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3. Type of Rural Settlement (ग्रामीण बस्ती के प्रकार)

3.  ग्रामीण बस्ती के प्रकार

(Type of Rural Settlement)



Type of Rural Settlement

बस्ती (Settlement)

     पृथ्वी के धरातल का वह स्थान जहाँ पर मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है, उस स्थान को बस्ती कहते हैं। 

      बस्ती दो प्रकार के होते हैं:-

(1) नगरीय बस्ती (Urban settlement) और

(2) ग्रामीण बस्ती (Rural settlement)

              ग्रामीण बस्ती वह है जहाँ की अधिकांश जनसंख्या प्राथमिक आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। जहाँ की जनसंख्या का आकार छोटी होती है तथा जनसंख्या में घनत्व कम होता है। विश्व की लगभग 50% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं। वहीं भारत की लगभग 69% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं।   

भौगोलिक कारक:-

            ग्रामीण बस्तियों की उत्पत्ति एवं विकास को प्रभावित करने वाले कारक: 

(A) प्राकृतिक कारक (Natural factors):

(i) जलवायु (Climate)

(ii) उच्चावच (Relief)

(iii) जल की उपलब्ध (Availability of water)

(iv) मिट्टियां (Soils)

(v) सूर्य प्रकाश (Sunlight)

(Vi) वनस्पति (Vegetation)

(B) आर्थिक एवं सामाजिक कारक (Economic and social factors):-

(i) आर्थिक व्यवसाय (Economic Business)

(ii) कृषि व्यवस्था (Agricultural system)

(iii) फसल प्रतिरूप (Cropping pattern)

(iv) परिवहन व्यवस्था (Transportation)

(v) सुरक्षा (Security)

(C) ऐतिहासिक एवं राजनितिक कारक (Historical and political factors):-

(i) जाति व्यवस्था (Caste system)

(ii) जनसंख्या (Population)

(iii) सामाजिक एवं रूढ़ियाँ (Social and conventions)। 

ग्रामीण बस्तियों के प्रकार (Types of rural settlements)

     ग्रामीण बस्तियों का प्रकार किसी बस्ती में मकानों की संख्या एवं मकानों के बीच की पारस्परिक दूरी के आधार पर निश्चित किया जाता है। मोटे तौर पर ग्रामीण बस्तियाँ दो प्रकार की होती हैं, जो निम्नवत है :-

(1) गुच्छित ग्रामीण बस्ती/सघन ग्रामीण बस्ती (Compact Settlement) 

(2) प्रकीर्ण ग्रामीण बस्ती/बिखरी बस्तियाँ (scattered settlements)

(1) गुच्छित ग्रामीण बस्ती/सघन ग्रामीण बस्ती (Compact Settlement)

        अमेरिकी भूगोलवेत्ता प्रेसी ने गुच्छित ग्रामीण बस्ती को “Compact Anglomeration” से सम्बोधित किया है। वैसी ग्रामीण बस्ती जिसमें अधिवासीय मकान एक-दूसरे से बिल्कुल सटे-2 हो, वैसी ग्रामीण बस्ती को ही गुच्छित ग्रामीण बस्ती कहते हैं। गुच्छित ग्रामीण बस्ती की मुख्य विशेषता निम्नलिखित है –

(i) मकानों के बीच की दूरी बहुत कम होती है। 

(ii) कम स्थान पर अधिक से अधिक लोग निवास करते हैं।

(iii) सड़‌क एवं गलियाँ पूर्णरूपेण विकसित नहीं होती है। 

(iv) ऐसी बस्तियाँ प्रायः (मानसूनी जलवायु क्षेत्रों) में पायी जाती है। 

गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के विकास के कारण

(Reasons for the development of clustered rural settlements)                 

        गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के विकास के पीछे निम्नलिखित कारण सक्रिय होते हैं-  

(i) बाढ़ के मैदान में अधिवास करने योग्य भूमि का अभाव होता है। इसलिए उन क्षेत्रों में मिलने वाला प्राकृतिक बाँध तथा ऊँचे-2 स्थानों पर गुच्छित बस्तियाँ विकसित हो जाती है।

नोट:-  सघन बस्ती (Compact Settlement) को संकेन्द्रित (Concentrated), पुंजित (Clustered), नाभिकीय (Nucleated) एवं एकत्रित/ गुच्छित (Agglomerated) बस्तियों के नाम से भी जाना जाता है।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रों में गुच्छित बस्तियों का विकास होता है क्योंकि सभी घर के लोग जल स्रोतों से जुड़े हुए रहना चाहते हैं।

(iii) पर्वतीय कटकों के सहारे भी गुच्छित बस्तियां विकसित होती है। जैसे- नागा जनजाति के लोग जानवरों एवं कुकी जनजातियों की भय से पहाड़ों की चोटियों पर निवास करते हैं। चोटियों पर कम भूमि उपलब्ध होने के कारण बस्तियाँ गुच्छित हो जाती है।

(iv) बाढ़ के मैदान में उपजाऊ एवं उर्वर भूमि का महत्त्व अधिक होता है। किसान चप्पे-2 भूमि का प्रयोग कर उसका सदुपयोग करना चाहता है, जिसके कारण अधिवास जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए भूमि कम बच जाती है। फलतः गुच्छित बस्तियों का विकास हो जाता है। 

(v) मानसूनी प्रदेशों में और बाढ़ वाले क्षेत्रों में श्रम प्रधान चावल की खेती की जाती है। अत: श्रम की पूर्ति बनाये रखने के लिए गुच्छित ग्रामीण बस्तियों का विकास होता है।

(vi) एक सांस्कृतिक विशेषता रखने वाले लोगों के बीच विशेष भावनात्मक लगाव होता है। अतः एक ही धर्म, भाषा, जाति, प्रजाति के लोग गुच्छित अधिवास करने की प्रवृति रखते हैं। आज भी भारत गाँवों में जातीय टोले मिलते हैं।

(vii) लुटेरों की भय, सामाजिक तनाव, जंगली जानवरों का आक्रमण इत्यादि कुछ ऐसे अन्य कारण है जो गुच्छित ग्रामीण बस्ती के विकास को प्रेरित करती हैं। 

 गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के लाभ और हानियाँ

(Advantages and Disadvantages of Clustered Rural Settlements)

         गुच्छित बस्तियों के कुछ लाभ और कुछ हानियाँ दोनों हैं। जैसे:-

गुच्छि बस्ती के लाभ (Benefits of cluster settlement)

(i) सामुदायिक भावना का विकास होता है। 

(ii) लोग सुख-दुःख में एक-दूसरे के सहभागी बनते हैं। 

(iii) श्रम आधारित सघन कृषि का विकास होता है।

गुच्छित बस्ती के हानि (Disadvantages of clustered settlement)

(i) गुच्छित बस्तियों में किसी भी व्यक्ति का जीवन निजी नहीं रह जाता है। जब निजी जीवन प्रभावित होता है तब संपूर्ण ग्रामीण बस्ती में अशान्ति का वातावरण उत्पन्न हो जाता है।

(ii) गुच्छित बस्तियों में अधिवासीय जमीन का अभाव होता है जिसके कारण भूमि की माँग बढ़ जाती है जिससे लोग दूसरे की जमीन हड़पने लगते हैं। फलतः ग्रामीण लोग कानूनी जटिलताओं में फँसकर अपना जीवन व्यर्थ गवाँ देते हैं।

 नोट :- गुच्छित = पूँजित = सघन

(iii) गुच्छित बस्तियाँ आलसी लोगों की बस्तियाँ कहलाती है। आलस्यपन का कारण मकानों का नजदीक होना है। इससे लोगों के कार्मिक क्षमता में कमी आती है।

गुच्छित ग्रामीण बस्ती के प्रकार (Types of clustered rural settlement)

        गुच्छित बस्तियाँ पाँच प्रकार के होती हैं-

(a) मानसूनी गुच्छित बस्ती (Monsoon clustered settlement):-

       यह मानसूनी जलवायु प्रदेश में बाढ़ के मैदानों में दिखाई देती है। ब्रह्मपुत्र का मैदान, निचली गंगा का मैदान, संपूर्ण बांग्लादेश, पूर्वी चीन के मैदान, ईरावदी का मैदान, मेकांग का मैदान, नील नदी के डेल्टा पर गुच्छित बस्तियाँ दिखाई देती हैं।

(b) लगभग गुच्छित बस्ती (Almost clustered settlements):-

      ऐसी बस्तियाँ वैसे मानसूनी क्षेत्रों से विकसित होती है जहाँ पर बाढ़ की समस्या नहीं है। ये वैसी बस्तियाँ है जहाँ एक से अधिक गुच्छित बस्ती एक ही भौगोलिक क्षेत्र में विकसित होते हैं। ऐसे बस्तियों में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन बस्ती पुराना है और कौन बस्ती नवीन है तथा किस बस्ती के प्रति आकर्षण सर्वाधिक है?

         ऐसी बस्ती उत्तर-पश्चिम भारत, सिन्धु के मैदान, उत्तरी चीन & नील नदी के ऊपरी भाग में ये बस्तियाँ मिलती हैं।

(c) रेखीय गुच्छित बस्ती (Linear clustered settlement):-

     रेखीय गुच्छित बस्तियों का विकास राजमार्गो, नहरों, प्राकृतिक बाँधों के ऊपर होता है क्योंकि ग्रामीण बस्ती के प्रत्येक लोग राजमार्गों और नहरों की सुविधा समान रूप से लेना चाहते हैं। इन्दिरा गांधी नहर, सरहिन्द नहर, पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र और उत्तरी चीन में नहरों के ऊपर विकसित गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं। बाढ़ वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक बाँध के ऊपर विकसित गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं जबकि भारत के तटीय मैदानी क्षेत्रों में राजमार्गो के किनारे गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं।

(d) गुच्छित सह पुरवा बस्ती (Clustered cum hamlet settlement):-

      वैसी बस्ती जिसमें एक केन्द्रीय बस्ती सर्वाधिक अनुकूलन वाले स्थान पर विकसित होती है और उसके ईर्द-गिर्द छोटी बस्तियों का विकास हो जाता है। छोटी बस्ती को ही पुरवा बस्ती कहते हैं। छोटी ब‌स्तियाँ और केन्द्रीय बस्ती एक-दूसरे से सांस्कृतिक कार्यों के लिए जुड़े हुए होते हैं। मानसूनी भारत में पुरवा बस्ती श्रमिकों की बस्ती होती है।

नोट- पुरवा = छोटी बस्ती या श्रमिकों की बस्ती

(e) गुच्छित सह पुरवा सह बिखरी बस्ती (Clustered cum hamlet cum scattered settlement):-

      ऐसी बस्तियाँ मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई देती है। पहला शोषण मूलक कृषि अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में, जैसे – बिहार, बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बांग्लादेश, इत्यादि में। दूसरा वैसे क्षेत्रों में जहाँ कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूलित वातावरण सर्वत्र रूप से मौजूद है। 

(2) प्रकीर्ण ग्रामीण बस्ती/बिखरी बस्तियाँ (Scattered rural settlement/scattered settlements)

       प्रकीर्ण बस्ती को बिखरी हुई बस्ती भी कहते हैं, क्योंकि इसमें अधिवासीय मकान एक-दूसरे से दूर-2 बने होते हैं। 

प्रकीर्ण बस्तियों के विकास के कारण (Reasons for the development of scattered settlements)

       प्रकीर्ण बस्तियों के विकास के निम्नलिखित कारण हैं।

(i) अधिवास की सुविधा सर्वत्र एक समान मौजूद होना। जैसे:- प० यूरोप

(ii) पर्याप्त समतल भूमि उपलब्ध न होना। 

(iii) समाज में किसी भी प्रकार का भय, आतंक या तनाव का अभाव होना।

(iv) कभी-2 गाँवों में कुछ विशेष लोगों को रहने की इजाजद न किया जाना।

(v) नवीन आर्थिक गतिविधियों का विकास होना। 

 प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के लाभ और हानियाँ (Advantages and Disadvantages of Scattered Rural Settlements)

प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के लाभ (Advantages of scattered rural settlements)-

         प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के निम्नलिखित लाभ है- 

(i) प्रत्येक व्यक्ति का निजी जीवन सुरक्षित रहता है।

(ii) आर्थिक क्षमता अधिक होने के कारण ऐसे बस्ती के लोग अधिक सम्पन्न होते हैं।

प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के हानि (Disadvantages of scattered rural settlements)-

      प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों का कुछ नाकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है। जैसे –

⇒ लोग एकाकी जीवन जीते-2 एकाकी हो जाते हैं।

⇒ लोग एक-दूसरे के सुख-दु:ख में सहभागी नहीं बन पाते हैं।

⇒ आकस्मिक संकट आ जाने पर लोगों की स्थिति दयनीय हो जाती है।

⇒ लोगों को सभी प्रकार के कार्य स्वयं करने पड़ते हैं।

प्रकीर्ण बस्तियों के प्रकार (Types of Scattered settlements)

           प्रकीर्ण बस्तियाँ भी पाँच प्रकार के होती हैं-

(i) एकाकी प्रकीर्ण बस्ती (Isolated scattered settlement):- 

       इसमें एक स्थान पर एक ही मकान स्थित होता है। यह विकसित देशों के गाँवों की विशेषता है। न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, USA, यूरोप में ऐसी बस्तियाँ मिलती हैं। उतर-पश्चिम भारत में भी ऐसी बस्ती विकास की प्रक्रिया से गुजर रही है।

(ii) बिखरी प्रकीर्ण बस्ती (Dispersed scattered settlement):- इसमें एक स्थान पर‌ एक से अधिक मकान होते हैं लेकिन एक-दूसरे से काफी दूर होते हैं। पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्रों में इस प्रकार के बस्तियों का उदाहरण मिलता है। उ०-पूर्वी भारत के जनजातीय बस्तियाँ, मध्य अफ्रीका, मोजाम्बिक, आमेजन प्रदेश, केरल के पर्वतीय क्षेत्र, राजस्थान के द०-पूर्वी पठारी क्षेत्रों में बिखरी प्रकीर्ण बस्तियाँ दिखाई देती है।

(iii) पुरवा प्रकीर्ण बस्ती (Purva scattered settlement):-

     वैसे प्रकीर्ण बस्ती जिसमें कई मकान एक स्थान पर होते हैं लेकिन मकानों के बीच की दूरी अधिक होती है। इसमें बस्ती का कुल आकार छोटा होता है। ऐसी बस्तियों का विकास पठारी क्षेत्रों में प्रकीर्ण वस्ती वहाँ पर होता है जहाँ पर पेयजल और कृषि की संभनाएँ मौजूद है। ढक्कन का पठार, मेघालय के पठार पर ऐसी बस्ती मिलती है।

(iv) रेखीय प्रकीर्ण बस्ती (Linear scattered Settlement):-

     रेखीय प्रकीर्ण बस्ती में अधिवासीय मकान एक ही रेखा में दूर-2 पर अवस्थित होते हैं। ऐसी बस्ती प्राकृतिक बांध, राजमार्ग, नहर, वनीय सड़क के किनारे पायी जाती है। इसका उदा० उन सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है जहाँ पर उपरोक्त भौगोलिक कारक मौजूद है।

(v) सीढ़ीनुमा प्रकीर्ण बस्ती (Terraced Scattered Settlement):-

     ऐसी बस्तियाँ पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीनुमा स्थलाकृति के सहारे विकसित होती है। अरुणाचल प्रदेश या हिमालय के ढालों पर, आल्पस एवं किलीमंजारो पर्वत के ढालों पर इस तरह के अनेक बस्ति‌याँ मिलती है। 

निष्कर्ष-

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण बस्तियों के प्रकार पूर्णत: भौगोलिक कारकों पर निर्भर करता है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. ग्रामीण बस्तियाँ कितने प्रकार की होती हैं। भारत के संदर्भ में उन बस्तियों की विशेषता और वितरण प्रारूप की चर्चा करें।

Q. ग्रामीण बस्तियाँ नगरीय बस्तियों से किस प्रका भिन्न है? ग्रामीण बस्तियों के प्रकार तथा प्रतिरूप की विशेषता भारत के सन्दर्भ में विशेष रूप से करें।



3. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 3  / सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान

3. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 3 

सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान


PSYCHOLOGY CAPSULE 3

एक नजर में इन्हें जरुर देखें-

अधिगम (सीखना): 

                        अधिगम शिक्षा मनोविज्ञान का ही मुख्य घटक है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। क्योंकि शिक्षा का सर्वप्रथम उद्देश्य ही सीखना है। हम सभी जानते है कि मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखना ही है। घर, स्कूल एवं अपने आस-पास के वातावरण से मनुष्य कुछ न कुछ निरंतर सीखता ही रहता है और अपना सर्वांगीण विकास करता है। 

             उदाहरण के लिए छोटे बालक के सामने जलता हुआ दीपक ले जाने पर वह दीपक की लौ को पकड़ने का प्रयास करता है। इस प्रयास में उसका हाथ जलने लगता है। वह हाथ को पीछे खींच लेता है। पुनः जब कभी उसके सामने जलता हुआ दीपक लाया जाता है तो वह अपने पूर्व अनुभव के आधार पर लौ पकड़ने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता है बल्कि  वह उससे दूर हो जाता है। इसी विचार को स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करना कहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अनुभव के आधार पर बालक के स्वाभाविक व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। अधिगम का सर्वोत्तम सोपान अभिप्रेरणा है।

सीखने की भूमिका 

                          सीखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, व्यक्ति जन्म से ही सीखना प्रारम्भ कर देता है और मृत्यु पर्यन्त सीखता रहता है।

अधिगम का प्रत्यय 

                          अधिगम से अभिप्राय अनुभवों के द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया से है।

सीखना किसी क्रिया/स्थिति के प्रति – सक्रिय प्रतिक्रिया /अनुक्रिया

अधिगम सम्बन्धित परिभाषाये:-

 स्किनर:- ” सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।”

वुडवर्थ:- “नवीन ‘ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।”

गेट्स :- “सीखना अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन है।”

क्रो एण्ड क्रो :- ‘सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।”

अधिगम की विशेषताऐं:-

अधिगम जीवन-पर्यन्त चलता है।

अधिगम उद्देश्य पूर्ण है। 

अधियम व्यवहार में परिवर्तन लाता है।

अधिगम विकास है।

अधिगम अनुकूलन है। 

अधिगम सार्वभौमिक है।

अधिगम विवेकपूर्ण है।

अधिगम निरन्तर है। 

अधिगम खोज एवं परिवर्तन है।

अधिगम सक्रिय प्रक्रिया है।

अधिगम व्यक्तिगत व सामाजिक होता है। 

अधिगम एक नया कार्य है।

अधिगम अनुभवों का संगठन है। 

अधिगम वातावरण की उपज है।

अधिगम समायोजन है।

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक व दशाएँ

➡वातावरण

प्रेरणा 

परिपक्वता 

बालकों का स्वास्थ्य

सीखने की इच्छा 

शिक्षण प्रक्रिया

विषय सामग्री का स्वरूप

सीखने की विधि 

सम्पूर्ण परिस्थिति

सीखने का समय व थकान 

अधिगम के सिद्धान्त:-

रायबर्न के अनुसार – “यदि शिक्षण विधियों में नियमों व सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाता है, तो सीखने का कार्य अधिक संतोषजनक होता है। “

थार्नडाइक के अधिगम सम्बन्धी नियम –

                                            थार्नडाइक ने कुल 8 नियम दिये जिसमें तीन प्रमुख व पाँच गौण या सहायक नियम दिये।

थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी तीन प्रमुख नियम:

1. तत्परता का नियम:-यदि हम किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहे तो काम तत्काल तथा आसानी से हो जायेगा।” उदाहरण – घोड़े को पानी के तालाब तक ले जाया तो जा सकता है, लेकिन पीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि घोड़ा पानी पीने के लिए तत्पर नहीं है।

2. अभ्यास का नियम:- ” इसे प्रयोग/अनुप्रयोग का नियम भी कहते हैं, ज्ञान को स्थायी करने के लिए अभ्यास करना अति आवश्यक है।”

किसी कवि ने कहा है –

                    “करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर होत निशान”

उपयोग का नियम:- ‘यदि कोई कार्य पहले किया गया है और अब उसको दुबारा किया जाता है तो वह हमारे मस्तिष्क में पुनः आ जाता है और ज्ञान स्थायी हो जाता है।’

अनुप्रयोग का नियम:- “यदि किसी किये हुए कार्य को पुनः नहीं करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसे भुला देता है।”‘

3. प्रभाव संतोष असंतोष अथवा परिमाण का नियम :-

                    “यदि किसी कार्य को करने पर हमे संतोष प्राप्त होता है, वो हम उस कार्य को दुबारा करेंगे और यदि कार्य को करने पर हमे असंतोष होता है तो हम उस कार्य को दुबारा नहीं करेंगें।”

थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी पाँच गौण या सहायक नियम

1. बहुप्रतिक्रिया का नियम:- कोई नया कार्य करने के लिए कई प्रकार की प्रतिक्रियाओं को अपनाया जाता है तथा उसमें से सही प्रतिक्रिया का पता लगाकर भविष्य में काम किया जाता है।  (ज्ञात से अज्ञात की ओर)

2. मनोवृत्ति का नियम:- किसी कार्य को जिस मनोवृत्ति से (मन/मेहनत) में करेंगे हमे वैसी ही सफलता मिलेगी।

3. आंशिक क्रिया का नियम:- जब किसी कार्य को छोटे-छोटे भागों में बांटकर किया जाता है तो उस कार्य में सफलता प्राप्ति सुगम व सरल हो जाती है। (अंश से पूर्ण की और)

4. आत्मीकरण का नियम :- कोई नया कार्य करने पर उसमें किसी पुराने किये गये कार्य का ज्ञान मिला देना आत्मीकरण प्रक्रिया अधिगम से उसका स्थायी अंग बना लिया जाता है। (ज्ञात से अज्ञात की ओर)

5. साहचर्य परिवर्तन का नियम:- इस नियम में किसी कार्य को पूर्ण करने की क्रिया विधि तो पूर्ववत रखी जाती है, लेकिन परिस्थितियों में परिवर्तन क दिया जाता है। उदाहरण :- पावलब का कुत्ता 

PSYCHOLOGY CAPSULE 3 

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

2. Pattern of rural settlements (ग्रामीण बस्तियों का प्रतिरूप)

2. Pattern of rural settlements

(ग्रामीण बस्तियों का प्रतिरूप)



              Pattern of rural settlements

       ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप का तात्पर्य गाँवों के बसाव की आकृति से है अर्थात एक गाँव को अगर बाहर से देखा जाय तो मानव के स्मृति पटल पर किस प्रकार की आकृति उभरकर सामने आती है। इसी ग्रामीण बस्ती के बाह्य आकृति का अध्ययन ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप कहलाता है। ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप पर दो भौगोलिक कारकों  का प्रभाव पड़ता है।:-

(1) भौतिक कारक और

(ii) सांस्कृतिक कारक।

     भौतिक कारक के अन्तर्गत कुंआ, तालाब, पोखर, (कच्चा मिट्टी) टीले, भूमि का ढाल, सीढ़ीनुमा, ढाल की आकृति, भूमिगत जलस्तर, दलदली भूमि इत्यादि प्रमुख हैं। 

    जबकि सांस्कृतिक कारक के अन्तर्गत ऐतिहासिक घटना क्रम, सड़क एवं गलियों का नियोजित एवं अनियोजित प्रारूप, खेतों का प्रतिरूप, ग्रामीण धार्मिक संस्थाएँ, जातीय संरचना इत्यादि को शामिल करते है। 

       ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव से गुजरने वाली सड़के एवं गलियाँ ग्रामीण बस्तियों के आतंरिक विन्यास के ढाँचे को सुनिश्चित करते है। भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक प्रकार के प्रतिरूप का विकास हुआ है जिनमें मुख्य निम्नवत है।:- 

(1) रेखीय प्रतिरूप⇒

     इसे रिबन प्रतिरूप या लम्बाकार प्रतिरूप या डोरी प्रतिरूप भी कहा जाता है। जब ग्रामीण बस्तियाँ किसी सड़‌क या नहर या पर्वतीय कटक या बाढ़ वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक बाँधों के सहारे विकसित होती हैं तो उसे रेखीय प्रतिरूप कहा जाता है।

      उदा०- उत्तरी-पूर्वी भारत में नागा जनजाति के लोग पर्वतीय कटक के सहारे घर बनाते हैं। प्रायद्वीपीय भारत में पूर्वी तटीय मैदान के सहारे रेखीय प्रतिरूप का घर मिलता है। निम्न गंगा के मैदानी क्षेत्र में, चीन के मैदानी क्षेत्रों में, पश्चिम एशिया में नहरों के सहारे रेखीय प्रतिरूप बस्तियाँ मिलते हैं। 

(2) L- प्रतिरूप⇒

     जब कोई मुख्य सड़क आगे बढ़‌कर अचानक समकोण पर मुड़ जाती है तथा उसके किनारे जब ग्रामीण अधिवासों का विकास हो जाता है तो वैसे प्रतिरूपों को है L- प्रतिरूप कहा जाता है। जैसे- पटना का दनियावां गाँव, मुजफ्फरपुर का नवगढ़ी गाँव इसका सर्वोत्तम उदहारण है।

(3) T- प्रतिरूप-

       जब किसी मुख्य सड़‌क मार्ग पर किसी सहायक सड़‌क का मिलन होता है तो उस पर विकसित ग्रामीण अधिवास T प्रतिरूप का कहलाता है। इसका उदा० नदी घाटी क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलती है।

       उदा० पटना का बख्तियारपुर, हजारीबाग का बरही।

(4) वर्गाकार और आयताकार प्रतिरूप:-

       ये दोनों प्रतिरूप एक-दूसरे के पूरक है। जब किसी ग्रामीण बस्ती का विकास नियोजित तरीके से किया जाता है तो वहाँ सड़‌कें एवं गलियाँ समकोण पर विभाजित करती है। अगर ग्रामीण बस्तियाँ बसकर एक वर्ग के रूप में उभरकर सामने आती हैं तो उसे वर्गाकार प्रतिरूप कहते है और जब आयत के रूप में सामने उभरकर आती हैं तो उसे आयताकार प्रतिरूप कहते है।

     वर्गाकार प्रतिरूप का उदा०- भागलपुर का माफला गाँव, सारण का कात्सा सांथी गाँव।

      आयताकार प्रतिरूप का उदा०- शाहाबाद का ऐरे गॉंव, भागलपुर का घोघली गाँव, सारण का सारथा गाँव।

(5) चौकोर प्रतिरूप:-

   वैसे ग्रामीण बस्ती जिसके बाहर में चाहार दीवारियाँ होती हैं और मध्य भाग में खुली आयताकार भूमि छोड़ दी जाती है। ऐसे प्रतिरूप को चौकोर प्रतिरूप कहते हैं। जैसे- पश्चिम राजस्थान में विकसित होने वाले मरूस्थलीय गाँव इसके उदा० है।

(6) चौकपट्टी प्रतिरूप:-

      इसकी तुलना शतरंज  के गोट से की जा सकती है। जब ग्रामीण क्षेत्रों में समान महत्व वाले गली या सड़‌क सम‌कोण पर कटती हैं उसके बाद बस्तियों का विकास हो जाता है तो वैसे प्रतिरूप को चौकपट्टी प्रतिरूप कहते है। गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र में, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश में चौकपट्टी प्रतिरूप की बस्तियाँ दिखाई देती हैं।

(7) दोहरा प्रतिरूप:-

     नदी पर पुल या फेरी के दोनों तरफ इन बस्तियों का विस्तार होता है।

(8) सीढ़ीनुमा प्रतिरूप:-

      इनायत अहमद ने सीढ़ीनुमा प्रतिरूप को सर्वोच्च रेखीय प्रतिरूप कहा है। इस प्रकार के गाँव पर्वतीय ढालों पर बसे मिलते है। हिमालय, रॉकी, एण्डीज, आल्प्स पर्वत इत्यादि पर सीढ़ीनुमा गाँव मिलते हैं।

(9) त्रिभुजाकार प्रतिरूप:-

        जब  कोई परिवहन मार्ग या नहर दूसरी नहर या परिवहन मार्ग से मिलती है परन्तु उसको पार नहीं करती है तो वहाँ त्रिभुजाकार प्रतिरूप का विकास होता है। इसका उदा० पंजाब, हरियाणा में अधिक मिलते हैं।

(10) तीर प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण अधिवास का विकास किसी केप/नुकीले मोड़ के सहारे होता है तो ऐसी स्थिति में तीर प्रतिरूप का विकास होता है। जैसे- दक्षिण भारत के कन्याकुमारी के पास, द० अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के पास, बिहार में बुढ़ी गंडक और बागमती नदी के संगम पर इस तरह के बस्तियाँ का विकास हुआ है। 

(11) वृताकार प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण बस्तियों का विकास किसी झील, कुँआ, जमीनदार का किला, चर्च, मस्जिद या मंदिर के किनारे विकसित होता है और उसका आकार एक वृत के समान हो जाता है तो वैसे प्रतिरूप को वृताकार प्रतिरूप कहते हैं। प्राचीन काल से ही इस तरह के बस्तियों का विकास होता रहा है। भारत में वृताकार बस्तियों का प्रतिरूप सर्वाधिक मिलता है। वृताकार प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती के केन्द्र में कुआँ या तालाब होता है तो उसे खोखला वृताकार प्रतिरूप कहते हैं और जब केन्द्र में कोई धार्मिक संस्थान, पंचायत भवन या जमीनदार का घर मौजूद होता है तो उसे निहारिका प्रतिरूप कहते हैं।

(12) तारा प्रतिरूप:-

      किसी स्थान पर कई दिशाओं से आकर परिवहन मार्ग एक बिन्दु पर मिल जाती है और सड़कों के किनारे ग्रामीण बस्तियाँ विकसित हो जाती है तो वैसे प्रतिरूप को तारा प्रतिरूप कहते हैं।

       मेरठ और गाजियाबाद का अधिकांश गाँव तारा प्रतिरूप के ही है।

(13) पंखा प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण बस्तियाँ विकसित होकर एक पंखे के रूप में तब्दील हो जाते हैं, तो उसे पंखा प्रतिरूप कहते है।

       डेल्टाई और पर्वतीय क्षेत्रों में पंखा प्रतिरूपों का विकास देखा जा सकता है। गंगा, कृष्णा, के डेल्टा पर तथा हिमालय के जलोढ़ पंखों पर इस प्रकार के ग्रामीण प्रतिरूपों  का विकास हुआ।

       उपरोक्त प्रतिरूप के अलावे कई अन्य प्रतिरूप भी देखने मिलता है। जैसे- बहुभुजीय प्रतिरूप, अर्द्धवृताकार प्रतिरूप, अनाकार प्रतिरूप इत्यादि हैं। 

निष्कर्ष-

        इसह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि पूरे विश्व में अलग-2 क्षेत्रों में भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण अलग-2 प्रतिरूपों का विकास हुआ है।

 NCERT CLASS 10 TOTAL OBJECTIVE GEOGRAPHY SOLUTIONS हिंदी माध्यम

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बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर

1. लौह अयस्क किस प्रकार का संसाधन है?

(क) नवीकरण योग्य

(ख) प्रवाह

(ग) जैव

(घ) अनवीकरण योग्य

उत्तर – (घ) अनवीकरण योग्य

2. ज्वारीय ऊर्जा निन्मलिखित में से किस प्रकार का संसाधन है?

(क) पुन: पूर्ती योग्य

(ख) अजैव

(ग) मानवकृत

(घ) अचक्रीय

उत्तर – (क) पुन: पूर्ती योग्य

3. पंजाब में भूमि निम्नीकरण का निम्नलिखित में से मुख्य कारण क्या है?

(क) गहन सिंचाई

(ख) अधिक सिंचाई

(ग) वनोंमूलन

(घ) अति पशुचारण

उत्तर – (ख) अधिक सिंचाई

4. निम्नलिखित में से किस प्रान्त में सीढ़ीदार (सोपानी) खेती की जाती है?

(क) पंजाब

(ख) उत्तर प्रदेश के मैदान

(ग) हरियाणा

(घ) उत्तराखंड

उत्तर – (घ) उत्तराखंड

5. इनमें से किस राज्य में काली मृदा पाई जाती है?

(क) जम्मू और कश्मीर

(ख) राजस्थान

(ग) गुजरात

(घ) झारखण्ड

उत्तर – (ग) गुजरात

6. इनमें से कौन-सी टिप्पणी प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास का सही कारण नहीं है?

(क) कृषि प्रसार

(ख) वृहत स्तरीय विकास परियोजनाएँ

(ग) पशुचारण और इंधन लकड़ी एकत्रित करना

(घ) तीव्र औदधोगीकरण और शहरीकरण

उत्तर – (ग) पशुचारण और इंधन लकड़ी एकत्रित करना

7. इनमें से कौन-सा संरक्षण तरीका समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं करता?

(क) संयुक्त वन प्रवंधन

(ख) चिपको आन्दोलन

(ग) पूर्वांचल

(घ) वन्य जीव पशुविहार (Santuary) का परिसीमन

उत्तर – (घ) वन्य जीव पशुविहार (Santuary) का परिसीमन

8. निन्मलिखित में से कौन-सा उस प्रणाली को दर्शाता है जिसमें एक ही फसल लम्बे-चौड़े क्षेत्र में उगाई जाती है?

(क) स्थानांतरी कृषि

(ख) रोपण कृषि

(ग) बागवानी

(घ) गहन कृषि

उत्तर –(ख) रोपण कृषि

9. इनमें से कौन-सी रबी फसल है?

(क) चावल

(ख) मोटे अनाज

(ग) चना

(घ) कपास

उत्तर – (ग) चना

10. इनमें से कौन-सी एक फलीदार फसल है?

(क) दालें

(ख) मोटे अनाज

(ग) ज्वार तिल

(घ) तिल

उत्तर – (क) दालें

11. सरकार निम्नलिखित में से कौन-सी घोषणा फसलों को सहायता देने के लिए करती है?

(क) अधिकतम सहायता मूल्य

(ख) न्यूनतम सहायता मूल्य

(ग) मध्यम सहायता मूल्य

(घ) प्रभावी सहायता मूल्य

उत्तर – (ख) न्यूनतम सहायता मूल्य

NCERT CLASS 10

12. निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज अपक्षयित पदार्थ के अपशिष्ट भार को त्यागता हुआ चट्टानों के अपघटन से बनता है?

(क) कोयला

(ख) बॉक्साइट

(ग) सोना

(घ) जस्ता

उत्तर – (ख) बॉक्साइट

13.झारखण्ड के कोडरमा निम्नलिखित से किस खनिज का अग्रणी उत्पादक है?

(क) बॉक्साइट

(ख) अभ्रक

(ग) लौह अयस्क

(घ) ताँबा

उत्तर – (ख) अभ्रक

14. निन्मलिखित चट्टानों में से किस चट्टान के स्तरों में खनिजों का निक्षेपण और संचयन होता है?

(क) तलहटी चट्टानें

(ख) कायांतरित चट्टानें

(ग) आग्नेय चट्टानें

(घ) इनमें से कोई नही

उत्तर – (क) तलहटी चट्टानें

15. मोनाजाइट रेत में निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज पाया जाता है?

(क) खनिज तेल

(ख) युरेनियम

(ग) थोरियम

(घ) कोयला

उत्तर – (ग) थोरियम

16. निम्न से कौन-सा उद्योग चुना पत्थर को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त करता है?

(क) एल्युमिनियम

(ख) चीनी

(ग) सीमेंट

(घ) पटसन

उत्तर – (ग) सीमेंट

17. निन्म से कौन सी एजेंसी सार्वजानिक क्षेत्र में स्टील को बाजार में उपलब्ध कराती है?

(क) हेल (HAIL)

(ख) सेल (SAIL)

(ग) टाटा स्टील

(घ) एम एन सी सी (MNCC)

उत्तर – (ख) सेल (SAIL)

18. निन्म से कौन-सा उद्योग बॉक्साइट को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करता है?

(क) एल्युमिनियम

(ख) सीमेंट

(ग) पटसन

(घ) स्टील

उत्तर – (क) एल्युमिनियम

19. निन्म से कौन-सा उद्योग दूरभाष, कम्प्यूटर आदि संयंत्र निर्मित करते है?

(क) स्टील

(ख) एल्युमिनियम

(ग) इलेक्ट्रॉनिक

(घ) सूचना प्रौद्योगिकी

उत्तर –(ग) इलेक्ट्रॉनिक

20. निन्म में से कौन-से दो दूरस्थ स्थित स्थान पूर्वी-पश्चिमी गलियारे से जुड़े है?

(क) मुम्बई तथा नागपूर

(ख) मुम्बई और कोलकात्ता

(ग) सिलचर तथा मुम्बई

(घ) नागपूर तथा सिलीगुड़ी

उत्तर – (ग) सिलचर तथा मुम्बई

21.निन्मलिखित में से परिवहन का कौन-सा साधन वहनांरण हानियों तथा देरी को घटाता है?

(क) रेल परिवहन

(ख) पाइपलाइन

(ग) सड़क परिवहन

(घ) जल परिवहन

उत्तर –(ख) पाइपलाइन

22. निम्न में से कौन-सा राज्य हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर पाइप लाइन से नहीं जुड़ा है?

(क) मध्य प्रदेश

(ख) गुजरात

(ग) महाराष्ट्र

(घ) उत्तर प्रदेश

उत्तर – (ग) महाराष्ट्र

23. इनमें से कौन-सा पत्तन पूर्वी तट पर स्थित है जो अंत: स्थलीय तथा अधिकतम गहराई का पत्तन है तथा पूर्ण सुरक्षित है?

(क) चेन्नई

(ख) तूतीकोरिन

(ग) पारादीप

(घ) विशाखापत्तनम

उत्तर – (घ) विशाखापत्तनम

24. निन्म में से कौन-सा परिवहन साधन भारत में प्रमुख साधन है?

(क) पइपलाइन

(ख) सड़क परिवहन

(ग) रेल परिवहन

(घ) वायु परिवन

उत्तर –(ग) रेल परिवहन

25. निम्न में से कौन-सा शब्द दो या अधिक देशों के व्यापार को दर्शाता है-

(क) आन्तरिक व्यापार

(ख) बाहरी व्यापार

(ग) अन्तराष्ट्रीय व्यापार

(घ) स्थानिक व्यापार

उत्तर – (ग) अन्तराष्ट्रीय व्यापा



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अध्याय-2. वन एवं वन्य जीव संसाधन / NCERT CLASS 10 Geography Solutions

 NCERT CLASS -10 Geography Solutions

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अध्याय -2. वन एवं वन्य जीव संसाधन



वन एवं वन्य

1. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर

1.इनमें से कौन-सी टिप्पणी प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास का सही कारण नहीं है?

(क) कृषि प्रसार

(ख) वृहत स्तरीय विकास परियोजनाएँ

(ग) पशुचारण और इंधन लकड़ी एकत्रित करना    

(घ) तीव्र औदधोगीकरण और शहरीकरण            

 उत्तर- (ग) पशुचारण और इंधन लकड़ी एकत्रित करना

2. इनमें से कौन-सा संरक्षण तरीका समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं करता?

(क) संयुक्त वन प्रवंधन   

(ख) चिपको आन्दोलन

(ग) पूर्वांचल                 

(घ) वन्य जीव पशुविहार (Santuaryका परिसीमन 

 उत्तर- वन्य जीव पशुविहार (Santuary) का परिसीमन

2. निम्नलिखित प्राणियों/पौधों का उनके अस्तित्व के  वर्ग से मेल करें।

3. निम्नलिखित का मेल करें।

आरक्षित वन- सरकार, व्यक्तियों के निजी और समुदायों के अधीन अन्य वन और बंजर भूमि।

रक्षित वन- वन और वन्य जीव संसाधन संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक मूल्यवान वन।

अवर्गीकृत वन- वन भूमि जो और अधिक क्षरण से बचाई जाती है।

उत्तर-   अवर्गीकृत वन– सरकार, व्यक्तियों के निजी और समुदायों के अधीन अन्य वन और बंजर भूमि।

आरक्षित वन– वन और वन्य जीव संसाधन संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक मूल्यवान वन।

रक्षित वन- वन भूमि जो और अधिक क्षरण से बचाई जाती है।

4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i) जैव विविधता क्या है? यह मानव जीवन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर – जैव विविधता से तात्पर्य, पृथ्वी पर पाये पाई जाने वाली जीवों की विविधता से है। यह शब्द किसी विशेष क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों की विभिन्न रूपों की ओर इंगित करता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक पृथ्वी पर जीवों की करीब एक करोड़ प्रजातियां पाई जाती हैं।

         ये हमारी धरा पर अमूल्य धरोहर हैं। वन्य जीव सदियों से हमारे सांस्कृतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इनसे हमें भोजन, वस्त्र के लिए रेशे, खालें, आवास आदि सामग्री एवं अन्य उत्पाद प्राप्त होते हैं। इनकी चहक और महक हमारे जीवन में स्फूर्ति प्रदान करते हैं। पारिस्थितिकी के लिए ये श्रृंगार के समान हैं। भारत में इन्हें सदैव आदरभाव एवं पूज्य समझा गया। मनीषियों के लिए प्रेरणा का स्रोत तो सैलानियों के लिए आकर्षण का विषय रहा है। ये पर्यावरण संतुलन के लिए भी अति आवश्यक हैं तथा हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। 

(ii) विस्तारपूर्वक बताएं कि मानव क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास के कारक है?

उत्तर –मानव के निम्नलिखित क्रियाकलापों वनस्पतियों एवं प्राणीजगत के ह्रास के कारक हैं-

◆आवासीय एवं कृषि योग्य भूमि का विस्तार

◆हानिकारक रसायनों का  प्रयोग

◆आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिये जैव विविधताओं का अति दोहन

◆जनसंख्या में वृद्धि

◆औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण में  वृद्धि

जंगली जीवों का शिकार इत्यादि।   

          मानव जीवमण्डल का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है जो न केवल अन्य जैविक घटकों को ही प्रभावित करता है बल्कि पर्यावरण के अजैविक घटकों में भी अत्यधिक परिवर्तन लाता है। मानव अपनी बुद्धि और विवेक के कारण प्रकृति के दूसरे जीवों और अजैविक घटकों का प्रयोग कर अपने जीवन को सुखमय और आरामदायक बनाता है। किन्तु जब मानव के क्रियाकलाप अनियंत्रित हो जाते हैं तो पर्यावरण के घटकों जैसे-वायु, जल तथा मृदा एवं दूसरे जीवों में अनावश्यक परिवर्तन हो जाता है जिसका वनस्पतियों एवं प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

       मानव अपने आवास, खेती एवं कारखाने स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को काटता रहा है । शाकाहारी एवं मांसाहारी जानवरों का अंधाधुंध शिकार कर जीवों में असंतुलन पैदा कर दिया है और बहुत-से जन्तु लुप्त होने के कगार पर हैं। जैसे—सिंह, बाघ, चीता, गैंडा, बारहसिंगा, कस्तुरी मृग आदि     

5. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए।

(i) भारत में विभिन्न समुदायों ने किस प्रकार वनों और वन्य जीव संरक्षण और रक्षण में योगदान किया है?

उत्तर- भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर वन्य जीवों के आवास स्थलों के संरक्षण में जुटे हैं क्योंकि यह वन और वनस्पतियों से दीर्घकाल से इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो रही है। सरिस्का बाघ ब रिजर्व में राजस्थान के गांवों के लोग वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत वहाँ से खनन कार्य बंद करवाने के लिए संघर्षरत हैं। कई क्षेत्रों में तो लोग स्वयं वन्य जीव आवासों की रक्षा कर रहे है।

             आदिवासी लोग अपनी आवश्यकताओं के लिए आस-पास के परिवेश पर निर्भर करते हैं। वह वन्य जीवों का आखेट, मछली पकड़ना, जंगली फल, कन्द का बीज प्राप्त करना एवं सीमित मात्रा में कृषि साधन आदि से ही अपने भोजन की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

        आदिवासियों का पेड़ पौधों तथा वन्य जीवों से भावनात्मक एवं आत्मीय लगाव होता है। अपने परिवेश में पाए जाने वाले संसाधनों के संरक्षण के प्रति यह अत्यंत सक्रिय तथा सचेत होते हैं। यह जंगली पौधों के बीज आदि के अंकुरण के मौसम में वन क्षेत्रों में नहीं जाते और अपने पालतू पशुओं को भी जंगल में प्रवेश से रोकते हैं। प्रजनन काल में मादा वन पशुओं का शिकार नहीं करते हैं। वन  संसाधनों का उपयोग चक्रीय पद्धति से करते हैं वन के खास क्षेत्रों को सुरक्षित रख उसमें प्रवेश नहीं करते हैं। समय-समय पर आवश्यकतानुसार वृक्षारोपण तथा उनकी रक्षा करते हैं इस प्रकार से जनजातीय क्षेत्रों के वन को स्वभाविक संरक्षण प्राप्त हो जाता है।

        हिमालय में प्रसिद्ध चिपको आंदोलन कई क्षेत्रों में वन कटाई रोकने में ही सफल नहीं रहा बल्कि यह भी दिखाया कि स्थानीय पौधों का प्रयोग करके सामुदायिक वनीकरण अभियान को सफल बनाया जा सकता है । इसी प्रकार टिहरी में किसानों के बीच भूमि बचाओ आंदोलन ने दिखा दिया है कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विभिन्न फसल उत्पादन द्वारा आर्थिक रूप से लाभकारी कृषि संभव है। 

(ii) वन और वन्य जीव संरक्षण में सहयोगी रीति-रिवाजों पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर- सहयोगी रीति-रिवाजों का वन और वन्य जीवों के संरक्षण में काफी महत्वपूर्ण योगदान है। ग्रामीण लोग कई धार्मिक अनुष्ठानों में 100 से अधिक पादप प्रजातियों का प्रयोग करते हैं और इन पौधों को अपने खेतों में भी उगाते हैं। आदिवासियों को अपने क्षेत्र में पाये जाने वाले पेड़-पौधों तथा वन्य जीवों से भावनात्मक तथा आत्मीय लगाव होता है। वे प्रजनन काल में मादा वन पशुओं का शिकार नहीं करते हैं। वन संसाधनों का उपयोग चक्रीय पद्धति से करते हैं।

     वन के खास क्षेत्रों को सुरक्षित रख उसमें प्रवेश नहीं करते हैं। समय-समय पर आवश्यकतानुसार वृक्षारोपण तथा उनकी रक्षा करते है । इस प्रकार से जनजातीय क्षेत्रों के वन को स्वभाविक संरक्षण प्राप्त हो जाता है।

       भारत में जैन एवं बौद्ध धर्म के अनुयायी अहिंसा प्रेमी होते हैं ये धर्म ‘अहिंसा परमो धर्म’ पर आधारित है, जैन समुदाय के बीच सूक्ष्मजीव की भी हत्या वर्जित है। अतः वन एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण में इनका काफी योगदान रहता है।

      महात्मा बुद्ध ने 487 ईसा पूर्व में कहा था- “पेड़ एक विशेष असीमित दयालु और उदारपूर्ण जीवधारी है, जो अपने सतत पोषण के लिए कोई मांग नहीं करता और दानशीलतापूर्वक अपने जीवन की क्रियाओं को भेंट करता है । यह सभी की रक्षा करता है और उस समय पर कुल्हाड़ी चलाने वाले प भी छाया प्रदान करता है।”


अध्याय 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ 

इकाई -5 अध्याय 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ 

(Geographical Perspective on Selected Issues and Problems)
बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)

भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ 

भौगोलिक परिप्रेक्ष्य

(क) नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए
प्रश्न 1. निम्नलिखित में से सर्वाधिक प्रदूषित नदी कौन-सी है?
(क) ब्रह्मपुत्र
(ख) सतलुज
(ग) यमुना
(घ) गोदावरी
उत्तर – (ग) यमुना
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन-सा रोग जल जन्य है?
(क) नेत्रश्लेष्मला शोध
(ख) अतिसार
(ग) श्वसन संक्रमण
(घ) श्वासनली शोध
उत्तर – (ख) अतिसार
प्रश्न 3. निम्नलिखित में से कौन-सा अम्ल वर्षा का एक कारण है?
(क) जल प्रदूषण
(ख) भूमि प्रदूषण
(ग) शोर प्रदूषण
(घ) वायु प्रदूषण
उत्तर – (घ) वायु प्रदूषण
प्रश्न 4. प्रतिकर्ष और अपकर्ष कारक उत्तरदायी है-
(क) प्रवास के लिए
(ख) भू-निम्नीकरण
(ग) गंदी बस्तियां
(घ) वायु प्रदूषण
उत्तर – (क) प्रवास के लिए
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
प्रश्न 1. प्रदूषण और प्रदूषकों में क्या भेद है?
उत्तर – प्रदूषण का संबंध उस विभिन्न स्रोतों से निकलने वाले पदार्थ की क्रियाओं से है, जो विकृत होकर परिवेश को प्रदूषित करता है। प्रदूषक ऐसे पदार्थ होते हैं जो कि प्रदूषण फैलाने के लिए उत्तरदायी होते हैं। मुख्यतः प्रदूषक दो प्रकार के होते हैं – जैव निम्नीकृत प्रदूषक और अजैव निम्नीकृत प्रदूषक।
प्रश्न 2. वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर – जीवाश्म ईंधन का दहन, खनन और उद्योग वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। ये प्रक्रियाएँ वायु में सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, सीसा तथा एस्बेस्टोस को निर्मुक्त करती हैं।
प्रश्न 3. भारत में नगरीय अपशिष्ट निपटान से जुड़ी प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर – भारत में नगरीय अपशिष्ट निपटान एक गंभीर समस्या है। अधिकांश शहरों में अपशिष्ट का 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत कचरा बिना एकत्र किए छोड़ दिया जाता है। जो गलियों में, घरों के पीछे खुली जगहों पर तथा परती जमीनों पर इकट्ठा हो जाता है जिसके कारण स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम पैदा हो जाते हैं।
प्रश्न 4. मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के क्या प्रभाव पड़ते हैं?
उत्तर – वायु प्रदूषण के कारण श्वसन तंत्रीय, तंत्रिका तंत्रीय तथा रक्त संचार तंत्र संबंधी विभिन्न बीमारियाँ होती हैं। नगरों के ऊपर कुहरा जिसे ‘शहरी धूम्र कुहरा कहा जाता है, मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत ही घातक सिद्ध होता है। 
(ग) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें
प्रश्न 1. भारत में जल प्रदूषण की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर – भारत में जल का प्रदूषण प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त प्रदूषकों, उद्योगों, आधुनिक कृषि एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से होता है। इन क्रियाकलापों में उद्योग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सहायक है। उत्पादन प्रक्रिया में, उद्योग अनेक अवांछित उत्पाद पैदा करते हैं जिनमें औद्योगिक कचरा, प्रदूषित अपशिष्ट जल, जहरीली गैसें, रासायनिक अवशेष, अनेक भारी धातुएँ, धूल, धुआँ आदि शामिल होता है।
                अधिकतर औद्योगिक कचरे का बहते जल में अथवा झीलों आदि में विसर्जित कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप विषाक्त रासायनिक तत्त्व जलाशयों, नदियों तथा अन्य जल भंडारों में पहुँच जाते हैं जो इन जलों में रहने वाली जैव प्रणाली को नष्ट करते हैं। सर्वाधिक जल प्रदूषक उद्योग-चमड़ों, लुगदी व कागज, वस्त्र तथा रसायन हैं।  
                 
       आधुनिक कृषि में विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है जैसे कि अकार्बनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवारनाशक आदि भी प्रदूषण उत्पादन करने वाले घटक हैं। इन रसायनों को नदियों, झीलों तथा तालाबों में बहा दिया जाता है। यह सभी रासायन जल के माध्यम से जमीन में सम्माहित होते हुए भू-जल तक पहुँच जाते हैं।
          उर्वरक धरातलीय जल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ा देते हैं। भारत में तीर्थ यात्राएँ, धार्मिक मेले व पर्यटन आदि जैसी सांस्कृतिक गतिविधियों भी जल प्रदूषण का कारण हैं। भारत में, धरातलीय जल के लगभग सभी स्रोत संदूषित हो चुके हैं और मानव के उपयोग के योग्य नहीं हैं।
प्रश्न 2. भारत में गंदी बस्तियों की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर – भारत में गंदी बस्तियाँ न्यूनतम वांछित आवासीय क्षेत्र होते हैं जहाँ जीर्ण-शीर्ण मकान, स्वास्थ्य की निम्न सुविधाएँ, खुली हवा का अभाव तथा पेयजल, प्रकाश तथा शौच सुविधाओं जैसी आधारभूत आवश्यक चीजों का अभाव पाया जाता है। यह क्षेत्र बहुत ही भीड़-भाड़, सँकरी गलियों तथा आग जैसे गंभीर खतरों के जोखिम से युक्त होते हैं। इसके अतिरिक्त गंदी बस्तियों की अधिकांश जनसंख्या नगरीय अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र में कम वेतन और अधिक जोखिम भरा कार्य करते हैं।
 
         परिणामस्वरूप ये लोग अल्प-पोषित होते हैं और इनमें विभिन्न रोगों और बीमारियों की संभावना बनी रहती है। ये लोग अपने बच्चों के लिए उचित शिक्षा का खर्च भी वहन नहीं कर सकते। गरीबी उन्हें नशीली दवाओं, शराब, अपराध, गुंडागर्दी, पलायन, उदासीनता और अंततः सामाजिक बहिष्कार के प्रति उन्मुख करती है।
प्रश्न 3. भू-निम्नीकरण को कम करने के उपाय सुझाइए।
उत्तर – भू-निम्नीकरण जल संभरण प्रबंधन कार्यक्रम द्वारा कम किया जा सकता है। जल संभरण प्रबंधन कार्यक्रम भूमि, जल तथा वनस्पतियों के बीच संबद्धता को पहचानता है और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन एवं सामुदायिक सहभागिता से लोगों की आजीविका को सुधारने का प्रयास करता है। मृदा अपरदन, लवणता (जलाक्रांतता) तथा भू-क्षारता से भू-निम्नीकरण होता है।

            भू-उर्वरकता के अप्रबंधन के साथ इसका अविरल उपयोग होने पर भी भू-निम्नीकरण होगा तथा उत्पादकता में कमी आएगी। अतः हमें मृदा अपरदन, लवणता तथा भू-क्षारता को रोकने के लिए उपाय करने होंगे जिससे भू-निम्नीकरण को रोका जा सकेगा।


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अध्याय 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, बिहार बोर्ड

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(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (International Trade)

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

 (क) नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
प्रश्न 1. दो देशों के मध्य व्यापार कहलाता है-
(क) अंतर्देशीय
(ख) बाह्य व्यापार
(ग) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
(घ) स्थानीय व्यापार
उत्तर – (ग) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन-सा एक स्थलबद्ध पोताश्रय है?
(क) विशाखापट्नम
(ख) मुंबई
(ग) एन्नोर
(घ) हल्दिया
उत्तर – (क) विशाखापट्नम
प्रश्न 3. भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार वहन होता है-
(क) स्थल और समुद्र द्वारा
(ख) स्थल और वायु द्वारा
(ग) समुद्र और वायु द्वारा
(घ) समुद्र द्वारा
उत्तर – (ग) समुद्र और वायु द्वारा
प्रश्न 4. वर्ष 2003-04 में निम्नलिखित में से कौन-सा भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था?
(क) यूनाइटेड किंग्डम
(ख) चीन
(ग) जर्मनी
(घ) स. रा. अमेरिका
उत्तर – (ग) जर्मनी
 
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
प्रश्न 1. भारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- 1950-51 में भारत का विदेशी व्यापार का मूल्य 1,214 करोड़ रुपए था जो कि वर्ष 2004-05 में बढ़कर 8,37,133 करोड़ रुपए हो गया। वर्ष 2004-05 में भारत के निर्यात में एशिया एवं ओशेनिया की 47.41 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी। उसके बाद पश्चिमी यूरोप (23.80%) और अमेरिका (20.42%) आते हैं।
प्रश्न 2. पतन और पोताश्रय में अंतर बताइए।
उत्तर- पतन समुद्री तट पर जहाजों के ठहरने के स्थान होते हैं। यहाँ पर सामान लादने एवं उतारने की सुविधाएँ होती हैं। जबकि पोताश्रय समुद्र में जहाजों के प्रवेश करने का प्राकृतिक स्थान है। यहाँ जहाज लहरों तथा तूफान से सुरक्षा प्राप्त करते हैं। प्राकृतिक पोताश्रय जैसे-मुंबई और चेन्नई में कृत्रिम पोताश्रय।
प्रश्न 3. पृष्ठ प्रदेश के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- किसी भी पत्तन या बंदरगाह के आस-पास के वे राज्य जिनका आयात एवं निर्यात एक ही पतन से होता है। उसे उस पतन का पृष्ठ प्रदेश कहा जाता है।
प्रश्न 4. उन महत्त्वपूर्ण मदों के नाम बताइए जिन्हें भारत विभिन्न देशों से अयात करता है?
उत्तर- भारत विभिन्न देशों से पेट्रोलियम, उर्वरक, खाद्य तेल, लुगदी तथा अपशिष्ट पेपर, पेपर बोर्ड, अखबारी कागज, अलौह धातुएँ, धातुमयी अयस्क, लोहा एवं स्टील, मोती, मशीनरी, दालें, कोयला, गैर धात्विक खनिज, विनिर्माण, चिकित्सीय एवं फार्मा उत्पाद, रासायनिक उत्पाद, वस्त्र, धागे, कपडे, स्वर्ण एवं चाँदी तथा व्यावसायिक उपस्कर आदि आयात करता है।
प्रश्न 5. भारत के पूर्वी तट पर स्थित पत्तनों के नाम बताइए।
उत्तर- भारत के पूर्वी तट पर स्थित पत्तनों के नाम- कोलकाता पत्तन हुगली नदी पर, हल्दिया पत्तन, पारादीप पत्तन, विशाखापट्नम पत्तन, चेन्नई पत्तन, एन्नोर पत्तन और तूतीकोरिन पत्तन आदि स्थित हैं।
 
(ग) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें
प्रश्न 1. भारत में निर्यात और आयात व्यापार के संयोजन का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारत के व्यापारिक संबंध विश्व के अधिकांश देशों एवं प्रमुख व्यापारी गुटों के साथ है। भारत का उद्देश्य आगामी पाँच वर्षों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अपनी हिस्सेदारी दुगुना करने का है। वर्ष 2004-05 में भारत के निर्यात में एशिया एवं ओशेनिया की 47.41 प्रतिशत की हिस्सेदारी है, उसके बाद पश्चिमी यूरोप (23.80%) और अमेरिका (20.42%) आते हैं। इसी प्रकार भारत के आयात में एशिया एवं ओशेनिया की सर्वाधिक (35.40%) मात्रा है। इसके बाद पश्चिमी यूरोप (22.60%) तथा अमेरिका (8.36%) आते हैं।
                संयुक्त राज्य अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार तथा भारत के निर्यात के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गंतव्य स्थान है। महत्त्व के आधार पर अन्य देशों में क्रमशः ब्रिटेन, बेल्जियम, जर्मनी, जापान, स्विटजरलैंड, हांगकांग, संयुक्त अरब अमीरात, चीन, सिंगापुर तथा मलेशिया आदि आते हैं। भारत का अधिकतर विदेशी व्यापार समुद्री एवं वायु मार्गों द्वारा संचालित होता है। हालांकि, विदेशी व्यापार का छोटा-सा भाग सड़क मार्ग द्वारा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान जैसे पड़ोसी राज्यों में सड़क मार्ग द्वारा किया जाता है।
प्रश्न 2. भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की बदलती प्रकृति पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर- समय के साथ भारत के विदेशी व्यापार की प्रकृति में बदलाव आया है। आयात एवं निर्यात दोनों की ही मात्रा में वृद्धि हुई है, लेकिन निर्यात की तुलना में आयात का मूल्य अधिक है। पिछले कुछेक वर्षों में व्यापार घाटे में भी वृद्धि है। घाटे में हुई इस वृद्धि के लिए अपरिष्कृत (क्रूड) पेट्रोलियम को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जो भारत की आयात सूची में एक प्रमुख घटक है।
              भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वस्तुओं के संघटक में समय के साथ आए बदलाव में कृषि तथा समवर्गी उत्पादों का हिस्सा घटा है, जबकि पेट्रोलियम तथा अपरिष्कृत उत्पादों एवं अन्य वस्तुओं में वृद्धि हुई है। अयस्क खनिजों तथा निर्मित सामानों का हिस्सा वर्ष 1997-98 से 2003 04 तक लगभग एक जैसा रहा है। पेट्रोलियम उत्पादों के हिस्से में वृद्धि का कारण पेट्रोलियम के मूल्यों में वृद्धि के साथ-साथ भारत में तेलशोधन क्षमता में वृद्धि भी जिम्मेदार है।
             परंपरागत वस्तुओं के व्यापार में गिरावट का कारण मुख्यतः कड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा है। कृषि उत्पादों के अंतर्गत कॉफी, मसाले, चाय व दालों आदि जैसी परंपरागत वस्तुओं के निर्यात में गिरावट आई है। हालांकि पुष्प कृषि उत्पादों, ताजे फलों, समुद्री उत्पादों तथा चीनी आदि के निर्यात में वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2003-04 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र ने भारत के कुल निर्यात मूल्य में अकेले 75.96 प्रतिशत की भागीदारी अंकित की है। निर्यात सूची में इंजीनियरिंग सामानों ने महत्त्वपूर्ण वृद्धि दर्शाई है।

           वस्त्रोद्योग क्षेत्र सरकार द्वारा उदारतापूर्ण उपाय उठाए जाने के बावजूद पर्याप्त उपलब्धि नहीं प्राप्त कर पाया। इस क्षेत्र में चीन तथा अन्य पूर्व एशियाई देश हमारे प्रमुख प्रतिस्पर्धी है। भारत के विदेश व्यापार में मणि-रत्नों तथा आभूषणों की एक व्यापक हिस्सेदारी है। भारत ने 1950 एवं 1960 के दशक में खाद्यान्नों की गंभीर कमी का अनुभव किया है। उस समय भुगतान संतुलन बिल्कुल विपरीत था।

            1970 के दशक के बाद हरित क्रांति में सफलता मिलने पर खाद्यान्नों का आयात रोक दिया गया। लेकिन 1973 में आए ऊर्जा संकट से पेट्रोलियम के मूल्य उछाल आया फलतः आयात वजट भी बढ़ गया। खाद्यान्नों के आयात की जगह उर्वरकों एवं पेट्रोलियम ने ले ली।


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बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

(खण्ड 1: मानव भूगोल के मूल सिद्धांत)

Part 1: Principal of Human Geography
बिहा बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)
Part 2: India- People and Economy

PREVIOUS YEAR QUESTION PAPER सम्पूर्ण हल सहित (बिहार बोर्ड भूगोल 12वीं कक्षा)

अध्याय 10 परिवहन तथा संचार (Transport And Communication)

इकाई -4 अध्याय 10 परिवहन तथा संचार (Transport And Communication)

बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)

अध्याय 10 परिवहन तथा संचार

परिवहन तथा संचार

(क) नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए
प्रश्न 1. भारतीय रेल प्रणाली को कितने मंडलों में विभाजित किया गया है?
(क) 9
(ख) 12
(ग) 16
(घ) 14
उत्तर – (ग) 16
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत का सबसे लंबा राष्ट्रीय महामार्ग है?
(क) एन.एच.-1
(ख) एन.एच.-6
(ग) एन.एच.-7
(घ) एन.एच.-8
उत्तर – (ग) एन.एच.-7
प्रश्न 3. राष्ट्रीय जल मार्ग संख्या-1 किस नदी पर तथा किन दो स्थानों के बीच पड़ता है?
(क) ब्रह्मपुत्र-सादिया-घुबरी
(ख) गंगा-हल्दिया-इलाहाबाद
(घ) पश्चिमी तट
(ग) नहर-कोट्टा पुरम से कोल्लाम
उत्तर – (ख) गंगा-हल्दिया-इलाहाबाद
प्रश्न 4. निम्नलिखित में से किस वर्ष पहला रेडियो कार्यक्रम प्रसारित हुआ था?
(क) 1911
(ख) 1936
(ग) 1927
(घ) 1923
उत्तर – (घ) 1923
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
प्रश्न 1. परिवहन किन क्रियाकलापों को अभिव्यक्त करता है? परिवहन के तीन प्रमुख प्रकारों के नाम बताए।
उत्तर – परिवहन के माध्यम से यात्रियों का अपने-अपने विचारों, दर्शनों, संदेशों तथा वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक अथवा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता हैं।
परिवहन के चार प्रमुख प्रकार हैं –
(i) स्थल परिवहन
(ii) वायु परिवहन
(iii) जल परिवहन
(iv) पाइप लाइन परिवहन आदि।
प्रश्न 2. पाइप लाइन परिवहन से लाभ एवं हानि की विवेचना करें।
उत्तर – लाभ-
  • पाइप लाइनों गैसों एवं तरल पदार्थों के लंबी दूरी तक परिवहन हेतु अत्यधिक सुविधाजनक एवं सक्षम परिवहन प्रणाली है।
  • इनके द्वारा ठोस पदार्थों को भी घोल या गारा में बदल कर परिवहित किया जा सकता है।
हानि-
  • पाइप लाइन परिवहन की हानि ये है कि इनको बनाने में बहुत अधिक समय और लागत की जरूरत पड़ती है।
  • पाइप लाइन परिवहन के द्वारा हम केवल कुछ वस्तुओं (तेल एवं गैस आदि) का ही परिवहन कर सकते हैं।
  • पाइप लाईनों के क्षतिग्रस्त होने का हमेशा खतरा बना रहता है।
प्रश्न 3. ‘संचार’ से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर – संचार वह प्रक्रिया है, जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति आपस में किसी एक संदेश पर समान समझ पैदा करने के लिए अपने विचारों, भावों, तथ्यों, प्रभावों इत्यादि का आदान-प्रदान करते हैं। प्रारंभ में संचार के साधन ही परिवहन के साधन होते थे। डाकघर, तार, प्रिंटिंग प्रेस, इन्टरनेट, फैक्से, ई-मेल, दूरभाष तथा उपग्रहों की खोज ने संचार को बहुत ही त्वरित एवं आसान बना दिया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ने संचार के क्षेत्र में क्रांति लाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
प्रश्न 4. भारत में वायु परिवहन के क्षेत्र में “एयर इंडिया’ तथा ‘इंडियन’ के योगदान की विवेचना करें।
उत्तर – एयर इंडिया यात्रियों तथा नौभार यातायात दोनों के लिए अंतर्राष्ट्रीय वायु सेवाएँ उपलब्ध कराता है। यह अपनी सेवाओं द्वारा विश्व के सभी महाद्वीपों को जोड़ता है। वर्ष 2005 में इसने 1.22 करोड़ यात्रियों तथा 4.8 लाख टन नौभार का वहन किया। 8 दिसंबर 2005 से इंडियन एयर लाइंस को ‘इंडियन’ के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2005 में घरेलू प्रचालन के अंतर्गत 24.3 मिलियन यात्री तथा 20 लाख टन नौभार शामिल था।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
प्रश्न 1. भारत में परिवहन के प्रमुख साधन कौन-कौन से हैं? इनके विकास को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना करें।
उत्तर – भारत में परिवहन के प्रमुख साधन हैं-
(i) स्थल परिवहन- जिसके अंतर्गत सड़क परिवहन, रेल परिवहन और पाइप लाइन परिवहन आता है।
(ii) जल परिवहन- जिसके अंतर्गत सागरीय व अंत स्थलीय परिवहन आता है। जो कि नौकाओं और जहाजों द्वारा किया जाता है।
(iii) वायु परिवहन- जो कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वायुयानों के माध्यम से किया जाता है।

           भारतीय परिवहन के साधनों के विकास को प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार रहे हैं- औद्योगिक क्रांति, कृषि क्रांति दुग्ध क्रांति, तकनीकी क्रांति, सामरिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र, पर्यटन, संचार क्रांति, परिवहन क्रांति और शिक्षा के बढ़ते स्तर, रोजगार आदि कारकों ने भारतीय परिवहन के साधनों के विकास को प्रभावित किया है। लाखों लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपनी नौकरियों को करने सड़क परिवहन द्वारा जाते हैं। लेकिन भू-भाग की प्रकृति तथा आर्थिक विकास का स्तर सड़कों के घनत्व के प्रमुख निर्धारक हैं। मैदानी क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण आसान एवं सस्ता होता है जबकि पहाड़ी एवं पठारी क्षेत्रों में कठिन एवं महंगा होता है। अंतर्राष्ट्रीय महामार्गों का उद्देश्य पड़ोसी देशों के बीच व्यापार, और रिश्तों को सद्दभावनापूर्ण बनाना होता है।
प्रश्न 2. पाइप लाइन परिवहन से लाभ एवं हानि की विवेचना करें।

उत्तर – लाभ-
  • पाइप लाइनों को कठिन, ऊबड़-खाबड़ भू-भागों तथा पानी के नीचे भी बिछाया जा सकता है।
  • प्रारंभ में इनके निर्माण में अधिक धन व्यय होता है। परन्तु बाद में इन्हें चालू रखने में कम लागत आती है।
  • पाइप लाइन पदार्थों की निरन्तर आपूर्ति सुनिश्चित करती है।
  • इनके द्वारा परिवहन में न तो समय नष्ट होता है और न ही किसी प्रकार की बर्बादी होती है।
  • इसमें ऊर्जा का बहुत कम खर्च होता है।
हानि-
  • इसमें कोई लोच नहीं है।
  • समयानुसार इसकी क्षमता को न तो बढ़ाया जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है।
  • इनकी सुरक्षा करना कठिन कार्य है।
  • कहीं पर पाइप लाइन के फट जाने पर उसकी मरम्मत करना भी कठिन है।
  • पाइप लाइन में रिसाव का पता लगाना भी एक समस्या है।
प्रश्न 3. भारत के आर्थिक विकास में सड़कों की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर – सड़क परिवहन का प्राचीन साधन है तथा रेल परिवहन की अपेक्षा विस्तृत एवं सुलभ है। यह देश के विभिन्न भागों में महत्त्वपूर्ण आर्थिक योगदान देता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था तो मुख्यतः सड़क परिवहन पर ही निर्भर है। सड़कें ग्राहक के दरवाजे तक सेवा देती है। सड़क परिवहन, लचीला, विश्वसनीय तथा तीव्रगामी है।

          देश के पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए सड़क परिवहन आदर्श साधन है। सड़क परिवहन द्वारा लाखों टन सामान देश के एक कोने से देश के दूसरे कोने तक प्रतिदिन पहुँचाया जाता है। जिस से प्रतिदिन करोड़ों रुपये सरकार टैक्स के रूप में वसूलती है। राज्य सरकारों की परिवहन बसें प्रतिदिन करोड़ों लोगों को एक जगह से दूसरी जगह लाती-ले जाती हैं। जिससे प्रतिदिन करोड़ों रुपये की कमाई राज्य सरकारें करती है।

        सड़क परिवहन ने पर्यटन को प्रोत्साहित किया है। करोड़ों रुपये पर्यटन उद्योग से लाखों लोग कमा रहे हैं। करोड़ों लोगों को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से सड़क परिवहन द्वारा रोजगार प्राप्त है। दूध, फल, सब्जी, फैक्ट्रियों के लिए कच्चा माल, उत्पादों को बाजार, लोगों के घरों तक सड़क परिवहन द्वारा ही पहुँचाया जाता है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में सड़क परिवहन का एक ही महत्त्वपूर्ण योगदान है। सड़क परिवहन ऐसे दुर्गम पहाड़ी स्थानों तक अपनी सेवाएँ देती है जहाँ तक और किसी परिवहन का पहुँचाना नामुमकिन है।


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(खण्ड 1: मानव भूगोल के मूल सिद्धांत)

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PREVIOUS YEAR QUESTION PAPER सम्पूर्ण हल सहित (बिहार बोर्ड भूगोल 12वीं कक्षा)

अध्याय 9 भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास (Planning and Sustainable Development in Indian Context)

इकाई -3 अध्याय 9 भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास

(Planning and Sustainable Development in Indian Context)

बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)

अध्याय 9 भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास

सततपोषणीय विकास

(क) नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

प्रश्न 1. प्रदेशीय नियोजन का संबंध है-
(क) आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों का विकास
(ख) क्षेत्र विशेष के विकास का उपागम
(ग) परिवहन जल तंत्र में क्षेत्रीय अंतर
(घ) ग्रामीण क्षेत्रों का विकास
उत्तर – (क) आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों का विकास

प्रश्न 2. आई.टी.डी.पी. निम्नलिखित में से किस संदर्भ में वर्णित है?
(क) समन्वित पर्यटन विकास प्रोग्राम
(ख) समन्वित यात्रा विकास प्रोग्राम
(ग) समन्वित जनजातीय विकास प्रोग्राम
(घ) समन्वित परिवहन विकास प्रोग्राम
उत्तर – (ग) समन्वित जनजातीय विकास प्रोग्राम

प्रश्न 3. इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र में सतत्पोषणीय विकास के लिए इनमें से कौन-सा सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है?
(क) कृषि विकास
(ख) पारितंत्र विकास
(ग) परिवहन विकास
(घ) भूमि उपनिवेशन
उत्तर – (क) कृषि विकास

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।

प्रश्न 1. भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम के सामाजिक लाभ क्या हैं?
उत्तर – भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम के सामाजिक लाभ निम्नलिखित हैं- 

➡साक्षरता दर में तेजी से वृद्धि हुई।

➡ महिला साक्षरता दर 1971 में 1.88 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 65 प्रतिशत हो गई।
➡साक्षरता स्तर और लैंगिक असमानता में पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर में काफी गिरावट आई है।
➡लिंगानुपात में सुधार हुआ है।
➡बाल विवाह में तेजी से कमी आई है।
➡सड़कों, स्कूलों और अस्पताल की उपलब्धता के मामले में बुनियादी ढांचे में तेजी से वृद्धि हुई है।
➡पहले, गद्दी के पास निर्वाह कृषि पद्धतियां थीं, लेकिन पिछले तीन दशकों में दालों और नकदी फसलों की खेती में वृद्धि हुई है।
➡पशुचारण के महत्व में गिरावट आई है, क्योंकि अब तक केवल 10% आबादी ही ऋतू-प्रवास करती है।

प्रश्न 2. सतत्पोषणीय विकास की संकल्पना को परिभाषित करें।
उत्तर – सतत्पोपणीय विकास का तात्पर्य ऐसा विकास से है जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियाँ की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति की जाती है। अर्थात सतत्पोपणीय विकास एक बहुआयामी संकल्पना है और अर्थव्यवस्था, समाज तथा पर्यावरण में सकारात्मक व अनुत्क्रमीय परिवर्तन का द्योतक है।

प्रश्न 3. इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र का सिंचाई पर क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ा?
उत्तर – नहरी सिंचाई के प्रसार से इस प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में रूपांतरित हो गई है। इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक फसलें उगाने के लिए मृदा नमी सबसे महत्त्वपूर्ण सीमाकरी कारक रहा है। यहाँ की पारंपरिक फसलों, चना, बाजरा, और ज्वार का स्थान गेहूँ, कपास, मूंगफली और चावल ने ले लिया है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।

प्रश्न 1. सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम और कृषि जलवायु नियोजन पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें। ये कार्यक्रम देश में शुष्क भूमि कृषि विकास में कैसे सहायता करते हैं?
उत्तर- सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम और कृषि जलवायु नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत चौथी पंचवर्षीय योजना में हुई। इसका उद्देश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगो को रोजगार उपलब्ध करवाना और सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए उत्पादन के साधनों को विकसित करना था। पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में इसके कार्यक्षेत्र को और विस्तृत किया गया। इसमें सिंचाई परियोजनाओं, भूमि विकास कार्यक्रमों, वनीकरण, चरागाह विकास और आधारभूत ग्रामीण अवसंरचना जैसे विद्युत, सड़कों, बाजार, ऋण सुविधाओं और सेवाओं पर जोर दिया गया।       

             पिछड़े क्षेत्रों के विकास की राष्ट्रीय समिति ने इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन की समीक्षा की जिसमें यह पाया गया कि सूखा संभावित क्षेत्रों में वैकल्पिक रोजगार अवसर पैदा करने की आवश्यकता है। इन क्षेत्रों का विकास करने की अन्य रणनीतियों में सूक्ष्म-स्तर पर समन्वित जल-संभर विकास कार्यक्रम अपनाना चाहिए। इन क्षेत्रों के विकास की रणनीति में जल, मिट्टी, पौधों, मानव तथा पशु जनसंख्या के बीच पारिस्थितिकीय संतुलन, पुनःस्थापन पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।          

              1967 में योजना आयोग ने देश में 67 जिलों की पहचान सूखा संभावी जिलों के रूप में की। 1972 में सिंचाई आयोग ने 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र का मापदंड लेकर सूखा संभावी क्षेत्रों का परिसीमन किया। भारत में सूखा संभावी क्षेत्र मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के रायलसीमा और तेलंगाना पठार, कर्नाटक पठार और तमिलनाडु की उच्च भूमि तथा आंतरिक भाग के शुष्क और अर्ध-शुष्क भागों में फैले हुए हैं। पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्र सिंचाई के प्रसार के कारण सूखे से बच जाते हैं।

प्रश्न 2. इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सतत्पोषणीय विकास को बढ़ावा देने के लिए उपाय सुझाएँ।
उत्तर – इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र में सतत्पोषणीय विकास को बढ़ावा देने वाले कुछ उपाय इस प्रकार हैं-पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है जल प्रबंधन नीति का कठोरता से कार्यान्वयन करना। इस नहर परियोजना के प्रथम चरण में कमान क्षेत्र में फसल रक्षण सिंचाई और द्वितीय चरण में फसल उगाने और चरागाह विकास के लिए विस्तारित सिंचाई का प्रावधान है। इस क्षेत्र में शस्य प्रतिरूप में सामान्यतः जल सघन फसलों को नहीं बोया जाना चाहिए। इसका पालन करते हुए किसानों का बागाती कृषि के अंतर्गत खट्टे फलों की खेती करनी चाहिए।

           कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम जैसे नालों को पक्का करना, भूमि विकास तथा समतलन और वारबंदी (ओसरा) पद्धति (निकास के कमान क्षेत्र में नहर के जल का समान वितरण) प्रभावी रूप से कार्यान्वित की जाए ताकि बहते हुए जल की क्षति मार्ग में कम हो सके।

           इस प्रकार जलाक्रांत एवं लवण से प्रभावित भूमि का पुनरूद्धार किया जाएगा। वनीकरण, वृक्षों का रक्षण मेखला (shelterbelt) का निर्माण और चरागाह विकास इस क्षेत्र, विशेषकर चरण-2 के भंगुर पर्यावरण, में पारितंत्र-विकास (eco-development) के लिए अति आवश्यक है। इस प्रदेश में सामाजिक सतत् पोषणता का लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है यदि निर्धन आर्थिक स्थिति वाले भूआवंटियों को कृषि के लिए पर्याप्त मात्रा में वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध करवाई जाए। मात्र कृषि और पशुपालन के विकास से इन क्षेत्रों में आर्थिक सतत्पोषणीय विकास की अवधारणा को साकार नहीं किया जा सकता।

           कृषि और इससे सम्बन्धित क्रियाकलापों को अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों के साथ विकसित करना पड़ेगा। इनसे इस क्षेत्र में आर्थिक विविधीकरण होगा तथा मूल आबादी गाँवों, कृषि-सेवा केन्द्रों (सुविधा गाँवों) और विपणन केन्द्रों (मंदी कस्बों) के बीच प्रकार्यात्मक संबंध स्थापित होगा।


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PREVIOUS YEAR QUESTION PAPER सम्पूर्ण हल सहित (बिहार बोर्ड भूगोल 12वीं कक्षा)

अध्याय 8 निर्माण उद्योग (Manufacturing Industries)

इकाई -3 अध्याय 8 निर्माण उद्योग (Manufacturing Industries)

बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)

अध्याय 8 निर्माण उद्योग

अध्याय 8 निर्माण उद्योग

(क) नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए:

प्रश्न 1. कौन-सा औद्योगिक अवस्थापना का एक कारक नहीं है?
(क) बाजार
(ख) पूँजी
(ग) जनसंख्या घनत्व
(घ) ऊर्जा
उत्तर – (ग) जनसंख्या घनत्व

प्रश्न 2. भारत में सबसे पहले स्थापित की गई लौह-इस्पात कंपनी निम्नलिखित में से कौन-सी है?
(क) भारतीय लौह एवं इस्पात कंपनी (आई.आई.एस.सी.ओ.)
(ख) टाटा लौह एवं इस्पात कंपनी (टी.आई.एस.सी.ओ.)
(ग) विश्वेश्वरैया लौह तथा इस्पात कारखाना
(घ) मैसूर लौह तथा इस्पात कारखाना
उत्तर – (ख) टाटा लौह एवं इस्पात कंपनी (टी.आई.एस.सी.ओ.)

प्रश्न 3. मुंबई में सबसे पहला सूती वस्त्र कारखाना स्थापित किया गया, क्योंकिः
(क) मुंबई एक पतन है
(ख) यह कपास उत्पादक क्षेत्र के निकट स्थित है
(ग) मुंबई एक वित्तीय केन्द्र था
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 4. हुगली औद्योगिक प्रदेश का केन्द्र है-
(क) कोलकाता-हावड़ा
(ख) कोलकाता-मेदनीपुर
(ग) कोलकाता-रिशरा
(घ) कोलकाता-कोन नगर
उत्तर – (क) कोलकाता-हावड़ा

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन-सा चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है?
(क) महाराष्ट्र
(ख) पंजाब
(ग) उत्तर प्रदेश
(घ) तमिलनाडु
उत्तर – (ख) पंजाब

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
प्रश्न 1. लोहा-इस्पात उद्योग किसी देश के औद्योगिक विकास का आधार है, ऐसा क्यों?
उत्तर- लोहा-इस्पात उद्योग किसी देश के औद्योगिक विकास का आधार है क्योंकि लगभग सभी सेक्टर अपनी मूल आधारिक अवसंरचना के लिए मुख्य रूप से लोह-इस्पात उद्योग पर ही निर्भर करते हैं।
प्रश्न 2. सूती वस्त्र उद्योग के दो सेक्टरों के नाम बताइए। वे किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर- भारत में सूती वस्त्र उद्योग को दो सेक्टरों में बाँटा जा सकता है – पहला संगठित सेक्टर और दूसरा विकेंद्रित सेक्टर।
संगठित सेक्टर के अंतर्गत बड़े मिलों में उत्पादित कपड़ा आता है जबकि विकेंद्रित सेक्टर के अंतर्गत हथकरघों (खादी सहित) और विद्युत करघों में उत्पादित कपड़ा आता है।
प्रश्न 3. चीनी उद्योग एक मौसमी उद्योग क्यों हैं?
उत्तर- चीनी उद्योग कृषि-आधारित उद्योग है। कच्चे माल के मौसमी होने के कारण, चीनी उद्योग एक मौसमी उद्योग है।
प्रश्न 4. पेट्रो-रासायनिक उद्योग के लिए कच्चा माल क्या है? इस उद्योग के कुछ उत्पादों के नाम बताइए।
उत्तर- अपरिष्कृत पेट्रोल से कई प्रकार की वस्तुएँ तैयार की जाती हैं जो अनेक नए उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती है, इन्हें, सामूहिक रूप से पेट्रो-रसायन उद्योग के नाम से जाना जाता है। पॉलिस्टर तंजु सूत, नाइलोन चिप्स, नायलान तथा पॉलिस्टर धागा तथा पुनः चक्रित प्लास्टिक आदि पेट्रो-रसायन उद्योग के कुछ उत्पादन हैं।
प्रश्न 5. भारत में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के प्रमुख प्रभाव क्या हैं?
उत्तर – भारत में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने आर्थिक और सामाजिक रूपांतरण के लिए नई संभावनाएं पैदा कर दी हैं। इस विकास का मुख्य प्रभाव रोजगार अवसर के सृजन पर पड़ा है जो प्रतिवर्ष लगभग दुगुना हो रहा है।
(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें
प्रश्न 1. ‘स्वदेशी’ आंदोलन ने सूती वस्त्र उद्योग को किस प्रकार विशेष प्रोत्साहन दिया?
उत्तर- स्वदेशी आंदोलन ने उद्योग को प्रमुख रूप से प्रोत्साहित किया क्योंकि ब्रिटेन के बने सामानों का बहिष्कार कर बदले में भारतीय सामानों को उपयोग में लाने का आह्वान किया गया। 1921 के बाद रेलमार्गों के विकास के साथ ही दूसरे सूती वस्त्र केन्द्रों का तेजी से विस्तार हुआ। दक्षिणी भारत में, कोयंबटूर, मदुरई और बंगलौर में मिलों की स्थापना की गई। मध्य भारत में नागपुर, इंदौर के अतिरिक्त शोलापुर और वडोदरा सूती वस्त्र केन्द्र बन गए। कानपुर में स्थापित निवेश के आधार पर सूती वस्त्र मिलों की स्थापना की गई।
           पत्तन की सुविधा के कारण कोलकाता में भी मिलें स्थापित की गईं। जलविद्युत शक्ति के विकास से कपास उत्पादक क्षेत्रों से दूर सूती वस्त्र मिलों की अवस्थिति में भी सहयोग मिला। तमिलनाडु में इस उद्योग के तेजी से विकास का कारण मिलों के लिए प्रचुर मात्रा में जल-विद्युत शक्ति की उपलब्धता है। उज्जैन, भरूच, आगरा, हाथरस, कोयंबटूर और तिरुनेलवेली आदि केंद्रों में, श्रम लागत के कारण कपास उत्पादक क्षेत्रों से उनके दूर होते हुए भी उद्योगों की स्थापना की गई।
        
         इस प्रकार, भारत के लगभग प्रत्येक राज्य में जहाँ एक या एक से अधिक अनुकूल अवस्थितिक कारक विद्यमान थे, सूती वस्त्र उद्योग स्थापित किए गए। इस प्रकार कच्चे माल के स्थान पर बाजार अथवा सस्ते स्थानिक श्रमिक या विद्युत शक्ति की उपलब्धता अधिक महत्वपूर्ण हो गई।
प्रश्न 2. आप उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से क्या समझते हैं? इन्होंने भारत के औद्योगिक विकास में किस प्रकार से सहायता की है?
उत्तर – नई औद्योगिक नीति के तीन मुख्य लक्ष्य हैं- उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण।       उदारीकरण नीति के अंतर्गत किए गए उपाय निम्नलिखित है-
  • औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था का समापन
  • विदेशी तकनीकी का निःशुल्क प्रवेश
  • विदेशी निवेश नीति
  • पूँजी बाजार में अभिगम्यता
  • खुला व्यापार
  • प्रावस्थबद्ध निर्माण कार्यक्रम का उन्मूलन
  • औद्योगिक अवस्थिति कार्यक्रम का उदारीकरण              

          निजीकरण नीति के अंतर्गत किए गए उपायों में नए सेक्टर जैसे- खनन, दूर संचार राजमार्ग निर्माण और व्यवस्था को व्यक्तिगत कंपनियों के लिए पूरा खोल दिया गया। वैश्वीकरण का अर्थ देश की अर्थव्यवस्था को संसार की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है। भारतीय संदर्भ में इसका निम्नलिखित अर्थ है-

  • भारत में आर्थिक क्रियाओं के विभिन्न क्षेत्रों में, विदेशी कंपनियों को पूँजी निवेश की सुविधा उपलब्ध कराकर, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए अर्थव्यवस्था को खोलना।
  • भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश परे लगे प्रतिबंधों और बाधाओं को खत्म करना।
  • भारतीय कंपनियों को देश में विदेशी कंपनियों के सहयोग से उद्योग खोलने की अनुमति प्रदान करना और उनके सहयोग से विदेशों में साझा उद्योग स्थापित करने के लिए भी प्रोत्साहित करना।
  • पहले शुष्क दर के मात्रात्मक प्रतिबंधों में कमी लाकर बड़ी मात्रा में आयात उदारता कार्यक्रम को कार्यान्वित करना और तब आयात करों के स्तर को ध्यान में रखते हुए उसे नीचे लाना।
  • निर्यात प्रोत्साहन के एक वर्ग के बजाय निर्यात को बढ़ाने के लिए विनिमय दर व्यवस्था को चुनना।

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(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)
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अध्याय 7 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन (Mineral and Energy Resources)

इकाई -3 अध्याय 7 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

(Mineral and Energy Resources)

बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)

अध्याय 7 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

(क) नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से किस राज्य में प्रमुख तेल क्षेत्र स्थित हैं?
(क) असम
(ख) बिहार
(ग) राजस्थान
(घ) तमिलनाडु
उत्तर – (क) असम

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किस स्थान पर पहला परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किया गया था?
(क) कलपक्कम
(ख) नरोरा
(ग) राणाप्रताप सागर
(घ) तारापुर
उत्तर – (घ) तारापुर

प्रश्न 3. निम्नलिखित में कौन-सा खनिज ‘भूरा हीरा’ के नाम से जाना जाता है।
(क) लौह
(ख) मैंगनीज
(ग) लिगनाइट
(घ) अभ्रका
उत्तर – (ख) मैंगनीज

प्रश्न 4. निम्नलिखित में कौन-सा ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है?
(क) जल
(ख) सौर
(ग) ताप
(घ) पवन
उत्तर – (ग) ताप

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें

प्रश्न 1. भारत में अभ्रक के वितरण का विवरण दें।

उत्तर- भारत में अभ्रक मुख्यतः झारखंड, आंध्र प्रदेश व राजस्थान में पाया जाता है। इसके पश्चात् तमिलनाडु, प. बंगाल और मध्य प्रदेश आते हैं। झारखंड में उच्च गुणवत्ता वाला अभ्रक निचले हजारी बाग पठार की 150 कि.मी. लंबी व 22 कि.मी. चौड़ी पट्टी में पाया जाता है। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में सर्वोत्तम प्रकार के अभ्रक का उत्पादन किया जाता है। राजस्थान में अभ्रक की पट्टी लगभग 320 कि.मी. लंबाई में जयपुर से भीलवाड़ा और उदयपुर के आस-पास विस्तृत है।

            कर्नाटक के मैसूर व हासन जिले, तमिलनाडु के कोयम्बटूर, तिरुचिरापल्ली, मदुरई तथा कन्याकुमारी जिले महाराष्ट्र के रत्नागिरी तथा पश्चिम बंगाल के पुरुलियाँ एवं बाँकुरा जिलों में भी अभ्रक के निक्षेप पाए जाते हैं।

प्रश्न 2. नाभिकीय ऊर्जा क्या है? भारत के प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा केंद्रों के नाम लिखें।
उत्तर – ऐसी अभिक्रियाएँ हैं जिसमें परमाणु के नाभिक की संरचना में परिवर्तन हो जाता है। ऐसे परिवर्तनों को नाभिकीय अभिक्रियाएँ कहते हैं और इन अभिक्रियाओं में मुक्त ऊर्जा नाभिकीय ऊर्जा कहलाती है। भारत के प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा केंद्रों के नाम इस प्रकार हैं- तारापुर (महाराष्ट्र), रावत भाटा (राजस्थान), कलपक्कम (तमिलनाडु), नरौरा (उत्तर प्रदेश), कैगा (कर्नाटक) तथा काकरापाड़ा (गुजरात)।
प्रश्न 3. अलौह धातुओं के नाम बताएँ उनके स्थानिक वितरण की विवेचना करें।
उत्तर- अलौह धातुएँ के नाम- बॉक्साइट और ताँबा हैं। उड़ीसा बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक है। कालाहांडी तथा संभलपुर अग्रणी उत्पादक हैं। बोलनगीर तथा कोरापुट में भी बॉक्साइट पाया जाता है। झारखंड में लोहारडागा जिले की पैटलैंडस में इसके समृद्ध निक्षेप हैं। गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु तथा गोआ बॉक्साइट के गौण उत्पादक हैं।
               ताँबा निक्षेप मुख्यतः झारखंड के सिंहभूमि में, मध्य प्रदेश के बालाघाट तथा राजस्थान के झुंझुनु एवं अलवर जिलों में पाए जाते हैं। ताँबा के गौण उत्पादक आंध्र प्रदेश गुंटूरे जिले का अग्निगुंडाला, कर्नाटक के चित्रदुर्ग तथा हासन जिले और तमिलनाडु का दक्षिण आरकाट जिला है।
प्रश्न 4. ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर- सौर, पवन, जल, भूतापीय ऊर्जा तथा जैवभार (बायोमास) ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोत कहलाते हैं। ये स्रोत कम लागत के बावजूद अधिक टिकाऊ, पारिस्थितिक-अनुकूल तथा सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।
(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
प्रश्न 1. भारत के पेट्रोलियम संसाधनों पर विस्तृत टिप्पणी लिखें।
उत्तर- अपनी दुर्लभता और विविध उपयोगों के लिए पेट्रोलियम को तरल सोना कहा जाता है। कच्चा पेट्रोलियम द्रव गैसीय अवस्था के हाइड्रोकार्बन से युक्त होता है तथा इसकी रासायनिक संरचना, रंगों और विशिष्ट धनत्व में भिन्नता पाई जाती है। यह मोटर-वाहनों, रेलवे तथा वायुयानों के अंतर-दहन ईंधन के लिए ऊर्जा का एक अनिवार्य स्रोत है। 
             
       इसके अनेक सह-उत्पाद पेट्रो-रसायन उद्योगों, जैसे कि उर्वरक, कृत्रिम रबर, रेशे, दवाईयाँ, वैसलीन, स्नेहकों, मोम, साबुन तथा अन्य सौंदर्य सामग्री में प्रक्रमित किए जाते हैं।
अपरिष्कृत पेट्रोलियम टरश्यरी युग की अवसादी शैलों में पाया जाता है। व्यवस्थित ढंग से तेल अन्वेषण और उत्पादन 1956 में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग की स्थापना के बाद प्रारंभ हुआ। तब तक असम में डिगबोई एक मात्र तेल उत्पादक क्षेत्र था। हाल ही के वर्षों में देश के दूरतम पश्चिमी एवं पूर्वी तटों पर नए तेल निक्षेप पाए गए हैं। 
       
         असम में डिगबोई, नहारकटिया तथा मोरान महत्त्वपूर्ण तेल उत्पादन क्षेत्र हैं। गुजरात में प्रमुख तेल क्षेत्र अंकलेश्वर कालोल, मेहसाणा, नवागाम, कोसांबा तथा लुनेज हैं मुंबई हाई, जो मुंबई नगर से 160 कि.मी. दूर अपतटीय क्षेत्र में पड़ता है, को 1973 में खोजा गया था और वहाँ 1976 में उत्पादन प्रारंभ हो गया। तेल एवं प्राकृतिक गैस को पूर्वी तट पर कृष्णा-गोदावरी तथा कावेरी के बेसिनों में अन्वेषणात्मक कूपों में पाया गया है।
प्रश्न 2. भारत में जल विद्युत पर एक निबंध लिखें।
उत्तर- भारत में कुल विद्युत ऊर्जा का एक बहुत बड़ा भाग जल विद्युत से प्राप्त किया जाता है। भारत में कुछ प्रमुख जल विद्युत उत्पादन संयंत्रों के नाम इस प्रकार हैं-
(i) भाखड़ा नांगल जल विद्युत परियोजना, पंजाब
(ii) रिहंद जल विद्युत शक्ति गृह, उत्तर प्रदेश 
(iii) पेरियार जल विद्युत केंद्र तमिलनाडु
(iv) टिहरी जल विद्युत परियोजना, उत्तरांचल, 
(v) नर्मदा सरदार सरोवर जल विद्युत परियोजना, गुजरात, 
(vi) नाथवा झापड़ी जल विद्युत परियोजना, डलहौजी, हिमाचल प्रदेश आदि।
                 
               जल विद्युत एक सबसे सस्ता और प्रदूषण मुक्त ऊर्जा का स्रोत है। भारत में हमारी ऊर्जा की माँग के चौथाई भाग की पूर्ति जल विद्युत संयंत्रों द्वारा होती है। जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए नदियों को रोक कर बड़े जलाशयों में जल एकत्र करने के लिए ऊँचे-ऊँचे बाँध बनाए जाते हैं। इन जलाशयों में जल संचित होता रहता है जिसके फलस्वरूप इनमें भरे जल का तल ऊँचा हो जाता हैं बाँध के ऊपरी भाग से पाइपों द्वारा जल, बाँध के आधार के पास स्थापित टरबाइन के ब्लेडों पर मुक्त रूप से गिरता है फलस्वरूप टरबाइन के ब्लेड घूर्णन गति करते हैं और जनित्र द्वारा विद्युत उत्पादन होता है। जल विद्युत ऊर्जा एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत हैं, लेकिन बाँधों का केवल कुछ सीमित क्षेत्रों में ही निर्माण किया जा सकता है। इनके लिए पर्वतीय क्षेत्र अच्छे माने जाते हैं।

               बाँधों के निर्माण से बहुत सी कृषि योग्य भूमि तथा मानव आवास डूबने के कारण, नष्ट हो जाते हैं, बाँध के जल में डूबने के कारण बड़े-बड़े पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो जाते हैं। गंगा नदी पर टिहरी बाँध के निर्माण तथा नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध के निर्माण की परियोजनाओं का विरोध इसी प्रकार की समस्याओं के कारण ही हुआ था।


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(खण्ड 1: मानव भूगोल के मूल सिद्धांत)

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(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)
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अध्याय 6 जल संसाधन (Water Resources)

इकाई -3 अध्याय 6 जल संसाधन (Water Resources)

बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
(खण्ड 2: भारत- लोग और अर्थव्यवस्था)

अध्याय 6 जल संसाधन

अध्याय 6 जल संसाधन

(क) नीचे दिए गए चार विकल्प में से सही उत्तर को चुनिए

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से जल किस प्रकार का संसाधन है?
(क) अजैव संसाधन
(ख) जैव संसाधन
(ग) अनवीकरणीय संसाधन
(घ) चक्रीय संसाधन
उत्तर – (घ) चक्रीय संसाधन

प्रश्न 2. निम्नलिखित नदियों में से देश में किस नदी में सबसे ज्यादा पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधान हैं?
(क) सिंधु
(ख) गंगा
(ग) ब्रह्मपुत्र
(घ) गोदावरी
उत्तर – (ग) ब्रह्मपुत्र

प्रश्न 3. घन कि.मी. में दी गई निम्नलिखित संख्याओं में से कौन-सी संख्या भारत में कल वार्षिक वर्षा दर्शाती है?
(क) 2,000
(ख) 4,000
(ग) 3,000
(घ) 5,000
उत्तर – (ग) 3,000

प्रश्न 4. निम्नलिखित दक्षिण भारतीय राज्यों में से किस राज्य में भौम जल उपयोग (% में) इसके कुल भैम जल संभाव्य से ज्यादा है?
(क) तमिलनाडु
(ख) आंध्र प्रदेश
(ग) कर्नाटक
(घ) केरल
उत्तर – (क) तमिलनाडु

प्रश्न 5. देश में प्रयुक्त कुल जल का सबसे अधिक समानुपात निम्नलिखित सेक्टरों में से किस सेक्टर में है?
(क) सिंचाई
(ख) घरेलू उपयोग
(ग) उद्योग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर – (क) सिंचाई

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें

प्रश्न 1. यह कहा जाता है कि भारत में जल संसाधनों में तेजी से कमी आ रही है। जल संसाधनों की कमी के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर – जल एक चक्रीय संसाधन है जो पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। देश में एक वर्ष में वर्षण से प्राप्त कुल जल की मात्रा लगभग 4,000 घन किमी. है। धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं- नदियाँ, झीलें, तलैया और तालाब। लेकिन जल के अति उपयोग तथा संरक्षण में कमी (प्रदूषण) के कारण इसका संतुलन बिगड़ गया है। जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता जनसंख्या बढ़ने से दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है।

        उपलब्ध जल संसाधन औद्योगिक, कृषि और घरेलू निस्सरणों से प्रदूषित होता जा रहा है और इस कारण उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धता और सीमित होती जा रही है। विस्तृत क्षेत्र बाढ़ तथा सूखे से प्रभावित है। लाखों क्यूसेक जल बिना उपयोग के समुद्र में बहकर चला जाता है। अन्तर्राज्यीय तथा अन्तरदेशीय विवादों ने जल के बँटवारे की समस्या खड़ी कर दी है।

प्रश्न 2. पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु राज्यों में सबसे अधिक भौम जल विकास के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं?
उत्तर – पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु राज्यों में भौम जल का उपयोग सबसे अधिक है। यह इसलिए सम्भव हुआ हैं क्योंकि कृषि के अंतर्गत यहाँ उगाए जाने वाली फसलों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती हैं, जिससे ये राज्य अपने संभावित भौम जल के एक बड़े भाग का उपयोग करते हैं जिससे कि इन राज्यों में भौम जल में कमी आ गयी है।

प्रश्न 3. देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होने की संभावना क्यों है?
उत्तर – कुल जल उपयोग में कृषि सेक्टर का भाग दूसरे सेक्टरों से अधिक है। भविष्य में विकास के साथ-साथ देश में औद्योगिक और घरेलू सेक्टरों में जल का उपयोग बढ़ने की संभावना है। इस कारण देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि का हिस्सा कम होने की संभावना है।

प्रश्न 4. लोगों पर संदूषित जल/गंदे पानी के उपभोग के क्या संभव प्रभाव हो सकते हैं?
उत्तर – जब संदूषित जल संसाधनों तक पहुँचने लगता है, उस समय सुपोषण जैसी घटनाएँ घटती है। सुपोषण के कारण पानी में O2 की मात्रा कम या समाप्त हो जाती है जिसके कारण पानी पर निर्भर करने वाले जीवों का जीवन प्रभावित होता है। खाद्य श्रृंखलाएँ दूषित हो जाती है। कई प्रकार के महामारी रोग जैसे-आंत्रशोथ, पीलिया, हैजा, टाइफॉइड आदि फैलते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।

प्रश्न 1. देश में जल संसाधनों की उपलब्धता की विवेचना कीजिए और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी निर्धारित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर- भारत में विश्व के धरातलीय क्षेत्र का लगभग 2.45 प्रतिशत जल संसाधनों का 4 प्रतिशत, जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत भाग पाया जाता है। देश में एक वर्ष में वर्षण से प्राप्त कुल जल की मात्रा लगभग 4,000 घन कि.मी. है। धरातलीय जल और पुनः पूर्तियोग भौम जल से 1.869 घन कि.मी. जल उपलब्ध है। इसमें से केवल 60 प्रतिशत जल का लाभदायक उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार देश में कुल उपयोगी जल संसाधन 1.122 घन किमी है।
          घरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत है- नदियों, झीलें, तलैया और तालाब।

       देश में कुल नदियों और उनकी सहायक नदियों की संख्या 10360 हैं। भारत में सभी नदी बेसिनों में औसत वार्षिक प्रवाह 1.869 घन कि.मी. होने का अनुमान लगाया गया है। फिर भी स्थलाकृतिक, जलीय और अन्य दबावों के कारण धरातलीय जल का केवल लगभग 690 घन कि.मी. (32%) जल का ही उपयोग किया जा सकता है। नदी में जल प्रवाह इसके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार अथवा नदी बेसिन और इस जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है।

         भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम सकेंद्रित है। भारत में कुछ नदियों जैसे-गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु के जलग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है। ये नदियाँ देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग पर पाई जाती है जिनमें कुल धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया जाता है। दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे-गोदावरी, कृष्णा और कावेरी में वार्षिक में वार्षिक जल प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है लेकिन ऐसा ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिनों में अभी भी संभव नहीं हो सका है।

भारत के नदी तंत्र को चार भागों में बाँटा गया है-
(i) हिमालयी नदियाँ
(ii) दक्षिणी नदियाँ
(iii) तटीय नदियाँ
(iv) अन्तःस्थलीय जल प्रवाह वाली नदियाँ

प्रश्न 2. जल संसाधनों का ह्रास सामाजिक द्वंद्वों और विवादों को जन्म देते हैं। इसे उपयुक्त उदाहरणों सहित समझाइए।
उत्तर- जल संसाधनों का ह्रास द्वंद्वों और विवादों को जन्म देता है। अन्तर्राज्यीय विवादों के कारण बड़े पैमाने पर जल के उपयोग में समस्याएँ पैदा हुई हैं। नर्मदा, चंबल, दामोदर, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, महानदी आदि नदियाँ दो या दो से अधिक राज्यों में से होकर बहती है। अन्य नदियाँ जैसे – गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी, गंडक, सिंधु, सतलुज आदि नदियाँ पड़ोसी देशों से होकर बहती हैं ओर वे अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ हैं। ऐसी परिस्थितियों में से सभी राज्य या देश, जिनसे होकर नदी बहती है, नदी जल के भागीदार बन जाते हैं।         

              ऐसे भी उदाहरण हैं कि राजनीतिक मतभेदों के कारण नदियों के जल का उपयोग नहीं हो पाता है। भारत में ऐसी अनेक समस्याएँ हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल विवाद एक ऐसा ही उदाहरण है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद तथा राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के बीच नदी जल का बँटवारा, कुछ ऐसे ही विवाद है। इन विवादों ने निम्नलिखित समस्याएँ पैदा कर दी है-
(i) लाखों क्यूसेक जल बिना उपयोग के ही बहकर समुद्र में चला जाता है।
(ii) विस्तृत क्षेत्र बाढ़ तथा सूखे से प्रभावित होते हैं।
(iii) लोगों के लिए पीने योग्य जल की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया है।
(iv) सिंचाई की खराब व्यवस्था से जलाक्रान्ति तथा लवणता की समस्या गंभीर हो गई है।

(v) अंतर्राज्यीय तथा अंतरदेशीय विवादों ने जल के बँटवारे की समस्या खड़ी कर दी है।

प्रश्न 3. जल-संभर प्रबंधन क्या है? क्या आप सोचते हैं कि यह सतत पोषणीय विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है?
उत्तर – जल-संभर प्रबंधन से अभिप्राय, मुख्य रूप से, धरातलीय और भौम जल संसाधनों के दक्ष प्रबंधन से है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधियों, जैसे- अंत:स्रवण तालाब, पुनर्भरण, कुओं आदि के द्वारा भौम जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल है। हाँ, जल-संभर प्रबंधन पोषणीय विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।

         जल संभर प्रबंधन का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और समाज के बीच संतुलन लाना है। जल-संभर व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से संप्रदाय के सहयोग पर निर्भर करती है। ‘हरियाली’ केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और वन रोपण के लिए जल संरक्षण के लिए योग्य बनाना है।

           नीरू-मीरू (जल और आप) कार्यक्रम (आंध्र प्रदेश में) और अखारी पानी संसद (अलवर राजस्थान में) के अंतर्गत लोगों के सहयोग से विभिन्न जल संग्रहण संरचनाएँ जैसे-अंत:स्रवण तालाब ताल की खुदाई की गई और रोक बाँध बनाए गए हैं। तमिलनाडु में किसी भी इमारत का निर्माण बिना जल संग्रहण संरचना के नहीं किया जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में जल-संभर विकास परियोजनाएँ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का करने में सफल हुई है। इस एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन उपागम द्वारा जल उपलब्धता सतत पोषणीय आधार पर निश्चित रूप से की जा सकती है।


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