किसी भी मानचित्र या उसके किसी भाग के Scale को बदलकर बड़ा या छोटा करना मानचित्र विवर्धन या लघुकरण कहलाता है।
⇒ मानचित्र का विवर्धन एवं लघुकरण हेतु तीन विधियाँ अपनायी जाती है।
(1) वर्ग विधि (Square Method)
Q. यदि 100 से 30km के पैमाने पर बने मानचित्र को 3 गुणा बढ़ा दिया जाता है तो बढ़े हुए मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न (मापनी) क्या होगा?
हल:- प्रश्नानुसार
1 Cm = 30 Km
मूल मानचित्र का पैमाना = 1Cm = 30Km
1Cm = 30x1000x100
= 300000
अतः
अतः नया मानचित्र का पैमाना = 1 : 1000000
Q. 10Cm = 30Km पैमाने से बने एक मानचित्र को आकार में 9 गुणा वर्धित किया गया है तो नये मानचित्र का पैमाना क्या होगा?
अत: नया मानचित्र का पैमाना = 1:1000000
नोट: वर्ग विधि (Square Method) में मापनी के अनुपात को इकाई संख्या में बनाये रखने के लिए वर्गमूल निकाला जाता है।
(2) सम त्रिभुज विधि (Similar Triangle Method)
इस विधि से संकुचित क्षेत्र जैसे- सड़क, रेलमार्ग, नदी, नहर इत्यादि का लघुकरण एवं विवर्धन किया जाता है।
(3) यांत्रिक विधि (Mechanical Method)
यांत्रिक विधि में मानचित्र का लघुकरण एवं विवर्धन हेतु अलग-2 यंत्र का प्रयोग करते हैं। जैसे-
(i) अनुपातिक कम्पास
(ii) पेन्टोग्राफ
(iii) इडियोग्राफ
(iv) फोटो स्टेट
(v) कैमरा ल्यूसीडा
(vi) फोटोग्राफी कैमारा
पेंटोग्राफ और इडियोग्राफ के द्वारा मानचित्र का लघुकरण एवं विवर्धन खर्चीला होता है। लेकिन ये दोनों समरूप त्रिभुज विधि के द्वारा मानचित्र को लघुकरण या विवर्धन करता है।
⇒ स्टेनले महोदय के द्वारा निर्मित मानचित्र का लघुकरण एवं विवर्धन करने हेतु पेन्टोग्राफ को उपयुक्त माना जाता है।
⇒ कैमरा ल्यूसीडा का प्रयोग Wall Map को छोटा या बड़ा करने में प्रयुक्त होता है।
मानचित्र पर दूरी का मापन
इसके लिए तीन विधि हैं:-
(i) यांत्रिक विधि⇒ मानचित्र पर दूरी मापने के लिए रोटोमीटर या ओपीसोमीटर का प्रयोग करते हैं।
(ii) अगर मानचित्र पर कोई नदी, नहर, सड़क टेढ़ी-मेढ़ी हो तो धागे की सहायता से दूरी का मापन कर मापनी पर दिखाये गये अनुपात के आधार पर लम्बाई ज्ञात कर लेते हैं।
(iii) तीसरी विधि⇒ इस विधि के द्वारा दो सीधी स्थानों की दूरी Divider के माध्यम से ज्ञात कर मापनी के माध्यम से वास्तविक दूरी को ज्ञात करते हैं।
मानचित्र पर क्षेत्रफल का मापन
मानचित्र का क्षेत्रफल ज्ञात करते हेतु निम्नलिखित विधि एक प्रयोग होता है।
(i) गणितीय विधि
(ii) ग्राफीय विधि
(iii) प्लेनीमीटर विधि⇒ यह मानचित्र का क्षेत्रफल ज्ञात करने हेतु सबसे उपयुक्त विधि है। इसका आविष्कार श्री. जे. टेन्सलर ने किया था।
वर्तमान में हैचर के द्वारा निर्मित प्लेनीमीटर को सबसे उपयुक्त माना जाता है।
⇒ मापनी (Scale) के द्वारा मानचित्र पर के दूरी और धरातल पर के दूरी के बीच सह-संबंध स्थापित किया जाता है।
⇒ मापनी में धरातलीय दूरी को कम करके प्रदर्शित किया जाता है, अर्थात् मानचित्र पर वास्तविक धरातल पर के सापेक्षिक दूरी और वास्तविक दूरी के अनुपात को मापनी कहते हैं। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे- अगर धरती पर के वास्तविक दूरी 5km को 1Cm के रूप में दिखलायी जाती है तो मापनी का मान 1Cm = 5Km होगा।
मापक को विभिन्न विद्वानों ने परिभाषित करने का प्रयास किया है। प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ यहाँ दी जा रही हैं-
स्ट्रेलर के अनुसार,“मापक धरातल की वास्तविक दूरी तथा मानचित्र पर प्रदर्शित दूरी के पारस्परिक अनुपात को कहते हैं”।
(Scale is the ratio between map distance and the actual ground distance that the map represents.)
मोंकाहाउस एवं विलकिन्सन के अनुसार, “मापक मानचित्र पर प्रदर्शित की गई किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी तथा धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी के पारस्परिक सम्बन्ध को प्रकट करता है, चाहे वे कथन द्वारा जैसे 1″ = 1 मील या प्रदर्शक भिन्न द्वारा जैसे प्र भि. 1/63360, प्रकट किया गया है।”
(Scale denotes the relationship which the distance between any two points on the map bears to the corresponding distance on the ground, expressed either in words as one inch to one mile or as a representative fraction R.F. 1/63360.)
कनेटकर एवं कुलकर्णी के अनुसार, “किसी मानचित्र या ड्राइंग का मापक, मानचित्र या ड्राइंग की प्रत्येक दूरी तथा उससे सम्बन्धित धरातल की दूरी के निश्चित अनुपात को कहते हैं।”
(The scale of a map or drawing is the fixed proportion in which every distance on the map or drawing bears to the corresponding distance on the ground.)
आर० एल० सिंह के अनुसार, “धरातल की वास्तविक दूरी तथा उसकी मानचित्र पर प्रदर्शित दूरी के सम्बन्ध को मापक कहते हैं।”
मापक का महत्व (Importance of Scale)-
⇒ मापक के माध्यम से छोटे क्षेत्रों को बड़े आकार में तथा बड़े क्षेत्रों को छोटे आकार में मानचित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
⇒ मापक द्वारा किसी भी मानचित्र में दो स्थानों (बिन्दुओं) के मध्य धरातल की वास्तविक दूरी ज्ञात की जा सकती है।
⇒ मापक के माध्यम से एक मानचित्रकार अपने उद्देश्य के अनुसार किसी भी क्षेत्र का छोटा या बड़ा मानचित्र तैयार कर सकता है।
इस प्रकार मापक मानचित्र का प्राण माना जाता है। इसके बिना मापक का कोई महत्व नहीं होता है। बिना मापक के बनाए गए मानचित्र को रेखा मानचित्र (Sketch Map) कहा जाता है। इसको सहायता से भी धरातल के प्रत्येक भाग का प्रदर्शन कागज पर किया जा सकता है। मानचित्र के उपयुक्त मापक चुनते समय (i) कागज तथा (ii) मानचित्र की रचना करने का उद्देश्य आदि पर विशेष निर्भर रहना पड़ता है।
Or 1Cm = 5x1000m x 100Cm
Or 1Cm = 500000Cm
RF = 1 : 500000
भूगोल में मापनी के प्रकार
(A) आकार के आधार पर मापनी दो प्रकार का होता है:-
(i) लघु मापनी (Small Scale)
(ii) दीर्घ मापनी (Large Scale)
(i) लघु मापनी (Small Scale)
⇒ लघु मापनी में वास्तविक दूरी को मील या किमी० के रूप में और मानचित्र के दूरी को इंच या सेमी० के रूप में प्रदर्शित करते हैं।
जैसे – 1″ = 50 मील
1 Cm = 50 km
⇒ लघु मापनी पर धरातल के वास्तविक दूरी को मानचित्र पर छोटे से इकाई के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मापनी का प्रयोग एटलस और दीवार मानचित्र में किया जाता हैं।
(ii) दीर्घ मापनी (Large Scale)
⇒ दीर्घ मापनी में धरातल के छोटे-2 दूरियों को बड़े इकाई में प्रदर्शित किया जाता है। जैसे – 1Cm = 500cm।
⇒ दीर्घ मापनी का प्रयोग भूसम्पत्ति मानचित्र (Cadastral Map), स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographic Map), सैनिकों के द्वारा प्रयोग किये जाने वाले मानचित्र इत्यादि में किया जाता है।
नोट : भूसम्पति मानचित्र (Cadastral Map) की मापनी सबसे बड़ी होती है। इसके पश्चात क्रमश: स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographic Map), दीवारी मानचित्र (Wall Map, एटलस मानचित्र (Atlas Map)) का स्थान आता है। (CTWA)
मानचित्र मापनी प्रदर्शित करने की विधि
मानचित्र पर मापनी को तीन प्रकार से प्रदर्शित किया जाता है-
(1) कथनात्मक विधि (Statement Method)
⇒ कथनात्मक विधि के द्वारा मापनी को शब्दों के रूप में लिखा जाता है। जैसे 1Cm = 1Km
⇒कथनात्मक विधि का प्रयोग प्राय: भूसम्पत्ति मानचित्र, भवन प्लान वाले मानचित्र में किया जाता है।
(2) आलेखी विधि / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)
एक सीधी रेखा को कई समान भागों में विभाजित कर उस पर वास्तविक दूरी को अंकों के रूप में प्रदर्शित कर दिया जाता है।
इस मापनी के दो भाग होते हैं-
(i) Primary Division वाले भाग
(ii) Secondery Division वाले भाग
इस मापनी के द्वारा मानचित्र पर km, m और Cm के रूप में एक साथ दूरियों को ज्ञात कर सकते है।
(3) प्रतिनिधि भिन्न विधि (Representative Fraction Or R.F. Method)
⇒ प्रतिनिधि भिन्न विधि के द्वारा मानचित्र के दूरी को और वास्तविक दूरी को एक रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
⇒ भिन्न में अंश और हर होता है, Numenator (अंश) और Denominator (हर) के रूप में प्रदर्शित जाता किया जाता है।
⇒ अंश मानचित्र पर के इकाई दूरी को व्यक्त करता और हर पृथ्वी पर के वास्तविक दूरी को व्यक्त करता है।
⇒ मानचित्र एवं धरातल पर मापी गई दूरियों के अनुपात को प्रतिनिधि भिन्न (R.F.) कहते है।
⇒ R. F. को हमेशा अनुपात के रूप में प्रदर्शित करते हैं।
⇒ मानचित्र पर के दूरी को हमेशा ईकाई (1) रूप में प्रदर्शित करते हैं।
⇒ R.F. विधि का सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी भी देश में भाषा ज्ञान के बिना प्रयुक्त कर सकते हैं।
⇒ R.F. विधि का सबसे बड़ा दोष यह है कि जब मानचित्र को बड़ा या छोटा किया जाता है, तो अनुपात में दोष उत्पन्न हो जाता है।
नोट :
1 Cm = 10 mm
100 Cm = 1 m
1000 m = 1 km
8/5 Km = 1 मील
1″ = 2.54 Cm
TMC = Trilian cubic meter
R.F = Map Distance/ Ground Distance
1 Km = 1,00000 cm (1000 m x 100 Cm)
1 मील = 63,360″ (1760 गज x 3 फीट x 12 इन्च)
1 मील = 1760 गज (5280 फीट)
1 गज = 3फीट (36″ = 12″ × 3 फीट)
1 फीट = 12″
1 मील = 8 फर्लांग
भूगोल में मापक के अनुप्रयोग
(Applications of Scale in Geography)
1. मानचित्रण (Cartography):-
मापक का सबसे महत्वपूर्ण अनुप्रयोग मानचित्र निर्माण में होता है। इसके माध्यम से पृथ्वी की वास्तविक दूरी एवं क्षेत्रफल को निश्चित अनुपात में छोटा करके कागज पर प्रदर्शित किया जाता है। उपयुक्त मापक के चयन से मानचित्र अधिक सटीक, स्पष्ट एवं विश्वसनीय बनता है तथा विभिन्न प्रकार के विषयगत (Thematic) मानचित्र तैयार किए जा सकते हैं।
2. स्थलाकृतिक सर्वेक्षण (Topographical Survey):-
स्थलाकृतिक मानचित्रों के निर्माण में मापक का विशेष महत्व है। इसके माध्यम से पर्वत, पठार, घाटी, नदी, ढाल, ऊँचाई तथा अन्य भू-आकृतियों का सही एवं विस्तृत निरूपण किया जाता है। सर्वेक्षण कार्यों में मापक के प्रयोग से धरातलीय विशेषताओं का सटीक मापन एवं विश्लेषण संभव होता है।
3. क्षेत्रीय नियोजन (Regional Planning):-
क्षेत्रीय नियोजन में मापक का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों के संसाधनों, जनसंख्या, परिवहन, भूमि उपयोग तथा विकास की योजनाएँ तैयार करने में किया जाता है। उपयुक्त मापक वाले मानचित्र क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन करने तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास की योजना बनाने में सहायक होते हैं।
4. नगर नियोजन (Urban Planning):-
नगर नियोजन में बड़े मापक (Large Scale) वाले मानचित्रों का उपयोग किया जाता है। इनके माध्यम से सड़कों, भवनों, आवासीय क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों, पार्कों, जलापूर्ति, सीवरेज तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की योजनाएँ वैज्ञानिक ढंग से तैयार की जाती हैं। इससे नगरों का सुव्यवस्थित एवं सतत विकास संभव होता है।
5. कृषि नियोजन (Agricultural Planning):-
कृषि भूगोल में मापक का उपयोग भूमि उपयोग, मृदा वितरण, सिंचाई नेटवर्क, फसल क्षेत्र, कृषि उत्पादन तथा कृषि विकास योजनाओं के निर्माण में किया जाता है। बड़े मापक वाले मानचित्र किसानों एवं योजनाकारों को खेतों की वास्तविक स्थिति एवं संसाधनों का सही आकलन करने में सहायता प्रदान करते हैं।
6. परिवहन योजना (Transport Planning):-
रेलमार्ग, सड़क मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, हवाई अड्डे तथा जलमार्गों की योजना एवं निर्माण में मापक अत्यंत उपयोगी होता है। इसके माध्यम से मार्गों की वास्तविक दूरी, दिशा तथा संपर्क का सही निर्धारण किया जाता है, जिससे परिवहन प्रणाली अधिक प्रभावी एवं सुगम बनती है।
7. रक्षा एवं सैन्य उपयोग (Defence and Military Applications):-
सैन्य कार्यों में बड़े एवं मध्यम मापक वाले मानचित्रों का व्यापक उपयोग किया जाता है। सीमाओं की निगरानी, सैन्य ठिकानों की स्थापना, सैनिकों की आवाजाही, युद्ध रणनीति तथा सुरक्षा योजनाओं के निर्माण में मापक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सटीक मापक राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।
8. पर्यावरण अध्ययन (Environmental Studies):-
वन क्षेत्र, नदी बेसिन, जलग्रहण क्षेत्र, जैव विविधता, भूमि क्षरण, प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन में मापक का व्यापक उपयोग किया जाता है। इससे पर्यावरणीय परिवर्तनों का विश्लेषण, संसाधनों का संरक्षण तथा सतत विकास की योजनाएँ तैयार करने में सहायता मिलती है।
9. GIS एवं Remote Sensing:-
आधुनिक भूगोल में भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) एवं सुदूर संवेदन (Remote Sensing) के अंतर्गत मापक का अत्यधिक महत्व है। डिजिटल मानचित्रों का निर्माण, स्थानिक (Spatial) विश्लेषण, उपग्रह चित्रों की व्याख्या तथा विभिन्न भौगोलिक सूचनाओं के एकीकरण में उपयुक्त मापक का प्रयोग किया जाता है, जिससे अधिक सटीक एवं विश्वसनीय परिणाम प्राप्त होते हैं।
10. आपदा प्रबंधन (Disaster Management):-
बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात, सूखा तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम क्षेत्रों की पहचान एवं प्रबंधन में मापक का महत्वपूर्ण योगदान है। विभिन्न मापकों वाले मानचित्रों की सहायता से संवेदनशील क्षेत्रों का विश्लेषण, राहत एवं बचाव कार्यों की योजना तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) की रणनीतियाँ तैयार की जाती हैं।
भौगोलिक सूचना तंत्र भौगोलिक आँकड़ों एवं सूचनाओं के संग्रहण, विश्लेषण और मानचित्रण का एक कम्प्यूटर आधारित तकनीक है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सूचना तकनीक (IT) कहते हैं।
⇒ भूगोलवेत्ता मार्बल ने इसे परिभाषित करते हुए कहा “GIS क्षेत्रीय सूचना संग्रहण, विश्लेषण एवं प्रदर्शन का एक तंत्र है।”
⇒ क्लार्क महोदय ने कहा है कि “भौगोलिक सूचना तंत्र विभिन्न सूचनाओं के एकत्रीकरण, संग्रहण, विश्लेषण और प्रदर्शन का कम्प्यूटर आधारित तंत्र है।”
⇒ गुडचाइल्ड के अनुसार “GIS विभिन्न क्षेत्रीय सूचनाओं का भौगोलिक तथ्यों से संबंधित समस्याओं का समाधान करने वाला एक उन्नत तकनीक है।”
⇒ GIS भूगोल, भूविज्ञान, मानचित्रकला, सुदूर संवेदन तकनीक, वायु फोटोग्राफी, सर्वेक्षण, सांख्यिकी और कम्प्यूटर विज्ञान से संबंधित एक समेकित तकनीक है।
भौगोलिक सूचना तंत्र का उद्देश्य
(1) विभिन्न प्रकार के भौगोलिक आकड़ों का संग्रहण, विश्लेषण और प्रदर्शन किया जाता है।
(2) सूचनाओं को विश्लेषित कर उसे आसान बनाता है।
(3) आकड़ों के विश्लेषण के आधार पर नियोजन तथा निर्णय की प्रक्रिया को अधिक तार्किक और वैज्ञानिक बनाता है।
(4) कम्प्यूटर आधारित समन्वित तकनीक की उपलब्धता से समय और धन की बचत करता है।
भौगोलिक सूचना तंत्र के प्रयोग के क्षेत्र
(1) यह सम्पति मानचित्र, परिवहन मानचित्र बनाने में उपयोगी है।
(2) यह कृषि, उद्योग, नगर स्थानीकरण में मदद करता है।
(3) विभिन्न दुर्घटनाओं का मानचित्रण कर सकते है।
(4) जनसंख्या का मानचित्रण एवं विश्लेषण कर सकते है।
(5) भूमि उपयोग के नियोजन एवं प्रबंधन में मदद करता है।
(6) पर्यावरण के विश्लेषण में मदद करता है।
(7) धरातल के स्वरूप का विश्लेषण करता है।
(8) GIS कम्प्यूटर रूपीय यंत्र के माध्यम से संचालित होता है। इसे डडले स्टाम्प ने भौगोलिक सूचना तंत्र का सुनहला बछड़ा (Golden Caw) कहा है।
जब कई कम्प्यूटर आपस में तार या किसी अन्य युक्ति से जुड़ जाते है तो उसे Network या Internet (इंटरनेट) कहते हैं।
मोटे तौर पर कम्प्यूटर के सभी सामाग्री को दो भागों में बाँटते है:-
(1) हार्डवेयर
(2) सॉफ्टवेयर
(1) हार्डवेयर
प्रमुख हार्डवेयर उपकरण:-
(i) डिक्स ड्राइव
(ii) डिजिटर
(iii) प्लॉटर
(iv) स्कैनर,
(v) भ्यूजुअल डिस्प्ले यूनिट
(vi) की बोर्ड
(vii) माउस
(viii) वेब कैमरा
(ix) CPU
(x) मोडेम
(1) पेन ड्राइव
(2) सॉफ्टवेर
भौगोलिक रेखाचित्रण एवं मानचित्रण के लिए कई सॉफ्टवेयर बाजार में उपलब्ध है। जैसे-
(i) SYMVV
(ii) RGRIG
(iii) SYMAP
(iv) LOTUS
(v) HG
(vi) BASIC
(vii) ILWLS
(viii) ANCVIEW
(ix) OSIRIS
नोट: CPU = सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट
ALU = अर्थमेटिक लोजिक यूनिट
TALLY = यह एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसका प्रयोग वाणिज्य के क्षेत्र में किया जाता है।
फोरटन और C++ = ये दोनों ऐसे Software है जिसका प्रयोग व्यापार एवं वाणिज्य में किया जाता है।
पास्कल= वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन हेतु प्रयुक्त होता है।
भूगोल में प्रमुख भौगोलिक यंत्र से जो कि भिभिन्न प्रतियोगिताओं में बार-बार पूछे जाते है वे निम्नलिखित है-
(1) प्लैनीमीटर⇒ मानचित्र पर क्षेत्रफल मापने वाला यंत्र
(2) पेन्टोग्राफ/ इंडीगोग्राफ/ इपिस्कोप / पेंटोग्राफिक कैमरा⇒ मानचित्रों का विवर्धन एवं लघुकरण करने वाला यंत्र
(3) क्लाइनोमीटर⇒ भूतल पर कोण एवं ढाल मापने का यंत्र
(4) पैरेलैक्स⇒ फोटोग्राफ के आधार पर ऊँचाई नापता है।
(5) ओपिसोमीटर⇒ मानचित्रों पर दूरियों के मापन हेतु प्रयुक्त यंत्र
(6) रेनगेज⇒ वर्षा मापने वाला यंत्र
(7) हाईग्रोमीटर⇒ वायु में उपस्थित आर्द्रता मापने वाला यंत्र
(8) इग्रोग्राफ⇒ मौसमी दशाएँ, शुद्ध क्षेत्रफल, शास्यकाल आदि एक साथ दर्शाएँ जाने वाले ग्राफ
(9) रिक्टर स्केल⇒ भूकंप के झटके मापने में रिक्टर स्केल का प्रयोग होता है।
(10) नेफ्रोस्कोप⇒ बादलों की दिशा और गति मापने वाला यंत्र
(11) सिस्मोग्रफ⇒ भूकंप की तीव्रता मापने वाला यंत्र
(12) मोह पैमाना (Moh’s Scale)⇒ चट्टानों की कठोरता मापने वाला यंत्र
(13) हाईग्रोग्राफ⇒ वायु में आपेक्षिक आर्द्रता मापने वाला यंत्र
(14) पायरोमीटर⇒ उच्च तापमान मापने वाला यंत्र
(15) साइनोमीटर⇒ आकाश के नीलापन का मापने वाला यंत्र
(16) एक्टिनेमीटर⇒ विकिरण की तीव्रता मापने वाला यंत्र
(17) एनिमोमीटर⇒ पवन की गति मापने वाला यंत्र
(18) ओक्टास⇒ मेघाच्छादन की मात्रा मापने वाला यंत्र
(19) करेंटमीटर⇒ जलप्रवाह मापने वाला यंत्र
(20) इवैपोरीमीटर / एटमोमीटर⇒ जलवाष्प मापने वाला यंत्र अर्थात एक वैज्ञानिक उपकरण है जो एक निश्चित समय में किसी नम सतह से वायुमंडल में होने वाले जल के वाष्पीकरण (Evaporation) या वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) की दर को मापता है।
(21) स्पीडोमीटर/ओडोग्राफ/ ओडोमीटर⇒ वाहन की गति मापने वाला यंत्र
एक छोटे भूभाग को बड़े इकाई (Scale/ मापनी) पर दिखाये जाने वाले मानचित्र को Large Scale Map कहते हैं।
1cm = 10km.
(i) Cadastral Map (भूसम्पति मानचित्र)
⇒ यह एक Large Scale Map है।
⇒ यह एक ऐसा Map है जिस पर किसी एक गाँव का, ग्राम पंचायत का, खेतों के मेढ़ को, ग्रामीण रास्तों को, गाँव में मिलने वाला कुँआ, छोटे -2 जलाशय, सार्वजनिक स्थान इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है। यह Map भूमि Survey करने वाले अमीन, C.O. और जिला में अवस्थित survey विभाग के पास होता है।
⇒ भूसम्पति मानचित्र का प्रयोग भूराजस्व पदाधिकारी कर वसूली में करते हैं। इसके अलावे इसका प्रयोग नगर नियोजन एवं भूमि उपयोग के नियोजन में किया जाता है।
⇒ भारत के गाँवों में 1:3960 या 16″ = 1 मील से 1:1980 (32″ = 1 मील) तक पैमाना पर भूसम्पत्ति मानचित्र बनाये जाते हैं।
(ii) स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Map)
⇒ जहाँ Cadastral Map में निजी भवन, ग्रामीण कुँआ, जलाशय इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है वहीं स्थलाकृतिक मानचित्र पर विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतिक लक्षण जैसे उच्चावच, प्रवाह प्रणाली, वन क्षेत्र, दलदली क्षेत्र इत्यादि को गाँव के साथ -2 दिखाया जाता है।
⇒ स्थलाकृतिक मानचित्र पर प्राकृतिक विशेषताओं के साथ-साथ सांस्कृतिक भूदृश्य को भी प्रदर्शित करते हैं।
⇒ स्थलाकृतिक मानचित्र सामान्यत: 1: 2,50,000 (1″ = 4 मील) से 1: 62500 (1″ = 1 मील) तक की मापनी पर बनाया जाता है।
⇒ 1″ = 4 मील से छोटी मापनी पर बनने वाला स्थलाकृतिक मानचित्र को ही भौगोलिक मानचित्र कहते हैं।
⇒ भारत में स्थलाकृतिक मानचित्रों का निर्माण 1: 62500 को 1: 50000 की मापनी में बदलकर प्रदर्शित किया जाता है।
(2) छोटी मापनी का मानचित्र (Small Scale Map)
⇒ छोटी मापनी के मानचित्र पर बहुत बड़े भूभाग को मानचित्र के छोटे इकाई पर प्रदर्शित करते हैं। जैसे:- 1m = 10,000 km
(i) दीवाल मानचित्र (Wall Map)
⇒ दीवाल मानचित्र एक ऐसा मानचित है जिसपर पूरे विश्व को, एक महाद्वीप को, एक देश को, एक राज्य को, एक जिला को प्रदर्शित किया जाता है।
⇒ Wall Map का प्रयोग मुख्यतः शिक्षण संस्थानों या कार्यालयों में किया जाता है।
⇒ Wall Map की मापनी Atlus Map के मापनी से बड़ी होती है। लेकिन स्थलाकृतिक मानचित्र के तुलना में छोटी होती हैं।
⇒ भारत में Wall Map 1: 15000000 1: 25,00000 के मापनी पर बनाया जाता है।
(ii) Atlas Map (एटलस मानचित्र)
Atlas Map एक Small Scale Map है। इन मानचित्रों में एक छोटे से कागज के पन्नों पर पूरे विश्व, महाद्वीप, देश, इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र 1:2,0000000 के मापनी पर बनाये जाते हैं। इस प्रकार के मानचित्र पर अलग -2 क्षेत्रों को अलग-2 रंग से प्रदर्शित करते हैं। इसलिए इसे “क्षेत्र वर्णी मानचित्र” भी कहते हैं।
भारत में सरकारी एटलस का प्रकाशन Survey of India, देहरादून द्वारा होता है
⇒ भारतीय सर्वेक्षण विभाग भारत के रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
⇒ भारत में सर्वप्रथम प्रो० S.P. चटर्जी ने “बंगाल इन Maps” एटलस प्रकाशित किया था।
⇒ भारत के महापंजीकार कार्यालय के अधीन कार्यरत जनगणना विभाग ने पूरे देश और सभी प्रान्तों का 32 खण्डों में विभक्त कर एक एटलस का प्रकाशन किया है।
NOTE ग्लोब⇒ यह पृथ्वी का वास्तविक प्रतिरूप होता है। इसका आकार गोल तथा 23 1/2° अक्ष पर झुका होता है।
⇒ उद्देश्य एवं विषय सामग्री के आधार पर मानचित्र के प्रकार।
इसके आधार पर मानचित्र को दो भागों में बाँटते है:
(A) प्राकृतिक मानचित्र
(i) खगोलीय मानचित्र (Astronomical Map)
(ii) स्थलीय मानचित्र (Orographic Map) Relief Map
(iii) भूगर्भीक मानचित्र (Geological Map) – इसमें चट्टानों के संस्तर को प्रदर्शित करते हैं। चट्टानों के एक संस्तर को Bed कहते हैं।
(iv) जलवायु मानचित्र (Climate Map)
(v) वनस्पति मानचित्र (Vegitation Map)
(vi) मृदा मानचित्र (Soil Map)
(B) सांस्कृतिक मानचित्र
यह भी कई प्रकार का होता है। जैसे- आर्थिक मानचित्र, राजनीतिक मानचित्र, सैनिक मानचित्र, ऐतिहासिक मानचित्र, सामाजिक मानचित्र, वितरण मानचित्र
वितरण मानचित्र (Distribution Map)
⇒ भौगोलिक तत्वों को वितरण मानचित्र के माध्यम से प्रदर्शित करते हैं। यह मूलतः चार प्रकार का होता है।
(i) रंगारेखी मानचित्र (Chromatic Map)
⇒ जब मानचित्र पर विभिन्न आकड़ों को विभिन्न रंगों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तो उसे Chromatic Map (रंगारेखी मानचित्र) कहते हैं।
(ii) प्रतीक चिह्न
⇒ इसमें फसलों, खनिजों आदि के वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र में अक्षरों एवं वर्णों का प्रयोग कर जो मानचित्र प्रस्तुत किया जाता है। वैसे Map को क्रोसमैटिक मैप कहते हैं।
(iii) सम्मान रेखा मानचित्र (Isopleth)
⇒ ऐसा मानचित्र जिसपर भौगोलिक तत्वों को समताप रेखा (Isotherm), समवर्षा रेखा (Isohyte), समधूप रेखा (lsohel), समोच्च रेखा (Contour) के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
(iv) वर्णमात्री मानचित्र (Choropleth map)
⇒ वैसा मानचित्र जिसमें भौगोलिक तत्वों को आड़ी तिरछी लम्बवत रेखाओं के द्वारा प्रदर्शित करते हैं उसे Choropleth कहते हैं।
नोट:- Atlas में सबसे ज्यादा प्रयोग रंगारेखी मानचित्र (Chromatic Map) का किया जाता है।
पृथ्वी के समस्त भूभाग अथवा किसी एक भाग को कागज पर सांकेतिक चिन्हों के द्वारा उचित मापक (Scale) तथा प्रक्षेप (Projection) पर चित्रण को ही मानचित्र कहते हैं। और इस प्रकार मानचित्रों के संग्रह को मानचित्रावली अथवा एटलस (Atlas) कहा जाता हैं।
किसी भी मानचित्र की शुद्धता एवं उपयोगिता निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है:-
(1) दिशा (Direction) – 10
N = North – उत्तर
S = south – दक्षिण
E = East – पूरब
W = West – पश्चिम
NE = इषाण कोण
NW = वायु कोण
SW = नैऋत्य कोण
SE = आग्नेय कोण
Zenith = आकाश
Nadir = पाताल
(2) मापक (Scale)
(3) उचित प्रक्षेप (Suitable Projection)
(4) उचित सांकेतिक चिह्न
(5) मानचित्रकार की कुशलता
(6) उचित निर्माण की विधि
✶मानचित्र निर्माण करने की विधि
(1) सर्वेक्षण विधि के द्वारा
(2) फोटोचित्रण विधि के द्वारा
(3) रेखाचित्रों एवं आरेख के द्वारा
(4) कम्प्यूटर एवं दूर संवेदन विधि के द्वारा
नोट :- सर्वेक्षण विधि में मानचित्र बनाने हेतु जरीब, थियोडोलाइट, प्रिज्मेटिक कम्पास, शाहुल जैसे उपकरण का प्रयोग किया जाता है।
✶मानचित्र रचना के इतिहास को निम्नलिखित चरण में बाँटते हैं:-
(1) प्राचीन काल
(2) अंध काल – युरानी -रोमन के पत्नन से शुरू
(3) पुनर्जागरण काल – 1500-1600 ई०
(4) आधुनिक काल – औद्योगिक क्रांति से
I प्राचीन काल
➡ 3000 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम मिस्र के लोगों ने मानचित्र निर्माण की कला का विकास किया।
* वास्तव में यूनानी विद्वानों को मानचित्र प्रारंभ करने का श्रेय जाता है। जैसे: –
(1) इरैटोस्थनीज ने सर्वप्रथम पृथ्वी के परिधि को अनुमानित किया तथा उसने भूमध्य रेखा को भी निर्धारित करने का प्रयास किए।
(2) हिप्पारकस ने पहली बार विश्व मानचित्र पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं का जाल खींचा।
(3) क्रेटस ने पहली बार यह अनुमान लगाया कि पृथ्वी की आकृति एक गोलाभ के समान है।
(4) टॉलेमी
पुस्तक- “ज्योगरफिया सिन्टैक्सिस” या “अल्मागस्ट”
इस पुस्तक में टॉलमी ने मानचित्र निर्माण हेतु वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किए। उन्होंने मानचित्र के संबंध में बताया कि मानचित्र में निम्नलिखित तीन गुण आवश्य होना चाहिए:-
(1) दिशा शुद्ध होनी चाहिए।
(2) आकृति शुद्ध होती चाहिए।
(3) क्षेत्रफल शुद्ध होनी चाहिए।
II अंध काल
➡अंधकाल में बनाये गये मानचित्र में पृथ्वी को चपटा दिखाया गया और पृथ्वी के केन्द्र में एरुसेलम या जेरूसेलम को दिखाया गया।
➡अंध काल का प्रारंभ: 6 ठी शताब्दी से मानी जाती है। और 15वीं शताब्दी तक रही। इस काल में रोमन सभ्यता का उदय हुआ। लोगों के सोच पर चर्च और पोप का जबरदस्त प्रभाव पड़ा जिसके कारण लोगों के वैज्ञानिक चिंतन समाप्त हो गई।
III. पुनर्जागरण काल
➡ पुनर्जागरण काल की शुरूआत 16वीं शताब्दी से होती है।
➡डच (आयरलैण्ड)वैज्ञानिक/विद्वान मर्केंटर महोदय ने मानचित्र कला को टॉलेमी के प्रभाव से मुक्त किया।
➡ फ्रांसीसी विद्वान कैसीनी वे 1779 ई० में फ्रांस के सर्वेक्षण कर मानचित्रावली का प्रकाशन किया।
➡इसी काल में या 1767 ई० में सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की गई।
IV आधुनिक काल
➡ आधुनिक काल की शुरुआत औद्योगिक क्रांति के बाद से मानी जाती है। इसे मानचित्र निर्माण कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।
➡ इस चरण में मानचित्र का निर्माण सुदूर संवेदन प्रणाली इत्यादि के द्वारा किया जाने लगा ।
➡भारत में 1924 ई0 से कैमरा के द्वारा या वायुफोटोग्राफी की पद्धति प्रारंभ हुई।
➡भारत में 1975 ई० से सुदूर संवेदन प्रणाली का विकास हुआ।
➡भारत में मुद्रणकला का विकास 1804 ई०-1860 ई० के बीच हुआ। इसी काल में जर्मनी में Stieler, फ्रांस में ब्लाश और मारटीन तथा इंगलैण्ड में “Bartholemou” नामक मानचित्रावली प्रकाशित की गई।
✶मानचित्र के निर्माण में निम्नलिखित उपकरण की आवश्यकता पड़ती है।