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20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation (पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)

20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation

(पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. पर्यावरण निम्नीकरण के कारणों, परिणामों की चर्चा कीजिए और संबंधित संरक्षण के उपाय पर प्रकाश डालें।

    पर्यावरणीय निम्नीकरण केवल भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की गंभीर समस्यायों में एक है। यह आज की उपभोक्तावादी जीवन, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, अनियोजित विकास, इत्यादि की देन है। प्रत्येक पर्यावरण में जैविक एवं अजैविक घटकों के बीच प्राकृतिक संतुलन का संबंध होता है। जब इस संतुलन में नाकारात्मक परिवर्तन होता है तो उसे ‘पर्यावरणीय निम्नीकरण’ कहते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारक

    पर्यावरणीय निम्नीकरण के कई कारण है जिन्हें हम दो प्रमुख वर्गों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारण

1. प्राकृतिक कारण

(ⅰ) भारी वर्षा, आकिस्मक वर्षाः

(ii) भूस्खलन, हिमस्खलन;

(iii) भूकंप, सूनामी;

(iv) ज्वालामुखी उद्‌गार;

(V) बाढ़, सूखाड़, अकाल;

(1) चक्रवात, हिमपातः

(vii) वायु इत्यादि।

2. मानवीय कारण

(i) वनों की कटाई,

(ii) वृहद बांधों का निर्माण,

(iii) खनन

(iv) औद्योगिकीकरण,

(v) नगरीकरण,

(vⅰ) संचार एवं परिवहन क्रांति

(vii) कीटनाशक एवं उर्वरक के प्रयोग,

(viii) अवैज्ञानिक कृषि,

(ix) अति पशुचारण,

(x) अनियोजित विकास इत्यादि।

1. प्राकृतिक कारण

     भारी या आकस्मिक वर्षा के कारण तीव्र ढाल एवं उबड़-खाबड़ प्रदेशों में तेजी से मृदा अपरदन होती है। जैसे- भारत के चम्बल घाटी क्षेत्र में रील एवं अवनलिका अपरदन के कारण मृदा का क्षरण हुआ है। जबकि महान हिमालय, लघु हिमालय में तीव्र ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के कारण मृदा ह्रास हुआ है।

     भूस्खलन एवं हिमस्खलन से पर्वतीय प्रदेशों में जैविक ह्रास, मृदा क्षरण, स्थलाकृतिक स्वरूप में परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। हिम स्खलन से बेड़-2 हिम और भूस्खलन से छोटे-बड़े चटानें ढाल के सहारे गुरुत्वारण के कारण नीचे गिरते हैं। इससे कई वनस्पति, जीव-जन्तु इत्यादि दब कर नष्ट हो जाते हैं जो पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक कारण है।

    भूकंप के दौरान कई पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं, कितने जीवों की जानें चली जाती हैं जो पर्यावरण निम्निकारण के कारण है। ज्वालामुखी उद्‌गार के समय लावा, राख, जलवाष्प गैस इत्यादि निकलती है जो पर्यावरण को प्रदूषित कर देती हैं। हिमालय क्षेत्र में अधिकतम भूकम्प आते हैं। 1934 में मुंगेर और दरभंगा का भूकम्प, 2001 में कच्छ की भूकम्प इत्यादि उल्लेखनीय है। हिमालय प्रदेश और बैरन द्वीप में ज्वालामुखी की घटना देखने को मिलती है जिससे पर्यावरण निम्नीकरण होती है।

    बाढ़, सूखाड़ और अकाल पर्यावरण निम्नीकरण को जन्म देते हैं। बाढ़ एवं सूखाड़ की बारम्बारता से खाद्य पदार्थ, पेयजल और चारे में कमी आ जाती है। महामारी, अकालमृत्यु, पशुमृत्यु दर बढ़ जाता है। भारत के वृष्टिछाया प्रदेश, द० बिहार, द०-प० उड़ीसा इत्यादि में सूखे के कारण और असम, उत्तरी बिहार इत्यादि में बाढ़ के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई होती है।

     चक्रवात के दौरान वायु की तेज झोंका और तीव्र वर्षा से वृक्ष का गिरना, बड़े भूभाग का जलमग्न होना, बाढ़ आना इत्यादि जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। यह घटना भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

     प्राकृतिक वायु मरुस्थलीय क्षेत्रों से धुलकण को उड़ाकर बाहरी क्षेत्रों में जमा करते रहती है जिसके कारण मरुस्थलीय क्षेत्रों का लगातार विस्तार होता जा रहा है। राजस्थान के थार मरुस्थल से वायु द्वारा धूल कण, बालू उड़ाकर पंजाब, हरियाणा, UP के सीमावर्ती क्षेत्रों में जमा करते रहने से यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

2. मानवीय कारण

     वनों की कटाई पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक प्रमुख कारण है। बढ़ती हुई आबादी के कारण कृषि एवं अधिवास के लिए वनों की कटाई की जा रही है। इसके कारण वनस्पति के विभिन्न प्रजातियों का विलोपीकरण, जैविक विविधता में ह्रास हो रही है और आहार-श्रृंखला पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भूमिगत जल स्तर तेजी से नीचे गिरता है।

       वृहत बांधों के निर्माण भी कई पर्यावरणीय निम्नीकरण को जन्म देते हैं। जैसे- बांधो के पीछे बनाये गये जलाशयों में वनीय भूमि, अधिवासीय क्षेत्र के आ जाने से उनका ह्रास होता है। आस-पास के क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर बढ़ जाने से पेयजल प्रदूषित हो जाता है। खनन से न केवल ऊर्जा संसाधनों का बल्कि अनेक प्रकार के खनिजों का दोहन किया जा रहा है। उन खनिजों पर कई छोटे-बड़े उद्योगों का विकास किया गया है। इससे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण इत्यादि की समस्या उत्पन्न हुई हैं।

     औद्योगिकीकरण और नगरीकरण साथ-2 चलने वाली प्रक्रिया है। आज विश्व के कई नगर महानगर में बदल चुके हैं। केवल भारत में ही 35 महानगर पाये जाते हैं। ये नगर अत्याधिक जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्र है। इन नगरों में जहाँ एक ओर ध्वनि और वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या है। वहीं अवशिष्ट पदार्थी के जलाशयों में छोड़ दिये जाने से जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है।

     संचार एवं परिवहन क्रांति के युग में सड़कों पर परिवहन साधनों का बाढ़ आ चुका है। ये परिवहन साधन जीवाश्म ऊर्जा का उपयोग करते हैं जिससे ग्रीन हाउस गैसों का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन हो रहा है। इसके कारण अनेक प्रकार के पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

     रासायनिक उर्वरक एवं किटनाशकों का प्रयोग खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने हेतु किया जा रहा है। इसके चलते मृदाक्षरण, जल प्रदूषण, सूक्ष्मजीवों के ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है।

    अवैज्ञानिक कृषि, अतिपशुचारण, अनियोजित विकास, मिसाइल तकनीक, आण्विक तकनीक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी इत्यादि के कारण अनेक गंभीर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

परिणाम

    उपरोक्त पाकृतिक एवं मानवीय कारणों से पर्यावरणीय निम्नीकरण की कई गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुई है। जैसे-

Causes

   इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण निम्नीकरण एक गंभीर परिणाम के रूप में उभर रहे हैं। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण करना अति आवश्यक है। इस दिशा में 1992 ई० में विश्व स्तर पर महत्त्वपूर्ण कदम रियो द जेनरियो में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन में उठाये गये। भारत सरकार भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके लिए उन्होंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना किया है जो कई कामक्रमों के माध्यम से इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके अलावे निम्नलिखित उपाय सुझाए जा सकते हैं:-

(i) वनोन्मूलन से बचाव हेतु वनीय नीति और वन संरक्षण कानून के क्रियान्वयन पर सख्ती से ध्यान दिया जाय। सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी, वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाय।

(ii) वन्य जीवों के शिकार पर कठोर प्रतिबंध लगायी जाय।

(iii) खेतों में रासायनिक उर्वरक की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाय।

(iv) जीवाश्म ऊर्जा के जगह पर सौर ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा एवं अन्य वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग पर जोर दिया जाय।

(v) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम से कम किया जाय।

(vi) विस्फोट पदार्थों का कम से कम प्रयोग किया जाय।

(vii) वैज्ञानिक कृषि पर जोर दिया जाए।

(viii) विकास का कार्य सतत् विकास की अवधारणा पर किया जाय।

(ix) पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जन-जागरण बढ़ायी जाय इत्यादि।

     उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पर्यावण निम्नीकरण एक गंभीर समस्या है। यह कई प्रकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न होती है। इसके कई भयानक परिणाम आ रहे हैं। इसलिए ‘पर्यावरण संरक्षण’ की दिशा में कई कार्य किये जा रह हैं और कई कार्य और भी किये जाने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी पूर्ण सफलता आमलोगों की सहभागिता, राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर भी निर्भर कती है।

2. Climate of Bihar (बिहार की जलवायु)

2. Climate of Bihar

(बिहार की जलवायु)



प्रश्न प्रारूप

Q. Explain Climate of Bihar.

(बिहार की जलवायु का विस्तृत वर्णन करें।)

उत्तर-  बिहार की जलवायु उष्णार्द्र मानसूनी है। यह जलवायु अल्प वर्षाकाल तथा दीर्घ शुष्ककाल के मानी जाती है। यहाँ की जलवायु में महाद्वीपीयता के लक्षण मिलते हैं, लेकिन अधिक आर्द्रता के कारण यहाँ संशोधित महाद्वीपीय जलवायु है। उत्तर की ओर हिमालय की हिमाच्छादित श्रेणियाँ इसको मध्य एशिया की ओर से आने वाली शीतल वायु से बचाकर महाद्वीपीय जलवायु का स्वरूप प्रदान करती है। इस जलवायु की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) न्यून दैनिक ताप परिसर

(ii) ताप परिसर की समानता

(iii) वायु में अधिक आर्द्रता

(iv) वर्षा का न्यूनाधिक रूप में सर्वत्र होना

(v) ऋतु परिवर्तन होना

      बिहार की जलवायु निम्नलिखित भौगोलिक तत्त्वों से प्रभावित होती है-

(i) अक्षांशीय विस्तार

(ii) हिमालय पर्वत की स्थिति

(iii) स्थलाकृति का प्रभाव

(iv) बंगाल की खाड़ी से निकटता

(v) नारवेस्टर तथा अन्य ग्रीष्मकालीन तूफान

(vi) दक्षिण-पश्चिम मानसून की क्रियाशीलता

      मॉनसूनी जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ के मौसमी परिवर्तन की हैं। यहाँ की ऋतुएँ ऐसी है जो लयबद्ध रूप में आती है। ग्रीष्मकाल की भीषण गर्मी से उबने के बाद वर्षाकाल की फुहारे वातावरण में प्रसन्नता पैदा करती है। जब वर्षाकाल की उमस से मन उब जाता है, तो शरदकालीन ठण्डक से राहत मिलती है। जबकी शीत लहर से मन घबरा जाता है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है तो ग्रीष्म ऋतु राहत पहुँचाती है। इस प्रकार बिहार की जलवायु में तीन ऋतुएँ स्पष्ट अनुभव की जाती है। अतः यहाँ तीन ऋतुएँ निम्नलिखित हैं-

1. ग्रीष्म ऋतु- मध्य मार्च से मध्य जून तक

2. वर्षा ऋतु- मध्य जून से मध्य अक्टूबर तक

3. शरद ऋतु-मध्य अक्टूबर से मध्य मार्च तक

1. ग्रीष्म ऋतु:-

       यह ऋतु मध्य मार्च से प्रारम्भ होता है। इस माह के बाद तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है मई के अन्त तक तापमान बहुत बढ़ जाता है। अधिक गर्मी से सापेक्षित आर्द्रता बहुत घट जाती है। मई-जून में कुछ स्थानों का तापमान 46°C तक पहुँच जाता है। बिहार के पश्चिमी भाग के क्षेत्रों में अधिक तापमान रहता है। पछुआ हवा के कारण हवा बहुत ही गर्म हो जाती है। जिसे ‘लू’ कहा जाता है। इसकी तुलना में पूर्वी भाग के क्षेत्रों में तापमान कम रहता है।

     इस ऋतु में अधिक गर्मी के कारण हवा का दबाव कम हो जाता है, हवा के निम्नदाब के कारण बिहार के पूर्वी भाग में चक्रवाती तूफान आता है, जिससे वर्षा होती है, इस तूफान से पूर्णियाँ, कटिहार में 4 से 8 सेमी० वर्षा होती है। इस भयंकर तूफान को ‘काल वैशाखी’ कहते हैं। इस आर्द्रयुक्त हवा से वर्षा होती है, जिसे नारवेस्टर या मैंगोसाँवर कहते हैं। इस वर्षा से आम एवं लीची फसलों को फायदा पहुँचती है। इस मौसम में गया शहर का तापमान सबसे ऊँचा 47°C तक चला जाता है।

(2) वर्षा ऋतु:-

         ग्रीष्मकाल से भीषण गर्मी के कारण एक विशाल निम्न भार का कटिबन्ध कायम हो जाता है। इस निम्न भार को भरने के लिए बंगाल की खाड़ी से मुड़कर दक्षिण-पश्चिम हवाएँ स्थल की ओर चलने लगती हैं। बिहार में मानसूनी हवा का प्रवेश पूर्व से जानेवाली मानसूनी धारा के रूप में होता है। यह हिमालय के समानान्तर चलती है। सामान्यतः 15-20 जून तक बिहार में मानसून का आगमन हो जाता है। इस मानसून के आगमन से तापमान में कमी होती है और सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे तापमान में कमी होती है और उमस बढ़ जाती है। जुलाई-अगस्त में काफी वृष्टि होती है।

      राज्य के पूर्वी भाग में वर्षा अधिक तथा पश्चिम में वर्षा कम होती है। पूर्व में स्थित कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा तथा पश्चिम में स्थित राज्य के कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है। जैसे- पूर्णियाँ 107.5 सेमी०, सहरसा 138.5 सेमी०, दरभंगा 125 सेमी०, पटना 117 सेमी०, गया 99.2 सेमी० इस आँकड़े से पूर्व से पश्चिम आने पर वर्षा में कमी आती जाती है।

      बिहार में अधिकतर वर्षा ग्रीष्मकालीन मौनसून से होती है। इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून भी कहते हैं।

     मानसून की वापसी तापमान की कमी के कारण अक्टूबर माह में प्रारम्भ होती है। इस काल में वर्षा की स्थिति नहीं बन पाती है। इस समय केवल हथिया नक्षत्र में थोड़ी वर्षा हो जाती है। इस समय रबी की फसल की बुआई शुरू हो जाती है।

3. शरद ऋतु:-

    वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर सितम्बर महीने से तापमान में गिरावट शुरू हो जाती है। इसके फलस्वरूप नवम्बर से फरवरी तक की अवधि में शीत शुष्क में बदल जाती है। इस ऋतु में मौसम अच्छा रहता है। यहाँ का औसत तापमान 10°C से नीचे चला जाता है। इस समय पश्चिमी चक्रवात से थोड़ी वर्षा हो जाती है। वर्षा की मात्रा 1 से 2 सेमी० से अधिक नहीं होती है। इस ऋतु में पटना का औसत तापमान 6.1°C, गया का 5.8°C तथा पूर्णियाँ का 4.4°C रहता है। शद के अन्तिम चण में तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।

13. Sugar Industry in Bihar (बिहार में चीनी उद्योग

13. Sugar Industry in Bihar

(बिहार में चीनी उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार में चीनी उद्योग की स्थिति, समस्या एवं समाधान पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

    बेबर के अनुसार चीनी उद्योग एक वजन ह्रास उद्योग है। इसलिए ऐसे उद्योगों की स्थापना कच्चे माल के क्षेत्र में की जाती है। विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी बिहार के मुजफ्फरपुर से UP के मुजफ्फरनगर के बीच अवस्थित है। इसी गन्ना की पेटी में बिहार के अधिकांश चीनी मील अवस्थित थे।

    1960 के दशक तक बिहार भारत का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य था। लेकिन वर्तमान समय में प्रथम पाँच राज्य में बिहार की स्थान नहीं है। उत्तरी बिहार की भूमि और परम्परागत कृषि पद्धति चीनी उद्योग के लिए समुचित आधार प्रदान करती है। यही कारण है कि मेहरौरा (छपड़ा) नामक स्थान पर 1903 ई० में प्रथम चीनी का कारखाना स्थापित किए गया था।

      आज यह उद्योग रुग्ण अवस्था से गुजर रही है। बिहार में कुल 33 चीनी मीलें थी। इनमें से 17 चीनी मीलें पूर्णत बन्द हो चुके है। 33 चीनी मील में से 28 मील स्वतंत्रता से पूर्व ही स्थापित हुए थे। गौरतलब है कि स्वतंत्रता के पूर्व 56 मील भारत में थी उनमें से 28 मील केवल बिहार में स्थापित है।

      स्वतंत्रता के बाद सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, किसानों की घटती हुई अभिरुचि, खाद्यान्न फसल के साथ गन्ना उद्योग की प्रतिस्पर्द्धा इत्यादि के कारण चीनी का उत्पादन लगातार घटता गया। इसी संदर्भ में बिहार विभाजन के बाद JJ ईरानी की अध्यक्षता में पहली औद्योगिक विकास का गठन किया गया तो उसने सिफारिश किया कि झारखण्ड निर्माण के बाद बिहार को औद्योगिक मान‌चित्र पर लाने के लिए चीनी उद्योगों विकास अनिवार्य है।

     दर असल गन्ना एक नकदी फसल है। जिसका उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़ा है लेकिन रणनीति के अभाव में बिहार का यह उद्योग लगातार पिछड़ रहा है। इसके पिछड़ेपन के निम्न‌लिखित कारण हैं:-

बिहार में चीनी उद्योग के पिछड़ापन के कारण

(1) गन्ना का उचित मूल्य नहीं:-

    गन्ना एक वर्षीय एवं नगदी फसल है। इसके उत्पादन के पीछे किसानों की मानसिकता और पर्याप्त लाभ की प्राप्ति रहती है अगर चीनी मील मालिक गन्ना उत्पादकों को उचित मूल्य समय पर दे देते हैं तो अगली बार किसान गन्ना की खेती करते हैं अन्यथा नहीं।

(2) अधिकांश गन्ना का उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में:-

     बिहार के अधिकांश गन्ना चीनी मील तक नहीं पहुंच पाती है बल्कि उनका उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में होता है। सम्पूर्ण भारत का 50% गन्ना उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में ही प्रयुक्त हो जाता है।

(3) समुद्र से अधिक दूरी:-

     समुद्र से अधिक दूर होने के कारण बिहार के गन्ना में रस की मात्रा अपेक्षाकृत कम पायी जाती है। जैसे महाराष्ट्र में कुल गन्ना वजन का 12-15% रस प्राप्त होता है जबकि बिहार में 8-9% रस प्राप्त होता है।

(4) अधिकांश मील पुरानी:-

     बिहार के अधिकांश चीनी मील पुरानी हो चुकी है जिसके कारण उत्पादन की क्षमता अत्याधिक कम हो गयी है।

(5) वर्षभर चीनी मिलें चालू नहीं:-

    दक्षिण भारत की चीनी मील सांलो भर चलती रहती है क्योंकि इससे प्राप्त होने वाला ‘खोई’ आधारित कागज उद्योग मोलास पर आधारित शराब उद्योग का विकास किया गया है। वहीं जिस मौसम में गन्ने की आपूर्ति नहीं होती है उस मौसम में वहाँ की चीनी मीलें तेलहन की पेराई करते हैं।

     इस तरह दक्षिण भारत की मीलें सालोंभर किसी-न-किसी रूम में चलते रहती हैं लेकिन बिहार में इस तरह के उद्योग के अभाव में कुछ माह ही उद्योग चल पाते हैं।

(6) सरकारी उदासीनता और भ्रष्टाचार:-

     सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण चीनी उद्योगों से संबंधित अनुसंधान कार्य ठीक तरीके से नहीं हो पा रहे हैं।

(7) प्रतिकूल चीनी औद्योगिक नीति:-

     चीनी उद्योग का लाइसेन्सीकरण 40% लेबी और 15 किमी० के दायरे में 2 चीनी मील नहीं लगाने की नीति इत्यादि के कारण चीनी उद्योग के विकास में बाँधा पहुंची है।

(8) हरित क्रांति का आगमन:-

     बिहार में हरित क्रांति के आगमन के बाद गन्ना क्षेत्र में खाद्यान्न फसलों का घुसपैठ बढ़ा है जिसके कारण गन्ना उत्पादक क्षेत्र लगातार सिकुड़ते जा रहे है।

(9) सहकारिता का अभाव:-

      इन समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने समय-2 पर महत्वपूर्ण सुधारों की घोषणा करती रही है। जैसे-1998 ई० में सरकार ने लाइसेन्सी करण की नीति रद्द कर दिया। इसके बाद 40% की लेबी को घटाकर 15% कर दिया। वैश्विक स्तर पर WTO की स्थापना हो जाने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्यात करने की मार्ग प्रशस्त हो चुकी है। सरकार ने यह निर्णय लिया है कि गन्ने के उपउत्पादकों को गैसहोल के रूप में किया जायेगा।

     उपरोक्त कदम उठाये जाने के बाद भी बिहार में पुनः चीनी उद्योग नहीं पनप पा रहे हैं क्योंकि किसानों को नकदी और गन्ना का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। किसानों के फसलों का बीमाकरण नहीं हो पा रहा है।

      पुनः न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य में काफी अन्तर दिखायी दे रहा है। रुग्ण मील तकनीकी सुधार नहीं कर पा रहे हैं। अपने कर्मचारियों को पिछला भुगतान नहीं कर पाये हैं। जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होगा। तब तक इनका विकास संभव नहीं है।

    इसके अलावे बिहार की घरेलू बाजार अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार को मजबूत करते हुए चीनी उद्योग पर आधारित बिहार को विशिष्ट पहचान स्थापित की जा सकती है। मॉरीशस, क्यूबा, फिजी जैसे छोटे-2 द्वीपीय देश प्रबंधन के बल पर ही अगर वैश्विक पहचान खते हैं तो बिहार ऐसा क्यों नहीं क सकता है?


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9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

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11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

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16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

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20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


2. Natural Region of Bihar (बिहार का प्राकृतिक प्रदेश)

2. Natural Region of Bihar

(बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई)



प्रश्न प्रारूप

Q. वर्तमान बिहार के प्राकृतिक प्रदेश की चर्चा करें।

      भारत के पूर्वी भाग में स्थित बिहार राज्य क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत का 13वाँ सबसे बड़ा राज्य है। इसका भौगोलिक विस्तार 24ºN से 27°N अक्षांश और 83ºE से 88°E देशान्तर के बीच फैला हुआ है। इसका कुल क्षेत्रफल 94,163 किमी०² है। पूरब से पश्चिम इसकी लम्बाई 483किमी० तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 345 किमी० है।

    बिहार राज्य के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में झारखण्ड, पूरब में प० बंगाल और पश्चिम में उत्तर प्रदेश अवस्थित है। इस राज्य का आकार लगभग आयताकार है। भारत के कुल क्षेत्रफल का 2.85% भाग बिहार के पास है। बिहार राज्य मुख्यतः मध्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में फैला हुआ है। समुद्रतल से बिहार की औसत ऊँचाई 53 मी० है। भौतिक बनावट और संरचना के दृष्टि से बिहार को तीन प्राकृतिक प्रदेश में बाँटते हैं:-

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

2. गंगा का मैदानी क्षेत्र

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी क्षेत्र

Natural Region of Bihar

चित्र: बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

      यह बिहार के उ०-प० भाग में (प० चम्पारण) अवस्थित है। यह शिवालिक पर्वत का ही एक भाग है। इसका विस्तार 546 किमी०² पर हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 160 मी० निर्धारित है। इस पहाड़ी क्षेत्र में दो स्पष्ट पर्वतीय श्रृंखलाएं हैं और दोनों पर्वत एक-दूसरे के समानान्तर उ०-प० दिशा से द०-पू० दिशा में नेपाल की सीमा के सहारे फैला हुआ है। इस पर्वत पदीय प्रदेश के सम्पूर्ण भाग को तीन भाग में बाँटकर अध्ययन करते है-

(i) रामनगर दून की पहाड़ी

(ii) सोमेश्वर की पहाड़ी

(iii) दून क्षेत्र

     रामनगर दून की पहाड़ी 214 km2 क्षेत्र पर फैला हुआ है। इसकी अधिकतम ऊंचाई 240 मी० है। इसकी अधिकतम चौड़ाई संतपुर के पास है। रामनगर दून 6-8 km चौड़ा है। यहाँ पर दक्षिणी श्रेणी के रूप में फैला हुआ है।

    सोमेश्वर श्रेणी त्रिवेणी नहर के शीर्ष भाग से शुरू होकर पूरब में भिखना थोरी दर्रा तक बिहार में फैला हुआ है। इसकी लम्बाई 74 किमी० और चौड़ाई 4.6 से 6.4 किमी० तक है। इसकी औसत ऊँचाई 457 मी० है। इस पर्वत में नदियों के द्वारा कई दर्दो का निर्माण हुआ है। जैसे सोमेश्वर दर्रा, भिखनाथोरी दर्रा, हरहा दर्रा इत्यादि प्रमुख हैं।

दून क्षेत्र-

    रामनगर दून और सोमेखर पहाड़ी के बीच में 22.5 किमी० लम्बा और समुद्रतल से 152 मी० ऊँचा एक घाटी है। जिसे दून घाटी से सम्बोधित करते हैं। उल्लेखनीय है कि विभाजित बिहार की सबसे ऊंची चोटी “सोमेश्वर की पहाड़ी” (874 मी०) है।

2.  गंगा का मैदानी भाग

     इसे बिहार का मैदान भी कहा जाता है। इसका विस्तार 90,650 km² भूभाग पर हुआ है। इस मैदान के उत्तर में शिवालिक पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में छोटानागपुर का पठार अवस्थित है। पश्चिम में इसकी चौड़ाई अधिक है जबकि पूरब में कम। इस मैदान का निर्माण हिमालय तथा प्रायद्वीय पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गयी मालवा के निक्षेपण से हुआ है। गंगा नदी इस मैदान के मध्य से होकर पश्चिम से पूरब दिशा में प्रवाहित होती है। इसका तात्पर्य है कि इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूरब दिशा की ओर हुआ है। गंगा नदी बिहार के मैदान को दो भागों में बाँट देती है।

(i) गंगा के उत्ती मैदानी भाग

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदानी भाग

(i) गंगा का उत्तरी मैदानी भाग

      गंगा नदी के उत्तर में पूरब से पश्चिम दिशा में फैला एक चौरस मैदान है जिसका क्षेत्रफल 57000 km2 है। इस मैदान का सामान्य ढाल उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर है। इसकी औसत ऊँचाई 76.2 मी० से भी कम है। इसका निर्माण गण्डक, बागमती, कोशी और महानन्दा नदी के द्वारा लायी गयी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान गण्डक के मैदान, बागमती का मैदान (मिथिला का मैदान), कोशी के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। इस मैदान में निम्नलिखित संरचना दिखाई देते हैं-

(a) भावर प्रदेश-

    इसका विस्तार नेपाल और बिहार के सीमामर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसक निर्माण नदियों के द्वारा लायी गई “बोल्डर क्ले” के निक्षेपण से हुआ है। इसकी चौड़ाई 8-16 किमी० के बीच है।

(b) तराई प्रदेश

    यहां का दूसरा महत्वपूर्ण संरचना तराई प्रदेश है। इसक विस्तार भावर के दक्षिणी भाग में हुआ है। इस प्रदेश में जगह-जगह पर दलदली भूमि भी मिलते हैं। इसी भूभाग पर विश्व की प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(c) बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश 

    गंगा नदी और उसके सहायक नदियों के द्वारा यहाँ कई अन्य स्थलाकृतियों का विकास हुआ है। जैसे- बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश।

    बाँगड़ प्रदेश वे हैं जहाँ नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा निक्षेपण का कार्य बंद हो चुका है और खादर संरचना वह है जहाँ पर मलवा का निक्षेपण आज भी जारी है।

      गंगा के उत्तरी मैदान में कई जगह प्राकृतिक बाँध, चौर, नदी दोआब का भी प्रमाण मिलता है। प्राकृतिक बाँध ऐसी स्थलाकृति है जो नदियों के तट के सहारे विकसित होती है। बाढ़ के दिनों में लोग इस पर आकर शरण लेते हैं।

    उत्तरी बिहार की नदियाँ मार्ग परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध है। नदियों के पुराने मार्ग को ही चौर कहा जाता है। दो नदियों के मध्यवर्ती भूभाग को नदी दोआब कहा जाता है। नदियों के बीच-2 में बालू के निक्षेपण से दियरा क्षेत्र का भी विकास हुआ है।

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदान

     इसका कुल क्षेत्रफल 33,670 किमी०² है। यह उत्तरी बिहार की तरह समतल नहीं है। इस मैदान के दक्षिणी भाग में छोटानागपुर का पठार और उसके कई छोटे-2 पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं। पहाड़ी के रूप में कैमूर की पहाड़ी, राजगीर की को पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, राजमहल की पहाड़ी, बांका की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी इत्यादि प्रमुख है। इस मैदान के दक्षिणी सीमा पर रोहतास का पठार, डुमरिया उच्च भूमि इत्यादि अवस्थित है। इस मैदान का निर्माण छोटानागपुर के पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर क्रमश: कर्मनाशा, सोन, पुनपुन, फल्गू, किऊल जैसी नदि‌याँ मिलती है।

    इस मैदान का सामान्य ढाल दक्षिण से उतर की ओर हुआ है। सोन का मैदान, मगध का मैदान, बिहारशरीफ- लखीसराय का मैदान और भागलपुर के मैदान के रूप में विभक्त है। गंगा नदी के किनारे जल्ला, टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इनके अलावे गंगा नदी पटना के पास प्राकृतिक बाँध का निर्माण करती है। पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र, मोकामा क्षेत्र और मोकामा के पास टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इस मैदान में ही आरा और बक्सर के बीच में सहार-संदेश क्षेत्र का निर्माण हुआ है।

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश

      बिहार के दक्षिणी सीमान्त भूगाग में विन्ध्यन श्रेणी का पूर्वी भाग और छोटानागपुर पठार का उत्तरी भाग अवस्थित है। छोटानागपुर के पठार के अधिकांश भाग ग्रेनाइट, नीस और शिष्ट जैसे चट्टानों से निर्मित है। विन्ध्यन श्रेणी का बिहार में विस्तृत श्रेणी कैमूर की श्रेणी कहलाती है जिसमें चूना पत्थर संरचना का विकास हुआ है।

   दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश में कई छोटी पहाड़ि‌याँ मिलती हैं। जैसे- बराबर की पहाड़ी, गया की पहाड़ी, जेटठियन की पहाड़ी, राजगीर की पहाड़ी, शेखपुरा की पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, बिहार शरीफ एवं जमालपुर की पहाड़ी इत्यादि प्रसिद्ध है। छोटानागपुर तथा कैमूर के पठार का अपरदित भाग ही बिहार में अवस्थित है। जिसकी औसत ऊँचाई 150-300 मी० है। यह भाग पूर्णतः विषम क्षेत्र है। छोटानागपुर पठार से निकलने वाली नदियाँ इसी सीमान्त प्रदेश को छोड़‌कर मैदानों में प्रविष्ट करती है। रोहतास से लेकर राजमहल की पहाड़ी तक कटक के रूप में यह ‌भाग अवस्थित है। कोडरमा की घाटी, चतरा की घाटी और कैमूर की घाटी छोटानागपुर पठार में प्रवेश हेतु द्वार उपलब्ध करवाती है।

निष्कर्ष:

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार का अधिकांश भाग मध्यवर्ती गंगा के मैदानी क्षेत्र में अवस्थित है। इसका उत्तरी भाग हिमालय को तथा दक्षिणी भाग प्रायद्वीपीय भात को छूती है। इस तह से यहाँ पर्वतों, पठारों एवं मैदानों का विषम संयोग पाया जाता है।


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5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


12. The Agro based industries in Bihar (बिहार में कृषि आधारित उद्योग)

12. The Agro based industries in Bihar

(बिहार में कृषि आधारित उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q. कृषि आधारित उद्योग तथा बिहार में उसका महत्त्व की चर्चा करें।

     बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। कृषि का तात्पर्य विभिन्न प्रकार फसल, पशुपालन और मत्स्यन से है। यहाँ कृषि पर आधारित कई उद्योगों का विकास किया गया है। जैसे-

1. चावल उद्योग:-

     बिहार एक प्रमुख चावल उत्पादक राज्य है। चावल प्राप्त करने के लिए धान को कूटकर तथा भूसा से अलग किया जाता है। सामान्यत‌या यह कार्य ग्रामीण इलाकों में घर-घर होता रहता है। लेकिन विद्युत चालित मीलों ने इसे औद्योगिक रूप दे दिया है। उत्तरी बिहार में इन मीलों की संख्या अधिक है क्योंकि गंगा के मैदानी भाग में धान की अच्छी उपज होती है। इस‌के अतिरिक्त बिहार के सभी जिलों में काफी संख्या में चावल मीले स्थापित की गई हैं।

2. चीनी उद्योग:-

       चीनी उद्योग बिहार का सबसे पुराना उद्योग है। उत्तर एवं मध्य बिहार में गन्ना उपजाने योग्य उपयुक्त मिट्टी एवं जलवायु है। गन्ना एक ह्रासमान उद्योग है। इ‌सीलिए चीनी उद्योग की अधिकतर मीले उत्पादन के क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं।

    बिहार में चीनी उद्योग के प्रमुख केन्द्र मोतीहारी, सुगौली, मझौलिया, चनपटिया, नरकटियागंज, मढ़ौरा, पंचरुखी, सासामुसा, गोपालगंज, हथुआ, मोतीपुर, डालमियानगर, सारण, समस्तीपुर, चम्पारण, दरभंगा इत्यादि हैं। बिहार में कुल चीनी मीलें 28 है लेकिन इनमें अधिकांशतः जर्जर एवं बीमार हो चुकी हैं तथा कुछ बंद भी हो गयी हैं। वर्तमान में बिहार में कुल चीनी मिलों की संख्या 11 है।

3. सूतीवस्त्र उद्योग:-

      बिहार में सूतीवस्त्र उद्योग गया, फुलवारी शरीफ में केन्द्रित हैं। इसकी अन्य छोटी-2 मीलों मुजफ्फरपुर, मुंगेर, भागलपुर, किशनगंज, बिहारशरीफ तथा मधुबनी में है। रेशमी वस्त्र उद्योग का विकास भागलपुर में हुआ है। ओबरा (औरंगाबाद) में बने दरी और कालीनों का विदेशों में निर्यात किया जाता है।

4. जुट उद्योग:-

     पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, किशनगंज और दरभंगा में 8.3 लाख टन से अधिक जूट का उत्पादन होता है। यहाँ इस उद्योग के लिए कच्चा माल तथा स्थानीय रूप से श्रमिक उपलब्ध है। कटिहार जूट उद्योग का प्रमुख केन्द्र है। इसके अतिरिक्त समस्तीपुर, चम्पारण, दरभंगा और सहरसा में जूट उद्योगों का विकास हुआ है।

5. तंबाकू उद्योग:-

     तम्बाकू उत्पादन में पूर्णिया, सहरसा, दरभंगा और मुंगेर का स्थान आता है। मुंगेर में एक सिगरेट का कारखाना, व्यापित है। सिगरेट के अतिरिक्त बीड़ी उद्योग का भी विकास राज्य के विभिन्न जिलों में हुआ है। बीड़ी निर्माण में मुंगेर, पटना तथा गया के प्रमुख स्थान हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरी बिहार में भी बीड़ी उद्योग का विकास हुआ है।

6. रबड़ उद्योग:-

      बिहार में आरा से 3 किमी० दूर जमीरा में और पटना, गया तथा मुजफ्फरपुर में कुछ रबड़ की कारखाने स्थापित हैं। यहाँ से छोटे पैमाने पर साइकिल और रिक्शा के टायरों का उत्पादन किया जाता है। इनके अतिरिक्त अन्य फसल आधारित उद्योगों में आटा मील, तेलधानी, हथकरघा, गुड़, खांडसारी, बेकरी इत्यादि आते हैं।

Agro based industries in Bihar

बिहार में पशुपालन

     बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बिहार की पशुओं में मानव, गाय, बैल, भैंस, घोड़ा, गधा, सूअर, भेड़, बकरी और कुक्कुट प्रमुख है। इन पशुओं पर आधारित यहाँ कई उद्योगों का विकास हुआ है। जैसे-

(i) शिक्षण संस्थान उद्योग

(ii) डेयरी उद्योग,

(iii) माँस उद्योग,

(iv) चमड़ा उद्योग,

(v) परिवहन उद्योग इत्यादि।

बिहार मत्स्यन पालन

      बिहार में आन्तरिक जलस्रोतों में मत्स्यन पालन का कार्य होता है। यहाँ गंगा तथा उसकी सहायक नदियों से मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। इसके अलावा छोटे-2 नदियों, तालाबों, तालों, पोखरो आदि में भी मत्स्यपालन होता है। बिहार सरकार 1975 ई० से मछलियों के अण्डों का उत्पादन तथा मत्स्यपालन के वैज्ञानिक पद्धति को अपनाकर मत्स्यपालन को प्रोत्साहित कर रही है। वर्तमान समय में भी बिहार सरकार मत्स्य पालन के लिए ऋण उपलब्ध करा रही है। मछुआरों को प्रशिक्षित कर रही है।

     बिहार की प्रमुख मछलियों में मांगुर, रोहू, कतला एवं भाखुर है। इसके साथ ही झींगा मछली, बचवा, पर्च, लोच, पयास, बुलेटस, गरई आदि मछलियों की माँग देश-विदेश में है। इसलिए आज निर्धन वर्ग ही नहीं बल्कि सम्पन्न वर्ग ने भी मतस्यपालन को उद्योग के रूप में अपनाया है।

बिहार में कृषि आधारित उद्योग का महत्व

        बिहार जैसे पिछड़े राज्य में कृषि आधारित उद्योगों का काफी महत्व है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में इसका काफी योगदान होता है। उपर्युक्त उद्योगों में कई बेरोजगारों को रोजगार मिलती हैं। इनसे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होती है। इन उद्योगों के उत्पादों से यहाँ के कई स्थानीय माँगों की पूर्ति होती है। जैसे- चावल, आटा, दाल, तेल, दुध, माँस, मछली, वस्त्र, बीड़ी, गुड़, चीनी इत्यादि।

निष्कर्ष:

     बिहार में कृषि आधारित उद्योगों के विकास भी अपार संभावनाएँ हैं। लेकिन यहाँ इनका विकास धीमी गति से हो रही है। इन उद्योगों के विकास में यहाँ कई बाधाएँ हैं। जैसे- पूँजी का अभाव, विद्युत का अभाव, अपराधिक घटनाएँ, रंगदारी, राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार इत्यादि। आवश्यता इस बात की है कि इन बाधाओं को दूर कर बिहार सरका को कृषि आधारित उद्योग के विकास प ध्यान देना चाहिए।


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20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


10. Industrial Region of Bihar (बिहार का औद्योगिक प्रदेश)

10. Industrial Region of Bihar

(बिहार का औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार को औद्योगिक प्रदेशों में विभाजित कीजिए तथा उन पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए।

      बिहार के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार के औद्योगिक कच्चे माल पाये जाते हैं। इन संसाधनों पर आधारित एक ही प्रकार के उद्योगों का एक विशेष क्षेत्र में समूहीकरण हुआ है और औद्योगिक सघनता विकसित हो गई है।

    उद्योगों के इस समूहीकरण के आधार पर इस राज्य को निम्नलिखित सात औद्योगिक प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है।-

1. चावल मिल का प्रदेश

2. चीनी उद्योग का प्रदेश

3. जुट उद्योग का प्रदेश

4. पश्चिमी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश

5. पूर्वी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश

6. सोन घाटी औद्योगिक प्रदेश

7. गया-गुरारु औद्योगिक प्रदेश

Industrial Region of Bihar

चित्र: बिहार उद्योग एवं औद्योगिक प्रदेश

1. चावल मिल का प्रदेश मानचित्र:-

     चावल मील उद्योग के रूप में पूरे राज्य में पाया जाता है फिर भी बिहार के उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र में इस उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है। धान का उत्पादन क्षेत्र मुख्यतः उत्तरी बिहार के मैदान तथा नेपाल की तराई क्षेत्र है। इसके आधार पर पश्चिम में रामनगर से लेकर पूर्व में किशनगंज तक चावल मिलों का विकास हुआ है।

मुख्य केन्द्र- रामनगर, नरकटियागंज, रक्सौल, अदापुर, बैरगनिया, सीतामढ़ी, जनकपुर रोड, जयनगर, झंझारपुर, जोगबनी और फारबीसगंज है।

    जनसंख्या की सघनता इन क्षेत्रों में होने के कारण उत्पादन का अत्यधिक खपत इन क्षेत्रों में ही हो जाता है।

2. चीनी उद्योग का प्रदेश:-

विस्तार- बिहार के उत्तरी-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र।

      यह बिहार का सर्वप्रमुख गन्ना उत्पादक प्रदेश है जो बागमती नदीं के पश्चिम और गंगा नदी के उतर में अवस्थित है। चीनी उद्योग का कच्चा माल गन्ना जो ह्रासमान पदार्थ है जिसके कारण चीनी उद्योग उत्पादन क्षेत्र में ही स्थित है।

मुख्य केन्द्र- प० और पूर्व चम्पारण, सिवान, गोपालगंज, सारण इत्यादि जिले आते है। वर्तमान में बिहार के 28 उद्योगों में से कार्यरत 11 मील यहाँ ही है। इसके अलावे अन्य मील भी है।

     इनके अलावा बिहार के भागलपुर तथा साहेबगंज क्षेत्र में 11 गुड़ के मिलें है तथा विभिन्न भागों में खाँडसारी का भी उत्पादन होता है।

    राज्य बँटवारे के बाद गन्ना आधारित अद्योग ही सबसे बड़ा उद्योग बन गया है। गन्ना उत्पादन पर ही चीनी उद्योग के साथ-साथ गुड़, खंडसारी, कागज, इथेनॅाल, पशु आहार एवं विद्युत-ऊर्जा, कार्बनिक खाद जैसे कई अन्य उद्योग निर्भर करते है।  चीनी उद्योग एक सामयिक उद्योग है जिनमें साल में करीब 145 दिनों तक काम होता है एवं राज्य में ईख उत्पादकों की संख्या लगभग 5 लाख है।

3. जुट उद्योग का प्रदेश:-

विस्तार- बिहार के उतरी-पूर्वी भाग में स्थित।

मुख्य केन्द्र- पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया जिले आते है। समीपवर्ती सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिलों में जूट की खेती होती है।

     जूट उद्योग का विकास मुख्य रूप से पूर्णिया एवं कटिहार में हुआ है। जहाँ जूट से टाट, बोरे इत्यादि बनाये जाते है।

4. पश्चिमी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- यह गंगा के किनारे स्थित पश्चिमी औद्योगिक प्रदेश है जिसका विस्तार बक्सर से मोकामा-बरौनी तक है। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से गंगा का दक्षिणी तटीय भाग आता है। गंगा नदी के उत्तर स्थित बरौनी और हाजीपुर भी क्रमशः राजेन्द्र पुल और महात्मा गाँधी सेतु के द्वारा इस क्षेत्र से जुड़ पाये है। 

मुख्य केन्द्र- बरौनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र है, जहाँ तेल- शोधक कारखाने, पेट्रो रसायन, ताप विद्युत रासायनिक खाद और दुग्ध उद्योग विकसित है।

      मोकामा में चमड़ा इत्यादि, हाजीपुर, पटना, फतुहा में स्कूटर तथा फुलवारीशरीफ में सूतीवस्त्र उद्योग का विकास हुआ है। इस सबके अलावे इन सब क्षेत्रों में चीनी उद्योग, प्लास्टिक उद्योग इत्यादि का भी विकास हुआ है।

5. पूर्वी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- गंगा नदी के किनारे स्थित पूर्वी औद्योगिक प्रदेश है जिसका विस्तार मुंगेर, जमालपुर से लेकर कहलगाँव तक है।

मुख्य केन्द्र- मुंगेर, जमालपुर तथा कहलगाँव है। मुंगेर में बंदूक और सिगरेट, जमालपुर में वर्कशॉप, नाथनगर तथा भागलपुर में रेशम तथा तसर, कहलगाँव में सुपर ताप विद्युत (1994 ई०) स्थित है। इससे औद्योगिक विकास को लाभ मिला है। इस उद्योगों के अतिरिक्त इन प्रदेशों में आटा, चावल और दाल की मिले तथा लकड़ी उद्योगों का विकास हुआ है।

6. सोन नदी-घाटी औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार:- बिहार के दक्षिण-पश्चिमी भाग में सोन नदी के तटीय क्षेत्र में स्थित है। इसका विस्तार, जपला से डालमियानगर तक है।

     यहाँ सीमेंट उद्योग, कागज उद्योग, लकड़ी उद्योग, पेपर बोर्ड उद्योग क्रमशः जपला, रोहतास, डालमियानगर में स्थित है। इसके अलावे इस औद्योगिक क्षेत्र में चीनी, रसायन, वनस्पति, चावल उद्योग इत्यादि का भी विकास हुआ है। यहाँ रेल सड़क और जल परिवहन की विशेष सुविधा है। सस्ते श्रमिक भी उपलब्ध है।

7. गया-गुरारू औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- यह छोटा औद्योगिक प्रदेश है जिसके अन्तर्गत गया और गुरारू आते है।

मुख्य केन्द्र- गया इसका प्रमुख औद्योगिक केन्द्र है जहाँ जूट और सूती वस्त्रोद्योग हस्तकरघा, कलात्मक मूर्तियाँ बनाने के उद्योगों का विकास हुआ है। गया और बोधगया के धार्मिक स्थल के कारण यहाँ होटल उद्योग भी स्थापित है। इन सब के अलावे इस क्षेत्र में अन्य उद्योगों का विकास भी हुआ है पर वे सीमित एवं औद्योगिक लाभ के दृष्टि से वे गौण है।

निष्कर्ष:

   बिहार का औद्योगिक प्रदेश बिहार के किसी एक ही भाग में न स्थित होकर के वरन पूरे क्षेत्र में विस्तृत है। वैसे तो प्रत्येक का अपना-2 महत्व है पर औद्योगिक लाभ के दृष्टिकोण से कम है जिसका कारण पूँजी का अभाव है अर्थात पूँजी एवं सरका की नीति का सहयोग हे तो बिहार के उद्योगों का अविष्य और भी उज्जवल हो सकता है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश की सरकार में यह हमें संभव दिखायी देता है।



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17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

9. Cause of Economic Backwardness of Bihar (बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण)

9. Cause of Economic Backwardness of Bihar

(बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण)



प्रश्न प्रारूप

Q1. बिहार क्यों प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद अविकसित है? व्याख्या कीजिए।

Q2. समृद्ध संसाधनों के बावजूद बिहार में औद्योगिक विकास धीमी क्यों है?

Q3. बिहार को पिछड़ा या गरीब राज्य क्यों माना जाता है?

      विभाजन के बाद बिहार मूलतः एक कृषि प्रधान राज्य हो गया है। यहाँ के 80% भूमि पर कृषि का कार्य किया जाता है और लगभग 87.7 % जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। अतः यहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और संस्कृति अभी भी व्याप्त है।

      ग्रामीण जनसंख्या का उच्च अनुपात, कृषि पर जनता की अधिक निर्भरता और प्रति व्यक्ति निम्न आय, बाढ़ तथा सिंचाई की समस्या ज‌हाँ बिहार के औद्योगिक पिछड़ेपन के सूचक है वहीं विशाल मानव संसाधन, सस्ते श्रम, जलविद्युत की उपलब्धता, सिंचाई कि अपार संभावनाएँ, नेपाल से लगती हुई अन्तरर्राष्ट्रीय सीमा बिहार में आर्थिक विकास की आशाएँ जगाती हैं। इन दोनों विचारों के चलते यह कहा जाता है कि “बिहार एक धनी राज्य है लेकिन यहाँ के लोग निर्धन है।” बिहार की अर्थव्यवस्था पिछड़े होने के निम्नलिखित कारण है-

1. बाढ़ और सूखे की समस्या:-

     गंगा का उत्तरी भाग बाढ़ की समास्या से पीड़ित है जबकि दक्षिणी भाग सूखे की समस्या से ग्रसित है। बिहार को एक अनोखा राज्य माना जाता है क्योंकि बिना बरसात हुए ही यहाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। इसक मुख्य कारण नेपाल से आने वाली सदावाहिनी नदियाँ है। बिहार के 38 में से 26 जिलें बाढ़ के समस्या से पीड़ित रहते हैं। गण्डक, बूढ़ी गण्डक, बागमती, कोसी, कमला बगान नदी घाटी क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष फसल तो लहललाते हैं लेकित बाढ़ के चलते किसान उन फसलों को घरों तक नहीं ला पाते हैं।

     पुनः गंगा के दक्षिणी भाग में प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली बर‌साती नदियाँ प्रवाहित होती है। इन नदियों पर जल संग्रहण का उपाय नहीं किये जाने के कारण सभी जल बेकार चले जाते हैं। पुनः सिंचाई की पूर्ण व्यवस्था नहीं होने के कारण किसान अपनी खड़ी फसलों को बचा नहीं पाते हैं। इसलिए बिहार का एक भाग जब बाढ़ की समस्या से जूझ रहा होता है तो दूसरी भाग सूखे की समस्या से जूझ रहा होता है।

2. सड़क बिजली को अपर्याप्तता:-

     बिहार का अधिकांश भाग बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आते हैं। यहाँ प्रति इकाई सड़क बनाने का खर्च बहुत अधिक आता है और जो सड़के बनती भी है, वे साल भर के अन्दर ही टूट-फूट जाती है। इसका एक कारण भौगोलिक है। लेकिन दूसरे कारण भी कम गंभीर नहीं है। जैसे- विमर्माण के क्रम में अनुसंधान का नहीं किया जाना, पैसों की बंदरबांट और घटिया सामग्री का इस्तेमाल इत्यादि।

    बिहार की बिजली कई घण्टों तक गायब रहती है। बिहार के आज भी कई क्षेत्र हैं जो लालटेन युग में जी रहे हैं। दूसरी ओर जिन क्षेत्रों में बिजली उपलब्ध है वहाँ तार काट लिये जाते हैं और जहाँ तार बच जाती है वहाँ बिजली चोरी किये जाते हैं और जो लोग बिजली का कनेक्शन लिए हुए हैं वे लोग समय पर बिल नहीं चुकाते हैं।

     बिहार में कोयला संसाधन का अभाव है और जो नदियाँ उपलब्ध हैं उस पर जल विद्युत् परियोजनाओं का निर्माण नहीं किला गया। फलतः बिहार राज्य को बिजली के लिए दूसरे राज्य के दया-दृष्टि पर निर्भर रहना पड़ता है।

3. प्रति व्यकि आय का नगण्य होना:-

       बिहार के प्रति व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत आय से निम्न है। निम्न आय के कारण बचत की क्षमता भी काफी निम्न और धीमी है। अतः निम्न आय वर्ग के लोग प्रतिभाशाली और व्यापार में दक्ष होने के बावजूद अपनी योजनाओं को अंजाम नहीं दे पाते हैं।

4. औद्योगिक निष्क्रियता:-

    बिहार में नवीन औद्योगिक नीति का अभाव, खनिज एवं वन आधारित उच्चे माल का अभाव, पिछड़ी मानसिकता, भ्रष्टाचार एवं लाल-फीताशाही, संस्थागत एवं संरचनात्मक सुविधाओं का अभाव, राजनीतिक निष्क्रियता, जातिवाद, रंगदारी में उलझी हुई समाज इत्यादि कुछ ऐसे कारण हैं जिसके चलते बिहार में औद्योगिक विकास नहीं हो रहा है। इसके आलावे जो यहाँ उद्योग है वे बंद होते जा रही है।

5. रोजगारोन्मुख शिक्षण और प्रशिक्षण का अभाव:-

    जापान एक ऐसा देश है जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का जबड़दस्त अभाव है फिर भी यह विश्व का एक विकसित राष्ट्र है। अगर इसी तर्ज पर सोचा जाए तो बिहार को क्यों नहीं एक विकसित राज्य बनाया जा सकता है? बिहार में कृषि आधारित उद्योगों को चलाने के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों का जबड़दस्त अभाव है।

     बिहार के विश्वविद्यालयों में 70% विद्यार्थी कला विषय लेकर पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक सोच का विकास कैसे हो सकता है। यहाँ रोजगारों उन्मुख शिक्षा, कम्प्यूटर, टाईपिंग, आउट सोर्सिंग, BPO आधारित शिक्षा का अभाव है। यहाँ पोलिटेक्नीक स्कूल, ट्रेनिंग स्कूल, प्रबंधन संस्थान नगण्य है। 

6. जनसंख्या विस्फोट:-

      बिहार भारत का तीसरा सबसे बड़ा जनसंख्या वाला राज्य है। लेकिन यहाँ की जनसंख्या गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और निरश्वरता से त्रस्त है। यहाँ के अधिकांश लोग कुशल एवं भाग्य प्रधान है। फलतः मानवीय संसाधन प्रचुर होने के बावजूद बिहार एक उपभोक्तावादी राज्य बन जाता है।

7. राजनीति अपराधीकरण का गठबंधन:-

    बिहार अपराधी राज्य का एक पर्याय बन चुका है। किडनैपिंग उद्योग का रूप ले चुका है। मेहनतकश इंसान दिनभर अगर श्रम करता है और शाम होते-2 अगर वह घर लौटता है तो इसकी गारंटी सरकार नहीं दे सकती है अर्थात यहाँ कानून और न्यायिक व्यवस्था काफी जर्जर है। राजनीतिक पार्टियाँ जाति के दुष्चक्र में फंसे रहने के कारण विकास की बात नहीं कर पाती है। राजनीतिक पार्टियों में इच्छा शक्ति का जबड़दस्त अभाव देखा जा सकता है।

अन्य कारण :-

     बिहार के पिछड़ेपन के पीछे कई अन्य कारण भी रहे हैं। जैसे-

     बिहार का एक भूमि बद्ध राज्य होना, समुद्री सीमा एवं बंदरगाहों का अभाव, बिहार में प्रत्यक्ष पूँजी निवेश की कमी, देशी विदेशी अप्रवासी भारतीयों की बिहार में कम रुचि, कला-संस्कृति का अभाव। जातिवादी एवं रूढ़ीवादी मानसिकता, ज्ञान-पर्यटन-मानव आधारित उद्योग के विकास पर ध्यान नहीं दिया जाना इत्यादि कुछ ऐसे करण हैं जो बिहार को एक पिछड़ा राज्य बनाते है।

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के पीछे कई कारण सक्रिय है। लेकिन बिहार के लोगों को इसे नियति मानकर नहीं चलना चाहिए क्योंकि हमारा इतिहास गवाह है कि जब-2 बिहार के लोग जागे हैं तब-2 भारत “सोने की चिड़ियाँ” कहलाया है।

    अतः वक्त आ चुका है कि बिहा के सभी जाति, धर्म के लोग एकजूट होकर बिहा के छवि को बदलने का प्रयास करें।



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1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

8. Industrial Backwardness of Bihar (बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन)

8. Industrial Backwardness of Bihar

(बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार के औद्योगिक पिछड़ेपन के कारणों का वर्णन करें।

      एकीकृत बिहार प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध था। बिहार विभाजन के बाद खनिज संसाधन, ऊर्जा संसाधन और वनीय संसाधन झारखण्ड राज्य में चले गये। प्राकृतिक संसाधन के रूप में बिहार में समतल भूमि, संदावाहिनी नदियाँ और प्रचुर मानवीय संसाधन बच गये हैं। बिहार विभाजन के बाद सभी बड़े उद्योग झारखण्ड में चले गये। बड़े उद्योग के रूप में मात्र बरौनी औद्योगिक संकुल बचा रह गया है। यह भी रुग्ण अवस्था के दौर से गुजर रहा है।

     बिहार की अधिकांश चीनी मीले बंद हो गयी हैं। डालमियानगर और बंजारी का सीमेंट कारखाना बंद हो चुका है। फतुहा में स्कूटर, मोकामा में चमड़ा उद्योग, पूर्णिया में कीटनाशक, गया, भागलपुर, डुमराँव (भोजपुर) का लालटेन और बाल्टी उद्योग, समस्तीपुर का अशोक पेपर मिल्स इत्यादि बन्द हो चुके हैं। इसका तात्पर्य यह है कि भारत के औद्योगिक मानचित्र के ऊपर से बिहार का औद्योगिक मानचित्र हट चुका है। स्वतंत्रता के पश्चात् जो भी बड़े उद्योग लगे वे सभी दक्षिण बिहार में थे। बिहार विभाजन के बाद प्राकृतिक संसाधनों के साथ-2 सभी बड़े उधोग भी झारखण्ड में चले गये।

      उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि बिहार उद्योग के मामले में काफी पिछड़ चुका है लेकिन, ऐसा नहीं है कि बिहार में उद्योगों की स्थापना नहीं की जा सकती है। बिहार राज्य में उद्योगों की स्थापना हेतु अनुकूल जलवायु उपलब्ध है। सस्ता श्रम, राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार उपलब्ध है। यहाँ कृषि के विकास की पूरी-2 संभावना है।

     बिहार में कृषि आधारित उद्योग, ज्ञान आधारित उद्योग, पर्यटन उद्योग, तकनीकी उद्योग, फूललुज उद्योग (चूड़ी, श्रृंगार, इलेक्ट्रॉनिक्स) इत्यादि का विकास कर पुनः औद्योगिक मानचित्र पर लाया जा सकता है लेकिन कई ऐसे कारण यहाँ मौजूद हैं जिसके कारण बिहार एक औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ राज्य है। इन कारणों की चर्चा नीचे के शीर्षकों में की जा रही है:-

औधोगिक पिछड़ेपन के कारण

1. लघु उद्योगों की उपेक्षा:-

     स्वतंत्रता के बाद एकीकृत बिहार में बड़े-2 उद्योग विकसित किये गये जबकि पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में कृषि और उससे संबंधित उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया। छोटे एवं लघु उद्योगों से प्रत्यक्षत: राज्य की आम जनता लाभान्वित होती है लेकिन बड़े-बड़े उद्योगों से राज्य की कुछ ही जनता लाभान्वित हो पाती है।

    बिहार में लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास पर जोर व दिये जाने के कारण औद्योगिक स्थिति काफी खराब है।

2. आधारभूत भूसंरचनाओं की कमी:-

     उद्योगों के विकास हेतु सड़क, पानी, बिजली, इत्यादि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए। बिहार में सड़‌के तो है। लेकिन अच्छी सड़‌कों का जबड़दस्त अभाव है। पुनः पटना जैसे महानगर में भी लगातार 24 घण्टे बिजली उपलब्ध नहीं हो पाती है। ऐसे में यहाँ उद्योगों का विकास कैसे हो सकता है। बिहार में पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध है लेकिन ये जल अनियंत्रित एवं बाढ़ के रूप में उपलब्ध है जिसका प्रबंधन आसान नहीं है।

3. कुप्रबंधन:-

    स्वतंत्रता के बाद बिहार में कई उद्योग स्थापित किये गये थे जिसकी चर्चा ऊपर की गई है लेकिन कुप्रबंधन के कारण सभी उद्योग या तो रुग्ण हो गये भा बन्द पड़े हैं।

4. पूंजी एवं बाजार की कमी:-

    बिहार में एक ओर औद्योगिक क्षेत्र में पूंजी निवेश की वातावरण का अभाव है। यहाँ प्रत्यक्ष पूँजी निवेश नहीं हो पा रही है। दूसरी ओर बिहार में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और गरीबी के कारण औद्योगिक वस्तुओं की माँग बहुत कम है अर्थात् बिहार के लोगों की क्रय क्षमता बहुत ही कम है। उपरोक्त कारणों के चलते बिहार में उद्योगों का विकास नहीं हो पा रहा है।

5. औद्योगिक वातावरण का अभाव:-

      नक्सलवाद, सामन्तवाद, भ्रष्टाचार, अशिक्षा जैसे सामाजिक कारण बिहार में औद्योगिक विकास हेतु वातावरण नहीं बनने देते है।

6. खनिज संसाधनों का अभाव:-

     बिहार में खनिज आधारित उद्योगों के विकास हेतु कच्चे माल का अभाव है। यहाँ पर लौह इस्पात, एल्यूमीनियम उधोग इत्यादि का विकास संभव नहीं है। इसी तरह वनों के अभाव में वनीय कच्चे माल पर आधारित वनीय उद्योगों का विकास संभव नहीं है।

7. पुरानी मशीन एवं तकनीक:-

    बिहार का जूट एवं चीनी उद्योग प्रमुख उद्योग रहा है लेकिन इनके मशीन और तकनीक काफी पुराने हो चुके हैं। सरकार के द्वारा तकनीकी उन्मूलन का कोई सकारात्मक प्रयास धरातल पर उतरता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है जिसके कारण पुराने उद्योग भी बंद हो गये हैं।

8. औद्योगिक नीति के अभाव:-

      बिहार राज्य में प्रारंभ से ही दूरदर्शी और विकासशील औद्योगिक नीति के अभाव रहा है।

निष्कर्ष:

   उपरोक्त बिन्दुओं के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बिहार में औद्योगिक पिछड़ेपन के कई कारण हैं। अतः सरकारी स्तर पर इस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए कि उपरोक्त समस्याओं पर विचार कर ऐसा औद्योगिक वातावण बनाया जाना चाहिए कि उद्योगपति औ पूँजीपति उद्योग लगाने के लिए स्वतः उन्मुख हो।



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7. बिहार में बाढ़

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10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

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15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

5. Drought in Bihar (बिहार में सूखा)

5. Drought in Bihar

(बिहार में सूखा)



प्रश्न प्रारूप

Q. सूखा से आप क्या समझते है? बिहार में सूखा के कारण, परिणाम तथा समस्या के समाधान में किये गये कार्यो की चर्चा करें।

    भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने बताया कि मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 cm या उससे कम हो तो सूखा की स्थिति कहलाती है। यह समयावधि मानसून के आगमन का है। इसलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है। भारत का दो-तिहाई क्षेत्र सूखा पीड़ित है। देश के एक तिहाई क्षेत्र में सूखा प्रकोप ज़्यादा गंभीर है, जहाँ 75 cm से कम वर्षा होती है।

     बिहार में दक्षिणी बिहार के कैमूर, रोहतास, गया, औरंगाबाद, नवादा, मुंगेर, जमुई, शेखपुरा, लखीसराय, भागलपुर, पटना, नालंदा और जहानाबाद के कुछ इलाके सूखा पीड़ित हैं। इनमें कई जिले बाढ़ एवं सूखा दोनों से पीड़ित हैं। जैसे टाल क्षेत्र वाले जिले बाढ़ से पीड़ित है और उनके दक्षिणी इलाके मानसून की असमानता में सूखे से भी पीड़ित हो जाते हैं। कुल मिलाकर बिहार का 20% क्षेत्र सूखा से पीड़ित है जिसे नीचे के रेखाचित्रों में देखा जा सकता है-

Drought in Bihar

बिहार में सूखा के कारण एवं समस्या

          बिहार में सूखा के मुख्य कारण निम्नलिखित है:-

(i) मानसून की अनिश्चिता एवं परिवर्तनशीलता

(ii) वर्षा का असमान वितरण

(iii) ढालयुक्त एवं पथरीली भूमि

(iv) वनों की कटाई

(v) बरसाती नदियाँ 

(vi) जल प्रबंधन का अभाव

     बिहार में सूखा ग्रस्त होने का मुख्य कारण मानसून की अनिश्चितता एवं परिवर्तनशीलता है। मानसून के कमजोर पड़ने से इन क्षेत्रों में कृषि करना कठिन हो जाता है। दक्षिण बिहार का मैदान ही सूखाग्रस्त है क्योंकि गर्मी के दिनों में यहाँ बहने वाली नदियाँ सूख जाती हैं जबकि हिमालय से बहने वाली नदियों में सालोंभर पानी रहता है। चूंकि दक्षिण बिहार की नदियाँ पठार के वर्षा प्रतिरूप पर निर्भर करती है। अतः यह जरूरी है कि पठारी भागों में इन नदियों को बांधकर जल संग्रह कर लिया जाता और गर्मी में उसका प्रयोग किया जाता।

     बेहतर जल प्रबंधन और इच्छा शक्ति के अभाव ने भी दक्षिणी बिहार के मैदान को सूखाग्रस्त बना दिया है। दक्षिणी बिहार के मध्य में जैसे पटना, नालंदा, जहानाबाद, औरंगाबाद, गया, नवादा तथा मुंगेर के कुछ इलाकों में वर्षा 100 cm से कम होती है। यह भी एक कारण है कि जिससे इन इलाकों को सूखाग्रस होने की संभावना बढ़ जाती है।

      गंगा के दक्षिणी मैदान की भूमि ढालयुक्त और पथरीली है। वहाँ की मिट्टी भी छिछली है जिनमें भूमिगत जल नहीं जा पाता और वर्षा का जल ऊपर से शीघ्र बहकर निकल जाता है। भूमिगत जल के कम होने के कारण गर्मी के दिनों में जल संकट गहरा हो जाता है। इस क्षेत्र में वनों के अतिशय कटने से भी मृदा में नमी की कमी हो गयी है जिससे कृषि प्रभावित होती है और सूखा का प्रकोप बढ़ जाता है।वनों के कटने से भी वर्षा की मात्रा कम हो गयी है।

सूखे से निपटने के उपाय

    सूखे से निपटने के लिए भारत एवं बिहार सरकार के द्वारा कई स्तरों पर प्रयास किये गये हैं लेकित सूखे की समस्या आज भी राष्ट्रीय समस्या के रूप में कायम है। पथरी क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 120 cm से अधिक वर्षा होती है जहाँ से दक्षिणी बिहार के मैदानी नदियों में जल आता है। मानसून के समय यह जल व्यर्थ ही गंगा में मिल जाता है। अगर इसे संग्रह कर लिया जाये तो बिहार में सूखे की समस्या नहीं रहेगी।

     दक्षिण बिहार के मैदानी भागों में धरातल थोड़ा उबड़-खाबड़ है। इन इलाकों के बेसिन क्रम में तालाब बनाकर पानी को संरक्षित रखा जा सकता है। इससे जहाँ-जहाँ एक ओर भूमिगत जल का भंडार जमा हो सकता है वहीं दूसरी ओर गर्मी में कृषि कार्य के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

    आज अधिक पेनेट्रेटिव गोजनाओं, पर्यावरण हितैषी, टिकाऊ विकास नीति, मानसून का सही आकलन पर विशेष जोर देने की जरूरत है। नदी-जोड़ योजना में तेजी लाने की आवश्यकता है। वनीकरण बहुत आवश्यक है। स्थानीय जल सुविधा व वर्षा जल संक्षण प विशेष ध्यान व जागरुकता लाने की जरूरत है।



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20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

4. Soils of Bihar (बिहार की मिट्टियाँ)

4. Soils of Bihar

(बिहार की मिट्टियाँ)



       भूपटल के सबसे ऊपरी भाग में मिलने वाला असंगठित पदार्थ को मिट्टी कहते हैं। यह जैविक एवं अजैविक तत्वों के ऋतुक्षरण से प्राप्त मलवा के द्वारा निर्मित होता है। मृदा वनस्पति का मूल आधार होता है। मृदा का निर्माण उच्चावच, ढाल, जलवायु, चट्टानों की संरचना इत्यादि पर निर्भर करता है। बिहार की 90% क्षेत्र जलोढ़ मृदा के अन्तर्गत आता है। शेष 10% भाग अन्य प्रकार की मिट्टी है। भौतिक, रासायनिक तथा रचनात्मक विशेषताओं के आधार पर बिहार में 8 प्रकार की मिट्टी पायी जाती है।

1. पर्वतपदीय मिट्टी/भाँवर मिट्टी

2. तराई मिट्टी

3. बांगड़ मिट्टी

4. खादर मिट्टी

5. बलसुन्दरी मिट्टी

6. टाल मिट्टी

7. बल्थर या लाल-पीली मिट्टी

8. लाल बलूई मिट्टी

1. पर्वतपदीय मिट्टी या भावर मिट्टी

     पर्वतपदीय मिट्टी प० चम्पारण के उ०-प० भाग में शिवालिक पर्वत के पदीय भाग में मिलती है। यह नदियों के द्वारा लायी गई बोल्डर क्ले, कंकड़-पत्थर से निर्मित भूभाग है। कहीं-2 अधिक वर्षा एवं नमी के कारण दलदली मिट्टी का प्रमाण मिलता है जिस कारण प्रकृति अम्लीय होती है तथा जैविक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है।

2. तराई मिट्टी

    तराई मिट्टी का विस्तार पर्वतपदीय मिट्टी के दक्षिणी भाग में हुआ है। इसका विस्तार प० चम्पारण से किशनगंज तक हुआ है। यह इसकी चौड़ाई 5 से 7 किमी० है। इसमें पर्याप्त मात्रा में नमी और हयूमस पायी जाती है। इसका रंग भूरा पीला, प्रकृति अम्लीय होती है। अत्यधिक नमी वाले क्षेत्र में यहाँ भी दलदली मिट्टी का विकास हुआ है। यह मिट्टी गन्ना, धान और जूट कृषि के लिए प्रसिद्ध है।

3. बाँगड़ मिट्टी

    इसे भांगर भा पुरानी जलोढ़ मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी का विकास तराई मिट्टी के दक्षिण में एक पट्टी के रूप में हुआ है। इसका सर्वाधिक विस्तार पूर्णिया और सहरसा के कोसी नदी घाटी क्षेत्र में हुआ है और ज्यों-2 पश्चिम की ओर जाते हैं त्यों-2 इसकी चौड़ाई कम होते जाती है।

    इस मिट्टी में चुने की मात्रा अधिक होने के कारण क्षारीय होती है। थोड़ा-बहुत बाँगड़ मिट्टी का विस्तार मुंगेर, भागलपुर, कैमूर और बक्सर जिला में भी देखा जा सकता है। इन जिलों में इस मिट्टी को “केवाल” मिट्टी कहा जाता है। इसका रंग गाढ़ा-भूरा और काला होती है। सिंचाई की सुविधा वाले प्रदेश में धान, गेहूँ की खेती की जाती है और असिंचित प्रदेशों में तेलहन और दलहन की खेती की जाती

4. खादर मिट्टी

     इसे “नवीन जलोढ़ मिट्टी” कहा जाता है। इसका निर्माण बाढ़ द्वारा लायी गयी मिट्टी के कारण होता है। इसका रंग भूरा और उर्वरता अधिक होती है। खादर मिट्टी में रेत बड़े पैमाने पर पायी जाती है। खादर मिट्टी में गेहूँ, धान और गन्ना के लिए उपयुक मानी जाती है। यह मिट्टी गंगा की घाटी, गण्डक, कोसी और महानन्दा नदी के निचली घाटी प्रदेश में पायी जाती है।

5. बलसुन्दरी मिट्टी

    यह बाँगड़ मिट्टी का ही एक विशिष्ट रूप है जिसमें बालू और क्ले की मात्रा अधिक होती है। इसका विस्तार सारण, गोपालगंज, सहरसा दरभंगा, मुजफ्फरपुर जैसे जिलों में देखा जा सकता है। सारण और गोपालगंज में कहीं-2 बलसुन्दरी मिट्टी के ऊपर लवणीय मिट्टी का विकास हुआ है। बलसुन्दरी मिट्टी मक्का, गन्ना, गेहूँ, आम, लीची इत्यादि की खेती के लिए प्रसिद्ध है।

6. टाल मिट्टी

   टाल मिट्टी गंगा के दक्षिणी भाग में तट के सहोर 8-10 किमी० चौड़ी पट्टी में पायी जाती है। इस मिट्टी के निर्माण में गंगा नदी के द्वारा लायी गयी जलोढ़ को तटीय भागों में निक्षेपण करने से हुआ है। यह अत्याधिक उर्वर मिट्टी है। इसकी विशेषताएं खादर और बांगड़ मिट्टी से मिलती-जुलती है। वर्षा ऋतु में बाढ़ के पानी के कारण खरीफ फसल का उत्पादन नहीं हो पाता है लेकिन रबी की फसल बड़े पैमाने पर उगायी जाती है।

7. बल्थर या लाल-पीली मिट्टी

    इस मिट्टी का निर्माण छोटानागपुर से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से हुआ है। इसका रंग पीला या लाल होता है। यह मिट्टी कैमर पठार, राजमहल की पहाड़ी में पायी जाती है। इसमें जल-संग्रह करने की क्षमता कम होती है। लेकिन लोहे की मात्रा पर्याप्त होती है। यह सामान्यतः मोटे अनाजों के लिए प्रसिद्ध है।

8. लाल बलूई मिट्टी

     लाल बलूई मिट्टी का विस्तार कैमूर और रोहतास के पठारी भागों में देखा जा सकता है। इसमें बालू की मात्रा अधिक होती है। इसकी उर्वरा शक्ति भी कम होती है। यह भी मोटे अनाजों के लिए प्रसिद्ध है।

Soils of Bihar

चित्र: बिहार में मृदा का वितरण

निष्कर्ष

    इस तह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार में स्थानीय विशेषताओं के कारण अलग-2 क्षेत्र में अलग-2 मृदा का विकास हुआ है।


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32. The functionalsim in Geography (भूगोल में कार्यात्मकवाद)

32. The functionalsim in Geography

(भूगोल में कार्यात्मकवाद)



प्रश्न प्रारूप

2. भूगोल में कार्यात्मकवाद की विवेचना करें ।

(Discuss the functionalsim in Geography.)

उत्तर- भिन्न-भिन्न विज्ञानों और भिन्न-भिन्न काल में कार्यात्मकवाद की परिभाषाएँ भी भिन्न-भिन्न स्वरूप लिए हैं। ‘क्रिया अथवा कार्य’ (Function) का तात्पर्य नीचे पाँच रूपों में व्यक्त है:

(i) समारोह अथवा उत्सव हेतु जन-समुदाय क्रियाएँ (विशेष-अवसर)

(ii) कार्य-भार अथवा कर्त्तव्य (राजनीतिक अर्थ)

(iii) एक ‘चर’ का दूसरे ‘चर’ से संबंध का फलन (गणितीय अर्थ)

(iv) जीवधारियों के संवारने हेतु क्रियाएँ (जीव विज्ञान व समाज विज्ञान)

(v) व्यवसाय (भूगोल के सन्दर्भ में आर्थिक क्रियाएँ)

     तात्पर्य है कि “सरल शब्दों में कार्यात्मकवाद व्यवसायों से जुड़ी अवधारणा है। वह समाज के कार्यों अथवा साामजिक व्यक्तियों की क्रियाएँ हैं।” विश्व को देखने का यह दृष्टिकोण एक ऐसा तंत्र है जो भिन्न-भिन्न, परन्तु अन्तः निर्भर बने तंत्रों का संकुल है। इसकी सम्मिलित क्रियाएँ पुनरावृत्तिजनक है, और पूर्वानुमानित हैं। इनका आकार-कार्य संबंधित है और यह सभी को अबाध बनाए रखने का तंत्र है-

     कार्यात्मकवाद के आधारभूत नियम निम्नलिखित हैं-

(i) समाजों का मूल्यांकन उनकी समस्तता (Wholeness) में किया जाना चाहिए।

(ii) घटित हुई सामाजिक क्रियाएँ वातावरण की अन्योन्याश्रित प्रकृति है। अनेक स्थितियों में ये कारण भी अनेक होते हैं।

(iii) सामाजिक तंत्र प्रायः साम्यावस्था की स्थिति (State of Equilibrium) है।

(iv) कार्यात्मकतावादी समाज के इतिहास में कम, परन्तु सामाजिक अन्तःक्रिया में अधिक रुचि रखते हैं।

(v) कार्यात्मकतावादियों के प्रयास सामाजिक ढाँचे के यौगिक घटकों के मध्य अन्तर्सम्बन्धों की खोज में निहित होते हैं।

      जीन ब्रून्स जैसे भूगोलवेत्ता एवं उनके समकालीन विद्वानों के शोध कार्यों में कार्यात्मक अथवा क्रियात्मक अभिगम उनकी रचनाओं में देखे जा सकते हैं। उन्नीसवीं सदी के अन्त में और बीसवीं सदी के प्रारम्भ काल में फ्रांसीसी विद्वानों को अविभाज्य समस्तता (Indivis- ible Wholeness) बताया। ‘प्रेदश’ (Region) को कार्यात्मक इकाई का जैविक क्षेत्र कहा जो उसके विभागों के योग से भी अधिक उच्च-स्तर की इकाई था और जीववत् क्रियाओं में बंधा था।

      आजकल भूगोल में कार्यपरकता की अवधारणा महत्त्वपूर्ण है। लोग मुंबई, टाटानगर और गुलमर्ग की पहचान क्रमशः एक प्रधान बन्दरगाह, लौह-इस्पात निर्माण केन्द्र और सैलानियों के स्थल के रूप में ही करते हैं। लघु नगरों की पहचान भी उनकी केन्द्र स्थानीय क्रियाओं व गुणों द्वारा की जाती है। इसी आधार पर उनका पदीय श्रृंखला-क्रम (Hierarchy) निर्धारित होता है। प्रत्येक स्थान को उसके दो प्रकार के व्यवसायों, एक ‘प्रकट’ (Manifest Function), और दूसरा ‘अप्रकट’ (Latent Function) के रूप में जाँचा जा सकता है। उदाहरणवत् टाटानगर का लोहा-इस्पात निर्माण कार्य-व्यवसाय प्रकट बना है, जबकि वहाँ के अन्य कार्य-शैक्षिक, सामाजिक, आदि ‘अप्रकट’ व्यवसाय हैं।

     कार्यात्मकतावाद की अलोचना संकल्पनात्मक व कार्य-पद्धतियों, दोनों आधारों पर की जाती है। कार्यात्मकतावाद भौगोलिक यथार्थता को एक संतुलित दशा (Equilibrium) में देखने की संकल्पना है। इसके विपरीत प्रयोजनमूलक (Teleology) एक ऐसा तंत्र है जो भौगोलिक यथार्थता को स्थिर (Static) मानकर उद्देश्यपरक घटना समझती है और परिवर्तनशील है।

     समाज को एक तंत्र में संरचित बना कहने से अन्य समकालीन समस्याएँ, जैसे गरीबी, अकाल, रोग, प्रजातीयता आदि की व्याख्या अछूती ही रह जाएगी। यथार्थता अपूर्ण ही प्रकट होगी। एक तंत्र सीमित उद्देश्य की ओर उन्मुख है, और अन्तर्सम्बन्धित अनेक उपतंत्र व प्रक्रियाएँ महत्त्वहीन ही समझी जाती है। कार्यात्मकतावाद की यह मुख्य कमी है।

     सामाजिक नियंत्रण में विश्वास व्यक्त करने के कारण कार्यात्मकवाद की आलोचना होती है, क्योंकि उस आधार पर परिवर्तनशील दृश्य जगत् की यथार्थता की व्याख्या नहीं हो सकती। सामाजिक परिवर्तन को कार्यात्मकवाद स्पष्ट नहीं करता है।

     तार्किक और पद्धति के आधार पर कार्यात्मकवाद की आलोचना सोद्देश्यवादियों ने की है। दृश्य-जगत् द्वारा स्थान की यथार्थता और स्थान का अधिग्रहण कारण परक नहीं है। (Not by Reference of Causes) अर्थात् स्थानिक घटना कारण-मूलक नहीं घटित बनी है। यह प्रयोजन मूलक घटित बनी है, क्योंकि स्थान को किसी प्रयोजन के लिए उपयोग में लिया गया। (A Given Situation by Reference to Ends Which Determine Its Course) दृश्य-जगत् में प्रकृति ने गिद्धों को इस उद्देश्य हेतु स्थान दिया कि वे शव (मृत जीवों) से पृथ्वी की सतह को मुक्त रखें।

     यद्यपि इसी कार्य के लिए वस्तु-जगत् में अन्य विकल्प (Alternatives of Substitutes) भी है। परन्तु, विकल्पों को समान प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र (Eco-System) का ही होना चाहिए। ऐस्किमो ने गाड़ी व अग्नि जैसे विकल्पों को प्रयोग में लाकर आर्कटिक जीव जगत् के नाजुक तंत्र को अव्यवस्थित (Up-Set) किया है।

     उपर्युक्त तर्कपूर्ण विवरण से कार्यात्मकतावाद में निम्नलिखित छः अवधारणाओं का उपयोग भूगोलवेत्ताओं द्वारा किया जाता है। ये अवधारणाएँ दृश्य-जगत की यथार्थता में अन्त: संबन्धित हैं-

(i) कार्य-व्यवसाय,

(ii) कार्यपरक विकल्प,

(iii) उद्देश्य,

(iv) प्रारूप-संवार, स्व-नियंत्रण अथवा यथा स्थिति

(v) अनुकूलता, और

(vi) एकीकरण।

   भूगोल में कार्यपक प्रदेश (Functional Region) से अभिप्राय प्रदेश का समस्तता में बंधी संचित इकाई के रूप में कार्य सम्पादन से है। वह अपने समस्त तंत्र में आंतरिक एवं बाह्य-तंत्रों की क्रियाओं द्वारा आवश्यकताओं की पूर्ति कर उद्देश्यमूलक प्रदेश है।

31. The Post-modernism and Feminism in Geography (भूगोल में उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद)

31. The Post-modernism and Feminism in Geography

(भूगोल में उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद की विवेचना करें।

(Discuss the Post-modernism and Feminism in Geography.)

उत्तर- मानवीय ज्ञान, दर्शन और समाजिक विज्ञानों व कला में आजकल उत्तर आधुनिकता का आन्दोलन चला है। वह आधुनिक भूगोल में ऐतिहासिकता की प्रतिक्रिया है। ऐतिहासिकतावाद का जोर व्यक्तियों एवं सामूहिक घटनाओं के काल क्रमानुसार वर्णन पर होता है और यह स्थानिकता को नजर अंदाज करता है।

सोजा (Soja, 1989) की राय में ऐतिहासिकतावाद सामाजिक जीवन पर ऐतिहासिक सन्दर्भ की अतिवादी दृष्टि है। वह भौगोलिक अथवा स्थानिक सोच को सामाजिक सैद्धांतिक विश्लेषण के दौरान हाशिए में धकेल देता है। काल की महत्ता में ‘स्थान’ गौण रह जाता है। इससे सामाजिक-जगत् की परिवर्तनशीलता का भौगोलिक निर्वचन अस्पष्ट रह जाता है।

     भूगोल में उत्तर आधुनिकता का जोर सामाजिक और भौगोलिक जाँच-पड़ताल के दौरान खुलेपन पर आधारित है। यह विषमांगता से युक्त पचमेल प्रयोग है। इसमें कलात्मक प्रयोग व राजनीतिक सशक्तता सम्मिलित है। इसका उद्भव स्थापत्य कला व साहित्य के सिद्धान्तों में निहित है। इसके केन्द्र बिन्दु अथवा नाभि (Core) की पहचान कठिन है।

डियर (Dear, 1944) के अनुसार- “Post-modernity is everywhere, from literature, design, art, architecture, philosophy, mass media, clothing, style, music and television. Post modernism raises urgent questions about place, space and landscape in the production of social life.”

अर्थात् उत्तर आधुनिकता सभी ओर है, वह साहित्य में, कला व डिजायन में, सत्यासत्य में, दर्शन और जनसंचार साधनों में, पोशाक के तौर-तरीकों व संगीत, दूरदर्शन सभी में मौजूद है।

     सामाजिक जीवन को गतिवान रखने में उत्तर आधुनिकता स्थान, क्षेत्र और दृश्य-जगत् के बारे में आवश्यक प्रश्नों को खड़ा करता है।

    उत्तर आधुनिकता का समर्थन करने वालों का तर्क है कि सामाजिक व ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की रचना भिन्न-भिन्न स्थानों व प्रदेशों में भिन्न-भिन्न स्वरूपों में हुई है, इसलिए ऐतिहासिक धारा सर्वत्र समान रूप से प्रवाहित नहीं बनी है। उदाहरणवत् आजकल के उपन्यासों की संरचना अस्त-व्यस्त है और आजकल की स्थापत्य कला मूल्यों से वचित बन उठी है।

    भूगोलवेत्ता ने समकालीनता की समस्या को बहुत पहले ही पहचाना जैसा कि डारबी (Darby) ने इंगित किया-

   ऐतिहासिक तथ्यों के सिलसिले को प्रस्तुत करने की अपेक्षा भौगोलिक तथ्यों के क्रमों को व्यक्त करना अधिक कठिन है। घटनाएँ एक के पश्चात दूसरी नाटकीय रूप में समयबद्ध घटित होती हैं। उनको समय बद्ध लिपिबद्ध करना सरल है, परन्तु उनको स्थान में सान्निध्य बनाना कठिन है।

  भौगोलिक विवरण अनिवार्यतः कठिन क्रिया है, जबकि ऐतिहासिक वर्णन अपेक्षाकृत सरल है। डियर (1986) ने उत्तर आधुनिकतावाद को तीन घटकों में विभक्त किया है-

(1) उत्तर आधुनिक शैली,

(2) उत्तर आधुनिक विधि और

(3) उत्तर आधुनिक काल।

(1) शैली रूप में:-

     उत्तर आधुनिकता साहित्य व साहित्यिक समालोचन में शैली रूप में व्यक्त है जहाँ से वह फिल्म, डिजायन, कला, फोटोग्राफी और स्थापत्य में फैला। इसकी सामान्य दिशा और संरचना में समरूपता व अनुरूपता का अभाव प्रवेश कर गया। स्थापत्य शैली की आलोचना उसके दिखावे में भिन्नता, रंग, डिजायन व प्रतिमा-विज्ञान के आधार पर की गई है। वह मात्र उथली व ऊपरी सतही बन शेष रही।

(2) विधि रूप में:-

     विधि रूप में उत्तर आधुनिकता सार्वभौमिक सत्य से परहेज करती है और इसके सोच में सभी कुछ समाया हुआ था। इसका किसी भी अर्थ में प्रयोग होने लगा और विधि निराधार बन उठी। अतः, इसका मूल्यांकन ही दुर्लभ बन गया। इससे रचना सिद्धान्त ही भिन्न भिन्न बन उठा और लेखक को संस्कृति, वर्ग, लिंग आदि सभी प्रभावित बनने लगे जिससे लेखक की स्थिति ही डगमगा गयी। विधि स्वयं लड़खड़ा गयी और विकल्प भी ढीले व कमजोर बन गए। लेखन-विधि में अस्थिरता विकसित हो गई।

       मानव भूगोल में ओलसन (Olsson, 1980) जो रचना के बिखराव के प्रारम्भिक समर्थक थे, उनको नवोन्मेष के अभ्यासी के रूप में जाना जाता है। रचना की तोड़-मरोड़ वस्तुतः अस्थिर विधि का ही परिणाम है।

(3) काल-अवधि के रूप में:-

     उत्तर आधुनिकतावाद का युग उसे ही माना जा सकता है जब संस्कृति सहित दार्शनिक सोच में परिवर्तन उत्पन्न हुआ। भूमण्डीलय अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति का विकास बदले स्वरूप में प्रकट बना और विलम्बित पूँजीवादी सांस्कृतिक प्रकट हुई जो भूतकालीन युग की संस्कृति से बिलकुल भिन्न है।

      नए युग की इस संस्कृति के अन्तर के अध्ययन की विशेषताओं में अनिश्चितता, कृत्रिम, घिसे-पिटे पुराने कुरुचिपूर्ण रंग-ढंग भरे पड़े हैं। अव्यवस्था को ही व्यवस्था मान लिया गया और मुख्य जोर दिया गया विषमता एवं अनूठे कृत्यों पर (ग्रिगरी 1989) ‘न्यूयार्क टाइम्स’ से उद्धृत टिप्पणी की सार्थकता उत्तर आधुनिकतावाद के विषय में व्यक्त है- “The great lesson of the 20th century is that all the great truths are false,” अर्थात्, 20वीं सदी की सबसे बड़ी सीख यही है कि सभी महान् ‘सत्य’ असत्य सिद्ध हुए हैं।

     मानव भूगोल के विद्धानों ने स्थानिक विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए आधुनिकतावाद की ‘व्यवस्था’ (System) पर जोर दिया परन्तु, आनुभाविक प्रेक्षणों (Empirical Observations) ने सिद्ध किया कि आधुनिकतावाद में अव्यवस्था (Disorder) के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यह ऐसी अव्यवस्था है जिसमें न तो कोई लागू करने हेतु सिद्धांत है और न विश्व व्यापक सत्य। बार्न्स (Barnes, 1996) आधुनिकतावाद के आलोचकों के हाथों में दार्शनिक सोच का ऐसा मंत्र आ गिरा जो-

     “आधुनिकतावाद को ‘अव्यवस्था भरा जगत्’ कहने में संकोच नहीं है। हम जिस प्रकार के आधुनिक जगत् में इस समय रह रहे हैं वह नव सैद्धांतिक अतिसंवेदनशीलता से भर उठा है, जहाँ जो कुछ भी करें, सभी सही मान लिया जाता है। क्षेत्र में व्याप्त विभिन्नताएँ भी ऐसी अव्यवस्थित बन गयी हैं। (Gregory, 1989)”

    वस्तुतः मानव भूगोल में उत्तर आधुनिकतावाद उत्तरकालीन प्रतिमान अथवा प्रकरण हैं जिनमें न तो कोई सुरुचिपूर्ण सोच और न यथार्थ। इसके समर्थकों ने वातावरणीय, नियतिवाद, आदि तंत्रों को नकार दिया। 1950 से 1980 के मध्य विकसित भौगोलिक अभिगमों का उत्तरकालीन आधुनिकवाद में कोई स्थान नहीं रहा। वे यह भी स्वीकार नहीं करते कि सामाजिक जीवन में किसी प्रकार की भूमण्डलीय सुसंगति है और प्रति दिन का जन-जीवन प्रणाली किसी पूर्व-शैली और मूल्यों द्वारा संचालित बनी हैं।

    उत्तर आधुनिकवादी ‘क्षेत्रीय’ विभिन्नताओं के सोच की ओर लौटे अवश्य हैं, परन्तु यह वापसी भिन्न प्रकार की है जिसमें ऐसे विश्व की सोच है जो अतिसंवेदनशीलता से भरी है, जहाँ न कोई नीति, न सिद्धांत और न संरचना ही है। वहाँ विषमता, विशिष्टता (व्यवस्था रहित) और अनूठापन जो कुछ भी करने, सोचने और बरतने में संकोच नहीं रखते। इनके मतानुसार “… we need, to go back in parts on the question of areal differentiation, but armed with a new theoretical sensivity towards the world in which we live and to the ways in which we live and to the ways in which we represent it.” (Gregory)

उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद (Post-modernism and Feminism)

    जाति प्रजाति के अतिरिक्त अनेक महत्वपूर्ण संबंधों में से लिंग का तत्व भी उत्तर-आधुनिक साहित्य से संबंधित है। नारीत्व भूगोल आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में दैनिक जन-जीवन से अन्तर्सम्बन्धित है। दूसरे रूप से व्यक्त करें तो यह लिंग-कारक है जो आजकल असमानता और प्रताड़ना जैसे सामाजिक अभिशाप का शिकार है।

      जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में नारी के प्रति भेद-भाव किया जाता है और नारी-दमन समाज में व्यापक बन चुका है। नारी विषयक भेद-भाव को उजागर बनाना और उसका विरोध भूगोल पेशेवरों में अध्ययन के अनेक उद्देश्यों में से एक उद्देश्य है।

जॉनसन (1989) के अनुसार नारीवाद भूगोल में महिलाओं के सामान्य अनुभवों की पहचान करना, पुरुषों द्वारा दमन के प्रति उनका प्रतिरोध और उसको अन्त करने की प्रतिबद्धता आदि विषय सम्मिलित है। नारीवाद भूगोल का उद्देश्य ‘नारी अभिव्यक्ति को प्रकट बनाना और अपने को नियंत्रित करना’ है। भूगोल का सोच और भौगोलिक अभ्यास प्रधानरूप से लिंग-दोष से ग्रसित बना है। भूगोल में केन्द्रित पितृ सत्ता और लैंगिकता केन्द्रित रहे हैं। इनसे मुक्ति राजनीतिक उपायों से मिलेगी।

रोज (Rose, 1993) जैसे नारीवादी भूगोलवेत्ताओं ने जोर देते हुए व्यक्त किया है कि-

1. भूगोल का व्यवस्थित विषय ऐतिहासिक रूप से पुरुष प्रधान है।

2 भूगोल- पेशे में महिलाओं को मात्र निरीह माना गया है और इसी रूप में संरिक्षत किया। वस्तुतः महिलाओं को भूगोल ने हाशिए पर लाकर उनकी उपेक्षा की और उनको सताया है।

3. ‘नारीवाद’ भूगोल के प्रोजेक्टों एवं शोध-विषयों से अछूता विषय बना रहा, और

4. पुरुषों द्वारा भूगोल में प्रभुत्व के कारण इसके दूरगामी दुष्परिणाम निकले हैं। स्थानों अथवा क्षेत्रों और भू-दृश्य जगत् के निवर्चन एकांगी हैं जहाँ प्रेक्षणों व आनुभाविक ज्ञान केवल पुरुष-दृष्टि-प्रधान है।

    अतएव, नियमानुरूप भूगोल विज्ञान (The Discipline of Geography) पुरुष-प्रधान (Masculinist) ही है जिसमें महिलाओं से संबंधित सोच की उपेक्षा है। लिंग भेद-भाव, वस्तुतः मानवीय कृत्य है। समाज के प्रभुत्वशाली समूहों ने समाज में अपने ही दृष्टिकोण से दृश्य-जगत् एवं प्रकृति को देखा और निर्वचित किया। यह भी कहें तो अत्युक्ति नहीं है कि पुरुषों ने अपने द्वारा की गई धरातल की व्याख्या को समाज पर थोपा है। उनके भौगोलिक विवरण स्त्री-पुरुष भेद-भाव की ओर इंगित नहीं बने हैं। वे केवल जाति-प्रजाति और वर्गों तथा यौन-उन्मुख भेदों से भरे हैं।

       उत्तर आधुनिक मानव भूगोलवेत्ताओं ने इस दिशा में निम्नांकित रूप-रेखा शोध हेतु प्रस्तुत की। इसके प्रधान विषय हैं-

1. नीति-संगत दार्शनिकता, नैतिक भूगोल और भूगोलवेत्ताओं का सदाचरण (Moral Philosophy, Moral Geographies and the Geographer’s Morality):-

    इसके अन्तर्गत भूगोल में आर्थिक केन्द्र बिन्दु के स्थान पर जीवनोपयोगी नैतिक-संरचना को विकसित बनाना है।

2. सामाजिक भेद-भाव की प्रक्रियाएँ (Social Differentiation):-

     इसमें जाति, प्रजाति, वर्ग, यौनाचरण, आयु व स्वास्थ्य विषयक सराहना की और ध्यानाकर्षण द्वारा स्थानिक विभिन्नताओं एवं परिवर्तनशीलता का निर्वचन करना सम्मिलित है।

3. ताक (टांड) की रचना और सीमांकन (Shelf Construction):-

      भूगोलविदों द्वारा इसमें विभिन्न श्रेणियों के व्यक्ति व्यक्तियों में परस्पर संबंध और मनोविश्लेषणात्मक साहित्य में ऐसे विषयों की चर्चा जिनका पूर्व में उल्लेख नहीं हुआ है।

4. भूमण्डलीय और प्रदेशीयता (Globality and Territoriality):-

      इसमें स्थानों में व्यक्तियों व समूहों की अवस्थिति विषयक चर्चा और उनके सांस्कृतिक अभ्यासों का निर्वचन सम्मिलित है, और

5. समाज, संस्कृति और प्राकृतिक वातावरण (Society, Culture and Natural Environment):-

     इसके अन्तर्गत विषयों में ‘प्रकृति’ एवं ‘वातावरण’ की सामाजिक रचना की व्याख्या और वातावरणीय समस्याओं के निराकरण हेतु अपनाए गए अभिगमों की महत्ता का उल्लेख होना चाहिए।

     उत्तर आधुनिकता और तर्क प्रधान उत्तरकालीन नारीवाद का मन्तव्य है कि भूगोल में एक पृथक श्रेणी के रूप में महिलाओं की स्थिति, समस्या और स्थानिक निर्वचन को अलग-अलग समूहों से जोड़ा जाए तथा भिन्न उनकी आवश्यकताओं औ अनुभवों की व्याख्या की जाए जो अभी तक भूगोल साहित्य में नदाद सामग्री है।

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