Archives August 2023

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

भारत के आर्थिक

               भारत एक मानसूनी जलवायु प्रधान देश है। यहाँ मानसून की उत्पति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायुसंचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होता है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से 80% वर्षा होती है जबकि 20% वर्षा  उ०-पू० मानसून एवं पछुआ विक्षोभ से होती है।

        भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव निम्नलिखित क्षेत्रों पर पड़ता है:-

(1) कृषि पर प्रभाव:-

        भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। भारत में कृषि मानसून पर निर्भर करती है। जिस वर्ष मानसून भारत में समय पर आती है और मानसून सामान्य रहती है तो उस वर्ष भारतीय किसानों के घर अन्न से भर जाते हैं। यदि मानसून समय पर नहीं आती है और अनावृष्टि या अतिवृष्टि होती है तो फसलें बर्बाद हो जाती है जिससे हमारे भारतीय किसानों को काफी क्षति उठानी पड़ती है। इसीलिए कहा भी जाता है कि-“भारतीय किसान मानसून के साथ जुआ खेलते है।”

(2) उद्योगों पर प्रभाव:-

       भारत के कई उद्योग कृषि पर आधारित हैं; जैसे- चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, कागज उद्योग, जूट उद्योग, चावल मील, इत्यादि। यदि भारतीय मानसून गन्ना, कपास, धान आदि फसलों को बर्बाद करती है तो इन उद्योगों में कच्चे माल की कमी हो जाती हैं। जब मानसून का प्रभाव अच्छा रहता है तो आसानी से इन उद्योगों को पर्याप्त कच्चे माल मिल जाते हैं।

(3) मत्स्य पालन पर प्रभाव:-

          भारतीय मानसून से पर्याप्त वर्षा होती हैं तो यहाँ के छोटे-बड़े तालाबों में पर्याप्त जल संग्रहित कर लिये जाते हैं जिससे इन जलाशयों में मत्स्य पालन का कार्य किया जाता है।

(4) पशुपालन पर प्रभाव:-

     भारतीय मानसून से अतिवृष्टि या अनावृष्टि होने से फसलें नष्ट हो जाती है। चारागाह पर चारे की फसले नष्ट हो जाती है जिसके कारण पशुओं के लिए चारा की कमी हो जाती है। फलस्वरूप पशुपालन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है। यदि मानसून सामान्य प्रका की होती है तो पशुपालन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फलतः दुध एवं माँस के उत्पादन में वृद्धि होती हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. भात के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव का वर्णन करें

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

भारत में शीतकालीन वर्षा

          भारत में जाड़े की ऋतु में होने वाली वर्षा को शीतकालीन वर्षा कहते हैं। यह वर्षा दो प्रकार की होती है। एक- पछुआ विक्षोभ के कारण होने वाली वर्षा और दूसरा- उ०-पू० मानसून की वर्षा। पछुआ विक्षोभ के कारण उ०-पू० भारत में वर्षा होती है। जबकि उ०-पू० मानसून से भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा होती है। इन दोनों प्रकार की वर्षा से भारत के आर्थिक जीवन की कई क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है। जैसे-

(1) कृषि पर प्रभाव⇒

          भारत में पछुआ विक्षोभ के कारण जाड़े की ऋतु में वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ एवं अन्य रबी फसल के लिए फायदेमंद होती है। पंजाब में यह वर्षा जनवरी या फरवरी महीने में होती है। यहाँ की कृषि के लिए यह वर्षा काफी महत्व रखती है क्योंकि वहाँ की रबी फसल की सफलता इस वर्षा पर निर्भर करती है।

       उ०-पूर्वी मानसून से मुख्यतः भारत के पूर्वी तटीय भागों में वर्षा होती है। यह वर्षा विशेष रूप से तमिलनाडु में होती है। इस वर्षा से मुख्यतः रबी फसलों की सिंचाई होती है, जिसके कारण उसके उत्पादन में वृद्धि होती है। उत्पादन में वृद्धि होने से किसानों की आमदनी बढ़ती है। शीतकालीन वर्षा का कृषि पर कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ते है। जैसे:- यदि एक सप्ताह तक शीतकालीन वर्षा के कारण मौसम गड़बड़ रहती है तो मौसम खराब रहने के कारण आलू, प्याज, मसूर आदि फसलों को पाला लग जाती है। इसके कारण उत्पादन में कमी हो जाती है और किसानों को काफी हानि उठानी पड़ती है।

प्रश्न प्रारूप

1. भात में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन प प्रभाव बतायें।

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व


प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व       

          भारत में प्राचीनतम कल्प से लेकर नवीनतम कल्प की चट्टानें पायी जाती हैं। प्राचीनतम कल्प में एक प्रमुख चट्टान धारवाड़ समूह की है। इसका निर्माण 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 1500 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच मानी जाती है। यह मूलत: प्री कैम्ब्रीयन  कल्प की चट्टान है जिसका खोज सर्वप्रथम राबर्ट ब्रशफुट महोदय ने कर्नाटक के धारवाड़ जिला से किया था।

धारवाड़ क्रम के चट्टानों की विशेषताएँ

      धारवाड़ चट्टान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं। जैसे- 

(1) यह भारत का सबसे प्राचीनतम परतदार चट्टान का उदाहरण है।

(2) लम्बे समय के कारण इसका काफी रूपान्तरण हो चूका है।

(3) धारवाड़ क्रम  के चट्टानों से किसी भी प्रकार का जीवाश्म नहीं मिलता है क्योंकि उस वक्त पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति हुई ही नहीं थी।

(4) धारवाड़ समूह की चट्टानों में नीस और शिस्ट प्रकार की चट्टानें मिलती हैं।

(5) प्री कैम्ब्रीयन कल्प में भूपटल के फैलाव और सिकुड़न से कई महासागरों और प्राचीन मोड़दार पर्वतों का निर्माण हुआ है। राजस्थान की अरावली की पहाड़ी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

(6) भारत में इसका विस्तार 15600 वर्ग किमी० क्षेत्र में हुआ है।

(7) भारत में धारवाड़ प्रकार की चट्टान कर्नाटक के धारवाड़ जिला, विशाखापत्तनम के पास कूदोराइट श्रेणी की चट्टान, रीवा & हजारीबाग के बीच में गोंडाइट क्रम की चट्टान, जम्मू-कश्मीर की सेलखाला क्रम की चट्टान, राजस्थान के अरावली क्षेत्र में, झारखण्ड और उड़ीसा के सीमा पर लौहक्रम की चट्टान, धारवाड़ समूह के चट्टान माने जाते हैं।

प्राचीनतम कल्पआर्थिक महत्व

         धारवाड़ क्रम की चट्टानें भारत में धात्विक खनिजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस चट्टान से लोहा, सोना, मैगनीज, यूरेनियम, ताम्बा, जिंक, क्रोमियम जैसे- धात्विक खनिज प्राप्त किये जाते हैं। राजस्थान की खेतरी का खान ताम्बा के लिए प्रसिद्ध रही है।

         कर्नाटक, गोआ, झारखण्ड, उड़ीसा इत्यादि से हेमाटाइट और मैग्नेटाइट जैसे लौह अयस्क प्राप्त किये जाते है।मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा, बाला घाट, उड़ीसा के कालाहांडी और बोलांगिर क्षेत्र से मैंग्नीज प्राप्त किया जाता है।

        धारवाड़ क्रम की चट्टानों से एस्बेस्ट, कोबाल्ट, अभ्रक, प्लेटीनम, सूरमा, सीसा, फ्यूराइट, इल्मेनाइट (नाभिकीय खनिज का स्रोत), गारनेट, संगमरमर, कोरंडम जैसे खनिज भी प्राप्त किये जाते हैं। 

    धारवाड़ क्रम चट्टानें भारत में लाल और लैटेराइट मिट्टी के निर्माण में भी सहायक रहा है जो विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों के लिए आधार का कार्य करती है।

निष्कर्ष

       इस ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि धावाड़ क्रम की चट्टानें अपनी विशिष्टता एवं आर्थिक महत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध रही हैं।

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व


भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

         भारत में विभिन्न भूगर्भिक काल में निर्मित अनेक प्रकार की चट्टानें पायी जाती हैं। इसका संबंध पैलियोजोइक महाकल्प के कार्बोनीफेरस कल्प से लेकर मीसोजोइक कल्प के मध्य रहा है।

भारत में गोण्डवाना क्रम की चट्टानें

        ‘गोंडवाना’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1872 ई० में एच०बी० मेडलीकॉट और 2876 ई० में ओ० फीस्टमेंटल महोदय ने किया था। इस शब्द की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के गोंड क्षेत्र से हुआ है क्योंकि सबसे पहले गोण्ड जनजातियों के निवास क्षेत्र से ही गोंडवानाक्रम की चट्टानों की खोज की गई थी। बाद में इस प्रकार की चट्टानें जहाँ कहीं भी प्राप्त हुआ उसे गोडवाना क्रम के चट्टानों से सम्बोधित किया।

         वस्तुत: विन्ध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण हो जाने के बाद प्रायद्वीपीय भारत का भूखण्ड लम्बे समय तक भूगर्भिक हलचल/भूकंप से मुक रहा है। लेकिन, कार्बोनीफेरस के पूर्वार्द्ध में भयंकर भूसंचलन हुआ जिसे हर्सीनियन भू-संचलन के नाम से जानते हैं।

      हर्सीनियन भू-संचलन भूसंचलन का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण पृथ्वी पर पड़ा। इस समय जल और स्थल के वितरण में भारी परिवर्तन हुआ। +जैसे: पेन्जिया रूपी विशालकाय भूखण्ड के मध्यवर्ती भाग में धंसान की क्रिया से एक विशाल टेथिस सागर का निर्माण हुआ। इसका विस्तार पश्चिम में भूमध्यसागर से लेकर पूरब में प्रशान्त महासागर तक था। टेथिस सागर के उतरी भाग अंगारालैण्ड कहलाया जबकि दक्षिणी भाग गोण्डवानालैण्ड कहलाया।

भारत में गोण्डवानाक्रम

         कार्बोनीफेरस कल्प में ही पृथ्वी पर कुछ क्षेत्रों में हिमयुग का आगमन हुआ था। पर्वतीय क्षेत्रों / पर्वतों के ऊँचाई वाले भाग में हिम के जमने और हिमस्खलन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों का अपरदन होने लगा। अपरदित सामाग्री गोंडवाना भूखण्ड के विभिन्न नदी घाटियों और गर्तों में जमा कर दिये जाने से उपजाऊ समतल मैदान का विकास हुआ है। उस वक्त मानवीय उद्भव नहीं होने के कारण सभी मैदानी क्षेत्र सघन वनस्पतियों से ढक गये। इन वनस्पतियों में ग्लोसोप्टेरिस और टीलोफाइलम समूह की वनस्पत्ति अधिक थी। भूसंचलन के कारण ये वनस्पति गिरकर यत्र-तत्र जमने लगे।

         पुन: अत्याधिक ताप एवं दाब के कारण ये वनस्पति कोयले में रूपान्तरित हो गये। जगह-2 पर आज भी इन वनस्पतियों के परतों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। चूँकि कार्बोनीफेरस कल्प में इन वनस्पतियों का विकास एवं भूमि के अन्दर दबने की क्रिया नदी घाटी क्षेत्रों में हुआ था। इसीलिए आज भी कोयला की पेटियाँ नदी घाटी क्षेत्रों में मिलती है।

वितरण

      भारत में गोंडवनाक्रम की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपीय भारत के बाहरी क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जैसे-

झारखण्ड- दामोदर नदी घाटी, उत्तरी कोल क्षेत्र, डाल्टेनगंज क्षेत्र।

बिहार- ललमटिया ये लेकर राजमहल की पहाड़ी तक।

उड़ीसा- महानदी घाटी क्षेत्र में।

आन्ध्रप्रदेश- गोदावरी एवं उनके सहायक नदी घाटी क्षेत्र में।

छतीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश- सोन नदी घाटी क्षेत्र।

महाराष्ट्र- वर्दा नदी घाटी क्षेत्र।

पश्चिम बंगाल- दामोदर और बराकर नदी घाटी क्षेत्र में।

         उपरोक्त क्षेत्रों के अलावे कश्मीर, असम, सिक्कीम और दार्जलिंग में भी गोंडवाना प्रकार की चट्टानें पायी जाती है।

भारत में गोण्डवानाक्रम

चित्र: गोंडवाना समूह की चट्टानों का वितरण

आर्थिक महत्व

(1) भारत का 96% एन्थ्रासाइट और बिटुमिनस कोपला गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलता है। थोड़ा-बहुत लिग्नाइट कोयला इस समूह की चट्टान से प्राप्त होता है।

(2) गोंडवानाक्रम की चट्टानों से बलुआ पत्थर मिलता है जिसका उपयोग भवन निर्माण में किया जाता है।

(3) कोयले की खानों ने चिका मिट्टी और फायर क्ले प्राप्त किये जाते हैं जिसका प्रयोग ईट और बर्तन के निर्माण में किया जाता है।

(4) गोंडवानाक्रम की चट्टानें, सीमेन्ट और रासायनिक उर्वरक के निर्माण में काफी उपयोगी माने जाते हैं।

(5) गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलने वाला कंक्रीट का प्रयोग, नाभिकीय भट्टी के निर्माण में किया जाता है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मिलने वाला गोडवानाक्रम की चट्टान से कोयला जैसे ऊर्जा संसाधन के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिसकी महत्ता अपने आप में सर्वविदित है।

प्रश्न प्रारूप

Q. भात में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधा, वितरण एवं आर्थिक महत्व की विवेचना कीजिए।

25. सूर्यातप (Insolation)

25. सूर्यातप (Insolation)


 सूर्यातप

        वायुमण्डल तथा पृथ्वी की ऊष्मा (Heat) का प्रधान स्रोत (सूर्य) है। सौर्यिक ऊर्जा को ही ‘सूर्यातप’ कहते हैं।

          दूसरे शब्दों में “लघु तरंगों के रूप में संचालित लगभग 3 लाख किमी० प्रति सेकेण्ड की गति से भ्रमण करती हुई प्राप्त सौर्यिक ऊर्जा को ‘सौर्य विकिरण’ या ‘सूर्यातप’ कहते हैं”। सूर्य धधकता हुआ गैस का वृहद् गोला है, जिसकी व्यास पृथ्वी से 100 गुना तथा उसके आयतन से 100,000 गुना अधिक है। सूर्य के धरातल जिसे फोटोस्फेयर कहते है, का तापक्रम 6000 डिग्री सेल्सियस तथा केन्द्रीय भाग का 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस बताया जाता है। पृथ्वी के वायुमण्डल का औसत तापक्रम 15.2°C होता है।

       सूर्य की ऊर्जा का प्रधान स्रोत उसका आन्तरिक भाग जहाँ पर अत्यधिक दबाव तथा उच्च तापमान के कारण नाभिकीय संलयन के कारण हाइड्रोजन का हीलियम में रूपान्तर होने से ऊष्मा का उत्सर्जन होता है। यह ऊष्मा परिचालन तथा संवहन द्वारा सूर्य की बाहरी सतह तक पहुँचती है। सूर्य की वाह्य सतह से निकलने वाली ऊर्जा को फोटान कहते हैं। इसी तरह सूर्य की वाह्य सतह को फोटोस्फीयर कहते हैं। इस सतह से ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तरंग द्वारा विकिरण होता है।

        सूर्य के धरातल के प्रत्येक वर्ग इंच से विकीर्ण ऊर्जा 100,000 अश्व शक्ति के बराबर होती है, सूर्य की वह्य सतह (फोटोस्फीयर) से निकलने वाली ऊर्जा प्रायः स्थिर रहती है। इस तरह पृथ्वी की सतह के प्रति इकाई क्षेत्र पर सूर्य से प्राप्त ऊर्जा प्राय: स्थिर रहती है। इसे सौर्यिक स्थिरांक (Solar constant) कहते हैं।

      इस तरह सौर्यिक स्थिरांक सूर्य के विकिरण की दर को प्रदर्शित करता है जो प्रति वर्ग सेण्टीमीटर प्रति मिनट 2 ग्राम कैलरी है। सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर स्थित पृथ्वी सौर्यिक ऊर्जा का केवल 1/2×109 भाग ही प्राप्त कर पाती है। परन्तु यह स्वल्प मात्रा भी 23×1012 अश्व शक्ति के बराबर हो जाती है। सूर्य से प्राप्त इस न्यून ऊर्जा के कारण ही भूतल पर सभी प्रकार के जीवों का अस्तित्व सम्भव हो सका है। इसी कारण धरातल पर पवन संचार, सागरीय धाराओं का प्रवाह तथा मौसम एवं जलवायु का आविर्भाव होता है।

         प्रत्येक वस्तु, जिसमें ऊष्मा होती है, विकिरण करती है। नियमानुसार जो वस्तु जितनी अधिक गर्म होती है, उसकी तरंगें उतनी ही छोटी होती हैं। इसी कारण से सूर्य विकिरण द्वारा निकली ऊष्मा लघु तरंगों के रूप में होती है तथा प्रति सेकेण्ड 300000 किमी० की गति से भ्रमण करती है। इसके विपरीत अपेक्षाकृत कम तापक्रम वाली वस्तु से विकिरण तो कम होता है, परन्तु दीर्घ तरंग के रूप में होता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी से विकीर्ण ऊर्जा दीर्घ तरंगों के रूप में होती है।

धरातल पर सूर्यातप का वितरण

         सूर्यातप की सर्वाधिक मात्रा विषुवत रेखा के पास होती है क्योंकि यहाँ पर दिन-रात की लम्बाई बराबर होती है तथा सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् होती हैं। परन्तु सूर्य के दक्षिणायन तथा उत्तरायण की स्थितियों के कारण अत्यधिक सूर्यताप मण्डल विषुवत रेखा के दोनों ओर सरकता रहता है। विषुवत रेखा से सूर्यातप ध्रुवों की ओर कम होता जाता है। ध्रुवों पर यह ताप इतना कम हो जाता है कि विषुवत रेखा का केवल 40 प्रतिशत ही प्राप्त हो पाता है।

        इस तरह ध्रुवीय क्षेत्र न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त करते हैं। ‘इक्वीनाक्स (Equinox-विषुव) के समय दोनों गोलाद्धों में सूर्यातप का वितरण प्राय: समान रहता है। इसके विपरीत कर्क तथा मकर संक्रांति (Solstices) के समय दोनों गोलार्द्ध में ध्रुवों के बीच सूर्यातप के वितरण में पर्याप्त असमानता होती है।

         यहाँ पर यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि सूर्यातप के वितरण पर वायुमण्डल के परावर्तन, शोषण तथा प्रकीर्णन आदि प्रभावों का पर्याप्त असर होता है। इसी कारण से कर्क संक्रान्ति के समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा पर लम्बवत् होता है, ध्रुवों पर दिन की अवधि सर्वाधिक लम्बी होने पर भी सूर्यातप सर्वाधिक नहीं हो पाता है, अपितु अधिकतम सूर्यातप 40° अक्षांश के आस-पास ही प्राप्त होता है। धरातलीय तापक्रम निम्न मध्य अक्षांश वाले भागों में सर्वाधिक होता है, न कि भूमध्य रेखा के पास।

सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

         सूर्यातप के उपर्युक्त वितरण से स्पष्ट हो गया है कि भूतल के विभिन्न भागों पर सूर्यातप की मात्रा समान नहीं हुआ करती है, सूर्य की किरणों को वायुमण्डल की एक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, अत: वायुमण्डल का प्रभाव सूर्यातप की मात्रा पर पड़ना स्वाभाविक ही है। इसके अलावा सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन, दिन की अवधि, पृथ्वी से सूर्य की दूरी, सौर कलंक इत्यादि कारक किसी भी स्थान पर (वायुमण्डल की अनुपस्थिति में) सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करते हैं।

(i) सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन:-

           पृथ्वी के गोलाकार रूप के कारण सूर्य की किरणें सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् होती हैं क्योंकि सूर्य सर्वाधिक ऊँचाई पर होता है, परन्तु ध्रुवों की ओर किरणों का कोण कम होता जाता है अर्थात् वे तिरछी होती जाती हैं। यद्यपि किरणों के सापेक्ष्य तिरछापन में कुछ परिवर्तन होता रहता है, उदाहरण के लिए 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण पहली स्थिति में दक्षिणी गोलार्द्ध में किरणें अधिक तिरछी होती हैं, तथापि साधारण रूप में भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है।

(ii) दिन की अवधि

          यदि अन्य दशाएं समान हों तो दिन की अवधि जितनी अधिक होगी, सूर्यातप की मात्रा उतनी ही अधिक होगी। पृथ्वी अपनी कक्षा पर 66.5° का कोण बनाती हुई लगभग 24 घण्टे में अपनी धुरी पर एक परिक्रमा पूरा करती है तथा साथ ही सूर्य के चारों तरफ भी वर्ष में एक बार चक्कर लगाती है।

        यदि पृथ्वी भी अपनी जगह पर स्थिर होती तो वर्तमान स्थिति के विपरीत दशा होती, परन्तु पृथ्वी की दैनिक तथा वार्षिक गति के कारण भूमध्य रेखा को छोड़कर शेष भागों पर दिन की अवधि में अन्तर आता रहता है। भूमध्य रेखा पर दिन सदैव 12 घण्टे का इसलिए होता है कि प्रकाश वृत्त भूमध्य रेखा को दो बराबर भागों में काटता है।

        सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय (जब सूर्य कर्क रेखा पर होता है) भूमध्य-रेखा से उत्तर की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है तथा उत्तरी ध्रुव पर 6 मास का दिन होता है। इसके विपरीत भूमध्य रेखा से दक्षिण जाने पर दिन की अवधि कम हो जाती है, जबकि द० ध्रुव पर केवल रात (6 मास) ही होती है।

        सूर्य की दक्षिणायन स्थिति में (जबकि सूर्य मकर रेखा पर होता है) भूमध्य रेखा से दक्षिण की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है और उत्तर की ओर घटती जाती है। केवल 21 मार्च तथा 23 सितम्बर को, जबकि सूर्य की स्थिति भूमध्य रेखा पर होती है, सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। स्मरणीय है कि किरणों के तिरछेपन तथा दिन की अवधि के प्रभाव सापेक्ष्य हुआ करते हैं। उच्च अक्षांशों में (21 जून, उत्तरी गोलार्द्ध) दिन की अवधि 6 मास होने पर भी सूर्यातप न्यूनतम इसलिए होता है कि सूर्य की किरणें सर्वाधिक तिछी होती हैं। जहाँ पर दिन की अवधि अधिक होती है तथा साथ ही साथ किरणें सीधी पड़ती हैं वहाँ पर निश्चित रूप से ताप अधिक प्राप्त होता है। 

(iii) पृथ्वी से सूर्य की दूरी

     पृथ्वी अण्डाकार कक्ष के सहारे सूर्य की परिक्रमा करती है, जिस कारण उसकी सूर्य से दूरी में परिवर्तन होता रहता है। औसत रूप में पृथ्वी सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर है, परन्तु निकटतम दूरी 14.70 करोड़ किमी० है। इस स्थिति को उपसौर (Perihelion) कहते हैं। यह स्थिति 3 जनवरी को होती है। इसके विपरीत 4 जुलाई को अपसौर (Aphelion) की स्थिति होती है, जबकि पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ किमी० दूर होती है। साधारण नियम के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उस समय अधिकतम ताप तथा अधिकतम दूरी पर होने पर न्यूनतम ताप मिलना चाहिए। परन्तु वास्तविकता ठीक उसके विपरीत होती है।

       जनवरी के महीने में जबकि पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म काल होने के बजाय शीत काल होता है। इसी तरह 4 जुलाई के समय शीत काल के बजाय ग्रीष्मकाल होता है। वास्तव में दिन की अवधि तथा सूर्य की किरणों के तिरछेपन के प्रभाव के आगे यह कारक नगण्य हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य होता है कि जनवरी में उ० गोलार्द्ध में जितनी सर्दी होनी चाहिए, उसकी अपेक्षा 7 प्रतिशत कम होती है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मियां 7 प्रतिशत अधिक तीव्र होती हैं। अपसौर की स्थिति में उत्तरी गोलार्द्ध में (4 जुलाई) गर्मियां 7 प्रतिशत कम तीव्र तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल 7 प्रतिशत अधिक तीव्र हो जाता है।  

सूर्यातप

 

(iv) सौर कलंक

       चन्द्रमा के समान सूर्य-तल पर कलंक या धब्बे मिलते हैं। इनका कोई स्थायी रूप नहीं होता है, वरन् ये बनते-बिगड़ते रहते हैं तथा इनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। यह अन्तर चक्रीय रूप में सम्पन्न होता है। औसत रूप में एक चक्र ग्यारह वर्ष में पूरा होता है।

        जब सौर कलंकों की संख्या अधिक हो जाती है तो सूर्यातप की मात्रा भी अधिक हो जाती है, परन्तु इनकी मात्रा में कमी हो जाने के कारण प्राप्त होने वाला सूर्यातप कम हो जाता है। इस कारण की सत्यता अभी तक संदिग्ध है। सौर कलंकों के कारण सूर्य विकिरण में अन्तर आता रहता है। विश्व स्तर पर मौसम तथा जलवायु में कभी-कभी विश्वव्यापी अनियमितता होती हती है। सौर कलंकों के कारण होने वाला अनियमित सूर्यातप इस विश्वव्यापी मौसम सम्बन्धी अनियमितता का कारण हो सकता है, परन्तु इसे निश्चितता के साथ स्वीकार नहीं किया जा सका है।

(v) वायुमण्डल का प्रभाव

         सूर्यातप वितरण को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त कारकों की विवेचना के समय वायुमण्डल के प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा गया था, वास्तव में (सूर्य की) प्रकाश किरणों को वायुमण्डल की पारदर्शक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, जिस कारण उसका प्रकीर्णन (Scattering), परावर्तन (Reflection) तथा अवशोषण (Absorption) होता रहता है। प्रकीर्णन के अन्तर्गत सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग पारदर्शक वायुमण्डल में स्थित अदृश्य कणों तथा अणुओं के कारण बिखर कर फैल जाता है।

       प्रकीर्णन मुख्य रूप से वरणात्मक (Selective) होता है, अर्थात् यह उस समय होता है जबकि अदृश्य कणों (धूलकण आदि) की व्यास विकिरण तरंग से छोटी होती है। इस तरह लघु तरंगों का प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है, जिस कारण विभिन्न प्रकार के रंगों का आविर्भाव होता है। उदाहरण के लिए आकाश का नीला रंग, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की लालिमा आदि प्रकीर्णन के कारण ही सम्भव हो पाती है।

      जब वायुमण्डल में अदृश्य कणों की व्यास विकिरण तरंग से बड़ी होती है तो विसरित परावर्तन (diffuse reflection) की क्रिया होती है। इस क्रिया के कारण सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग परावर्तित होकर वापस लौट जाता है, जबकि कुछ भाग वायुमण्डल में चारों तरफ छिटक जाता है। पृथ्वी की सतह से भी कुछ ताप शक्ति का परावर्तन आकाश में हो जाता है। पृथ्वी के इस परावर्तन के कारण ही चन्द्रमा का अंधेरा भाग भी आसानी से दृष्टिगत हो जाता है।

           प्रकीर्णन तथा परावर्तन के कारण वायुमण्डल से कुछ सौर्यिक ऊर्जा पृथ्वी की सतह पर पहुँच जाती है। इसे आकाश का विसरित नीला प्रकाश (diffuse blue light of sky) कहते हैं अथवा विसरित दिवा प्रकाश (diffuse day light) की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसी प्रकाश के कारण पूर्ण बदली के दिन अथवा किसी भी स्थान के वे भाग जहाँ पर सूर्य की किरणें नहीं पहुँच पाती हैं, आसानी से देखें जा सकते हैं।

         अवशोषण की क्रिया मुख्य रूप में जलवाष्प तथा गौण रूप में आक्सीजन एवं ओजोन गैसों द्वारा सम्पादित होती है। अवशोषण भी वरणात्मक होता है अर्थात् सभी विकिरण तरंगों का अवशोषण न होकर केवल दीर्घ तरंगों का ही हो पाता है। प्रकीर्णन, परावर्तन तथा अवशोषण द्वारा सूर्यातप की नष्ट होने वाली मात्रा मुख्य मुख्य रूप से सूर्य की किरणों के कोण तथा वायुमण्डल के पारदर्शक तत्व पर आधारित होती है।

         सूर्य से विकीर्ण समस्त सूर्यातप का लगभग 35 प्रतिशत भाग परावर्तन तथा प्रकीर्णन द्वारा आकाश में वापस लौट जाता है तथा इसका उपयोग न ही वायुमण्डल को गर्म करने में हो पाता है और न ही पृथ्वी को सूर्यातप के 14 प्रतिशत भाग का वायुमण्डल द्वारा अवशोषण हो जाता है।

       इस तरह सूर्यातप का केवल 51 प्रतिशत भाग पृथ्वी को प्राप्त हो पाता है, जिससे वायुमण्डल का निचला भाग गर्म होता है। किसी भी सतह से विकिरण ऊर्जा के परावर्तित भाग को अलबिडो (Albedo) कहा जाता है। पृथ्वी की सतह का औसत अलबिडो 24 से 34 प्रतिशत के बीच बताया जाता है।


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7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर

7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर


बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त

बिग बैंग

              ब्रह्माण्ड तथा आकाशगंगा तथा उनके सदस्य तारों तथा ग्रहों की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए ब्रह्माण्ड के अदृश्य घटकों अर्थात् काले पदार्थों के अस्तित्व के आधार पर प्रयास किये गये हैं। आकाश गंगा के निर्माण के विषय में वैज्ञानिकों के दो वैकल्पिक विचार हैं- काले पदार्थों का अस्तित्व ‘गर्म’ या ‘ठंडे’ (Hot or cold forms) रूप में रहा होगा।

         गर्म काले पदार्थों (Hot dark matter) की स्थिति में आकाशगंगायें (Galaxies) दूर-दूर होंगी जबकि ठंडे पदार्थों की स्थिति में वे झुण्ड में होंगी (वर्तमान समय में विभिन्न आकाशगंगायें पास-पास समूह में स्थित हैं)।

         बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति आज से लगभग 15 बिलियन वर्ष (15 अरब वर्ष) पहले घने पदार्थों वाले विशाल अग्निपिण्ड (fireball) के आकस्मिक जोरदार विस्फोट तथा उससे जनित विकिरण के कारण हुई।

           इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मुख्यतः जॉर्ज लैमेण्टर द्वारा 1950-60 तथा 1960-70 दशक में किया गया (इस सिद्धान्त के अनुसार आज से 15 अरब वर्ष पहले एक विशाल अग्निपिण्ड था जिसकी रचना भारी पदार्थों से हुई थी। इस विशालकाय अग्निपिण्ड का अचानक विस्फोट हुआ जिस कारण पदार्थों का बिखराव हो गया। इन पदार्थों को प्रारम्भिक सामान्य पदार्थ (Normal matter) कहा गया। शीघ्र ही सामान्य पदार्थों के अलगाव के कारण (काले पदार्थों का सृजन हुआ। इन काले पदार्थों का आपस में समेकन होने से (अनेकों पिण्डों का निर्माण हुआ। इन पिण्डों के चारों ओर सामान्य पदार्थों का जमाव होने लगा। जिस कारण इनका आकार बढ़ता गया। इन पिण्डों के आकार में वृद्धि होने से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ।

 

            ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड अत्यधिक छोटा था परन्तु इसमें त्वरित गति से फैलाव होने लगा। परिणामस्वरूप आकाशगंगायें, जो प्रारम्भ में पास-पास थीं वे निरन्तर दूर होती गयीं। आज से लगभग 15 अरब वर्ष पहले अपने निर्माण-काल से आज तक ब्रह्माण्ड आकार में लगातार फैलता रहा है तथा उसके पदार्थ शीतल होते रहे हैं। आकाशगंगाओं का भी भयंकर विस्फोट हुआ तथा विस्फोट से निकले पदार्थों के समेकन से बने असंख्य पिण्डों द्वारा प्रत्येक आकाशगंगा के तारों (stars) का निर्माण हुआ। इसी तरह प्रत्येक तारे, के विस्फोट के कारण जनित पदार्थों के समूहन द्वारा ग्रहों (Planets) का निर्माण हुआ।

          अमेरिकन वैज्ञानिक अलन गुथ (Alan Guth) ने 1980 में बिग बैंग सिद्धान्त को ब्रह्माण्ड (आकाशगंगा, तारों तथा ग्रहों) की उत्पत्ति की समस्या को सुलझाने में असमर्थ पाया। अत: इन्होंने स्फीति सिद्धान्त (inflationary theory) का प्रतिपादन किया। अलन गुथ की अवधारणा है कि ब्रह्माण्ड के दृश्य द्रव्यमान (visible mass) के घनत्व की तुलना में उसका वास्तविक घनत्व बहुत अधिक है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्माण्ड में अदृश्य काले पदार्थों का अस्तित्व है। यद्यपि बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त लगभग एक जैसे हैं क्योंकि उनकी कई मान्यतायें उभयनिष्ठ हैं। उनमें अन्तर मात्र इस बात से सम्बन्धित है कि विशालकाय अग्निपिण्ड के विस्फोट के एक सेकेण्ड के अन्दर किस प्रकार की घटनायें घटीं।

          स्फीति सिद्धान्त के अनुसार विशालकाय अग्निपिण्ड के जोरदार विस्फोट के बाद अति अल्प काल में ब्रह्माण्ड का असाधारण त्वरित गति से फैलाव (स्फीति, rapaid, expansion or inflation) हुआ। इस प्रक्रिया के दौरान एक सेकेण्ड के अल्पांश के अन्तर्गत ही ब्रह्माण्ड के आकार में कई गुना वृद्धि हो गयी। काले पदार्थों के समूहन से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ। इनके विस्फोट से जनित पदार्थों के समूह से निर्मित पिण्डों द्वारा तारों का निर्माण हुआ तथा तारों के विस्फोट से उत्पन्न पदार्थों के एकत्रित एवं संगठित होने से निर्मित पिण्डों से ग्रहों (पृथ्वी इत्यादि) का निर्माण हुआ।

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना (Binary Star Hypothesis of Russell)

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

(Binary Star Hypothesis of Russell)


रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

रसेल की द्वैतारक

              जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना से निम्नलिखित दो बातें प्रमाणित नहीं हो पा रहीं थीं-

(i) सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी और

(ii) ग्रहों के वर्तमान कोणीय आवेग (Angular momentum) की अधिकता।

       इन दो समस्याओं के समाधान हेतु रसेल ने द्वैतारक परिकल्पना का प्रतिपादन किया।

           आदिकाल में सूर्य के पास ही दो तारे थे। सर्वप्रथम सूर्य का एक साथी तारा था जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। आगे चलकर एक विशालकाय तारा साथी तारे के समीप आया, किन्तु इसकी परिक्रमा की दिशा साथी तारे के विपरीत थी।

       इन दो तारों के बीच की दूरी सम्भवतः 48 से 64 लाख किमी० के बीच रही होगी। इस तरह विशालकाय तारा सूर्य से और अधिक दूर (साथी तारा तथा विशालकाय तारा के बीच की दूरी का कई गुना) रहा होगा जिस कारण विशालकाय तारे के ज्वारीय बल का प्रभाव सूर्य पर नहीं पड़ा, परन्तु साथी तारे पर ज्वारीय बल के कारण पदार्थ विशालकाय तारे की ओर आकर्षित होने (उभार) लगा। जैसे-जैसे विशालकाय तारा साथी तारे के करीब आता गया, आकर्षण बल बढ़ता गया और उभार अधिक होने लगा।

        जब विशालकाय तारा साथी तारे की निकटतम दूरी पर आ गया तो अधिकतम आकर्षण के कारण कुछ पदार्थ साथी तारे से अलग होकर विशालकाय तारे की दिशा में घूमने (साथी तारे की विपरीत दिशा) लगे। आगे चलकर इन पदार्थों से ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ग्रह करीब रहे होंगे तथा आपसी आकर्षण के कारण ग्रहों से पदार्थ निकलकर उनके उपग्रह बन गये होंगे जिसे निम्नांकित चित्रों में देखा जा सकता है-

रसेल की द्वैतारक

रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

         इस तरह युग्म तारे की कल्पना करके तथा सूर्य के स्थान पर साथी तारे से पदार्थ निस्सृत कराके ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति मानकर रसेल ने सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी तथा उनके कोणीय आवेग की समस्या का वैज्ञानिक स्तर पर समाधान कर दिखाया है।

आलोचना

(i) रसेल ने साथी तारे से निकले पदार्थ से ग्रहों की उत्पत्ति को समझाया है, परन्तु साथी तारे के अवशिष्ट भाग पर प्रकाश नहीं डाला है। अवशिष्ट भाग का क्या हुआ? कोई संतोषजनक हल नहीं दिया गया है।

(ii) निर्माण के समय ग्रह सूर्य से दू थे तथा एक-दूसरे दूर फैले थे, परन्तु विशालकाय तारे के भ्रमण पथ पर से आगे निकल जाने पर सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, जबकि उसके सबसे करीब साथी तारे का अवशिष्ट भाग सूर्य के आकर्षण में नहीं आ सका। इस तरह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रसेल ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है।

(iii) यदि यह मान भी लिया जाय कि सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, तो भी सेल विशद रूप में यह नहीं समझा पाते हैं कि किस प्रक्रिया द्वारा यह सम्भव हुआ।

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis of James Jeans)

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना

(Tidal Hypothesis of James Jeans)


जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पनाजेम्स जीन्स की ज्वारीय

            सौर्य-मण्डल की उत्पत्ति से सम्बन्धित ”ज्वारीय परिकल्पना” का प्रतिपादन अंग्रेज विद्वान सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने सन् 1919 में किया तथा जेफरीज (Jeffreys) नामक विद्वान ने उक्त परिकल्पना में सन् 1929 में कुछ संशोधन प्रस्तुत किया जिससे इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ गया।

             यह ज्वारीय परिकल्पना आधुनिक परिक्लपनाओं तथा सिद्धान्तों में से एक है, जिसे अन्य की अपेक्षा अधिक समर्थन प्राप्त है। अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए जीन्स कुछ तथ्यों को स्वयं मानकर चले हैं।

        इस प्रकार ‘ज्वारीय परिकल्पना’ प्रतिपादक द्वारा कुछ निम्नलिखित कल्पित तथ्यों पर आधारित है।

1. सौर्य-मण्डल का निर्माण सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुआ।

2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला था।

3. सूर्य के साथ ही साथ ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा था।

4. सूर्य अपनी जगह पर स्थिर था तथा अपनी जगह पर ही घूम रहा था।

5. साथी तारा एक पथ के सहारे इस तरह घूम रहा था कि वह सूर्य के निकट आ रहा था।

6. साथी तारा आकार तथा आयतन में सूर्य से बहुत अधिक विशाल था।

7. पास आते हुए तारे द्वारा ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ा था।

ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण 

          इस प्रकार उपर्युक्त स्वयं-कल्पित तथ्यों के आधार पर जीन्स ने बताया है कि साथी तारा निरन्तर एक पथ के सहारे सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था, जिस कारण साथी तारे की आकर्षण शक्ति द्वारा वायव्य ज्वार का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ने लगा। फलस्वरूप सूर्य में ज्वार उत्पन्न होने लगा। यह ज्वारीय क्रिया सूर्य में उसी प्रकार सम्भव हो सकी, जिस प्रकार वर्तमान समय में पृथ्वी के निकट चन्द्रमा के आ जाने से पृथ्वी के महासागरों में ज्वार उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों विशालकाय तारा सूर्य के पास आता गया, त्यों-त्यों उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ती गयी तथा ज्वार की तीव्रता बढ़ती गयी।

          जब तारा सूर्य से निकटतम दूरी पर आया तो उसकी आकर्षण शक्ति सूर्य से अधिक हो गयी, जिस कारण हजारों किलोमीटर लम्बा सिगार के आकार का ज्वार सूर्य के वाह्य भाग में उठा। सिगार के आकार वाले इस भाग को फिलामेन्ट (Filament) कहा गया है। सूर्य के निकटतम दूरी पर पहुँचने के कारण तारे की अधिकतम आकर्षण शक्ति के प्रभाव से एक विशाल फिलामेन्ट सूर्य से हटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ। जीन्स के अनुसार पास आने वाला तारा सूर्य के मार्ग पर नहीं था, अत: यह सूर्य से आगे बढ़ने लगा।

           इस प्रकार तारे के दूर निकल जाने के कारण फिलामेन्ट तारे के साथ न जा सका, वरन् वह सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करने लगा। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस स्थिति में जब कि तारा अधिक दूर चला गया तो फिलामेन्ट सूर्य के पास पुन: वापस क्यों नहीं आ गया?

     व्याख्या सरल है। जब फिलामेन्ट टूटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ, उस परिस्थिति में यह सूर्य की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र से बाहर (Neutral point) हो गया था, अत: वह सूर्य का ही चक्कर लगाने लगा, वापस नहीं आ सका।

     कुछ समय पश्चात् तारा सूर्य से इतना दूर चला गया कि पुन: कोई वायव्य भाग (फिलामेण्ट) सूर्य से अलग नहीं हो सका। आगे चलकर सूर्य से निकला हुआ ज्वारीय पदार्थ सिगार के आकार में अधिक लम्बा हो गया, जिसका मध्य भाग अधिक मोटा या चौड़ा तथा दोनों किनारे वाले भाग अत्यधिक पतले थे। किनारों के पतला होने का मुख्य कारण तारे तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव ही बताया जाता है। फिलामेंट में गति या परिभ्रमण का आविर्भाव दूर होते हुये (Receding) तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के खिंचाव (Gravitational pull) के कारण हुआ था।

फिलामेन्ट से ग्रहों की उत्पत्ति:-

          सूर्य से अलगाव के बाद फिलामेन्ट शीतल होने लगा, जिस कारण उसके आकार में संकुचन प्रारम्भ हो गया। इस संकुचन के कारण फिलामेन्ट कई टुकड़ों में टूट गया तथा प्रत्येक भाग घनीभूत होकर ग्रह (Planet) के रूप में बदल गया। इसी क्रिया से फिलामेन्ट से नौ ग्रहों की रचना सम्भव हुई। इसी प्रक्रिया के अनुसार सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ग्रहों पर ज्वार उत्पन्न होने से उनके कुछ पदार्थ अलग हो गये, जो घनीभूत होकर उपग्रह बने।

          अब यह प्रश्न उठता है कि ग्रह से उपग्रह बनने का क्रम कब तक चलता रहा? जब तक ग्रहों से निकले हुये ज्वारीय पदार्थ बड़े आकार वाले थे तथा उनकी केन्द्रीय आकर्षण शक्ति अधिक थी, तब तक उपग्रह बनते रहे। परन्तु जब उनका आकार इतना छोटा होने लगा कि उनकी केन्द्रीय आकर्षण-शक्ति उन्हें संगठित रखने में असमर्थ हो गयी, उपग्रहों की रचना समाप्त हो गयी। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों की संख्या ग्रहों के आकार के अनुसार निश्चित हुई।

          इस परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही साथ सौर्य-मंडल की अनेक समस्याएँ भी सुलझी-सी प्रतीत होती हैं-

(1) ग्रहों का क्रम तथा आकार-

        सूर्य से निस्सृत ज्वारीय फिलामेन्ट बीच में चौड़ा तथा किनारों की तरफ पतला था। इस प्रकार जब फिलामेन्ट के टूटने से ग्रहों का निर्माण हुआ तो बड़े ग्रह बीच में तथा छोटे ग्रह किनारे की ओर बने। ग्रहों का यह क्रम वर्तमान सौर्य मंडल के ग्रहों से पूर्णतया सामंजस्य रखता है।

            सूर्य की ओर से प्रारम्भ करने पर बुध ग्रह सबसे पहले है। यह अधिक छोटा है। इसके बाद शुक्र, पृथ्वी, मंगल (यह पृथ्वी से छोटा है) आदि एक-दूसरे से बड़े होते जाते हैं तथा बीच में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है । इसके बाद पुनः ग्रहों का आकार घटता जाता है तथा अन्त में कुबेर अत्यन्त छोटा ग्रह है। यह तथ्य निम्न तालिका से पूरी तरह प्रमाणित हो जाता है।

         जीन्स ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कुबेर ग्रह( Pluto) की खोज के पहले किया था। बाद में अत्यन्त लघु ग्रह कुबेर की खोज ने इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि यह परिकल्पना सौर्य-मंडल के सदस्यों के क्रम को पूर्णतया सिद्ध करती है। केवल मंगल की स्थिति इसके अनुसार ठीक नहीं बैठती है।

(2) उपग्रहों का क्रम-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों का निर्माण ग्रहों से निकले हुए ज्वारीय पदार्थ से उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार सूर्य से निकले ज्वारीय पदार्थ से ग्रहों की रचना हुई। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों का भी वही क्रम है जो कि ग्रहों का। अर्थात् एक ग्रह के यदि कई उपग्रह हैं तो सबसे बड़ा उपग्रह बीच में तथा छोटा उपग्रह किनारे की ओर पाया जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान उपग्रहों की स्थिति तथा क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना एक ही प्रणाली द्वारा हुई होगी।

(3) उपग्रहों की संरचना तथा आकार-

         इस ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार बड़े ग्रह ब्रह्माण्ड में अधिक समय तक गैस के रूप में रहे, क्योंकि आकार की विशालता के कारण उसके शीतल होने में अधिक समय लगा होगा। इस कारण बड़े ग्रहों के उपग्रह अधिक संख्या में बने, परन्तु अपेक्षाकृत ये छोटे आकार वाले थे। मध्यम आकार वाले (बड़े ग्रहों के समीपवर्ती ग्रह) ग्रहों से कम संख्या में उपग्रह (Satellites) बने, परन्तु इनका आकार बड़ा रहा। किनारे वाले ग्रह आकार में छोटे होने के कारण शीघ्र शीतल हो गये होंगे। परिणामस्वरूप उनसे उपग्रहों की रचना नहीं हो पायी होगी।

            यह तथ्य वर्तमान सौर्य-मंडल के उपग्रहों के क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। शनि तथा बृहस्पति जैसे सबसे बड़े ग्रहों के छोटे आकार वाले अनेक उपग्रह हैं, जबकि बुध तथा शुक्र के पास एक भी उपग्रह नहीं है।

(4) ग्रहों का परिभ्रमण कक्ष-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के परिभ्रमण कक्ष (Orbit) अथवा ग्रह पथ को सूर्य के कक्ष (orbit) से मेल नहीं खाना चाहिये, बल्कि ग्रह-कक्ष को सूर्य कक्ष से एक निश्चित कोण पर झुका होना चाहिये, क्योंकि सूर्य की आकर्षण शक्ति से ग्रह झुक जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान ग्रहों के कक्ष से पूर्णतया मेल खाता है, क्योंकि प्रत्येक ग्रह-कक्ष झुका हुआ है। 

प्रत्येक ग्रह का कोणीय झुकाव

ग्रह झुकाव
बुध
शुक्र 3.5°
पृथ्वी 23.5°
मंगल 2° 
बृहस्पति 1° 
शनि 2.5° 
अरुण 0° 
वरुण
कुबेर 17°

(5) निस्सृत वायव्य पदार्थ का आकार-

        पास आते हुये तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य से जो फिलामेन्ट निकला वह सिगार के आकार का क्यों हो गया? इसका मुख्य कारण पास आते हुये तारे की आकर्षण शक्ति में विभिन्नता का होना ही बताया जाता है। अर्थात् तारा दूर था तो कम आकर्षण के कारण कम पदार्थ बाहर निकला तथा तारा ज्यों-ज्यों पास आता गया, बढ़ती आकर्षण शक्ति से पदार्थ की मात्रा बढ़ती गयी तथा तारे के सूर्य से निकटतम दूरी पर आने पर निस्सृत पदार्थ सबसे अधिक था।

           पुन: तारे के दूर जाने से आकर्षण शक्ति में कमी के कारण निस्सृत पदार्थ की मात्रा घटती गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निस्सृत पदार्थ (Ejected matter) तारे की आकर्षण शक्ति के अनुपात में थे।

परिकल्पना में संशोधन

       सन् 1929 ई. में हेरोल्ड जेफरीज महोदय ने इस परिकल्पना को संशोधित करते हुए बताया कि ग्रहों की उत्पत्ति फिलामेंट बनने से नहीं हुई है, वरन् साथी तारा और सूर्य के आपस में टकराने से हुई है। साथी तारा और सूर्य के बीच जब टक्कर होती है तो कुछ पदार्थ सूर्य से बाहर निकल आते हैं और बाद में संगठित एवं शीतल होकर 9 ग्रहों का निर्माण करते हैं।      

     जेफरीज के इस संशोधन के मानने पर ग्रहों के परिभ्रमण (Rotation) सम्बन्धी अनेक कठिनाईयां सुलझ जाती हैं।

मूल्यांकन

         जीन्स द्वारा प्रतिपादित तथा जेफरीज द्वारा संशोधित एवं परिवर्द्धित ‘ज्वारीय परिकल्पना’ को बहुत समय तक समर्थन प्राप्त होता रहा तथा लोगों में इसके प्रति अधिक विश्वास हो गया था क्योंकि जीन्स को यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड की ग्रह-प्रणाली का निर्माण एक अनुपम विधान है।

         परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इस विचारधारा की कटु आलोचनाएँ की गयी हैं तथा वर्तमान वैज्ञानिकों को जीन्स की यह परिकल्पना मान्य नहीं है। यदि कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों के इस परिकल्पना में संशोधन मान लिये जाय तो सचमुच यह परिकल्पना बड़ी हद तक पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सही ज्ञान दे सकती है।

आलोचनाएँ

      इस परिकल्पना के निम्नलिखित आलोचनाएँ बतायी जा सकती हैं:-

⇒ एक तारे से दूसरे तारे इतना दू है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

⇒  रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

⇒ सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके काण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

⇒ यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis of Laplace)

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

(Nebular Hypothesis of Laplace)


लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

लाप्लास की निहारिका

              फ्रान्सीसी विद्वान लाप्लास ने अपना मत सन् 1796 ई० में व्यक्त किया, जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Exposition of the World System’ में किया है। यह परिकल्पना काण्ट के विचार से कुछ साम्य रखती है। लाप्लास ने काण्ट की कुछ गलतियों को दूर करके अपना संशोधित विचार व्यक्त किया।

            काण्ट की परिकल्पना के मुख्य तीन दोष थे:-

(1) निहारिका अथवा आद्य पदार्थ के कणों के टकराव से पर्याप्त ताप उत्पन्न नहीं हो सकता है।

(2) कणों के टकराव से गति नहीं हो सकती है।

(3) आकार में वृद्धि के साथ गति में वृद्धि नहीं हो सकती है।

            इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए लाप्लास ने कुछ कल्पनायें की हैं, जिन पर आधारित होकर उनका सिद्धान्त आगे चलता है:-

(1) प्रथम समस्या अर्थात् निहारिका के ताप की समस्या हल करने के लिये उन्होंने यह मान लिया कि ब्रह्माण्ड में पहले से एक विशाल तप्त निहारिका (नेबुला ) थी।

(2) यह निहारिका प्रारम्भ से ही गतिशील थी।

(3) यह निहारिका निरन्तर शीतल होकर आकार में सिकुड़ती गयी।

            इस प्रकार उपर्युक्त तीन स्वयं के माने हुये तथ्यों के अनुसार अतीत काल में ब्रह्माण्ड में एक गतिशील एवं तप्त महापिण्ड था, जिसको लाप्लास ने निहारिका नाम दिया है। निहारिका की गति के कारण विकिरण द्वारा उष्मा का ह्रास होने लगा जिस कारण इसका बहिर्भाग शीतल होने लगा।

           इस प्रकार निहारिका के निरन्तर शीतल होने के कारण उसमें संकुचन होने लगा। परिणामस्वरूप निहारिका के आकार अथवा आयतन में ह्रास होने लगा। आयतन में कमी के कारण निहारिका की गति में निरन्तर वृद्धि होने लगी। यहाँ पर काण्ट की तृतीय गलती भी दूर हो जाती है। अत्यधिक गति के कारण केन्द्रापसारित बल (centrifugal force) के कारण निहारिका के मध्यवर्ती भाग के पदार्थ भारहीन होने लगे तथा मध्य भाग बाहर की ओर उभरने लगा।

               ऊपरी भाग निरन्तर शीतल होने के कारण अत्यधिक घना हो गया, परन्तु यह ऊपरी भाग निचले भाग के साथ भ्रमण नहीं कर सका। इस प्रकार ऊपरी भाग, निरन्तर शीतल होते तथा सिकुड़ते मध्य भाग से, छल्ला के रूप में पृथक होने लगा। कुछ समय बाद यह गोल छल्ला निहारिका से अलग होकर बाहर निकल आया तथा निहारिका का चक्कर लगाने लगा।

              लाप्लास के अनुसार निहारिका से केवल एक ही छल्ला बाहर निकला तथा बाद में यह छल्ला नौ छल्लों में विभाजित हो गया। (जबकि काण्ट के अनुसार निहारिका से ही नौ छल्ले निकले थे) तथा प्रत्येक छल्ला एक-दूसरे से दूर हटता गया। प्रत्येक छल्ले के समस्त पदार्थ ने एक स्थान पर गांठ के रूप में एकत्रित होकर ‘गर्म वायव्य ग्रन्थि’ (Hot gaseous agglomeration) का रूप धारण किया, जो आगे चलकर  शीतल होकर ठोस बन कर ग्रह बन गया।

           इस प्रकार नौ ग्रहों का निर्माण हुआ। इसी क्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उपग्रहों का आविर्भाव हुआ। निहारिका का अवशिष्ट भाग सूर्य बना।

लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

          उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रान्सीसी विद्वान रॉस “(Roche) ने लाप्लास की परिकल्पना में संशोधन प्रस्तुत किया। लाप्लास के अनुसार निहारिका से निकले एक भारी छल्ले से कई पतले छल्ले बाहर निकल गये परन्तु रॉस ने बताया कि मुख्य निहारिका से ही कई पतले छल्ले क्रमश: अलग हो गये। प्रत्येक छल्ला घनीभूत होकर ग्रह बन गया। इसी क्रम के जारी रहने से समस्त ग्रहों की उत्पति हुई।

मूल्यांकन

      अपने सरल रूप के कारण लाप्लास की परिकल्पना को प्रारम्भ में पर्याप्त समर्थन मिला तथा लगभग 150 वर्षों तक इसका समादर (आदर) होता रहा। परन्तु सौर्य-मंडल सम्बन्धी नवीन वैज्ञानिक तथ्यों एवं सिद्धान्तों के प्रकाश में आने के कारण इस परिकल्पना का समर्थन जाता रहा।

          इस परिकल्पना में न केवल पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या ही हल की गयी है, वरन् उसकी रचना तथा स्वभाव का भी वर्णन किया गया है। इसके अनुसार ग्रह प्रारम्भ में मौलिक रूप में वायव्य अवस्था में थे। तत्पश्चात् शीतल होते समय तरल अवस्था में आये एवं अन्त में ठोस भूपटल (solid crust) का निर्माण हुआ। परन्तु इस मत के विपरीत कुछ विद्वानों ने यह बताया है कि पृथ्वी अपनी उत्पत्ति एवं वृद्धि-काल से ही एक ठोस रूप में रही होगी।

          अधिकांश विद्वानों के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में एक तरल अवस्था अवश्य रही होगी। अत: ‘निहारिका परिकल्पना’ का इस सम्बन्ध में पर्याप्त महत्व है। इस परिकल्पना के विरोध में निम्नांकित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं-

(1) सौर्य-मण्डल के विभिन्न ग्रहों का वर्तमान ‘कोणीय आवेग’ (angular momentum), जो कि प्रारम्भ में मौलिक निहारिका में व्याप्त था, भ्रमण की अधिकता से निहारिका को तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि निहारिका के मौलिक कोणीय आवेग से पदार्थ निहारिका से अलग नहीं हो सकता था।

             ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ (laws of conservation of angular momentum) के अनुसार मौलिक निहारिका का कोणीय आवेग, वर्तमान सूर्य एवं उसके सदस्य ग्रहों के कुल कोणीय आवेग के बराबर होना चाहिये, जबकि ऐसा न होकर सम्पूर्ण कोणीय आवेग का 98 प्रतिशत भाग ग्रहों तथा शेष 2 प्रतिशत भाग वर्तमान सूर्य में है। इस प्रकार यह परिकल्पना गणितीय सूत्रों के विपरीत है।

(2) निहारिका से 9 छल्ले ही क्यों निकले? नौ से अधिक भी छल्ले निकल सकते थे। इस समस्या का निदान लाप्लास की तरफ से नहीं मिलता है। घनीभवन के कारण एक छल्ले का सारा पदार्थ एक ही गोल पिण्ड के रूप में नहीं बदल सकता है। वस्तुत: छल्ला छोटे-छोटे कई टुकड़ों में टूट जायेगा तथा एक ही छल्ले से कई छोटे-छोटे स्वतंत्र ग्रह बनेंगे।

(3) निहारिका के कणों की ”अल्प पारस्परिक संलग्नता” (small degree of cohesion between the particles of nebula) के द्वारा छल्लों के निकलने का क्रम जारी रहेगा तथा उस क्रिया में अवकाश नहीं हो सकता।

(4) यदि ग्रहों की उत्पत्ति निहारिका से हुई तो प्रारम्भ में वे द्रवित अवस्था में रहे होंगे। परन्तु द्रवित अवस्था में ग्रह निर्बाध रूप से परिभ्रमण तथा परिक्रमा नहीं कर सकते क्योंकि द्रव के विभिन्न स्तरों की गति समान नहीं होती और उनमें घर्षण होता रहता है। केवल ठोस पिण्ड ही पूर्णरूपेण  परिभ्रमण तथा परिक्रमा कर सकता है।

(5) इस परिकल्पना के अनुसार सभी ग्रहों के उपग्रहों को अपने पिता ग्रहों की दिशा में ही घूमना चाहिए। इस तथ्य के विपरीत शनि तथा वृहस्पति के उपग्रह अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में भ्रमण करते हैं। सम्भवत: लाप्लास की परिकल्पना के समय तक केवल ऐसे ही उपग्रहों का पता लग पाया था जो अपने पिता ग्रह के चारों तरफ घूमते थे। बाद में चलकर ऐसे अन्य उपग्रहों की खोज हुई जो कि अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में घूमते हैं।

(6) यदि सूर्य, निहारिका का ही एक भाग है तो तरल अवस्था में होने के कारण इसके बीच में उभार होना चाहिए जिससे यह मालूम पड़ता हो कि एक नवीन छल्ला पृथक् होकर बाहर निकलने ही वाला है। पर ऐसा नहीं देखा जाता है।

(7) लाप्लास यह मानकर चलते हैं कि प्रारम्भ में एक गतिशील तथा तप्त निहारिका थी, पर यह निहारिका कहाँ से आयी? उसमें उष्मा तथा गति कैसे पैदा हुई? इन प्रश्नों का उत्तर इस परिकल्पना से नहीं मिल पाता है।

            इस प्रकार यह कहा जाता है कि लाप्लास की यह परिकल्पना कल्पना मात्र ही है। उपर्युक्त त्रुटियों के आधार पर यह प्रमाणित किया जाता है कि यह ‘निहारिका परिकल्पना’ पृथ्वी की उत्पति के विषय में गलत धारणा तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही साथ पृथ्वी के इतिहास तथा उसके भूगर्भ के विषय में भी गलत तथ्यों का प्रचार करती है। वर्तमान समय में यह परिकल्पना मान्य नहीं है।

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना (Kant’s Gaseous Hyphothesis)

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना

(Kant’s Gaseous Hyphothesis)


काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना 

काण्ट की वायव्य राशि

      पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology (भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology  

(भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)



             स्थलमण्डल के दृश्य भागों अर्थात् स्थलरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है, इसलिए भू-आकृति विज्ञान को स्थलरूपों का विज्ञान कहते हैं। भू-आकृति विज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त किये जाने वाले Geomorphology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ (Geo-पृथ्वी, morphi-रूप और logos-वर्णन) भी स्थलरूपों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

Nature and Scope of ​​Geomorphology

      इस विज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किये जाने वाले उच्चावचनों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है-

(i) प्रथम श्रेणी के उच्चावचन-

        इसके अन्तर्गत महाद्वीप तथा महासागरीय बेसिन को सम्मिलित करते हैं। इनके वितरण, वर्तमान प्रारूप तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय श्रेणी के उच्चावचन–

       इसके अन्तर्गत पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा उत्पन्न रचनात्मक स्थलाकृतियों यथा पर्वत, भ्रंश, पठार, मैदान तथा झीलों का अध्ययन सम्मिलित है। इन स्थलाकृतियों के अध्ययन के लिए पृथ्वी के अन्तर्जात बलों तथा प्रक्रमों के स्वरूप तथा क्रियाविधि का अध्ययन भी आवश्यक होता है।

(iii) तृतीय श्रेणी के उच्चावचन-

      इसके अन्तर्गत बहिर्जात प्रक्रमों (वायुमंडल से उत्पन्न यथा– जल, सरिता, सागरीय जल, भूमिगत जल, पवन, हिमनद एवं परिहिमानी) द्वारा अपक्षय, अपरदन एवं निक्षेपण द्वारा जनित स्थलरूपों की आकारिकी, उत्पत्ति एवं विकास का गहन अध्ययन किया जाता है इन स्थलरूपों को निर्मित्त, प्रभावित एवं परिमार्जित करने वाले प्रक्रमों को सम्मिलित रूप में अनाच्छादनात्मक प्रक्रम (Denudational Processes) कहते है जिसके अंतर्गत अपक्ष्य (Weathering) तथा अपरदन (Erosion, निक्षेपण भी) को सम्मिलित करते है।

थार्नबरी के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलरूपों का विज्ञान है, परन्तु इसमें अन्तः सागरीय रूपों के अध्ययन को सम्मिलित किया जाता है।

स्ट्राहलर के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान भौतिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है जो सभी प्रकार के स्थलरूपों की उत्पत्ति तथा उनके व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विकास की व्याख्या करता है।

ए. एल. ब्लूम के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलाकृतियों तथा उन्हें परिवर्तित करने वाले प्रक्रमों का क्रमबद्ध वर्णन एवं विश्लेषण करता है।

बारसेस्टर महोदय ने इसे पृथ्वी के उच्चावचों का व्याख्यात्मक वर्णन करने वाला विज्ञान कहा है। यह भू-पटल के विभिन्न रूपों, उनकी उत्पत्ति, इतिहास तथा विकास की व्याख्या करता है।

       निष्कर्षतः भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसमें न केवल स्थलरूपों के आकार (आकृति) का अध्ययन किया जाता है अपितु इन स्थलरूपों पर क्रियाशील अपरदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक प्रक्रमों की भी व्याख्या समयानुसार क्रमबद्ध विकास के आधार पर की जाती है।

           ज्ञातव्य है कि भू-आकृति विज्ञान में पृथ्वी सतह पर विद्यमान स्थलरूपों का, उनके ऐतिहासिक विकास क्रम का तथा उन प्रक्रमों का अध्ययन किया जाता है जिनसे स्थलरूपों का निर्माण होता है। इन प्रक्रमों में विवर्तनिक शक्तियाँ (उत्थान, अवतलन) अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण महत्वपूर्ण हैं।

          भौतिक भूगोल और भूविज्ञान (Earth Sciences) दोनों से ही भू-आकृति विज्ञान घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का स्थानिक पैमाने पर (उर्मिकाओं से लेकर पर्वतों तक) और कालिक पैमाने पर (सैकण्ड से लेकर लाखों वर्षों तक) अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः स्थलरूप, जिन पदार्थों से बने हैं (शैल और आवरण सामग्री) तथा जो प्रक्रम एवं बल इन पदार्थों पर क्रियाशील रहते हैं, के बीच सन्तुलन के प्रतीक हैं।

           अपक्षय और अपरदन के प्रक्रम सम्मिलित रूप से क्रियाशील रहकर जहां एक ओर स्थलरूपों का विनाश करते हैं वहीं दूसरी ओर वे स्थलरूपों का सृजन अथवा निर्माण करते हैं। उल्लेखनीय है कि पृथ्वी सतह पर तल शैल अथवा आधार प्रस्तर (Bedrock) और मिट्टी जैसे निष्क्रिय पदार्थों पर जलवायु और भूपृष्ठीय गतियां (Crustal Dynamics) जैसे क्रियाशील कारकों के सक्रिय होने से स्थलरूपों का निर्माण होता है। विभिन्न प्रकार के भू-आकृति प्रक्रमों में गुरुत्व बल महत्वपूर्ण चालक शक्ति होती है।

           गुरुत्व बल के अतिरिक्त सूर्यताप तथा पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भी भू-आकृतिक प्रक्रमों के संचालन में सहायक होती है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भ्रंशन क्रिया को जन्म देती है। इस दृष्टि से पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार, सौरमण्डलीय सम्बन्धों, गतियों, शक्तियों तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन भी भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

         भूदृश्य या दृश्यभूमि के मानव कल्याणकारी उपयोग हेतु स्थलरूपों का अध्ययन एवं उनका सम्यक ज्ञान एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गई है, विशेषकर वर्तमान समय में जबकि भूदृश्य में होने वाले कुछ परिवर्तन मानव एवं प्राकृतिक पर्यावरण के लिए विपत्तिकारक बन चुके हैं। इसी कारण से वर्तमान में मानवीय कार्यों के भू-आकृतिक प्रक्रमों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी इसके अन्तर्गत किया जाने लगा है।

विषय क्षेत्र:-

         विकासवादी भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों के विकास क्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी के अन्तर्गत क्षेत्र के भू-आकृतिकीय विकास की प्रमुख घटनाओं का तिथिकरण किया जाता है।

         डेविस ने स्थलरूपों के विकास क्रम को अपरदन चक्र के द्वारा समझाया है, जिसमें तीव्र ढाल समय के साथ अन्ततः धीमे ढाल वाले पेनीप्लेन में बदल जाता है। अन्य भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं, जिन्हें अनाच्छादन कालक्रम विज्ञानवेत्ता (Denudation Chronologists) कहा जाता है, ने बताया है कि किस तरह प्रादेशिक स्थलरूप समय के साथ हुए अपरदन एवं भूपृष्ठीय सतह के उत्थान की तीव्रता अथवा दर के अनुरूप विकसित हुए हैं। इन्होंने भूतकाल की अपरदनात्मक सतहों पर तिथिकरण द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाने का प्रयास किया।

         कुछ भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं ने परिवर्तित जलवायु के प्रभावों द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाया है। जलवायवीय भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों और उनके ऊपर क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रमों को प्रादेशिक जलवायवीय दशाओं से सम्बन्धित कर अध्ययन किया जाता है। जैसे ठण्डे क्षेत्रों में विद्यमान जलवायवीय दशाओं में हिमनद एक प्रभावी भू-आकृतिक प्रक्रम है जो भूदृश्य में परिवर्तन लाता है। इसी प्रकार वनस्पति विहीन रेगिस्तानी क्षेत्रों में पवन प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रम है।

           चट्टानों के प्रकार और भूगर्भिक संरचना (जैसे भ्रंश और वलन) के स्थलरूपों पर प्रभावों का अध्ययन संरचनात्मक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। अधिकांश भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाशीलता चट्टानों की कठोरता और कोमलता से प्रभावित होती है। इसी तरह अधिकांश ढाल रूप चट्टानों की कठोरता और विन्यास (Disposition) के अनुरूप विकसित होते हैं। स्थलरूपों पर क्रियाशील प्रक्रमों (जैसे अपक्षय, अपरदन) की तीव्रता और प्रकृति का अध्ययन प्रक्रम भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। इसी में नदी बेसिनों और पहाड़ी ढालों पर होने वाले शैल पुंज प्रवाह (Mass Wasting) का अध्ययन किया जाता है। इन गतिशील प्रक्रमों की क्रियाविधि पर मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जैव-भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        मानव ने अपनी गतिविधियों के द्वारा विभिन्न भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाविधि में परिवर्तन ला दिया है। भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा वन विनाश से मृदा अपरदन बढ़ा है। इसी प्रकार अम्ल वर्षा से शैलों के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के उपयोग का अध्ययन व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        आज सम्पूर्ण विश्व में तटीय भागों में अपरदन, हिमनदों का पिघलना और उनकी गति का तीव्र होना, भूस्खलन, जल संयोजकों का अपरदन, बांधों में अवसादों का जमाव, मरुद्यानों और परिवहनों मार्गों पर बालुका स्तूपों का विस्तार, उत्खात भूमि का विस्तार, आदि जैसे समस्याओं की मॉनीटरिंग, पहचान और प्रबन्धन में व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-आकृति विज्ञान को परिभाषित कते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

11. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

11. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ


संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

संथाल जनजाति

                   भारतीय जनजातियों में संथाल अपने परम्परावादी सामाजिक संगठन, हिन्दू रीती-रिवाज के अनुसार मृतक एवं शादी संस्कार और अनेक प्रकार के आर्थिक कार्यों के कारण अपनी पहचान बनाये हुए हैं। ये कृषि, पशुपालन, वन, वस्तु-संग्रह, आखेट और नौकरी अनेक आर्थिक कार्य करते हैं। श्रमिक के रूप में इनका मौसमी स्थानान्तरण दूर-दराज के मैदानी भागों में होता है जहाँ वे कृषि और अन्य निर्माण कार्यों में काम करते हैं और पुनः अपने क्षेत्र में लौट आते हैं। इससे प्रकट होता है कि इन्हें अपनी मिट्टी से बहुत लगाव होता है।

            संथाल बारह गोत्रों में बँटे हुए हैं यथा-हल्डाक, विस्कृ, भरमू, हेमब्रायी, भारण्डी, सरेन, टूड, बैसर, वास्के, बेडिंम, चोरे तथा पैरिया। प्रत्येक गोत्र की अपनी परम्परा होती है और बहुधा एक गोत्र के लोग एक गाँव में रहते हैं। अनुमानतः संथालों की संख्या 30 लाख से अधिक है जिसका अधिकांश झारखंड के संथाल परगना में निवास करते हैं। अपने रूप-रंग भाषा और परम्परा से ये मलाया, जावा और हिंदेशिया के आदिवासियों से मिलते जुलते हैं। कहा जाता है कि संथाल यहाँ के आदिवासी हैं।

               इनका काला रंग, औसत कद, सामान्य नाक-नक्शा द्रविड़ प्रजाति के निकट है जिसे कोल के नाम से जाना जाता है। ये शरीर से चुस्त और मन से भोले-भाले किन्तु सच्चे और सहिष्णु होते हैं। यही कारण है कि मैदानी भागों में आसानी से खप जाते हैं। अपनी रोटी के लिए संथाल बड़ी संख्या में बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में स्थानान्तरण करते हैं। इनका पूरा परिवार साथ-साथ प्रवास करता है।

निवास क्षेत्र:-

            संथाल जनजाति के लोग बंगाल की वीर-भूमि उड़ीसा के कटक और झारखंड के पलामू, हजारीबाग, राँची और संथाल परगना आदि जनपदों में पाये जाते हैं। इनके निवास का प्रमुख क्षेत्र बिहार का संथाल परगना राँची पठार का भाग है जिसकी औसत ऊँचाई 200 से 250 मी० के मध्य है। यह पठारी भाग उत्तर एवं दक्षिण में राजमहल की पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

          पठार लावा निक्षेपण के कारण लगभग समतल है। लेकिन बीच-बीच में पहाड़ियों और नदी घाटियों के कारण एकबद्ध नहीं हैं। ब्राह्मणी, युआनी, अजय एवं मोर प्रमुख नदियाँ हैं जिनकी तलहटी जलोढ़ के कारण काफी उपजाऊ है। पठार एवं पहाड़ी ढाल वनों से आच्छादित है क्योंकि वहाँ पर्याप्त वर्षा होती है जिसका औसत 150 से०मी० से अधिक है। ऐसे भौगोलिक परिवेश में संथाल उपयुक्त भूमि पर कृषि करते हैं जहाँ कृषि भूमि नहीं है वहाँ वन वस्तु-संग्रह आखेट और पशुपालन से अपना जीवन-यापन करते हैं।

शारीरिक लक्षण:-

          संथाल जनजाति का कद औसतन कम, इनका मुँह बड़ा, मोटे होठ, लम्बा सिर, चौड़ी नाक तथा बाल घुंघराले होते हैं।

अर्थव्यवस्था:-

      आदिवासी लोग आज के विज्ञान के युग में भी अधिकांशतया प्रकृति पर  ही आश्रित हैं। हजारों वर्षों से उनकी सम्पत्ति के मुख्य स्रोत जंगल, पहाड़, घाटियाँ एवं नदियाँ ही रही हैं। जंगलों तथा पहाड़ों से खाद्य-संग्रह करना, नदियों तथा तालाबों से मछली पकड़ना तथा कहीं-कहीं घाटियों व अन्यत्र पहाड़ी ढालों पर कृषि करना ही उनकी आजीविका के प्रमुख साधन रहे हैं।

       संथाल लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि उत्पादन की कमी को आखेट द्वारा पूरा किया जाता है। ये मुख्यतः मोटे अनाजों की फसलें उगाते हैं। ये लोग वनों को काटकर खेती योग्य भूमि प्राप्त करते हैं तथा उनका प्रयोग बसने के रूप में भी करते हैं। पूर्णतः कृषि से जीवन-निर्वाह न चलने के कारण ये लोग चाय के बागों, मिलों तथा खानों में मजदूरी करते हैं।

संथाल जनजाति में विवाह:-

          संथालों में विवाह शब्द ‘बाप्ला’ नाम से जाना जाता है। अपने हो वंश में विवाह इन लोगों में निषेध है। ये किसी भी अन्य वंश में विवाह कर सकते हैं। यह प्रचलित प्रथा है कि तीन पीढ़ी के बाद आपस में विवाह सम्पन्न किया जा सकता है। लेकिन कभी-कभी कुछ वंशों में विवाह परम्परागत संघर्षो की वजह से निषिद्ध माना जाता है, जिसका ये लोग आज भी पालन करते हैं। अक्सर विवाह में लड़कियों को वरण का अवसर मिलता है।

          विवाह विशिष्ट दो प्रकारों से ही सम्पन्न होता है। प्रथम, वह जिसमें विवाह ‘रैबर’ (Marriage Maker) के द्वारा तय किया जाता है, जिसका प्रचलन आजकल बढ़ गया है। दूसरी प्रथा, जिसमें विवाह बिना ‘रैबर’ की सहायता के लड़के तथा लड़की के माता-पिता अथवा स्वयं लड़के-लड़की निश्चय करते हैं।

धर्म एवं जादू:-

         संथालों में धर्म का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है, जिसने सम्पूर्ण जनजाति को सामाजिक एकता के सूत्र में रखने का प्रयत्न किया है। जादू के द्वारा उस अज्ञात रहस्यमय शक्ति पर नियंत्रण तथा प्रभुत्व रखा जाता है जो कि हानिकारक सिद्ध हो सकती है। विभिन्न प्रकार के धार्मिक प्रकार्यों के लिये अलग-अलग व्यक्ति होते हैं जिन्हें भिन्न-भिन्न नामों से सम्बोधित किया जाता है जैसे- ओझा, जगुरु, कामरुगुरु, रेरेनिक, अतोनेक, कुदामनेक तथा देहरी।

            प्राकृतिक कारणों से बीमार व्यक्ति का उपचार करने वाला व्यक्ति रेरेनिक कहलाता है अथवा जड़ी-बूटी वाला डाक्टर कहा जाता है। जब यह व्यक्ति उपचार करने में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता है तो फिर उन लोगों को उपचार करने के लिये बुलाया जाता है जिन्हें ‘बोंगा’ का समर्थन प्राप्त होता है तथा जनगुरु अथवा ओझा को भी बुलाया जाता है, जो जड़ी-बूटी के अतिरिक्त जादुई शक्ति से बीमार व्यक्ति को ठीक करने का प्रयत्न करते हैं।

 

प्रश्न प्रारूप

1. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

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