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13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य



प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

        दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार हुआ है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी. है। इसका आकार एक त्रिभुज के समान है। यह 1600 किमी० हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750 मी० मानी गयी है।

          प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल, गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करती हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे “पठारों का पठार” भी कहा जाता है। प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेन्जिया के समकालीन चट्टानें पायी जाती हैं।

        प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच और भूदृश्य का अध्ययन नीचे के दो शीर्षकों में किया जा रहा है। 

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

(2) प्रायद्वीपीय भारत के पठार

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

         प्रायद्वीपीय भारत में छोटी-बड़ी कई पर्वतीय श्रंखलाएँ मिलती है। जैसे-

(i) पश्चिमी घाट-

       यह प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी किनारे पर अवस्थित है। यह अरब सागर के समानान्तर लेकिन तट से दूर स्थित है। लेकिन कर्नाटक में यह श्रृंखला समुद्र के नजदीक आ जाती है। इसका विस्तार उत्तर में ताप्ती नदी के मुहाना से दक्षिण में कन्याकुमारी तक हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 1600 किमी० है। इसकी औसत ऊँचाई 915 मी० है। पश्चिमी घाट को कई छोटे-2 भागों में विभक्त कर उसके भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

       ताप्ती नदी से लेकर 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट को सह्याद्री पर्वत कहते है जिसकी सबसे ऊँची चोटी कालसुबाई (1646 मी०) है। 

    16º उतरी अक्षांश के दक्षिण वाले भाग की सबसे ऊँची चोटी कुद्रेमुख (1892 मी०) है। पश्चिमी घाट के तीसरी शाखा का प्रारंभ नीलगिरि से होता है क्योंकि यहाँ पश्चिमी एवं पूर्वी घाट आपस में आकर मिल जाती है।

     ताप्ती से 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट पर्वत के ऊपर बैसाल्ट चट्टान या लावा उदगार का प्रमाण मिलता है। इसमें थालघाट और भोरघाट दो प्रसिद्ध दर्रे है। गोदावरी और कृष्णा नदी का क्षेत्र में उद्‌गम स्थल पाया जाता है। इस क्षेत्र में स्थित पहाड़ का एक भाग धँसकर भ्रंशोत्थ/ब्लाँक पर्वत का निर्माण करता हैं।

      16º उत्तरी अक्षांश से नीलगिरि पहाड़ी तक अवस्थित पश्चिमी घाट की ऊँचाई बहुत अधिक है। लेकिन इसका पश्चिमी ढाल अधिक तीव्र है जबकि पूर्वी ढाल मंद है।

       पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट के मिलने से एक गाँठ का निर्माण होता है जिसे नीलगिरी कहते हैं। नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी दोदाबेटा (2636 मी०) है। इसी पहाड़ी पर ऊपर बहुत ही प्रसिद्ध पर्यटक स्थल ऊँटी (उटकमण्डलम्) है।

       नीलगिरि के दक्षिण में क्रमश: अन्नामल्लई, कार्डमम, नागर कोयल और स्वामी विवेकानन्द रॉक अवस्थित है। इसे सम्मिलित रूप से दक्षिण की पहाड़ी के रूप में सम्बोधित करते हैं। अन्नामलाई की सबसे ऊँची चोटी अन्नाईमुडी (2695 मी०) है। अन्नामलाई के उत्तर-पूर्व में पालिनी पर्वत श्रृंखला है जिस पर कोडाईकनाल नामक पर्वतीय नगर अवस्थित है।

         नीलगिरि और अन्नामलाई के बीच में पाल नायक दर्रा स्थित है जो किसी प्राचीन नदी के अपरदन द्वारा निर्मित है। इसी तरह अन्नामलई और कार्डमम पहाड़ी के बीच में शेनकोटा दर्रा अवस्थित है। शेनकोट दर्रा के दक्षिण में पहाड़ियों की ऊँचाई बहुत कम हो जाती है और अन्ततः हिन्द महासागर में प्रक्षेपित हो जाती है। इसका अन्तिम बिन्दु स्वामी विवेकानन्द रॉक कहलाता है।

(ii) पूर्वीघाट

        पूर्वी घाट प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी तट के समानान्तर उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर फैला है। यह तट से 200-400 किमी० अन्दर अवस्थित है। इस पर्वत का निर्माण कुडप्पा संरचना से हुआ है। इसमें डोलोमाइट, खोंडोलाइट, चर्कोनाइट जैसे खनिजों से निर्मित चट्टान पाए जाते हैं।

       यह एक विखण्डित श्रृंखला है क्योंकि इसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा जैसी नदियों ने जगह-2 पर काट डाला है। पूर्वी घाट की औसत ऊँचाई 900 मी० मानी जाती है। पूर्वी घाट को मूलतः तीन भागों में बाँटकर भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(a) धुर उत्तरी भाग-

      यह महानदी के उत्तर में अवस्थित है। उड़ीसा के मयूरभंज में इसका विस्तार सर्वाधिक हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इस भाग में कई पर्वतीय चोटी मिलती है। जैसे- मलयगिरि (1187 मी०), मेघासनी (1165 मी०), गन्धमार्तन (1160 मी०) इत्यादि। उड़ीसा में अवस्थित सम्मिलित पर्वतीय श्रृंखला को ‘मलयास्क’ के नाम से जानते हैं।

      उड़ीसा और आन्ध्रप्रदेश में पूर्वी समुद्रतट के समानांतर पूर्वी घाट उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इन क्षेत्र में पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी महेन्द्रगिरि (1501 मी०) अवस्थित है। गोदावरी नदी पूर्वी घाट को काटकर गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है।

(b) मध्यवर्ती श्रृंखला- 

       कृष्णा नदी से लेकर पेलार नदी के बीच स्थित पूर्वीघाट श्रृंखला को मध्यवर्ती श्रृंखला कहते हैं। इनमें नालामाला, पालकोंडा, वेलीकोंडा श्रृंखला प्रमुख हैं। पालकोंडा और वेलीकोंडा पहाड़ी के मध्य भाग से पनेरू नदी प्रवाहित होती है।

(c) तमिलनाडु श्रृंखला-

        पूर्वीघाट को तमिलनाडु में जावदी, गिंजी, शिवराय पहाड़ी के नाम से जानते हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ एक-दूसरे से पृथक-2 हैं।

      पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट बीच-2 में आपस में जुड़े हुए हैं। जैसे- मुम्बई और हैदराबाद के बीच हरिचन्द्र पर्वत और बालाघाट पर्वत स्थित है और बंगलोर के पास बाबाबुदन तथा श्रीसैलम पहाड़ी से जुड़ी हैं।

अरावली पर्वत

       अरावली पर्वत राजस्थान में द०-प० से उ०-पू० दिशा में अवस्थित है। इसका विस्तार गुजरात के सीमा से लेकर दिल्ली तक हुआ है। दिल्ली में अरावली पर्वत को ‘दिल्ली कटक’ के नाम से जानते हैं। हिमालय और अरावली पर्वत के बीच में एक गैप है जिसे अम्बाला गैप कहते हैं। अरावली न सिर्फ भारत की बल्कि विश्व की सबसे पुरानी पर्वत है। यह कभी विश्व का सबसे लम्बा वलित पर्वत हुआ करता था लेकिन अब अवशिष्ट पहाड़ी के रूप में बदल चुका है। इसकी सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर (1722 मी०) है जो राजस्थान के सिरोही जिला में माउण्ट आबू के पास स्थित है।

         अरावली की लम्बाई 800 किमी० और औरत ऊँचाई 700-900 मी० मानी जाती है। अरावली में कई दर्रे भी मिलते हैं जिसमें पिपलीघाट, देवारी, बेसूर दर्रा सबसे प्रमुख हैं। इसके गर्भ में कई खनिज पाये जाते हैं। इसलिए इसे राजस्थान के ‘खनिजों का अजायबघर’ कहा जाता है। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के कारण कई स्थानों पर यह विखण्डित हो चुकी है। लेकिन दक्षिण-पश्चिम अरावली पर्वतीय भाग की ऊँचाई आज भी पर्याप्त है।

सतपुड़ा पर्वत

      सतपुड़ा एक ब्लॉक पर्वत है जो नर्मदा और ताप्ती भ्रंश घाटी के बीच अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 900-1100 मी० है। सतपुड़ा श्रृंखला के पूरब में महादेव, मैकाल, रामगढ़ और गढ़‌जात की पहाड़ी अवस्थित है। सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी धूपगढ़ (1350 मी०) है। जबकि मैकाल की सबसे ऊँची चोटी अमरकंटक (1127 मी०) है। मैकाल पर ही पंचमढ़ी नामक पर्वतीय पर्यटक नगर अवस्थित है। सतपुड़ा पर्वत के समान्तर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिला में अजन्ता की पहाड़ी और नागपुर में गाविलगढ़ की पहाड़ी स्थित है।

विन्ध्यन पर्वत

        विन्ध्यन पर्वत प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी सीमा का निर्माण करती है। यह नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-700 मी० है। इस पर्वत का उत्तरी ढाल भ्रंशन  क्रिया से बना है जिसके कारण उत्तरी भाग का ढाल तीव्र है जबकि दक्षिणी भाग का ढाल मंद है। इसका विस्तार गुजरात की सीमा से लेकर बिहार के गंगा नदी तक हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर इसे क्रमश: विन्ध्यन पर्वत, भारनेर पर्वत, कैमूर की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी और खड़‌गपुर की पहाड़ी के नाम जानते हैं।

राजमहल की पहाड़ी

      राजमहल की पहाड़ी बिहार और झारखण्ड की सीमा पर भागलपुर के पास अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-7oo मी० है। यह उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला हुआ है। राजमहल पहाड़ी के कारण गंगा नदी को भागलपुर के पास उत्तरायण होना पड़ता है। राजमहल की पहाड़ी पर जूरासिक काल में हुए लावा का प्रमाण मिलता है।

गारो, खांसी और जयंतिया की पहाड़ी

      ये मेघालय राज्य में पश्चिम से पूरब की ओर क्रमशः फैला हुआ है। गारो एक अलग पहाड़ी के रूप में अवस्थित है जबकि खाँसी और जयन्तिया आपस में जुड़े हुए हैं। जयन्तिया पहाड़ी से एक भाग पृथक होकर काफी पूरब की ओर चला गया है जिसे मिकिर की पहाड़ी कहते हैं जो असम में अवस्थित है। गारो, खाँसी जयन्तियाँ की सबसे ऊँची चोटी नॉरकेक है जो गारो पहाड़ी पर स्थित है। लेकिन औसत ऊँचाई के दृष्टिकोण से जयन्तिया की पहाड़ी सबसे ऊँची है। जबकि गारो पहाड़ी सबसे नीची है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भात के उच्चावच या भूदृश्य की विशेषता का चर्चा करें।

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र



गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र  

          गंगा तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय से निकलने वाली उत्तर भारत की सबसे प्रमुख नदी हैं। ये नदियाँ लम्बी है तथा अनेक छोटी एवं बड़ी महत्त्वपूर्ण नदियाँ इनमें आकर मिलती हैं। इनके सम्मिलित रूप को गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र कहते हैं। इनकी चर्चा हम दो अलग-2 नदी तंत्र में कर रहे हैं।

(1) गंगा नदी तंत्र

    गंगा भारत के सबसे बड़े भाग की नदी तंत्र है। इसका विस्तार लगभग 18 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र पर है जिसका 8.6 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र भारतीय सीमा के अन्तर्गत है। यह हिमालय के पर्वतीय भाग से लेकर मैदान तथा दक्षिण के पठारी भाग तक विस्तृत है। गंगा नदी तंत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हैं। इसका विकास हिमालय के उत्थान के बाद हुआ लेकिन इसको विकसित करने में पूर्ववर्ती का भी योगदान रहा है। इस नदी तंत्र में गंगा मुख्य नदी है।

     गंगा नदी महान हिमालय में गंगोत्री के पास गोमुख हिमानी से निकलती है। इसकी आरंभिक धारा को ‘भागीरथी’ कहा जाता है। उत्तराखण्ड के देवप्रयाग में भागीरथी में अलकनन्दा धारा आकर मिलती है। दोनों की सम्मिलित धारा को ‘गंगा’ कहते हैं। हरिद्वार तक गंगा पर्वतीय भाग से गुजरती है। इसके बाद यह मैदान में प्रवेश करती है। इलाहाबाद के निकट गंगा में यमुना नदी मिलती है। यमुना नदी महान हिमालय में यमुनोत्री हिमनद से निकलती है। यमुना की सहायक नदी चम्बल, कालीसिन्ध, बेतवा, केन आदि प्रमुख हैं। बिहार के चौसा (बक्सर) नामक स्थान पर गंगा बिहार में प्रवेश करती है और कटिहार तथा भागलपुर जिले के बाद झारखण्ड होते हुए गंगा नदी पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।

      गंगा के दाहिने किनारे पर यमुना, टोंस, सोन, पुनपुन, किऊल इत्यादि नदियाँ आकर मिलती हैं। इसमें यमुना को छोड़कर में सभी नदियाँ प्रायद्वीपीय उच्चभूमि से निकलती हैं। गंगा के बाएँ किनारे पर हिमालय से निकलने वाली अनेक नदियाँ जैसे- रामगंगा, गोमती, घाघरा, गण्डक, बुढी गण्डक, कोसी, महानन्दा इत्यादि आकर मिलती हैं।

     दाहिने एवं बाएँ किनारे की सहायक नदियों के जल से परिपूर्ण होकर गंगा पूरब दिशा में पश्चिम बंगाल के फरक्का तक बहती है। फरक्का गंगा डेल्टा का सबसे उत्तरी भाग है। यहाँ गंगा नदी दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा हुगली के नाम से दक्षिण की तरफ बहती है तथा डेल्टा के मैदान से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

      गंगा की मुख्य धारा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती हैं। यहाँ गंगा नदी को “पदमा” कहा जाता है तथा ब्रह्मपुत्र नदी इससे आकर मिलती है। गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की सम्मिलित धारा को “मेघना” कहा जाता है। अन्ततः यह बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। इन नदियों के द्वारा बनाए गए डेल्टा को “सुन्दरवन का डेल्टा” कहते हैं।

(2) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

       इस नदी तंत्र की ब्रह्मपुत्र सबसे प्रमुख नदी है। बह्मपुत्र नदी तिब्बत में मानसरोवर झील के पूर्व 80 किमी० की दूरी पर स्थित हिमानी से निकलती है। इसकी लम्बाई 2900 किमी० है। यह नदी तिब्बत में सांग्पो ने नाम से हिमालय के समानान्तर पूरब की ओर बहती है। पूरब में नामचा बरबा पर्वत को काटकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में बह्मपुत्र नदी को ‘दिहांग’ कहा जाता है। इसके बाद असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। असम के डुबरी जिले के बाद ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में जमुना के नाम से प्रवेश कती है। यहाँ गंगा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

       ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में दिवांग, लुहित, स्वर्णसिरी, धनसीरी, भाद्री, बण्डी, बुढ़ी दिहंग, मानस, सकोंश, तिस्ता, दिसांग, दिखो, कुलसी, कपिली, कोपिती इत्यादि हैं।

     प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु में यह नदी अपने किनारों से ऊप बहने लगती है एवं बाढ़ के द्वारा असम तथा बांग्लादेश में अधिक क्षति पहुँचती है।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

गंगा ब्रह्मपुत्र नदी

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय) / Drainage System

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय)

(Drainage System)



अपवाह तंत्र

           भारत एक विशाल देश है। हिमालय पर्वत, अरावली पर्वत, विन्ध्याचल पर्वत, सतपुड़ा पर्वत और पश्चिमी घाट मिलकर महान जलविभाजक रेखा का निर्माण करती है। उद्गम क्षेत्र के आधार पर भारतीय नदियों को दो प्रमुख वर्ग में बाँटा जाता है।:-

(1) हिमालय से निकालने वाली नदियाँ
(2) प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियाँ

       उपरोक्त दोनों स्रोतों से निकलने वाली नदियों की अलग-2 विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन नीचे किया जा रहा है:-

(i) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ सदावाहिनी/सदानीरा होती हैं और पठारीय नदियाँ सदावाहिनी नहीं होती है। क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियों का स्रोत ग्लेशियर/ हिमानी होता है। जबकि पठारी क्षेत्र की नदियों का स्रोत क्षेत्र हिमानी नहीं हैं। फिर पठारी भारत के सभी बड़ी नदियों में सालोंभर जल का प्रवाह होता है जिसका प्रमुख कारण उनके उद्गम क्षेत्र में झील या जलप्रपात का मिलना है।

(ii) हिमालय स्रोत की नदियाँ लम्बी होती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटी होती है। इसका प्रमुख कारण हिमालय की महाद्वीपीय स्थिति और दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय का होना है। हिमालय एक महाद्वीपीय पर्वत होने के कारण निकलने वाली नदियों के उद्‌गम एवं मुहाना क्षेत्र काफी पूर्व हो जाता है। इसलिए हिमालय क्षेत्र की नदियाँ लम्बी होती है। पुन: हिमालय क्षेत्र में कई ऐसे पूर्ववर्ती नदी मिलते हैं जो हिमालय के उत्थान से पूर्व से ही प्रवाहित होते आ रहे हैं। जैसे- ब्रह्मपुत्र की लम्बाई 2960 किमी०, सिन्धु की लम्बाई 2880 किमी०, गंगा नदी की लम्बाई 2525 किमी० तक पायी जाती है।

       इसके विपरीत पठारीय भारत के अधिकांश नदियों का उद्गम क्षेत्र प० घाट के पूर्वी ढाल और पश्चिमी ढाल पर पायी जाती है। पश्चिमी ढाल से निकलने वाली नदियाँ तुरंत (समुद्र) में जाकर मिल जाती है। पश्चिमी घाट के पश्चिम में बहने वाली सबसे लम्बी नदी पेरियार (80 किमी०) है। पुनः पश्चिमी घाट पूर्वी ढाल से निकलने वाली नदियों में गोदावरी, कृष्णा और कावेरी प्रमुख हैं। गोदावरी प्रायद्वीपीय पठार की सबसे लम्बी नदी है जिसकी लम्बाई 1465 किमी० है।”

अपवाह तंत्र

(iii) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ वृहद् नदी बेसिन का निर्माण करती है जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटे बेसित का निर्माण करती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र नदियों का मार्ग लम्बा होता है तथा समतलीय मैदान से होकर गुजरती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ तीव्र ढाल से होकर गुजरने के कारण एवं प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण नदी बेसिन का आकार छोटा हो जाता है।

(iv) हिमालय प्रदेश के नदियों की अपरदनात्मक क्षमता तीव्र होती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियाँ युवा अवस्था से होकर गुजर रही है। इसके विपरीत द० भारत की नदियाँ वृद्धा अवस्था से होकर गुजर रही है जिसके कारण उनके अपरदनात्मक क्षमता में जबड़स्त कमी आयी है। हिमालय क्षेत्र की नदियाँ प्राय: V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। वहीं प्रायद्वीपीय भारत नदियाँ खुली हुई V-आकार के घाटी का निर्माण करती है।

(v) हिमालय प्रदेश की नदियाँ कई प्रकार के अपवाह विशेषताओं को विकसित करती है। जैसे- पर्वतीय क्षेत्रों में वृक्षाकार अपवाह प्रणाली, मैदानी क्षेत्र में समामान्तर और मोड़ लेती हुई अपवाही प्रणाली और मुहाना पर जालीनुमा अपवाह प्रणाली का विकास करती है। यद्यपि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ प्रायः वृक्षाकार अपवाह प्रणाली विकास करती है।

         पुनः प्रायद्वीपीय भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ अलग-2 प्रतिरूप का निर्माण करती है। जैसे अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ समानान्तर प्रतिरूप का निर्माण करती है क्योंकि तीव्र ढाल से प्रवाहित होने के कारण मलवा का निक्षेपण नहीं हो पाता है जबकि बंगाल की खाड़ी की ओर गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ लम्बी दूरी तय करती है और तुलनात्मक दृष्टिकोण से मंद ढाल से प्रवाहित होती है। इसलिए वृक्षाकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

(vi) हिमालय प्रदेश की नदियाँ मुहाना पर डेल्टा का निर्माण करती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की वे नदियाँ जो अरब सागर में गिरती है वे डेल्टा के स्थान पर एश्चुरी का निर्माण करती है। जबकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदी डेल्टा का निर्माण करती है।

(vii) हिमालय प्रदेश की नदियों में दो बार जलस्तर ऊपर उठता है। प्रथमत: वर्षा ऋतु में और द्वितीय ग्रीष्म ऋतु में हिम पिघलने के कारण होती। पठारीय भारत की अधिकांश नदियों में केवल एक बार जलस्तर ऊपर उठती है। लेकिन तमिलनाडु को नदियों में द०-प० मानसून और  उ०-पू० मानसून के कारण जल दो बार उठती है।

(viii) हिमालय क्षेत्र की नदी मार्ग में जलप्रपात और उच्छालिका या क्षिप्रिका केवल पर्वतीय क्षेत्रों में बनती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में इसका प्रमाण सम्पूर्ण मार्ग में देखने को मिलता है।

(ix) हिमालय स्रोत से निकलने वाली कोई भी नदी किसी भी पठारीय नदी की सहायक नदी नहीं है। जबकि पठारीय भाग से निकलने वाली नदियाँ हिमालय से निकलने वाली नदियों का सहायक नदी है। जैसे- सोन, दामोदर, किऊल, किर्मनाशा, पुनपुन, इत्यादि नदियाँ पठारीय नदी है। गंगा की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

(x) हिमालय स्रोत से निकलने वाली नदियाँ केवल दो मुहाना का निर्माण करती है। प्रथम सिन्धु नदी का मुहाना और द्वितीय गंगा-ब्रह्मपुत्र का मुहाना। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ अनेक मुहानों का निर्माण करती है। जैसे स्वर्णरेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, ताप्ती इत्यादि ये सभी के सभी स्वतंत्र मुहानों निर्माण करती है।

(xi) हिमालय प्रदेश की कोई भी ऐसी नदी नहीं है जो भ्रंश घाटी से प्रवाहित होती है जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नर्मदा, ताप्ती और दामोदर ऐसी नदी है जो भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है।

निष्कर्ष

      इस प्रका ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय तथा प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियों के बीच कई मौलिक अन्तर है। यह अन्तर धरातलीय विशेषताओं के कारण उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर भारत के जल प्रवाह तंत्र में प्रकृति-जन्य विभिन्नता बतलाइये।

2. प्रायद्वीपीय भारत की अपवाह संबंधी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

3. हिमालय क्षेत्र के अपवाह तंत्र के उत्पत्ति एवं प्रवाह तंत्र का वर्णन कीजिए।

4. हिमालय और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी

(Monsoon of Mechanism)



भारतीय मानसून की प्रक्रिया

      भारत में मानसून की उत्पत्ति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायु-संचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होती है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ द०-प० मानसून से लगभग 80% होती है जबकि 20% वर्षा उ०-पू० मानसून और पछुवा विक्षोभ से होती है।

         ग्रीष्म ऋतु के बाद दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के आगमन से वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। भारत में सबसे पहले द०-प० मानसून 29 मई को अण्डमान & निकोबार द्वीप समूह में 1 जून को केरल के तट पर पहुँचती है।

          केरल के तट पर पहुंचकर द०-प० मानसून पश्चिमी घाट पर्वत से टकराती है और संघनित होकर अचानक मूसलाधार वर्षा करती है जिसे “मानसून विस्फोट” कहा जाता है। 15 जून तक द.-प. मानसून मध्य भारत के आन्तरिक भागों में पहुँच जाती है जिससे 5° से 8°C तापमान में गिरावट दर्ज की जाती है। द०-प० मानसून की दो प्रमुख शाखा है।

(1) अरब सागर की मानसूनी पवन

(2) बंगाल की खाड़ी की मानसूनी पवन

          अरब सागर के मानसून की उत्पत्ति अरब सागर में होती है। जब यह भारत के तट पर पहुंचती है तो यह तीन शाखाओं में बंट जाती है।

(i) पहली शाखा पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदान में 250 cm वर्षा करती है। पश्चिमी घाट से टकराने के बाद‌ यह हवा पूर्वी ढाल के सहारे नीचे उतरती है। लेकिन पूर्वी ढाल के सहारे उतरने वाली इस हवा के कारण वर्षा बहुत कम होती है जिसके कारण पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में वृष्टिछाया प्रदेश का निर्माण होता है।

(ii) अरब सागरीय मानसून की दूसरी शाखा नर्मदा और ताप्ती नदी घाटी के सहारे भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण नर्मदा एवं ताप्ती नदी घाटी क्षेत्र पर्याप्त मात्रा वर्षा प्राप्त करते हैं।

(iii) तीसरी शाखा अरावली पर्वत के समानान्तर राजस्थान में प्रवेश करती है। रास्ते में कोई रुकावट नहीं मिलने के कारण यह राजस्थान के ऊपर से गुजर जाती है जिससे वहाँ वर्षा नहीं हो पाती है। यह शाखा राजस्थान से होते हुए कूल्लू और मनाली के पास जाकर यह हिमालय से टकराती है और वर्षा करती है।

(2) बंगाल की खाड़ी से चलने वाली मानसूनी हवा भी कई छोटे-छोटे शाखाओं में बंट जाती है। इनमें से दो शाखा प्रमुख है-

(i) पहली शाखा बंगलादेश से होते हुए उ०-पूर्वी भारत में प्रवेश करती है।

⇒ इसकी एक शाखा बराक और सूरमा नदी घाटी से गुजरती है जिससे मिजोरम, मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में पर्याप्त वर्षा होती है।

⇒ एक शाखा गारो, खासी, जयंतिया पर्वत से टकराकर विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मासिनराम ग्राम  का निर्माण करती है।

(ii) बंगाल की खाड़ी की दूसरी सबसे प्रमुख शाखा उड़ीसा और प. बंगाल के सहारे भारत में सीधे प्रविष्ट करती है। यह शाखा कोसी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जाकर असम से आने वाली मानसूनी हवा से मिलकर अत्याधिक वर्षण का कार्य करती है।

         धीरे-2 ये दोनों शाखाएँ सम्मिलित रूप से पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होने लगती है जिससे गंगा के उतरी मैदानी क्षेत्र पर्याप्त वर्षा प्राप्त करती है। यह शाखा कुल्लू के पास जाकर अरेबियन शाखा से मिलती है जिसके कारण यहाँ “बादल फटने की घटना” होती है।

          ग्रीष्म ऋतु में गया से प्रयागराज के बीच ITCZ या तीव्र निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाने के कारण बंगाल की खाड़ी की मानसूनी शाखा को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी अक्ष के सहारे धीरे-2 मानसूनी हवा दक्षिण गंगा के मैदान में पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होती है। ज्यों-2 पूरब से पश्चिम की ओर जाती है त्यों-2 आर्द्रता में कमी आने के कारण वर्षा की मात्रा में कमी देखी जाती है।

      पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के दौरान उष्णकटिबंधीय चक्रवात के आँख का विकास होता है जिसके चारों ओर तीव्र गति से हवाएँ चक्र के रूप में घुमकर पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षण कार्य करती है।

मानसून का लौटना

        15 अक्टूबर के बाद भारत से मानसून के लौटने की प्रक्रिया शुरू होती है। मानसून लौटने के दौरान वायु स्थल से समुद्र की ओर चलती है। इसे उत्तर-पूरब मानसून की संज्ञा देते हैं। इस शाखा की एक भाग बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

निकर्ष

       इस तह ऊपर के तथ्यों के स्पष्ट है कि भातीय मानसून की यांत्रिकी काफी जटिल है। इसे नीचे के मानचित्र से भी समझा जा सकता है।

भारतीय मानसून की प्रक्रि

चित्र: द०-प० मानसून की क्रियाविधि

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना



भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

          भारत एक मानसूनी प्रदेश है। यहाँ ही जलवायु मानसूनी है। मानसून एक मौसमी हवा है। ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ (Mausim) अथवा मलायन भाषा के मोनसिन (Monsin) शब्द से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है- मौसम के अनुसार हवाओं का उलट-फेर।

        ब्रिटिश भूगोलवेता हैली महोदय ने बताया कि मानसून एक ऐसी वायु प्रवाह है जो छ: महीने द०-प० से उ०-पू० की ओर (15 मई से 15 नवम्बर तक) तथा अगले छ: महीने (15 नवम्बर से 15 मई तक) उ०-पू० से द०-प० की ओर प्रवाहित होती है। इन्हें चित्रों से समझा जा सकता है:

भारतीय मानसून

मानसून का प्रकार

     भूगोलवेत्ताओं ने मानसून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर करते हुए इसे दो भागों में बाँटा है:- उष्ण कटिबंधीय मानसून और शीतोष्ण प्रदेश की मानसून।

        भारत में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की मानसून है। इसे भी दो भागों में बाँटा गया है :-

(i) द०-प० मानसून,

(ii) उ०-पू० मानसून

             द०-प० मानसून को ग्रीष्मकालीन मानसून तथा उ०-पू० मानसून को शीतकालीन मानसून कहा जाता है। द०-प० मानसून ही भारत की प्रमुख मानसून है। भारत की 80% वर्षा इसी द०-प० मानसून से होती है। यह मानसून अरब सागर से भारतीय उपमहाद्वीप पर जलवाष्प लाकर वर्षा करती है। जबकि उ०-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प लाकर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती है। द०-प० मानसून की तुलना समुद्री समीर से और उ०-पूर्वी मानसून की तुलना स्थलीय समीर से की जा सकती है।

भारतीय मानसून की विशेषताएँ

        भारतीय मानसून की कई विशेषताएँ हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) भारतीय मानसून अपने अनिश्चितताओं के लिए विश्व विख्यात है। अर्थात इनकी आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

(2) भारतीय मानसून भारत का वास्तविक बजट निर्माता है।

(3) मानसून मौसम विशेष की हवा है।

(4) मानसून के कारण भारत में मुख्यत: प्रकार की वर्षा होती है-

(i) पर्वतीय वर्षा

(ii) चक्रवातीय वर्षा।

(5) मानसूनी वर्षा का वितरण अत्यन्त अनियमित है।

(6) मानसूनी वर्षा की मात्रा काफी अनिश्चित है। 

(7) मानसून की विश्वसनीयता संदिग्ध है।

(8) मानसून की वर्षा निरंतर नहीं होती, बल्कि कुछ दिनों के अन्तराल पर रुक-रुक कर होती है।

(9) मानसूनी वर्षा मूल रूप से धरातलीय वर्षा है।

(10) मानसूनी वर्षा भारतीय उपमहाद्वीप के तापमान में कमी लाती है।

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून कई विशेषताओं से युक्त हैं।

भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक:-

       भारतीय मानसून को अनेक कारक प्रभावित करते हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) स्थिति एवं अक्षांशीय विस्तार:-

        भारत मोटे तौर पर 8°4’N से 37°6’N अक्षांशों के मध्य स्थित है। कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है। विषुवत रेखा के पास होने के कारण दक्षिणी भागों में वर्ष भर उच्च तापमान रहता है। दूसरी उतरी भाग गर्म शीतोष्ण पेटी में स्थित है।

       अत: यहाँ विशेषकर शीतकाल में निम्न तापमान रहता है। इसके कारण स्थल और समुद्र पर मिलने वाले वायुदाब में अन्तर आ जाता है। फलत: मध्य मई से मध्य नवम्बर तक द०-प० मानसून सागर से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर और मध्य नवम्बर से मध्य मई तक उ०-पूर्वी मानसून भारतीय उपमहाद्वीप से सागर की ओर अग्रसारित होती है और वे वर्षा करते है।

(2) समुद्र से दूरी:-

        प्रायद्वीपीय भारत अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है। अत: भारत के तटीय प्रदेशों की जलवायु सम है। इसके विपरीत जो प्रदेश देश के आन्तरिक भागों में स्थित हैं, वे समुद्री प्रभाव से अछूते हैं। फलस्वरूप उन प्रदेशों की जलवायु अति विषम या महाद्वीपीय है। समुद्र से निकटवर्ती क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा अधिक और जैसे-2 इससे दूरी बढ़ती जाती है वैसे- वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है।

(3) उत्तरी पर्वतीय श्रेणियाँ:-

       हिमालय तथा उसके साथ की श्रेणियाँ जो उत्तर-पश्चिम में कश्मीर से लेकर उ०-प० में अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई हैं। ये भारत को शेष एशिया से अलग करते हैं। ये श्रेणियाँ शीतकाल में मध्य एशिया से आने वाली अत्याधिक ठण्डी व शुष्क पवनों से भारत की रक्षा करती हैं। साथ ही वर्षादायिनी द०-पश्चिम मानसून पवनों के सामने एक प्रभावी अवरोध बनाती हैं, ताकि वे भारत की उत्तरी सीमाओं को पार न कर सकें। इस प्रकार ये श्रेणियाँ उपमहाद्वीप तथा मध्य एशिया के बीच एक जलवायु विभाजक का कार्य करती है।

(4) स्थलाकृति:-

          देश के विभिन्न भागों में स्थलाकृतिक लक्षण वहाँ के तापमान, वायुमण्डलीय दाब, पवनों की दिशा तथा वर्षा की मात्रा को प्रभावित करते हैं। उत्तर में हिमालय पर्वत नमीयुक्त मानसून पवनों को रोककर समूचे उत्तरी भारत में वर्षा का कारण बनता है। मेघालय पठार में पहाड़ियों की कीपनुमा आकृति से मानसून पवनों द्वारा विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है। अरावली पर्वत मानसून पवनों की दिशा के समानान्तर है।

       अत: यह मानसूनी पवनों को रोकने में असफल होता है। फलस्वरूप वहाँ वर्षा नहीं हो पाती और लगभग सम्पूर्ण राजस्थान एक विस्तृत मरूस्थल में बदल गया है। पश्चिमी घाट द०-प० मानसून पवनों के मार्ग में दीवार की भाँति खड़ा है जिसके कारण इस पर्वत के पश्चिमी ढालों तथा पश्चिमी तटीय मैदान में भारी वर्षा होती है। इसके पूर्व में पवनें नीचे उत्तरती है और ठण्डी व शुष्य हो जाती है। अतः इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है और यह “वृष्टि छाया क्षेत्र” कहलाता है।

(5) मानसूनी पवनें:-

        द०-प० पश्चिमी ग्रीष्मकालीन पवनें समुद्र से स्थल की ओर चलती है और समस्त देश को प्रचुर वर्षा प्रदान करती हैं। इसके विपरीत शीतकालीन उ०-पूर्वी मानसून पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती है और वर्षा करने में असमर्थ होती है। बंगाल की खाड़ी से कुछ जलवाष्प प्राप्त करने के पश्चात ये पवनें तमिलनाडु के तट पर थोड़ी सी वर्षा करती है।

(6) ऊपरी वायु परिसंचरण:-

        भारत में मानसून के अचानक विस्फोट का एक अन्य कारण भारतीय भाग के ऊपर वायु परिसंचरण में होने वाला परिवर्तन भी है। ऊपरी वायुतंत्र में बहने वाली जेट वायुधरायें भारतीय जलवायु को निम्न प्रकार से प्रभावित करती है। जैसे:-

(i) पश्चिमी जेट वायुधारा-

       शीतकाल में, समुद्र तल से लगभग 8Km की ऊँचाई पर पश्चिमी जेट वायुधारा अधिक तीव्र गति से समशीतोष्ण कटिबंध के ऊपर चलती है। यह जेट वायुधारा हिमालय की श्रेणियों द्वारा दो भागों में विभाजित हो जाती है। इस जेट वायुधारा की उत्तरी शाखा इस अवरोध के उत्तरी सिरे के सहारे चलती है। दक्षिणी शाखा हिमालय श्रेणियों के दक्षिण में 25°N अक्षांश के ऊपर पूर्व की ओर चलती है।

       मौसम वैज्ञानिकों का ऐसा विश्वास है कि यह शाखा भारत की शीतकालीन मौसमी दशाओं को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह जेट वायुधारा भूमध्य सागरीय प्रदेशों से पश्चिमी विक्षोभों को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने के लिए उत्तरदायी है। उत्तर पश्चिम मैदानों में होने वाली शीतकालीन व ओलावृष्टि तथा पहाड़ी प्रदेशों में कभी-2 होने वाली भारी हिमपात इन्हीं विक्षाओं का परिणाम है। इसके बाद सम्पूर्ण उतरी मैदानों में शीत लहरें चलती है।

(ii) पूर्वी जेट वायुधारा-

        ग्रीष्मकाल में, उतरी गोलार्द्ध में सूर्य के उत्तरायण के कारण ऊपरी वायु परिसंचरण में परिवर्तन हो जाता है। पश्चिमी जेट वायुधारा के स्थान पर पूर्वी जेट वायुधारा चलने लगती है, जो तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी गर्म जेट वायुधारा विकसित होती है जो 15°N अक्षांश के आस-पास प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर चलती है। यह द०-पश्चिमी मानसून पवनों के अचानक आने में सहायता करती है।

(7) एलनीनो प्रभाव:-

        भारत में मौसमी दशाएँ एलनीनो से भी प्रभावित होती है, जो संसार के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में विस्तृत बाढ़ों और सूखों के लिए उत्तरदायी है। एलनीनो एक सतही उप गर्म जलधारा है। यह कभी-2 द० अमेरिका के पेरू तट से कुछ दूरी पर दिसम्बर के महीने में दिखाई देती है। कई बार पेरू की ठंडी धारा के स्थान पर अस्थायी धर्म धारा के रूप में बहने लगती है। कभी-2 अधिक तीव्र होने पर यह समुद्र के ऊपरी जल के तापमान को 10ºC तक बढ़ा देती है।

         उष्ण कटिबंधीय प्रशान्त महासागरीय जल के गर्म होने से भूमण्डलीय दाब व पवन तंत्रों के साथ-2 हिन्द महासागर में मानसून पवनें भी प्रभावित होती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि 1987 ई. में भारत में भयंकर सूखा एलनीनो का ही परिणाम था।

(8) दक्षिणी दोलन:-

        दक्षिणी दोलन मौसम विज्ञान से संबंधित वायुदाब में होने वाली परिवर्तन का प्रतिरूप है, जो हिन्द व प्रशांत महासागरों के मध्य प्राय: देखा जाता है। ऐसा देखा गया है कि जब वायुदाब हिन्द महासागर में अधिक होता प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र पर अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है अथवा इन दोनों महासागरों पर वायुदाब की स्थिति एक-दूसरे के उलटा होती है। जब वायुदाब प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर  अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है तो भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक शक्तिशाली होती है। इसके विपरीत परिस्थिति में मानसून के कमजोर होने की संभावना अधिक होती है।

     उपरोक्त कारकों के अलावे पश्चिमी विक्षोभ, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब का खिसकाव इत्यादि भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक हैं।

निष्कर्ष

        उपरोक्त तथ्यों विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मानसून ए मौसमी हवा है। इसकी कई विशेषताएँ होती हैं। ये विशेषताएँ मानसून को प्रभावित कने वाले कारकों द्वारा निर्धारित होती हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

19. भारतीय जल विभाजक रेखा


भारतीय जल विभाजक रेखा

             जल विभाजक दो भौगोलिक प्रदेश के बीच वह उत्थित स्थलाकृति है, जो दो अपवाह प्रदेशों को अलग-अलग विभाजित करती है। अर्थात् यह दो विपरित ढाल वाले प्रदेश के मध्य उच्च भूमि है।

      भारत में प्रमुख चार जल विभाजक रेखाएँ है। उसके आधार पर भारत को चार अपवाह प्रदेशों में विभाजित किया गया है। भारतीय जल विभाजक रेखा को मानचित्र में देखा जा सकता है-

भारतीय जल(i) उत्तर भारतीय जल विभाजक रेखा

(ii) अरावली जल विभाजक रेखा

(iii) विन्ध्यन सतपुड़ा जल विभाजक रेखा

(iv) पश्चिमी पर्वतीय घाट जल विभाजक रेखा।

(i) उत्तर भारतीय जल विभाजक रेखा-

        उत्तर भारत में उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र जल विभाजक रेखा का कार्य करती है। इसका विस्तार काराकोरम हिमालय से मणिपुर मिजो पहाड़ी तक है। काराकोरम हिमालय व पूर्वांचल हिमालय के श्रृंखलाओं में अवस्थित हिमयुक्त शिखर जल विभाजक रेखा का कार्य करती है। जिसकी औसत ऊँचाई काराकोरम से नामचा बरबा तक 6000 मी० है।

    ब्रह्मपुत्र गार्ज के पास पर्वतीय श्रृंखला दक्षिण कि ओर मुड जाती है जिसकी औसत ऊँचाई 2600 मी० से 3000 मी० तक हैं। इसमें पटकोई बुम, नागा हिल, मणिपुर एवं मिजो पहाड़ियाँ शामिल हैं। मूलत: पूर्वांचल हिमालय, म्यानमार और पूर्वोत्तर भारत के बीच जल विभाजक रेखा का कार्य करती हैं। जबकि हिमालय पर्वत चीन एवं भारत के बीच जल विभाजक रेखा का कार्य करता है।

(ii) अरावली जल विभाजक रेखा-

        इस जल विभाजक रेखा का विस्तार गुजरात के “इन आफ कच्छ” से लेकर अम्बाला सिटी तक हुआ है। इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व कि ओर हैं। जिसकी औसत लम्बाई 600 मी० से 1000 मी० तक है। यह सिंधु नदी तंत्र एवं गंगा यमुना नदी तंत्र के बीच जल विभाजक का कार्य करती है। यह एक प्राचीनतम श्रृंखला है। जो कि एक अवशिष्ट पहाड़ी का रूप धारण कर लिया है। इसका भौगोलिक विस्तार गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली जैसे राज्यों तक हुआ है।

(iii) विन्ध्यन सतपुड़ा जल विभाजक रेखा-

         इसका विस्तार मध्य भारत में हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 1600 किमी० है। इस जल विभाजक रेखा का निर्माण विन्ध्यन, सतपुड़ा, महादेव, मैकाल आदि पर्वत श्रृंखलाओं के मिलने से हुआ है। यह जल विभाजक रेखा प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में बहने वाली नदी अपवाह तंत्र के बीच में जल विभाजक रेखा का कार्य करती हैं। इसी जल विभाजक रेखा का कुछ भाग टूटकर बिहार व बंगाल की सीमा पर राजमहल छोटी जल विभाजक रेखा का निर्माण हुआ है, जिसका विस्तार उत्तर से दक्षिण कि ओर हैं।

           इसी जल विभाजक रेखा का कुछ भाग टूटकर गारो, खासी, जयन्तिया जल विभाजक रेखा का भी निर्माण हुआ है। यह जब विभाजक रेखा के दक्षिण से निकलने वाली नदियां बांग्लादेश में नई अपवाह तंत्र को जन्म देती हैं, जबकि उत्तर की ओर बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का निर्माण करती हैं।

(iv) पश्चिमी पर्वतीय घाट जल विभाजक रेखा-

          इसकी औसत लम्बाई 1600 किमी० है, इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा में है। इसकी औसत ऊँचाई 910 मी० हैं। पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट परस्पर नीलगिरी के पास मिलकर एक गाठ का निर्माण करते हैं। और एक सम्मिलित श्रृंखला के रूप में मिलकर क्रमश: अनामलाई, कोर्डेमम, पालनी नागर कोयल, श्रृंखला के रूप मे उत्तर से दक्षिण दिशा ने प्रक्षेपित हो गई हैं।

       चुकिं यह जल विभाजक रेखा पश्चिमी समुद्र स्तर से काफी नजदीक है, साथ ही इसका पश्चिमी किनारा एक भ्रन्शोथ पर्वत के समान हैं। इसलिए अरब सागर में गिरने वाली नदियों की लम्बाई कम हो जाती है। जबकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ लम्बी दूरी को तय करने के बाद सागर में गिरती है।

महत्व:

           चूंकि जल विभाजक रेखाएं दो भौगोलिक अपवाह प्रदेशों के बीच की उत्थित भूमि है, जिसके कारण नदी मार्ग मे ढाल तीव्र हो जाता है, जिसके काण वर्षा का जल तेजी से बहते हुए समुद्र में चला जाता है। लेकिन जल विभाजक रेखा को प्राकृतिक सीमा मानते हुए “जल संभर प्रबंधन (WSM)” के माध्यम से जल संसाधन का उपयोग, संरक्षण एवं उचित संवर्धन किया जा सकता है। इससे कृषि, पशुपालन, मत्स्यन, सामाजिक वानिकी सिंचाई, विद्युत उत्पादन एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देक पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कई आर्थिक समस्याओं से निपटा जा सकता है। 

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार


प्रायद्वीपीय भारत के पठार

               प्रायद्वीपीय भारत का बाहरी किनारा विन्ध्यन, अरावली, गारो, खाँसी, जयन्तिया, पूर्वीघाट और पश्चिमी घाट से निर्मित है। ये श्रृंखलाएँ प्रायद्वीपीय भारत को एक पठार के समय में बदल देती है। पुन: सतपुड़ा, हरिश्चंद्र, बालाघाट, बाबाबूदन, श्रीशैलम जैसी छोटी-2 पहाड़ियाँ इस पठार को कई छोटे-2 पठारों में बाँट देती हैं। इसलिए प्रायद्वीपीय भारत को “पठारों का पठार” कहा जाता है। प्रायद्वीपीय भारत में निम्नलिखित पठार पाये जाते हैं-

(1) दक्कन का पठार-

       दक्कन के पठार का विस्तार महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु में हुआ है। महाराष्ट्र के पश्चिमी भाग में इसे ‘महाराष्ट्र का पठार’ जबकि पूर्वी भाग में पूर्वी ‘विदर्भ का पठार’ कहते हैं। इसी तरह से आन्ध्र प्रदेश में उत्तर वाला भाग को तेलंगाना का पठार जबकि दक्षिण वाला भाग रॉयल सीमा का पठार कहलाता है। तमिलनाडु में इसे कोयम्बटूर का पठार कहते हैं जबकि कर्नाटक में इसे मैसूर और बंगलोर का पठार कहते हैं।

         महाराष्ट्र के पठार का औसत ऊँचाई 300-900 m है। इसी पठार पर अजन्ता की पहाड़ी स्थित है। विदर्भ के पठार की औसत ऊंचाई 700 9am है। यहाँ पर पतली लावा की परत पायी जाती है। आन्ध्र प्रदेश में स्थित पठारों की औसत ऊँचाई 300-900 m है। और इसकी ढाल बंगाल की खाड़ी की ओर है। कर्नाटक में स्थित पठारों की औसत ऊँचाई 600-900 m है।

        सम्पूर्ण दक्कत के पठार का निर्माण क्रिटेशियस कल्प में हुए दरारी लावा उद्‌गार से हुआ है। इस पठार पर क्षारीय लावा के निक्षेपण से बैसाल्टिक चट्टानों का निर्माण हुआ है। कहीं-2 केन्द्रीय उद्‌गार होने से शंकु पहाड़ियों अनेक क्रेटर एवं कोल्डेरा का निर्माण हुआ है।

(2) कठियाबाड़ का पठार-

         गुजरात के काठियाबाड़ क्षेत्र में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 200-400 m है। इस पठार पर चूनापत्थर और लावा निक्षेपण का प्रमाण मिलता है। इसी पठार पर एक शंकुनुमा गिर की पहाड़ी स्थित है।

(3) उत्तर का पठार- 

               प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में कई छोटे-2 पठार स्थित है। जैसे:

(i) मारवाड़ का पठार-

         यह राजस्थान के जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर जिला में स्थित है। यह शुष्क मरुस्थलीय प्रदेश के भूदृश्य प्रस्तुत करता है। इनकी औसत ऊँचाई 250-500 m है।

(ii) मेवाड़ का पठार-

           यह राजस्थान के चितौड़, उदयपुर और बाँसवाड़ा जिला में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 250-500 m है। यह पठार काफी उबड़-खाबड़ है। इसी पठार पर हल्दी घाटी का मैदान अवस्थित है।

(iii) मालवा का पठार-

          यह राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है। इसे ढक्कन के पठार का ‘उत्तरी विस्तार’ माना जाता है। मलबा पठार की औसत ऊँचाई 500-600 m मानी जाती है।

(iv) बुंदेलखण्ड के पठार-

          इसका विस्तार दक्षिण-पश्चिम उत्तर प्रदेश और उतरी मध्य प्रदेश के सीमा पर हुआ है। ललितपुर, झाँसी, गुना, विदिशा, ग्वालियर इत्यादि जिले इसी पठार पर अवस्थित है। चम्बल नदी इस पर प्रवाहित होकर उत्खात भूमि का निर्माण करती है। इसकी औसत ऊँचाई 500-600 m है।

(v) बस्तर का पठार और बघेलखण्ड का पठार-

         बस्तर का पठार छतीसगढ़ के दक्षिण में और बघेलखंड का पठार छत्तीसगढ़ के उत्तर में स्थित है। इन दोनों के बीच महानदी के सहायक नदी शिओनाथ (शिवनाथ) सीमा निर्माण करती है। बखेलखण्ड के पठार की औसत ऊँचाई 700-900 m है। जबकि बस्तर के पठार की औसत ऊँचाई 500-700 m है। बस्तर के पठार पर ही दण्डकारण्य क्षेत्र अवस्थित है जो भारत का सबसे अधिक उबड़-खाबड़ वाला क्षेत्र है।

(vi) छोटानागपुर का पठार-

        इसका विस्तार झारखण्ड, द०-पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और छतीसगढ़ में हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 700-900 m है। इस पठार का पश्चिमी भाग सबसे ज्यादा ऊँचा है जिसे पाट (PAT) का पठार कहते हैं। इस पर नेतरहाट नामक पहाड़ी मोनेडनॉक का उदाहरण प्रस्तुत करती है। पाट के पठार के पूरब में में राँची का पठार और हजारीबाग का पठार स्थित है। इन दोनों के बीच में दामोदर नदी सीमा बनाते हुए भ्रंश घाटी में प्रवाहित होती है।

       हजारीबाग पठार पर पारसनाथ के पहाड़ी अवस्थित है। जिसके सबसे अधिक ऊँचाई 1365 m छोटानागपुर पठार के सबसे पूर्वी एवं उतरी भाग को कोडरमा के पठार से सम्बोधित करते हैं। हाजारीबाग और कोडरमा पठार के बीच में कोडरमा की घाटी और चतरा की घाटी स्थित है।

(vii) मेघालय का पठार-

         यह मेघालय राज्य में स्थित है। इसे प्रायद्वीपीय भारत का ही एक भाग माना जाता है। राजमहल गैप के द्वारा यह प्रायद्वीपीय भारत से पृथक है। इस पठार पर गारो, खाँसी और जयन्तिया तीन शंकु पहाड़ी स्थित है।इस प्रकार की औसत ऊँचाई 700-900 m है।

निष्कर्ष

         इस तह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रायद्वीपीय भारत अनेक पर्वतों और अनेक पठारों से निर्मित है। इसके भूदृश्य पर वाह्य एवं आन्तरिक कारकों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।

32. चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार (Rocks and its Types)

32. चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार

(Rocks and its Types)



चट्टानें

           भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं। पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

             उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

        आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

⇒ ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

          स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

           वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

         वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है, अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालीय चट्टान (Plutonic Rock)

            इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं। अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।

मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

⇒ जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे- गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली मेसा को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे बैथोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी या तलछटी या परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

      ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।

⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है, अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

       जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनः रूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

           कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरम,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट



 

31. अपक्षय एवं अपरदन (Weathering and Erosion)

31. अपक्षय एवं अपरदन (Weathering and Erosion)



अपक्षय एवं अपरदन

       अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। इसमें चट्टान-चूर्ण के परिवहन को सम्मिलित नहीं किया जाता है

        अपरदन की क्रिया में टूटे हुए चट्टानों के टुकड़ों के परिवहन (नदी, हिमानी, वायु, भूमिगत जल तथा सागरीय लहर द्वारा) तथा टुकड़ों द्वारा आपस में रगड़ एवं उनके द्वारा कटाव की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है।

        अनाच्छादन (Denudation) में अपक्षय तथा अपरदन दोनों क्रियाओ का समावेश किया जाता है। इस प्रकार अपक्षय में केवल स्थैतिक क्रिया तथा अपरदन में गतिशील क्रिया होती है अनाच्छादन स्थैतिक तथा गतिशील दोनों क्रियाओं का योग है।           

         पृथ्वी का भूपटल दृढ़ भूखण्डों से निर्मित है जिसे प्लेट कहते है। पृथ्वी के भूपटल पर आंतरिक एवं बाह्य दो प्रकार की शक्तियाँ सतत कार्यरत रहती है। आंतरिक शक्तियों में ज्वालामुखी, भूकम्प एवं भूपटल को विरूपित करने वाले अन्य शक्ति (जैसे- संवहन तरंग) को शामिल करते है। जबकि बाह्य शक्तियों में जलवायु, बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग, इत्यादि को शामिल करते है। 
         आंतरिक शक्तियाँ भूपटल में विषमता (उत्थान, धंसान, वलन) उत्पन्न करती है। जबकि बाह्य शक्तियां भूपटल में उतपन्न विषमता को समाप्त कर समतल मैदान के रूप में बदलने का प्रयास करती है अर्थात बाह्य शक्तियां  प्राकृतिक कैंची के समान है जो अपरदन के माध्यम से धरातल को अपरदित कर समतल करते रहती है

                समतल स्थापन का कार्य दो रूपों में होता है:

(i) बाह्य शक्तियां उच्च भागों को काट-छांटकर कर समतल बनाने का कार्य करती है, जिसे निम्नीकरण (Degradation) की क्रिया कहा जाता है।

(ii) जब बाह्य शक्तियां कटे छंटे पदार्थों का निक्षेपण निम्न भागों में करती हैं एवं इस प्रकार समतल स्थापन का कार्य करती हैं, तो यह क्रिया अधिवृद्धिकरण (Aggradation) कहलाती है। बाह्य शक्तियों द्वारा धरातल की ऊंचाई एवं गहराई समाप्त कर समतल स्थापन की प्रक्रिया को अनावृतीकरण कहा जाता है। अनावृत्तीकरण के अंतर्गत तीन क्रियाएं सम्मिलित हैं:

1. अपक्षयण (Weathering):

    भौतिक अथवा रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का अपने ही स्थान पर टूटना-फूटना या सड़ना गलना अपक्षयण कहलाता है।

2. शिलाखंडों का सरकना (Mass Wasting):

      यह वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत गुरुत्व के सीधे प्रभाव से टूटी हुई चट्टानें नीचे की ओर सरकती हैं या गिर पड़ती हैं, जैसे- भू-स्खलन।

3. अपरदन (Erosion):

         अपरदन वह क्रिया है जिसमें गतिशील अभिकरणों (Mobile Agencies) द्वारा शिलाखंडों का स्थानांतरण होता है। अपरदन के अंतर्गत तीन क्रियाएं सन्निहित हैं।

(क) परिवहन या अपनयन (Transportation):-

        इसमें ऋतुक्षरित चट्टानें कमजोर होकर अपरदन के दूतों के द्वारा बहाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है और निम्न भागों में निक्षेपण का कार्य किया जाता है स्रोत क्षेत्र से चट्टानों को उठाकर दूसरे स्थान पर पहुंचा देने वाले कारकों को अपरदन का दूत (बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग) कहा जाता है।    

(ख) अपघर्षण (Corrasion):-

     जब चट्टानों के टुकड़े अपरदन की शक्तियों (बहता जल, हिमानी, पवन आदि) द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाये जाते हैं तो वे धरातल की सतह को घिसते एवं काटते रहते हैं, इसे ही अपघर्षण कहा जाता है।

(ग) निक्षेपण (Deposition):-

        अपरदन के विभिन्न कारक परिवहन कार्य करने के बाद अपने साथ लाये गये मलबे को अपनी वाहन शक्ति के अनुसार जगह-जगह छोड़ते जाते हैं, जिसे निक्षेपण कहते हैं। निक्षेपण क्रिया से धरातल ऊंचा-नीचा हो जाता है। इस कार्य को बहता हुआ नदी, भूमिगत जल, हिमानी, वायु तथा सागरीय लहरें सम्पन्न करती हैं। निक्षेपण की इस अवस्था में धरातल पर विभिन्न भू-आकृतियों का जन्म एवं विकास होता है। 

        इस प्रकार जहां अपक्षयण में स्थैतिक (Static) क्रिया होती है, वहीं अपरदन में गतिशील (Dynamic) क्रिया होती है। हालांकि अपक्षयण में विखंडित चट्टानों का परिवहन नहीं होता है, परंतु गुरुत्व द्वारा विखंडित चट्टानों का सामूहिक रूप से नीचे की ओर सरकना (Mass Wasting) इसमें सम्मिलित किया जा सकता है। इस प्रकार भू-स्खलन को अपक्षयण के अंतर्गत रखा जा सकता है।

       अपक्षयण की क्रिया पर जलवायु के तत्वों (धूप, तापमान, वर्षा आदि) के अलावा चट्टानों की विशेषता (गठन, संरचना आदि) का भी प्रभाव पड़ता है।

अपरदन के प्रकार

    अपरदन के विभिन्न रूप अपरदन की भिन्न-भिन्न क्रियाओं में सम्पन्न होते हैं, जिसका विवरण निम्नलिखित है:-

(i) सन्नीघर्षण (Attrition):-

        एक ही प्रकार के चट्टानों का आपस में टकराना और टूटना सन्नीघर्षण कहलाता है।

(ii) अपघर्षण (Abrasion or corrasion):-

       जब दो विभिन्न प्रकार के चट्टान आपस में टकराकर टूटते हैं तो अपघर्षण कहलाता है।

(iii) उत्पाटन (Plucking):-

      अपरदन के दूतों के द्वारा चट्टानों को उखाड़ कर फेंकना उत्पाटन कहलाता है।

(iv) अपवाहन (Deflation):-

         वायु के द्वारा चट्टानों का उड़ा कर ले जाना अपवाहन कहलाता है।   यह क्रिया शुष्क मरुस्थलीय भागों में अधिक होती है। 

(v) स्थानांतरण या भूस्खलन (Landslide):-

          गुरुत्वाकर्षण बल के कारण चट्टानों का ऊपर से नीचे गिरना या खिसकना स्थानांतरण कहलाता है। 

(vi) अपक्षालन (Leaching):-

        अपरदन के दूतों के द्वारा छोटे एवं महीन चट्टानी कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना अपक्षालन कहलाता है।

(vii) संक्षारण (corrosion):-

       रासायनिक प्रतिक्रिया के द्वारा चट्टानों का टूटना और दूसरे स्थान पर जमा करना संक्षारण कहलाता है। इस प्रकार संक्षारण रासायनिक क्षरण की एक प्रक्रिया है।

(viii) जलगति क्रिया (Hydraulic Action):-

            यह एक यान्त्रिक क्रिया है। इसमें बहता हुआ जल अपने वेग तथा दबाव के कारण मार्ग में स्थित चट्टानी कणों को अपने साथ बहाकर ले जाता है।      

अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

     बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के चट्टानों के टूट-फूट कर टुकड़े-टुकड़े होने की प्रक्रिया को भौतिक या यांत्रिक ऋतुक्षरण कहा जाता है।

⇒ भौतिक ऋतुक्षरण, मरुस्थलों में अधिक दैनिक तापांतर के कारण एवं ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में पाले (Frost) के कारण होता है।

⇒ गर्म मरुस्थलों में स्वच्छ आकाश एवं वायु की शुष्कता के कारण दिन एवं रात के तापमान में काफी अंतर पाया जाता है। दिन के समय तेज धूप के कारण चट्टानों का ऊपरी आवरण तप्त होकर फैल जाता है। किन्तु रात के समय प्रायः तापमान गिरकर हिमांक (Freezing Point) तक पहुंच जाता है एवं चट्टानें सिकुड़ जाती हैं। इन क्रियाओं की पुनरावृति के कारण चट्टानों में दरार पड़ने लगता है एवं चट्टानें बड़े बड़े खंडों में टूट जाती हैं। इस प्रक्रिया को खंड विच्छेदन (Block Disintegration) कहा जाता है।

⇒ उष्ण मरुस्थलीय, अर्द्ध मरुस्थलीय एवं मानसूनी जलवायु प्रदेशों में अधिक तापांतर के कारण कभी-कभी चट्टानों की ऊपरी सतह गर्म होकर अन्दर की अपेक्षाकृत ठंडी सतह से अलग हो जाती है एवं ऊपर का भाग प्याज के छिलके की तरह अलग हो जाता है। इसे अपदलन, अपशल्कन या अपपत्रण (Exfoliation) कहा जाता है। यह क्रिया मुख्यतः ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों में होती है।

⇒ चट्टानें विभिन्न खनिजों का समुच्चय होती हैं एवं विभिन्न खनिजों के फैलाव एवं सिकुड़ने की दर अलग-अलग होती हैं। इसके कारण चट्टानों के विभिन्न खनिज कण टूट-टूटकर अनेक खनिज कणों में विभाजित हो जाते हैं। चट्टानों का इस प्रकार खनिज कणों में टूटना कणिकामय विखंडन (Granular Disintegration) कहलाता है। खंड विखंडन एवं कणिकामय विखंडन के कारण ही गर्म मरुस्थलों में विस्तृत क्षेत्रों में बालू पाये जाते हैं।

⇒ शीत कटिबंधीय क्षेत्रों एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों की छिद्रों एवं दरारों में जल के जमने एवं पिघलने की क्रिया क्रमिक रूप से होती है। इससे चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं बड़े-बड़े खंडों में टूटने लगती हैं अर्थात् खंड-विखंडन (Block Disintegration) होने लगता है। यह क्रिया तुषार क्रिया (Frost Action) कहलाती है।

          खड़ी पहाड़ी ढालों पर इस प्रकार का विघटन अधिक देखने को मिलता है। विघटित चट्टानें गुरुत्व बल के कारण नीचे की ओर सरककर जमा होने लगती हैं। ये विखंडित चट्टानें खुरदरी एवं नुकीली होती हैं। इस प्रकार के कोणीय चट्टानी खंडों (Angular Rock Fragments) के ढेर को भग्नाश्म राशि (Scree) अथवा टैलस (Talus) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्री या टैलस का निर्माण मुख्यतः तुषार क्रिया एवं गुरुत्वाकर्षण का परिणाम है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

    जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

      चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

     ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

     जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

     जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

        बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

अपक्षयण पर जलवायु का प्रभाव

⇒ उष्ण एवं शुष्क जलवायु क्षेत्रों (जैसे- गर्म मरुस्थलों में) दैनिक तापांतर अधिक मिलने के कारण भौतिक अपक्षय महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ उष्ण एवं आर्द्र जलवायु क्षेत्र (जैसे- विषुवतीय क्षेत्र) एवं चूना पत्थर वाले क्षेत्र में रासायनिक अपक्षय महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ शीत एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में भौतिक अपक्षय अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थायी हिमाच्छादन के कारण अपक्षयण की क्रिया नहीं होती है।

⇒ मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों (जैसे भारत) में रासायनिक एवं भौतिक दोनों ही प्रकार का अपक्षयण पाया जाता है।

नोट: अपक्षयण एवं अपदन दो अलग-अलग क्रियाएं हैं। बिना अपक्षयण के भी अपरदन हो सकता है। अपक्षयण के पश्चात् अपरदन हो ही, यह आवश्यक नहीं है। अपरदन की प्रक्रिया में अपक्षयण सहायक होता है, परंतु यह अपरदन का अंग नहीं है।



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23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

(Conventional Signs and Symbols)


रूढ़ चिन्ह और संकेत

          स्थलाकृति मानचित्र पर भौगोलिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को एक विशिष्ट चिन्ह के द्वारा प्रदर्शित किया है, जो रूढ़ चिन्ह कहे जाते है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा इन संकेतों का मापनीकरण किया जा चुका है। भारतीय स्थलाकृति मानचित्र में प्रयुक्त संकेत को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। प्राय: 1:50,000 और 1:25000 मापनी वाले पत्रक में रूढ़ चिन्ह समरूपी होते है। कुछ रूढ़ चिन्ह निम्नांकित है-

        यह मुख्यत: दो प्रका के होते है-

1. मौसम विज्ञान के लिए

2. स्थलाकृतिक पत्रक के लिए

 रूढ़ चिन्ह और संकेत

 


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23. एलनीनो सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत


एलनीनो सिद्धांत

         मानसून की उत्पत्ति के संबंध में “एलनीनो सिद्धांत” को एक नवीन सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त है। एलनीनो के बारे में विश्व को पहली जानकारी तब मिली जब गिल्बर्ट वाकर महोदय 1924 में मध्य प्रशान्त महासागर में बनने वाला “निम्न वायुदाब क्षेत्र” का अध्ययन कर रहे थे। मध्य प्रशान्त महासागर में निम्न वायुदाब क्षेत्र का कारण उन्होंने अलनीनो जलधारा को बताया। पुन: 1987 ई० में भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न हुई तो अलनीनो का संबंध भारतीय मानसून से जोड़ा गया।

         अलनीनो एक गर्म उपसतही जलधारा है जिसकी उत्पत्ति पेरू के तट पर 3ºS से 33ºS अक्षांश के मध्य होती है। यह वह क्षेत्र है जहाँ दोनों गोलार्द्धों की वाणिज्यिक हवाएं अपने नियत मार्ग से होकर प्रवाहित होती है। पुनः पृथ्वी की घूर्णन गति के विरुद्ध यह जलधारा पूरब से पश्चिम दिशा में विषुवत रेखा के समान्तर प्रवाहित होने लगती है। यह जलधारा मध्य प्रशान्त महासागर में बिना कोई अवरोध के प्रवाहित होती है। पुन: मलाया प्रायद्वीप और आस्ट्रेलिया के मध्यवर्ती भाग से गुजरकर यह जलधारा हिन्द महासागर में प्रविष्ट कर जाती है और धीरे-2 इसका फैलावा पूर्वी अफ्रीका के तट तक हो जाता है।

        अलनीनो जलधारा के कारण समुद्री जल का तापमान 3º-10ºC तक बढ़ जाती है। पुनः सामान्य नियम के अनुसार भारत में मानसून सक्रिय होने के लिए यह यावश्यक है कि ग्रीष्म ऋतु में समुद्री सतह पर HP और स्थल पर LP का निर्माण हो। लेकिन अलनीनो का प्रभाव समुद्री क्षेत्र में होते ही समुद्र के ऊपर ग्रीष्म ऋतु में LP का निर्माण हो जाता है और उसके तुलना में स्थल पर HP का निर्माण होता है। फलत: वायु स्थल से समुद्र की ओर चलने की प्रवृति रखती है। जिससे भारत में मानसून सक्रिय हो ही नहीं पाता है।

      अलनीनों का प्रभाव सभी वर्ष एक समान नहीं देखा गया है। अत: इसके प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए (SOS) ‘साउथ ओसीलेशन स्केल” (दक्षिणी दोलन पैमाना) का विकास किया गया है। इन पैमान में दो तरह के सूचकांक (इंडेक्स) विकासत किये गये हैं। जैसे-

(i) अप्रैल महीने में मध्य प्रशान्त महासागर में स्थित टेहिटी (Tahiti) द्वीप पर HP का निर्माण होता है, और ऑस्ट्रेलिया के डार्विन नगर में LP का निर्माण होता है तो यह सकारात्मक मानसून का सूचक है। और

(ii) जब अप्रैल महीने में टेहिटी द्वीप पर LP और डार्विन नगर पर HP का निर्माण हो तो यह नकारात्मक मानसून का सूचक है।

एलनीनो सिद्धांत

चित्र: एलनीनो सिद्धांत के अनुसार मानसून की उत्पत्ति

आलोचना

       यद्यपि अलनीनो के प्रभाव से सूखे की प्रभाव की व्याख्या होती है। लेकिन मानसून की उत्पत्ति के संबंध में यह कोई भी तर्क प्रस्तुत नहीं करता है। पुन: अलनीनो सिद्धांत सूर्य की उत्पत्ति के संबंध में तापीय सिद्धांत के समान ही सरल तर्क प्रस्तुत करता है। अत: अनेक मौसम वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को सूखे की उत्पत्ति का सिद्धांत मानते हैं न कि मानूसून की उत्पत्ति का सिद्धांत। यह सिद्धांत सूखे की उत्पत्ति की व्याख्या करने में भी पूर्णरूपेण सक्षम नहीं हैं।

       1875 ई० – 1985 ई० के बीच एलनीनो से संबंधित सूचना एकत्रित किये गये हैं। इन 110 वर्षों में 43 वर्ष मानसून औसत से कम सक्रिय रहा। इन 43 वर्षो में मात्र 19 वर्ष मानसून असफल होने का कारण अलनीनो का प्रभाव था। कई ऐसे वर्ष भी थे जब हिन्द महासागर में अलनीनो का प्रभाव था फिर भी भारत में मानसून से पर्याप्त वर्षा हुई। ये तथ्य अलनीनो सिद्धांत की सीमा/आलोचना को रेखांकित करते हैं।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति के संबंध में कोई भी सिद्धांत पूर्ण व्यख्या करने में सक्षम नहीं है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि उपरोक्त चारों सिद्धांतों को मिलाकर एक संश्लेषित सिद्धांत प्रस्तुत किया जाए। अगर संभव हो सके तो आधुनिक उपग्रह और GIS के माध्यम से मानसून को प्रभावित करने वाले अन्य चरों/कारकों को पहचान कर इसके विश्लेषण में शामिल किया जाय।

नोट: एलनीनो सिद्धांत- एलनीनो का प्रभाव रहने पर ग्रीष्म ऋतु में हिन्द महासागर पर LP तथा भारतीय महाद्वीप पर HP बनता है फलत: वायु स्थल (HP) से समुद्र (LP) की ओर चल पड़ती है जिससे भारत में मानसून सक्रिय नहीं हो पाती

प्रश्न प्रारूप

2 एलनिनो क्या है? भातीय मानसून में एलनिनो प्रभाव प प्रकाश डालिए।

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत


मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत     

        मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले सिद्धांतों में जेट स्ट्रीम सिद्धांत को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। इस सिद्धांत का विकास तब हुआ जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जेट स्ट्रीम वायु की खोज की गई। जेट स्ट्रीम वायु की खोज करने का श्रेय अमेरिकी सैनिकों को जाता है। लेकिन जेट स्ट्रीम का वैज्ञानिक अध्ययन करने का श्रेय रॉक्सबी महोदय को जाता है।

       सर्वप्रथम एम.टी. यीन महोदय ने जेट स्ट्रीम को भारतीय मानसून से जोड़‌कर मानसून उत्पत्ति की व्याख्या करने का प्रयास किया। पुन: कोटेश्वरम् महोदय ने उनके सिद्धांत में संशोधन प्रस्तुत करते हुए इसको प्रस्तुत किया। पुन: 1973 ई० में पूर्व सोवियत संघ के वैज्ञानिक और भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘MONEX’ अनुसंधान के द्वारा जेट स्ट्रीम सिद्धांत को पुष्ट करने का प्रयास किया। वर्तमान समय में भारतीय एवं अमेरिकी उपग्रह प्रणाली भी इसी सिद्धांत का समर्थन करते हैं।

‘जेट स्ट्रीम’ क्या है?

       जेट स्ट्रीम हवा ऊपरी वायुमण्डल में तीव्र गति से चलने वाली हवा है। इन हवाओं का संबंध पृथ्वी के धरातल पर बनने वाले वायुदाब परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों ने जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल के माध्यम से करने का प्रयास किया है।

          मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जेट हवा चार प्रकार की होती है:-

(1) ध्रुवीय रात्रि जेट हवा- इनका प्रभाव समताप मण्डल में होता है।

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा- इनका विस्तार 45º से 65º अक्षांशों के बीच होता है 

(3) उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा- इनका विस्तार 20º से 40º अक्षांशों के बीच होता है। यह भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं।

(4) उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट हवा- यह एक अस्थाई जेट स्ट्रीम है जो ग्रीष्म काल में दक्षिण एशिया के ऊपर बहती है। भारत में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के उद्भव में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

        उपरोक्त चार जेट हवाओं में से अंतिम दो जेट हवाओं का संबंध मानसून उत्पत्ति से है। एम. टी. यीन महोदय ने बताया कि उपोष्ण पछुवा जेट हवा जाड़े की ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से गुजरती है। इसकी दिशा पश्चिम से पूरब की ओर होती है। इसलिए इसे ‘पछुवा जेट हवा’ भी कहते हैं।

मानसून उत्पत्ति का जेट

चित्र: पछुवा और पूर्वा जेट हवा

      पछुवा जेट हवा का तापमान कम होता है। ऐसी स्थिति में यह हवा नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है। नीचे बैठने की प्रवृति के कारण भारतीय उपमहाद्वीप उच्च भार / उच्च वायुदाब के क्षेत्र में बदल जाता है। फलतः धरातल पर हवाएं स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है। ये हवाएँ ही “उत्तरी-पूर्वी मानसून” कहलाता है।

          ग्रीष्म ऋतु में स्थितियाँ भिन्न होती है, क्योंकि एम. टी. यीन महोदय के अनुसार 15 मार्च के बाद से ही भारत के दक्षिणी भाग और श्रीलंका के जाफना प्रायद्वीप के ऊपर एक नवीन जेट स्ट्रीम वायु का जन्म होता है जिसे “उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा” कहते है। जैसे-2 सूर्य का उतरायण होता जाता है, वैसे-2 इस जेट हवा का विस्तार उत्तर की ओर होने लगता है। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है।

         पूर्वा जेट हवा के विकास होते ही उपोष्ण जेट हवा उत्तर की ओर खिसक कर चीन के तारिम बेसिन के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। पूर्वा जेट हवा के गर्म होने के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की हवा को ऊपर की ओर खींचने लगता है जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर LP का निर्माण होता है। इसी LP को भरने के लिए अरब सागर से हवाएँ दौड़ती है और “दक्षिणी-पश्चिमी मानसून” को जन्म देती है।

       कोटेश्वरम महोदय ने इस सिद्धांत की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल से किया है। जैसे- उनके अनुसार 15 मार्च के बाद ही तिब्बत का पठार दो कारणों से गर्म होने लगती है-

चित्र: त्रि-कोशिकीय मॉडल

(i) 5000 m समुद्र तल से तिब्बत के पठार का ऊँचा होना। और

(ii) बर्फ के पिघलने से बड़ी मात्रा में गुप्त ऊष्मा का परित्याग।

       इन दो कारणों के चलते तिब्बत के पठार की धरातलीय हवाएँ लम्बवत रूप से ऊपर उठने लगती है और तिब्बत के पठार के ऊपर HP का निर्माण कर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न करती है। इस प्रतिचक्रवातीय केन्द्र से हवाएँ मूलतः उत्तर और दक्षिण दिशा की तरफ अग्रसारित होती है। उत्तर की ओर चलने वाली हवा चीन की जलवायु को प्रभावित करती है जबकि दक्षिण की ओर चलने वाली हवा भारत की जलवायु को प्रभावित करती है।

      दक्षिण की ओर चलने वाली हवा फेरल के नियमानुसार उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलना चाहिए। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप पर इसकी दिशा पूर्णतः पूरब से पश्चिम की ओर होती है। इसे ही उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा या पूर्वा जेट हवा कहते हैं। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है। जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ठण्डी धरातलीय हवा को ऊपर की ओर खींच लेती है जिसके कारण छोटे-2 चक्रवातों का आगमन होता है। पूर्वा जेट हवा अरब सागर के ऊपर ठण्डी होकर बैठने की प्रवृति रखती है, जिसके कारण समुद्री क्षेत्र HP में बदल जाते हैं और अरब सागर से हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलकर दक्षिणी-पश्चिमी मानसून को जन्म देते हैं।

चित्र : पूर्वा जेट हवा से दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति

      पुन: कोटेश्वरम महोदय ने बताया कि ग्रीष्म ऋतु के बाद सूर्य ज्यों ही दक्षिणायन होने लगता है त्यों ही तिब्बत के पठार के ऊपर बनने वाला निम्न वायुदाब पेटी का विस्तार प्रायद्वीपीय भारत और हिन्द महासागर तक हो जाता है, जिसके कारण समुद्र और प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर प्रतिचक्रवात की स्थिति उत्पन्न होती है।

       इस प्रतिचक्रवात से पुन: हवाएं दो दिशाओं में चलती है जो हवाएँ उत्तर की ओर अग्रसारित होती है वही वायु फेरल का नियम अनुसरण करते हुए पछुवा जेट हवा को जन्म देती है। यही पछुवा जेट हवा ठण्डी होकर भारतीय उपमहाद्वीप पर बैठने लगती है जिससे घरातल पर HP का निर्माण होता है। पुन: हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति होती है।

चित्र: पछुआ जेट हवा से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति

         MONEX अनुसंधान तथा उपग्रह से लिए गए मानचित्रों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में मानसून की अनिश्चितता तथा बाढ़ और सूखाड़ के लिए “पूर्वा जेट हवा” उत्तरदायी है। इसमें कहा गया है कि पूर्वा जेट हवा का विस्तार जब प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाता है तब भारत में मानसून सामान्य रहता है और जब इसका विस्तार शिवालिक पर्वत और मैदानी क्षेत्र तक ही रह जाता है तो भारत में अनावृष्टि की स्थिति उत्पन्न होती है।

आलोचना

       मानसून की उत्पत्ति का व्याख्या करने वाला यह सबसे आधुनिक एवं वैज्ञानिक सिद्धांत है। लेकिन इसकी उत्पत्ति के संबंध में अभी भी प्रश्नचिह्न उठाये जाते हैं। इस पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है कि इसका विस्तार कभी प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाती है और कभी इसका विस्तार शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र तक ही रह जाता है। ऐसा क्यों? अतः इन दिशा में और भी वैज्ञानिक अनुसंसाधन किए जाने की आवश्यकता है।

नोट: जेट स्टीम सिद्धांत के अनुसार, उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा से उ०-पूर्वी मानसून और उष्णकटिबंधीय पूर्वा जेट हवा से द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

⇒ सूर्य के दक्षिणायण से भारतीय उपमहाद्वीप पर उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा (ठण्डी) का आगमन होता है एवं HP का निर्माण करता है और उतरायण से उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा (गर्म) का आगमन होता है तथा LP का निर्माण करता है। फलत: वायु H.P. से L.P. की ओर चलकर क्रमश: उ०-पूर्वी मानसून तथा द०-प० मानसून को जन्म देती है।

जेट स्ट्रीम की विशेषताएँ-

⇒ जेट स्ट्रीम का संचरण ऊपरी क्षोभमंडल में 7.5 से 14 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक संकरी पट्टी के रूप में पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर होता है।

⇒ ये त्रिकोणीय पवनें होती हैं, जिनकी लंबाई कई हजार किलोमीटर, चौड़ाई सैकड़ों किलोमीटर तथा गहराई कुछ किलोमीटर तक होती है।

⇒ इनका विकास 20º अक्षांश से ध्रुवों तक होता है। जेट स्ट्रीम मौसम में परिवर्तन से प्रभावित होते हैं शीतकाल में इनका वेग तथा विस्तार अपेक्षाकृत अधिक होता है।

⇒ ग्रीष्मकाल में उत्तर की ओर खिसकने से इनके विस्तार में कमी आ जाती है।

प्रश्न प्रारूप

1. भातीय मानसून की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि की व्याख्या हेतु प्रस्तावित अभिनव सिद्धांत की विवेना करें।

2. मानसून की उत्पत्ति से संबंधित नवीन सिद्धांत की विवेचना करें।

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