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1. India with neighboring countries (पड़ोसी देशों के साथ भारत)

1. India with neighboring countries
(पड़ोसी देशों के साथ भारत)



हमारे देश का नाम- भारत अर्थात इण्डिया है।

भारत का अन्य नाम- हिन्दुस्तान, आर्यावर्त, भारतवर्ष, जम्मूद्वीप, हिन्द,

भारत का नाम भारत एक पौराणिक राजा दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर पड़ा है।

➤ भारत का संवैधानिक नाम- ” India that is Bharat.”

भारत को इण्डिका से सबसे पहले यूनानियों ने सम्बोधित किया।

जबकि अरबवासियों ने भारत को सबसे पहले हिन्दुस्तान से सम्बोधित किया। (अमीर खुसरो)

भारत को आंग्ल भाषा में इंडिया कहते है।

‘इण्डिया ‘ शब्द की उत्पति “Indus” (सिन्धु) नदी से हु‌आ है।

फारसवासी ‘स’ अक्षर का उच्चारण ‘ह’ के रूप में करते हैं। फलतः ‘सिन्धु शब्द से हिन्दू शब्द की उत्पति हुई और हिन्दू से हिन्दुस्तान शब्द की उत्पति हुई।

भारत के उतरी भाग को आर्यावर्त और दक्षिणी भाग को ‘दक्षिणावर्त’ कहते हैं।

भारत की चौहद्दी

उतर- हिमालय, (तिब्बत) चीन, अफगानिस्तान, नेपाल

पश्चिम- पाकिस्तान, अरब सागर

पूरब- म्यानमार, बंगाल की खाड़ी, बाँग्लादेश, इण्डोनेशिया

दक्षिण- हिन्द महासागर, श्रीलंका, मालदीप।

India with neighboring

भारत के पड़ोसी देशों के साथ लगने वाले सीमा की लम्बाई-

(1) बांगलादेश के साथ- 4096 Km (सबसे ज्यादा)

(2) चीन- 3917 km

(3) पाकिस्तान- 3310 km

(4) नेपाल- 1761 km

(5) म्यानमार- 1458 km

(6) भूटान- 587 Km

(7) अफगानिस्तान- 80 km (सबसे कम)

भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश के पास जो सीमा लगती है उसे मैकमोहन रेखा कहते हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित सीमा को रेड क्लीफ लाइन और L.O.C. (Line of Control) के नाम से जानते हैं।

पाक अधिकृत कश्मीर और भारत अधिकृत कश्मीर के बीच की सीमा रेखा L.O.C. (Line of Control) के नाम से जानते हैं।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच स्थित सीमा को डूरण्ड लाइन ( लम्बाई 2430 km) के नाम से जानते हैं। 

भारत का कुल क्षेत्र- 32,87,263 km²

➤ भारत की स्थल सीमा की कुल लम्बाई 15,200 km है।

भारत की समुद्री सीमा की कुल लम्बाई मुख्य भूमि के साथ 6100 km और द्वीपीय सीमा के साथ 7516.6 km है।

भारत की स्थलीय सीमा सर्वाधिक बांग्लादेश के साथ लगती है।

भारत का सबसे लम्बा समुद्री तट वाला राज्य गुजरात है।

➤ समुद्री सीमा की लम्बाई के अनुसार राज्यों का क्रम-

1. गुजरात

2. आन्ध्र प्रदेश 

3. तमिलनाडु

4. महाराष्ट्र

प्रादेशिक समुद्री सीमा 12 समुद्री मील निर्धारित किया गया है।

समुद्र में प्रादेशिक समुद्री सीमा (12 नॉटिकल मील) तक भारत का सम्पूर्ण अधिकार है।

➤ प्रादेशिक समुद्री सीमा के बाद जो समुद्र आती है उसे संलग्न क्षेत्र कहते हैं। संलग्न क्षेत्र प्रादेशिक सीमा से 24 समुद्री मील तक होता है। यह वह क्षेत्र है जिससे कोई देश सीमा शुल्क वसूलने, साफ-सफाई और वित्तीय अधिकार (कारोबार करने का अधिकार) का अधिकार रखते हैं।

संलग्न क्षेत्र के आगे 200 समुद्री मील तक की समुद्री सीमा को एकांकी आर्थिक क्षेत्र (EEZ- Exclusive Economic Zone ) कहते हैं।

➤ एकांकी (अनन्य) आर्थिक क्षेत्र में भारत देश को 3 तरह के अधिकार प्राप्त है-

(i) 200 समुद्री मील तक भारत नये द्वीपों का निर्माण कर सकता है।

(ii) वैज्ञानिक परीक्षण करने का अधिकार।

(iii) प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का संपूर्ण अधिकार

नोट: 1 मानक मील = 1.6 km (1.584 km) 

1 समुद्री मील या नॉटिकल मील = 1.8 Km (1.824 km)

प्रादेशिक समुद्री सीमा वह सीमा है जिस पर राज्यों का अधिकार होता है।

एकांकी आर्थिक क्षेत्र संलग्न क्षेत्र के आगे 200 नॉटिकल मील तक निर्धारित किया गया है। इस पर केन्द्र सरकार का अधिकार होता है।
भारत पूर्णतः उत्तरी गोलार्द्ध का देश है।

भारत का देशान्तरीय विस्तार- 68º7′ पूर्वी देशांतर से 97º25′ पूर्वी देशांतर

भारत के मुख्य भूमि का अक्षांशीय विस्तार- 8º4′ उत्तरी अक्षांश से 37º6’उत्तरी अक्षांश

अगर द्वीपों के साथ भारत का अक्षांशीय विस्तार देखा जाय तो पाते हैं कि इसका विस्तार 6º4′ उत्तरी अक्षांश से 37º6′ उत्तरी अक्षांश तक है।

भारत एशिया महाद्वीप का एक प्रमुख देश है।

यह एशिया के दक्षिण भाग में स्थित है।

भौगोलिक संरचना के दृष्टि से भारत गोण्डवाना भूखण्ड पर स्थित है।

भारत के मध्य से (प्रयागराज के पास मिर्जापुर से) 82º½ पूर्वी देशान्तर रेखा गुजरती है।

कर्क रेखा (23º½ उत्तरी अक्षांश रेखा) भारत के 8 राज्यों से होकर गुजरती है।

(1) गुजरात

(2) राजस्थान

(3) मध्य प्रदेश (M.P)

(4) छतीसगढ़

(5) झारखण्ड

(6) पश्चिम बंगाल (W.B.)

(7) त्रिपुरा

(8) मिजोरम

मुख्य भूमि का सबसे दक्षिणी बिंदु कन्याकुमारी विषुवत रेखा से 876 किमी० दूरी पर स्थित है।

भारत की आकृति- चतुष्कोणीय

क्षेत्रफल के दृष्टि से भारत विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा देश है। विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4% भूमि भारत के पास है।

भारत से बड़े देशों का क्रम- रूस> कनाडा> संयुक्त राज्य अमेरिका> चीन> ब्राजील> ऑस्ट्रेलिया> भारत

भारत का उत्तर से दक्षिण की लम्बाई- 3214 किमी०

पूरब से पश्चिम की लम्बाई- 2933 किमी०

भारत के तीन ओर समुद्र स्थित है, इसलिए दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहते हैं।

प्रायद्वीपीय भारत 1600 किमी० दुरी तक समुद्र में घुसा हुआ है।

भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु- इंदिरा प्वाइंट / पिग्मेलियन प्वाइंट/पारसान प्वाइंट (ग्रेट निकोबार में)

यह 2004 में सूनामी लहरों के कारण समुद्र में जलमग्न हो गया।

➤ भारत के मुख्य भूमि पर कन्याकुमारी (केप कोमोरिन) सबसे दक्षिण में स्थित है।

सबसे उत्तरी भाग- इंदिरा कॉल (जम्मू और कश्मीर)

सबसे पश्चिमी भाग- राजहर क्रिक (झील) / गौरमाता (मूल द्वारिका)

सबसे पूरबी भाग- वालांगू/कीवुतु (अरुणाचल  प्रदेश)

भारतीय उपमहाद्वीप = भारत, पाकिस्तान, नेपाल भूटान, बांग्लादेश

भारत के उत्तर-पश्चिम, उत्तर तथा उत्तर-पूर्वी सीमा पर नवीनतम वलित पर्वत है।

इसके दक्षिण का भूभाग उत्तर में चौड़ा है और 22º उत्तरी अक्षांश से हिन्द महासागर की ओर संकरा होता गया है।

1869 में स्वेज नहर के खुलने से भारत-यूरोप के बीच की दूरी 7000 किमी० कम हो गई है।

➤ बांग्लादेश की सीमा पर स्थिति राज्य-

(1) पश्चिम बंगाल (W.B)

(2) असम

(3) मेघालय

(4) त्रिपुरा

(5) मिजोरम

➤ म्यानमार की सीमा पर स्थित राज्य-

(1) अरुणाचल प्रदेश

(2) नागालैण्ड

(3) मणिपुर

(4) मिजोरम

➤ भूटान की सीमा पर स्थित भारतीय राज्य-

(1) सिक्कीम

(2) पश्चिम बंगाल (W.B)

(3) असम

(4) अरुणाचल प्रदेश

➤ नेपाल की सीमा पर स्थित भारतीय राज्य-

(1) उत्तराखण्ड

(2) उत्तर प्रदेश (UP)

(3) बिहार

(4) पश्चिम बंगाल (W.B)

(5) सिक्किम

➤ चीन की सीमा पर स्थित भारतीय राज्य-

(1) लद्दाख

(2) हिमाचल प्रदेश

(3) उतराखण्ड

(4) सिक्किम

(5) अरुणाचल प्रदेश

➤ पाकिस्तान की सीमा पर स्थित भारतीय राज्य-

(1) जम्मू और कश्मीर

(2) पंजाब

(3) राजस्थान

(4) गुजरात

श्रीलंका भारत से पाक जलसन्धि और मन्नार की खाड़ी से अलग होता है।

निकोबार और सुमात्रा ग्रेट चैनल से विभक्त होता है।

भारत के अक्षांश और देशान्तर का विस्तार लगभग 30º है।

अक्षांश का प्रभाव दक्षिण से उत्तर की ओर दिन और रात की अवधि पर पड़‌ता है।

ध्रुवों की ओर जाते समय दो देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटती जाती है, जबकि दो अक्षांशों के बीच की दूरी हर जगह एक-सी रहती है।

अक्षांश रेखाओं के मानों से ज्ञात होता है कि भारत का दक्षिणी हिस्सा उष्णकटिबंध में और उत्तरी हिस्सा उपोष्ण कटिबंध/ कोष्ण शीतोष्ण कटिबंध में स्थित है।

यही स्थिति देश में भू-आकृति, जलवायु, मिट्टी के प्रकारों और वनस्पति में पाई जाने वाली भारी भिन्नता के लिए उत्तरदायी है।

भारत के अक्षांक्ष रेखाओं के मानों का अंतर- 30º (लगभग)

भारत के देशांतर रेखाओं के मानों का अंतर- 30º (लगभग)

➤ अरुणाचल प्रदेश में सूर्योदय के होने के 2 घंटे बाद द्वारका में सूर्योदय होता है।

विश्व के देशों में आपसी समझ के तहत मानक याम्योत्तर को 7½º या 7°30′ देशांतर के गुणक पर चुना जाता है। यही कारण है कि 82º30′ याम्योत्तर को भारत की मानक याम्योत्तर चुना गया है।

भारतीय मानक समय ग्रीनवीच माध्य समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।

कुछ देश ऐसे हैं जिनमें अधिक पूर्व-पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक देशान्तर रेखाएँ हैं। जैसे-USA में 6, रूस में 7 समय कटिबंध है। 

➤ भारत के राज्य एवं संघीय क्षेत्र

राज्य

क्रमांक राज्य  राजधानी
1. अरुणाचल प्रदेश ईटानगर
2. असम दिसपुर
3. बिहार पटना
4. छतीसगढ़ रायपुर
5. गोवा पणजी
6. गुजरात गांधीनगर
7. हरियाणा चंडीगढ़
8. हिमाचल प्रदेश शिमला
9. झारखण्ड राँची
10 कर्नाटक बंगलोर
11. केरल तिरुवनन्तपुरम
12. मध्य प्रदेश भोपाल
13. महाराष्ट्र मुम्बई
14. मणिपुर इम्फाल
15. मेघालय शिलांग
16. मिजोरम आइजोल
17. नागालैंड कोहिमा
18. ओड़िसा भुवनेश्वर
19. पंजाब चंडीगढ़
20. राजस्थान जयपुर
21. सिक्किम गंगटोक
22. तमिलनाडु चेन्नई
23. तेलंगाना हैदराबाद
24. त्रिपुरा अगरतला
25. उतराखंड देहरादून
26. उत्तर प्रदेश लखनऊ
27. पश्चिम बंगाल कोलकात्ता
28. आंध्र प्रदेश हैदराबाद, अमरावती

केंद्र शासित प्रदेश

क्रमांक केंद्र शासित प्रदेश राजधानी
1. अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह पोर्ट ब्लेयर
2. चंडीगढ़ चंडीगढ़
3. दादरा तथा नगर हवेली और दमन एवं दीव दमन
4. जम्‍मू एवं कश्‍मीर  ग्रीष्मकालीन राजधानी- श्रीनगर और शीतकालीन राजधानी- जम्मू-तवी
5. लद्दाख लेह
6. लक्षद्वीप कावारती
7. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली दिल्ली
8. पुडुचेरी (पांडिचेरी) पुडुचेरी

➤ भारत की राजधानी- नई दिल्ली

➤ क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत के 5 बड़े राज्यों का क्रम- राजस्थान (सर्वाधिक बड़ा), मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात

➤ क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत के सबसे छोटा राज्य- गोवा (3702 km2)

➤ क्षेत्रफल की दृष्टि से बिहार का स्थान- 13वाँ

➤ क्षेत्रफल की दृष्टि से भात के सबसे बड़ा केंद्र शासित प्रदेश- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

➤ क्षेत्रफल की दृष्टि से भात के सबसे छोटा केंद्र शासित प्रदेश- लक्षद्वीप

➤ उत्तरी पूर्वी भारत के 7 राज्यों को “Seven Sister State” कहते है।



पड़ोसी देशों के साथ भारत से सम्बंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर



1. प्राचीन भारतीय भौगोलिक मान्यता के अनुसार भारतवर्ष किस द्वीप का अंग था?

(a) पुष्कर द्वीप

(b) जम्बू द्वीप

(c) कांच द्वीप

(d) कुश द्वीप

[read more] (b) जम्बू द्वीप [/read]

2. सर्वप्रथम इण्डिया शब्द का प्रयोग भारत के लिए किस भाषा में किया गया?

(a) उर्दू

(b) ग्रीक

(c) फारसी

(d) अरबी

[read more] (b) ग्रीक [/read]

3. भारत की मुख्य भूमि की दक्षिणी सीमा है-

(a) 6°4′ उत्तरी अक्षांश

(b) 7°4′ उत्तरी अक्षांश

(c) 8°4′ उत्तरी अक्षांश

(d) 6°8′ उत्तरी अक्षांश

[read more] (c) 8°4′ उत्तरी अक्षांश [/read]

4. भारतीय मानक समय आधारित है-

(a) 80° पूर्व देशान्तर पर

(b) 80° पश्चिम देशान्तर पर

(c) 82°30′ पूर्व देशान्तर पर

(d) 82°30′ पश्चिम देशान्तर पर

[read more] (c) 82°30′ पूर्व देशान्तर पर [/read]

5. भारत का प्रमाणिक समय उस स्थान का स्थानीय समय है, जो स्थित है-

(a) दिल्ली के समीप

(b) कोलकाता के समीप 

(c) प्रयागराज के समीप

(d) भोपाल के समीप

[read more] (c) प्रयागराज के समीप [/read]

6. भारतीय मानक समय व ग्रीनविच समय में अन्तर है-

(a) 5½ घंटे

(b) 2½ घंटे

(c) 6½ घंटे

(d) 5 घंटे

[read more] (a) 5½ घंटे [/read]

7. भारत का धुर दक्षिणी भाग की भूमध्य रेखा से दूरी कितनी है?

(a) 776 किमी०

(b) 867 किमी०

(c) 876 किमी०

(d) 916 किमी०

[read more] (c) 876 किमी० [/read]

8. भारत की स्थलीय सीमा की लम्बाई कितनी है?

(a) 6100 किमी०

(b) 7516.5 किमी०

(c) 1200 किमी०

(d) 15200 किमी०

[read more] (d) 15200 किमी० [/read]

9. द्वीपों सहित भारत के तट रेखा की लम्बाई कितनी है?

(a) 6100 किमी०

(b) 6200 किमी०

(c) 7516.5 किमी०

(d) 8000 किमी०

[read more] (c) 7516.5 किमी० [/read]

10. भारत की उत्तर से दक्षिण तक की लम्बाई है-

(a) 2933 किमी०

(b) 3033 किमी०

(c) 3133 किमी०

(d) 3214 किमी०

[read more] (d) 3214 किमी० [/read]

11. भारत की पूर्व से पश्चिम तक की लम्बाई है-

(a) 2933 किमी०

(b) 3033 किमी०

(c) 3133 किमी०

(d) 3214 किमी०

[read more] (a) 2933 किमी० [/read]

12. भारत की तट रेखा की लम्बाई है-

(a) 6100 किमी०

(b) 6200 किमी०

(c) 6175 किमी०

(d) 6500 किमी०

[read more] (a) 6100 किमी० [/read]

13. भारत का क्षेत्रफल विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का कितना है?

(a) 2.2%

(b) 2.4%

(c) 2.8%

(d) 3.2%

[read more] (b) 2.4% [/read]

14. भारत के कुछ क्षेत्रफल का कितना प्रतिशत भाग पर्वतीय क्षेत्र (माध्य समुद्र तल से 2135 मीटर या अधिक ऊँचाई) के अन्तर्गत आता है?

(a) 10.7%

(b) 18.6%

(c) 27.7%

(d) 43.0%

[read more] (a) 10.7% [/read]

15. सम्पूर्ण भारत के कितने प्रतिशत भू-भाग पर पर्वत और पहाड़ियों का विस्तार पाया जाता है?

(a) 10.7%

(b) 18.6%

(c) 29.3%

(d) 43.0%

[read more] (c) 29.3% [/read]

16. सम्पूर्ण भारत के कितने प्रतिशत भू-भाग पर पठार का विस्तार पाया जाता है?

(a) 10.7%

(b) 18.6%

(c) 27.7%

(d) 29.3%

[read more] (c) 27.7% [/read]

17. सम्पूर्ण भारत के कितने प्रतिशत भू-भाग पर मैदान का विस्तार पाया जाता है?

(a) 10.7%

(b) 18.6%

(c) 27.7%

(d) 43.0%

[read more] (d) 43.0% [/read]

18. भारत की प्रादेशिक जल सीमा (Territorial water) समुद्र तट से कितने समुद्री मील की दूरी तक है?

(a) 12 मील

(b) 24 मील

(c) 111 मील

(d) 200 मील

[read more] (a) 12 मील [/read]

19. भारत का संलग्न क्षेत्र (Contiguous zone) प्रादेशिक जल सीमा के आगे कितने समुद्री मील की दूरी तक है?

(a) 12 मील

(b) 24 मील

(c) 100 मील

(d) 200 मील

[read more] (b) 24 मील [/read]

20. भारत का एकान्तिक आर्थिक क्षेत्र (Exclusive economic zone) संलग्न क्षेत्र के आगे कितने समुद्री मील की दूरी तक है?

(a) 100 मील

(b) 200 मील

(c) 300 मील

(d) 400 मील

[read more] (b) 200 मील [/read]

21. भारत में समुद्री तट रेखा वाले राज्यों की संख्या कितनी है?

(a) 7

(d) 13

(c) 9

(b) 8

[read more] (c) 9 [/read]

22. सबसे लम्बी तटीय रेखा वाला राज्य है-

(a) महाराष्ट्र

(b) गुजरात

(c) आ० प्र०

(d) तमिलनाडु

[read more] (b) गुजरात [/read]

23. निम्नलिखित में से किस राज्य की तट रेखा सर्वाधिक लम्बी है?

(a) केरल

(b) महाराष्ट्र 

(c) आ० प्र०

(d) तमिलनाडु

[read more] (c) आ० प्र० [/read]

24. कौन-सी अक्षांश रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है?

(a) कर्क रेखा

(b) मकर रेखा

(c) विषुवत रेखा

(d) आर्कटिक रेखा

[read more] (a) कर्क रेखा [/read]

25. कर्क रेखा भारत के कितने राज्यों से होकर गुजरती है?

(a) 5

(b) 6

(c) 7

(d) 8

[read more] (d) 8 [/read]

26. निम्नलिखित में से किस राज्य से होकर कर्क रेखा नहीं गुजरती है?

(a) उड़ीसा

(b) गुजरात

(c) राजस्थान

(d) प० बंगाल

[read more] (a) उड़ीसा [/read]

27. निम्नलिखित में से किस राज्य से होकर कर्क रेखा गुजरती है?

(a) बिहार

(b) उड़ीसा

(c) उत्तर प्रदेश

(d) गुजरात

[read more] (d) गुजरात [/read]

28. भारत की मुख्य भूमि का दक्षिणी नोक (Point) है-

(a) केप केमोरिन

(b) कैलीमेयर प्वाइण्ट

(c) इन्दिरा प्वाइण्ट

(d) नॉरीमन प्वाइण्ट

[read more] (a) केप केमोरिन [/read]

29. भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु है-

(a) इन्दिरा कॉल

(b) इन्दिरा प्वाइण्ट

(c) कैलीमेयर प्वाइण्ट

(d) नॉरीमून याहुण्ट

[read more] (b) इन्दिरा प्वाइण्ट [/read]

30. इन्दिरा प्वाइण्ट का अन्य नाम है-

(a) पारसन प्वाइण्ट

(b) ला-हि-चिंग

(c) पिगमेडियन प्वाइण्ट

(d) इनमें से सभी

[read more] (d) इनमें से सभी [/read]

31. निम्नलिखित में से कौन-सा स्थान भूमध्य रेखा के निकटतम स्थित है?

(a) केप केमोरिन

(b) रामेश्वरम्

(c) इन्दिरा प्वाइण्ट

(d) इन्दिरा कॉल

[read more] (c) इन्दिरा प्वाइण्ट [/read]

32. भारतीय भूमि का सर्वाधिक उत्तरी भाग है

(a) इन्दिरा प्वाइण्ट

(b) पारसन प्वाइण्ट

(c) पिगमेलियन प्वाइण्ट

(d) इन्दिरा कॉल

[read more] (d) इन्दिरा कॉल [/read]

33. भारत का दक्षिणतम स्थान इन्दिरा प्वाइण्ट निम्नलिखित में से कहाँ स्थित है?

(a) तमिलनाडु

(b) केरल

(c) लक्षद्वीप

(d) अंडमान-निकोबार द्वी० स०

[read more] (d) अंडमान-निकोबार द्वी० स० [/read]

34. भारत की मुख्य भूमि को रामेश्वरम् द्वीप से कौन अलग करता है?

(a) पाक जलसंधि

(b) दस डिग्री चैनल

(c) पम्बन चैनल

(d) नौ डिग्री चैनल

[read more] (c) पम्बन चैनल [/read]

35. आदम का पुल (Adam’s bridge) निम्नलिखित में से किन दो देशों के मध्य स्थित है?

(a) भारत एवं पाकिस्तान

(b) भारत एवं बांग्लादेश

(c) भारत एवं श्रीलंका

(d) भारत एवं म्यान्मार

[read more] (c) भारत एवं श्रीलंका [/read]

36. दस डिग्री (10°) चैनल किसके बीच स्थित है?

(a) छोटा अंडमान एवं बड़ा अंडमान

(b) छोटा अंडमान एवं कार निकोबार

(c) छोटा निकोबार एवं कार निकोबार

(d) छोटा निकोबार एवं बड़ा निकोबार

[read more] (b) छोटा अंडमान एवं कार निकोबार [/read]

37. डंकन पास (Duncan Pass) किसके बीच स्थित है?

(a) उत्तरी अंडमान एवं मध्य अंडमान

(b) दक्षिणी अंडमान एवं मध्य अंडमान

(c) दक्षिणी अंडमान एवं छोटा अंडमान

(d) कार निकोबार एवं छोटा निकोबार

[read more] (c) दक्षिणी अंडमान एवं छोटा अंडमान [/read]

38. भारत और श्रीलका को पृथक करने वाला जलडमरूमध्य क्या कहलाता है?

(a) मलक्का जलसन्धि

(b) डोवर जलसन्धि

(c) पाक जलसन्धि

(d) हार्मुज जलसन्धि

[read more] (c) पाक जलसन्धि [/read]

39. श्रीलंका को भारत से पृथक करती है-

(a) बंगाल की खाड़ी

(b) विन्ध्यन पर्वत श्रेणी

(c) पामीर ग्रंथि

(d) मन्नार की खाड़ी

[read more] (d) मन्नार की खाड़ी [/read]

40. भारत और चीन के बीच कौन-सी रेखा सीमा निर्धारण करने का कार्य करती है?

(a) रेडक्लिफ रेखा

(b) डूरण्ड रेखा

(c) मैकमहोन रेखा

(d) इनमें से कोई नहीं

[read more] (c) मैकमहोन रेखा [/read]

41. भारत एवं पाकिस्तान को विभाजित करने वाली रेखा कहलाती है-

(a) 38वीं समानान्तर

(b) रेडक्लिफ रेखा

(c) मैकमहोन रेखा

(d) इरण्ड रेखा

[read more] (b) रेडक्लिफ रेखा, व्याख्या: भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारण के लिए 1947 में सर सिरिल रेडक्लिफ द्वारा खींची गई रेखा को रेडक्लिफ रेखा (Radcliffe Line) कहा जाता है। [/read]

42. भारत के सुदूर पूर्व में कौन-सा देश भारत के साथ सर्वाधिक लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा बनाता है?

(a) चीन

(b) म्यान्मार

(c) थाईलैंड

(d) वियतनाम

[read more] (b) म्यान्मार [/read]

43. भारत एवं चीन के बीच सीमा निर्धारित करने वाली मैकमहोन रेखा निम्नलिखित में से किस प्रदेश के उत्तरी सीमा पर खींची गई है?

(a) जम्मू-कश्मीर

(b) उत्तर प्रदेश

(c) हिमाचल प्रदेश

(d) अरुणाचल प्रदेश

[read more] (d) अरुणाचल प्रदेश [/read]

44. निम्नलिखित में से किस देश के साथ भारत की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा नहीं लगती है?

(a) पाकिस्तान

(b) बांग्लादेश

(c) भूटान

(d) श्रीलंका

[read more] (d) श्रीलंका [/read]

45. निम्नलिखित में से कौन-सा देश भारतीय उपमहाद्वीप के अन्तर्गत शामिल नहीं किया जाता है?

(a) पाकिस्तान

(b) नेपाल

(c) श्रीलंका

(d) बांग्लादेश

[read more] (c) श्रीलंका [/read]

46. निम्नलिखित में से किस भारतीय राज्य की समुद्रतटीय सीमा सबसे छोटी है?

(a) गोवा

(b) केरल

(c) उड़ीसा

(d) प० बंगाल

[read more] (a) गोवा [/read]

47. भारत की सबसे लम्बी स्थलीय सीमा किस देश के साथ है?

(a) चीन

(b) पाकिस्तान

(c) बांग्लादेश

(d) म्यान्मार

[read more] (c) बांग्लादेश [/read]

48. सबसे छोटी स्थलीय सीमा भारत की किस देश के साथ है?

(a) पाकिस्तान

(b) नेपाल

(c) म्यान्मार

(d) भूटान

[read more] (d) भूटान [/read]

49. भारत को निम्नलिखित भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है

(a) हिमालय, गंगा का मैदान, दक्षिणी पठार एवं राजस्थान का मैदान

(b) पर्वतीय प्रदेश, हिमानी प्रदेश, नदी घाटी प्रदेश एवं हिमालय प्रदेश

(c) दक्षिणी पठारी प्रदेश, सागर तटीय प्रदेश, द्वीपीय प्रदेश एवं हिमालय प्रदेश

(d) उत्तरी पर्वतीय प्रदेश, वृहत् मैदानी प्रदेश, दक्षिणी प्रायद्वीपीय प्रदेश तथा सागर तटीय प्रदेश

[read more] (d) उत्तरी पर्वतीय प्रदेश, वृहत् मैदानी प्रदेश, दक्षिणी प्रायद्वीपीय प्रदेश तथा सागर तटीय प्रदेश [/read]

50. भारत का कौन-सा भू-आकृतिक विभाग प्राचीनतम है?

(a) उत्तरी पर्वतीय प्रदेश

(b) गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान

(c) प्रायद्वीपीय पठार

(d) समुद्रतटीय मैदान

[read more] (c) प्रायद्वीपीय पठार [/read]

51. गारो, खासी एवं जयन्तियाँ पहाड़ियाँ संरचना एवं उत्पत्ति की दृष्टि से निम्नलिखित में से किसका भाग है?

(a) हिमालय पर्वत श्रेणी का

(b) पूर्वांचल की पहाड़ी का

(c) अराकानयोमा पर्वत का

(d) प्रायद्वीपीय पठार का

[read more] (d) प्रायद्वीपीय पठार का [/read]

52. निम्नलिखित में से कौन-सा तट पश्चिमी तट का भाग नहीं है?

(a) काठियावाड़ तट

(b) कोंकण तट

(c) मालाबार तट

(d) कोरोमंडल तट

[read more] (d) कोरोमंडल तट [/read]

53. भारत का पूर्वी समुद्री तट किस नाम से जाना जाता है?

(a) दीघा तट

(b) कोरोमण्डल तट

(c) कोंकण तट

(d) मालाबार तट

[read more] (b) कोरोमण्डल तट [/read]

54. कोंकण तट कहाँ से कहाँ तक विस्तृत है?

(a) गोवा से कोच्चि

(b) गोवा से दीव

(c) गोवा से दमण

(d) गोवा से मुम्बई

[read more] (c) गोवा से दमण [/read]

55. लक्षद्वीप समूह के द्वीपों की उत्पत्ति निम्नलिखित में से किस प्रकार हुई है?

(a) ज्वालामुखी उत्पत्ति से

(b) मृदा निक्षेपण से

(c) प्रवाल उत्पत्ति से

(d) इनमे से कोई नहीं

[read more] (c) प्रवाल उत्पत्ति से [/read]

56. भारतीय क्षेत्र में स्थित दो ज्वालामुखी द्वीप हैं-

(a) कवारत्ती एवं न्यू मूर

(b) पम्बन एवं बैरन

(c) बैरन एवं नारकोण्डम

(d) ग्रेट अंडमान व लिटिल निकोबार

[read more] (c) बैरन एवं नारकोण्डम [/read]

57. न्यू मूर द्वीप कहाँ है?

(a) अरब सागर में

(b) मन्नार की खाड़ी में

(c) बंगाल की खाड़ी में

(d) अण्डमान सागर में

[read more] (c) बंगाल की खाड़ी में [/read]

58. निम्नलिखित में से कौन एक द्वीप है?

(a) दमण

(b) दीव

(c) पांडिचेरी

(d) दादरा एवं नागर हवेली

[read more] (b) दीव [/read]

59. स्वतंत्रता से पूर्व कौन-सा भारतीय क्षेत्र ‘काला पानी’ के नाम से जाना जाता था?

(a) लक्षद्वीप समूह

(b) अंडमान-निकोबार द्वी० स०

(c) दीव

(d) अलियावेट व खदियावेट

[read more] (b) अंडमान-निकोबार द्वी० स० [/read]

60. लक्षद्वीप समूह स्थित है-

(a) कच्छ की खाड़ी में

(b) अरब सागर में

(c) मन्नार की खाड़ी में

(d) बंगाल की खाड़ी में

[read more] (b) अरब सागर में [/read]

61. दीव स्थित है

(a) कच्छ की खाड़ी में

(b) खम्भात की खाड़ी में

(c) मन्नार की खाड़ी में

(d) बगाल की खाड़ी में

[read more] (b) खम्भात की खाड़ी में [/read]

62. निम्नलिखित में से कौन-सा द्वीप भारत और श्रीलंका के मध्य स्थित है?

(a) न्यू मूर

(b) लक्षद्वीप

(c) गंगासागर

(d) रामेश्वरम्

[read more] (d) रामेश्वरम् [/read]

63. लक्षद्वीप समूह में द्वीपों की संख्या है-

(a) 26

(b) 36

(c) 37

(d) 43

[read more] (b) 36 [/read]

64. थार मरुभूमि कहाँ स्थित है?

(a) गुजरात

(b) राजस्थान

(c) पंजाब

(d) हरियाणा

[read more] (b) राजस्थान [/read]

65. दक्षिण गंगोत्री क्या है?

(a) प्रायद्वीपीय भारत की एक नदी

(b) भारतीय नौसेना का युद्धक जलपोत

(c) उत्तरी ध्रुव में स्थापित भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र

(d) अंटार्कटिका में स्थापित भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र

[read more] (d) अंटार्कटिका में स्थापित भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र [/read]

66. वर्तमान में भारत के किस स्थान को ‘सफेद पानी’ के नाम से जाना जाता है?

(a) लेह

(b) लद्दाख

(c) कारगिल

(d) सियाचीन

[read more] (d) सियाचीन [/read]

67. हैदराबाद का जुडवाँ नगर है-

(a) निजामाबाद

(b) सिकन्दराबाद

(c) आसिफाबाद

(d) आदिलाबाद

[read more] (b) सिकन्दराबाद [/read]

68. कोच्चि का जुड़वाँ नगर है-

(a) एर्नाकुलम

(b) अल्वाय

(c) अलेप्पी

(d) कोट्ठायाम

[read more] (a) एर्नाकुलम [/read]

69. जम्मू-कश्मीर राज्य का वह हिस्सा जिस पर चीन का अधिकार है, क्या कहलाता है?

(a) गिलगिट क्षेत्र

(b) छो-मोरारी क्षेत्र

(c) सियाचीन क्षेत्र

(d) अक्साई चीन

[read more] (d) अक्साई चीन [/read]

70. भारत का एकमात्र शीत मरूस्थल है-

(a) लद्दाख

(b) पूर्वी कामेंग

(c) लाचेन

(d) चम्बा

[read more] (a) लद्दाख [/read]

71. भारत का क्षेत्रफल कितना है?

(a) 32,57,405 वर्ग किमी०

(b) 32,68,276 वर्ग किमी०

(c) 32,87,263 वर्ग किमी०

(d) 32,87,679 वर्ग किमी०

[read more] (c) 32,87,263 वर्ग किमी० [/read]

72. भारतीय उपमहाद्वीप मूलतः एक विशाल भूखण्ड का भाग था, जिसे कहा जाता है-

(a) जुरेशिक भूखण्ड

(c) इण्डियाना

(b) आर्यावर्त

(d) गोंडवानालैंड

[read more] (d) गोंडवानालैंड [/read]

73. निम्न नगरों में से कौन-सा कर्क रेखा के निकटतम है?

(a) दिल्ली

(b) कोलकाता

(c) जोधपुर

(d) नागपुर

[read more] (b) कोलकाता [/read]

74. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर कर्क रेखा से निकटतम दूरी पर अवस्थित है?

(a) अगरतला

(b) गाँधीनगर

(c) जबलपुर

(d) उज्जैन

[read more] (a) अगरतला [/read]

75. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

(a) भारत पूर्णतया उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है।

(b) भारत की आकृति चतुष्कोणीय है।

(c) क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत विश्व में सातवें तथा जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है।

(d) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं।

[read more] (d) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं। [/read]

76. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) भारत के क्षेत्रफल का 29.3 प्रतिशत भाग पर्वतीय है।

(b) भारत के क्षेत्रफल का 27.7 प्रतिशत भाग पठारी है।

(c) भारत के क्षेत्रफल का 48.0 प्रतिशत भाग मैदानी है।

(d) भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ उ० से 37°6′ उ० है।

[read more] (c) भारत के क्षेत्रफल का 48.0 प्रतिशत भाग मैदानी है। [/read]

77. भारत के उत्तर के मैदान से सम्बन्धित निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) उत्तर का विशाल मैदान गंगा, ब्रह्मपुत्र और सतलज नदियों का मैदान है।

(b) यह नवनिर्मित मैदानी प्रदेश है।

(c) इस मैदान की मिट्टी चरनोजम प्रकार की है।

(d) इस मैदान में मिट्टी का निक्षेपण 400 मीटर से 3000 मीटर की गहराई तक है।

[read more] (c) इस मैदान की मिट्टी चरनोजम प्रकार की है।, व्याख्या :  भारत का उत्तर का विशाल मैदान (Northern Plains) मुख्य रूप से गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु-सतलज नदी प्रणालियों द्वारा निर्मित है  इसलिए कथन (a) सही है। यह मैदान अपेक्षाकृत भूवैज्ञानिक रूप से नया (नव निर्मित) है- इसलिए (b) भी सही है।

     इस मैदान में अत्यधिक मोटी जलोढ़ (Alluvial) मिट्टी पाई जाती है और इसकी गहराई लगभग 400 मीटर से 3000 मीटर तक है इसलिए (d) भी सही है। जबकि  चरनोजम (Chernozem) मिट्टी काले रंग की उपजाऊ मिट्टी होती है, जो यूक्रेन, रूस, कनाडा आदि जैसे क्षेत्रों में पाई जाती है। भारत के उत्तर के मैदान में चरनोजम मिट्टी नहीं, बल्कि जलोढ़ (Alluvial Soil) पाई जाती है। [/read]

78. भारत की भौगोलिक स्थिति के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(a) यह विषुवत रेखा के उत्तर में स्थित है।

(b) यह 8°4′ उ० से 37°6′ उ० अक्षांश के बीच स्थित है।

(c) यह 68°7′ पू० से 97°25′ पू० देशान्तर के बीच स्थित है।

(d) उपर्युक्त सभी सही है।

[read more] (d) उपर्युक्त सभी सही है। [/read]

79. किस भारतीय राज्य की सीमा सर्वाधिक राज्यों की सीमा को स्पर्श कहती है?

(a) मध्य प्रदेश

(b) असम

(c) उत्तर प्रदेश

(d) आन्ध्र प्रदेश

[read more] (c) उत्तर प्रदेश [/read]

80. निम्न में से कौन भारत का केन्द्र शासित प्रदेश नहीं है?

(a) लक्षद्वीप

(b) दमण व दीव

(c) पाण्डिचेरी

(d) नागालैंड

[read more] (d) नागालैंड [/read]

81. भारत में कितने राज्य व केन्द्र शासित प्रदेश हैं?

(a) 25 राज्य व 6 केन्द्र शासित प्रदेश

(b) 28 राज्य व 8 केन्द्र शासित प्रदेश

(c) 28 राज्य व 9 केन्द्र शासित प्रदेश

(d) 29 राज्य व 9 केन्द्र शासित प्रदेश

[read more] (b) 28 राज्य व 8 केन्द्र शासित प्रदेश [/read]

82. न्यू मूर द्वीप किन दो देशों के मध्य विवाद का कारण है?

(a) भारत और श्रीलंका

(b) भारत और बांग्लादेश

(c) ब्रिटेन और अर्जेण्टीना

(d) इजराइल और सीरिया

[read more] (b) भारत और बांग्लादेश [/read]

83. विश्व के 2.4 प्रतिशत क्षेत्रफल में भारत विश्व की कितनी प्रतिशत जनसंख्या का पोषण करता है?

(a) 11%

(b) 14%

(c) 17%

(d) 21%

[read more] (c) 17% [/read]

84. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) भारत के स्थल सीमा की लम्बाई 15200 किमी० हैं।

(b) भारत के मुख्य स्थलखण्ड के समुद्री सीमा की लम्बाई 6100 किमी० है।

(c) भारत का देशान्तरीय विस्तार 68°7′ पूर्वी देशान्तर से 97°25′ पूर्वी देशान्तर तक है।

(d) उपर्युक्त सभी सही है।

[read more] (d) उपर्युक्त सभी सही है। [/read]

85. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) भारत का दक्षिणी बिन्दु पिगमेलियन प्वाइण्ट है।

(b) भारत की कुल समुद्री सीमा का लम्बाई 7516.5 किमी० है।

(c) पाक जलसन्धि भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित है।

(d) भारत का दक्षिणतम बिन्दु 6°4′ उत्तरी अक्षांश पर स्थित है।

[read more] (c) पाक जलसन्धि भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित है। [/read]

86. पटना का स्थानीय समय-

(a) भारतीय मानक समय से आगे है।

(b) भारतीय मानक समय से पीछे है।

(c) वही है जो भारतीय मानक समय है।

(d) भारतीय मानक समय से सम्बन्धित नहीं है।

[read more] (a) भारतीय मानक समय से आगे है। [/read]

87. भारत अवस्थित है-

(a) अक्षांश 8°4′ द० से 37°6′ उ० तथा देशांश 68°7′ प० से 97°25′ पू० के मध्य

(b) अक्षांश 8°4′ उ० से 37°6′ द० तथा देशांश 68°7 पू० से 97°25 प० के मध्य

(c) अक्षांश 8°4′ उ० से 37°6′ उ० तथा देशांश 68°7′ पू० से 97°25′ पू० के मध्य

(d) अक्षांश 8°4′ द० से 37°6′ द० तथा देशांश 68°7′ प० से 97°25 प० के मध्य

[read more] (c) अक्षांश 8°4′ उ० से 37°6′ उ० तथा देशांश 68°7′ पू० से 97°25′ पू० के मध्य [/read]

88. भारत किस गोलार्द्ध में स्थित है?

(a) उत्तरी और पूर्वी

(b) दक्षिणी और पूर्वी

(c) उत्तरी और पश्चिमी

(d) उत्तरी और दक्षिणी

[read more] (a) उत्तरी और पूर्वी [/read]

89. निम्नलिखित में से वह राज्य क्षेत्र कौन-सा है जिसकी सीमा मिजोरम से नहीं लगी हुई है?

(a) नागालैंड

(b) म्यान्मार

(c) असम

(d) त्रिपुरा

[read more] (a) नागालैंड [/read]

90. निम्नलिखित में से वह क्षेत्र कौन-सा है जिसकी सीमा अरुणाचल प्रदेश से नहीं लगती है?

(a) असम

(b) नागालैंड

(c) भूटान

(d) मणिपुर

[read more] (d) मणिपुर [/read]

91. निम्नलिखित में से किस राज्य की सीमा से राजस्थान सटा हुआ नहीं है?

(a) गुजरात

(b) महाराष्ट्र

(c) हरियाणा

(d) उ० प्र०

[read more] (b) महाराष्ट्र [/read]

92. संघ शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव भारत में निम्न में से किन राज्यों के बीच स्थित है?

(a) आन्ध्र प्रदेश व मध्य प्रदेश

(b) गुजरात व मध्य प्रदेश

(c) मध्य प्रदेश व गुजरात

(d) गुजरात व महाराष्ट्र

[read more] (d) गुजरात व महाराष्ट्र [/read]

93. निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य पहले नेफा (NEFA) के नाम से जाना जाता था?

(a) नागालैंड

(b) मणिपुर

(c) अरुणाचल प्रदेश

(d) असम

[read more] (c) अरुणाचल प्रदेश [/read]

94. पोर्ट ब्लेयर स्थित है-

(a) उत्तरी अंडमान

(b) दक्षिणी अंडमान

(c) मध्य अंडमान

(d) छोटा अंडमान

[read more] (b) दक्षिणी अंडमान [/read]

95. निम्न में से कौन-सा युग्म सही नहीं है?

(a) मदुरै- तमिलनाडु

(b) झाँसी- मध्य प्रदेश

(c) हरिद्वार- उत्तरांचल

(d) अलवर- राजस्थान

[read more] (b) झाँसी- मध्य प्रदेश [/read]

96. भारत की पूर्व से पश्चिम की दूरी किलोमीटर में कितनी है?

(a) 2700 किमी०

(b) 2800 किमी०

(c) 2900 किमी०

(d) 3000 किमी०

[read more] (c) 2900 किमी० [/read]

97. निम्नलिखित राज्यों को क्षेत्रफल के अनुसार क्रम में रखें और सही विकल्प का चयन करें-

I. मध्य प्रदेश II. आन्ध्र प्रदेश

III. राजस्थान IV. महाराष्ट्र

(a) II, IV, III, I

(b) III, IV, I, II

(c) III, I, IV, II

(d) IV, I, II, IV

[read more] (c) III, I, IV, II [/read]

98. भारत की सबसे बड़ी सुरंग जवाहार सुरंग किस राज्य में अवस्थित है?

(a) हिमाचल प्रदेश

(b) राजस्थान

(c) पश्चिम बंगाल

(d) जम्मू और कश्मीर

[read more] (d) जम्मू और कश्मीर [/read]

99. भारत के अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से लगे समुद्र तट की लंबाई लगभग कितनी है?

(a) 5700 किमी०

(b) 5900 किमी०

(c) 6100 किमी०

(d) 6300 किमी०

[read more] (c) 6100 किमी० [/read]

100. सियाचिन है

(a) भारत और पाकिस्तान के बीच का हिमनद सीमान्त क्षेत्र

(b) भारत और पाकिस्तान के बीच का मरुस्थलीय सीमान्त क्षेत्र

(c) भारत और चीन के बीच का सीमान्त क्षेत्र

(d) भारत और म्यान्मार के बीच का सीमान्त क्षेत्र

[read more] (a) भारत और पाकिस्तान के बीच का हिमनद सीमान्त क्षेत्र [/read]

101. सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र के ऊपर किनके मध्य झगड़ा है?

(a) भारत और पाकिस्तान

(b) भारत और चीन

(c) भारत और नेपाल

(d) चीन और नेपाल

[read more] (a) भारत और पाकिस्तान [/read]

102. सियाचिन ग्लेशियर भारत के किस राज्य में है?

(a) उत्तर प्रदेश

(b) हिमाचल प्रदेश

(c) जम्मू-कश्मीर

(d) सिक्किम

[read more] (c) जम्मू-कश्मीर [/read]

103. निम्नलिखित में से भारत की सुदूर दक्षिण भौगोलिक इकाई कौन-सी है?

(a) कन्याकुमारी

(b) रामेश्वरम

(c) लक्षद्वीप

(d) निकोबार द्वीप समूह

[read more] (d) निकोबार द्वीप समूह [/read]

104. भारत (मुख्य भूमि) का दक्षिणी नोक है-

(a) केप केमोरिन

(b) कैलीमेयर बिन्दु

(c) इन्दिरा बिन्दु

(d) त्रिवेन्द्रम में कोवलम

[read more] (a) केप केमोरिन [/read]

105. कर्क रेखा कहाँ से होकर नहीं गुजरती है?

(a) गुजरात

(b) उड़ीसा

(c) त्रिपुरा

(d) पश्चिम बंगाल

[read more] (b) उड़ीसा [/read]

106. कौन से देश पाक जलडमरूमध्य से जुड़े हुए हैं?

(a) भारत और श्रीलंका

(b) उत्तर और दक्षिण कोरिया

(c) ब्रिटेन और फ्रांस

(d) भारत और पाकिस्तान

[read more] (a) भारत और श्रीलंका [/read]

107. भारत और चीन के बीच सीमा रेखा कहलाती है-

(a) मैकमहोन रेखा

(b) डूरण्ड रेखा

(c) लाल रेखा

(d) रेडक्लिफ रेखा

[read more] (a) मैकमहोन रेखा [/read]

108. भारत और पाकिसतन के बीच की सीमा का निर्धारण किसने किया?

(a) लॉर्ड माउण्टबेटन

(b) सर कौरिल रेडक्लिफ

(c) सर स्टेफोर्ड रेडक्लिफ

(d) लौरेंस

[read more] (b) सर कौरिल रेडक्लिफ [/read]

109. निम्न में से कौन-सा राज्य भारत के वृहद प्रायद्वीपीय पठार का भाग नहीं है?

(a) महाराष्ट्र

(b) मध्य प्रदेश

(c) आन्ध्र प्रदेश

(d) पंजाब

[read more] (d) पंजाब [/read]

110. ड्ररण्ड लाइन निम्नलिखित दो देशों के बीच की सीमा रेखा है-

(a) भारत और पाकिस्तान

(b) पाकिस्तान और अफगानिस्तान

(c) भारत और चीन

(d) सं० रा० अ० और मैक्सिको

[read more] (b) पाकिस्तान और अफगानिस्तान [/read]

111. पाकिस्तान की सीमाओं से लगे भारतीय राज्य कौन-कौन से हैं?

(a) गुजरात, हि० प्र०, हरियाणा, जम्मू व कश्मीर

(b) गुजरात, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान

(c) जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब

(d) जम्मू-कश्मीर, हि० प्र०, पंजाब, राजस्थान

[read more] (b) गुजरात, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान [/read]

112. अरब सागर में स्थित भारतीय द्वीपों की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशिष्टता क्या है?

(a) वे आकार में काफी छोटे हैं।

(b) वे सभी प्रवाल उद्गम के हैं।

(c) वहाँ अति शुष्क जलवायु है।

(d) वे मुख्य भूमि के विस्तारित क्षेत्र हैं।

[read more] (b) वे सभी प्रवाल उद्गम के हैं। [/read]

113. पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश की सीमाएँ किसके साथ हैं:

(a) कर्नाटक और आंध्र प्रदेश

(b) आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु

(c) तमिलनाडु

(d) कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु

[read more] (c) तमिलनाडु

सही उत्तर है – (c) तमिलनाडु

व्याख्या:

पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश चार अलग-अलग हिस्सों- पुडुचेरी, कराइकल, माहे और यनम में बँटा हुआ है जो Map में देखा जा सकता है

  • पुडुचेरी और कराइकल – दोनों तमिलनाडु से घिरे हैं।
  • माहे – केरल के भीतर स्थित है।

  • यनम – आंध्र प्रदेश के भीतर स्थित है।

     लेकिन सीमा साझा करने की बात की जाए तो केवल मुख्य भाग (पुडुचेरी व कराइकल) की सीमाएँ तमिलनाडु से लगती हैं। अतः परीक्षा के मानक अनुसार सही उत्तर (c) माना जाता है। [/read]

19. Definition and Scope of ​​social geography (सामाजिक भूगोल की परिभाषा तथा विषय क्षेत्र)

19. Definition and Scope of ​​social geography

(सामाजिक भूगोल की परिभाषा तथा विषय क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. सामाजिक भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा इसका विषय क्षेत्र बताइए।

उत्तर- सामाजिक भूगोल मानव भूगोल की महत्वपूर्ण शाखा है। मानव एक सामाजिक प्राणी है, अतः समाज में घटित होने वाली समस्त घटनाओं का अध्ययन मानव भूगोल की इस शाखा में होता है। समाज में रहकर मानव विभिन्न क्रिया-कलाप करता है। इन क्रिया-कलापों के लिए कुछ कारक भी उत्तरदायी होते हैं। समाज में पाए जाने वाले विभिन्न सामाजिक वर्गों एवं सामाजिक विभिन्नताओं में अन्तर पाया जाता है, अतः सामाजिक भूगोल में इस अन्तर के कारणों का भी अध्ययन किया जाता है।

हैरीसन के अनुसार, “सामाजिक भूगोल समाज का इसके पर्यावरण के सम्बन्ध में एक क्रमिक व्यवहार नहीं था, अपितु सामाजिक भिन्नताओं का एक उत्पत्तिजनक विवरण था क्योंकि वे अन्य कारकों से एवं पृथ्वी सतह के क्षेत्रों में भिन्नताओं से सम्बन्धित हैं।”

डेरियल फोर्ड ने इसमें आदिम समाज का वर्णन बताया है जबकि ग्रिफिथ टेलर ने इसमें विकसित समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक तथ्य सम्मिलित करने पर बल दिया है।

विषय क्षेत्र-

    सामाजिक भूगोलवेत्ताओं का अध्ययन क्षेत्र केवल भाव वाचक मानव नहीं है तथा न ही जैविक मानव है, किन्तु आदमी, औरतें, बच्चे हैं जो सामाजिक समूहों के सदस्य हैं। इस प्रकार मनुष्य जाति (Mankind) को विभिन्न छोटे व्यक्तिगत समूहों में बांटा जा सकता है तथा सामाजिक भूगोल वेत्ताओं का दायित्व है कि वे उनके जीवन का अध्ययन करें।

     सामाजिक भूगोल में मानव समाज के तथ्य- आवास, विविध स्वरूप, सामाजिक तत्व व तंत्र, राजनीतिक भूगोल, पारितंत्र, विकसित व विकासशील परिवेश प्रारूप तथा उसका मानव पर प्रभाव, मानव के आचार-विचार, आदतें व अर्थतंत्र एवं सामंजस्य जैसे तत्व सम्मिलित हैं। इसमें यह अध्ययन किया जाता है कि पृथ्वी पर बसे हुए लोगों के सामाजिक वर्गों एवं सामाजिक विभिन्नताओं में अन्तर क्यों है? अर्थात् मानव समुदायों, सामाजिक संगठन, परिवार प्रणाली, श्रम विभाजन, रीति-रिवाज एवं सामाजिक प्रथाओं, समुदायों का अध्ययन इसमें किया जाता है।

प्रो. वाटसन के अनुसार यदि भूगोल पृथ्वी के नक्षत्र का विज्ञान है, या पारिस्थितिकी का विज्ञान है अथवा वस्तु वितरण का विज्ञान है तो इसके सामाजिक सामंजस्यों का अध्ययन करने के लिए ऐसी सामाजिक शक्तियों का अध्ययन करना आवश्यक होगा जिनके परिणामस्वरूप उस क्षेत्र विशेष के सामाजिक प्रतिमान उत्पन्न होते हैं। ऐसा अध्ययन करने वाला विज्ञान सामाजिक भूगोल है।

      अब व्यक्तिगत प्रोत्साहन (Individual Motivation) पर अधिक आनुभविक कार्य किया जा रहा है। उदाहरणार्थ स्थानान्तरण के सम्बन्ध में अनेक विस्तृत प्रोत्साहन अध्ययन किए जा रहे हैं जिससे यह पता चले कि प्राचीन एवं वर्तमान स्थानान्तरण में क्या सम्बन्ध है तथा परिवर्तन हुआ है। व्यवहार तथा सामाजिक भूगोल के सम्बन्ध में बहुत कम अध्ययन किया गया है। यह दृढ़ विश्वास किया जाता रहा है कि पर्यावरणीय अथवा आर्थिक क्षेत्र में सामान्यीकरण की व्याख्या को छोड़ दिया गया है।

किर्क तथा अन्य ने 1963 में स्पष्ट किया कि मानव तथ्य पर्यावरण (Phenomenal environment) के विरुद्ध व्यावहारिक पर्यावरण में निवास करते हैं तथा कार्य करते हैं। व्यवहार उन प्रत्युत्तरों एवं मूल्यों से प्रत्यक्षतः जुड़ा हुआ है जो सामाजिक रूप से प्राप्त होते हैं।

      मानव को विशिष्ट संस्कृति का सदस्य मानकर अध्ययन किया जाता है। अतः इसका विस्तृत अध्ययन सामाजिक भूगोल का क्षेत्र है। डेरियल फोर्ड ने सामाजिक भूगोल में केवल आदिम समाज का वर्णन बताया है जबकि ग्रिफिथ टेलर का विचा है कि इसमें विकसित समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक तथ्य सम्मिलित किए जाने चाहिए।

     वर्तमान समय में सामाजिक भूगोल में मानव समाज की बढ़ती समस्याओं के प्रति चेतना बढ़ती जा ही है। इसी सन्दर्भ में मानव समाज के कल्याण की संकल्पना (Concept of social well being) के अन्तर्गत आने वाले समस्त मानवीय प्रयासों का अध्ययन सामाजिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाने लगा है।

18. The Industrial regions of the world (विश्व के औद्योगिक प्रदेश)

18. The Industrial regions of the world

(विश्व के औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. What are the industrial regions of the world? Discuss the characteristics of each region.

(विश्व के औद्योगिक प्रदेश कौन-कौन हैं? प्रत्येक की विशेषताओं का वर्णन करें।)

उतर- औद्योगिक प्रदेश एक महत्त्वपूर्ण प्रदेश होता है। उसका समूचा स्वरूप ही उद्योगों पर निर्भर होता है। इस प्रकार औद्योगिक प्रदेश वह है जहाँ अधिकतर लोगों की जीविका का साधन उद्योग है। उस प्रदेश में मानव का मुख्य क्रियाकलाप उद्योगों से सम्बंधित होता है। ऐसे प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों में सम्बद्धता होती है। वह सम्पूर्ण प्रदेश उद्योगों से परिपूर्ण होता है। इन गुणों के विद्यमान रहने पर हम उसे औद्योगिक प्रदेश कह सकते हैं। इसी संदर्भ में किसी अर्थशास्त्री ने उद्योग के लिए 9 ‘M’ को महत्त्वपूर्ण माना है जो इस प्रकार है-
1. Money (मुद्रा)

2. Material (माल/सामग्री)

3. Man (मानव)

4. Market (बाजार)

5. Machinery (मशीनें)

6. Motive (शक्ति)

7. Management) (प्रबंधन)

8. Means of transport (यातायात के साधन)

9. Momentum of early start (पहले कारखाना खोलने से विकास की गति)।

      विश्व को उनकी औद्योगिक सम्बद्धता के आधार पर निम्नलिखित औद्योगिक प्रदेशों में बाँट सकते हैं-

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका का औद्योगिक प्रदेश

(2) कनाडा औद्योगिक प्रदेश

(3) ग्रेट ब्रिटेन का औद्योगिक प्रदेश

(4) जर्मनी औद्योगिक प्रदेश

(5) सोवियत रूस औद्योगिक प्रदेश

(6) जापान का औद्योगिक प्रदेश

(7) चीन का औद्योगिक प्रदेश

(8) भारत का औद्योगिक प्रदेश

(9) आस्ट्रेलिया का औद्योगिक प्रदेश

(10) दक्षिणी अफ्रिकी गणराज्य।

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका:-

     U.S.A. विश्व का सबसे विकसित औद्योगिक देश है। यहाँ अनेक वस्तुओं का उत्पादन होता है। अलग-अलग प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनती हैं। अतः यहाँ कई क्षेत्रों में औद्योगिक विकास हुआ है, जो इस प्रकार हैं-

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड प्रदेश

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय प्रदेश

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी प्रदेश

(iv) डेट्रॉइट औद्योगिक प्रदेश

(v) महान झील औद्योगिक प्रदेश

(vi) दक्षिणी अप्लेशियन प्रदेश

(vii) पूर्वी टेक्सास प्रदेश

(viii) प्रशांत तटीय प्रदेश

(ix) राकी पर्वतीय प्रदेश

(x) मध्य न्यूयार्क क्षेत्र।

    लोहा-इस्पात उद्योग सबसे अधिक यहीं केन्द्रित है। दक्षिण-पूर्वी U.S.A में देश का 85% लोहा-इस्पात के कारखाने स्थित हैं। इसके कारण अन्य उद्योग भी यहाँ स्थापित हैं।

(2) कनाडा औद्योगिक प्रदेश:-

     उत्तरी अमेरिका में U.S.A. के बाद दूसरा सबसे विकसित औद्योगिक देश कनाडा है। यहाँ कच्चे माल की सुविधा तथा यातायात की सुगमता के कारण उद्योगों का विकास हुआ है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार है-

(i) ओण्टोरियो औद्योगिक प्रदेश

(ii) क्यूवेक,

(iii) समुद्री प्रान्तों का प्रदेश

(iv) ब्रिटिश कोलम्बिया,

(v) प्रेयरी प्रदेश का औद्योगिक प्रदेश।

    कनाडा में भी अलग-अलग प्रदेशों में औद्योगिक पट्टियों का विकास हुआ है। ओण्टोरियो प्रदेश में भारी उद्योगों के संयंत्र स्थापित हैं। समुद्री भाग में मत्स्य उद्योग औद्योगिक प्रदेश है।

(3) ग्रेट ब्रिटेन का औद्योगिक प्रदेश:-

     ग्रेट ब्रिटेन से ही विश्व में औद्योगिक क्रान्ति शुरू हुई। कुछ ही समय में वह एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक राष्ट्र बन गया। यहाँ के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार हैं-

(i) नार्थम्बरलैंड डरहम क्षेत्र

(ii) यार्क-डर्बी- नार्टिघमशायर प्रदेश

(iii) मिडलैंड औद्योगिक प्रदेश

(iv) साउथ वेल्स

(v) लंकाशायर

(vi) स्काटलैंड मध्यघाटी औद्योगिक प्रदेश।

       इस समय ग्रेट ब्रिटेन विभिन्न प्रकार के उद्योगों में पीछे हो गया है।

(4) जर्मनी के औद्योगिक प्रदेश:-

     जर्मनी विश्व के बड़े औद्योगिक देशों में से एक है। यहाँ भारी उद्योगों की स्थापना हुई है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार हैं-

(i) बेस्टपफैलिया औद्योगिक प्रदेश

(ii) बवेरिया क्षेत्र

(iii) सार बेसिन क्षेत्र

(iv) सेक्सोनी क्षेत्र।

(5) सोवियत रूस के औद्योगिक प्रदेश:-

      यहाँ के बड़े भाग में उद्योगों का विकास हुआ है। इसके औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) यूक्रेन क्षेत्र

(ii) केन्द्रीय प्रदेश

(iii) यूराल प्रदेश

(iv) लेनिनग्राड

(v) मध्य वोल्गा

(vi) कृजवास प्रदेश

(vii) ट्रांस काकेशिया

(viii) एशियाई क्षेत्र

(ix) वैकाल झील क्षेत्र

(x) सुदूर पूर्वी क्षेत्र

(xi) क्रोशिया प्रदेश।

(6) जापान का औद्योगिक प्रदेश:-

        यहाँ के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) टोकियो-योकोहामा क्षेत्र

(ii) नागोया क्षेत्र

(iii) कोवे ओसाका क्षेत्र

(iv) नागासाकी क्षेत्र

(v) कमैसी प्रदेश

(vi) द० होकैडो क्षेत्र।

(7) चीन का औद्योगिक प्रदेश-

      यहाँ के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) उत्तरी-पूर्वी चीन क्षेत्र

(ii) पेकिंग प्रदेश

(iii) शंघाई-वुहान क्षेत्र

(iv) कैण्टन।

(8) भारत के औद्योगिक प्रदेश:-

      भारत के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) हुगलीघाटी औद्योगिक प्रदेश

(ii) दामोदर घाटी एवं स्वर्णरेखा घाटी औद्योगिक प्रदेश

(iii) मुम्बई-अहमदाबाद क्षेत्र

(iv) दक्षिण-भारत के औद्योगिक प्रदेश

(v) गंगा-यमुना की घाटी का औद्योगिक प्रदेश।

(9) आस्ट्रेलिया का औद्योगिक प्रदेश:-

      आस्ट्रेलिया में उद्योग का विकास हो हा है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश ये हैं-

(i) न्यूसाउथ वेल्स का औद्योगिक प्रदेश

(ii) न्यूजीलैंड का औद्योगिक प्रदेश।

(10) दक्षिण अफ्रिका के औद्योगिक प्रदेश:-

        दक्षिण अफ्रिका गणराज्य में कच्चे माल की प्राप्ति के काण उद्योगों का विकास हुआ है।

17. The Commercial Grain Farming in the world (विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि)

17. The Commercial Grain Farming in the world

(विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि)



प्रश्न प्रारूप

Q. Discuss the Commercial Grain Farming in the world.

(विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि का वर्णन करें।)

उत्तर- जिस कृषि की उपजों को स्थानीय उपभोग के लिए नहीं बल्कि बाजारों में व्यापार के लिए प्रयोग किया जाता है, उसे व्यापारिक कृषि कहते हैं। इस प्रकार की कृषि से मुद्रा की प्राप्ति होती है। अतः इसे मुद्रादायिनी फसल भी कहते हैं। बाजारों में बेचकर इससे तुरन्त धन कमाया जाता है, इसी से इसे (Cash crop) या नकदी फसल भी कहा जाता है। इस प्रकार की फसल विश्व के अनेक क्षेत्र में उपजाई जाती है।

      वास्तव में इस प्रकार की कृषि अधिक आबादी के देशों में स्थानीय उपभोग के लिए की जाती है। दक्षिणी पूर्वी एशिया के देशों में व्यापारिक खाद्यान्न कृषि व्यापार के लिए नहीं बल्कि स्थानीय उपभोग के लिए की जाती है। अतः इस क्षेत्र में गेहूँ जीवन निर्वाहण कृषि है। परन्तु U.S.A., कनाडा आदि देशों में गेहूँ का उत्पादन व्यापार के लिए होता है, अतः यहाँ यह व्यापारिक कृषि के अन्तर्गत आता है।

विस्तीर्ण व्यापारिक खाद्यान्न कृषि की विशेषताएँ:

     इस प्रकार कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:

1. आधुनिक युग की कृषि:-

    व्यापारिक खाद्यान्न कृषि वास्तव में आधुनिक युग की देन है। यह मध्य आक्षांशों के आर्द्र एवं शुष्क प्रदेशों के बीच में की जाती है। ये क्षेत्र अत्यन्त ही विरल जनसंख्या वाले हैं। इनके अधिकांश जनसंख्या यूरोपीय किस्म की है।

2. एक ही फसल के उत्पादन पर बल:-

    प्रत्येक देश में या उसके उप प्रदेश में, केवल एक ही मुख्य फसल के उत्पादन पर बल दिया जाता है। वह फसल बाजार में बिक्री के लिए उत्पन्न की जाती है। जैसे- गेहूँ। इन प्रदेशों की सर्वप्रमुख फसल गेहूँ ही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में एक पेटी में मक्का भी बोई जाती है। गेहूँ के अलावा जौ, जई और राई का थोड़ा-थोड़ा उत्पादन देशी या स्थानीय माँग पूर्ति के लिए किया जाता है। लगभग 70% से 80% कृषि भूमि पर गेहूँ का उत्पादन होता है।

3. मानव एवं पशुओं का कम प्रयोग:-

     मानव एवं कृषि पशुओं का प्रयोग कृषि में कम होता है। अधिकतम कार्य मशीनों से होता है।

4. बड़े-बड़े कृषि फार्म:-

     कृषि फार्म बड़े-बड़े होते हैं। U.S.A. एवं अर्जेन्टाइना में 300 एकड़ से 1000 एकड़ तक कृषि फार्म होते हैं। कृषि फार्म पर ही कृषक का निवास तथा मशीनों के रखने आदि की जगह होती है।

5. फसलों में विशेषीकरण:-

     यह केबल एक फसल का विशेषीकरण होता है। इस कृषि की मुख्य फसल गेहूँ है। बड़े पैमाने पर गेहूँ का उत्पादन होता है तथा विश्व के गेहूँ का कुल निर्यात इन्हीं देशों से होता है।

6. कृषि कार्य वैज्ञानिक ढंग से:-

     कृषि का प्रत्येक कार्य वैज्ञानिक ढंग से किया जाता है। उर्वरकों का पूर्ण प्रयोग होता है।

7. मैदानी भागों में कृषि:-

      यह कृषि विशाल समतल मैदानी प्रदेशों में की जाती है।

उत्पादन-

     FAO Production year book, 2011 के अनुसार विश्व में गेहूँ का कुल उत्पादन 5190 लाख मेट्रिक टन हुआ। नीचे के तालिका में कुछ प्रमुख देशों का उत्पादन इस प्रकार रहा-

विश्व में गेहूँ का उत्पादन, 2011

देश कुल उत्पादन लाख मेट्रिक टन में विश्व के कुल उत्पादन का %
चीन 951 18.32
U.S.S.R. 835 16.9
भारत 565 10.88
U.S.A. 605 11.66
फ्रांस 401 7.23
कनाडा 364 7.01
टर्की 275 5.30
पाकिस्तान 205 3.95
ब्रिटेन 195 3.76
जर्मनी 154 2.97
ऑस्ट्रेलिया 115 2.21
अन्य देश 525 10.11
कुल विश्व 5190 100%

विश्व वितरण-

    इस प्रकार की कृषि मध्य अक्षांशों में स्थित समशीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदानों में की जाती है। इसके क्षेत्र निम्नलिखित हैं-

1. सोवियत संघ में स्टेपी घास के मैदान:-

     गेहूँ के उत्पादन में U.S.S.R. का स्थान दूसरा है। यह विश्व का 14.5% गेहूँ उत्पन्न करता है। यहाँ गेहूँ के दो क्षेत्र हैं-

(i) शीतकालीन पट्टी- उत्तरी यूक्रेन प्रदेश में

(ii) बसन्त कालीन गेहूँ पट्टी- कैस्पियन सागर एवं कालासागर के आस-पास। यहाँ उपजाऊ मिट्टी, गर्मी में वर्षा तथा मशीनों का पूर्ण प्रयोग से यहाँ कृषि की जाती है।

2. उत्तरी अमेरिका में तथा कनाडा के प्रेयरी मैदान:-

    यहाँ विश्व का लगभग 10% गेहूँ उत्पादन होता है। यहाँ बड़े पैमाने पर मशीनों द्वारा गेहूँ की व्यापारिक कृषि होती है। यहाँ गेहूँ के 4 प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

(i) बसन्तकालीन गेहूँ क्षेत्र- प्रेयरीज के उत्तरी भाग में डेकोटा, मोण्टाना और मिन्नेसोटा में।

(ii) शीतकालीन गेहूँ क्षेत्र- कन्सास ओकलाहोमा, नेबास्का, टेस्सास।

(iii) कोलम्बिया पठार गेहूँ क्षेत्र

(iv) कैलिफोर्निया गेहूँ क्षेत्र

3. दक्षिणी अमेरिका अर्जेटिना का पम्पा प्रदेश:-

    इस प्रदेश में यूरुग्वे एवं पराग्वे नदी के डेल्टा प्रदेश में पम्पा नामक घास का विस्तृत मैदान है। इसमें गेहूँ की विस्तृत खेती की है। यहाँ से गेहूँ विदेशों को निर्यात होता है।

4. दक्षिणी पूर्वी अफ्रीका में वेल्ड नामक घास के मैदान:-

     यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रिका गणराज्य के द० पूर्वी भाग में स्थित है। यहाँ भी गेहूँ के उत्पादन के लिए लगभग सारी भौगोलिक परिस्थितियाँ उपलब्ध है। अतः यहाँ भी बड़े पैमाने प व्यापा के लिए गेहूँ की खेती की जाती है।

5. आस्ट्रेलिया में डार्लिंग डाउन्स का मैदान:-

       आस्ट्रेलिया के डाउन्स क्षेत्र में गेहूँ की काफी उपज होती है। यहाँ गेहूँ के उत्पादन के लिए समतल मैदानी भाग, उत्तम मिट्टी तथा वैज्ञानिक ढंग से कृषि की सुविधा प्राप्त है। यहाँ गेहूँ के दो क्षेत्र हैं:

(i) दक्षिणी पूर्वी भाग जो विक्टोरिया तथा न्यूसाउथ वेल्स में है,

(ii) भूमध्य सागरीय जलवायु के प्रदेश में, जो पश्चिमी आस्ट्रेलिया में स्थित है।

16. The Reserve, Production and Distribution of Petroleum in the world (विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण)

16. The Reserve, Production and Distribution of Petroleum in the world

(विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण)



प्रश्न प्रारूप

Q. Describe the reserve, production and distribution of Petroleum in the world.

(विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- पेट्रोलियम एक महत्त्वपूर्ण शक्ति का साधन है। इसका स्थान शक्ति के साधनों में कोयला के बाद है। यह केवल शक्ति का साधन ही नहीं अपितु कई उद्योगों का कच्चा माल भी है। वर्तमान युग में इसका महत्त्व और भी बढ़ गया है। अतः इसकी कीमत हमेशा बढ़ रही है।

   अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार विश्व में पेट्रोलियम का कुल भण्डार 110 अरब मैट्रिक टन तेल की संचित राशि बताई गई है। इस राशि का तीन-चौथाई अर्थात् 76% भाग केवल एशिया महादेश में संचित है। इसमें दक्षिण-पश्चिम एशिया में विश्व के कुल भंडार का 66% भाग है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10%, लैटिन अमेरिका में 8%, अफ्रिका में 3%, पूर्वी एशिया में 4% तथा शेष 9% अन्य देशों में पाया जाता है। संसार के कुछ महत्त्वपूर्ण उत्पादक देश इस प्रकार हैं-

क्रम उत्पादक देश उत्पादन प्रतिशत
1. मध्य पूर्व 54.4 %
2. संयुक्त राज्य अमेरिका 15.5 %
3. पूर्वी यूरोपीय देश 14.6 %
4. लैटिन अमेरिका 14.5 %
5. अन्य देश 10.0 %
6. कुल विश्व 100.00 %

      Statistical year book-1991, संयुक्त राष्ट्र संघ, के अनुसार विश्व के प्रमुख देशों के उत्पादन तथा भंडार दिखाए गए हैं। इन देशों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस प्रकार यह तालिका स्पष्ट करता है कि किस देश में तेल का उत्पादन तथा भंडार क्या है-

देश संचित भंडार (करोड़ टन में) विश्व के कुल भंडार का % कुल उत्पान करोड़ टन में) विश्व में कुल उत्पादन का %
सोवियत रूस 3080 2.8 61.5 23.2
संयुक्त राज्य अमेरिका 397 3.6 46.2 16.2
सऊदी अरब 2280 20.4 36.4 12.3
मेक्सिको 690 6.3 15.6 5.4
चीन 275 2.5 13.1 4.7
ईरान 780 7.1 9.8 3.7
वेनेज्वेला 105 1.00 10.6 3.4
इराक 410 3.7 8.3 3.0
कुवैत 880 8.0 7.6 2.6
इंडोनेशिया 675 6.1 7.2 2.5
संयुक्त अरब अमिरात 440 4.0 6.8 2.4
लीबिया 3.8 2.8 5.2 2.0
अन्य देश शेष  शेष  शेष  शेष
कुल विश्व 11000 100% 290.00 100%

     उपरोक्त तालिका से यह स्पष्ट होता है कि सोवियत रूप विश्व में पेट्रोलियम के उत्पादन में सबसे आगे है। केवल उत्पादन में ही नहीं अपितु संचित राशि में भी अग्रगण्य है। ऊपर से महत्त्वपूर्ण पाँच देश विश्व के पेट्रोलियम के उत्पादन के 85% भाग सोवियत रूस, U.S.A. सउदी अरब, मेक्सिको, ईरान, इराक आदि देशों से होता है। इस प्रकार ये देश तेल के उत्पादन में सर्वोपरि हैं।

1. सोवियत संघ-

     सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। उत्पादन तथा संचित भंडार दोनों दृष्टिकोणों से इसका स्थान विश्व में प्रथम है। सोवियत रूस के तीन क्षेत्रों में इसका विशेष उत्पादन होता है, जो निम्नलिखित हैं-

(i) वोल्गा-यूराल क्षेत्र- सोवियत रूस के कुल उत्पादन का 75% यहीं से होता है। इसके प्रमुख केन्द्र पर्म, उफा, कुडसेव आदि प्रमुख हैं।

(ii) बाकू क्षेत्र- इस प्रदेश को काकेशश क्षेत्र भी कहते हैं। इसके मुख्य प्रदेश बाकू, माखघकला, प्रोजनी, माइकोप, रशुका, कोसाहागिल आदि है।

(iii) अन्य क्षेत्र- इस प्रदेश में कई छोटे-छोटे तेल क्षेत्र आते हैं। इनमें एम्बा, तुर्कमेनिस्तान, कुंभदाग, चेलेकिन, पेचोरा, फरगन, साईबेरिया, सखालिन आदि सम्मिलित हैं।

2. संयुक्त राज्य अमेरिका-

    यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ 4 लाख से अधिक तेल के कुएँ हैं। यह विश्व का सबसे अधिक तेल की खपत करता है। यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र निम्न हैं-

(i) अप्लेशियन क्षेत्र।

(ii) लीमा-इडियाना क्षेत्र।

(iii) मध्यवर्ती क्षेत्र।

(iv) खाड़ी क्षेत्र।

(v) कैलिफोर्निया क्षेत्र।

3. सऊदी अरब-

    यह देश संचित राशि की दृष्टि से दूसरा तथा उत्पादन की दृष्टि से विश्व का तीसरा बड़ा देश है। यहाँ का तेल भंडार विश्व का 20% तथा उत्पादन 12-3% है। यहाँ तेल का क्षेत्र 3 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहाँ का प्रमुख तेल क्षेत्र धावर, अवकेक, ऐनदार, शेदगम, हरद, दम्मान, सफानियाँ कार्डिक, अबूसफा, फथीली आदि हैं। यहाँ से तेल रास तनुरा तेलशोधक कारखाने में भेजा जाता है। यहाँ से कच्चा तेल साफ होने के लिए भूमध्यसागर के तट पर हैको को भी भेजा जाता है। यह विश्व का बड़ा तेल उत्पादक देश बन सकता है।

4. ईरान-

    ईरान में कुल तेल का भंडार 65 अरब टन है। यह पूरे विश्व के भंडार का 7.8 प्रतिशत है। ईरान का वार्षिक तेल उत्पादन 30 अरब टन है। इसके मुख्य तेल कूप अजागरी, मस्जिदे सुलेमान, हफ्तेकेल, खानक्वीन, नफ्त खनाह, लाली, गुलखरी, बीबी हाकीमेह, करंज आदि हैं।

5. इराक-

    इसका भंडार 4.7 अरब टन तथा उत्पादन 10 करोड़ टन है। किरकुक तथा बसरा दो बड़े तेल क्षेत्र हैं। इसके अन्य तेल कूप नफ्तखनाह, वुटमाह तथा मइला है। यहाँ से तेल तेल पाइप द्वारा त्रिपोली तथा बनियास को भेजा जाता है।

6. कुवैत-

    इस छोटे देश के पास विश्व का 10% तेल का भंडार है। यहाँ का सबसे बड़ा तेल प्रदेश बुरधान का पहाड़ी-प्रदेश है। इसका वार्षिक उत्पादन 9 करोड़ टन है। यहाँ लगभग 105 तेल कूप हैं।

7. मध्यपूर्व के अन्य क्षेत्र-

    यहाँ के अन्य तेल उत्पादक देश संयुक्त अब अमिरात, ओमान, कतार आदि हैं। इन सभी देशों में प्रत्येक का उत्पादन एक करोड़ टन वार्षिक से अधिक है।

8. वेनेज्वेला-

     दक्षिणी अमेरिका में यह देश काफी महत्त्वपूर्ण है। कैरेबियन सागर के दक्षिण में यह क्षेत्र में स्थित है। यहाँ के तीन क्षेत्रों के उत्पादन होता है। यह इस प्रकार हैं-

(i) माराकैवो बेसिन

(ii) ओरिनिको बेसिन

(iii) आपुरो बेसिन।

      इस देश का वार्षिक उत्पादन 10 करोड़ टन है। यहाँ के कुल उत्पादन का 90% भाग निर्यात कर दिया जाता है।

9. भारत- भात का अभी कुल उत्पादन 5 करोड़ टन हो गया है। यहाँ भी तीन क्षेत्रों में उत्पादन होता है-

(i) असम क्षेत्र में डिगबोई।

(ii) गुजरात-अंकलेश्व क्षेत्र।

(iii) मुम्बई उच्च प्रदेश।

10. अन्य क्षेत्र- इनके अलावे एशिया में बर्मा, चीन, दक्षिणी अफ्रिका, अल्जिरिया, इन्डोनेशिया आदि से तेल का उत्पाद होता है।

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world (विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)



प्रश्न प्ररूप

Q. Discuss the chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world.

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताओं तथा वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- बगानी या बगाती या रोपण कृषि, कृषि का एक विशिष्टीकृत रूप है जो मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही की जाती है। इस प्रकार की कृषि में कोई एक ही फसल उत्पन्न की जाती है। यह फसल भी मुख्य रूप से बाजारों में बिक्री के लिए की जाती है। इन फसलों में रबड़, चाय, कहवा, गन्ना, केला, नारियल आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार की कृषि को एक फसली (One-crop Mono-Culture) की खेती कहते हैं। कुछ विद्वान गन्ने को भी बगानी फसल मानते हैं किन्तु वास्तव में गन्ना बगानी फसल नहीं है।

बगानी कृषि के क्षेत्र-

(i) पश्चिमी द्वीप समूह में क्यूबा, जमाइका, पोर्टिरिको, आदि

(ii) मध्य अमेरिका में होण्डुरस, ग्वाटेमाला त्तथा कोस्टारिका

(iii) पश्चिमी अफ्रिका के गिनीतट, घाना आदि।

(iv) दक्षिण अफ्रिका में नेटाल आदि

(व) दक्षिणी एशिया में द० भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इन्डोनेशिया आदि।

(vi) आस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड क्षेत्र।

       इस प्रकार की रोपण (Plantation) कृषि में मुख्य रूप से यूरोपीय लोगों की पूँजी तथा प्रबंध क्षमता लगी हुई है। इस प्रकार की कृषि में मूल निवासी लोग श्रमिकों का काम करते हैं। इस प्रकार की कृषि प्रणाली में फसलों के उत्पादन में बहुत से प्रक्रम (Processes) ऐसे होते हैं जिनके लिए बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है। इस कृषि की विधियाँ बहुत ही दक्षतापूर्ण और वैज्ञानिक होती हैं। इसकी फसलों के लिए वैज्ञानिक प्रणाली तथा सावधानी बरती जाती है। इसके पौधे काफी नाजुक होते हैं।

     रोपण (Plantation) कृषि में उन फसलों का उत्पादन होता है जिसके पदार्थों के माँग पिछले दो शताब्दियों में नगरीय संस्कृति के विकास के साथ-साथ बढ़ती गई है। आज की वर्तमान आधुनिक दुनिया में पेय पदार्थों का महत्व बहुत बढ़ गया है। इनमें चाय, कॉफी, कोको काफी लोकप्रिय हो गए हैं। विश्व के उन्नत देशों में इन पदार्थों की काफी माँग है।

रोपण कृषि की विशेषताएँ-

     रोपण कृषि की कुछ मूलभूत विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) यह एक फसली (Mono culture) कृषि है। इसमें एक ही फसल के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, उच्च प्रबंध और वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।

(iii) इसकी फसलें केवल बिक्री द्वारा मुद्रा प्राप्त करने के लिए उत्पन्न की जाती है।

(iv) अधिकतर उत्पादन व्यापार के लिए होता है। स्थानीय क्षेत्रों में इसका उपभोग बहुत ही, कम होता है।

(v) इसके अन्तर्गत खेत (Holdings) बहुत विस्तृत तथा खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

(vi) इसमें मानव श्रम की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

(vii) इस कृषि पर बाजार-माँग की घट-बढ़ का और मूल्य में उतार-चढ़ाव का गहरा प्रभाव पड़ता है।

(viii) इस प्रकार की कृषि के लिए भारी पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि रख-रखावों,, प्रक्रिया तथा यातायात में काफी खर्च पड़ता है।

(ix) इस कृषि की फसलों में बीमारी लगने का काफी भय रहता है। अतः फसल के खराब होने से बहुत हानि होती है।

(x) इस कृषि का बाजार सम्पूर्ण विश्व के नगरों में फैला हुआ है। अतः ग्रह फसल नगरीय सभ्यता तथा संस्कृति का द्योतक है।

(xi) यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्रादायिणी फसल है।

     इस प्रकार की फसलों का उत्पादन प्रायः विकासशील या अविकसित क्षेत्रों में होता है। जैसे दक्षिणी अमेरिका, मध्य अफ्रिका, तथा दक्षिणी एशिया के अधिकतर देश या तो विकासशील हैं या अविकसित हैं, परन्तु इसका बाजार अधिकतर विकसित देशों के महानगरों में से है।

      इसका मुख्य खरीददार U.S.A., कनाडा तथा यूरोपीय महादेश के देश हैं। आस्ट्रेलिया भी इसका अच्छा बाजार है। इस प्रकार इसका उत्पादन उष्ण कटिबंधीय देशों में तथा इनकी बिक्री समशीतोष्ण तथा शीत प्रदेशों में है। उदाहरणस्वरूप विश्व में चाय का सबसे बड़ा निर्यातक भारत, श्रीलंका है। कॉफी का सबसे बड़ा निर्यातक ब्राजील है। परन्तु सबसे बड़ा आयातक U.S.A. तथा यूरोप के देश हैं।

विश्व में बगानी कृषि की फसलें तथा उनके क्षेत्र-

(1) रबड़- मौनसून एशिया में मलेशिया, इन्डोनेशिया, थाइलैंड, श्रीलंका, भारत, हिन्दचीन के देश- सिंगापुर, फिलीपीन, अफ्रिका- गिनी तट के देश घाना, नाइजीरिया, आइवरी कोस्ट आदि तया दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील। 

(2) चाय- मौनसून एशिया में चीन, भारत, श्रीलंका, जापान, बंगलादेश, इन्डोनेशिया, मलेशिया आदि पश्चिमी एशिया में ईरान, दक्षिणी रूस आदि, अफ्रिका में केन्या, जायरे, जाम्बिया, तंजानियाँ आदि दक्षिणी अमेरिका में अर्जेन्टिना तथा ब्राजील।

(3) नारियल- दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देश- इन देशों के समुद्र तटीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के तटीय प्रदेश।

(4) कहवा- दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील, कोलम्बिया, इक्वेडोर, वेनेज्वेला तथा पेरू, अफ्रिका में गिनी तट के देश-आइवरी कोस्ट, घाना, अंगोला, उगाण्डा, एथियोपिया, जैसे आदि तथा मौनसून एशिया में भारत, हिन्दचीन आदि।

(5) केला- मौनसून एशिया में भारत, फिलीपिन, हिन्देशिया, मलेशिया, सिंगापुर और अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के भूमध्यरेखीय प्रदेश शामिल है।

(6) मसालें- मौनसून एशिया में भारत, श्रीलंका, मलेशिया तथा तंजानियाँ आदि। तंजानियाँ में जंजीवार द्वीप लौंग के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(7) कोको- इसका सबसे बड़ा उत्पादक अफ्रिका महादेश है। इसमें अप वोल्टा, घाना, नाजीरिया आदि हैं। कोको का कुछ उत्पादन दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील में भी होता है।

15. The Dairy farming in the world (विश्व में दुग्ध व्यवसाय)

15. The Dairy farming in the world

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. Discuss the dairy farming in the world.

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय का वर्णन करें।)

उत्तर- दूध पशुपालन विश्व के प्रत्येक देश में कुछ-न-कुछ होता है परन्तु कुछ भागों में यह व्यवसाय व्यापारिक स्तर पर किया जाता है। इन प्रदेशों में बड़े पैमाने पर पशुचारा तथा उनको खिलाने लायक अनाजों का उत्पादन होता है। आधुनिक समय में तीव्रगामी परिवहन तथा प्रशीतलन विधि से यह उद्योग और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। दुग्ध पशुपालन की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) इस प्रकार की कृषि में दुधारु पशुओं का विशेष महत्त्व होता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, प्रचुर श्रम तथा मवेशियों के रखने की वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग होता है।

(iii) कार्य के आकार एवं उपयोग में भिन्नता होती है।

(iv) दूध एवं दूध सामग्रियों का वितरण सापेक्ष दूरी के अनुसार होता है। ताजा दूध निकट के नगरों में तथा मक्खन एवं पनीर दूर के नगरों से प्राप्त किया जाता है।

(v) इस उद्योग में कुछ देशों ने विशेषीकरण प्राप्त कर लिया है।

(vi) इस उद्योग का विकास कम जनसंख्या वाले देशों में हुआ है।

(vii) यह व्यवसाय विश्व के समशीतोष्ण क्षेत्र में ही अधिक विकसित है।

विश्व में दुग्ध उत्पादन

       दूध की प्राप्ति गाय, भैंस, भेड़ तथा बकरी से होती है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1988 में विश्व भर में कुल 53 करोड़ टन दूध का उत्पादन था। विश्व भर में कुल दूध उत्पादन में पिछले तीन दशकों में आश्चर्यजनक रूप से लगभग दोगुना से अधिक की बढ़ोत्तरी हुई है। 30 साल बाद अर्थात 2018 में कुल दुग्ध उत्पादन 84.3 करोड़ टन हो गया है। साधारण शब्दों में कहें तो तीन दशक के भीतर कुल दूध उत्पादन में लगभग 60 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है।

    दूध का उत्पादन विश्व में निम्नलिखित क्षेत्रों से होता है।

विश्व में शीर्ष 10 दुग्ध उत्पादक देश (2019)

क्रम  देश उत्पादन (प्रतिशत में)
1. भारत 21
2. अमेरिका 11
3. पाकिस्तान  06
4. ब्राजील 04
5. चीन  04
6. रूस  04
7. जर्मनी 04
8. तुर्की 03
9. फ्रांस 03
10. न्यूजीलैंड 02

प्रमुख क्षेत्र

    विश्व में पशुपालन के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं-

(1) उत्तरी अमेरिका का U.S.A. तथा कनाडा का मध्य पूर्वी भाग।

(2) पश्चिमी यूरोप का उत्तरी भाग, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, डेनमार्क, ग्रेट ब्रिटेन तथा U.S.S.R का पश्चिमी भाग।

(3) दक्षिणी अमेरिका के अर्जेन्टाइना

(4) आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड

(5) गौण क्षेत्र पश्चिमी U.S.A., मध्य चिली, द० अफ्रीका तथा पूर्वी जापान।

(1) उत्तरी अमेरिका:

     दूध कृषि व्यवसाय U.S.A. तथा कनाडा में विकसित हैं। यहाँ के सभी बड़े नगरों के पास ताजे दूध के लिए यह किया जाता है। इसका सबसे अधिक केन्द्रीकरण U.S.A. के मक्का पट्टी के उत्तर ग्रेट लेक्स तथा सेंट लारेंस प्रदेश में हुआ है। यह घनी शहरी आबादी के पास स्थित है, जहाँ दूध, मक्खन एवं पनीर की बड़ी माँग है। यहाँ भी अनुकूल जलवायु तथा पहाड़ी प्रदेश अन्य कृषि के लिए अनुपयुक्त हैं। यहाँ क्यूवेक एवं ओण्टोरियो में लगभग 4000 से अधिक पनीर बनाने के कारखाने हैं। कनाडा से पनीर ब्रिटेन भेजा जाता है।

    U.S.A. में दूध उत्पादक क्षेत्र अटलांटिक तट से लेकर प० में मिसौरी नदी तक फैला है। न्यू इंगलैंड स्टेट, पेन्सिलवानिया, न्यूयार्क एवं विस्कौन्सिन राज्यों में दूध उत्पादन अधिक होता है। यहाँ दूध उत्पादन के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त हैं-

(i) ऊँची-नीची पहाड़ी भूमि पर पशु-चरण होता है।

(ii) ग्रीष्मकालीन वर्षा तथा कम गर्मी से घासें उगती है।

(iii) निकट की मक्का पट्टी से मकई से साइलेज बनाने की सुविधा।

(iv) निकट के बंदगाह से दूध पदार्थों के निर्यात की सुविधा

(v) समशीतोष्ण जलवायु के कारण दूध खराब नहीं होता है।

(vi) मशीनों का विभिन्न कार्यों में प्रयोग।

(vii) अच्छी नस्लों की जर्सी, गार्न से, आयर शायर आदि से अधिक दूध की प्राप्ति।

(viii) यातायात तथा शीतलन विधि की सुविधा।

     दूध तथा मक्खन के उत्पादन में U.S.A. का स्थान विश्व में रूस के बाद दूसरा तथा पनीर के उत्पादन में प्रथम है। इसने 1981 में विश्व का 15-6% दूध तथा मक्खन एवं 21-3% पनीर का उत्पादन किया।

(2) पश्चिम यूरोपीय प्रदेश:

    यह प्रदेश अच्छी मिट्टी एवं नम जलवायु के मुलायम घासों के लिये प्रसिद्ध है। यह दूध उत्पादन के लिए आदर्श है। यहाँ के दूध क्षेत्र प० फ्रांस, हॉलैंड, डेनमार्क, स्वेडन, ब्रिटेन तथा रूस तक फैला है।

    हॉलैंड में विशाल मैदान, नम जलवायु, उपजाऊ घास तथा उच्च गायों से अधिक दूध मिलता है। हॉलैंड का एडाम पनीर विश्व विख्यात है। डेनमार्क विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। समस्त डेनमार्क एक गऊशाला है। यहाँ दूध की नदी बहती है। यहाँ के लोगों की यह मुख्य पेशा है। यहाँ के दूध विकास के निम्न कारण हैं-

(i) यहाँ खनिजों का अभाव है।

(ii) जलवायु नम एवं अनुकूल।

(iii) छोटे-छोटे खेतों में घास

(iv) खेती के स्थान पर घासों का उत्पादन

(v) यहाँ दुग्ध शालाएँ लगभग 8000 से अधिक सहकारी समितियाँ द्वारा संचालित।

(vi) यहाँ 80% मक्खन तथा 10% पनीर

(viii) गाएँ उत्तम नस्ल की है।

        आधुनिक युग में पशुपालन वैज्ञानिक तरीकों से व्यावसायिक आधार पर हो रहा है। उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र, ब्राजील का पठारी भाग और अर्जेण्टीना में विस्तृत पम्पास घास स्थल, वेनेजुएला का लानोस घास स्थल, दक्षिणी अफ्रीका का वेल्ड क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड की शीतोष्ण घास भूमि, कैस्पियन सागर के पूर्व तथा अरल सागर के उत्तर के विस्तृत भाग व्यापारिक पशुपालन के उल्लेखनीय क्षेत्र हैं।

     व्यापारिक पशुपालन उद्योग पूर्णतया प्राकृतिक चरागाहों पर आश्रित नहीं है। विस्तृत क्षेत्रों में चारे की फसलों और पौष्टिक घासों की खेती की जाती है। पशुओं को सुख-सुविधा सम्पन्न बाड़ों में रखकर खिलाया-पिलाया जाता है। विशेष नस्ल के पशु पाले जाते हैं, जिनकी दूध या मांस उत्पादन क्षमता अत्यधिक होती है। पशुओं के प्रजनन, नस्ल सुधार, रोगों की रोकथाम तथा बीमार पशुओं के इलाज, आदि की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। पशुओं को बड़े-बड़े बाड़ों में रखा जाता है।

      डेनमार्क तथा न्यूजीलैण्ड में बड़े पैमाने पर दुग्ध व्यवसाय होता है। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में भेड़ ऊन तथा मांस के लिए व्यापारिक स्तर पर पाली जाती हैं। व्यापारिक पशुचारण में लोगों को प्रवास नहीं करना पड़ता है। वे एक ही स्थान पर हते हैं। चारे की फसलों की खेती तथा दूध और मांस से संसाधित पदार्थ बनाने के लिए मशीनों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इन संसाधित पदार्थों का बाजा अन्तर्राष्ट्रीय है।

       भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

14. WTO (विश्व व्यापार संगठन) की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्य

14. WTO (विश्व व्यापार संगठन) की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्य



WTO

प्रश्न प्रारूप

Q. विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना के उद्देश्यों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई। विश्व व्यापार संगठन (WTO) का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जिनेवा (Geneva) शहर में स्थित है।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




विश्व व्यापार संगठन

(World Trade Organisation)

परिचय
    विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization) एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार को मुक्त, पारदर्शी, संतुलित और विवाद-रहित बनाना है।

    इसका गठन 1 जनवरी 1995 को किया गया था। इससे पहले विश्व व्यापार व्यवस्था को नियंत्रित करने वाला मुख्य समझौता GATT (General Agreement on Tariffs and Trade – 1948) था, जिसे आगे बढ़ाते हुए WTO की स्थापना की गई।

    WTO आज वैश्विक व्यापार का सबसे प्रभावशाली संस्थान है, जिसमें 160 से अधिक देश सदस्य हैं। यह न केवल व्यापार नियमों को निर्धारित करता है, बल्कि व्यापार से जुड़े विवादों का समाधान भी करता है।

WTO की संरचना एवं कार्यप्रणाली

    WTO एक सदस्य-चालित संगठन है, अर्थात् इसके सभी निर्णय सदस्य देशों की सहमति से लिए जाते हैं। इसकी प्रमुख संस्थाएँ हैं- 

1. मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (Ministerial Conference):

     सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय; हर दो वर्ष में बैठक।

2. सामान्य परिषद (General Council):-

     दैनिक कार्यों का संचालन; यही विवाद निपटान निकाय (DSB) और व्यापार नीति समीक्षा निकाय (TPRB) के रूप में भी कार्य करता है।

3. विभिन्न समितियाँ:-

    कृषि, सेवाएँ, बौद्धिक संपदा (TRIPS), निवेश, प्रतिस्पर्धा आदि।

   WTO सभी सदस्यों पर एक समान नियम लागू करता है। इसका प्रमुख सिद्धांत ‘Most Favoured Nation – MFN’ है, जिसके तहत एक देश किसी सदस्य को जो व्यापार लाभ देता है, वह सभी सदस्यों को देना पड़ता है।

WTO के प्रमुख समझौते

1. GATT–1994 (वस्तु व्यापार):- 

     वस्तुओं पर टैरिफ कम करना, गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना।

2. GATS (सेवाओं पर व्यापार):-

     बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, पर्यटन आदि सेवाओं का उदारीकरण।

3. TRIPS (बौद्धिक संपदा अधिकार):-

     पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क की सुरक्षा।

4. TRIMS (निवेश संबंधी उपाय):-

     निवेश पर भेदभाव खत्म करना।

5. कृषि समझौता (AoA):-

      कृषि सब्सिडी, बाजार पहुंच और निर्यात सब्सिडी का नियमन।

WTO के उद्देश्य

      इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

(ix) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मुक्त प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना।

(x) टैरिफ और अन्य प्रतिबंधों को कम कर व्यापार को सरल और पारदर्शी बनाना।

(xi) व्यापार विवादों का निष्पक्ष समाधान करना।

(xii) विकासशील देशों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखना।

WTO और विकासशील देश

      WTO अपने नियमों में विकासशील और अल्प विकसित देशों को विशेष और भिन्न सुविधा (Special and Differential Treatment) देने की व्यवस्था करता है।

⇒ उन्हें कुछ समझौतों को लागू करने के लिए अधिक समय मिलता है।

⇒ निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

⇒ अल्प विकसित देशों को बाजार पहुंच में विशेष रियायत मिलती है।

     परंतु अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि WTO विकसित देशों के हितों की अधिक रक्षा करता है और विकासशील देशों की आवाज उतनी प्रभावशाली नहीं होती।

WTO और भारत

   भारत WTO का संस्थापक सदस्य है। WTO में भारत की भागीदारी का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में देखा जाता है।

सकारात्मक प्रभाव

1. निर्यात अवसरों में वृद्धि:- सेवाओं के क्षेत्र, विशेषकर IT और BPO (Business process outsourcing) में भारत को भारी लाभ मिला।

2. प्रतिस्पर्धा में वृद्धि:- उद्योगों ने बेहतर तकनीक अपनाई और निर्यात-उन्मुख उत्पादन बढ़ा।

3. कृषि निर्यात में सुधार:- मसाले, चाय, कॉफी, समुद्री उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी।

4. FDI प्रवाह में वृद्धि:- वैश्विक व्यापार मानकों के कारण निवेश में पारदर्शिता आई।

नकारात्मक प्रभाव

1. कृषि क्षेत्र पर दबाव:- विकसित देशों द्वारा भारी सब्सिडी के कारण भारतीय किसानों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा मुश्किल।

2. दवा क्षेत्र में प्रभाव:- TRIPS समझौते के कारण दवाओं पर पेटेंट नियम कड़े हुए, जिससे सस्ती जनरिक दवाओं का उत्पादन सीमित हो सकता है।

3. आयात में वृद्धि:- सस्ते विदेशी उत्पादों के कारण घरेलू उद्योग पर दबाव बढ़ा।

4. निर्णय लेने में असमानता:- WTO में विकसित देशों का प्रभाव अधिक माना जाता है।

WTO की आलोचनाएँ

⇒ यह संगठन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित देशों को अधिक लाभ पहुंचाता है।

⇒ कृषि सब्सिडियों के मामले में असमानता विकसित देश अधिक सब्सिडी देते हैं जबकि विकासशील देशों पर रोक।

⇒ पर्यावरण और श्रम मानकों पर स्पष्ट नियम नहीं।

⇒ TRIPS समझौता गरीब देशों की स्वास्थ्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

⇒ निर्णय-प्रक्रिया बहुत जटिल और धीमी है।

WTO के समक्ष चुनौतियाँ

1. वैश्विक संरक्षणवाद का बढ़ना:-

     कई देश घरेलू उद्योग बचाने के लिए प्रतिबंध बढ़ा रहे हैं।

2. विवाद निपटान तंत्र में संकट:-

     अपीलीय निकाय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में अड़चनें।

3. डिजिटल व्यापार:-

     नए नियम बनाने की आवश्यकता।

4. कृषि सुधार:-

     विकसित देशों की सब्सिडी नीति WTO को चुनौती देती है।

5. बहुपक्षीय वार्ताओं में गतिरोध:- दोहा विकास एजेंडा वर्षों से अधर में।

भारत की मांगें और रुख

⇒ कृषि सब्सिडियों में न्यायसंगत नियम।

⇒ खाद्य सुरक्षा के लिए Public Stockholding व्यवस्था को स्थायी समाधान।

⇒ विकासशील देशों की विशेष सुविधाएँ जारी रहें।

⇒ सेवाओं में Mode-4 (लो-कॉस्ट वर्कफोर्स मूवमेंट) को मजबूत करना।

⇒ भारत WTO में विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।

निष्कर्ष

    WTO वैश्विक व्यापार व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ है, जिसने दुनिया भर में व्यापार को अधिक उदार और पारदर्शी बनाया है। हालांकि इसके सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं विशेषकर विकसित और विकासशील देशों के बीच असमानता, कृषि सब्सिडी, और पेटेंट नियमों के विवाद।

     भारत जैसे विकासशील देशों के लिए WTO एक अवसर और चुनौती दोनों है। सही नीति-निर्माण, सामूहिक कूटनीति और राष्ट्रीय हितों के साथ तालमेल रखते हुए WTO भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाने में सहायक हो सकता है।

नोट:

GATT: The General Agreement on Tariffs and Trade

GATS: The General Agreement on Trade in Services

TRIPS: The Agreement on Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights

TRIMS: The Agreement on Trade-Related Investment Measures

♣ लो-कॉस्ट वर्कफोर्स मूवमेंट (Low-Cost Workforce Movement):-

       यह एक ऐसा श्रम-गतिशीलता (labour mobility) मॉडल है, जिसमें कम लागत पर उपलब्ध श्रमिक एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, या एक देश से दूसरे देश में आर्थिक अवसरों, जीवन-स्तर सुधार और रोजगार सुरक्षा की तलाश में स्थानांतरित होते हैं। यह अवधारणा मुख्यतः वैश्वीकरण, औद्योगिकीकरण और सेवा क्षेत्र के तेज विस्तार से जुड़ी है।

13. Definition and scope of transport geography (परिवहन भूगोल की परिभाषा एवं विषय-क्षेत्र)

13. Definition and scope of transport geography

(परिवहन भूगोल की परिभाषा एवं विषय-क्षेत्र)



scope of transport geography

प्रश्न प्रारूप

Q. परिवहन भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय-क्षेत्र एवं अध्ययन उद्देश्य की विवेचना कीजिए।

उत्तर- मानव भूगोल की उपशाखा आर्थिक भूगोल की एक महत्वपूर्ण सहशाखा परिवहन भूगोल है। 1954 में सर्वप्रथम एडवर्ड उलमान (Edward Ullman) ने यह प्रतिपादित किया कि परिवहन का अध्ययन एक दृष्टिकोण के रूप में किया जाना चाहिए क्योंकि परिवहन विभिन्न क्षेत्रों के मध्य सम्बन्धों का माप होता है।

    इस दृष्टि से यह भूगोल का अपरिहार्य अंग है। परिवहन के द्वारा माल, मनुष्य एवं विचारों का वहन होता है। इस वहन में संचरण एवं गति निहित होती है जो कि परिवहन का मूल है। स्पष्ट है कि परिवहन में माल, मनुष्य एवं विचारों का संचरण होता है और यह संचरण निश्चित उद्देश्यों से होता है। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं द्वारा अठारहवीं शताब्दी में संचरण भूगोल शब्द का प्रयोग किया गया था।

      वस्तुतः परिवहन एक सार्वभौमिक घटना है और वर्तमान आर्थिक वैश्वीकरण के इस दौर में परिवहन के कारण ही अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भरता का स्थान अन्तरनिर्भरता ने ले लिया है। अतः यह कथन सत्य प्रतीत होता है कि परिवहन ने दूरी एवं समय पर विजय प्राप्त कर ली है। उल्लेखनीय है कि मानव की मूलभूत (Basic) एवं उच्चतर (Higher) आवश्यकताएं एक ही स्थान से पूरी नहीं हो सकती हैं।

     इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु या तो मानव को स्वयं दूसरे स्थान पर जाना होता है या उन आवश्यकता वाली वस्तुओं को अपने पास लाना होता है। उपरोक्त दोनों ही स्थितियों में आवश्यकता पूर्ति हेतु परिवहन आवश्यक हो जाता है। इस तरह से परिवहन स्थान उपयोगिता (Place Utility) को भी बढ़ा देता है और समय उपयोगिता (Time Utility) को भी बढ़ा देता है।

     स्पष्ट है कि परिवहन एक भौगोलिक घटना है, जिसमें पारस्परिक प्रतिक्रिया निहित है। यह पारस्परिक प्रतिक्रिया भूतल पर स्थित विभिन्न क्षेत्रों एवं स्थानों के मध्य होती है। हार्टशोर्न के अनुसार, भूतल पर क्षेत्रीय विभिन्नता, क्षेत्रीय पृथकता एवं प्रादेशिक विशिष्टीकरण के कारण ही पारस्परिक प्रतिक्रिया होती है। इन्हीं पारस्परिक प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप भूतल पर मांग एवं पूर्ति के क्षेत्र बन गए हैं जो संचरण को जन्म देते हैं। इस संचरण में चूंकि भूगोल की एक महत्वपूर्ण अवधारणा क्षेत्रीय विभिन्नता एवं क्षेत्रीय सम्बन्ध निहित है, अतः उलमान के अनुसार, क्षेत्रीय प्रतिक्रिया में परिवहन का अध्ययन ही परिवहन भूगोल है।

     यद्यपि भूतल पर पारम्परिक प्रतिक्रिया सामान्यत: जनसंख्या, संसाधनों और संसाधनों के उपयोग के ज्ञान के असमानता होने के कारण उत्पन्न होती है तथापि उलमान ने इस पारस्परिक प्रतिक्रिया के सैद्धान्तिक पहलू का विश्लेषण करते हुए इसके तीन आधार बताए हैं। जिन्हें उलमान के त्रय ((Ullman’s Triod) के नाम से जाना जाता है। ये त्रय हैं। :-

(1) संपूरकता (Complimentarity)

(2) मध्यवती आपूर्ति सुविधाएं (Intervening Opportunities)

(3) स्थानान्तरणशीलता (Transferability)

(1) संपूरकता (Complimentarity):-

      भूतल पर माल, मनुष्य एवं विचारों की क्षेत्रीय विभिन्नता है। यही क्षेत्रीय विभिन्नता मांग और पूर्ति के क्षेत्रों को जन्म देकर संचरण को अस्तित्व में लाती है। अतः स्थानों अथवा क्षेत्रों के मध्य मांग एवं पूर्ति की प्रक्रिया को संपूरकता अथवा परिपूरकता कहते हैं। यह परिपूरकता वस्तु-विशेष के सन्दर्भ में होती है अर्थात् एक प्रदेश में वस्तु-विशेष का आधिक्य हो तथा दूसरे प्रदेश में इस वस्तु-विशेष की मांग हो।

     नगरीय औद्योगिक प्रदेश एवं ग्रामीण कृषि प्रदेश इसी परिपूरकता पर आधारित हैं अर्थात् ये दोनों प्रदेश एक-दूसरे को आदान-प्रदान करके अपनी मांग की पूर्ति करते हैं। इसी प्रकार तकनीकी रूप से विकसित देश विकासशील अथवा अविकसित देशों से औद्योगिक कच्चे माल का आयात कर निर्मित माल का निर्यात मांग वाले देशों को करते हैं।

     इस प्रकार परिपूरकता अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक मौलिक आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि एक ही वस्तु के उत्पादन पैमाने में भिन्नता के कारण भी दो क्षेत्रों में परिपूरकता की दशाएं उत्पन्न हो सकती हैं। यह परिपूरकता कच्चे माल के एकत्रीकरण, अर्द्धनिर्मित माल के वहन एवं विनिर्मित वस्तुओं के वितरण से सम्बन्धित हो सकती है।

(2) मध्यवर्ती आपूर्ति स्रोत अथवा सुविधाएं (Intervening Opportunities):-

      ये वे वैकल्पिक सुविधाएं अथवा स्रोत होती हैं जिनमें दो स्थानों के बीच के मांग एवं पूर्ति के सम्बन्धों को तीसरे किसी अन्य स्थान अथवा स्रोत द्वारा वैकल्पिक सुविधा प्रदान की जाती है और ऐसी स्थिति में इन दो क्षेत्रों के मध्य यह स्थान मध्यवर्ती आपूर्ति स्रोत के नाम से पुकारा जाता है। यह स्रोत अथवा सुविधा अधिक दूर और उत्तम वस्तु के स्थान पर सापेक्ष निकट में और पर्याप्त वस्तु प्रदान करने का विकल्प प्रदान करती है और यह विकल्प चयन के लिए प्रेरित करता है। मध्यवर्ती सुविधाएं एक तरफ तो संचरण को हतोत्साहित करती हैं लेकिन दूसरी तरफ नये स्थानों के बीच संचरण को प्रोत्साहित करती हैं।

(3) स्थानान्तरणशीलता (Transferability):

      परिवहन हेतु उपरोक्त दो कारकों के अतिरिक्त स्थानान्तरणशीलता अर्थात् आर्थिक दृष्टिकोण से परिवहन सम्भव होना चाहिए। यदि दो स्थानों के मध्य परिवहन व्यय इतना अधिक हो कि वस्तु-विशेष निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचने पर अत्यधिक महंगी पड़े तो परिवहन सम्भव नहीं होगा। ऐसी दशा में उस वस्तु के स्थान पर दूसरी वस्तु का प्रतिस्थापन होने लगेगा। स्थान-युग्म के मध्य एक ही परिवहन साधन द्वारा यातायात में भी विभिन्न वस्तुओं की भाड़े की दरें भिन्न-भिन्न होती हैं। अतः विभिन्न वस्तुओं की स्थानान्तरणशीलता वस्तु की परिवहन लागत के साथ-साथ यात्रा समय, सुरक्षा, विश्वसीनयता आदि पर निर्भर करती है।

    उलमान के अनुसार विभिन्न स्थानों के मध्य प्रतिक्रिया उपरोक्त तीनों कारकों के सम्मिलित प्रभाव से निर्धारित, नियंत्रित अथवा नियमित होती है।

     पीटर हैगेट (Peter Hagget) ने संचरण (Movement) के सहारे एक समन्वित प्रादेशिक व्यवस्था के विकास की व्याख्या की है। यह विकास (ⅰ) संचरण (Movement), (ii) जाल (Network), (iii) केन्द्र (Nodes), (iv) श्रेणी क्रम (Hierar- chies) और (v) सतह (Surfaces) के द्वारा होता है।

     एम. ई. ई. हर्स्ट (M. E. E. Hurst) ने केन्द्र (Nodes), कड़ियों (Linkages), साधन व्यवस्था (Modes) और वहन (Flow) के आधार पर अपनी कार्यकलापी अवधारणा प्रस्तुत की है जो कूले (Cooley) के अर्थशास्त्री सिद्धान्त से ली गई है।

    हर्स्ट ने परिवहन को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश में प्रस्तुत किया है क्योंकि ये ही परिवेश परिवहन प्रणालियों के संचालन की दशाएं प्रदान करते हैं।

    इस संचालन परिवेश में किसी भी परिवहन प्रणाली की प्रथम अवस्था में पारस्परिक प्रतिक्रिया की इच्छा होती है और यह पारस्परिक प्रतिक्रिया संचरण उत्पन्न करती है। संचरण प्रधानतः पृथ्वी सतह पर मांग और पूर्ति के क्षेत्रों के स्थानिक असन्तुलन के कारण उत्पन्न होता है। स्थानिक संचरण (Spatial Movement) को प्रोत्साहित करने वाले सकारात्मक घटक (Positive Potentials) परिपूरकता, मध्यवर्ती स्रोत सुविधाएं तथा सांस्कृतिक समानता हैं जबकि स्थानिक संचरण को हतोत्साहित करने वाले नकारात्मक घटक (Negative Potentials) दूरी, परिवहन लागत, स्थानान्तरणशीलता और राजनीतिक अवरोध हैं।

    परिवहन प्रणाली की द्वितीय अवस्था में संचरण निश्चित मार्गों के सहारे होता है जो परिवहन जाल (Network) का विकास करता है। यह परिवहन जाल दृश्यमान और अदृश्यमान दोनों ही प्रकार का होता है। तत्पश्चात् इन मार्गों के जाल के सहारे विभिन्न परिवहन साधनों द्वारा वहन होता है जिनमें वाहन संख्या तथा मार्गों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। ये परिवहन के विभिन्न साधन एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी भी होते हैं और एक-दूसरे के पूरक भी होते हैं।

   इस प्रकार इन सभी के द्वारा माल, मनुष्य एवं विचारों का वहन होता है तथा ये सभी मिलकर एक प्रदेश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हुए उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश को नियंत्रित करते हैं।

   हर्स्ट ने अपनी कार्यकलापी विचारधारा में परिवहन भूगोल के अध्ययन के लिए विभिन्न परिवहन के साधनों को समग्र रूप से अध्ययन करने के साथ-साथ संचरण अवधारणा को निर्धारित करने वाली परिवहन व्यवस्था को विभिन्न अवयवों में विभक्त करके अध्ययन करने का सुझाव दिया। उन्होंने परिवहन व्यवस्था को निम्न अवयवों के रूप में प्रस्तुत किया है:

(1) वस्तु सूची तालिका (Inventory),

(2) परिवहन जाल (Network),

(3) वहन (Flows),

(4) साधन व्यवस्था (Modes),

(5) उपरोक्त चारों अवयवों का अन्तर्सम्बन्ध (Interrelationship)

परिवहन भूगोल का अध्ययन उद्देश्य-

     उलमान के अनुसार, परिवहन भूगोल का अध्ययन निम्न उद्देश्यों के पूर्ति के लिए किया जाता है:-

(i) माल, मनुष्य एवं विचारों के स्थानिक संचरण का, उत्पत्ति एवं निर्दिष्ट स्थलों के बीच संचरण की मात्रा एवं गति का मापन एवं मानचित्रीकरण करना।

(ii) परिवहन लागत तथा लागत-दर संरचना का भौगोलिक विश्लेषण करना।

(iii) परिवहन को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय घटकों (विशेषकर धरातलीय दशाओं, जल प्रवाह, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी) का अध्ययन करना।

(iv) निरन्तर विकासमान अथवा परिवर्तित तकनीक के परिवहन पर प्रभाव का अध्ययन करना।

(v) भूतल पर आर्थिक विकास की प्रक्रियाओं के साथ-साथ विकसित हुए परिवहन मार्ग जाल का अध्ययन करना।

(vi) भूतल पर परिवहन साधनों, परिवहन मार्ग जाल, संयोजकता (Connectivity) औ संगम स्थल अभिगम्यता (Nodal Accessibility) की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन कना।

18. Delimitation and division of cultural regions (सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन)

18. Delimitation and division of cultural regions

(सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन)



Delimitation and division

प्रश्न प्रारूप 

Q. सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन के प्रमुख आधारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- समान गुण एवं समान प्रकृति वाले क्षेत्र को प्रदेश कहते हैं। इस दृष्टि से सांस्कृतिक प्रदेश धरातल का वह भाग है जिसमें सांस्कृतिक लक्षणों में समानता विद्यमान होती है तथा जिस कारण वह अपने निकटवर्ती प्रदेशों से भिन्न होता है।वस्तुतः मानव संस्कृति का उद्भव किसी सूक्ष्म केन्द्र पर होता है, कालान्तर में इसका प्रसरण समीपवर्ती क्षेत्रों में होता है।कुछ समय उपरान्त जब एक विस्तृत क्षेत्र के अन्तर्गत समान सांस्कृतिक लक्षण, तकनीकी तथा संसाधन उपयोग प्रक्रिया का विस्तार हो जाता है तब इसे सांस्कृतिक प्रदेश कहते हैं।

     स्पेन्सर के अनुसार किसी लघु क्षेत्र में रहने वाले मानवों का प्रभाव तथा उनकी संस्कृति निकटवर्ती क्षेत्रों में फैलकर अपना प्रभाव अंकित करती है। उसके सम्पूर्ण प्रभाव क्षेत्र को सांस्कृतिक प्रदेश कहते हैं।

    सांस्कृतिक प्रदेश में सांस्कृतिक तत्वों की समानता, सांस्कृतिक तत्वों का पारस्परिक सम्बन्ध, तथा उसके द्वारा उत्पन्न परिणामों का विशिष्ट पुंज होता है जिसके आधार पर प्रदेशों का विभाजन किया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के विभाजन में सर्वप्रथम महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तत्वों का चयन किया जाता है तथा यह देखा जाता है कि कौन-सा सांस्कृतिक तत्व सबसे अधिक एवं सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रभावी है। सांस्कृतिक तत्व मानवीय विचारों से सम्बन्धित होते हैं, जिनके ज्ञान के लिए सूक्ष्म निरीक्षण की आवश्यकता होती है।

       वह क्षेत्र जिसमें समान संस्कृति विद्यमान होती है, वह एक सांस्कृतिक प्रदेश कहलाता है। संस्कृति प्रदेशों का उल्लेख सर्वप्रथम विस्लर ने अमेरिकी इण्डियन संस्कृतियों के अध्ययन में प्रस्तुत किया था। इस अध्ययन में विस्लर ने सम्पूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों के आधार पर प्रदेशों का विभाजन किया। सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन के समय क्षेत्र के भौतिक लक्षणों को भुला दिया जाता है तथा यह बात भी अमान्य कर दी जाती है कि संस्कृति भौतिक संस्कृति के गुणों पर आधारित होती है।

    बोआस के अनुसार धर्म या सामाजिक संगठन या संस्कृति के किसी अन्य पहलू के आधार पर विभाजित किए गए सांस्कृतिक प्रदेश भौतिक संस्कृति पर आधारित सांस्कृतिक प्रदेशों से मेल नहीं खाते हैं।

     समान सांस्कृतिक गुणों के अधिकाधिक सघन संग्रह मिलते हैं, वही उस संस्कृति-प्रदेश का केन्द्र बनता है। केन्द्र से दूर जब प्रदेश की सीमा को खोजा जाता है, तो वहां पर संस्कृति के भावात्मक तथा निषेधात्मक दोनों गुणों पर ध्यान दिया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन में निम्नलिखित संस्कृति लक्षणों को आधार बनाया जा सकता है। जैसे-

(i) भौतिक दशाओं,

(ii) बसावट प्रारूप,

(iii) जनसंख्या,

(iv) व्यवसाय,

(v) भाषा,

(vi) शिक्षा,

(vii) धर्म,

(viii) रहन-सहन,

(ix) रीति-रिवाज तथा

(x) आचार-विचार   

     सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन के समय निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है ताकि सांस्कृतिक प्रदेशों का यथार्थ विभाजन सम्भव हो सके :

1. संस्कृति क्षेत्र मूलतः एक युक्ति है, जिसका प्रयोग सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता किसी महाद्वीप या द्वीप में संस्कृतियों के विस्तार को दिखाने के लिए करता है। सांस्कृतिक प्रदेश के लिए किसी विस्तृत परिवेश में एक विशिष्ट जीवन-रीतियां विद्यमान हैं, उनकी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिए संस्कृतियों के बीच समानताओं एवं भिन्नताओं का सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक होता है।

2. सांस्कृतिक प्रदेश वह स्थान है, जहां गुणों का संग्रह पाया जाता है, इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए। यह नहीं देखना चाहिए कि किसी क्षेत्र में लोग किस प्रकार समृद्धशाली जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

3. सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन के समय सीमान्त संस्कृति का सूक्ष्मता से निरीक्षण आवश्यक होता है। सीमान्त संस्कृति वह है, जहां कि पड़ोस के क्षेत्र के गुणों को पहचाना जा सके।

4. कभी-कभी किसी क्षेत्र में इतनी अधिक सांस्कृतिक सादृश्यताएं रहती हैं कि सांस्कृतिक-प्रदेशों के क्रम में उनकी भिन्नताएं छिप जाती हैं। ऐस दशा में किसी सामाजिक वर्ग या पेशे वाले समूह के विशिष्ट व्यवहार को मुख्य आधार माना जाता है।

     संस्कृति मण्डल की लघुतर इकाई संस्कृति-परिमण्डल तथा संस्कृति-परिमण्डल की लघुतर इकाई संस्कृति-प्रदेश है। संस्कृति-परिमण्डल के अन्तर्गत जितनी विषमता संस्कृति लक्षणों में विद्यमान होगी, प्रदेशों की इकाई उतनी ही अधिक होगी।

    प्रदेशों की इकाइयों की संख्या संस्कृति-लक्षणों की विषमता पर निर्भर करती है। इन्हीं संस्कृति लक्षणों के आधार प संस्कृति प्रदेशों का स्वरूप विश्लेषित किया जाता है, परन्तु संस्कृति-लक्षणों की संख्या इतनी अधिक होती है कि सभी का विश्लेषण कना सम्भव नहीं होता है।

      ऐसी दशा में महत्वपूर्ण लक्षणों का वर्णन किया जाता है तथा कम महत्व के संस्कृति-लक्षणों को छोड़ दिया जाता है। संस्कृति-लक्षणों के महत्व का आकलन संस्कृति लक्षणों के अन्तर्सम्बन्ध से लगाया गया है। जो संस्कृति लक्षण व्यावहारिक दृष्टि से अधिक सम्बन्धित होते हैं, उनका महत्व अधिक होता है तथा सांस्कृतिक प्रदेशों के अन्तर्गत उसी का विश्लेषण किया जाता है।

17. Definition and scope of ​​cultural geography (सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र)

17. Definition and scope of ​​cultural geography

(सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र)



Definition and scope

प्रश्न प्रारूप 

Q. सांस्कृतिक भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

उत्तर- सांस्कृतिक पर्यावरण मानव के द्वारा निर्मित किया हुआ भूदृश्य होता है जिसमें मानवीय निवास गृह, आवागमन के साधन, सिंचाई के साधन, परिवहन और संचार के साथन, आर्थिक व्यवसाय, श्रम विभाजन, खेत, कारखाने, बैंक, बीमा संस्थान, साहित्यिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक और राजनैतिक संस्थाएं, आदि होती हैं। इनके अतिरिक्त सामाजिक व्यवस्था, श्रम विभाजन, प्रथाएं और जीवन के मूल्य भी इसमें सम्मिलित रहते हैं।

    सांस्कृतिक पर्यावरण के इस निर्माण में मानव की संख्या, उसकी शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता, विकास का स्तर. सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताएं, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी उपलब्धियां आधारी कारक रहे हैं। इन कारकों ने सांस्कृतिक पर्यावरण की कई प्रक्रियाओं को जन्म दिया है जिनमें समाजीकरण और आर्थिकीकरण मुख्य हैं।

     समाजीकरण मानव की वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वह अपने समाज में कुछ निश्चित तौर तरीके अपनाता है तथा अपने को समाज के अनुकूल ढालता है। विभिन्न समाजों के अन्तर्गत मानव अपने जीवन निर्वाह तथा विकास के लिए पर्यावरण के संसाधनों को प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं। मानव की इस प्रक्रिया को आर्थिकीकरण कहते हैं। इसके अन्तर्गत मानव की उत्पादन, वितरण, उपभोग सम्बन्धी मांग-आपूर्ति तथा आय द्वारा समृद्धि से जुड़ी क्रियाएं आती हैं।

     संस्कृति एक ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है जो सांस्कृतिक पर्यावरण और सामाजिक क्रिया का निर्धारण करती है। व्यक्ति विशेष का व्यवहार उस संस्कृति द्वारा नियमित होता है जिसमें वह रहता है। संस्कृति व्यक्ति को एक अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र के वैकल्पिक व्यवहारों में से एक विशेष प्रकार के व्यवहार का चुनाव करने में सहायक सिद्ध होती है, जो उसकी जैविक विरासत द्वारा उसे अनुमत है। यह एक ऐसी जटिल सम्पूर्णता है जिसके अन्तर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा और कई अन्य क्षमताओं तथा आदतों का समावेश होता है जिसे व्यक्ति ने समाज के एक सदस्य के रूप में अर्जित किया है।

   यद्यपि सम्पूर्ण विश्व की मानव जाति की संस्कृतियों में एक आश्चर्यजनक विभिन्नता दिखाई पड़ती है फिर भी प्रत्येक संस्कृति मानव कार्यकलापों के कुछ ऐसे क्षेत्रों को सम्मिलित करती है जिनको संस्कृति के विविध पक्षों के रूप में जाना जाता है। ये पक्ष आसपास के भौतिक पर्यावरण से अनुकूलन करने के साधन हैं।

    इन पक्षों में प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र, सामाजिक संगठन, शिक्षा, राजनीतिक संरचनाएं, विश्वास, प्रथाएं, शक्ति का नियंत्रण, कला, संगीत, नाटक, नृत्य, लोकवार्ता, आदि उल्लेखनीय हैं। किसी समाज द्वारा अपने लिए सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के विशिष्ट तंत्रों को अपनाने का निर्धारण अधिकांशतः उसका भौतिक पर्यावरण ही करता है जिसमें जलवायु, स्थलाकृति, प्राकृतिक संसाधन और अन्य सम्मिलित होते हैं।

सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा

    धरातल पर सांस्कृतिक भूदृश्यों में विभिन्नता का कारण मानव की सांस्कृतिक प्रक्रियाओं में भिन्नता होना है। मानव प्राकृतिक पर्यावरण में प्राविधिकी ज्ञान, सामाजिक संगठन आदि के द्वारा परिवर्तन करता है और सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करता है। प्रत्येक सांस्कृतिक पर्यावरण में भिन्न-भिन्न जीवन तंत्र का विकास होता है। इस जीवन तंत्र का विश्लेषण करना सांस्कृतिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य है।

    फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता डिमांजियां के अनुसार मानव समाज का अध्ययन पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य में करना ही सांस्कृतिक भूगोल है।

   हंटिंगटन के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत भौतिक दशाओं एवं मानवीय प्रतिक्रियाओं के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। इन्होंने जलवायु को मानव की संस्कृति के उत्थान और पतन का कारण माना है।

    कार्ल ओ सावर के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल की वास्तविक योजना सामान्य उद्देश्यों से सम्बन्धित है जो पृथ्वी तल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन करता है। धरातल पर भौतिक पर्यावरण एवं सांस्कृतिक पर्यावरण दोनों विद्यमान हैं, लेकिन सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

     जार्डन तथा रॉवेन्ट्री के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें मानव निवास करता है, की अपेक्षा मानवीय संस्कृति पर विशेष बल दिया जाता है। ये मानवीय संस्कृतियां भिन्न-भिन्न होती हैं, जिससे क्षेत्रीय भिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं। अतः सांस्कृतिक समूहों की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन ही सांस्कृतिक भूगोल है।

     स्पेन्सर तथा थॉमस जूनियर के अनुसार मानवीय प्राविधिक व्यवस्थाओं तथा सांस्कृतिक व्यवहारों, जिसका सम्बन्ध आदिकाल से पृथ्वी के विशिष्ट क्षेत्रों में मानवीय संस्कृति से ही प्रचलित है, का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल है।

सांस्कृतिक भूगोल का उद्देश्य और अध्ययन क्षेत्र

       उपर्युक्त परिभाषा के विश्लेषण के पश्चात प्रमुख तथ्य स्पष्ट होते हैं। जो सांस्कृतिक भूगोल के मूलभूत उद्देश्य है :

1. प्राकृतिक पर्यावरण एवं संस्कृति का प्रभाव मानव जीवन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पर्यावरण संस्कृति पर तथा संस्कृति पर्यावरण पर स्पष्ट प्रभाव डालते हैं। फलस्वरूप दोनों में परिवर्तन घटित होता है। इस परिवर्तन का प्रभाव मानव जीवन स्तर पर पड़ता है। अतः आदिकाल से वर्तमान काल तक के इन्हीं तथ्यों का विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल का उद्देश्य है।

2. धरातल पर प्राकृतिक पर्यावरण तथा भौगोलिक पर्यावरण में भिन्नता एवं विषमता दृष्टिगत है। ये भिन्नताएं तथा विषमताएं मानव समाज में मानसिक एवं सांस्कृतिक भिन्नताएं उत्पन्न कर देती हैं। फलस्वरूप किसी विशिष्ट स्थान का मानव ज्ञान एवं प्राविधिकी का विकास करके अपना जीवन स्तर, दूसरे स्थान के मानव की अपेक्षा सुधार लेता है। अतः इसका विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

3. पूर्वज मानव जब गुफाओं अथवा वृक्षों पर रहता था, तब जंगली फलों, आखेट एवं मछुआ कर्म द्वारा जीविकोपार्जन करता था तथा पशुओं की खालों, वृक्षों की छालों एवं पत्तियों से अपना शरीर ढकता था। अर्थात् इस समय मानव पूर्णरूपेण प्राकृतिक पर्यावरण के अनुसार अपने को ढालते थे, परन्तु मानव ने जब कृषि एवं पशुपालन अपनाया, तब प्राकृतिक वातावरण में सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण किया।

     वर्तमान समय में, मानव ने आविष्कार शक्ति, संचित अनुभव, अन्य समुदायों से लाभ उठाकर, एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तन कर तथा प्राकृतिक पर्यावरण में यथासम्भव परिवर्तन करके अपनी संस्कृति का विकास किया है। पूर्व मानव तथा आधुनिक मानव के क्रियाकलापों का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल का लक्ष्य है।

4. प्राकृतिक पर्यावरण में अनेक सम्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, परन्तु, मानव सम्पूर्ण सम्भावनाओं का पूर्ण उपयोग करे, यह सम्भव नहीं है। यह उपयोग मात्र मानव के सांस्कृतिक विकास पर आधारित होता है। संस्कृति का विकास कम हुआ है तथा इसी क्रम में उसने प्राकृतिक सम्भावनाओं का उपयोग भी किया है। वर्तमान काल में उसका उपयोग हो रहा है। अतीतकाल तथा वर्तमान काल के उपयोग की दर के अन्तर का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल का लक्ष्य है।

5. प्राकृतिक पर्यावरण में सांस्कृतिक विकास की सीमाएं होती हैं। मानव अपने ज्ञान तथा प्राविधिकी कारकों की सहायता से इस सीमा का विस्तार कर लेता है। सांस्कृतिक भूगोल में इन्ही सीमाओं एवं अधिकार क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है।

6. मानव की संस्कृति में निरन्तर परिवर्तन हुआ है। इसके द्वारा सृजित सांस्कृतिक पर्यावरण में धर्म, भाषा, रहन-सहन, वेश-भूषा, आदि में विश्व स्तर पर अनेक भिन्नताएं मिलती हैं। इन सब का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

7. प्राकृतिक पर्यावरण पर मानव का नियंत्रण प्रभावशाली ढंग से हुआ है, परन्तु इसमें कुछ परिवर्तन महत्वपूर्ण तथा तीव्रगामी हैं, जिसे क्रान्ति की संज्ञा प्रदान की जाती है। उदाहरणार्थ- कृषि क्रान्ति, औद्योगिक क्रान्ति, प्राविधिक क्रान्ति, आदि। प्राचीन काल से वर्तमान काल तक, इन क्रान्तियों की भौगोलिक व्याख्या करना सांस्कृतिक भूगोल का मुख्य लक्ष्य है।

सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध-

    सांस्कृतिक लक्षणों तथा मानव प्राविधि तंत्रों का विकास विभिन्न संस्कृति क्षेत्रों में होता है जिसका अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। भौतिक पर्यावरण में मानवीय क्रियाओं द्वारा प्राचीन से अर्वाचीन तक अनेक परिवर्तन घटित हुए हैं। पर्यावरण में परिवर्तन के कारण एक विस्तृत संस्कृति तंत्र का विकास होता है।

     मानव एक सक्रिय तत्व है जो अपने गुण द्वारा विभिन्न संस्कृति तत्वों का विकास करता है। मानव की सृजनात्मक एवं विनाशात्मक प्रवृत्ति के द्वारा पर्यावरण में अन्तःक्रिया तथा  सांस्कृतिक स्थानान्तरण होता है। संस्कृति के प्रत्येक तत्व क्रियाशील होते हैं तथा प्रत्येक तत्व में अन्तर्सम्बन्ध होता है। प्रत्येक तत्व के संगठन की क्रिया के फलस्वरूप किसी विशेष संस्कृति में एकीकरण होता है।

     क्रोबर के अनुसार ‘सांस्कृतिक एकीकरण या मानवीय सामाजिक एकीकरण कुछ लचीला होता  है।’

   मानव जीवन तंत्र की उत्पत्ति, पर्यावरण की विभिन्नता तथा नूतन प्रविधि के द्वारा परिवर्तन, आदि का विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है। नूतन प्रविधि को प्रयोग तथा संस्कृति सृजन में पर्याप्त समय लगता है। संस्कृति का सृजनात्मक स्वरूप, संस्कृति के विभिन्न तत्वों के आपस में सम्मिलन के द्वारा उत्पन्न होता है। ये सभी तत्व एक संगठन के रूप में कार्य करते हैं।

   मेलिनोवस्की के अनुसार संस्कृति एक जटिल यंत्र के समान है, जिसके विभिन्न पक्षों में अन्तर्सम्बन्ध है तथा उन्हें संगठित रूप में कार्य करना पड़ता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वह व्यर्थ सिद्ध होता है। संस्कृति का अध्ययन भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों के सन्दर्भ में होता है।

    स्पेन्सर ने स्पष्ट किया कि किसी संस्कृति का अध्ययन भौतिक जैविक वातावरण के अन्तर्सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य में होता है। विभिन्न मानव समूह अथवा मानव जनसंख्या का अध्ययन, उसका सामाजिक संगठन, विशेष अवस्था प्राप्त प्रविधि और इनके कलात्मक एवं गुणात्मक विकास के रूप में किया जाता है।

     स्थानान्तरणीय प्रवृत्ति के कारण सामाजिक संगठन में विकास की नवीन विधि का उद्भव हुआ है। वर्तमान में अपनी बौद्धिक क्षमता के कारण अधिकांश प्राकृतिक पर्यावरण को मानव ने अपने अधीन कर लिया है। मानव समुदायों में नवीन प्रविधियों के विकास के कारण चेतन तथा अचेतन पदार्थों का समुचित उपयोग करके विकसित मानवीय पर्यावरण का विकास करता है।

    मानव ने संचयात्मक तथा प्रसरण की प्रवृत्ति के फलस्वरूप नवीन प्रविधि का विकास विभिन्न पर्यावरण में किया है। मानव के प्रसार के कारण विभिन्न संस्कृतियों का प्रादुर्भाव हुआ है। वर्तमान संस्कृति ऐतिहासिक धरोहर है, जो विभिन्न मानव समूहों द्वारा विभिन्न कालों तथा स्थानों में अनुभव के सापेक्ष प्रयोग से उद्भूत हुई है। सभी संस्कृतियों में कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य पाया जाता है। सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता का यह कर्तव्य होता है कि संस्कृति के समस्त भौगोलिक तथ्यों के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करें।

    जार्डन तथा रॉवेन्टी ने स्पष्ट किया कि सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता संस्कृति के समस्त तत्वों तथा क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्धों को महत्व देता है। बिना क्षेत्रीय विषमताओं एवं अन्तर्सम्बन्धों के अध्ययन के संस्कृति की प्रक्रिया को समझना अत्यन्त कठिन है। सांस्कृतिक तत्व परस्पर किस प्रकार सम्बन्धित हैं, बिना इसके समझना असम्भव है। सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध के स्पष्टीकरण के लिए, उन कारणों की व्याख्या करना आवश्यक है जिससे सभ्यता, संस्कृति व सामाजिक विकास होता है। स्पेन्सर तथा थॉमस (1973) ने चा स्वतंत्र आधा तथा इनके मध्य छः अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या की है।

चित्र : कार्यात्मक अवधारणाएं तथा अन्तर्सम्बन्ध

        स्पेन्सर के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल का चार अवधारणात्मक अस्तित्व निम्न है :

1. भौतिक-जैविक पर्यावरण-

      इसमें क्षेत्रीय परिवर्तन तथा मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक संसाधन : मिट्टी, जलवायु, वनस्पति, खनिज, आदि का अध्ययन किया जाता है। मानव समुदाय इसका उपयोग करके अपने सन्ततियों की वृद्धि करता है।

2. जनसंख्या-

     मानव समुदायों द्वारा अधिकृत क्षेत्र जिसके संसाधनों का उपयोग करता है, समूहों का विकास, ह्रास तथा उसकी संख्या का अध्ययन किया जाता है।

3. सामाजिक संगठन-

        पूर्वज मानव से वर्तमान मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में प्रयुक्त प्रविधि, सामाजिक इकाइयों : परिवार, जाति, वर्ग तथा संस्था, आदि की संगठनात्मक संरचना तथा श्रम विभाजन का अध्ययन इसके अन्तर्गत किया जाता है।

4. प्रविधियां –

       इसमें नूतन एवं प्राचीन प्रविधियां जिसका प्रयोग मानव भौतिक एवं सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु करता है, का अध्ययन किया जाता है।

32. Cyclone and Anticyclone

32. Cyclone and Anticyclone



चक्रवात (Cyclone)

      चक्रवात को आँग्ल भाषा में Cyclone कहते है। “Cyclone” शब्द यूनानी भाषा से लिया गया है। जिसका शाब्दिक अर्थ है- सर्प की कुंडली। इस शब्द का प्रयोग जलवायु विज्ञान में प्रथम बार पिडिंगटन महोदय ने किया था।

      चक्रवात उस वायुमण्डलीय परिस्थिति को कहते हैं जिसमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृत्ति रखती है। चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब केन्द्र को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई के विपरीत (Anticlock wise) और दक्षिण गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा (Clock wise) में घुमने लगती हैं।

Cyclone and Anticycloneप्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

चक्रवात का वर्गीकरण

     विशेषताओं एवं भौगोलिक स्थिति के आधार प चक्रवात को दो भागों में बाँटते हैं:-

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)

(2) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cylone)

1. उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)- 

     पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों में 8º से 20° अक्षांशों के बीच या उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में किसी निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर तेज गति से घुमते हुए वायु से उत्पन्न मौसमी परिस्थितियों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की विशेषताएँ

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति तथा विकास सागरीय सतह से प्राय: प्रारंभ होती है। इसकी उत्पत्ति हेतु सागर एवं स्थल का मिलन बिन्दु आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।

(2) इसमें एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर हवाएँ घूमती है।

(3) इसमें वायु की औसत गति 100 Km/h होती है।

(4) इसमें समदाब रेखाएँ प्रायः गोलाकार होती है।

(5) इसमें दाब प्रवणता तीव्र होती है।

(6) चक्रवात की तीव्रता दाब प्रवणता पर निर्भर करती है। जब दाब प्रवणता कम होती है तो वायुमण्डलीय अवदाब का निर्माण होता है।

(7) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का विस्तार अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र पर होता है।

(8) प्राय: उष्ण कटिबंधीय चक्रवात पूरब से पश्चिम दिशा की ओर गमन करता है।

(9) इसमें अति अल्प समय में तीव्र गति से एवं अधिक मात्रा में वर्षा होती है।

(10) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केन्द्र को चक्रवात का आँख (चक्षु) कहा जाता है।

(11) यह शीत ऋतु की उपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक उत्पन्न होता है।

(12) चक्रवात में गर्म एवं आर्द्र हवाएँ ऊपर की ओर उठकर संघनन क्रिया के माध्यम से बादल का निर्माण करती है। संघनन क्रिया के द्वारा परित्यक्त गुप्त उष्मा के द्वारा चक्रवात शक्ति ग्रहण करता है।

(13) यह समुद्र से आर्द्रता को स्थल की ओर लाने में मदद करता है।

(14) चक्रवात के कारण बड़े पैमाने पर जान एवं माल की हानि होती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति

    उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्नि दोनों गोलार्द्ध में 8º से 20° अक्षांश के बीच होता है। लेकिन इन्हीं अक्षांशों के बीच द० अटलांटिक महासागर में चक्रवात उत्पन्न नहीं होता है क्योंकि इस क्षेत्र में चक्रवात उत्पन्न करने हेतु स्थलीय भूभाग का अभाव है।

          8º से 20° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्धों में तापीय विषुवत रेखा के सहारे दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा आपस में मिलती है। जब दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा का तापमान एक समान होता है तो वैसी परिस्थिति में आपस में केवल मिलने की प्रवृति रखते हैं अर्थात् चक्रवात की आँख का विकास नहीं होता है।

         8º से 20° अक्षांश के बीच जल एवं स्थल का वितरण काफी अनियमित है। वाणिज्यिक हवाएँ जब स्थलीय भाग से गुजरती हैं तो उसे स्थलीय वायु राशि और समुद्र के ऊपर से गुजरने वाली हवा को समुद्री वायुराशि कहते हैं। जिन स्थानों पर स्थलीय वायुराशि और समुद्री वायुराशि मिलती है वहाँ पर बला आघूर्ण के कारण हवाएँ घुमने लगती हैं और चक्रवात को जन्म देती हैं।

     समुद्री वायुराशि काफी गर्म एवं आर्द्रता से युक्त होती है। जिससे स्वत: समुद्री सतह पर निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास होता है। जबकि इसके तुलना में स्थलीय भाग पर उच्च वायुदाब केन्द्र का विकास होता है।

    तटीय भागों में स्थलीय एवं समुद्री वायुराशि प्राय: मिलने की प्रवृत्ति रखते हैं। प्रारंभ में वाताग्र की स्थिति उत्पन्न करते हैं। लेकिन बला आघुर्ण के कारण वाताग्र ही चक्रवात के आँख के रूप में तब्दील कर जाता है। फलत: उच्च वायुदाब क्षेत्र से आने वाली हवाएँ आँख को समाप्त करने के लिए दौड़ पड़ती है। लेकिन आँख के केंद्र में पहुँचने के पहले ही हवाएं पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आ जाती है और ऊपर की ओर प्रक्षेपित कर दिए जाते है।

     उष्ण एवं आर्द्र हवाएँ उपर जाकर संघनित होती है। जिससे वर्षण का कार्य प्रारंभ हो जाता है। सम्पूर्ण उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति को नीचे के मानचित्र से समझा जा सकता है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की संरचना

      उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की संरचना चक्रीय होती है। जववायु विज्ञानवेताओं ने इसकी संरचना का अध्ययन क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से करते हैं।

(A) क्षैतिज अध्ययन/ संरचना

      क्षैतिज रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कई वलय में विभक्त होता है। सामान्य रूप से एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में कुल 6 रिंग होते हैं। जैसे-

प्रथम रिंग (वलय)⇒

    यह चक्रवात का केन्द्र बिन्दु होता है। इसे चक्रवात की आँख कहते हैं। इसका व्यास 5 से 50 Km तक हो सकता है। आकार में यह लगभग वृत के समान होता है। वायुदाब अति न्यून होता है। वायु गर्म होकर ऊपर जाने की प्रवृत्ति रखती है। ठीक इसके ऊपर बादल का निर्माण नहीं होता है क्योंकि उष्ण एवं आर्द्र वायु जब गर्म होकर ऊपर उठती है तो केन्द्र के मध्य भाग में ठंडी एवं शुष्क व नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती है।

द्वितीय रिंग⇒

      यह चक्रवात के चारों ओर स्थित होता है। इसे आँख की दीवाल (Eye Wal) कहते हैं। इसकी चौड़ाई 10 से 20 Km तक होता है। इस रिंग में हवा तेजी से ऊपर की ओर उठती है और आकाश में Cumulo nimbus cloud का निर्माण करती है और इस द्वितीय रिंग में भारी वर्षा होती है।

तृतीय रिंग⇒

    इसे स्पाइरल बैण्ड या वर्षा बैण्ड कहा जाता है। द्वतीय रिंग में गरज के साथ भारी वर्षा होती है।

चौथा रिंग⇒

     इसे Annular Band कहते हैं। चौथा रिंग में सघन बादल छाये रहते हैं। लेकिन वर्षा बहुत कम होती है। इस रिंग में तापमान उच्च और आर्द्रता निम्न होती है।

पांचवां रिंग⇒

     इसे Outer Convective Band कहते हैं। इसमें बादल बहुत कम पाये जाते है। वर्षा नगण्य होती है।

छठा रिंग⇒

     यह उष्ण चक्रवात का सबसे बाहरी हिस्सा है। इस रिंग में ह‌वाएँ क्षैतिज रूप से केन्द्र की ओर चलती है। लेकिन इसमें अन्य मौसमी परिस्थितियाँ सामान्य रहती है। छठा रिंग को Outer Band कहते हैं।

1. चक्रवात का आंख (Eye of Cyclone) – अति न्यून वायुदाब

2. चक्रवात का दीवाल (Eye Wall)- क्यूम्लो निम्बस बादल का निर्माण तथा भारी वर्षा

3. वर्षा बैण्ड (Rain Band)- गरज के साथ भारी वर्षा

4. एनुलर बैण्ड (Annular Band)- सघन बादल

5. Outer Convective Band- बहुत कम बादल, नगण्य वर्षा

6. Outer Band- उष्ण चक्रवात का बाहरी हिस्सा

(B) लम्बवत संरचना

    मौसम वैज्ञानिकों ने लम्बवत रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को तीन परत में विभक्त करते हैं-

I. In-flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे निचली परत है। इसकी मोटाई घरातल से 3Km ऊँचाई तक होता है। इसमें हवाएँ क्षैतिज रूप से चक्रवात के आँख की ओर अग्रसारित होती है।

II. Middle layer⇒

     यह चक्रवात का सबसे प्रमुख हिस्सा है। इसकी मोटाई 3 से 7 Km तक होती है। इसमें हवाएँ ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है। साथ ही चक्रीय रूप से घुमते हुए चक्रवात के केन्द्र तक पहुँचने का प्रयास करती है।

III. Out flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे ऊपरी परत है। इसका विस्तार 7 km से ऊपर होता है। इस Layer के मध्य में उच्च वायुदाब केन्द्र होता है तथा हवाएं बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। दूसरे शब्दों में इस Layer में प्रतिचक्रवात की स्थिति होती है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

2. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

        मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले चक्रवात को शीतोष्ण चक्रवात कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति का मुख्य आधार उपध्रुवीय निम्न वायु भार का क्षेत्र होता है क्योंकि इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर ध्रुवीय वायु और पछुवा वायु चलने की प्रवृति रखती है। ध्रुवों की ओर से आने वाली वायु प्राय: ठण्डी, भारी, और शुष्क होती है। जबकि पछुआ हवा गर्म, हल्की और आर्द्रता से युक्त होती है। विपरीत दिशाओं से आने वाली तथा अलग-2 भौतिक विशेषता रखने वाली वायु जब आपस में मिलने का प्रयास करती है तो मिश्रण शीघ्र संभव नहीं हो पाता है। इन दो वायु के अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण की स्थिति उत्पन्न करते हैं। संक्रमण का यह क्षेत्र ही वाताग्र (Front) कहलाता है।

    दूसरे शब्दों में ध्रुवीय हवा और पछुआ हवा के अग्र भाग आपस में मिलकर जिस संक्रमण पेटी का निर्माण करते हैं, उस पेटी को वाताग्र कहते है। इसकी चौड़ाई सामान्यतः 5-7 Km तक होती है। कभी-2 इसकी चौड़ाई 2-75 Km तक होती है। धरातल से इसकी ऊँचाई 1½- 2 Km तक होती है और लम्बाई 750 Km तक हो सकती हैं। वाताग्र धरातल के साथ एक निश्चित कोण पर झुका होता है।

ध्रुवीय हवा (ठंडी, शुष्क, भारी)

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

पछुआ हवा (गर्म, आर्द्र, हल्की)

वाताग्र (ल०- 750 किमी०, ऊँ०-1.5 किमी०, चौ०-5-7 किमी०)

           शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति प्रारंभ होना Fronto-genesis (वाताग्र जनन की अवस्था) कहलाता है। जबकि चक्रवात का अन्त/ विनाश Frontolisis (वाताग्र समापन की अवस्था) कहलाता है।

        वाताग्र निर्माण के बाद या संक्रमण स्थिति बनने के बाद वायु में चक्रीय प्रवाह की प्रक्रिया प्रारंभ होती हैं। इसका मुख्य कारण ठण्डी वायु का गर्म वायु राशि क्षेत्र में प्रवेश करना है। जब ठण्डी वायुराशि, गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो ग्रहीय नियमों के अनुरूप प्रवाहित नहीं हो पाती हैं क्योंकि प्रवाहित वायु का लक्ष्य कोई अक्षांशीय निम्न बायुदाब की पेटी न होकर आस-पास की गर्म वायु का केन्द्र होता है।

     अत: प्रविष्ट करने वाली वायु गर्म वायु की दिशा में प्रवाहित होने लगती है और ठण्डी वायु अपना ग्रहीय प्रवाह को छोड़ देती है। प्रवाह का यह विचलन अंततः चक्रीय रूप धारण कर लेती है। इसे चित्र के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

      कई मौसम वैज्ञानिकों ने शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति का अध्ययन किया है। इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य स्वीडीश मौसम वैज्ञानिक जैकोट्स और जर्केंस का है। इन्होंने चक्रवात उत्पत्ति के संबंध में ध्रुवीय वाताग्र सिद्धांत प्रस्तुत किया है। इस सिद्धांत के अनुसार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 6 अवस्थाओं में होती है:-

प्रथम अवस्था – प्रारंभिक अवस्था/ वाताग्र जनन की अवस्था

द्वितीय अवस्था – चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभ की अवस्था

तृतीय अवस्था – उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

चतुर्थ अवस्था – शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

पाँचवा अवस्था – संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

छठा अवस्था – समापन की अवस्था

(1) प्रारंभिक अवस्था (Fronto genesis)/ वाताग्र जनन की अवस्था

       प्रारंभिक अवस्था में ध्रुवीय और पछुआ वायु का अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण पेटी या स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है जिसकी चौड़ाई 5-7 किमी०, ऊँचाई 1.5-2 किमी० और लम्बाई 750 किमी० या उससे अधिक होती है।

        स्थिर वाताग्र के निर्माण के लिए अति अनुकूल क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्य अक्षांशीय क्षेत्र है। सामान्यत: वाताग्र का निर्माण उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र के सहारे होता है। लेकिन, स्थल और समुद्र के असमान वितरण के कारण वाताग्र सीधा न होकर लहरदार होता है या थोड़ा सा मुड़ा होता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्री सतह के अधिकता के कारण लहरदार स्थिर वाताग्र का निर्माण नहीं होता।

(2) चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभिक अवस्था

       इस अवस्था में ग्रहीय वायु (ध्रुवीय वायु) अपने मार्ग से विचलित होती है जिसके परिणामस्वरूप स्थिर वाताग्र का कुछ भाग दक्षिण की ओर अग्रसारित हो जाती है। जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र ठण्डी / ध्रुवीय वायु के कारण जुड़ जाती है। उस भाग को शीत वाताग्र और शेष भाग को उष्ण वाताग्र कहते हैं। गर्म वाताग्र के सहारे मंद ढाल बनाते हुए गर्म वायु स्वतः ठंडी वायु के ऊपर उठने की प्रवृति रखती है। जबकि शीत वाताग्र में तीव्र ढाल के सहारे शीत वायु चक्रीय प्रवाह की प्रवृति खती है।

चित्र: शीत और उष्ण वाताग्र के निर्माण की अवस्था या चक्रीय परिसंचरण की अवस्था

(3) उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था
        इस अवस्था में ठण्डी वायु और भी अधिक निम्न अक्षांश की ओर खिसकते हुए चक्रीय प्रवाह लेने की प्रवृति रखती है जिसके कारण शीत वायु गर्म वायु के वृहत क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित कर लेती है। इतना ही नहीं शीत वाताग्र के अग्रसारित हो जाने से पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत क्षेत्र से खत्म हो जाता है जिसके कारण गर्म वायु एक खण्ड के रूप से बचा रह जाता है जिसे उष्ण खण्ड के नाम से जानते हैं।

चित्र: उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

(4) शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

       इस अवस्था में शीत वाताग्र और आगे बढ़ता है। इस अवस्था में शीत वाताग्र के लगातार आगे बढ़ने के कारण पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत्र क्षेत्र से पूर्णतः कट जाता है। इतना ही नहीं बल्कि गर्म हवा एक संकरे प्रदेश में सिकुड़‌कर रह जाता है तथा शीत वाताग्र को पछुआ हवा और ठण्डी ध्रुवीय हवा दोनों मिलकर दबाव लगाना प्रारंभ कर देती है जिसके कारण शीत वाताग्र तेजी से अग्रसारित होने लगता है।

     दूसरी ओर जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र मुड़ा था उस स्थान पर शीत सीमाग्र और गर्म सीमाग्र के मिलने से आवर्त की स्थिति उत्पन्न होती है। इस अपर्त के चारों ओर गर्म एवं ठण्डी वायु का मिश्रित चक्रीय प्रवाह देखने को मिलता है।

चित्र: शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी की अवस्था

(5) संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

            इस अवस्था में शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र आपस में मिलने की प्रवृति रखती है। लेकिन मिलने की प्रक्रिया वाताग्र के केन्द्र से शुरू होती है। गर्म वाताग्र और शीत वाताग्र मिलकर संरोध वाताग्र (Occluded front) का निर्माण करती है। संरोध वाताग्र एक ऐसा वाताग्र है जिसमें उष्ण एवं शीत दोनों प्रकार की वायु पायी जाती हैं। संरोध वाताग्र दो प्रकार का होता है:-

(i) शीत संरोध वाताग्र

(ii) गर्म संरोध वाताग्र

        शीत संरोध वाताग्र वह स्थिति है जिसमें गर्म वाताग्र समाप्त हो जाता है और शीत वाताग्र गर्म वाताग्र के आगे अवस्थित ठण्डी वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाती है।

चित्र: संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

उष्ण संरोध वाताग्र वह हैं जहाँ पर वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र वाताग्र के केन्द्र प्रभाव में एक छोटे से केन्द्र में रह जाता है।

(6) समापन की अवस्था (Frontolisis)

         समापन की अवस्था को Frontolisis की अवस्था भी कहते हैं। इस अवस्था में उष्ण वाताग्र एवं शीत वाताग्र आपस में पूर्णतः मिल जाते हैं। ध्रुवीय वायु और पछुवा हवा पृथ्वी की घुर्णन गति के प्रभाव में आकर ग्रहीय मार्ग अपना लेती है और चक्रवात की समाप्ति हो जाती है।

 

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की मौसमी दशाएँ एवं वाताग्र के प्रकार

       शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में विभिन्न प्रकार के मौसमी दशाओं का विवेचना निर्मित होने वाले चारों वाताग्र के आधार पर करते हैं। प्रत्येक वाताग्र की अलग-2 विशेषताएँ होती हैं। मौसमी विशेषताओं के आधार पर ही वाताग्र को चार भागों में बाँटते हैं।

(1) स्थिर वाताग्र (Stationary Front)

(2) उष्ण वाताग्र (Warm Front)

(3) शीत वाताग्र (Cold Front)

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

(1) स्थिर वाताग्र

      शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होने के पहले आसमान साफ होता है। ध्रुवीय और पछुआ वायु अपने-2 प्रचलित मार्ग से चलने की प्रवृति रखते हैं। ज्यों ही पछुआ वायु और ध्रुवीय वायु एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं से आकर मिलती है तो स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है। स्थिर वाताग्र में वायु स्थिर रहती है। वर्षा नहीं होती है। लेकिन आसमान धुंधला होने लगता है।

(2) उष्ण वाताग्र

        उष्ण वाताग्र की स्थिति में भी वायु स्थिर बनी रहती है क्योंकि गर्म पछुवा वायु ठण्डी ध्रुवीय वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट करने का प्रयास करती है। लेकिन गर्म वायु प्रविष्ट नहीं कर पाती है। फलत: गर्म वायु मंद ढाल के सहारे ठण्डी वायु के ऊपर धीरे-2 चढ़ने की प्रवृ‌त्ति रखती है जिससे बहुस्तरीय बादलों का निर्माण होता है। जैसे:- उपर से नीचे आने पर क्रमशः Cirrus, Cirro stratus, Alto stratus और Cumulus नामक बादल का निर्माण करती है। इस प्रकार के बादलों से धीरे-धीरे लम्बी अवधि तक वर्षण का कार्य होती है। वर्षा का प्रभाव क्षेत्र भी विस्तृत होता है।

(3) शीत वाताग्र (Cold front)

         शीत वाताग्र की स्थिति में ठण्डी वायुराशि गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण वाताग्र तीव्र ढाल का निर्माण करती है। तीव्र ढाल के सहारे गर्म वायु राशि उपर उठकर संतृप्त हो जाती है और ऊपर से नीचे क्रमशः तीन प्रकार के बादलों का निर्माण करती है। जैसे-

(i) स्तरी बादल (Cirro Stratus)

(ii) कपासी वर्षी बादल (Cumulo Nimbus)

(iii) वर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus)

         शीत वाताग्र वाले क्षेत्र में अति अल्प समय में भारी वर्षा रिकॉर्ड किया जाता है। शीत वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र काफी छोटे क्षेत्रों में होता है। जबकि उस स्थान से शीत वाताग्र गुजर जाता है तो अचानक वर्षा रुक जाती है। शीतलहरी चलने लगती है। तापमान में भारी गिरावट आती है। वायुदाब बढ़ जाती है औ मौसम कष्टकर हो जाता है।

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

      संरोध वाताग्र में कई प्रकार के बादलों का निर्माण होता है। लेकिन इसमें वर्षा तीव्र होती है। संरोध के कारण शीतोष्ण चक्रवात में अंतिम रूप से वर्षा होती है। जब उष्ण वाताग्र और शीत वाताग्र पूर्णतः आपस में मिलते हैं तो उष्ण खण्ड भी समाप्त हो जाता है। ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु पुन: ग्रहीय मार्ग को अपना लेते हैं। आकाश साफ हो जाता है।

      ध्रुवीय वायु औ पछुआ वायु अपने-2 क्षेत्र में रहकर उप-ध्रुवीय भागों में कोरियालिस प्रभाव के कारण ऊपर उठने लगती है। जिससे मौसम पूर्णतः सामान्य हो जाता है। पुनः जब ध्रुवीय वायु पछुवा वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट होने का प्रयास कती है तो पुन: नई चक्रवात का निर्माण प्रारंभ होता है।

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