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अध्याय-7  जीवन का आधार पर्यावरण

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-7 जीवन का आधार पर्यावरण


अध्याय-7 जीवन का आधार पर्यावरण

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प पर सही (✓) का निशान लगाएँ।

1. जल प्रदूषण हो रहा है:
(क) पौधो के कटाव से
(ख) वाहन चलाने से
(ग) पानी पीने से
(घ) पानी में दूषित पदार्थ मिलने से
उत्तर- (घ) पानी में दूषित पदार्थ मिलने से

2. पानी की शुद्धता हो सकती है:
(क) मच्छर पालने से
(ख) तोता पालने से
(ग) बत्तख पालने से
(घ) मछली पालने से
उत्तर- (घ) मछली पालने से

3. बढ़ती जनसंख्या के कारण हो रहा है
(क) वृक्षों का तेजी से कटाव
(ख) भवनों का निर्माण
(ग) आधारभूत संरचना का निर्माण
(घ) इनमें सभी
उत्तर- (घ) इनमें सभी

4. पर्यावरण संरक्षण के लिए किया जाना चाहिए:
(क) खूब पौधे लगाना
(ख) गंदे जल की उचित निकासी का प्रबंध
(ग) गाड़ियों का कम उपयोग
(घ) इनमें सभी
उत्तर- (घ) इनमें सभी

अध्याय-7 जीवन का आधार पर्यावरण

ii. खाली जगहों को भरिए।

(1) कार्बन मोनोआक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड गैसें वायु प्रदूषण पैदा करता है।

(2) ध्वनि की तीव्रता को डेसिबल में मापा जाता है।

(3) सोंस/ डॉल्फिन को संरक्षित राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है।

जीवन का आधार पर्यावरण

सोंस/ डॉल्फिन 

अध्याय-7 जीवन का आधार पर्यावरण

iii. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1. वृक्षों की संख्या-वृद्धि के लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
उत्तर- वृक्षों की संख्या-वृद्धि के लिए हमें संकल्पबद्ध होना पड़ेगा। हमें संकल्प लेना होगा कि प्रत्येक वर्ष हम कुछ-न-कुछ वृक्ष अवश्य लगायेंगेऔर उसकी देखभाल करेंगे, बहुत नहीं तो कम-से-कम वर्ष में 5 वृक्ष। फलदार वृक्ष हो तो बहुत अच्छा, पत्तेदार वृक्ष तो पर्यावरण के लिए प्राण माने जाते हैं। हम न तो वृक्ष काटेंगे और न किसी को काटने देंगे। पशुओं से रक्षा के लिए हम वृक्षों की घेराबन्दी कर देंगे।

2. नदियों के जल को स्वच्छ बनाने के लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
उत्तर- नदियों के जल को स्वच्छ रखने के लिए हम गाँव-नगर के नाले-नलियों को नदियों तक पहुँचने के पहले ही रोक कर गन्दे जल की सफाई करके नदियों में छोड़ेंगे। नदी तट पर अवस्थित कारखानों पर दबाव डालेंगे कि कारखानों के कचरा की सफाई कर ही उसके जल को नदी में छोड़ें। मृत पशुओं के शव को नदी में नहीं बहाने देंगे। इस काम के लिए एक संगठन खड़ा करना होगा और नदी तट के सभी गांवों में उसकी शाखाएँ संगठित करनी होंगी।

3. उन क्रियाकलापों की सूची बनाइए जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है?
उत्तर- वे क्रियाकलाप निम्नांकित हैं जिनसे पर्यावरण को नकसान पहँचता है:-

⇒ खनिज ईंधनों से चलने वाली सवारियों के साधनों से निकलने वाले धुएँ से।

⇒  खनिज कोयला जलाने वाले कल-कारखानों से निकले धुएँ से।

⇒ आवाज करनेवाले कारखानों तथा मोटर-वाहनों के कर्कश हॉर्न की आवाज से।

⇒ पेड़-पौधों की अंधा-धुंध कटाई से।

⇒ नदी, तालाब, कुआँ आदि के जल को गंदा करने से।

⇒ पॉलीथीन के उपयोग से।

⇒ मरे हुए जानवरों को खुले वातावरण में फेंकने से।

4. पॉलीथीन के विकल्प क्या-क्या हो सकते हैं?
उत्तर- रद्दी कागज के ठोंगा के साथ जूट के थैला, कपड़े का थैला या इसी प्रकार किसी प्रकार के थैला पॉलीथीन के विकल्प हो सकते हैं।

5. पता कीजिए कि कितने घरों का बेकार पानी बाहर गली या सड़क पर गिरता है। कितने घरों का पानी सोख्ता गड्ढे में गिरता है?
उत्तर- मेरे गाँव के किसी भी घर का पानी गली या सड़क पर नहीं गिरता। सभी ने कोई-न-कोई व्यवस्था कर रखी है। गली में जो घर हैं उनका पानी नाली में गिरता है। नाली का पानी मुख्य सड़क के बड़े नाले में गिरता है, जो गाँव के बाहर दक्षिण में अवस्थित एक गड्ढे में एकत्र होता है जो कुछ घर नाली से सम्बद्ध नहीं हैं, उन्होंने सोख्ता गड्ढा बना रखा है और घर का पानी उसी में गिराते हैं।

6. शहरी एवं ग्रामीण पर्यावरण में क्या-क्या अंतर दिखाई पड़ते हैं?
उत्तर- शहरी पर्यावरण दमघोंटू रहता है, जबकि गाँव का पर्यावरण खुला-खुला होता है। शहरों में पेड़-पौधों की कमी होती है जबकि गाँवों में अपेक्षाकृत अधिकता है। शहरों में छोटे-बड़े वाहनों की अधिकता है तो वहीं गाँवों में खनिज तेल (पेट्रोल, डीजल) चालित वाहन एक-दो ही दिखाई पड़ते हैं। गाँवों में सायकिल, बैलगाड़ा, टमटम ही अधिक दिखते हैं।

7. प्रदूषण के क्या कारण हैं? इनका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर- प्रदूषण के कारण- अधिक भीड़-भाड़ में पेट्रोल-डीजल चालित वाहन चलाने से उनके द्वारा निकले धुएँ से वायु प्रदूषण होता है। मशीनों, वाहनों, हॉर्न, लाउडस्पीकरों द्वारा निकले कर्कश आवाज से ध्वनि प्रदूषण होता है। नदियों में गन्दगी मिलाने, तालाबों में कपड़ा साफ करने और पशुओं को नहलाने, कुआँ के निकट कचड़ा एकत्र करने से जल प्रदूषण होता है।

प्रदूषण का हमारे जीवन पर प्रभाव- वायु प्रदुषण से श्वास रोग होता है, जबकि ध्वनि प्रदूषण से कान की बीमारी होती है और कभी-कभी बहरेपन का शिकार भी होना पड़ता है। जल प्रदूषण से पेट की बीमारियाँ होती हैं। खासकर डायरिया का प्रकोप बढ़ता है।

8. हम ग्लोबल वार्मिग को कैसे कम कर सकते हैं?
उत्तर- ग्लोबल वार्मिंग अर्थात भूमंडलीय तापन को कम करने के लिए हमें अपनी सुविधाओं में कटौती करनी होगी। जेनरेटर, फ्रीज, ए.सी., खनिज तेल (पेट्रोल, डीजल) चालित वाहनों का उपयोग कम कना होगा। हमें वे सब उपाय अपनाने पड़ेंगे, जिनसे ओजन परत की क्षति न हो और सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणें पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाएँ।


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अध्याय-6 हमारा पर्यावरण

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-6 हमारा पर्यावरण


अध्याय-6 हमारा पर्यावरण

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प चुने-

(1) इनमें कौन सी प्राकृतिक पर्यावरण की वस्तु है।

(क) पुल

(ख) मकान

(ग) जल

(घ) सड़क

उत्तर- (ग) जल

(2) पर्यावरण कितने प्रकार का होता है?

(क) दो

(ख) तीन

(ग) चार

(घ) अनगिनत

उत्तर- (क) दो (प्राकृतिक और मानव निर्मित पर्यावरण)

(3) पृथ्वी के चारों ओर क्या है?

(क) वायु

(ख) जल

(ग) पर्यावरण

(घ) सड़क

उत्तर- (ग) पर्यावरण

ii. खाली जगहों को भरिए-

(1) पेड़-पौधे एवं जीव मिलकर  जैव पर्यावरण बनाते हैं।

(2) पेड़-पौधे जीव-जन्तु जैव मंडल  के अंग हैं।

(3) मनुष्य ने अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए चीजों को बनाया है।

iii. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1. पर्यावरण किसे कहते हैं?
उत्तर- हमारे चारों ओर पाए जाने वाले प्राकृतिक एवं मानवीय दशाओं के आवरण को पर्यावरण कहते है। अर्थात हमारे आस-पास जो भी दृश्य और अदृश्य वस्तुएँ हैं, इन सभी को मिलाकर बनने वाले अन्तर्जाल को पर्यावरण कहते हैं। नदी, पहाड़, जंगल, जीव-जंतु, घर, सड़क, पुल, कल-कारखाने आदि दृश्य वस्तुएँ हैं। वायु, मानवीय रीति-रिवाज, परम्पराएँ, आदतें आदि अदृश्य वस्तुएँ हैं। इन सभी को मिलाकर पर्यावरण का निर्माण होता है।

2. पर्यावरण कितने प्रकार के होते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर- पर्यावरण मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं-

(क)  प्राकृतिक पर्यावरण तथा

(ख) मानव निर्मित पर्यावरण।

(क) प्राकृतिक पर्यावरण- प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत नदी, पहाड़, जंगल, जैव मंडल आदि आते हैं। जैव मंडल में सभी जीव-जन्तुओं को रखा गया है।

(ख) मानव निर्मित पर्यावरण- छोटे-बड़े घर और भवन, कल-कारखाने, कृषि से संबंधित उपकरण, कुआँ, तालाब, सड़क, पुल, पुलिया, गली-कुची आदि मानव निर्मित पर्यावरण है।

3. स्थलमंडल, जलमंडल एवं वायुमंडल किसे कहते हैं?
उत्तर- स्थलमंडल- भूमि का वह भाग, जिस पर जीव-जंतु रहते हैं। जैसे- मकान, पेड़-पौधे, पहाड़, पठार, मैदान और खेत-खलिहान आदि को स्थलमंडल कहते हैं। 

जलमंडल- सागर, महासागर, झील, नदी, कुआँ, तालाब, बादल, वर्षा आदि सभी मिलकर जलमंडल का निर्माण करते हैं।

वायुमंडल- जिस गैसीय आवरण से पृथ्वी घिरी हुई है उसे वायुमंडल कहते हैं। इनमें मुख्य गैसे हैं- नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड। ऑक्सीजन को मनुष्य सॉस में लेता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड से पौधे अपना भोजन बनाते हैं।

4. सांस्कृतिक पर्यावरण के तहत कौन-कौन सी बातें आती हैं?
उत्तर- समाज में तरह-तरह के रीति-रिवाज, परम्पराएं, उत्सव आदि देखने को मिलते हैं। शादी-ब्याह के अवसर पर खुशियों में शरीक होना, छोटों को प्यार एवं बड़े-बुजुर्गों का सम्मान ये सभी हमारी सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं। मुलाकात होने पर अभिवादन के तरीके, खुशियों को व्यक्त करने के तरीके, शोक प्रकट करने के भाव, पर्व-त्योहारों पर गाए जाने वाले मंगलगीत, पहनावा, विशेष प्रकार के पकवान ये सब संस्कृति की पहचान है। यही सब मिलकर सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करते है।

       वृक्ष-पूजा, कुआँ पूजा, गंगा पूजन, सूर्य को जल अर्पण आदि सांस्कृतिक पर्यावरण में ही आते हैं। जिन प्राकृतिक साधनों से हमें लाभ पहुँचता है उन सभी को आदर देने के लिये हमारे पूर्वजों ने किसी-न-किसी रूप में उन्हें पूजना आरम्भ कर दिया।

5. मानव निर्मित पर्यावरण के कारण प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचा है। कैसे?
उत्तर- मानव अपने लाभ और आराम के लिए अनेक प्रकार के कार्य करता है। वह मकान बनाता है, सड़क बनाता है, कारखाने बनाता है, आवागमन के साधन बनाता है। इन सबको संचालित करने के लिए खनिज इंधनों की आवश्यकता होती है। खनिज निकालने में प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है।

          भवन और कारखाने तथा सड़क बनाने के लिए पत्थर की गिट्टी की आवश्यकता पड़ती है। सीमेंट बनाने के लिए चूना-पत्थर और विभिन्न खनिजों की आवश्यकता पड़ती है। पत्थर गिट्टी के लिए पहाड़ तोड़े जाते हैं। इस प्रकार इन सभी कार्यों से पर्यावरण को नुकसान पाएँचता है।

6. किन घटनाओं से सांस्कृतिक पर्यावरण को क्षति होती है?
उत्तर- आज यह प्रथा-सी चल गई है कि पढ़-लिखकर अपना गृह गाँव छोड़कर लोग अन्यत्र नौकरी पर चले जाते हैं। वहाँ विभिन्न स्थानों और परंपरा रिवाजों वाले लोग रहते हैं। उनके रहन-सहन और खाने-पीने में भी समानता नहीं रहती। अत: पड़ोसी होकर भी व्यक्ति एक-दूसरे के पर्व-त्योहार में हिस्सा नहीं ले पाता और इधर अपने गाँव-नगर के त्योहार तो छूट ही जाते हैं। इन्हीं कारणों से सांस्कृतिक पर्यावरण को क्षति होती हे।

7. आपके पास कौन-सा पारितंत्र है? चित्र बनाकर किसी एक का वर्णन करें।
उत्तर- हमारे पास स्थलीय पारितंत्र है। इस पारितंत्र में नदी, पहाड़, पेड़-पौधे, सड़क, घर, विद्यालय, आवागमन के साधन, कुआँ, चापाकल आदि हैं। इसमें खेत-खलिहान भी शामिल हैं जहाँ से हमें अनाज और सब्जियाँ मिलती है। स्थलीय पारितंत्र का चित्र निम्नांकित है:-

हमारा पर्यावरण

स्थलीय पारितंत्र

8. हम किन उपायों को अपनाकर पानी के खर्च को कम कर सकते हैं?
उत्तर- पानी का सही उपयोग करके ही हम पानी के खर्च को कम कर सकते हैं। हमें इसका अपव्यय नहीं होने देना चाहिए।

9. पर्यावरण को नुकसान पहुँचाकर हम अपना ही जीवन संकट में डाल रहे हैं। कैसे?
उत्तर- हम कभी-कभी अनजाने में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं और कभी-कभी हम जान-बूझ कर भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा देते हैं। हम कभी गन्दी बाल्टी को कुएँ में डाल देते हैं। गाँव या शहर की नालियों को नदी में मिला देते हैं। इससे नदी जल गंदा हो जाता है। गन्दे कएँ और गन्दी नदी का पानी पी कर हम स्वयं बीमार हो जाते हैं। विभिन्न कारगुजारियों से हम वायु को दूषित कर देते हैं और हम ही उस वायु में सांस लेते हैं और बीमार पड़ जाते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचा कर हम अपना ही जीवन संकट में डाल लेते हैं।

iv. प्रातःकालीन बाल सभा में चर्चा कीजिए-

1. पर्यावरण संरक्षण- हमें हर हाल में पर्यावरण को संरक्षित रखना चाहिए। शुद्ध और साफ पर्यावरण में ही हम या हमारा समाज स्वस्थ रह सकता है। अतः सबको स्वस्थ रखने के लिए हमें पर्यावरण संरक्षण करना ही होगा।

2. वृक्षारोपण- आजकल बड़ी तेजी से पेड़ों की कटाई हो रही है। घर बनवाने और फर्निचर तथा जलावन के लिए लकड़ियों की आवश्यकता बढ़ चली हे। इस कारण वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने लगी है। इस पर रोक लगाने के लिए हमें वृक्षारोपण पर जोर देना चाहिए।

3. कटता जंगल-घटता जीवन- जैसे-जैसे जंगल कटते जा रहे हैं वैसे-वैसे कार्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन का संतुलन बिगड़ने लगा है। इससे हमें एक तो ऑक्सीजन की कमी हो रही है और दूसरी ओर वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने लगी है। इन दोनों बातों का कुप्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने लगा है। इससे औसत आयु वर्ष घटने लगा है। अतः अपने जीवन को बचाने के लिए हमें जंगलों को बचाना होगा।

4. जैविक कचरा समाप्त करने में जानवरों की भूमिका- जैविक कचरा से तात्पर्य है मृत पशु। इनको समाप्त कने के लिए गिद्ध, चील, कुत्ते सियार आदि बड़े काम के सिद्ध होते हैं। बल्कि इन्हें तो प्राकृतिक सफाई कर्मचारी तक भी कहा जाता है।


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अध्याय-4 वायुमंडल एवं इसका संघटन

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-4 वायुमंडल एवं इसका संघटन


वायुमंडल एवं इसका संघटन

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुनें।

(1) पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर जाने पर साँस लेना कठिन होता है क्योंकि-

(क) वातावरण में कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है।

(ख) वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है।

(ग) वातावरण में नाइट्रोजन की मात्रा कम जाती हैं।

(घ) वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा कम जाती है।

उत्तर- (घ) वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा कम जाती है।

(2) पहले कौन-सा भाग गर्म होता है?

(क) जल की सतह

(ग) पर्वतीय भाग

(ख) स्थल की सतह

(घ) वायुमंडल

उत्तर- (ग) पर्वतीय भाग

(3) वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा है-

(क) 25.42

(ख) 78.03

(ग) 20.99

(घ) 2

उत्तर- (ग) 20.99

(4) वायुमंडल की सबसे पहली परत है-

(क) समताप मंडल

(ख) क्षोभमंडल

(ग) वाह्यमंडल

(घ) मध्यमंडल

उत्तर- (ख) क्षोभमंडल

(5) रेडियो तरंगे किस परत से परावर्तित होकर पृथ्वी पर वापस लौटती हैं-

(क) क्षोभ मंडल

(ख) आयनमंडल

(ग) ओजोनमंडल

(घ) बर्हिमंडल

उत्तर- (ख) आयनमंडल

ii. रिक्त स्थानों को भरिए

1. समताप मंडल का आरंभ क्षोभ मंडल के बाद होता है।

2. बाह्यमंडल का फैलाव 80 से 400 किलोमीटर तक है।

3. हल्की गैसें बर्हिमंडल से अंतरिक्ष में तैरती रहती हैं।

4. वायुमंडल का विस्तार पृथ्वी की सतह से 1000 किलोमीटर की ऊँचाई तक है।

5. वायुमंडल में सबसे अधिक नाइट्रोजन गैस पाई जाती है।

6. तापमान बढ़ने से समुद्र के जल स्तर में वृद्धि हो रही है।

7. कार्बन डाइऑक्साइड गैस को ग्रीन हाउस गैस भी कहते हैं।

iii. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. वायुमंडल किसे कहते हैं? वायुमंडल के गैसों के घटक को वृत्त में दिखाइए।
उत्तर- धरातल से लेकर ऊपर कई सौ मीटर तक वायु पाई जाती है। अर्थात हमारी पृथ्वी के चरों ओर घिरी हुई वायु के आवरण को ही ‘वायुमंडल’ कहते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी हमेशा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती रहती है तो इसके साथ ही वायुमंडल भी चक्कर लगाते रहता है। एक खास ऊँचाई तक ही जहाँ हमारी नाक रहेगी वहाँ वायु भी रहेगी। वायुमंडल के गैसों के घटकों का वृत्त निम्नलिखित है-

वायुमंडल एवं इसका संघटन

पृथ्वी के वातावरण के इकाई आयतन में गैसों की मात्रा

2. ग्रीन हाउस को समझाइए।
उत्तर- ऐसा प्रक्रम जिससे ताप को ह्रासित होने से बचाया जा सके, उसे ग्रीन हाउस कहते हैं। बहुत ठण्डे देशों में प्लास्टिक या कांच के मकान बनाकर उसी में बगवानी की जाती है। ऐसे घर में ताप प्रवेश तो कर जाता है, लेकिन उससे निकल नहीं पाता। इसी तरह के मकान को ‘ग्रीन हाउस’ कहते हैं। ग्रीन हाउस के पौधों पर बाहरी आवो-हवा का असर नहीं पड़ता, जिससे वे सदा हरे-भरे रहते हैं। इसी से उसका नाम ‘ग्रीन हाउस’ रखा गया है।

वायुमंडल एवं इसका संघटन

ग्रीन हाउस

3. कार्बन डाइऑक्साइड भी जीवन के लिये जरूरी है। कैसे?
उत्तर- वैसे तो कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा एक सीमा से अधिक वृद्धि होने पर हारिकाकरक मानी जाती है, लेकिन यह जीवन के लिये जरूरी भी है क्योंकि पेड़-पौध ‘कार्बन डाइऑक्साइड’ से ही अपना भोजन बनाते हैं। सूर्य के प्रकाश में पेड़-पौध अपने हरे पत्तों द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कर प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से अपना भोजन तैयार करते हैं। ये इस प्रक्रम में कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग तो कर ही लेते हैं, बदले में पर्याप्त ऑक्सीजन निकालते हैं जो जीव-जंतुओं के लिये प्राण वायु का काम करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि कार्बन डाइऑक्साइड भी जीवन के लिये बहुत ही जरूरी है।

4. वायुमंडल में पाई जाने वाली विभिन्न परतों के नाम लिखिए। मोटे कूट या थर्मोकोल की मदद से इन परतों को क्रमबद्ध दिखाइए।
उत्तर- वायुमंडल में नीचे से ऊपर पाई जानेवाली विभिन्न परतों के नाम निम्नलिखित हैं:

(क) क्षोभमंडल

(ख) समतापमंडल

(ग) मध्यमंडल

(घ) बाह्य मंडल/आयनमंडल 

(ड़) बर्हिमंडल।

         इस प्रकार पृथ्वी से सटे सबसे नीचे क्षोभमंडल है और सबसे ऊपर बर्हिमंडल है।
(नोट : प्रश्न के दूसरे भाग को छात्र स्वयं करें।)

5. किसी एक मंडल के न होने से क्या कठिनाइयाँ होंगी? लिखिए।
उत्तर- सभी मंडलों की अपनी-अपनी उपयोगिता है। एक मंडल के काम को कोई दूसरा मंडल नहीं कर सकता। अतः किसी एक मंडल के भी न रहने से सम्भव है जलवायु में भारी परिवर्तन हो जाय, जिससे मानव जीवन ही खतरे में पड़ जाय या इसका कोई क्रियाकलाप बाधित हो जाय। इस प्रकार यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि किस मंडल के नहीं रहने से क्या कठिनाई होगी। लेकिन यह निश्चित है कि कोई-न-कोई कठिनाइयाँ अवश्य ही होगी।

6. पृथ्वी पर तापमान बढ़ने से जीवन के लिये खतरा बढ़ता है। कैसे?
उत्तर- पृथ्वी पर तापमान बढ़ने से जीवन के लिये खतरा बढ़ता है, क्योंकि पृथ्वी पर तापमान के बढ़ने से पहाड़ों पर जमें बर्फ तो गलते ही हैं साथ में ध्रुवों के पास के बर्फ भी गलने लगते हैं। जिसके परिणामस्वरूप समुद्रों का जलस्तर बढ़ने लगता है जिससे समुद्रों के बीच बसे द्वीप पानी में डूब जाते हैं। वहाँ के लोगों को पलायन करना पड़ता है। गंगा नदी के डेल्टा के कुछ द्वीप पानी में विलीन हो चुके हैं। तटवर्ती निवासियों के जीवन पर खतरे की तलवार लटक रही है, कब उनका आवास समुद्र में समा जाएगा, कोई ठीक नहीं।

7. रेडियो और दूरदर्शन की तरंगें किन माध्यमों से हम तक पहुँचती हैं? पता कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी से प्रसारित रेडियो और दूरदर्शन की तरंग बाह्य मंडल से होकर पुन: पृथ्वी पर हमारे रेडियो या दरदर्शन पर दिखाई पड़ता है। ऊँचे फ्रीक्वुऐंसी (Frequency) की तरंगों को यह मंडल आसानी से प्रसारित कर देता है। इसी सुविधा का लाभ उठाकर आज घर-घर में टेलिविजन और गाँव-गाँव तक मोबाइल फोन पहुँच गये हैं।

8. शीत प्रदेशों या ध्रुवों पर सब्जियों का उत्पादन कैसे करते है?
उत्तर- शीत प्रदेशों या ध्रुवों पर अत्यधिक ठंड पड़ती है। इस कारण-वहाँ कोई वनस्पति नहीं उग पाती। लेकिन ‘ग्रीन हाउस’ का उपयोग कर वहाँ भी सब्जियाँ उगा ली जाती है। यदि ग्रीन हाउस (मकान) बड़ा हो तो अनाज भी उपजाया जा सकता है।

9. वायमंडल की विभिन्न परतों को चार्ट पेपर पर अलग-अलग रंगों से दिखलाइए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें

10. ओजोन परत को खतरे से बचाना जरूरी है? क्यों और कैसे?
उत्तर- आजोन परत को खतरे से बचाना इसलिये जरूरी है क्योंकि यह परत पृथ्वी और पृथ्वीवासियों की रक्षा करता है। सूर्य से निकलने वाली किरणों में एक खतरनाक किरण ‘पराबैंगनी किरण’ है। यदि यह किरण पूरी तरह पृथ्वी पर पहुँच जाय तो शायद जीवन ही समाप्त हो जाय। लेकिन गनीमत है कि इन खतरनाक पराबैंगनी किरणों को ओजोन परत सोख लेती है और उन्हें पृथ्वी पर पहुँचने नहीं देती। लेकिन मानव की लापरवाही और स्वार्थ के चलते ओजन परत पर खतरा मंडरा रहा है। इसका कारण है कि हम धड़ल्ले से ऐसे वाहनों और उपकरणों का उपयोग करने लगे हैं, जिनसे निकली गैसें ओजोन परत को नष्ट करने पर उतारू हैं। अत: उसे बचाने के लिए हमें खनिज तेज चालित वाहनों तथा सुविधा देने वाले उपकरणों का उपयोग कम करना चाहिए।

11. पता कीजिए कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कौन-कौन से शहर, द्वीप और देश पर खतरा है?
उत्तर- समुद्र का जल स्तर बढ़ने से वैसे तो विश्व के सभी तटवर्ती गाँव और शहरों पर खतरा है लेकिन अपने देश भारत में पूर्वी डेल्टा के द्वीपों, मुंबई तथा चेन्नई शहरों को विशेष खतरा है। मुंबई में थोडी वर्षा से ही सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, क्योंकि समुद्र में पानी जा नहीं पाता और जाता भी है तो बहुत धीरे-धीरे। कई देशों जैसे- श्रीलंका, मालद्वीप, मारीशस तथा मेडागस्कर पर भारी खतरा है। हिन्द महासाग, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में अवस्थित छोटे-छोटे भारतीय द्वीप तो पहले ही डूबेंगे।


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अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ


अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुनें।

(1) छोटानागपुर क्या है?

(क) एक पठार

(ख) एक मैदान

(ग) एक झील

(घ) एक पर्वत

उत्तर- (क) एक पठार

(2) भूसतह पर भूकंप के केन्द्र के ऊपर स्थित स्थान क्या कहलाता है?

(घ) भू-पटल

(क) क्रेटर

(ख) अधिकेन्द्र

(ग) लावा

उत्तर- (ख) अधिकेन्द्र

(3) भारत को कितने भूकंप तीव्रता के क्षेत्रों में बाँटा गया है?

(क) 5

(ख) 4

(ग) 3

(घ) 7

उत्तर- (ख) 4

(4) सतपुड़ा पर्वत उदाहरण है-

(क) भ्रंश घाटी का

(ख) वलित पर्वत का

(ग) ब्लॉक पर्वत का

(घ) भ्रशोत्थ पर्वत का

उत्तर- (ग) ब्लॉक पर्वत का

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

ii. सही मिलान कर लिखिए-

                            उत्तर

1. हिमालय- (ख) वलित पर्वत

2. फ्यूजियामा- (क) संचयन पर्वत

3. अरावली- (घ) अवशिष्ट पर्वत

4. दक्कन- (ग) लावा निर्मित पठार

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

iii. निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए:

अधिकेन्द्र, उद्गम केन्द्र, सिस्मोग्राफ तथा रिक्टर स्केल

उत्तर- अधिकेन्द्र- पृथ्वी के ऊपर उद्गम क्षेत्र के ठीक सामने का भाग ‘अधिकेन्द्र’ कहलाता है। भूकम्प का अधिक कुप्रभाव अधिकेन्द्र के पास ही होता है और उसके चारों ओर क्रमशः कम होते जाता है।

उद्गम केन्द्र- पृथ्वी के अन्दर का वह भाग, जहाँ से भूकम्प की उत्पत्ति होती है उस भाग को ‘उद्गम केन्द्र’ कहा जाता हैं। अर्थात उद्गम केन्द्र तथा अधिकेन्द्र ठीक आमने-सामने होते हैं।

सिस्मोग्राफ- भूकम्प की तीव्रता मापने वाले यंत्र को ‘सिस्मोग्राफ’ कहा जाता हैं। सिस्मोग्राफ रिक्टर पैमाने का बना होता है।

रिक्टर पैमाना- जिस पैमाने में भूकम्प की तीव्रता को मापते हैं उस पैमाने को ‘रिक्टर पैमाना’ कहते हैं। सिस्मोग्राफ का पैमाना ‘रिक्टर’ ही होता है।

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

(1) भूकंप के झटके क्यों आते हैं?
उत्तर- पृथ्वी के अन्दर गतिशील प्लेटों के टकराने से भूकंप के झटके आते है।

(2) भूकम्प का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर- भूकम्प का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। छोटे-बड़े मकान ध्वस्त हो जाते हैं। बहुत से आदमी उसके मलवे में दब जाते हैं। इस प्रकार भारी जानमाल की हानि होती है।

(3) ज्वालामुखी किसे कहते हैं?
उत्तर- कभी-कभी और कहीं-कहीं पृथ्वी के अन्दर से तरल अग्नि की ज्वाला निकलने लगती है, उसी को ज्वालामखी कहते हैं।

(4) ज्वालामुखी ने मानव जीवन को प्रभावित किया है, कैसे?
उत्तर- पहले तो ज्वालामुखी ने अपने लपेटे में मनुष्य को तो लिया ही, उसके खेत-खलिहान और बाग-बगीचों को जला डाला। जहाँ ज्वालामुखी मृत हो गई और निकला लावा ठंडा हो गया वहाँ मनुष्य को उपजाऊ जमीन मिल गई। इस प्रकार मानव जीवन कुप्रभावित हुआ तो लाभान्वित भी हुआ है।

(5) पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के परिणामस्वरूप निर्मित होनेवाली स्थलाकृतियाँ कौन-कौन सी हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के परिणामस्वरूप निर्मित होने वाली स्थलाकृतियाँ अनेक हैं। ज्वालामुखी पर्वत पृथ्वी की आंतरिक शक्ति का परिणाम है। पृथ्वी की आंतरिक शक्ति से ही पर्वत/पहाड़, पहाड़ियाँ और पठार बनते हैं। पठारों पर भी पहाड़ियाँ दिख जाती हैं।

(6) मोड़दार एवं संचयन पर्वतों में क्या भिन्नता है एवं क्या समानता है?
उत्तर- धरातलीय भाग पर उत्पन्न दबाव के कारण जब मोड़ पड़ता है तो वह भाग ऊपर उठ जाता है और मोड़दार पर्वत का रूप धारण कर लेता है। इसके विपरीत ज्वालामुखी से निकले मैग्मा और लावा जब काफी मात्रा में एकत्र हो जाते हैं तब कालक्रम में ठंडा होकर संचयित पर्वत बन जाते हैं। दोनों पर्वत ऊंचे होते हैं। लेकिन मोडदार पर्वत काफी ऊंचे होते हैं, जिससे उनपर बर्फ जम जाती है, लेकिन संचयन पर्वत उतने ऊँचे नहीं होते जिससे उन पर बर्फ नहीं जमती। समानता यह है कि दोनों को पर्वत ही कहा जाता है।

(7) पर्वत और पठार में क्या अंतर है?
उत्तर- पर्वत और पठार में यह अंतर है कि पर्वत की ऊँचाई धीरे-धीरे बढ़ती है और ऊपर बहुत कम बराबर स्थान होता है जबकि पठार की ऊँचाई अकस्मात बढ़ती है और ऊपर काफी बराबर स्थान रहता है। अधिक ऊँचे पहाड़ों पर बर्फ जमती है, लेकिन पठारों पर खनिज मिलते हैं।

अध्याय-3 आंतरिक बल(8) पर्वत के प्रकारों का उदाहरण के साथ वर्णन कीजिए।
उत्तर- पर्वत चार प्रकार के होते हैं:-

(क) वलित पर्वत

(ख) भ्रंशोत्थ पर्वत

(ग) संचयन पर्वत और

(घ) अवशिष्ट पर्वत

(क) वलित पर्वत- धरातलीय भाग पर उत्पन्न दाब के कारण चट्टानों में बल पड़ने लगते हैं। इससे वहाँ की धरातल ऊपर उठ जाता है और वलित पर्वत बनता है। उदाहरण में एशिया का हिमालय, यूरोप का रॉकी।

(ख) भ्रंशत्य पर्वत- धरातल पर कभी-कभी समांतर भ्रंश के बाद बीच का भाग ऊपर उठ जाता है और पर्वत-सा दिखने लगता है। ऐसे ही पर्वत को भ्रंशोत्थ पर्वत कहते हैं। जैसे यूरोप का ब्लैक फॉरेस्ट और भारत का विन्ध्याचल।

(ग) संचयन पर्वत- ज्वालामुखी द्वारा निकले लावा ठंडा होकर संचित होते जाते हैं। कालक्रम में इस संचित लावा का ढेर लग जाता है और पर्वत बन जाता है। इसी को संचयन पर्वत कहते हैं। जैसे जापान का फ्यूजियामा तथा अफ्रिका का किलोमंजारो।

(घ) अवशिष्ट पर्वत- हवा, वर्षा, बर्फबारी आदि अपरदन की शक्तियों द्वारा पर्वत की चोटी कटती-छंटती तथा घिसती रहती है। इससे इसकी ऊंचाई बहुत कम हो जाती है। जैसे- अरावली, पूर्वी और पश्चिमी घाट पर्वत।

(9) पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के क्या-क्या प्रभाव नजर आते हैं?
उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के निम्नलिखित प्रभाव नजर आते हैं:-

⇒ भूकम्प,

⇒ ज्वालामुखी तथा

⇒ विभिन्न प्रकार के पर्वतों का बनना।

(10) भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान कब एवं कहाँ होता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान तब होता है जब वहाँ के निवासी लापरवाह रहते हैं। इससे बचने के उपायों से अवगत नहीं रहते। पुनः भूकम्प का अधिक नुकसान वहाँ होता है जहाँ के मकान भूकम्परोधी नहीं बने होते।

(11) भूकम्प से होनेवाली क्षति से हम कैसे बच सकते हैं?
उत्तर- भूकम्प से होनेवाली क्षति से हम तभी बच सकते हैं जब लोगों को इससे बचने के उपायों से अवगत करायें। जो भी भवन बनें उनको वैज्ञानिक ढंग से भूकम्परोधी बनाया जाय। इससे भूकम्प से होनेवाली क्षति को कम किया जा सकता है या क्षति से बचा जा सकता है।

(12) पठार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर- पठार निम्नलिखित छः प्रकार के होते हैं:-

(क) महाद्वीपीय पठार

(ख) वायूढ़ निक्षेप पठार

(ग) हिमनदीय निक्षेपण पठार

(घ) लावा निर्मित पठार

(ड़) अंतरपर्वतीय पठार और

(च) गिरिपद पठा


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11. अंकीय उच्चता मॉडल 

11. अंकीय उच्चता मॉडल 

(The Digital Elevation Model)


अंकीय उच्चता मॉडल (DEM) 

            “किसी भी धरातल के उच्चावचों की भिन्नताओं की निरन्तरता का अंकीय प्रदर्शन अंकीय च्चता मॉडल कहलाता है।” अर्थात यह उच्चावच को दर्शाने का एक कम्प्यूटर आधारित महत्वपूर्ण मॉडल है। पृथ्वी की सतह दिखाने के अलावा यह मॉडल ग्रहों एवं उपग्रहों के लिए भी प्रयोग किया जा रहा है। सामान्यतः धरातलीय विषमताओं को समोच्च रेखाओं द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

मूरे (Moore) तथा अन्य के अनुसार:-

        अंकीय उच्चता मॉडल संख्याओं का क्रमिक विन्यास है जो समुद्र तल से ऊँचाई के धरातलीय वितरण को प्रदर्शित करता है।

        अंकीय उच्चता मॉडल किसी दिये गये क्षेत्र के किसी बिन्दु की ऊँचाई का चित्रण अंकीय आकार में रखता है तथा सूचनाओं को किन्हीं कंकाल (Skeleton) रेखाओं के द्वारा एकत्र करता है। कंकाल रेखायें वे रेखायें होती हैं जो किसी ऊँचे-नीचे ढाल तथा ढाल परिवर्तन बिन्दुओं को दर्शाती है।

अंकीय भूभाग मॉडल (Digital Terrian Model)

            उच्चावच को प्रदर्शित करने के लिए DTM शब्द का भी सामान्यतः उपयोग किया जाता है। अंकीय भूभाग मॉडल (DTM) धरातलीय लक्षणों के सतही वितरण को प्रदर्शित करता है।

      अंकीय- भूभाग मॉडल (DTM), अंकीय आकार में भू-धरातलीय मानचित्र है जो केवल अंकीय उच्चता मॉडल को ही नहीं दर्शाता बल्कि भूमि उपयोग के प्रकारों, अधिवासों, सरिता रेखाओं के प्रकारों, ढालों इत्यादि को भी मॉडल के साथ दर्शाता है।

       DEM शब्द उच्चता सम्बन्धी आँकड़ों को रखने के मॉडल के रूप में प्रयोग किया जाता है जबकि भूभाग (Terrain) शब्द अक्सर भूमि सतही ऊँचाई के अतिरिक्त स्थलरूपों के लक्षणों को भी प्रदर्शित करने के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यद्यपि DEM शब्द ही सबसे पहले उच्चता मॉडल के लिए प्रयोग किया गया था तब से लगातार द्विविम सतह के ऊपर Z लक्षणों के परिवर्तनों के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

अंकीय उच्चता मॉडल की आवश्यकता (Need of Digital Elevation Model)

       अंकीय उच्चता मॉडल के कई उपयोग है। इनमें प्रमुख निम्न प्रकार से हैं:-

1. राष्ट्रीय आँकड़ा आधार प्रणाली में अंकीय भूपत्रक मानचित्रों के ऊँचाई सम्बन्धी आँकड़ों का संग्रह करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. यह सांख्यिकीय विश्लेषण तथा अलग-अलग भूभागों में तुलना करने में सहायक है।

3. DEM के द्वारा किसी भी क्षेत्र का ढाल मानचित्र, ढाल पहलू मानचित्र, भूआकृतिक विश्लेषण तथा अपरदन तथा बाह्य जल का अनुमान लगाया जा सकता हैं।

4. सामरिक उद्देश्यों के लिये भूआकृतियों का त्रिविम प्रदर्शन से किसी भूभाग का ज्ञान, हथियारों का संचालन तथा पाइलट परिशिक्षण जैसे कार्यों में DEM से सहायता मिलती है।

5. किसी भी भूभाग की डिजाइन तथा योजना तैयार करने के लिये DEM का उपयोग जाता है।

6.. इसके द्वारा विकट धरातल पर सड़क के डिजाइन में कटान तथा भरण (Cut and (Fill) जैसी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है

7. कई इन्जिनिरिंग परियोजनाओं जैसे कि बाँध, नगर, पावर लाइन तथा तकनीकि कार्यों में DEM का उपयोग सहायक होता है।

8. इनके द्वारा किसी देश के सीमा पार की दृश्यता का भी विश्लेषण किया जा सकता है।

9. DEM के साथ कई विषयी मानचित्रों जैसे कि भूमि उपयोग, मिट्टी, शैल विन्यास, भूस्खलन इत्यादि को इसके ऊपर डालकर प्रदर्शित किया जा सकता है।

10. यह किसी भूआकृति तथा भूआकृतिक प्रक्रियाओं के निम्न अनुरूपता मॉडल के लिये आँकड़े उपलब्ध कराता है।

11. इसमें किसी भी प्रदर्शित स्तर के ऊँचाई परिवर्तित करने की सुविधा उपलब्ध होती है जिससे कई तथ्यों का अनुमान लगाया जा सकता है।

अंकीय उच्चता मॉडल के विभिन्न संरचनायें (Various Structure of DEM)

         वर्तमान समय में DEM की कई प्रकार की संरचनायें प्रयोग की जाती हैं। इनमें से कोई भी पूर्ण रूप से किसी आँकड़ा संरचना की पूर्ति नहीं करते हैं। उद्देश्यों एवं कम्प्यूटर पर उपलब्धता के आधार पर निम्न उपयुक्त मॉडल प्रयोग किये जाते हैं-

1. रेखीय मॉडल (Linear Model)

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network)

3. ग्रिड जाल (Grid Network)/वर्ग संरचना (Grid Structure)

1. रेखीय मॉडल (Linear Model):-

           रेखीय मॉडल समोच्च रेखाओं के द्वारा किसी भू-भाग की ऊँचाई को प्रदर्शित करता है तथा प्रत्येक सम्मोच्च रेखा के X एवं Y निर्देशांकों के जोड़े ऊँचाई को व्यक्त करते हैं। सम्मोच्च रेखाओं से त्रिविम्ब प्रदर्शन तैयार किया जा सकता है तथा धरातलीय विशेषताओं को तब इसके ऊपर विश्लेषण किया जा सकता है।

       इन रेखाओं के द्वारा निष्कोण (Smooth) दूरी के साथ सम्मोच्च रेखाओं की अनुपातिक दूरी को सम्मिलित जाता है जो किसी भी ढाल के निष्कोणता को दर्शाता है। सम्मोच्च रेखाओं के अनुरूप एक विशेष प्रकार का दूसरा रेखीय मॉडल भी है जो सरिताओं की व्याख्या करता है तथा जिसे जल प्रवाह मॉडल में भी प्रयोग किया जाता है। जैसा कि स्पष्ट है कि किसी भी रेखीय अंकीय ग्राफ को तैयार करने के लिये भूपत्रक मानचित्रों से सम्मोच्च रेखाओं को डिजिटाइज किया जाता है। ये मानचित्र ही आँकड़ों के ऐसे स्रोत हैं जो वर्गाकार खानों के द्वारा ऊँचाई मॉडल का निर्माण करते हैं।

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network-TIN):-

         असतत त्रिभुजीकृत जाल, अंकीय उच्चता मॉडल के लिये एक प्रणाली है जिसे पीउकेर तथा अन्य (1978) के द्वारा डिजाइन किया गया है। यह प्रणाली उच्चावच मैट्रिक्स के बहुलता (Redundancies) को दूर करता है। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे टिन मॉडल कहते हैं।

        टिन एक विक्टर स्थानविज्ञान संरचना के समान है। इसके अन्तर्गत पोलीगन जाल की स्थान विज्ञान संरचना के अनुरूप प्रदर्शित किया जाता है। टिन मॉडल आँकड़ा आधार के प्रारम्भिक प्रविष्टियों के जाल का नोड (Note) बनाने में सहायक होते हैं। आँकड़ा आधार में स्थान विज्ञान के सम्बन्ध एक-दूसरे से बनाये जाते हैं। प्रत्येक नोड को प्रत्येक निकट के नोड से किसी निशान के द्वारा निर्मित किया जाता है।

         टिन मॉडल घरातल को त्रिभुजाकार समतल तत्वों में विभाजित करता है। भूभाग धरातल किसी जोड़ (नोड) द्वारा प्रतिदर्श होता है। ये धरातलीय बिन्दु भूभाग की विशेषताओं को स्थिति को दर्शाते हैं। त्रिभुजाकार आवृत्ति के तीन नोड सन्दर्भ बिन्दु होते है। इन बिन्दुओं को अन्तर्वेशन (Interpolation) विधि द्वारा बदला नहीं जा सकता है। धरातलीय प्रतिदर्श (Sampling) के अनतर्गत विशेष बिन्दुओं एवं रेखाओं को सम्मिलित किया जाता है जो कोई चोटी, गहरा भाग, ढाल रेखा जैसे कि जल विभाजक या सरिता रेखा तथा ढाल परिवर्तन रेखा को दर्शाया जाता है। ये कंकाल (Skeleton) रेखायें टिन संरचना पर किसी चाप की भाँति प्रतीत होती हैं। प्रतिचयन घनत्व भूभाग की जटिलता पर निर्भर करती है। नोड जाल के घनत्व की वृद्धि से धरातल की सही तस्वीर प्रस्तुत की जा सकती है परन्तु इसमें आँकड़ की अधिकता तथा परिकलन समय अधिक लगता है।

टिन संरचना के लाभ (Advantages of the Tin Structure)

1. टिन आँकड़ा संरचना एक संरचना है।

2. स्थानीय भूभाग की दशाओं के आवश्यकतानुसार त्रिभुजों की आकृति एवं आकार भिन्न-भिन्न होते हैं।

3. त्रिभुज के किनारों पर ढाल परिवर्तनशीलता की समाविष्टि करने में यह मॉडल सक्षम होता है।

4. टिन संरचना से कई भूभाग विशेषताओं जैसे कि ढाल, ढाल पहलू, इत्यादि का परिकलन किया जा सकता है।

टिन संरचना (TIN Structure ):-

            सबसे महत्वपूर्ण कार्य संरचना की रूप-रेखा का है। प्रश्न यह है कि किस प्रकार सम्मोच्च रेखाओं के जाल को अंकों में परिवर्तित कर आँकड़ा आधार पर रखा जाता है। यहाँ पर आँकड़ा को आँकड़ा आधार पर रखने की विधियों को प्रदर्शित किया जा रहा है। टिन को आँकड़ों आधार (Data Base) में संग्रह करने के कई तरीके हैं। गुडचाइल्ड तथा केम्प (Goodchild and Kemp, 1990) ने दो संरचनाओं को प्रस्तावित किया है जो मुख्यतः त्रिभुजों तथा नोड़ों पर आधारित है । त्रिभुज संरचना ढाल विश्लेषण के लिये दण्ड विधि है जबकि नोड संरचना सम्मोच्च रेखाओं को निर्मित करने तथा आड़ा-तिरछा करने में सरल होती है।

अंकीय उच्चता मॉडल 

अलकनंदा क्षेत्र

त्रिभुजीकरण (Traingulation):-

        टिन के निर्माण के लिये त्रिभुजाकार विधि का भी उपयोग जाता है। ग्राफ संरचना के साथ चापों एवं शीर्ष बिन्दुओं (Vertices) के उपयोग से क्षेत्र त्रिभुजों में उपविभाजित हो जाता है जिससे

(a) प्रत्येक मापन बिन्दु पर एक नोड निर्मित होता है तथा

(b) प्रत्येक त्रिभुज के अन्तर्गत तीन नोड होते हैं।

          यह विधि आन्तरिक कोण को अधिकतम बनाती है तथा त्रिभुज की लम्बी भुजा को कम से कम करती है। इसी तरीके से भिन्नतायें प्राप्त की जाती है। इस विधि में सबसे पहले थिसेन (Thiessen) पोलीगॉन की रचना की जाती है। कृत्रिम त्रिभुजीकरण, अन्तरर्वेशन रेखाओं (Interpolation Lines) जैसे कि सम्मोच्य रेखायें त्रिभुज के किनारों पर एक दूसरे से आर-पार होती हैं। यह डेलाउनाइ (Delaunay) त्रिभुजीकरण पर आधारित है।

3. वर्ग संरचना (Grid Structure):-

          वर्ग आधारित विधियाँ भी समान फैले त्रिभुजों या वर्गों के लिये प्रयोग हो सकते हैं। क्षेत्रीय तत्व तीन या चार पड़ोसी वर्ग बिन्दुओं से घिरा हुआ सेल (Cell) होता है। रास्टर आधारित जी.आई.एस. के अन्तर्गत वर्ग ग्रिड जाल का प्रयोग किया जाता है।

          ग्रिड घनत्व या सेल का आकार क्षेत्रीय विषमताओं से आवश्यक रूप से समायोजित होता है। जहाँ पर भूभाग अत्यधिक कटाफटा है वहाँ पर ग्रिड घनत्व अधिक होता है। इस प्रकार के विषय क्षेत्रों में यह अतिरिक्त पुनरावृत्ति को बढ़ाता है। एक बात विशेषकर दिमाग में यह रखनी चाहिए कि जब सेल का सापेक्षिक आकार बड़ा होता है तो भूभाग तीव्र ढाल वाला होता है। इसके लिये अधिक आँकड़ों की आवश्यकता की पूर्ति होती है।

             इस विधि का लाभ यह हैं कि इसमें आँकड़ों का संग्रह अतिसरल होता है। दूसरा इसके द्वारा DEM से कई परिकलन का निर्माण किया जा सकता है।

निष्कर्ष:

       उपरोक्त तीनों विधियों में सबसे सरल एवं प्रचलित टिन संरचना प्रमुख है। टिन संरचना पर आधारित यहाँ पर हिमालय भूभाग (अलकनंदा क्षेत्र) का एक उच्चता मॉडल तैयार किया गया है। इसमें धरातलीय विषमताओं को उजागर किया गया है। इस प्रकार के धरातलीय मॉडल किसी भूभाग के मॉडलिंग कने में सहायक होते हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. अंकीय उच्चता मॉडल पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the digital elevation model.)



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15. डिजिटल मानचित्रकला

15. डिजिटल मानचित्रकला

(Digital Cartography)



डिजिटल मानचित्रकला ⇒

          “कम्प्यूटर पर मानचित्र निर्माण या कम्प्यूटर की सहायता से मानचित्रों के निर्माण डिजिटल मानचित्रकला कहलाती है।”

          पहले तकनीकी रूप से सदृश्य मानचित्रण तकनीकि की मांग अधिक थी लेकिन यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थी। वर्तमान समय में डिजिटल मानचित्रकला के प्रकाश में आने से ऐसा नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रण कार्यों से जुड़ा हुआ है वह थोड़े से प्रशिक्षण के पश्चात् कम्प्यूटर पर मानचित्रों का निर्माण कर सकता है तथा मानचित्रों की रूप रेखा, सांकेतिक चिह्नों, रंगों इत्यादि को सुगमता से परिवर्तित कर सकता है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रों को संचालित करता है। उसको मानचित्रकला (Catrography) का आधारभूत ज्ञान होना अति आवश्यक है।

          पिछले एक या दो दशक में विद्युत तकनीकि के विकास ने वैज्ञानिक क्रियाकलापों तक की मनुष्य के प्रतिदिन के कार्यों को भी प्रभावित किया है। भूमि सर्वेक्षण जैसे व्यवसाय में तो मानचित्रकला का कोई विकल्प नहीं है। सुदूर संवेदन तथा वायुयान निर्मित संवेदकों से उपलब्ध आँकड़े डिजिटल आकार में होते हैं। तीव्रगति वाले विद्युत कम्प्यूटरों का विकास, इनकी पर्याप्त संग्रहण क्षमता, आसानी से इनका देश में उपलब्ध होना, ऑन लाइन पर अतिरिक्त सुविधायें प्राप्त होना तथा कीमत में निरन्तर ह्रास होना इत्यादि कई ऐसे कारक है जिसे कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रणाली का प्रयोग निरन्तर बढ़ा है।

            जैसा कि स्पष्ट है कि कम्प्यूटर पर कोई मानचित्र या प्रतिबिम्ब उसी रूप में संग्रह नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक आकृति को अंकों में कम्प्यूटर पर संग्रहीत किया जाता है तथा इच्छानुसार इनके द्वारा प्रतिबिम्ब या दृश्य तैयार किये जा सकते हैं। किसी मानचित्र को अंकों में संग्रह करने को भौगोलिक आँकड़े कहा जाता है। भौगोलिक आँकड़े दो प्रकार के होते धरातलीय तथा अधरातलीय। प्रायः धरातलीय आँकड़ों को बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

            अधरातलीय आँकड़े किसी बिन्दु, रेखा अथवा क्षेत्र विशेष की सूचनाओं को दर्शाते हैं। ये धरातलीय आँकड़े की विशेषताओं को बताते हैं जैसे कि किसी शहर का नाम, नदी या सड़क का नाम या किसी क्षेत्र विशेष का नाम इत्यादि। इस प्रकार धरातलीय तथा अधरातलीय आँकड़ों या सूचनाओं को कम्प्यूटर पर संग्रह किया जाता है। धरातलीय आँकड़ों को कम्प्यूटर पर प्रदर्शित करने के लिए निम्नलिखित दो कर्टोग्राफिक मॉडलों का उपयोग किया जाता है।

कार्टोग्राफिक मॉडल (Cartographic Models)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल (The Cartographic Map Model)

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल (The Geo Relational Model)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल:-

            कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल में कम्प्यूटर का स्क्रीन आकार लघु वर्गाकार आकृतियों में विभाजित होता है जिसका प्रत्येक ग्रिड सेल एरी (Array) या पिक्सल (Pixal) कहलाता है। एरी अथवा पिक्सल जितना क्षेत्रफल तय करता है वह उस मानचित्र का विभेदन (Resolution) कहलाता है। प्रत्येक ग्रिडसेल पंक्ति व कॉलम द्वारा सन्दर्भित होता है जो संख्याओं में ऑकत होता है। प्रत्येक ग्रिडसेल का अपना काम होता है जिसे आँकड़ा कहते हैं। आँकड़ों का यह रूप रास्टर संरचना (Raster Structure) कहलाता है। रास्टर संरचना में बिन्दु आकृति को एक ग्रिडरौल से, रेखीय आकृति को आस-पास के ग्रिड सेलों के अंकीय मान के क्रम द्वारा तथा क्षेत्र आकृति को आस-पास के समान या मान वाले ग्रिड सेलों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

डिजिटल मानचित्रकला

डिजिटल मानचित्रकला

 

               रास्टर प्रणाली में आँकड़ों की संग्रह क्षमता बहुत कम होती है। यही कारण है कि इस संरचना के अन्तर्गत कई प्रक्रियायें एक साथ सम्भव नहीं हो सकती है।

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल:-

             भू-सम्बन्धी मॉडल आँकड़ों के संग्रहण तथा सूचनाओं के एकीकरण की ऐसी पद्धति है जो विभिन्न (बिन्दु, रेखीय तथा क्षेत्रीय) आकृतियों को अधरातलीय सूचनाओं से जोड़ता है। उदाहरण के लिए नगर, गाँव अथवा घर की बिन्दु आकृति को उसके नाम तथा जनसंख्या के साथ दर्शाया जा सकता है। इसी प्रकार रेखीय आकृतियों में किसी सड़क को उसके नाम से तथा नदी को उसके नाम के साथ जल निस्तारण क्षमता द्वारा दर्शाया जा सकता है। अलग-अलग क्षेत्रीय आकृतियाँ को उनके नाम एवं विशेषताओं के आधार पर दर्शाया जा सकता है। उदाहरण के लिए भूमि उपयोग, शैल इकाईयाँ, मिट्टी के प्रकार तथा सिंचित असिंचित भूमि इत्यादि। भू-सम्बन्धीय आँकड़ों के लिए विक्टर आँकड़ा संरचना पद्धति सबसे प्रमुख है।

          विक्टर प्रणाली को सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किसी वस्तु अथवा आकृति की सापेक्षिक दूरी तथा विस्तार मापक के अनुसार दुरुस्त तरीके से दर्शाया जाता है। प्रत्येक भौगोलिक आकृति को X एवं Y निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

             किसी बिन्दु आकृति को एकल XY निर्देशांक के जोड़े द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जबकि रेखीय आकृतियों को दो या दो से अधिक XY निर्देशांकों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। क्षेत्रीय आकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए विक्टर संरचना में कई प्रणालियाँ प्रयोग की जाती हैं। इनमें सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला तरीका स्थान (Spagetti Representation) है जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय आकृतियों की सीमाओं को XY निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक केवल एक ही विक्टर रेखा प्रदर्शित की जाती है। क्षेत्रीय आकृति को किसी सांकेतिक चिह्न अथवा नाम से प्रदर्शित किया जाता है।

डिजिटल मानचित्रकला के तत्व (Elements of Digital Cartography):-

            सदृश्य मानचित्रकला के (Analog Cartography) प्रमुख तत्व निम्न हैं-

1. मानचित्र का मापक एवं प्रमाणिकता (Scale of Map of Accuracy)

2. मानचित्र की विषय सामग्री (Content of Map)

3. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)

4. मानचित्र की रूपरेखा (Map Layout)

5. मानचित्र सांकेतिक चिह्न (Map Symbols)

6. रंगों एवं प्रतिरूपों का प्रयोग (Use of Colours and Pattem)

7. टाइप की गई सामग्री (Typography- Lattering)

8. मानचित्रों का सामान्यीकरण (Generalization of Map)

9. मानचित्रों का संकलन (Compilation of Map)

             अब डिजिटल मानचित्रकला में निम्न तत्वों को भी सम्मिलित किया जाने लगा है-

1. आँकड़ा मॉडल (Data Model)

2. आकृतिक विशेषतायें (Features Attributes)

3. आँकड़ा सेट अनुक्रम (Data Set Lineage)

4. दृश्यिकरण (Visulization)

           मानचित्र कला के इस अनुभाग में धरातलीय सूचनाओं को कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रारूप में प्रदर्शित करने के तरीकों तथा मानचित्रों डिजाइन पर अधिक बल दिया जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं-

1. सबसे पहला उद्देश्य यह समझना है कि डिजिटल धरातलीय आँकड़ों को किस प्रकार डिजाइन किया जाता है।

2. दूसरा यह समझना है कि विभिन्न तत्वों से मानचित्रों का निर्माण कैसे किया जाय जैसा कि ये क्रम से लगे होते हैं।

3. तीसरा यह जानकारी रखना है कि मानचित्र पर प्राथमिकता के आधार पर किन तत्वों को स्थान दिया जाना चाहिए। 4. चौथा आकृतियों को शुद्धता से प्रदर्शित करने के लिए किन उपयुक्त चिह्नों का प्रयोग करना चाहिए।

मानचित्र एवं डिजिटल धरातलीय आँकड़ा आधार (Mapand Digital Spatial Data Base)

             जहाँ तक मानचित्र का सम्बन्ध है, मानचित्र धरातलीय सूचनाओं का एक दस्तावेज है। मानचित्रों को अंकीय आकार (Digital Form) में लाने के लिए इन्हें सबसे पहले डिजिटाइज करना पड़ता है तथा सूचना तत्वों के आधार पर अलग-अलग खण्डों में विभाजित किया जाता है।

Preparation of Data Design

           इस प्रक्रिया में कुछ कार्टोग्राफिक सूचनाओं को जिन्हें मनुष्य अपने दिमाग से समझता है उन्हें छोड़ दिया जाता है लेकिन कुछ आवश्यक सूचनाओं का शक्तिशाली आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है।

        धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की सबसे सरल विधि उपलब्ध मानचित्रों को डिजीटाईज करना है। इसके अलावा फोटोग्रामेटी, सुदूर संवेदन तथा धरातलीय अवलोकन विधि जिनके आधार पर आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है। डिजिटल आँकड़े सापेक्ष रूप से बिना मापक के होते हैं। प्रायः इन्हें 1:1 मापक पर रखा जाता है।

धरातलीय सूचनाओं का अंकीय आंकड़ा आधार (Digital Data Base):-

            जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है कि जी.आई.एस. में आँकड़ों को तीन रूपों में दर्शाया जाता है। ये तीन रूप बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र आकृतियाँ हैं। प्रत्येक आकृति XY को निर्देशांक की सहायता से डिजिटाइज किया जाता है।

भू-धरातलीय आँकड़ा आधार का डिजाइन (Geo-Spatial Data Base Design):-

           एक बार यदि हम आँकड़ा आधार, प्रक्षेप, विषय सामग्री तथा शुद्ध स्तर का उद्देश्य समझ जाते हैं तब निम्न दो कार्यों को सम्पन्न करने के लिए धरातलीय आँकड़ों का डिजाइन तैयार किया जाता है।

(a) जी.आई.एस. विश्लेषण के लिए भू-धरातलीय आँकड़ों को प्राकृतिक संरचना के अनुसार तैयार किया जा सकता है। (b) मानचित्रों के निर्माण तथा प्रदर्शन के लिए आँकड़ों का उपयोग अति सरल करना होता है।

डिजिटल धरातलीय आँकड़ों के निर्माण के लिए आंकड़ा मॉडलिंग (Data Modelling for Creating Digital Spatial Data):-

        डिजिटल धरातलीय आँकड़ों का ऐसा आँकड़ा मॉडल तैयार किया जाता है जो उच्च स्तर के मानचित्रों का उत्पादन कर सके तथा प्रत्येक के उपयोगकर्ता के लिए उपयोगी बन सके। जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि आँकड़ा मॉडलिंग का अर्थ आँकड़ों के संरचना की रूपरेखा तैयार करना है जिसे इन्हें सुगमता से प्रयोग किया जाए। धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की यह एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है।

आँकड़ों के मॉडलिंग डिजाइन को निम्न तीन रूपों में तैयार किया जा सकता है-

1. संकल्पनात्मक डिजाइन

2. तार्किक डिजाइन

3. भौतिक डिजाइन

1. संकल्पनात्मक डिजाइन (Conceptual Design):-

       मॉडलिंग ऐसा होना चाहिए जो धरातलीय आँकड़ों को अत्यधिक सिद्ध-परस्त बना सकें तथा जो अनुप्रयोग की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। आँकड़ों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि उनसे सरलतापूर्वक मानचित्रों का निर्माण किया जा सके।

          मानचित्रकला के आँकडे स्थान विज्ञान की दृष्टि से ढांचागत नहीं होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस रूप में हमें मानचित्र और उसमें निहित सूचनाएँ प्राप्त होती है उसी रूप में इन्हें जी.आई.एस. में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। इन्हें कम्प्यूटर वातावरण में ढालने की आवश्यकता होती है। यदि मानचित्र के प्रतिरूप को डिजिटाईज किया जाए तो इसके लिए कई प्रयास करने पड़ते हैं तब यह जी.आई.एस. के अनुरूप कार्य कर सकता है। जी.आई.एस. निर्माण हेतु आँकड़ों का डिजिटाइजेशन करने के पश्चात इनसे मानचित्र तैयार करना अति सरल हो जाता है।

        इस प्रकार स्थान विज्ञान ढाँचे के लिए संकल्पनात्मक आँकड़ा मॉडल तैयार करना आवश्यक होता है। प्रत्येक आकृति को बिन्दु (Point), रेखा (Line) या घिरे हुए क्षेत्र (Polygon) के रूप में डिजिटाईज किया जाता है।

2. तार्किक डिजाइन (Logical Design):-

         आँकड़ों का मॉडलिंग  तर्पूकर्ण तरीके से तैयार किया जाता है। इसको इतना सरल बनाया जाता है कि कोई भी मानचित्रकार या उपयोगकर्ता उसे भली-भाँति समझ सके तथा उसका उपयोग कर सके। डिजिटल आँकड़े में जी.आई.एस. में धरातलीय विश्लेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इनकी संरचना इस प्रकार तैयार की जाती है कि प्रत्येक आकृति की पहचान की जा सके। इसकी बसाव-स्थिति इस प्रकार हो कि डिजिटल आँकड़ों में उसे पृथक किया जा सके। आँकड़ों को तार्किक क्रम में संगठित किया जाता है। इसी प्रकार आँकड़ों का ढाँचा सरल एवं समझ के योग्य बनाया जाता है।

          बिन्दु, रेखा तथा आकृतियों के ज्यामितीय लक्ष्यों को निर्देशांक या निर्देशांकों (X,Y) के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यदि प्रत्येक ज्यामितीय वस्तु को किसी कोड से सम्बन्धि किया जाय तब वह उस आकृति के सम्बन्ध में जानकारी देता है जो एक ज्यामितीय आकृति है। उदाहरण के लिए कोई झील या कृषि भूमि या वन क्षेत्र किसी भी आकृति को वर्गीकृत कर कोडिंग किया जाता है।

3. भौतिक डिजाइन (Physical Design):-

         आँकड़ा संरचना का भौतिक डिजाइन कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर पर निर्भर करता है।

      कुछ कम्प्यूटर प्रणाली में आकृतियाँ प्रायः स्थानविज्ञान से जुड़ी हुई होती है। उदाहरण के लिए रंग, दबाव, स्टाइल तथा विभिन्न तल इत्यादि या आँकड़े अलग-अलग फाइलों में पृथक-पृथक किये जाते हैं जैसे कि एक सड़क के लिए, एक जंगल के लिए इत्यादि।

       आँकड़ों का दूसरा भौतिक डिजाइन आँकड़ा आधार की कड़ियाँ या कोड से सम्बंधित होते हैं। भौतिक आँकड़ा संरचना मॉडल का आधारभूत सिद्धान्त वही है जो कि डिजाइन के अन्तर्गत था। इसमें डिजिटाइजेशन इस प्रका किया जाता है कि एक आकृति को दूसरे आकृति से पृथक किया जा सके तथा सरलतापूर्वक स्वतः ही तार्किक डिजाइन में परिवर्तित हो सकें।

प्रश्न प्रारूप

Q. डिजिटल मानचित्रकला पर निबंध लिखें।

(Write on essay on digital Cartography.)



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16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

(Difference between Raster and Vector Model)


रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर ⇒

            भौगोलिक सूचनाओं के प्रतिरूपण (Modeling) में धरातलीय आँकड़ा संरचना के लिए रास्टर तथा विक्टर विधियाँ स्पष्ट रूप से अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक यह माना जाता था कि रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा सूचनायें एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा इसलिये समझा गया क्योंकि रास्टर विधि में संग्रहण तथा प्रतिविम्ब प्रक्रिया के लिये अत्यधिक कम्प्यूटर स्पेस तथा स्मृति की आवश्यकता होती थी जबकि विक्टर विधि में कम स्थान की आवश्यकता होती थी।

         रास्टर विधि में कई धरातलीय विश्लेषण अति सरल होते हैं। आँकड़ों के परिचालन में इसमें कई प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होती हैं जैसे कि पोलीगन प्रतिच्छेदन या धरातलीय सामान्यीकरण से उत्पन्न समस्या इत्यादि। रास्टर विधि द्वारा निर्मित मानचित्र अच्छे व साफ नहीं होते हैं।

           इसके विपरीत विक्टर विधि में आँकड़ा आधार बहुत उत्तम तरीके से प्रबन्धित होता है। इसके द्वारा निर्मित मानचित्र अत्यधिक परिष्कृत होते हैं। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें धरातलीय विश्लेषण नितान्त कठिन होते हैं।

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल में अंतर

रास्टर आँकड़ा मॉडल

1. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक सरल (Simple) डाटा मॉडल है।

2. रास्टर मॉडल मुख्य रूप से बसाव स्थिति (Location) को केन्द्रित करता है। 

3. रास्टर आधारित जी.आई.एस. में उपग्रही सूचनाओं को सरलतापूर्वक कम्प्यूटर पर डाला जा सकता है।

4. रास्टर मॉडल धरातलीय शुद्धता को कम करता है। इसका अर्थ है कि रास्टर मॉडल अत्यन्त सामान्यीकरण दृश्य को प्रस्तुत करता।

5. रास्टर मॉडल आकृतियों एवं धरातल के मध्य Gradual Transition दर्शाता है। उदाहरण के लिये उच्चावन्वन के साथ मिट्टियों का वर्गीकरण।

6. रास्टर मॉडल बसाव स्थिति को कार्टेशन निर्देशांक प्रणाली में प्रदर्शित करता है।

7. रास्टर मॉडल में आँकड़ों को पंक्ति एवं कालम में संग्रह किया जाता है। लेकिन टोपोलोजीकल प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती है।

8. इसमें प्रत्येक तत्व एक लक्ष्य (Object) के रूप में प्रदर्शित करता है।

9. रास्टर मॉडल में क्षेत्र या दूरियों की माप करना सरल होता है परन्तु किसी चर की माप करना अत्यन्त कठिन होता है।

10. रास्टर आँकड़ा मॉडल किसी प्रश्न का उत्तर आसानी से देता है जैसे कि भौगोलिक आकृति की बसाव स्थिति क्या है?

11. रास्टर मॉडल अत्यन्त जगह घेरता है, इसलिए आँकड़ों को सघन करके प्रयोग किया जाता है।

12. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक विक्टर की तुलना में तीव्र है।

13. रास्टर मॉडल का उपयोग धरातलीय विश्लेषण में बहुतायत में किया जाता है।

रास्टर एवं विक्टर मॉडल

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल

विक्टर आँकड़ा मॉडल

1. विक्टर मॉडल अत्यधिक जटिल आँकड़ा संरचनायुक्त मॉडल है।

2. विक्टर मॉडल भौगोलिक आकृतियों (Features) को केन्द्रित करता है?

3. विक्टर मॉडल में उपग्रह से उपलब्ध आँकड़ों को सरलता से कम्प्यूटर पर नहीं डाला जा सकता है।

4. विक्टर मॉडल किसी वस्तु या लक्ष्य की आकृति को अति शुद्धता से प्रदर्शित करता है।

5. विक्टर मॉडल में किसी वस्तु आकृति की सीमाओं को अति शुद्धता के साथ दर्शाया जाता है।

6. विक्टर मॉडल में बसाव स्थितियों को ‘x’ एवं ‘y’ निर्देशांकों प्रणाली की सहायता से दर्शाया जाता है।

7. इसमें टोपोलाजीकल प्रक्रिया अपनाई जाती है।

8. वास्तविक सांसारिक घटनाओं को जिनकी एक विशिष्ट बसाव स्थिति होती है को स्थैतिक बिन्दु, रेखा, सीमाओं एवं घिरे हुये क्षेत्र का शुद्ध अवलोकन करता है। अधिकतर लक्ष्यों के लिए विक्टर मॉडल अत्यधिक उपयुक्त है।

9. किसी भी क्षेत्र की दूरी एवं क्षेत्रफल ज्ञात करना आसान होता है।

10. विक्टर मॉडल में किसी भौगोलिक आकृति के बारे में क्या करना है। इस प्रका के प्रश्नों का स्वयं हल निकाल लेता है।

11. विक्टर मॉडल में धरातलीय आँकड़ों के संग्रह के लिये अत्यन्त कम स्थान होता है।

12. विक्टर मॉडल तीव्रता के साथ शुद्धता को भी दर्शाता है।

13. विक्टर मॉडल का उपयोग अति उच्च श्रेणी के कार्टोग्राफी प्रदर्शन के लिए किया है जिसमें शुद्धता एवं स्पष्टता महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में क्या अंतर है?

(What is difference between Raster and Vector model.)



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अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज


अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुने।

1. इनमें रूपांतरित चट्टान कौन है?

(क) बेसाल्ट

(ख) चूना पत्थर

(ग) संगमरमर

(घ) ग्रेनाइट

उत्तर- (ग) संगमरमर

2. बेसाल्ट किस प्रकार की चट्टान है?

(क) अवसादी

(ख) आग्नेय

(ग) कायांतरित 

(घ) परतदार

उत्तर- (ख) आग्नेय

3. चट्टानों के रूपान्तरण में किसका योगदान होता है?

(क) तापमान

(ख) दबाव

(ग) रासायनिक द्रव्य

(घ) उपर्युक्त सभी 

उत्तर- (घ) उपर्युक्त सभी

ii. खाली जगहों को भरिए:

(क) जो चट्टान ज्वालामुखी से निकले लावा के ठंडा होने से बनती हैं वे आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं।

(ख) जिन चट्टानों में परत पायी जाती है उन्हें परतदार चट्टानें कहते है।

(ग) ज्वालामुखी से निकला गर्म पदार्थ लावा कहलाता है।

(घ) अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण चट्टानों के लक्षण बदल जाते हैं।

iii. सही मिलान कर लिखिए।

                     उत्तर

1. सेंधा नमक– अवसादी चट्टान

2. ग्रेनाइट– आग्नेय चट्टान

3. संगमरमर– रूपान्तरित चट्टान

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए?

(क) अपने घर में खनिज से बनी हुई चीजों की सूची बनाइए।
उत्तर- तराजू के पलड़े, आभूषण, सायकिल, हल का फाल, खुरपी, हसिया, पहँसुल, लालटेन।

(ख) छत की ढलाई में कौन-सा पत्थर इस्तेमाल होता है?
उत्तर- छत की ढलाई में पहाड़ों से काटकर निकाले गए पत्थरों को टुकड़े बना कर जिसे गिट्टी कहा जाता है, इस्तेमाल होता है। इन पत्थरों का रंग भूरा-स्लेटी होती है। ये आग्नेय चट्टान के उदाहरण कहे जा सकते हैं।

(ग) उन खेलों की सूची बनाइए, जिनमें पत्थरों का इस्तेमाल होता हो।
उत्तर- पत्थरों से खेलने जाने वाले कोई अधिक खेल नहीं है। हाँ, ग्रामीण क्षेत्र के बीच पत्थर के टुकड़ों से एकट-दोकट तथा सरगोटिया खेलते हैं।

(घ) पत्थरों का उपयोग कहाँ-कहाँ होता है? सूची बनाइए।
उत्तर- पत्थरों का उपयोग पहले घर, महल, कोठी और किला बनाने में होता था। वाराणसी के प्राय: सभी प्राचीन भवन पत्थर के ही बने हैं। आज भी झारखंड में पत्थरों का उपयोग घर तथा चहार-दीवारी बनाने में होता है ‘वैसे आम तौर पर सड़क बनाने, मकानों की छत बनाने तथा फर्श को पक्का करने के लिए विभिन्न आकारों के पत्थरों का उपयोग होता है।

(ड़) पता करके लिखिए कि निम्न भवन किन-किन पत्थरों से बना है- 

⇒ रोहतास गढ़ का किला- बलुआ पत्थर

⇒ लाल किला (दिल्ली)- लाल बलुआ पत्थर

⇒ पत्थर की मस्जिद (पटना)- बलुआ पत्थर

⇒ विष्णुपद मन्दिर (गया)- काला बलुआ पत्थर

⇒ आगरा का किला- लाल बलुआ पत्थर

⇒ कुतुबमीनार (दिल्ली)- बलुआ पत्थर

⇒ विशला बुद्ध मूर्ति (गया)- काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

लाल बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

बलुआ पत्थर से निर्मित मूर्ति

(च) चट्टानों के प्रकार और उनकी बनावट के बारे में लिखिए।
उत्तर- चट्टानें मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं-

1. आग्नेय चट्टान

2. अवसादी चट्टान तथा

3. रूपांतरित चट्टान।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्दर जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।

अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

रूपांतरित चट्टान- कभी-कभी आग्नेय या परतदार चट्टानों में ताप और दाब की वृद्धि होती है तो इनके रूप और गुण दोनों में बदलाव आ जाता है। रूप में अंतर के कारण ही इन्हें रूपांतरित चट्टान कहते हैं। चूना-पत्थर अपना रूप बदलकर संगमरमर में बदल जाता है। इसी प्रकार ग्रेनाइट रूपांतरित होकर नाइस बन जाता है।

(छ) चट्टान किसे कहते है? उदहारण के साथ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – पृथ्वी की पर्पटी बनाने वाले खनिज पदार्थ के किसी भी प्राकृतिक पिंड को चट्टान या शैल करते हैं। शैल विभिन्न रंग, आकार एवं गठन की हो सकती है।

जैसे- आग्नेय चट्टान- ग्रेनाइट और बेसाल्ट।

अवसादी चट्टान- चूना-पत्थर, बलुआ पत्थर।

रूपांतरित चट्टान- संगमरमर, नाइस।

(ज) चट्टानों का रूपांतरण कैसे होता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- किसी निश्चित दशाओं में एक प्रकार की शैल चक्रीय तरीके से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार एक शैल से दूसरे शैल में परिवर्तित होने की इस प्रक्रिया को शैल चक्र कहा जाता है।

              द्रवित मैग्मा ठंडा होकर ठोस आग्नेय शैल बन जाता हैं। ये आग्नेय चट्टान/शैल छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होकर अवसादी चट्टान/शैल का निर्माण करते हैं। अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण ये आग्नेय एवं अवसादी शैल पुनः कायांतरित चट्टान/शैल में बदल जाते हैं। पुनः अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण कायांतरित शैल पिघलकर द्रवित मैग्मा बन जाता है। यह द्रवित मैग्मा पुनः ठंडा होकर आग्नेय चट्टान/शैल में परिवर्तित हो जाता है।

(झ) अवसादी चट्टान तथा आग्नेय चट्टानों में अंतर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्द जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।


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अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक


अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

i. सही विकल्प को चुनें।

1. निफे में होता है-

(क) सिलिका

(ख) मैग्नेशियम

(ग) लोहा

(घ) सोना

उत्तर- (ग) लोहा

2. भू-पर्पटी में ऊपरी हिस्सा कहलाता है-

(क) सियाल

(ख) सीमा

(ग) परत

(घ) मेंटल

उत्तर- (क) सियाल

3. क्रोड है।

(क) पृथ्वी की ऊपरी परत

(ख) पृथ्वी की निचली परत

(ग) खनिज तेल

(घ) ठोस पदार्थ

उत्तर- (ख) पृथ्वी की निचली परत

ii. खाली जगहों को भरिए।

1. भू-पर्पटी को सियाल/भू-पटल भी कहा जाता है।

2. पृथ्वी के अन्दर प्रति 32 मीटर की गहारई पर तापमान 1°C  बढ़ जाता है।

3. पृथ्वी के बीच की परत को सीमा/मेंटल कहा जाता है।

iii. मिलान कीजिए:

                     उत्तर-

1. भू-पर्पटी– खनिज पदार्थ

2. सीमा– सिलिका और मैग्नेशियम

3. सियाल– सिलिका और एल्यूमिनियम

4. निफे– पदार्थ की गाढ़ी अवस्था

पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. पृथ्वी की तीनों परतों के नाम लिखिए।
उत्तर- पृथ्वी की तीनों परतों के नाम निम्नलिखित हैं:

(क) भूपर्पटी (Sial)

(ख) मेंटल (Sima) तथा

(ग) क्रोड (Nife)

2. पृथ्वी की कौन-सी परत पिघली अवस्था में रहती है? और क्यों?
उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत अर्थात क्रोड पिघली अवस्था में रहती है। इसकी पिघली अवस्था में रहने का कारण है कि यहाँ अत्यधिक ताप तथा भारी दाब रहता है। अत्यधिक ताप तथा भारी दाब के कारण इस भाग में पाई जाने वाली वस्तुएँ (निकेल तथा लोहा) पिघल जाती हैं और तरल अवस्था में बहती रहती है।

3. पृथ्वी की सबसे निचली परत में कौन-से तत्व अधिकता में पाये जाते हैं?
उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत में निकेल (Ni) तथा लोहा (Fe) तत्व अधिकता में पाये जाते हैं। लेकिन ये तत्व वहाँ ठोस अवस्था में नहीं, बल्कि तरल अवस्था में बहते रहते हैं। यह अवस्था पृथ्वी के अन्दर का ताप तथा भारी दाब के कारण हैं।

4. पाठ के आधार पर बताइए कि पृथ्वी को रत्नगर्भा क्यों कहा जाता है?
उत्तर- पृथ्वी को रत्नगर्भा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके अन्दर सोना से लेकर कोयला तथा हीरा तक बहुमूल्य खनिज पाये जाते हैं। पृथ्वी के गर्भ में खनिज तेल (किरासन, पेट्रोल, रसोई गैस), चाँदी, ताँबा, जस्ता लोहा आदि जितने बहुमूल्य खनिज हैं सब पृथ्वी के अन्दर से ही निकलते हैं। यहाँ तक कि हमारे पीने का पानी भी पृथ्वी में से या पर से ही मिलता है। इसी कारण से पृथ्वी को रत्नगर्भा कहा जाता है।

5. पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी क्यों महसूस होती है?
उत्तर- पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी इसलिये महसूस होती है क्योंकि वहाँ अत्यधिक दाब हता है। जैसे-जैसे पृथ्वी की गहराई में जाते हैं, वैसे-वैसे दाब बढ़ता जाता है। इसी दाब के कारण ताप बढ़ता जाता है और हमें गर्मी महसूस होती है।


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13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS)


भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्य (Objectives of GIS)

              भौगोलिक सूचना प्रणाली के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित प्रकार हैं-

1. योजना तथा निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाना।

2. आंकड़ों के वितरण तथा संचालन के लिए सफल साधनों की पूर्ति करना।

 3. आँकड़ा भण्डार से अनावश्यक आंकड़ों को हटाना तथा पुनरावृत्ति को करना।

4. विभिन्न स्रोतों से एकत्रित सूचनाओं को संगठित करने की क्षमता रखना।

5. अति जटिल विश्लेषण करना।

6. भौगोलिक आँकड़ों के जटिल विश्लेषणों से नई-नई सूचनाओं करना।

              जब किसी भी योजना में भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग किया जाता है तो यह हमें निम्नलिखित जातीय प्रश्नों का उत्तर देता है।

बसाव स्थिति (Location):-

          कोई भी स्थान या वस्तु कहाँ स्थित है इसका जी.आई.एस. के विश्लेषण से आसानी से प्राप्त हो जाता है। चूंकि जी.आई.एस. में उपयोग किये गये आँकड़े भौगोलिक रूप से संदर्भित होते है इसलिए किसी भी लक्ष्य की उपयुक्त बसाव स्थिति का ज्ञान इसके द्वारा किया जा सकता है। यदि कहीं पर भी यह जानना चाहे कि यहाँ क्या है तो इसका भी उत्तर शीघ्र एवं सरलता से जी.आई.एस. से प्राप्त हो जाता है।

दशा (Condition):-

         दशा से अभिप्राय यह है कि कोई वस्तु कहीं पर किन कारणों से तथा किन दशाओं में स्थित है। यहाँ पर कार्य एवं कारण का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। किसी भी लक्ष्य या वस्तु के बसाव की स्थिति की पहचान जी.आई.एस. प्रक्रिया से की जा सकती है।

प्रवृत्ति (Trend):-

           प्रवृत्ति का अर्थ है चरों का परिवर्तन। कोई भी मानचित्र तत्व घटते हुए क्रम में है या बढ़ते हुए क्रम में, इसको पुष्टि जी.आई.एस. आसानी से देता है। यहाँ तक कि क्या परिवर्तन हो रहा है इसका भी उत्तर प्राप्त हो जाता है। कोई भी चर निम्न रूपों में परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं-

(i) आकार में वृद्धि (Increase Size)

(ii) आकार में कमी तथा स्थान में परिवर्तन (Decreased size and changged position)

(iii) आकृति परिवर्तन (Change Shape)

प्रतिरूप (Pattern):-

           जी.आई.एस. के कार्यों में धरातलीय प्रतिरूप तथा अंतरसम्बन्ध महत्वपूर्ण विशेषतायें हैं। सभी मानचित्र आकृतियों में विभिन्न प्रकार के धरातलीय सम्बन्ध होते हैं। इनमें से कुछ सम्बन्धों को आँखों से आसनी से देखा जा सकता है जबकि अन्य को जानने के लिए जी.आई.एस. की आवश्यकता होती है। यहाँ समझने के लिए तीन प्रकार के सम्बन्धों को समझाया गया है-

(i) क्या किसी X आकृति में कोई प्रतिरूप है? आकृति X कुछ भी हो सकती है जैसे कि भूमि उपयोग, वनस्पति प्रकार, आवासीय विस्तार आदि। किसी साधारण मानचित्र में इनका प्रतिरूप देखा जा सकता है।

(ii) क्या X एवं Y में कोई सम्बन्ध है? हमारी आँखों यह बताने में सक्षम होती हैं कि X व Y में निकट का सम्बन्ध है या Y, X के अति निकट है। यह भी हो सकता है कि एक X से दूसरे X में Y की स्थिति में परिवर्तन एक प्रतिरूप में होता है। इन धरातलीय सम्बन्धों को समझने के लिए कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्यात्मक साहचर्य (Functional Association) को जानना अति आवश्यक है। उदाहरण के लिए यदि X व Y हमेशा साथ है तो इसका अर्थ है कि इनकी निकटता का कोई महत्वपूर्ण कारण है। इस प्रकार की जानकारियों का ज्ञान जी.आई.एस. में ढूँढा जा सकता है।

(iii) क्या अन्य धरातलीय अथवा कार्यात्मक प्रतिरूप भी अस्तित्व में है? माना कोई Z प्रकार की आकृति सीमाओं की ओर स्थित है तथा पश्चिम से पूर्व की ओर आकार में बहती है। इसका बसाव प्रतिरूप टेढ़ा-मेढ़ा है। इसका कोई कार्यात्मक कारण होता है। जी.आई.एस. इसका उत्तर ढूंढ़ने में सहायता करता है।

मॉडलिंग (Modeling):-

         ‘मॉडल’ संसार तथा इसकी प्रक्रियाओं का प्रदर्शित रुपान्तरण है। मॉडल किसी सामान्य कथन बनाने के लिए आँकड़ों या विश्लेषण का सारांश प्रस्तुत करता है। ये मॉडल ऑकड़ों के कालोहाल को कम करने तथा सामान्यीकरण को बनाने में सहायता करते हैं। आज उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार के नवीन विश्लेषण को मॉडलिंग कहते हैं।

          यहाँ पर प्रश्न किया जा सकता है कि जी.आई.एस. में ऐसा क्या है जिससे यह तकनीक अत्यधिक प्रचलित हो रही है। इसका उत्तर सक्षिप्त में इस प्रकार दिया जा सकता है।

जी.आई.एस. के विशिष्ट तथ्य

                        ⇓⇓⇓⇓

⇒ सूचनाओं की पुनर्प्राप्ति (Retrevel of Information)

⇒ टोपोलोजिकल मॉडल (Topological Model)

⇒ नेटवर्क (Network)

⇒ अंशछादन(Overlay)

⇒ आँकड़ों का निर्गमन (Data Output)  

जी.आई.एस. कैसे कार्य करता है?

(How does GIS work?)

               यहाँ पर संक्षेप में उन बिन्दुओं को उद्धरित किया गया है जिनके अंतर्गत जी.आई.एस. कार्य करता है:-

1. विभिन्न स्रोतों से सूचनाओं को सम्बद्ध करना। 

2. आँकड़ों का अभिग्रहण (Capture) करना

3. ऑकड़ों को एकीकृत (Integration) करना

4. प्रक्षेपण तथा पंजीकरण (Projection and Registration) करना

5. आँकड़ों को ढाँचा (Data Structure) तैयार करना।

आँकड़ों का विश्लेषण (Data Analysis)

            इसके अंतर्गत मुख्यतः निम्न प्रकार से आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है:-

1. साधारण जाँच (Simple Query)

2. विशेष जाँच (Spacial Query)

3. एक परतीय संचालन (Single Layer Operation)

4. जोनिंग करना (Zoning)

         यहाँ जाँच शब्द से अभिप्राय है पूछताछ करना। इस प्रणाली में हम पूछताछ के माध्यम से सूचनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कते हैं। विशेष पूछताछ निम्न प्रकार से की जाती है-

1. बहुपरतीय संचालन (Multi Layer Operation)

2. विशेष मॉडलिंग (Spacial Modeling)

3. धरातलीय विश्लेषण (Surfacial Analysis)

4. जाल विश्लेषण (Network Analysis)

5. बिन्दु प्रतिरूप विश्लेषण (Point Partem Analysis)

6. ग्रिड विश्लेषण (Grid Analysis)

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्व (Elements or Components of GIS):-

             जी.आई.एस. के प्रमुख तत्वों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:-

1. हार्डवेयर (Hardware)

2. सॉफ्टवेयर (Software)

3. आँकड़े (Data)

4. लाइफवेयर (Lifewate)

5. साँचागत संगठन (Infrastructural Organisation)

भौगोलिक सूचना प्रणाली

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्त्व

प्रश्न प्रारूप

Q. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना करें।

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS.)



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12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

(The Concept and Approaches of GIS)


जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम⇒

      जी.आई.एस. की प्रमुख संकल्पनायें इस प्रकार हैं:-

सी.पी.लो. एवं बलबर्ट के. (2005) ने जी.आई.एस. के निम्नलिखित संकल्पनायें एवं तकनीकी प्रस्तुत की हैं-

(i) आँकड़ों को उपार्जित एवं मॉडलिंग करना (Data Acquisition and Modeling)

(ii) भू-सन्दर्भित करना (Georeferencing)

(iii) आँकड़ा स्तर (Data Standard)

(iv) आँकड़ों का प्रक्रियन एवं विश्लेषण करना ( Data Processing / Analysis)

(v) कम्प्यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर (Computer Hardware and Software)

(vi) व्यवहारिक उपयोग (Application)

(vii) जी.आई.एस. प्रणाली का विकास (G.I.S. System Development)

(viii) समस्या एवं समाधान (Problem and Solution)

             इसी प्रकार कई अन्य लेखकों ने जी.आई.एस. की संकल्पनायें निम्नलिखित रूप से दी है-

(i) आँकड़ा प्राप्त करना एवं उनको प्रस्तुत करना (Data Capture and Presentation

(ii) आँकड़ा प्रबन्धन जिसके अन्तर्गत संग्रहण एवं रख-रखाव सम्मिलित है। (Data Management)

(iii) आँकड़ों का विश्लेषण एवं परिचालन करना ( Data Analysis and Manipulation)

(iv) आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण (Data Presentation)

(v) मॉडलिंग करना (Modeling)

            कुछ अन्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

1. स्थान एवं घटना विशेष की संकल्पना:-

           जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि जी.आई.एस. भौगोलिक सूचनाओं को कम्प्यूटर पर एकीकृत करता है। प्रश्न उठता है कि ये भौगोलिक घटनायें कहाँ घटित हुई हैं? इनका धरातलीय प्रतिरूप किस प्रकार प्रतीत होता है? स्थान विशेष की संकल्पना इससे सम्बन्धित है। भूगोल एक वितरण का विज्ञान है। सूचनाओं व घटनाओं का घरातलीय वितरण प्रतिरूप प्रदर्शन करने में जी.आई.एस. सबसे अधिक उपयोगी तकनीक है। किसी वस्तु अथवा घटना का धरातलीय वितरण मानचित्र के द्वारा, जी.आई.एस. के अंतर्गत सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

2. मानचित्र बाहुलता (Map Quantities)

3. घनत्व विश्लेषण (Density Analysis)

4. सूचना से सूचना संकल्पना (Concept of Data in Data)

5. सहसम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Relationship)

6. परिवर्तनशीलता की संकल्पना (Concept of Change)

7. प्रतिरूपों की संकल्पना (Concept of Pattern)

8. प्रवृत्तियों की संकल्पना (Concept of Trend)

जी.आई.एस. के भौगोलिक उपागम

(Geographical Approach of GIS)

            भूगोल एक सांसारिक विज्ञान है तथा जी.आई.एस. एक सांसारिक विज्ञान के विश्लेषण की आधुनिकतम तकनीकी है। भूगोल एवं जी.आई.एस. दोनों ही पृथ्वी के धरातल की सूचनाओं के सम्बन्ध में उपयुक्त समझ उत्पन्न करते हैं। भौगोलिक ज्ञान का उपयोग मानव क्रियाकलापों को संचालित करने में सहायक होते हैं। यहीं से भौगोलिक उपागम का आरम्भ होता है। यहाँ भौगोलिक उपागम का आशय किसी भी समस्या के समाधान के लिए एक नये तरीके की सोच विकसित करना है जो भौगोलिक सूचनाओं को एकीकृत एवं संगठित करती है जिससे पृथ्वी जैसे ग्रह के बारे में अधिकतम जानकारी प्राप्त की जा सके।

            भौगोलिक उपागम भौगोलिक ज्ञान को जागृत (Create) कर हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है। पृथ्वी का मापन (Measurement of Earth), आँकड़ों या सूचनाओं का व्यवस्थीकरण एवं विश्लेषण, विभिन्न प्रक्रियाओं का मॉडलिंग, अवयवों (Elements) में आपसी सम्बन्ध इत्यादि भौगोलिक ज्ञान के प्रमुख बिन्दु हैं जिनका अध्ययन भौगोलिक विश्लेषण के अंतर्गत कया जाता है। इतना ही नहीं भौगोलिक उपागम की विधियों हमें यह भी अनुमति प्रदान करती है कि किस प्रकार सांसारिक घटनाओं का डिजाइन योजनाबद्ध किया जा सकता है। भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-

भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण

(Steps of Geographical Approach)

1. Step 1- प्रश्न करना (Ask)

2. Step 2- उपार्जन करना (Acquire)

3. Step 3- परीक्षण करना (Examine)

4. Step 4- विश्लेषण करना (Analysis)

5. Step 5- कार्यान्वयन (Action)

Step 1 प्रश्न करना (Ask):-

              किसी भी भौगोलिक समस्या को उजागर करने से पूर्व प्रश्न उठता है कि जिस समस्या के समाधान या विश्लेषण किया जाना है या किया जा रहा है वह समस्या क्या है तथा वह भौगोलिक दृष्टि से कहाँ स्थित है? इस प्रकार के प्रश्न करने से सम्भवतः उसके उत्तर प्राप्त करने में सहायता मिल सके। यह भौगोलिक उपागम का प्रमुख कदम है। समस्या के बसाव स्थिति के अनुरूप विश्लेषण विधियों की रूपरेखा तैयार की जाती है।

Step 2-उपार्जन करना (Acquire):-

               समस्या या घटना के स्पष्टीकरण के पश्चात उसे सम्बन्धित उपयुक्त सूचनाओं की सूची निर्धारित की जाती है जिनकी विश्लेषणकर्ता को नितान्त आवश्यकता होती है। यह भी निश्चित किया जाता है कि अमुक सूचना प्राप्त की जा सकती है या जी.आई.एस. के अंतर्गत तैयार की जा सकती है। वास्तव में आंकड़ों के प्रकार एवं उनका भौगोलिक महत्त्व किसी समस्या के मूल में पहुँचने की कला व विधियों को भी स्पष्ट करने में सहायता करते हैं। यदि अध्ययन की विश्लेषण विधियाँ उच्च स्तर की हों तो वे समस्या के निदान में प्रयोग किये जाने वाले आंकड़ों की प्राप्ति में भी सहायक होते है।

             उत्कृष्ट अध्ययन विधियों के उपयोग के लिए आवश्यक है कि नये प्रकार के आकड़ों को उत्पन्न किया जाय। नये प्रकार की सूचनाओं को सूचीबद्ध करने के लिए भौगोलिक धरातलीय (Spatial) तथा अधरातलीय (Aspatial or Attribute) सूचनाओं की आवश्यकता होती है। इन सूचनाओं एवं आँकड़ों को तालिकाओं, नये प्रकार के मानचित्रों की परतों इत्यादि तरीकों से जीआईएस द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

Step3-परीक्षण करना (Examine):-

              आँकड़ों की प्राप्ति के पश्चात् अगला कदम है कि सूचनाओं या आँकड़े की उत्तमता को परखना। यह प्रयास किया जाता है कि प्राप्त किये गये आँकड़े हमारे अध्ययन के लिए अनुकूल है या नहीं। यदि उपयुक्त है तो उन्हें किस रूप में उपयोग किया जा सकता है।

           परीक्षण के अंतर्गत प्रत्यक्ष निरीक्षण, अन्वेषण (संगठित करने के तरीके), एक आँकड़ा सेट से दूसरे आँकड़ा सेट से सम्बन्ध, आँकड़ों को व्यवस्थित करने के विज्ञान के नियम (Topology) तथा आँकड़ों के प्राप्ति का स्रोत (Meta Data) इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

            कहने का अर्थ यह है कि सभी प्रकार के आँकड़ों की पुष्टि होने के पश्चात् उन्हें अध्ययन के अनुरूप व्यवस्थित किया जाता है।

Step 4- विश्लेषण करना (Analysis):-

              जीआईएस का अगला कदम, आँकड़ों अथवा सूचनाओं का परीक्षण या विश्लेषण की विधियों के आधार पर प्रक्रियन (Process) तथा व्याख्या (Analysis) करना होता है। परिणामों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है तथा परिणामों को देखकर यह तय किया जाता है कि सूचनायें जिनका प्रयोग किया गया है उपयोगी या वैधानिक है या नहीं। विभिन्न अवयवों (Parameters) के विश्लेषण करने में उपयोग की गई विधियाँ कितनी कारगर सिद्ध हुई हैं?

            इस प्रकार जी.आई.एस. मॉडलिंग की जाती है जिसके माध्यम से परिणामों के परिवर्तन सरल, शुद्ध एवं आसान बनाया जाता है, जो नये परिणाम प्रस्तुत करने में सहायक होते है कि रास्टर एवं विक्टर ऑकड़ा मॉडल इसी कदम के प्रतिफल हैं।

Step 5 कार्यान्वयन (Action):-

             भौगोलिक उपागम के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा परिणामों का प्रस्तुतीकरण एवं कार्यान्वयन करना होता है। किसी भी समस्या के परिणामों की रिपोर्ट, मानचित्रों, तालिकाओं, चारों या इन्टरनेट या वेब अथवा अन्य मुद्रित माध्यमों से प्रयोगकर्ताओं के मध्य आदान-प्रदान की जा सकती हैं। किसी भी विश्लेषण के परिणामों की प्रस्तुतीकरण के उपयुक्त साधनों की नितान्त आवश्यकता होती है। यह देखा आता है कि कौन विधि परिणामों को उपयोगकर्ता तक पहुँचाने में अति सहयोगी हो सकती है। इसके लिए सभी तरह के Audio Visual विद्युतीकरण यंत्रों से समस्या के परिणामों को आंशिक एवं पूर्ण रूप से प्रस्तुत कर उस पर कार्यान्वयन किया जाता है। कार्यान्वयन करना तथा उपयोगकर्ता द्वारा परिणामों को उपयोग में लाना ही भौगोलिक उपागम की महत्वपूर्ण कड़ी है। परिणामों के द्वारा समस्या के निदान करना ही किसी योजना की सफलता मानी जाती है।

जी. आई. एस. की संकल्पना

            उपरोक्त परिभाषायें भौगोलिक सूचना प्रणाली के विषय वस्तु तथा क्रियाकलापों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं। कभी-कभी इसे धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System) भी कहते हैं जो किसी भी स्थान विशेष पर स्थित आँकड़ों का संचालन करती है। इसी प्रकार का शब्द ‘अधरातलीय आँकड़ा’ (Aspatial Data) है। इसकी भी समान्तर रूप से लाक्षणिक आँकड़ों (Attribute Data) के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए वर्षा, तापमान, मिट्टी के रासायनिक गुण, जनसंख्या आँकड़ा इत्यादि। यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि धरातलीय आँकड़ों के संचालन के लिए कई प्रकार के तकनीक शब्द प्रयोग किये जाते हैं जिनमें कुछ इस प्रकार हैं-

(a) भू-सूचना प्रणाली (Geo-Information System-GIS)

(b) धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System-SIS)

(c) भूमि सूचना प्रणाली (Land Information System-LIS)

(d) बहु-उद्देशीय भू-आधारित प्रणाली (Multi-Purpose Cadastre-MPC)

       अंत में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “भौगोलिक सूचना प्रणाली एक कम्प्यूटर सहायता प्राप्त तंत्र है जो भौगोलिक संसार के विभिन्न पहलुओं से संबंधित आँकड़ों को एकत्र, संग्रह, विश्लेषण, परिचालन, प्रस्तुतीकरण तथा पुनर्प्रसाण करता है। यह किसी निर्णय पर पहुँचने का शक्तिशाली साधन या प्रणाली है।”

प्रश्न प्रारूप

Q. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम की विवेचना को

(Discuss the Concept and approaches of GIS.)



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7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

( Indian remote sensing satellite-IRS)


भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

                   भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह श्रृंखला का प्रथम उपग्रह IRS-1A को मार्च 1988 में सोवियत वोस्टक रॉकेट (Soviet Vostak Rocket) की सहायता से अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। इसी श्रृंखला का द्वितीय उपग्रह IRS-1B को अगस्त, 1991 को प्रक्षेपित किया गया जो अभी भी निरन्तर कार्य कर रहा है। इस पर 72.5 मीटर विभेदन के LISS-1 तथा 36.25 मीटर के LISS-2A व LISS-2B संवेदक के दो कैमरे लगे हुये हैं। ये कैमरे चार स्पैक्ट्रम बैंड 0.45 से 0.86 माइक्रोमीटर पर कार्य करते हैं। इसी प्रकार तृतीय उपग्रह IRS-1C को 28 दिसम्बर, 1995 में रूसी रॉकेट द्वारा मोलिया से प्रक्षेपित किया गया। इस पर निम्नलिखित तीन कैमरे लगे हुये थे-

(i) पेंक्रोमेटिक कैमरा (Panchromatic Camera-PAN):-

             यह एक उच्च विभेदक (5.8 मीटर) पेंक्रोमेटिक बैंड पर कार्य करता है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 70 किमी० होती है। इसमें स्टीरियोस्कोपित विम्ब देखने की क्षमता है। 

(i) LISS-3 (A Linear Imaging Self Scanning Sensor):-

           यह चार स्पेक्ट्रल बैंड पर कार्य करता है। इनमें तीन दृश्य अवरक्त स्पैक्ट्रल (VNIR) बैंड तथा एक लघु तरंग अवरक्त (SWIR) प्रभाग है। इसका भूमि विभेदन VNIR बैंड पर 23.5 मीटर तथा SWIR बैंड पर 70.5 मीटर है जिनकी स्वाथ चौड़ाई क्रमशः 41 किमी० तथा 148 किमी० है।

(iii) WIFS (A Wide Field Sensor-WIFS):-

          यह एक निम्न विभेदक (188.3 मीटर) कैमरा है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 810 किमी० है। उपग्रह में एक टेपरिकार्डर भी है जो आंकड़ों को अंकित करता है।

              चतुर्थ उपग्रह IRS-1D को 29 सितंबर 1997 को प्रक्षेपित किया गया जो IRS-1C के ही समान है। IRS-P2, तथा IRS-P1, को भारत में निर्मित PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) द्वारा क्रमश: 15 अक्टूबर, 1994 व 21 मार्च, 1996 को प्रक्षेपित किया गया। IRS-1A व 1B की ही भांति IRS-P2, में भी LISS-2 कैमरा लगा है जबकि IRS-P1 में WIFS कैमरा लगा हुआ है।

            IRS-P4, को PSLV-C2 द्वारा 26 मई, 1999 को सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में छोड़ा गया। यह अपने तरह का एक नया प्रयोग था। इस पर समुद्रीय रंगीन मोनीटर (Ocean Colour Monitor) तथा बहु आवृत्ति स्कैनिंग लघुतरंग रेडियोमीटर (Multi Frequency Scanniring Microwave Radiometer) लगे हुये हैं।

          उपग्रह नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में स्थित है। इसके अतिरिक्त लखनऊ तथा माउरीटियस उपस्टेशन भी निरन्तर आई. आर. एस. उपग्रह का प्रबोधन (Monitor) करते हैं। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (NRSA) का आंकड़ों को प्राप्त करने वाला स्टेशन हैदराबाद के पास सादनगर में स्थित है। यहां पर उपग्रह से आंकड़ों को प्राप्त कर इन्हें प्रयोग के योग्य बनाया जाता है। तत्पश्चात् हैदराबाद में NRSA द्वारा आंकड़ों को वितरित करने की सुविधा है।

           भारतीय सुदूर संवेदन प्रणाली का सबसे मुख्य आधार राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन प्रणाली (National Natural Resources Management System-NNRMS) है जो भारत के प्राकृतिक संसाधनों के आंकड़ों का प्रभावशाली ढंग से प्रबन्धन करती है। आई. आर. एस. के आंकड़ों को कई उपयोगों में लाया जाता है जैसे कि कृषि फसलों का उत्पादन अनुमान, सूखाग्रस्त क्षेत्रों का प्रबन्धन, बाढ़ क्षेत्रों का मानचित्रण, भूमि उपयोग मानचित्रण बेकार भूमि का प्रबन्धन, जल संसाधनों का प्रबन्धन, समुद्रीय संसाधनों का सर्वेक्षण, नगरीय योजनायें, खनिज संभावनायें, वन सर्वेक्षण इत्यादि।

              आई. आर. एस. आंकड़ों का अनोखा उपयोग IMSD (Intergrated Mission for Sustainable Development) है। वास्तव में IMSD के अन्तर्गत 174 जिलों को सम्मिलित किया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य उपग्रहीय तथा सामाजिक व आर्थिक धरातलीय आँकड़ों की सहायता से सतत विकास (Sustainable Development) करना है। IRS श्रृंखला के सामान्य लक्षणों तथा उनके संवेदकों की विशेषताओं को इस प्रकार नीचे देखा जा सकता है-

आई. आर. एस. श्रृंखला की कक्षीय विशेषतायें
क्षण (Features) IRS-1A/1B IRS-P2
ऊँचाई (Altitude) 904 किमी० 817 किमी०
कक्षीय काल (Orbital Period) 103.2 मिनट 101.35 मिनट
सम-सामयिक विभेदन   (Temporal Resolution)  22 दिन 24 दिन

भूमध्य रेखा पार करने का समय (Equatorial Crossing Time)

10 बजे सुबह 10 बजे सुबह
संवेदक (Sensors) LISS-1 व LISS-2 LISS-2
आई. आर. एस. 1C की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-1C
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.69
दूरी (Ditance between Adjacent Traces) 117.5 किमी०
पुनरावृत्ति (Repitative for LISS-3) 24 दिन
पुनरावृत्ति (Repitative for WIFS) 5 दिन
दृश्यालोकन (Revisit of Pan) 5 दिन
नादिर बिन्दु पर कवरेज (Coverage) 398 किमी०
स्टीरियोग्राफिक क्षमता (Stereo Coverage Capacity) 5 दिन
आई. आर. एस. P3 की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-P3
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
कक्षीय प्रकार (Orbital Period) 101.35 मिनट
भूमध्य रेखा पार करने का समय 10.30 बजे सुबह
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.73
संवेदक (Sensors) WIFS, MOS, X-Ray

          भारत ने प्रथम प्रयास 1975 से लेकर 2014 तक 73 भारतीय उपग्रहों को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया है। भारत के सभी उपग्रहों का उत्तरदायित्व भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन के अधीन है।

     भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (INSAT) को भू-तुल्यकालिक कक्षों में स्थापित किया गया है। यह प्रणाली एशिया-प्रशान्त क्षेत्र की सबसे बृहत घरेलू संचार उपग्रह प्रणाली (Domestic Communication Satellite System) है। इसे वर्ष 1983 में INSAT-B के प्रक्षेण के साथ ही स्थापित किया गया था। भारत के इतिहास में संचार सेक्टर के क्षेत्र में एक क्रांति है जो निरन्तर चल रही है। समय-समय पर इसमें कई परिवर्तन होते चले गये हैं। INSAT अन्तरिक्ष प्रणाली के अन्तर्गत 24 उपग्रह प्रक्षेपित है उनमें से 10 सफलतापूर्वक अब भी कार्यरत हैं।

भारत के प्रक्षेपणयान (India Launch Vehicles)

            भारत के प्रमुख प्रक्षेपणयान निम्नलिखित हैं-

उपग्रह प्रक्षेपणयान (Satellite Launch Vehicle – SLV-3):-

          इस क्षेत्र में भारत की क्षमता का पहला प्रदर्शन SLV-3 का निर्माण था। 1980 में SLV-3 ने अपनी सफलतम उड़ान भरी जिसने 40 किग्रा० के रोहणी उपग्रह को ध्रुवीय कक्ष के नजदीक पहुंचाया। SLV-3 की लम्बाई 22.7 मीटर है जिसकी क्षमता 17 टन वजन उठाने की है। SLV-3 के दो अन्य प्रक्षेपण मई, 1981 व अप्रैल, 1983 में सम्पन्न किये गये।

आवर्धक उपग्रह प्रक्षेपणयान (The Augmented Satellite Launch Vehicle-ASLV):-

         ASLV की प्रथम सफलता 20 मई, 1992 को प्राप्त हुई जब रोहणी उपग्रह (SROSS-C) को पृथ्वी के नजदीक कक्ष में स्थापित किया गया। ASLV के द्वारा दूसरा प्रक्षेपण 4 मई, 1994 को सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ जब SROSS-C2, उपग्रह को छोड़ा गया था। ASLV पांच अवस्थाओं वाला यान है जो 150 किलो० पेलोड (Payload) की क्षमता रखता है।

ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान (Polar Satellite Launch Vehicle-PSLV):-

              ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान के विकास में यह भारत की तीसरी सफलता थी। 21 मार्च, 1996 में PSLV की सफलता से भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि यह आई. आर. एस. उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की क्षमता रखता है। PSLV-D, द्वारा सुदूर संवेदक उपग्रह IRS-P, को 817 किमी० दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में स्थापित किया गया। PSLV-D3 को द्वितीय विकास उड़ान 15 अक्टूबर, 1994 को हुई जब IRS-P2, उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्ष में स्थापित किया गया।

              PSLV, 283 टन भार वाला 44 मीटर लम्बा यान है। यह 1000 से 1200 किग्रा भार वाले सुदूर संवेदन उपग्रह को 900 किमी० की दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में पहुंचाने की क्षमता रखता है। यह यान चार अवस्थाओं का है। इसकी पहली अवस्था 2.8 मीटर व्यास की 129 टन भारी है। इस पर एक ठोस मोदक मोटर (Solid Propellant Motor) है जिसके चारों ओर 6 मोटर जड़ी हुई हैं। 2.8 मीटर व्यास वाली दूसरी अवस्था है जो तरल इन्जन तकनीक पर आधारित है। यह 37.5 टन (Liquid Propellant) का उपयोग करता है।

             तीसरी अवस्था में 7.2 टन ठोस मोदक मोटर है तथा चौथी अवस्था में पुनः तरल मोदक की है जिसमें 2 टन मोदक है। इस पर एक संकीर्ण लूप निर्देशन प्रणाली है।

भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपणयान (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle- GSLV):-

           भारत ने भृतुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपणयान का भी निर्माण किया है जिसकी प्रक्षेपण क्षमता 2500 किग्रा० के संचार उपग्रहों को भू-स्थैतिक कक्ष में स्थापित की है। GSLV का निर्माण PSLV को परिवर्तित करके तैयार किया गया है जिस पर 6 ठोस मोदक स्ट्रैप मोटर तथा 4 तरल मोदक स्ट्रेप मोटर लगी है। इसमें PSLV की दो अन्य अवस्थाओं को बदलकर एक क्रायोजिनिक अवस्था की गई है।

भारतीय अन्तरिक्ष केन्द्र तथा इकाईयाँ (Indian Space Centers and Units):-

           भारत में अन्तरिक्ष विज्ञान के विकास एवं अनुसंधान के लिये देश के विभिन्न भागों में अन्तरिक्ष केन्द्रों की स्थापना की गई है जिनमें प्रमुख निम्न हैं-

1. विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केन्द्र (VSSC):-

             यह केन्द्र तिरुअनन्तपुरम में स्थित है। प्रक्षेपणयान के विकास तथा रॉकेट अनुसंधान में इस केन्द्र की अग्रणी भूमिका है। केन्द्र इसरो के प्रक्षेपणयान विकास प्रोजेक्ट की योजनायें तैयार कर उन्हें क्रियान्वित करता है।

2. इसरो उपग्रह केन्द्र (ISAC):-

              यह केन्द्र बंगलौर में स्थित है। यहां पर वैज्ञानिक तकनीक तथा उपयोग मिशन (Application Mission) के लिये उपग्रह प्रणाली का डिजाइन, निर्माण, परीक्षण तथा प्रबन्धन किया जाता है।

3. अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (SAC):-

          इसरो के अहमदाबाद केन्द्र पर अनुसंधान एक विकास कार्य किये जाते हैं। इनमें मुख्यतः अन्तरिक्ष तकनीक के व्यावहारिक उपयोग के लिए सोच, विचार (Conceiving), संगठन तथा निर्माण प्रणाली तैयार करना है। क्रियाकलापों का मुख्य विषय क्षेत्र उपग्रहीय संचार प्रणाली, सुदूर संवेदन, मौसम विज्ञान, ज्योडेसी इत्यादि हैं।

4. सहार केन्द्र (SHAR):-

             यह आन्ध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा में इसरो का प्रमुख प्रक्षेपण केन्द्र है। यहां पर उपग्रह प्रक्षेपण के अतिरिक्त ठोस मोदक रॉकेट मोटर का  वृहद पैमाने पर प्रक्रीयन तथा भूमि परीक्षण भी किया जाता है।

भारतीय सुदूर संवेदन उपग

अंतरिक्ष केंद्र और भारत में इकाइयाँ

5. तरल मोदक प्रणाली केन्द्र (Liquid Propulsion System Center-LPS):-

           इस प्रकार की सुविधा तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर तथा महेन्द्रगिरी (तमिलनाडु) केन्द्रों में उपलब्ध है जहां पर इसरो प्रक्षेपणयान व उपग्रह प्रोग्राम के लिये तरल मोदक प्रणाली का खाका, निर्माण तथा परीक्षण किया जाता है।

6. विकास एवं शैक्षिक संचार इकाई (Development and Educational Communication Unit-DECU):-                       

              अहमदाबाद केन्द्र आन्तरिक उपयोग प्रोग्रामों के संकल्पन (Conception), परिभाषा, योजना तथा सामाजिक आर्थिक मूल्यांकन के लिये प्रमुख हैं।

7. इसरो टेलीमेटरी, ट्रेकिंग व कमान्ड नेटवर्क (ISTRAC):-

              इसका केन्द्रीय कार्यालय तथा स्पेसक्राफ्ट नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में है। इसके भूमि नेटवर्क केन्द्र श्रीहरिकोटा, तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर, लखनऊ, पोर्टब्लेयर तथा माउरीटियस में है।

8. प्रधान नियंत्रण सुविधा (Master Control Facility- MCF):-

           कर्नाटक में स्थित हसन केन्द्र प्रक्षेपण के बाद की क्रियाओं के लिये उत्तरदायी है। विशेषकर इन्सेट उपग्रह के कक्षीय मैनुअवर (Manoeuvers) स्टेशन का रख-रखाव तथा कक्षीय संचालन इत्यादि क्रियायें हैं।

9. इसरो जड़त्व प्रणाली इकाई (ISRO Inertial Systems Unit):-

             तिरुअनन्तपुरम केन्द्र उपग्रह तथा प्रक्षेपणयान के लिये जड़त्व प्रणाली का बाहरी खाका तथा निर्माण करता है।

10. भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory-PRL):-

                यह प्रयोगशाला अन्तरिक्ष विभाग के अधीन अहमाबाद में स्थित है जो अन्तरिक्ष अनुसंधान एवं अन्य विज्ञानों के अनुसंधान का अग्रणी राष्ट्रीय केन्द्र है।

11. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (National Remote Sensing Agency-NRSA):-

                 यह केन्द्र भी अन्तरिक्ष विभाग के अधीन हैदराबाद में स्थित है। यहां पर सुदूर संवेदन उपग्रह के आंकड़ों को प्रक्रियन के पश्चात प्रयोगकर्ता तक उपलब्ध कराता है। इसके द्वारा वायु सुदूर संवेदन का संचालन भी किया जाता है।

12. राष्ट्रीय मेसोस्फीयर-स्ट्रेटोस्फीयर-ट्रोपोस्फीयर रडार सुविधा (National Mesophere Stratosphere Toposphere Radar Facilitiy):-

               इस केन्द्र पर वायुमण्डलीय विज्ञान अनुसंधान किया जाता है। अन्तरिक्ष विभाग के अधीन यह केन्द्र तिरुपति में स्थित है।

13. भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (Indian Institute of Remote Sensing- IIRS):-

               भारती सुदूर संवेदन संस्थान एक प्रमुख शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान है जो कि भारत सरकार के अन्तरिक्ष विभाग में राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेन्सी के अन्तर्गत आता है। इसकी स्थापना सुदूर संवेदन के क्षेत्र में दक्ष व्यवसायियों को विकसित करने के लिये की गई है। संस्थान का प्रमुख कार्य क्षेत्र के प्रयोगकर्ता समुदाय में तकनीक हस्तान्तरण द्वारा अपनी क्षमताओं का निर्माण करना है। यह संस्थान सुदूर संवेदन के विभिन्न उपयोगों के क्षेत्रों में डिप्लोमा एवं स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्रदान करता है। यह संस्थान देहरादून में स्थित है।

         इस संस्थान का प्रमुख मिशन सुदूर संवेदन तथा ज्योइनफारमेटिक्स के क्षेत्र में शिक्षा एवं परिशिक्षण के द्वारा व्यावसायिक श्रेष्ठता को जारी रखना तथा प्रोत्साहन करना है। इसका दूसरा उद्देश्य भूविज्ञान, मानचित्रण, प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण, पर्यावरण प्रबन्धन इत्यादि विषयों में धरातलीय अनुभवों तथा प्रयोगकर्ता के संवाद को एकीकृत करना है। इसका तीसरा महत्वपूर्ण कार्य प्राकृतिक संसाधनों के विकास तथा प्रबन्धन के लिये सामाजिक-आर्थिक सोच-विचार का ध्यान रखते हुये अन्तर विषयी अन्तरापृष्ट की स्थापना करना है।

          उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिये संस्थान में तकनीक तथा उपयोग के लिये कई विभाग हैं जो फोटोग्रामेंट्री सुदूर संवेदन, ज्योइन्फोरमेटिक्स तथा विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन को संचालित करते हैं। इनमें प्रमुख विभाग हैं-

(i) फोटोग्राफी एवं सुदूर संवेदन,

(ii) भू-विज्ञान,

(iii) कृषि एवं मृदा

(iv) जल संसाधन

(v) समुद्र विज्ञान

(vi) वन एवं पारिस्थितिकी

(vii) मानव अधिवास विश्लेषण तथा

(viii) ज्योइन्फोर्मेटिक।

प्रश्न प्रारूप

Q. भारतीय सुदूर संवेदक उपग्रह प प्रकाश डालें।

(Throw light on the Indian remote sensing satellite-IRS.)



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