Category GEOMORPHOLOGY (भू-आकृति विज्ञान)

31. अपक्षय एवं अपरदन (Weathering and Erosion)

31. अपक्षय एवं अपरदन (Weathering and Erosion)



अपक्षय एवं अपरदन

       अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। इसमें चट्टान-चूर्ण के परिवहन को सम्मिलित नहीं किया जाता है

        अपरदन की क्रिया में टूटे हुए चट्टानों के टुकड़ों के परिवहन (नदी, हिमानी, वायु, भूमिगत जल तथा सागरीय लहर द्वारा) तथा टुकड़ों द्वारा आपस में रगड़ एवं उनके द्वारा कटाव की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है।

        अनाच्छादन (Denudation) में अपक्षय तथा अपरदन दोनों क्रियाओ का समावेश किया जाता है। इस प्रकार अपक्षय में केवल स्थैतिक क्रिया तथा अपरदन में गतिशील क्रिया होती है अनाच्छादन स्थैतिक तथा गतिशील दोनों क्रियाओं का योग है।           

         पृथ्वी का भूपटल दृढ़ भूखण्डों से निर्मित है जिसे प्लेट कहते है। पृथ्वी के भूपटल पर आंतरिक एवं बाह्य दो प्रकार की शक्तियाँ सतत कार्यरत रहती है। आंतरिक शक्तियों में ज्वालामुखी, भूकम्प एवं भूपटल को विरूपित करने वाले अन्य शक्ति (जैसे- संवहन तरंग) को शामिल करते है। जबकि बाह्य शक्तियों में जलवायु, बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग, इत्यादि को शामिल करते है। 
         आंतरिक शक्तियाँ भूपटल में विषमता (उत्थान, धंसान, वलन) उत्पन्न करती है। जबकि बाह्य शक्तियां भूपटल में उतपन्न विषमता को समाप्त कर समतल मैदान के रूप में बदलने का प्रयास करती है अर्थात बाह्य शक्तियां  प्राकृतिक कैंची के समान है जो अपरदन के माध्यम से धरातल को अपरदित कर समतल करते रहती है

                समतल स्थापन का कार्य दो रूपों में होता है:

(i) बाह्य शक्तियां उच्च भागों को काट-छांटकर कर समतल बनाने का कार्य करती है, जिसे निम्नीकरण (Degradation) की क्रिया कहा जाता है।

(ii) जब बाह्य शक्तियां कटे छंटे पदार्थों का निक्षेपण निम्न भागों में करती हैं एवं इस प्रकार समतल स्थापन का कार्य करती हैं, तो यह क्रिया अधिवृद्धिकरण (Aggradation) कहलाती है। बाह्य शक्तियों द्वारा धरातल की ऊंचाई एवं गहराई समाप्त कर समतल स्थापन की प्रक्रिया को अनावृतीकरण कहा जाता है। अनावृत्तीकरण के अंतर्गत तीन क्रियाएं सम्मिलित हैं:

1. अपक्षयण (Weathering):

    भौतिक अथवा रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का अपने ही स्थान पर टूटना-फूटना या सड़ना गलना अपक्षयण कहलाता है।

2. शिलाखंडों का सरकना (Mass Wasting):

      यह वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत गुरुत्व के सीधे प्रभाव से टूटी हुई चट्टानें नीचे की ओर सरकती हैं या गिर पड़ती हैं, जैसे- भू-स्खलन।

3. अपरदन (Erosion):

         अपरदन वह क्रिया है जिसमें गतिशील अभिकरणों (Mobile Agencies) द्वारा शिलाखंडों का स्थानांतरण होता है। अपरदन के अंतर्गत तीन क्रियाएं सन्निहित हैं।

(क) परिवहन या अपनयन (Transportation):-

        इसमें ऋतुक्षरित चट्टानें कमजोर होकर अपरदन के दूतों के द्वारा बहाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है और निम्न भागों में निक्षेपण का कार्य किया जाता है स्रोत क्षेत्र से चट्टानों को उठाकर दूसरे स्थान पर पहुंचा देने वाले कारकों को अपरदन का दूत (बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग) कहा जाता है।    

(ख) अपघर्षण (Corrasion):-

     जब चट्टानों के टुकड़े अपरदन की शक्तियों (बहता जल, हिमानी, पवन आदि) द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाये जाते हैं तो वे धरातल की सतह को घिसते एवं काटते रहते हैं, इसे ही अपघर्षण कहा जाता है।

(ग) निक्षेपण (Deposition):-

        अपरदन के विभिन्न कारक परिवहन कार्य करने के बाद अपने साथ लाये गये मलबे को अपनी वाहन शक्ति के अनुसार जगह-जगह छोड़ते जाते हैं, जिसे निक्षेपण कहते हैं। निक्षेपण क्रिया से धरातल ऊंचा-नीचा हो जाता है। इस कार्य को बहता हुआ नदी, भूमिगत जल, हिमानी, वायु तथा सागरीय लहरें सम्पन्न करती हैं। निक्षेपण की इस अवस्था में धरातल पर विभिन्न भू-आकृतियों का जन्म एवं विकास होता है। 

        इस प्रकार जहां अपक्षयण में स्थैतिक (Static) क्रिया होती है, वहीं अपरदन में गतिशील (Dynamic) क्रिया होती है। हालांकि अपक्षयण में विखंडित चट्टानों का परिवहन नहीं होता है, परंतु गुरुत्व द्वारा विखंडित चट्टानों का सामूहिक रूप से नीचे की ओर सरकना (Mass Wasting) इसमें सम्मिलित किया जा सकता है। इस प्रकार भू-स्खलन को अपक्षयण के अंतर्गत रखा जा सकता है।

       अपक्षयण की क्रिया पर जलवायु के तत्वों (धूप, तापमान, वर्षा आदि) के अलावा चट्टानों की विशेषता (गठन, संरचना आदि) का भी प्रभाव पड़ता है।

अपरदन के प्रकार

    अपरदन के विभिन्न रूप अपरदन की भिन्न-भिन्न क्रियाओं में सम्पन्न होते हैं, जिसका विवरण निम्नलिखित है:-

(i) सन्नीघर्षण (Attrition):-

        एक ही प्रकार के चट्टानों का आपस में टकराना और टूटना सन्नीघर्षण कहलाता है।

(ii) अपघर्षण (Abrasion or corrasion):-

       जब दो विभिन्न प्रकार के चट्टान आपस में टकराकर टूटते हैं तो अपघर्षण कहलाता है।

(iii) उत्पाटन (Plucking):-

      अपरदन के दूतों के द्वारा चट्टानों को उखाड़ कर फेंकना उत्पाटन कहलाता है।

(iv) अपवाहन (Deflation):-

         वायु के द्वारा चट्टानों का उड़ा कर ले जाना अपवाहन कहलाता है।   यह क्रिया शुष्क मरुस्थलीय भागों में अधिक होती है। 

(v) स्थानांतरण या भूस्खलन (Landslide):-

          गुरुत्वाकर्षण बल के कारण चट्टानों का ऊपर से नीचे गिरना या खिसकना स्थानांतरण कहलाता है। 

(vi) अपक्षालन (Leaching):-

        अपरदन के दूतों के द्वारा छोटे एवं महीन चट्टानी कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना अपक्षालन कहलाता है।

(vii) संक्षारण (corrosion):-

       रासायनिक प्रतिक्रिया के द्वारा चट्टानों का टूटना और दूसरे स्थान पर जमा करना संक्षारण कहलाता है। इस प्रकार संक्षारण रासायनिक क्षरण की एक प्रक्रिया है।

(viii) जलगति क्रिया (Hydraulic Action):-

            यह एक यान्त्रिक क्रिया है। इसमें बहता हुआ जल अपने वेग तथा दबाव के कारण मार्ग में स्थित चट्टानी कणों को अपने साथ बहाकर ले जाता है।      

अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

     बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के चट्टानों के टूट-फूट कर टुकड़े-टुकड़े होने की प्रक्रिया को भौतिक या यांत्रिक ऋतुक्षरण कहा जाता है।

⇒ भौतिक ऋतुक्षरण, मरुस्थलों में अधिक दैनिक तापांतर के कारण एवं ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में पाले (Frost) के कारण होता है।

⇒ गर्म मरुस्थलों में स्वच्छ आकाश एवं वायु की शुष्कता के कारण दिन एवं रात के तापमान में काफी अंतर पाया जाता है। दिन के समय तेज धूप के कारण चट्टानों का ऊपरी आवरण तप्त होकर फैल जाता है। किन्तु रात के समय प्रायः तापमान गिरकर हिमांक (Freezing Point) तक पहुंच जाता है एवं चट्टानें सिकुड़ जाती हैं। इन क्रियाओं की पुनरावृति के कारण चट्टानों में दरार पड़ने लगता है एवं चट्टानें बड़े बड़े खंडों में टूट जाती हैं। इस प्रक्रिया को खंड विच्छेदन (Block Disintegration) कहा जाता है।

⇒ उष्ण मरुस्थलीय, अर्द्ध मरुस्थलीय एवं मानसूनी जलवायु प्रदेशों में अधिक तापांतर के कारण कभी-कभी चट्टानों की ऊपरी सतह गर्म होकर अन्दर की अपेक्षाकृत ठंडी सतह से अलग हो जाती है एवं ऊपर का भाग प्याज के छिलके की तरह अलग हो जाता है। इसे अपदलन, अपशल्कन या अपपत्रण (Exfoliation) कहा जाता है। यह क्रिया मुख्यतः ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों में होती है।

⇒ चट्टानें विभिन्न खनिजों का समुच्चय होती हैं एवं विभिन्न खनिजों के फैलाव एवं सिकुड़ने की दर अलग-अलग होती हैं। इसके कारण चट्टानों के विभिन्न खनिज कण टूट-टूटकर अनेक खनिज कणों में विभाजित हो जाते हैं। चट्टानों का इस प्रकार खनिज कणों में टूटना कणिकामय विखंडन (Granular Disintegration) कहलाता है। खंड विखंडन एवं कणिकामय विखंडन के कारण ही गर्म मरुस्थलों में विस्तृत क्षेत्रों में बालू पाये जाते हैं।

⇒ शीत कटिबंधीय क्षेत्रों एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों की छिद्रों एवं दरारों में जल के जमने एवं पिघलने की क्रिया क्रमिक रूप से होती है। इससे चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं बड़े-बड़े खंडों में टूटने लगती हैं अर्थात् खंड-विखंडन (Block Disintegration) होने लगता है। यह क्रिया तुषार क्रिया (Frost Action) कहलाती है।

          खड़ी पहाड़ी ढालों पर इस प्रकार का विघटन अधिक देखने को मिलता है। विघटित चट्टानें गुरुत्व बल के कारण नीचे की ओर सरककर जमा होने लगती हैं। ये विखंडित चट्टानें खुरदरी एवं नुकीली होती हैं। इस प्रकार के कोणीय चट्टानी खंडों (Angular Rock Fragments) के ढेर को भग्नाश्म राशि (Scree) अथवा टैलस (Talus) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्री या टैलस का निर्माण मुख्यतः तुषार क्रिया एवं गुरुत्वाकर्षण का परिणाम है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

    जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

      चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

     ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

     जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

     जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

        बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

अपक्षयण पर जलवायु का प्रभाव

⇒ उष्ण एवं शुष्क जलवायु क्षेत्रों (जैसे- गर्म मरुस्थलों में) दैनिक तापांतर अधिक मिलने के कारण भौतिक अपक्षय महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ उष्ण एवं आर्द्र जलवायु क्षेत्र (जैसे- विषुवतीय क्षेत्र) एवं चूना पत्थर वाले क्षेत्र में रासायनिक अपक्षय महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ शीत एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में भौतिक अपक्षय अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थायी हिमाच्छादन के कारण अपक्षयण की क्रिया नहीं होती है।

⇒ मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों (जैसे भारत) में रासायनिक एवं भौतिक दोनों ही प्रकार का अपक्षयण पाया जाता है।

नोट: अपक्षयण एवं अपदन दो अलग-अलग क्रियाएं हैं। बिना अपक्षयण के भी अपरदन हो सकता है। अपक्षयण के पश्चात् अपरदन हो ही, यह आवश्यक नहीं है। अपरदन की प्रक्रिया में अपक्षयण सहायक होता है, परंतु यह अपरदन का अंग नहीं है।



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7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर

7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर


बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त

बिग बैंग

              ब्रह्माण्ड तथा आकाशगंगा तथा उनके सदस्य तारों तथा ग्रहों की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए ब्रह्माण्ड के अदृश्य घटकों अर्थात् काले पदार्थों के अस्तित्व के आधार पर प्रयास किये गये हैं। आकाश गंगा के निर्माण के विषय में वैज्ञानिकों के दो वैकल्पिक विचार हैं- काले पदार्थों का अस्तित्व ‘गर्म’ या ‘ठंडे’ (Hot or cold forms) रूप में रहा होगा।

         गर्म काले पदार्थों (Hot dark matter) की स्थिति में आकाशगंगायें (Galaxies) दूर-दूर होंगी जबकि ठंडे पदार्थों की स्थिति में वे झुण्ड में होंगी (वर्तमान समय में विभिन्न आकाशगंगायें पास-पास समूह में स्थित हैं)।

         बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति आज से लगभग 15 बिलियन वर्ष (15 अरब वर्ष) पहले घने पदार्थों वाले विशाल अग्निपिण्ड (fireball) के आकस्मिक जोरदार विस्फोट तथा उससे जनित विकिरण के कारण हुई।

           इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मुख्यतः जॉर्ज लैमेण्टर द्वारा 1950-60 तथा 1960-70 दशक में किया गया (इस सिद्धान्त के अनुसार आज से 15 अरब वर्ष पहले एक विशाल अग्निपिण्ड था जिसकी रचना भारी पदार्थों से हुई थी। इस विशालकाय अग्निपिण्ड का अचानक विस्फोट हुआ जिस कारण पदार्थों का बिखराव हो गया। इन पदार्थों को प्रारम्भिक सामान्य पदार्थ (Normal matter) कहा गया। शीघ्र ही सामान्य पदार्थों के अलगाव के कारण (काले पदार्थों का सृजन हुआ। इन काले पदार्थों का आपस में समेकन होने से (अनेकों पिण्डों का निर्माण हुआ। इन पिण्डों के चारों ओर सामान्य पदार्थों का जमाव होने लगा। जिस कारण इनका आकार बढ़ता गया। इन पिण्डों के आकार में वृद्धि होने से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ।

 

            ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड अत्यधिक छोटा था परन्तु इसमें त्वरित गति से फैलाव होने लगा। परिणामस्वरूप आकाशगंगायें, जो प्रारम्भ में पास-पास थीं वे निरन्तर दूर होती गयीं। आज से लगभग 15 अरब वर्ष पहले अपने निर्माण-काल से आज तक ब्रह्माण्ड आकार में लगातार फैलता रहा है तथा उसके पदार्थ शीतल होते रहे हैं। आकाशगंगाओं का भी भयंकर विस्फोट हुआ तथा विस्फोट से निकले पदार्थों के समेकन से बने असंख्य पिण्डों द्वारा प्रत्येक आकाशगंगा के तारों (stars) का निर्माण हुआ। इसी तरह प्रत्येक तारे, के विस्फोट के कारण जनित पदार्थों के समूहन द्वारा ग्रहों (Planets) का निर्माण हुआ।

          अमेरिकन वैज्ञानिक अलन गुथ (Alan Guth) ने 1980 में बिग बैंग सिद्धान्त को ब्रह्माण्ड (आकाशगंगा, तारों तथा ग्रहों) की उत्पत्ति की समस्या को सुलझाने में असमर्थ पाया। अत: इन्होंने स्फीति सिद्धान्त (inflationary theory) का प्रतिपादन किया। अलन गुथ की अवधारणा है कि ब्रह्माण्ड के दृश्य द्रव्यमान (visible mass) के घनत्व की तुलना में उसका वास्तविक घनत्व बहुत अधिक है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्माण्ड में अदृश्य काले पदार्थों का अस्तित्व है। यद्यपि बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त लगभग एक जैसे हैं क्योंकि उनकी कई मान्यतायें उभयनिष्ठ हैं। उनमें अन्तर मात्र इस बात से सम्बन्धित है कि विशालकाय अग्निपिण्ड के विस्फोट के एक सेकेण्ड के अन्दर किस प्रकार की घटनायें घटीं।

          स्फीति सिद्धान्त के अनुसार विशालकाय अग्निपिण्ड के जोरदार विस्फोट के बाद अति अल्प काल में ब्रह्माण्ड का असाधारण त्वरित गति से फैलाव (स्फीति, rapaid, expansion or inflation) हुआ। इस प्रक्रिया के दौरान एक सेकेण्ड के अल्पांश के अन्तर्गत ही ब्रह्माण्ड के आकार में कई गुना वृद्धि हो गयी। काले पदार्थों के समूहन से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ। इनके विस्फोट से जनित पदार्थों के समूह से निर्मित पिण्डों द्वारा तारों का निर्माण हुआ तथा तारों के विस्फोट से उत्पन्न पदार्थों के एकत्रित एवं संगठित होने से निर्मित पिण्डों से ग्रहों (पृथ्वी इत्यादि) का निर्माण हुआ।

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना (Binary Star Hypothesis of Russell)

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

(Binary Star Hypothesis of Russell)


रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

रसेल की द्वैतारक

              जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना से निम्नलिखित दो बातें प्रमाणित नहीं हो पा रहीं थीं-

(i) सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी और

(ii) ग्रहों के वर्तमान कोणीय आवेग (Angular momentum) की अधिकता।

       इन दो समस्याओं के समाधान हेतु रसेल ने द्वैतारक परिकल्पना का प्रतिपादन किया।

           आदिकाल में सूर्य के पास ही दो तारे थे। सर्वप्रथम सूर्य का एक साथी तारा था जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। आगे चलकर एक विशालकाय तारा साथी तारे के समीप आया, किन्तु इसकी परिक्रमा की दिशा साथी तारे के विपरीत थी।

       इन दो तारों के बीच की दूरी सम्भवतः 48 से 64 लाख किमी० के बीच रही होगी। इस तरह विशालकाय तारा सूर्य से और अधिक दूर (साथी तारा तथा विशालकाय तारा के बीच की दूरी का कई गुना) रहा होगा जिस कारण विशालकाय तारे के ज्वारीय बल का प्रभाव सूर्य पर नहीं पड़ा, परन्तु साथी तारे पर ज्वारीय बल के कारण पदार्थ विशालकाय तारे की ओर आकर्षित होने (उभार) लगा। जैसे-जैसे विशालकाय तारा साथी तारे के करीब आता गया, आकर्षण बल बढ़ता गया और उभार अधिक होने लगा।

        जब विशालकाय तारा साथी तारे की निकटतम दूरी पर आ गया तो अधिकतम आकर्षण के कारण कुछ पदार्थ साथी तारे से अलग होकर विशालकाय तारे की दिशा में घूमने (साथी तारे की विपरीत दिशा) लगे। आगे चलकर इन पदार्थों से ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ग्रह करीब रहे होंगे तथा आपसी आकर्षण के कारण ग्रहों से पदार्थ निकलकर उनके उपग्रह बन गये होंगे जिसे निम्नांकित चित्रों में देखा जा सकता है-

रसेल की द्वैतारक

रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

         इस तरह युग्म तारे की कल्पना करके तथा सूर्य के स्थान पर साथी तारे से पदार्थ निस्सृत कराके ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति मानकर रसेल ने सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी तथा उनके कोणीय आवेग की समस्या का वैज्ञानिक स्तर पर समाधान कर दिखाया है।

आलोचना

(i) रसेल ने साथी तारे से निकले पदार्थ से ग्रहों की उत्पत्ति को समझाया है, परन्तु साथी तारे के अवशिष्ट भाग पर प्रकाश नहीं डाला है। अवशिष्ट भाग का क्या हुआ? कोई संतोषजनक हल नहीं दिया गया है।

(ii) निर्माण के समय ग्रह सूर्य से दू थे तथा एक-दूसरे दूर फैले थे, परन्तु विशालकाय तारे के भ्रमण पथ पर से आगे निकल जाने पर सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, जबकि उसके सबसे करीब साथी तारे का अवशिष्ट भाग सूर्य के आकर्षण में नहीं आ सका। इस तरह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रसेल ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है।

(iii) यदि यह मान भी लिया जाय कि सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, तो भी सेल विशद रूप में यह नहीं समझा पाते हैं कि किस प्रक्रिया द्वारा यह सम्भव हुआ।

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis of James Jeans)

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना

(Tidal Hypothesis of James Jeans)


जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पनाजेम्स जीन्स की ज्वारीय

            सौर्य-मण्डल की उत्पत्ति से सम्बन्धित ”ज्वारीय परिकल्पना” का प्रतिपादन अंग्रेज विद्वान सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने सन् 1919 में किया तथा जेफरीज (Jeffreys) नामक विद्वान ने उक्त परिकल्पना में सन् 1929 में कुछ संशोधन प्रस्तुत किया जिससे इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ गया।

             यह ज्वारीय परिकल्पना आधुनिक परिक्लपनाओं तथा सिद्धान्तों में से एक है, जिसे अन्य की अपेक्षा अधिक समर्थन प्राप्त है। अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए जीन्स कुछ तथ्यों को स्वयं मानकर चले हैं।

        इस प्रकार ‘ज्वारीय परिकल्पना’ प्रतिपादक द्वारा कुछ निम्नलिखित कल्पित तथ्यों पर आधारित है।

1. सौर्य-मण्डल का निर्माण सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुआ।

2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला था।

3. सूर्य के साथ ही साथ ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा था।

4. सूर्य अपनी जगह पर स्थिर था तथा अपनी जगह पर ही घूम रहा था।

5. साथी तारा एक पथ के सहारे इस तरह घूम रहा था कि वह सूर्य के निकट आ रहा था।

6. साथी तारा आकार तथा आयतन में सूर्य से बहुत अधिक विशाल था।

7. पास आते हुए तारे द्वारा ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ा था।

ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण 

          इस प्रकार उपर्युक्त स्वयं-कल्पित तथ्यों के आधार पर जीन्स ने बताया है कि साथी तारा निरन्तर एक पथ के सहारे सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था, जिस कारण साथी तारे की आकर्षण शक्ति द्वारा वायव्य ज्वार का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ने लगा। फलस्वरूप सूर्य में ज्वार उत्पन्न होने लगा। यह ज्वारीय क्रिया सूर्य में उसी प्रकार सम्भव हो सकी, जिस प्रकार वर्तमान समय में पृथ्वी के निकट चन्द्रमा के आ जाने से पृथ्वी के महासागरों में ज्वार उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों विशालकाय तारा सूर्य के पास आता गया, त्यों-त्यों उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ती गयी तथा ज्वार की तीव्रता बढ़ती गयी।

          जब तारा सूर्य से निकटतम दूरी पर आया तो उसकी आकर्षण शक्ति सूर्य से अधिक हो गयी, जिस कारण हजारों किलोमीटर लम्बा सिगार के आकार का ज्वार सूर्य के वाह्य भाग में उठा। सिगार के आकार वाले इस भाग को फिलामेन्ट (Filament) कहा गया है। सूर्य के निकटतम दूरी पर पहुँचने के कारण तारे की अधिकतम आकर्षण शक्ति के प्रभाव से एक विशाल फिलामेन्ट सूर्य से हटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ। जीन्स के अनुसार पास आने वाला तारा सूर्य के मार्ग पर नहीं था, अत: यह सूर्य से आगे बढ़ने लगा।

           इस प्रकार तारे के दूर निकल जाने के कारण फिलामेन्ट तारे के साथ न जा सका, वरन् वह सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करने लगा। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस स्थिति में जब कि तारा अधिक दूर चला गया तो फिलामेन्ट सूर्य के पास पुन: वापस क्यों नहीं आ गया?

     व्याख्या सरल है। जब फिलामेन्ट टूटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ, उस परिस्थिति में यह सूर्य की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र से बाहर (Neutral point) हो गया था, अत: वह सूर्य का ही चक्कर लगाने लगा, वापस नहीं आ सका।

     कुछ समय पश्चात् तारा सूर्य से इतना दूर चला गया कि पुन: कोई वायव्य भाग (फिलामेण्ट) सूर्य से अलग नहीं हो सका। आगे चलकर सूर्य से निकला हुआ ज्वारीय पदार्थ सिगार के आकार में अधिक लम्बा हो गया, जिसका मध्य भाग अधिक मोटा या चौड़ा तथा दोनों किनारे वाले भाग अत्यधिक पतले थे। किनारों के पतला होने का मुख्य कारण तारे तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव ही बताया जाता है। फिलामेंट में गति या परिभ्रमण का आविर्भाव दूर होते हुये (Receding) तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के खिंचाव (Gravitational pull) के कारण हुआ था।

फिलामेन्ट से ग्रहों की उत्पत्ति:-

          सूर्य से अलगाव के बाद फिलामेन्ट शीतल होने लगा, जिस कारण उसके आकार में संकुचन प्रारम्भ हो गया। इस संकुचन के कारण फिलामेन्ट कई टुकड़ों में टूट गया तथा प्रत्येक भाग घनीभूत होकर ग्रह (Planet) के रूप में बदल गया। इसी क्रिया से फिलामेन्ट से नौ ग्रहों की रचना सम्भव हुई। इसी प्रक्रिया के अनुसार सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ग्रहों पर ज्वार उत्पन्न होने से उनके कुछ पदार्थ अलग हो गये, जो घनीभूत होकर उपग्रह बने।

          अब यह प्रश्न उठता है कि ग्रह से उपग्रह बनने का क्रम कब तक चलता रहा? जब तक ग्रहों से निकले हुये ज्वारीय पदार्थ बड़े आकार वाले थे तथा उनकी केन्द्रीय आकर्षण शक्ति अधिक थी, तब तक उपग्रह बनते रहे। परन्तु जब उनका आकार इतना छोटा होने लगा कि उनकी केन्द्रीय आकर्षण-शक्ति उन्हें संगठित रखने में असमर्थ हो गयी, उपग्रहों की रचना समाप्त हो गयी। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों की संख्या ग्रहों के आकार के अनुसार निश्चित हुई।

          इस परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही साथ सौर्य-मंडल की अनेक समस्याएँ भी सुलझी-सी प्रतीत होती हैं-

(1) ग्रहों का क्रम तथा आकार-

        सूर्य से निस्सृत ज्वारीय फिलामेन्ट बीच में चौड़ा तथा किनारों की तरफ पतला था। इस प्रकार जब फिलामेन्ट के टूटने से ग्रहों का निर्माण हुआ तो बड़े ग्रह बीच में तथा छोटे ग्रह किनारे की ओर बने। ग्रहों का यह क्रम वर्तमान सौर्य मंडल के ग्रहों से पूर्णतया सामंजस्य रखता है।

            सूर्य की ओर से प्रारम्भ करने पर बुध ग्रह सबसे पहले है। यह अधिक छोटा है। इसके बाद शुक्र, पृथ्वी, मंगल (यह पृथ्वी से छोटा है) आदि एक-दूसरे से बड़े होते जाते हैं तथा बीच में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है । इसके बाद पुनः ग्रहों का आकार घटता जाता है तथा अन्त में कुबेर अत्यन्त छोटा ग्रह है। यह तथ्य निम्न तालिका से पूरी तरह प्रमाणित हो जाता है।

         जीन्स ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कुबेर ग्रह( Pluto) की खोज के पहले किया था। बाद में अत्यन्त लघु ग्रह कुबेर की खोज ने इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि यह परिकल्पना सौर्य-मंडल के सदस्यों के क्रम को पूर्णतया सिद्ध करती है। केवल मंगल की स्थिति इसके अनुसार ठीक नहीं बैठती है।

(2) उपग्रहों का क्रम-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों का निर्माण ग्रहों से निकले हुए ज्वारीय पदार्थ से उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार सूर्य से निकले ज्वारीय पदार्थ से ग्रहों की रचना हुई। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों का भी वही क्रम है जो कि ग्रहों का। अर्थात् एक ग्रह के यदि कई उपग्रह हैं तो सबसे बड़ा उपग्रह बीच में तथा छोटा उपग्रह किनारे की ओर पाया जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान उपग्रहों की स्थिति तथा क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना एक ही प्रणाली द्वारा हुई होगी।

(3) उपग्रहों की संरचना तथा आकार-

         इस ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार बड़े ग्रह ब्रह्माण्ड में अधिक समय तक गैस के रूप में रहे, क्योंकि आकार की विशालता के कारण उसके शीतल होने में अधिक समय लगा होगा। इस कारण बड़े ग्रहों के उपग्रह अधिक संख्या में बने, परन्तु अपेक्षाकृत ये छोटे आकार वाले थे। मध्यम आकार वाले (बड़े ग्रहों के समीपवर्ती ग्रह) ग्रहों से कम संख्या में उपग्रह (Satellites) बने, परन्तु इनका आकार बड़ा रहा। किनारे वाले ग्रह आकार में छोटे होने के कारण शीघ्र शीतल हो गये होंगे। परिणामस्वरूप उनसे उपग्रहों की रचना नहीं हो पायी होगी।

            यह तथ्य वर्तमान सौर्य-मंडल के उपग्रहों के क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। शनि तथा बृहस्पति जैसे सबसे बड़े ग्रहों के छोटे आकार वाले अनेक उपग्रह हैं, जबकि बुध तथा शुक्र के पास एक भी उपग्रह नहीं है।

(4) ग्रहों का परिभ्रमण कक्ष-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के परिभ्रमण कक्ष (Orbit) अथवा ग्रह पथ को सूर्य के कक्ष (orbit) से मेल नहीं खाना चाहिये, बल्कि ग्रह-कक्ष को सूर्य कक्ष से एक निश्चित कोण पर झुका होना चाहिये, क्योंकि सूर्य की आकर्षण शक्ति से ग्रह झुक जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान ग्रहों के कक्ष से पूर्णतया मेल खाता है, क्योंकि प्रत्येक ग्रह-कक्ष झुका हुआ है। 

प्रत्येक ग्रह का कोणीय झुकाव

ग्रह झुकाव
बुध
शुक्र 3.5°
पृथ्वी 23.5°
मंगल 2° 
बृहस्पति 1° 
शनि 2.5° 
अरुण 0° 
वरुण
कुबेर 17°

(5) निस्सृत वायव्य पदार्थ का आकार-

        पास आते हुये तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य से जो फिलामेन्ट निकला वह सिगार के आकार का क्यों हो गया? इसका मुख्य कारण पास आते हुये तारे की आकर्षण शक्ति में विभिन्नता का होना ही बताया जाता है। अर्थात् तारा दूर था तो कम आकर्षण के कारण कम पदार्थ बाहर निकला तथा तारा ज्यों-ज्यों पास आता गया, बढ़ती आकर्षण शक्ति से पदार्थ की मात्रा बढ़ती गयी तथा तारे के सूर्य से निकटतम दूरी पर आने पर निस्सृत पदार्थ सबसे अधिक था।

           पुन: तारे के दूर जाने से आकर्षण शक्ति में कमी के कारण निस्सृत पदार्थ की मात्रा घटती गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निस्सृत पदार्थ (Ejected matter) तारे की आकर्षण शक्ति के अनुपात में थे।

परिकल्पना में संशोधन

       सन् 1929 ई. में हेरोल्ड जेफरीज महोदय ने इस परिकल्पना को संशोधित करते हुए बताया कि ग्रहों की उत्पत्ति फिलामेंट बनने से नहीं हुई है, वरन् साथी तारा और सूर्य के आपस में टकराने से हुई है। साथी तारा और सूर्य के बीच जब टक्कर होती है तो कुछ पदार्थ सूर्य से बाहर निकल आते हैं और बाद में संगठित एवं शीतल होकर 9 ग्रहों का निर्माण करते हैं।      

     जेफरीज के इस संशोधन के मानने पर ग्रहों के परिभ्रमण (Rotation) सम्बन्धी अनेक कठिनाईयां सुलझ जाती हैं।

मूल्यांकन

         जीन्स द्वारा प्रतिपादित तथा जेफरीज द्वारा संशोधित एवं परिवर्द्धित ‘ज्वारीय परिकल्पना’ को बहुत समय तक समर्थन प्राप्त होता रहा तथा लोगों में इसके प्रति अधिक विश्वास हो गया था क्योंकि जीन्स को यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड की ग्रह-प्रणाली का निर्माण एक अनुपम विधान है।

         परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इस विचारधारा की कटु आलोचनाएँ की गयी हैं तथा वर्तमान वैज्ञानिकों को जीन्स की यह परिकल्पना मान्य नहीं है। यदि कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों के इस परिकल्पना में संशोधन मान लिये जाय तो सचमुच यह परिकल्पना बड़ी हद तक पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सही ज्ञान दे सकती है।

आलोचनाएँ

      इस परिकल्पना के निम्नलिखित आलोचनाएँ बतायी जा सकती हैं:-

⇒ एक तारे से दूसरे तारे इतना दू है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

⇒  रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

⇒ सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके काण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

⇒ यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis of Laplace)

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

(Nebular Hypothesis of Laplace)


लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

लाप्लास की निहारिका

              फ्रान्सीसी विद्वान लाप्लास ने अपना मत सन् 1796 ई० में व्यक्त किया, जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Exposition of the World System’ में किया है। यह परिकल्पना काण्ट के विचार से कुछ साम्य रखती है। लाप्लास ने काण्ट की कुछ गलतियों को दूर करके अपना संशोधित विचार व्यक्त किया।

            काण्ट की परिकल्पना के मुख्य तीन दोष थे:-

(1) निहारिका अथवा आद्य पदार्थ के कणों के टकराव से पर्याप्त ताप उत्पन्न नहीं हो सकता है।

(2) कणों के टकराव से गति नहीं हो सकती है।

(3) आकार में वृद्धि के साथ गति में वृद्धि नहीं हो सकती है।

            इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए लाप्लास ने कुछ कल्पनायें की हैं, जिन पर आधारित होकर उनका सिद्धान्त आगे चलता है:-

(1) प्रथम समस्या अर्थात् निहारिका के ताप की समस्या हल करने के लिये उन्होंने यह मान लिया कि ब्रह्माण्ड में पहले से एक विशाल तप्त निहारिका (नेबुला ) थी।

(2) यह निहारिका प्रारम्भ से ही गतिशील थी।

(3) यह निहारिका निरन्तर शीतल होकर आकार में सिकुड़ती गयी।

            इस प्रकार उपर्युक्त तीन स्वयं के माने हुये तथ्यों के अनुसार अतीत काल में ब्रह्माण्ड में एक गतिशील एवं तप्त महापिण्ड था, जिसको लाप्लास ने निहारिका नाम दिया है। निहारिका की गति के कारण विकिरण द्वारा उष्मा का ह्रास होने लगा जिस कारण इसका बहिर्भाग शीतल होने लगा।

           इस प्रकार निहारिका के निरन्तर शीतल होने के कारण उसमें संकुचन होने लगा। परिणामस्वरूप निहारिका के आकार अथवा आयतन में ह्रास होने लगा। आयतन में कमी के कारण निहारिका की गति में निरन्तर वृद्धि होने लगी। यहाँ पर काण्ट की तृतीय गलती भी दूर हो जाती है। अत्यधिक गति के कारण केन्द्रापसारित बल (centrifugal force) के कारण निहारिका के मध्यवर्ती भाग के पदार्थ भारहीन होने लगे तथा मध्य भाग बाहर की ओर उभरने लगा।

               ऊपरी भाग निरन्तर शीतल होने के कारण अत्यधिक घना हो गया, परन्तु यह ऊपरी भाग निचले भाग के साथ भ्रमण नहीं कर सका। इस प्रकार ऊपरी भाग, निरन्तर शीतल होते तथा सिकुड़ते मध्य भाग से, छल्ला के रूप में पृथक होने लगा। कुछ समय बाद यह गोल छल्ला निहारिका से अलग होकर बाहर निकल आया तथा निहारिका का चक्कर लगाने लगा।

              लाप्लास के अनुसार निहारिका से केवल एक ही छल्ला बाहर निकला तथा बाद में यह छल्ला नौ छल्लों में विभाजित हो गया। (जबकि काण्ट के अनुसार निहारिका से ही नौ छल्ले निकले थे) तथा प्रत्येक छल्ला एक-दूसरे से दूर हटता गया। प्रत्येक छल्ले के समस्त पदार्थ ने एक स्थान पर गांठ के रूप में एकत्रित होकर ‘गर्म वायव्य ग्रन्थि’ (Hot gaseous agglomeration) का रूप धारण किया, जो आगे चलकर  शीतल होकर ठोस बन कर ग्रह बन गया।

           इस प्रकार नौ ग्रहों का निर्माण हुआ। इसी क्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उपग्रहों का आविर्भाव हुआ। निहारिका का अवशिष्ट भाग सूर्य बना।

लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

          उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रान्सीसी विद्वान रॉस “(Roche) ने लाप्लास की परिकल्पना में संशोधन प्रस्तुत किया। लाप्लास के अनुसार निहारिका से निकले एक भारी छल्ले से कई पतले छल्ले बाहर निकल गये परन्तु रॉस ने बताया कि मुख्य निहारिका से ही कई पतले छल्ले क्रमश: अलग हो गये। प्रत्येक छल्ला घनीभूत होकर ग्रह बन गया। इसी क्रम के जारी रहने से समस्त ग्रहों की उत्पति हुई।

मूल्यांकन

      अपने सरल रूप के कारण लाप्लास की परिकल्पना को प्रारम्भ में पर्याप्त समर्थन मिला तथा लगभग 150 वर्षों तक इसका समादर (आदर) होता रहा। परन्तु सौर्य-मंडल सम्बन्धी नवीन वैज्ञानिक तथ्यों एवं सिद्धान्तों के प्रकाश में आने के कारण इस परिकल्पना का समर्थन जाता रहा।

          इस परिकल्पना में न केवल पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या ही हल की गयी है, वरन् उसकी रचना तथा स्वभाव का भी वर्णन किया गया है। इसके अनुसार ग्रह प्रारम्भ में मौलिक रूप में वायव्य अवस्था में थे। तत्पश्चात् शीतल होते समय तरल अवस्था में आये एवं अन्त में ठोस भूपटल (solid crust) का निर्माण हुआ। परन्तु इस मत के विपरीत कुछ विद्वानों ने यह बताया है कि पृथ्वी अपनी उत्पत्ति एवं वृद्धि-काल से ही एक ठोस रूप में रही होगी।

          अधिकांश विद्वानों के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में एक तरल अवस्था अवश्य रही होगी। अत: ‘निहारिका परिकल्पना’ का इस सम्बन्ध में पर्याप्त महत्व है। इस परिकल्पना के विरोध में निम्नांकित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं-

(1) सौर्य-मण्डल के विभिन्न ग्रहों का वर्तमान ‘कोणीय आवेग’ (angular momentum), जो कि प्रारम्भ में मौलिक निहारिका में व्याप्त था, भ्रमण की अधिकता से निहारिका को तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि निहारिका के मौलिक कोणीय आवेग से पदार्थ निहारिका से अलग नहीं हो सकता था।

             ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ (laws of conservation of angular momentum) के अनुसार मौलिक निहारिका का कोणीय आवेग, वर्तमान सूर्य एवं उसके सदस्य ग्रहों के कुल कोणीय आवेग के बराबर होना चाहिये, जबकि ऐसा न होकर सम्पूर्ण कोणीय आवेग का 98 प्रतिशत भाग ग्रहों तथा शेष 2 प्रतिशत भाग वर्तमान सूर्य में है। इस प्रकार यह परिकल्पना गणितीय सूत्रों के विपरीत है।

(2) निहारिका से 9 छल्ले ही क्यों निकले? नौ से अधिक भी छल्ले निकल सकते थे। इस समस्या का निदान लाप्लास की तरफ से नहीं मिलता है। घनीभवन के कारण एक छल्ले का सारा पदार्थ एक ही गोल पिण्ड के रूप में नहीं बदल सकता है। वस्तुत: छल्ला छोटे-छोटे कई टुकड़ों में टूट जायेगा तथा एक ही छल्ले से कई छोटे-छोटे स्वतंत्र ग्रह बनेंगे।

(3) निहारिका के कणों की ”अल्प पारस्परिक संलग्नता” (small degree of cohesion between the particles of nebula) के द्वारा छल्लों के निकलने का क्रम जारी रहेगा तथा उस क्रिया में अवकाश नहीं हो सकता।

(4) यदि ग्रहों की उत्पत्ति निहारिका से हुई तो प्रारम्भ में वे द्रवित अवस्था में रहे होंगे। परन्तु द्रवित अवस्था में ग्रह निर्बाध रूप से परिभ्रमण तथा परिक्रमा नहीं कर सकते क्योंकि द्रव के विभिन्न स्तरों की गति समान नहीं होती और उनमें घर्षण होता रहता है। केवल ठोस पिण्ड ही पूर्णरूपेण  परिभ्रमण तथा परिक्रमा कर सकता है।

(5) इस परिकल्पना के अनुसार सभी ग्रहों के उपग्रहों को अपने पिता ग्रहों की दिशा में ही घूमना चाहिए। इस तथ्य के विपरीत शनि तथा वृहस्पति के उपग्रह अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में भ्रमण करते हैं। सम्भवत: लाप्लास की परिकल्पना के समय तक केवल ऐसे ही उपग्रहों का पता लग पाया था जो अपने पिता ग्रह के चारों तरफ घूमते थे। बाद में चलकर ऐसे अन्य उपग्रहों की खोज हुई जो कि अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में घूमते हैं।

(6) यदि सूर्य, निहारिका का ही एक भाग है तो तरल अवस्था में होने के कारण इसके बीच में उभार होना चाहिए जिससे यह मालूम पड़ता हो कि एक नवीन छल्ला पृथक् होकर बाहर निकलने ही वाला है। पर ऐसा नहीं देखा जाता है।

(7) लाप्लास यह मानकर चलते हैं कि प्रारम्भ में एक गतिशील तथा तप्त निहारिका थी, पर यह निहारिका कहाँ से आयी? उसमें उष्मा तथा गति कैसे पैदा हुई? इन प्रश्नों का उत्तर इस परिकल्पना से नहीं मिल पाता है।

            इस प्रकार यह कहा जाता है कि लाप्लास की यह परिकल्पना कल्पना मात्र ही है। उपर्युक्त त्रुटियों के आधार पर यह प्रमाणित किया जाता है कि यह ‘निहारिका परिकल्पना’ पृथ्वी की उत्पति के विषय में गलत धारणा तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही साथ पृथ्वी के इतिहास तथा उसके भूगर्भ के विषय में भी गलत तथ्यों का प्रचार करती है। वर्तमान समय में यह परिकल्पना मान्य नहीं है।

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना (Kant’s Gaseous Hyphothesis)

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना

(Kant’s Gaseous Hyphothesis)


काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना 

काण्ट की वायव्य राशि

      पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology (भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology  

(भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)



             स्थलमण्डल के दृश्य भागों अर्थात् स्थलरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है, इसलिए भू-आकृति विज्ञान को स्थलरूपों का विज्ञान कहते हैं। भू-आकृति विज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त किये जाने वाले Geomorphology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ (Geo-पृथ्वी, morphi-रूप और logos-वर्णन) भी स्थलरूपों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

Nature and Scope of ​​Geomorphology

      इस विज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किये जाने वाले उच्चावचनों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है-

(i) प्रथम श्रेणी के उच्चावचन-

        इसके अन्तर्गत महाद्वीप तथा महासागरीय बेसिन को सम्मिलित करते हैं। इनके वितरण, वर्तमान प्रारूप तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय श्रेणी के उच्चावचन–

       इसके अन्तर्गत पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा उत्पन्न रचनात्मक स्थलाकृतियों यथा पर्वत, भ्रंश, पठार, मैदान तथा झीलों का अध्ययन सम्मिलित है। इन स्थलाकृतियों के अध्ययन के लिए पृथ्वी के अन्तर्जात बलों तथा प्रक्रमों के स्वरूप तथा क्रियाविधि का अध्ययन भी आवश्यक होता है।

(iii) तृतीय श्रेणी के उच्चावचन-

      इसके अन्तर्गत बहिर्जात प्रक्रमों (वायुमंडल से उत्पन्न यथा– जल, सरिता, सागरीय जल, भूमिगत जल, पवन, हिमनद एवं परिहिमानी) द्वारा अपक्षय, अपरदन एवं निक्षेपण द्वारा जनित स्थलरूपों की आकारिकी, उत्पत्ति एवं विकास का गहन अध्ययन किया जाता है इन स्थलरूपों को निर्मित्त, प्रभावित एवं परिमार्जित करने वाले प्रक्रमों को सम्मिलित रूप में अनाच्छादनात्मक प्रक्रम (Denudational Processes) कहते है जिसके अंतर्गत अपक्ष्य (Weathering) तथा अपरदन (Erosion, निक्षेपण भी) को सम्मिलित करते है।

थार्नबरी के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलरूपों का विज्ञान है, परन्तु इसमें अन्तः सागरीय रूपों के अध्ययन को सम्मिलित किया जाता है।

स्ट्राहलर के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान भौतिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है जो सभी प्रकार के स्थलरूपों की उत्पत्ति तथा उनके व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विकास की व्याख्या करता है।

ए. एल. ब्लूम के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलाकृतियों तथा उन्हें परिवर्तित करने वाले प्रक्रमों का क्रमबद्ध वर्णन एवं विश्लेषण करता है।

बारसेस्टर महोदय ने इसे पृथ्वी के उच्चावचों का व्याख्यात्मक वर्णन करने वाला विज्ञान कहा है। यह भू-पटल के विभिन्न रूपों, उनकी उत्पत्ति, इतिहास तथा विकास की व्याख्या करता है।

       निष्कर्षतः भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसमें न केवल स्थलरूपों के आकार (आकृति) का अध्ययन किया जाता है अपितु इन स्थलरूपों पर क्रियाशील अपरदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक प्रक्रमों की भी व्याख्या समयानुसार क्रमबद्ध विकास के आधार पर की जाती है।

           ज्ञातव्य है कि भू-आकृति विज्ञान में पृथ्वी सतह पर विद्यमान स्थलरूपों का, उनके ऐतिहासिक विकास क्रम का तथा उन प्रक्रमों का अध्ययन किया जाता है जिनसे स्थलरूपों का निर्माण होता है। इन प्रक्रमों में विवर्तनिक शक्तियाँ (उत्थान, अवतलन) अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण महत्वपूर्ण हैं।

          भौतिक भूगोल और भूविज्ञान (Earth Sciences) दोनों से ही भू-आकृति विज्ञान घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का स्थानिक पैमाने पर (उर्मिकाओं से लेकर पर्वतों तक) और कालिक पैमाने पर (सैकण्ड से लेकर लाखों वर्षों तक) अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः स्थलरूप, जिन पदार्थों से बने हैं (शैल और आवरण सामग्री) तथा जो प्रक्रम एवं बल इन पदार्थों पर क्रियाशील रहते हैं, के बीच सन्तुलन के प्रतीक हैं।

           अपक्षय और अपरदन के प्रक्रम सम्मिलित रूप से क्रियाशील रहकर जहां एक ओर स्थलरूपों का विनाश करते हैं वहीं दूसरी ओर वे स्थलरूपों का सृजन अथवा निर्माण करते हैं। उल्लेखनीय है कि पृथ्वी सतह पर तल शैल अथवा आधार प्रस्तर (Bedrock) और मिट्टी जैसे निष्क्रिय पदार्थों पर जलवायु और भूपृष्ठीय गतियां (Crustal Dynamics) जैसे क्रियाशील कारकों के सक्रिय होने से स्थलरूपों का निर्माण होता है। विभिन्न प्रकार के भू-आकृति प्रक्रमों में गुरुत्व बल महत्वपूर्ण चालक शक्ति होती है।

           गुरुत्व बल के अतिरिक्त सूर्यताप तथा पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भी भू-आकृतिक प्रक्रमों के संचालन में सहायक होती है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भ्रंशन क्रिया को जन्म देती है। इस दृष्टि से पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार, सौरमण्डलीय सम्बन्धों, गतियों, शक्तियों तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन भी भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

         भूदृश्य या दृश्यभूमि के मानव कल्याणकारी उपयोग हेतु स्थलरूपों का अध्ययन एवं उनका सम्यक ज्ञान एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गई है, विशेषकर वर्तमान समय में जबकि भूदृश्य में होने वाले कुछ परिवर्तन मानव एवं प्राकृतिक पर्यावरण के लिए विपत्तिकारक बन चुके हैं। इसी कारण से वर्तमान में मानवीय कार्यों के भू-आकृतिक प्रक्रमों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी इसके अन्तर्गत किया जाने लगा है।

विषय क्षेत्र:-

         विकासवादी भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों के विकास क्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी के अन्तर्गत क्षेत्र के भू-आकृतिकीय विकास की प्रमुख घटनाओं का तिथिकरण किया जाता है।

         डेविस ने स्थलरूपों के विकास क्रम को अपरदन चक्र के द्वारा समझाया है, जिसमें तीव्र ढाल समय के साथ अन्ततः धीमे ढाल वाले पेनीप्लेन में बदल जाता है। अन्य भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं, जिन्हें अनाच्छादन कालक्रम विज्ञानवेत्ता (Denudation Chronologists) कहा जाता है, ने बताया है कि किस तरह प्रादेशिक स्थलरूप समय के साथ हुए अपरदन एवं भूपृष्ठीय सतह के उत्थान की तीव्रता अथवा दर के अनुरूप विकसित हुए हैं। इन्होंने भूतकाल की अपरदनात्मक सतहों पर तिथिकरण द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाने का प्रयास किया।

         कुछ भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं ने परिवर्तित जलवायु के प्रभावों द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाया है। जलवायवीय भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों और उनके ऊपर क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रमों को प्रादेशिक जलवायवीय दशाओं से सम्बन्धित कर अध्ययन किया जाता है। जैसे ठण्डे क्षेत्रों में विद्यमान जलवायवीय दशाओं में हिमनद एक प्रभावी भू-आकृतिक प्रक्रम है जो भूदृश्य में परिवर्तन लाता है। इसी प्रकार वनस्पति विहीन रेगिस्तानी क्षेत्रों में पवन प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रम है।

           चट्टानों के प्रकार और भूगर्भिक संरचना (जैसे भ्रंश और वलन) के स्थलरूपों पर प्रभावों का अध्ययन संरचनात्मक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। अधिकांश भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाशीलता चट्टानों की कठोरता और कोमलता से प्रभावित होती है। इसी तरह अधिकांश ढाल रूप चट्टानों की कठोरता और विन्यास (Disposition) के अनुरूप विकसित होते हैं। स्थलरूपों पर क्रियाशील प्रक्रमों (जैसे अपक्षय, अपरदन) की तीव्रता और प्रकृति का अध्ययन प्रक्रम भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। इसी में नदी बेसिनों और पहाड़ी ढालों पर होने वाले शैल पुंज प्रवाह (Mass Wasting) का अध्ययन किया जाता है। इन गतिशील प्रक्रमों की क्रियाविधि पर मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जैव-भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        मानव ने अपनी गतिविधियों के द्वारा विभिन्न भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाविधि में परिवर्तन ला दिया है। भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा वन विनाश से मृदा अपरदन बढ़ा है। इसी प्रकार अम्ल वर्षा से शैलों के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के उपयोग का अध्ययन व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        आज सम्पूर्ण विश्व में तटीय भागों में अपरदन, हिमनदों का पिघलना और उनकी गति का तीव्र होना, भूस्खलन, जल संयोजकों का अपरदन, बांधों में अवसादों का जमाव, मरुद्यानों और परिवहनों मार्गों पर बालुका स्तूपों का विस्तार, उत्खात भूमि का विस्तार, आदि जैसे समस्याओं की मॉनीटरिंग, पहचान और प्रबन्धन में व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-आकृति विज्ञान को परिभाषित कते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत



पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

         बाल्टर पेंक प्रमुख भू-आकृतिक जर्मन वैज्ञानिक थे। उन्होंने डेविस के अपरदन चक्र सिद्धांत के आलोचना के क्रम में अपरदन चक्र का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किया जो पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। यह डेविस के सिद्धांत की तुलना में अधिक वैज्ञानिकता पर आधारित है। इसमें भू-आकृतिक प्रक्रम की वैज्ञानिक संकल्पना का उपयोग किया गया है।

      पेंक ने डेविस की तरह ही आर्द्र प्रदेशो में प्रवाहित जल या नदियों को अपरदन का प्रमुख कारक मानते हुए अपरदन चक्र का सिद्धांत दिया। इसके अनुसार किसी भी प्रदेश में उत्थान की प्रकिया प्रारम्भ होने के साथ ही अपरदन के कारक सक्रिय हो जाते है। अपरदन का कार्य तब तक घटित होता रहता है, जब तक आधार तल की प्राप्ति न हो जाए।

     आर्द्र प्रदेशो में मुख्य नदी के साथ ही जब सहायक नदियाँ भी आधार तल को प्राप्त कर लेती है तब एक अपरदन चक्र पूर्ण होता है और अंतिम रूप से लगभग समतलप्राय मैदान (इनड्रम्प) का विकास होता है। यहाँ जल विभाजक के अवशेष इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

       पेंक ने उत्थान व अपरदन की सम्मिलित अवधि को अपेक्षाकृत अधिक लम्बे समय तक घटित होने वाली क्रिया माना जबकि केवल अपरदन के समय को अपेक्षाकृत छोटा माना। पेंक ने निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया-

स्थलरुप- उत्थान की प्रावस्था, दर और निम्नीकरण का प्रतिफल होता है।

      इस सूत्र के अनुसार अपरदन की प्रक्रिया विभिन्न प्रावस्था में घटित होती है और प्रत्येक प्रावस्था में उत्थान और अपरदन का विशिष्ट दर होता है। इसी अनुरूप ऊंचाई एवं उच्चावच विषमता में कमी आती है अर्थात निम्नीकरण होता है।

      पेंक ने अपरदन चक्र की पाँच प्रावस्था को बताया। प्रथम तीन प्रावस्था में उत्थान एवं अपरदन दोनों साथ-साथ घटित होते है। अंतिम दो प्रावस्था में केवल अपरदन की क्रिया घटित होती है।

(i) प्रथम प्रावस्था में प्रदेश की ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में वृद्धि हुई है। उंचाई में वृद्धि का कारण उत्थान की दर का अपरदन के दर की तुलना में अधिक होना है, जबकि उच्चावच में वृद्धि का कारण नदियों द्वारा तलीय कटाव की अधिकता है।

(ii) दूसरी प्रावस्था में भी अपरदन की तुलना में उत्थान की दर अधिक होने के कारण ऊंचाई में वृद्धि होती है, लेकिन उच्चावच स्थिर रहता है।

(iii) तीसरी प्रावस्था में उत्थान और अपरदन दोनों के दर समान होते है, अतः ऊंचाई में वृद्धि रुक जाती है जबकि घाटी की उपरी एवं निचले भाग में अपरदन की दर सामान्य होने के कारण उच्चावच स्थिर रहता है।

(iv) चौथी प्रावस्था में उत्थान का प्रभाव समाप्त हो जाने और नदियों द्वारा तलीय कटान के साथ क्षैतिज कटान के प्रभाव से ऊंचाई में कमी आने लगती है, लेकिन घाटी के उपरी और निचले भाग में अपरदन की दर समाप्त होने के कारण उच्चावच स्थिर बना रहता है।

(v) पांचवी अवस्था में क्षैतिज अपरदन की अधिकता, निक्षेपण का प्रभाव तथा तलीय कटान भी लगभग समाप्त हो जाने के कारण ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में कमी आने लगती है। अंततः इन्ड्रम्प जैसी समप्राय मैदान का निर्माण होता है। इसके साथ ही अपरदन का एक चक्र पूर्ण हो जाता है।

पेंक का अपरदन चक्र

           पेंक ने अपरदन चक्र की संकल्पना में ढालों के विकास को पर्याप्त महत्व दिया और ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

पेंक का ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत-

       इसके अनुसार अपरदन चक्र की प्रक्रिया में एक ढाल का दूसरे ढाल में प्रतिस्थापन होता रहता है। सर्वप्रथम उत्तल ढाल का निर्माण होता है जिसका प्रतिस्थापन समढाल में और पुनः समढाल का प्रतिस्थापन अवतल ढाल में हो जाता है।
      जब कई अवतल ढाल परस्पर मिलते है तब इंड्रम्प का विकास होता है। इन ढालो के मध्य में भी जल विभाजक इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार स्पष्ट है की पेंक का अपरदन चक्र मॉडल डेविस के अपरदन चक्र मॉडल की तुलना में अधिक वैज्ञानिक अवधारणा पर आधारित है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने भी पेंक के मॉडल को ही वैज्ञानिक माना। इसी कारण पेंक के मॉडल को अधिक मान्यता प्राप्त है।

नोट:

वाल्टर पेंक  के अनुसार:

        अपरदन चक्र में पाँच चरण होते हैं-

1. प्राइमारम्प (Primarampf)

2. आफस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग  (Aufteingende entwickelung)

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग (Gleichforminge entwickelung )

4. आबस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग (Absteigende entwickelung)

5. इंड्रम्प (Endrufmpf)

1. प्राइमारम्प:-

पेंक के अनुसार प्रारंभ में एक विशेषताहीन सतह होती है जिसे पेंक ने “प्राइमारम्प” या “प्राथमिक पेडप्लेन” कहा।

यह भू-आकृति विकास का एक पूर्व चरण है।

इस चरण में भू-आकृतियों के विकास के बिना एक परिदृश्य मौजूद होता है।

इस अवस्था में कोई पहाड़ नहीं।

भू-आकृतियों का ऊपरी वक्र और निचला वक्र समान होता है।

2. आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

भू-आकृतियाँ विकसित होने लगती हैं।

पहाड़ अचानक उठने लगते  हैं।

घाटियाँ गहरी होने लगती है और संकरी घाटियाँ का निर्माण करती हैं।

उच्चावच बढ़ने लगती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल का विकास होता हैं।

ऊपरी वक्र और निचले वक्र के बीच की ढाल बढ़ती जाती है।

इस चरण में अंतर्जात बल से कम बहिर्जात बल लगते है।

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग :-

        इस चरण में तीन भाग होते हैं।

पहले चरण में उत्थान अपरदन से ज्यादा होता है।

सबसे ऊंची चोटी ऊपरी वक्र में बनती हैं।

दूसरा चरण  में उत्थान और अपरदन लगभग बराबर होते है।

अंतिम चरण में उत्थान की प्रक्रिया कम हो जाती है। धीरे-धीरे घाटी चौड़ा होने लगता है और पर्वत की ऊँचाई भी कम होने लगते हैं।

4. आबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

शिखर या ऊपरी वक्र तेजी से मिटता है।

नदी श्रेणीबद्ध (ग्रेडेड) हो जाती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल रेक्टिलिनियर ढलानों में परिवर्तित हो जाते है।

इस चरण में शंक्वाकार आकार का इंसेलबर्ग बनता है।

5. इंड्रम्प:-

भू-आकृति का विकास रुक जाता है।

पेडिप्लेन अंत में बनता है।

भू-आकृतियों के ऊपरी भागों में कुछ अपरदन होता है और अपरदित पदार्थ भू-आकृतियों के निचले भाग में जमा हो जाता है।

नोट: 

आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।


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23. डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन करें।

23. डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन करें।


डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन

    अमेरिकी भूगोलवेता डेविस की और जर्मन भूगोलवेता बाल्टर पेंक को “आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान” का जन्मदाता माना जाता है। 1889 ई० में डेविस ने ‘ज्योग्राफिकल एसेज’ नामक पुस्तक में जबकि बाल्टर पेंक ने 1924 ई० में अनुसंधान प्रपत्र में “मॉरफोलोजिकल एनालिसिस ऑफ लैण्डफॉर्म” नामक शीर्षक से अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इन दोनों के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर करते हैं। जैसे- समानता और असमानता।

समानताएँ

(i) दोनों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया।

(2) दोनों के अनुसार अपरदन चक्र के प्रारंभ में अपरदन का कार्य तेजी से और बाद में निक्षेपण का कार्य तेजी से होता है।

(3) दोनों ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया। जैसे- जिस प्रकार से मानव जीवनचक्र का पाँच अवस्था होता है और पुनर्जन्म के बाद नयी जीवन चक्र प्रारंभ होता है। ठीक उसी तरह एक अपरदन चक्र समाप्त होता है और पुनरुत्थान के बाद दूसरा अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

(4) दोनों विद्वानों ने बताया कि अपरदन चक्र प्रारंभ होने के लिए उत्थान अति आवश्यक है।

(5) दोनों ने बताया कि बहते हुए जल के द्वारा अपरदन का कार्य आधारतल (S.L.) तक होता है।

(6) दोनों वैज्ञानिकों ने यह प्रकट किया कि अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है।

असमानताएँ:-

         वास्तव में डेविस एवं पेंक का विचार समानता के लिए नहीं बल्कि असमानता के लिए जानी जाती है। दोनों के विचारों को चार आधार पर अन्तर स्थापित किया जा सकता है-

(1) उत्थान के संदर्भ में

(2) समय के संदर्भ में

(3) ढाल विकास के संदर्भ में

(क) समप्राय मैदान के संदर्भ में

(1) उत्थान के संदर्भ में

          दोनों विद्वानों ने अपरदन चक्र की शुरूआत के लिए उत्थान को अनिवार्य माना है। लेकिन उत्थान की प्रक्रिया और स्थलाकृति पर उसके प्रभाव के संदर्भ में अलग-2 विचार है। जैसे- डेविस ने कहा कि उत्थान के बाद अपरदन होती है, जबकि पेंक के अनुसार उत्थान के साथ-2 अपरदन का कार्य चलता है। डेविस के अनुसार उत्थान में समय बहुत कम लगता है, इसलिए यह कार्य तीव्र गति से सम्पन्न होती है जबकि पेंक के अनुसार उत्थान में समय बहुत अधिक लगता है, इसलिए उत्थान का कार्य मंद गति से होती है। डेविस के अनुसार उत्थान का कार्य एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है जबकि पेंक के अनुसार यह एक अनियमित प्रक्रिया है।

परीक्षण

       डेविस और पेंक के उत्थान के संबंध में व्यक्त किये गए विचारों का अगर परीक्षण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि पेंक का विचार अधिक वैज्ञानिक है। होम्स के द्वारा प्रस्तुत संवहन तरंग सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पेंक के विचारों को समर्थन करते हैं।

      डेविस और पेंक ने उत्थान और अपरदन के संदर्भ में जो मॉडल प्रस्तुत किया है उसमें भी स्पष्ट रूप से अन्तर दिखाई देता है।

डेविस और पेंक

नोट:

⇒ युवावस्था- केवल अपरदन का कार्य होता है।

⇒ प्रौढावस्था- अपरदन + निक्षेपण दोनों का कार्य होता है।

⇒ वृद्धावस्था- केवल निक्षेपण का कार्य होता है।

(2) समय के संदर्भ में:-

       दोनों विद्वानों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत समय के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। लेकिन डेविस ने अपरदन चक्र तीन अवस्थाओं में और पेंक पाँच दशाओं (Phases) में वर्गीकृत किया है।

       डेविस ने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों के निर्माण में 5 अपरदन दूत (नदी, शुष्क पवन, हिमानी, समुद्री तरंग, भूमिगत जल) का प्रभाव पड़ता है। जबकि पेंक के अनुसार अपरदन चक्र बाह्य अपरदन दूत के अतिरिक्त आन्तरिक कारक के सहभागिता से संचालित होती है।

          डेविस के अनुसार युवास्था में तलीय अपरदन अधिक होती है, जिसके कारण उच्चावच में तेजी से वृद्धि होती है। जलविभाजक रेखा चौड़ा होता है। प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन अधिक होती है। जिससे V-आकार की घाटी विकसित होती है। जलविभाजक की चौड़ाई कम होने लगती है। फलतः उच्चावच में भी कमी आने लगती है। वृद्धावस्था में अपरदन का कार्य समाप्त हो जाता है जिसके कारण इस अवस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। उच्चावच और जल-विभाजक अति न्यून रह जाती है। पेंक के अनुसार स्थलाकृतियों का विकास 5 दशाओं में सम्पन्न होता है। प्रत्येक दशा के विशेषताओं का उल्लेख नीचे के तालिका में किया गया है-

दशा/अवस्था उत्थान सापेक्षिक ऊँचाई उच्चावच
प्रथम सक्रिय वृद्धि वृद्धि
द्वितीय सक्रिय ह्रास स्थिर
तृतीय सक्रिय स्थिर स्थिर
चतुर्थ स्थिर या समाप्त स्थिर स्थिर
पंचम निष्क्रिय तीव्र ह्रास  ह्रास

        उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समय के संदर्भ में दोनों के विचार में कई मौलिक अन्तर हैं।

(3) ढाल के संदर्भ में:-

         डेविस का सिद्धांत ढाल ह्रास का सिद्धांत कहलाता है जबकि पेंक का सिद्धांत ढाल प्रतिस्थापना का सिद्धांत कहलाता है। डेविस ने बताया कि उत्थान के बाद ढाल अति तीव्र होती है जिसके कारण I-आकार की घाटी विकसित होती है। उसके बाद नदी घाटी के दीवारों का क्रमिक ह्रास होता है।

        प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन के कारण नदी घाटी के दीवारों का तेजी से कटाव होता है जिसके कारण ढाल में पुनः कमी आती है और V- आकार की घाटी विकसित होती है। वृद्धावस्था में क्षैतिज अपरदन और अधिक हो जाने पर  खुली V- आकार की घाटी विकसित होती है जिसके कारण जल-विभाजक रेखा उत्तल ढाल के समान और नदी घाटी अवतल ढाल के समान दिखाई पड़ती है।

       पेंक के अनुसार ढाल प्रतिस्थापन होता है न कि क्रमिक ह्रास होता है। उन्होंने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान तीन प्रकार के ढाल विकसित होते हैं-

(i) उत्तल ढाल- इसे उन्होंने आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग से संबोधित किया।

(ii) समढाल- इसे उन्होंने ग्लीचफोर्मिंग इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

(iii) अवतल ढाल- इसे उन्होंने अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ढाल के संदर्भ में व्यक्त किये गये विचार में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक पेंक का विचार है।

नोट :

आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इन्टवकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।

(4) समप्राय मैदान के संदर्भ में:-

           दोनों ने अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान विकसित होने की संकल्पना प्रस्तुत की है। इसे डेविस ने समप्राय मैदान से सम्बोधित किया है। जबकि पेंक ने लगभग समतल मैदान को Endrumpf (इन्ड्रम्प) और Primarumpf (प्राइमारम्प) से सम्बोधित किया है। पेंक ने बताया कि एक अपरदन चक्र के अन्त में विकसित होने वाला लगभग समतल मैदान (Endrumpf) कहलाता है। लेकिन जब दूसरा अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है तो अपरदन चक्र के पूर्व विकसित समतल मैदान को Primarumpf (प्राइमारम्प) कहते हैं। 

          डेविस ने बताया कि समप्राय मैदान में कहीं-कहीं कठोर चट्टानें दिखाई देती हैं, उसे मोनाडनॉक कहा जाना चाहिए। जबकि पेंक ऐसे कठोर चट्टानों को इन्सेलवर्ग से सम्बोधित किया है।

निष्कर्ष:

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ समानताओं के बावजूद उनके चिन्तन में कई मौलिक विषमताएँ है। ये विषम‌ताएँ ही आधुनिक भू-आकृतिक विज्ञान के आधार का कार्य किया है।


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22. भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है। का व्याख्या करें।

“भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है।” का व्याख्या करें।


“भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है।”

           अमेरिकी भूगोलवेता डेविस ने 1889 ई० में “अपरदन चक्र का सिद्धांत” प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने भूदृश्य को संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन या परिणाम बताया।

        उपरोक्त कथन में प्रयुक्त भूदृश्य का तात्पर्य ऐसे भौगोलिक प्रदेश से है जिसमें विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों का समूह पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों की समूह आपस में मिलकर विशिष्ट भूदृश्य का निर्माण करते हैं। जैसे- गंगा का मैदान एक विशिष्ट भूदृश्य है। जिसमें गोखुर झील, प्राकृतिक बाँध, नदी विसर्प, बाढ़ का मैदान, टाल, चौर, जल्ला जैसे स्थलाकृति मिलते है।

        इस कथन में उन्होंने बताया है कि भूदृश्य पर संरचना, प्रक्रम और अवस्था का प्रभाव पड़ता है। इन प्रभावों को नीचे के शीर्षकों में देखा जा सकता है:-

(1) भूदृश्य के विकास में संरचना का प्रभाव:-

           डेविस ने बताया कि संरचना का तात्पर्य किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के भूगर्भिक काल, भूगर्भिक विकास, भूगर्भिक ढाल, चट्टानों की व्यवस्था और चट्टानों की कठोरता से है।

         डेविस ने यह भी बताया कि कहीं भी अपरदन चक्र की शुरुआत भूगर्भिक उत्थान के बाद ही होता है। इससे अपने-आप स्पष्ट होता है कि भूदृश्य के विकास के लिए भूगर्भिक विकास आवश्यक है। पेंक महोदय ने बताया था कि उत्थान के साथ-2 अपरदन की क्रिया चलती है जिसके कारण अनेक स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

        भूदृश्य के विकास पर भूगर्भिक आयु या चट्टानों की आयु का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- अधिक आयु के कारण चट्टानें मृत हो जाती हैं जिनका अपरदन आसानी से संभव है। दूसरी ओर कम उम्र की चट्टानें, सुदृढ़ और संगठित रहती है। फलत: उनका अपरदन तेजी से संभव नहीं हो पाता है। जैसे- भारत का अरावली पर्वत धारवाड़ युग का बना हुआ है। जबकि दक्कन का पठार क्रिटेशियस युग का बना हुआ है। अधिक समय बीत जाने के कारण अरावली अवशिष्ट पर्वत में बदल चुका है। जबकि दक्कन के पठार पर अभी भी कठोर चट्टानें भूगर्भ में पाये जाते हैं।

       भूदृश्य के विकास पर भूगर्भिक ढाल का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों के नदियों में I-आकार की घाटी, गॉर्ज, दर्रा, उच्छलिका (क्षिप्रिका), जलप्रपात इत्यादि का निर्माण होता है। जबकि मंद ढाल वाले क्षेत्रों में नदी दोआब, बाढ़ का मैदान, प्राकृतिक बाँध, विसर्प, डेल्टा इत्यादि का निर्माण होता है।

         भूदृश्य के विकास पर चट्टानों की व्यवस्था का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे-मरुस्थलीय क्षेत्रों में अगर कठोर एवं मुलायम चट्टानें वैकल्पिक एवं लम्बवत रूप से अवस्थित हो तो यारदांग और क्षैतिज स्थित हो तो ज्यूगेन नामक स्थलाकृति का निर्माण करते हैं।

       भूदृश्य के व्यवस्था पर चट्टानों की कठोरता का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- चुना प्रधान वाले क्षेत्रों में चट्टानें जल में घुलनशील होती है। जिसके कारण घोल रन्ध्र, विलयन रन्ध्र, युवाला, पोल्जे, पोनोर स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। इसी तरह जिन क्षेत्रों में बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट, बैसाल्ट जैसे कठोर चट्टानें मिलती है, वहाँ पर अपरदन का कार्य नगण्य होता है। फलत: सपाट या उबड़-खाबड़ भूदृश्य का विकास होता है।

          इस तरह स्पष्ट है कि भूदृश्य के निर्माण पर संरचना का जबड़दस्त प्रभाव पड़ता है।

(2) भूदृश्य पर प्रक्रम का प्रभाव:-

        डेविस महोदय ने बताया कि प्रक्रम का तात्पर्य स्थलाकृति निर्माण करने वाले कारकों से है। डेविस ने कहा कि स्थलाकृतिक के निर्माण में अपरदन के पाँचों दूत जैसे बहता हुआ जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग और भूमिगत जल का प्रमुख योगदान है। लेकिन पेंक के अनुसार स्थलाकृति निर्माण में बाह्य कारकों के साथ-2 आन्तरिक कारकों का योगदान होता है। जैसे- आन्तरिक भूसंचलन के कारण धरातल में विषमताएँ उत्पन्न होती हैं। जैसे- उत्थान की क्रिया से विषम ढाल का निर्माण होता है। और बाह्य क्रिया (पाँचों अपरदन के दूत) सक्रिय होकर नई-2 स्थलाकृतियों का निर्माण करते हैं। स्पष्ट है कि प्रक्रम के तहत आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के क्रियाओं को शामिल करते हैं। बाह्य कारक के द्वारा अपरदन एवं निक्षेपण दोनों कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। किसी भी अपरदन दूत की अपरदनात्मक क्षमता मौजूद धूणकण, जल की मात्रा, गति, ढाल की तीव्रता इत्यादि पर निर्भर करती है।

           डेविस ने बताया कि आन्तरिक भूसंचलन के कारण पहले उत्थान होता है उसके बाद अपरदन की क्रिया आरंभ होती है। जबकि पेंक ने कहा कि उत्थान एवं अपरदन की क्रिया साथ-साथ चलती है। अपरदन के पाँचों दूत निम्नलिखित स्थलाकृतियों को जन्म देते हैं-

अपरदन के दूत प्रभावित क्षेत्र अपरदनात्मक स्थलाकृति  निक्षेपात्मक स्थलाकृति 
(i) बहता हुआ जल  आर्द्र प्रदेश I एवं V आकार की घाटी, जलप्रपात, गॉर्ज, कैनिय, क्षिप्रिका, मोनाडनॉक, समप्राय मैदान डेल्टा, प्राकृतिक बांध, बाढ़ का मैदान
(ii) शुष्क जलवायु मरुस्थलीय प्रदेश  गारा, यारदांग, ज्यूगेन लोएस, बालुका स्तूप 
(iii) हिमानी पर्वतीय चोटी  एवं ढाल, ध्रुवीय प्रदेश  U-आकार की घाटी, लटकती घाटी, सर्क, रॉक बेसिन ड्रमलिन, एस्कर, टील मैदान
(iv) समुद्री तरंग तटीय प्रदेश  समुद्री क्लिफ, समुद्री मेहराव स्पीट, टोम्बोलो
(v) भूमिगत जल कार्स्ट प्रदेश घोलरंध्र, युवाला, पोल्जे, डोलाइन स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, कन्दरा स्तम्भ

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूदृश्य के निर्माण में प्रक्रम का भी प्रभाव पड़ता है।

प्रक्रम

गॉर्ज या कैनियन

भूदृश्य संरचना

V-आकार की घाटी

(3) भूदृश्य के निर्माण में अवस्था का प्रभाव:-

          यहाँ पर अवस्था का तात्पर्य समय से है। डेविस के अनुसार अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों का विकास तीन अवस्था में होता है- (i) युवावस्था, (ii) प्रौढ़ावस्या और (iii) वृद्धावस्था।

        सामान्य रूप से युवावस्था में अपरदन, प्रौढ़ावस्था में अपरदन एवं विक्षेपण और वृद्धावस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। डेविस के अनुसार इन अवस्थाओं की सीमा निर्धारित नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह चट्टानों की आयु, धरातल के ढाल एवं ऊँचाई, अपरदन के दूतों की क्षमता इत्यादि पर निर्भर करती है। अतः अवस्था की पहचान समय के आधार पर नहीं बल्कि स्थलाकृति के आधार पर किया जाता है। जैसे-

अवस्था विशेषता एवं स्थलाकृति
(i) युवावस्था

I-आकार की घाटी, बंद V-आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, क्षिप्रिका, जलप्रपात, सरिता अपहरण, बेमेल विसर्प (Misfit or Unfit Meander), जल विभाजक चौड़ा, तलीय अपरदन अधिक, उच्चावच अधिकतम।

(ii) प्रौढ़ावस्था

गोखुर झील, विसर्प, क्षैतिज अपरदन, अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य साथ-2।

(iii) वृद्धावस्था मोनाडनॉक, समप्राय मैदान, खुली V-आकार की घाटी, उच्चावच न्यूनतम, जलविभाजक सबसे कम, केवल निक्षेपण का कार्य।

निष्कर्ष

        उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूदृश्य के विकास पर अवस्था का भी प्रभाव पड़ता है। डेविस महोदय ने उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ठीक ही कहा था कि “भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और अवस्था का फलन होता है।”

नोट: 

चौर- नदी का पुराना मार्ग,

जल्ला- जहाँ सालोभर पानी रहता है


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21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

(Poly or Multi Cycle Topography)



बहुचक्रीय स्थलाकृति

     बहुचक्रीय स्थलाकृति को पुनर्युवनित भूआकृति या नवोन्मेष के नाम से जानते हैं। इस शब्द का प्रथम प्रयोग डेविस महोदय ने किया था। प्रारंभ में उन्होंने एक चक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। लेकिन जब इनकी आलोचना होने लगी तो बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। डेविस ने बताया कि एक चक्रीय अपरदन चक्र वहीं पर चल सकता है। जहाँ पर:-

(i) समुद्र तल या आधारतल में लम्बी समय तक परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

(ii) भूसंचलन की क्रिया नहीं हो रहा हो।

(iii) जलवायु के दशाओं में परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

        तीनों ही कारकों का लम्बे समय तक स्थिर रहना असंभव है। वस्तुतः भूसंचलन या जलवायु परिवर्तन आने से आधारतल में परिवर्तन होने से पूर्व से चले आ रहे अपरदन चक्र की क्रिया बाधित होती है और नवीन अपरदन चक्र की क्रिया प्रारंभ होती है। नवीन अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है। इसलिए इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते हैं। छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में बहुचक्रीय स्थलाकृति का प्रमाण मिलता है।

         आधारतल में परिवर्तन लाने वाले कारकों को नवोन्मेष कहते हैं। नवोन्मेष के कारण कोई भी भूखण्ड का पुनरुत्थान होता है जिसे पुनर्युवनित कहते हैं। नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते हैं।

       किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन संभावना है-

(i) आन्तरिक क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) बाह्य क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) स्थैतिक नवोन्मेष

        आन्तरिक क्रिया के अन्तर्गत भूसंचलन को शामिल करते हैं। भूसंचलन के कारण भूखण्डों का पुनरुत्थान हो सकता है। जिससे नवीन अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

आतंरिक बल के कारण नवोन्मेष या गतिक नवोन्मेष

        बाह्य नवोन्मेष में जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों को शामिल करते हैं।

बाह्य क्रिया द्वारा नवोन्मेष या सुस्थैतिक नवोन्मेष

       कभी-2 बिना आधारतल में परिवर्तन के भी अपरदन की गति में परिवर्तन होता है। जैसे- अगर किसी कारणवश बहता हुआ जल में कंकड़-पत्थर, बालू, जैसे जलोढ़ पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है तो तलीय अपरदन एवं क्षैतिज अपरदन में वृद्धि हो जाती है जिसे स्थैतिक नवोन्मेष कहते हैं।

स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण:-

           किसी भौगोलिक प्रदेश में बहुचक्रीय स्लाथाकृतियों की पहचान 5 प्रकार के स्थलाकृतियों से करते हैं।

(1) निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिकाएं (River Terraces)

(3) अध: कर्ति विसर्प (INCISED OR ENTRENCHED MEANDERS)

(4) संगत शिखर

(5) अपरदन सतह

(1) निक प्वाइन्ट

         जब किसी नदी मार्ग का ऊपरी भाग उठ जाय या निचली भाग धँस जाय तो धँसान या उत्थान रेखा के सहारे तीव्र ढाल का विकास होता है। ऐसे तीव्र ढाल वाले रेखा को निक प्वाइन्ट कहते हैं। ऐसे ढाल पर नदी का पानी तेजी से नीचे गिरने लगता है जिससे जलप्रपात का निर्माण होता है।

उत्थान से निर्मित निक प्वाइंट

धंसान से निर्मित निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिका

         अगर नदी का अनुप्रस्थ काट लेते हैं तो नदी का किनारा सीढ़ी के समान दिखाई देता है।

जैसे:-

बहुचक्रीय स्थलाकृति

           जब नदी वृद्धावस्था के दौर से गुजरती है तो V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। लेकिन जब वृद्धावस्था के दौरान ही पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो तलीय अपरदन में वृद्धि से कम खुली हुई V-आकार की घाटी का निर्माण होता है। जिसके कारण घाटी के अन्दर घाटी का निर्माण होता है जिसे नदी वेदिका कहते हैं। जैसे- वोल्गा नदी और दामोदर नदी घाटी में।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प

        अन्तिम प्रौढ़ावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है जिसे विसर्प कहते है। जब पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो नदी के मोड़ पर तलीय अपरदन की वृद्धि से मोड़ पर घाटी के अन्दर मोड़ लेती हुई घाटी विकसित होती है। जिसे अध: कर्तिक विसर्प कहते हैं। जैसे- हजारीबाग के पठार पर दामोदर नदी कई अध: कर्तिक विसर्प का निर्माण की है।

(4) संगत शिखर

          अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे संगत शिखर कहते हैं। संगत शिखर का निर्माण अलग-2 काल में भूपटल के उत्थान एवं धँसान से होता है। दो संगत शिखर वाले पर्वतों के बीच में बहने वाली नदी घाटी संकरी होती है। इसका प्रमाण स्कॉटलैण्ड के स्कैन्डिनेवियन पर्वतीय क्षेत्र में देखा जा सकता है।

(5) अपरदन सतह

        डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अंतिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते हैं। जैसे-छोटानागपुर का पठार एक उत्थित समप्राय मैदान का उदाहरण है। इस पठार पर तीन बार हुए उत्थान का प्रमाण मिलता है। जिसके कारण पात का पठार, राँची का पठार, कोडरमा या हजारीबाग का पठार नामक अपरदन सतह का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष: पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है। 

नोट: 

नवोन्मेष / पुनर्युवन:- एक सक्रिय चक्र में बाधा उत्पन्न होने पर स्थलखण्ड पर नये चक्र का प्रारंभ होना नवोन्मेष पुनर्युवन कहलाता है।

बहुचक्रीय स्थलाकृति:- एक से अधिक अपरदन चक्रों द्वारा निर्मित स्थलाकृति को बहुचक्रीय स्थलाकृति कहा जाता है।

    नवोन्मेष तीन प्रकार के होते है:-

(i) गत्यात्मक नवोन्मेष, जैसे- स्थलखण्ड का उत्थान

(ii) सुस्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- साग तल का नीचा होना

(iii) स्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- नदी के बोझ में कमी, नदी अपहरण, अधिक वर्षा से नदी जल में वृद्धि होना।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




बहुचक्रीय स्थलाकृति

          जब नवीन अपरदन चक्र और पूर्व  के अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है तो उसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते है। इसका प्रमाण छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में मिलता है। बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत सर्वप्रथम डेविस महोदय ने दिया था।

           नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते है। इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति के नाम से भी जानते है।

नवोन्मेष के प्रकार 

             किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन प्रकार की संभावनाएँ होती है जिसे चित्रों द्वारा समझा जा सकता है-

(1) गतिक नवोन्मेष

(2) सुस्थैतिक नवोन्मेष

(3) स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण

(1) निक प्वाइंट-

            जिस तीव्र ढाल के सहारे नदी मार्ग का उत्थान या धंसान होता है, उसे निक प्वाइंट कहते है।

(2) नदी वेदिका-

            जब नदी के वृद्धा अवस्था में पुनरुत्थान होता है और इसके बाद घाटी के अन्दर घाटी घाटी का निर्माण होता है, जिसे नदी वेदिका कहते है।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प-

           अंतिम प्रौढावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है इस अवस्था में जब पुनरुत्थान होता है तो नदी विसर्प के अन्दर विसर्प का निर्माण करती है तो उसे अद्य: कर्तिक विसर्प कहते है।

(4) संगत शिखर-

            अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे सांगत शिखर कहते है।

(5) अपरदन सतह/ उत्थित समप्राय मैदान- 

              डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते है।

निष्कर्ष:

          उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष या पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है।



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20. Peneplain (समप्राय मैदान)

20. समप्राय मैदान (Peneplain)


समप्राय मैदान (Peneplain)⇒

           समप्राय मैदान (Peneplain) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिकी भूगोलवेत्ता डेविस ने किया था। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल अपरदन का प्रमुख दूत होता है। बहता हुआ जल अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में एक लगभग समतल मैदान का निर्माण करती है जिसे समप्राय मैदान कहते है। इस तरह डेविस ने स्पष्ट किया कि समप्राय मैदान के विकास के लिए भूमि का उत्थान और उस पर अपरदन चक्र का सक्रिय होना आवश्यक है। 

     पेंक के अनुसार अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में जो समप्राय मैदान विकसित होते हैं उसे इन्ड्रम्प और प्राइमारम्प कहते हैं। इन्ड्रम्प अपादन चक्र की अन्त में बनने वाला समप्राय मैदान है जबकि प्राइमारम्प उत्थान के पूर्व की अवस्था है।

       क्रीकमे महोदय ने समप्राय मैदान को परिभाषित करते हुए कहा यह एक ऐसा मैदान है जिसमें अपरदन एवं निक्षेपण दोनों कार्यों से निर्मित होता है। क्रीकमे ने अपनी संकल्पना सवाना प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया और इन्होंने समप्राय मैदान को पैनप्लेन (Panplain) से सम्बोधित किया।

        L.C. किंग महोदय ने बताया कि समतल मैदान के साथ जब कहीं कठोर चट्टानें मिलती हैं तो वैसे भूभाग को समप्राय मैदान कहते हैं। इनके अनुसार समप्राय मैदान का निर्माण केवल अपरदन से होता है। L.C. किंग ने समप्राय मैदान को पेडीप्लेन (Pediplain) से सम्बोधित किया है। इन्होंने अनी संकल्पना मरुस्थलीय क्षेत्र के संदर्भ में प्रस्तुत किया था।

Peneplainसमप्राय मैदान की विशेषताएँ:-

(1) यह लगभग समतल मैदान होता है।

(2) V- आकार की घाटी अत्यन्त खुली हुई होती है।

(3) उच्चावच अत्यन्त न्यून होता है।

(4) जलविभाजक के स्थान पर कठोर चट्टानें लम्बवत दिखाई देती हैं जिसे डेविस ने मोनैडनॉक और पेंक एवं L.C. किंग ने इन्सेलबर्ग से सम्बोधित किया है।

(5) समप्राय मैदान में बहने वाली मुख नदी अपने आधार तल को प्राप्त कर होती है। जबकि पेंक के अनुसार इन्ड्रम्प सम्प्राय मैदान में मुख नदी और प्राइमारम्प अवस्था में मुख्य नदी के साथ-2 सहायक नदियाँ भी अपने आधारतल को प्राप्त कर लेती है।

समप्राय मैदान के प्रकार:-

          समप्राय मैदान चार प्रकार के होते हैं।

(1) स्थानीय समप्राय मैदान- प्रमाण नहीं

(2) प्रादेशिक समप्राय मैदान- प्रमाण नहीं

(3) उत्थित समप्राय मैदान- छोटानागपुर का पठार, स्कैण्डेनेवियन का पठार

(4) अध्यारोपित समप्राय मैदान- SHEMAN क्षेत्र (USA)

          अंतिम दो समप्राप्त मैदान का प्रमाण मिलता है। लेकिन, प्रथम दो का प्रमाण नहीं मिला है। छोटानागपुर का पठार और स्कैण्डेनेविय‌न पठार उत्थित समप्राय मैदान के उदाहरण है जबकि USA के वायोमिंग राज्य में स्थित SHEMAN क्षेत्र अध्यारोपित समप्राय मैदान का उदाहरण है।

           चूँकि स्थानीय और प्रादेशिक समप्राय मैदान का प्रमाण नहीं मिलता है। इसलिए समप्राय मैदान की संकल्पना की कटु आलोचना की जाती है। स्थलाकृतिक वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक कोरी कल्पना है। लेकिन डेविस महोदय ने कहा कि यदि समुद्रत लम्बी अवधि तक स्थिर हो तो स्थानीय प्रादेशिक समप्राय मैदान भी विकसित होंगें। वर्तमान में समुद्रतल की आयु 5½ हजार वर्ष है। इतने कम समय में समप्राय मैदान का विकास संभव नहीं है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद अपदन की प्रवृत्ति यह इशारा करती है कि अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में लगभग समतल मैदान या समप्राय मैदान का विकास होता है।


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