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17. Master Plan of Patna/Patna City Planning (पटना का मास्टर‌ प्लान/पटना नगर‌ नियोजन)

17. Master Plan of Patna/Patna City Planning

(पटना नगर‌ नियोजन/पटना का मास्टर‌ प्लान)



Master Plan of Patna

प्रश्न प्रारूप

Q.1 पटना नगर विकास से संबंधित नियोजन के लिए विचारणीय भौगोलिक अभिकर्ताओं का विश्लेषण कीजिए। 

Q.2 पटना नगर विकास से संबंधित नियोजन के लिए भौगोलिक कारकों की चर्चा करें।

Q.3 बिहार का किसी नगर जिसका आपने अध्ययन किया है। उसकी आकारिकी की व्याख्या कीजिए और नगर आकारिकी के लिए कौन-सा मॉडल उपयुक्त है।

Q.3 बिहार के एक न‌गर की आकारिकी पर प्रकाश डालिए।

      गैलीयन महोदय ने नगर नियोजन का तात्पर्य बताते हुए कहा था कि नगर में अधिवासित लोगों के स्वास्थ, सम्पति एवं सौदर्य का संतुलित विकास किया जाना नगर नियोजन कहलाता है। इसके अन्तर्गत भूमि उपयोग, सार्वजनिक सुविधा, पर्यावरण, परिवहन तथा मनोरंजन केन्द्रों का संतुलित विकास किया जाता है।

     कोई भी नगर मानवीय जनसंख्या का जमघट होता है। ऐसे स्थानों पर अधिवासीय अव्यवस्था न हो इसलिए नियोजन का कार्य किया जाता है। भारत में नगर नियोजन का इतिहास काफी पुरानी है। भारत में नगर नियोजन की शुरुआत सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के नगरों से प्रारंभ मानी जाती है। लेकित आधुनिक नगर नियोजन का इतिहास 1863 ई० से प्रारम्भ माना जाता है, क्योंकि इंगलैण्ड के स्वास्थ्य विभाग के अनुशंसा पर नगर नियोजन का प्रारंभ किया गया था।

पटना नगर नियोजन

     जहाँ तक पटना नगर के नियोजन का प्रश्न है। इसकी शुरुआत मुगल काल से हुई थी। लेकिन उस समय पटना सिटी व पश्चिम दरवाजा से पूर्वी दरवाजा के मध्य मुख्य सड़क के दोनों तरफ नगरीय बस्ती बसे हुए थे। ये रेखीय नगरीय बस्ती था। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने प० पटना में नियोजन का कार्य प्रारंभ करवाया। इसका नियोजन अर्द्ध वृत्ताकार विन्यास प्रारूप पर आधारित था।

     लेकिन स्वतंत्रता के बाद पटना सहित देश के सभी बड़े नगरों में जनसंख्या वृद्धि की प्रवृति तेज हो गयी। इसका प्रमुख कारण ग्रामीण नगरीय जनसंख्या का स्थानान्तरण था। नगर में लगातार जनसख्या वृद्धि को देखते हुए द्वितीय पंचवर्षीय योजना में नगर नियोजन की दो प्रकार की नीति अपनाई गयी-

(1) एक लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरों के लिए ‘मास्टर प्लान’ का निर्माण किया गया।

(2) लघु या मध्यम आकार वाले नगरों में सार्वजनिक सुविधाओं का विकास करने का निर्णय लिया गया।

    पुनः मास्टर प्लान की नीति में भी दो प्रकार के नीति निर्धारित किये गये। प्रथम पूर्णतः नवीन नगरों की नीति और द्वितीय पूर्व के बसे हुए नगरों के विकास की नीति।

    नवीन नगरों में मुख्यतः प्रशासन हेतु चण्डीगढ़, औद्योगिक विकास हेतु राऊरकेला, खनन कार्य हेतु कुद्रेमुख और अंकलेश्वर जैसे नियोजित नगर बसाये गये और पूर्व के बसे हुए नगरों में पटना नगर को नियोजित करने का निर्णय लिया गया।

     प्रथम चरण में 36 नगरों के लिए मास्टर प्लान का निर्माण किया गया था। उनमें से पहला नगर पटना था। पटना के लिए प्रथम मास्टर प्लान 1965 ई० में, दूसरा 20 वर्ष बाद 1985 ई० में कार्यान्वित किया गया और तीसरा मास्टर प्लान अभी निर्माणाधीन है। प्रथम मास्टर प्लान 1965 में पटना इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट के द्वारा किया गया था। इसी मास्टर प्लान के तहट राजेन्द्र नगर, कदम कुंआ, गर्दनीबाग और पाटलिपुत्रा कोलोनी का नियोजन किया गया था।

     1965 ई० में PRDA का प्रस्ताव स्वीकृत करते हुए बिहार सरकार ने नियोजन का स्थायी अधिकार PRDA को ही सौप दिया। दूसरे मास्टर प्लान के तहत फुलवारी शरीफ, कंकड़‌बाग, दीघा जैसे मुहल्लों का नियोजन किया गया। लेकिन दूसरा मास्टर प्लान को पूरी तरह लागू नहीं किया गया। पटना में नगर नियोजन पूरी तरह लागू नहीं किये जाने के पीछे कई कारण उत्तरदायी रहे हैं। जैसे-

(1) विस्फोटक जनसंख्या वृद्धि:-

      1995 ई० के मास्टर प्लान के अनुरूप पटना नगर की जनसंख्या 2001 ई० में 12 लाख होनी चाहिए थी जबकि यह वास्तविक रूप से 17 लाख हो गई। पुनः 1981 ई० में पटना की जनसंख्या 4 लाख 80 हजार थी जो 1991 ई० में बढ़कर 10 लाख 80 हजार हो गयी थी।

      2001 ई० में ही पटना भारत का 14 वाँ सबसे बड़ा नगर बन चुका है। मैनपुर, दीघा, फूलवारी शरीफ में मूल रूप से ग्रामीण क्षेत्र से आयी हुई जनसंख्या अधिवासित होती है। यहाँ ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी और भूमिहीनता के कारण जनसंख्या अधिवासित होते रही है।

(2) भूमि उपयोग के नियमों का पालन नहीं होना:-

          भूमि उपयोग के दृष्टि से पटना महानगर को चार भागों में बाँटा जा जा सकता है।-

(ⅰ) अनियोजित पटना का सघन बसा हुआ क्षेत्र

(ⅱ) ब्रिटिशकालीन पश्चिम पटना

(iii) स्वतंत्रता के बाद नियोजित ढंग से विकसित क्षेत्र। जैसे – राजवंशी नगर, शास्त्रीनगर, पाटलिपुत्रा कोलनी और मुंशीनगर

(iv) गैर कानूनी ढंग से निर्मित क्षेत्र- यही क्षेत्र पटना नगर नियोजन की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है।

       बुद्धा कोलनी फेज-2, राजीव नगर, कंकड़‌बाग, न्यू वाइपास के दक्षिण का क्षेत्र तथा नगर के पश्चिमी क्षेत्र ये सभी क्षेत्र PRDA के अन्तर्गत आते हैं। इन क्षेत्रों में PRDA के अनुमति से ही निर्माण कार्य किया जा सकता है। लेकिन PRDA के अनुमति के निर्माण कार्य किये जाने से गंदी बस्ती की विकास हुआ है।

(3) परिवहन ही समस्या:-

      पटना की अधिकतर सड़‌कें संकरी है। महात्मा गाँधी सेतु बनने के बाद परिवहन दबाव में भारी वृद्धि हुई है। पटना में ट्रैफिक जाम सामान्य बात हो चुकी है। नगर बस सेवा लगभग असफल से चुकी है। सड़‌कों पर वाहनो के चलने की रफ्तार लगातार कम होती जा रही है जो नगर नियोजन के विरुद्ध है।

(4) पटना में मलीन बस्तियों का विकास:-

      PRDA के अनुसार पटना की आधी जनसंख्या मलीन बस्तियों में निवास करती है क्योंकि पटना में सार्वजनिक सुविधाओं का काफी अभाव है। यहाँ जल विकासी की समस्या यथावत बनी हुई है। पुनः स्वच्छ जलापूर्ति और गंदी नालियों का जबड़दस्त संगम हुआ है। विद्युत आपूर्ति और सार्वजनिक स्थलों का अभाव है। जगह-2 पर पटना में कचड़ों का अम्बार आसानी से देखा जा सकता है।

(5) पटना में मनोरंजन केन्द्रों का जबड़दस्त अभाव:-

     यह नगर को अनियोजित और अस्वस्थकर बनाता है। सार्वजनिक स्थल जैसे- Park, Play ground, सामुदायिक भवन, क्लब, थीयेटर हॉल की यहाँ जबड़दस्त कमी है।

(6) पटना में पर्यावरणीय समस्याएँ भी काफी गंभीर है। पर्यावरणीय समस्याओं के रूप में यहाँ प्रदूषित जल की समस्या, वायु प्रदूषण की समस्या और ध्वनि प्रदूषण से समस्या गंभीर है।

     उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर पटना का ‘मास्टर प्लान’ तैयार किया गया है। वास्तव में पटना का मास्टर प्लान मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी हुई है। यहाँ के ‘मास्टर प्लान’ में उल्लेखित कुछ विशेषताएं निम्नलिखित है। जैसे-

मास्टर प्लान की विशेषताएँ

(1) पटना का क्षैतिज विस्तार अब संभव नहीं है। इसलिए सरकार ने बहुमंजली इमारतों में बदलने का निर्णय लिया है।

(2) मौर्या कम्प्लेक्स के बाजार का विकास बाजार संकुल के रूप में किया गया है।

(3) पुराने जेल परिसर में नया बाजार विकसित करने का निर्णय किया गया है। लेकिन High Court के निर्देशानुसार जेल परिसर में पार्किंग बनाने का निर्देश मिल जाने के बाद यह कार्य अभी रूका हुआ है।

(4) पटना मुख्य स्टेशन के भार को कम करने के लिए राजेन्द्र नगर टर्मिनल का विकास किया जा रहा है।

(5) बोरिंग रोड चौराहा क्षेत्र को सुपरमार्केट के रूप में बदलने का निर्णय लिया गया है।

(6) मध्यवर्ती पटना के लिए बाजार समीति कैम्पस में सुपर मार्केट विकास करने निर्णय लिया गया है।

(7) अधिवासीय क्षेत्रों के विकास हेतु पटना को चार प्रमुख निकटतम पड़ोसी क्षेत्र में विभाजित किया गया है। जैसे- पश्चिमी पटना में बिहटा, पूर्वी पटना में फतुहा, दक्षिणी पटना में परसा बाजार और गौरीचक एवं उतरी पटना में हाजीपुर को विकसित करने का निर्णय लिया गया है। इन सभी क्षेत्रों में सार्वजनिक सुविधाएँ, बाजार, पार्क, खेल का मैदान, जलापूर्ति की सुविधा विकसित करने के निर्णय बिला गया है।

(8) मास्टर प्लान के तहत फूलवारी शरीफ एयरपोर्ट को बिहटा में, पटना विश्वविद्यालय और PMCH को बाइपास के दक्षिण में, प्राइवेट बस स्टेण्ड को ट्रान्स पोर्ट नगर में और खागौल में विकसित करने का निर्णय लिया गया है लेकिन पूँजी एवं तकनीक की कमी, आम लोग की सहभागिता का अभाव, प्रशासनिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण क्रियान्वित नहीं किया जा सका है।

(9) पटना नगर के परिवहन के समस्या के समाधान हेतु कई महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव है। जैसे- एक रेलवे लाइन दक्षिणी पटना में पुनपुन नदी के किनारे बिहटा से फतुहा तक विकसित करने का निर्णय लिया गया है। साथ ही दीघा में गंगा नदी पर “जयप्रकाश नारायण रेल पुल” का निर्माण किया जा रहा है।

     पुनः गंगा नदी के किनारे मुम्बई के मेरीन ड्राइव के तर्ज पर River drive Road दानापुर से पटना सिटी तक विकसित करने का निर्णय लिया गया है। नगर के अन्दर सभी सड़‌कें को चौड़ा किया जा रहा है। कंकड़बाग जल निकासी योजना के तहत सम्पूर्ण दक्षिणी पटना में चौड़ी-2 नालियों और बड़े-2 ‘सम्प हाउस’ का निर्माण किया जा रहा है तथा नगर से निकलने वाले प्रदूषित जल को साफ करने हेतु ‘मैला टंकी’ के विकास का निर्णय लिया गया है।

(10) स्टेशन एरिया और नगर के अन्य क्षेत्रों में ट्रैफिक जाम वाले क्षेत्र को पहचान कर फ्लाईओवर ब्रिज का निर्माण किया जा रहा है। जैसे- चिरैयाँ टाल पुल, मीठापुर पुल, चारपुर पुल, बहादुरपुर पुल इत्यादि का कार्य प्रगति पर है।

      गंगा नदी के किनारे सड़क निर्माण का कार्य 1942 से ही प्रस्तावित है। लेकिन विभिन्न कारणों से यह प्रस्ताव अभी तक कार्य रूप में नहीं आ पाया है क्योंकि गंगा नदी के किनारे निजी अधिवासीय क्षेत्र और कई सरकारी कार्यालय अवस्थित है जिसे हटाना अभी संभव है।

(11) सार्वजनिक सुविधाओं के विकास हेतु मास्टर प्लान में कई प्रस्ताव शामिल किये गये है। जैसे- खाली पड़े जमीन पर पार्कों का विकास किया जा रहा है। शहर के अंदर जगह-2 सुलभ शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। पाटलिपुत्रा कोलनी में और बाजार समीति कैम्पस में मल्टी पलेक्स विकसित करने का निर्णय लिया गया है। कंकड़बाग में ‘इंडोर स्टेडियम’ का निर्माण किया जा रहा है।

(12) पर्यावरणीय नियोजन:-

     मास्टर प्लान के अन्तर्गत प्रत्येक मलीन बस्ती को विकसित करने के लिए दो प्रकार के निर्णय लिये गये हैं। मलीन बस्तियों में गरीबी, निवारण कार्यक्रम चलाया जा रहा है तथा मलीन बस्तियों में सस्ते लागत वाले मकान बनाकर गरीबों को उपलब्ध करवाया जा रहा है।

        बिहार सरकार गरीब परिवारों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है तथा गंदी बस्तियों में सुलभ इंटरनेशनल के माध्यम से शौचालय निर्माण किया जा रहा है। पर्यावरणीय विकास के अंतर्गत खुले नालों को ढका जा रहा है। निजी शौचालय को नालियों से जोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कचड़ा उठाव के लिए नगर निगम को रात्रि में उठाने को कहा गया है। पटना के चारों ओर एक हरित पेटी (चौ० ½ km) के विकास का निर्णय लिया गया है।

      उपयुक्त कार्यक्रमों के द्वारा पटना नगर के नगरीय पर्यावरण में सुधार की पूरी संभावना है। चूंकि पटना एक पुराना नगर है इसलिए इसका पूर्ण नियोजन संभव नही है। इसलिए आंशिक नियोजन और कुछ सुधारों से ही नगरीय लोगों की समस्साओं से निजात दिलायी जा सकती है।

      लेकिन पूँजी, और तकनीक, आम लोगों की सहभागिता, प्रशासनिक एवं राजनीतिक इच्छाशक्ति, कानून में संशोधन, विस्थापित लोगों को उचित मुआवजा इत्यादि प ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। पुन: इसका भी व्यवस्था किया जाना चाहिए कि गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, आरा, बक्स जैसे नगरों के इस रूप में विकास किया जाय कि ग्रामीण क्षेत्रों से स्थानान्तरित होने वाली जनसंख्या वहीं अधिवासित हो सके।


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17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


18. Urbanization in Bihar (बिहार में नगरीकरण)

    18. Urbanization in Bihar

(बिहार में नगरीकरण)



    Urbanization in Bihar

     नगरीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कार्यिक प्रतिरूप, नगर के आकार और नगर की जनसँख्या में लगातार वृद्धि होती है। आजादी के समय बिहार में कुल आबादी का 10 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती थी और आज 70 साल के बाद भी 11.3 प्रतिशत आबादी ही नगरों में निवास करती है। बिहारी अर्थव्यवस्था की निस्तेजता और स्थिरता की यह सबसे बड़ा उदाहरण है। बिहार में नगरीकरण के नगण्य होने के पीछे कई कारण है:-

1. कृषि उत्पादन की स्थिरता,

2. औद्योगिकीकरण की दर नगण्य होना,

3. सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,

4. बाढ़ और सुखाड़ की स्थायी समस्या,

5. सिंचाई की अपर्याप्त व्यवस्था।

          बिहार के 130 शहरों में से 111 स्वतंत्र शहर है और 19 ऐसे शहर है जिन्हें नव-नगर समूहों में बाँटा गया है। ‘नगर समूह’ ऐसे नगरीय बस्ती को कहते है जब दो या दो से अधिक नगरों की सीमा आपस में मिल जाते है। जैसे- पटना, गया, मोतिहारी, समस्तीपुर, भागलपुर, पूर्णिया, बेगुसराय, कटिहार, सीतामढ़ी इत्यादि नगर समूह के उदाहरण है।

       भारत में नगरीकरण का औसत प्रतिशत 2.78 प्रतिशत है। भारत के सभी राज्य और केन्द्र प्रशासित राज्यों में बिहार में सबसे कम नगरीय जनसंख्या अधिवासित होती है। कुल जनसंख्या के दृष्टिकोण से बिहार भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है जबकि यहाँ भारत की मात्र 3.04 प्रतिशत जनसंख्या ही बिहार के नगरों में निवास करती है।

       जनगणना 2011 के अनुसार बिहार में 11758016 लोग नगरों में निवास करते है। जिसमें से 6204307 पुरूषों तथा 5553709 महिलाओं की संख्या हैं। पिछले 10 सालों में बिहार में नगरीय जनसंख्या में 11.29 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

        2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में 26 ऐसे नगर है जिनकी जनसख्या 01 लाख से अधिक है। इस नीचे की तालिका में देखा जा सकता है।

नगर जनसंख्या (लाख में)
पटना 16.84
गया 4.8
भागलपुर 4.0
मुजफ्फरपुर 3.54
बिहारशरीफ 2.97
दरभंगा 2.96
पूर्णिया 2.82
आरा 2.6
बेगूसराय  2.52
कटिहार 2.26
मुंगेर 2.1
छपड़ा 2.02
दानापुर 1.82
सहरसा 1.56
हाजीपुर 1.47
सहरसा 1.56
डेहरी 1.37
सीवान 1.35
बेतिया 1.32
मोतिहारी 1.26
बगहा 1.26
किशनगंज 1.05
जमालपुर 1.05
जहानाबाद 1.03
बक्सर 1.02
औरंगाबाद 1.02

     बिहार में छोटे-बड़े नगरों की संख्या 130 है। उल्लेखनीय है कि 1991 में अविभाजित बिहार की नगरीय जनसंख्या 11353012 थी। वर्तमान बिहार का जो क्षेत्र है उसकी नगरीय जनसंख्या 67.1 लाख थी। 1991-2001 की अवधि में 19.67 लाख तथा 2001-2011 की अवधि में 30 लाख जनसंख्या वर्तमान बिहार में नगरीय जनसंख्या के रूप में बढ़ी।

     वर्तमान बिहार में कुल नगरीय जनसंख्या जनगणना 2011 के अनुसार 117 लाख है। बेगुसराय, मधेपुरा, समस्तीपुर और सुपौल ऐसे जिले थे जहाँ नगरीकरण की दर ऋणात्मक रही क्योंकि 2001 की जनगणना 2011 के अनुसार वैसे शहरों में नगरीय जनसंख्या में वृद्धि हुई है। अगर बिहार के नगरों के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट होता है कि बिहार के जिला को 06 समूहों में विभक्त किया जा सकता है।-

क्रम नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत वृद्धि जिला
1. 50 प्रतिशत से अधिक नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला कैमूर, जहानाबाद, शिवहर, सहरसा
2. 40-50 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला पूर्णिया, मोतिहारी, बक्सर, औरंगाबाद, नवादा, पटना
3. 30-40 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला पश्चिम चम्पारण, भोजपुर, गया, लखीसराय, जमुई, भागलपुर, वैशाली
4. 20-30 प्रतिशत के बीच कटिहार जनसंख्या वृद्धि वाले जिला सिवान, सारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, मधुबनी, अररिया, कटिहार, रोहतास, बांका
5. 0-20 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला बिहारशरीफ, मुंगेर
6. 0-6 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला सुपौल, मधेपुरा, समस्तीपुर, बेगुसराय

       इस तरह उपर्युक्त दिए गये आंकड़ों और तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि बिहार नगरीकरण के मामले में भारत का सबसे पिछड़ा राज्यों में से एक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बिहार में नगरीय जनसंख्या जहाँ मात्र 6.5 प्रतिशत थी वही आज भी आजादी के 70 वर्षों के बाद भी मात्र 4.8 प्रतिशत बढ़कर 11.3 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास कर रही है जो कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है। अतः बिहार में कृषि सुधार, औद्योगिकरण इत्यादि को बढ़ावा देकर नग विकास की प्रक्रिया को तीव्र कने की आवश्यकता है।


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19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


19. Rural Market Center in Bihar (बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र)

19. Rural Market Center in Bihar

(बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्रों की भूमिका की विवेचना कीजिए।

       बिहार के ग्रामीण-नगरीय क्षेत्रों के विकास के क्रम में कई ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास हुआ है। ग्रामीण बाजार में प्राय: हाट मेला कस्बाई बाजार, सप्ताहिक बाजार या पाक्षिक बाजार इत्यादि के नाम से जानते है। ग्रामीण बाजार केन्द्र बड़े नगर और ग्रामीण क्षेत्र के बीच योजक कड़ी का कार्य  करते हैं।

ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास:-

       बिहार में ऐसे ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास लगभग पुरे बिहार में हुई है। ऐसे बाजार जैसे क्षेत्रों पर विकसित होते हैं जहाँ पर सड़कों का चौराहा हो या कोई सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ केन्द्र हो या कोई जलाशय उपलब्ध हो सोनपुर, बाढ़, बख्तियारपुर, बिहटा, तारेगना, अकबरपुर, रजौली, गिरियक इत्यादि ऐसे बाजार केंद्र हैं जो पटना महानगर के इर्द-गिर्द स्थित हैं।

ग्रामीण बाजार केन्द्रों की भूमिका:-

       बिहार के ग्रामीण बाजार केन्द्रों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित भूमिकाएँ रेखांकित की जा सकती हैं-

(1) ग्रामीण बाजार केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों की मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं तथा उनका जीवन स्तर सुधारने में मदद करते हैं।
(2) ग्रामीण बाजार आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु होता है। यहाँ द्वितीयक तथा तृतीयक प्रकार के आर्थिक गतिविधि सम्पन्न किये जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने कृषि उत्पादों को ग्रामीण बाजार केन्द्र में आकर बेचते हैं अपनी आवश्यकता की चीजें खरीदकर ले जाते हैं।

(3) ग्रामीण बाजार केन्द्र नवो उत्पाद विसाण का केन्द्र होता है। इसका तात्पर्य है कि किसानों के कृषि कार्य से संबंधित नवीन उपकरण, बीज, उर्वरक इत्यादि सबसे पहले ग्रामीण बाजार केन्द्र तक पहुंचते है और वहाँ से उनका धीरे-2 ग्रामीण क्षेत्रों में विसरण होता है।

(4) ग्रामीण बाजार केन्द्र बफर स्टॉक का कार्य करते हैं। जैसे- ग्रामीण बाजार केन्द्रों में ‘Cold Storage’ स्थापित होते है जहाँ किसान अपने उत्पादों को सुर‌क्षित एवं संरक्षित रखते हैं।

(5) ग्रामीण कृषि और कुटीर उद्योग से संबंधित उत्पादों का विपनण का कार्य किया करते है

(6) ग्रामीण बाजार केन्द्र सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केन्द्र बिन्दु होता है। जैसे- एक ओर ग्रामीण केन्द्रों में आर्थिक गतिविधियाँ चल रही होती है वहीं दूसरी ओर मनोरंजन से जुड़े हुए गतिविधि भी चल रहे होते हैं।

(7) ग्रामीण बाजार केन्द्र सूचना के प्रमुख केन्द्र होते हैं। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित NGO, नुक्कड़ नाटक इत्यादि के माध्यम से सरकारी कार्यक्रम, परिवार नियोजन, साक्षरता, स्वास्थ संबंधित जानकारी इत्यादि आसानी से सम्प्रेषित करते हैं।

(8) ग्रामीण बाजार केन्द्र विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों को मिलने-जुलने का अवसर प्रदान करता है जिससे सामाजिक एकता बनी रहती है।

(9) ग्रामीण बाजार में साहुकार, छोटे-छोटे बैंक, बीमा एजेन्ट, व्यापारी इत्यादि का जमघट होता है। ये किसानों को जरूरत के उननुसार धन उपलब्ध करवाते हैं और किसानों के उत्पादों को खरीदकर राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुं‌चाते हैं।

(1) ग्रामीण बाजार केन्द्र प्रादेशिक असमानता को दूर करने में सहायक है।

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण बाजार केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल आर्थिक गतिविधियों को संचालित कता है बल्कि समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक औ आर्थिक गतिविधियों का भी केन्द्र बिन्दु होता है।

Rural Market Center in Bihar



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7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

14. Sindri Fertilizer Industries (सिन्दरी उर्वरक उद्योग)

14. Sindri Fertilizer Industries

(सिन्दरी उर्वरक उद्योग)



Sindri Fertilizer Industries

प्रश्न प्रारूप

Q. सिन्दरी उर्वरक उद्योग एक वृहत केन्द्र के रूप में व्याख्या कीजिए।

     सिन्दरी एकीकृत बिहार राज्य की एक प्रमुख उर्वरक उद्योग का एक महान् केन्द्र रहा है जो वर्तमान समय में झारखण्ड राज्य के धनबाद जिला में अवस्थित है। यह औद्योगिक केन्द्र धनबाद से 82 किमी० दक्षिण में अवस्थित है। यह छोटानागपुर खनिज औद्योगिक प्रदेश के दामोदर नदी घाटी में अवस्थित है। इसकी व्यापना 1951 ई० में किया गया था। यहाँ उर्वरक निर्माण के तीन इकाई है-

1. फर्टिलाइजर्स कारपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (FCIL)-

    यह अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइ‌ट्रेट और आमोनिया कार्बोनेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।

2. बिहार स्टेट सुपर फॉस्फेट (BBSF)-

     यह इकाई सुपर फॉस्फेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।

3. गैनुलर फर्टिलाइजर्स फैक्ट्री-

      यह दामोदर उर्वरक का उत्पादन करता है।

     सिन्दरी को महान उर्वरक उत्पादन केन्द्र के रूप में विकसित करने पीछे कई भौगोलिक कारक उत्तरदायी रहे है। जैसे-

(i) सिन्दरी भारत के महान कोयला संचित भण्डार क्षेत्र में स्थित है। इसे झरिया क्षेत्र से कोयला की प्राप्ति हो जाती है।यहाँ कोयला से ही उर्वरक का उत्पादन होता है।

(ii) परिवहन मार्ग की सुविधा- सिन्दरी धनबाद से पुरुलिया जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित है। यह रेलवे लाइन ये भी जुड़ी हुई है। रेगवे लाइन धनबाद, कोलकाता, मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों से जुड़े हुए हैं। सिन्दरी में ही मंझोले एयरपोर्ट का भी निर्माण किया गया है। कालकोता एवं पारादीप बंदरगाह पास में ही अवस्थित है।

(iii) श्रमिक उपलब्धता- सिन्दरी सघन जनसंख्या वाले प्रदेश में अवस्थित है। कुशल इंजीनियरों की आपूर्ति हेतु सिन्दरी में ही बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की गई थी।

(iv) सिन्दरी को दामोदर और उसके सहायक नदी बराकर से पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध हो जाती है।

(v) विद्युत आपूर्ति हेतु चन्द्रपुरा और सिन्दरी थर्मल प्लाण्ट से विद्युत मिल जाती है। आकस्मिक बिजली इसे दामोदर भैली कारपोरेशन (DVC) से मिल जाती है।

(vi) किसी उद्योग के विकास हेतु एवं पथरीली भूमि की आवश्यकता होती है जो सिन्दरी उर्वरक कारखाना को आसानी से उपलब्ध है।

(vii) सिन्दरी प० बंगाल और बिहार के मैदानी क्षेत्र के जंक्शन पर अवस्थित है जहाँ नाइट्रोजन एवं फॉस्फेटयुक्त उर्वरक की भारी माँग है। इस तरह इसे विस्तृत बाजार की सुविधा भी उपलब्ध है।

     उपरोक्त भौगोलिक कारकों के अलावे आधुनिक तकनीक का अभाव, पूँजी की कमी, बिजली की आपूर्ति न किये जाने, कर्मचारियों के द्वारा अक्सर के द्वारा अक्सर हड़ताल एवं तालाबंदी किये जाने, इंजीनियरिंग कॉलेज की बिगड़ती स्थिति, झारखण्ड की बिग‌ड़ती राजनीतिक अस्थिरता, बेहतर प्रबंधन के अभाव में उर्वरक की यह महान केन्द्र रुग्ण स्थिति में बदल चुका है। लेकिन उपरोक्त समस्याएँ सामयिक दिखाई पड़‌ती है। ज्यों-ही इन परिस्थितियों में थोड़ी बहुत बदलाव आती है तो सिन्दरी पुनः महान उर्वरक केन्द्र के रूप में तब्दील हो जायेगी। सरकार ने सिन्दरी उर्वक संयंत्र से निकलने वाले कचड़ों से सीमेंट का निर्माण प्रारंभ कर दिया है तथा इसे हल्दिया गैस पाइप लाइन से भी जोड़ने का निर्णय लिया गया है।

      इससे स्पष्ट होता है कि आने वाला समय में इनकी महानता पुनः स्थापित हो के हेगी।



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1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

7. Flood in Bihar (बिहार में बाढ़)

7. Flood in Bihar

(बिहार में बाढ़)



प्रश्न प्रारूप

Q. Describe the flood problems in Bihar.

(बिहार में बाढ़ से सम्बन्धित समस्याओं का वर्णन करें।)

उत्तर- बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ की 80 या 85 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। बिहार से झारखण्ड राज्य के अलग होने के कारण यहाँ केवल कृषि का ही क्षेत्र रह गया है। अब बिहार की आर्थिक उन्नति केवल कृषि पर निर्भर है। बिहार में कई समस्याओं के कारण कृषि सम्पदा से परिपूर्ण बिहार आज भी अपनी निर्धनता के लिए देश में विख्यात है। अतः इन समस्याओं के निदान के बगैर इसकी आर्थिक उन्नति असंभव है।

बाढ़ की समस्या:-

     बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। बाढ़ नदियों में अत्यधिक जल के कारण आती है। यहाँ की नदियाँ सदियों से विनाशकारी बाढ़ के लिए प्रसिद्ध रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के कुल बाढ़ग्रस्त क्षेत्र का लगभग 64 लाख हेक्टेयर है। इसका अधिकतर क्षेत्र उत्तरी बिहार में पड़ता है। उत्तर बिहार में अधिकतर नदियाँ हिमालय से निकलती है। इन नदियों में कोसी, कमला, बागमती, गण्डक, बूढ़ी गण्डक आदि सम्मिलित हैं।

     ये सभी नदियाँ हिमालय के अतिवृष्टि के क्षेत्र से निकलने के कारण काफी जलराशि लाती है, इनका जलग्रहण क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। इन नदियों में बाढ़ का मुख्य कारण हिमालय के तराई क्षेत्र में अत्यधिक वृष्टि है। इस भाग की कोसी तथा गण्डक नदियों का जलक्षेत्र ऊँचे हिमालय के शिखर पर है।

      इस भाग में अधिक वर्षा से यहाँ बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण कोसी नदी में जल का प्रवाह काफी तीव्र है। इसका क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहता है। यह नदी मार्ग परिवर्तन के लिए भी विख्यात है। विगत 200 वर्षों से 150 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसक गई है और बार-बार खिसकने से पुरानी धारा जल प्लावन को बढ़ावा देती है। वर्षाऋतु में पूर्णिया से दरभंगा तक का क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका से प्रभावित रहता है। अतः इस नदी को ‘बिहार का शोक’ (‘Sorrow of Bihar’) कहा जाता है। परन्तु कोसी परियोजना के कार्यान्वयन से अब कुछ राहत मिली है।

     हिमालय से जब नदियाँ बिहार के मैदान में प्रवेश करती है तो इनके द्वारा लायी गयी जलोढ़ मिट्टी यहाँ के समतल मैदान पर बिछाकर उथला बना देती है और कहीं-कहीं पर अवरोध भी उत्पन्न कर देती हैं। इसके फलस्वरूप नदी अपने दोनों किनारे पर जल फैला देती है। मन्द ढाल के कारण छाड़न झीलें, दलदली भूमि तथा चौर आदि का निर्माण करती हैं।

      इसी प्रकार बूढ़ी गण्डक, कमला, बागमती तथा महानन्दा अपने किनारे पर जल फैलाकर बाढ़ उत्पन्न करती हैं। जल की निकासी ठीक से नहीं होती है। इस प्रकार महीनों पानी भरा रहता है और फसलों को क्षति होती है। उत्तरी बिहार के अररिया, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगुसराय, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, छपरा आदि जिलों में भयंकर बाढ़ आती है।

      दक्षिण बिहार की नदियाँ पठारी भाग से निकलकर गंगा में गिरती हैं। इस प्रदेश की प्रमुख नदियाँ, सोन, पुनपुन, फल्गु, मोरहर, पैमार, पंचाने, सकरी, मोहाने, कर्मनाशा आदि है। इस भाग में वर्षा के कारण कुछ महीनों के लिए बाढ़ की समस्या बनी रहती है।

    जब गंगा नदी स्वयं जलमग्न रहती है तो सोन, पुनपुन, सकरी, फल्गू आदि नदियों के पानी के निकास को अवरूद्ध कर देती है। इसके फलस्वरूप नदियों के प्रवाह क्षेत्र में भयंकर बाढ़ आ जाती है। इन नदियों से भी दलदली भूमि, दियारा भूमि, तालभूमि, चऊर भूमि, तथा जल प्रदेश बन जाते है। वर्षाऋतु में पटना से मोकामा तक का क्षेत्र जलप्लावित रहता है। दक्षिण बिहार के मैदान में पटना, उत्तरी नालन्दा, उत्तरी मुंगेर, लक्खीसराय तथा उत्तरी भागलपुर के जिले बाढ़ से प्रभावित होते हैं।

Flood in Bihar

बाढ़ की समस्याओं का निदान-

     बिहार में बाढ़ से निपटने के लिए अनेक प्रयास किये गये हैं। इसमें केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा भी कई प्रयास किये गये हैं। इधर बिहार की नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ को नियंत्रित किया गया है। इससे जल की निकासी हो जाती है और बाढ़ की विभीषिका से बचाव भी हो जाता है। सोन नदी पर भी बाँध बनाया गया है। इसके अलावे गंगा तट पर कोइलवर बक्सर बाँध, भूतहीबलान बाँध मधुबनी, वैशाली जिले में हाजीपुर-बाजीपुर बाँध, कोसी के किनारे बदलाघाट-नगरपाला बाँध, त्रिमुहानी कुरसेला बाँध, पुनपुन नदी बाँध, बेतवा नहर बाँध, फल्गु नदी पर उदेरास्थान बाँध आदि है।

        बाँध निर्माण के अलावा बाढ़ नियंत्रण के लिए और भी कई उपाय किये गये हैं। पेड़-पौधे लगाक बाढ़ से बचाव किया गया है। इसका प्रयास भी हो हा है।


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20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


11. The Agricultural Region of Bihar (बिहार का कृषि प्रदेश)

11. The Agricultural Region of Bihar

(बिहार का कृषि प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. Divide Bihar into agricultural regions and discuss their salient characteristics.

(बिहार को कृषि प्रदेशों में विभाजित करें तथा प्रत्येक की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।)

उत्तर- बिहार की कृषि विभिन्न प्राकृतिक तत्वों पर निर्भर करती है। ये तत्व तापमान, वर्षा, स्थलाकृति, मिट्टी, सिंचाई के साधन आदि हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं पर कृषि तथा फसलों के प्रकार निर्भर करते हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं को आधार मानकर बिहार की कृषि को बाँटा गया है। इन्हीं तत्वों पर फसलों का उत्पादन निर्भर करता है। इन्हीं तत्वों से फसलें प्रभावित होती हैं। जिन भागों में जिस प्रकार की दशाएँ हैं, वहाँ की फसल उगाई जाती है।

      उदाहरणार्थ, उत्तरी बिहार में उपजाऊ मिट्टी, 40 सेमी० से अधिक वर्षा, समतल भूमि तथा अधिक जनसंख्या मिलती है। अतः वहाँ इन्हीं भौगोलिक दशाओं के अनुरूप धान की फसल लगाई जाती है। इस क्षेत्र के लिए यही फसल सबसे अधिक उपयुक्त है। भौगोलिक दशाओं की अनुकूलता के कारण प्रति एकड़ उत्पादन भी अधिक होता है। इसी कारण बिहार के उत्तरी सीमान्त क्षेत्र में धान की खेती की अधिकता है, यह पट्टी का निर्माण करता है। इस प्रकार बिहार के कृषि क्षेत्र को निम्नलिखित कृषि पट्टियों में बाँट सकते हैं-

1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र

2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र

3. दक्षिणी गंगा के सिंचित प्रदेश

4. छोटानागपुर के पठारी प्रदेश

1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र:-

        बिहार का यह कृषि प्रदेश बूढ़ी गंडक नदी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह मुख्य रूप से बिना सिंचाई के धान का क्षेत्र है। यह प्रदेश उत्तर पश्चिम में संकीर्ण तथा पूर्व में चौड़ा होता गया है। यह भूमि निम्न है और यहाँ मकई और रबी की भी खेती की जाती है। यह पूरा क्षेत्र समतल है। इस भाग में अनेक नदियों में प्रतिवर्ष बाढ़ आ जाती है।

     यहाँ की मिट्टी जलोढ़ है। जिसमें नमी रखने की क्षमता अधिक है। इस भाग में वर्षा अधिक होती है। जिसके कारण आर्द्रता अधिक रहती है। कोशी नदी के क्षेत्र में बाढ़ अधिक आती है। जिसके फलस्वरूप धान की फसल को हानि होती है। सामान्य रूप से सम्पूर्ण क्षेत्र में धान की ही खेती की जाती है। इस प्रदेश में मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णिया आदि जिले सम्मिलित हैं। इस भाग में चावल कूटने की मिलें स्थित हैं।

2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र:-

     यह प्रदेश उत्तर गंगा में धनहर क्षेत्र के दक्षिण में स्थित है तथा गंगा के दक्षिण का छोटा-सा भाग इसमें सम्मिलित है। इसमें दो तरह की भूमि आती है। पहली भूमि ऊँची है। जिस पर बाढ़ का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसे दियारा भी कहते हैं।

       दूसरी भूमि निम्म् भूमि है जो वर्षा के दिनों में जल से भरी रहती है। दोनों ही भूमि पर भदई फसल मकई एवं रबी की फसल होती है। रबी फसलों में गेहूँ, चना, जौ, दलहन एवं तेहलन होता है। कहीं-कहीं पर धान भी होता है। इसकी भूमि भी उपजाऊ है और वर्षा भी अच्छी हो जाती है। गंगा के दक्षिण में मोकामा-बड़हिया के क्षेत्र में गेहूँ और चना काफी होता है।

3. दक्षिणी गंगा का सिंचित प्रदेश:-

     यह दक्षिणी गंगा के मैदानी भाग का पूर्व प्रदेश है। यह पश्चिम में पुराना शाहाबाद जिला (आरा, रोहतास, बक्सर, कैमूर) से लेकर पूरब में भागलपुर तक फैला है। इस भाग में कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ की कृषि सिंचाई पर आश्रित है। इसी भाग में सोन एवं सकरी नदियों पर नहरें बनाई गई हैं और इस भाग में आहर तथा पईन के द्वारा भी सिंचाई की सुविधा प्रदान की गई है। इन्हीं सुविधाओं के कारण यहाँ सघन कृषि की जाती है।

      इस भाग की सबसे महत्त्वपूर्ण कृषि की फसल धान ही है। आरा एवं रोहतास जिलों में सोन नहर से सिंचाई के कारण धान की अच्छी खेती की जाती है। गया, जहानाबाद, पटना तथा नालन्दा जिलों में भी इसकी खेती की जाती है। धान के अलावे इस भाग में गेहूँ, आलू, चना, दलहन, तेलहन तथा अन्य फसलें होती हैं।

4. छोटानागपुर पठारी क्षेत्र:-

       छोटानागपुर की स्थलाकृति तथा मिट्टी की दशाएँ उत्तर बिहार से बिल्कुल भिन्न है। अतः इस भाग की कृषि “प्रणाली” भी भिन्न हैं। इस भाग में पठारी भूमि एवं अनुपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि कम होती है। कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नदी घाटियों में धान की खेती की जाती है तथा ऊपरी पठारी भागों पर मकई, मडुआ, दलहन आदि की खेती की जाती है।

      मिट्टी की कमी के कारण खेती करने में अधिक कठिनाई है। नदी घाटी के आर्द्र भागों में खेती अधिक की जाती है। वहाँ सिंचाई की भी थोड़ी सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावे इस भाग में कृषि सिंचाई एवं मिट्टी की कमी के काण सीमित है। 


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19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation (पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)

20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation

(पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. पर्यावरण निम्नीकरण के कारणों, परिणामों की चर्चा कीजिए और संबंधित संरक्षण के उपाय पर प्रकाश डालें।

    पर्यावरणीय निम्नीकरण केवल भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की गंभीर समस्यायों में एक है। यह आज की उपभोक्तावादी जीवन, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, अनियोजित विकास, इत्यादि की देन है। प्रत्येक पर्यावरण में जैविक एवं अजैविक घटकों के बीच प्राकृतिक संतुलन का संबंध होता है। जब इस संतुलन में नाकारात्मक परिवर्तन होता है तो उसे ‘पर्यावरणीय निम्नीकरण’ कहते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारक

    पर्यावरणीय निम्नीकरण के कई कारण है जिन्हें हम दो प्रमुख वर्गों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारण

1. प्राकृतिक कारण

(ⅰ) भारी वर्षा, आकिस्मक वर्षाः

(ii) भूस्खलन, हिमस्खलन;

(iii) भूकंप, सूनामी;

(iv) ज्वालामुखी उद्‌गार;

(V) बाढ़, सूखाड़, अकाल;

(1) चक्रवात, हिमपातः

(vii) वायु इत्यादि।

2. मानवीय कारण

(i) वनों की कटाई,

(ii) वृहद बांधों का निर्माण,

(iii) खनन

(iv) औद्योगिकीकरण,

(v) नगरीकरण,

(vⅰ) संचार एवं परिवहन क्रांति

(vii) कीटनाशक एवं उर्वरक के प्रयोग,

(viii) अवैज्ञानिक कृषि,

(ix) अति पशुचारण,

(x) अनियोजित विकास इत्यादि।

1. प्राकृतिक कारण

     भारी या आकस्मिक वर्षा के कारण तीव्र ढाल एवं उबड़-खाबड़ प्रदेशों में तेजी से मृदा अपरदन होती है। जैसे- भारत के चम्बल घाटी क्षेत्र में रील एवं अवनलिका अपरदन के कारण मृदा का क्षरण हुआ है। जबकि महान हिमालय, लघु हिमालय में तीव्र ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के कारण मृदा ह्रास हुआ है।

     भूस्खलन एवं हिमस्खलन से पर्वतीय प्रदेशों में जैविक ह्रास, मृदा क्षरण, स्थलाकृतिक स्वरूप में परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। हिम स्खलन से बेड़-2 हिम और भूस्खलन से छोटे-बड़े चटानें ढाल के सहारे गुरुत्वारण के कारण नीचे गिरते हैं। इससे कई वनस्पति, जीव-जन्तु इत्यादि दब कर नष्ट हो जाते हैं जो पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक कारण है।

    भूकंप के दौरान कई पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं, कितने जीवों की जानें चली जाती हैं जो पर्यावरण निम्निकारण के कारण है। ज्वालामुखी उद्‌गार के समय लावा, राख, जलवाष्प गैस इत्यादि निकलती है जो पर्यावरण को प्रदूषित कर देती हैं। हिमालय क्षेत्र में अधिकतम भूकम्प आते हैं। 1934 में मुंगेर और दरभंगा का भूकम्प, 2001 में कच्छ की भूकम्प इत्यादि उल्लेखनीय है। हिमालय प्रदेश और बैरन द्वीप में ज्वालामुखी की घटना देखने को मिलती है जिससे पर्यावरण निम्नीकरण होती है।

    बाढ़, सूखाड़ और अकाल पर्यावरण निम्नीकरण को जन्म देते हैं। बाढ़ एवं सूखाड़ की बारम्बारता से खाद्य पदार्थ, पेयजल और चारे में कमी आ जाती है। महामारी, अकालमृत्यु, पशुमृत्यु दर बढ़ जाता है। भारत के वृष्टिछाया प्रदेश, द० बिहार, द०-प० उड़ीसा इत्यादि में सूखे के कारण और असम, उत्तरी बिहार इत्यादि में बाढ़ के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई होती है।

     चक्रवात के दौरान वायु की तेज झोंका और तीव्र वर्षा से वृक्ष का गिरना, बड़े भूभाग का जलमग्न होना, बाढ़ आना इत्यादि जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। यह घटना भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

     प्राकृतिक वायु मरुस्थलीय क्षेत्रों से धुलकण को उड़ाकर बाहरी क्षेत्रों में जमा करते रहती है जिसके कारण मरुस्थलीय क्षेत्रों का लगातार विस्तार होता जा रहा है। राजस्थान के थार मरुस्थल से वायु द्वारा धूल कण, बालू उड़ाकर पंजाब, हरियाणा, UP के सीमावर्ती क्षेत्रों में जमा करते रहने से यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

2. मानवीय कारण

     वनों की कटाई पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक प्रमुख कारण है। बढ़ती हुई आबादी के कारण कृषि एवं अधिवास के लिए वनों की कटाई की जा रही है। इसके कारण वनस्पति के विभिन्न प्रजातियों का विलोपीकरण, जैविक विविधता में ह्रास हो रही है और आहार-श्रृंखला पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भूमिगत जल स्तर तेजी से नीचे गिरता है।

       वृहत बांधों के निर्माण भी कई पर्यावरणीय निम्नीकरण को जन्म देते हैं। जैसे- बांधो के पीछे बनाये गये जलाशयों में वनीय भूमि, अधिवासीय क्षेत्र के आ जाने से उनका ह्रास होता है। आस-पास के क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर बढ़ जाने से पेयजल प्रदूषित हो जाता है। खनन से न केवल ऊर्जा संसाधनों का बल्कि अनेक प्रकार के खनिजों का दोहन किया जा रहा है। उन खनिजों पर कई छोटे-बड़े उद्योगों का विकास किया गया है। इससे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण इत्यादि की समस्या उत्पन्न हुई हैं।

     औद्योगिकीकरण और नगरीकरण साथ-2 चलने वाली प्रक्रिया है। आज विश्व के कई नगर महानगर में बदल चुके हैं। केवल भारत में ही 35 महानगर पाये जाते हैं। ये नगर अत्याधिक जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्र है। इन नगरों में जहाँ एक ओर ध्वनि और वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या है। वहीं अवशिष्ट पदार्थी के जलाशयों में छोड़ दिये जाने से जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है।

     संचार एवं परिवहन क्रांति के युग में सड़कों पर परिवहन साधनों का बाढ़ आ चुका है। ये परिवहन साधन जीवाश्म ऊर्जा का उपयोग करते हैं जिससे ग्रीन हाउस गैसों का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन हो रहा है। इसके कारण अनेक प्रकार के पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

     रासायनिक उर्वरक एवं किटनाशकों का प्रयोग खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने हेतु किया जा रहा है। इसके चलते मृदाक्षरण, जल प्रदूषण, सूक्ष्मजीवों के ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है।

    अवैज्ञानिक कृषि, अतिपशुचारण, अनियोजित विकास, मिसाइल तकनीक, आण्विक तकनीक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी इत्यादि के कारण अनेक गंभीर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

परिणाम

    उपरोक्त पाकृतिक एवं मानवीय कारणों से पर्यावरणीय निम्नीकरण की कई गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुई है। जैसे-

Causes

   इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण निम्नीकरण एक गंभीर परिणाम के रूप में उभर रहे हैं। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण करना अति आवश्यक है। इस दिशा में 1992 ई० में विश्व स्तर पर महत्त्वपूर्ण कदम रियो द जेनरियो में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन में उठाये गये। भारत सरकार भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके लिए उन्होंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना किया है जो कई कामक्रमों के माध्यम से इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके अलावे निम्नलिखित उपाय सुझाए जा सकते हैं:-

(i) वनोन्मूलन से बचाव हेतु वनीय नीति और वन संरक्षण कानून के क्रियान्वयन पर सख्ती से ध्यान दिया जाय। सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी, वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाय।

(ii) वन्य जीवों के शिकार पर कठोर प्रतिबंध लगायी जाय।

(iii) खेतों में रासायनिक उर्वरक की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाय।

(iv) जीवाश्म ऊर्जा के जगह पर सौर ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा एवं अन्य वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग पर जोर दिया जाय।

(v) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम से कम किया जाय।

(vi) विस्फोट पदार्थों का कम से कम प्रयोग किया जाय।

(vii) वैज्ञानिक कृषि पर जोर दिया जाए।

(viii) विकास का कार्य सतत् विकास की अवधारणा पर किया जाय।

(ix) पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जन-जागरण बढ़ायी जाय इत्यादि।

     उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पर्यावण निम्नीकरण एक गंभीर समस्या है। यह कई प्रकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न होती है। इसके कई भयानक परिणाम आ रहे हैं। इसलिए ‘पर्यावरण संरक्षण’ की दिशा में कई कार्य किये जा रह हैं और कई कार्य और भी किये जाने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी पूर्ण सफलता आमलोगों की सहभागिता, राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर भी निर्भर कती है।

2. Climate of Bihar (बिहार की जलवायु)

2. Climate of Bihar

(बिहार की जलवायु)



प्रश्न प्रारूप

Q. Explain Climate of Bihar.

(बिहार की जलवायु का विस्तृत वर्णन करें।)

उत्तर-  बिहार की जलवायु उष्णार्द्र मानसूनी है। यह जलवायु अल्प वर्षाकाल तथा दीर्घ शुष्ककाल के मानी जाती है। यहाँ की जलवायु में महाद्वीपीयता के लक्षण मिलते हैं, लेकिन अधिक आर्द्रता के कारण यहाँ संशोधित महाद्वीपीय जलवायु है। उत्तर की ओर हिमालय की हिमाच्छादित श्रेणियाँ इसको मध्य एशिया की ओर से आने वाली शीतल वायु से बचाकर महाद्वीपीय जलवायु का स्वरूप प्रदान करती है। इस जलवायु की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) न्यून दैनिक ताप परिसर

(ii) ताप परिसर की समानता

(iii) वायु में अधिक आर्द्रता

(iv) वर्षा का न्यूनाधिक रूप में सर्वत्र होना

(v) ऋतु परिवर्तन होना

      बिहार की जलवायु निम्नलिखित भौगोलिक तत्त्वों से प्रभावित होती है-

(i) अक्षांशीय विस्तार

(ii) हिमालय पर्वत की स्थिति

(iii) स्थलाकृति का प्रभाव

(iv) बंगाल की खाड़ी से निकटता

(v) नारवेस्टर तथा अन्य ग्रीष्मकालीन तूफान

(vi) दक्षिण-पश्चिम मानसून की क्रियाशीलता

      मॉनसूनी जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ के मौसमी परिवर्तन की हैं। यहाँ की ऋतुएँ ऐसी है जो लयबद्ध रूप में आती है। ग्रीष्मकाल की भीषण गर्मी से उबने के बाद वर्षाकाल की फुहारे वातावरण में प्रसन्नता पैदा करती है। जब वर्षाकाल की उमस से मन उब जाता है, तो शरदकालीन ठण्डक से राहत मिलती है। जबकी शीत लहर से मन घबरा जाता है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है तो ग्रीष्म ऋतु राहत पहुँचाती है। इस प्रकार बिहार की जलवायु में तीन ऋतुएँ स्पष्ट अनुभव की जाती है। अतः यहाँ तीन ऋतुएँ निम्नलिखित हैं-

1. ग्रीष्म ऋतु- मध्य मार्च से मध्य जून तक

2. वर्षा ऋतु- मध्य जून से मध्य अक्टूबर तक

3. शरद ऋतु-मध्य अक्टूबर से मध्य मार्च तक

1. ग्रीष्म ऋतु:-

       यह ऋतु मध्य मार्च से प्रारम्भ होता है। इस माह के बाद तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है मई के अन्त तक तापमान बहुत बढ़ जाता है। अधिक गर्मी से सापेक्षित आर्द्रता बहुत घट जाती है। मई-जून में कुछ स्थानों का तापमान 46°C तक पहुँच जाता है। बिहार के पश्चिमी भाग के क्षेत्रों में अधिक तापमान रहता है। पछुआ हवा के कारण हवा बहुत ही गर्म हो जाती है। जिसे ‘लू’ कहा जाता है। इसकी तुलना में पूर्वी भाग के क्षेत्रों में तापमान कम रहता है।

     इस ऋतु में अधिक गर्मी के कारण हवा का दबाव कम हो जाता है, हवा के निम्नदाब के कारण बिहार के पूर्वी भाग में चक्रवाती तूफान आता है, जिससे वर्षा होती है, इस तूफान से पूर्णियाँ, कटिहार में 4 से 8 सेमी० वर्षा होती है। इस भयंकर तूफान को ‘काल वैशाखी’ कहते हैं। इस आर्द्रयुक्त हवा से वर्षा होती है, जिसे नारवेस्टर या मैंगोसाँवर कहते हैं। इस वर्षा से आम एवं लीची फसलों को फायदा पहुँचती है। इस मौसम में गया शहर का तापमान सबसे ऊँचा 47°C तक चला जाता है।

(2) वर्षा ऋतु:-

         ग्रीष्मकाल से भीषण गर्मी के कारण एक विशाल निम्न भार का कटिबन्ध कायम हो जाता है। इस निम्न भार को भरने के लिए बंगाल की खाड़ी से मुड़कर दक्षिण-पश्चिम हवाएँ स्थल की ओर चलने लगती हैं। बिहार में मानसूनी हवा का प्रवेश पूर्व से जानेवाली मानसूनी धारा के रूप में होता है। यह हिमालय के समानान्तर चलती है। सामान्यतः 15-20 जून तक बिहार में मानसून का आगमन हो जाता है। इस मानसून के आगमन से तापमान में कमी होती है और सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे तापमान में कमी होती है और उमस बढ़ जाती है। जुलाई-अगस्त में काफी वृष्टि होती है।

      राज्य के पूर्वी भाग में वर्षा अधिक तथा पश्चिम में वर्षा कम होती है। पूर्व में स्थित कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा तथा पश्चिम में स्थित राज्य के कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है। जैसे- पूर्णियाँ 107.5 सेमी०, सहरसा 138.5 सेमी०, दरभंगा 125 सेमी०, पटना 117 सेमी०, गया 99.2 सेमी० इस आँकड़े से पूर्व से पश्चिम आने पर वर्षा में कमी आती जाती है।

      बिहार में अधिकतर वर्षा ग्रीष्मकालीन मौनसून से होती है। इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून भी कहते हैं।

     मानसून की वापसी तापमान की कमी के कारण अक्टूबर माह में प्रारम्भ होती है। इस काल में वर्षा की स्थिति नहीं बन पाती है। इस समय केवल हथिया नक्षत्र में थोड़ी वर्षा हो जाती है। इस समय रबी की फसल की बुआई शुरू हो जाती है।

3. शरद ऋतु:-

    वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर सितम्बर महीने से तापमान में गिरावट शुरू हो जाती है। इसके फलस्वरूप नवम्बर से फरवरी तक की अवधि में शीत शुष्क में बदल जाती है। इस ऋतु में मौसम अच्छा रहता है। यहाँ का औसत तापमान 10°C से नीचे चला जाता है। इस समय पश्चिमी चक्रवात से थोड़ी वर्षा हो जाती है। वर्षा की मात्रा 1 से 2 सेमी० से अधिक नहीं होती है। इस ऋतु में पटना का औसत तापमान 6.1°C, गया का 5.8°C तथा पूर्णियाँ का 4.4°C रहता है। शद के अन्तिम चण में तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।

13. Sugar Industry in Bihar (बिहार में चीनी उद्योग

13. Sugar Industry in Bihar

(बिहार में चीनी उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार में चीनी उद्योग की स्थिति, समस्या एवं समाधान पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

    बेबर के अनुसार चीनी उद्योग एक वजन ह्रास उद्योग है। इसलिए ऐसे उद्योगों की स्थापना कच्चे माल के क्षेत्र में की जाती है। विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी बिहार के मुजफ्फरपुर से UP के मुजफ्फरनगर के बीच अवस्थित है। इसी गन्ना की पेटी में बिहार के अधिकांश चीनी मील अवस्थित थे।

    1960 के दशक तक बिहार भारत का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य था। लेकिन वर्तमान समय में प्रथम पाँच राज्य में बिहार की स्थान नहीं है। उत्तरी बिहार की भूमि और परम्परागत कृषि पद्धति चीनी उद्योग के लिए समुचित आधार प्रदान करती है। यही कारण है कि मेहरौरा (छपड़ा) नामक स्थान पर 1903 ई० में प्रथम चीनी का कारखाना स्थापित किए गया था।

      आज यह उद्योग रुग्ण अवस्था से गुजर रही है। बिहार में कुल 33 चीनी मीलें थी। इनमें से 17 चीनी मीलें पूर्णत बन्द हो चुके है। 33 चीनी मील में से 28 मील स्वतंत्रता से पूर्व ही स्थापित हुए थे। गौरतलब है कि स्वतंत्रता के पूर्व 56 मील भारत में थी उनमें से 28 मील केवल बिहार में स्थापित है।

      स्वतंत्रता के बाद सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, किसानों की घटती हुई अभिरुचि, खाद्यान्न फसल के साथ गन्ना उद्योग की प्रतिस्पर्द्धा इत्यादि के कारण चीनी का उत्पादन लगातार घटता गया। इसी संदर्भ में बिहार विभाजन के बाद JJ ईरानी की अध्यक्षता में पहली औद्योगिक विकास का गठन किया गया तो उसने सिफारिश किया कि झारखण्ड निर्माण के बाद बिहार को औद्योगिक मान‌चित्र पर लाने के लिए चीनी उद्योगों विकास अनिवार्य है।

     दर असल गन्ना एक नकदी फसल है। जिसका उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़ा है लेकिन रणनीति के अभाव में बिहार का यह उद्योग लगातार पिछड़ रहा है। इसके पिछड़ेपन के निम्न‌लिखित कारण हैं:-

बिहार में चीनी उद्योग के पिछड़ापन के कारण

(1) गन्ना का उचित मूल्य नहीं:-

    गन्ना एक वर्षीय एवं नगदी फसल है। इसके उत्पादन के पीछे किसानों की मानसिकता और पर्याप्त लाभ की प्राप्ति रहती है अगर चीनी मील मालिक गन्ना उत्पादकों को उचित मूल्य समय पर दे देते हैं तो अगली बार किसान गन्ना की खेती करते हैं अन्यथा नहीं।

(2) अधिकांश गन्ना का उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में:-

     बिहार के अधिकांश गन्ना चीनी मील तक नहीं पहुंच पाती है बल्कि उनका उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में होता है। सम्पूर्ण भारत का 50% गन्ना उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में ही प्रयुक्त हो जाता है।

(3) समुद्र से अधिक दूरी:-

     समुद्र से अधिक दूर होने के कारण बिहार के गन्ना में रस की मात्रा अपेक्षाकृत कम पायी जाती है। जैसे महाराष्ट्र में कुल गन्ना वजन का 12-15% रस प्राप्त होता है जबकि बिहार में 8-9% रस प्राप्त होता है।

(4) अधिकांश मील पुरानी:-

     बिहार के अधिकांश चीनी मील पुरानी हो चुकी है जिसके कारण उत्पादन की क्षमता अत्याधिक कम हो गयी है।

(5) वर्षभर चीनी मिलें चालू नहीं:-

    दक्षिण भारत की चीनी मील सांलो भर चलती रहती है क्योंकि इससे प्राप्त होने वाला ‘खोई’ आधारित कागज उद्योग मोलास पर आधारित शराब उद्योग का विकास किया गया है। वहीं जिस मौसम में गन्ने की आपूर्ति नहीं होती है उस मौसम में वहाँ की चीनी मीलें तेलहन की पेराई करते हैं।

     इस तरह दक्षिण भारत की मीलें सालोंभर किसी-न-किसी रूम में चलते रहती हैं लेकिन बिहार में इस तरह के उद्योग के अभाव में कुछ माह ही उद्योग चल पाते हैं।

(6) सरकारी उदासीनता और भ्रष्टाचार:-

     सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण चीनी उद्योगों से संबंधित अनुसंधान कार्य ठीक तरीके से नहीं हो पा रहे हैं।

(7) प्रतिकूल चीनी औद्योगिक नीति:-

     चीनी उद्योग का लाइसेन्सीकरण 40% लेबी और 15 किमी० के दायरे में 2 चीनी मील नहीं लगाने की नीति इत्यादि के कारण चीनी उद्योग के विकास में बाँधा पहुंची है।

(8) हरित क्रांति का आगमन:-

     बिहार में हरित क्रांति के आगमन के बाद गन्ना क्षेत्र में खाद्यान्न फसलों का घुसपैठ बढ़ा है जिसके कारण गन्ना उत्पादक क्षेत्र लगातार सिकुड़ते जा रहे है।

(9) सहकारिता का अभाव:-

      इन समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने समय-2 पर महत्वपूर्ण सुधारों की घोषणा करती रही है। जैसे-1998 ई० में सरकार ने लाइसेन्सी करण की नीति रद्द कर दिया। इसके बाद 40% की लेबी को घटाकर 15% कर दिया। वैश्विक स्तर पर WTO की स्थापना हो जाने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्यात करने की मार्ग प्रशस्त हो चुकी है। सरकार ने यह निर्णय लिया है कि गन्ने के उपउत्पादकों को गैसहोल के रूप में किया जायेगा।

     उपरोक्त कदम उठाये जाने के बाद भी बिहार में पुनः चीनी उद्योग नहीं पनप पा रहे हैं क्योंकि किसानों को नकदी और गन्ना का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। किसानों के फसलों का बीमाकरण नहीं हो पा रहा है।

      पुनः न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य में काफी अन्तर दिखायी दे रहा है। रुग्ण मील तकनीकी सुधार नहीं कर पा रहे हैं। अपने कर्मचारियों को पिछला भुगतान नहीं कर पाये हैं। जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होगा। तब तक इनका विकास संभव नहीं है।

    इसके अलावे बिहार की घरेलू बाजार अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार को मजबूत करते हुए चीनी उद्योग पर आधारित बिहार को विशिष्ट पहचान स्थापित की जा सकती है। मॉरीशस, क्यूबा, फिजी जैसे छोटे-2 द्वीपीय देश प्रबंधन के बल पर ही अगर वैश्विक पहचान खते हैं तो बिहार ऐसा क्यों नहीं क सकता है?


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1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


2. Natural Region of Bihar (बिहार का प्राकृतिक प्रदेश)

2. Natural Region of Bihar

(बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई)



प्रश्न प्रारूप

Q. वर्तमान बिहार के प्राकृतिक प्रदेश की चर्चा करें।

      भारत के पूर्वी भाग में स्थित बिहार राज्य क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत का 13वाँ सबसे बड़ा राज्य है। इसका भौगोलिक विस्तार 24ºN से 27°N अक्षांश और 83ºE से 88°E देशान्तर के बीच फैला हुआ है। इसका कुल क्षेत्रफल 94,163 किमी०² है। पूरब से पश्चिम इसकी लम्बाई 483किमी० तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 345 किमी० है।

    बिहार राज्य के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में झारखण्ड, पूरब में प० बंगाल और पश्चिम में उत्तर प्रदेश अवस्थित है। इस राज्य का आकार लगभग आयताकार है। भारत के कुल क्षेत्रफल का 2.85% भाग बिहार के पास है। बिहार राज्य मुख्यतः मध्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में फैला हुआ है। समुद्रतल से बिहार की औसत ऊँचाई 53 मी० है। भौतिक बनावट और संरचना के दृष्टि से बिहार को तीन प्राकृतिक प्रदेश में बाँटते हैं:-

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

2. गंगा का मैदानी क्षेत्र

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी क्षेत्र

Natural Region of Bihar

चित्र: बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

      यह बिहार के उ०-प० भाग में (प० चम्पारण) अवस्थित है। यह शिवालिक पर्वत का ही एक भाग है। इसका विस्तार 546 किमी०² पर हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 160 मी० निर्धारित है। इस पहाड़ी क्षेत्र में दो स्पष्ट पर्वतीय श्रृंखलाएं हैं और दोनों पर्वत एक-दूसरे के समानान्तर उ०-प० दिशा से द०-पू० दिशा में नेपाल की सीमा के सहारे फैला हुआ है। इस पर्वत पदीय प्रदेश के सम्पूर्ण भाग को तीन भाग में बाँटकर अध्ययन करते है-

(i) रामनगर दून की पहाड़ी

(ii) सोमेश्वर की पहाड़ी

(iii) दून क्षेत्र

     रामनगर दून की पहाड़ी 214 km2 क्षेत्र पर फैला हुआ है। इसकी अधिकतम ऊंचाई 240 मी० है। इसकी अधिकतम चौड़ाई संतपुर के पास है। रामनगर दून 6-8 km चौड़ा है। यहाँ पर दक्षिणी श्रेणी के रूप में फैला हुआ है।

    सोमेश्वर श्रेणी त्रिवेणी नहर के शीर्ष भाग से शुरू होकर पूरब में भिखना थोरी दर्रा तक बिहार में फैला हुआ है। इसकी लम्बाई 74 किमी० और चौड़ाई 4.6 से 6.4 किमी० तक है। इसकी औसत ऊँचाई 457 मी० है। इस पर्वत में नदियों के द्वारा कई दर्दो का निर्माण हुआ है। जैसे सोमेश्वर दर्रा, भिखनाथोरी दर्रा, हरहा दर्रा इत्यादि प्रमुख हैं।

दून क्षेत्र-

    रामनगर दून और सोमेखर पहाड़ी के बीच में 22.5 किमी० लम्बा और समुद्रतल से 152 मी० ऊँचा एक घाटी है। जिसे दून घाटी से सम्बोधित करते हैं। उल्लेखनीय है कि विभाजित बिहार की सबसे ऊंची चोटी “सोमेश्वर की पहाड़ी” (874 मी०) है।

2.  गंगा का मैदानी भाग

     इसे बिहार का मैदान भी कहा जाता है। इसका विस्तार 90,650 km² भूभाग पर हुआ है। इस मैदान के उत्तर में शिवालिक पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में छोटानागपुर का पठार अवस्थित है। पश्चिम में इसकी चौड़ाई अधिक है जबकि पूरब में कम। इस मैदान का निर्माण हिमालय तथा प्रायद्वीय पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गयी मालवा के निक्षेपण से हुआ है। गंगा नदी इस मैदान के मध्य से होकर पश्चिम से पूरब दिशा में प्रवाहित होती है। इसका तात्पर्य है कि इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूरब दिशा की ओर हुआ है। गंगा नदी बिहार के मैदान को दो भागों में बाँट देती है।

(i) गंगा के उत्ती मैदानी भाग

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदानी भाग

(i) गंगा का उत्तरी मैदानी भाग

      गंगा नदी के उत्तर में पूरब से पश्चिम दिशा में फैला एक चौरस मैदान है जिसका क्षेत्रफल 57000 km2 है। इस मैदान का सामान्य ढाल उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर है। इसकी औसत ऊँचाई 76.2 मी० से भी कम है। इसका निर्माण गण्डक, बागमती, कोशी और महानन्दा नदी के द्वारा लायी गयी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान गण्डक के मैदान, बागमती का मैदान (मिथिला का मैदान), कोशी के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। इस मैदान में निम्नलिखित संरचना दिखाई देते हैं-

(a) भावर प्रदेश-

    इसका विस्तार नेपाल और बिहार के सीमामर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसक निर्माण नदियों के द्वारा लायी गई “बोल्डर क्ले” के निक्षेपण से हुआ है। इसकी चौड़ाई 8-16 किमी० के बीच है।

(b) तराई प्रदेश

    यहां का दूसरा महत्वपूर्ण संरचना तराई प्रदेश है। इसक विस्तार भावर के दक्षिणी भाग में हुआ है। इस प्रदेश में जगह-जगह पर दलदली भूमि भी मिलते हैं। इसी भूभाग पर विश्व की प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(c) बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश 

    गंगा नदी और उसके सहायक नदियों के द्वारा यहाँ कई अन्य स्थलाकृतियों का विकास हुआ है। जैसे- बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश।

    बाँगड़ प्रदेश वे हैं जहाँ नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा निक्षेपण का कार्य बंद हो चुका है और खादर संरचना वह है जहाँ पर मलवा का निक्षेपण आज भी जारी है।

      गंगा के उत्तरी मैदान में कई जगह प्राकृतिक बाँध, चौर, नदी दोआब का भी प्रमाण मिलता है। प्राकृतिक बाँध ऐसी स्थलाकृति है जो नदियों के तट के सहारे विकसित होती है। बाढ़ के दिनों में लोग इस पर आकर शरण लेते हैं।

    उत्तरी बिहार की नदियाँ मार्ग परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध है। नदियों के पुराने मार्ग को ही चौर कहा जाता है। दो नदियों के मध्यवर्ती भूभाग को नदी दोआब कहा जाता है। नदियों के बीच-2 में बालू के निक्षेपण से दियरा क्षेत्र का भी विकास हुआ है।

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदान

     इसका कुल क्षेत्रफल 33,670 किमी०² है। यह उत्तरी बिहार की तरह समतल नहीं है। इस मैदान के दक्षिणी भाग में छोटानागपुर का पठार और उसके कई छोटे-2 पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं। पहाड़ी के रूप में कैमूर की पहाड़ी, राजगीर की को पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, राजमहल की पहाड़ी, बांका की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी इत्यादि प्रमुख है। इस मैदान के दक्षिणी सीमा पर रोहतास का पठार, डुमरिया उच्च भूमि इत्यादि अवस्थित है। इस मैदान का निर्माण छोटानागपुर के पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर क्रमश: कर्मनाशा, सोन, पुनपुन, फल्गू, किऊल जैसी नदि‌याँ मिलती है।

    इस मैदान का सामान्य ढाल दक्षिण से उतर की ओर हुआ है। सोन का मैदान, मगध का मैदान, बिहारशरीफ- लखीसराय का मैदान और भागलपुर के मैदान के रूप में विभक्त है। गंगा नदी के किनारे जल्ला, टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इनके अलावे गंगा नदी पटना के पास प्राकृतिक बाँध का निर्माण करती है। पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र, मोकामा क्षेत्र और मोकामा के पास टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इस मैदान में ही आरा और बक्सर के बीच में सहार-संदेश क्षेत्र का निर्माण हुआ है।

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश

      बिहार के दक्षिणी सीमान्त भूगाग में विन्ध्यन श्रेणी का पूर्वी भाग और छोटानागपुर पठार का उत्तरी भाग अवस्थित है। छोटानागपुर के पठार के अधिकांश भाग ग्रेनाइट, नीस और शिष्ट जैसे चट्टानों से निर्मित है। विन्ध्यन श्रेणी का बिहार में विस्तृत श्रेणी कैमूर की श्रेणी कहलाती है जिसमें चूना पत्थर संरचना का विकास हुआ है।

   दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश में कई छोटी पहाड़ि‌याँ मिलती हैं। जैसे- बराबर की पहाड़ी, गया की पहाड़ी, जेटठियन की पहाड़ी, राजगीर की पहाड़ी, शेखपुरा की पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, बिहार शरीफ एवं जमालपुर की पहाड़ी इत्यादि प्रसिद्ध है। छोटानागपुर तथा कैमूर के पठार का अपरदित भाग ही बिहार में अवस्थित है। जिसकी औसत ऊँचाई 150-300 मी० है। यह भाग पूर्णतः विषम क्षेत्र है। छोटानागपुर पठार से निकलने वाली नदियाँ इसी सीमान्त प्रदेश को छोड़‌कर मैदानों में प्रविष्ट करती है। रोहतास से लेकर राजमहल की पहाड़ी तक कटक के रूप में यह ‌भाग अवस्थित है। कोडरमा की घाटी, चतरा की घाटी और कैमूर की घाटी छोटानागपुर पठार में प्रवेश हेतु द्वार उपलब्ध करवाती है।

निष्कर्ष:

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार का अधिकांश भाग मध्यवर्ती गंगा के मैदानी क्षेत्र में अवस्थित है। इसका उत्तरी भाग हिमालय को तथा दक्षिणी भाग प्रायद्वीपीय भात को छूती है। इस तह से यहाँ पर्वतों, पठारों एवं मैदानों का विषम संयोग पाया जाता है।


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6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


12. The Agro based industries in Bihar (बिहार में कृषि आधारित उद्योग)

12. The Agro based industries in Bihar

(बिहार में कृषि आधारित उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q. कृषि आधारित उद्योग तथा बिहार में उसका महत्त्व की चर्चा करें।

     बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। कृषि का तात्पर्य विभिन्न प्रकार फसल, पशुपालन और मत्स्यन से है। यहाँ कृषि पर आधारित कई उद्योगों का विकास किया गया है। जैसे-

1. चावल उद्योग:-

     बिहार एक प्रमुख चावल उत्पादक राज्य है। चावल प्राप्त करने के लिए धान को कूटकर तथा भूसा से अलग किया जाता है। सामान्यत‌या यह कार्य ग्रामीण इलाकों में घर-घर होता रहता है। लेकिन विद्युत चालित मीलों ने इसे औद्योगिक रूप दे दिया है। उत्तरी बिहार में इन मीलों की संख्या अधिक है क्योंकि गंगा के मैदानी भाग में धान की अच्छी उपज होती है। इस‌के अतिरिक्त बिहार के सभी जिलों में काफी संख्या में चावल मीले स्थापित की गई हैं।

2. चीनी उद्योग:-

       चीनी उद्योग बिहार का सबसे पुराना उद्योग है। उत्तर एवं मध्य बिहार में गन्ना उपजाने योग्य उपयुक्त मिट्टी एवं जलवायु है। गन्ना एक ह्रासमान उद्योग है। इ‌सीलिए चीनी उद्योग की अधिकतर मीले उत्पादन के क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं।

    बिहार में चीनी उद्योग के प्रमुख केन्द्र मोतीहारी, सुगौली, मझौलिया, चनपटिया, नरकटियागंज, मढ़ौरा, पंचरुखी, सासामुसा, गोपालगंज, हथुआ, मोतीपुर, डालमियानगर, सारण, समस्तीपुर, चम्पारण, दरभंगा इत्यादि हैं। बिहार में कुल चीनी मीलें 28 है लेकिन इनमें अधिकांशतः जर्जर एवं बीमार हो चुकी हैं तथा कुछ बंद भी हो गयी हैं। वर्तमान में बिहार में कुल चीनी मिलों की संख्या 11 है।

3. सूतीवस्त्र उद्योग:-

      बिहार में सूतीवस्त्र उद्योग गया, फुलवारी शरीफ में केन्द्रित हैं। इसकी अन्य छोटी-2 मीलों मुजफ्फरपुर, मुंगेर, भागलपुर, किशनगंज, बिहारशरीफ तथा मधुबनी में है। रेशमी वस्त्र उद्योग का विकास भागलपुर में हुआ है। ओबरा (औरंगाबाद) में बने दरी और कालीनों का विदेशों में निर्यात किया जाता है।

4. जुट उद्योग:-

     पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, किशनगंज और दरभंगा में 8.3 लाख टन से अधिक जूट का उत्पादन होता है। यहाँ इस उद्योग के लिए कच्चा माल तथा स्थानीय रूप से श्रमिक उपलब्ध है। कटिहार जूट उद्योग का प्रमुख केन्द्र है। इसके अतिरिक्त समस्तीपुर, चम्पारण, दरभंगा और सहरसा में जूट उद्योगों का विकास हुआ है।

5. तंबाकू उद्योग:-

     तम्बाकू उत्पादन में पूर्णिया, सहरसा, दरभंगा और मुंगेर का स्थान आता है। मुंगेर में एक सिगरेट का कारखाना, व्यापित है। सिगरेट के अतिरिक्त बीड़ी उद्योग का भी विकास राज्य के विभिन्न जिलों में हुआ है। बीड़ी निर्माण में मुंगेर, पटना तथा गया के प्रमुख स्थान हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरी बिहार में भी बीड़ी उद्योग का विकास हुआ है।

6. रबड़ उद्योग:-

      बिहार में आरा से 3 किमी० दूर जमीरा में और पटना, गया तथा मुजफ्फरपुर में कुछ रबड़ की कारखाने स्थापित हैं। यहाँ से छोटे पैमाने पर साइकिल और रिक्शा के टायरों का उत्पादन किया जाता है। इनके अतिरिक्त अन्य फसल आधारित उद्योगों में आटा मील, तेलधानी, हथकरघा, गुड़, खांडसारी, बेकरी इत्यादि आते हैं।

Agro based industries in Bihar

बिहार में पशुपालन

     बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बिहार की पशुओं में मानव, गाय, बैल, भैंस, घोड़ा, गधा, सूअर, भेड़, बकरी और कुक्कुट प्रमुख है। इन पशुओं पर आधारित यहाँ कई उद्योगों का विकास हुआ है। जैसे-

(i) शिक्षण संस्थान उद्योग

(ii) डेयरी उद्योग,

(iii) माँस उद्योग,

(iv) चमड़ा उद्योग,

(v) परिवहन उद्योग इत्यादि।

बिहार मत्स्यन पालन

      बिहार में आन्तरिक जलस्रोतों में मत्स्यन पालन का कार्य होता है। यहाँ गंगा तथा उसकी सहायक नदियों से मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। इसके अलावा छोटे-2 नदियों, तालाबों, तालों, पोखरो आदि में भी मत्स्यपालन होता है। बिहार सरकार 1975 ई० से मछलियों के अण्डों का उत्पादन तथा मत्स्यपालन के वैज्ञानिक पद्धति को अपनाकर मत्स्यपालन को प्रोत्साहित कर रही है। वर्तमान समय में भी बिहार सरकार मत्स्य पालन के लिए ऋण उपलब्ध करा रही है। मछुआरों को प्रशिक्षित कर रही है।

     बिहार की प्रमुख मछलियों में मांगुर, रोहू, कतला एवं भाखुर है। इसके साथ ही झींगा मछली, बचवा, पर्च, लोच, पयास, बुलेटस, गरई आदि मछलियों की माँग देश-विदेश में है। इसलिए आज निर्धन वर्ग ही नहीं बल्कि सम्पन्न वर्ग ने भी मतस्यपालन को उद्योग के रूप में अपनाया है।

बिहार में कृषि आधारित उद्योग का महत्व

        बिहार जैसे पिछड़े राज्य में कृषि आधारित उद्योगों का काफी महत्व है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में इसका काफी योगदान होता है। उपर्युक्त उद्योगों में कई बेरोजगारों को रोजगार मिलती हैं। इनसे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होती है। इन उद्योगों के उत्पादों से यहाँ के कई स्थानीय माँगों की पूर्ति होती है। जैसे- चावल, आटा, दाल, तेल, दुध, माँस, मछली, वस्त्र, बीड़ी, गुड़, चीनी इत्यादि।

निष्कर्ष:

     बिहार में कृषि आधारित उद्योगों के विकास भी अपार संभावनाएँ हैं। लेकिन यहाँ इनका विकास धीमी गति से हो रही है। इन उद्योगों के विकास में यहाँ कई बाधाएँ हैं। जैसे- पूँजी का अभाव, विद्युत का अभाव, अपराधिक घटनाएँ, रंगदारी, राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार इत्यादि। आवश्यता इस बात की है कि इन बाधाओं को दूर कर बिहार सरका को कृषि आधारित उद्योग के विकास प ध्यान देना चाहिए।


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1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


10. Industrial Region of Bihar (बिहार का औद्योगिक प्रदेश)

10. Industrial Region of Bihar

(बिहार का औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार को औद्योगिक प्रदेशों में विभाजित कीजिए तथा उन पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए।

      बिहार के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार के औद्योगिक कच्चे माल पाये जाते हैं। इन संसाधनों पर आधारित एक ही प्रकार के उद्योगों का एक विशेष क्षेत्र में समूहीकरण हुआ है और औद्योगिक सघनता विकसित हो गई है।

    उद्योगों के इस समूहीकरण के आधार पर इस राज्य को निम्नलिखित सात औद्योगिक प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है।-

1. चावल मिल का प्रदेश

2. चीनी उद्योग का प्रदेश

3. जुट उद्योग का प्रदेश

4. पश्चिमी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश

5. पूर्वी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश

6. सोन घाटी औद्योगिक प्रदेश

7. गया-गुरारु औद्योगिक प्रदेश

Industrial Region of Bihar

चित्र: बिहार उद्योग एवं औद्योगिक प्रदेश

1. चावल मिल का प्रदेश मानचित्र:-

     चावल मील उद्योग के रूप में पूरे राज्य में पाया जाता है फिर भी बिहार के उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र में इस उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है। धान का उत्पादन क्षेत्र मुख्यतः उत्तरी बिहार के मैदान तथा नेपाल की तराई क्षेत्र है। इसके आधार पर पश्चिम में रामनगर से लेकर पूर्व में किशनगंज तक चावल मिलों का विकास हुआ है।

मुख्य केन्द्र- रामनगर, नरकटियागंज, रक्सौल, अदापुर, बैरगनिया, सीतामढ़ी, जनकपुर रोड, जयनगर, झंझारपुर, जोगबनी और फारबीसगंज है।

    जनसंख्या की सघनता इन क्षेत्रों में होने के कारण उत्पादन का अत्यधिक खपत इन क्षेत्रों में ही हो जाता है।

2. चीनी उद्योग का प्रदेश:-

विस्तार- बिहार के उत्तरी-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र।

      यह बिहार का सर्वप्रमुख गन्ना उत्पादक प्रदेश है जो बागमती नदीं के पश्चिम और गंगा नदी के उतर में अवस्थित है। चीनी उद्योग का कच्चा माल गन्ना जो ह्रासमान पदार्थ है जिसके कारण चीनी उद्योग उत्पादन क्षेत्र में ही स्थित है।

मुख्य केन्द्र- प० और पूर्व चम्पारण, सिवान, गोपालगंज, सारण इत्यादि जिले आते है। वर्तमान में बिहार के 28 उद्योगों में से कार्यरत 11 मील यहाँ ही है। इसके अलावे अन्य मील भी है।

     इनके अलावा बिहार के भागलपुर तथा साहेबगंज क्षेत्र में 11 गुड़ के मिलें है तथा विभिन्न भागों में खाँडसारी का भी उत्पादन होता है।

    राज्य बँटवारे के बाद गन्ना आधारित अद्योग ही सबसे बड़ा उद्योग बन गया है। गन्ना उत्पादन पर ही चीनी उद्योग के साथ-साथ गुड़, खंडसारी, कागज, इथेनॅाल, पशु आहार एवं विद्युत-ऊर्जा, कार्बनिक खाद जैसे कई अन्य उद्योग निर्भर करते है।  चीनी उद्योग एक सामयिक उद्योग है जिनमें साल में करीब 145 दिनों तक काम होता है एवं राज्य में ईख उत्पादकों की संख्या लगभग 5 लाख है।

3. जुट उद्योग का प्रदेश:-

विस्तार- बिहार के उतरी-पूर्वी भाग में स्थित।

मुख्य केन्द्र- पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया जिले आते है। समीपवर्ती सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिलों में जूट की खेती होती है।

     जूट उद्योग का विकास मुख्य रूप से पूर्णिया एवं कटिहार में हुआ है। जहाँ जूट से टाट, बोरे इत्यादि बनाये जाते है।

4. पश्चिमी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- यह गंगा के किनारे स्थित पश्चिमी औद्योगिक प्रदेश है जिसका विस्तार बक्सर से मोकामा-बरौनी तक है। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से गंगा का दक्षिणी तटीय भाग आता है। गंगा नदी के उत्तर स्थित बरौनी और हाजीपुर भी क्रमशः राजेन्द्र पुल और महात्मा गाँधी सेतु के द्वारा इस क्षेत्र से जुड़ पाये है। 

मुख्य केन्द्र- बरौनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र है, जहाँ तेल- शोधक कारखाने, पेट्रो रसायन, ताप विद्युत रासायनिक खाद और दुग्ध उद्योग विकसित है।

      मोकामा में चमड़ा इत्यादि, हाजीपुर, पटना, फतुहा में स्कूटर तथा फुलवारीशरीफ में सूतीवस्त्र उद्योग का विकास हुआ है। इस सबके अलावे इन सब क्षेत्रों में चीनी उद्योग, प्लास्टिक उद्योग इत्यादि का भी विकास हुआ है।

5. पूर्वी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- गंगा नदी के किनारे स्थित पूर्वी औद्योगिक प्रदेश है जिसका विस्तार मुंगेर, जमालपुर से लेकर कहलगाँव तक है।

मुख्य केन्द्र- मुंगेर, जमालपुर तथा कहलगाँव है। मुंगेर में बंदूक और सिगरेट, जमालपुर में वर्कशॉप, नाथनगर तथा भागलपुर में रेशम तथा तसर, कहलगाँव में सुपर ताप विद्युत (1994 ई०) स्थित है। इससे औद्योगिक विकास को लाभ मिला है। इस उद्योगों के अतिरिक्त इन प्रदेशों में आटा, चावल और दाल की मिले तथा लकड़ी उद्योगों का विकास हुआ है।

6. सोन नदी-घाटी औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार:- बिहार के दक्षिण-पश्चिमी भाग में सोन नदी के तटीय क्षेत्र में स्थित है। इसका विस्तार, जपला से डालमियानगर तक है।

     यहाँ सीमेंट उद्योग, कागज उद्योग, लकड़ी उद्योग, पेपर बोर्ड उद्योग क्रमशः जपला, रोहतास, डालमियानगर में स्थित है। इसके अलावे इस औद्योगिक क्षेत्र में चीनी, रसायन, वनस्पति, चावल उद्योग इत्यादि का भी विकास हुआ है। यहाँ रेल सड़क और जल परिवहन की विशेष सुविधा है। सस्ते श्रमिक भी उपलब्ध है।

7. गया-गुरारू औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- यह छोटा औद्योगिक प्रदेश है जिसके अन्तर्गत गया और गुरारू आते है।

मुख्य केन्द्र- गया इसका प्रमुख औद्योगिक केन्द्र है जहाँ जूट और सूती वस्त्रोद्योग हस्तकरघा, कलात्मक मूर्तियाँ बनाने के उद्योगों का विकास हुआ है। गया और बोधगया के धार्मिक स्थल के कारण यहाँ होटल उद्योग भी स्थापित है। इन सब के अलावे इस क्षेत्र में अन्य उद्योगों का विकास भी हुआ है पर वे सीमित एवं औद्योगिक लाभ के दृष्टि से वे गौण है।

निष्कर्ष:

   बिहार का औद्योगिक प्रदेश बिहार के किसी एक ही भाग में न स्थित होकर के वरन पूरे क्षेत्र में विस्तृत है। वैसे तो प्रत्येक का अपना-2 महत्व है पर औद्योगिक लाभ के दृष्टिकोण से कम है जिसका कारण पूँजी का अभाव है अर्थात पूँजी एवं सरका की नीति का सहयोग हे तो बिहार के उद्योगों का अविष्य और भी उज्जवल हो सकता है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश की सरकार में यह हमें संभव दिखायी देता है।



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11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

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