18. आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)

आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)



आलेखी / रैखिक विधि⇒

            आलेखी विधि का प्रयोग कर मानचित्र पर की दूरी को और धरातल के वास्तविक दूरी को मापने हेतु एक रेखा खींचकर उस पर मापनी अंकित कर दिया जाता है।

गुण एवं उपयोगिता के आधार पर रेखीय मापनी निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(1) साधारण रेखीय मापक (Simple Linear Seale)

       यह मानचित्र पर दूरी मापने का सर्वोत्तम Scale है। इस मापनी को मानचित्र के एक भाग में एक साधारण रेखा खींचकर दो भागों में बाँट देते हैं। एक भाग प्राथमिक पैमाना कहलाता है और दूसरा भाग द्वितीयक पैमाना कहलाता है। प्राथमिक पैमाना को हमेशा दाईं ओर प्रदर्शित करते हैं। जबकि द्वितीयक पैमाना को हमेशा बाईं ओर प्रदर्शित करते हैं।          

आलेखी

साधारण रेखीय मापक

       प्राथमिक मापनी में केवल एक उपविभाग होता है जबकि द्वितीयक मापनी में दस उपविभाग होता है। इसका तात्पर्य है कि साधारण मापनी से 1km के 10वें भाग के दूरी को भी ज्ञात कर सकते हैं।

(2) तुलनात्मक मापनी (Comaprative Scale)

        तुलनात्मक मापनी को बनाने के पीछे उद्देश्य यह है कि मानचित्र की विभिन्न मापों के मापकों जैसे- मील और किमी०, मीटर और गज, फैदम और मीटर इत्यादि में एक साथ दूरियाँ ज्ञात कर ली जाय।

       रचना के दृष्टि से तुलनात्मक मापनी भी साधारण मापनी के समान होता है। लेकिन इसमें एक ही स्थान पर दो मापनी अलग-2 इकाई के बना दिये जाते हैं।

तुलनात्मक मापनी

तुलनात्मक मापनी

⇒ तुलनात्मक मापक दो साधारण मापकों का समिश्रण है।

⇒ दोनों साधारण मापक समान लम्बाई के होते हैं।

⇒ दोनों साधारण मापक का मापन एक ही प्रदर्शक भिन्न पर निर्मित किये जाते हैं।


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17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल (Vernier and Diagonal Scale)

17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल

(Diagonal and Vernier Scale)



विकर्ण मापनी (Diagonal Scale)⇒

        विकर्ण मापनी एक ऐसा मापनी है जिसके माध्यम से तीन इकाई तक दूरियों का मापन कर सकते हैं। या इसी शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इसके द्वारा दशमलव के बाद दो अंकों तक (100वाँ भाग तक) की दूरी को ज्ञात किया जा सकता है।

       इस मापनी में विकर्णों की सहायता से द्वितीयक मापनी को पुन: और छोटे-2 भागों में विभाजित कर दिया जाता है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है।

विकर्ण मापनी

विकर्ण मापनी

 

वर्नियर स्केल (Vernier Scale)⇒

वर्नियर स्केल

वर्नियर स्केल

         वर्नियर स्केल एक ऐसा यंत्र है जिसके माध्यम से सूक्ष्म दूरियों को पढ़ा जा सकता है। 

⇒ सर्वेक्षण कार्य के दौरान और वायुयान के पायलट अपने पास वर्नियर स्केल रखते है, ताकि सूक्ष्मतम स्तर तक दूरियों का मापन कर सके।

⇒ वर्नियर पैमाना का आविष्कार पियरे वर्नियर ने किया था।

⇒ सर्वेक्षण के दौरान थियोडोलाइट नामक उपकरण के साथ इसका प्रयोग किया जाता है।

⇒ भारत में वार्नियर स्केल का निर्माण मुजफ्फरनगर के मोती झील (मुहल्ला) में किया जाता है।

⇒ वर्नियर मापनी के द्वारा मापा जाने वाला सबसे छोटी दूरी को Least Count (लीस्ट काउंट) कहते हैं।

Least Count = 1/N XP

यहाँ, P = प्राथमिक मापनी के सबसे छोटे भाग का मान

N = वर्नियर मापनी में बनाए गए भागों की कुल संख्या।

⇒ वर्नियर पैमाना में दो प्रकार का स्केल होता है।

(1) प्राथमिक/प्रधान पैमाना,

(2) वर्नियर पैमाना

⇒ जर्मनी में निर्मित वर्नियर में 0 के स्थान पर “तीर” का  प्रयोग होता है। 

⇒ किसी गोल पृष्ठ वाले सतह का सूक्ष्मतम मोटाई या वक्रता का मापन स्फैरोमीटर के द्वारा करते हैं। 


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21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ

21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ


जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ⇒

           जनसंख्या वितरण एवं घनत्व मानचित्रों का भूगोल के अध्ययन में विशेष महत्व है। इन मानचित्रों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि धरातल, जलवायु तथा अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों का मनुष्य के घनत्व एवं वितरण के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है। समय अथवा स्थान परिवर्तन के साथ-साथ किस प्रकार मनुष्य की भौतिक तथा सामाजिक परिस्थिति परिवर्तित होती है तथा इस परिवर्तन का मनुष्य के वितरण एवं घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है, इन सभी प्रश्नों का उत्तर जनसंख्या-मानचित्र के अध्ययन से प्राप्त होता है।

जनसंख्या मानचित्र के प्र

जनसंख्या मानचित्र के प्रकार

             जनसंख्या मानचित्रों के निम्नलिखित तीन मुख्य प्रकार होते हैं:- 

1. जनसंख्या वितरण मानचित्र (Maps Showing Population Distribution):-

           इस प्रकार के मानचित्रों से जनसंख्या के वितरण का चित्रण किया जाता है। यह चित्रण वास्तविक आंकड़ों (Absolute Figures) के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार के जनसंख्या वितरण मानचित्र जनसंख्या के वितरण का शुद्ध एवं सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या का सांख्यिकीय वितरण भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

2. जनसंख्या घनत्व मानचित्र (Maps Showing Relative Density of Population or Choropleth Maps):-

           इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के औसत घनत्व को प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार मानचित्रों द्वारा क्षेत्र की भौगोलिक एवं अन्य परिस्थितियों का जनसंख्या के घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है। रेखा द्वारा छाया देकर विभिन्न घनत्व प्रदर्शित किए जाते हैं।

3. परिमाणविहीन मानचित्र (Non-Statistical Population Maps or Chorochromatic Maps):-   

           इस प्रकार के मानचित्र द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी ऐसी दशाओं का वितरण प्रस्तुत होता है, जिनमें आंकड़ों की आवश्यकता नहीं होती, जैसे—धर्म, भाषा, जाति, आदि का वितरण। परिमाणविहीन मानचित्रों में नामांकन विधि, चित्रात्मक विधि तथा रंगछाया-विधि द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी दशाओं का क्षैतिज वितरण प्रस्तुत किया जाता है।

             जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को निम्नलिखित विधियों द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

1. समान बिन्दु विधि (Uniform Dot Method):-

             मापनी के अनुसार एक-समान गोलाई के बिन्दुओं द्वारा क्षेत्र की जनसंख्या का क्षेत्रीय वितरण प्रदर्शित किया जाता है। बिन्दुओं को भरने में विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। इसका उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। इस विधि द्वारा जनसंख्या वितरण के प्रदर्शन का मुख्य दोष यह है कि ग्रामीण अथवा शहरी जनसंख्या का अलग-अलग प्रदर्शन इस विधि द्वारा सम्भव नहीं है।

2. आनुपातिक बिन्दु तथा वृत्त विधि (Proportional Dot and Circle Method):-

              इस विधि द्वारा जनसंख्या के वितरण आदि का प्रदर्शन मापनी के अनुसार मानचित्र के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के बिन्दु तथा वृत्त बनाकर किया जाता है। इस विधि का दोष यह है कि कभी-कभी वृत्त एक-दूसरे को ढंक लेते हैं तथा मानचित्र स्पष्ट (Clear) आंकड़े प्रदर्शित नहीं करता।

3. बिन्दु एवं वृत्त विधि (Dot and Circle Method):-

               इस विधि को स्टिलजेनबौर विधि (Stilgenbaur’s Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगर जनसंख्या वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। नगरों की विभिन्न जनसंख्या विभिन्न क्षेत्रफल वाले वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। इस विधि के आंकड़ों के प्रदर्शन हेतु बनाए गए वृत्तों तथा बिन्दुओं के अर्द्धव्यास में महान असमानताएं होने के कारण यह विधि अधिक प्रचलित नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि 1/20 इंच के अर्द्धव्यास का बिन्दु 103 जनसंख्या प्रदर्शित करता है तो 10,00,000 जनसंख्या वाले नगर के लिए 5 इंच के अर्द्धव्यास का वृत्त खींचा जाएगा जो अत्यन्त असंगत होगा। इस दोष को दूर करने के लिए गोलीय आरेखों (Spherical Diagrams) का प्रयोग बिन्दु विधि साथ करते हैं। बिन्दु एवं वृत्त विधि में वृत्तों का अर्द्धव्यास वर्गमूल सूत्र विधि द्वारा निकाला जाता है।

4. बिन्दु एवं गोला विधि (Dot and Sphere Method):-

               इस विधि को स्टेन डी गियर विधि (Sten De Geer Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या गोलों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। गोलों के अर्द्धव्यास विभिन्न नगरों की जनसंख्या के आंकड़ों की सहायता से परिकलित (Calculate) किए जाते हैं। बिन्दु समान अर्द्धव्यास के होते हैं तथा नगरों की जनसंख्या का प्रदर्शन करने वाले गोले मापनी के अनुसार ही अर्द्धव्यास के होते हैं। इनकी मापनी भी बिन्दुओं की मापनी के अनुसार होती है। गोलों का अर्द्धव्यास निकालने के लिए घनमूल मापनी विधि प्रयोग में लाते हैं।

5. आनुपातिक बिन्दु विधि (Multiple Dot Method):-

            इस विधि द्वारा जनसंख्या प्रदर्शन में बिन्दुओं का आकार जनसंख्या के साथ घटता-बढ़ता रहता है। अधिक जनसंख्या प्रदर्शित करने के लिए बड़े आकार के बिन्दु मानचित्र में भरे जाते हैं तथा छोटे आकार के बिन्दु कम जनसंख्या प्रदर्शित करते हैं।

जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन विधियाँ

             जनसंख्या घनत्व मानचित्र मनुष्य तथा भूमि का साधारण आनुपातिक सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के सम्बन्ध को गणितीय घनत्व (Arithmetric Density) भी कहते है। इस घनत्व का यह अर्थ समझा जाता है कि प्रति वर्ग किमी भूमि पर कितने मनुष्य रहते हैं।

             कृषि योग्य भूमि तथा जनसंख्या के घनत्व के सम्बन्ध को भी मानचित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार का घनत्व (Physiological Density) जनसंख्या तथा कृषि योग्य भूमि का आनुपातिक घनत्व कहलाता है। इसी प्रकार जनसंख्या का खेतिहर घनत्व (Agricultural Density) अथवा आर्थिक घनत्व (Economic Density) अथवा पौष्टिक घनत्व (Nutrition Density) आदि का भी प्रदर्शन जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन मानचित्रों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

              इस प्रकार के मानचित्रों में विभिन्न घनत्व प्रदर्शन के लिए साधारण रेखा छाया विधि (Simple Shading Method or Choropleth Method) का प्रयोग करते हैं। इस विधि द्वारा जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन की सीमाओं का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है।

            जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन के लिए समरेखा विधि (Isopleth Method) का भी उपयोग कर सकते हैं, परन्तु यह विधि इस कार्य के लिए अधिक रुचिकर नहीं है तथा प्रचलित भी नहीं है।

              अन्य प्रकार के मानचित्र, जैसे Stock Maps, आदि में बिन्दु विधि तथा छाया विधि प्रयोग में लाते हैं। यही विधि कृषि मानचित्रों (Crop Maps) में क्षेत्रफल अथवा पैदावार की मात्रा प्रदर्शन के लिए प्रयोग की जाती है। फसलों अथवा विशेष क्षेत्रफल के अनुपात के लिए वृत्त चित्रों का प्रयोग करते हैं। जलवायवीय मानचित्रों में समरेखा विधि (Isopleth Method) का प्रयोग करते हैं तथा अन्य प्रकार के मानचित्रों में अन्य यथायोग्य विधियों का प्रयोग करते हैं।

             जनसंख्या की वृद्धि रैखिक आरेख (Line Graph) द्वारा आयु तथा लिंग-भेद (Age and Sex Structure) पिरामिड विधि द्वारा तथा व्यावसायिक विशेषताएँ (Occupational Structure) चक्राकार आरेख (Wheel Diagrams) अथवा दण्डारे (Bar Diagrams) द्वारा प्रदर्शित करते हैं।


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16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप

16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप



रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Projection)

⇒ किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वेच्छा के अनुसार छाटे गये सिद्धांतों पर निर्मित प्रक्षेप को रूढ़ प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप पर समस्त संसार की मानचित्र बनायी जाती है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप इतना संशोधित प्रक्षेप है कि इसे न तो शंकु, न बेलनाकार, न खमध्य प्रक्षेप के वर्ग में रखते हैं। अत: यह पूर्णतः गणितीय विधि पर आधारित है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:-

(1) मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सिनुस्वायडल प्रक्षेप

(1) मॉलवीड प्रक्षेप  (Mollweide’s Projection)

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप का निर्माण 1805 ई० में जर्मन मानचित्रकार ब्रेडन मॉलवीड ने किया था।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण पाया जाता है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण उत्पन्न करने के लिए दो प्रकार के संशोधन किये जाते हैं:

(i) मॉलवीड प्रक्षेप में 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा को एक वृत्त मानते हुए दिखाया जाता है जिसका अर्द्धव्यास (त्रिज्या) √2 x R होता है।

(ii) भूमध्यरेखा की लम्बाई केन्द्रीय मध्याहन रेखा की दुगनी होती है अर्थात् प्रक्षेप में बनाये गये वृत्त के अर्द्धव्यास का चार गुणा (4 x√2 x R) के बराबर भूमध्यरेखा होती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप पृथ्वी के वास्तविक अर्द्धव्यास को भी घटाकर निर्मित होता है।

⇒ सभी अक्षांश वृत्त सरल और समान्तर रेखाओं की तरह होते हैं। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होती जाती है।

⇒ 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा केन्द्रीय मध्याहन रेखा होती है। यही रेखा एक सरल देशान्तर रेखा होती है। जबकि शेष देशान्तर देखा दीर्घवृताकार होती है।

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा अक्षांश को समकोण पर काटती है, शेष देशान्तर रेखा अक्षांश को तिरछी काटती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी रहती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा से पूरब या पश्चिम की ओर जाने पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटते जाती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप विश्व मानचित्र बनाने हेतु, फसलों के उत्पादन दिखाने हेतु उपयोगी होता है। अत: यह संसार के वितरण मानचित्र बनाने के लिए सबसे उपयोगी है।

रूढ़ प्रक्षेप

मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सैन्सन-फ्लैम्स्टीड या सिनुस्वायडल प्रक्षेप (Sanson-Flamsteed or Sinusoidal Projection)

सिनुस्वायडल प्रक्षेप का निर्माण 1650 ई० में निकोलस सैन्सन ने किया तथा बाद में जॉन फ्लैम्स्टीड ने इसमें संशोधन किया।

⇒ इसीलिए इसे सैन्सन-फ्लैम्स्टीड प्रक्षेप कहते है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप वास्तव में शंक्क्वाकार प्रक्षेप या बोन प्रक्षेप का एक भाग है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर क्षेत्रफल शुद्ध होता है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 2πR के बराबर रखा जाता है। इसलिए भूमध्यरेखा पर लम्बाई शुद्ध होता है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर भूमध्यरेखा की लम्बाई πR के बराबर होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना में Sine Curve (ज्या वक्र) का प्रयोग होता है। इसलिए इसे ज्यावक्रीय या सिनुस्वायडल प्रक्षेप भी कहते हैं।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखायें सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होते हैं।

⇒ विषुवत रेखा मानक अक्षांश रेखा का कार्य करता है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक लम्बवत एवं सरल रेखा होती है। लेकिन शेष सभी देशान्तर रेखाएँ मिश्रित वक्र होती है।

⇒ लेकिन एक ही अक्षांश रेखा पर दो देशान्तर रेखा के बीच की दूरी नियत रहती हैं। 

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा विषुवतीय अक्षांश को समकोण पर काटती है और शेष को तिरछे काटती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा पर मापनी शुद्ध होती है लेकिन अन्य देशान्तर रेखाओं पर अशुद्ध होती है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर सीमावर्ती भागो में आकृति काफी विकृत हो जाती है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप वैसे महाद्वीपों के लिए उपयोगी है जो विषुवत रेखा के दोनों ओ स्थित है। जैसे- अफ्रीका, द० अमेरिका।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1:250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 30 हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) भूमध्य रेखा की लम्बाई = 2πR

= 2× 22/7 × 1″

= 6.28″

(iii) केन्द्रीय मध्याह्न रेखा की लम्बाई = 2πR/2

= 6.28″/2

= 3.14″

रूढ़ प्रक्षेप

सिनुस्वायडल प्रक्षेप

         उपरोक्त  चित्र A के अनुसार 1″ का अर्द्धव्यास लेकर वृत्त के चतुर्थांश ABO की रचना करते हैं। OB रेखा के O बिन्दु पर 30 के अन्तराल पर कोण बनाती हुई OC तथा OD रेखायें खींचते हैं।

    फिर BC की चापीय दूरी से O बिन्दु से एक चाप लगाते हैं जो OC तथा OD कोणिक रेखाओं को क्रमशः E तथा F बिन्दुओं पर काटता है। E तथा F बिन्दुओं से OA रेखा पर EE’ तथा FF’ लम्ब डालते हैं (अर्थात् OB के समान्तर रेखा खींचते हैं)। यही क्षैतिज दूरियाँ प्रक्षेप में सम्बन्धित अक्षांशों पर देशान्तरों के मध्य की दूरी को प्रकट करेंगी।

   अब चित्र B के अनुसार 6.28″ लम्बी क्षैतिज रेखा खींचते हैं जो भूमध्यरेखा कहलाती है। इस रेखा को BC की चापीय दूरी 2πR x Interval/360 से 360/ 30 = 12 समान भागों में विभाजित करते हैं।

   तत्पश्चात् इस रेखा के मध्यवर्ती बिंदु से ऊपर तथा नीचे दोनों ओर NS लम्ब डालते हैं, जिसकी लम्बाई भमध्यरेखा की आधी होती है। अर्थात् NS रेखा पर BC की चापीय दूरी से भूमध्यरेखा के ऊपर तथा नीचे तीन-तीन चिह्न अंकित करते हैं तथा इन चिन्हों से भूमध्यरेखा के समान्तर रेखायें खींचते हैं। ये समान्तर रेखायें क्रमशः 30 तथा 60 उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्त होंगे और N व S बिन्दु क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव होंगे।

     देशान्तर रेखायें बनाने के लिए 30° तथा 60 उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्तों पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दायें-बायें दोनों ओर क्रमशः EE’ एवं FF’ दूरी से छः छः चिह्न लगाते हैं।

     तदुपरान्त अक्षांश वृत्तों पर अंकित समान देशान्तरीय मान वाले इन चिन्हों को ध्रुवों (N तथा S बिन्दुओं) से फ्रेंच कर्व द्वारा मिला कर देशान्तर रेखाओं की रचना पूर्ण करते हैं। चित्र की भांति केन्द्रीय मध्याह्न रेखा को 0° की देशान्तर मान कर शेष देशान्तर रेखाओं पर उनके अंशों में मान अंकित करते हैं।



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15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना (Comparison Between Mercator’s and Gall Projection)

15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना



मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना⇒

मर्केटर प्रक्षेप  गॉल प्रक्षेप 
(1) मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्य रेखा की लम्बाई 2πr होती है। (1) गॉल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 45° अक्षांश के बराबर होती है।
(2) मर्केटर प्रक्षेप में ध्रुव को नहीं दिखाया जा सकता। (2) गॉल प्रक्षेप में ध्रुव को दिखाया जा सकता है।
(3) मर्केटर प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत केन्द्र पर होता है। (3) गॉल प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत विषुवत रेखा के ठीक  180 पर होता है।
(4) इसमें आकृति और दिशा शुद्ध होता है। (4) गॉल प्रक्षेप में आकृति, दिशा और क्षेत्रफल तीनों अशुद्ध होती है।
(5) सभी देशान्तर रेखाएँ Great Circle होती है। (5) इसमें यह गुण नहीं होता है।
(6) मर्केटर में रम्ब लाइन खींचा जाता है। (6) गॉ में रम्ब लाइन नहीं खींचा जाता है।
(7) मर्केटर प्रक्षेप नौसंचालन के लिए उपयुक्त है। (7) गॉल प्रक्षेप राजनीतिक मानचित्र के लिए उपयुक्त है।

मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप


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14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)

14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)



गॉल प्रक्षेप⇒

⇒ गॉल एक संशोधित बेलनाकार प्रक्षेप है।

⇒ इसे गॉल का त्रिविम प्रक्षेप भी कहते हैं क्योंकि इसमें प्रकाश के स्रोत विषुवत रेखा के ठीक 180 पर रहता है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में समतल कागज का खोखला बेलन इस प्रकार रखा जाता है कि ग्लोब के 45ºN और 45°S अक्षांश को एक साथ काटता है। अतः इसमें भूमध्यरेखा की लम्बाई पृथ्वी की 45º अक्षांश रेखा के बराबर बनायी जाती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में अक्षांश वृत की लम्बाई एक समान, सीधी एवं समानान्तर होती है।

⇒ प्रत्येक अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45º अक्षांश वृत्त के लम्बाई (2πR Cos45) के बराबर होती है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी बढती है, लेकिन मर्केटर प्रक्षे के तुलना में कम बढ़ती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45° अक्षांश रेखा के बराबर होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ सीधी और समानान्तर होती हैं।

⇒ देशान्तर और अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समकोण पर काटती है।

⇒ केवल 45ºN से 45ºS अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ 45º अक्षांश से विषुवत रेखा की ओर जाने पर मापनी छोटी और ध्रुव की ओर जाने पर मापनी बढ़ी हुई होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर आकृति, क्षेत्रफल और दिशा तीनों अशुद्ध होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर राजनीतिक मानचित्र या दीवारी मानचित्र का निर्माण विशेष तौर पर किया जाता है।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक गॉल्स प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1 : 250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 15 हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई = 2πR Cos45

= 2× 22/7 × 1″ x 0.71

= 4.46″

(iii) Interval Distance (अन्तरालीय दूरी)

= 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई x Interval ÷ 360

= 4.46″ x 15 ÷ 360

= 4.46″ / 24

= .186″

     RF के अनुसार Reduce Radius (RR) = 1″ पर वृत्त NESQ खींचा। केन्द्र O से EQ पर क्रमशः 15°, 30°, 45°, 60°, 75° के कोण बनाती हुई रेखाएं खींची। 45° की रेखा तथा परिधि के कटाव बिन्दु से ध्रुवीय अक्ष से समानान्तर रेखा खींची। सभी अक्षांशों व परिधि व कटान बिन्दु से E को मिलाया। ये रेखाएं अथवा इनके बढ़ाये हुए भाग जहाँ अक्ष के समानांतर खींची गई रेखा से मिलते हैं वह विषुवत रेखा से अक्षांशों की दूरी हुई।

    अतः विषुव अक्ष EQ को आगे बढ़ाया तथा 45° की रेखा पर अन्तरालीय दूरी (.186″) के अनुसार इस पर 24 भाग काट लिए। बिन्दुओं से विषुवत रेखा पर लम्बवत रेखाएं खींचा तथा पूर्व निर्मित रेखा पर प्राप्त कटान बिन्दुओं से विषुवत रेखा के समानान्तर रेखाएं खींचीं जो अक्षांश रेखाएं हैं। इस प्रकार रेखा-जाल तैयार हो जायेगा।

गॉल प्रक्षेप

गॉल प्रक्षेप



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13. Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप)

13. Mercator’s Projection

(मर्केटर प्रक्षेप)



Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप)

⇒ मर्केटर एक बेलनाकार प्रक्षेप है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में आकृति शुद्ध होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप को यथाकृतिक प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप की खोज गिरारडस मर्केटर नामक फ्रेंच मानचित्रकार ने किया।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप का सर्वाधिक प्रयोग नौसंचालन में होता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में बनायी गई भूमध्य रेखा की लम्बाई 2πr या पृथ्वी के वास्तविक परिधि के समतुल्य होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षे पर खींची गई अक्षांश रेखा सीधी, सामानान्तर और लम्बाई में बराबर होती है। 

⇒ देशान्तर रेखाएँ सीधी, परस्पर बराबर और समान्तर होती है तथा दो देशान्तर रेखाओं के बीच दूरी बराबर होती है।

⇒ देशान्तर रेखा और अक्षांश रेखा एक-दूसरे को समकोण पर काटती है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखा की दूरी बढ़ते जाती है। इसीलिए इस प्रक्षेप में आकृति शुद्ध होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्यरेखा पर मापनी शुद्ध होती है क्योंकि इस प्रक्षेप में भूमध्यरेखा पृथ्वी के परिधि के बराबर होती है।

⇒ अन्य अक्षांश रेखाओं पर मापनी बढ़ी हुई होती हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर ध्रुव अनन्त पर होता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में शुद्ध दिशा का गुण पाया जाता है। इसीलिए इसका प्रयोग नौसंचालन में करते हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर क्षेत्रफल अशुद्ध होता क्योंकि भूमध्यरेखा से दूर जाने पर मापनी का मान बढ़ता जाता है।

⇒ अगर मर्केटर प्रक्षेप पर ऐसी सरल रेखा खींची जाए जो समस्त अक्षांश रेखाओं को एक नियत कोण पर काटे तो ऐसी सरल रेखा को Rhumb Lime (रम्ब लाईन) या  Loxodrome Line (लोग्जोड्रम) कहते हैं।

 

 

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ मर्केटर प्रक्षेप में Rhumb Lime (एकदिश नौपथ) होती है क्योंकि सभी देशान्तर रेखाएँ अक्षांश रेखा को एक नियत कोण पर काटती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर राजनीतिक मानचित्र का निर्माण किया जाता है। इसका प्रयोग नौवहन, पवन की दिशा एवं महासागरीय जलधाराओं को प्रदर्शन में किया जाता है।

⇒ इस प्रक्षेप पर संसार का दीवारी मानचित्र (Wall Map) अधिक बनाया जाता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप दो बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम दूरी को उन बिन्दुओं से होकर जाने वाले वृहत वृत्त (Great circle) के सहारे ज्ञात करते हैं।

⇒ मर्केटर पर Great circle का आकार वक्राकार होता है।

⇒ Great circle उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण की ओर मुड़ा होता है।

Mercator's Projection


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12. Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)

12. Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)



Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)⇒

⇒ Zenithal प्रक्षेप में ग्लोब को किसी एक बिन्दु पर समतल कागज स्पर्श करते हुए कल्पना करके भूग्रिड प्रक्षेपित किया जाता है।

⇒ समतल कागज ग्लोब को जिस बिन्दु पर स्पर्श करता है उस बिन्दु को प्रक्षेप केन्द्र (Projertion Point) कहते हैं।

⇒ ग्लोब में जिस बिन्दु पर प्रकाश स्थित होता है, उस बिन्दु को नेत्र स्थान या उत्पत्ति बिन्दु कहते हैं।

⇒ Zenithal प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखाएँ संकेन्द्रीय होती है तथा सभी देशान्तर रेखाएँ केन्द्र से निकलने वाली एक सरल रेखा के समान होती है।

⇒ Zenithal प्रक्षेप पर पृथ्वी के केवल आधे भाग को प्रदर्शित किया जा सकता है।

⇒ नेत्र की स्थिति के आधार पर और प्रक्षेपण तल या समतल कागज के स्थिति के आधार पर इस प्रक्षेप को दो भागों में बाँटते हैं।

Zenithal Projection

Zenithal Projection

(1) नेत्र की स्थिति या प्रकाश स्रोत की स्थिति के आधार पर

          नेत्र की स्थिति के आधार पर पुन: इस प्रक्षेप को तीन भागों में बाँटते हैं।

(i) Gnomonic Porojection (केन्द्रक या नोमॉनिक प्रक्षे)

⇒ इसमें प्रकाश का स्रोत ग्लोब के केन्द्र में होता है।

⇒ 60º-90° अक्षांश के बीच के क्षेत्र को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी है।

⇒ अर्थात ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे आर्कटिक और अण्टार्कटिका का प्रदर्शन के लिए उपयोगी है।

(ii) Stereographic Porojection (त्रिविम प्रक्षेप)

⇒ Stereographic प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत ग्लोब के परिधि पर स्थित माना जाता है।

⇒ यह एक ऐसा प्रक्षेप है जिनमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा दोनों को दिखाया जाता है।

⇒ चूँकि इसमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा का प्रदर्शन साथ-2 होता है। इसलिए इस प्रक्षेप को त्रिविम प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ त्रिविम प्रक्षेप किसी भी गोलार्द्ध के फसलों के उत्पादन को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी मानी जाती है।

(iii) Orthographic Porojection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)

⇒ लम्बकोणीय प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत अनन्त पर होता है। यह प्रक्षेप गोलीय मानचित्र के लिए तथा आकाश में तारों की स्थिति के प्रदर्शन हेतु उपयुक्त माना जाता है।

(2) प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर nittual Projection)

         प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर Zenithal Projection तीन प्रकार के होते हैं-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ Polar Zenithal Projection में समतल कागज ध्रुव को स्पर्श करते हुए रखा जाता है।

⇒ इस प्रक्षेप में ध्रुव को केन्द्र मानकर समान दूरी के अन्तर पर संकेन्द्रीय अक्षांश वृत खीचे जाते हैं।

यह प्रक्षेप आर्कटिक क्षेत्रों एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में नौसंचालन के लिए उपयोगी माना जाता है।

⇒ इसमें ध्रुव को एक बिन्दु के रूप में प्रकट किया जाता है।

⇒ प्रत्येक देशान्तर पर मापनी शुद्ध होता है।

⇒ ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जाने पर अक्षांश पर मापनी अशुद्ध होने लगती है।

⇒ Polar Zenithal Projection समदूरस्थ का गुण होता है।

(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को विषुवत रेखा से स्पर्श करते हुए खींचा जाता है।

⇒ भूमध्यरेखीय क्षेत्र के वायुमार्ग और नौसंचालन से संबंधित मानचित्रों के लिए उपयोग है।

(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को 60° अक्षांश रेखा से स्पर्श करते हुए रखा जाता है। अर्थात इसमें स्पर्शी बिन्दु विषुवत रेखा एवं ध्रुव के मध्य स्थित माना जाता है।

नोट: लैम्बर्ट महोदय ने ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप में गणितीय विधि से संशोधन कर एक ऐसा प्रक्षेप बनाया जिसमें समक्षेत्रफल का गुण था। ऐस प्रक्षेप को लैम्बर्ट प्रक्षेप भी कहते हैं। इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्र बनाने हेतु उपयोगी माना जाता है।

          इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर जाने पर भूमध्य रेखा पर मापनी घटने लगती है लेकिन अक्षांश रेखा पर मापनी का मान बढ़ने लगती है। इसीलिए यह एक समक्षेत्र प्रक्षेप कहलाता है।


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11. बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)

11. बेलनाकार प्रक्षेप

(Cylindrical Projection)



बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)⇒

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में प्रकाश के स्रोत को ग्लोब के केन्द्र में स्थिर रखा जाता है और कागज को ग्लोब पर खोखले बेलन के रूप में लपेटकर अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं के रेखाजाल को समतल कागज पर उतारने का प्रयास किया जाता है।

⇒ सामान्य दशा में कागज का खोखला बेलन भूमध्यरेखा को स्पर्श करता है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी के ध्रुवीय अक्ष और खोखले बेलन का अक्ष एक ही हो जाता है।

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में सभी अक्षांश वृत की लम्बाई एक समान होती है तथा सीधी एवं समान्तर रेखा के रूप में होती है।

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप पर मध्य अक्षांशीय क्षेत्र और ध्रुवीय क्षेत्र में विवर्धन का गुण पाया जाता है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ समान लम्बाई वाली सरल एवं समान्तर रेखाओं के समान होती है तथा देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी भी एक समान होती है। 

⇒ प्रत्येक अक्षांश रेखा देशान्तर को समकोण पर काटती है।

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में गणितीय विधि से सुधार लाकर अलग-2 प्रक्षेप बनाये जाते हैं। जैसे-समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप, बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप



(1) समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Equi-Distance Projection)



          इस प्रक्षेप में आक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ परस्पर समान दूरी के अंतर पर बनायी जाती है। इसीलिए इसे समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप के नाम से पुकारा जाता है।

⇒ चूँकि समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप को सर्वप्रथम प्लेट कैरी ने बनाया था। इसलिए इसे प्लेट कैरी प्रक्षेप भी कहा जाता है। 

⇒ यह एक बेलनाकार प्रक्षेप का उदाहरण है, इसलिए इसमें सभी समदूरस्थ का गुण होता है।

⇒ अक्षांश वृत और देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी नियत रहती है। जिसके कारण दो क्रमबद्ध अक्षांश और दो क्रमबद्ध देशांतर रेखाओं के बीच का क्षेत्र एक वर्ग के समान दिखाई देती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं की लम्बाई भूमध्यरेखा के बराबर होती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाएँ सीधी एवं समान्तर होती है। 

⇒ देशान्तर रेखाएँ भी सीधी एवं समान्तर होती है। लेकिन देशान्तर रेखाओं की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी होती है।

⇒ खोखला बेलनाकार कागज केवल विषुवत रेखा को स्पर्श करता है। इसलिए उस पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ इसमें ध्रुव भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश वृत्तों की लम्बाई वास्तविक लम्बाई से बढ़ती जाती है।

⇒ सम्दूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप न तो यथाकृति और न ही समक्षेत्र  का गुण होता है। 

⇒ विषुवत रेखा के आस-पास क्षेत्रों को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी है अर्थात् इस पर विषुवतीय प्रतिरोधी जलधारा, विषुवतीय पछुवा हवा इत्यादि प्रदर्शित कर सकते है।

उदाहरण 1. 1:370,000,000 मापनी एवं 30º अंतराल पर संसार का मानचित्र बनाने के लिए एक समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप बनाइए।

रचना विधि :

प्रश्न के अनुसार,

1. पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास,

R(RR) = 635000000/370000000 = 1.72cm

2. भूमध्यरेखा की लंबाई = 2πR = 2 x 22 x 1.72/7 = 10.81 cm

3. दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी

= 2πR x अंतराल (अंश)/360 = 10.81×30/360 = 0.90 cm

   अब 10.81 cm लंबी AB सरल रेखा खींचिए। यह प्रक्षेप में भूमध्यरेखा होगी। इस रेखा के A बिन्दु पर CD तथा B बिन्दु पर EF लंब उठाइए। अब 0.90 cm दूरी के अंतराल पर AB रेखा को 12 समान भागों में विभाजित कीजिए तथा विभाजक बिन्दुओं से CD के समान भूमध्य रेखा के दोनों ओर लंब खीचिए। ये लंब प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं को प्रकट करेंगे। A बिन्दु के दोनों ओर CD रेखा पर 0.90 cm के अंतर पर 3-3 चिह्न लगाइए एवं इन चिह्नों से भूमध्यरेखा के समानांतर रेखाएँ खींचकर आक्षांश वृत्त पूर्ण कीजिए।



(ii) बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप (Cylindrical Equal Area Projection)



⇒ बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप को सर्वप्रथम लैम्बर्ट महोदय ने बनाया था। इसलिए इसे लैम्बर्ट या Equal Area Projection भी कहते हैं।

⇒ इसमें अक्षांश वृत्त सीधा एवं समान्तर रेखा के समान होता है।

⇒ सभी अक्षांश वृत की लम्बाई भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर होता है। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होते जाती है।

देशान्तर रेखाएँ सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होती है।

इसमें भी ध्रुव को भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर प्रदर्शित किया जाता है।

भूमध्यरेखा पर मापनी शुद्ध होती हैं लेकिन अक्षांश रेखाओं पर अशुद्ध होती है।

बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप में देशान्तर रेखाओं को पृथ्वी ध्रुवीय व्यास के बराबर बनायी जाती है। जिसके कारण देशान्तर रेखाओं के मापनी अशुद्ध हो जाते हैं।

⇒ विषुवत रेखा से ध्रुवा की ओर जाने पर आकृति विकृत होने लगता है।

इसका प्रयोग कभी-2 वितरण मानचित्र को प्रदर्शित करने में किया जाता है।

विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर जाने पर आकृति विकृत होने के कारण इसे “Wrinkal Projection” भी कहते हैं।

बेलनाकार प्रक्षेप




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 10. बोन तथा बहुशंकुक प्रक्षेप (Bonne’s and Polyconic Projection)

10. बोन तथा बहुशंकुक प्रक्षेप

(Bonne’s and Polyconic Projection)



बोन प्रक्षेप ⇒

⇒ बोन प्रक्षेप की रचना सर्वप्रथम रिगोवर्ट बोन ने किया था।

⇒ बोन प्रक्षेप एक ऐसा शंकु प्रक्षेप है जिसमें सभी अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है। इसलिए इसे समक्षेत्र प्रक्षेप कहा जाता है।

⇒  सभी अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी एक समान तथा संकेन्द्रीय होती है।

⇒ अक्षांश रेखा वक्राकार होती है।

⇒ शुद्ध क्षेत्रफल प्राप्त करने हेतु इसमें देशान्तर रेखाओं का भी वक्र बनाया जाता है। लेकिन केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक सरल रेखा के समान होती है।

⇒ बोन प्रक्षेप में ध्रुव को एक बिन्दु के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ अलग-2 अक्षांश रेखाओं पर दो देशान्तरों के बीच की दूरी अलग-2 होती है।

⇒ चूँकि केन्द्रीय मध्याहन रेखा पूर्णत: एक सरल रेखा होती है। इसलिए शेष देशान्तर रेखाओं के तुलना में इस रेखा पर मापनी सर्वाधिक शुद्ध होती है।

⇒ बोन प्रक्षेप में अधिक से अधिक एक गोलार्द्ध को दिखाया जा सकता है। यह प्रक्षेप वैसे देशों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है जिनका लम्बाई एवं चौड़ाई एक समान है। जैसे- फ्रांस, स्वीट्जरलैण्ड, बेल्जियम इत्यादि।

⇒ बोन प्रक्षेप वैसे देशों के लिए उपयोगी है जिनका देशान्तरीय विस्तार कम है। जैसे- चिली।

⇒ बोने प्रक्षेप वितरण मानचित्र के लिए काफी उपयोगी है।

बोन तथा बहुशंकुक प्रक्षे


बहुशंकुक प्रक्षेप (Polyconic Projection)


⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप की रचना सर्वप्रथम फर्डिनेण्ड हेस्लर ने किया था।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में प्रत्येक अक्षांश मानक अक्षांश होता है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप को यह मानकर बनाया गया है कि प्रक्षेप में प्रदर्शित वाले अक्षांश वृतों पर अलग-अलग कागज के शंकु रखे गये है। इसीलिए इसे बहुशंकु प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखा संकेन्द्रीय नहीं होती है।

⇒ बहुशंकुक में अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ वक्राकार होती है। लेकिन भूमध्यरेखा को अगर प्रदर्शित किया जाता है तो वह एक सीधी रेखा होती है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक सीधी रेखा होती है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा सभी अक्षांश रेखा को समकोण पर काटती है। जबकि अन्य देशान्तर रेखाएँ 90° पर नहीं काटती है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा पर और सभी अक्षांश रेखा पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ अक्षांश वृतों के संकेन्द्रीय न होने के कारण न तो यह समक्षेत्र प्रक्षेप है और न ही यथाकृति प्रक्षेप।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षे वैसे देशों के लिए उपयोगी है जिनका पूरब-पश्चिम के विस्तार कम तथा उत्तर-दक्षिण के विस्तार अधिक होता है। जैसे- आर्जेन्टिना, चिली, जापान, इटली वियतनाम, भारत का NH-7।

बहुशंकुक प्रक्षेप


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 9. शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)

शंकु प्रक्षेप

(Conical Projection)

शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)⇒

  शंकु प्रक्षेप

 

⇒ ग्लोब को कागज के शंकु द्वारा इस प्रकार ढँका जाता है कि कागज के शंकु किसी एक अक्षांश पर ही ग्लोब को चारों ओर स्पर्श करता हो।

⇒ ग्लोब पर अंकित भूग्रिड को कागज के  शंकु पर स्थानान्तरित करके एवं स्थानांतरण के बाद शंकु वाले कागज को फैला दिया जाता है।

⇒ शंकु प्रक्षेप में कागज का शंकु विषुवत रेखा और ध्रुव को कभी नहीं छूता।

⇒ शंकु प्रक्षेप में कागज का शंकु ग्लोब के जिस अक्षांश को स्पर्श करता है उस अक्षांश को मानक अक्षांश (Standard Parallel) कहते हैं।

⇒ शंकु प्रक्षेप में अक्षांश की आकृति वृत के चाप (Arc of Circle) के समान होता है तथा दो अक्षांशों के बीच की दूरी समान होती है।

⇒ देशान्तर रेखा ध्रुव से बाहर निकलता हुआ प्रतीत होता है तथा एक सरल रेखा के समान होती है।

⇒ विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर जाने पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटती जाती है।

⇒ शंकु प्रक्षेप पर विषुवतीय एवं ध्रुवीय क्षेत्र को कभी भी प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है।

⇒ शंकु प्रक्षेप में अक्षांश और देशान्तर रेखा एक-दूसरे को समकोण पर काटती है।

⇒ मानक अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है, शेष अक्षांश रेखाओं पर नहीं।

⇒ शंकु प्रक्षेप पर शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र या मध्य अक्षांशीय क्षेत्र के मानचित्र बनाने के लिए उपयोगी माना जाता है। जबकि ध्रुव और विषुवत रेखा के लिए अनुपयोगी माना जाता है।

शंकु प्रक्षेप कई प्रकार के होते हैं-

(i) एक मानक अक्षांश वाला शंकु प्रक्षेप (One Standard Parallel Parallel Projection या Simple Conical Projection with one Standard Parallel)

⇒ इस प्रक्षेप में ध्रुव को केन्द्र मानकर अक्षांश रेखाओं का चाप खींचा जाता है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाएँ संकेन्द्रीय होती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाएँ एक चाप के समान होती है जबकि देशान्तर रेखाएँ सरल रेखा के समान होती है।

⇒ इसमें ध्रुव को एक चाप के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। 

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ ध्रुवों पर आकर मिल जाती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी समान रहती है। लेकिन देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी ध्रुव की ओर जाने पर घटती है जबकि विषुवत रेखा की ओर जाने पर बढ़ती है।

⇒ केवल मानक अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है, इसलिए इसे समदूरस्थ मानचित्र प्रक्षेप (Equidistance Conical Projection) कहते हैं।

⇒ मानक अक्षांश रेखा पर आकृति एवं क्षेत्रफल बहुत सीमा तक शुद्ध रहती है। लेकिन मानक अक्षांश रेखा से दूर जाने पर आकृति एवं क्षेत्रफल में विकृति आती-जाती है।

⇒ यह प्रक्षेप मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में स्थित छोटे-छोटे आकार वाले देशों का मानचित्र बनाने के लिए उपयोगी है। जैसे- स्वीट्जरलैण्ड 

⇒ दूसरे शब्दों में यह प्रक्षेप उन देशों के मानचित्र बनाने के लिए उपयोगी है जिनका अक्षांशीय विस्तार कम है।

          इस प्रकार के प्रक्षेप में विषुवत रेखा और देशान्तर रेखा की मानचित्र पर दूरियों का अनुपात π के बराबर होता है।

शंकु प्रक्षेप

उदाहरण 1. निम्नलिखित विवरण के आधार पर एक मानक अक्षांश वाला साधारण शंकु प्रक्षेप बनाइए :

मापनी: 1:250,000,000; मानक अक्षांश – 60º N, क्षेत्र का विस्तार – 30º N से 75º N अक्षांश तथा 60º W से 60º E देशांतर, अंतराल – 15º

Construct a Simple Conical Projection with One Standard Parallel based on the following data:

  • Scale: 1 : 250,000,000
  • Standard Parallel: 60° N
  • Extent of the Area: 30° N to 75° N Latitudes and 60° W to 60° E Longitudes
  • Interval: 15° for both Latitudes and Longitudes.

हल : दी गई मापनी के अनुसार, RR = 250000000/250000000 =1″

     अब 1″ अर्द्धव्यास लेकर वृत्त का चतुर्थांश ABO खींचिए। OB रेखा के O बिन्दु पर 15º अंतराल के बराबर कोण DOB तथा मानक अक्षांश के बराबर कोण COB बनाइए। C बिन्दु पर लंब उठाइए जो बढ़ायी गयी OA रेखा को P बिन्दु पर काटता है। अब O को केन्द्र मानकर BD अर्द्धव्यास से वृत्तांश खींचिए जो OC रेखा को E बिन्दु पर काटता है। E बिन्दु से OA रेखा पर EF लंब खीचिए।

     प्रक्षेप बनाने के लिए एक लंबवत् सरल रेखा P’G खींचिए जो इस प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याह्न रेखा होगी तथा प्रश्न के अनुसार इसका मान 0º देशांतर होगा। अब PC के बराबर दूरी लेकर P’ बिन्दु से एक वृत्तांश खींचिए जो प्रक्षेप में 60º N की मानक अक्षांश रेखा को प्रकट करेगा। अन्य अक्षांश वृत्त बनाने के लिए केन्द्रीय मध्याह्न रेखा पर BD दूरी के अंतर पर मानक आक्षांश रेखा से P’ की ओर को एक चिह्न तथा G की ओर को दो चिह्न लगाइए। P’ बिन्दु को केन्द्र मानकर इन चिह्नों से होते हुए वृत्तों के चाप खींचिए तथा इन चापों पर आक्षांश रेखाओं के अंशों में मान लिखिए।

     अब EF दूरी के अंतर पर मानक अक्षांश में केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दोनों ओर को चार-चार चिह्न लगाइए। इन चिह्नों को P’ बिन्दु से मिलाते हुए सरल रेखाएँ खींचिए। ये सरल रेखाएँ प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं को प्रकट करेंगे। देशांतर रेखाओं पर उनके मान लिखकर प्रक्षेप पूर्ण कीजिए।

SIMPLE CONICAL PROJECTION

WITH

ONE STANDARD PARALLEL

(ii) दो मानक अक्षांश वाला शंकु प्रक्षेप (Two Standard Parallel Conical Projection)

⇒ इस प्रक्षेप की रचना में यह कल्पना की जाती है कि कागज का शंकु ग्लोब को दो अक्षांश वृतों को स्पर्श करती है।

⇒ सभी अक्षांश वृत संकेन्द्रीय वृत्तों के समान होते हैं और उनके बीच की दूरी भी समान रहती है।

⇒ दोनों मानक अक्षांश रेखा पर और समस्त देशान्तर रेखा पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ इस प्रक्षेप पर न आकृति शुद्ध रहती है और न क्षेत्रफल शुद्ध रहती है।

⇒ लेकिन ट्रांस साइबेरियन रेलवे, NH-2 भारत की उतरी सीमा, उत्तरी अटलांटिक जलमार्ग प्रदर्शित कने के लिए दो मानक अक्षांश वाला प्रक्षेप उपयोगी है।

उदाहरण 1. 40º N से 80º N आक्षांश तथा 40º W से 40ºE देशांतर के मध्य स्थित क्षेत्र का 10º अंतराल तथा 1:125,000,000 मापनी पर मानचित्र बनाने के लिए दो मानक आक्षांश वाले शंकु प्रक्षेप की रचना कीजिए। प्रक्षेप में 50ºN तथा 70º N आक्षांश वृत्तों को मानक आक्षांश मानिए।

Construct a Two Standard Parallel Conical Projection on a scale of 1 : 1,250,000,000 for the area extending from 40° N to 80° N latitude and 40° W to 40° E longitude, with meridians and parallels drawn at 10° intervals. In the projection, take 50° N and 70° N as the standard parallels.

हल: दी गई मापनी के अनुसार,

RR= 250,000,000/125,000,000= 2″

SIMPLE CONICAL PROJECTION

WITH

TWO STANDARD PARALLEL

     अब 2″ अर्द्धव्यास लेकर वृत्त का चतुर्थांश ABO खींचिए। OB रेखा के O बिन्दु पर अंतराल के बराबर कोण EOB तथा 50ºN व 70ºN के मानक अक्षांशों के बराबर 10º कोण COB तथा कोण DOB बनाइए। EB चाप दूरी से बिन्दु पर वृत्त का चतुर्थांश खींचिए जो OC तथा OD रेखाओं को क्रमशः F तथा G बिन्दुओं पर काटता है। F तथा G बिन्दुओं से OA रेखा पर क्रमशः FI तथा GH लंब गिराइए।

     अब एक लंबवत् सरल रेखा खींचिए तथा इस रेखा में CD के बराबर C’D’ दूरी काटिए। C’ तथा D’ बिन्दुओं पर FI तथा GH के बराबर क्रमशः C’I’ तथा D’H’ लंब गिराइए। I’ तथा H’ बिन्दुओं को मिलाते हुए एक सरल रेखा खींचिए जो बढ़ायी गयी C’D’ रेखा को P बिन्दु पर काटती है।

    अब प्रक्षेप बनाने के लिए P’G’ एक लंबवत् सरल रेखा खींचिए। P’ को केन्द्र मानकर PC’ तथा PD’ अर्द्धव्यासों से क्रमशः 50º व 70º N मानक अक्षांश खीचिए। केन्द्रीय मध्याह्न रेखा पर दोनों मानक अक्षांशों का मध्यवर्ती बिन्दु ज्ञात कीजिए, जिसकी मानक अक्षांशों से दूरी EB के बराबर होगी तथा इससे होकर जाने वाले संकेन्द्र वृत्त का चाप 60° N अक्षांश को प्रकट करेगा। अन्य अक्षांश वृत्त बनाने के लिए EB दूरी के अंतर पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा पर 70º N मानक अक्षांश से उत्तर की ओर एक तथा 50º N मानक अक्षांश से दक्षिण की ओर एक चिह्न लगाइए।

     अब P’ को केन्द्र मानकर इन बिन्दुओं से होते हुए वृत्तों के चाप खींचिए। अब 70º N मानक अक्षांश पर GH लंब दूरी अथवा 50º N मानक आक्षांश पर FI लंब दूरी के अंतर पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दोनों ओर 4-4 चिह्न लगाइए। इन चिह्नों से P’ को मिलाते हुए सरल रेखाएँ खींचिए जो प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं को प्रकट करेगी।



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8. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)

8. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)


 मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)⇒

          ग्लोब पर स्थित अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के जाल को समतल कागज पर प्रक्षेपित करने की तकनीक को मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) कहते हैं।

परिभाषा

स्टीयर्स⇒ ग्लोब की अक्षांश या देशान्तर रेखाओं को सपाट कागज पर प्रदर्शित करने की विधि को मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) कहते हैं।

इरविन रेज⇒ अक्षांश वृत्तों तथा याम्योत्तर रेखाओं (Meridian) का कोई व्यवस्थित क्रम जिस पर मानचित्र बनाया जा सके प्रक्षेप कहा जाता है।

मैक हाउस⇒ पृथ्वी के अक्षांश वृतों और याम्योत्तर रेखाओं का रेखा जाल के रूप में समतल पर प्रदर्शन प्रक्षेप कहलाता है।

जॉन बीगॉट⇒ ग्लोब की अक्षांश और देशान्तर रेखाओं को कागज पर प्रदर्शित करने की विधि को मानचित्र प्रक्षेप कहते हैं।

मानचित्र प्रक्षेप की आवश्यकता क्यों

        मानचित्र का प्रदर्शन ग्लोब और समतल कागज पर प्रदर्शित करते हैं। लेकिन ग्लोब की तुलना में मानचित्रों का समतल कागज पर प्रदर्शन कई अर्थों में भिन्नता रखता है। जैसे-

(1) ग्लोब पर बने मानचित्र को एक बार में समस्त भाग को नहीं देखा जा सकता। लेकिन समतल कागज पर मानचित्र को एक बार में समस्त भाग को देखा जा सकता है।

(2) ग्लोब पर स्थित दो स्थानों के बीच की दूरी मापना एक कठिन कार्य है जबकि समतल कागज पर यह काम आसानी से किया जा सकता है।

(3) ग्लोब को मानचित्र की तरह मोड़ा नही जा सकता है।

(4) पृथ्वी के छोटे-2 भागों को अलग-2 ग्लोब पर नहीं बनाया जा सकता है।

(5) मानचित्र की तुलना में ग्लोब का रख-रखाव और उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने और ले जाने में अधिक कठिनाई होती है।

अक्षांश (Latitude) या Parallel

        पृथ्वी के केन्द्र पर बनाये गये उदग्र (Vertical) कोणीय मान को अक्षांश कहते हैं। दूसरे शब्दों में ग्लोब पर किसी स्थान तथा विषुवतरेखा के मध्य कोणीय दूरी को उस स्थान का आक्षांश कहते हैं। यह कोणीय दूरी ग्लोब के केन्द्र से मापी जाती है। 

➤ सामान्य परिभाषा के अनुसार ग्लोब पर पूरब से पश्चिम दिशा की ओर खींची गयी काल्पनिक रेखा को अक्षांश रेखा कहते हैं।

ग्लोब पर समान आक्षांश वाले बिन्दुओं को मिलाने वाले काल्पनिक वृत्तों को आक्षांश वृत्त कहा जाता है। विषुवत रेखा पूर्ण वृहत् वृत्त (Great Circle) होती है तथा शेष समस्त आक्षांश वृत्त लघु वृत्त होते हैं।

वृहत वृत्त:-

      वृहत वृत्त वह रेखा होती है जो गोलाकार पृथ्वी को दो समान परिधियों वाले गोलाद्धों में विभाजित करती है। पृथ्वी पर सभी देशान्तरों (Meridians) के अतिरिक्त भूमध्य रेखा/विषुवत रेखा एक वृहत वृत्त भी है।

भूमध्यरेखा पृथ्वी के मध्य से होकर गुजरने वाली अक्षांश रेखा है। इसे विषुवत रेखा या  0° अक्षांश भी कहते हैं। इस पर वर्ष भर दिन-रात बराबर होते हैं। इसलिए इसे विषुवत रेखा कहते हैं।

विषुवत रेखा वृहत् वृत का उदाहरण है क्योंकि यह पृथ्वी को दो बराबर भागों में बाँटती है।

भूमध्यरेखा पृथ्वी को दो गोलार्द्धों (उत्तरी और दक्षिणी) में विभक्त करती है।

अक्षांश रेखाओं का मान न्यूनतम 0º और अधिकतम 90º होता है।

उत्तरी गोलार्द्ध में खीची गई अक्षांश रेखा को N के द्वारा और दक्षिणी गोलार्द्ध में खींची गई  रेखा को S के द्वारा निरुपित करते है।

अश्व अक्षांश (Horse Latitude):-

       30° से 35° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश के मध्य स्थित पेटी को अश्व अक्षांश कहा जाता है। इसे उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (Subtropical High Pressure Belt) भी कहते हैं। इसके बनने का कारण इन अक्षांशो के मध्य प्रतिचक्रवातों का उत्पन्न होना है।

0º अक्षांश⇒ भूमध्यरेखा या विषुवत रेखा (Equator)

23½º N अक्षांश⇒ कर्क  रेखा (Tropic of Cancer)

23½º S अक्षांश⇒ मकर रेखा (Tropic of Capricorn)

66½º N अक्षांश⇒ आर्कटिक वृत्त

66½º S अक्षांश⇒ अण्टार्कटिक वृत

90º N⇒ उतरी ध्रुव

90º S⇒ दक्षिणी ध्रुव

➤ 23½° से 66½° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र कहते हैं। यहाँ पर वर्ष भर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।

➤ प्रति 1° पर एक अक्षांश निर्मित होता है। विषुवत रेखा से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर जाने पर अक्षांशीय वृत्त का आकार छोटा होता जाता है, जो ध्रुवों पर अंततः एक बिन्दु में परिवर्तित हो जाता है।

➤ 90° अक्षांश एक बिंदु के रूप में पाया जाता है, जिसे ध्रुव (Pole) कहते हैं। 90° उत्तरी अक्षांश को उत्तरी ध्रुव (North Pole) तथा 90° दक्षिण अक्षांश को दक्षिणी ध्रुव (South Pole) के नाम से जाना जाता है।

➤ 66½° से 90° उत्तरी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Region) कहते हैं। यहाँ 6 महीने का दिन तथा 6 महीने की रात होती है।

भूमध्य रेखा की परिधि की आधी लम्बाई 60° अक्षांश रेखा पर प्राप्त होती है।

90° अक्षांश रेखा एक बिन्दु के समान होती है।

सभी अक्षांश रेखा (90º को छोड़कर) देशान्तर रेखा को समकोण पर काटती है।

सभी अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समान्तर और समान दूरी पर अवस्थित होते हैं।      

किसी भी स्थान का अक्षांश रेखा का निर्धारण Pole Star से आने वाली किरण और चक्षु अक्ष के बीच बने कोणीय माप के द्वारा निर्धारित करते हैं।

ग्लोब पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 89-89 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव एक बिंदु के रूप में है न कि रेखा या वृत्त के रूप में।

मानचित्र पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव मानचित्रों पर एक रेखा के रूप में होती है न कि बिंदु के रूप में।

अक्षांशों की कुल संख्या 180 है।

नोट: यदि अक्षांशों को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश होंगे। यहाँ विषुवत रेखा का मान 0 अक्षांश होगा, इस प्रकार कुल अक्षांशों की संख्या 180 होगी क्योंकि दोनों ध्रुवों का अंश 90º मानचित्र या ग्लोब पर होगा, यहाँ पर एक रेखा या बिंदु के रूप में नहीं होगा।

 प्रति 1º की अक्षांशीय दूरी लगभग 111 Km के बराबर होती है जो पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण भूमध्यरेखा से ध्रुवों तक भिन्न-भिन्न मिलती है। अर्थात् दो अक्षांशों के बीच की दूरी 111 किमी० होती है।

मानचित्र प्रक्षेप

देशान्तर या याम्योत्तर (Longitude)

      ग्लोब पर प्रमुख याम्योत्तर (Prime meridian) तथा किसी दिये गये स्थान के मध्य की कोणीय दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं। यह दूरी ग्लोब के ध्रुवीय अक्ष से मापी जाती है।

⇒ दोनों ध्रुवों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को देशान्तर रेखा कहते हैं।

⇒ देशान्तर रेखा हमेशा उत्तर से दक्षिण दिशा में खींची जाती है।

⇒ दो देशान्तर रेखाओं के बीच में विषुवत रेखा पर अधिकतम दूरी होती है जबकि ध्रुवों की ओर जाने पर दोनों देशान्तर रेखाओं के बीच दूरी घटते जाती है।

⇒ देशान्तर रेखाएँ पृथ्वी के केन्द्र पर क्षैतिज तल में बनाया गया कोण को व्यक्त करता है।

⇒ देशान्तर रेखाओं का न्यूनतम मान 0º और अधिकतम मान 180° होता है।

⇒ इस तरह कुल  देशांतर रेखाओं की संख्या ग्लोब पर 360 और मानचित्र पर 361 होती है।

⇒ 0º देशान्तर रेखा को प्रधान मध्यान्ह / प्रधान याम्योत्तर रेखा (Prime Meridian) कहा जाता है। जबकि 180°  देशांतर रेखा को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहते हैं।

⇒ 0° देशान्तर रेखा पृथ्वी को दो भागों में बाँटती है – (i) पूर्वी गोलार्द्ध और (ii) पश्चिमी गोलार्द्ध।

⇒ पूर्वी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को E के द्वारा और पश्चिमी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को W के द्वारा विरूपित करते हैं।

⇒ 1889 ई0 में वाशिंगटन बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि 0° देशान्तर रेखा लंदन के एक मुहल्ला ग्रीनवीच में स्थित “रॉयल ज्योग्रफिकल सोसाइटी” के कैम्पस में स्थित एक Pointer से होकर गुजरती है। शेष सभी देशान्तर रेखाओं को पूरब एवं पश्चिम में इसके अनुरूप ही खींचते हैं।

भूग्रि(The Earth Grid):-

          किसी प्रक्षेप चना में एक निश्चित मापनी पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के रेखा जाल को भूग्रिड कहते हैं।


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