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22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त




मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

मेकिण्डर

            1861 में जन्में मेकिण्डर ने ग्रेट ब्रिटेन में भूगोल की सुदृढ़ स्थापना की और अपने भौगोलिक विचारों से विश्व भूगोल को प्रभावित किया।

       मेकिण्डर अपने समय के बड़े प्रभावशाली भूगोलवेत्ता रहे हैं जिनका भूगोल एवं राजनीति में पूरा-पूरा दखल था। इस तरह भूगोल के व्यावहारिक पक्ष को क्रियान्वित करने में इनकी प्रमुख भूमिका रही है। इन्होंने न केवल विश्व मंच की घटनाओं के संचालन में भूगोल के ज्ञान की सार्थकता सिद्ध की वरन् यह भी उदाहरण प्रस्तुत किया कि कैसे भूगोलवेत्ता संसार की समस्याओं को सुलझाने में व्यावहारिक योगदान दे सकता है।

       इन्होंने भूगोल को इतिहास के शिकंजे से उबारा। ज्ञातव्य है कि पूर्व काल में वस्तुतः रिटर महोदय द्वारा भूगोल को इतिहास का विषय वस्तु बना दिया गया था। मेकिण्डर ने भूगोल के स्वंत्रत अस्तित्व का प्रतिपादन किया तथा सिद्ध किया कि भौगोलिक पृष्ठभूमि ही इतिहास को प्रभावित करती है।

      मेकिण्डर ने ऐतिहासिक भूगोल का गम्भीर अध्ययन करके 1902 में एक पुस्तक ‘ब्रिटेन और ब्रिटिश सागर’ प्रकाशित की थी। उसका यह ग्रंथ बहुत समय तक ब्रिटिश भूगोल का एक प्रथम वर्गीय श्रेष्ठ ग्रन्थ माना जाता रहा था। इस ग्रन्थ में ब्रिटिश भूगोल के मूल सिद्धांतों का संक्षिप्त रूप बड़े कौशल से दिया गया है। मेकिण्डर का यह ग्रन्थ उसके विस्तृत अध्ययन और गंभीर विचारों पर आधारित था, जिसमें इस पृष्ठभूमि से संबंधित ब्रिटेन के इतिहास की समीक्षा दी हुई थी।

       ऐतिहासिक भूगोल पर लिखे गये एक अन्य निबन्ध से मैकिण्डर को इतनी ख्याति प्राप्त हुई जिसकी कभी आशा नहीं थी। 1904 में उसने ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी’ की बैठक में एक निबन्ध पढ़ा जिसका शीर्षक था “इतिहास का भौगोलिक धुराग्र” (हृदय स्थल सिद्धान्त)उस निबंध के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित थे।:-

(1) समुद्री (यात्राओं का) युग बीत चुका है, अब थल का कोई बड़ा भाग अन्वेषण द्वारा खोज निकालना शेष नहीं रहा है।

(2) भविष्य में, थल-शक्ति निर्णायक होगी, क्योंकि अब संसार के सभी भाग इतने समीपस्थ हो गये हैं कि महाशक्तियों के बीच होने वाली लड़ाई के विश्वव्यापी प्रभाव होंगे।

(3) सबसे बड़ा थल-खण्ड पुरानी दुनिया में है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों का सम्मिलित थलखण्ड ‘पुरानी दुनिया’ कहलाता है। इसके केन्द्रीय भाग का एक बड़ा भूराजनीतिक महत्व है। इसके हृदय भाग में महाद्वीपीय तथा आर्कटिक जल-प्रवाह वाला एक ऐसा विशाल क्षेत्र है, जो समुद्री शक्ति को पहुँच से पूर्णत: बाहर है। संक्षेपतः यह थल-खण्ड घास स्थल-स्टेपी तथा मरूस्थल है जो घुड़सवार और ऊँटसवार खानाबदोशों का निवास-स्थल रहा है तथा इन खानाबदोशों के आक्रमण सीमावर्ती स्थाई बस्तियों के देशों पर सारे इतिहास भर में लगातार होते रहे हैं।

(4) इस क्षेत्र के स्वरूप में बड़ी तेजी से आमूल परिवर्तन हो रहा है। महाद्वीप के आर-पार जाने वाले रेल मार्गों के निर्माण और उपनिवेशन के आधार पर वहाँ एक शक्ति का सृजन हो रहा है; और वह शक्ति, आन्तरिक मार्गों पर सत्ताधारी होने के कारण, संसार को केन्द्रीय युद्धनीतिक स्थिति को प्राप्त करती रही है।

(5) इस हृदय स्थल के बाहरी भाग में सीमावर्ती महाद्वीपीय राज्यों की एक आन्तरिक अर्द्ध रचनाकार पेटी और उसके परे एक बाहरी अर्द्ध चन्द्राकार पेटी है, जिसमें समुद्रपारीय (समुद्र के पा) शक्तियाँ ब्रिटेन, संयुक्त राज्य, जापान इत्यादि स्थित है।

(6) यदि शक्ति संतुलन इस घुराग्र-राज्य के अत्यधिक अनुकूल हो जाता है तो उसके परिणामस्वरूप उस शक्ति का प्रसार यूरोप-एशिया के सीमावर्ती थल-क्षेत्रों पर हो जायेगा, जिससे इस शक्ति को महासागरीय बेड़ों के निर्माण करने के लिये विस्तृत महाद्वीपीय साधनों का प्रयोग करने की छूट मिल जायेगी और तब संसार का साम्राज्य दृष्टिगोचर होगा। यदि जर्मनी अपनी मित्रता रूस के साथ कर ले तब ऐसा हो जायेगा।

(7) इस धमकी के विरूद्ध, समुद्रपारीय शक्तियों को अपने पुल-पदाधार सैन्य मोरचे फ्रांस, इटली, मिस्र, भारत और कोरिया में बनाये रखने चाहिये, जो धुराग्र मित्रों को अपनी थलीय शक्ति का विकास करने पर बाध्य करेंगे और उनको महासागरीय बेड़े रखने पर ध्यान केन्द्रित करने से रोकेंगे।

       मेकिण्डर की हृदय स्थल की विचारधारा का विकसित रूप उसी पुस्तक लोकतंत्रीय आदर्श और यथार्थता में प्रथम महायुद्ध के पश्चात 1919 में प्रकाशित हुआ था। उसने देखा कि उस युद्ध की उत्पत्ति इस कारण से हुई थी, कि जर्मनी ने रूसी हृदय-स्थल को संसार पर प्रभुत्व जमाने के लिए, प्रयोग करने का प्रयत्न किया था। क्योंकि उस थल-शक्ति ने मित्र राष्ट्रों के जहाजी बेड़ों को बाल्टिक सागर तथा काला सागर में आने से रोक दिया था, इसलिए मेकिण्डर ने अपने हृदय स्थल के क्षेत्र को बढ़ाकर उसमें पूर्वी यूरोप को भी सम्मिलित कर लिया था। यह उसका संसार द्वीप का सिद्धान्त था। उसने एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका के सम्मिलित महाद्वीप यूरेअफ्रेशिया को संसार-द्वीप का नाम दिया था।

         इस संसार द्वीप की विचारधारा में थलीय और समुद्री शक्तियों का तुलनात्मक-पूरक दृष्टिकोण रखा गया था।

      मेकिण्डर ने यह प्रस्ताव किया था कि जर्मनी और रूस के बीच एक स्वतंत्र राज्यों की पेटी बना दी जानी चाहिए। उसका प्रस्ताव यह भी था कि पेलेस्टाइन, सीरिया, मेसोपोटामिया, बोसफोरस, डारडेनलीज तथा बाल्टिक सागर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो जाना चाहिए, तथा भारत और चीन को हृदय स्थल के आक्रमण से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पुरानी दुनिया के केन्द्रीय भाग के इस ‘ह्रदय स्थल’ सिद्धान्त के भूराजनीतिक महत्व से मेकिण्डर को बड़ी ख्याति प्राप्त हुई।

         वायुयान-यात्रा की बहुत अधिक उन्नति हो जाने पर मेकिण्डर के हृदय स्थल सिद्धान्त का महत्व गिर गया है। इस वायुयान युग में मेकिण्डर द्वारा बतलाये गये हृदय स्थल के बजाय उत्तरी ध्रुव का महत्व बढ़ गया है। अब तो आर्कटिक क्षेत्र ही नया या आधुनिक हृदय स्थल बन गया हैं। इस वायुयान युग में उत्तरी ध्रुव की केन्द्रीय स्थिति है, जिसके चारों ओर यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका स्थिति हैं।

     आर्कटिक वृत के चारों ओर स्थित इस आधुनिक हृदय स्थल में केवल जर्मनी और यूरोपीय रूस ही नहीं, वरन् समस्त उत्तरीय यूरोप, सोवियत संघ, उत्तरी चीन, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका का आन्तरिक भाग भी सम्मिलित है। इसमें दो महान् शक्तियाँ सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं। महासागरीय युग में इन राष्ट्रों के बीच विशाल महानगर थे, और नाविक शक्ति द्वारा दोनों एक-दूसरे की पहुँच से बाहर थे, परन्तु वायुयान युग में सोवियत संघ और उत्तरी अमेरिका दोनों उत्तरी ध्रुव के मार्ग से एक दूसरे के सम्मुख स्थित हो गये हैं।

       वर्तमान युग तो परमाणु-युग है, जिसमें प्रक्षेपास्त्रो और रॉकेटों के प्रयोग ने मेकिण्डर के हृदय स्थल (Heartland) सिद्धान्त का महत्व और भी कम कर दिया है।  

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

 

 


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21. भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान

21. भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान


भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान

भूगोल के विकास में विडाल ड

            20वीं सदी के भूगोलवेत्ताओं में ब्लाश का नाम सर्वप्रथम आता है। इस महान विचारक ने सन् 1877 में इस महान कार्यक्षेत्र में कदम रखा था। भूगोल विषय पर पेरिस में अपने भाषण देना प्रारम्भ किया और यह कार्य अन्तिम समय तक चलता रहा। सन् 1898 में ब्लाश की नियुक्ति पेरिस के सार्वोनी विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के रूप में हुआ था।

    उन्होंने अपने प्रादेशिक अध्ययन पर अधिक जोर दिया जिसके अंदर किसी क्षेत्र के भौतिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा ऐतिहासिक कारणों के प्रभावों का स्पष्टीकरण किया जाना आवश्यक था। ब्लाश ने सारे विश्व के प्रादेशिक भूगोल का वर्णन प्रस्तुत करने वाली ग्रन्थ माला ‘विश्व भूगोल’ की योजना बनाई थी। उसने पेरिस के निवास काल में भूगोल की महान सेवा करते हुए निम्नांकित कार्य किये-

1. सन् 1889 में यूरोप के राज्य और राष्ट्र नामक प्रथम पुस्तक प्रकाशित हुई।

2. सन् 1894 में यूरोप का एटलस प्रकाशित हुआ।

3. सन् 1891 में विभिन्न प्रदेशों में किए गये शोध कार्यों के प्रकाशन हेतु उसने औपनिवेशिक भूगोल के विज्ञान ‘दुबोइस’ के सहयोग से वार्षिक ग्रंथमाला, नामक भौगोलिक पत्रिका प्रकाशित की थी जिसमें अनेक लेख प्रकाशित हुए।

4. ब्लाश ने बिब्लियोग्राफी के प्रकाशन की भी व्यवस्था की थी।

5. सन् 1903 में ‘फ्रांस का भूगोल’ नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया था। यह भूगोल के अलावा साहित्य का उत्कृष्ट ग्रंथ माना गया।

6. सन् 1917 में उसके प्रारम्भिक अध्ययन तथा शोध कार्यों पर आधारित पूर्वी फ्रांस का भूगोल प्रकाशित हुआ।

7. ब्लाश ने मानव के भूगोल सिद्धांतों पर सामग्री की मार्लोनी के महान प्रयासों में से एकत्र कर लिया था। सन् 1921 में ब्लाश की मृत्यु के पश्चात उसकी पुस्तक मानव भूगोल के सिद्धान्त प्रकाशित करायी गयी।

8. ब्लाश साम्यवादी विचारधारा का प्रवर्तक था।

9. प्रादेशिक अध्ययन के अन्तर्गत किसी प्रदेश के भौतिक, आर्थिक, राजनैतिक और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रभावों को स्पष्ट करना ब्लाश ने आवश्यक माना था।

10. ब्लाश ने प्राकृतिक वातावरण तथा मानव के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन पर विशेष बल दिया।

भूगोल  में योगदान:-

          विडाल डी लॉ ब्लाश फ्रांसीसी भूगोल के संस्थापक माने जाते हैं। उनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं:-

        ब्लाश ने Annals में 1913 में भूगोल के विशिष्ट लक्षण पर एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने स्पष्टतः कहा कि भूगोलवेत्ता का स्थान प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों विज्ञानों में होना चाहिए। उसने भूगोल के निम्न छः लक्षण बताये-

(i) भूगोल में पार्थिव घटनाओं की एकता महत्वपूर्ण है। अतः इसमें विश्व की पार्थिव घटनाओं एवं उनकी प्रकृति की सकारण व्याख्या की जाती है। दूसरे अर्थों में, भौतिक कारक तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित होकर पार्थिव घटक का निर्माण करते हैं।

(ii) पार्थिव घटनाएँ विविधता रूपी योग एवं समायोजन में स्थित हैं। विभिन्न घटनाक्रमों में विकास एवं परिवर्तन इसी कारण होता है।

(iii) ऐसी यौगिक एवं सह-विविधताओं की स्थिति, उनका वर्णन एवं व्याख्या भूगोल में होती है।

(iv) भूगोल में परिवेश या वातावरण के विभिन्न तत्वों का मानव पर प्रभाव का अध्ययन होता है। इसमें विशेषतः जलवायु, धरातल, वनस्पति, आदि का प्रभाव महत्वपूर्ण है। इन सबसे मानव के सामंजस्य का अध्ययन भी भूगोल में समान रूप से महत्वपूर्ण है।

(v) भूगोल में ऐसी वैज्ञानिक विधियों की खोज करना है, जिसके द्वारा पार्थिव घटनाओं को परिभाषित कर उन्हें वर्गीकृत किया जा सके। यहाँ ब्लाश ने ऐसे नियमों एवं गणितीय आधार की कल्पना की जो कि भूतल की विभिन्न घटनाओं की प्रवृत्ति को तथ्यात्मक आधार प्रदान कर सके। ब्रूंस पर भी ब्लाश के इस लक्षण का प्रभाव पड़ा एवं उसने पार्थिव घटनाओं को वर्गीकृत एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया।

(vi) भूगोल में मानव द्वारा भूतल पर लाये गये परिवर्तन एवं उसके महत्वपूर्ण कार्यों का सही-सही मूल्यांकन कर उनकी तर्कसंगत स्थिति निश्चित की जानी चाहिए।

        भूगोल के उपरोक्त लक्षणों की ऐसी व्यावहारिक व्याख्या वह सन् 1889 से लेकर जीवन पर्यन्त अपनी रचनाओं द्वारा करता रहा। ब्लाश के विचार प्रारंभ से ही परिपक्व एवं स्पष्ट रहे। उसने कांट की भांति दर्शन पर भी अधिक जोर दिया। उसने भौतिक, प्रादेशिक एवं मानव में से किसी एक पक्ष को भूगोल में कभी भी विशेष प्रबल नहीं माना। वह तीनों के समन्वित विकास का समर्थक रहा। अतः उसने पृथ्वी के विभिन्न प्रदेशों, उसकी घटनाओं एवं उन घटनाओं में मानव के योग की सम्यक व्याख्या को महत्वपूर्ण माना। भूगोल के वैज्ञानिक विकास के लिए उसने Annals में, स्वेस, स्टीन एवं अन्य कई भूगोल से संबंधित विज्ञानों के जर्मन एवं अंग्रेजी विद्वानों के लेखों और खोजों का फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद कराकर उन्हें प्रकाशित किया।

वातावरण मानव एवं सम्भावनाएँ:-

        ब्लाश ने भूगोल के अन्तर्गत भौतिक विश्व या प्रकृति जिसे उसने भौगोलिक वातावरण कहा, का अध्ययन एवं मानव का अध्ययन दोनों को अनिवार्य माना। भूतल पर पार्थिव अन्तः सम्बन्ध के रूप में पाये जाने वाले भौतिक एवं मानवीय तत्वों को स्वतंत्र रखकर उनकी सही-सही व्याख्या नहीं की जा सकती। जहाँ प्राकृतिक परिवेश विविध स्तरीय सम्भावनाओं की ओर मानव आकर्षित करता है वहीं मानव स्वेच्छा से अपनी क्षमता एवं आवश्यकता के अनुसार इनको चुनता है। इस प्रकार ब्लाश ने अपने समय के नियतिवादी चिन्तन की पकड़ से अपने को मुक्त ही नहीं रखा वरन एक साहसी और निर्भीक अग्रणी की भाँति वह स्पष्टतः सम्भववाद की ओर भी आगे बढ़ता गया। इस प्रकार उसने ल्यूसिन फेब्रे का समर्थन किया। मानव प्राकृतिक क्रियाओं से सामंजस्य एवं सम्बन्धों में अपने को एकाकी नहीं पाता। ब्लाश ने स्पष्ट किया कि वह भूमि पर आवास के द्वारा अपने से राज्य, इकाई क्षेत्र या प्रदेश को स्वरूपित करता है। ऐसे स्वरूपों के विकास को समझने के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं तत्कालिक परिस्थितियों को भी समझना आवश्यक है। इसके द्वारा ही पूर्व की प्रवृत्ति की व्याख्या एवं भविष्य का पूर्वानुमान सम्भव है। संक्षेप में वह व्यावहारिक भूगोलवेत्ता रहा।

सम्भववादी नियम:-

        ब्लाश का चिन्तन प्रारम्भ से ही यही रहा कि मानव स्वयं एक क्रियाशील प्राणी है। वह अपने परिवेश का उपयोग स्वयं के अनुभव के आधार पर करता है। जैसा कि पूर्व में लिखा गया है, प्रकृति सम्भावनाएँ व्यक्त करती है और मानव अपनी क्षमता एवं आवश्यकतानुसार उनका उपयोग कर सकता है। मानव का प्रवाहित जल, कटावयुक्त मिट्टी, वृक्ष आदि परिवेश के कुछ तत्वों पर नियंत्रण नहीं है परंतु कुछ अन्यों पर उसका नियंत्रण है। उदाहरणार्थ, प्रत्येक सभ्यता काल में विशेष फसलों का प्रादुर्भाव होता रहा है, आज मानव ने इन फसलों के उपज क्षेत्र का इतना विस्तार कर दिया है जिसकी कल्पना भी नहीं थी। इस प्रकार आज यह पूर्व के प्रतिकूल प्रदेशों में भी इनकी कृषि कर रहा है। ब्लाश ने उदाहरण देकर इन्हें स्पष्ट किया है।

         ब्लाश लिखते हैं, “समस्त भौगोलिक प्रगति में प्रबल विचारधारा यदि है तो वह है सार्वभौमिक एकता” मानव भूगोल के गोचर पदार्थ अर्थात् मानव रचित दृश्य भूमि सार्वभौमिक एकता से सम्बन्धित है, जिसकी रचना स्वयं पृथ्वी के प्रत्येक भाग में भौतिक दशाओं के योग से हुई है। ब्लाश ने रेटजेल की भांति प्रकृति के आधिपत्य या नियंत्रणकारी प्रभाव को कहीं भी स्वीकार नहीं किया।

प्रदेशों की संकल्पना:-

         ब्लाश ने कभी भी प्रदेश का चहारदीवारी की भाँति सीमांकित नहीं माना। उसने उन विद्वानों की आलोचना की जो कि प्रदेश को Water tight compartment मानते हैं। उसने अन्ततः प्रदशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में संक्रमण अथवा परस्परव्यापी क्षेत्र से भी इन्कार नहीं किया। ऐसे प्रदेशों का अध्ययन ही उसने व्यावहारिक माना। एक प्रदेश में पार्थिव घटनाओं एवं कारकों की अन्त: निर्भरता की खोज करके उनकी अन्य प्रदेशों की ऐसी घटनाओं एवं कारकों से समता एवं विषमता के आधार पर अन्यों से तुलना की जानी चाहिए। एक प्रदेश के कारकों के प्राकृतिक परिवेश के साथ-साथ वहाँ के निवासियों की परम्पराएँ, तकनीकी कुशलता, अन्य आर्थिक और सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रभाव को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसे सहयोग से ही प्रदेश में स्वरूपित लक्षणों को उत्कृष्ट विधि से समझा जा सकता है। हम्बोल्ट ने भी इसे प्रकृति एवं मानव के अन्तः सम्बन्धों के रूप में स्वीकार किया।

प्रादेशिक अध्ययन:-

       ब्लाश ने किसी भी राजनैतिक इकाई में प्राकृतिक परिवेश की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता के अनुसार विकसित लघु इकाइयों या प्रदेशों का बहुत ही सुन्दर ढंग से या सजीव वर्णन प्रस्तुत कया है। उसने सर्वप्रथम 1889 में अपनी रचना में भूतल पर निर्मित एवं लघु स्वरूपीय क्षेत्रों में मानव एवं प्राकृतिक परिवेश की क्रियाओं के घनिष्ठ सम्बन्धों के अध्ययन एवं उनके विश्लेषण पर विशेष बल दिया। उसने ऐसे अध्ययन की आवश्यकता क्षेत्र के भौतिक, ऐतिहासिक एवं आर्थिक तथ्यों के विकास, उनके सम्बन्ध और अन्तः निर्भरता का स्वरूप एवं उसमें आने वाले परिवर्तन (गतिशीलता) को समझने के लिए आवश्यक माना। उसने स्वीकार किया कि प्रकृति एवं मानव निर्मित तथ्य एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। भूतल पर इन दोनों का सम्बन्ध इतना गहरा है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। यूरोप के राज्य एवं राष्ट्र ग्रन्थ में उसने बताया कि एक प्रदेश में रहने वाला समाज स्थानीय होता है। वह ग्रामीण होता है।

             ब्लाश के समय फ्रांस एवं अधिकांश यूरोप की व्यवस्था भिन्न थी। तब विशिष्ट नगर, औद्योगिक इकाइयाँ एवं गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का अभाव था। अधिकांश प्रदेशों की आबादी ग्रामीण थी। उसने समझाया कि यहाँ के निवासियों का भूमि से गहरा संबंध होता है। युद्ध, महामारी, अकाल, बाढ़, विद्रोह आदि के समय ही ऐसे प्रदेश में व्याप्त सामान्य लक्षण कुछ समय के लिए अदृश्य होते हैं जैसे कि स्वच्छ जल के तालाब में एकाएक तेज हिलोरों से थोड़े समय के लिए तली के लक्षण दीखने बन्द हो जाते हैं परन्तु प्रतिकूलता समाप्त होते ही पूर्व की सामाजिक व्यवस्था पुनः स्थापित होने लगती है। आगे चलकर उसने औद्योगिकरण के कारण सामाजिक व्यवस्था एवं ग्रामीण आत्मनिर्भरता व्यवस्था में आने वाले स्थाई परिवर्तनों का भी पूर्वानुमान लगाया। उसके अनुसार 1896 के बाद से ही फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था तेजी से शहरी बनने लगी है, इसके लिए सहायक तत्व मशीनें विकसित यातायात, कोयला एवं नवीन उद्योग रहे नवीन समाज में आत्मनिर्भरता, अन्तः निर्भरता में बदल गयी। ब्लाश के ऐसे सुन्दर निष्कर्ष तथ्यात्मक एवं सही-सही विश्लेषण एवं उसकी विलक्षण क्षमता के कारण ही सम्भव हो सके। क्षेत्रीय अध्ययन को ब्लाश ने ‘Annals ‘ के माध्यम से विशेष लेखों द्वारा उद्देश्यपूर्ण बनाने का प्रयास किया।

भौतिक वातावरण:-

          यद्यपि ब्लाश ने हम्बोल्ट, रिचथोफन एवं पेश्चल की भाँति भूतल के प्राकृतिक तत्वों का अलग से व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया फिर भी उसने इनके अध्ययन को भूगोल के विकास के हित में महत्वपूर्ण माना। अतः जब भी भौतिक भूगोल सम्बन्धी कोई मुख्य अथवा रचना उपलब्ध हुई उसने ‘Annals’ में विशेष स्थान दिया। इस प्रकार उसका दर्शन बहुमुखी एवं विस्तृत आधार वाला रहा। उसने कभी भी भूगोल को संकुचित क्षेत्र या उद्देश्य हेतु निर्धारित अथवा व्यवस्थित विज्ञान या सामाजिक विज्ञान का ही अंग वाला विज्ञान नहीं माना।

        उसने स्पष्टतः समझाया कि भौतिक वातावरण जिसका कि निर्माण भूतल के भौतिक तत्वों से होता है, के लक्षणों को समझे बिना उनके प्रभाव के स्त को स्पष्ट नहीं किया जा सकता। किसी भी प्रदेश के अध्ययन में ऐसे भौतिक तत्वों के सम्मिलित प्रभाव को मानवीय तत्वों के साथ स्थान मिलना आवश्यक है। ऐसे सम्बन्धों के योग से एक मानव संस्कृति एवं सभ्यता के विकास के साथ-साथ उनकी गतिशीलता से अन्तःसम्बन्ध भी समझा जाना चाहिए।

20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान




भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

फ्रेडरिक रेटजेल

            रेटजेल का जन्म 1844 में जर्मनी में हुआ था। इनके पिता एक डयूक के मैनेजर थे। परिवार में कुल चार सदस्य थे। रेट्जेल ने सर्वप्रथम प्राणी विज्ञानी के रूप में हेडलबर्ग विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। बाद में (Jena) विश्वविद्यालय में चले गये।

        31 वर्ष की आयु में रेटजेल म्यूनिख के एक स्कूल में अध्यापक हो गये तथा 1886 तक वहीं रहे। उन्होंने म्यूनिख के नृजाति संग्रहालय में मोरिस वेगनर के साथ कार्य किया। यहीं वे प्रजातियों के आव्रजन से प्रभावित हुये। इस विचार ने उनके भौगोलिक दर्शन को प्रभावित किया। 1886 में रिचथोफेन के बर्लिन जाने के बाद रेटजेल लीपजिंग आये। यहाँ फिशर एवं हेटनर जैसे भूगोलविदों ने रेटजेल के निर्देशन में कार्य किया। रेटजेल मृत्यु पर्यन्त (1904) यहीं रहे।

         फ्रांस के मॉन्टपेलियर नगर में उसने प्रसिद्ध प्राणी-वैज्ञानिक चार्ल्स मार्टिन्स के साथ कार्य किया था। उस समय उसने एक पत्रिका में अपने कुछ लेख प्रकाशित किये थे जिनका शीर्षक ‘भूमध्यसागरीय तट से जीव वैज्ञानिक पत्र’ था। इन लेखों ने वैज्ञानिकों और सरकार का ध्यान उसकी ओर आकर्षित किया था। उसने 1870 के युद्ध में सेवा की थी, जिसके बाद उसको पत्रकार बनाकर पूर्वी यूरोप के देशों में तथा इटली, संयुक्त राज्य, मैक्सिको और क्यूबा में भेजा गया था।

      अपनी इन यात्राओं में उसने भौगोलिक अध्ययन किये, और धीरे-धीरे प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन लिखने की कला में सिद्धहस्त हो गया। उसने कैलिफोर्निया, मैक्सिको और क्यूबा में ‘चीन से प्रवास’ के तथ्यों का अध्ययन किया था। ‘चीनी प्रवास’ पर उसने अपना शोध-प्रबन्ध लिखा था, जिस पर उसे शोध-डिग्री मिली थी।

      1878 में रेटजेल ने उत्तरी अमेरिका के भूगोल पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी। उसके विख्यात ग्रन्थ एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ का प्रथम खण्ड 1882 में और दूसरा खण्ड 1891 में प्रकाशित हुआ। यह एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय ग्रन्थ है, जिसके कारण रेटजेल को मानव भूगोल का जन्मदाता कहा जाता है।

         रेटजेल ने राजनीतिक भूगोल का भी गम्भीर अध्ययन किया था। उसने ‘राजनीतिक भूगोल ग्रन्थमाला’ का प्रथम खण्ड 1897 में, और दूसरा खण्ड 1903 में प्रकाशित किया था। इन ग्रन्थों के अलावा रेटजेल ने कुछ पुस्तकें सामान्य जनता की रूची के लिए भी लिखा थी। उसने भूविज्ञान, मानवजातिशास्त्र, जीवविज्ञान, भौतिक भूगोल तथा मानव समाजों पर बहुत से लेख लिखे थे।

       रेटजेल ने वातावरण तथा मानवीय तथ्यों एवं उनके पास्परिक सम्बन्धों का विश्लेषण किया था। उसने मानव एवं वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों में वातावरण के प्रभावों को महत्वपूर्ण बतलाया था, इसीलिए उसे वातावरण निश्चयवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादक माना जाता है।

        रेटजेल ने ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के प्रथम खण्ड में डार्विन के विकासवाद सिद्धान्त से मिलते-जुलते विचार व्यक्त किये थे। इन विचारों में उसने मानवीय समाजों के इतिहास पर भौगोलिक वातावरण के प्रभावों का दिग्दर्शन किया था। इस खण्ड में उसने ‘इतिहास पर भूगोल का अनुप्रयोग’ समझाया था। ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के दूसरे खण्ड (1891) में सांस्कृतिक वातावरण जनसंख्या, मानवीय बस्तियाँ, जनसंख्याओं के प्रवास तथा सांस्कृतिक लक्षणों के वर्णन किये गये थे।

         रेटजेल ने भौतिक भूगोल के क्षेत्र में भी अनुसंधान किये थे तथा एक भौगोलिक ग्रन्थमाला का सम्पादन किया था। इस ग्रन्थमाला में प्रसिद्ध भूगोलवेत्ताओं की वैज्ञानिक शोध प्रकाशित हुई थी। इस ग्रन्थमाला में हाइम की पुस्तक हिमनदी पर थी। हान की पुस्तक जलवायु विज्ञान पर थी और पैंक की पुस्तक भू-आकृति विज्ञान पर थी। रेटजेल की रूची भौतिक भूगोल में बहुत अधिक थी, इसी कारण अपने जीवन में आगे चलकर जब उसने मानव भूगोल का वर्णन किया, तब उसने वातावरण की शक्तियों को सदा ध्यान में रखा था।

       फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता ब्रूंज ने लिखा है, रेटजेल को पार्थिव सत्यता का बहुत ऊँचा ज्ञान था। वह पृथ्वी पर मानवीय तथ्यों को केवल एक दार्शनिक या इतिहासकार अथवा अर्थशास्त्री की दृष्टि से नहीं, वरन् भूगोलवेत्ता की दृष्टि से देखता था। उसने मानवीय तथ्यों से बहुत से विभिन्न सम्बन्धों को भौतिक तथ्यों के साथ परखा था- जिनमें भूमि की ऊँचाई, जलवायु, वनस्पति आदि भी थे। उसने पृथ्वी के गोले पर मानव समूहों को बसते हुए, जीवकोपार्जन करते हुए, और इतिहास का निर्माण करते हुए देखा था। उसकी दृष्टि एक सच्चे प्रकृतिवादी की दृष्टि थी।

         रेटजेल उन गिने-चुने विद्वानों में से थे जिन्होंने बहुमुखी प्रतिभा के आधार पर भूगोल की सेवा की। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल को विकसित किया एवं यह शीघ्र ही वैज्ञानिक स्वरूप लेकर पौधों से विशाल वटवृक्ष की भाँति चहुँदिशा में प्रसारित हो गया। सभी यूरोपीय भूगोलवेत्ताओं ने उसके बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों की सराहना की। वह जीव विज्ञान, भू-विज्ञान, मौसम विज्ञान, आदि विषयों के विद्वान रहे। उसने जीव विज्ञान पर लिखना प्रारम्भ किया और यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के भ्रमण के उपरान्त वह भी हम्बोल्ट की भाँति एक मँजे हुए भूगोलवेत्ता बन गये।

        रेटजेल ने अपनी पूर्व के अनुभवों का मानव भूगोल चिन्तन के विकास में लाभ उठाया। वह डार्विन क विकासवादी सिद्धान्त से बहुत प्रभावित हुए, इसी से उन्होंने भौतिक परिवेश, उसके तत्व एवं उसका मानव पर प्रभाव का बहुमुखी रूप में पता लगाया। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल के लिए शब्द का प्रयोग किया। उसके अनुसार मानव भूगोल को भौतिक भूगोल की पृष्ठभूमि में ही सही-सही समझा जा सकता है। मानव भूगोल भू-मण्डल पर स्थल एवं भौतिक परिवेश से नियंत्रित मानवता के विस्तार एवं विवरण समझाता है। वास्तव में, उसने मानव भूगोल साथ-साथ कई विज्ञानों पर लिखा, इसी कारण रेटजेल को जर्मनी में मानव भूगोल के पिता होने का श्रेय प्राप्त है।

एन्थ्रोपोज्योग्राफी (मानव भूगोल):-

         रेटजेल रिटर के विचारों से विशेष रूप से प्रभावित हुआ और स्वयं उसने यह स्वीकार किया कि वह रिटर की अर्डकुंडे रचना को भूतल पर गतिशील विकास के सन्दर्भ में विकसित करना चाहता है। उसने पृथ्वी को एक इकाई के रूप में तो स्वीकार किया परन्तु उसका चिन्तन इस ग्रन्थ में निम्न दो बातों के आधार पर रिटर से भिन्न है:-

(i) उसने इसमें प्रादेशिक वर्णन के स्थान पर मानव भूगोल एवं परिवेश सम्बन्धी व्यवस्थित वर्णन प्रस्तुत किये।

(ii) उसने डार्विन के सिद्धान्त में विश्वास करते हुए मानव को विकास की अन्तिम कड़ी माना।

         अतः उसके इस ग्रन्थ में मानव वितरण के लिए उत्तरदायी कारक एवं प्राकृतिक परिवेश के तत्वों की व्याख्या सरल एवं स्पष्ट भाषा में की गयी है। अतः प्रथम खण्ड को ‘Application of geography to history भी कहा जाता है। उसके अनुसार भूतल पर हमारे कार्यकलापों के निर्धारण में परिवेश के निम्न चारों प्रभावी समूह महत्वपूर्ण हैं।

(i) शारीरिक प्रजातीय लक्षणों वाले प्रभाव,

(ii) मनोवैज्ञानिक प्रभाव,

(iii) जनसमूह की आर्थिक एवं सामाजिक गतिशीलता की न्यूनाधिकता के स्वरूप में फैली प्राकृतिक शाक्तियों के भौगोलिक प्रभाव, एवं

(iv) मानवता के वितरण एवं गतिशीलता को नियंत्रित एवं निर्धारित करने वाले प्रभाव।

           उपरोक्त चारों प्रभावों के कारकों का समूह ही प्राकृतिक परिवेश का प्रमुख आधार है। उसने मानव मन को भी प्राकृतिक परिवेश की उपज माना। उसने प्रथम ग्रन्थ में प्रायः कठोर निश्चयवाद का अनुसरण किया। उसके अनुसार, नियति द्वारा दी गई भूमि पर ही मानव को निवास करना चाहिए एवं उसे वहाँ विधना (प्राकृतिक परिवेश व भाग्य) के नियमों के अनुसार ही मौत का भी वरण करना चाहिये।

         उसने दूसरे खण्ड में मानव समुदाय के तात्कालिक विश्व वितरण की व्याख्या की। उसने भूतल के बसे हुए एवं निर्जन प्राय प्रदेशों के विस्तार को बताते हुए उनकी सीमा निश्चित की। रेटजल ने बताया कि बसी हुई दुनियाँ की सीमा पर बसे हुए बिखरे मानव समुदाय सभ्यता की चौकियाँ हैं। जलवायु के प्रभाव को महत्वपूर्ण बताते हुए उसने प्राचीन सभ्यता-केन्द्रों के उद्भव एवं विकास का कारण भी इसे ही बताया। जल संसाधन असभ्य मानव के लिए प्रमुख बाधा थे परन्तु ज्योंहि मानव ने नौवहन सीख लिया यह बाधा उसके लिए महान राजमार्ग बन गया। 

         मानव एवं उसके विकास के लिए रेटजेल ने तीन कारणों को उत्तरदायी माना, यह है-

(i) (Lage Situation) स्थिति- यह स्थिति अन्य मानव समूहों के सन्दर्भ में है। 

(ii) Raum (Space) स्थान- क्षेत्र की सहसम्बद्धता, क्षेत्र की केन्द्रीयता एवं उनकी सीमावर्ती स्थिति इसके अंग हैं। ऐसा क्षेत्र जनसंख्या की अधिकता के साथ-साथ प्राकृतिक अथवा मानवीय बाघाएँ स्वीकार नहीं करता, एवं

(iii) Rahmen (limits) सीमाएँ- मानव समुदाय प्राकृतिक ढाँचे अथवा निर्धारित सीमा में विकसित होते हैं।

       संक्षेप में, रेटजेल के एन्थ्रोपोज्योग्राफी ग्रन्थ में निम्न तीन समस्याओं की ओर विशेष ध्यान दिया गया है:-

(i) भूतल पर मानव समूहों का वितरण-

       इसमें मानव के जातीय, राष्ट्रीय भाषा एवं धार्मिक स्तर विषयक वर्णन हैं जिन्हें समझने के लिए वांछित मानचित्र चाहिए। वर्तमान में यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूगोल का अभिन्न अंग माने गये हैं।

(ii) उपरोक्त वितरण किस प्रकार भौतिक परिवेश द्वारा प्रभावित है एवं उस पर निर्भर है।

(ii) मानव एवं उसके समाज पर भौतिक परिवेश का स्पष्ट प्रभाव। जैसे जलवायु एवं धरातल का प्रभाव।

           उसने इस प्रकार एन्थ्रोपोज्यॉग्राफी में सामान्यीकरण की प्रक्रिया को अपनाया। अपनी दूरदृष्टी के कारण उसने अपनी ग्रन्थ रचना में वारेनियस की भाँति कोई योजना नहीं बनायी। वह अपने अनुभवों के सहारे बढ़ता गया एवं ज्यों-ज्यों उसका कार्य आगे बढ़ा कई समस्याएँ उसके सम्मुख आयीं तो रेटजेल उनके निराकरण में तथा उससे सम्बन्धित विषय को समझने में लग गया।

       समुचित अध्ययन हेतु प्रदेशों एवं क्षेत्रों के अध्ययन के दर्शन को रेटजेल के साथ-साथ रिचथोफेन एवं हेटनर ने भी (ऐसे ही अध्ययन को) क्षेत्रीय अध्ययन के सिद्धान्तों को भूगोल का अनिवार्य अंग माना। वर्तमान में इस चिन्तन को विकसित करने का श्रेय हार्टशोर्न को है।

        रेटजेल की मानव भूगोल की धारणा की परिणति राजनीतिक भूगोल में हुई।  रेटजेल की राजनीतिक भूगोल नामक पुस्तक का प्रकाशन 1897 में हुआ था। वे राज्य को पृथ्वी की सतह पर एक विशिष्ट किस्म की भौगोलिक इकाई के रूप में देखते थे। वे राज्य की तुलना जैविक इकाई (जीवशास्त्र) से करते थे। उनके अनुसार राज्य वस्तुतः पृथ्वी पर मनुष्य द्वारा रचित एक संगठन होता है जिसमें जनसंख्या का निवास पाया जाता है।

         उनके अनुसार राज्य एक स्थानिक जीव की तरह है जो अपनी प्रकृति प्रदत्त सीमाओं तक प्रसार करता है। यदि उसके प्रसार को अवरोध नहीं मिलता तो वह अपनी प्राकृतिक सीमाओं को लांघ कर अपनी सीमा का विस्तार करता है। यह प्रवृत्ति विकसित मानव समूहों, बंजारों, चरवाहों, शिकारी समूहों आदि सभी में मिलती है। यहीं से लेवांसराम की सकल्पना का जन्म होता है।

          इस तरह रेटजेल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे मानव भूगोल के प्रणेता थे। उन्हें नियतिवादी कहना गलत है। यह एक भ्रान्ति थी। भ्रांति का कारण जर्मन भाषा के उनके ग्रन्थों का अंग्रेजी अनुवाद था जिसमें मनुष्य एवं प्रकृति के सम्बन्ध के मापन पर जोर देने के कारण रेटजेल को प्रकृतिवादी कहा गया।

     चूँकि इनकी शिष्या कुमारी ऐलेन सेम्पुल ने आगे चलकर अति कठोर प्रकृतिवादी विचारधारा प्रस्तुत की अतः उनके गुरू के प्रकृतिवादी होने की धारणा अपने आप पुष्ट होती गई जब आधुनिक लेखकों ने उनके मूल योगदान को पढ़ा तो यह तथ्य स्पष्ट हुआ। रेटजेल ने लीपजिंग में एक भूगोल संस्था की भी स्थापना की थी जो शीघ्र अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की संस्था बनी।

       रेटजेल के समय में या तो भौतिक भूगोल का अधिक अध्ययन हो रहा था या मनुष्य का। मनुष्य के विकास को यंत्रवत् बतलाया गया था तथा मनुष्य का भौगोलिक स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं माना जाता था। रेटजेल ने इस अन्तर को पाटने का प्रयास किया। उनके कार्य भौतिक भूगोल एवं मनुष्य के अध्ययन के बीच की कड़ी है। वे प्रकृति के उन नियमों के अध्ययन को आवश्यक मानते थे जो पृथ्वी पर जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करते हैं। उन्होंने मनुष्य को पृथ्वी की एक ईकाई के रूप में भूगोल में समाविष्ट किया। इस प्रयास से भूगोल पुर्नजीवित हो उठा।

24. वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली के एक-कोशिकीय एवं त्रि-कोशिकीय मॉडल

      24. वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली के एक-कोशिकीय एवं त्रि-कोशिकीय मॉडल


वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल

           वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:-

1. अन्तरिक्ष में पृथ्वी घूर्णन नहीं कर रही है।

2. पृथ्वी सतह का निर्माण एक समान पदार्थों से हुआ है।

3. पृथ्वी सतह द्वारा प्राप्त सौर विकिरण और बहिर्गामी दीर्घ तरंगी विकिरण में अक्षांशों के अनुसार विद्यमान भिन्नता के कारण उत्पन्न तापमान प्रवणता के कारण भूमध्य रेखा पर गर्म हवा और ध्रुवों पर ठण्डी हवा प्रवाहित होती है।

        उपरोक्त पूर्व मान्यताओं के आधार पर दोनों ही गोलाद्धों में वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का प्रतिरूप एक-कोशिकीय रूप में पाया जाता है। ध्रुवों पर उच्च वायुदाब एवं भूमध्यरेखा पर न्यून वायुदाब होने के कारण हवाओं का धरातलीय प्रवाह ध्रुवों से भूमध्यरेखा की ओर होता है।

         ध्रुवों से चलने वाली ये हवाएं जब भूमध्यरेखा पर पहुंचती हैं तो अभिसरण और संवहन के द्वारा ऊपर उठती हैं। ऊपर उठकर ये हवाएं क्षोभ सीमा के समीप पहुंचकर पुनः क्षैतिज रूप में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं। ऊपरी वायुमण्डल में चलने वाली ये हवाएं ध्रुवों पर पहुंचकर नीचे उतरती हैं। नीचे उतरकर ये हवाएं पुनः भूमध्यरेखा की तरफ प्रवाहित होती हैं। इस प्रकार वायुमंडल की सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय संचार पूर्ण होता है।

वायुमण्डलीय सामान्य

चित्र: वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल

वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का त्रि-कोशिकीय मॉडल

         एक कोशिकीय मॉडल की पहली मान्यता को यदि हटा दें तो वायुमण्डलीय प्रणाली का संचार प्रतिरूप बिल्कुल ही बदल जाएगा। वास्तव में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण दोनों ही गोलाद्धों में वायुमण्डलीय संचार प्रणाली का त्रिकोशिकीय प्रतिरूप देखने को मिलता है। इन तीन संचार कोशिकाओं के नाम- हैडले कोशिका, फैरेल कोशिका तथा ध्रुवीय कोशिका हैं।

          इस त्रि-कोशिकीय मॉडल में भी भूमध्यरेखीय क्षेत्र पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र है। सर्वाधिक ऊष्मा से युक्त यह तापीय न्यून (वायुमण्डल में उच्च वायुदाब वाला वह क्षेत्र जो सतही तापमान के कारण उत्पन्न होता है) क्षेत्र अन्तर उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र (Inter Tropical Convergence Zone) कहलाता है। इस क्षेत्र में दोनों ही गोलाद्धों के उपोष्ण कटिबन्ध से आने वाली हवाओं का अभिसरण होता है।

           अभिसरण और संवहन के कारण ये हवाएं भूमध्य रेखा पर ऊपर की ओर उठती है और 14 किमी० की ऊंचाई अर्थात् क्षोभ सीमा के समीप ये हवाएं क्षैतिज रूप में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने लगती है। ऊपरी वायुमण्डल में प्रवाहित होने वाली इन हवाओं पर कोरिआलिस प्रभाव के कारण विक्षेपण उत्पन्न होता है और 30° अक्षांशों के समीप ये हवाएं अक्षांश रेखाओं के समानान्तर पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती है। यह अक्षांशीय प्रवाह उपोष्ण कटिबन्धीय जेट धारा (Subtropical Jet Stream) के नाम से जाना जाता है।

        इस अक्षांशीय प्रवाह के कारण ऊपरी वायुमण्डल में हवा का एकत्रीकरण होने लगता है। फलतः कुछ हवा अवतलित होकर धरातल पर उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब क्षेत्र को जन्म देती है। इस उच्च वायुदाब कटिबन्ध से हवा अपसरित होकर भूमध्यरेखा एवं ध्रुवों की और प्रवाहित होने लगती है। भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली हवाएं भूमध्य रेखा पर पहुंच कर हैडले कोशिका को पूर्ण रूप प्रदान करती हैं।

          भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली यह हवा कोरिऑलिस प्रभाव के कारण विक्षेपित होकर उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवने (दायीं ओर विक्षेपण) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवनें (बायीं और विक्षेपण) कहलाती है। उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली धरातलीय पवनें भी कॉरिआलिस प्रभाव के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिण-पश्चिमी पछुआ हवाएं (दायीं ओर विक्षेपण) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिमी पछुआ पवने (बायीं ओर विक्षेपण) कहलाती हैं।

चित्र: वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का त्रि-कोशिकीय मॉडल

       दोनों ही गोलार्द्ध में 30 से 60° अक्षाशों के बीच ऊपरी वायुमण्डल में हवा सामान्यत ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती है। एक बार फिर कॉरिऑलिस प्रभाव के कारण इन हवाओं में विक्षेपण उत्पन्न होता है। फलतः ये हवाएं पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती हैं और दोनों ही गोलार्द्धों में 60º अक्षांश के समीप ध्रुवीय जेट धारा (Polar Jet Stream) का निर्माण करती हैं।

         पृथ्वी सतह पर 60° उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों के समीप उपोष्ण कटिबन्ध से प्रवाहित होने वाली पछुआ हवाएं ध्रुवों से आने वाली ठण्डी हवाओं से टकराती हैं। इस टकराव से वाताग्र के संक्रमण क्षेत्र में ठण्डी और घनी वायु गर्म एवं हल्की वायु को ऊपर की ओर उठा देती है। फलस्वरूप उपोष्ण कटिबन्धीय न्यून वायुदाब क्षेत्र की उत्पत्ति होती है। ऊपर उठती हुई यह वायु क्षोभ सीमा के समीप जब पहुंचती है तो इसमें से कुछ वायु पुनः फैरेल कोशिका में प्रवेश कर फैरेल कोशिका को पूर्ण करती है।

          ऊपर उठी हुई इस वायु का अधिकांश भाग ध्रुवीय आवर्त (Polar Vortex) (ध्रुवीय क्षेत्रों में ऊपरी वायुमण्डल में स्थित उच्च वायुदाब क्षेत्र। इस क्षेत्र में ऊपरी क्षोभमण्डल में प्रवाहित होने वाली वायु आवर्त के केन्द्र में प्रवेश करके अवरोहित होकर धरातल पर उच्च वायु दाब क्षेत्र को जन्म देती है।) में पहुंच जाता है जहां से वायु के अवरोहण से धरातल प ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्र का जन्म होता है और इस प्रकार ध्रुवीय कोशिका पूर्ण होती है।


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23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?

23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?


एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina)

एलनिनो

          एल निनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है नवजात ईसा मसीह (Child Christ)। यह नाम इसको इसलिए दिया गया है, क्योंकि इस घटना का आगमन क्रिसमस के समय होता है।

       यह एक जलवायु सम्बन्धी (Weather phenomena) प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप हवा उल्टी दिशा में बहने लगती है। ऐसा प्रत्येक दो से सात वर्ष बाद होता है। इसके अन्तर्गत दक्षिण अमेरीका से एशिया की ओर प्रशान्त महासागर के ऊपर से बहने वाली हवाएं उलटकर एशिया से दक्षिण अमेरीका की ओर बहने लगती हैं।

         इस प्रकार एशिया में वर्षा पहुंचाने के बजाय ये हवाएं इस वर्षा को दक्षिण अमेरीका की ओर ले जाती हैं जिससे दक्षिण अमेरीका और उसके आस-पास के प्रशान्त महासागर में घनघोर वर्षा होने लगती है और वहां बाढ़ आ जाती है और दूसरी ओर एशिया के विभिन्न देश जैसे भारत, इण्डोनेशिया और यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया में भी वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एल निनो के कारण दक्षिण एशिया का मानसून बुरी तरह प्रभावित होता है।

        एल निनो का कारण है, दक्षिण अमेरीका के पूर्वी प्रशान्त महासागर से लगे किनारों पर पानी का ठण्डे होने के स्थान पर गर्म हो जाना, जो मुख्यतः पेरू के किनारे समुद्र में होता है। यह गर्म जल धीरे-धीरे पश्चिम की ओर प्रशान्त महासागर में फैल जाता है।

        इस प्रकार जल के गर्म हो जाने के कारण दक्षिण प्रशान्त महासागर के ऊपर एक कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। (जहां पर अन्यथा जल के ठण्डे होने के कारण अधिक दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) तथा इस कम दबाव के क्षेत्र को सन्तुलित करने के लिए इण्डोनेशिया के पास एक अधिक दबाव का क्षेत्र (जहां पर अन्यथा एक कम दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) बन जाता है। इस प्रकार दबाव क्षेत्रों की अदला-बदली के कारण प्रशान्त महासागर के ऊपर बहने वाली हवाओं की दिशा उलट जाती है।

      मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल निनो की घटना इस दशक में पहले की तुलना में अधिक हो रही है और साथ ही इसकी तीव्रता भी पहले से अधिक है। इसका कारण वे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को मानते हैं। विश्व भर में बढ़ते प्रदूषण, ग्रीन हाउस प्रभाव और ओजोन परत की क्षति के कारण पृथ्वी की जलवायु में भारी परिवर्तन हो रहे हैं।

     एल निनो का एक चक्र समाप्त होने पर इसमें होने वाली घटनाओं के ठीक विपरीत एक और घटना होती है जिसेला निना’ (La Nina) कहा जाता है। ‘ला निना’ के समय प्रशान्त महासागर का जल पुनः ठण्डा हो जाता है। इस प्रका ‘ला निना’, एल निनो के जलवायु पर होने वाले प्रभावों को विपरीत दिशा में मोड़ देता है और वातावरण में पुनः स्थिरता को स्थापित करता है।


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19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान (Contribution by Arab scholars)

19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

(Contribution by Arab scholars)


अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

           700 A. D. से 1100 A. D. तक का समय अरबी भूगोलवेत्ताओं का समय माना जाता है। इस समय जबकि यूरोपीय ईसाई राष्ट्र भूगोल को अवनति की ओर धकेल रहे थे, अरबी भूगोलवेत्ता न केवल भूगोल के चिरसम्मत शास्त्रीय कालीन ज्ञान की रक्षा क रहे थे वरन् उसकी उत्तरोत्तर वृद्धि के लिए भी प्रयत्न कर रहे थे।

        पूर्ववर्ती अन्धकार युग में भूगोल के पथ भ्रष्ट हो जाने का सर्वप्रमुख कारण था, भूगोल पर धर्म का आरोपण। अरब भूगोलवेत्ता भी यद्यपि भूगोल को धर्म के पंजे से पूर्णतः मुक्त तो नहीं कर सके तथापि उन्होंने उसके प्रभाव को कम अवश्य किया। उन्होंने तर्क शक्ति के आधार पर धर्म को भूगोल में स्थान दिया। धर्म के प्रभाव के कारण उनके कार्य पूर्णतः तो वैज्ञानिक नहीं थे, परन्तु काफी हद तक वैज्ञानिक थे।

       अरबी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल में यह महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए उनको प्रेरित करने वाले कारकों में अरब साम्राज्य की स्थिति व विस्तार, उसकी यूनानी सभ्यता के देशों पर विजय, यातायात मार्गों का विकास, भारत से सम्पर्क, व्यापार में उन्नति व मरुस्थलीय वातावरण प्रमुख थे। अरब भूगोलवेत्ताओं ने जो योगदान भूगोल के क्षेत्र में किए वे संक्षेप में इस प्रकार हैं :

(1) प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा:-

            अरब भूगोलवेत्ताओं का कार्य अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। परिणामतः इनको अनेक भ्रामक धारणाओं से भूगोल को मुक्ति दिलानी पड़ी। साथ ही इन्होंने प्राचीन शास्त्रीय कालीन ज्ञान को भी जीवित रखा। अरस्तु, टॉलमी, स्ट्रैबो, आदि भूगोलवेत्ताओं का सतत परिश्रम से अध्ययन किया व उनके ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद किया। अन्वेषण कार्य किए तथा मौलिक ग्रन्थों की रचना की। 776 A. D. में अरब में अब्बासी वंश का साम्राज्य था। उस समय खलीफा का प्रशासनिक कार्यालय दमिश्क (सीरिया) में था जिसे बदलकर बगदाद में ले जाया गया। यहां पर यूनानी व अरब सभ्यताओं का मेल हुआ जिससे भौगोलिक ज्ञान के प्रसार में सहायता मिली। 

अरब भूगोलवेत्ताओं का योग

टॉलमी

(2) गणित में विशेष प्रगति:-

        अरब भूगोलवेताओं ने पृथ्वी के आकार को निश्चित करने के अनेक प्रयास किए थे। मानचित्र बनाने के लिए कुछ प्रक्षेपों की गणनाएं की गई थी।

         बगदाद में गणितीय भूगोल का काफी विकास किया गया था। भू-सर्वेक्षण के लिए पृथ्वी की आकृति (Shape) और आकार (Size) निश्चित करने के लिए मानचित्रों के निर्माण और परिवहन आदि के लिए गणितीय भूगोल का प्रयोग किया जाता था। शीराज (ईरान), काहिरा (मिस्र), टॉलेडो (स्पेन) में खगोलिकी तथा गणित के उच्च अध्ययन किए गए थे।

        अल-खालिजामी, अल हबीब, इब्ने यूनुस, अब्दुल रहमान, अल अजीज, आदि भूगोलवेत्ताओं ने गणितीय भूगोल में विशेष योगदान किया। अल इदरीसी ने पृथ्वी की परिधि 22,900 मील मानी थी। उसने पृथ्वी की जलवायु प्रदर्शित करने के लिए 60 मानचित्र बनाए थे।

(3) खगोलिकी में प्रगति:-

           इस काल में खगोलिकी के क्षेत्र में भी विशेष प्रगति हुई । फलक यन्त्र की सहायता से नक्षत्रों की गति, चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण की दशाओं, पृथ्वी की विषुवतरेखीय स्थितियों तथा सूर्य व चन्द्र की राशियों के सन्दर्भ में खोज कार्य किए गए। खगोलिकी में प्रगति के लिए तीन तथ्य विशेष रूप से उत्तरदायी हैं-

(i) अरब का मरुस्थलीय एवं अर्धमरुस्थलीय वातावरण जहां रात्रि में आकाश स्वच्छ रहता है, जिससे खगोलिकीय वेधों (Astronomical observations) में सहायता मिलती है।

(ii) पूर्ववर्ती कालों में खगोलिकीय यन्त्रों का आविष्कार हो चुका था। यूनान व रोम से भी इस सम्बन्ध में काफी ज्ञान प्राप्त हुआ था।

(iii) अरबी भूगोलवेत्ताओं के भारत से अच्छे सम्बन्ध थे, भारत में इस क्षेत्र में पर्याप्त विकास हो चुका था।

        इस क्षेत्र में अल-ममून, अल फर्घानी, अल वतानी व अल खालिजामी आदि भूगोलवेत्ताओं ने विशेष योगदान किया।

(4) अक्षांश व देशान्तर रेखाओं की शुद्ध गणना:-

           टॉलमी के समय की अपेक्षा इस युग में पृथ्वी के अक्षांशों व देशान्तरों की दूरियों को अरब विद्वानों ने अधिक शुद्धता के साथ निश्चित कर दिया था। पूर्ववर्ती अन्धकार युग की प्रवृत्ति के विपरीत मुसलमानों के तीर्थ स्थान मक्का की स्थिति के सन्दर्भ में पृथ्वी के निर्देशकों को शुद्धता के साथ निश्चित करने की प्रेरणा इन विद्वानों को अपने धर्म से मिली, ताकि दूरस्थ क्षेत्रों में निवास करने वाले मुसलमानों की दोपहर की नमाज एक साथ हो सके। मक्के में जब दोपहर के बारह बजते थे तभी सब मुसलमान अपने स्थानीय नमाज पढ़ते थे। इसके अतिरिक्त देश में एक मस्जिद बनाई जाती थी, उनका निर्माण इस प्रकार किया जाता था कि का मूँह मक्का की ओर रहे। इस प्रकार धार्मिक रीति रिवाजों से भी देशान्तरों व दिशाओं का शुद्ध ज्ञान करने में सहायता मिली।

(5) भौगोलिक ग्रन्थों का विकास:-

          मध्य युग में वर्णनात्मक भूगोल का भी प्रचलन हो गया था। भ्रमण कार्य लोगों के लिए रुचिकर हो गया था। यह धार्मिक, व्यापारिक या ज्ञानार्जन के दृष्टिकोण से होता था। यात्रियों ने उस समय पूर्व दिशा में देखे हुए व बिना देखे स्थानों के वर्णन विभिन्न नगरों, मार्गों, बीच की दूरियों, उत्पादन, व्यापार, समाज व्यवस्था आदि के परिप्रेक्ष्य में किए।

          वर्णनात्मक भूगोल पर खलीफाओं के संरक्षण में जो ग्रन्थ लिखे गए उनमें अरब साम्राज्य, भारत, मध्य एशिया व अरब के प्रादेशिक वर्णन बहुत श्रेष्ठ थे। सर्वाधिक संख्या में ग्रन्थ अल इदरीसी ने लिखे, जो वैज्ञानिक ढंग से की गई सविस्तार प्रादेशिक व्याख्या के लिए प्रशंसनीय हैं।

(6) भौगोलिक शिक्षा के केन्द्र:-

       अरब साम्राज्य में भौगोलिक ज्ञान को विकसित करने के लिए सात केन्द्र थे- येरूसलम, काहिरा, टॉलेडो, कुस्तुनतुनिया, दमिश्क, शीराज। हारू-अल रशीद ने बगदाद में एक संस्था की स्थापना की जिसमें भाषा विशेषज्ञों द्वारा यूनानी, रोमन व भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद होते थे।

(7) मानचित्र कला:-

          पूर्ववर्ती अन्धकार युग में ईसाई धर्म के प्रभाव से मानचित्रों का वास्तविक परिचय ही समाप्त हो गया था। अरबी भूगोलवेत्ताओं ने उन्हें पुनर्स्थापित किया। उन्होंने टॉलमी व स्ट्रैबो,आदि भूगोलवेत्ताओं के मानचित्रों को संशोधित रूप में प्रस्तुत किया। ये मानचित्र पूर्ववर्ती मानचित्रों से अधिक शुद्ध, परन्तु वास्तविकता से दूर थे, परन्तु ये सजावटी मानचित्र उच्चकोटि के थे।

          इस काल में विभिन्न मानचित्र प्रक्षेपों का निर्माण किया गया। स्कूलों में भूगोल पढ़ाने के लिए मानचित्रावलियों का निर्माण किया गया। इदरीसी इस काल का प्रमुख मानचित्रकार था। उसने अपने मानचित्रों को सजावट तो उच्चकोटि की प्रदान की थी, परन्तु उसमें तथ्यों का अभाव था।

(8) अनुवाद कार्य:-

         इस विधा पर सर्वप्रथम अरबी भूगोलवेत्ताओं ने ही कार्य किया। इस कार्य से ही उन्होंने प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा की। अनुवाद कार्य का प्रमुख केन्द्र बगदाद था। सर्वप्रथम अल-बातरीक (Al-Batriq) ने ट्रॉलमी के अल्मागेस्ट का अनुवाद अबी भाषा में किया। उसने ही गैलेव हिप्पोक्रेट्स के ग्रन्थों का भी अनुवाद किया। अरस्तु व स्ट्रैबो के ग्रंथों का अनुवाद किया गया।

(9) भौगोलिक शब्द-कोश:-

            भौगोलिक शब्द-कोश का निर्माण करके अरब भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक ज्ञान के समृद्ध होने का परिचय था। महत्वपूर्ण शब्दकोश का निर्माण इब्नयाकूत ने किया। इब्न फिदा ने सामान्य ज्ञान कोश का निर्माण किया। अलबरूनी, इब्ने-सिना, जकाउट (Jakout) व अल-बाकरी ने भी इस क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया।

निष्कर्ष: 

      इस प्रकार स्पष्ट है कि अरब भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यद्यपि उनके कार्य वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक शुद्ध नहीं थे, तथापि उनमें सत्यता का पुट था। उनके कार्य इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनका काल अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। भूगोल पर अन्धका का पर्दा उठाकर उसको सही दिशा प्रदान करना ही इन भूगोलवेत्ताओं का सबसे बड़ा कार्य है।

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास (Development of Geographical ideas in Ancient India)

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास


प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास

             प्राचीन भारत की कई हजार वर्ष ईसा पूर्व की संस्कृति व नगरीय निर्माण कला के अवशेष देखकर आज विकसित पाश्चात्य देशों के महान विद्वान भी असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं। पुरातनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान का विवरण विभिन्न स्थलों की खुदाई से प्राप्त सामग्री तथा तत्कालीन विभिन्न ग्रन्थों से प्राप्त होता है।

         प्राचीनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान को संक्षेप में निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है:-

(1) सौरमण्डलीय ज्ञान:-

          प्राचीन काल में ही ब्रह्माण्ड विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने पर्याप्त उन्नति कर ली थी। सूर्य, चन्द्र व पृथ्वी के सम्बन्धों, ऋतु परिवर्तनों, दिवस-रात्रि, उषः, मध्याह्न अपरान्ह, आदि के प्रसंग ऋग्वेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद में, बहुत से मन्त्रों में आते है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष के वर्णन तथा मृगशिरा, कृत्तिका, चित्रा, रेवती आदि सत्ताईस नक्षत्रों के वेदों व ब्रह्माण्ड ग्रन्थों में पढ़े जा सकते हैं। विषुव दिवस (Equatorial Day) का उल्लेख वेदों में अनेक स्थानों पर है। सौर वर्ष (Solar Year), सौर मास (Solar Month), आदि की गणनाओ, सत्ताइस नक्षत्रों की चालों और सूर्य नक्षत्रों की गणनाओं के आधार पर वैदिक ज्योतिष का प्रतिपादन किया गया।

        ईसा की पांचवीं सदी से सातवीं सदी तक भारतीय विद्वानों ने खगोलीय भूगोल (Astronomical Geography) में बहुत उन्नति की। इसी काल में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, आदि विख्यात गणितज्ञ थे। इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों में ‘सूर्य सिद्धान्त’ प्रमुख है।

प्राचीन भारत में भौगोलिक

आर्यभट्ट

            प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में पृथ्वी की उत्पत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद के मन्त्रों से अनुमान लगाया गया है कि आर्यों ने पृथ्वी के पिघले रूप की कल्पना की थी, जिसे आज सभी स्वीकार करते हैं। रामायण-महाभारत में भूचाल तथा ज्वालामुखी के प्रसंग हैं। “जब शक्तिशाली गज थक कर सिर हिलाता है, तब भूचाल आता है।’ यही कारण बताया गया है भूचाल का। महाभारत में ज्वालामुखी पर्वत के उभार की चर्चा है- “पृथ्वी अपने सातों महाद्वीपों के साथ उठ गई, जिसके साथ पर्वत, नदियां, वन, आदि भी ऊंचे उठ गए।’

        पुराणों में महाद्वीपों व पर्वतों की उत्पत्ति विषयक कल्पनाएं की हैं- ‘पृथ्वी महासागर में एक बृहत् नौका के रूप में तैरती है। ब्रह्मा ने पृथ्वी का समतलन किया व उसे सात द्वीपों में विभक्त किया।’ इससे पृथ्वी के तैरने की वर्तमान संकल्पना (सियाल के बने महाद्वीप सीमा पर तैरते हैं) के समकक्ष विचारधारा का अनुमान होता है। पृथ्वी की आयु की कल्पना भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में की गई है। ‘मनुस्मृति’ उल्लेख है कि पृथ्वी अब तक 1,96,91,03,000 वर्ष पूर्ण कर चुकी है। समकालीन विद्वान भी पृथ्वी की आयु करीब दो अरब मानते हैं। रामायण में सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण की भी चर्चा है। इसके कारण राहु-केतु बताए गए हैं। सौरमण्डल के अन्य ग्रहों- मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, आदि की चर्चा भी कई स्थलों पर है।

(2) वायुमण्डलीय ज्ञान:-

          ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय के आर्यों को वायुमण्डल के सम्बन्ध में अच्छा ज्ञान था। उन्होंने वर्ष को छः ऋतुओं में विभक्त किया था। मन्त्रों में 49 से 63 प्रकार की पवनों की चर्चा है। वाल्मीकि रामायण में बादलों का वर्णन है। इसमें तीन प्रकार के बादल व सात प्रकार की पवन की चर्चा है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में,  विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का वितरण समझाया गया है जो आज के वितरण के अनुकूल है। कृषि तथा वर्षा का सम्बन्ध स्थापित करते हुए कौटिल्य ने लिखा है- कुछ ऐसे बादल होते हैं जो क्रमशः सात दिन तक वर्षा करते हैं, 80 ऐसे हैं जिनमें कम वर्षा होती है, 60 ऐसे होते हैं जो खेतों को जोतने योग्य बनाते हैं। कौटिल्य ने वर्षा मापक यन्त्र भी तैयार किया था।

(3) जलमण्डलीय ज्ञान:-

            वैदिक मन्त्रों में महासागरों का वर्णन है। सामवेद तथा अथर्ववेद में महासागरों की संख्या 4 बताई गई है, परन्तु अन्य वेदों में इनकी संख्या 7 बताई गई है। सामवेद में महासागरों में जल के उठने का वर्णन मिलता है, जिससे ज्वार-भाटा की कल्पना की जा सकती है। रामायण में कई स्थानों पर ज्वार-भाटा का उल्लेख है, इसका कारण चन्द्रमा बताया गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मूंगा, मोती की चर्चा है। महासागरों में किन स्थानों पर ये मिलते हैं, इसका भी विस्तृत वर्णन ग्रन्थ में पढ़ा जा सकता है।

(4) स्थलमण्डलीय ज्ञान (सामान्य भौगोलिक वर्णन):-

       प्राचीन काल के स्थलमण्डलीय ज्ञान को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-

(i) भौतिक भूगोल- भौतिक भूगोल विषयक ज्ञान में पर्वतों, नदियों व वनस्पति का वर्णन मिलता हैं:-

(क) पर्वत- पुराणों के अनुसार संसार की समस्त पर्वत श्रृंखलाएं पामीर (मेरु) के चारों ओर जाती हैं। पर्वतों को पांच प्रकारों में विभक्त किया गया है- मध्य पर्वत (मेरु), विषकम्भ पर्वत (जो मेरु के चतुर्दिक विस्तृत हैं), वर्ष पर्वत (विभिन्न देशों की कुल पर्वत (मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं) तथा मर्यादा पर्वत (सीमा पर स्थित पर्वत)।

         भारत के पर्वतों का पुराणों में विस्तृत वर्णन है। इनमें महेन्द्र (पूर्वी घाट), मलय (पश्चिमी घाट का दक्षिणी भाग), सह्य (पश्चिमी घाट का उत्तरी भाग), रिक्ष (मध्य विंध्य), आदि प्रमुख है।

(ख) नदियां- वेदों में नदियों के विस्तृत वर्णन हैं। वेदों व उपनिषदों में अफगानिस्तान, पंजाब व गंगा-यमुना क्षेत्र की नदियों का वर्णन है। पुराणों के अनुसार मेरु (पामीर) के दिशाओं में नदियां प्रवाहित होती हैं। दक्षिण की ओर गंगा, पश्चिम की ओर चक्षु, पूर्व की और सीता व उत्तर की ओर भद्रसोन नदी बहती है। मार्कण्डेय पुराण में भारतीय नदियों का विस्तृत वर्णन है। गंगा की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन है। अन्य नदियों में यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, कृष्णा व ताम्रपर्णी का विशेष वर्णन है।

(ग) वनस्पति- मार्कण्डेय पुराण में विभिन्न प्रकार की वनस्पति का वर्णन मिलता है। तत्कालीन फसलों का भी वर्णन है। शिव पुराण में दुग्ध वृक्ष (रबर) का प्रसंग है।

(ii) मानव भूगोल विषयक ज्ञान-

          ऋग्वेद में पृथ्वी पर पांच प्रकार के लोगों के निवास का वर्णन है। इनमें असुर तथा दास भी सम्मिलित हैं। वाजसनेयि संहिता में चार वर्णों का उल्लेख है: ब्राह्मण्ड, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। रामायण में अनेक भारतीय आदिम जातियों के वर्णन है। इनमें राक्षस, वानर, निषाद, किन्नर, सावर, गन्धर्व, नाग, असुर, देव, आदि जातियां मुख्य हैं। विदेशी जातियों में शक एवं यवनों को गौर वर्ण की जातियां कहा गया है। राक्षसों का रंग काला व रूप भयानक बताया गया है।

         महाभारत में भी अनेक जातियां, उनके रूप-रंग, विवाह पारिवारिक सम्बन्धों आदि के वर्णन है। मनु के धर्म शास्त्र में आठ प्रकार के विवाह बताए गए हैं: ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गन्दर्व, पैशाच व राक्षस। इनमें से छः को सामाजिक समर्थन प्राप्त था। कौटिल्य ने भी विवाह पद्धति व स्त्री-पुनर्विवाह की चर्चा की है।

(iii) सांस्कृतिक भूगोल विषयक ज्ञान-

          प्राचीन समय से ही कृषि भारतीयों का मुख्य व्यवसाय रहा है। अथर्ववेद में वर्णन है कि कृषि में किन सावधानियों की आवश्यकता होती है। ऋग्वेद में खेत जोतने का आदेश दिया गया है। पातञ्जलि के महाभाष्य में फसलें बोने की विधियों, कृषि क्षेत्रों, बीजों व अनाज भण्डारण का वर्णन है। पाणिनि प्रातञ्जलि व मनु ने भूमि का वर्गीकरण भी किया है। बाढ़ से प्रभावित भूमि द्वारा अनुपयोगी भूमि ऊसर, पशुचारण के लिए प्रयुक्त भूमि गोचर व जोतने योग्य भूमि (शील्य) कही गई। पातञ्जलि ने फसलों के प्रादेशिक वितरण का भी वर्णन किया है। सिंचाई के साधनों पर भी प्रकाश डाला गया है। कुएं व तालाब सिंचाई के प्रमुख साधन थे।

           प्राचीन भारत में विभिन्न उद्योग धन्धे भी पर्याप्त विकसित अवस्था में थे। वर्तन, वस्त्र निर्माण, सिक्के, आभूषण आदि सम्बन्धी उद्योगों का वर्णन वेदों में है। भवन निर्माण, काष्ट शिल्प, मृतिका शिल्प, लौह शिल्प भी इस समय अपनी उन्नति की चरम सीमा पर थे। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप स्थापित जंगरहित लौह स्तम्भ, जो कि गुप्त काल में निर्मित बताया जाता है, भारतीय लौह-शिल्पियों की दक्षता का प्रमाण हैं।

         परिवहन मार्ग भी प्राचीन भारत में अच्छी अवस्था में थे। ब्रह्माण्ड पुराण में दस प्रका की सड़कों का वर्णन है: दिशा मार्ग, ग्राम मार्ग, सीमा मार्ग, राज, पथ, शाखा रथ्या, रथोपरथ्या, उपरथ्या, जंघापथ, गृहान्तपथ तथा धृति मार्ग।

          विदेशी व्यापार भी प्राचीन काल से भारतीय विशेषता है। विष्णु पुराण में कम्बोज के घोड़ों तथा मत्स्य पुराण में नेपाल के कम्बलों का उल्लेख है।

        अधिवास सम्बन्धी ज्ञान भी प्राचीन भारतीय साहित्य से प्राप्त होता है। मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई से प्राचीन भारतीय नगर नियोजन व भवन निर्माण कला का परिचय मिलता है। मानवीय बस्तियों का वर्गीकरण ‘मायामतम’ में किया गया है।

(iv) राजनीतिक व प्रादेशिक भूगोल विषयक ज्ञान-

           वैदिक साहित्य में भारतीय जनपद प्रदेशों के वर्णन हैं। इनमें काशी, कोशल, मगध, पांचाल, विदर्भ, सौराष्ट्र व आन्ध्र प्रमुख थे।

निष्कर्ष:          

         उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारतीय भौगोलिक ज्ञान उच्चकोटि का था परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि भौगोलिक विचारधाराओं के विकास के इतिहास में उसे स्थान नहीं दिया गया है।

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास


19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

           वर्तमान समय में भूगोल का जो वैज्ञानिक स्वरूप उभर कर सामने आया है, वह वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी की ही देन है। यह वह युग था, जिनमें हम्बोल्ट (Humboldt), रिटर (Ritter) व रेटजेल (Ratzel) जैसे महान भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक तथ्यों को भलीभांति संगठित करके प्रस्तुत किया था। उन्होंने भूगोल को परिभाषित किया व उसकी विषय वस्तु को निर्धारित किया। यद्यपि इसके युग से पूर्व के भूगोलवेत्ताओं के अध्ययन में वैज्ञानिक छाप थी, परन्तु उनमें वैज्ञानिकता कम व दार्शनिकता अधिक थी। इसी युग में वस्तुतः वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना हुई। इसका श्रेय जर्मनी के तीन महान भूगोलवेत्ताओं (हम्बोल्ट, रिटर व रेटजेल) को है। इनके द्वारा जो भी ग्रन्थ प्रकाशित किए गए, उनमें अन्वेषण की विधियों, अभिलेखों तथा वर्णनों की सूक्ष्मता देखने को मिलती है। बीसवीं सदी का भूगोल इसी सूक्ष्मता व शुद्धता के आधार पर विकसित हुआ।

         इस युग के भूगोलवेत्ताओं का भूगोल में योगदान संक्षेप में प्रस्तुत है:-

(1) हम्बोल्ट (Alexander Von Humboldt):-

         हम्बोल्ट बहुमुखी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक था। भूगोल में उसके योगदान का मूल्यांकन करना कोई हंसी-खेल नहीं। बनस्पति विज्ञान, भू-विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, शरीर क्रिया विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आदि क्षेत्रों में हम्बोल्ट का योगदान रहा है। बहुत से विज्ञान इस बात के लिए उसके ऋणी हैं कि उसने उनको नए तथ्य व नई सूझें प्रदान की थीं, परन्तु भूगोल का तो वह एक जन्मदाता था।

      हम्बोल्ट की सबसे प्रसिद्ध रचना कॉसमॉस (Cosmos) है। इसमें सम्पूर्ण विश्व का प्रादेशिक वर्णन विस्तार से किया गया है। इसमें पांच खण्ड हैं। यह ग्रन्थ लिखने में हम्बोल्ट को सत्रह वर्ष का समय लगा था। हम्बोल्ट का दूसरा प्रसिद्ध ग्रन्थ मध्य एशिया (Asia Centrale) है। यह जर्मन भाषा में 1843 में दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था।

    हम्बोल्ट ने प्रारम्भ से ही यात्राओं में रुचि प्रदर्शित की थी। उसने प्रथम यात्रा 1799 में प्रारम्भ की थी। वह जहाँ भी जाता था, कुछ यन्त्र प्रेक्षण के लिए अपने साथ-साथ रखता था।

       हम्बोल्ट ने भूगोल मे सात संकल्पनाओं का भी प्रतिपादन किया था। ये संकल्पनाएं थी-

(i) पृथ्वी तल का मानव निवास के रूप में अध्ययन,

(ii) भूगोल संसार में स्थानिक वितरणों का विज्ञान,

(iii) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है,

(iv) भूगोल सम्बन्धों का अध्ययन है,

(v) सांसारिक दृश्य घटनाओं का अध्ययन है,

(vi) प्रकृति की एकता का अध्ययन तथा

(vii) दृश्य घटनाओं की विषमांगता का अध्ययन

        हम्बोल्ट ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियाँ अपनाई जैसे- आनुभविक, तुलनात्मक, कार्टोग्राफिक, क्रमबद्ध, आदि।

(2) रिटर (Carl Ritter):-

         रिटर का जन्म 1779 में हुआ था। भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने वाले आधार स्तम्भों में रिटर भी एक था।

     रिटर का सर्वप्रमुख ग्रन्थ एर्डकुण्डे (Erdkunde) था। इसके अतिरिक्त ‘यूरोप का भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांख्यिकीय चित्रण’ भी रिटर का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। यह रिटर का प्रथम ग्रन्थ था।

       1828 में रिटर ने भौगोलिक ज्ञान के प्रचार व प्रसार के लिए एक भौगोलिक समिति की स्थापना की थी। वह जीवन पर्यन्त, 31 वर्ष तक इसका अध्यक्ष रहा था।

       रिटर की विचारधारा पर हम्बोल्ट का बहुत प्रभाव था, हम्बोल्ट से रिटर की मुलाकात 1827 में हुई। दोनों ने मिलकर भूगोल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया।

          रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का समर्थन करता था। वह पृथ्वी तल के वर्णन मात्र को भूगोल नहीं मानता था। उसका मत था कि इस अध्ययन में मानव की मुख्य भूमिका होनी चाहिए। रिटर प्रकृति की एकता में विश्वास करता था। प्रादेशीकरण की विचारधारा का रिटर ने समर्थन किया था।

          रिटर ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियां अपनाई। इनमें अधिकांश हम्बोल्ट की विधियों के समान थीं-आनुभविक, तुलनात्मक व मानचित्रण इसके अतिरिक्त रिटर ने विश्लेषणात्मक व संश्लेषणात्मक विधि भी अपनाई।

(3) रेटजेल (Friedrich Ratzel 1844-1904):-

     उन्नीसवीं सदी के अन्तिम समय में जर्मनी के भौगोलिक क्षेत्र में रेटजेल ने शासन किया। भूगोल में मानव के स्थान को स्थायी बनाने का कार्य रेटजेल ने किया, अतः उसे मानव भूगोल का जन्मदाता (Father of Human Geography) कहा जाता है।

     एन्थ्रोपोज्योग्राफी (Anthropogeographic) रेटजेल की सबसे महत्वपूर्ण रचना है। यह ग्रन्थ 1882 में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रन्थ से ही वस्तुतः मानव भूगोल का जन्म हुआ।

रेटजेल ने स्वयं यात्राएं करके आनुभविक विधि से भौगोलिक ज्ञान का एकत्रीकरण किया था। रेटजेल ने ही लिखा है:

“I travelled, I sketched, I described. Thus, I was led to the description of nature.”

       रेटजेल का दूसरा प्रमुख ग्रन्थ ‘राजनीतिक भूगोल’ (Politische geographie) था, यह दो खण्डों में क्रमशः 1897 व 1903 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त रेटजेल ने कई अन्य पुस्तकें लिखी। भौमिकी (Geology) मानव जातिशास्त्र (Ethnography), जीव विज्ञान (Biology), भौतिक भूगोल (Physical Geography), आदि पर अनेक लेख लिखे।

         रेटजेल ने मानव व वातावरण के सम्बन्धों का अध्ययन किया था तथा वातावरण निश्चयवाद (Environmental determinism) का प्रतिपादन किया था।

(4) फ्रोबेल (Frobel):-

         फ्रोबेल की विचारधारा हम्बोल्ट व रिटर की विचारधारा से मेल नहीं खाती थी। उसने रिटर की आलोचना की थी तथा उससे ‘तुलनात्मक’ (Comparative) शब्द का स्पष्टीकरण मांगा था, परन्तु रिटर उसे सन्तुष्ट न कर सका था। फ्रोबेल का मत था कि विभिन्न अवयवों की तुलना, जैसे एक पर्वत की दूसरे पर्वत से, एक नदी की दूसरी नदी से की जा सकती है, परन्तु किसी सम्पूर्ण प्रदेश की तुलना दूसरे सम्पूर्ण प्रदेश से करना उचित नहीं है। फ्रोबेल ने भूगोल को परिभाषित किया था :

          “Geography” he claimed, “was a natural science, concerned with the earth’s surface, studied in a systematic way, i. e. taking in form, relief, climate, vegetation, animal and man; attempting throughout to make clear the interrelation of the various factors.”

          इस प्रकार फ्रोबेल ने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को सीमित करके मात्र भौतिक भूगोल बताया।

(5) पेशेल (Oscar Peshcel):-

           पेशेल जर्मनी में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। वह भौगोलिक पत्र (Das Ausland) का सम्पादक भी था। इसमें विदेशी भूगोलवेत्ताओं के लेख प्रकाशित होते थे। पेशेल ने विभिन्न क्षेत्रों की तुलना की तथा तुलनात्मक भूगोल का विकास किया। पेशेल ने, जिसने भौतिक भूगोल का आधार तैयार किया था, भूगोल में मानव को अधिक महत्व नहीं दिया था।

(6) रिचथोफेन (Ferdinand von Richthofen) (1833-1905):-

         रिचथोफेन मूलतः भौमिकीविद (Geologist) था। वह बोन, बर्लिन व लीपजिंग विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक रहा था। बाद में इन्हीं विश्वविद्यालयों में भूगोल का प्रोफेसर रहा। ‘बर्लिन ज्योग्राफीकल सोसाइटी’ का कई वर्षों तक वह अध्यक्ष रहा था।

19वीं शताब्दी के दौरान भूगो

रिचथोफेन

          रिचथोफेन ने चीन में प्रेक्षण किए थे। चीन पर उसकी ग्रन्थमाला पांच खण्डो में प्रकाशित हुई थी। इसमें प्रथम खण्ड पर ही उसे ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी’ का पदक मिला था। उसने चीन की एक एटलस भी प्रकाशित की थी।

          रिचथोफेन की मुख्य देन भौतिक भूगोल के क्षेत्र (भू-आकृति विज्ञान) में है। उसने तुलनात्मक भूगोल की स्थापना की थी।

         भूगोल को रिचथोफेन ने क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Chorological Science) बताया था। इसमें पृथ्वी तल पर पाए जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन होता है।

        रिचथोफेन ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) और सामान्य भूगोल (General Geography) में अन्तर स्पष्ट किया था। उसने बताया था कि प्रादेशिक भूगोल में किसी तथ्य विशेष के पृथ्वी पर वितण का अध्ययन करते हैं।

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत



पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

         बाल्टर पेंक प्रमुख भू-आकृतिक जर्मन वैज्ञानिक थे। उन्होंने डेविस के अपरदन चक्र सिद्धांत के आलोचना के क्रम में अपरदन चक्र का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किया जो पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। यह डेविस के सिद्धांत की तुलना में अधिक वैज्ञानिकता पर आधारित है। इसमें भू-आकृतिक प्रक्रम की वैज्ञानिक संकल्पना का उपयोग किया गया है।

      पेंक ने डेविस की तरह ही आर्द्र प्रदेशो में प्रवाहित जल या नदियों को अपरदन का प्रमुख कारक मानते हुए अपरदन चक्र का सिद्धांत दिया। इसके अनुसार किसी भी प्रदेश में उत्थान की प्रकिया प्रारम्भ होने के साथ ही अपरदन के कारक सक्रिय हो जाते है। अपरदन का कार्य तब तक घटित होता रहता है, जब तक आधार तल की प्राप्ति न हो जाए।

     आर्द्र प्रदेशो में मुख्य नदी के साथ ही जब सहायक नदियाँ भी आधार तल को प्राप्त कर लेती है तब एक अपरदन चक्र पूर्ण होता है और अंतिम रूप से लगभग समतलप्राय मैदान (इनड्रम्प) का विकास होता है। यहाँ जल विभाजक के अवशेष इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

       पेंक ने उत्थान व अपरदन की सम्मिलित अवधि को अपेक्षाकृत अधिक लम्बे समय तक घटित होने वाली क्रिया माना जबकि केवल अपरदन के समय को अपेक्षाकृत छोटा माना। पेंक ने निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया-

स्थलरुप- उत्थान की प्रावस्था, दर और निम्नीकरण का प्रतिफल होता है।

      इस सूत्र के अनुसार अपरदन की प्रक्रिया विभिन्न प्रावस्था में घटित होती है और प्रत्येक प्रावस्था में उत्थान और अपरदन का विशिष्ट दर होता है। इसी अनुरूप ऊंचाई एवं उच्चावच विषमता में कमी आती है अर्थात निम्नीकरण होता है।

      पेंक ने अपरदन चक्र की पाँच प्रावस्था को बताया। प्रथम तीन प्रावस्था में उत्थान एवं अपरदन दोनों साथ-साथ घटित होते है। अंतिम दो प्रावस्था में केवल अपरदन की क्रिया घटित होती है।

(i) प्रथम प्रावस्था में प्रदेश की ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में वृद्धि हुई है। उंचाई में वृद्धि का कारण उत्थान की दर का अपरदन के दर की तुलना में अधिक होना है, जबकि उच्चावच में वृद्धि का कारण नदियों द्वारा तलीय कटाव की अधिकता है।

(ii) दूसरी प्रावस्था में भी अपरदन की तुलना में उत्थान की दर अधिक होने के कारण ऊंचाई में वृद्धि होती है, लेकिन उच्चावच स्थिर रहता है।

(iii) तीसरी प्रावस्था में उत्थान और अपरदन दोनों के दर समान होते है, अतः ऊंचाई में वृद्धि रुक जाती है जबकि घाटी की उपरी एवं निचले भाग में अपरदन की दर सामान्य होने के कारण उच्चावच स्थिर रहता है।

(iv) चौथी प्रावस्था में उत्थान का प्रभाव समाप्त हो जाने और नदियों द्वारा तलीय कटान के साथ क्षैतिज कटान के प्रभाव से ऊंचाई में कमी आने लगती है, लेकिन घाटी के उपरी और निचले भाग में अपरदन की दर समाप्त होने के कारण उच्चावच स्थिर बना रहता है।

(v) पांचवी अवस्था में क्षैतिज अपरदन की अधिकता, निक्षेपण का प्रभाव तथा तलीय कटान भी लगभग समाप्त हो जाने के कारण ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में कमी आने लगती है। अंततः इन्ड्रम्प जैसी समप्राय मैदान का निर्माण होता है। इसके साथ ही अपरदन का एक चक्र पूर्ण हो जाता है।

पेंक का अपरदन चक्र

           पेंक ने अपरदन चक्र की संकल्पना में ढालों के विकास को पर्याप्त महत्व दिया और ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

पेंक का ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत-

       इसके अनुसार अपरदन चक्र की प्रक्रिया में एक ढाल का दूसरे ढाल में प्रतिस्थापन होता रहता है। सर्वप्रथम उत्तल ढाल का निर्माण होता है जिसका प्रतिस्थापन समढाल में और पुनः समढाल का प्रतिस्थापन अवतल ढाल में हो जाता है।
      जब कई अवतल ढाल परस्पर मिलते है तब इंड्रम्प का विकास होता है। इन ढालो के मध्य में भी जल विभाजक इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार स्पष्ट है की पेंक का अपरदन चक्र मॉडल डेविस के अपरदन चक्र मॉडल की तुलना में अधिक वैज्ञानिक अवधारणा पर आधारित है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने भी पेंक के मॉडल को ही वैज्ञानिक माना। इसी कारण पेंक के मॉडल को अधिक मान्यता प्राप्त है।

नोट:

वाल्टर पेंक  के अनुसार:

        अपरदन चक्र में पाँच चरण होते हैं-

1. प्राइमारम्प (Primarampf)

2. आफस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग  (Aufteingende entwickelung)

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग (Gleichforminge entwickelung )

4. आबस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग (Absteigende entwickelung)

5. इंड्रम्प (Endrufmpf)

1. प्राइमारम्प:-

पेंक के अनुसार प्रारंभ में एक विशेषताहीन सतह होती है जिसे पेंक ने “प्राइमारम्प” या “प्राथमिक पेडप्लेन” कहा।

यह भू-आकृति विकास का एक पूर्व चरण है।

इस चरण में भू-आकृतियों के विकास के बिना एक परिदृश्य मौजूद होता है।

इस अवस्था में कोई पहाड़ नहीं।

भू-आकृतियों का ऊपरी वक्र और निचला वक्र समान होता है।

2. आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

भू-आकृतियाँ विकसित होने लगती हैं।

पहाड़ अचानक उठने लगते  हैं।

घाटियाँ गहरी होने लगती है और संकरी घाटियाँ का निर्माण करती हैं।

उच्चावच बढ़ने लगती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल का विकास होता हैं।

ऊपरी वक्र और निचले वक्र के बीच की ढाल बढ़ती जाती है।

इस चरण में अंतर्जात बल से कम बहिर्जात बल लगते है।

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग :-

        इस चरण में तीन भाग होते हैं।

पहले चरण में उत्थान अपरदन से ज्यादा होता है।

सबसे ऊंची चोटी ऊपरी वक्र में बनती हैं।

दूसरा चरण  में उत्थान और अपरदन लगभग बराबर होते है।

अंतिम चरण में उत्थान की प्रक्रिया कम हो जाती है। धीरे-धीरे घाटी चौड़ा होने लगता है और पर्वत की ऊँचाई भी कम होने लगते हैं।

4. आबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

शिखर या ऊपरी वक्र तेजी से मिटता है।

नदी श्रेणीबद्ध (ग्रेडेड) हो जाती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल रेक्टिलिनियर ढलानों में परिवर्तित हो जाते है।

इस चरण में शंक्वाकार आकार का इंसेलबर्ग बनता है।

5. इंड्रम्प:-

भू-आकृति का विकास रुक जाता है।

पेडिप्लेन अंत में बनता है।

भू-आकृतियों के ऊपरी भागों में कुछ अपरदन होता है और अपरदित पदार्थ भू-आकृतियों के निचले भाग में जमा हो जाता है।

नोट: 

आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।


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23. डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन करें।

23. डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन करें।


डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन

    अमेरिकी भूगोलवेता डेविस की और जर्मन भूगोलवेता बाल्टर पेंक को “आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान” का जन्मदाता माना जाता है। 1889 ई० में डेविस ने ‘ज्योग्राफिकल एसेज’ नामक पुस्तक में जबकि बाल्टर पेंक ने 1924 ई० में अनुसंधान प्रपत्र में “मॉरफोलोजिकल एनालिसिस ऑफ लैण्डफॉर्म” नामक शीर्षक से अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इन दोनों के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर करते हैं। जैसे- समानता और असमानता।

समानताएँ

(i) दोनों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया।

(2) दोनों के अनुसार अपरदन चक्र के प्रारंभ में अपरदन का कार्य तेजी से और बाद में निक्षेपण का कार्य तेजी से होता है।

(3) दोनों ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया। जैसे- जिस प्रकार से मानव जीवनचक्र का पाँच अवस्था होता है और पुनर्जन्म के बाद नयी जीवन चक्र प्रारंभ होता है। ठीक उसी तरह एक अपरदन चक्र समाप्त होता है और पुनरुत्थान के बाद दूसरा अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

(4) दोनों विद्वानों ने बताया कि अपरदन चक्र प्रारंभ होने के लिए उत्थान अति आवश्यक है।

(5) दोनों ने बताया कि बहते हुए जल के द्वारा अपरदन का कार्य आधारतल (S.L.) तक होता है।

(6) दोनों वैज्ञानिकों ने यह प्रकट किया कि अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है।

असमानताएँ:-

         वास्तव में डेविस एवं पेंक का विचार समानता के लिए नहीं बल्कि असमानता के लिए जानी जाती है। दोनों के विचारों को चार आधार पर अन्तर स्थापित किया जा सकता है-

(1) उत्थान के संदर्भ में

(2) समय के संदर्भ में

(3) ढाल विकास के संदर्भ में

(क) समप्राय मैदान के संदर्भ में

(1) उत्थान के संदर्भ में

          दोनों विद्वानों ने अपरदन चक्र की शुरूआत के लिए उत्थान को अनिवार्य माना है। लेकिन उत्थान की प्रक्रिया और स्थलाकृति पर उसके प्रभाव के संदर्भ में अलग-2 विचार है। जैसे- डेविस ने कहा कि उत्थान के बाद अपरदन होती है, जबकि पेंक के अनुसार उत्थान के साथ-2 अपरदन का कार्य चलता है। डेविस के अनुसार उत्थान में समय बहुत कम लगता है, इसलिए यह कार्य तीव्र गति से सम्पन्न होती है जबकि पेंक के अनुसार उत्थान में समय बहुत अधिक लगता है, इसलिए उत्थान का कार्य मंद गति से होती है। डेविस के अनुसार उत्थान का कार्य एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है जबकि पेंक के अनुसार यह एक अनियमित प्रक्रिया है।

परीक्षण

       डेविस और पेंक के उत्थान के संबंध में व्यक्त किये गए विचारों का अगर परीक्षण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि पेंक का विचार अधिक वैज्ञानिक है। होम्स के द्वारा प्रस्तुत संवहन तरंग सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पेंक के विचारों को समर्थन करते हैं।

      डेविस और पेंक ने उत्थान और अपरदन के संदर्भ में जो मॉडल प्रस्तुत किया है उसमें भी स्पष्ट रूप से अन्तर दिखाई देता है।

डेविस और पेंक

नोट:

⇒ युवावस्था- केवल अपरदन का कार्य होता है।

⇒ प्रौढावस्था- अपरदन + निक्षेपण दोनों का कार्य होता है।

⇒ वृद्धावस्था- केवल निक्षेपण का कार्य होता है।

(2) समय के संदर्भ में:-

       दोनों विद्वानों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत समय के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। लेकिन डेविस ने अपरदन चक्र तीन अवस्थाओं में और पेंक पाँच दशाओं (Phases) में वर्गीकृत किया है।

       डेविस ने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों के निर्माण में 5 अपरदन दूत (नदी, शुष्क पवन, हिमानी, समुद्री तरंग, भूमिगत जल) का प्रभाव पड़ता है। जबकि पेंक के अनुसार अपरदन चक्र बाह्य अपरदन दूत के अतिरिक्त आन्तरिक कारक के सहभागिता से संचालित होती है।

          डेविस के अनुसार युवास्था में तलीय अपरदन अधिक होती है, जिसके कारण उच्चावच में तेजी से वृद्धि होती है। जलविभाजक रेखा चौड़ा होता है। प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन अधिक होती है। जिससे V-आकार की घाटी विकसित होती है। जलविभाजक की चौड़ाई कम होने लगती है। फलतः उच्चावच में भी कमी आने लगती है। वृद्धावस्था में अपरदन का कार्य समाप्त हो जाता है जिसके कारण इस अवस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। उच्चावच और जल-विभाजक अति न्यून रह जाती है। पेंक के अनुसार स्थलाकृतियों का विकास 5 दशाओं में सम्पन्न होता है। प्रत्येक दशा के विशेषताओं का उल्लेख नीचे के तालिका में किया गया है-

दशा/अवस्था उत्थान सापेक्षिक ऊँचाई उच्चावच
प्रथम सक्रिय वृद्धि वृद्धि
द्वितीय सक्रिय ह्रास स्थिर
तृतीय सक्रिय स्थिर स्थिर
चतुर्थ स्थिर या समाप्त स्थिर स्थिर
पंचम निष्क्रिय तीव्र ह्रास  ह्रास

        उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समय के संदर्भ में दोनों के विचार में कई मौलिक अन्तर हैं।

(3) ढाल के संदर्भ में:-

         डेविस का सिद्धांत ढाल ह्रास का सिद्धांत कहलाता है जबकि पेंक का सिद्धांत ढाल प्रतिस्थापना का सिद्धांत कहलाता है। डेविस ने बताया कि उत्थान के बाद ढाल अति तीव्र होती है जिसके कारण I-आकार की घाटी विकसित होती है। उसके बाद नदी घाटी के दीवारों का क्रमिक ह्रास होता है।

        प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन के कारण नदी घाटी के दीवारों का तेजी से कटाव होता है जिसके कारण ढाल में पुनः कमी आती है और V- आकार की घाटी विकसित होती है। वृद्धावस्था में क्षैतिज अपरदन और अधिक हो जाने पर  खुली V- आकार की घाटी विकसित होती है जिसके कारण जल-विभाजक रेखा उत्तल ढाल के समान और नदी घाटी अवतल ढाल के समान दिखाई पड़ती है।

       पेंक के अनुसार ढाल प्रतिस्थापन होता है न कि क्रमिक ह्रास होता है। उन्होंने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान तीन प्रकार के ढाल विकसित होते हैं-

(i) उत्तल ढाल- इसे उन्होंने आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग से संबोधित किया।

(ii) समढाल- इसे उन्होंने ग्लीचफोर्मिंग इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

(iii) अवतल ढाल- इसे उन्होंने अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ढाल के संदर्भ में व्यक्त किये गये विचार में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक पेंक का विचार है।

नोट :

आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इन्टवकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।

(4) समप्राय मैदान के संदर्भ में:-

           दोनों ने अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान विकसित होने की संकल्पना प्रस्तुत की है। इसे डेविस ने समप्राय मैदान से सम्बोधित किया है। जबकि पेंक ने लगभग समतल मैदान को Endrumpf (इन्ड्रम्प) और Primarumpf (प्राइमारम्प) से सम्बोधित किया है। पेंक ने बताया कि एक अपरदन चक्र के अन्त में विकसित होने वाला लगभग समतल मैदान (Endrumpf) कहलाता है। लेकिन जब दूसरा अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है तो अपरदन चक्र के पूर्व विकसित समतल मैदान को Primarumpf (प्राइमारम्प) कहते हैं। 

          डेविस ने बताया कि समप्राय मैदान में कहीं-कहीं कठोर चट्टानें दिखाई देती हैं, उसे मोनाडनॉक कहा जाना चाहिए। जबकि पेंक ऐसे कठोर चट्टानों को इन्सेलवर्ग से सम्बोधित किया है।

निष्कर्ष:

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ समानताओं के बावजूद उनके चिन्तन में कई मौलिक विषमताएँ है। ये विषम‌ताएँ ही आधुनिक भू-आकृतिक विज्ञान के आधार का कार्य किया है।


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22. भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है। का व्याख्या करें।

“भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है।” का व्याख्या करें।


“भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है।”

           अमेरिकी भूगोलवेता डेविस ने 1889 ई० में “अपरदन चक्र का सिद्धांत” प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने भूदृश्य को संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन या परिणाम बताया।

        उपरोक्त कथन में प्रयुक्त भूदृश्य का तात्पर्य ऐसे भौगोलिक प्रदेश से है जिसमें विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों का समूह पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों की समूह आपस में मिलकर विशिष्ट भूदृश्य का निर्माण करते हैं। जैसे- गंगा का मैदान एक विशिष्ट भूदृश्य है। जिसमें गोखुर झील, प्राकृतिक बाँध, नदी विसर्प, बाढ़ का मैदान, टाल, चौर, जल्ला जैसे स्थलाकृति मिलते है।

        इस कथन में उन्होंने बताया है कि भूदृश्य पर संरचना, प्रक्रम और अवस्था का प्रभाव पड़ता है। इन प्रभावों को नीचे के शीर्षकों में देखा जा सकता है:-

(1) भूदृश्य के विकास में संरचना का प्रभाव:-

           डेविस ने बताया कि संरचना का तात्पर्य किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के भूगर्भिक काल, भूगर्भिक विकास, भूगर्भिक ढाल, चट्टानों की व्यवस्था और चट्टानों की कठोरता से है।

         डेविस ने यह भी बताया कि कहीं भी अपरदन चक्र की शुरुआत भूगर्भिक उत्थान के बाद ही होता है। इससे अपने-आप स्पष्ट होता है कि भूदृश्य के विकास के लिए भूगर्भिक विकास आवश्यक है। पेंक महोदय ने बताया था कि उत्थान के साथ-2 अपरदन की क्रिया चलती है जिसके कारण अनेक स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

        भूदृश्य के विकास पर भूगर्भिक आयु या चट्टानों की आयु का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- अधिक आयु के कारण चट्टानें मृत हो जाती हैं जिनका अपरदन आसानी से संभव है। दूसरी ओर कम उम्र की चट्टानें, सुदृढ़ और संगठित रहती है। फलत: उनका अपरदन तेजी से संभव नहीं हो पाता है। जैसे- भारत का अरावली पर्वत धारवाड़ युग का बना हुआ है। जबकि दक्कन का पठार क्रिटेशियस युग का बना हुआ है। अधिक समय बीत जाने के कारण अरावली अवशिष्ट पर्वत में बदल चुका है। जबकि दक्कन के पठार पर अभी भी कठोर चट्टानें भूगर्भ में पाये जाते हैं।

       भूदृश्य के विकास पर भूगर्भिक ढाल का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों के नदियों में I-आकार की घाटी, गॉर्ज, दर्रा, उच्छलिका (क्षिप्रिका), जलप्रपात इत्यादि का निर्माण होता है। जबकि मंद ढाल वाले क्षेत्रों में नदी दोआब, बाढ़ का मैदान, प्राकृतिक बाँध, विसर्प, डेल्टा इत्यादि का निर्माण होता है।

         भूदृश्य के विकास पर चट्टानों की व्यवस्था का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे-मरुस्थलीय क्षेत्रों में अगर कठोर एवं मुलायम चट्टानें वैकल्पिक एवं लम्बवत रूप से अवस्थित हो तो यारदांग और क्षैतिज स्थित हो तो ज्यूगेन नामक स्थलाकृति का निर्माण करते हैं।

       भूदृश्य के व्यवस्था पर चट्टानों की कठोरता का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- चुना प्रधान वाले क्षेत्रों में चट्टानें जल में घुलनशील होती है। जिसके कारण घोल रन्ध्र, विलयन रन्ध्र, युवाला, पोल्जे, पोनोर स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। इसी तरह जिन क्षेत्रों में बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट, बैसाल्ट जैसे कठोर चट्टानें मिलती है, वहाँ पर अपरदन का कार्य नगण्य होता है। फलत: सपाट या उबड़-खाबड़ भूदृश्य का विकास होता है।

          इस तरह स्पष्ट है कि भूदृश्य के निर्माण पर संरचना का जबड़दस्त प्रभाव पड़ता है।

(2) भूदृश्य पर प्रक्रम का प्रभाव:-

        डेविस महोदय ने बताया कि प्रक्रम का तात्पर्य स्थलाकृति निर्माण करने वाले कारकों से है। डेविस ने कहा कि स्थलाकृतिक के निर्माण में अपरदन के पाँचों दूत जैसे बहता हुआ जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग और भूमिगत जल का प्रमुख योगदान है। लेकिन पेंक के अनुसार स्थलाकृति निर्माण में बाह्य कारकों के साथ-2 आन्तरिक कारकों का योगदान होता है। जैसे- आन्तरिक भूसंचलन के कारण धरातल में विषमताएँ उत्पन्न होती हैं। जैसे- उत्थान की क्रिया से विषम ढाल का निर्माण होता है। और बाह्य क्रिया (पाँचों अपरदन के दूत) सक्रिय होकर नई-2 स्थलाकृतियों का निर्माण करते हैं। स्पष्ट है कि प्रक्रम के तहत आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के क्रियाओं को शामिल करते हैं। बाह्य कारक के द्वारा अपरदन एवं निक्षेपण दोनों कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। किसी भी अपरदन दूत की अपरदनात्मक क्षमता मौजूद धूणकण, जल की मात्रा, गति, ढाल की तीव्रता इत्यादि पर निर्भर करती है।

           डेविस ने बताया कि आन्तरिक भूसंचलन के कारण पहले उत्थान होता है उसके बाद अपरदन की क्रिया आरंभ होती है। जबकि पेंक ने कहा कि उत्थान एवं अपरदन की क्रिया साथ-साथ चलती है। अपरदन के पाँचों दूत निम्नलिखित स्थलाकृतियों को जन्म देते हैं-

अपरदन के दूत प्रभावित क्षेत्र अपरदनात्मक स्थलाकृति  निक्षेपात्मक स्थलाकृति 
(i) बहता हुआ जल  आर्द्र प्रदेश I एवं V आकार की घाटी, जलप्रपात, गॉर्ज, कैनिय, क्षिप्रिका, मोनाडनॉक, समप्राय मैदान डेल्टा, प्राकृतिक बांध, बाढ़ का मैदान
(ii) शुष्क जलवायु मरुस्थलीय प्रदेश  गारा, यारदांग, ज्यूगेन लोएस, बालुका स्तूप 
(iii) हिमानी पर्वतीय चोटी  एवं ढाल, ध्रुवीय प्रदेश  U-आकार की घाटी, लटकती घाटी, सर्क, रॉक बेसिन ड्रमलिन, एस्कर, टील मैदान
(iv) समुद्री तरंग तटीय प्रदेश  समुद्री क्लिफ, समुद्री मेहराव स्पीट, टोम्बोलो
(v) भूमिगत जल कार्स्ट प्रदेश घोलरंध्र, युवाला, पोल्जे, डोलाइन स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, कन्दरा स्तम्भ

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूदृश्य के निर्माण में प्रक्रम का भी प्रभाव पड़ता है।

प्रक्रम

गॉर्ज या कैनियन

भूदृश्य संरचना

V-आकार की घाटी

(3) भूदृश्य के निर्माण में अवस्था का प्रभाव:-

          यहाँ पर अवस्था का तात्पर्य समय से है। डेविस के अनुसार अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों का विकास तीन अवस्था में होता है- (i) युवावस्था, (ii) प्रौढ़ावस्या और (iii) वृद्धावस्था।

        सामान्य रूप से युवावस्था में अपरदन, प्रौढ़ावस्था में अपरदन एवं विक्षेपण और वृद्धावस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। डेविस के अनुसार इन अवस्थाओं की सीमा निर्धारित नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह चट्टानों की आयु, धरातल के ढाल एवं ऊँचाई, अपरदन के दूतों की क्षमता इत्यादि पर निर्भर करती है। अतः अवस्था की पहचान समय के आधार पर नहीं बल्कि स्थलाकृति के आधार पर किया जाता है। जैसे-

अवस्था विशेषता एवं स्थलाकृति
(i) युवावस्था

I-आकार की घाटी, बंद V-आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, क्षिप्रिका, जलप्रपात, सरिता अपहरण, बेमेल विसर्प (Misfit or Unfit Meander), जल विभाजक चौड़ा, तलीय अपरदन अधिक, उच्चावच अधिकतम।

(ii) प्रौढ़ावस्था

गोखुर झील, विसर्प, क्षैतिज अपरदन, अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य साथ-2।

(iii) वृद्धावस्था मोनाडनॉक, समप्राय मैदान, खुली V-आकार की घाटी, उच्चावच न्यूनतम, जलविभाजक सबसे कम, केवल निक्षेपण का कार्य।

निष्कर्ष

        उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूदृश्य के विकास पर अवस्था का भी प्रभाव पड़ता है। डेविस महोदय ने उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ठीक ही कहा था कि “भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और अवस्था का फलन होता है।”

नोट: 

चौर- नदी का पुराना मार्ग,

जल्ला- जहाँ सालोभर पानी रहता है


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21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

(Poly or Multi Cycle Topography)



बहुचक्रीय स्थलाकृति

     बहुचक्रीय स्थलाकृति को पुनर्युवनित भूआकृति या नवोन्मेष के नाम से जानते हैं। इस शब्द का प्रथम प्रयोग डेविस महोदय ने किया था। प्रारंभ में उन्होंने एक चक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। लेकिन जब इनकी आलोचना होने लगी तो बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। डेविस ने बताया कि एक चक्रीय अपरदन चक्र वहीं पर चल सकता है। जहाँ पर:-

(i) समुद्र तल या आधारतल में लम्बी समय तक परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

(ii) भूसंचलन की क्रिया नहीं हो रहा हो।

(iii) जलवायु के दशाओं में परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

        तीनों ही कारकों का लम्बे समय तक स्थिर रहना असंभव है। वस्तुतः भूसंचलन या जलवायु परिवर्तन आने से आधारतल में परिवर्तन होने से पूर्व से चले आ रहे अपरदन चक्र की क्रिया बाधित होती है और नवीन अपरदन चक्र की क्रिया प्रारंभ होती है। नवीन अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है। इसलिए इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते हैं। छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में बहुचक्रीय स्थलाकृति का प्रमाण मिलता है।

         आधारतल में परिवर्तन लाने वाले कारकों को नवोन्मेष कहते हैं। नवोन्मेष के कारण कोई भी भूखण्ड का पुनरुत्थान होता है जिसे पुनर्युवनित कहते हैं। नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते हैं।

       किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन संभावना है-

(i) आन्तरिक क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) बाह्य क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) स्थैतिक नवोन्मेष

        आन्तरिक क्रिया के अन्तर्गत भूसंचलन को शामिल करते हैं। भूसंचलन के कारण भूखण्डों का पुनरुत्थान हो सकता है। जिससे नवीन अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

आतंरिक बल के कारण नवोन्मेष या गतिक नवोन्मेष

        बाह्य नवोन्मेष में जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों को शामिल करते हैं।

बाह्य क्रिया द्वारा नवोन्मेष या सुस्थैतिक नवोन्मेष

       कभी-2 बिना आधारतल में परिवर्तन के भी अपरदन की गति में परिवर्तन होता है। जैसे- अगर किसी कारणवश बहता हुआ जल में कंकड़-पत्थर, बालू, जैसे जलोढ़ पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है तो तलीय अपरदन एवं क्षैतिज अपरदन में वृद्धि हो जाती है जिसे स्थैतिक नवोन्मेष कहते हैं।

स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण:-

           किसी भौगोलिक प्रदेश में बहुचक्रीय स्लाथाकृतियों की पहचान 5 प्रकार के स्थलाकृतियों से करते हैं।

(1) निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिकाएं (River Terraces)

(3) अध: कर्ति विसर्प (INCISED OR ENTRENCHED MEANDERS)

(4) संगत शिखर

(5) अपरदन सतह

(1) निक प्वाइन्ट

         जब किसी नदी मार्ग का ऊपरी भाग उठ जाय या निचली भाग धँस जाय तो धँसान या उत्थान रेखा के सहारे तीव्र ढाल का विकास होता है। ऐसे तीव्र ढाल वाले रेखा को निक प्वाइन्ट कहते हैं। ऐसे ढाल पर नदी का पानी तेजी से नीचे गिरने लगता है जिससे जलप्रपात का निर्माण होता है।

उत्थान से निर्मित निक प्वाइंट

धंसान से निर्मित निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिका

         अगर नदी का अनुप्रस्थ काट लेते हैं तो नदी का किनारा सीढ़ी के समान दिखाई देता है।

जैसे:-

बहुचक्रीय स्थलाकृति

           जब नदी वृद्धावस्था के दौर से गुजरती है तो V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। लेकिन जब वृद्धावस्था के दौरान ही पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो तलीय अपरदन में वृद्धि से कम खुली हुई V-आकार की घाटी का निर्माण होता है। जिसके कारण घाटी के अन्दर घाटी का निर्माण होता है जिसे नदी वेदिका कहते हैं। जैसे- वोल्गा नदी और दामोदर नदी घाटी में।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प

        अन्तिम प्रौढ़ावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है जिसे विसर्प कहते है। जब पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो नदी के मोड़ पर तलीय अपरदन की वृद्धि से मोड़ पर घाटी के अन्दर मोड़ लेती हुई घाटी विकसित होती है। जिसे अध: कर्तिक विसर्प कहते हैं। जैसे- हजारीबाग के पठार पर दामोदर नदी कई अध: कर्तिक विसर्प का निर्माण की है।

(4) संगत शिखर

          अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे संगत शिखर कहते हैं। संगत शिखर का निर्माण अलग-2 काल में भूपटल के उत्थान एवं धँसान से होता है। दो संगत शिखर वाले पर्वतों के बीच में बहने वाली नदी घाटी संकरी होती है। इसका प्रमाण स्कॉटलैण्ड के स्कैन्डिनेवियन पर्वतीय क्षेत्र में देखा जा सकता है।

(5) अपरदन सतह

        डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अंतिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते हैं। जैसे-छोटानागपुर का पठार एक उत्थित समप्राय मैदान का उदाहरण है। इस पठार पर तीन बार हुए उत्थान का प्रमाण मिलता है। जिसके कारण पात का पठार, राँची का पठार, कोडरमा या हजारीबाग का पठार नामक अपरदन सतह का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष: पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है। 

नोट: 

नवोन्मेष / पुनर्युवन:- एक सक्रिय चक्र में बाधा उत्पन्न होने पर स्थलखण्ड पर नये चक्र का प्रारंभ होना नवोन्मेष पुनर्युवन कहलाता है।

बहुचक्रीय स्थलाकृति:- एक से अधिक अपरदन चक्रों द्वारा निर्मित स्थलाकृति को बहुचक्रीय स्थलाकृति कहा जाता है।

    नवोन्मेष तीन प्रकार के होते है:-

(i) गत्यात्मक नवोन्मेष, जैसे- स्थलखण्ड का उत्थान

(ii) सुस्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- साग तल का नीचा होना

(iii) स्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- नदी के बोझ में कमी, नदी अपहरण, अधिक वर्षा से नदी जल में वृद्धि होना।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




बहुचक्रीय स्थलाकृति

          जब नवीन अपरदन चक्र और पूर्व  के अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है तो उसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते है। इसका प्रमाण छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में मिलता है। बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत सर्वप्रथम डेविस महोदय ने दिया था।

           नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते है। इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति के नाम से भी जानते है।

नवोन्मेष के प्रकार 

             किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन प्रकार की संभावनाएँ होती है जिसे चित्रों द्वारा समझा जा सकता है-

(1) गतिक नवोन्मेष

(2) सुस्थैतिक नवोन्मेष

(3) स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण

(1) निक प्वाइंट-

            जिस तीव्र ढाल के सहारे नदी मार्ग का उत्थान या धंसान होता है, उसे निक प्वाइंट कहते है।

(2) नदी वेदिका-

            जब नदी के वृद्धा अवस्था में पुनरुत्थान होता है और इसके बाद घाटी के अन्दर घाटी घाटी का निर्माण होता है, जिसे नदी वेदिका कहते है।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प-

           अंतिम प्रौढावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है इस अवस्था में जब पुनरुत्थान होता है तो नदी विसर्प के अन्दर विसर्प का निर्माण करती है तो उसे अद्य: कर्तिक विसर्प कहते है।

(4) संगत शिखर-

            अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे सांगत शिखर कहते है।

(5) अपरदन सतह/ उत्थित समप्राय मैदान- 

              डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते है।

निष्कर्ष:

          उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष या पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है।



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