4. सम्भववाद / Possibilism
सम्भववादPossibilism |
सम्भववाद / Possibilism⇒

सम्भववाद का उदय नियतिवाद के विरोध में हुआ। सम्भववाद में जहाँ मानव को श्रेष्ठ बताया गया है वहीं नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ बताया गया है। नियतिवाद में मानव को प्रकृति का दास बताया गया तथा मोम का पुतला कहा गया है। इतना ही नहीं प्रकृति मानव को अपनी इच्छानुसार ढाल सकती है। वहीं सम्भववाद में कहा गया है कि मानव प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है अर्थात मानव प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है तथा मानव प्रकृति के द्वारा खड़ा किए गए अवरोधों को पार कर सकता है। प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार हो सकता है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।
सम्भववाद के उदय का कारण
नियतिवाद का उदय जर्मनी में हुआ जबकि संभववाद का उदय फ्रांस में हुआ। फ्रांस में संभववाद के उदय के कई कारण है। जैसे-
(i) औद्योगिक क्रांति का प्रभाव⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव था जिसमें भूगोलवेत्ताओं ने देखा कि मानव बड़े-2 कल कारखाने स्थापित कर बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करता है।
(ii) इतिहास के घटनाओं का प्रभाव⇒ फ्रांस में अधिकांश भूगोलवेत्ताओं इतिहास के घटनाओं के प्रभाव में थे जिसके कारण लोगों में उन्होंने मानवीय श्रेष्ठता की संकल्पना विकसित किया।
(iii) महानगरों का विकास⇒ फ्रांसीसी विद्वानों ने देखा कि मानव सामूहिक अधिवास करते हुए महानगरों को विकसित कर लिया है। इन महानगरों में सर्वत्र मानवीय श्रेष्ठता दिखाई देती है न कि प्रकृति। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व ही पेरिस और लंदन जैसे नगर महानगरों में बदल चुके थे।
(iv) महाद्वीपीय रेलवे का विकास⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के ऊपर महाद्वीपीय रेलवे का भी प्रभाव था। जैसे-लोगों ने यह देखा था कि प्रकृति ने दूरी और अनेक प्रकार के अवरोध खड़ा कर दिया। मानव को मानव से अलग कर दिया था लेकिन मानव दूरियों को पाटने के लिए सभी अवरोधों को पार कर महाद्वीपीय रेलवे का विकास किया जो प्रकृति पर विजय का अद्भूत उदाहरण है।
(v) वाणिज्य एवं व्यापार⇒ मानव अपने बलबूते कई देशों को गुलाम बनाने में सफल हुआ था वैश्विक वाणिज्य एवं व्यापार का विकास कर मानव ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दी।
उपरोक्त कारणों के ही कारण 19वीं शताब्दी के अन्त आते-आते नियतिवादी चिन्तन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा। भौगोलिक चिन्तन के क्षेत्र में संभववाद का उदय 1900-20ई० तक हुआ। सम्भववाद को व्यवस्थित रूप से विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, ब्रूंश, डिमांजिया, किरचॉफ, जिमरमैन, कार्लसावर, टैथम, ईसा बोमेन जैसे भूगोलवेताओं को जाता है।
“सम्भववाद” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इतिहासकार फेब्रे महोदय ने किया था उन्होंने अपनी पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि “मानव एक पशु के समान नहीं है बल्कि मानव एक भौगोलिक रूप है वह अपनी सोच के आधार पर प्रकृति के नियमों में एवं रचनाओं की विवेचना करता है तथा उसमें परिवर्तन लाता है।”
भूगोल में सम्भववाद के सबसे बड़े समर्थक विडॉल डी ला ब्लाश हुए। ब्लाश न केवल मानव को श्रेष्ठ बताया बल्कि यह भी कहा कि प्रकृति की भूमिका अधिक-से-अधिक सलाहकार की हो सकती है। मानव प्रकृति की सलाह मान भी सकता या नहीं भी। ब्लाश के इस चिन्तन का इतना व्यापक प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेता पर पड़ा था कि वहाँ डी-मोरटोनी को छोड़कर कोई भी विद्वान नियतिवाद समर्थक नहीं निकला।
पॉल वाइडल डि लॉ ब्लाश के एक शिष्य जीन ब्रूंश महोदय थे। उन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था‘ (Robber Economy) की संकल्पना प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने सम्भववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज को बाहर निकाल लेता है और पृथ्वी मूक बनी रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव भूतल पर निवास करता है तथा अपने परिवेश में रहकर कार्य करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मानव प्रकृति का दास है।
ब्लाश के दूसरे शिष्य डिमांजिया थे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में विकसित मानवीय गतिविधि जैसे कृषि, उद्योग को देखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव आस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में भी अपनी परचम (विजयी पताका) लहरा चुका है।
दो अन्य भूगोलवेत्ता किरचॉफ एवं ब्लेंचार्ड ने सम्भववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने यहाँ तक कहा कि मानव कोई मशीन नहीं है कि उसे रिमोट कंट्रोल के द्वारा नियंत्रित किया जा सके। इसी तरह ब्लेंचार्ड महोदय ने नगरीय भूगोल पर शोध करके यह बताया कि नगरों पर ज्यादा मानवीय इच्छाओं का प्रभाव होता है।
अमेरिका में जिमरमैन, कार्लसावर और ईसा बोमैन जैसे संभववादी भूगोलावेत्ता जन्म लिये। जिमरमैन ने कहा कि “संसाधन होते नहीं, बनते हैं।” इनके ही तर्कों का समर्थन करते हुए जापान के पूर्व प्रधानमंत्री टनाका ने कहा कि “जापान का सबसे बड़ा संसाधन उसके पास कोई भी प्राकृतिक संसाधन न होना है।”
अमेरिकी भूगोलवेत्ता ईसा बोमेन ने भी जिमरमैन के समान तर्क प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास कर रहे मानव और उसके समाज के स्वरूप भौतिक कारक सुनिश्चित नहीं करता बल्कि मानव अपने प्रयास से उसके स्वरूप के निर्धारण करता है।
अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्लसावर ने कहा कि पृथ्वी के तल पर सांस्कृतिक भूदृश्य के विकास में प्रकृति का योगदान नहीं होता है बल्कि मानव स्वयं सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण करता है। लेकिन उन्होंने The Morphology of Landscape (भूदश्य की आकारिकी), 1925, नामक शोध लेख में यह स्वीकार किया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्तियाँ मानव को सामान्य रूप से प्रभावित करती है। इसीलिए उन्होंने कहा था कि संभववाद के स्थान पर सांभाव्यवाद की संकल्पना विकसित किया जाए।
इनके संकल्पना को समर्थन करते हुए प्रसिद्ध पारिस्थैतिक वैज्ञानिक बोरो ने “मानव पारिस्थतिकी” (Human Ecology) की संकल्पना विकसित किया जिसमें बताया गया कि “प्रकृति मानव को प्रभावित करता है और मानव प्रकृति को प्रभावित करता है।”
निष्कर्ष
इस प्रकार फ्रांसीसी चिन्तकों ने जर्मन चिन्तकों के समक्ष एक नवीन चिन्तन प्रस्तुत किया अर्थात नियतिवादी के विरोध में सम्भववाद की संकल्पना प्रस्तुत किये। जिसके कारण भूगोल में द्विभाजन का संकट उत्पन्न हो गया है। बाद में ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेत्ताओं के प्रयास से इस विभाजन को रोका गया और यह बताया गया कि नियतिवाद और सम्भववाद की संकल्पना को दो अलग-अलग संकल्पना नहीं माना जाय बल्कि दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाय। इनके प्रयास से भूगोल में नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद का उदय हुआ।
सम्भववाद को दूसरे तरीके से इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-
संभववाद
नियतिवाद के अनुसार “मानव प्रकृति का दास है” या “मानव मोम का पुतला है जिसे प्रकृति इच्छानुसार ढालती है।” इसी के प्रतिक्रिया स्वरूप एक विचारधारा का उदय हुआ जिसे संभववाद कहा गया। अतः संभववाद “मानव की प्रकृति पर विजय, मानव द्वारा प्रकृति पर नियन्त्रण, मानव का सर्वत्र चयन की सुविधा जैसे अर्थों का समाहित किये हुए हैं।” 19वीं शताब्दी के अंत तक नियतिवादी चिंतन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा था। इसका प्रमुख कारण फ्रांस में भूगोल का उदय होना था फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं पर औद्योगिक क्रांति और इतिहास के घटनाओं का स्पष्ट प्रभाव था।
इन दो पृष्ठभूमियों के कारण फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के नियतिवादी दृष्टिकोण को अस्वीकार किया और सम्भववादी दृष्टिकोण का विकास किया।
भौगोलिक चिंतन के क्षेत्र में संभववाद की शुरूआत 1900 से 1920 ई० के मध्य हुआ। संभववाद में “मानवीय श्रेष्ठता” को स्वीकार किया गया है। फ्रांसीसी चिंतकों ने संभववाद के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया कि औद्योगिक क्रांति के बाद प्रकृति की श्रेष्ठता कमजोर हो चुकी है। क्योंकि मनुष्य ने अपने बलबूते उपनिवेश, महाद्वीपीय रेलवे मार्ग, महानगरों तथा वाणिज्य-व्यापार आदि का विकास किया है। ये सभी मानवीय श्रेष्ठता के द्योतक हैं। अतः भूगोल में प्रकृति को नहीं मानव को अध्ययन का केन्द्रीय बिंदु माना जाना चाहिये।
संभववादी चिंतन को व्यवस्थित रूप देकर विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, जीन ब्रूस आदि फ्रांसीसी विद्वानों को है। इसके अतिरिक्त किरचॉफ, ईशा बोमेन, टैथम, कार्ल सवार और जिमरमैन आदि के नाम भी उल्लेखनीय है।
इतिहासकार फेब्र को संभववाद का जनक माना जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम इन्होंने ही संभववाद शब्द का प्रयोग किया था। इन्होंने अपने पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि मानव एक भौगौलिक दूत है, पशु नहीं है, वह सर्वत्र पृथ्वी की रचना की विवेचना में एवं उसके परिवर्तनशील भौगोलिक तत्वों के अभीव्यक्तियों में अपना योगदान देता है। इसलिए मानव का अध्ययन करना भूगोल का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।
भूगोल में संभववाद के सबसे बड़े समर्थक ब्लाश ने न केवल मनुष्य को श्रेष्ठ कहा बल्कि यह भी बताया है की प्रकृति की भूमिका अधिक से अधिक एक सलाहकार के रूप में हो सकती है। मानव उनके बात को मान भी सकते है और नहीं भी मान सकते है। इन्होंने Genres-de-vie की संकल्पना भी इसी संदर्भ में प्रस्तुत किया था।
ब्रूंश नामक फ्रांसीसी विद्वान ब्लाश के माने हुये शिष्य थे। इसने माना कि मानव भूतल पर निवास करता है साथ ही वह अपने परिवेश में रहकर काम करता है, परन्तु इसका अर्थ कदापि नहीं कि वह वातावरण का दास है। वास्तव में वह जब तक जीवित है क्रिया-प्रतिक्रिया करता रहता है। इन्होंने सर्वप्रथम मानव भूगोल को भूगोल के अध्ययन के लिये एक व्यवस्थित उपागम के रूप में संभववाद को स्पष्ट किया था। Robber Economy Concept इसी पर था। जिसमें कहा कि मानव दिन दिहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज संसाधन का दोहन कर रहा है।
डिमाजियाँ भी ब्लाश के शिष्य थे। इन्होंने भी संभववाद का समर्थन किया। संभववाद को उन्होंने आस्ट्रेलिया तथा इजरायल के शुष्क प्रदेशों में मानव के अथक प्रयास एवं सफलता का उदाहरण से पुष्ट करने का प्रयास किया है।
दो अन्य भूगोलवेत्ता किरचॉफ एवं ब्लैन्चार्ड ने भी संभववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने कहा है कि मानव ऐसी मशीन नहीं है जिसकी कोई अपनी इच्छा नहीं है। इसी भाँति ब्लैन्चार्ड ने भी नगरीय भूगोल के विधितंत्र पर शोध लेख एवं अन्य वर्णन प्रस्तुत करते हुये मानवीय प्रभावों का बहुत महत्व दिया।
अमेरिकी चिंतक जिमरमैन, ईशा बोमेन एवं कार्ल सावर ने संभववादी विचार को अभूतपूर्व समर्थन दिया। जिमरमैन ने यहाँ तक लिखा है कि “संसाधन होते नहीं बनते हैं। संसाधन को बनाने का कार्य मानव करता है, इसलिये मानव प्रमुख है। जिमरमैन ने एक मॉडल के द्वारा इसकी पुष्टि की है-
प्रकृति (Nature)
↓
प्राकृतिक तत्व (Natural Elements)
↓
मानव की आवश्यकता (Human Need)
↓
मानव का ज्ञान + तकनीक (Knowledge & Technology)
↓
उपयोगिता (Utility)
↓
संसाधन (Resource)
इस मॉडल के आधार पर यह बताने का प्रयास किया है कि मानवीय अध्ययन को ही केन्द्रीय स्थान दिया जाना चाहिये।
ईशा बोमन ने भी लगभग इसी प्रकार की बात कही है। इनके अनुसार विकासशील मानव समाज की प्रकृति एवं उसके स्वरूप को भौतिक परिवेश ही सुनिश्चित नहीं करता है बल्कि मानव अपने प्रयास से धरातल पर नवीन तत्व के निर्माण को क्षमता रखता है।
कार्ल सावर ने भूतल पर सांस्कृतिक विकास में प्राकृतिक परिवेश के हावी होने की बात को स्वीकार नहीं किया। उसने “The Morphology of Landscape“ नामक अन्य लेख ने बताया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्ति के प्रभाव को सामान्य रूप से स्वीकार तो किया जा सकता है परंतु संभववादी इससे पूर्णतया सहमत नहीं हैं कि परिवेश मानव को पूर्ण रूप से प्रभावित करता है, उसके अनुसार प्रकृति की कुछ सीमाएँ अवश्य निर्धारित करती हैं, परन्तु वहाँ भी मानव के लिये सम्भावनाएँ एवं चयन की सुविधाएं है। इसी तरह प्रसिद्ध पारिस्थैतिक विज्ञानी बोरो ने पर्यावरण की अपेक्षा मनुष्य पारिस्थैतिकी (Human Ecology) की अधिक महत्व दिया। मेकिंडर ने तो यहां तक कहा कि मानव भूगोल ही सामान्य भूगोल है। भूगोल में मानव को अधिक महत्व मिलने लगा। मानव भूगोल की शाखा का विस्तार हुआ।
इस प्रकार फ्रांसीसी चिंतकों ने जर्मनी चिन्तकों के लिये एक वैकल्पिक चिन्तन प्रस्तुत कर द्वैतवाद की स्थिति उत्पन्न कर दी। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के संभववादी चिंतन ने विश्व भूगोल को दो वर्गों में विभाजित कर दिया अर्थात जर्मनी और फ्रांस में अलग-अलग प्रकार से भूगोल का अध्ययन होने लगा। इससे भूगोल के शैशवावस्था में ही विधितंत्र में विभाजन का खतरा उत्पन्न हो गया। बाद में विभाजन को रोकने हेतु टेलर महोदय ने नवनियतिवाद की संकल्पना विकसित की।
आलोचना
संभववाद की सर्वाधिक आलोचना कट्टर नियतिवादियों द्वारा की गयी। बाद में यह आलोचना संभववादियों द्वारा दोहरे वक्तव्य दिये जाने के कारण भी हुई। सेम्पुल ने संभवत: ऐसे ही वक्तव्यों को देखकर चुटकी लेते हुये लिखी है कि “मानव अपनी प्रकृति विजय को डींगे हाँकता-फिरता है, जबकि प्रकृति मौन रहकर भी निरन्तर मानव पर निश्चित प्रभाव डालती रहती है।”
दूसरी आलोचना यह है कि संभववाद भौगोलिक पर्यावरण के अध्ययन को प्रोत्साहन नहीं देता है बल्कि यह भूगोल में Anthropocentric को बढ़ावा देता है।
टेलर ने संभववाद का आलोचना करते हुये लिखा कि भूगोल का कार्य प्राकृतिक वातावरण का अध्ययन और उसका मानव पर प्रभावों का अध्ययन करना है, मानव अथवा सांस्कृतिक भूदृश्य से सम्बन्धित सभी समस्याओं का अध्ययन करना नहीं।
नोट:
♣ Genres-de-vie की संकल्पना फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता पॉल विडाल डी ला ब्लाश (Paul Vidal de la Blache) द्वारा प्रतिपादित की गई थी।
इसका शाब्दिक अर्थ है – “जीवन-शैली” (Way of Life)। अर्थात् Genres-de-vie से आशय किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों की जीवन पद्धति, आजीविका के साधन, सामाजिक व्यवहार, परंपराएँ और पर्यावरण के साथ उनका सामंजस्य से है।
✍️ यह संभववाद (Possibilism) से संबंधित है।
✍️ मनुष्य प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी जीवन-शैली विकसित करता है।
✍️ समान भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले लोगों की जीवन-पद्धति प्रायः समान होती है।
✍️ उदाहरण: मरुस्थलीय क्षेत्र में ऊँट पालन, ध्रुवीय क्षेत्र में मछली पकड़ना आदि।
अतः Genres-de-vie मानव और पर्यावरण के पारस्परिक संबंध को समझाने की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।
YOU TUBE LINK – https://youtu.be/Hzlu7wVDSYM
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