41. Significance of Statistical Methods in Geography/भूगोल में सांख्यिकीय विधियों का महत्व

Significance of Statistical Methods in Geography

(भूगोल में सांख्यिकीय विधियों का महत्व)

Significance of Statistical Methodsपरिचय:

       भूगोल एक समन्वयात्मक विज्ञान है, जो प्राकृतिक तथा मानव निर्मित दोनों प्रकार की घटनाओं का अध्ययन करता है। आधुनिक भूगोल केवल वर्णनात्मक (descriptive) विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक विश्लेषणात्मक, मात्रात्मक और वैज्ञानिक अनुशासन बन चुका है। इसी परिवर्तन के साथ सांख्यिकीय विधियों (Statistical Methods) का महत्व भूगोल में अत्यधिक बढ़ गया है।

        सांख्यिकी भूगोल को मात्रात्मक आधार प्रदान करती है, जिससे भौगोलिक तथ्यों का मापन, वर्गीकरण, विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन संभव होता है। जनसंख्या, जलवायु, कृषि, उद्योग, परिवहन, नगरीकरण, संसाधन वितरण आदि सभी क्षेत्रों में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग अनिवार्य हो गया है।

सांख्यिकी और भूगोल का संबंध:

      सांख्यिकी और भूगोल के बीच घनिष्ठ एवं पूरक संबंध है। भूगोल प्राकृतिक तथा मानव निर्मित घटनाओं का स्थानिक और कालिक अध्ययन करता है, जबकि सांख्यिकी इन घटनाओं से संबंधित आंकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण, विश्लेषण एवं व्याख्या की वैज्ञानिक विधि प्रदान करती है।

      जनसंख्या वितरण, वर्षा, तापमान, कृषि उत्पादन, औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण जैसे भौगोलिक तथ्यों को समझने में सांख्यिकी अत्यंत सहायक है। सांख्यिकीय विधियों के माध्यम से भौगोलिक पैटर्न, क्षेत्रीय असमानता तथा कारण–परिणाम संबंधों का स्पष्ट विश्लेषण संभव होता है। इस प्रकार सांख्यिकी भूगोल को वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ एवं विश्लेषणात्मक आधार प्रदान करती है।

भूगोल में सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग के कारण:

     भूगोल में सांख्यिकी के प्रयोग के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(i) भौगोलिक तथ्यों की विशाल मात्रा

(ii) क्षेत्रीय विविधता और जटिलता

(iii) तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता

(iv) पूर्वानुमान (forecasting) की मांग

(v) नीति निर्माण और योजना में उपयोग

भूगोल में सांख्यिकीय विधियों का महत्व:

    यह स्पष्ट है कि सांख्यिकीय विधियाँ आधुनिक भूगोल की आधारशिला हैं। इनके बिना भूगोल न तो वैज्ञानिक बन सकता है और न ही व्यावहारिक। इसलिए भूगोल के अध्ययन में सांख्यिकी का महत्व अत्यंत व्यापक और अनिवार्य है। इसके महत्व निम्नलिखित है-

(i) भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करना:-

        सांख्यिकीय विधियाँ भूगोल को केवल वर्णनात्मक विषय न बनाकर वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ और विश्लेषणात्मक अनुशासन बनाती हैं। इनके माध्यम से भौगोलिक तथ्यों का मात्रात्मक विश्लेषण संभव होता है।

(ii) भौगोलिक आंकड़ों के संग्रह और संगठन में सहायता:-

       भूगोल में विशाल मात्रा में आंकड़े प्राप्त होते हैं, जैसे- जनगणना, जलवायु, कृषि, उद्योग आदि। सांख्यिकीय विधियाँ इन आंकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण और सारणीकरण को सरल और व्यवस्थित बनाती हैं।

(iii) क्षेत्रीय विविधता एवं असमानता की व्याख्या:-

      भूगोल का मूल उद्देश्य क्षेत्रीय अंतर को समझना है। सांख्यिकी की सहायता से क्षेत्रीय असमानता, विविधता और वितरण पैटर्न का स्पष्ट विश्लेषण किया जाता है।

(iv) तुलनात्मक अध्ययन में उपयोगिता:-

      सांख्यिकीय विधियाँ विभिन्न क्षेत्रों, देशों एवं समयावधियों के बीच तुलनात्मक अध्ययन को संभव बनाती हैं, जैसे—राज्यों की जनसंख्या घनत्व, विकास स्तर, साक्षरता दर आदि।

(v) कारण-परिणाम संबंध की व्याख्या:-

      भूगोल में केवल तथ्यों का वर्णन नहीं, बल्कि उनके कारण और परिणाम की व्याख्या भी आवश्यक है। सहसंबंध एवं प्रतिगमन जैसी सांख्यिकीय तकनीकें इन संबंधों को स्पष्ट करती हैं।

(vi) प्रवृत्ति विश्लेषण और पूर्वानुमान:-

       जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण, जलवायु परिवर्तन आदि के अध्ययन में सांख्यिकी द्वारा प्रवृत्तियों (Trends) का विश्लेषण तथा भविष्य के लिए पूर्वानुमान लगाया जाता है।

(vii) मानचित्रण (Cartography) में महत्व:-

       विषयगत मानचित्रों जैसे- कोरॉप्लेथ, डॉट, आइसोप्लिथ मानचित्रों के निर्माण में सांख्यिकीय आंकड़े अनिवार्य होते हैं। इससे भौगोलिक तथ्यों की दृश्यात्मक प्रस्तुति संभव होती है।

(viii) भौतिक भूगोल में योगदान:-

       तापमान, वर्षा, नदी प्रवाह, भूकंप, सूखा आदि के अध्ययन में सांख्यिकी द्वारा औसत, विचलन और परिवर्तनशीलता का विश्लेषण किया जाता है।

(ix) मानव भूगोल में उपयोग:-

       जनसंख्या, बस्ती, आर्थिक गतिविधियाँ, परिवहन आदि मानव भूगोल के सभी पक्ष सांख्यिकीय मापों पर आधारित होते हैं, जिससे मानव–पर्यावरण संबंधों की स्पष्ट समझ मिलती है।

(x) योजना निर्माण एवं नीति निर्धारण में सहायता:-

        क्षेत्रीय योजना, शहरी विकास, संसाधन प्रबंधन और आपदा प्रबंधन में सांख्यिकीय विश्लेषण वैज्ञानिक निर्णय लेने में सहायक होता है।

(xi) अनुसंधान एवं मात्रात्मक क्रांति का आधार:-

       भूगोल में आई मात्रात्मक क्रांति का मूल आधार सांख्यिकी है। शोध, परिकल्पना परीक्षण और मॉडल निर्माण में इसका विशेष महत्व है।

भूगोल में प्रयुक्त प्रमुख सांख्यिकीय विधियाँ: 

      भूगोल में सांख्यिकीय विधियाँ भौगोलिक तथ्यों के मापन, विश्लेषण और व्याख्या के लिए प्रयोग की जाती हैं। प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-

(i) केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप (Measures of Central Tendency):-

    इनमें औसत (Mean), माध्यिका (Median) तथा बहुलक (Mode) शामिल हैं। इनका उपयोग किसी क्षेत्र की सामान्य स्थिति को समझने के लिए किया जाता है, जैसे औसत वर्षा, औसत तापमान या औसत जनसंख्या घनत्व।

(ii) विचलन के माप (Measures of Dispersion):-

    इनमें परास (Range), मानक विचलन (Standard Deviation) तथा परिवर्तन गुणांक (Coefficient of Variation) प्रमुख हैं। ये किसी भौगोलिक घटना में असमानता और परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हैं, जैसे वर्षा की अस्थिरता।

(iii) सहसंबंध विश्लेषण (Correlation Analysis):-

    इसका प्रयोग दो भौगोलिक चरों के बीच संबंध की दिशा और तीव्रता जानने के लिए किया जाता है, जैसे वर्षा और फसल उत्पादन के बीच संबंध।

(iv) प्रतिगमन विश्लेषण (Regression Analysis):-

     यह कारण-परिणाम संबंध की व्याख्या तथा पूर्वानुमान में सहायक है, जैसे जनसंख्या वृद्धि के आधार पर शहरी विस्तार का अनुमान।

(v) समय श्रेणी विश्लेषण (Time Series Analysis):-

    इसका उपयोग समय के साथ होने वाले परिवर्तनों और प्रवृत्तियों के अध्ययन में किया जाता है, जैसे दशकों में तापमान या जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्ति।

(vi) सूचकांक संख्या (Index Numbers):-

     ये तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रयुक्त होते हैं, जैसे जीवन स्तर, कृषि उत्पादन या औद्योगिक विकास सूचकांक।

(vii) संभाव्यता एवं नमूना विधियाँ (Probability and Sampling Techniques):-

    सीमित आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालने और भौगोलिक अनुसंधान को वैज्ञानिक बनाने में इनका महत्वपूर्ण स्थान है।

सीमाएँ (Limitations):

      यद्यपि सांख्यिकीय विधियाँ भूगोल को वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक एवं मात्रात्मक आधार प्रदान करती हैं, फिर भी इनकी कुछ व्यावहारिक और सैद्धांतिक सीमाएँ हैं। इन सीमाओं को समझना आवश्यक है ताकि सांख्यिकी का प्रयोग संतुलित एवं विवेकपूर्ण ढंग से किया जा सके।

✍️ सांख्यिकीय निष्कर्ष पूर्णतः आंकड़ों की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं।

✍️ मानवीय व्यवहार, संस्कृति और भावनाओं को संख्याओं में व्यक्त करना कठिन है।

✍️ अति-मात्रात्मकता से भूगोल का मानवीय पक्ष उपेक्षित हो सकता है।

✍️ अपूर्ण या गलत आंकड़े भ्रामक निष्कर्ष दे सकते हैं।

✍️ सांख्यिकीय विधियाँ सामान्यीकरण पर आधारित होती हैं, जिससे स्थानीय विशेषताएँ छूट सकती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

       निष्कर्षतः भूगोल में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। ये भौगोलिक तथ्यों को वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ एवं विश्लेषणात्मक रूप प्रदान करती हैं। सांख्यिकी के माध्यम से आंकड़ों का संग्रह, वर्गीकरण, तुलनात्मक अध्ययन तथा कारण-परिणाम संबंध की व्याख्या संभव हो पाती है।

    आधुनिक भूगोल में क्षेत्रीय योजना, पूर्वानुमान, शोध एवं नीति निर्माण के लिए सांख्यिकीय विधियाँ अनिवार्य हो चुकी हैं। इनके बिना भूगोल का आधुनिक, व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक स्वरूप अधूरा माना जाएगा।

30. Interpretation of Topographical Maps (स्थलाकृतिक मानचित्र का प्रदर्शन)

Interpretation of Topographical Maps

(स्थलाकृतिक मानचित्र का प्रदर्शन)



स्थलाकृतिक मानचित्र का अर्थ:-

         स्थलाकृतिक मानचित्र पृथ्वी की सतह पर दिखाई देने वाली विशेषताओं के विस्तृत चित्रमय एवं सटीक प्रतिनिधित्व को संदर्भित करता है। ये समतल तथा भूगणितीय सर्वेक्षणों पर आधारित ऐसे बहु-उद्देशीय मानचित्र होते हैं जिन्हें वृहत् मापक या मापनी (Large Scale) पर बनाया जाता है। इन्हें सामान्य उपयोग वाले मानचित्र भी कहा जाता है।

    इन मानचित्रों पर प्राकृतिक व सांस्कृतिक विवरण या लक्षणों जैसे- उच्चावच, धरातल, जल-प्रवाह, जलाशय, वनस्पति, गाँव, नगर, सड़कें, नहरें, रेल लाइनें पूजा स्थल आदि को देखा जा सकता है। मानचित्रों पर इन सभी विवरणों को रूढ़ चिह्नों एवं प्रतीकों द्वारा प्रदर्शित किया जाता हैं।

   अर्थात् स्थलाकृतिक मानचित्र ऐसे मानचित्र है जो भौगोलिक विशेषताओं के स्थानों का प्रतिनिधित्व करते है। ये भौगोलिक विशेषताएँ पहाड़, घाटियाँ, मैदानी सतह, जल निकाय और बहुत कुछ हो सकती हैं। अतः स्थलाकृतिक मानचित्र बड़े और मध्यम पैमाने के मानचित्रों को संदर्भित करते हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की जानकारी शामिल होती है।

       स्थलाकृतिक मानचित्र के सभी घटक समान महत्व रखते हैं। किसी विशेष सतह के व्यापक विश्लेषण के कारण ये मानचित्र भू-विज्ञान के क्षेत्र का एक अनिवार्य हिस्सा या भाग हैं। ये मानचित्र सभी देशों की राष्ट्रीय मानचित्र संगठनों द्वारा तैयार एवं प्रकाशित किए जाते हैं।

        उदाहरण के लिए भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भारत में, पूरे देश के लिए स्थलाकृतिक मानचित्र तैयार करता है। भारत में स्थलाकृतिक मानचित्र दो श्रृंखलाओं में तैयार किए जाते हैं- भारत एवं पडोसी देशों की श्रृंखला एवं विश्व के अंतर्राष्ट्रीय मानचित्रों की श्रृंखला।

स्थलाकृतिक मानचित्र को परिभाषित करते हुए फिलिस डिन्क महोदय ने लिखा है- “स्थलाकृतिक मानचित्र दीर्घमापक मानचित्र हैं किन्तु इनका आकार भू-मानचित्रों से छोटा होता है। चूंकि इनका आकार बड़ा होता है अतः ये प्राकृतिक एवं मानव द्वारा निर्मित विभिन्न लक्षणों, जैसे- पर्वतों, नदियों, जंगलों, नगरों, गाँवों, सड़कों, रेलों व नहरों आदि को प्रदर्शित करते हैं। ये मानचित्र यात्री व मोटर चालकों, युद्ध भूमि में सैनिकों तथा किसी क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्ययन में भूगोलवेत्ताओं के लिए गाइड का कार्य करते हैं।

जोन बाइगोट के अनुसार, “स्थलाकृतिक मानचित्र सूक्ष्म सर्वेक्षण पर आधारित वृहद् मापक मानचित्र होते है जिनमें प्राकृतिक एवं मानव निर्मित विभिन्न लक्षणों को विस्तार से प्रदर्शित किया जाता है।”

इरविन रेज के अनुसार, “वृहद् एवं मध्यवर्ती मापनी पर बने सामान्य मानचित्र जिनमें उच्चावच सहित सभी महत्त्वपूर्ण लक्षणों को प्रदर्शित किया जाता है, स्थलाकृतिक मानचित्र कहलाते हैं।”

 भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रकाशित मानचित्र एवं धरातल पत्रक

         भारतीय सर्वेक्षण विभाग (देहरादून) द्वारा प्रकाशित मानचित्र एवं धरातल पत्रक के निम्न प्रकार हैं-

(1) भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला (India and adjacent Countries)

       इस श्रृंखला के मानचित्रों का मापक भी 1:1,000,000 है। इस मापक पर ही भारत और उसके समीपवर्ती देशों के मानचित्र बनाए जाते है। इसमें प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तर है। अतः 4° उत्तरी अक्षांश से 40° उत्तरी अक्षांश तक तथा 44° पूर्वी देशान्तर से 104° पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित क्षेत्र को शामिल किया गया है।

       इसमें सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप जैसे- अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश एवं म्यामार और मध्य पूर्व के देश थाईलैण्ड, वियतनाम, कम्बोडिया, तिब्बत, कैस्पियन सागर का दक्षिणी भाग, तुर्कमिनिस्तान, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, किर्गिजस्तान देश शामिल हैं। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को 4×4 के कुल 106 भागों में विभाजित किया गया है। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र को संख्या में 1 से 106 तक क्रमशः दिया गया है।

       भारतीय क्षेत्र 40 से 92 के बीच क्रम संख्या में पाए जाते हैं। ये संख्याएँ सूचक संख्याएँ (Index Number) कहलाती है। उदाहरण के लिए, 47 व 43 सूचकांक मुम्बई व श्री नगर के पत्रकों के नाम से जाना जाता है। यह श्रृंखला वर्तमान में प्रकाशित नही होती है, परन्तु यह भारत में छपने वाली अन्य सभी श्रृंखलाओं का आधार है। इस श्रृंखला का प्रत्येक मानचित्र 4 डिग्री शीट या एक मिलियन शीट कहलाता है।

Interpretation of Topo

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला (International Series):-

      भारतीय सर्वेक्षण विभाग, अन्तर्राष्ट्रीय समिति 1909 के समझौते के अनुसार अब अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला का प्रकाशन करता है। इस श्रृंखला के मानचित्र 1:1,000,000 मापक पर बनाए जाते हैं। 60° उत्तरी व 60° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्रों के प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 6° देशान्तर है। इस क्षेत्र हेतु 1800 शीटे तैयार की गयी है।

         60° अक्षांश-88° अक्षांश के मध्य स्थित क्षेत्र की 4° अक्षांश तथा 12° देशान्तर विस्तार की 420 सीटे हैं। इसके अतिरिक्त दो अर्धव्यास वाले 2 मानचित्र ध्रुवीय क्षेत्रों के हैं। सम्पूर्ण विश्व के लिए 2222 शीट इस श्रृंखला में हैं। इस श्रृंखला की प्रत्येक शीट एक मिलियन शीट कहलाती है।

स्थलाकृतिक शीट के प्रकार

       भारतीय सर्वेक्षण विभाग के स्थलाकृतिक अंशचित्रों का अंकन ‘भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला’ (India and Adjacent Countries Series) पर आधारित है।

स्थलाकृतिक 

         मानचित्र के पैमाने के आधार पर स्थलाकृतिक शीटों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है।

1. 4×4 डिग्री या मिलियन शीट 

          इस श्रृंखला के सभी मानचित्र 1:1,000,000 मापनी (1 इंच=16 मील) पर तैयार किए गए हैं। इनमें से प्रत्येक मानचित्र 4° अक्षांश व 4° देशांतर (4° x 4°) के बीच स्थित क्षेत्र को प्रदर्शित करता है।

        पहचान के लिए प्रत्येक 1 मिलियन मानचित्र पर उसकी सूचक संख्या (Index Number) जैसे- 51, 52, 53, 54 आदि लिखी होती है। प्रत्येक मिलियन मानचित्र को 16 चौथाई इंच (1″ = 4 मील) अंशचित्रों में, प्रत्येक चौथाई इंच अंशचित्रों को 4 आधा इंच (1″ = 2 मील) अंशचित्रों में तथा प्रत्येक आधा इंच अंशचित्रों को 4 एक इंच (1″ = 1 मील) अंशचित्रों में विभाजित किया गया है।

चित्र: मिलियन शीट या चार डिग्री शीट

नोट: कभी-कभी किसी शीट का नामकरण उस शीट में अंकित प्रमुख नगर के नाम पर किया जाता है। जैसे 43, 47, 53, 57, 72 सूचकांक वाली शीटों को क्रमशः श्रीनगर शीट, बम्बई शीट, दिल्ली शीट, मद्रास शीट एवं पटना के नाम से भी जाना जाता है।

⇒ समोच्च अंतराल 500 मीटर है।

चूंकि, इन मानचित्रों में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है, इसलिए टोपो शीट के रूप में इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया है।

2. एक डिग्री शीट (Degree Sheet):

        किसी 1 इंच = 16 मील मापनी वाले मानचित्र को 1 इंच = 4 मील मापनी वाले 16 अंशचित्रों में विभाजित करने पर, प्रत्येक अंश चित्र 1° अक्षांश x 1° देशांतर क्षेत्र को प्रदर्शित करता है। अतः इन अंशचित्रों को चौथाई इंच शीट कहा जाता है। डिग्री शीटों को सूचित करने के लिए A से P तक के 16 अक्षरों का प्रयोग किया जाता है। इसका R.F. 1:250000 होता है।

एक डिग्री शीट

चित्र: एक डिग्री शीट

     किसी डिग्री शीट का नामकरण करने के लिए उस शीट के अंग्रेजी अक्षर को संबंधित 1 मिलियन मानचित्र की सूचक संख्या के बाद लिख दिया जाता है। जैसे- 53A, 53B, 53C 53P.

⇒ समोच्च अंतराल 250 मीटर है।

3. आधा डिग्री शीट (Half Degree Sheet):-

      इसके अंतर्गत किसी डिग्री शीट को चार आधा डिग्री शीटों में विभाजित किया जाता है। इस शीट की मापनी 1 इंच = 2 मील होती है। अतः इसे आधा इंच शीट भी कहा जाता है। इसका R.F. 1:100000 होता है। इसका विस्तार 30° अक्षांश x 30° देशांतर होता है।

      प्रत्येक आधा इंच शीट की सूचक संख्या में उसकी दिशा के साथ-साथ संबंधित 1 मिलियन की सूचक संख्या व डिग्री शीट का अंग्रेजी अक्षर लिखा जाता है। जैसे : 53 A/NE, 53 A/SE, 53 A/SW, 53 A/NW। अत: यदि किसी शीट की सूचक संख्या 53 A/NE है, तो इसका अर्थ है कि वह शीट 53 सूचक संख्या वाले 1 मिलियन के A अक्षर वाले डिग्री शीट का NE भाग सूचित करता है।

इसका समोच्च अंतराल 100 मीटर है।

चित्र: आधा डिग्री शीट

4. चौथाई डिग्री शीट (Quarter Degree Sheet):-

    इसके अंतर्गत किसी डिग्री शीट को 16 चौथाई डिग्री शीटों में विभाजित किया जाता है। इस शीट की मापनी 1 इंच = 1 मील होती है। अतः इसे एक इंच शीट भी कहा जाता है। इसका विस्तार चौथाई डिग्री (15′ अक्षांश x 15′ देशांतर) होता है। इसका R.F. 1 : 50,000 होता है।

       इस प्रकार किसी 1 मिलियन मानचित्र में 256 डिग्री शीट में 16 तथा आधा डिग्री शीट में 4 एक इंच शीटें होती हैं। किसी एक इंच शीट की सूचक संख्या को उस शीट की संबंधित डिग्री शीट में क्रमांक संख्या के अनुसार निश्चित किया जाता है। जैसे – 53 A/1, 53 A/2, ……..453A/16।

⇒ इसका समोच्च अंतराल 50 मीटर है।

चित्र: चौथाई डिग्री शीट

            इस प्रकार  तीनों एक साथ देखा जा सकता है-

5. नई श्रृंखला टोपो शीट्स:-

            टोपो शीट की यह श्रृंखला चौथाई डिग्री टोपो शीट के भीतर 1/8° अक्षांश (7.5 मिनट) और 1/8° देशांतर (7.5 मिनट) तक फैले क्षेत्र को कवर करती है। जब चौथाई डिग्री शीट को 4 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है, तो हमें बहुत सारी जानकारी के साथ बहुत बड़े पैमाने की टोपो शीट मिलती हैं। इन्हें 53A 1/NE, 53A 1/NW, 53A 1/SE, और 53A 1/SW क्रमांकित किया गया है। इसका स्केल 1:25000 है।

⇒ उद्देश्य और क्षेत्र के आधार पर इसका समोच्च अंतराल 5-20 मीटर के बीच होता है। उदाहरण के लिए, पहाड़ी क्षेत्र की ऊँचाई अधिक है औ समोच्च अंतराल थोड़ा बड़ा होना चाहिए। जबकि मैदानी क्षेत्रों में समोच्च अंतराल छोटा होना चाहिए।


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29. Minerals (खनिज) तथा खनिजों और चट्टानों के बीच अंतर

29. Minerals (खनिज)



खनिजMinerals

          खनिज निश्चित अनुपात में रासायनिक एवं भौतिक विशिष्टताओं के साथ निर्मित एक प्राकृतिक पदार्थ है। दूसरे शब्दों में, खनिज निश्चित रासायनिक संयोजन एवं विशिष्ट आंतरिक परमाणविक रचना वाले ठोस प्राकृतिक पदार्थ को कहा जाता है। संक्षेप में खान से निकाले गए पदार्थ को खनिज कहते है। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, सोना, लौह अयस्क, अभ्रक, जिप्सम इत्यादि।

        इस प्रकार पृथ्वी में खनिज घटक शामिल हैं जो या तो अकेले या अनेकों प्रकार के संयोजनों में मौजूद हैं जिन्हें यौगिक कहा जाता है। एक खनिज एक परमाणु या अणु से बना होता है जो प्राकृतिक रूप से पाया जाता है एवं इसकी एक विशिष्ट रासायनिक संरचना व संगठित परमाणु संरचना होती है।

खनिजों की विशेषताएँ-
⇒ खनिजों का वितरण असमान होता है। 
⇒ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
⇒ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है। 
खनिजों के प्रकार
         खनिज मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
(i) धात्विक खनिज- 
          वैसे खनिज जिसमें धातु होती है, उसे धात्विक खनिज कहा जाता है। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल, मैंगनीज आदि। पुनः इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है
(क) लौहयुक्त खनिज- 
            जिन धात्विक खनिज में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है उसे लौहयुक्त खनिज कहते हैं, जैसे- लौह अयस्क, निकेल, टंगस्टन।
(ख) अलौहयुक्त खनिज-
           जिन धात्विक खनिज में लोहे की मात्रा न्यून होती है या नहीं होती है, अलौहयुक्त खनिज कहलाते हैं। जैसे- सोना, चाँदी, शीशा, बॉक्साइट ताँबा।
(ii) अधात्विक खनिज-
            वैसे खनिज जिसमें धातु की  मात्रा  नहीं होती है उसे  अधात्विक खनिज कहते है। जैसे-चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम आदि। अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-
(क) कार्बनिक खनिज-
         इसमें जीवाश्म होते हैं, ये पृथ्वी में दबे प्राणी, पादप जीवों के परिवर्तन से बनते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि।
(ख) अकार्बनिक खनिज-
           इसमें जीवाश्म नहीं होते हैं। जैसे- अभ्रक, ग्रेफाइट।
खनिजों के संरक्षण के उपाय:-
     खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है, किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-
(i) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण, 
(ii) उनका बचतपूर्वक उपयोग एवं
(iii) कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

        खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्ण उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। अगर खनिजों के संक्षण के साथ-साथ प्रबंधन प ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।

धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच अंतर एवं तुलना

         धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर एवं तुलना किया जा सकता है:-

धात्विक अधात्विक
1. धात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ होती हैं। अधात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ नहीं होती है।
2. ये कठोर एवं चमकदार होते हैं। ये चमकदार नहीं होते हैं।
3. ये आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं। ये तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।
4. धात्विक खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त की जा सकती है। इन खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त नहीं की जा सकती है।
5. ये खनिज लचीले होते हैं। ये खनिज लचीले और भंगुर नहीं होते हैं।
6. धात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के अच्छे संवाहक होते हैं। अधात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के कुचालक होते हैं।
7. इन खनिजों का गलनांक उच्च होता है। इन खनिजों का गलनांक बहुत कम होता है।
8. लोहा, एल्युमीनियम, सोना, चाँदी आदि के अयस्क धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं। हीरा, स्लेट, पोटाश आदि गैर-धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं।
9. इन्हें पीटकर तार बनाया जा सकता है। ये पीटने पर टूटते नहीं हैं। ये पीटने पर चूर-चूर हो जाते हैं।
10. इन्हें खानों से निकालने के बाद साफ करने की आवश्यकता होती है। इन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती है।
11. ये प्रायः अयस्क (ore) के रूप में पाए जाते है। ये अयस्क के रूप में नहीं पाए जाते हैं

♣ चट्टानों और खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर है-

क्र.सं. चट्टानों खनिजों
1. चट्टानों को उस ठोस द्रव्यमान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो भौगोलिक सामग्रियों से बना होता है। दूसरी ओर, खनिजों को अकार्बनिक रासायनिक यौगिकों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से बनते हैं।
2. चट्टानें खनिजों से बनी होती हैं। खनिज चट्टानों से नहीं बनते।
3. चट्टानें अपनी बनावट में एक समान नहीं होती हैं। खनिज अपनी बनावट में एक समान होते हैं।
4. जेडाइट, रेड बेरिल, ब्लैक ओपल, मसग्रेवाइट आदि चट्टानें कुछ दुर्लभ चट्टानें हैं। पेनाइट एक दुर्लभ खनिज है।
5. चट्टानें सूक्ष्म अर्थात् प्रकृति में छोटी होती हैं। खनिज सूक्ष्मदर्शी नहीं होते और इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
6. पृथ्वी पर चट्टानें ठोस रूप में मौजूद हैं। खनिज पदार्थ पृथ्वी पर खनिज भंडार के रूप में मौजूद हैं।
7. चट्टानों की एक परमाणु संरचना होती है। खनिजों में क्रिस्टलीय और रासायनिक संरचना होती है।
8. चट्टानों का उपयोग सड़क, भवन आदि निर्माण कार्यों के लिए किया जाता है। खनिजों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों जैसे प्रौद्योगिकी, फैशन, निर्माण आदि के लिए किया जाता है।
9. चट्टानों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ चट्टानों

⇒ आकार

⇒ रंग

⇒ आभा

⇒ नमूना

⇒ बनावट

खनिजों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ रंग

⇒ क्रिस्टल

⇒ कठोरता

⇒ भंग

⇒ तप

⇒ गुरुत्वाकर्षण

10. चट्टानों का कोई निश्चित आकार या रंग नहीं होता है। खनिजों का एक निश्चित रंग और आकार होता है।
11. उदाहरण:-

⇒ रेत

⇒ कंकड़

⇒ टुकड़े टुकड़े

⇒ गोले

उदाहरण:-

⇒ जीवाश्म ईंधन

⇒ कोयला

⇒ पेट्रोलियम


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28. Representation of Relief

28. Representation of Relief



        किसी भी धरातल या स्थान का उच्चावच (Terrain या relief) उस धरातल की ऊँचाई-निचाई से बनने वाले प्रतिरूप या आकार को कहते हैं। क्षेत्रीय स्तर पर उच्चावच भू-आकृतिक प्रदेशों के रूप में व्यक्त होता है और छोटे स्तर पर यह एक स्थलरूप या स्थलरूपों के एक संयुक्त समूह का प्रतिनिधित्व करता है।

    विभिन्न ढालों की समोच्च रेखाएँ एवं अनुप्रस्थ काट या पार्शिवका बनाने की विधियों के बाद यहाँ कुछ स्थल रूपों की सरलीकृत आकृतियों की समोच्च रेखाएँ बनायी जाती है।

ढाल के प्रकार:

     ढालों को मुख्यतः धीमा/मंद, तीव्र/खड़ा, अवतल, उत्तल, सम एवं विषम भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के ढालों की समोच्च रेखा एक विशिष्ट अंतराल की पद्धति को दर्शाता है। ढाल को डिग्री या कोण में भी व्यक्त किया जाता है।

(i) धीमा/मंद ढाल :

    जब किसी स्थलाकृति के ढाल की डिग्री या कोण बहुत कम होता है, तब ढाल मंद होता है। इस प्रकार की ढालों की समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी बहुत अधिक होती हैं।

Representation of Relief

(ii) तीव्र/खड़ी ढाल :

      जब किसी स्थलाकृति के ढाल का कोण अधिक होता है, तो इनकी समोच्च रेखाओं के बीच की आपसी दूरी बहुत कम होती है. तथा ये खड़ी ढाल को इंगित करते हैं।

(iii) अवतल/नतोदर ढाल:-

          जब उच्चावच स्थलाकृति का निचला भाग मंद ढाल वाला एवं ऊपरी भाग खड़े ढाल वाला हो, तो उसे अवतल ढाल कहा जाता है। इस प्रकार के ढाल में समोच्च रेखाएँ निचले भाग में दूर-दूर तथा ऊपरी भाग में पास-पास होती हैं।

(iv) उत्तल/उन्नतोदर ढाल:-

        अवतल ढाल के विपरीत, उत्तल ढाल का ऊपरी भाग मंद एवं निचला भाग खड़ा होता है। इसके परिणामस्वरूप ऊपरी भाग में समोच्च रेखाएँ दूर-दूर तथा निचले भाग में पास-पास होती हैं।

(v) सम ढाल और (vi) विषम ढाल:-

          दोनों ही ढालों में से प्रत्येक धीमा या तेज कोई भी हो सकते हैं। दोनों की समोच्च रेखाओं में केवल इतना ही अन्तर है कि प्रथम में समोच्च रेखाएँ समान दूरी पर होती है, जबकि द्वितीय में इनकी दूरी का क्रम सर्वत्र असमान रहता है। विषम ढाल में एक साथ तेज एवं धीमा दोनों ही ढाल बिना किसी क्रम के दर्शाये जा सकते हैं, जबकि सम ढाल में ढाल का क्रम सर्वत्र प्राय: एक-सा रहता है।

(vii) सीढ़ीनुमा ढाल:-

          ऐसे ढाल में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सीढ़ियों की तरह प्रवणता बढ़ने से समोच्च रेखाएँ बीच-बीच में समीप आ जाती है। नदी व हिमानी की घाटी में ऐसा ढाल पाया जाता है।

स्थ्लाकृतियों के प्रकार

1. शंक्वाकार पहाड़ी (Conical Hill):-

       समुद्र से 600 मी० ऊँचे खण्ड को पहाड़ी कहते हैं। इनकी समोच्च रेखा बन्द होती है। सभी दशाओं में शंक्वाकार पहाड़ी का ढाल समान होता है, इन रेखाओं की दूरी समान होती है। एक शंक्वाकार पहाड़ी, उसकी समोच्च रेखाएँ एवं विभिन्न ऊँचाई पर घिरे धरातल को दर्शाया गया है। सभी ओर ढाल समान होने से समोच्च रेखाएँ प्रायः वृत्ताकार बनी है। पहाड़ी के शिखर की ऊँचाई मध्य में बिन्दु या त्रिकोण बनाकर भी अंकित की जा सकती है।

       शंक्वाकार पहाड़ियों की भाँति ही अन्य पहाड़ियों की समोच्च आकृति खींची जाती है। पहाड़ी के जिस भाग में ढाल तेज होगा, वहाँ समोच्च रेखाएँ पास-पास एवं ढाल धीमा होने पर दूर-दूर खींची जाती है। चित्र में एक विषम ढाल वाली पहाड़ी का समोच्च रेखाचित्र बनाया गया है। यहाँ चित्र में पहाड़ियों के साथ-साथ उनका अनुप्रस्थ काट (Cross Section) भी स्पष्टता के लिये खींच दिया गया है-

विभिन्न ढाल वाली एक पहाड़ी

2. पठार:-

         एक विस्तृत चपटा उठा हुआ भूभाग, जिसकी ढाल अपेक्षाकृत पार्श्वो पर खड़ी होती है तथा जो आसपास के मैदान या समुद्र से ऊँची उठी होती है, पठार कहलाती है। पठारों को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ सामान्यतः किनारों पर पास-पास तथा भीतर की ओर दूर होती हैं। मध्यवर्ती भाग समोच्च रेखाओं रहित होता है।

3. जलप्रपात:-

        किसी नदी तल पर काफी ऊंचाई से पानी का अचानक उर्ध्वाधर गिरना जलप्रपात कहलाता है। कभी-कभी जलप्रपात सोपानी धारा के रूप में गिरता है, जिसे रैपिड कहा जाता है। मानचित्र पर नदी को पार करती हुई समोच्च रेखाओं के परस्पर मिल जाने से जलप्रपात को पहचाना जा सकता है तथा रैपिड को अपेक्षाकृत दूर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा।

4. भृगु:-

         यह अत्यधिक तीव्र या  खड़े पार्श्वो वाली भू-आकृति है। मानचित्र पर भृगु की पहचान पास-पास बनी समोच्च रेखाओं से की जाती है, जो आपस में जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।

5. V-आकार की घाटी:-

      यह ‘V’ अक्षर की तरह दिखाई देती है। V-आकार की घाटी पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है। V-आकार की घाटी का निचला भाग भीतरी समोच्च रेखाओं के द्वारा दिखाया जाता है, जो पास-पास स्थित होते हैं तथा जिनके समोच्च का मान कम होता है। बाहर की ओर स्थित समोच्च रेखाओं का मान एकसमान रूप से बढ़ता है।

6. U-आकार की घाटी:-

          ऊँचाई पर स्थित हिमानियों के पार्श्व अपरदन के कारण इस प्रकार की घाटी का निर्माण होता है। इसका निचला तल चौड़ा एवं चपटा तथा किनारे खड़े होते हैं, जिसके कारण इसका आकार ‘U’ अक्षर के समान प्रतीत होता है। U-आकार की घाटी के सबसे निचले हिस्से को सबसे भीतर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है तथा इसके दोनों किनारों के बीच का अंतर अधिक होता है। बाहर की ओर स्थित दूसरी समोच्च रेखाओं के लिए एकसमान अंतराल के साथ समोच्च रेखाओं का मान बढ़ता जाता है।

7. महाखड्ड (गार्ज):-

     उच्च भागों में, जहाँ नदियों के द्वारा पार्श्व अपरदन की अपेक्षा ऊर्ध्वाधर अपरदन की क्रिया तीव्र होती है, वहाँ तंग घाटी का निर्माण होता है। ये गहरी तथा संकरी नदी घाटियाँ होती हैं, जिनके दोनों किनारों का हाल बहुत तीव्र होता है। तंग घाटी को पास पास स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसमें भीतरी समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत कम होता है, जो इसके दोनों किनारे को दिखाता है।

8. पर्वतस्कंध:-

       पर्वत श्रृंखलाओं से घाटी की ओर की झुकी हुई उत्तल ढाल वाली आकृति को स्पर या पर्वतस्कंध कहा जाता है। इसे V आकार की समोच्च रेखा के द्वारा दर्शाया जाता है लेकिन विपरीत तरीके से V के दोनों किनारे ऊँचाई वाले भा को दिखाते हैं तथा इसकी चोटी निचले हिस्से को।


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27. समोच्च रेखाएँ (Contour Lines)

27. समोच्च रेखाएँ (Contour Lines)



समोच्च रेखाएँ

      समुद्र तल से समान ऊँचाई पर स्थित बिन्दुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को समोच्च रेखा कहा जाता है, इसे समतल रेखा भी कहा जाता है। समोच्च रेखा स्थलाकृतिक मानचित्र पर जमीन की ऊँचाई या अवसाद को इंगित करने के लिए खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।

समोच्चरेखीय अंतराल :

        दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर को समोच्चरेखीय अंतराल कहा जाता है। इसे ऊर्ध्वाधर अंतराल भी कहते हैं। यह प्रायः अंग्रेजी के अक्षरों द्वारा लिखा जाता है। किसी भी मानचित्र पर प्राय: इसका मान स्थिर होता है।

        समोच्च रेखाएँ माध्य समुद्र तल के ऊपर विभिन्न ऊर्ध्वाधर अंतरालों (VI), जैसे- 20, 50, 100 मीटर पर खींची जाती हैं। इसे समोच्च रेखाओं का अंतराल कहा जाता है। किसी भी दिए गए मानचित्र पर प्रायः यह नियत होता है। इसे सामान्यतः मीटर में व्यक्त किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढाल की प्रकृति के अनुसार दो समोच्च रेखाओं के बीच की क्षैतिजीय दूरी में अंतर होता है जबकि उनके बीच का ऊर्ध्वाधर अंतराल अचल होता है। क्षैतिज दूरी, जिसे क्षैतिज तुल्यांक (HE) के नाम से भी जाना जाता है, मंद ढाल के लिए अधिक एवं तीव्र ढाल के लिए कम होती है।

समोच्च रेखाओं द्वारा धरातल प्रदर्शन (Relief Representation by Contour Lines)

      बाह्य तथा आन्तरिक शक्तियों के कारण धरातल पर परिवर्तन होते हैं तथा ढाल में भी परिवर्तन होते हैं, जिससे आकृतियाँ भी परिवर्तित हो जाती है। इन ढालों को समोच्च रेखाओं द्वारा दिखाया जाता है। जिस प्रकार धरातल पर नदी, हिमानी, वायु और लहरों के प्रभाव से निश्चित आकृतियाँ बनती है, उसी भाँति ऐसी प्रत्येक निश्चित आकृति की समोच्च रेखाएँ भी विशेष स्वरूप वाली होगी। इस विशेषता के कारण थोड़े से अध्ययन के बाद ही अध्यानकर्त्ता आसानी से समोच्च मानचित्रों में उनकी आकृतियों को देखकर धरातल की प्रकृति का अनुमान लगा सकता है।

       ऐसे समोच्च मानचित्र के माने गये दो बिन्दुओं को जोड़कर उनके बीच के भूतल की प्रकृति का वास्तविक रेखाचित्र या अनुप्रस्थ काट (Cross Section) बनाया जा सकता है। इससे अध्ययन कक्ष में ही दो स्थानों के बीच की अन्तःदृश्यता या पारदृश्यता (Intervisibility) ज्ञात करके कई समस्याओं का आसानी से समाधान ढूँढा जा सकता है।

समोच्च रेखाओं के कुछ मूल लक्षण :-

समोच्च रेखाएँ समान ऊँचाइयों वाले स्थान को दर्शाती हैं।

⇒ समोच्च रेखाएँ एवं उनकी आकृतियाँ स्थलाकृति के ढाल एवं ऊँचाई को दर्शाती हैं।

⇒ पास-पास खींची, अधिक घनी समोच्च रेखाएँ तीव्र ढाल को तथा दूर-दूर खींची हुई, कम घनी समोच्च रेखाएँ मंद ढाल को प्रदर्शित करती हैं।

⇒ दो या दो से अधिक समोच्च रेखाओं के एक-दूसरे से मिलने से ऊर्ध्वाधर वाली आकृतियाँ, जैसे- भृगु अथवा जलप्रपात प्रदर्शित होते हैं।

⇒ विभिन्न ऊँचाई वाली दो समोच्च रेखाएँ सामान्यतः एक-दूसरे को नहीं काटती हैं।

      समोच्च रेखाएँ खींचते समय ध्यान रखने योग्य निम्नलिखित बातें:-

1. समोच्च रेखाएँ खण्डित एवं कटी हुई रेखाएँ नहीं होती। इनमें निरन्तरता (Continuity) रहती है।

2. एक मानचित्र की सभी समोच्च रेखाओं का मध्यान्तर समान रहता है अर्थात् उसमें कहीं भी दो समोच्च रेखाओं के बीच ऊर्ध्वाधर अन्तर (VI) नहीं बदलेगा।

3. कुछ विशेष धरातलीय लक्षण; जैसे- पहाड़ी, पर्वत शिखर, श्रेणी का ऊपरी भाग रेतीले या अन्य टीले और गर्तों की समोच्च रेखाएँ बन्द वक्र (Closed Curves) रेखाएँ होती हैं।

4. धीमे ढाल वाले क्षेत्र में समोच्च रेखाएँ दूर-दूर और ढाल की प्रवणता या तीव्रता बढ़ने के साथ-साथ ये अधिक पास-पास आती जाती है।

5. नदी घाटी और पहाड़ी के अगले भाग या पर्वत प्रक्षेप (स्पर) की समोच्च रेखाओं का आकार प्रायः समान रहता है। इन दोनों में ऊँचाइयों का क्रम एक-दूसरे के विपरीत रहता है चित्र (A) एवं (B)। इसी भाँति पहाड़ी एवं झील की बन्द समोच्च रेखाओं में ऊँचाइयाँ ढाल की विलोम प्रकृति के कारण विपरीत दिशा में अंकित की जाती है।

6. पर्वत श्रेणी के निचले ढालों, हिमानी या नदी घाटी के पाश्र्व एवं पठारी किनारों के ढाल को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ प्रायः समानान्तर दिखायी देती है।

7. समोच्च रेखाएँ प्रवाह मार्गों को आड़ी काटती हुई बनायी जाती है। इन मार्गों को काटते समय वे घाटी तल के आकार के अनुसार (V या U आकार में) ऊपर की ओर मुड़ जाती है।

8. प्रत्येक समोच्च रेखा पर मध्यान्तर के अनुसार फीट, मीटर या माप की अन्य इकाई में ऊँचाई अवश्य अंकित की जाती है। यह अन्त बढ़ती हुई ऊँचाईयों की ओ लिया जाता है जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।

समोच्च रेखाएँ

26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)

26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)



अनुप्रस्थ काट

        किसी समोच्च मानचित्र में अंकित किसी रेखा के सहारे त्रिमितीय धरातल का द्विमितीय (लम्बाई एवं ऊंचाई) पार्श्व चित्र ही अनुप्रस्थ काट (Cross Section) कहलाता है।

       अनुप्रस्थ काट सामान्यतः निम्नलिखित विधियों से खींचें जाते हैं।

⇒ सीधी रेखा के सहारे (Along a Straight Line)-

(i) लम्ब डालकर, एवं

(ii) कागज की पट्टी विधि।

(i) लम्ब डालकर (By drawing perpendiculars):-

       मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ इस विधि द्वारा बनायी जाती है। समोच्च मानचित्र में एक AB रेखा को बाह्य सीमा के समानान्तर खीचा। मानचित्र के बाहर नीचे की ओर AB के समानान्तर एवं बराबर लम्बी CD रेखा खींच लें।

        अब जितनी समोच्च रेखाओं को AB रेखा काटती है, उतनी ही लम्बवत् रेखाएँ नीचे की CD रेखा की ओर अनुकूल दूरी पर खींच लें। CD के दोनों ओर लम्ब डालकर उसे पेन्सिल से AB से मिला दें। अब इस लम्बवत् AC रेखा के निचले भाग के बाहर की ओर धरातल की प्रकृति के अनुसार एवं समोच्च रेखाओं के फैलाव या मान के अनुसार ऊँचाइयाँ अंकित कर CD के समानान्तर या आड़ी रेखाएँ खीच लें।

     अतः वह रेखा जिसके सहारे अनुप्रस्थ काट का पार्श्व चित्र (Cross Section) खींचा जाता है, उसे अनुदैर्ध्य रेखा (Line of Profile) कहते हैं। AB रेखा समोच्च रेखाओं को जिन बिन्दुओं पर काटती हुई जाती है, उनसे CD की ओर कटी हुई रेखाओं की तरह लम्ब डालते हुए उन्हें सम्बन्धित ऊँचाई वाली आड़ी रेखा पर मिलाया।

       इस विधि से जो बिन्दु मानचित्र के नीचे के रेखाचित्र पर आये, उन्हें एक गहरी रेखा द्वारा मिला दें। यही आकृति AB रेखा के सहारे आने वाली समोच्च आकृति का अनुप्रस्थ काट है। इसमें मानचित्र एवं अनुप्रस्थ काट दोनों ही की रेखाएँ समानान्तर एवं बराबर लम्बी होने से शुद्ध होगी। इससे आसानी से क्षैतिज और लम्बवत् दोनों ही मापनियों का अनुपात निश्चित किया जा सकता है। प्रायः लम्बवत् मापनी क्षैतिज मापनी से कई गुना अधिक होती है।

(ii) कागज की पट्टी विधि द्वारा (By Strip Mehtod):-

        व्यवहार में समोच्च रेखाओं से बनी आकृतियों का अनुप्रस्थ काट प्रायः तिर्यक् या तिरछी रेखा खींचकर बनाना होता है। ऐसे मानचित्रों का अनुप्रस्थ काट यदि तिरछी रेखा पर ही लम्ब डालकर खींचा जायेगा तो वहाँ दूरी सिकुड़ जाने से पूर्णतः गलत होगा।

        इसमें धरातल की समानुपातिक लम्बाई भी सही-सही नहीं बताई जा सकती। अतः ऐसी तिरछी या तिर्यक रेखा के सहारे आने वाले धरातल का सही अनुप्रस्थ काट खींचने के लिये एक मुड़ी हुई साफ कागज की पट्टी लेकर उसे चित्र (B) की भाँति तिर्यक रेखा के सहारे सटाते हुए इस प्रकार रखेंगे कि यह पट्टी पूरी रेखा पर आ जाय।

        इस पट्टी को जिस ऊँचाई की समोच्च रेखा जहाँ-जहाँ पर छूती है, वहाँ-वहाँ पर छोटे-छोटे चिह्न पट्टी पर अंकित कर उन पर बीच-बीच में ऊँचाई लिख दी जाती है। चोटियों व सबसे निम्न भागों में सुविधा के लिए ढाल के अनुसार तीर खींच दें।

      अब मानचित्र के बाहर सुविधाजनक स्थान पर कागज की पट्टी के दोनों पर्श्वीय बिन्दुओं की लम्बाई के बराबर सीधी रेखा खींचकर उसके दोनों किनारे पर लम्ब डाल दें। इन लम्बों पर 1″ या सुविधाजनक दूरी लेकर ऊँचाइयाँ अंकित करने हेतु तल रेखा के समानान्तर अन्य रेखाएँ खींच लें।

       अब जिस पट्टी पर ऊँचाइयाँ अकित की गई है, उस कागज की पट्टी को पुनः तल रेखा पर रखकर उस पर अंकित चिह्नों की ऊँचाई के अनुसार ऊपर की ओर लम्ब खींचे। इन लम्बों के शीर्ष बिन्दुओं को जोड़ते हुए एक गहरी रेखा खींच लें, इस रेखा को खींचते समय शीर्ष और निम्न स्थल के पास लगे तीरों को ध्यान में रखना चाहिये। अतः यही तिर्यक रेखा के सहारे खींचा गया सही अनुप्रस्थ काट है। यहाँ इस आकृति की आधार रेखा की लम्बाई तिर्यक अनुदैर्ध्य रेखा के बराबर है।

⇒ लम्बवत् मापनी एवं लम्बवत् अभिवृद्धि (Vertical Scale and Vertical Exaggeration):-

      समोच्च मानचित्र में धरातल जटिल बना रहता है, अतः इससे अनुप्रस्थ काट (Cross Section) बनाते समय लम्बवत् मापनी की ओर भी ध्यान रखा जाना चाहिये। क्षैतिज विस्तार एवं लम्बवत् अभिवृद्धि के बीच मापनी के आधार पर अन्तः सम्बन्ध रहता है। इसमें धरातल के स्वरूप- मैदान, पहाड़ी, पठार, पर्वत, आदि के ढाल को ध्यान में खा जाता है।

अनुप्रस्थ काट

अन्य उदहारण


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25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान (Properties and Identification of Minerals)

25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान

(Properties and Identification of Minerals)


      खनिजों की पहचान उनकी भौतिक विशेषताओं या गुणों के आधार पर कर सकते हैं। खनिजों के मुख्य गुण इस प्रकार हैं-

1. रंग (Colour)

2. चमक (Lustre )

3. विशिष्ट गुरुत्व (Specific gravity)

4. कठोरता (Hardness)

5. दरार (Cleavage)

6. धारी (Streak)

7. विशेष गुण (Special characteristics)

1. रंग (Colour):-

    किसी खनिज का सबसे स्पष्ट गुण उसका रंग है। खनिजों के रंग का निर्धारण उनकी परमाणविक संरचना से तथा कुछ में अशुद्धियों के कारण होता है। वैसे तो कई खनिजों का रंग एक जैसा होता है। उदाहरण के लिए, कई खनिज हरे रंग के होते हैं। जैसे- ओलिवाइन, एपिडोट और एक्टिनोलाइट आदि। लेकिन यदि रासायनिक संरचना में अशुद्धियाँ हैं, जैसे कि क्वार्ट्ज तो एक खनिज कई अलग-अलग रंग ले सकता है, जो स्पष्ट, धुएँ के रंग का गुलाबी, बैंगनी या पीला हो सकता है।

       खनिजों के रंग का विशिष्ट निदान नहीं होने का एक कारण यह है कि क्रिस्टल संरचना और संरचना के कई घटक हैं जो रंग उत्पन्न कर सकते हैं। लौह जैसे कुछ तत्वों की उपस्थिति से सदैव एक रंगीन खनिज बनता है, लेकिन लौह अपने ऑक्सीकरण की स्थिति के आधार पर विभिन्न प्रकार के रंग उत्पन्न कर सकता है। ये रंग आमतौर पर काला, लाल या हरा होता है।

       कुछ खनिजों की क्रिस्टल संरचना में रंग-उत्पादक तत्व होते हैं। जैसे ओलिवाइन (Fe2SiO4), जबकि अन्य उन्हें क्वार्ट्स (SiO2) जैसी अशुद्धियों के रूप में शामिल करते हैं। यह सारी परिवर्तनशीलता किसी खनिज की पहचान के लिए केवल रंग का उपयोग करना कठिन बना देती है। हालाँकि, क्रिस्टल रूप जैसे अन्य गुणों के संयोजन में, रंग संभावनाओं को कम करने में सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए, हॉर्नब्लेंड, बायोटाइट एवं मस्कोवाइट सभी आमतौर पर ग्रेनाइट जैसी चट्टानों में पाए जाते हैं।

       हॉर्नब्लेंड और बायोटाइट दोनों काले हैं, लेकिन उन्हें उनके क्रिस्टल रूप से उनकी पहचान आसानी से की जा सकती है क्योंकि बायोटाइट शीट में होता है, जबकि हॉर्नब्लेंड मजबूत प्रिज्म बनाता है। मास्कोवाइट और बायोटाइट दोनों शीट में बनते हैं, लेकिन वे अलग-अलग रंग के होते हैं। वास्तव में मस्कोवाइट रंगहीन होता है।

2. चमक या आभा (Lustre):-

    प्रत्येक खनिज की अपनी चमक होती है, जैसे- मेटैलिक, रेशमी, ग्लॉसी आदि। चमक या आभा शब्द से तात्पर्य प्रकाश की मात्रा एवं गुणवत्ता से है जो किसी खनिज की बाहरी सतहों से परावर्तित होती है। चमक इस बात का आंकलन प्रदान करती है कि खनिज सतह कितनी ‘चमकती’ है।

       किसी खनिज की चमक वह तरीका है जिससे वह प्रकाश को प्रतिबिंबित करता है। एक खनिज जो कांच की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है, उसमें काँच (Vitreous) जैसी या ग्लासी चमक होती है।

      एक खनिज जो क्रोम की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है उसमें धात्विक (Metallic) चमक होती है। चमक के लिए विभिन्न प्रकार की अन्य संभावनाएँ भी हैं, जिनमें मोती (pearly), मोमी (waxy) एवं राल (resinous) शामिल है। जो खनिज हीरे की तरह अदम्य या शानदार परावर्तक होते हैं उनमें अदम्य चमक होती है। थोड़े से प्रयास से, चमक को आसानी से पहचाना जा सकता है साथ ही यह अत्यन्त विशिष्ट होते हैं। विशेषकर उन खनिजों के लिए जो जैसे कई रंगों में होते हैं।

(i) धात्विक या चमकदार (Metallic or splendent):-

        खनिजों में पॉलिश धातु की चमक होती है और आदर्श सतहें परावर्तक सतहों के रूप में काम करती है, जैसे गैलेना, पाइराइट एवं मैग्नेटाइट।

(ii) विट्रियस (Vitreous):-

     यह शब्द लैटिन भाषा के ग्लास, विट्रियम से लिया गया है। यह चमक का एक ऐसा प्रकार है जो खनिजों में सबसे अधिक देखा जाता है और अपेक्षाकृत कम अपवर्तक सूचकांक वाले पारदर्शी या पारभासी खनिजों में होती है। जैसे- कैल्साइट, क्वार्ट पुखराज, बेरिल, टूमलाइन और फ्लोराइट आदि।

(iii) रालयुक्त (Resinous):-

      रालयुक्त चमक की सतह पर राल जैसी चमक होती है। ऐसी सामग्रियों का अपवर्तनांक 2.0 से अधिक होता है। स्पैलेराइट (ZnS) एक रालयुक्त चमक प्रदर्शित करता है।

(iv) फीके या मटमैले (Dull or Earthy):-

   फीके या मटमैले चमक वाले खनिज, प्रकाश को बहुत खराब तरीके से परावर्तित करते हैं एवं चमकते नहीं हैं। ऐसी चमक अक्सर उन खनिजों में देखी जाती है जो छोटे-छोटे दानों के समूह से बने होते हैं।

(v) मोती (Pearly):-

   मोती की चमक इंद्रधनुषी, ओपेलेसेंट या मोती जैसी दिखाई देती है। यह सामान्यतः खनिज सतहों द्वारा प्रदर्शित होता है जो पूर्ण दरार के विमानों के समानांतर होते हैं। टैल्क जैसे परत सिलिकेट अक्सर दरार वाली सतहों पर मोती जैसी चमक प्रदर्शित करते हैं।

(vi) चिकनाई (Greasy):-

     एक सतह जिसमें चिपचिपी चमक होती है वह तेल की एक पतली परत से ढकी हुई प्रतीत होती है। एक प्रकाश प्रकीर्णन सतह जो थोड़ी खुरदरी होती है, चिकनाई वाली चमक प्रदर्शित कर सकती है, जैसे- नफाइना।

(vii) रेशमी (Silky):-

     जब प्रकाश बारीक समानांतर रेशों के समुच्चय से परावर्तित होता है तो उत्पन्न चमक रेशमी चमक होती है। मैलाकाइट और सर्पेन्टाइन दोनों रेशमी चमक प्रदर्शित कर सकते हैं।

(viii) एडमैंटाइन या ब्रिलियंट (Adamantine or brilliant):-

      हीरे का चमकदार प्रतिबिंब एडमेंटाइन के रूप में जाना जाता है। एडामेंटाइन चमक वाले खनिजों में उच्च अपवर्तक सूचकांक (1.9-2.6) होते हैं और ये अत्यधिक फैलाव वाले और पारभासी होते हैं।

3. कठोरता (Hardness):-

      खनिज कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार के होते हैं, लेकिन अधिकांश खनिज कठोर ही होते हैं। कठोरता की डिग्री तुलानात्मक रूप से आसानी या कठिनाई को देखकर निर्धारित की जाती है किसी खनिज की कठोरता का परीक्षण कई तरीकों से किया जा सकता है। आमतौर पर खरोंच परीक्षण का उपयोग करके खनिजों की तुलना ज्ञात कठोरता की वस्तु से की जाती है।

       उदाहरण के लिए यदि कोई कील क्रिस्टल को खरोंच सकती है, तो कील उस खनिज की तुलना में कठोर है। 1800 के दशक की शुरुआत में लगभग 1812 में प्रसिद्ध भूविज्ञानी और खनिजविज्ञानी फ्रेंडरिक मोहस ने स्क्रैच परीक्षण के आधार पर एक सापेक्ष कठोरता पैमाना विकसित किया। उन्होंने प्रत्येक खनिज को पूर्णांक संख्याएँ दी, जहाँ 1 सबसे नरम और 10 सबसे कठोर है।

     यद्यपि इनका यह पैमाना रैखिक नहीं है (कोरंडम वास्तव में क्वार्ट्ज की तुलना में 4 गुना अधिक कठोर है), और अन्य तरीकों ने अब कठोरता के अधिक कठोर माप प्रदान किए हैं। मोहस पैमाने में सटीकता की कमी के बावजूद, यह आज भी उपयोगी बना हुआ है क्योंकि यह सरल याद रखने में आसान एवं परीक्षण करने में आसान है।

     पॉकेटनाइफ का स्टील (भूवैज्ञानिकों के लिए क्षेत्र में ले जाने के लिए एक सामान्य उपकरण) लगभग ठीक मध्य में पड़ता है, इसलिए ऊपरी आधे हिस्से को निचले आधे से अलग करना आसान होता है। उदाहरण के लिए, क्वार्ट्ज और कैल्साइट बिल्कुल एक समान दिखते हैं। दोनों रंगहीन एवं पारभासी हैं, और विभिन्न प्रकार की चट्टानों में पाए जाते हैं। लेकिन एक साधारण स्क्रैच परीक्षण उन्हें अलग बता सकता है।

      कैल्साइट को पॉकेटनाइफ या पत्थर के हथौड़े से खरोंचा जाएगा और क्वार्ट्ज को नहीं। जिप्सम भी काफी हद तक कैल्साइट जैसा दिख सकता है, लेकिन यह इतना नरम होता है कि इसे नाखून से खरोंचा जा सकता है। कठोरता में भिन्नता खनिजों को विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोगी बनाती है।

       कैल्साइट की कोमलता इसे मूर्तिकला के लिए, एक लोकप्रिय सामग्री बनाती है (संगमरमर पूरी तरह से कैल्साइट से बना होता है) जबकि हीरे की कठोरता का मतलब है कि इसका उपयोग चट्टान को चमकाने के लिए अपघर्षक के रूप में किया जाता है।

खनिज कठोरता
Tak 1
Gypsum 2
Calcite 3
Fluorite 4
Apatite 5
Feldspar 6
Quartz 7
Topaz 8
Corundum 9
Diamond 10

4. क्रिस्टल रूप (Crystal form):-

    किसी खनिज क्रिस्टल अर्थात् कणों का ब्राह्मरूप (बाहरी आकार या उसका क्रिस्टल रूप) बहुत सीमा तक उसकी आंतरिक परमाणु संरचना द्वारा निर्धारित होता है, जिसका अर्थ है कि यह गुण अत्यधिक नैदानिक हो सकता है। खनिजों के कण घनाकार, अष्टभुजाकार या षट्भुजाकार भी हो सकते हैं। विशेष रूप से, क्रिस्टल के रूप को क्रिस्टल चेहरों के बीच कोणीय सम्बन्धों द्वारा परिभाषित किया जाता है। कुछ खनिज, जैसे हेलाइट (NaCl या नमक) और पाइराइट (FeS) का घन रूप (cubic form) होता है।

     अन्य जैसे टूमलाइन प्रिज्मीय (prismatic) है। कुछ खनिज जैसे अजुराइट और मैलाइट, जो दोनों ताँबे के अयस्क हैं, नियमित क्रिस्टल नहीं बनाते हैं, और अनाकार (amorphous) होते हैं।

   दुर्भाग्य से, हमें सदैव क्रिस्टल का रूप देखने को नहीं मिलता। हम पूर्ण क्रिस्टल तभी देख पाते हैं जब उन्हें किसी गुहा में विकसित होने का अवसर मिलता है, जैसे कि जियोड में। हालांकि, जब ठंडा मैग्मा के संदर्भ में क्रिस्टल बढ़ते हैं, तो वे अन्य सभी क्रिस्टल के साथ जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं जो बढ़ने का प्रयास कर रहे होते हैं और वे जितनी भी जगह भर सकते हैं, भर लेते हैं। क्रिस्टल का आकार उपलब्ध स्थान की मात्रा के आधार पर काफी भिन्न हो सकता है, लेकिन क्रिस्टल फेस के मध्य का कोण सदैव समान रहता है।

5. घनत्व (Density):-     

       खनिजों का घनत्व व्यापक रूप से लगभग 1.01 ग्राम / सेमी से लेकर लगभग 17.5 ग्राम/सेमी तक भिन्न होता है। पानी का घनत्व 1 ग्राम / सेमी है, शुद्ध लोहे का घनत्व 7.6 ग्राम/सेमी है, शुद्ध सोने का घनत्व 17.65 ग्राम सेमी है। इसलिए, खनिज पानी एवं शुद्ध सोने के मध्य घनत्व की सीमा पर होते हैं।

       किसी विशिष्ट खनिज के घनत्व को मापने के लिए समय लेने वाली तकनीकों की आवश्यकता होती है, और अधिकांश भूवैज्ञानिकों ने “सामान्य” घनत्व क्या है, इसके आकार के लिए असामान्य रूप से भारी क्या है, और असामान्य रूप से हल्का क्या है। इसके लिए अधिक सहज ज्ञान विकसित किया है। किसी चट्टान को “तौल” करके अनुभवी भूविज्ञानी आमतौर पर अनुमान लगा सकते हैं कि चट्टान किन खनिजों से बनी है।

6. दरार (विदलन) और फ्रैक्चर (Cleavage and Fracture):-

        खनिज विज्ञान में क्रिस्टलीय सामग्रियों की निश्चित क्रिस्टलोग्राफिक संरचनात्मक विमानों के साथ विभाजित होने की प्रवृत्ति है। सापेक्ष कमजोरी के ये स्तर क्रिस्टल में परमाणुओं और आयनों के नियमित स्थान का परिणाम हैं, जो चिकनी दोहराव वाली सतह बनाते हैं जो माइक्रोस्कोप और नग्न आँखों दोनों में दिखाई देते हैं। दरार क्रिस्टलोग्राफिक विमानों के समानांतर बनती है।

        इसे ऐसे भी समझा जा सकता है, कि अधिकांश खनिजों में उनकी परमाणु संरचनाओं के भीतर अंतर्निहित कमजोरियाँ होती हैं एक ऐसा तल जिसके साथ बंधन की ताकत आसपास के बंधनों से कम होती है। जब हथौड़े से मारा जाता है या अन्यथा तोड़ दिया जाता है, तो खनिज पहले से मौजूद कमजोरी के उस स्तर पर टूट जाएगा। इस प्रकार के टूटने को दरार कहा जाता है, और दरार की गुणवत्ता बंधन की ताकत के साथ बदलती रहती है।

         खनिजों में विदलन प्रकृति दिशा द्वारा निश्चित होती है। खनिज एक या अनेक दिशाओं में एक-दूसरे से कोई भी कोण बनाकर टूट सकते हैं। 

(i) बेसल या पिनाकोइडल दरार तब होती है जब केवल एक दरार तल होता है, जैसे-ग्रेफाइट, अभ्रक (Mica) (मास्कोवाइट या बायोटाइट)। यही कारण है कि अभ्रक को छीलकर पतली शीट में बदला जा सकता है।

(ii) क्यूबिक दरार तब होता है जब तीन दरार तल 90 डिग्री पर एक-दूसरे को काटते हैं। जैसे- हेलाइट, गैलेना।

(iii) अष्टफलकीय बिदलन तब होता है जब एक क्रिस्टल में चार विदलन तल होते हैं। अर्धचालकों के लिए अष्टफल्कीय विदलन सामान्य है। जैसे-हीरा, फ्लोराइट।

(iv) रौम्बोहेड्रल दरार तब होती है जब तीन दरार तल ऐसे कोणों पर एक-दूसरे को काटते हैं जो 90 डिग्री नहीं होते हैं जैसे-कैल्साइट।

(v) प्रिज्मीय दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में दो दरार तल होते हैं, जैसे- स्पोडुमिन।

(vi) डोडेकाहेड्रल दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में छह दरार तल होते हैं, जैसे स्पेलराइट।

7. खनिज वर्गीकरण प्रणाली (Mineral Classification Systems):-

       मध्य युग से 1800 के दशक के मध्य तक खनिजों के वर्गीकरण के लिए भौतिक गुण मुख्य आधार थे। खनिजों को कठोरता के अनुसार समूहीकृत किया गया था, जिसमें हीरा एवं कोरन्डम खनिज एक ही वर्ग में थे। जैसे-जैसे खनिजों की रासायनिक संरचना निर्धारित करने की क्षमता विकसित हुई, वैसे-वैसे एक नई वर्गीकरण प्रणाली भी विकसित हुई हैं।

      कई वैज्ञनिकों ने खनिज रासायनिक सूत्रों की खोज में योगदान दिया, लेकिन 1850 से 1892 तक येल विश्वविद्यालय के खनिज विज्ञानी जेम्स ड्वाइट डाना ने रासायनिक संरचना के आधार पर खनिजों के लिए वर्गीकरण प्रणाली विकसित को जो आज तक चल रही है। उन्होंने खनिजों को उनके आयनों के अनुसार समूहीकृत किया। एक रासायनिक वर्गीकरण प्रणाली का मतलब था कि जिन खनिजों को सैद्धांतिक रूप से एक साथ समूहीकृत किया गया था, वे भी चट्टानों में एक-दूसरे के साथ दिखाई देते थे क्योंकि वे समान भू-रासायनिक परिस्थितियों में विकसित होते थे।

        अभी भी भौतिक गुण खनिजों की पहचान के लिए मुख्य साधन हैं, हालांकि, अब उनका उपयोग खनिजों को समूहित करने के लिए नहीं किया जाता है। एक संरचना आधारित समूहन कुछ सामान्य खनिज संघों पर प्रकाश डालता है जो भूवैज्ञानिकों को एक त्वरित नजर से भी इस बारे में शिक्षित अनुमान लगाने की अनुमति देता है कि चट्टान में कौन से खनिज मौजूद हैं।

     अब तक सबसे आम खनिज सिलिकेट हैं, जो पृथ्वी की परत का 90% भाग बनाते हैं। सैकड़ों नामित सिलिकेट खनिजों में से केवल आठ ही सामान्य हैं, जिनमें से एक क्वार्ट्ज है। हालांकि, असामान्य खनिज महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उनमें आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जैसे गैलेना, जो सीसा के लिए प्राथमिक अयस्क हैं, और ऐपेटाइट, फॉस्फोरिक एसिड के लिए खनन किया जाने वाला फॉस्फेट शामिल हैं, जिसे उर्वरकों में जोड़ा जाता है।

8. धारियाँ ( Streak):-

      खनिजों में विभिन्न रंगों के मिश्रण के कारण धारियाँ होती हैं। किसी खनिज की धारियाँ उस पाउडर के रंग की होती है जो तब उत्पन्न होता है जब इसे किसी अपक्षयित सतह पर खींचा जाता है। किसी खनिज के स्पष्ट रंग के विपरीत, जो अधिकांश खनिजों के लिए काफी भिन्न हो सकता है, बारीक पिसे हुए पाउडर के निशान में आमतौर पर अधिक सुसंगत विशेषता वाला रंग होता है और इस प्रकार यह खनिज पहचान में एक महत्वपूर्ण नैदानिक उपकरण है। यदि कोई लकीर बनी नहीं दिखती है, तो खनिज की लकीर सफेद या रंगहीन मानी जाती है। अपारदर्शी और रंगीन सामग्रियों के निदान के रूप में स्ट्रीक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

(i) कुछ खनिज अपने प्राकृतिक रंगों के समान एक धारियाँ छोड़ते हैं, जैसे सिनेबार और लाजुराइट।

(ii) अन्य खनिज आश्चर्यजनक रंग छोड़ते हैं, जैसे फ्लोराइट, जिसमें हमेशा एक सफेद लकीर होती है। हालांकि यह बैंगनी, नीले, पीले या हरे क्रिस्टल में दिखाई दे सकता है।

(iii) हेमेटाइट, जो दिखने में काला होता है, एक लाल लकीर या चेरी लाल छोड़ता है जो इसके नाम का कारण बनता है, जो ग्रीक शब्द “हैमा” से आया है जिसका अर्थ है “रक्त”

(iv) गैलेना, जो दिखने में हेमेटाइट के समान हो सकता है, अपनी भूरे रंग की लकीर से आसानी से पहचाना जा सकता है।

खनिज संसाधनों को उपयोग (Uses of Mineral Sources)-

      खनिज संसाधनों के उपयोग में से कुछ हैं-

1. भवनों, पुलों एवं आवास निर्माण के उपयोग किया जाता है।

2. उद्योगों एवं मशीनरी के विकास में इसका उपयोग किया जाता है।

3. मुख्य रूप से कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है।

4. रक्षा उपकरणों के विकास के लिए उपयोग किया जाता है।

5. टेलीफोन, तार, केबल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि जैसे संचार के क्षेत्र में उपयोग किया जाता है।

6. विभिन्न प्रयोजनों के लिए मिश्र धातुओं का निर्माण।

7. आभूषणों के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है जैसे सोना, हीरा, चाँदी आदि के आभूषण।

8. उर्वरकों, कवकनाशी आदि के संश्लेषण के लिए उपयोग किया जाता है।


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29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना

 29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना



            क्षेत्रीय विभेदन भूगोल की आत्मा स्वरूप है। अन्तर्सम्बन्ध की प्रक्रिया तो मात्र यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्य कैसे एक जैविक इकाई की तरह परस्पर ससंजित एवं क्रियाशील हैं, लेकिन इन तथ्यों की जिनमें प्राकृतिक वातावरण एवं मनुष्य आते हैं, अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं।

     यदि हम पृथ्वी की सतह को देखें तो पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा जल है एवं एक-तिहाई भाग थल है। थल पर मिट्टी की असमान परत है तथा अनेक भू-आकृतियाँ हैं, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ एवं उसके विविध रूप। जल भी अनेक छोटे-बड़े सागरों, नदियों, झीलों में विभक्त है। थल पर नदियाँ, हिमानी, झरने, भूमिगत जल, अन्तरादेशीय प्रवाह प्रणालियाँ, जंगल, घास के मैदान, पशुजीवन, मरुस्थल, कृषि क्षेत्र आदि दृष्टव्य हैं।

       जल की सतह पर कोरल रीफ, जल से प्राप्त पदार्थ, थल से प्राप्त पदार्थ, जलीय वनस्पतियाँ, मछलियाँ, कछुए आदि अनेक जीव हैं। वायुमण्डल भी पृथ्वी की सतह का अंग है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23°30′ अंश झुकी है एवं सूर्य की परिक्रमा करती है। वायुमण्डल भी उसके साथ घूमता है। पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप का वितरण असमान है जो सूर्य से सापेक्ष स्थिति के अनुसार बदलता है। इससे पृथ्वी की जलवायु में विविधता आती है। इस तरह वैभिन्न्य पृथ्वी की सतह की मूल विशेषता है।

      दूसरी ओर मनुष्य हैं। मनुष्य अकेला नहीं होता। वह वस्तुतः समाज में रहता है। आज भी पृथ्वी की सतह पर आदिवासी जनजातियाँ हैं जो परस्पर युद्धरत रहती हैं। पशुचारण करने वाले समूह भी हैं। उन्नत समाज स्थायी कृषि करते हैं और उद्योग, व्यापार परिवहन में रत रहते हैं। उनके अधिवास हैं जो कहीं बिखरे हैं तो कहीं सघन हैं, ग्राम एवं नगर हैं, ये सब भी स्थान घेरते हैं।

     उपरोक्त दोनों तथ्य कैसे एक-दूसरे से एक जीव की तरह अन्तर्सम्बन्धित हैं, यह ऊपर विवेचित है। इस तरह यह अन्तर्सम्बन्धित वैविध्य पृथ्वी की सतह पर पहचाना जा सकता है तथा इसके छोटे-बड़े क्षेत्र दृष्टव्य होते हैं। उदाहरणार्थ ध्रुवीय क्षेत्र के एस्किमों निवासियों को अपना स्पष्ट क्षेत्र है, तो अफ्रीका के पिग्मी एवं कलाहारी के बुशमैन का अपना रहन-सहन एवं स्पष्ट क्षेत्र है।

        इतना ही नहीं असम घाटी में धान की खेती, कनाडा में गेहूँ की खेती के विस्तृत क्षेत्र, अर्जेन्टाइना में पशुचारक प्रदेश, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं जापान में औद्योगिक प्रदेश सब वैभिन्य से परिपूर्ण होते हुए भी क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में पहचाने जाते हैं। इस तरह, समाज एवं वातावरण के अन्तर्सम्बन्ध की परिणति क्षेत्रीय इकाई में होती है। ऐसी क्षेत्रीय इकाइयों का अध्ययन भूगोल का उद्देश्य है।

    यहीं से भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का समावेश होता है। पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय वैभिन्न्य का विषम स्वरूप पृथ्वी को विभिन्न प्रखण्डों में बांट देता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान का धरातल, जलप्रवाह, मिट्टियाँ, मानव अधिवास, आदि मिलकर एक विशिष्ट जीवन पद्धति का गठन करते हैं। यह कृषि प्रधान क्षेत्र कहा जा सकता है, सीमांकित किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रदेश में जीवन पद्धति की एकरूपता या समरूपता मिलती है। इस समरूपता के आधार पर इसे गंगा-यमुना प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

       इसी तरह, पहाड़ी प्रदेश, पर्वतीय क्षेत्र, भूमध्यसागरीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय प्रदेश आदि सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपने आन्तरिक क्षेत्रीय विस्तार में एक रूप होते हैं। इसलिए इन्हें प्रदेश कहते हैं।

     प्रदेश की संकल्पना भूगोल का क्रोड है। प्रदेश की परिभाषा, प्रदेश की पहचान एवं सीमांकन आदि सब अपने आप में विवेचना की विषय-वस्तु हैं। प्रदेश भौगोलिक भी होते हैं तथा प्रदेश की पहचान कराने वाले एक या अधिक तत्वों पर आधारित भी होते हैं। इस तरह प्रदेश अतिव्यापित भी हो सकते हैं।

     भूगोल के सैद्धान्तिक स्वरूप के उपरोक्त दोनों तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अन्तर्सम्बन्ध पृथ्वी की सतह के तथ्यों को संसंजित करता है तथा क्षेत्रीय वैभिन्न्य भौगोलिक तथ्यों के स्थानिक प्रसार एवं उनके भौगोलिक व्यक्तित्व एवं अन्तर्निहित समरूपता को स्थापित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल में क्षेत्रीय विभेद अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना को विवेचित कीजिए।

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

(Conventional Signs and Symbols)


रूढ़ चिन्ह और संकेत

          स्थलाकृति मानचित्र पर भौगोलिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को एक विशिष्ट चिन्ह के द्वारा प्रदर्शित किया है, जो रूढ़ चिन्ह कहे जाते है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा इन संकेतों का मापनीकरण किया जा चुका है। भारतीय स्थलाकृति मानचित्र में प्रयुक्त संकेत को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। प्राय: 1:50,000 और 1:25000 मापनी वाले पत्रक में रूढ़ चिन्ह समरूपी होते है। कुछ रूढ़ चिन्ह निम्नांकित है-

        यह मुख्यत: दो प्रका के होते है-

1. मौसम विज्ञान के लिए

2. स्थलाकृतिक पत्रक के लिए

 रूढ़ चिन्ह और संकेत

 


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20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ

20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ


हीदरग्राफ

       हीदरग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम टेलर महोदय ने किया था।

⇒ हीदरग्राफ में जलवायु के आँकड़े को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ में X-अक्ष पर वर्षा और Y-अक्ष पर तापमान को दिखाया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ का प्रयोग औपनिवेशिक काल में अँग्रेज लोग बड़े पैमाने पर किया करते थे।

⇒ हीदरग्राफ पर बहुत अधिक गर्म, बहुत अधिक ठण्डा, बहुत अधिक सूखा और बहुत अधिक आर्द्रता के साथ-2 अधिवासित होने के लिए उपयुक्त क्षेत्र को प्रदर्शित किया जाता था।

हीदरग्राफ

 

 

क्लाइमोग्राफ

       Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था।

⇒ Climograph X-अक्ष पर Relative Humidity (सापेक्षिक आर्द्रता) को और Y-अक्ष पर Wet Bulb Temperature (आर्द्र बल्ब तापमान) को ध्यान में रखकर मानचित्र या ग्राफ बनाया जाता है।

⇒ इंग्लैण्ड के निवासी औपनिवेशिक काल में Climograph का उपयोग वैश्विक स्तर पर निवास करने योग्य स्थान के निर्धारण में किया कर‌ते थे।

⇒ जबकि हीदरग्राफ का प्रयोग स्थानीय स्तर पर निवास करने योग्य स्थान का निर्धारण किया करते थे।

⇒ टेलर ने कुछ विशेष प्रकार की जलवायु को भी दर्शाया है जो क्लाइमोग्राफ के चारों कोनों पर होता है। इसके चार प्रकार हैं:

1. झुलसता हुआ (SCORCHING):-

        NW कोने पर, आर्द्र बल्ब तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् उष्ण-शुष्क जलवायु।

2. उमसदार (MUGGY):-

       NE कोने पर तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् उष्णार्द्र जलवायु।

3. शीतार्द्र (RAW):-

      SE कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् ठंडी आर्द्र जलवायु।

4. शीत-शुष्क (KEEN):-

       SW कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् शीत व शुष्क जलवायु।

 

Cartogram (मानारेख)

        मानारेख में किसी क्षेत्र की मूल आकृति को किसी विशेष उद्देश्य से विकृत कर सांख्यिकीय आंकड़ों का आरेखी विधि से मानचित्र पर प्रदर्शन किया जाता है। यह एक अति सारगर्भित एवं सरल मानचित्र होता है तथा आधुनिक भूगोल में काफी लोकप्रिय है।

⇒ इरविन रेख ने मानारेख को परिभाषित करते हुए कहा कि-“किसी एकल विचार को आरेखी ढंग से दिखाने के लिए बनाया गया अमूर्त और सरलीकृत मानचित्र को मानारेख कहते हैं।”

       मानारेख चार प्रकार का होता है:-

(1) क्षेत्र मूल मानारेख

        क्षेत्र मूल मानारेख में संसार अथवा किसी महाद्वीप, देश अथवा राज्य के क्षेत्रफल को आयत चित्र के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

क्षेत्र मूल मानारेख

(2) यातायात परिवहन मानारेख (Traffic flow Cartogram)

        वैसा मानारेख जिस पर सड़‌क पर चलने वाली गाड़ियों के भार को प्रदर्शित किया जाता है। इसे Star Diagram भी कहते हैं।

⇒ Star Diagram पर नियत समय में दिशा के अनुरूप चलने वाली वायु को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ इस आरेख में  शांत दिनों की संख्या को केन्द्र में लिख दिया जाता है या नहीं तो Calm Days लिख दिया जाता है। ऐसे Diagram को Wind Diagram कहते है।

यातायात परिवहन मानारेख

(3) Isochronic Diagram (समकालीन मानारेख)

         किसी निश्चित बिन्दु से समान समय में पहुँच वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समकालीन रेखा कहते हैं।

⇒ जब परिवहन मार्ग पर समकालीन रेखा को प्रदर्शित किया जाता है तो Isochronic Diagram का निर्माण होता है।

Isochronic Diagram

(4) समान मूल्य दूरी मानारेख

         किसी भी क्षेत्र के संदर्भ में सड़क अथवा रेलमार्ग पर तय की जाने वाली समान दूरी अन्तराल पर खींचे जाने वाली क्रमिक ट्रैफिक को प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को समान मूल्य दूरी मानारेख कहते है।

⇒ समान मूल्य दूरी मानारेख पर दूरी एवं परिवहन के भार को साथ-2 प्रदर्शित किया जाता है।

समान मूल्य दूरी मानारेख

अरगोग्राफ

       अरगोग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम गेडिज महोदय ने किया था।

⇒ अरगोग्राफ कृषकों के लिए काफी उपयोगी है।

⇒ अरगोग्राफ प तापमान, वर्षा, फसलों की संख्या और उत्पादन को एक साथ प्रदर्शित किया जाता है।


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3. मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

3. मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण


मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

      प्रकाश या ज्यामितीय विधि द्वारा समतल सतह पर निर्मित अक्षांश व देशांतर रेखाओं के जाल या भू-ग्रिड को मानचित्र प्रक्षेप कहा जाता है। गोलाकार पृथ्वी अथवा इसके किसी बड़े भू-भाग का समतल सतह पर मानचित्र बनाने के लिए मानचित्र प्रक्षेप का प्रयोग किया जाता है। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के जाल को Graticule, Net या Mesh के नाम से भी जाना जाता है।

मानचित्र प्रक्षेपों

           पृथ्वी की आकृति का यथार्थ चित्रण केवल ग्लोब के द्वारा ही संभव है एवं कोई भी मानचित्र प्रक्षेप आकार, क्षेत्रफल एवं दिशा, तीनों ही दृष्टि से सही नहीं होता है। परन्तु समक्षेत्र, यथाकृतिक अथवा शुद्ध दिशा के गुणों में से किसी विशेष गुण का प्रक्षेप बनाना संभव है। अतः मानचित्र के उद्देश्य को ध्यान में रखकर उपयुक्त प्रक्षेप का चयन किया जाता है।

    मानचित्र प्रक्षेप को तीन आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

(1) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

(2) गुण के आधार पर

(3) रचना विधि के आधार पर

(I) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

            प्रकाश के प्रयोग के आधार पर प्रक्षेप दो प्रकार के होते हैं:-

(1) संदर्श मानचित्र-प्रक्षेप (Perspective Map Projection or Geometrical Projection):-

         यह एक ऐसा Projection है जिसमें ग्लोब पर स्थित भूग्रिड को समतल कागज पर प्रकाश के माध्यम से प्रक्षेपित करते हैं।

        इस प्रक्षेप में प्रकाश के स्रोत की तीन स्थिति हो सकती है। जैसे-

(1) केन्द्र में,

(2) पृथ्वी के परिधि पर और

(3) अनन्त पर।

          इन तीनों स्थितियों के आधार पर प्रक्षेप तीन प्रकार के होते हैं:-
(i) केन्द्रक प्रक्षेप (Gnomonic Projection)

⇒ इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के केंद्र में होता है।

(ii) त्रिविम प्रक्षेप (Stereograophic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के परिधि पर होता है।

(iii) लम्ब-कोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत अनंत पर होता है।

(2) असंदर्श मानचित्र प्रक्षेप (Non-Perspective Map Projection):-

          इसमें गणितीय विधि के आधार पर भूग्रिड को समतल कागज पर प्रक्षेपित किया जाता है। इस विधि में प्रकाश स्रोत को केन्द्र में स्थिर कर दिया जाता है और समतल कागज को अलग-2 स्थितियों में बदलकर प्रक्षेपण का कार्य किया जाता है। इसके आधार पर यह Projection तीन प्रकार का होता है-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज को ग्लोब के ध्रुव पर फैलाकर रखा जाता है।

(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज विषुवत रेखा को स्पर्श करता है।
(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज ध्रुव और विषुवत रेखा के बीच के किसी स्थान को स्पर्श करता है।

(II) गुण के आधार पर 

             गुण के आधार पर प्रक्षे तीन प्रकार के होते हैं:-

(1) यथाआकृति प्रक्षेप (Orthomorphic Projection)

(2) समक्षेत्र प्रक्षेप (Homolographic Projection or Equal Area Projection)

(3) शुद्ध दिशा प्रक्षेप (Azimuthal Projection)

(III) रचना विधि के आधार पर

           इसमें गणित और प्रकाश दोनों का सहारा अपने सुविधा के अनुसार लिया जाता है।

⇒ रचना विधि के आधार पर प्रक्षेप कई प्रकार के होते हैं:-
(1) शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)

      शंकु प्रक्षेप चार प्रकार का होता है-

(i) One Standard Parallel Conical Projection (एक मानक अक्षांश वाला शंकु-प्रक्षेप)

(ii) Two Standard Parallel Conical Projection (दो मानक अक्षांशों वाला शंकु प्रक्षेप)

(iii) Bonne’s Projection (बोन प्रक्षेप)

(iv) Polyconic Projection (बहुशंकुक प्रक्षेप)

(2) बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)

(i) Cylindrical Equi-Distance Projection (समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप)

(ii) Cylindrical Equal-Area Projection (बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप)

(iii) Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप या यथाकृति प्रक्षेप)

(iv) Gall Projection (गॉल प्रक्षेप)

(3) Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)
              प्रकाशीय स्थिति के आधार पर खमध्य प्रक्षेप तीन प्रकार का होता है:-

(1) Gnomonic Projection (केन्द्रक नोमॉनिक प्रक्षेप)

(ii) Stereograophic Projection (त्रिविम प्रक्षेप)

(ii) Orthographic Projection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)

             खमध्य प्रक्षेप कागज तल स्थिति के आधार पर तीन प्रकार का होता है:-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

(ii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक प्रक्षेप)

(iii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

(4) रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Porojection)

(i) मॉलवीड प्रक्षेप (Mollveide Projection)

(ii) ज्यावक्रीय या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

(iii) गोलाकार प्रक्षेप (Globular Projection)

(iv) विच्छिन्न मॉलवीड प्रक्षेप (Interrupted Mollveide Projection)

(v) विच्छिन्न सैन्सन फ्लैम्स्टीड या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Interrupted Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण


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19. आरेख का प्रकार एवं उपयोग

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

(Diagram: Types & uses or Statistical Representation of Data)


आरेख का प्रकार एवं उपयोग

         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भूगोल के विषयवस्तु एवं विधि तंत्र में मात्रात्मक क्रांति का आगमन हुआ। इसी मात्रात्मक क्रान्ति का यह प्रभाव था कि भूगोल में अनेक प्रकार के भौगोलिक तत्वों का निरूपण हेतु आरेख (Diagram) का निर्माण किया जाने लगा।

⇒ मात्रात्मक क्रान्ति- भूगोल में गणितीय विधि का प्रयोग करना।

भौगोलिक तत्वों को ग्राफ या चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित करने की विधि को आरेख (Diagram) कहते हैं।

⇒ भूगोल में प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के किसी तत्व का वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को वितरण मानचित्र कहते है।

⇒ वितरण मानचित्र को दो भागों में बाँटते हैं-

(1) अमात्रात्मक विधि के द्वारा निर्मित वितरण मानचित्र या गुण प्रधान वितरण मानचित्र

(2) मात्रात्मक विधि पर आधारित वितरण मानचित्र या सांख्यिकी मानचित्र

गुण प्रधान मानचित्र /वितरण मानचित्र

       गुण प्रधान मानचित्र मोटे तौर पर चार प्रकार का होता है:-

(1) रंगारेखा विधि (Choro-Chromatic Method)

(2) सामान्य छाया विधि (Sketching Map) पर आधारित मानचित्र

(3) चित्रीय विधि (Pictorial Map) पर आधारित मानचित्र

(4) वर्ण प्रतीकी विधि पर आधारित मानचित्र (Choros-Chematic Map)

मात्रात्मक मानचित्र

      मात्रात्मक मानचित्र भी चार प्रकार का होता है-

(i) वर्णमात्री विधि पर आधारित मानचित्र

(ii) सममान प्रतीक विधि पर आधारित मानचित्र

(iii) बिन्दु विधि पर आधारित मानचित्र

(iv) आरेखी विधि आधारित मानचित्र

(1) रंगारेखी विधि मानचित्र (Colour patch Map)

⇒ इसे Colour Map या Choro-Chromatic Map भी कहते हैं।

⇒ प्राकृतिक, राजनीतिक एवं प्रशासकीय ने प्रदेशों के विस्तार, भूमि उपयोग, मिट्टी एवं वनस्पतियों के प्रकार का वितरण प्रदर्शित करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है।

⇒ रंगारेखी मानचित्र पर अलग-2 भौगोलिक तत्वों को अलग-2 रंग से प्रदर्शित करते हैं।

(2) Sketching Map (सामान्य छाया विधि)

⇒ sketching Map में एक भौगोलिक तत्व के उपविभाग को एक ही रंग से अलग-2 तीव्रता (Intensity) प्रदर्शित करते हैं।

(3) चित्रीय विधि पर आधारित मानचित्र

        किसी देश के दर्शनीय स्थान, पर्यटन केन्द्र, वेष-भूषा एवं ऐतिहासिक इमारतों के चित्रों के माध्यम से मानचित्र परम प्रस्तुत करना चित्रीय मानचित्र कहलाता है।

(4) वर्ण प्रतीकी मानचित्र

        वैसा मानचित्र जिस पर कई तत्त्वों के वितरण को एक ही मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ वर्ण प्रतीकी मानचित्र पर खनिजों का वितरण, औद्योगिक वितरण एवं फसल उत्पादन के वितरण प्रदर्शित करते हैं और Index बनाकर इसमें संकेत के रूप प्रदर्शित कर देते हैं।

⇒ कभी-2 Index का निर्माण कर सीधे-2 भौगोलिक तत्व के पहला अक्षर को मिलने वाले स्थान पर लिख दिया जाता है। ऐसे मानचित्र को नामांकन विधि मानचित्र कहते है।

मात्रात्मक विधि

       जब भौगोलिक तत्वों जैसे वस्तुओं के मूल्य, मात्रा, घनत्व इत्यादि को भौगोलिक मानचित्र पर या सांख्यिकी विधि द्वारा प्रकट किया जाता है तो उसे मात्रात्मक विधि घर आधारित आरेख (मानचित्र) कहते हैं।

यह कई प्रकार का होता है। जैसे-

(1) वर्णमात्री विधि (Choropleth)

        ऐसे मानचित्र में भिन्न-2 घनत्त्व वाली भौगोलिक तत्त्वों को मानचित्र पर प्रति इकाई औसत या प्रतिशत के मूल में प्रदर्शित करते हैं। जैसे- जनघनत्व (प्रति इकाई क्षेत्रफल पर निवासित जनसंख्या), कृषि भूमि का प्रतिशत, उत्पादकता (kg प्रति इकाई क्षेत्रफल) को दिखाया जाता है।

⇒ इसमें मूल्यों के बढ़ने के साथ रंगों के गहराई में भी वृद्धि होते जाती है।

(2) सममान रेखा विधि (Isopleth Map)

          मानचित्र पर किसी वस्तु के समान मूल्य या धनत्व को मिलाने वाली रेखा को Isopleth रेखा कहते हैं।

⇒ Isopleth जलवायु के तत्वों को दिखलाने के लिए काफी उपयोगी है। इसके अलावे इस पर निम्नलिखित तत्त्वों को प्रदर्शित किया जा सकता है। जैसे- समताप रेखा, सममेघ रेखा, समवर्षा रेखा, समदाब रेखा इत्यादि।

1. आइसोनीफ (Isonif)⇒ समान हिम वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनीफ कहते है।

2.  सममेघ रेखा या आइसोनेफ (Isoneph)⇒ समान मेघ आच्छादन वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनेफ कहते है।

3. आइसो बाथ (Isobath)⇒ समुद्र के अंदर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाकर खींचे जाने वाली रेखा को आइसो बाथ कहते है।

4. आइसो ब्रांट (Isobront)⇒ एक समान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

5. समपवनवेग रेखा या आइसोटैक (Isotach)⇒ मौसम मानचित्र पर पवन की समान गति वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखा।

6. समताप रेखा (Isotherm)⇒ समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

7. आइसोपैच (Isopach)⇒ हिमानी अथवा चट्टानों के समान मोटाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

8.  समकाल रेखा या आइसोक्रोन (Isochrone)⇒ किसी बिंदु से एक समान समय में तय कि गई दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

(3) बिन्दु विधि (Dot Method)

          इसे बनाने से पूर्व चार तथ्यों पर ध्यान देना पड़ता है-

(i) बिन्दुओं के आकार को निश्चित करना पड़ता है।

(ii) बिन्दु मूल्य सुनिश्चित करना पड़ता है।

⇒ बिन्दुओं के मूल्य का निर्धारण दो आधार पर होता है:

(a) क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि (क्षेत्रफल के लिए)

(b) आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि (आयतन के लिए)

(iii) बिन्दुओं को अंकित करना- यह भी दो प्रकार का हो सकता है:-

(a) समवितरण प्रणाली पर आधारित

(b) असमवितरण प्रणाली पर आधारित

(iv) एक समान बिन्दु बनाना।

⇒ बिन्दु विधि या आधारित मानचित्र में केवल एक वस्तु का विवरण दिखाते हैं। जैसे:- जनसंख्या,पालतू पशु

क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि

⇒ यह बिन्दु विधि वितरण मानचित्र का एक संशोधित रूप है।

⇒ इस विधि के द्वारा ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या को स्पष्ट रूप से दिखाया जा सकता है।

⇒ इस विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिंदु के द्वारा और नगरीय जनसंखा को अनुपातिक वृत के द्वारा दिखाया जाता है।

इसमें आनुपातिक वृत को क्षेत्रफल के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ वृतों की त्रिज्या सम्बंधित जनसंख्या का वर्गमूल निकालकर बिन्दु के आकार से गुणा करके प्राप्त किया जाता है।

आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि

⇒ इसमें भी ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के वितरण को मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ बोअर विधि में कभी-2 नगरीय केन्द्र की जनसंख्या अधिक होने पर आकार बहुत बड़ा हो जाता है, जिसके कारण वृत नगर सीमा के बाहर चली जाती है।

⇒ अत: इस समस्या से निपटने हेतु नगरीय जनसंख्या को समानुपातिक गोला के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। 

⇒ गोला का अर्द्ध व्यास जनसंख्या के घनमूल निकालकर ज्ञात करते हैं।

⇒ स्टेन डी गियर विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिन्दुओं एवं नगरीय जनसंख्या को गोलों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

(4) आरेखी विधि पर आधारित मानचित्र

         वैसा मानचित्र जिसमें भौगोलिक तत्वों को सरल रेखा, वृत, दण्ड इत्यादि के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। उसे आरेख कहते हैं।

आरेख चार प्रकार के होते हैं-

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

        दण्ड-आरेख पा पिछले शताब्दी के जनसंख्या को प्रदर्शित किया जा सकता है। इसमें समय को x-axis पर और जनसंख्या को Y-axis पर दिखाया जाता है।

      वस्तुतः दण्डारेख दो प्रकार का होता है:-

(a) साधारण दण्ड आरेख (Simple Bar Diagram):- साधारण दण्ड आरेख में कुल मात्रा को एक दण्ड के रूप में प्रदर्शित करते है।

साधारण दण्ड आरेख

(b) मिश्रित दण्ड आरेख (Compound Bar Diagram):- यदि दिया गया डाटा सतत (Continuous) हो तो दण्डारेख आयत चित्र के रूप में बनते है। 

मिश्रित दण्ड आरेख

(c) बहुदण्ड आरेख (Multiple Bar Diagram):- इसमें दो या अधिक वस्तुओं के आँकड़े एक साथ प्रदर्शित किये जाते हैं। तुलनात्मक अध्ययन में ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

बहुदण्ड आरेख

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

                  यह आँकड़ों को प्रदर्शित करने की एक सरल ज्यामितीय विधि है। वृत्तारेख में वृत्त का कुल क्षेत्रफल आँकड़ों का कुल योग तथा विभिन्न त्रिज्याखंड आँकड़ों के प्रत्येक घटक को प्रदर्शित करते हैं। वृत्तारेख बनाने के लिए सर्वप्रथम सुविधानुसार कोई अर्द्धव्यास से वृत्त खींचकर आँकड़ों के योग को प्रदर्शित करते हैं। इसके बाद आँकड़ों के विभिन्न घटकों या उपविभागों के अंशों में मान निम्न प्रकार ज्ञात करते हैं:

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

            इस प्रकार ज्ञात किये गये कोणों को वृत्त में कहीं भी अर्द्धव्यास खींचकर बनाया जा सकता है, परन्तु उत्तर दिशा से प्रारंभ करके घड़ी की सूई की दिशा में तथा अवरोही क्रम में बनाये गये कोण अधिक श्रेयस्कर होते हैं।

वृत आरेख

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

              Line Diagram प्रवृति का द्धोतक है। Line Diagram से जनसंख्या वृद्धि, Market Price, Index को पर्दर्शित करते है। 

Line Diagram

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

               जैसा कि नाम से पता चलता है, इन आरेखों के तीन आयाम होते हैं, अर्थात लंबाई, चौड़ाई और गहराई। घनीय और गोलाकार आरेख त्रिविम या त्रिआयामी आरेखों के मुख्य उदाहरण हैं। त्रिवि या त्रिआयामी रेखाचित्रों का आयतन उनके द्वारा दर्शायी जाने वाली मात्राओं के समानुपाती होता है, और इसीलिए उन्हें आयतन आरेख भी कहा जाता है। यह आरेख द्विविम या द्विआयामी आरेखों की तुलना में बहुत कम जगह घेरते हैं। इस प्रकार, वे विशेष रूप से उपयोगी होते हैं जब दिए गए मात्राओं के मूल्य बहुत भिन्न होते हैं। इन आरेखों को वितरण मानचित्रों पर स्थित आरेखों के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

त्रिविम आरेख

त्रिविम आरेख


पिरामिड आरेख (Piramidal Diagram) 

                     पिरामिड Diagram द्वारा दो विपरीत भौगोलिक आंकड़ों को विरूपित किया जाता है। जैसे- पुरुष-महिला के लिंगानुपात, आयात-निर्यात, औसत आयु (स्त्री- पुरुष) को दिखाते है।

पिरामिड आरेख

पट्टिका-ग्राफ (Band Graph)

             जब किसी उत्पादन का आंकड़ा कई वर्षों का और कई देशों का उपलब्ध हो तो उसे Band Graph के माध्यम से प्रदर्शित करते है।

पट्टिका-ग्राफ

Poly Graph 

⇒ Poly Graph  का प्रयोग जनसँख्या भूगोल में किया जाता है

⇒ Poly Graph  पर मृत्यु दर, जन्म दर और प्राकृतिक वृद्धि दर को प्रदर्शित किया जाता है

Poly Graph 


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