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11. Earthquake / भूकंप

 11. Earthquake / भूकंप



Earthquake / भूकंप

Earthquake

भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है- भू + कम्प

भू = भूपटल 

कम्प = कम्पन

      इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र या भूकंप मूल या हाइपोसेंटर (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र-
       भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)-

      अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है । जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

★ बिहार में औसतन प्रत्येक 17 वर्ष पर भूकम्प आता है।

सिस्मोग्राफ

     सिस्मोग्राफ भूकम्पीय तरंगों के प्रवृति को रेखांकन करने वाला यन्त्र है।

समभूकम्प रेखा

      समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समभूकम्पीय रेखा  (Isoseismal line) कहते है।

सहभूकम्प रेखा

     एक ही समय पर पहुँचने वाले भूकम्पीय तरंगों को मिलाने वाली सरल रेखा को सहभूकम्प रेखा (Homoseismal line) कहते है।

 भूकम्प के प्रकार

     भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

(A) गहराई के आधार पर

       गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

(i) सामान्य गहराई के भूकंप– फोकस 50 KM से ऊपर होता है।

(ii) मध्यम गहराई के भूकंप– फोकस 50-250 KM के बीच

(iii) अधिक गहराई के भूकंप– फोकस 250-700 KM के बीच

(B) समय के आधार पर

       समय के आधार पर भूकम्प दो प्रकार के होते है:-

(i) धीमा भूकम्प

(ii) अचानक भूकम्प

धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वत का निर्माण होता है।

विश्व में सर्वाधिक कम गहराई वाले भूकंप या छिछले उदगम वाले भूकम्प आते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

 भूकम्प के कारण

      भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) मानवीय कारण

(B) प्राकृतिक कारण

(A) मानवीय कारण:-

(i) परमाणु विस्फोट

(ii) मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य

(iii) बड़े-बड़े बाँधों का निर्माणEarthquake

(iv) पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण इत्यादि।

(B) प्राकृतिक कारक:-

    ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है तो भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए है:-

(1) प्रत्यास्थ पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)

       इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था। इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्थ चट्टानों से निर्मित है। जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।

(2) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

        इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैरीहेस महोदय है। इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है। यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है। प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है। भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है–

(i) अपसरण सीमा

(ii) अभिसरण सीमा

(iii) संरक्षी सीमाEarthquake

       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-

जैसे:-

(i) चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल

(ii) एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना

(iii) पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

(iv) दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग

      प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है। जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।

जैसे- अटलांटिक कटक के सहारेEarthquake

    जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है। 
Earthquake
       जब दो प्लेट आपस में समांतर रूप से रगड़ खाते है तो वैसे स्थानों पर संरक्षी सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को संरक्षी गति कहते है। जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे द्वीप समूह संरक्षी सीमा पर अवस्थित है। यही कारण है कि यहां सबसे अधिक भूकम्प रिकॉर्ड किया जाता है।
Earthquake
        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।

भूकम्प का वितरण

        विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर–

       विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र–

        यह क्षेत्र यूरेशियन प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक- 

     अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोबेट द्वीप तक हुआ है।

भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन

       भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है। वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है–

1. मार्सेली पैमाना

2. रिचर पैमाना

3. आधुनिक- आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw)

मार्सेली पैमाना

        मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था। इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया। इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।

रिचर पैमाना

     रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था। इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता का मापन 1 से 9/10 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन स्केल पर अंकित हर अगला अंक अपने ठीक पिछले अंक की तुलना में 10 गुना अधिक तीव्र होता है।

रिचर पैमाना पर तीव्रता प्रभाव
1 केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2 केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3 चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है
4 केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है
5 अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं
6 विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7 दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8 इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9 सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
     
     अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है। 
आधुनिक- आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw)
      आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw) का उपयोग भूकम्पों की तीव्रता मापने के लिए किया जाता है, जिसमें भूकंप के स्रोत से निकलने वाली कुल ऊर्जा को मापा जाता है। इसे रिक्टर पैमाने के अद्यतन रूप के रूप में 1979 में थॉमस हेंक्स और हिरो कानामोरी द्वारा विकसित किया गया था, क्योंकि यह बड़े और छोटे दोनों प्रकार के भूकंपों के लिए अधिक सटीक परिणाम देता है, जबकि रिक्टर पैमाने बड़े भूकंपों के लिए सटीक नहीं था। Mw भूकंप के आकार (यानी, आकार, विस्थापन और कठोरता) का सबसे विश्वसनीय अनुमान देता है।  

भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता

      भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-

(A) प्रमुख तरंग 

1. P तरंग

2. S तरंग

3. L तरंग

(B) गौण तरंग

1. P* तथा S*

2. Pg तथा Sg

(A) प्रमुख तरंग 

P तरंग 

     P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य तथा गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र / फोकस से होती है। 

S तरंग

     S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है। इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है। यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है। भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है। S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र / फोकस से होती है।

P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है। S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।

L तरंग 

      L तरंग को सतही तरंग भी कहा जाता है। L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है। L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है। इसी तरंग के कारण सर्वाधिक क्षति होती है। L तरंग की गति काफी अनियमित होती है। 

भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow Zone)

       भूकंप लेखी यंत्र (सिस्मोग्राफ) पर दूर के क्षेत्रों से आने वाली भूकंपीय तरंग अंकित होती हैं, परन्तु कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है, ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र कहते है।

भूकंप अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है।  यह क्षेत्र दोनों प्रकार की तरगों के लिए छाया क्षेत्र (Shadow zone) हैं।

105° के परे पूरे क्षेत्र में ‘S’ तरंगें नहीं पहुँचतीं।

‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘P’ तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक विस्तृत है।

भूकंप अधिकेंद्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी (Band) के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है।

‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवल विस्तार में बड़ा है, वरन् यह पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अधिक है। 

(B) गौण तरंग

P* & S* तरंग 

        पृथ्वी  का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:-

(1) ग्रेनाइट तथा

(2) बैसाल्ट चट्टान

P* & S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।

P* की गति=6-7 Km/Sec

S* की गति=3-4 Km/Sec

      ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है। इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था। इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।

Pg & Sg तरंग 

        ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है। इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।

Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec

Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec

       Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है। 

निष्कर्ष:-

       इस तह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।



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9. Volcano / ज्वालामुखी

 9. Volcano / ज्वालामुखी


 Volcano / ज्वालामुखी

Volcano

ज्वालामुखी क्रिया:- ज्वालामुखी क्रिया दो शब्दों सेे मिलकर बना है। प्रथम ज्वालामुखी, द्वितीय क्रिया। पुनः ज्वालामुखी शब्द को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:- प्रथम ज्वाला द्वितीय मुखी।
           जब पृथ्वी के भूपटल में किसी भी प्रकार का छिद्र का निर्माण होता है तो उसे मुख कहते है, जब उस मुख से पृथ्वी के दुर्बल मण्डल का मैग्मा पदार्थ, जल एवं वाष्प बाहर की ओर निकलता है तो उसे ज्वाला कहते है। ज्वाला और मुख को सम्मिलित रूप से ज्वालामुखी कहते है।

      क्रिया का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के प्रक्रियाओं से है। ज्वालामुखी उदगार में निकलने वाला पदार्थ भुपटल के ऊपर निकलने का प्रयास करता है या निकल जाता है, पुनः निकलकर अनेक प्रकार के स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इस सम्पूर्ण परिघटना को ही ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) कहा जाता है।

       ज्वालामुखी क्रिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वारसेस्टर महोदय ने किया था। उन्होनें ज्वालामुखी क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि “ज्वालामुखी क्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है कि जिसमे गर्म पदार्थ की धरातल के तरफ या धरातल के ऊपर आने वाली सभी प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।”

       परिभाषा से स्पष्ट होता है कि ज्वालामुखी क्रिया दो प्रकार का होता  है। प्रथम आन्तरिक ज्वालामुखी की क्रिया दूसरा बाह्य ज्वालामुखी की क्रिया।

★ आन्तरिक ज्वालामुखी क्रिया में गर्म पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर धरातल के नीचे ही ठोस होने की प्रवृत्ति रखता है जबकि बाह्य ज्वालामुखी क्रिया में गर्म पदार्थ धरातल के ऊपर प्रकट होकर अनेक स्थलाकृतियां को जन्म देता है। इस तरह स्पष्ट होता है कि ज्वालामुखी क्रिया एक व्यापक शब्द है जिसमे अनेक क्रियाएं शामिल है।

ज्वालामुखी क्रिया में निकलने वाला पदार्थ-

      ज्वालामुखी उदगार के दौरान निकलने वाला पदार्थ को तीन श्रेणी में विभाजित करते है:-

(i) गैस तथा जलवाष्प

(ii) विखण्डित पदार्थ

(iii) लावा पदार्थ

        सर्वप्रथम जब ज्वालामुखी का उदगार होता है तो गैस एवं जलवाष्प धरातल को तोड़कर सबसे पहले तेजी से बाहर निकलते है। इसमें जलवाष्प की मात्रा सर्वाधिक होती है। सम्पूर्ण गैस का 60 से 90 प्रतिशत भाग जलवाष्प का होता है। वाष्प के अलावा कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड, जैसे गैस भी मौजूद रहते है।

       विखण्डित पदार्थ में बारीक धूलकण से लेकर बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़ों को शामिल किया जाता है। इसका मुख्य स्रोत क्रस्ट के विखंडित होता है। जब गैस निलकना मंद पड़ता है तो ये विखण्डित चट्टाने धरातल पर पुनः वापस आने लगते है जिससे ऐसा लगता है कि अकाश से बम्ब बरसाए जा रहे है। आकार के आधार पर इन टुकड़ों के अलग-अलग नाम रखे गए हैं :-

(क) ज्वालामुखी बम (Volcanic Bomb):

     ज्वालामुखी से निकलने वाले बड़े टुकड़ों को ‘ज्वालामुखी बम’ कहते हैं। इनका निर्माण धरातल के नीचे ही मैग्मा के जमकर ठोस रूप धारण करने से होता है। ये किसी भी आकार (यथा- गोलाकार, बेलनाकार आदि) के हो सकते हैं।

(ख) लैपिली (Lapilli):

      मटर के दाने या अखरोट के आकार वाले ठोस टुकड़ों को ‘लैपिली’ कहा जाता है।

(ग) स्कोरिया (Scoria):

     लैपिली से थोड़े छोटे टुकड़ों को ‘स्कोरिया’ कहते हैं।

(घ) प्यूमिस (Pumice):

     मैग्मा के झाग के जमने से बहुत हल्के एवं छिद्रदार शिलाखण्ड का निर्माण होता है। यह ‘प्यूमिस’ कहलाता है।

(ङ) ज्वालामुखी धूल या राख (Volcanic ash):

    ज्वालामुखी से निकलने वाले बारीक ठोस कणों को ‘ज्वालामुखी धूल या राख’ कहते हैं।

(च) टफ (Tuff):

     ज्वालामुखी धूल या राख जब संगठित होकर ठोस चट्टानी रूप धारण कर लेते हैं तो उन्हें ‘टफ’ कहा जाता है। अर्थात् जब लावा पदार्थ पानी के अंदर जमकर ठोस हो जाता है तो उसे ‘टफ(Tuff)’ कहते है।

(छ) ब्रेसिया (Breccia):

      जब ज्वालामुखी से निःसृत पदार्थों का जमाव ठोस कोणीय नुकीले टुकड़ों के रूप में होता है तो ऐसे टुकड़ों को ‘ब्रेसिया’ कहा जाता है।      

    ज्वालामुखी उद्गार के दौरान सबसे अंत में लावा या मैग्मा पदार्थ बाहर निकलता है। लावा पदार्थ का स्रोत दुर्बलमण्डल में मिलने वाला मैग्मा चैम्बर या ‘बेनी ऑफ जोन’ होता है। ये लावा दो प्रकार के होते है। प्रथम अम्लीय लावा द्वितीय क्षारीय लावा

     अम्लीय लावा का रंग पीला भार में हल्का लेकिन गाढ़ा होता है। अर्थात इसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। जिसके कारण अति उच्च तापमान पर पिघलता है।

        क्षारीय लावा का रंग गहरा तथा काला होता है। सिलिका की मात्रा कम होने के कारण शीघ्र पिघलने की क्षमता रखता है यह पतला और शीघ्र जमकर ठोस रूप धारण करने वाला होता है।

ज्वालामुखी उदगार के कारण 

 ज्वालामुखी उदगार के चार कारण है–

1) भूगर्भ में ताप का अधिक होना,

2) अत्यधिक ताप तथा दबाव के कारण लावा की उत्पति

3) गैस तथा वाष्प की उत्पति,

4) लावा पदार्थ का ऊपर की ओर आना।

1. भूगर्भ में ताप की वृद्धि–

      भूपटल के नीचे की ओर जाने पर प्रति 32 मीटर पर 1℃ तापमान बढ़ जाता है । इस प्रकार पृथ्वी के आन्तरिक भाग का तापमान अत्यधिक होना चाहिए। तापमान के बढ़ोतरी पृथ्वी के आन्तरिक भागों में रेडियोसक्रिय पदार्थों के उपस्थिति को बतलाया जाता है।

     पृथ्वी के अंदर तापमान बढ़ने से चट्टानें पिघल जाती है और पिघलकर हल्की हो जाती है। यही पिघला हुआ पदार्थ धरातल को तोड़कर बाहर निकलता है या भूपटल के नीचे ही ठंडा हो जाता है तो ज्वालामुखी उत्पन्न होता है।Volcano2. अत्यधिक ताप एवं दबाव के कारण लावा की उत्पति–

       पृथ्वी  धरातल से ज्यों-ज्यों पृथ्वी के केन्द्र की ओर जाते है त्यों-त्यों पृथ्वी के दबाव में बढ़ोतरी होती जाती है । ज्यों-ज्यों दबाव बढ़ता है त्यों-त्यों तापमान में बढ़ोतरी होती जाती है । इसी तापमान की बढ़ोतरी से चट्टानें पिघलकर मैग्मा पदार्थ का निर्माण करती है। यह मैग्मा पदार्थ जब अपने स्रोत क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करता है तो ज्वालामुखी का उदगार होता है।

3. गैस तथा वाष्प की उत्पति–

      ज्वालामुखी उदगार के समय कई तरह की गैस एवं जलवाष्प निकलती है। ज्वालामुखी गैसों की उत्पति के विषय में उनेेेक मत प्रचलित है। जैसे-जब भूमिगत जल रिसकर पृथ्वी के दुर्बलमण्डल में पहुंच जाते है तो अत्यधिक ताप के कारण बड़े पैमाने पर गैस तथा जलवाष्प निर्माण होता है।

         दूसरे मत के अनुसार वर्षा जल जब संरोधी चट्टानों के सहारे धरातल के अंदर पहुंचते है तो भी बड़े पैमाने पर गैस एवं जलवाष्प का  निर्माण होता है । भूपटल के नीचे निर्मित ये जलवाष्प एवं गैस ही भूकम्पीय उदगार को जन्म देते है।

4. लावा पदार्थ का ऊपर की ओर अग्रसर होना–

       पृथ्वी के अंदर स्थित दुर्बलमण्डल में मैग्मा पदार्थ स्थायी रूप से मौजूद है। दुर्बलमण्डल के चारों ओर स्थलमण्डल अवस्थित है। जब स्थलमण्डल में पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन या भूकंप या किसी कारण वश स्थलमण्डल कमजोर पड़ता है तो स्वत: मैग्मा पदार्थ धरातल से बाहर निकलने का प्रयास करते है और ज्वालामुखी उदगार को जन्म देते है।  

★प्लेटविवर्तनिकी सिद्धान्त ज्वालामुखी उदगार की व्याख्या करने वाला सबसे सटीक संकल्पना है। इस संकल्पना के अनुसार पृथ्वी अनेक प्लेटों से निर्मित है।Volcano

★ये प्लेट संवहन तरंगों के कारण हमेशा गतिशील रहते है। इन प्लेटों में तीन प्रकार के सीमा का निर्माण होता है :-

I. निर्माणकारी सीमा या अपसरण सीमा

II. विनाशकारी  या अभिसरण सीमा

III. संरक्षी सीमा

           ज्वालामुखी वितरण के माध्यम से स्पष्ट हुआ कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी के प्रमाण इन्हीं सीमाओं के सहारे मिलते है। अपसरण सीमा में उठते हुए संवहन तरंग के कारण दो प्लेटें एक दूसरे से दूर खिसकती है जिससे लम्बे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से मैग्मा चैंबर का लावा पदार्थ बाहर निकलता है और ज्वालामुखी उदगार को जन्म देता है। मध्य अटलांटिक कटक के सहारे इसी प्रक्रिया से ज्वालामुखी का उदगार हो रहा है। 

           विनाशात्मक सीमा का निर्माण नीचे गिरते हुए संवहन तरंगों के कारण होता है। प्रशान्त महासागर के चारों ओर इस प्रकार का सीमा का निर्माण हुआ है। विनाशात्मक सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले महासागरीय प्लेट कम घनत्व वाले महाद्वीपीय प्लेट के अंदर प्रविष्ट करने की प्रवृति रखते है।

       महासागरीय प्लेट का नीचे की ओर प्रक्षेपित भाग पिघलकर “बेनी ऑफ जोन” का निर्माण करते है। बेनी ऑफ जोन का ही मैग्मा पदार्थ धरातल से ऊपर आकर ज्वालामुखी उदगार को जन्म देता है। 

    कभी-कभी संरक्षी सीमा के सहारे भी ज्वालामुखी का उदगार होता है। जैसे जापान के होंशु द्वीप के सहारे दो महासागरीय प्लेट आपस में रगड़ खा रहे है। एक प्लेट जापान सागर प्लेट कहलाता है तो दूसरा प्लेट  प्रशान्त महासागरीय प्लेट कहलाता है।

    प्रशान्त महासागरीय प्लेट का सापेक्षिक घनत्व अधिक होने के कारण जापान सागर प्लेट के नीचे प्रक्षेपित हो गया है। और होन्शु द्वीप के नीचे ‘बेनी ऑफ जोन’ का निर्माण कर लिया।

Volcano

★ यहां जापान सागर प्लेट स्थिर है जबकि प्रशांत प्लेट ही गतिशील है।

★ इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्लेट टेक्टोनिक संकल्पना ज्वालामुखी उदगार का व्याख्या करने वाला सबसे सटीक मत है।

ज्वालामुखी क्रिया का प्रकार

      ज्वालामुखी क्रिया दो प्रकार का होता है।

A. केंद्रीय उदगार वाले ज्वालामुखी क्रिया :-

        इस प्रकार के उदगार में भूपटल में एक सँकरा छिद्र का निर्माण होता है और इन्ही छिद्रों के सहारे ज्वालामुखी पदार्थ बाहर की ओर निकलते है। मुख का व्यास कुछ 100 फीट से अधिक नहीं होता है।

       मुख का आकार लगभग गोल होता है। जिससे गैस, लावा एवं विखण्डित पदार्थ अत्यधिक भयंकर विस्फोट के साथ बाहर निकलते हैं तथा आकाश में काफी ऊँचाई तक पहुंच जाते हैं। ऐसे उदगार को ही केंद्रीय ज्वालामुखी उदगार कहते है। इस प्रकार का उदगार काफी विनाशकारी होता है। उदगार के समय भयंकर भूकम्प आती है। केन्द्रीय ज्वालामुखी उदगार को 1908 ई० में लैक्रोइक्स नमक विद्वान ने इसे चार वर्गों में बांटा है:-

1. हवाईतुल्य ज्वालामुखी उदगार

2. स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उदगार

3. वोल्केनियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार

4. पिलियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार

       इनके अलावा केन्द्रीय उदगार वाले एक अन्य प्रकार के ज्वालामुखी का जिक्र मिलता है जो विसुवियस-तुल्य ज्वालामुखी कहलाता है।

1. हवाई तुल्य ज्वालामुखी उद्गार- 

        इस प्रकार का ज्वालामुखी का उद्गार काफी शांत तरीके से होता है। क्योंकि इसमें निकलने वाला मैग्मा पदार्थ काफी पतला तथा गैसों की मात्रा कम होती है। इस कारण विस्फोट तीव्र नहीं होता है। इसमें निकलने वाला विखण्डित पदार्थ नगण्य होता है।

              उद्गार के समय लावा के छोटे-छोटे लाल पिंड गैसों के साथ ऊपर उछाल दिए जाते है जिसे हवाई द्वीप के निवासी “अग्नि देवी पिलीकेश राशि” कहते है। इस तरह का उद्गार खासकर हवाई द्वीप पर देखने को मिलता है इसीलिए इसे हवाईयन प्रकार का ज्वालामुखी कहते है।Volcano

2. स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उद्गार– हवाईयन के तुलना में ये ज्यादा विस्फोटक होता है। तरल लावा पदार्थ एवं अन्य विखण्डित पदार्थ उसके तुलना में अधिक निकलते है। उदगार के समय यह विखण्डित पदार्थ काफी ऊँचाई पर चले जाते है और जाकर पुनः क्रेटरमें गिरते रहते है। इस प्रकार का उदगार इटली के लिपारी द्वीप पर स्थित स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी में पाया जाता है। इसीलिए इसे स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उदगार कहते है।Volcano

3. वोल्केनियन ज्वालामुखी उदगार– इस प्रकार का उदगार काफी भयंकर एवं विस्फोटक होता है। इससे निकलने वाला लावा काफी चिपचिपा एवं लसदार होता है। जिसके कारण दो उदगार के बीच यह ज्वालामुखी छिद्र पर जमकर ढक देता है। जिसके कारण ज्वालामुखी नली में बड़ी मात्रा में गैस एवं जलवाष्प जमा हो जाते है जब विस्फोट होता है तो काफी तीव्रता के साथ बाहर निकलते है। ये गैस बाहर निकलने के बाद आसमान में फूलगोभी के समान दल का निर्माण करते है। इसका नामकरण लीपारी द्वीप पर स्थित वोल्केनो पर्वत के नाम पर किया गया है।Volcano

4. पीलियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार- यह उदगार सबसे अधिक विस्फोटक एवं भयंकर होता है। इसमें निकलने वाला लावा सबसे अधिक चिपचिपा एवं लसदार होता है। विस्फोट के समय काफी तीव्रता से आवाज उत्पन्न होता है।

            8 May, 1902 ई० को वेस्टइंडीज में स्थित पिल्ली ज्वालामुखी के भयंकर विस्फोट के आधार पर इसे पीलियन ज्वालामुखी उदगार कहते है। 1883 में हुआ क्राकातोआ विस्फोट (जावा और सुमात्रा द्वीप के बीच में) पीलीयन प्रकार का विस्फोट था। यह अब तक का सबसे भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट का उदाहरण है।

5. विसुवियस तुल्य ज्वालामुखी:- 

     कुछ विद्वान विसुवियस तुल्य ज्वालामुखी उदगार का भी उल्लेख करते है। इस प्रकार के ज्वालामुखी का नामकरण नेपल्स की खाड़ी (द. प. इटली) के तट से कुछ दूर स्थलखंड पर स्थित माउण्ट विसुवियस नामक ज्वालामुखी के आधार पर किया गया है। इस प्रकार के उदगार का पहला अध्ययन प्लिनी (इटली) ने किया था, इसलिए इसे प्लिनियन प्रकार का ज्वालामुखी उद्गार भी कहते है। यह भी काफी विस्फोटक होता है। लेकिन इसमें लावा पदार्थ काफी ऊँचाई तक पहुंच जाते है और ज्वालामुखी बादल का आकार गोलाकार हो जाता है।

Volcano

(B) दरारी उदभेदन वाले ज्वालामुखी– जब ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान गैस की मात्रा कम और लावा की मात्रा अधिक होती है तो भूपटल में दरार का विकास होता है। और उससे लावा निकलकर ठोस होने की प्रवित्ति रखती है। निकलने वाला लावा प्रायः क्षारीय (Basic) प्रकार का होता है। कोलम्बिया का पठार (USA), दक्कन का पठार दरारी उदगार के प्रमुख उदाहरण है।

ज्वालामुखी स्थलाकृति

 ज्वालामुखी क्रिया से मुख्यत: दो प्रकार के स्थलाकृति का निर्माण होता है।

1. आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति और

2. बाह्य ज्वालामुखी स्थलाकृति।

1. आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति- जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है, तब उससे आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

        जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है।

       इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

2. बाह्य स्थलाकृति– जब गर्म पदार्थ भूपटल को तोड़कर बाहर निकलती है तो निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण करते है:-

I. क्रैटर एवं कोल्डेरा- वैसा ज्वालामुखी छिद्र जिसका व्यास कम हो तथा समय-समय पर लावा निकलता रहता हो उसे क्रैटर कहते है, लेकिन जिस ज्वालामुखी के छिद्र का व्यास बहुत अधिक हो तथा लावा निकलना बंद हो गया हो तो उसे कोल्डेरा कहते है।

          अमेरिका का ओरेगन झील और भारत का लुनार झील क्रैटर का उदाहरण है जबकि किलिमंजारो पर्वत के ऊपर तथा भारत के पुष्कर झील कोल्डेरा का उदाहरण है।

II. सोल्फतारा और धुँआरा– जब ज्वालामुखी उदगार के बाद लावा निकलना बन्द हो जाता है तो लम्बे समय तक गैस एवं जलवाष्प निकलते रहते है तो उसे धुँआरा कहते है लेकिन जिस धुँआरे में गंधक की मात्रा अधिक होती है तो उसे सोल्फतारा कहते है।

          अलास्का के कटमई ज्वालामुखी के पास 10000 (दस हजार) धुँआरों की घाटी, न्यूजीलैण्ड के प्लेनेटी के खाड़ी में व्हाइट टापू का  धुँआरा, ईरान में कोह सुल्तान का धुँआरा का विकास हुआ है।

III. गीजर– यह एक ऐसी ज्वालामुखी स्थलाकृति है जिसमें भिन्न-भिन्न समयांतराल पर गर्म जलवाष्प फव्वारे के रूप में बाहर निकलते है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण USA के वायोमिंग राज्य में स्थित ओल्डफेथफुल गीजर है । इसी तरह आइसलैंड  के द ग्रेट गीसिर और न्यूजीलैंड के वायमान्यू गीजर प्रसिद्ध है।

IV. गर्म जल के सोते– यह एक ऐसी ज्वालामुखीय स्थलाकृति है, जिसके मुख से गर्म पानी बाहर निकलता रहता है। जैसे- राजगीर का सूर्य कुंड, नानक कुंड, हजारीबाग का सूर्य कुंड, सीताकुंड और मुंगेर का सीताकुंड प्रसिद्व है।

V. ज्वालामुखी पठार एवं मैदान– दरारी ज्वालामुखी उदगार के समय पर्याप्त मात्रा में क्षारीय लावा धरातल पर प्रकट होकर ठंडा हो जाते है और पठार जैसी स्थलाकृति का निर्माण करते है ।  भारत का दक्कन का पठार, USA का कोलम्बिया का पठार, इथोपिया का पठार और अनातोलिया का पठार इसका उदाहरण है।

VI. ज्वालामुखी पर्वत– जब केंद्रीय ज्वालामुखी उदगार होती है तो उससे पर्याप्त मात्रा में अम्लीय लावा बाहर की ओर निकलती है जो काफी गाढ़ा होता है। इनके जमाव से निर्मित पर्वतीय स्थलाकृति को ज्वालामुखी पर्वत कहते है।

          ज्वालामुखी पर्वत तीन प्रकार का होता है। 

1. सक्रीय/जीवित ज्वालामुखी पर्वत-

      वैसा ज्वालामुखी पर्वत जिसके क्रेटर से वर्त्तमान समय में भी मलवा बाहर निकल रहा हो। विश्व में कुल 500 जीवित ज्वालामुखी पर्वत है। जैसे– इटली का एटना तथा स्ट्रोम्बोली, फिलिपिंस का पिनाटुबो, हवाई द्वीप पर स्थित मोनालोआ, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी, अर्जेंटीना एवं चिली की सीमा पर स्थित ओजस डेल सालाडो इत्यादि इसका प्रमुख उदाहरण है। “स्ट्रोम्बोली को  भूमध्यसागर का प्रकाश स्तम्भ” कहते है। 

2. प्रसुप्त ज्वालामुखी पर्वत-

       वैसा ज्वालामुखी पर्वत जिनके क्रेटर से वर्तमान समय में लावा का उत्सर्जन नहीं हो रहा हो लेकिन भविष्य में लावा का उत्सर्जन  की पूरी संभावना हो, उसे प्रसुप्त ज्वालामुखी पर्वत कहते है। जैसे- इटली का विसुवियस, जापान का फ्यूजीयामा, इंडोनेशिया (जावा व सुमात्रा के मध्य) का क्राकाटोआ, इक्वेडोर का चिम्बराजों और चिली का एकांकागुआ इत्यादि।

3. शांत ज्वालामुखी पर्वत-

        जब ज्वालामुखी का उदगार पूर्णतया समाप्त हो गया हो या भविष्य में भी उदगार की कोई संभावना न हो, उसे शांत या मृत ज्वालामुखी कहते है। जैसे– ईरान का देमवन्द, पाकिस्तान का कोह-सुल्तान, म्यंनमार का माउंट पोपा, अफ्रीका का किलिमंजारों मृत ज्वालामुखी के उदाहरण है।

VII. शंकु– केन्द्रीय ज्वालामुखी उदगार के दौरान निकले विखण्डित पदार्थों के निक्षेपण से शंकु का निर्माण होता है। शंकु कई प्रकार का होता है। जैसे:-

1. सिंडर शंकु Volcano

जैसे – म्यांमार का प्यूमा शंकु

2. मिश्रित शंकु

Volcano

जैसे- जापान का फ्यूजियामा

3. सैटेलाइट शंकु

Volcano

सैटेलाइट शंकु

जैसे- जापान का फ्यूजियामा

विश्व में ज्वालामुखी का वितरण

        विश्व में ज्वालामुखी वितरण का एक निश्चित क्रम है जिसे नीचे की शीर्षक में चर्चा की जा रही है।

1. परिप्रशान्त मेखला के सहारे मिलने वाला ज्वालामुखी–

         यह मेखला प्रशांत महासागर के सहारे चारों ओर स्थित है, इसे “प्रशांत अग्निवलय” के नाम से भी जानते है। विश्व में सर्वाधिक ज्वालामुखी इसी क्षेत्र में मिलते है। जैसे जापान का फ्यूजियामा, फिलीपींस का माउंट टाल, USA का माउंट सस्ता, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी और चिम्बरजो, अर्जेंटीना का एकांकागुआ, कनाडा का माउंट रेनजल इत्यादि।

        विश्व के अधिकांश ऊँचे ज्वालामुखी पर्वत एवं चोटियाँ इसी मेखला के सहारे मिलती है।       

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी:-

       इस पेटी का विस्तार पूर्व में प्रशांत महासागर से लेकर पश्चिम में अटलांटिक महासागर के केनारी द्वीप तक हुआ है। यह हिमालय और आल्पस पर्वत से होकर गुजरती है। यह प्लेट अभिसरण का क्षेत्र है। हिमालय क्षेत्र में बाहरी ज्वालामुखी का प्रमाण मिलने की पूरी-पूरी संभावना है। जबकि इसी पेटी में स्थित भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अनेक जीवित एवं प्रसुप्त ज्वालामुखी का प्रमाण मिलता है। जैसे- इटली का विसुवियस, स्ट्राम्बोली, एटना, एल्बुर्ज, ईरान का कोह-सुल्तान इत्यादि।

3. मध्य अटलांटिक कटक पेटी:

        यह पेटी अटलांटिक महासागर के मध्य भाग में उत्तर से दक्षिण दिशा से होकर गुजरती है। यह प्लेट अपसरण का क्षेत्र है। यहाँ पर लम्बे दरार का निर्माण हुआ है। जिससे बैसाल्टिक लावा बाहर निकलता है और ठंडा होकर मध्य अटलांटिक कटक को जन्म दिया है। जैसे- आइसलैंड का माउंट हेकला, माउंट लोकी, सक्रिय ज्वालामुखी है, जो मध्य अटलांटिक पेटी में ही पड़ते है।

4. अन्य क्षेत्र:-

          विश्व के कई ऐसे छोटे-छोटे क्षेत्र है जहाँ पर ज्वालामुखी उदगार का प्रमाण मिलता है। जैसे- अफ्रीका के पूर्वी भाग में निर्मित महान भ्रंश घाटी के सहारे तंजानिया का किलिमंजारो, केन्या का  माउंट केनिया पर्वत मिलते है। इसी तरह क्रिटैशियस काल में हुए लावा उदगार से दक्कन के पठार पर ज्वालामुखी का प्रमाण मिलता है तथा अंडमान एवं निकोबार में बैरन (सक्रिय) एवं नरकोंडम (प्रसुप्त) द्वीप ज्वालामुखी के ही उदहारण है।

        अतः उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी के क्षेत्र प्लेट के किनारे पर अवस्थित है।

मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का प्रभाव:

    मानवीय क्रियाकलापों को ज्वालामुखी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रभावित करता है।

1. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का सकारात्मक प्रभाव:

         मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखियों के सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी से बहुत सारे नए भू-आकृतियों का निर्माण होता है। जैसे- क्रेटर और काल्डेरा झीलें, लावा मैदान, गेसर, ज्वालामुखीय पठार और ज्वालामुखी पर्वत।

⇒ यह दुर्बलमंडल (Asthenosphere) से सतह पर सोना, लोहा, निकेल और मैग्नीशियम जैसे मूल्यवान तत्व को पृथ्वी के सतह पर लाता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग का सोना और कनाडा में सडबरी का निकेल निक्षेप ज्वालामुखी निक्षेपण के उदाहरण हैं।

⇒ आग्नेय शैल लावा के ठंडा होने के बाद बनता है, जिसका उपयोग निर्माण जैसी विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाता है।

⇒ ज्वालामुखी हमें उपजाऊ भूमि प्रदान करते हैं। ज्वालामुखी की धूल और राख का जमाव भूमि को उपजाऊ बनाता है। उदाहरण के लिए, दक्कन ट्रैप की काली मिट्टी और जावा द्वीपों की उपजाऊ भूमि ज्वालामुखी द्वारा बनाई गई है।

⇒ यह सुंदर दृश्य भी बनाता है और जिससे यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।

⇒ यह पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में भी बहुत सारी जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं और प्लेटों की गति की स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह भूतापीय ऊर्जा का एक संभावित स्रोत भी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, इटली और जापान जैसे कई देश भूतापीय ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।

2. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का नकारात्मक प्रभाव:

      मनुष्य पर ज्वालामुखी के नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी की धूल और गैसें वातावरण को अपारदर्शी बना देती हैं जिससे वायु परिवहन मुश्किल हो जाता है, श्वसन रोग बढ़ जाता है और सूर्यातप को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से भी रोकता है अर्थात यह पृथ्वी को ठंण्डा करता है।

⇒ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद क्षेत्र में लावा का जमाव होने से वहाँ की जमीन को सरंध्र बनाती है जिससे क्षेत्र में पानी की कमी हो जाती है।

⇒ ज्वालामुखियों के अचानक फटने से मानव बस्ती, मानव जीवन और उसकी संपत्ति को काफी नुकसान होता  है। उदाहरण के लिए, माउंट वेसुवियस (जो एक ज्वालामुखी विस्फोट से बना है) ने 78 ई० में इटली में पोम्पेई शहर को नष्ट कर दिया।

⇒ जब समुद्र में ज्वालामुखियों का विस्फोट होता है तो यह आसपास के जल को गर्म कर देता है जिससे की वहाँ के जलीय जीवों पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।


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10. Topography Created by Volcanic Action / ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति

 10. Topography Created by Volcanic Action

(ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति)


ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति⇒

Topography Created by Volcanic Action

   ज्वालामुखी वह क्रिया है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के भीतर गैस एवं लावा की उत्पति से लेकर उनके पृथ्वी के भीतर या बाहर प्रकट होने की सभी क्रियाएं सम्मिलित होती है। ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर :- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रका के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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2. Complete Educational Psychology Capsule 2 / सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान

2. Complete Educational Psychology Capsule 2


Complete Educational Psychology Capsule 2

Psychology Capsule 2Education (शिक्षा)

                     शिक्षा एक जीवनपर्यन्त चलने वाली बालक के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया है, जिसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। यह देश, काल व स्थान आदि के बन्धनों से मुक्त होती है। अर्थात  वास्तव में शिक्षा एक अनियंत्रित वातावरण है, जिसमें रहते हुए बालक स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी प्रकृति एवं क्षमता  के अनुसार विभिन्न अनुभवों को प्राप्त करते हुए सीखता है। 

एक नजर में इन्हें जरुर देखें-

➡शिक्षा शब्द की उत्पत्ति ‘शिक्ष’ धातु से हुई है, जिसका  शाब्दिक अर्थ सीखने, ज्ञान ग्रहण करने या विद्या प्राप्त करने से है।

शिक्षा शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर शब्द Education है। Education शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा एडुकेट ‘Educatum’से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षण कार्य करना।

➡कई विद्वानों के अनुसार Education शब्द की उत्पत्ति ‘Educare’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ  है – पालन पोषण और विकसित करना।

➡ इस प्रकार Education शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Educatum शब्द से हुई है जिसमें E मतलब अन्दर से, Duco मतलब बाहर निकालना। अर्थात शिक्षा का अर्थ होता है, बालक के अन्तर्निहित योग्यताओं को बाहर निकाल कर उसके व्यवहार में परिवर्तन करना है।

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति: 

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है।

इसमें नियम व सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है।

➡ शिक्षा मनोविज्ञान अतीत की अपेक्षा वर्तमान की घटनाओं से, क्या और क्यों से सम्बन्धित है।

 इसके नियम व सिद्धान्त सार्वभौमिक होते हैं।

इसके द्वारा भविष्यवाणी की जा सकती है।

किसी भी वैज्ञानिक पद्धति में हम उसका अध्ययन करते हैं, जिसक निरीक्षण किया जाता है 

शिक्षा मनोविज्ञान व्यवहार का अध्ययन करता है, इसका निरीक्षण किया जा सकता है।

 शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहारात्मक पक्ष का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है।

शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

शिक्षा मनोविज्ञान एक सकारात्मक विद्यालय विज्ञान है, जो शिक्षा के कब, कैसे, और कहाँ आदि प्रश्नों के उत्तर पर ध्यान केन्द्रित करता है।

Complete Educational Psychology Capsule 2

शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता :

स्वयं को पहचानने में सहायक।

बालक को पहचानने में सहायक।

मूल्यांकन की नई-नई विधियों का प्रयोग करना।

शिक्षक के दृष्टिकोण को उन्नत व व्यापक बनाने में सहायक।

 किसी भी प्रकार की कक्षा में शैक्षणिक प्रस्तुतियां जागृत कने में सहायक।

बालको के प्रति प्रेम, सहानुभूति व समदृशी भाव अपनाने में

बालकों के चहुमुखी विकास के लिए उचित शिक्षण विधियों अपनाने में सहायक

बालकों को अभिप्रेरित करते हुए उनमें रुचि जागृत करना। 

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

1. Complete Educational Psychology Capsule 1 / शिक्षा मनोविज्ञान

1. Complete Educational Psychology Capsule 1


Complete Educational Psychology Capsule 1⇒

Psychology Capsule 1

शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा मनोविज्ञान’ दो शब्दों से मिलकर बना है- पहला- ‘शिक्षा’ और दूसरा- ‘मनोविज्ञान’। इस प्रकार शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ शिक्षा संबंधी मनोविज्ञान से है। दूसरे शब्दों में, शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का ही व्यावहारिक रूप है और शिक्षा की प्रक्रिया में मानव व्यवहार का सम्पूर्ण अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

एक नजर में इन्हें जरुर देखें

➡ शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में माना जाता था।

➡ विलियम जेम्स ने दर्शनशास्त्र से मनोविज्ञान को मुक्त कराया। इसलिए मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स को माना जाता है।

➡ मनोविज्ञान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रूडोल्फ गोयल ने किया।

➡ मनोविज्ञान को स्वतन्त्र विषय बनाने के लिए मनीषियों द्वारा इसे परिभाषित करना आरम्भ किया गया।

➡ गेरेट के अनुसार PSYCHOLOGY शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के दो शब्दों PSYCHE और LOGOS से मिलकर हुई हैं।

➡ यहाँ PSYCHE का अर्थ :- आत्मा तथा LOGOS का अर्थ – अध्ययन करना है।

➡ 16वीं शताब्दी में सर्वप्रथम आत्मा को आधार मानकर प्लेटो, अरस्तु और डेकार्डे  के द्वारा मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना गया। 

➡ आत्मा शाब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अन्त में यह परिभाषा अमान्य हो गयी।

➡ 17वीं शताब्दी में इटली के मनोविज्ञानी पॉम्पोनोजी व थासडरीन इसे मन तथा मस्तिष्क का विज्ञान माना। बाद में यह परि भाषा भी अपूर्ण अर्थ के कारण अमान्य कर दी गयी।

➡ 19वीं शताब्दी में विलियम वुण्ट, विलियम जेम्स ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान माना और अपने अपूर्ण अर्थ की वजह से यह भी अमान्य कर दी गयी।

➡ 20वीं शताब्दी में वाटसन, थार्नडाइक, स्किनर तथा मेग्डुगल इत्यादि ने मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना जो आज तक प्रचलित है।

➡ भारत में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला सेन गुप्त के द्वारा 1915 ई0 में कलकत्ता शहर में स्थापित की गयी।

➡ जर्मनी के लिपजिंग शहर में विलियम वुण्ट के द्वारा 1879 ई० में ‘कार्लमार्क्स विश्विद्यालय में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोग शाला स्थापित की गयी। 

➡ विलियम वुण्ट को प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।

➡ वुडवर्थ के अनुसार – “मनोविज्ञान में सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर मन व मस्तिष्क का त्याग किया और फिर उसने अपनी चेतना का त्याग किया तथा तब आज वर्तमान में मनोविज्ञान व्यवहार के विधि स्वरूप स्वीकार करता है।”

➡ वाटसन का कथन – ‘तुम मुझे एक बालक दो मैं उसे वो बना सकता हूँ जो मैं बनाना चाहता हूँ।” 

मनोविज्ञान के अर्थ पर विभिन्न विज्ञानियों के मत
➡ मेग्डुगल- मनोविज्ञान व्यवहार व आचरण का विज्ञान है।’
➡ स्किनर- ‘मनोविज्ञान व्यवहार व अनुभव का विज्ञान है।’
➡ वाटसन- मनोविज्ञान व्यवहार का सुख निश्चित, सकारात्मक धनात्मक विज्ञान है।” 
➡ क्रो एण्ड क्रो- ‘मनोविज्ञान मानव व्यवहार व संबंधों का अध्ययन है।
➡ मन- ‘आधुनिक मनोविज्ञान का संबंध व्यवहार की वैज्ञानिक खोज है।’
➡विलियम मेग्डुगल ने अपनी पुस्तक Outline Psychology में चेतना शब्द की निंदा की है
मनोविज्ञान की प्रमुख शाखायें / क्षेत्र-
1. सामान्य मनोविज्ञान,
2. असामान्य मनोविज्ञान,
3. तुलनात्मक मनोविज्ञान,
4. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान,
5. समाज मनो विज्ञान,
6. औद्योगिक मनोविज्ञान,
7. बाल मनोविज्ञान,
8. किशोर मनोविज्ञान,
9. प्रोढ़ मनोविज्ञान,
10. विकासात्मक मनोविज्ञानी,
11. निदानात्मक / उपचाराला / क्लिनिक मनोविज्ञान,
12. परा मनो विज्ञान,
13. पशु मनो विज्ञान,
14. शिक्षा मनोविज्ञान

➡ मनोविज्ञान की शाखा शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पत्ति 1900 ई० में मानी जाती है। बाद में थार्नडाइक, जड़, टरमन, प्रोबेल, हरबल आदि के प्रयासों से 1920 ई0 में शिक्षा मनोविज्ञान को स्पष्ट स्वरू प्राप्त हुआ।

➡ प्रथम शैक्षिक मनोविज्ञानिक थार्नडाइक को माना जाता है।

➡ शिक्षा में मनोवैज्ञानिक दृष्टि का सूत्रपात रूसो ने किया। रूसो ने अपनी पुस्तक E-mail में लिखा- “शिक्षा संस्कृत के शिक्ष धातु से बना है।”

➡ स्किनर के अनुसार- “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों की तैयारी की आधार शिला है।”

 शिक्षा मनोविज्ञान पर विभिन्न वैज्ञानिकों के मत

➡रूसो- “बालक एक पुस्तक के समान है जिसका अध्ययन प्रत्येक अध्यापक को करना चाहिए।”

➡फ्रॉबेल- “शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक बालक अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास करता है।”

➡क्रो एण्ड क्रो- “शिक्षा मनोविज्ञान जन्म से वृद्धावस्था तक किसी भी व्यक्ति के सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”

➡स्किनर-“मनोविज्ञान शिक्षा का आधार भूत विज्ञान है। 

➡ट्रो-  “शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक प्रस्तुतियों का मनोवैज्ञानिक ‘दृष्टि से अध्ययन है।”

➡ब्राउन- “शिक्षा वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के व्ययवहारों में परिवर्तन होता है।”

➡विवेकानन्द- “अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति प्रदान करना ही शिक्षा है।”

➡महात्मा गांधी- “शिक्षा से अभिप्राय बालक या मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्तम विकास से है।”

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

7. Plate Tectonic Theory / प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत

7. Plate Tectonic Theory

(प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत)




Plate Tectonic Theory

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत⇒

Plate Tectonic Theory

      प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे- पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर एक नया विचार प्रस्तुत करता है।

       इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है। अर्थात् पृथ्वी के ऊपरी ठोस परत को ही प्लेट कहते है। इसके अंतर्गत न सिर्फ महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपटल (Crust) शामिल हैं बल्कि मैंटल का ऊपरी पतला हिस्सा भी शामिल है। वास्तव में यह स्थलमंडल (Lithosphere) ही है, जिसके नीचे दुर्बलमंडल (Astheno sphere) स्थित है।

सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। इन प्लेटों के  स्वभाव और प्रवाह से संबंधित अध्ययन को ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त कहते है। यह सिद्धांत किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं है बल्कि इसमें कई विद्धानों (मोर्गन, मैकेंजी व पार्कर इत्यादि) का योगदान है। इस सिद्धांत के विकास में पहले से चली आ रही निम्नलिखित तीन सिद्धांतों का महत्वपूर्ण योगदान हैः-

(i) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (अलफ्रेड वेगनर, 1912 ई.)

(ii) संवहन तरंग सिद्धांत (ऑर्थर होम्स, 1929 ई.)

(iii) समुद्र तली प्रसार सिद्धांत (हैरीहेस, 1960 ई.)

परंतु 1962 ई० में हैरिहस महोदय ने इन सभी विचारों को संगठित कर एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया।

{नोट:

♣ प्लेट शब्द- टूजो विल्सन

♣ प्लेट विवर्तनिकी शब्द- मोर्गन

♣प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का प्रतिपादन- हैरिहेस

♣ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की वैज्ञानिक रूप से विस्तृत व्याख्या- मोर्गन

♣ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में अन्य भू-वैज्ञानिक जो सहायता किए- मैकेंजी व पार्कर}

प्लेटों का स्वभाव तथा संख्या

   इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई महाद्वीपीय भागों में 100 किमी० और न्यूनतम मोटाई  महासागरीय भागों में 5 किमी० तथा औसत मोटाई 70 किमी० है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी  के 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-

प्रमुख प्लेट (बड़े प्लेट)- 7

1. प्रशांत महासागरीय प्लेट

2. उ० अमेरिकी प्लेट

3. द० अमेरिकी प्लेट

4. अफ्रीकन प्लेट

5. यूरेशियन प्लेट

6. इण्डियन प्लेट (इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट)

7. अंटार्कटिका प्लेट

नोट: कुछ विद्वान उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिणी अमेरिका को एक ही प्लेट मानते हैं। ऐसी स्थिति में बड़े प्लेटों की संख्या 6 हो जाती है।

गौण प्लेट (छोटे प्लेट)- 6

(i) अरेबियन प्लेट

(ii) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट

(iii) कोकस प्लेट

(iv) नास्का प्लेट

(v) स्कोशिया प्लेट

(vi) कैरेबियन प्लेट

Plate Tectonic Theory

प्लेटों के प्रकार

⇒ गति के आधार पर

    इस सिद्धांत के अनुसार गति के आधार पर प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–

1. स्थिर प्लेट

2. गतिशील प्लेट

       स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है।

⇒ संरचना के आधार पर

     संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है-

1. महासागरीय प्लेट:-  प्रशांत महासागरीय प्लेट, इण्डियन प्लेट या इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट।

⇒ गति- 5 सेमी० प्रति वर्ष

2. महाद्वीपीय  प्लेट:- उ० अमेरिकी प्लेट, द० अमेरिकी प्लेट, अफ्रीकन प्लेट, युरेशियन प्लेट, अंटार्कटिका प्लेट।

⇒ गति- 2 सेमी० प्रति वर्ष

       महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व (2.9 ग्राम/सेमी०3) अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व (2.7 ग्राम/सेमी०3)  कम है।

प्लेट सीमांत तथा प्लेट सीमा        

      इस सिद्धांत के अनुसार किसी एक प्लेट के किनारे या अंत के हिस्से को प्लेट सीमांत (Plate Margins) कहते है।

      ‘प्लेट सीमा’ (Plate Boundaries) दो या दो से अधिक प्लेटों के मध्य का वह क्षेत्र है जिसके सहारे वे आपस में मिलते (converge) हैं या दूर जाते (diverge) हैं या घर्षण (slide) करते हैं।

    इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं होती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

(i) अभिसारी प्लेट सीमा
(ii) अपसारी प्लेट सीमा
(iii) संरक्षी प्लेट सीमा
प्लेटों के संचालन शक्तियाँ

        इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है। प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया हैजैसे-

(i) पृथ्वी के घूर्णन गति,

(ii) प्लवनशीलता बल,

(iii) गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन,

(iv) सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल,

(v) संवहन तरंग आदि।

         इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है जैसे-

(i) निर्माणकारी प्लेट गति- इसकी उत्पत्ति अपसरण प्लेट सीमा के सहारे होती है।

(ii) विनाशकारी प्लेट गति- इसकी उत्पति अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

(iii) संरक्षी प्लेट गति- इसकी उत्पति संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

प्लेटों का क्रियाविधि

         उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत किये गए प्रमाण

   प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है–

1. ज्वालामुखी:

         विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

2. भूकम्प:

       भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।

3. सागर नितल प्रसार और पुराचुम्बकत्व:-

        सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुम्बकत्व का गुण कम तथा पुराने चट्टानों में पुराचुम्बकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।

4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान:-

        प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचलन, महाद्वीपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुम्बकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।

आलोचना

       उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियाँ है। जैसे- 

(i) प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है। जैसे-जैसे सर्वेक्षण किए जा रहे हैं, प्लेटों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

(ii) हॉट स्पॉट की संख्या का भी स्पष्ट पता नहीं चल पाता है।

(iii) कई संभावित क्षेत्रों में बेनी ऑफ जोन का निर्माण नहीं हुआ है।

(iv) बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता। 

(v) प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है? इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं किया गया है।

(vi) एक प्लेट को एक ही दिशा में गतिशील होना चाहिए, लेकिन कई प्लेटों में विपरीत (opposite) गति के प्रमाण भी मिलते हैं, जैसे- अफ्रीकी प्लेट।

(vii) कई प्राचीन मोड़दार पर्वतों के निर्माण की व्याख्या करने में यह सिद्धांत सक्षम नहीं है, जैसे- सेरा डो मार (Serra do Mar) पर्वत (ब्राजील), ड्रेकेन्सबर्ग पर्वत (दक्षिण अफ्रीका), ग्रेट डिवाइडिंग रेंज (ऑस्ट्रेलिया) आदि पर्वतों की अवस्थिति प्लेट सीमा पर नहीं है, वरन् प्लेटों के मध्य है।

(viii) रचनात्मक सीमा मध्य महासागरीय कटक के रूप में सभी महासागरों में पाए जाते हैं, लेकिन विनाशात्मक सीमा अथवा प्रत्यावर्तन क्षेत्र (सिंक/Sink) सभी महासागरों में नहीं पाए जाते हैं। ये मुख्यतः प्रशांत महासागर के तटों के सहारे ही देखे जाते हैं।

     इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।



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6. Continental drift theory of Alfred Wegener / वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त

 6. Continental drift theory of Alfred Wegener

(वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त)


Continental drift theory of Alfred Wegener 

Continental drift theory

      वेगनर महोदय एक जलवायुवेता एवं भूगर्भशास्त्री थे। इन्होंने 1912 ई० में अपनी पुस्तक डाई इंटेस्टहंगडर कण्टिनेंट एण्ड ओगोनी में महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन एवं विभिन्न स्थानों पर मिलने वाले वनस्पतियों के समानता का व्याख्या करना था। इसके व्याख्या में उन्होंने दो तर्क दिए–

(1) या तो समय-समय पर जलवायु में परिवर्तन होता रहा है।

(2) या तो महाद्वीपों का विस्थापन होता रहा है।

        वेगनर के अनुसार प्रांभिक कार्बोनिफेरस युग में सभी महाद्वीप आपस में जुड़े थे, जिसे पेंजिया कहा तथा इसके चारों ओर स्थित विशाल महासागर को पैंथालास कहा। कालान्तर में पेंजिया के विखण्डन से मध्य भाग में गहरी व सकरी भूसन्नति का निर्माण हुआ जिसे टेथिस सागर कहा। टेथिस के उत्तर में स्थित भूखण्ड को लॉरेशिया तथा दक्षिण में स्थित भूखण्ड को गोंडवानलैंड कहा।

         वेगनर के अनुसार भूपटल सियाल से निर्मित है और इससे नीचे सीमा तथा निफे की परत है तथा सियाल सीमा पर अबाध रूप से तैर रही है।

       कार्बोनिफेरस युग में कुछ भूगर्भिक शक्तियों के कारण लॉरेशिया एवं गोंडवाना लैंड में विखण्डन की क्रिया हुई जिससे छोटे-छोटे भूखण्ड यानी महाद्वीपों का निर्माण हुआ। इन महाद्वीपों के विस्थापन से ही दरार घाटी में हुए जल विस्तार से महासागरों का निर्माण हुआ जिसे निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

महाद्वीपों का प्रवाह

       वेगनर के अनुसार महाद्वीपों के विस्थापन के लिए दो बल उत्तरदायी है– 

(i) गुरुत्वाकर्षण एवम प्लवनशीलता बल- महाद्वीपों का उत्तर की ओर विस्थापन

(ii) सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल- महाद्वीपों के पश्चिम दिशा की ओर विस्थापन के लिए उत्तरदायी।

       वेगनर के अनुसार लौरेशिया भूखंड में उ० अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप एवं एशिया के अधिकांश भाग तथा गोण्डवाना लैंड में द० अमेरिका, अफ्रीका, प्रायद्वीपीय भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका सम्मलित थे।

पक्ष में प्रमाण

(1) भूगर्भिक प्रमाण- भारतीय पठार, अफ्रीकी पठार, ब्राजील का पठार एवं ऑस्ट्रेलिया के पठार सभी एक ही समय के निर्मित एवं समान विशेषताएं वाले चट्टान है। 

(2) अटलांटिक महासागर के दोनों तटों पर समानता पायी जाती है तथा दोनों तटों को मिलाया जा सकता है, जिसे उन्होंने Jig-Saw-Fit कहा।

(3) साइबेरिया, ग्रीनलैण्ड, कनाडा में कोयला का पाया जाना तथा केन्या, युगांडा, ब्राजील के मध्य भाग में बोल्डर क्ले का पाया जाना।

(4) सभी महाद्वीपों पर ग्लोसॉप्टेरिस एवं रेन्डियर का पाया जाना।

(5) लेमिंग नामक जंतु का पश्चिम की ओर भागने की प्रवृति।

(6) सभी महाद्वीपों को कम्प्यूटर पर टूटे हुए प्लेट के समान जोड़ा जा सकता है।

आलोचना

• वेगनर मूलतः जलवायुवेत्ता एवं भूगर्भशास्त्री थे जो जलवायु परिवर्तन का अध्ययन न कर महाद्वीप के विस्थापन का अध्ययन करने लगे।

• इनके द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन का कारक बल पर्याप्त नहीं है।

• आस्ट्रेलिया का उ० पू० में प्रवाहित होने इस सिद्धांत के विरुद्ध है।

• प्लेट विवर्तनिकी के अनुसार विस्थापन महाद्वीपों का नहीं बल्कि प्लेटों का हो रहा है।

• इनके अनुसार महाद्वीप सियाल एवं महासागर सीमा से निर्मित है जो गलत है।

• इनके अनुसार सियाल सीमा पर निर्बाध रूप से तैर रही है परंतु मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के लिए सीमा द्वारा अवरोध बताता है जो विरोधाभाषी है।

निष्कर्ष:-

       उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद यह सिद्धांत भूपटल प्रवाह के सम्बंध में व्यक्त प्रथम विचार था जो प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का आधार बना।


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  5. Isostasy / भूसंतुलन /समस्थिति 

5. Isostasy 

भूसंतुलन /समस्थिति


Isostasy⇒Isostasy

            भूसंतुलन भूगोल की एक ऐसी संकल्पना है जो भूपटल के विभिन्न स्तंभों के मध्य पाये जाने वाले संतुलन को व्याख्या करता है। भूसंतुलन का सामान्य अर्थ  “परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर उभरे हुये क्षेत्र (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान) एवं नीचे स्थित क्षेत्रों  (सागर, झील) में भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता भूसंतुलन कहलाता है।”

     भूसंतुलन आंग्ल भाषा में ‘Isostasy या Equilibrium’ कहलाता है। Isostasy शब्द ग्रीक भाषा के Isostasius से बना है जिसका तात्पर्य समस्थिति होता है। आइसोस्टैसी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1889 ई० में अमेरिकी भूवैज्ञानिक C.F. डटन ने किया था। इन्होंने कहा था कि समस्थिति के कारण ही पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र साथ-साथ स्थित है। बहिर्जात बल पर्वतों से मिट्टी काट-काट कर समुद्र एवं मैदान में निक्षेपित करते रहते हैं। इसीलिए मैदान एवं समुद्र तली का भार अधिक तथा पर्वतों के भार कम होते है। भार में कमी या अधिकता के कारण भूगर्भ के भूपटल पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता है। समस्थिति इसी दबाव के विभिन्नता को संतुलन बनाये रखने में मदद करता है।

        डटन ने बताया कि जिस रेखा के सहारे भूपटलीय संतुलन कायम रहता है उसे ‘समदबाव तल’ (Level of Uniform Pressure) अथवा ‘समतोल तल’ (Isotatic Level) या ‘क्षतिपूर्ति तल’ (Level of Compensation) कहते है।

        ऑर्थर होम्स महोदय ने भूसंतुलन की व्याख्या करते हुए कहा है कि “संतुलन की वह दशा जो भूपटल पर विभिन्न ऊँचाई वाले पर्वत, पठार, मैदान अथवा सागरीय नितल के मध्य पायी जाती है, भूसंतुलन कहलाता है।”

भूसंतुलन सिद्धांत का बुनियाद

      भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न भागों के घनत्व भिन्न-भिन्न है। इनकी पुष्टि भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी किया गया है। 1859 ई० में गंगा सिंधु मैदान के मध्य में अक्षांश ज्ञात करते समय दो विधियों को प्रयोग में लाया गया:-

 (l) साहुल विधि

 (ll) त्रिभुजीकरण विधि          

         यह अक्षांशीय मापन का कार्य कल्याण एवं कल्याणपुर नामक स्थान पर किया जा रहा था। इन दोनों स्थानों पर उपरोक्त दोनों विधियों द्वारा आये परिणाम में भारी अंतर था। यह अंतर 5.236 सेकंड बताया गया। इस अंतर का कारण बताते हुए विद्वानों ने बताया कि साहुल को हिमालय पर्वत अपनी ओर आकर्षित कर रही है लेकिन पुनः यह प्रश्न उठाया गया कि अगर हिमालय साहुल को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो हिमालय जितना विशाल है उस दृष्टि से आकर्षण और अधिक होना चाहिए तथा अंतर 15 सेकेंड से भी अधिक होना चाहिए। कालांतर में इसी जटिल तथ्यों की व्याख्या भूसंतुलन से करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि हिमालय के नीचे स्थित चट्टानों के घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से भी कम है। जबकि समुद्र नितल का घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से अधिक है। यही कारण है कि दोनों के बीच संतुलन की स्थिति कायम है। भूसंतुलन को स्पष्ट करने हेतु अनेक मत प्रतिपादित किये गये है:-

(1) एयरी का मत

(2) प्रौट का मत

(3) हिस्कानेन का मत

(4) जौली का मत

(1) एयरी का मत

       1859 ई० में एयरी ने अपना मत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार “भूपटल के प्रत्येक स्तम्भ का घनत्व समान है, जो भाग जितना ऊँचा है वह उसी अनुपात में भूगर्भ में घुसा हुआ है। अर्थात जो भाग अधिक ऊंचा है उसका अधिक भाग और जो भाग कम ऊँचा है उसका कम ही भाग भूगर्भ में घुसा हुआ है।”

           एयरी महोदय ने पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभों की तुलना जल में तैरते हुए हिमशीलाखंडों से किया है। उन्होंने अपने मत का व्याख्या करने हेतु आर्कमिडीज के सिद्धान्तों का सहारा लिया है। अर्कमिडीज के अनुसार “कोई भी तैरती हुई वस्तु अपनी मात्रा के समतुल्य द्रव्य को नीचे से हटा देती है”। हिम के संबंध में कहा कि “हिम जब पानी के ऊपर तैर रहा होता है तो उसका 1/9 भाग जल के ऊपर तथा शेष 8/9 भाग जल में डूबा रहता है।”

          धरातल के प्रत्येक भाग के लिए उसका 8 गुणा भाग धरातल के नीचे धंसा रहता है। इसे  सिद्ध करने के लिए एयरी ने एक प्रयोग के माध्यम से प्रदर्शित किया है। एयरी ने भूपटल के विभिन्न भागों की तुलना लौह धातु के छोटे-बड़े टुकड़ों से किया है। उन्होंने बताया कि जब लोहे के विभिन्न ऊँचाई वाले टुकड़े को द्रव में डुबोया जाता है तो जिस लोहे के टुकड़े की ऊँचाई अधिक होता है उसका उतना अधिक भाग द्रव में डूबा रहता है और जो लोहा का टुकड़ा कम ऊँचा रहता है उसका उतना ही कम भाग द्रव में डूबा रहता है।

Isostasy

आलोचना

      अगर एयरी के मत को सही मान लिया जाय तो इनके अनुसार जो भाग जितना ऊँचा होगा उसका उतना ही भाग धरातल के अंदर घुसा हुआ होगा। जैसे -अगर हिमालय की ऊँचाई को आधार बनाया जाय तो 2 लाख 70 हजार फीट गहरा जड़ होना चाहिए लेकिन दूसरी ओर यह भी ज्ञात है कि धरातल के नीचे जाने पर प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1°C तापमान बढ़ जाती है। इस प्रकार हिमालय की इतनी गहरी जड़ धरातल के अंदर अति उच्च तापमान के कारण यथावत नहीं रह सकती। अतः इनका विचार भ्रामक है।

       एयरी के मत का दूसरा आलोचना यह है कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभों का औसत घनत्व एक समान है जबकि भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न स्तम्भों का घनत्व अलग-अलग है।

निष्कर्ष:

       एयरी के द्वारा भूसंतुलन के दिशा में किया गया यह प्रथम प्रयास था। उनके मत को “Uniform Density with Varying Depthness” (एक समान घनत्व के साथ बदलता हुआ गहराई) नामक सिद्धांत से भी जानते है। दूसरी एयरी के मत से यह भी स्पष्ट हुआ कि पहाड़ों के जड़ें होते है। इस तरह एयरी के विचार में कुछ खामियों के बावजूद विशेष महत्व रखता है।

प्रौट के मत

           प्रौट महोदय ने अपना विचार Royan Geography of Landform (1859 ई०) में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कल्याण एवं कल्याणपुर के बीच साहुल एवं त्रिभुजीकरण विधि से किये गए मापन के परिणाम में आये अंतर के संबंध में विचार प्रकट करते हुए कहा कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभो का घनत्व एक समान नहीं है बल्कि अलग-अलग है। जैसे- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व पठारी चट्टानों के घनत्व से कम है। पठारी चट्टानों का घनत्व मैदानी चट्टानों के घनत्व से कम है और मैदानी चट्टानों के घनत्व समुद्री भूपटल के घनत्व से कम है।

          प्रौट महोदय ने बताया कि पृथ्वी का सभी भू-स्तंभ एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है। उन्होंने ऊँचाई और घनत्व के बीच व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध  बताया अर्थात पृथ्वी के ऊपर स्थित भू-स्तंभ का घनत्व भले ही अलग-अलग हो लेकिन सभी भू-स्तंभ एक समान गहराई के साथ भूपृष्ठ में धँसे हुए है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित प्रयोग के माध्यम से पुष्टि करने का प्रयास किया है:-

चित्र: प्रौट का भू-संतुलन

         प्रौट अपने मत (Varying Density With Uniform Depth) को उपरोक्त चित्र के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभ के घनत्व अलग-अलग है और चित्रानुसार ही एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे सभी भू-स्तंभ संतुलित है।            

आलोचना

    बहुत से विद्वानों ने प्रौट के विचारों का आलोचना करते हुए कहा कि इनका मत एयरी के मत का ही संशोधित रूप है। कुछ विद्वानों ने यह भी कहा है कि भूपटल के विभिन्न भू-स्तंभ उस तरह से नहीं है जैसा कि विभिन्न धातुओं का उदाहरण देकर प्रौट ने बताया है। फिर भी इन आलोचनाओं के बावजूद क्षतिपूर्ति रेखा और विभिन्न घनत्व के निर्मित भू-स्तंभ भूसंतुलन संकल्पना की सराहनीय कदम है।                                                  

हिस्कानेन  का मत

        1933 ई०  में भूसंतुलन के संबंध में हिस्कानेन  अपना अवधारणा प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने एयरी तथा प्रौट के विचारों को संगठित रूप से प्रदर्शित किया। हिस्कानेन ने बताया कि समुद्री भूपटल की चट्टानों का घनत्व ऊँचे उठे हुए भूभाग से अधिक होता है। इन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि भूपटल के प्रत्येक स्तंभों में भी अलग-अलग गहराई पर घनत्व में परिवर्तन होता रहता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न स्तम्भों का घनत्व एवं उनकी लंबाई भी भिन्न-भिन्न होती है। इस अनुमान के आधार पर हिस्कानेन ने पुनः बताया कि अधिक घनत्व वाले भूस्तम्भ का लंबाई कम होगा और कम घनत्व वाले भूस्तम्भ की लंबाई अधिक होगी तथा भिन्न-भिन्न गहराई पर  भूस्तम्भों का घनत्व भी भिन्न-भिन्न होगी। लेकिन एक भू-स्तम्भ के नीचे जाने पर घनत्व बढ़ता जाएगा।

             इस तरह हिस्कानेन के मत से पर्वतों के जड़ की व्याख्या होती ही है साथ ही भू-स्तम्भों के विभिन्न भागों में घनत्व की विभिन्नता का भी समाधान प्रस्तुत करता है।

जौली का मत

         1925 ई०में जौली महोदय ने भूसंतुलन सिद्धान्त का प्रतिपादन कर यह स्पस्ट किया कि क्षतिपूर्ति तल की गहराई 100 KM  है। जौली के अनुसार भूपटल के ऊपरी भाग का घनत्व 2.7 है। इसके नीचे 16 KM गहरी पट्टी है। जिसमें पदार्थों के घनत्व में विभिन्नता पायी जाती है। इसका कारण औसत घनत्व 3 है। इसी 16 KM पट्टी के ऊपर कम घनत्व के पदार्थ पाये जाते है जिस प्रकार बर्फ पानी में तैरता हुआ अपने वजन के बराबर पानी हटाता है। ठीक उसी प्रकार महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपटल सीमा के ऊपर तैर रहे है।

              ये दोनों भूपटल अपने अपने वजन के अनुरूप भूपटल के नीचे स्थित सीमा के पदार्थों को विस्थापित करते है और एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित रहते है।

Isostasy

        भूसंतुलन का सिद्धांत कुछ संदर्भों में सही प्रतीत होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी प्रमाण मिले हैं जो भूसंतुलन सिद्धात के आधार पर व्याख्या नहीं किया जाता है। ऐसे में इस सिद्धांत पर प्रश्न चिन्ह खड़े किए जाते है। फिर भी पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तम्भों के मध्य पाया जाने वाला संतुलन का व्याख्या करने में यह सिद्धांत सक्षम है।


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4. Convection Current Theory of Holmes / होम्स का संवहन तरंग सिद्धांत

4. Convection Current Theory of Holmes

(होम्स का संवहन तरंग सिद्धांत)


Convection Current Theory of Holmes 

होम्स का संवहन तरंग सिद्धांत⇒Convection Current Theory of Holmes                            

           संवहन तरंग सिद्धांत सर्वप्रथम अर्थर होम्स ने सन 1928-29 में प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत के माध्यम से उन्होंने भूपटल की विभिन्न आकृतियों की उत्पत्ति की समस्या को स्पष्ट करने का प्रयास किया। संवहन तरंग सिद्धांत को प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत भी मान्यता प्रदान करता है। होम्स एवं प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत के अनुसार भूपटल के नीचे संवहन तरंग चल रही है। उठते हुए संवहन तरंग के कारण भूपटल या प्लेट का उत्थान होता है जबकि गिरते हुए संवहन तरंग के कारण भूसन्नति का निर्माण होता है।

       उन्होंने पृथ्वी की आंतरिक संरचना को मुख्यतः दो मण्डलों में विभाजित किया है- पहले मण्डल का नाम क्रस्ट और दूसरे का अध: स्तर दिया।

      क्रस्ट की रचना सियाल तथा सिमा के ऊपरी हिस्से से और अध: स्तर की रचना सीमा के निचले हिस्से से हुई है। संवहनीय तरंगों की उत्पत्ति चट्टानों में स्थित रेडियो-सक्रिय पदार्थों (यूरेनियम, थोरियम, रेडियम आदि) पर आधारित होती है। यद्यपि पृथ्वी के ऊपरी भाग में भी रेडियो सक्रिय पदार्थ अधिक मात्रा में पाए जाते हैं परंतु विकिरण द्वारा इस ताप का ह्रास होता रहता है। जबकि आंतरिक भाग में रेडियो सक्रिय पदार्थ कम होते हैं परंतु उनसे उत्पन्न ताप का संचयन होता रहता है जिसके कारण अत्यधिक तापमान हो जाता है। परिणामस्वरूप पृथ्वी के गर्भ में संवहन तरंगें उत्पन्न होकर ऊपर की ओर चलने की प्रवृत्ति रखती है। पृथ्वी के भूपटल के नीचे पहुँचने पर इनकी निम्नलिखित दो स्थितियाँ होती है –

(i) जिस स्थान पर दो संवहन तरंग अलग होकर एक-दूसरे के विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है वहाँ फैलाव होने से तनाव की शक्ति पैदा होती है। जिसके कारण स्थल भाग दो खंडों में विभक्त होकर विपरीत दिशाओं में हट जाते हैं तथा बीच वाले खुले भाग में सागर का निर्माण हो जाता है। इस प्रकार महाद्वीपों में प्रवाह होता है।

(ii) जिस स्थान पर दो केंद्रों से ऊपर उठने वाली संवहनीय तरंगे पृथ्वी की भूपर्पटी के नीचे पँहुचने के बाद मुड़कर क्षैतिज दिशा में प्रवाहित होकर एक-दूसरे से मिलती है तो अभिसरण के कारण दबाव की शक्ति उत्पन्न होती है, परिणामस्वरूप धरातल में होने वाले अवतलन से भूसन्नति का निर्माण होता है।

पर्वत निर्माण की प्रक्रिया:-

     महाद्वीपों तथा महासागरों दोनों के नीचे संवहनीय तरंगों की उत्पत्ति होती है लेकिन महाद्वीपों के नीचे से उठने वाले संवहनीय तरंग अधिक तीव्र होती है क्योंकि महाद्वीपों की चट्टानों में रेडियो-सक्रिय पदार्थ अधिक होते हैं संवहन तरंगों की उत्पत्ति कई केंद्रों से होती है तथा यह उत्पत्ति केंद्र बदलते रहते हैं। महाद्वीपों तथा महासागरों के नीचे से उठने वाली आरोही संवहन तरंग जब जलमग्न तट के नीचे मिलकर मुड़ती है तो संपीडन के कारण इस भाग का अवतलन होता है तथा भूसन्नति का निर्माण होता है।

       इस तरह भूसन्नति की स्थिति गिरते स्तंभ के ऊपर या अवरोही तरंगों के ऊपर होती है। आरोही तरंगे महाद्वीपों तथा महासागरीय तली के नीचे कुछ भागों को उच्च तापक्रम के कारण पिघलाकर उन्हें भूसन्नति में जमा करने लगती है। इस तरह महाद्वीपीय परत पतली होने लगती है। लगातार संपीड़न तथा तलछटीय निक्षेप के कारण भूसन्नति में निरंतर धँसाव होता रहता है। संवहनीय तरंगों की क्रिया चक्रीय होती है तथा इसी के दौरान भूसन्नति का निर्माण, पर्वत की उत्पत्ति तथा उसका उत्थान होता है।

     संवहन धाराओं के द्वारा पर्वत निर्माण की प्रक्रिया को समझाते हुए होम्स ने निम्नलिखित तीन अवस्थाओं  का जिक्र किया है-

1. प्रथम अवस्था (भूसन्नति निर्माण की अवस्था)-

◆ प्रथम अवस्था का समय सबसे लंबा होता है, जिसके अंतर्गत दो केंद्रों से आने वाली संवहनीय तरंगे मिलकर जलमग्न तटों के नीचे भूसन्नति का निर्माण करती है।

◆ इस अवस्था में तरंगे लगातार तीव्र होती जाती है।

◆ इस अवस्था में भूसन्नति में तलछटीय जमाव होता रहता है, जिससे भूसन्नति की तली निरंतर धँसती जाती है।

◆ पृथ्वी की आंतरिक तापमान तथा मलबों के दबाव के कारण गहराई वाले पदार्थ गर्म होने लगते हैं, फलस्वरूप उनका घनत्व बढ़ता जाता है तथा उसका पुनः धँसाव होता है। इस प्रकार कुछ ताप रूपांतरण के समय खर्च हो जाता है जिससे ताप का अधिक संचय नहीं हो पाता है।

2. द्वितीय अवस्था (पर्वत निर्माण की अवस्था)-

◆ द्वितीय अवस्था का अल्प समय होता है।

◆ इस अवस्था में संवहनीय तरंगों की गति काफी तीव्र हो जाती है, जिसका मुख्य कारण गिरते स्तंभ में ठंडे पदार्थों का अवतलन तथा उठते स्तंभ में तप्त पदार्थों का प्रवाहित होना है।

◆ महाद्वीपों तथा महासागरों की ओर से आने वाली तरंगें तीव्र गति से मिलकर नीचे मुड़ती है जिससे भूसन्नति के मलबे पर संपीडनात्मक बल लगता है, फलस्वरुप भूसन्नति का मलबा वलित होकर पर्वतों का निर्माण करती है।

3. तृतीय अवस्था (पर्वत उत्थान की अवस्था)-

      अंतिम अवस्था में संवहनीय तरंगे क्रमशः कमजोर होने लगती है जिसका प्रमुख कारण गिरते स्तम्भ में गर्म पदार्थों का अंत तथा उठते स्तम्भ में ठंडे पदार्थों का उठना है। धीरे-धीरे समस्त उठता स्तंभ ठंडा हो जाता है जिसके कारण संवहन तरंगे समाप्त होने के साथ ही उनकी समस्त प्रक्रिया भी समाप्त हो जाती है। इसके निम्नलिखित परिणाम होते हैं :-

(i) निक्षेपण के समाप्त हो जाने से गिरते स्तम्भ के ऊपर दबाव कम हो जाता है, जिसके कारण गिरते स्तंभ के पदार्थ धीरे-धीरे उठने लगते हैं तथा पर्वतों में उत्थान प्रारंभ हो जाता है।

(ii) दबाव के कम हो जाने से भारी पदार्थ जो नीचे दब गए थे, अब ऊपर उठने लगते हैं जिससे पर्वतों में पुन: उत्थान होने लगता है।

     इस प्रकार इस सिद्धांत के आधार पर पर्वत निर्माण की अवस्था भली-भाँति स्पष्ट हो जाती है।

आलोचना:-

        इस सिद्धांत में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

◆ उठते तथा गिरते स्तंभ की धारणा संदेहास्पद है।

◆ संवहन तरंगे पृथ्वी के अंदर ताप-प्रवणता तथा रेडियो-सक्रिय पदार्थों पर आधारित है, जिनके विषय में जानकारी बहुत कम है।

◆ क्रस्ट के नीचे संवहन तरंगों का क्षैतिज प्रवाह संदेहास्पद है।

◆ रूपांतरण द्वारा भारी पदार्थों का नीचे की ओर धँसाव एक भ्रामक समस्या है।

◆ इस सिद्धांत के अनुसार संवहन तरंगों का उत्पत्ति महाद्वीपों के नीचे कुछ सीमित केंद्रों पर ही होगा। यदि इन तरंगों की उत्पत्ति के लिए आवश्यक दशाएँ प्राप्त है तो तरंगों की उत्पत्ति प्रत्येक स्थान पर क्यों नहीं होता है। यदि यह संभव है तो समस्त महाद्वीप कई टुकड़ों में विभक्त हो जाएंगे तथा समस्त ग्लोब पर केवल सागरीय क्षेत्र ही होगा। इस तरह यह सिद्धांत संवहन तरंगों के विषय में गलत विवरण प्रस्तुत करता है।

◆ आरोही तरंगे क्रस्ट के नीचे मुड़कर क्षैतिज रूप से न चलकर ऊपर भी चल सकती है। ऐसी स्थिति में तरंगे भूपटल को तोड़कर भयंकर विस्फोट से धरातल पर ज्वालामुखी क्रिया को जन्म देगी न कि तनाव द्वारा सागर का निर्माण करेगी।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार स्पष्ट है कि संवहन तरंग सिद्धांत कई आलोचनाओं के बावजूद काफी महत्वपूर्ण सिद्धांत है क्योंकि इसके माध्यम से भूपटल की आकृतियों की उत्पत्ति की समस्या का समाधान किया जा सकता है। यह सभी प्रकार के पर्वतों की उत्पत्ति एवं उनके विकास का वैज्ञानिक विश्लेषण भी करता है।



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3. GEOSYNCLINE OROGEN THEORY-KOBER (भुसन्नत्ति पर्वतोत्पत्ति सिद्धांत-कोबर)

3. GEOSYNCLINE OROGEN THEORY-KOBER


        कोबर महोदय ने मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के सम्बंध में भूसन्नति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इस संकल्पना के विकास का प्रथम प्रयास हॉल और डाना महोदय द्वारा किया गया, लेकिन एक सिद्धांत के रूप में इस संकल्पना का प्रतिपादन सर्वप्रथम हॉग महोदय द्वारा किया गया। कोबर ने वलित पर्वतों की उत्पत्ति के संबंध में भू-सन्नति सिद्धांत का प्रतिपादन किया। कोबर के अनुसार भूपटलीय चट्टानें लचीली होती है, जब चट्टानों पर दबाव शक्ति कार्य करती है तो भूपटलीय चट्टानें मुड़कर भुसन्नति या मोड़दार पर्वत का निर्माण करती है। 

       भू-सन्नतियां लंबे, संकरे तथा उथले जलीय भाग होती है, जिनमें तलछटीय निक्षेप के साथ-साथ तली में धंसाव होता है। वर्तमान समय में प्राय: सभी विद्वानों की यह मान्यता है कि प्राचीन और नवीन वलित पर्वतों का आविर्भाव भू-सन्नतियाँ से हुआ है। जैसे- रॉकी भूसन्नति से रॉकी पर्वत, यूराल भू-सन्नति से यूराल पर्वत तथा टेथिस भू-सन्नति से महान हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ। भू-सन्नतियों का पर्वत निर्माण से संबंध होने के कारण कोबर ने इन्हें ‘पर्वत निर्माण स्थल’ या “पर्वतों का पालना” (Orogen) कहा है।

कोबर का भूसन्नति सिद्धांत

           वास्तव में उनका मुख्य उद्देश्य प्राचीन दृढ़ भूखंडों तथा भू-सन्नतियों (Geosyncline) में संबंध स्थापित करना था। इनका सिद्धांत संकुचन शक्ति पर आधारित है। पृथ्वी में संकुचन होने से उत्पन्न बल से अग्रदेशों में गति उत्पन्न होती है, जिससे प्रेरित होकर सम्पिडनात्मक बल के कारण भूसन्नति का मलवा वलीत होकर पर्वत का रूप धारण करता है। जहाँ पर आज पर्वत है, वहां पर पहले भू-सन्नतियां थी, जिन्हें कोबर ने पर्वत निर्माण स्थल बताया। इन भू-सन्नतियों के चारों ओर प्राचीन दृढ़ भूखण्ड (क्रैटोजेन) को ‘अग्रदेश’ बताया है, कोबर के अनुसार भूसन्नतिया लंबे तथा चौड़े जलपूर्ण गर्त थी।

         प्रत्येक भूसन्नति के किनारे पर दृढ़ भूखंड होते हैं, जिन्हें कोबर ने अग्रदेश (Foreland) बताया। इन दृढ़ भूखंडों के अपरदन से प्राप्त मलवा का नदियों द्वारा भूसन्नति में धीरे-धीरे जमा होता रहता है। अवसादों के जमाव के कारण भार में वृद्धि होने से भूसन्नति की तली में निरंतर धंसाव होता जाता है, इसे अवतलन की क्रिया कहते हैं। इन दोनों क्रियाओं के लंबे समय तक चलते रहने के कारण भूसन्नति में मलबों का जमाव अत्यंत गहराई तक हो जाती है तथा अधिक मात्रा में मलबा का निक्षेप हो जाता है। 

     जब भूसन्नति भर जाती है तो पृथ्वी के संकुचन से उत्पन्न क्षैतिज संपीडनात्मक बल के कारण भूसन्नति के दोनों अग्रदेश एक-दूसरे की ओर खिसकने लगते हैं। इसे पर्वत निर्माण की अवस्था कहते हैं। भूसन्नति के दोनों किनारों पर दो पर्वत श्रेणियों का निर्माण होता है, जिन्हें कोबर ने ‘रेन्डकेटेन’ (Rendketten) नाम दिया है। यदि संपीड़न का बल सामान्य होता है तो केवल किनारे वाले भाग ही वलित होते हैं तथा बीच का भाग वलन से अप्रभावित रहता है। इस अप्रभावित भाग को कोबर ने स्वाशिनवर्ग की संंज्ञा प्रदान की है, जिसे सामान्य रूप में मध्य पिंड (Median Mass) कहा जाता है। जब संपीडन का बल सर्वाधिक सक्रिय होता है तो भूसन्नति का संपूर्ण मलबा वलित होकर एक जटिल पर्वतमाला के रूप में परिवर्तित हो जाता है, जिसे नार्बे (Narbe) कहते है। ऐसी स्थिति मध्यपिंड का निर्माण नहीं होता है।

GEOSYNCLINE OROGEN THEORY-KOBER

        कोबर ने अपने विशिष्ट मध्य पिंड के आधार पर विश्व के वलित पर्वतों की संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। टेथीस भूसन्नति के उत्तर में यूरोप का स्थलीय भाग तथा दक्षिण में अफ्रीका का दृढ़ भूखण्ड था। इन दोनों अग्रदेशों के आमने-सामने सरकने के कारण अल्पाइन पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। अफ्रीका के उत्तर की ओर सरकने के कारण बेटीक कार्डिलरा, पेरेनिज प्राविन्स श्रेणियां, मुख्य आल्प्स, कार्पेथियंस, बाल्कन पर्वत तथा काकेशस का निर्माण हुआ।

   कोबर ने कई उदाहरणों के द्वारा अपने सिद्धांत को पुष्ट भी किया है। जैसे- हिमालय तथा कुनलून के बीच तिब्बत का पठार, टॉरस श्रेणी एवं पौंटिक श्रेणी के मध्य अनातोलिया का पठार, एल्बुर्ज एवं जैग्रोस पर्वत के मध्य ईरान का पठार, पिरेनीज श्रेणी (यूरोप) और एटलस पर्वत (अफ्रीका) के बीच भूमध्य सागर मध्यपिंड के रूप में है। इस तरह कोबर ने अपने सिद्धांत में मध्य पिंड की कल्पना करके पर्वतीकरण को उचित ढंग से समझाने का प्रयास किया है तथा मध्य पिंड की यह कल्पना कोबर के विशिष्ट पर्वत निर्माण स्थल की अच्छी तरह व्याख्या करती हैं। 

           हिमालय के निर्माण के विषय में कोबर ने बताया है कि पहले टेथि सागर था जिसके उतर में अंगारालैंड तथा दक्षिण में गोंडवाना लैंड अग्रदेश के रूप में थे। इयोसीन युग में दोनों आमने-सामने सरकने लगे, जिस कारण टेथिस के दोनों किनारों पर तलछट पर वलन पड़ने से उत्तर में कुनलुन पर्वत तथा दक्षिण में हिमालय की उत्तरी श्रेणी का निर्माण हुआ तथा दोनों के बीच तिब्बत का पठार मध्य पिंड के रूप में बचा रहा। आगे चलकर मध्य हिमालय तथा लघु शिवालिक श्रेणियों का भी निर्माण हुआ।

आलोचना

     यद्यपि कोबर महोदय ने पर्वतों के निर्माण को भली-भांति समझाने का प्रयास किया तथापि उसके भुसन्नत्ति सिद्धान्त में कुछ दोष पाये जाते है, जिनका उल्लेख निम्नलिखित है।-

1. पर्वतों के निर्माण के लिये पृथ्वी के सिकुड़ने से पैदा होने वाले जिस बल का वर्णन कोबर ने किया है, वह अपर्याप्त है।

2. कोबर के अनुसार भुसन्नत्ति के दोनों किनारे सरकते है जबकि स्वेस का मतानुसार भुसन्नति का एक ही किनारा सरकता है।

3. कोबर के सिद्धान्त से पूर्व-पश्चिम दिशा में फैले हुए पर्वतों (हिमालय,आल्पस) का स्पष्टीकरण तो हो जाता है, परन्तु उत्तर-दक्षिण दिशा में फैले पर्वतों (रॉकी, एंडिज) का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता है।



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2. Best Internal Structure of The Earth / पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Internal Structure of The Earth

(पृथ्वी की आंतरिक संरचना)

पृथ्वी की आंतरिक संरचना⇒Internal Structure of The Earth               

          पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवं भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

चित्र: स्वेस के अनुसार पृथ्वी की आंतरिक संरचना

(1) सियाल (SIAL) 

       पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

    स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

      पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना

(Internal Structure of the Earth Based on Seismic Evidence):-

     भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है-

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भू-प्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

      यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:-

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भू-प्रावार (Mantle):-

       भू-प्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है। 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

       यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:- 

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।


MCQs/UGC NET/JRF Quick Revision

1. पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाणों की तुलना में अप्रत्यक्ष प्रमाण अधिक महत्वपूर्ण क्यों हैं?

Why are indirect evidences more important than direct evidences for understanding Earth’s interior?

(A) पृथ्वी के केंद्र तक प्रत्यक्ष रूप से पहुँचना संभव नहीं है / Direct access to Earth’s center is not possible

(B) सभी प्रत्यक्ष प्रमाण गलत हैं / All direct evidences are incorrect

(C) केवल surface rocks ही उपलब्ध हैं / Only surface rocks are available

(D) पृथ्वी की सतह पर कोई शैल नहीं मिलती / No rocks are found at the surface

Answer: (A)

2. निम्न में से कौन-सा पृथ्वी के आंतरिक भाग का सबसे महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष प्रमाण है?

Which is one of the most important indirect evidences of Earth’s interior?

(A) Seismic waves

(B) River sediments

(C) Atmospheric pressure

(D) Ocean tides

Answer: (A)

3. भूकंपीय तरंगों के संदर्भ में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding seismic waves?

(A) P-waves केवल solids में चलती हैं।

(B) S-waves केवल solids में propagate करती हैं।

(C) दोनों P और S waves केवल liquids में चलती हैं।

(D) S-waves gases में सबसे तेज चलती हैं।

Answer: (B)

4. P-wave और S-wave के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर क्या है?

What is the most important difference between P-waves and S-waves?

(A) P-waves compressional होती हैं, जबकि S-waves shear/transverse होती हैं।

(B) P-waves केवल liquids में चलती हैं।

(C) S-waves solids और liquids दोनों में समान रूप से चलती हैं।

(D) दोनों की प्रकृति बिल्कुल समान है।

Answer: (A)

5. यदि किसी पृथ्वी के आंतरिक layer में S-waves प्रवेश नहीं करती हैं, तो इससे क्या संकेत मिलता है?

If S-waves do not pass through a particular layer of Earth, what does this indicate?

(A) वह layer पूर्णतः solid है।

(B) वह layer liquid या shear waves को support न करने वाली अवस्था में है।

(C) वहाँ pressure शून्य है।

(D) वहाँ कोई पदार्थ नहीं है।

Answer: (B)

6. पृथ्वी के बाह्य क्रोड (Outer Core) के liquid होने का प्रमुख भूकंपीय प्रमाण क्या है?

What is the major seismic evidence for the liquid nature of Earth’s outer core?

(A) S-waves का outer core से होकर न गुजरना

(B) P-waves का mantle में न जाना

(C) Surface waves का समाप्त होना

(D) केवल gravity anomalies

Answer: (A)

7. पृथ्वी के आंतरिक क्रोड (Inner Core) के solid होने के समर्थन में कौन-सा प्रमाण महत्वपूर्ण है?

Which evidence supports the solid nature of Earth’s inner core?

(A) Inner core में S-wave-related behavior और seismic-wave observations

(B) Ocean currents

(C) Atmospheric circulation

(D) Surface temperature

Answer: (A)

8. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संदर्भ में Mohorovičić Discontinuity (Moho) किसे अलग करती है?

What does the Mohorovičić Discontinuity (Moho) separate?

(A) Crust और mantle

(B) Mantle और outer core

(C) Outer core और inner core

(D) Lithosphere और atmosphere

Answer: (A)

9. Gutenberg Discontinuity किसके बीच स्थित है?

The Gutenberg Discontinuity occurs between:

(A) Crust और mantle

(B) Mantle और outer core

(C) Outer core और inner core

(D) Lithosphere और asthenosphere

Answer: (B)

10. Lehmann Discontinuity मुख्यतः किससे संबंधित है?

Lehmann Discontinuity is mainly associated with:

(A) Crust–mantle boundary

(B) Mantle–outer core boundary

(C) Outer core–inner core boundary

(D) Lithosphere–asthenosphere boundary

Answer: (C)

11. पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग कितनी है?

What is the approximate mean radius of the Earth?

(A) 3,371 km

(B) 5,371 km

(C) 6,371 km

(D) 8,371 km

Answer: (C)

12. पृथ्वी की आंतरिक संरचना को रासायनिक आधार पर मुख्यतः किन layers में विभाजित किया जाता है?

On a compositional basis, Earth is mainly divided into which layers?

(A) Crust, Mantle और Core

(B) Lithosphere, Atmosphere और Hydrosphere

(C) Troposphere, Stratosphere और Mesosphere

(D) Ocean, Continent और Island

Answer: (A)

13. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के mechanical/rheological classification में कौन-सा समूह अधिक उपयुक्त है?

Which is more appropriate in the mechanical/rheological classification of Earth’s interior?

(A) Lithosphere, Asthenosphere, Mesosphere, Outer Core, Inner Core

(B) Crust, River, Ocean, Atmosphere

(C) Mantle, Ocean, Glacier, Soil

(D) Core, Troposphere, Biosphere, Hydrosphere

Answer: (A)

14. Lithosphere की सबसे उपयुक्त विशेषता क्या है?

What is the most appropriate characteristic of the lithosphere?

(A) यह rigid outer shell है जिसमें crust और uppermost mantle शामिल होते हैं।

(B) यह केवल liquid core है।

(C) यह केवल oceanic crust से बनी है।

(D) यह पूरी तरह molten layer है।

Answer: (A)

15. Asthenosphere के संदर्भ में कौन-सा कथन अधिक उपयुक्त है?

Which statement is most appropriate regarding the asthenosphere?

(A) यह relatively weak/ductile zone है जो lithosphere के नीचे स्थित है।

(B) यह Earth’s inner core का दूसरा नाम है।

(C) यह atmosphere की सबसे निचली layer है।

(D) यह पूर्णतः rigid zone है।

Answer: (A)

16. Plate tectonics में Asthenosphere का महत्व मुख्यतः किस कारण है?

Why is the asthenosphere important in plate tectonics?

(A) इसकी relative ductility lithospheric plates के movement को facilitate करती है।

(B) यह पूरी तरह solid और immobile है।

(C) यह Earth’s magnetic field को directly generate करती है।

(D) यह केवल oceanic water store करती है।

Answer: (A)

17. Continental crust और oceanic crust के बीच कौन-सा अंतर सही है?

Which difference between continental and oceanic crust is correct?

(A) Continental crust सामान्यतः thicker और less dense होती है।

(B) Oceanic crust सामान्यतः thicker और less dense होती है।

(C) दोनों की thickness और density बिल्कुल समान है।

(D) Continental crust हमेशा basaltic होती है।

Answer: (A)

18. Oceanic crust का प्रमुख compositional association किससे है?

Oceanic crust is primarily associated compositionally with:

(A) Basaltic rocks

(B) Granitic rocks only

(C) Limestone only

(D) Coal

Answer: (A)

19. Continental crust का सामान्यतः कौन-सा rock association अधिक प्रसिद्ध है?

Which rock association is commonly associated with continental crust?

(A) Granitic/felsic composition

(B) केवल basaltic composition

(C) केवल ultramafic composition

(D) केवल metallic composition

Answer: (A)

20. पृथ्वी की सबसे मोटी आंतरिक layer कौन-सी है?

Which is the thickest major compositional layer of Earth?

(A) Crust

(B) Mantle

(C) Outer Core

(D) Inner Core

Answer: (B)

21. Mantle की प्रमुख mineralogical composition में कौन-सा तत्व समूह अधिक महत्वपूर्ण है?

Which elemental group is particularly important in the mantle’s composition?

(A) Magnesium और iron-rich silicate minerals

(B) केवल gold और silver

(C) केवल carbon

(D) केवल sodium chloride

Answer: (A)

22. Core की composition के संदर्भ में कौन-सा कथन अधिक स्वीकार्य है?

Which statement is more acceptable regarding the composition of the core?

(A) Iron और nickel सहित metallic elements का प्रमुख योगदान है।

(B) यह केवल silicate rocks से बना है।

(C) यह केवल water से बना है।

(D) इसमें कोई metallic element नहीं है।

Answer: (A)

23. पृथ्वी के केंद्र की ओर density बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?

What is a major reason for increasing density toward Earth’s center?

(A) Increasing pressure और denser materials का concentration

(B) Gravity का समाप्त होना

(C) Temperature का हमेशा कम होना

(D) Water content का अत्यधिक बढ़ना

Answer: (A)

24. पृथ्वी के आंतरिक भाग में pressure के बारे में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct about pressure inside Earth?

(A) सामान्यतः depth के साथ pressure बढ़ता है।

(B) Depth के साथ pressure हमेशा घटता है।

(C) Center पर pressure शून्य होता है।

(D) Pressure केवल crust में पाया जाता है।

Answer: (A)

25. पृथ्वी के अंदर तापमान के संबंध में सामान्य प्रवृत्ति क्या है?

What is the general trend of temperature inside Earth?

(A) Depth के साथ सामान्यतः तापमान बढ़ता है।

(B) Depth के साथ तापमान हमेशा घटता है।

(C) पूरे Earth में temperature समान है।

(D) Core का तापमान surface से कम है।

Answer: (A)

26. Geothermal gradient का अर्थ क्या है?

What is meant by geothermal gradient?

(A) Depth के साथ temperature में परिवर्तन की दर

(B) Latitude के साथ rainfall में परिवर्तन

(C) Longitude के साथ pressure का परिवर्तन

(D) Surface पर gravity का absolute value

Answer: (A)

27. निम्न में से कौन-सा पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी का अप्रत्यक्ष स्रोत नहीं है?

Which is NOT an indirect source of information about Earth’s interior?

(A) Seismic waves

(B) Gravity anomalies

(C) Magnetic field

(D) Deep borehole observations

Answer: (D)

28. Gravity anomalies पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में क्या संकेत दे सकती हैं?

What can gravity anomalies indicate about Earth’s interior?

(A) Subsurface density variations

(B) केवल atmospheric humidity

(C) केवल ocean salinity

(D) केवल rainfall distribution

Answer: (A)

29. Earth’s magnetic field का अस्तित्व किस प्रकार के internal process से विशेष रूप से जुड़ा है?

Earth’s magnetic field is particularly associated with which internal process?

(A) Outer core में electrically conducting fluid की motion

(B) Crust में rainfall

(C) Mantle में केवल solidification

(D) Atmosphere में cloud formation

Answer: (A)

30. Geodynamo theory के अनुसार Earth’s magnetic field मुख्यतः किससे संबंधित है?

According to the geodynamo theory, Earth’s magnetic field is mainly related to:

(A) Electrically conducting fluid motion in the outer core

(B) केवल crustal weathering

(C) केवल ocean currents

(D) केवल atmospheric circulation

Answer: (A)

31. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. P-waves solids और liquids दोनों से गुजर सकती हैं।

2. S-waves liquids से नहीं गुजरती हैं।

3. P-waves, S-waves की तुलना में generally faster होती हैं।

सही विकल्प चुनिए:

(A) केवल 1

(B) 1 और 2

(C) 2 और 3

(D) 1, 2 और 3

Answer: (D)

32. निम्नलिखित में से कौन-से पृथ्वी के आंतरिक भाग के अध्ययन के indirect evidences हैं?

1. Seismic waves

2. Gravity

3. Geomagnetism

4. Meteorites

(A) केवल 1 और 2

(B) 1, 2 और 3

(C) 2, 3 और 4

(D) 1, 2, 3 और 4

Answer: (D)

33. निम्नलिखित में से कौन-से पृथ्वी की compositional layers हैं?

1. Crust

2. Mantle

3. Core

4. Asthenosphere

(A) केवल 1 और 2

(B) 1, 2 और 3

(C) 2, 3 और 4

(D) 1, 2, 3 और 4

Answer: (B)

34. Assertion (A): S-waves outer core से होकर नहीं गुजरती हैं।

Reason (R): S-waves को propagate करने के लिए shear strength वाला medium चाहिए, जबकि outer core predominantly liquid है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

35. Assertion (A): पृथ्वी के center की ओर density सामान्यतः बढ़ती है।

Reason (R): Increasing pressure तथा denser metallic materials का concentration interior में अधिक है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

36. Assertion (A): Oceanic crust सामान्यतः continental crust से अधिक dense होती है।

Reason (R): Oceanic crust में basaltic/mafic composition का प्रभुत्व होता है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

37. Assertion (A): Lithosphere और Asthenosphere की mechanical properties अलग होती हैं।

Reason (R): Lithosphere relatively rigid है, जबकि Asthenosphere comparatively weak/ductile behavior प्रदर्शित करती है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

38. निम्नलिखित का सही मिलान कीजिए:

सूची-I सूची-II
A. Moho 1. Crust–Mantle boundary
B. Gutenberg 2. Mantle–Outer Core boundary
C. Lehmann 3. Outer Core–Inner Core boundary
D. Asthenosphere 4. Weak/ductile zone

(A) A-1, B-2, C-3, D-4

(B) A-2, B-1, C-4, D-3

(C) A-1, B-3, C-2, D-4

(D) A-4, B-2, C-3, D-1

Answer: (A)

39. निम्नलिखित का सही मिलान कीजिए:

सूची-I सूची-II
A. P-wave 1. Compressional
B. S-wave 2. Shear
C. Surface wave 3. Near-surface propagation
D. Geodynamo 4. Magnetic field generation
(A) A-1, B-2, C-3, D-4

(B) A-2, B-1, C-4, D-3

(C) A-3, B-2, C-1, D-4

(D) A-4, B-3, C-2, D-1

Answer: (A)

40. निम्न में से कौन-सा गलत सुमेलित है?

Which is incorrectly matched?

(A) Moho – Crust-Mantle boundary

(B) Gutenberg – Mantle-Core boundary

(C) Lehmann – Outer Core-Inner Core boundary

(D) Asthenosphere – Rigid metallic inner core

Answer: (D)

41. निम्न में से कौन-सा गलत सुमेलित है?

Which is incorrectly matched?

(A) P-wave – Primary wave

(B) S-wave – Secondary wave

(C) P-wave – Shear wave

(D) S-wave – Transverse wave

Answer: (C)

42. यदि किसी seismic wave की velocity अचानक बढ़ जाती है, तो यह किसकी ओर संकेत कर सकता है?

If the velocity of a seismic wave suddenly increases, what may it indicate?

(A) Material properties/density या rigidity में परिवर्तन वाली discontinuity

(B) पृथ्वी के rotation का रुकना

(C) केवल atmospheric pressure में परिवर्तन

(D) केवल rainfall में परिवर्तन

Answer: (A)

43. Seismic wave velocity मुख्यतः किन factors से प्रभावित होती है?

Seismic wave velocity is mainly influenced by which factors?

(A) Elastic properties, density, pressure और temperature

(B) केवल rainfall

(C) केवल latitude

(D) केवल ocean currents

Answer: (A)

44. पृथ्वी के आंतरिक भाग में seismic waves के refraction और reflection का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

Why are refraction and reflection of seismic waves important in studying Earth’s interior?

(A) इससे internal boundaries और material changes का अनुमान लगाया जा सकता है।

(B) इससे केवल surface rainfall ज्ञात होती है।

(C) इससे केवल atmospheric composition ज्ञात होती है।

(D) इससे केवल ocean depth ज्ञात होती है।

Answer: (A)

45. यदि P-wave किसी boundary पर refract होती है और velocity में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है, तो इसका सबसे उपयुक्त interpretation क्या होगा?

If a P-wave refracts at a boundary and shows a marked change in velocity, what is the most appropriate interpretation?

(A) वहाँ material properties में बदलाव वाली internal discontinuity हो सकती है।

(B) वहाँ atmosphere समाप्त हो गया है।

(C) वहाँ gravity समाप्त हो गई है।

(D) वहाँ कोई material मौजूद नहीं है।

Answer: (A)

46. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संदर्भ में shadow zone किससे संबंधित है?

In the context of Earth’s internal structure, what is a seismic shadow zone associated with?

(A) कुछ angular distances पर seismic waves के direct arrival का अभाव/कमजोरी

(B) केवल solar eclipse

(C) केवल atmospheric shadow

(D) केवल oceanic tides

Answer: (A)

47. P-wave shadow zone का प्रमुख कारण क्या है?

What is a major cause of the P-wave shadow zone?

(A) Core boundary पर strong refraction और outer core की seismic properties

(B) Atmosphere का पूर्ण अभाव

(C) केवल continental drift

(D) केवल ocean currents

Answer: (A)

48. Meteorites को पृथ्वी के interior के अध्ययन में उपयोगी क्यों माना जाता है?

Why are meteorites considered useful in studying Earth’s interior?

(A) वे Solar System के प्रारंभिक पदार्थ और planetary composition के बारे में clues प्रदान कर सकते हैं।

(B) वे सीधे Earth’s core से बाहर आते हैं।

(C) वे केवल atmospheric gases से बने हैं।

(D) उनका Earth की composition से कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

49. यदि किसी planet के interior में S-waves का एक बड़े क्षेत्र में propagation नहीं होता, तो सबसे तार्किक inference क्या होगा?

If S-waves do not propagate through a large internal region of a planet, what is the most logical inference?

(A) उस region में liquid या बहुत कमजोर shear strength वाला material हो सकता है।

(B) पूरा planet gaseous है।

(C) उस planet में gravity नहीं है।

(D) वहाँ temperature शून्य है।

Answer: (A)

50. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के लिए सबसे व्यापक और वैज्ञानिक approach कौन-सा है?

Which is the most comprehensive scientific approach for studying Earth’s internal structure?

(A) केवल surface rocks का अध्ययन

(B) केवल volcanic eruptions का अध्ययन

(C) Seismology + gravity + geomagnetism + heat flow + meteorites + geological evidence का संयुक्त अध्ययन

(D) केवल atmospheric observations

Answer: (C)

UGC NET/JRF Quick Revision

Concept Key Point
Crust पृथ्वी की सबसे बाहरी compositional layer
Mantle सबसे मोटी major compositional layer
Core मुख्यतः metallic, Fe-Ni rich
Outer Core Predominantly liquid
Inner Core Predominantly solid
Moho Crust–Mantle boundary
Gutenberg Mantle–Outer Core boundary
Lehmann Outer Core–Inner Core boundary
P-Wave Compressional, fastest body wave
S-Wave Shear, liquids में propagate नहीं करती
Lithosphere Rigid outer mechanical layer
Asthenosphere Relatively weak/ductile zone
Geothermal Gradient Depth के साथ temperature change
Gravity Anomaly Subsurface density variation
Geomagnetism Earth’s magnetic field से संबंधित
Geodynamo Outer core में conducting fluid motion
Shadow Zone Seismic-wave behavior से संबंधित
Meteorites Planetary/Solar System composition के clues

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1. Origin Of The Earth / पृथ्वी की  उत्पति

1. Origin Of The Earth / पृथ्वी की  उत्पति



Origin Of The Earth / पृथ्वी की  उत्पति⇒

● हमारी पृथ्वी का निर्माण 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ। पृथ्वी के उत्पति के संदर्भ में कई सिद्धान्त दिए गए है। पहला सिद्धान्त  ‘कास्ते-द-बफन’ के द्वारा प्रतिपादित किया गया था।

● उन्होंने 1749 ई० में ‘पुच्छल तारा परिकल्पना’ (Comet Hyppothesis) प्रस्तुत किया।

● इनके सिद्धान्त के बाद कई विद्वानों ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

● इन सिद्धांतों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कुछ विद्वानों का मानना है कि हमारी पृथ्वी / सौरमंडल के निर्माण में केवल एक ही तारा का योगदान है जबकि कुछ लोगों के मतानुसार हमारे पृथ्वी के निर्माण में एक से अधिक तारों का योगदान है।

● तारों की संख्या के आधार पर सभी सिद्धान्तों को दो भागों में बाँटते है।

(A)अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic Concept):-

● इसमें एक ही तारे से सम्पूर्ण ग्रहों की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया है।

● इसे (पैतृक संकल्पना) भी कहते है। इसके अनुसार सम्पूर्ण ग्रहों  की उत्पत्ति में एक ही पिता तारे की भूमिका रही है।

● इस संकल्पना पर चार सिद्धान्त दिए गए है:-

1. पुच्छलतारा परिकल्पना (1749)- कास्ते-द-बफन

2. वायव्य राशि परिकल्पना (1755)- इमैनुएल कांट

3. निहारिका परिकल्पना (1796)- लाप्लास

4. उल्कापिंड परिकल्पना (1919)– लॉकियर

(B) द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic Concept):-

● इस संकल्पना में ग्रहों की उत्पति दो तारों से मानी गई है।

● इस सिद्धांत के अनुसार ग्रहों की उत्पति को आकस्मिक घटना से जोड़ा जाता है।

● द्वैतवादी संकल्पना पर आधारित प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित है:

1. ग्रहाणु परिकल्पना (1905)- टी०सी० चैम्बरलिन

2.ज्वारीय परिकल्पना (1919)- जेम्स जीन्स एवं जेफरीज

3. द्वैतारक परिकल्पना- एच० एन० रसेल

4. विखण्डन का सिद्धान्त- रॉसजन

5. विधुत चुम्बकीय परिकल्पना- डॉ० आल्फवेन

6.निहारिका मेघ सिद्धान्त (1974)- डॉ० वॉन विजसैकर

7. नवतारा परिकल्पना-  फ्रेड होयल एवं लिटिलटन 

8. अन्तरतारक धूलकण परिकल्पना- ऑटो श्मिड

9. सिफीड संकल्पना- ए० सी० बनर्जी

10. घूर्णन एवं ज्वारीय परिकल्पना- रॉसजन

11. वृहस्पति- सूर्य द्वैतारक- ई० एम० ड्रोवीशेवस्की

● पृथ्वी सौरमण्डल का एक ग्रह है। सौरमण्डल की उत्पति से ही पृथ्वी की उत्पति की व्याख्या होती है। 

● प्राचीन ग्रंथों में सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माणकर्ता ‘ब्रह्मा’ को माना गया है।

● पृथ्वी की उत्पति के संदर्भ  में दिए गए वैज्ञानिक सिद्धान्तों की विवेचना निम्न है–

●‘पुच्छल तारा परिकल्पना’ (Comet Hyppothesis)- कास्ते-द-बफन

        इस परिकल्पना के अनुसार बहुत समय पहले ब्रह्माण्ड में  घूमता हुआ एक विशालकाय पुच्छल तारा सूर्य के निकट से गुजरते वक्त सूर्य से टकरा गया।

● इस टक्कर के उपरांत बहुत से पदार्थ सूर्य से छिटक कर अलग हो गया। सूर्य से छिटक कर अलग हुए पदार्थ से ही सौरमण्डल का निर्माण हुआ है।

आलोचना:-

● पुच्छलतारा अपनी कक्षा छोड़कर दूसरी कक्षा में आकर सूर्य से कैसे टकराया।

● सूर्य से पुच्छल तारे की टक्कर इतनी महत्व की नहीं होगी कि उससे पूरा सौरमण्डल का ही निर्माण हो।

● अगर मान लिया जाए कि टक्कर हुआ ही तो टक्कर के बाद निकले पदार्थों ने गोलाकार रूप कैसे धारण कर लिया।

● सूर्य के पास बहुत छोटे ग्रह तथा बीच में कुछ बड़े ग्रह और फिर छोटे ग्रह का क्रम, है इसकी व्याख्या यह सिद्धान्त नही करता है।

● पुच्छल तारे सूर्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि दोनों के परिणाम में काफी अंतर होता है।

वायव्य राशि परिकल्पना (Gaseous Hyphothesis)- इमैनुएल कांट

● इमैनुएल कांट का यह सिद्धांत न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त पर आधारित है।

● कांट कहते है  “तुम मुझे आद्य पदार्थ दो और मैं पृथ्वी का निर्माण करके दिखाता हूँ”।

● इस परिकल्पना के अनुसार प्रारम्भ में समस्त आकाश में आद्य पदार्थ फैले हुए थे।

● ये सभी आद्य पदार्थ गुरुत्वाकर्षण बल के कारण टकराने लगे।

● टक्कर से पहले उत्पन्न अत्यधिक ताप के कारण आद्य पदार्थ पिघलकर द्रव एवं गैस के अवस्था मे बदल गए।

● गैसीय कण के कारण गैसीय आद्य पदार्थ परिभ्रमण करने लगे लेकिन परिभ्रमण करते हुए गैसीय पदार्थ में गुरुत्वकर्षण बल की तुलना में केन्द्रापसारी बल अधिक था। जिसके कारण गैसीय पिंड के मध्यवर्ती भाग में  एक उभार पैदा हुआ।

● इस प्रकार से नौ गोलाकार छल्ला बाहर की ओर निकला और इनके ठंडा होने से ही नौ ग्रह का निर्माण हुआ।

● बचा हुआ अपशिष्ट भाग सूर्य के रूप में मौजूद है।

आलोचना

● अगर आद्य पदार्थ में गुरुत्वाकर्षण शक्ति था तो टकराने के पहले यह किस रूप में था और बाद में शक्ति कैसे प्रकट हुआ। इसकी व्याख्या  कांट नहीं करते।

● यह सिद्धान्त संवेग संरक्षण के सिद्धान्त के विरुद्ध है। 

● आद्य पदार्थ के टकराने से उन कणों में परिभ्रमण गति कैसे उत्पन्न हो सकता है।

● कांट ने अपनी परिकल्पना में यह बतलाया था कि छल्ला या निहारिका के परिभ्रमण के दौरान जैसे-जैसे उसका आकार बढ़ता गया उसकी गति बढ़ती गयी।

निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis)- लाप्लास

● लाप्लास ने अपना सिद्धान्त इमैनुएल कांट के वायव्य राशि परिकल्पना में सुधार के रूप में प्रस्तुत किया था।

● इन्होनें निहारिका सिद्धान्त 1796 में “Exposition of The World System”  नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया था।

● लाप्लास ने कांट के सिद्धान्त में तीन त्रुटियां बतलाई।

1. आद्य पदार्थों के टकराने से बहुत बड़ी मात्रा में वाष्प का निर्माण नहीं हो सकता है।

2. चट्टानों के टकराने से घूर्णन गति उत्पन्न नहीं हो सकती।

3. निहारिका के आकार बढ़ने से गति में वृद्धि नहीं हो सकती।

● इन आलोचनाओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए लाप्लास ने कहा कि आद्य  पदार्थ पहले से ही घूर्णन गति में थे।

● धीरे-धीरे गुरुत्वाकर्षण बल के कारण संघनन या संकुचन की क्रिया प्रारम्भ हुई, जिसके फलस्वरूप आद्य पदार्थ में घूर्णन गति बढ़ गया।

● इस घूर्णन के कारण निहारिका का आकार तश्तरीनुमा बन गया।

● निहारिका में जैसे-जैसे घूर्णन वेग बढ़ता गया वैसे-वैसे अपकेंद्रीय बल में भी वृद्धि होती गयी।

● जिसके फलस्वरूप निहारिका के ऊपरी भाग के वलय के रूप में पदार्थ अलग होते गए और ये पदार्थ धीरे-धीरे ठंडा होकर ग्रह एवं उपग्रह के रूप में परिणत हो गए।

द्वैतारक परिकल्पना (Binary-star-Hypothesis)- एच० एन० रसेल

● इस सिद्धांत का प्रतिपादन एच० एन० रसेल ने किया।

● इनका मानना था कि प्रारम्भ में सूर्य तथा उसका एक साथी तारा एक ही केन्द्र के चारो ओर चक्कर लगा रहा था। उसी समय एक तीसरी तारा सुदूर से सूर्य तथा साथी तारे के पास गुजरने लगा।

● धीरे-धीरे आकर्षण शक्ति के कारण ये पदार्थ तारा से अलग हो गया होगा। कालन्तर में यही पदार्थ ठंडा एवं घनीभूत होकर ग्रह में परिणत हो गए।

Origin Of The Earth

● रसेल पुनः ये बतलाते है कि स्वंय ग्रहों के बीच में आकर्षण बल होंगें जिसके परिणामस्वरूप ग्रहों से भी ज्वार के रूप में पदार्थ पृथक होकर उपग्रह का निर्माण हुए होंगें।

● रसेल का कहना है “विशाल तारे का सूर्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि यह सूर्य से काफी दूर था।”

विशेषता:-

● ग्रहों के कोणीय संवेग उसके साथ आने वाले तारे के कोणीय संवेग से अधिक है। यह सिद्धांत इसकी पुष्टि करता है।

● ग्रहों के बीच अधिक दूरियां क्यों पायी जाती है, इसे साबित करता है।

● इस परिकल्पना में किसी प्रकार का भ्रम उत्पन्न नहीं होता है क्योंकि सूर्य पहले से ही साथी तारे के साथ था । युग्म तारा का प्रमाण आज भी अंतरिक्ष मे मौजूद है।

आलोचना:-

● विशालकाय तारे कहाँ गए, इसकी व्याख्या नहीं करता।

● साथी तारे का अवशिष्ट भाग का क्या हुआ।

ज्वारीय परिकल्पना(Tidal Hypothesis):-

● इस सिद्धांत को जेम्स जीन्स ने 1919 ई० में प्रस्तुत किया जबकि 1929 ई० में जेफरीज महोदय ने इसमें संसोधन प्रस्तुत किया।

● इस सिद्धांत के अनुसार घूमता हुआ एक विशालकाय तारा सूर्य के पास से गुजरा।

● उस तारे के आकर्षण के कारण सूर्य के सतह पर ज्वार उत्पन्न हुआ।

● घूमते तारे के आगे बढ़ जाने से सूर्य में उत्पन्न ज्वार  एक लम्बा गैसीय पिंड के रूप में सूर्य से अलग हो गया । परन्तु यह ज्वार तारा तक नहीं पहुंच पाया और सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृताकार पथ में परिभ्रमण करने लगा।

Origin Of The Earth

● इस अलग हुए ज्वार का मध्य भाग मोटा और दोनों किनारे पर पतला आकार ग्रहण कर लिया। यह ज्वार सूर्य की परिक्रमा करते हुए ठंडा होकर छोटे-छोटे गोलाकार खंडों में विभाजित हो गए और नौ ग्रहों का निर्माण हुआ।

● परिक्रमा क्रम में जब ये ग्रह सूर्य के निकट आये तो ठीक उसी प्रकार सूर्य के आकर्षण बल के कारण ग्रहों के सतह पर भी ज्वार उत्पन्न हुआ और ये अलग होकर उपग्रह का निर्माण किया।

● 1929 ई० में जेफरीज ने इस सिद्धान्त में संसोधन प्रस्तुत करते हुए कहा कि घूमता हुआ तारा सूर्य के पास आकर इससे टकरा गया जिसके कारण सूर्य का कुछ अंश छिटक कर अंतरिक्ष मे बिखर गया फलस्वरूप ग्रहों का निर्माण हुआ।

● गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ये ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने लगे।

विषेशता:-

● सिगार की आकृति के अनुसार ही ग्रहों का वितरण है।

● इस सिद्धांत में यह भी माना गया कि सूर्य से निकले हुए पदार्थ द्रव के रूप में पिघले हुए थे। यह भी प्रमाणित हो चुका है कि हमारी पृथ्वी प्रारंभ में द्रव के समान थी।

● इस सिद्धान्त के आधार पर प्लूटो ग्रह का खोज संभव हो सका।

अलोचना:-

● एक तारे से दूसरे तारे इतना दूर है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

● रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

● सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके कारण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

● यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

 सीफीड संकल्पना (Cepheid Theory)

●  यह परिकल्पना 1942 ई० में ए० सी० बनर्जी के द्वारा दिया गया था।

● सीफीड सूर्य से भी बड़ा एक ऐसा तारा है जो समय-समय पर क्रमबद्ध रूप से संकुचित एवं प्रसारित होता है। जिसके कारण प्रकाश के तीव्रता में भी कमी या वृद्धि होती है।

● बनर्जी के अनुसार सौरमण्डल की उत्पति इसी प्रकार के सीफ़ीड तारे से हुआ है।

●पहले से विद्यमान सीफ़ीड तारा के पास से एक विशाल भ्रमणशील तारा गुजरा।

● ज्वारीय प्रभाव के कारण सीफ़ीड तारा से कुछ पदार्थ पृथक होकर अंतरिक्ष में फैल गए और अंततः संघनित होकर ग्रहों में परिणत हो गए।

● सीफीड तारा का अवशिष्ट भाग सूर्य कहलाया और आगन्तुक तारा अंतरिक्ष में विलीन हो गया।

ग्रहाणु परिकल्पना (Planetsimal Hypothesis):-

● इस परिकल्पना को चैम्बरलीन एवं मोल्टन ने प्रस्तुत किया था।

 ● इस परिकल्पना के अनुसार सूर्य के पास से एक घूमता हुआ तारा गुजरा जिसके कारण सूर्य के बाहरी क्षेत्र में पाए जाने वाले पदार्थ छिटक कर अंतरिक्ष में बिखर गया।

● ये छिटके हुए पदार्थ तारे के आकर्षण के कारण तारे की ओर बढ़े परन्तु तारे के दूर चले जाने के कारण छिटके हुए पदार्थ पुनः सूर्य के ही चारों ओर चक्कर लगाने लगे।

● छिटके हुए पदार्थ को ही चैम्बरलीन ने ग्रहाणु कहा।

● ग्रहाणु के कण ही संघनित होकर ग्रह का निर्माण किये।

आंतरिक धूलकण परिकल्पना (Inter Stellar Dust Hypothesis)

● ऑटो श्मिड एक रूसी वैज्ञानिक थे, इन्होंने अपने सिद्धांत में बतलाये कि प्रारम्भ में एक तारा जो भ्रूण का काम करता था। उस भ्रूणीय तारा के चारों ओर धूलकण एवं गैस फैले हुए थे।

● तारा भ्रमणशील था इसीलिए धूलकण भी उसके चारों ओर घूमते रहते थे। इस कारण धूलकणों  में टक्कर का कार्य होता रहता था। इसी धूलकण के संघनन से ग्रह एवं उपग्रह की उत्पति हुई है।

सुपर नोवा या नवतारा परिकल्पना (Nova Hypothesis):- फ्रेड होयल & लिटिलटन

● यह वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार अंतरिक्ष में एक युग्म तारा पहले से मौजूद था।

● वैसा तारा जिसमें अभी-अभी विस्फोट हुआ हो उसे सुपरनोवा कहते है, कुछ दिन पश्चात उसे ही नोवा कहते है।

● इस सुपरनोवा तारे का साथी तारा आज सूर्य के रूप में मौजूद है। जो तारा सुपरनोवा के रूप में था उससे बड़ी मात्रा में पदार्थ बाहर निकल आये। ये बाहर निकले हुए पदार्थ एक ही दिशा में कम परन्तु भिन्न-दिशाओं में अधिक दूरी तक फैल गए। वे पदार्थ जो छिटक कर सूर्य के चारों ओर गये थे, वे सूर्य से आकर्षित होकर सूर्य के चारों ओर घूमने लगे और ग्रहों का निर्माण कर लिए।

● जब तारा में विस्फोट हुआ तब उसी समय वहाँ से एक भ्रमणशील तारा गुजरा जिसके कारण सुपरनोवा बने तारे का अवशिष्ट भाग उस भ्रमणशील तारे से आकर्षित होकर अंतरिक्ष में विलीन हो गया।


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