometer

1.  WIND VANE (वात् दिग्दर्शी)

WIND VANE (वात् दिग्दर्शी):-

       इस यंत्र से वायु की दिशा ज्ञात की जाती है। इसे भारतीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा निर्धारित 10 मीटर की ऊँचाई पर लगाया जाता है, ताकि पवन में कोई रुकावट न हो। इस यंत्र में तीन भाग होते हैं-

(1) एक भाग तीर,

(2) दूसरा भाग पूँछ तथा

(3) तीसरा भाग लम्बवत् धुरी।

        वात् दिग्दर्शी दो प्रकार के होते हैं:-

(1) तीर वाला वात् दिग्दर्शी एवं

(2) कुक्कुट वाला वात् दिग्दर्शी।

     धुरी एवं ऊपर के तीर या कुक्कुट की व्यवस्था इस प्रकार रहती है कि तनिक भी हवा चलने पर यह घूमने लगे। हवा चलने से यह तीर हवा की ओर इशारा करता है अर्थात् जिधर से हवा आती है, उधर उसका तीर होता है। इस यंत्र के निचले भाग में लगी छड़ में चार छड़े लगी रहती है जिन पर दिशाओं के नाम लिखे रहते है, यथा-उत्तर, पूरब, दक्षिण तथा पश्चिम।

     यहाँ एक बात अधिक ध्यान देने की है कि हवा का नामकरण उसी ओर होता है जिधर से हवा आती है, जैसे- यदि हवा पश्चिम की ओर से चल रही है तो उसे पछुआ पवन कहा जायेगा। जिधर से हवा आती है, उधर तीर का नुकीला भाग होता है। जिस यंत्र में तीर के स्थान पर मुर्गा लगा रहता है, उसे वेदर कॉक (Weather Cock) या मौसम कुक्कुट कहा जाता है।

ARROW-TYPE WIND VANE



COCK-TYPE WIND VANE

(WEATHERCOCK)

Metrological Instruments



2. Anemometer (पवन वेगमापी)

Anemometer (पवन वेगमापी):-

     इस यंत्र द्वारा हवा की गति ज्ञात की जाती है। इसमें चार कटोरियाँ भुजाओं द्वारा एक लम्बी छड़ी में इस तरह लगी रहती है कि वे आसानी से घूम सके। जब हवा चलती है तो ये कटोरियाँ भी घूमने लगती है। इस छड़ी के निचले भाग में एक छड़ी लगी रहती है जिसमें डायल पर चक्करों की संख्या अंकित रहती है। इसकी सहायता से वायु की गति प्रति घण्टा किलोमीटर ज्ञात कर लेते है। वात् दिग्दर्शी की तरह इस यंत्र को भी धरातल से लगभग 10 मीटर की ऊँचाई पर लगाते हैं।

ANEMOMETER

 



3.  BAROMETER (वायुदाबमापी यंत्र)

BAROMETER (वायुदाबमापी यंत्र):-

    इस यंत्र द्वारा वायुदाब ज्ञात किया जाता है। ये बैरोमीटर प्रमुखतः दो प्रकार के होते हैं-

(1) पारायुक्त बैरोमीटर एवं

(2) निर्द्रव बैरोमीटर।

     इसके अतिरिक्त, अब स्वतः वायुदाब लेखी (Barograph) का प्रयोग किया जाने लगा है जिनका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

फॉर्टिन वायुदाब मापी (Fortin’s Barometer)-

     फॉर्टिन बैरोमीटर की रचना फॉर्टिन महोदय ने की थी। उसी के नाम पर इसे फॉर्टिन बैरोमीटर कहा जाता है। यह पारायुक्त वायुदाब मापी है। यह साधारण वायुदाब मापी का परिष्कृत रूप है। इसमें 90 सेण्टीमीटर लम्बी एक काँच की नली होती है जिसमें पारा भरा होता है। इस नली का ऊपरी सिरा बन्द तथा निचला खुला रहता है। निचले सिरे पर नोंक बनी रहती है जो पारे में भरे पात्र में डूबी रहती है। इस बर्तन के नीचे एक चमड़े की थैली के नीचे पेंच लगा रहता है जिसको ढीला करने या कसने पर बर्तन में पारे की ऊँचाई को घटाया या बढ़ाया जा सकता है।

      प्याले तथा नली में पारे की तली को बढ़ने के लिए खुली जगह होती है। मापक का शून्य बताने के लिए हाथीदाँत का नोकदार संकेतक होता है जो दाब नापते समय प्याले से भरे हुए पारे के तल को स्पर्श करता है। नली में पारे का तल पढ़ने के लिए वर्नियर कैलिपर्स मापक होता है। यह सारा यत्र धातु के एक पाइप में बन्द रहता है तथा हुकों द्वारा लकड़ी के तख्ते पर कसा रहता है। इस पूरे यंत्र को काँच के एक शोकेस में रखकर दीवाल पर टाँग दिया जाता है।

     सर्वप्रथम संकेतांक की नोंक को पारे के तल पर स्पर्श कराना चाहिए। यह क्रिया नीचे लगे पेंच द्वारा होती है। यह क्रिया शून्य समायोजन (Zero Adjustment) कहलाती है। अब पारे की सतह पढ़ने के लिए वर्नियर अल्पतमांक ज्ञात करते हैं तथा वर्नियर को पारे की ऊपरी सतह से उठाकर तब तक धीरे-धीरे नीचे लाते हैं जब तक कि वह पारे के सर्वोच्च तल को न छूने लगे। मापक तथा वर्नियर दोनों की नाप जोड़ देने पर वायुदाब आ जाता है। कई बार नाप लेकर उसका मध्यमान ज्ञात कर लिया जाता है।

FORTIN’S BAROMETER

        फॉर्टिन बैरोमीटर से वायुदाब लेते समय निम्नांकित सावधानियाँ बरतनी चाहिए-

(1) बैरोमीटर को ऊर्ध्वाधर कर लेना चाहिए।

(2) प्याले में पारे के तल को संकेतक से ठीक-ठीक स्पर्श करना चाहिए।

(3) वर्नियर मापक के निचले सिरे भी नली में पारे के उत्तल तल के उच्चतम बिन्दु से आँख को उसी ऊँचाई पर रखकर स्पर्श करना चाहिए।

      बैरोमीटर (वायुदाबमापी) से निम्न बातों का ज्ञान होता है-

(1) बैरोमीटर से ऊँचाई का ज्ञान होता है-

     जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती जाती है, वायु का दाब कम होता जाता है फलतः बैरोमीटर को ऊँचाई पर ले जाने से उसका पारा धीरे-धीरे गिरने लगता है। समुद्र तल से 900′ ऊँचाई पर बैरोमीटर से पारे की ऊँचाई लगभग 1″ कम हो जाती है। इस प्रकार प्रत्येक 900′ चढ़ने पर ऊँचाई 1″ कम हो जाती है।

(2) बैरोमीटर से आँधी या तूफान आने का ज्ञान प्राप्त होता है-

     यदि बैरोमीटर का पारा शीघ्रता से गिर रहा है तो यह आँधी या तूफान आने का संकेत करता है क्योंकि उस स्थान का दबाव कम होने के कारण बैरोमीटर का पारा एकदम नीचे गिर जाता है। चारों ओर से ऊँचे दबाव वाले स्थानों से पवनें उस स्थान की ओर बड़े वेग से चलने लगती हैं। यही पवनें तूफान व आँधी का स्वरूप धारण कर लेती है।

(3) बैरोमीटर से मौसम की स्वच्छता का ज्ञान होना-

      यदि बैरोमीटर में पारा धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगे तो समझ लीजिए कि मौसम साफ एवं स्वच्छ होने जा रहा है क्योंकि पारे का चढ़ना अधिक दबाव का द्योतक है। दाब बढ़ने पर वायु अन्य स्थानों को बहने लगती है।

(4) वायुमण्डल के नम होने या वर्षा होने का अनुमान किया जाता है-

    जब बैरोमीटर का पारा धीरे-धीरे नीचे गिरता है तो मौसम के नम होने या वर्षा की सम्भावना की जाती है।

(5) तापमान का ज्ञान होता है-

     जैसे-जैसे तापमान बढ़ता जाता है, वायु गरम होकर हल्की हो जाती है और उसका दबाव घटता जाता है जिससे बैरोमीटर में पारा नीचे गिरने लगता है।

निर्द्रव वायुदाब मापी (Aneroid Barometer)-

      एनीरॉइड ग्रीक भाषा के शब्द Aneros से बना है जिसमें ‘A’ का अर्थ नहीं तथा ‘Neros’ का अर्थ द्रव से लगाया जाता है अर्थात् इसमें कोई द्रव नहीं होता है। यह धातु की एक चादर का बना घड़ी के आकार का एक डिब्बा होता है जिसकी सतह लहरदार होती है। यंत्र की हवा यंत्रों द्वारा निकाल दी जाती है। इस डिब्बे का ऊपरी भाग बहुत हल्की चादर का बना होता है जो थोड़े-से दबाव से प्रभावित होता है।

      वायुदाबमापी के डिब्बे के मध्य का सम्बन्ध एक लीवर तथा कमानी द्वारा ऊपरी भाग में लगी सुई से होता है। हवा के दबाव के कारण डिब्बे का ऊपरी भाग ऊपर-नीचे होता है जो ऊपरी भाग में लगी सुई के द्वारा वायुदाब बताता है। ऊपरी भाग पर आँधी, वर्षा, परिवर्तन, बहुत शुष्क आदि चिह्न बने रहते हैं। इस प्रकार इनकी सहायता से मौसम की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

ANEROIDS BAROMETER

वायुदाब लेखी (Barograph)-

     यह आधुनिकतम उपकरण है जिसमें वायुदाब स्वतः अंकित होता है क्योंकि वायुदाब किसी व्यक्ति द्वारा नहीं पढ़ा जाता है अपितु ग्राफ पेपर पर स्वतः अंकित होता रहता है। इसमें एक बेलन के ऊपर ग्राफ पेपर लगा रहता है तथा इसके भीतर एक घड़ी लगी रहती है जो बेलन को घुमाती है। एक सप्ताह में बेलन एक चक्र पूरा कर लेता है।

      इस प्रकार इस यंत्र द्वारा दैनिक वायुदाब सरलता से ज्ञात कर लिया जाता है। इससे आगामी मौसम के बारे में जानकारी प्राप्त करने में अधिक सहायता मिलती है।

वायुदाब का स्वरूप (Nature of Airpressure):-

     वायुदाब का स्वरूप या इसकी मात्रा का रूप दो प्रकार का होता है-

(1) निम्न बायुदाब:-

     निम्न वायुदाब क्षेत्र में समदाब रेखाएँ अण्डाकार या वृत्ताकार होती है। इसमें केन्द्रीय भाग में वायु का दबाव कम (Low Pressure) तथा बाहर वायुदाब अधिक होता है। इसे चक्रवात भी कहते है। ये वर्षा सूचक है क्योंकि हवाएँ बाहर से केन्द्र की ओर चलती हैं।

(2) उच्च वायुदाब:-

     यह अधिक वायुदाब वाले होते हैं जिनके केन्द्रीय भाग में वायु का दबाव अधिक (High Pressure) तथा बाहर वायुदाब कम होता है। यह साफ एवं शुष्क मौसम का सूचक है। इसमें हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर चलती हैं। इन्हें प्रतिचक्रवात कहते हैं।



4. Rain Gauge (वर्षामापी यंत्र)

Rain Gauge (वर्षामापी यंत्र):-

       साधारणतः वर्षामापी कई प्रकार के होते हैं। इस यंत्र द्वारा किसी निश्चित समय में होने वाली वर्षा की मात्रा ज्ञात की जाती है। साधारणतः यह धातु का बेलन के आकार का एक खोल होता है। इसके ऊपरी भाग में एक कीप (Funnel) लगी रहती है। इस कीप का व्यास बेलन के व्यास के बराबर होता है। वर्षा के समय इसे खुले मैदान में रख दिया जाता है जिससे धीरे-धीरे वर्षा का जल इसमें एकत्रित होता रहता है।

       वर्षा समाप्त होने पर इस जल को अलग से काँच के एक बड़े बर्तन में डालते हैं जिसकी आकृति गिलास जैसी होती है, इसे नपना गिलास कहते हैं। इसमें सेण्टीमीटर या इंच के चिह्न लगे रहते हैं जिनसे वर्षा की मात्रा ज्ञात कर लेते हैं।

     ज्ञातव्य है कि जब बेलन तथा कीप के व्यास बराबर होते हैं तो वर्षा की मात्रा आसानी से ज्ञात हो जाती है किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वे दोनों सदैव बराबर हों। नपना गिलास भी विभिन्न प्रकार के वर्षामापियों के लिए भिन्न-भिन्न होते है। यदि फनल तथा नपना गिलास का व्यास पता हो तो निम्न सूत्र द्वारा नपना गिलास में पानी की ऊँचाई ज्ञात की जा सकती है-

नपना गिलास में पानी की ऊँचाई= कीप का व्यास/नपना गिलास का व्यास

RAIN GAUGE

वर्षालेखी (Rainograph)-

      यह स्वतः वर्षालेखी यंत्र होता है जिसमें वर्षा की मात्रा तथा अवधि दोनों का एक ग्राफ पेपर पर स्वतः आलेखन होता है। इसमें एक घूमता हुआ बेलन होता है जो 24 घण्टे में एक पूरा चक्कर कर लेता है। बेलन के चारों ओर एक ग्राफ लगा रहता है।

     इस ग्राफ का सम्बन्ध लीवर द्वारा एक तैरने वाली वस्तु से होता है। लीवर में एक कलम लगी रहती है जो ग्राफ पेपर को स्पर्श करती है। जब वर्षा होती है तो जल कीप द्वारा नीचे बेलन में गिरता है जिससे लीवर में कम्पन होता है जिसका प्रभाव कलम पर पड़ता है। यह कलम ग्राफ पेपर पर आलेखन करती है।



5. Dry and Wet Bulb Thermometer (शुष्क एवं आर्द्र बल्ब तापमापी)

Dry and Wet Bulb Thermometer (शुष्क एवं आर्द्र बल्ब तापमापी):-

      इस तापमापी के द्वारा तापमान तथा आर्द्रता ज्ञात की जाती है। इसमें एक बोर्ड पर दो तापमापी लगे रहते है। इनमें से एक तापमापी का बल्ब शुष्क तथा दूसरे का गीला रखा जाता है। इसे गीला रखने के लिए बल्ब पर मलमल की पतली पट्टी लिपटी रहती है जिसका एक सिरा नीचे पानी से भरे बर्तन में डूबा रहता है, शुष्क तापमापी का तापमान आर्द्र बल्ब के तापमान से सदैव अधिक रहता है। जितनी अधिक वायु शुष्क होगी, उतना ही अधिक दोनों तापमापियों के पाठ्यांकों में अन्तर होगा। किसी समय दोनों तापमापियों के अन्तर की सहायता से वायु की सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) ज्ञात कर लेते हैं।

DRY

AND

WET BULB THERMOMETER

     किसी वायु पुंज में किसी तापमान पर जितनी अधिकतम जलवाष्प समा सकती है और जितने प्रतिशत वायु में उपस्थित है, उसे सापेक्षिक आर्द्रता कहते हैं अर्थात् किसी निश्चित तापमान पर निश्चित आयतन वाली वायु की आर्द्रता शक्ति तथा उसमें उपस्थित आर्द्रता की वास्तविक मात्रा के अनुपात को सापेक्ष या सापेक्षिक आर्द्रता कहा जाता है।

      उदाहरणार्थ, 70° फारेनहाइट पर आर्द्रता सामर्थ्य 8 ग्रेन है, यदि इसकी वास्तविक आर्द्रता 4.1 ग्रेन है तो सापेक्ष आर्द्रता होगी-

सापेक्ष आर्द्रता = निरपेक्ष आर्द्रता / आर्द्रता सामर्थ्य x 100

= 4.1/8×100

= 51.25%

तापमान की मापनियों का परिवर्तन-

      तापमान प्रायः फारनेहाइट, सेण्टीग्रेड तथा रियूमर में ज्ञात किया जाता है। फारनेहाइट पैमाने का आविष्कार जर्मन विद्वान डेनियल फारनेहाइट ने 1714 ई. में किया था। सेण्टीग्रेड मापनी का आविष्कार स्वीडन के प्रसिद्ध खगोलज्ञ एण्डर्स सेल्सियस ने 1742 ई. में किया था। रियूमर मापनी का आविष्कार फ्रांसीसी वैज्ञानिक रियूम ने किया था। इन इकाइयों में नापे गये तापमान को निम्नलिखित सूत्र द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है-

F-32/180 = C/100 = R/80

या

F-32/9 = C/5 = R/4

14. Composition of The Atmosphere (वायुमण्डल का संगठन)

14. Composition of The Atmosphere

(वायुमण्डल का संगठन)


वायुमण्डल ⇒

Composition of The Atmosphere

 

      ठोस पृथ्वी के चारों ओर गैंसों का एक आवरण मिलता है जिसे वायुमण्डल (Atmosphere) कहते हैं। इसकी कई विशेषताएँ है। जैसे:-

वायुमण्डल के ही अंतर्गत कई प्रकार के मौसमी एवं जलवायु सबंधित घटनाएँ घटित होती है।

हमारा वायुमण्डल गैस, जलवाष्प और धुलकण से निर्मित है।

जलवाष्प की उपस्थिति के कारण ही मौसमी घटनायें घटित होती है।

हमारा वायुमंडल कई उप-पेटियों में विभक्त है।

वायुमण्डल में प्रतिरोधात्मक क्षमता है।

गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वायुमंडल पृथ्वी से चिपका हुआ है।

वायुमण्डल में वायुदाब, वायुसंचरण, जलवायु परिवर्तन जैसे गुण पाये जाते हैं।

वायुमण्डल अपने आपको लगातार स्वच्छ बनाए रखता है।

वायुमण्डल का संगठन (Composition of the Atmosphere)

      हमारा वायुमण्डल मुख्यत: गैस, जलवाष्प और धुलकण से निर्मित है। वायुमण्डल को निर्मित करने वाले संघटन की चर्चा नीचे कर रहे हैं-

(1) गैस (Gases)- हमारा वायुमंडल कई प्रकार के गैसों से निर्मित हैं।

क्रम गैस सूत्र आयतन (% में)
1. नाइट्रोजन N2 78.03
2. ऑक्सीजन O2 20.95
3. आर्गन Ar 0.93
4. कार्बन डाई ऑक्साइड CO2 0.036
5. नियॉन Ne 0.002
6. हीलियम He 0.0005
7. क्रिप्टन Kr 0.001
8. जेनन Xe 0.00009
9. हाइड्रोजन H2 0.00005

       उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि वायुमण्डल में नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक है। वायुमण्डल में यह दो कार्यों को सम्पन्न करता है-

(i) ऑक्सीकरण की क्रिया को मंद करता है या रोकता है।

(ii) नाइट्रोजन चक्र को संचालित करता है।

हमारे वायुमण्डल में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण गैस ऑक्सीजन है जो ऑक्सीकरण तथा प्रज्वलन की क्रिया में मदद करता है। साथ ही जैविक श्वसन क्रिया का प्रमुख आधार है।

हमारे वायुमण्डल में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण गैस अक्रिय गैसे हैं। जैसे- आर्गन, नियॉन इत्यादि।

सभी अक्रिय गैसों को मिलाने पर वायुमण्डल में इनकी मात्रा 1% है। इनमें भी सर्वाधिक आर्गन (0.93%) है। ये वायुमण्डल में अति अल्प मात्रा में मौजूद है। वायुमण्डल में रहकर यह कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ को निष्क्रिय करती है।

हमारे वायुमण्डल में ऑक्सीजन का एक अपरूप ओजोन (O3) के रूप में मौजूद है।

यह गैस समताप मण्डल के ओजोन परत में पायी जाती है।

यह सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को शोखकर पृथ्वी को सुरक्षित करती है, इसलिए ओजन परत को “वायुमण्डल का छतरी” कहा जाता है।

हमारे वायुमण्डल का अगला महत्वपूर्ण गैस ग्रीनहाउस गैसें हैं।

इसके अंतर्गत CO2, CO, CFC, CH4 (मिथेन) जैसे गैसों को शामिल करते हैं।

इनमें सिर्फ CO2 को छोड़कर शेष सभी गैस वायुमण्डल में प्रदूषक के रूप में मौजूद रहते हैं।

CO2 गैस प्राकृतिक रुप से वायुमण्डल में मौजूद रहता है।

CO2 गैस ही पार्थिव विकिरण को अवशोषित कर वायुमण्डल को गर्म बनाये रखता है।

CO2 को “वायुमण्डल का कम्बल” भी कहा जाता है।

अंतिम महत्वपूर्ण गैस हाइड्रोजन है जो जलवाष्प एवं जल के निर्माण में मदद करता है।

       सामान्यतः समुद्रतल से 80 Km की ऊँचाई तक गैस समान अनुपात में पाये जाते हैं लेकिन उसके बाद गैंसों का भिन्न -2 स्तर पाया जाता है। जैसे:-

      ऊँचाई               गैसों का स्तर
(i) 90 – 200 किमी०- N2 गैस के अणुओं का स्तर
(ii) 200-400 किमी०- O2 गैस के परमाणु का स्तर
(iii) 1100-3500 किमी०- He गैस का स्तर
(iv) 3500-10000 किमी०- H2 परमाणु का स्तर

(2) जलवाष्प (Water Vapour)-

जलवाष्प हमारे वायुमण्डल का दूसरा प्रमुख संघटक है।

यह वायुमण्डल में 12 किमी० की ऊँचाई तक पायी जाती है। लेकिन 90% हिस्सा 8 किमी० की ऊँचाई तक ही मिलती है।

कभी-2 वायु में चलने वाले संवहन तरंगों के कारण जलवाष्प को 50 किमी० की ऊँचाई तक पहुँचा दी जाती है।

ये जलवाष्प ब्रह्माण्डीय धुल-कणों के साथ मिलकर विश्व में सबसे ऊँचाई पर मिलने वाले बादल “निशा दीप्ति बादल” का निर्माण करती है।

वायुमण्डलीय जलवाष्प के कारण ही वर्षण क्रिया, बादल निर्माण क्रिया, कुहरा, कुहासा, ओस और आर्द्रण की क्रिया होती है।

वायुमण्डल में जलवाष्प की आपूर्ति पृथ्वी के धरातल से ही वाष्पोत्सर्जन, वाष्पीकरण, उर्ध्वपातन (ठोस से गैस) की क्रिया द्वारा होता है।

नोट: वाष्पोत्सर्जन की दर को जिस यंत्र द्वारा मापा जा सकता है उसे पोटोमीटर कहते हैं।

(3) धुलकण (Dust Particle)-

वायुमण्डल का तीसरा सबसे प्रमुख संघटक धूलकण है।

वायुमण्डल में इसकी आपूर्ति दो स्थानों से होती है- ब्रह्माण्ड और पृथ्वी के धरातल से।

ब्रह्मण्ड से मिलने वाले धुलकण को ब्रह्मण्डलीय धूलकण कहते हैं।

ये धुलकण दूसरे ग्रह, उपग्रह से विखण्डित होकर पृथ्वी पर गिरने वाला पदार्थ है।

कभी-2 इनके आकार इतनी बड़ी होती है कि पृथ्वी पर उल्का वृष्टि की घटना घटती है।

पार्थिव धूलकण का मुख्य स्रोत धरातल है।

ये परागण एवं हाइग्रोस्कोपिक (आर्द्रताग्राही) कण के रूप में मौजूद रहते हैं।

वायुमण्डल में सर्वाधिक धुलकण की आपूर्ति समुद्र तटीय भागों से होती है।

ये धूलकण वायुमंडल में जाकर जल की तुलना में पहले ठण्डी होने की प्रवृत्ति रखते हैं। इस कणों के इर्द-गिर्द आर्द्रता या जलवाष्प का संघनन होने लगता है जिससे जलबून्दों का निर्माण होने लगता है।

सामान्य तौर पर वायुमण्डल में 12 Km की ऊँचाई तक धूलकण पाये जाते हैं लेकिन इसका अधिकांश भाग 5 किमी० की ऊँचाई तक मिलते हैं।

निष्कर्ष:

        सैद्धांतिक रूप से हमारा वायुमण्डल गैस, जलवाष्प और धूलकण से निर्मित है। लेकिन तीव्र औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, बढ़ती जनसंख्या इत्यादि के कारण कई प्रदूषक तत्व वायुमण्डल में छोड़े जा रहे हैं जिसके कारण वायु प्रदूषण, ओजोन क्षरण, ग्लोबल वार्मिंग, अम्ल वर्षा जैसी घटनायें घटित हो ही हैं। अत: आवश्यकता इस बात का है कि वायुमण्डल में मौजूद गैस, जलवाष्प एवं धुलकण के अनुपात को नियत बनाकर खा जाय।



वायुमण्डल का संगठन से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. पृथ्वी के वायुमण्डल का कितना प्रतिशत भाग 29 km की ऊँचाई तक पाया जाता है?

[A] 29%
[B] 57%
[C] 76%
[D] 97%

[read more] [D] 97% [/read]

2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] वायुमण्डल की ऊपरी सीमा लगभग 10,000 km की ऊँचाई तक है।
[B] वायुमण्डल का 50% भाग 5-6 km की ऊँचाई तक सीमित है।
[C] ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि होती है।
[D] वायुमण्डल के निचले स्तर में भारी गैस एवं ऊपरी स्तर में हल्की गैसों की प्रधानता है।

[read more] [C] ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि होती है। [/read]

3. वायुमण्डल का सर्वाधिक स्थायी तत्व है-

[A] नाइट्रोजन
[B] ऑक्सीजन
[C] कार्बन डाइऑक्साइड
[D] जलवाष्प

[read more] [D] जलवाष्प [/read]

4. वायुमण्डल में सर्वाधिक कौन-सी गैस मिलती है?

[A] ऑक्सीजन
[B] हाइड्रोजन
[C] नाइट्रोजन
[D] कार्बन डाइऑक्साइड

[read more] [C] नाइट्रोजन [/read]

5. वायुमण्डल में सर्वाधिक मात्रा में विद्यमान अक्रिय गैस कौन-सी है?

[A] ऑर्गन
[B] क्रिप्टॉन
[C] हीलियम
[D] नियॉन

[read more] [A] ऑर्गन [/read]

6. वायुमण्डल मुख्यतः गर्म होता है-

[A] सूर्य की सीधी किरणों से
[B] पृथ्वी से विकिरण द्वारा
[C] पृथ्वी के अंदर की ऊष्मा से
[D] पृथ्वी की गति के घर्षण से

[read more] [B] पृथ्वी से विकिरण द्वारा [/read]

7. निम्न में से कौन-सा युग्म वायुमण्डल की गैसों की बढ़ती मात्रा को दर्शाता है?

[A] ओजोन, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन
[B] नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन
[C] कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन
[D] आर्गन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड

[read more] [A] ओजोन, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन [/read]

8. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस ग्रीन हाऊस प्रभाव के लिये उत्तरदायी है?

[A] क्लोरीन
[B] ऑक्सीजन
[C] कार्बन डाइऑक्साइड
[D] हाइड्रोजन

[read more] [C] कार्बन डाइऑक्साइड [/read]

9. सूर्य की तीव्र किरणों द्वारा झुलसने से वायुमण्डल की कौन-सी गैस हमारी रक्षा करती है?

[A] ऑक्सीजन
[B] नाइट्रोजन
[C] ओजोन
[D] आर्गन

[read more] [C] ओजोन [/read]

10. पृथ्वी के वायुमण्डल में पायी जाने वाली निम्नलिखित गैसों का सही अवरोही क्रम क्या होगा?

1. नाइट्रोजन 2. कार्बन डाइऑक्साइड 3. ऑक्सीजन 4. आर्गन 5. नियॉन

कूट :

[A] 1, 3, 2, 4, 5
[B] 1, 3, 4, 2, 5
[C] 1,3, 2, 5, 4
[D] 1, 2, 3, 5, 4

[read more] [B] 1, 3, 4, 2, 5 [/read]

11. भू-पृष्ठ से परावर्तित अवरक्त विकिरण के अवशोषण द्वारा भू-वायुमण्डल के तापमान में वृद्धि की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?

[A] सुनामी
[B] ग्रीन हाउस प्रभाव
[C] सौर तापन
[D] भूकम्पीय प्रभाव

[read more] [B] ग्रीन हाउस प्रभाव [/read]

12. वायुमण्डल में नाइट्रोजन की प्रतिशतता है-

[A] 70%
[B] 71%
[C] 78%
[D] 21%

[read more] [C] 78% [/read]

13. पृथ्वी के धरातल से ऊपर की ओर वायुमण्डल के विभिन्न स्तरों का सही अनुक्रम है-

[A] क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, आयन मण्डल, मध्य मण्डल
[B] समताप मण्डल, क्षोभ मण्डल, आयन मण्डल, मध्य मण्डल
[C] क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल
[D] समताप मण्डल, क्षोभ मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल

[read more] [C] क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल [/read]

14. वायुमण्डल को क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल आदि परतों में विभाजित करने का मुख्य आधार क्या है?

[A] तापमान
[B] वायुदाब
[C] संघटन
[D] घनत्व

[read more] [A] तापमान [/read] 

15. क्षोभ मण्डल की धरातल से औसत ऊँचाई लगभग कितनी है?

[A] 8 किमी०
[B] 18 किमी०
[C] 22 किमी०
[D] 14 किमी०

[read more] [D] 14 किमी० [/read]

16. निम्नलिखित में से किस मण्डल को संवहन मण्डल भी कहा जाता है?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] आयन मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] मध्य मण्डल

[read more] [A] क्षोभ मण्डल [/read]

17. किस ऋतु में क्षोभ मण्डल की ऊँचाई में वृद्धि हो जाती है?

[A] शीत ऋतु
[B] वर्षा ऋतु
[C] ग्रीष्म ऋतु
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] ग्रीष्म ऋतु [/read]

18. क्षोभ मण्डल की धरातल से अधिकतम ऊँचाई है-

[A] 6 किमी०
[B] 12 किमी०
[C] 8 किमी०
[D] 18 किमी०

[read more] [D] 18 किमी० [/read]

19. क्षोभ मण्डल में तापमान की सामान्य ह्रास की 1°C प्रत्येक-

[A] 146 मी० हेतु
[B] 165 मी० हेतु
[C] 156 मी० हेतु
[D] 176 मी० हेतु

[read more] [B] 165 मी० हेतु [/read]

20. क्षोभ मण्डल के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] यह वायुमण्डल का सघनतम परत है।
[B] बादलों का निर्माण क्षोभ मण्डल में ही होता है।
[C] क्षोभ मण्डल की ऊपरी सीमा पर समताप सीमा स्थित है।
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] क्षोभ मण्डल की ऊपरी सीमा पर समताप सीमा स्थित है। [/read]

21. क्षोभ मण्डल एवं समताप मण्डल के बीच स्थित संक्रमण क्षेत्र को क्या कहा जाता है?

[A] समताप सीमा
[B] मध्य सीमा
[C] क्षोभ सीमा
[D] बाह्य सीमा

[read more] [C] क्षोभ सीमा [/read]

22. पृथ्वी के वायुमण्डल का सर्वाधिक घनत्व कहाँ पर होता है?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] मध्य मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] आयन मण्डल

[read more] [A] क्षोभ मण्डल [/read]

23. वायुमण्डल में दैनिक मौसम परिवर्तन निम्नलिखित में से किसके कारण होते हैं?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] आयन मण्डल
[C] मध्य मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [A] क्षोभ मण्डल [/read] 

24. क्षोभ मण्डल (Troposphere) वायुमण्डल का निचला स्तर है जिसकी ऊँचाई भूमध्य रेखा पर होती है-

[A] 10 मील तक
[B] 6 मील तक
[C] 9 मील तक
[D] 4 मील तक

[read more] [A] 10 मील तक [/read]

25. मेघ गर्जन वायुमण्डल की किस परत में होता है?

[A] आयन मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] ओजोन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [B] क्षोभ मण्डल [/read]

26. परिवर्तन मण्डल या क्षोभ मण्डल में तापमान-

[A] ऊँचाई के साथ घटता है।
[B] ऊँचाई के साथ बढ़ता है
[C] अपरिवर्तित रहता है।
[D] पहले घटता है पुनः बढ़ता है।

[read more] [A] ऊँचाई के साथ घटता है। [/read]

27. समताप मण्डल (Stratosphere) है-

[A] वायुमण्डल का मध्यस्थ प्रदेश
[B] वायुमण्डल का ऊपरी प्रदेश
[C] वायुमण्डल का निचला प्रदेश
[D] क्षोभ सीमा के ऊपर स्थित प्रदेश

[read more] [D] क्षोभ सीमा के ऊपर स्थित प्रदेश [/read]

28. वायुमण्डल की किस सतह में तापमान में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता?

[A] समताप मण्डल
[B] बाह्य मण्डल
[C] क्षोभ मण्डल
[D] ताप मण्डल

[read more] [A] समताप मण्डल [/read] 

29. ओजोन परत अवस्थित है-

[A] क्षोभ मण्डल में
[B] क्षोभ सीमा में
[C] समताप मण्डल में
[D] प्रकाश मण्डल में

[read more] [C] समताप मण्डल में [/read]

30. समताप मण्डल में ओजोन परत का कार्य है-

[A] भूमण्डलीय ताप को स्थिर रखना
[B] भूकम्पों की आवृति को घटाना
[C] मानसूनों की विफलता को बचाना
[D] भूतल पर पराबैंगनी विकिरणपात को रोकना

[read more] [D] भूतल पर पराबैंगनी विकिरणपात को रोकना [/read]

31. सुपर सोनिक (Supersonic) विमानों की उड़ान के लिये सर्वाधिक सुविधाजनक वायुमण्डलीय परत है-

[A] क्षोभ मण्डल
[B] मध्य मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] आयन मण्डल

[read more] [C] समताप मण्डल [/read]

32. समताप मंडल के सम्बन्ध में निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] समताप मण्डल का विस्तार 50 किमी० की ऊँचाई तक पाया जाता है।
[B] समताप मंडल की सीमा आयन मण्डल से मिलती है।
[C] इस मण्डल में बादलों का अभाव पाया जाता है।
[D] इस मण्डल में धूल कण और जलवाष्प की मात्रा काफी कम होती है।

[read more] [B] समताप मंडल की सीमा आयन मण्डल से मिलती है। [/read]

33. ओजोन परत के प्रतिवर्ष 7 प्रतिशत की दर से अवक्षय के कारण उसमें 10 मिलियन वर्ग किमी० आकार का एक बड़ा छिद्र बन गया है। यह छिद्र अवस्थित है-

[A] आर्कटिक के ऊपर
[B] ध्रुवों के ऊपर
[C] अंटार्कटिका के ऊपर
[D] अमेरिका एवं यूरोप के ऊपर

[read more] [C] अंटार्कटिका के ऊपर [/read]

34. दीर्घ रेडियो तरंगें पृथ्वी की किस सतह से परावर्तित होती है?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] क्षोभ सीमा
[C] आयन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [C] आयन मण्डल [/read]

35. संचार उपग्रह किस वायुमण्डलीय स्तर में स्थित होते हैं?

[A] समताप मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] आयन मण्डल
[D] बर्हिमण्डल

[read more] [C] आयन मण्डल [/read]

36. वायुमण्डल में ओजोन स्तर के अवक्षय का कारण निम्नलिखित में से कौन-सा रसायन है?

[A] सल्फर डाइऑक्साइड
[B] कार्बन डाइऑक्साइड
[C] नाइट्रस ऑक्साइड
[D] क्लोरो-फ्लोरो कार्बन

[read more] [D] क्लोरो-फ्लोरो कार्बन [/read]

37. रेडियो की लघु तरंगें आयन मण्डल की किस परत से परावर्तित होकर धरातल पर आती है?

[A] S परत
[B] E परत
[C] F परत
[D] D परत

[read more] [C] F परत [/read]

38. ऊपर से नीचे की ओर वायुमण्डल की विभिन्न परतों की सीमाओं (Pause) का कौन-सा क्रम सही है?

[A] मैग्निटोपॉज, मेसोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज
[B] मेसोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज, मैग्निटोपॉज
[C] ट्रोपोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, मेसोपॉज, मैग्निटोपॉज
[D] स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज, मैग्निटोपॉज, मेसोपॉज

[read more] [A] मैग्निटोपॉज, मेसोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज [/read]

39. वायुमण्डल के किस भाग में जलवाष्प की कुल मात्रा का 90 प्रतिशत भाग विद्यमान रहता है?

[A] आयन मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] ओजोन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [B] क्षोभ मण्डल [/read]

40. वायुमण्डल के किस परत को रसायन मण्डल कहते हैं?

[A] मध्य मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] आयन मण्डल
[D] ओजोन मण्डल

[read more] [A] मध्य मण्डल [/read]

41. किस वायुमण्डलीय परत को ‘मौसमी परिवर्तन की छत’ के नाम से जाना जाता है?

[A] समताप मण्डल
[B] आयन मण्डल
[C] क्षोभ मण्डल
[D] मध्य मण्डल

[read more] [C] क्षोभ मण्डल [/read]

42. हवाई जहाज प्राय: किस मण्डल में उड़ते हैं-

[A] क्षोभ मण्डल
[B] मध्य मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] बाह्य मण्डल

[read more] [C] समताप मण्डल [/read]

43. वायुमण्डल की सबसे निचली परत कहलाती है-

[A] मध्य मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] आयन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [B] क्षोभ मण्डल [/read]

44. पृथ्वी की सतह से सबसे दूर वायुमण्डलीय परत किस नाम से विदित है?

[A] आयन मण्डल
[B] समताप मण्डल
[C] बहिर्मण्डल
[D] क्षोभ मण्डल

[read more] [C] बहिर्मण्डल [/read]

45. वायुमण्डल में सबसे अधिक ओजोन कहाँ पर केन्द्रित है?

[A] आयनोस्फीयर
[B] स्ट्रेटोस्फीयर
[C] मीसोस्फीयर
[D] ट्रोपोस्फीयर

[read more] [B] स्ट्रेटोस्फीयर [/read]

46. समुद्रतल पर औसत वायुदाब कितना होता है?

[A] 1003.25 मिलीबार
[B] 1023.25 मिलीबार
[C] 1013.25 मिलीबार
[D] 1034.25 मिलीबार

[read more] [C] 1013.25 मिलीबार [/read]

47. वायुदाब प्रायः सर्वाधिक होता है जब वायु होती है-

[A] ठण्डी तथा शुष्क
[B] उष्ण तथा शुष्क
[C] ठण्डी तथा नम
[D] उष्ण तथा नम

[read more] [A] ठण्डी तथा शुष्क [/read]

48. वायुदाब में अचानक आने वाली कमी निम्न में से किसका सूचक होती है?

[A] स्वच्छ मौसम
[B] अत्यधिक शीतल मौसम
[C] तूफानी मौसम
[D] वर्षा का मौसम

[read more] [C] तूफानी मौसम [/read]

49. सामान्य वायुदाब पाया जाता है-

[A] पर्वतों पर
[B] सागरतल पर
[C] रेगिस्तान में
[D] धरातल के 5 km ऊपर

[read more] [B] सागरतल पर [/read]

50. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

[A] सागर तल पर वायुदाब अधिकतम होता है।
[B] वायुदाब को मिलीबार (mb) में मापा जाता है।
[C] किसी भी स्थान पर वायुदाब दो बार बढ़ता एवं दो बार घटता है।
[D] उपर्युक्त सभी।

[read more] [D] उपर्युक्त सभी। [/read]

51. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

[A] वायुदाब के घटने-बढ़ने की क्रिया को ‘वायुदाब उच्चावचन’ (Barometric tide) कहते हैं।
[B] वायुदाब में उतार-चढ़ाव विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर कम होता जाता हैं।
[C] 60° अक्षांश के बाद वायुदाब का दैनिक उतार चढ़ाव नहीं देखा जाता है।
[D] उपर्युक्त सभी।

[read more] [D] उपर्युक्त सभी। [/read] 

52. ग्लोब पर दाब कटिबंधों (pressure belts) की संख्या कितनी है?

[A] 5
[B] 6
[C] 7
[D] 9

[read more] [C] 7 [/read]

53. विषुवतीय निम्न दाब पेटी का विस्तार विषुवत रेखा के दोनों ओर कितने अक्षांश तक मिलता है?

[A] 5°
[B] 10°
[C] 15°
[D] 20°

[read more] [A] 5° [/read]

54. डोलड्रम पेटी का विस्तार सामान्यतः पाया जाता है-

[A] 0° – 5° उत्तर
[B] 0° – 5° दक्षिण
[C] 0°- 10° उत्तर
[D] 5°N – 5° दक्षिण

[read more] [D] 5°N – 5° दक्षिण [/read]

55. डोलड्रम क्षेत्र की विशेषता होती है-

[A] निम्न दाब एवं वायु का अवतलन
[B] निम्न दाब एवं मन्द पूर्वी पवन
[C] सामान्य दाब एवं वायु का अवतलन
[D] निम्न दाब एवं शान्त पवन

[read more] [D] निम्न दाब एवं शान्त पवन [/read]

56. शांत पेटी किस रेखा के दोनों ओर पायी जाती है?

[A] भूमध्य रेखा
[B] कर्क रेखा
[C] मकर रेखा
[D] आर्कटिक वृत्त

[read more] [A] भूमध्य रेखा [/read]

57. विश्व के सभी उष्ण मरुस्थल निम्न में से किस पेटी में स्थित हैं?

[A] विषुवतीय निम्न दाब पेटी
[B] उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटी
[C] उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी
[D] ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी

[read more] [B] उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटी [/read]

13. Structure of The Atmosphere (वायुमण्डल की संरचना)

13. Structure of The Atmosphere

(वायुमण्डल की संरचना)


वायुमण्डल की संरचना-

         हमारी पृथ्वी वायु की एक पतली परत से चरों ओर से घिरी हुई है जिसका विस्तार पृथ्वी की सतह से कई किलोमीटर ऊपर तक है, जिसे वायुमंडल कहते हैं।

हमारे वायुमंडल की उत्पत्ति लगभग 1 अरब वर्ष पहले हुआ। लेकिन वर्तमान स्वरूप में 58 करोड़ वर्ष पूर्व में आया।

अमेरिकी भूगोलवेता स्ट्रॉलर के अनुसार धरातल से 80 हजार किमी० की ऊँचाई तक वायुमंडल मौजूद है। 

आयतन के दृष्टिकोण से 97% हिस्सा 29 किमी० की ऊँचाई तक और द्रव्यमान के दृष्टिकोण से 50% हिस्सा 5.6 किमी० की ऊँचाई तक मौजूद है।

हमारे वायुमंडल में 95% हिस्सा गैसों का और 5% जलवाष्प एवं धूलकणों का है।

      वायुमण्डल की संरचना का अध्ययन कई विधियों से सम्पन्न किया गया है जिससे ज्ञात होता है कि हमारा वायुमण्डल कई सकेन्द्रीय पेटियों में विभक्त है। जैसे:-

(A) प्रमुख मण्डल

(1) क्षोभ मण्डल / परिवर्तन मण्डल

(2) समताप मण्डल

(3) मध्य मण्डल

(4) ताप या आयन मण्डल

(5) बर्हिमण्डल

(6) चुम्बकीय मण्डल

(B) गौण मण्डल

(i) क्षोभ सीमा

(ii) समताप सीमा

(iii) मध्य सीमा

Structure of The Atmosphere

(1) क्षोभ मण्डल / परिवर्तन मण्डल (Troposphere):-             

यह वायुमण्डल का सबसे नीचला परत है जो धरातल से 8 से 18 किमी० की ऊँचाई तक पायी जाती है।

सूर्य के तापीय प्रभाव के कारण विषुवत रेखा पर इसकी ऊँचाई अधिक 18 किमी० और ध्रुवों पर 8 किमी० है।

इसमें सम्पूर्ण वायुमंडल का 75% भार पाया जाता है।

सभी प्रकार की मौसमी घटनाएँ इसी मण्डल में घटित होती हैं। जैसे:- बादल का फटना, वर्षण, कुहरा, कुहासा आदि।      

क्षोभमण्डल के ऊपरी भाग में तेज गति से चलने वाली वायु को जेटस्ट्रीम कहते है।

क्षोभमण्डल में नीचे से ऊपर जाने पर तापमान में कमी प्रति 165 मी० की ऊँचाई पर 1ºC और प्रत्येक 1,000 मी० पर 6.5ºC या प्रति 1 हजार फीट की ऊँचाई पर 3.6ºF की कमी आती है।

क्षोभमण्डल के ऊपरी भाग में तापमान घटकर -45°C से -80°C तक पहुँच जाता है।

अत्याधिक मौसमी घटनायें घटित होने के कारण इसे परिवर्तन मंडल भी कहते हैं।

(2) समताप मण्डल (Stratosphere):-

यह मण्डल क्षोभमण्डल के ऊपरी भाग में पायी जाती है।

इसका अधिकतम ऊपरी विस्तार धरातल से 50 km तक है।

इस मण्डल में ओजोन गैस की उपस्थिति के कारण बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापमान में बढ़ोतरी होती है।

इस मण्डल के ऊपरी भाग में तापमान बढ़‌कर 0°C तक पहुँच जाता है।

समताप मण्डल में 25-35 km के बीच ओजोन गैस की एक घना परत पायी जाती है जो सूर्य से आने वाली पराबैगनी किरणों को अवशोषित कर धरातल को सुरक्षित रखती है।

ओजोन परत का सर्वप्रथम खोज रामसन महोदय ने किया था।           

समताप मंडल प्राय: जलवाष्प, धूलकण से रहित होता है। परन्तु कभी-2 इस मण्डल में हल्के मेघ का निर्माण होता है जिसे Mother of Pearl Cloud कहते हैं।

(3) मध्यमण्डल (Mesosphere):-

मध्यमण्डल धरातल से 80km की ऊँचाई तक पायी जाती है।

इस मंडल में बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आती है।

मध्यमण्डल के ऊपरी भाग में तापमान घटकर -80°C से -100°C तक पहुँच जाता है।

इस मण्डल में ब्रह्माण्डलीय धूल कण के कारण Noctilucent Cloud “निशादीप्ति बादल” का निर्माण होता है।

(4) तापमंडल (Thermosphere) / आयनमंडल (Inosphere):-

ताप या आयनमण्डल मध्यमंडल के ऊपरी भाग में पायी जाती है।

इसकी ऊपरी सीमा धरातल से 500 km की ऊँचाई तक पायी जाती है।

इस मंडल में तापमान बढ़‌कर 25°C तक पहुँच जाता है।

इसमें आयनीकृत गैस पाये जाते हैं, इसलिए इसे आयनमंडल भी कहते हैं।

इसमें ध्रुवीय ज्योति की घटना घटती है जिसे उत्तरी गोलार्द्ध में “अरोरा बोरियालेसिस” और दक्षिणी गोलार्द्ध में अरोरा ऑस्ट्रेलेसिते हैं।

⇒ तापमंडल को पुन: कई परतों में बांटा जाता है। जैसेः-

क्रम उप परत मोटाई विशेषता
1  D परत 80-90 किमी० सूर्यास्त के समय समाप्त हो जाता है।

यह लघु रेडियों तरंगों को परावर्तित करता है।

2 E परत 90-130 किमी० इसे क्रनेली हेवीसाइट परत भी कहते है।

इसमें मध्यम एवं दीर्घ रेडियों तरंगों का परावर्तन होता है।

3 विशिष्ट E परत 110 किमी० उल्का पिंड घुसने के दौरान बनता है।
4 E परत 150 किमी० इसे एफलिटन परत भी कहते है।
5 F1 तथा F2 परत 150-380 किमी० इसे Appleton परत भी कहते है।

यह परत सूर्य धब्बा दिखाई देने के दौरान बनता है।

6 G परत 400-500 किमी०

यह सभी प्रकार के रेडियों तरंगों का परावर्तन करता है।

 

(5) बर्हिमण्डल / आयतन मण्डल (Exosphere):-

धरातल से बर्हिमण्डल की ऊँचाई 2000 km तक है।

इसकी ऊपरी सीमा पर तापमान बढ़कर 1000ºC तक पहुँच जाता है।

इस मंडल में गैसों का इतना आयनीकरण हो जाता है कि गैस के अणु परमाणु के रूप में मिलने लगते है।

इसी मण्डल में गैसों के अलग-अलग परत पाये जाते हैं।

(6) चुम्बकीय मण्डल:-

यह वायुमंडल का सबसे उपरी परत है।

इसकी ऊपरी सीमा 80 हजार किमी० तक संभावित है।

इस मंडल को कुछ विद्वान वायुमण्डल का हिस्सा नहीं मानते हैं।

इस मंडल में गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव नगण्य हो जाता है।

इस मंडल में गैस के अणु इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटोन में टूट जाते हैं।

इस मंडल में विभिन्न प्रकार के कॉस्मिक किरणों का प्रभाव होता है। इस मंडल में सौर लपट का प्रभाव पड़ता है।

(B) गौण मण्डल- उपरोक्त प्रमुख मंडलों के अलावे भी तीन गौण मंडल भी पाये जाते हैं। जैसे:-

(i) क्षोभ सीमा

स्थिति- क्षोभ मंडल और समताप मंडल के बीच की संक्रमण की पेटी

मोटाई-1.5 किमी०

(ii) समताप सीमा

समताप मंडल और मध्यमंडल के बीच की संक्रमण की पेटी

मोटाई-5 किमी०

(iii) मध्य सीमा

मध्यमंडल और तापमंडल के बीच की संक्रमण की पेटी

मोटाई-10 किमी०           

ये तीनों पेटियाँ एक संक्रमण पेटी के समान है जिसमें किसी भी प्रकार की मौसमी घटनाएँ नहीं घटती है।

       रासायनिक संघटन के दृष्टिकोण से वायुमण्डल को दो भागों में बाँटते है :-

(1) सममण्डल:-

         इसके अंतर्गत क्षोभ मंडल, समताप मंडल और मध्यमंडल को शामिल किया जाता है। इसमें गैसों का अनुपात एक समान रहता है।

(2) विषममण्डल:-

इसके अंतर्गत तापमंडल, बर्हिमण्डल एवं चुम्बकीय मण्डल को शामिल करते हैं।

इसमें बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ गैसों के अनुपात में परिवर्तन होते हता है।



वायुमण्डल की संरचना  से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. पृथ्वी के वायुमण्डल का कितना प्रतिशत भाग 29 km की ऊँचाई तक पाया जाता है?

[A] 29%
[B] 57%
[C] 76%
[D] 97%

[read more] [D] 97% [/read]

2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] वायुमण्डल की ऊपरी सीमा लगभग 10,000 km की ऊँचाई तक है।
[B] वायुमण्डल का 50% भाग 5-6 km की ऊँचाई तक सीमित है।
[C] ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि होती है।
[D] वायुमण्डल के निचले स्तर में भारी गैस एवं ऊपरी स्तर में हल्की गैसों की प्रधानता है।

[read more] [C] ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि होती है। [/read]

3. वायुमण्डल का सर्वाधिक स्थायी तत्व है-

[A] नाइट्रोजन
[B] ऑक्सीजन
[C] कार्बन डाइऑक्साइड
[D] जलवाष्प

[read more] [D] जलवाष्प [/read]

4. वायुमण्डल में सर्वाधिक कौन-सी गैस मिलती है?

[A] ऑक्सीजन
[B] हाइड्रोजन
[C] नाइट्रोजन
[D] कार्बन डाइऑक्साइड

[read more] [C] नाइट्रोजन [/read]

5. वायुमण्डल में सर्वाधिक मात्रा में विद्यमान अक्रिय गैस कौन-सी है?

[A] ऑर्गन
[B] क्रिप्टॉन
[C] हीलियम
[D] नियॉन

[read more] [A] ऑर्गन [/read]

6. वायुमण्डल मुख्यतः गर्म होता है-

[A] सूर्य की सीधी किरणों से
[B] पृथ्वी से विकिरण द्वारा
[C] पृथ्वी के अंदर की ऊष्मा से
[D] पृथ्वी की गति के घर्षण से

[read more] [B] पृथ्वी से विकिरण द्वारा [/read]

7. निम्न में से कौन-सा युग्म वायुमण्डल की गैसों की बढ़ती मात्रा को दर्शाता है?

[A] ओजोन, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन
[B] नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन
[C] कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन
[D] आर्गन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड

[read more] [A] ओजोन, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन [/read]

8. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस ग्रीन हाऊस प्रभाव के लिये उत्तरदायी है?

[A] क्लोरीन
[B] ऑक्सीजन
[C] कार्बन डाइऑक्साइड
[D] हाइड्रोजन

[read more] [C] कार्बन डाइऑक्साइड [/read]

9. सूर्य की तीव्र किरणों द्वारा झुलसने से वायुमण्डल की कौन-सी गैस हमारी रक्षा करती है?

[A] ऑक्सीजन
[B] नाइट्रोजन
[C] ओजोन
[D] आर्गन

[read more] [C] ओजोन [/read]

10. पृथ्वी के वायुमण्डल में पायी जाने वाली निम्नलिखित गैसों का सही अवरोही क्रम क्या होगा?

1. नाइट्रोजन 2. कार्बन डाइऑक्साइड 3. ऑक्सीजन 4. आर्गन 5. नियॉन

कूट :

[A] 1, 3, 2, 4, 5
[B] 1, 3, 4, 2, 5
[C] 1,3, 2, 5, 4
[D] 1, 2, 3, 5, 4

[read more] [B] 1, 3, 4, 2, 5 [/read]

11. भू-पृष्ठ से परावर्तित अवरक्त विकिरण के अवशोषण द्वारा भू-वायुमण्डल के तापमान में वृद्धि की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?

[A] सुनामी
[B] ग्रीन हाउस प्रभाव
[C] सौर तापन
[D] भूकम्पीय प्रभाव

[read more] [B] ग्रीन हाउस प्रभाव [/read]

12. वायुमण्डल में नाइट्रोजन की प्रतिशतता है-

[A] 70%
[B] 71%
[C] 78%
[D] 21%

[read more] [C] 78% [/read]

13. पृथ्वी के धरातल से ऊपर की ओर वायुमण्डल के विभिन्न स्तरों का सही अनुक्रम है-

[A] क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, आयन मण्डल, मध्य मण्डल
[B] समताप मण्डल, क्षोभ मण्डल, आयन मण्डल, मध्य मण्डल
[C] क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल
[D] समताप मण्डल, क्षोभ मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल

[read more] [C] क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल [/read]

14. वायुमण्डल को क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल आदि परतों में विभाजित करने का मुख्य आधार क्या है?

[A] तापमान
[B] वायुदाब
[C] संघटन
[D] घनत्व

[read more] [A] तापमान [/read] 

15. क्षोभ मण्डल की धरातल से औसत ऊँचाई लगभग कितनी है?

[A] 8 किमी०
[B] 18 किमी०
[C] 22 किमी०
[D] 14 किमी०

[read more] [D] 14 किमी० [/read]

16. निम्नलिखित में से किस मण्डल को संवहन मण्डल भी कहा जाता है?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] आयन मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] मध्य मण्डल

[read more] [A] क्षोभ मण्डल [/read]

17. किस ऋतु में क्षोभ मण्डल की ऊँचाई में वृद्धि हो जाती है?

[A] शीत ऋतु
[B] वर्षा ऋतु
[C] ग्रीष्म ऋतु
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] ग्रीष्म ऋतु [/read]

18. क्षोभ मण्डल की धरातल से अधिकतम ऊँचाई है-

[A] 6 किमी०
[B] 12 किमी०
[C] 8 किमी०
[D] 18 किमी०

[read more] [D] 18 किमी० [/read]

19. क्षोभ मण्डल में तापमान की सामान्य ह्रास की 1°C प्रत्येक-

[A] 146 मी० हेतु
[B] 165 मी० हेतु
[C] 156 मी० हेतु
[D] 176 मी० हेतु

[read more] [B] 165 मी० हेतु [/read]

20. क्षोभ मण्डल के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] यह वायुमण्डल का सघनतम परत है।
[B] बादलों का निर्माण क्षोभ मण्डल में ही होता है।
[C] क्षोभ मण्डल की ऊपरी सीमा पर समताप सीमा स्थित है।
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] क्षोभ मण्डल की ऊपरी सीमा पर समताप सीमा स्थित है। [/read]

21. क्षोभ मण्डल एवं समताप मण्डल के बीच स्थित संक्रमण क्षेत्र को क्या कहा जाता है?

[A] समताप सीमा
[B] मध्य सीमा
[C] क्षोभ सीमा
[D] बाह्य सीमा

[read more] [C] क्षोभ सीमा [/read]

22. पृथ्वी के वायुमण्डल का सर्वाधिक घनत्व कहाँ पर होता है?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] मध्य मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] आयन मण्डल

[read more] [A] क्षोभ मण्डल [/read]

23. वायुमण्डल में दैनिक मौसम परिवर्तन निम्नलिखित में से किसके कारण होते हैं?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] आयन मण्डल
[C] मध्य मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [A] क्षोभ मण्डल [/read] 

24. क्षोभ मण्डल (Troposphere) वायुमण्डल का निचला स्तर है जिसकी ऊँचाई भूमध्य रेखा पर होती है-

[A] 10 मील तक
[B] 6 मील तक
[C] 9 मील तक
[D] 4 मील तक

[read more] [A] 10 मील तक [/read]

25. मेघ गर्जन वायुमण्डल की किस परत में होता है?

[A] आयन मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] ओजोन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [B] क्षोभ मण्डल [/read]

26. परिवर्तन मण्डल या क्षोभ मण्डल में तापमान-

[A] ऊँचाई के साथ घटता है।
[B] ऊँचाई के साथ बढ़ता है
[C] अपरिवर्तित रहता है।
[D] पहले घटता है पुनः बढ़ता है।

[read more] [A] ऊँचाई के साथ घटता है। [/read]

27. समताप मण्डल (Stratosphere) है-

[A] वायुमण्डल का मध्यस्थ प्रदेश
[B] वायुमण्डल का ऊपरी प्रदेश
[C] वायुमण्डल का निचला प्रदेश
[D] क्षोभ सीमा के ऊपर स्थित प्रदेश

[read more] [D] क्षोभ सीमा के ऊपर स्थित प्रदेश [/read]

28. वायुमण्डल की किस सतह में तापमान में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता?

[A] समताप मण्डल
[B] बाह्य मण्डल
[C] क्षोभ मण्डल
[D] ताप मण्डल

[read more] [A] समताप मण्डल [/read] 

29. ओजोन परत अवस्थित है-

[A] क्षोभ मण्डल में
[B] क्षोभ सीमा में
[C] समताप मण्डल में
[D] प्रकाश मण्डल में

[read more] [C] समताप मण्डल में [/read]

30. समताप मण्डल में ओजोन परत का कार्य है-

[A] भूमण्डलीय ताप को स्थिर रखना
[B] भूकम्पों की आवृति को घटाना
[C] मानसूनों की विफलता को बचाना
[D] भूतल पर पराबैंगनी विकिरणपात को रोकना

[read more] [D] भूतल पर पराबैंगनी विकिरणपात को रोकना [/read]

31. सुपर सोनिक (Supersonic) विमानों की उड़ान के लिये सर्वाधिक सुविधाजनक वायुमण्डलीय परत है-

[A] क्षोभ मण्डल
[B] मध्य मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] आयन मण्डल

[read more] [C] समताप मण्डल [/read]

32. समताप मंडल के सम्बन्ध में निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] समताप मण्डल का विस्तार 50 किमी० की ऊँचाई तक पाया जाता है।
[B] समताप मंडल की सीमा आयन मण्डल से मिलती है।
[C] इस मण्डल में बादलों का अभाव पाया जाता है।
[D] इस मण्डल में धूल कण और जलवाष्प की मात्रा काफी कम होती है।

[read more] [B] समताप मंडल की सीमा आयन मण्डल से मिलती है। [/read]

33. ओजोन परत के प्रतिवर्ष 7 प्रतिशत की दर से अवक्षय के कारण उसमें 10 मिलियन वर्ग किमी० आकार का एक बड़ा छिद्र बन गया है। यह छिद्र अवस्थित है-

[A] आर्कटिक के ऊपर
[B] ध्रुवों के ऊपर
[C] अंटार्कटिका के ऊपर
[D] अमेरिका एवं यूरोप के ऊपर

[read more] [C] अंटार्कटिका के ऊपर [/read]

34. दीर्घ रेडियो तरंगें पृथ्वी की किस सतह से परावर्तित होती है?

[A] क्षोभ मण्डल
[B] क्षोभ सीमा
[C] आयन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [C] आयन मण्डल [/read]

35. संचार उपग्रह किस वायुमण्डलीय स्तर में स्थित होते हैं?

[A] समताप मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] आयन मण्डल
[D] बर्हिमण्डल

[read more] [C] आयन मण्डल [/read]

36. वायुमण्डल में ओजोन स्तर के अवक्षय का कारण निम्नलिखित में से कौन-सा रसायन है?

[A] सल्फर डाइऑक्साइड
[B] कार्बन डाइऑक्साइड
[C] नाइट्रस ऑक्साइड
[D] क्लोरो-फ्लोरो कार्बन

[read more] [D] क्लोरो-फ्लोरो कार्बन [/read]

37. रेडियो की लघु तरंगें आयन मण्डल की किस परत से परावर्तित होकर धरातल पर आती है?

[A] S परत
[B] E परत
[C] F परत
[D] D परत

[read more] [C] F परत [/read]

38. ऊपर से नीचे की ओर वायुमण्डल की विभिन्न परतों की सीमाओं (Pause) का कौन-सा क्रम सही है?

[A] मैग्निटोपॉज, मेसोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज
[B] मेसोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज, मैग्निटोपॉज
[C] ट्रोपोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, मेसोपॉज, मैग्निटोपॉज
[D] स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज, मैग्निटोपॉज, मेसोपॉज

[read more] [A] मैग्निटोपॉज, मेसोपॉज, स्ट्रेटोपॉज, ट्रोपोपॉज [/read]

39. वायुमण्डल के किस भाग में जलवाष्प की कुल मात्रा का 90 प्रतिशत भाग विद्यमान रहता है?

[A] आयन मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] ओजोन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [B] क्षोभ मण्डल [/read]

40. वायुमण्डल के किस परत को रसायन मण्डल कहते हैं?

[A] मध्य मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] आयन मण्डल
[D] ओजोन मण्डल

[read more] [A] मध्य मण्डल [/read]

41. किस वायुमण्डलीय परत को ‘मौसमी परिवर्तन की छत’ के नाम से जाना जाता है?

[A] समताप मण्डल
[B] आयन मण्डल
[C] क्षोभ मण्डल
[D] मध्य मण्डल

[read more] [C] क्षोभ मण्डल [/read]

42. हवाई जहाज प्राय: किस मण्डल में उड़ते हैं-

[A] क्षोभ मण्डल
[B] मध्य मण्डल
[C] समताप मण्डल
[D] बाह्य मण्डल

[read more] [C] समताप मण्डल [/read]

43. वायुमण्डल की सबसे निचली परत कहलाती है-

[A] मध्य मण्डल
[B] क्षोभ मण्डल
[C] आयन मण्डल
[D] समताप मण्डल

[read more] [B] क्षोभ मण्डल [/read]

44. पृथ्वी की सतह से सबसे दूर वायुमण्डलीय परत किस नाम से विदित है?

[A] आयन मण्डल
[B] समताप मण्डल
[C] बहिर्मण्डल
[D] क्षोभ मण्डल

[read more] [C] बहिर्मण्डल [/read]

45. वायुमण्डल में सबसे अधिक ओजोन कहाँ पर केन्द्रित है?

[A] आयनोस्फीयर
[B] स्ट्रेटोस्फीयर
[C] मीसोस्फीयर
[D] ट्रोपोस्फीयर

[read more] [B] स्ट्रेटोस्फीयर [/read]

46. समुद्रतल पर औसत वायुदाब कितना होता है?

[A] 1003.25 मिलीबार
[B] 1023.25 मिलीबार
[C] 1013.25 मिलीबार
[D] 1034.25 मिलीबार

[read more] [C] 1013.25 मिलीबार [/read]

47. वायुदाब प्रायः सर्वाधिक होता है जब वायु होती है-

[A] ठण्डी तथा शुष्क
[B] उष्ण तथा शुष्क
[C] ठण्डी तथा नम
[D] उष्ण तथा नम

[read more] [A] ठण्डी तथा शुष्क [/read]

48. वायुदाब में अचानक आने वाली कमी निम्न में से किसका सूचक होती है?

[A] स्वच्छ मौसम
[B] अत्यधिक शीतल मौसम
[C] तूफानी मौसम
[D] वर्षा का मौसम

[read more] [C] तूफानी मौसम [/read]

49. सामान्य वायुदाब पाया जाता है-

[A] पर्वतों पर
[B] सागरतल पर
[C] रेगिस्तान में
[D] धरातल के 5 km ऊपर

[read more] [B] सागरतल पर [/read]

50. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

[A] सागर तल पर वायुदाब अधिकतम होता है।
[B] वायुदाब को मिलीबार (mb) में मापा जाता है।
[C] किसी भी स्थान पर वायुदाब दो बार बढ़ता एवं दो बार घटता है।
[D] उपर्युक्त सभी।

[read more] [D] उपर्युक्त सभी। [/read]

51. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

[A] वायुदाब के घटने-बढ़ने की क्रिया को ‘वायुदाब उच्चावचन’ (Barometric tide) कहते हैं।
[B] वायुदाब में उतार-चढ़ाव विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर कम होता जाता हैं।
[C] 60° अक्षांश के बाद वायुदाब का दैनिक उतार चढ़ाव नहीं देखा जाता है।
[D] उपर्युक्त सभी।

[read more] [D] उपर्युक्त सभी। [/read] 

52. ग्लोब पर दाब कटिबंधों (pressure belts) की संख्या कितनी है?

[A] 5
[B] 6
[C] 7
[D] 9

[read more] [C] 7 [/read]

53. विषुवतीय निम्न दाब पेटी का विस्तार विषुवत रेखा के दोनों ओर कितने अक्षांश तक मिलता है?

[A] 5°
[B] 10°
[C] 15°
[D] 20°

[read more] [A] 5° [/read]

54. डोलड्रम पेटी का विस्तार सामान्यतः पाया जाता है-

[A] 0° – 5° उत्तर
[B] 0° – 5° दक्षिण
[C] 0°- 10° उत्तर
[D] 5°N – 5° दक्षिण

[read more] [D] 5°N – 5° दक्षिण [/read]

55. डोलड्रम क्षेत्र की विशेषता होती है-

[A] निम्न दाब एवं वायु का अवतलन
[B] निम्न दाब एवं मन्द पूर्वी पवन
[C] सामान्य दाब एवं वायु का अवतलन
[D] निम्न दाब एवं शान्त पवन

[read more] [D] निम्न दाब एवं शान्त पवन [/read]

56. शांत पेटी किस रेखा के दोनों ओर पायी जाती है?

[A] भूमध्य रेखा
[B] कर्क रेखा
[C] मकर रेखा
[D] आर्कटिक वृत्त

[read more] [A] भूमध्य रेखा [/read]

57. विश्व के सभी उष्ण मरुस्थल निम्न में से किस पेटी में स्थित हैं?

[A] विषुवतीय निम्न दाब पेटी
[B] उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटी
[C] उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी
[D] ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी

[read more] [B] उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटी [/read]

15. Home remedies to stay healthy (स्वस्थ रहने के घरेलु उपाय)

15. Home remedies to stay healthy

(स्वस्थ रहने के घरेलु उपाय)



1. हाथ पैर बेवजह कापते हैं तो रात को खाना खाने के बाद एक लौंग चबाकर गर्म पानी पी लें। कुछ ही दिनों में आराम मिल जाएगा।



2. दूध में मखाने उबालकर खाने से हाथ-पैर, घुटनों और कमर का दर्द ठीक रहता है। हड्डियाँ मजबूत होती हैं और खून की कमी भी नहीं होती है।



3. सेब का छिलका उतार कर और नमक लगाकर सुबह खाली पेट खाने से पुराने से पुराना सर दर्द खत्म हो जाता है।



4. एक गिलास पानी में पान के पत्तों को उबालकर पी लें। इससे छाती में जमी बलगम दूर हो जाएगी और इससे खांसी में आराम मिलेगा।



5. प्याज के रस में शक्कर डालकर शर्बत बनाकर दस से पंद्रह दिनों तक सेवन कीजिए। पथरी गल कर बाहर निकल जाएगी।



6. कुकर में बनी दाल नहीं खानी चाहिए। क्योंकि कुकर में सिर्फ दाल गलती है जबकि पकती नहीं है। जिससे एसिड प्रॉब्लम हो सकती है।



7. जब भी शराब पीने की इच्छा करें। एक चम्मच शहद में अदरक के रस की दो से तीन बूंदे मिलाकर सेवन करें। इससे शराब पीने की इच्छा तुरंत मर जाएगी।



8. क्या आपको पता है सोयाबीन को दो घंटे भिगोकर, मसल कर, जहरीले जाग निकालकर ही उपयोग करना चाहिए।



9. मखाने खाने से शरीर में शुगर रोग खत्म होता है। क्योंकि इसको खाने से शरीर में इंसुलेशन बनता है जिससे आप शुगर से निजात पा सकते हैं।



10. चालीस दिन तक सात बादाम, मिश्री, सौफ प्रत्येक दस ग्राम पीसकर रात को गर्म दूध के साथ लेने से मस्तिष्क की दुर्बलता दूर होती है।



11. भोजन के साथ कच्ची हरी मिर्च खाना बहुत ही लाभदायक होता है क्योंकि कच्ची हरी मिर्च खाने से चेहरे के दाग धब्बे खत्म होते हैं।



12. सरसों के तेल में नमक मिलाकर मालिश करने से छाती में जमी हुई बलगम की गांठे निकल जाती हैं।



13. आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली सब्जी कंटोला है। यह एक ऐसी सब्जी है जो मीट, चिकेन से 50 गुना ज्यादा ताकतवर और प्रोटीन से भरपूर होती है। इसे खाने से कई सारी समस्या ठीक होती हैं।



14. डायबिटीज के मरीजों को दूध के साथ काजू खाने चाहिए! क्योंकि दूध और काजू दोनों का सेवन करने से शुगर लेवल कंट्रोल होता है।



15. एक नींबू को आधा काट कर उसमें कुछ लौंग लगा लीजिए और इन्हें घर के सभी कोनों में रख दीजिए। ऐसा करने से एक भी मच्छर नहीं आएगा।



16. एक चुकंदर को छोटे टुकड़ों में काट कर दो गिलास पानी में उबाल लें और पानी ठंडा होने पर उसे पी लें। गुर्दे की पथरी साफ हो जाएगी।



17. रात को सोने से पहले नाभि पर सरसों का तेल लगाने से पेट संबंधी बीमारियाँ दूर होती हैं और होंठ फटना भी बंद हो जाएंगे।



18. देसी घी में काली मिर्च मिलाकर गर्म दूध के साथ पीने से आंतो में रूका मल नरम और ढीला होकर बाहर निकल जाता है।



19. आपके हाथ पैरों में अगर बहुत दर्द होता है तो इसकी वजह चाय है। चाय का असर हमारी हड्डियों पर पड़ता है।



20. मूंग में मांस से कई गुना ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है यदि आप लगातार इसका सेवन करते हैं तो शरीर ताकतवर और मजबूत बनता है।



Home remedies

21. यदि किसी का बाल झड़ रहा हो तो 20 लौंग को आधे कटोरी पानी में 10 मिनट तक उबालकर और उसे फि ठंडे होने के बाद बाल में लगाकर रातभर छोड़ दे, इसी तरह एक सप्ताह तक दोहराने के बाद बाल झना बंद हो जायेगा।



22. वजन कम करने के सर्वोत्तम उपाय

➤ दूध की जगह दही खाएं,

➤ ग्रीन टी पियें,

➤ ठंडा पानी न पियें,

➤ नारियल पानी पियें.

➤नमक कम खाएं.

➤ प्रतिदिन नींबू का सेवन करें,

➤ नींबू और मेथी अतिरिक्त चर्बी जमा नहीं करते इसलिए इन्हें जरूर खाएं,

➤ सुबह-शाम गर्म पानी पियें।

➤ खाना खाने के बाद पानी न पियें, 60 मिनट बाद गुनगुना पानी पियें,

➤ एक चम्मच मेथी को रात में भिगोकर रख दें और सुबह इसे खाएं,

➤ काली चाय भी ले सकते हैं, लेकिन इसमें दूध न मिलाएं,

➤ तुलसी, हरी चाय और अदरक से तैयार हर्बल पानी पिएं।

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