Archives May 2023

11. अंकीय उच्चता मॉडल 

11. अंकीय उच्चता मॉडल 

(The Digital Elevation Model)


अंकीय उच्चता मॉडल (DEM) 

            “किसी भी धरातल के उच्चावचों की भिन्नताओं की निरन्तरता का अंकीय प्रदर्शन अंकीय च्चता मॉडल कहलाता है।” अर्थात यह उच्चावच को दर्शाने का एक कम्प्यूटर आधारित महत्वपूर्ण मॉडल है। पृथ्वी की सतह दिखाने के अलावा यह मॉडल ग्रहों एवं उपग्रहों के लिए भी प्रयोग किया जा रहा है। सामान्यतः धरातलीय विषमताओं को समोच्च रेखाओं द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

मूरे (Moore) तथा अन्य के अनुसार:-

        अंकीय उच्चता मॉडल संख्याओं का क्रमिक विन्यास है जो समुद्र तल से ऊँचाई के धरातलीय वितरण को प्रदर्शित करता है।

        अंकीय उच्चता मॉडल किसी दिये गये क्षेत्र के किसी बिन्दु की ऊँचाई का चित्रण अंकीय आकार में रखता है तथा सूचनाओं को किन्हीं कंकाल (Skeleton) रेखाओं के द्वारा एकत्र करता है। कंकाल रेखायें वे रेखायें होती हैं जो किसी ऊँचे-नीचे ढाल तथा ढाल परिवर्तन बिन्दुओं को दर्शाती है।

अंकीय भूभाग मॉडल (Digital Terrian Model)

            उच्चावच को प्रदर्शित करने के लिए DTM शब्द का भी सामान्यतः उपयोग किया जाता है। अंकीय भूभाग मॉडल (DTM) धरातलीय लक्षणों के सतही वितरण को प्रदर्शित करता है।

      अंकीय- भूभाग मॉडल (DTM), अंकीय आकार में भू-धरातलीय मानचित्र है जो केवल अंकीय उच्चता मॉडल को ही नहीं दर्शाता बल्कि भूमि उपयोग के प्रकारों, अधिवासों, सरिता रेखाओं के प्रकारों, ढालों इत्यादि को भी मॉडल के साथ दर्शाता है।

       DEM शब्द उच्चता सम्बन्धी आँकड़ों को रखने के मॉडल के रूप में प्रयोग किया जाता है जबकि भूभाग (Terrain) शब्द अक्सर भूमि सतही ऊँचाई के अतिरिक्त स्थलरूपों के लक्षणों को भी प्रदर्शित करने के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यद्यपि DEM शब्द ही सबसे पहले उच्चता मॉडल के लिए प्रयोग किया गया था तब से लगातार द्विविम सतह के ऊपर Z लक्षणों के परिवर्तनों के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

अंकीय उच्चता मॉडल की आवश्यकता (Need of Digital Elevation Model)

       अंकीय उच्चता मॉडल के कई उपयोग है। इनमें प्रमुख निम्न प्रकार से हैं:-

1. राष्ट्रीय आँकड़ा आधार प्रणाली में अंकीय भूपत्रक मानचित्रों के ऊँचाई सम्बन्धी आँकड़ों का संग्रह करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. यह सांख्यिकीय विश्लेषण तथा अलग-अलग भूभागों में तुलना करने में सहायक है।

3. DEM के द्वारा किसी भी क्षेत्र का ढाल मानचित्र, ढाल पहलू मानचित्र, भूआकृतिक विश्लेषण तथा अपरदन तथा बाह्य जल का अनुमान लगाया जा सकता हैं।

4. सामरिक उद्देश्यों के लिये भूआकृतियों का त्रिविम प्रदर्शन से किसी भूभाग का ज्ञान, हथियारों का संचालन तथा पाइलट परिशिक्षण जैसे कार्यों में DEM से सहायता मिलती है।

5. किसी भी भूभाग की डिजाइन तथा योजना तैयार करने के लिये DEM का उपयोग जाता है।

6.. इसके द्वारा विकट धरातल पर सड़क के डिजाइन में कटान तथा भरण (Cut and (Fill) जैसी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है

7. कई इन्जिनिरिंग परियोजनाओं जैसे कि बाँध, नगर, पावर लाइन तथा तकनीकि कार्यों में DEM का उपयोग सहायक होता है।

8. इनके द्वारा किसी देश के सीमा पार की दृश्यता का भी विश्लेषण किया जा सकता है।

9. DEM के साथ कई विषयी मानचित्रों जैसे कि भूमि उपयोग, मिट्टी, शैल विन्यास, भूस्खलन इत्यादि को इसके ऊपर डालकर प्रदर्शित किया जा सकता है।

10. यह किसी भूआकृति तथा भूआकृतिक प्रक्रियाओं के निम्न अनुरूपता मॉडल के लिये आँकड़े उपलब्ध कराता है।

11. इसमें किसी भी प्रदर्शित स्तर के ऊँचाई परिवर्तित करने की सुविधा उपलब्ध होती है जिससे कई तथ्यों का अनुमान लगाया जा सकता है।

अंकीय उच्चता मॉडल के विभिन्न संरचनायें (Various Structure of DEM)

         वर्तमान समय में DEM की कई प्रकार की संरचनायें प्रयोग की जाती हैं। इनमें से कोई भी पूर्ण रूप से किसी आँकड़ा संरचना की पूर्ति नहीं करते हैं। उद्देश्यों एवं कम्प्यूटर पर उपलब्धता के आधार पर निम्न उपयुक्त मॉडल प्रयोग किये जाते हैं-

1. रेखीय मॉडल (Linear Model)

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network)

3. ग्रिड जाल (Grid Network)/वर्ग संरचना (Grid Structure)

1. रेखीय मॉडल (Linear Model):-

           रेखीय मॉडल समोच्च रेखाओं के द्वारा किसी भू-भाग की ऊँचाई को प्रदर्शित करता है तथा प्रत्येक सम्मोच्च रेखा के X एवं Y निर्देशांकों के जोड़े ऊँचाई को व्यक्त करते हैं। सम्मोच्च रेखाओं से त्रिविम्ब प्रदर्शन तैयार किया जा सकता है तथा धरातलीय विशेषताओं को तब इसके ऊपर विश्लेषण किया जा सकता है।

       इन रेखाओं के द्वारा निष्कोण (Smooth) दूरी के साथ सम्मोच्च रेखाओं की अनुपातिक दूरी को सम्मिलित जाता है जो किसी भी ढाल के निष्कोणता को दर्शाता है। सम्मोच्च रेखाओं के अनुरूप एक विशेष प्रकार का दूसरा रेखीय मॉडल भी है जो सरिताओं की व्याख्या करता है तथा जिसे जल प्रवाह मॉडल में भी प्रयोग किया जाता है। जैसा कि स्पष्ट है कि किसी भी रेखीय अंकीय ग्राफ को तैयार करने के लिये भूपत्रक मानचित्रों से सम्मोच्च रेखाओं को डिजिटाइज किया जाता है। ये मानचित्र ही आँकड़ों के ऐसे स्रोत हैं जो वर्गाकार खानों के द्वारा ऊँचाई मॉडल का निर्माण करते हैं।

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network-TIN):-

         असतत त्रिभुजीकृत जाल, अंकीय उच्चता मॉडल के लिये एक प्रणाली है जिसे पीउकेर तथा अन्य (1978) के द्वारा डिजाइन किया गया है। यह प्रणाली उच्चावच मैट्रिक्स के बहुलता (Redundancies) को दूर करता है। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे टिन मॉडल कहते हैं।

        टिन एक विक्टर स्थानविज्ञान संरचना के समान है। इसके अन्तर्गत पोलीगन जाल की स्थान विज्ञान संरचना के अनुरूप प्रदर्शित किया जाता है। टिन मॉडल आँकड़ा आधार के प्रारम्भिक प्रविष्टियों के जाल का नोड (Note) बनाने में सहायक होते हैं। आँकड़ा आधार में स्थान विज्ञान के सम्बन्ध एक-दूसरे से बनाये जाते हैं। प्रत्येक नोड को प्रत्येक निकट के नोड से किसी निशान के द्वारा निर्मित किया जाता है।

         टिन मॉडल घरातल को त्रिभुजाकार समतल तत्वों में विभाजित करता है। भूभाग धरातल किसी जोड़ (नोड) द्वारा प्रतिदर्श होता है। ये धरातलीय बिन्दु भूभाग की विशेषताओं को स्थिति को दर्शाते हैं। त्रिभुजाकार आवृत्ति के तीन नोड सन्दर्भ बिन्दु होते है। इन बिन्दुओं को अन्तर्वेशन (Interpolation) विधि द्वारा बदला नहीं जा सकता है। धरातलीय प्रतिदर्श (Sampling) के अनतर्गत विशेष बिन्दुओं एवं रेखाओं को सम्मिलित किया जाता है जो कोई चोटी, गहरा भाग, ढाल रेखा जैसे कि जल विभाजक या सरिता रेखा तथा ढाल परिवर्तन रेखा को दर्शाया जाता है। ये कंकाल (Skeleton) रेखायें टिन संरचना पर किसी चाप की भाँति प्रतीत होती हैं। प्रतिचयन घनत्व भूभाग की जटिलता पर निर्भर करती है। नोड जाल के घनत्व की वृद्धि से धरातल की सही तस्वीर प्रस्तुत की जा सकती है परन्तु इसमें आँकड़ की अधिकता तथा परिकलन समय अधिक लगता है।

टिन संरचना के लाभ (Advantages of the Tin Structure)

1. टिन आँकड़ा संरचना एक संरचना है।

2. स्थानीय भूभाग की दशाओं के आवश्यकतानुसार त्रिभुजों की आकृति एवं आकार भिन्न-भिन्न होते हैं।

3. त्रिभुज के किनारों पर ढाल परिवर्तनशीलता की समाविष्टि करने में यह मॉडल सक्षम होता है।

4. टिन संरचना से कई भूभाग विशेषताओं जैसे कि ढाल, ढाल पहलू, इत्यादि का परिकलन किया जा सकता है।

टिन संरचना (TIN Structure ):-

            सबसे महत्वपूर्ण कार्य संरचना की रूप-रेखा का है। प्रश्न यह है कि किस प्रकार सम्मोच्च रेखाओं के जाल को अंकों में परिवर्तित कर आँकड़ा आधार पर रखा जाता है। यहाँ पर आँकड़ा को आँकड़ा आधार पर रखने की विधियों को प्रदर्शित किया जा रहा है। टिन को आँकड़ों आधार (Data Base) में संग्रह करने के कई तरीके हैं। गुडचाइल्ड तथा केम्प (Goodchild and Kemp, 1990) ने दो संरचनाओं को प्रस्तावित किया है जो मुख्यतः त्रिभुजों तथा नोड़ों पर आधारित है । त्रिभुज संरचना ढाल विश्लेषण के लिये दण्ड विधि है जबकि नोड संरचना सम्मोच्च रेखाओं को निर्मित करने तथा आड़ा-तिरछा करने में सरल होती है।

अंकीय उच्चता मॉडल 

अलकनंदा क्षेत्र

त्रिभुजीकरण (Traingulation):-

        टिन के निर्माण के लिये त्रिभुजाकार विधि का भी उपयोग जाता है। ग्राफ संरचना के साथ चापों एवं शीर्ष बिन्दुओं (Vertices) के उपयोग से क्षेत्र त्रिभुजों में उपविभाजित हो जाता है जिससे

(a) प्रत्येक मापन बिन्दु पर एक नोड निर्मित होता है तथा

(b) प्रत्येक त्रिभुज के अन्तर्गत तीन नोड होते हैं।

          यह विधि आन्तरिक कोण को अधिकतम बनाती है तथा त्रिभुज की लम्बी भुजा को कम से कम करती है। इसी तरीके से भिन्नतायें प्राप्त की जाती है। इस विधि में सबसे पहले थिसेन (Thiessen) पोलीगॉन की रचना की जाती है। कृत्रिम त्रिभुजीकरण, अन्तरर्वेशन रेखाओं (Interpolation Lines) जैसे कि सम्मोच्य रेखायें त्रिभुज के किनारों पर एक दूसरे से आर-पार होती हैं। यह डेलाउनाइ (Delaunay) त्रिभुजीकरण पर आधारित है।

3. वर्ग संरचना (Grid Structure):-

          वर्ग आधारित विधियाँ भी समान फैले त्रिभुजों या वर्गों के लिये प्रयोग हो सकते हैं। क्षेत्रीय तत्व तीन या चार पड़ोसी वर्ग बिन्दुओं से घिरा हुआ सेल (Cell) होता है। रास्टर आधारित जी.आई.एस. के अन्तर्गत वर्ग ग्रिड जाल का प्रयोग किया जाता है।

          ग्रिड घनत्व या सेल का आकार क्षेत्रीय विषमताओं से आवश्यक रूप से समायोजित होता है। जहाँ पर भूभाग अत्यधिक कटाफटा है वहाँ पर ग्रिड घनत्व अधिक होता है। इस प्रकार के विषय क्षेत्रों में यह अतिरिक्त पुनरावृत्ति को बढ़ाता है। एक बात विशेषकर दिमाग में यह रखनी चाहिए कि जब सेल का सापेक्षिक आकार बड़ा होता है तो भूभाग तीव्र ढाल वाला होता है। इसके लिये अधिक आँकड़ों की आवश्यकता की पूर्ति होती है।

             इस विधि का लाभ यह हैं कि इसमें आँकड़ों का संग्रह अतिसरल होता है। दूसरा इसके द्वारा DEM से कई परिकलन का निर्माण किया जा सकता है।

निष्कर्ष:

       उपरोक्त तीनों विधियों में सबसे सरल एवं प्रचलित टिन संरचना प्रमुख है। टिन संरचना पर आधारित यहाँ पर हिमालय भूभाग (अलकनंदा क्षेत्र) का एक उच्चता मॉडल तैयार किया गया है। इसमें धरातलीय विषमताओं को उजागर किया गया है। इस प्रकार के धरातलीय मॉडल किसी भूभाग के मॉडलिंग कने में सहायक होते हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. अंकीय उच्चता मॉडल पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the digital elevation model.)



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15. डिजिटल मानचित्रकला

15. डिजिटल मानचित्रकला

(Digital Cartography)



डिजिटल मानचित्रकला ⇒

          “कम्प्यूटर पर मानचित्र निर्माण या कम्प्यूटर की सहायता से मानचित्रों के निर्माण डिजिटल मानचित्रकला कहलाती है।”

          पहले तकनीकी रूप से सदृश्य मानचित्रण तकनीकि की मांग अधिक थी लेकिन यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थी। वर्तमान समय में डिजिटल मानचित्रकला के प्रकाश में आने से ऐसा नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रण कार्यों से जुड़ा हुआ है वह थोड़े से प्रशिक्षण के पश्चात् कम्प्यूटर पर मानचित्रों का निर्माण कर सकता है तथा मानचित्रों की रूप रेखा, सांकेतिक चिह्नों, रंगों इत्यादि को सुगमता से परिवर्तित कर सकता है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रों को संचालित करता है। उसको मानचित्रकला (Catrography) का आधारभूत ज्ञान होना अति आवश्यक है।

          पिछले एक या दो दशक में विद्युत तकनीकि के विकास ने वैज्ञानिक क्रियाकलापों तक की मनुष्य के प्रतिदिन के कार्यों को भी प्रभावित किया है। भूमि सर्वेक्षण जैसे व्यवसाय में तो मानचित्रकला का कोई विकल्प नहीं है। सुदूर संवेदन तथा वायुयान निर्मित संवेदकों से उपलब्ध आँकड़े डिजिटल आकार में होते हैं। तीव्रगति वाले विद्युत कम्प्यूटरों का विकास, इनकी पर्याप्त संग्रहण क्षमता, आसानी से इनका देश में उपलब्ध होना, ऑन लाइन पर अतिरिक्त सुविधायें प्राप्त होना तथा कीमत में निरन्तर ह्रास होना इत्यादि कई ऐसे कारक है जिसे कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रणाली का प्रयोग निरन्तर बढ़ा है।

            जैसा कि स्पष्ट है कि कम्प्यूटर पर कोई मानचित्र या प्रतिबिम्ब उसी रूप में संग्रह नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक आकृति को अंकों में कम्प्यूटर पर संग्रहीत किया जाता है तथा इच्छानुसार इनके द्वारा प्रतिबिम्ब या दृश्य तैयार किये जा सकते हैं। किसी मानचित्र को अंकों में संग्रह करने को भौगोलिक आँकड़े कहा जाता है। भौगोलिक आँकड़े दो प्रकार के होते धरातलीय तथा अधरातलीय। प्रायः धरातलीय आँकड़ों को बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

            अधरातलीय आँकड़े किसी बिन्दु, रेखा अथवा क्षेत्र विशेष की सूचनाओं को दर्शाते हैं। ये धरातलीय आँकड़े की विशेषताओं को बताते हैं जैसे कि किसी शहर का नाम, नदी या सड़क का नाम या किसी क्षेत्र विशेष का नाम इत्यादि। इस प्रकार धरातलीय तथा अधरातलीय आँकड़ों या सूचनाओं को कम्प्यूटर पर संग्रह किया जाता है। धरातलीय आँकड़ों को कम्प्यूटर पर प्रदर्शित करने के लिए निम्नलिखित दो कर्टोग्राफिक मॉडलों का उपयोग किया जाता है।

कार्टोग्राफिक मॉडल (Cartographic Models)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल (The Cartographic Map Model)

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल (The Geo Relational Model)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल:-

            कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल में कम्प्यूटर का स्क्रीन आकार लघु वर्गाकार आकृतियों में विभाजित होता है जिसका प्रत्येक ग्रिड सेल एरी (Array) या पिक्सल (Pixal) कहलाता है। एरी अथवा पिक्सल जितना क्षेत्रफल तय करता है वह उस मानचित्र का विभेदन (Resolution) कहलाता है। प्रत्येक ग्रिडसेल पंक्ति व कॉलम द्वारा सन्दर्भित होता है जो संख्याओं में ऑकत होता है। प्रत्येक ग्रिडसेल का अपना काम होता है जिसे आँकड़ा कहते हैं। आँकड़ों का यह रूप रास्टर संरचना (Raster Structure) कहलाता है। रास्टर संरचना में बिन्दु आकृति को एक ग्रिडरौल से, रेखीय आकृति को आस-पास के ग्रिड सेलों के अंकीय मान के क्रम द्वारा तथा क्षेत्र आकृति को आस-पास के समान या मान वाले ग्रिड सेलों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

डिजिटल मानचित्रकला

डिजिटल मानचित्रकला

 

               रास्टर प्रणाली में आँकड़ों की संग्रह क्षमता बहुत कम होती है। यही कारण है कि इस संरचना के अन्तर्गत कई प्रक्रियायें एक साथ सम्भव नहीं हो सकती है।

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल:-

             भू-सम्बन्धी मॉडल आँकड़ों के संग्रहण तथा सूचनाओं के एकीकरण की ऐसी पद्धति है जो विभिन्न (बिन्दु, रेखीय तथा क्षेत्रीय) आकृतियों को अधरातलीय सूचनाओं से जोड़ता है। उदाहरण के लिए नगर, गाँव अथवा घर की बिन्दु आकृति को उसके नाम तथा जनसंख्या के साथ दर्शाया जा सकता है। इसी प्रकार रेखीय आकृतियों में किसी सड़क को उसके नाम से तथा नदी को उसके नाम के साथ जल निस्तारण क्षमता द्वारा दर्शाया जा सकता है। अलग-अलग क्षेत्रीय आकृतियाँ को उनके नाम एवं विशेषताओं के आधार पर दर्शाया जा सकता है। उदाहरण के लिए भूमि उपयोग, शैल इकाईयाँ, मिट्टी के प्रकार तथा सिंचित असिंचित भूमि इत्यादि। भू-सम्बन्धीय आँकड़ों के लिए विक्टर आँकड़ा संरचना पद्धति सबसे प्रमुख है।

          विक्टर प्रणाली को सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किसी वस्तु अथवा आकृति की सापेक्षिक दूरी तथा विस्तार मापक के अनुसार दुरुस्त तरीके से दर्शाया जाता है। प्रत्येक भौगोलिक आकृति को X एवं Y निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

             किसी बिन्दु आकृति को एकल XY निर्देशांक के जोड़े द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जबकि रेखीय आकृतियों को दो या दो से अधिक XY निर्देशांकों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। क्षेत्रीय आकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए विक्टर संरचना में कई प्रणालियाँ प्रयोग की जाती हैं। इनमें सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला तरीका स्थान (Spagetti Representation) है जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय आकृतियों की सीमाओं को XY निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक केवल एक ही विक्टर रेखा प्रदर्शित की जाती है। क्षेत्रीय आकृति को किसी सांकेतिक चिह्न अथवा नाम से प्रदर्शित किया जाता है।

डिजिटल मानचित्रकला के तत्व (Elements of Digital Cartography):-

            सदृश्य मानचित्रकला के (Analog Cartography) प्रमुख तत्व निम्न हैं-

1. मानचित्र का मापक एवं प्रमाणिकता (Scale of Map of Accuracy)

2. मानचित्र की विषय सामग्री (Content of Map)

3. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)

4. मानचित्र की रूपरेखा (Map Layout)

5. मानचित्र सांकेतिक चिह्न (Map Symbols)

6. रंगों एवं प्रतिरूपों का प्रयोग (Use of Colours and Pattem)

7. टाइप की गई सामग्री (Typography- Lattering)

8. मानचित्रों का सामान्यीकरण (Generalization of Map)

9. मानचित्रों का संकलन (Compilation of Map)

             अब डिजिटल मानचित्रकला में निम्न तत्वों को भी सम्मिलित किया जाने लगा है-

1. आँकड़ा मॉडल (Data Model)

2. आकृतिक विशेषतायें (Features Attributes)

3. आँकड़ा सेट अनुक्रम (Data Set Lineage)

4. दृश्यिकरण (Visulization)

           मानचित्र कला के इस अनुभाग में धरातलीय सूचनाओं को कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रारूप में प्रदर्शित करने के तरीकों तथा मानचित्रों डिजाइन पर अधिक बल दिया जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं-

1. सबसे पहला उद्देश्य यह समझना है कि डिजिटल धरातलीय आँकड़ों को किस प्रकार डिजाइन किया जाता है।

2. दूसरा यह समझना है कि विभिन्न तत्वों से मानचित्रों का निर्माण कैसे किया जाय जैसा कि ये क्रम से लगे होते हैं।

3. तीसरा यह जानकारी रखना है कि मानचित्र पर प्राथमिकता के आधार पर किन तत्वों को स्थान दिया जाना चाहिए। 4. चौथा आकृतियों को शुद्धता से प्रदर्शित करने के लिए किन उपयुक्त चिह्नों का प्रयोग करना चाहिए।

मानचित्र एवं डिजिटल धरातलीय आँकड़ा आधार (Mapand Digital Spatial Data Base)

             जहाँ तक मानचित्र का सम्बन्ध है, मानचित्र धरातलीय सूचनाओं का एक दस्तावेज है। मानचित्रों को अंकीय आकार (Digital Form) में लाने के लिए इन्हें सबसे पहले डिजिटाइज करना पड़ता है तथा सूचना तत्वों के आधार पर अलग-अलग खण्डों में विभाजित किया जाता है।

Preparation of Data Design

           इस प्रक्रिया में कुछ कार्टोग्राफिक सूचनाओं को जिन्हें मनुष्य अपने दिमाग से समझता है उन्हें छोड़ दिया जाता है लेकिन कुछ आवश्यक सूचनाओं का शक्तिशाली आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है।

        धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की सबसे सरल विधि उपलब्ध मानचित्रों को डिजीटाईज करना है। इसके अलावा फोटोग्रामेटी, सुदूर संवेदन तथा धरातलीय अवलोकन विधि जिनके आधार पर आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है। डिजिटल आँकड़े सापेक्ष रूप से बिना मापक के होते हैं। प्रायः इन्हें 1:1 मापक पर रखा जाता है।

धरातलीय सूचनाओं का अंकीय आंकड़ा आधार (Digital Data Base):-

            जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है कि जी.आई.एस. में आँकड़ों को तीन रूपों में दर्शाया जाता है। ये तीन रूप बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र आकृतियाँ हैं। प्रत्येक आकृति XY को निर्देशांक की सहायता से डिजिटाइज किया जाता है।

भू-धरातलीय आँकड़ा आधार का डिजाइन (Geo-Spatial Data Base Design):-

           एक बार यदि हम आँकड़ा आधार, प्रक्षेप, विषय सामग्री तथा शुद्ध स्तर का उद्देश्य समझ जाते हैं तब निम्न दो कार्यों को सम्पन्न करने के लिए धरातलीय आँकड़ों का डिजाइन तैयार किया जाता है।

(a) जी.आई.एस. विश्लेषण के लिए भू-धरातलीय आँकड़ों को प्राकृतिक संरचना के अनुसार तैयार किया जा सकता है। (b) मानचित्रों के निर्माण तथा प्रदर्शन के लिए आँकड़ों का उपयोग अति सरल करना होता है।

डिजिटल धरातलीय आँकड़ों के निर्माण के लिए आंकड़ा मॉडलिंग (Data Modelling for Creating Digital Spatial Data):-

        डिजिटल धरातलीय आँकड़ों का ऐसा आँकड़ा मॉडल तैयार किया जाता है जो उच्च स्तर के मानचित्रों का उत्पादन कर सके तथा प्रत्येक के उपयोगकर्ता के लिए उपयोगी बन सके। जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि आँकड़ा मॉडलिंग का अर्थ आँकड़ों के संरचना की रूपरेखा तैयार करना है जिसे इन्हें सुगमता से प्रयोग किया जाए। धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की यह एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है।

आँकड़ों के मॉडलिंग डिजाइन को निम्न तीन रूपों में तैयार किया जा सकता है-

1. संकल्पनात्मक डिजाइन

2. तार्किक डिजाइन

3. भौतिक डिजाइन

1. संकल्पनात्मक डिजाइन (Conceptual Design):-

       मॉडलिंग ऐसा होना चाहिए जो धरातलीय आँकड़ों को अत्यधिक सिद्ध-परस्त बना सकें तथा जो अनुप्रयोग की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। आँकड़ों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि उनसे सरलतापूर्वक मानचित्रों का निर्माण किया जा सके।

          मानचित्रकला के आँकडे स्थान विज्ञान की दृष्टि से ढांचागत नहीं होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस रूप में हमें मानचित्र और उसमें निहित सूचनाएँ प्राप्त होती है उसी रूप में इन्हें जी.आई.एस. में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। इन्हें कम्प्यूटर वातावरण में ढालने की आवश्यकता होती है। यदि मानचित्र के प्रतिरूप को डिजिटाईज किया जाए तो इसके लिए कई प्रयास करने पड़ते हैं तब यह जी.आई.एस. के अनुरूप कार्य कर सकता है। जी.आई.एस. निर्माण हेतु आँकड़ों का डिजिटाइजेशन करने के पश्चात इनसे मानचित्र तैयार करना अति सरल हो जाता है।

        इस प्रकार स्थान विज्ञान ढाँचे के लिए संकल्पनात्मक आँकड़ा मॉडल तैयार करना आवश्यक होता है। प्रत्येक आकृति को बिन्दु (Point), रेखा (Line) या घिरे हुए क्षेत्र (Polygon) के रूप में डिजिटाईज किया जाता है।

2. तार्किक डिजाइन (Logical Design):-

         आँकड़ों का मॉडलिंग  तर्पूकर्ण तरीके से तैयार किया जाता है। इसको इतना सरल बनाया जाता है कि कोई भी मानचित्रकार या उपयोगकर्ता उसे भली-भाँति समझ सके तथा उसका उपयोग कर सके। डिजिटल आँकड़े में जी.आई.एस. में धरातलीय विश्लेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इनकी संरचना इस प्रकार तैयार की जाती है कि प्रत्येक आकृति की पहचान की जा सके। इसकी बसाव-स्थिति इस प्रकार हो कि डिजिटल आँकड़ों में उसे पृथक किया जा सके। आँकड़ों को तार्किक क्रम में संगठित किया जाता है। इसी प्रकार आँकड़ों का ढाँचा सरल एवं समझ के योग्य बनाया जाता है।

          बिन्दु, रेखा तथा आकृतियों के ज्यामितीय लक्ष्यों को निर्देशांक या निर्देशांकों (X,Y) के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यदि प्रत्येक ज्यामितीय वस्तु को किसी कोड से सम्बन्धि किया जाय तब वह उस आकृति के सम्बन्ध में जानकारी देता है जो एक ज्यामितीय आकृति है। उदाहरण के लिए कोई झील या कृषि भूमि या वन क्षेत्र किसी भी आकृति को वर्गीकृत कर कोडिंग किया जाता है।

3. भौतिक डिजाइन (Physical Design):-

         आँकड़ा संरचना का भौतिक डिजाइन कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर पर निर्भर करता है।

      कुछ कम्प्यूटर प्रणाली में आकृतियाँ प्रायः स्थानविज्ञान से जुड़ी हुई होती है। उदाहरण के लिए रंग, दबाव, स्टाइल तथा विभिन्न तल इत्यादि या आँकड़े अलग-अलग फाइलों में पृथक-पृथक किये जाते हैं जैसे कि एक सड़क के लिए, एक जंगल के लिए इत्यादि।

       आँकड़ों का दूसरा भौतिक डिजाइन आँकड़ा आधार की कड़ियाँ या कोड से सम्बंधित होते हैं। भौतिक आँकड़ा संरचना मॉडल का आधारभूत सिद्धान्त वही है जो कि डिजाइन के अन्तर्गत था। इसमें डिजिटाइजेशन इस प्रका किया जाता है कि एक आकृति को दूसरे आकृति से पृथक किया जा सके तथा सरलतापूर्वक स्वतः ही तार्किक डिजाइन में परिवर्तित हो सकें।

प्रश्न प्रारूप

Q. डिजिटल मानचित्रकला पर निबंध लिखें।

(Write on essay on digital Cartography.)



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16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

(Difference between Raster and Vector Model)


रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर ⇒

            भौगोलिक सूचनाओं के प्रतिरूपण (Modeling) में धरातलीय आँकड़ा संरचना के लिए रास्टर तथा विक्टर विधियाँ स्पष्ट रूप से अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक यह माना जाता था कि रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा सूचनायें एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा इसलिये समझा गया क्योंकि रास्टर विधि में संग्रहण तथा प्रतिविम्ब प्रक्रिया के लिये अत्यधिक कम्प्यूटर स्पेस तथा स्मृति की आवश्यकता होती थी जबकि विक्टर विधि में कम स्थान की आवश्यकता होती थी।

         रास्टर विधि में कई धरातलीय विश्लेषण अति सरल होते हैं। आँकड़ों के परिचालन में इसमें कई प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होती हैं जैसे कि पोलीगन प्रतिच्छेदन या धरातलीय सामान्यीकरण से उत्पन्न समस्या इत्यादि। रास्टर विधि द्वारा निर्मित मानचित्र अच्छे व साफ नहीं होते हैं।

           इसके विपरीत विक्टर विधि में आँकड़ा आधार बहुत उत्तम तरीके से प्रबन्धित होता है। इसके द्वारा निर्मित मानचित्र अत्यधिक परिष्कृत होते हैं। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें धरातलीय विश्लेषण नितान्त कठिन होते हैं।

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल में अंतर

रास्टर आँकड़ा मॉडल

1. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक सरल (Simple) डाटा मॉडल है।

2. रास्टर मॉडल मुख्य रूप से बसाव स्थिति (Location) को केन्द्रित करता है। 

3. रास्टर आधारित जी.आई.एस. में उपग्रही सूचनाओं को सरलतापूर्वक कम्प्यूटर पर डाला जा सकता है।

4. रास्टर मॉडल धरातलीय शुद्धता को कम करता है। इसका अर्थ है कि रास्टर मॉडल अत्यन्त सामान्यीकरण दृश्य को प्रस्तुत करता।

5. रास्टर मॉडल आकृतियों एवं धरातल के मध्य Gradual Transition दर्शाता है। उदाहरण के लिये उच्चावन्वन के साथ मिट्टियों का वर्गीकरण।

6. रास्टर मॉडल बसाव स्थिति को कार्टेशन निर्देशांक प्रणाली में प्रदर्शित करता है।

7. रास्टर मॉडल में आँकड़ों को पंक्ति एवं कालम में संग्रह किया जाता है। लेकिन टोपोलोजीकल प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती है।

8. इसमें प्रत्येक तत्व एक लक्ष्य (Object) के रूप में प्रदर्शित करता है।

9. रास्टर मॉडल में क्षेत्र या दूरियों की माप करना सरल होता है परन्तु किसी चर की माप करना अत्यन्त कठिन होता है।

10. रास्टर आँकड़ा मॉडल किसी प्रश्न का उत्तर आसानी से देता है जैसे कि भौगोलिक आकृति की बसाव स्थिति क्या है?

11. रास्टर मॉडल अत्यन्त जगह घेरता है, इसलिए आँकड़ों को सघन करके प्रयोग किया जाता है।

12. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक विक्टर की तुलना में तीव्र है।

13. रास्टर मॉडल का उपयोग धरातलीय विश्लेषण में बहुतायत में किया जाता है।

रास्टर एवं विक्टर मॉडल

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल

विक्टर आँकड़ा मॉडल

1. विक्टर मॉडल अत्यधिक जटिल आँकड़ा संरचनायुक्त मॉडल है।

2. विक्टर मॉडल भौगोलिक आकृतियों (Features) को केन्द्रित करता है?

3. विक्टर मॉडल में उपग्रह से उपलब्ध आँकड़ों को सरलता से कम्प्यूटर पर नहीं डाला जा सकता है।

4. विक्टर मॉडल किसी वस्तु या लक्ष्य की आकृति को अति शुद्धता से प्रदर्शित करता है।

5. विक्टर मॉडल में किसी वस्तु आकृति की सीमाओं को अति शुद्धता के साथ दर्शाया जाता है।

6. विक्टर मॉडल में बसाव स्थितियों को ‘x’ एवं ‘y’ निर्देशांकों प्रणाली की सहायता से दर्शाया जाता है।

7. इसमें टोपोलाजीकल प्रक्रिया अपनाई जाती है।

8. वास्तविक सांसारिक घटनाओं को जिनकी एक विशिष्ट बसाव स्थिति होती है को स्थैतिक बिन्दु, रेखा, सीमाओं एवं घिरे हुये क्षेत्र का शुद्ध अवलोकन करता है। अधिकतर लक्ष्यों के लिए विक्टर मॉडल अत्यधिक उपयुक्त है।

9. किसी भी क्षेत्र की दूरी एवं क्षेत्रफल ज्ञात करना आसान होता है।

10. विक्टर मॉडल में किसी भौगोलिक आकृति के बारे में क्या करना है। इस प्रका के प्रश्नों का स्वयं हल निकाल लेता है।

11. विक्टर मॉडल में धरातलीय आँकड़ों के संग्रह के लिये अत्यन्त कम स्थान होता है।

12. विक्टर मॉडल तीव्रता के साथ शुद्धता को भी दर्शाता है।

13. विक्टर मॉडल का उपयोग अति उच्च श्रेणी के कार्टोग्राफी प्रदर्शन के लिए किया है जिसमें शुद्धता एवं स्पष्टता महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में क्या अंतर है?

(What is difference between Raster and Vector model.)



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अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज


अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुने।

1. इनमें रूपांतरित चट्टान कौन है?

(क) बेसाल्ट

(ख) चूना पत्थर

(ग) संगमरमर

(घ) ग्रेनाइट

उत्तर- (ग) संगमरमर

2. बेसाल्ट किस प्रकार की चट्टान है?

(क) अवसादी

(ख) आग्नेय

(ग) कायांतरित 

(घ) परतदार

उत्तर- (ख) आग्नेय

3. चट्टानों के रूपान्तरण में किसका योगदान होता है?

(क) तापमान

(ख) दबाव

(ग) रासायनिक द्रव्य

(घ) उपर्युक्त सभी 

उत्तर- (घ) उपर्युक्त सभी

ii. खाली जगहों को भरिए:

(क) जो चट्टान ज्वालामुखी से निकले लावा के ठंडा होने से बनती हैं वे आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं।

(ख) जिन चट्टानों में परत पायी जाती है उन्हें परतदार चट्टानें कहते है।

(ग) ज्वालामुखी से निकला गर्म पदार्थ लावा कहलाता है।

(घ) अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण चट्टानों के लक्षण बदल जाते हैं।

iii. सही मिलान कर लिखिए।

                     उत्तर

1. सेंधा नमक– अवसादी चट्टान

2. ग्रेनाइट– आग्नेय चट्टान

3. संगमरमर– रूपान्तरित चट्टान

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए?

(क) अपने घर में खनिज से बनी हुई चीजों की सूची बनाइए।
उत्तर- तराजू के पलड़े, आभूषण, सायकिल, हल का फाल, खुरपी, हसिया, पहँसुल, लालटेन।

(ख) छत की ढलाई में कौन-सा पत्थर इस्तेमाल होता है?
उत्तर- छत की ढलाई में पहाड़ों से काटकर निकाले गए पत्थरों को टुकड़े बना कर जिसे गिट्टी कहा जाता है, इस्तेमाल होता है। इन पत्थरों का रंग भूरा-स्लेटी होती है। ये आग्नेय चट्टान के उदाहरण कहे जा सकते हैं।

(ग) उन खेलों की सूची बनाइए, जिनमें पत्थरों का इस्तेमाल होता हो।
उत्तर- पत्थरों से खेलने जाने वाले कोई अधिक खेल नहीं है। हाँ, ग्रामीण क्षेत्र के बीच पत्थर के टुकड़ों से एकट-दोकट तथा सरगोटिया खेलते हैं।

(घ) पत्थरों का उपयोग कहाँ-कहाँ होता है? सूची बनाइए।
उत्तर- पत्थरों का उपयोग पहले घर, महल, कोठी और किला बनाने में होता था। वाराणसी के प्राय: सभी प्राचीन भवन पत्थर के ही बने हैं। आज भी झारखंड में पत्थरों का उपयोग घर तथा चहार-दीवारी बनाने में होता है ‘वैसे आम तौर पर सड़क बनाने, मकानों की छत बनाने तथा फर्श को पक्का करने के लिए विभिन्न आकारों के पत्थरों का उपयोग होता है।

(ड़) पता करके लिखिए कि निम्न भवन किन-किन पत्थरों से बना है- 

⇒ रोहतास गढ़ का किला- बलुआ पत्थर

⇒ लाल किला (दिल्ली)- लाल बलुआ पत्थर

⇒ पत्थर की मस्जिद (पटना)- बलुआ पत्थर

⇒ विष्णुपद मन्दिर (गया)- काला बलुआ पत्थर

⇒ आगरा का किला- लाल बलुआ पत्थर

⇒ कुतुबमीनार (दिल्ली)- बलुआ पत्थर

⇒ विशला बुद्ध मूर्ति (गया)- काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

लाल बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

बलुआ पत्थर से निर्मित मूर्ति

(च) चट्टानों के प्रकार और उनकी बनावट के बारे में लिखिए।
उत्तर- चट्टानें मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं-

1. आग्नेय चट्टान

2. अवसादी चट्टान तथा

3. रूपांतरित चट्टान।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्दर जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।

अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

रूपांतरित चट्टान- कभी-कभी आग्नेय या परतदार चट्टानों में ताप और दाब की वृद्धि होती है तो इनके रूप और गुण दोनों में बदलाव आ जाता है। रूप में अंतर के कारण ही इन्हें रूपांतरित चट्टान कहते हैं। चूना-पत्थर अपना रूप बदलकर संगमरमर में बदल जाता है। इसी प्रकार ग्रेनाइट रूपांतरित होकर नाइस बन जाता है।

(छ) चट्टान किसे कहते है? उदहारण के साथ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – पृथ्वी की पर्पटी बनाने वाले खनिज पदार्थ के किसी भी प्राकृतिक पिंड को चट्टान या शैल करते हैं। शैल विभिन्न रंग, आकार एवं गठन की हो सकती है।

जैसे- आग्नेय चट्टान- ग्रेनाइट और बेसाल्ट।

अवसादी चट्टान- चूना-पत्थर, बलुआ पत्थर।

रूपांतरित चट्टान- संगमरमर, नाइस।

(ज) चट्टानों का रूपांतरण कैसे होता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- किसी निश्चित दशाओं में एक प्रकार की शैल चक्रीय तरीके से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार एक शैल से दूसरे शैल में परिवर्तित होने की इस प्रक्रिया को शैल चक्र कहा जाता है।

              द्रवित मैग्मा ठंडा होकर ठोस आग्नेय शैल बन जाता हैं। ये आग्नेय चट्टान/शैल छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होकर अवसादी चट्टान/शैल का निर्माण करते हैं। अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण ये आग्नेय एवं अवसादी शैल पुनः कायांतरित चट्टान/शैल में बदल जाते हैं। पुनः अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण कायांतरित शैल पिघलकर द्रवित मैग्मा बन जाता है। यह द्रवित मैग्मा पुनः ठंडा होकर आग्नेय चट्टान/शैल में परिवर्तित हो जाता है।

(झ) अवसादी चट्टान तथा आग्नेय चट्टानों में अंतर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्द जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।


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अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक


अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

i. सही विकल्प को चुनें।

1. निफे में होता है-

(क) सिलिका

(ख) मैग्नेशियम

(ग) लोहा

(घ) सोना

उत्तर- (ग) लोहा

2. भू-पर्पटी में ऊपरी हिस्सा कहलाता है-

(क) सियाल

(ख) सीमा

(ग) परत

(घ) मेंटल

उत्तर- (क) सियाल

3. क्रोड है।

(क) पृथ्वी की ऊपरी परत

(ख) पृथ्वी की निचली परत

(ग) खनिज तेल

(घ) ठोस पदार्थ

उत्तर- (ख) पृथ्वी की निचली परत

ii. खाली जगहों को भरिए।

1. भू-पर्पटी को सियाल/भू-पटल भी कहा जाता है।

2. पृथ्वी के अन्दर प्रति 32 मीटर की गहारई पर तापमान 1°C  बढ़ जाता है।

3. पृथ्वी के बीच की परत को सीमा/मेंटल कहा जाता है।

iii. मिलान कीजिए:

                     उत्तर-

1. भू-पर्पटी– खनिज पदार्थ

2. सीमा– सिलिका और मैग्नेशियम

3. सियाल– सिलिका और एल्यूमिनियम

4. निफे– पदार्थ की गाढ़ी अवस्था

पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. पृथ्वी की तीनों परतों के नाम लिखिए।
उत्तर- पृथ्वी की तीनों परतों के नाम निम्नलिखित हैं:

(क) भूपर्पटी (Sial)

(ख) मेंटल (Sima) तथा

(ग) क्रोड (Nife)

2. पृथ्वी की कौन-सी परत पिघली अवस्था में रहती है? और क्यों?
उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत अर्थात क्रोड पिघली अवस्था में रहती है। इसकी पिघली अवस्था में रहने का कारण है कि यहाँ अत्यधिक ताप तथा भारी दाब रहता है। अत्यधिक ताप तथा भारी दाब के कारण इस भाग में पाई जाने वाली वस्तुएँ (निकेल तथा लोहा) पिघल जाती हैं और तरल अवस्था में बहती रहती है।

3. पृथ्वी की सबसे निचली परत में कौन-से तत्व अधिकता में पाये जाते हैं?
उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत में निकेल (Ni) तथा लोहा (Fe) तत्व अधिकता में पाये जाते हैं। लेकिन ये तत्व वहाँ ठोस अवस्था में नहीं, बल्कि तरल अवस्था में बहते रहते हैं। यह अवस्था पृथ्वी के अन्दर का ताप तथा भारी दाब के कारण हैं।

4. पाठ के आधार पर बताइए कि पृथ्वी को रत्नगर्भा क्यों कहा जाता है?
उत्तर- पृथ्वी को रत्नगर्भा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके अन्दर सोना से लेकर कोयला तथा हीरा तक बहुमूल्य खनिज पाये जाते हैं। पृथ्वी के गर्भ में खनिज तेल (किरासन, पेट्रोल, रसोई गैस), चाँदी, ताँबा, जस्ता लोहा आदि जितने बहुमूल्य खनिज हैं सब पृथ्वी के अन्दर से ही निकलते हैं। यहाँ तक कि हमारे पीने का पानी भी पृथ्वी में से या पर से ही मिलता है। इसी कारण से पृथ्वी को रत्नगर्भा कहा जाता है।

5. पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी क्यों महसूस होती है?
उत्तर- पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी इसलिये महसूस होती है क्योंकि वहाँ अत्यधिक दाब हता है। जैसे-जैसे पृथ्वी की गहराई में जाते हैं, वैसे-वैसे दाब बढ़ता जाता है। इसी दाब के कारण ताप बढ़ता जाता है और हमें गर्मी महसूस होती है।


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13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS)


भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्य (Objectives of GIS)

              भौगोलिक सूचना प्रणाली के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित प्रकार हैं-

1. योजना तथा निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाना।

2. आंकड़ों के वितरण तथा संचालन के लिए सफल साधनों की पूर्ति करना।

 3. आँकड़ा भण्डार से अनावश्यक आंकड़ों को हटाना तथा पुनरावृत्ति को करना।

4. विभिन्न स्रोतों से एकत्रित सूचनाओं को संगठित करने की क्षमता रखना।

5. अति जटिल विश्लेषण करना।

6. भौगोलिक आँकड़ों के जटिल विश्लेषणों से नई-नई सूचनाओं करना।

              जब किसी भी योजना में भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग किया जाता है तो यह हमें निम्नलिखित जातीय प्रश्नों का उत्तर देता है।

बसाव स्थिति (Location):-

          कोई भी स्थान या वस्तु कहाँ स्थित है इसका जी.आई.एस. के विश्लेषण से आसानी से प्राप्त हो जाता है। चूंकि जी.आई.एस. में उपयोग किये गये आँकड़े भौगोलिक रूप से संदर्भित होते है इसलिए किसी भी लक्ष्य की उपयुक्त बसाव स्थिति का ज्ञान इसके द्वारा किया जा सकता है। यदि कहीं पर भी यह जानना चाहे कि यहाँ क्या है तो इसका भी उत्तर शीघ्र एवं सरलता से जी.आई.एस. से प्राप्त हो जाता है।

दशा (Condition):-

         दशा से अभिप्राय यह है कि कोई वस्तु कहीं पर किन कारणों से तथा किन दशाओं में स्थित है। यहाँ पर कार्य एवं कारण का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। किसी भी लक्ष्य या वस्तु के बसाव की स्थिति की पहचान जी.आई.एस. प्रक्रिया से की जा सकती है।

प्रवृत्ति (Trend):-

           प्रवृत्ति का अर्थ है चरों का परिवर्तन। कोई भी मानचित्र तत्व घटते हुए क्रम में है या बढ़ते हुए क्रम में, इसको पुष्टि जी.आई.एस. आसानी से देता है। यहाँ तक कि क्या परिवर्तन हो रहा है इसका भी उत्तर प्राप्त हो जाता है। कोई भी चर निम्न रूपों में परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं-

(i) आकार में वृद्धि (Increase Size)

(ii) आकार में कमी तथा स्थान में परिवर्तन (Decreased size and changged position)

(iii) आकृति परिवर्तन (Change Shape)

प्रतिरूप (Pattern):-

           जी.आई.एस. के कार्यों में धरातलीय प्रतिरूप तथा अंतरसम्बन्ध महत्वपूर्ण विशेषतायें हैं। सभी मानचित्र आकृतियों में विभिन्न प्रकार के धरातलीय सम्बन्ध होते हैं। इनमें से कुछ सम्बन्धों को आँखों से आसनी से देखा जा सकता है जबकि अन्य को जानने के लिए जी.आई.एस. की आवश्यकता होती है। यहाँ समझने के लिए तीन प्रकार के सम्बन्धों को समझाया गया है-

(i) क्या किसी X आकृति में कोई प्रतिरूप है? आकृति X कुछ भी हो सकती है जैसे कि भूमि उपयोग, वनस्पति प्रकार, आवासीय विस्तार आदि। किसी साधारण मानचित्र में इनका प्रतिरूप देखा जा सकता है।

(ii) क्या X एवं Y में कोई सम्बन्ध है? हमारी आँखों यह बताने में सक्षम होती हैं कि X व Y में निकट का सम्बन्ध है या Y, X के अति निकट है। यह भी हो सकता है कि एक X से दूसरे X में Y की स्थिति में परिवर्तन एक प्रतिरूप में होता है। इन धरातलीय सम्बन्धों को समझने के लिए कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्यात्मक साहचर्य (Functional Association) को जानना अति आवश्यक है। उदाहरण के लिए यदि X व Y हमेशा साथ है तो इसका अर्थ है कि इनकी निकटता का कोई महत्वपूर्ण कारण है। इस प्रकार की जानकारियों का ज्ञान जी.आई.एस. में ढूँढा जा सकता है।

(iii) क्या अन्य धरातलीय अथवा कार्यात्मक प्रतिरूप भी अस्तित्व में है? माना कोई Z प्रकार की आकृति सीमाओं की ओर स्थित है तथा पश्चिम से पूर्व की ओर आकार में बहती है। इसका बसाव प्रतिरूप टेढ़ा-मेढ़ा है। इसका कोई कार्यात्मक कारण होता है। जी.आई.एस. इसका उत्तर ढूंढ़ने में सहायता करता है।

मॉडलिंग (Modeling):-

         ‘मॉडल’ संसार तथा इसकी प्रक्रियाओं का प्रदर्शित रुपान्तरण है। मॉडल किसी सामान्य कथन बनाने के लिए आँकड़ों या विश्लेषण का सारांश प्रस्तुत करता है। ये मॉडल ऑकड़ों के कालोहाल को कम करने तथा सामान्यीकरण को बनाने में सहायता करते हैं। आज उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार के नवीन विश्लेषण को मॉडलिंग कहते हैं।

          यहाँ पर प्रश्न किया जा सकता है कि जी.आई.एस. में ऐसा क्या है जिससे यह तकनीक अत्यधिक प्रचलित हो रही है। इसका उत्तर सक्षिप्त में इस प्रकार दिया जा सकता है।

जी.आई.एस. के विशिष्ट तथ्य

                        ⇓⇓⇓⇓

⇒ सूचनाओं की पुनर्प्राप्ति (Retrevel of Information)

⇒ टोपोलोजिकल मॉडल (Topological Model)

⇒ नेटवर्क (Network)

⇒ अंशछादन(Overlay)

⇒ आँकड़ों का निर्गमन (Data Output)  

जी.आई.एस. कैसे कार्य करता है?

(How does GIS work?)

               यहाँ पर संक्षेप में उन बिन्दुओं को उद्धरित किया गया है जिनके अंतर्गत जी.आई.एस. कार्य करता है:-

1. विभिन्न स्रोतों से सूचनाओं को सम्बद्ध करना। 

2. आँकड़ों का अभिग्रहण (Capture) करना

3. ऑकड़ों को एकीकृत (Integration) करना

4. प्रक्षेपण तथा पंजीकरण (Projection and Registration) करना

5. आँकड़ों को ढाँचा (Data Structure) तैयार करना।

आँकड़ों का विश्लेषण (Data Analysis)

            इसके अंतर्गत मुख्यतः निम्न प्रकार से आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है:-

1. साधारण जाँच (Simple Query)

2. विशेष जाँच (Spacial Query)

3. एक परतीय संचालन (Single Layer Operation)

4. जोनिंग करना (Zoning)

         यहाँ जाँच शब्द से अभिप्राय है पूछताछ करना। इस प्रणाली में हम पूछताछ के माध्यम से सूचनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कते हैं। विशेष पूछताछ निम्न प्रकार से की जाती है-

1. बहुपरतीय संचालन (Multi Layer Operation)

2. विशेष मॉडलिंग (Spacial Modeling)

3. धरातलीय विश्लेषण (Surfacial Analysis)

4. जाल विश्लेषण (Network Analysis)

5. बिन्दु प्रतिरूप विश्लेषण (Point Partem Analysis)

6. ग्रिड विश्लेषण (Grid Analysis)

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्व (Elements or Components of GIS):-

             जी.आई.एस. के प्रमुख तत्वों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:-

1. हार्डवेयर (Hardware)

2. सॉफ्टवेयर (Software)

3. आँकड़े (Data)

4. लाइफवेयर (Lifewate)

5. साँचागत संगठन (Infrastructural Organisation)

भौगोलिक सूचना प्रणाली

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्त्व

प्रश्न प्रारूप

Q. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना करें।

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS.)



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12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

(The Concept and Approaches of GIS)


जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम⇒

      जी.आई.एस. की प्रमुख संकल्पनायें इस प्रकार हैं:-

सी.पी.लो. एवं बलबर्ट के. (2005) ने जी.आई.एस. के निम्नलिखित संकल्पनायें एवं तकनीकी प्रस्तुत की हैं-

(i) आँकड़ों को उपार्जित एवं मॉडलिंग करना (Data Acquisition and Modeling)

(ii) भू-सन्दर्भित करना (Georeferencing)

(iii) आँकड़ा स्तर (Data Standard)

(iv) आँकड़ों का प्रक्रियन एवं विश्लेषण करना ( Data Processing / Analysis)

(v) कम्प्यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर (Computer Hardware and Software)

(vi) व्यवहारिक उपयोग (Application)

(vii) जी.आई.एस. प्रणाली का विकास (G.I.S. System Development)

(viii) समस्या एवं समाधान (Problem and Solution)

             इसी प्रकार कई अन्य लेखकों ने जी.आई.एस. की संकल्पनायें निम्नलिखित रूप से दी है-

(i) आँकड़ा प्राप्त करना एवं उनको प्रस्तुत करना (Data Capture and Presentation

(ii) आँकड़ा प्रबन्धन जिसके अन्तर्गत संग्रहण एवं रख-रखाव सम्मिलित है। (Data Management)

(iii) आँकड़ों का विश्लेषण एवं परिचालन करना ( Data Analysis and Manipulation)

(iv) आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण (Data Presentation)

(v) मॉडलिंग करना (Modeling)

            कुछ अन्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

1. स्थान एवं घटना विशेष की संकल्पना:-

           जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि जी.आई.एस. भौगोलिक सूचनाओं को कम्प्यूटर पर एकीकृत करता है। प्रश्न उठता है कि ये भौगोलिक घटनायें कहाँ घटित हुई हैं? इनका धरातलीय प्रतिरूप किस प्रकार प्रतीत होता है? स्थान विशेष की संकल्पना इससे सम्बन्धित है। भूगोल एक वितरण का विज्ञान है। सूचनाओं व घटनाओं का घरातलीय वितरण प्रतिरूप प्रदर्शन करने में जी.आई.एस. सबसे अधिक उपयोगी तकनीक है। किसी वस्तु अथवा घटना का धरातलीय वितरण मानचित्र के द्वारा, जी.आई.एस. के अंतर्गत सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

2. मानचित्र बाहुलता (Map Quantities)

3. घनत्व विश्लेषण (Density Analysis)

4. सूचना से सूचना संकल्पना (Concept of Data in Data)

5. सहसम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Relationship)

6. परिवर्तनशीलता की संकल्पना (Concept of Change)

7. प्रतिरूपों की संकल्पना (Concept of Pattern)

8. प्रवृत्तियों की संकल्पना (Concept of Trend)

जी.आई.एस. के भौगोलिक उपागम

(Geographical Approach of GIS)

            भूगोल एक सांसारिक विज्ञान है तथा जी.आई.एस. एक सांसारिक विज्ञान के विश्लेषण की आधुनिकतम तकनीकी है। भूगोल एवं जी.आई.एस. दोनों ही पृथ्वी के धरातल की सूचनाओं के सम्बन्ध में उपयुक्त समझ उत्पन्न करते हैं। भौगोलिक ज्ञान का उपयोग मानव क्रियाकलापों को संचालित करने में सहायक होते हैं। यहीं से भौगोलिक उपागम का आरम्भ होता है। यहाँ भौगोलिक उपागम का आशय किसी भी समस्या के समाधान के लिए एक नये तरीके की सोच विकसित करना है जो भौगोलिक सूचनाओं को एकीकृत एवं संगठित करती है जिससे पृथ्वी जैसे ग्रह के बारे में अधिकतम जानकारी प्राप्त की जा सके।

            भौगोलिक उपागम भौगोलिक ज्ञान को जागृत (Create) कर हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है। पृथ्वी का मापन (Measurement of Earth), आँकड़ों या सूचनाओं का व्यवस्थीकरण एवं विश्लेषण, विभिन्न प्रक्रियाओं का मॉडलिंग, अवयवों (Elements) में आपसी सम्बन्ध इत्यादि भौगोलिक ज्ञान के प्रमुख बिन्दु हैं जिनका अध्ययन भौगोलिक विश्लेषण के अंतर्गत कया जाता है। इतना ही नहीं भौगोलिक उपागम की विधियों हमें यह भी अनुमति प्रदान करती है कि किस प्रकार सांसारिक घटनाओं का डिजाइन योजनाबद्ध किया जा सकता है। भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-

भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण

(Steps of Geographical Approach)

1. Step 1- प्रश्न करना (Ask)

2. Step 2- उपार्जन करना (Acquire)

3. Step 3- परीक्षण करना (Examine)

4. Step 4- विश्लेषण करना (Analysis)

5. Step 5- कार्यान्वयन (Action)

Step 1 प्रश्न करना (Ask):-

              किसी भी भौगोलिक समस्या को उजागर करने से पूर्व प्रश्न उठता है कि जिस समस्या के समाधान या विश्लेषण किया जाना है या किया जा रहा है वह समस्या क्या है तथा वह भौगोलिक दृष्टि से कहाँ स्थित है? इस प्रकार के प्रश्न करने से सम्भवतः उसके उत्तर प्राप्त करने में सहायता मिल सके। यह भौगोलिक उपागम का प्रमुख कदम है। समस्या के बसाव स्थिति के अनुरूप विश्लेषण विधियों की रूपरेखा तैयार की जाती है।

Step 2-उपार्जन करना (Acquire):-

               समस्या या घटना के स्पष्टीकरण के पश्चात उसे सम्बन्धित उपयुक्त सूचनाओं की सूची निर्धारित की जाती है जिनकी विश्लेषणकर्ता को नितान्त आवश्यकता होती है। यह भी निश्चित किया जाता है कि अमुक सूचना प्राप्त की जा सकती है या जी.आई.एस. के अंतर्गत तैयार की जा सकती है। वास्तव में आंकड़ों के प्रकार एवं उनका भौगोलिक महत्त्व किसी समस्या के मूल में पहुँचने की कला व विधियों को भी स्पष्ट करने में सहायता करते हैं। यदि अध्ययन की विश्लेषण विधियाँ उच्च स्तर की हों तो वे समस्या के निदान में प्रयोग किये जाने वाले आंकड़ों की प्राप्ति में भी सहायक होते है।

             उत्कृष्ट अध्ययन विधियों के उपयोग के लिए आवश्यक है कि नये प्रकार के आकड़ों को उत्पन्न किया जाय। नये प्रकार की सूचनाओं को सूचीबद्ध करने के लिए भौगोलिक धरातलीय (Spatial) तथा अधरातलीय (Aspatial or Attribute) सूचनाओं की आवश्यकता होती है। इन सूचनाओं एवं आँकड़ों को तालिकाओं, नये प्रकार के मानचित्रों की परतों इत्यादि तरीकों से जीआईएस द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

Step3-परीक्षण करना (Examine):-

              आँकड़ों की प्राप्ति के पश्चात् अगला कदम है कि सूचनाओं या आँकड़े की उत्तमता को परखना। यह प्रयास किया जाता है कि प्राप्त किये गये आँकड़े हमारे अध्ययन के लिए अनुकूल है या नहीं। यदि उपयुक्त है तो उन्हें किस रूप में उपयोग किया जा सकता है।

           परीक्षण के अंतर्गत प्रत्यक्ष निरीक्षण, अन्वेषण (संगठित करने के तरीके), एक आँकड़ा सेट से दूसरे आँकड़ा सेट से सम्बन्ध, आँकड़ों को व्यवस्थित करने के विज्ञान के नियम (Topology) तथा आँकड़ों के प्राप्ति का स्रोत (Meta Data) इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

            कहने का अर्थ यह है कि सभी प्रकार के आँकड़ों की पुष्टि होने के पश्चात् उन्हें अध्ययन के अनुरूप व्यवस्थित किया जाता है।

Step 4- विश्लेषण करना (Analysis):-

              जीआईएस का अगला कदम, आँकड़ों अथवा सूचनाओं का परीक्षण या विश्लेषण की विधियों के आधार पर प्रक्रियन (Process) तथा व्याख्या (Analysis) करना होता है। परिणामों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है तथा परिणामों को देखकर यह तय किया जाता है कि सूचनायें जिनका प्रयोग किया गया है उपयोगी या वैधानिक है या नहीं। विभिन्न अवयवों (Parameters) के विश्लेषण करने में उपयोग की गई विधियाँ कितनी कारगर सिद्ध हुई हैं?

            इस प्रकार जी.आई.एस. मॉडलिंग की जाती है जिसके माध्यम से परिणामों के परिवर्तन सरल, शुद्ध एवं आसान बनाया जाता है, जो नये परिणाम प्रस्तुत करने में सहायक होते है कि रास्टर एवं विक्टर ऑकड़ा मॉडल इसी कदम के प्रतिफल हैं।

Step 5 कार्यान्वयन (Action):-

             भौगोलिक उपागम के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा परिणामों का प्रस्तुतीकरण एवं कार्यान्वयन करना होता है। किसी भी समस्या के परिणामों की रिपोर्ट, मानचित्रों, तालिकाओं, चारों या इन्टरनेट या वेब अथवा अन्य मुद्रित माध्यमों से प्रयोगकर्ताओं के मध्य आदान-प्रदान की जा सकती हैं। किसी भी विश्लेषण के परिणामों की प्रस्तुतीकरण के उपयुक्त साधनों की नितान्त आवश्यकता होती है। यह देखा आता है कि कौन विधि परिणामों को उपयोगकर्ता तक पहुँचाने में अति सहयोगी हो सकती है। इसके लिए सभी तरह के Audio Visual विद्युतीकरण यंत्रों से समस्या के परिणामों को आंशिक एवं पूर्ण रूप से प्रस्तुत कर उस पर कार्यान्वयन किया जाता है। कार्यान्वयन करना तथा उपयोगकर्ता द्वारा परिणामों को उपयोग में लाना ही भौगोलिक उपागम की महत्वपूर्ण कड़ी है। परिणामों के द्वारा समस्या के निदान करना ही किसी योजना की सफलता मानी जाती है।

जी. आई. एस. की संकल्पना

            उपरोक्त परिभाषायें भौगोलिक सूचना प्रणाली के विषय वस्तु तथा क्रियाकलापों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं। कभी-कभी इसे धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System) भी कहते हैं जो किसी भी स्थान विशेष पर स्थित आँकड़ों का संचालन करती है। इसी प्रकार का शब्द ‘अधरातलीय आँकड़ा’ (Aspatial Data) है। इसकी भी समान्तर रूप से लाक्षणिक आँकड़ों (Attribute Data) के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए वर्षा, तापमान, मिट्टी के रासायनिक गुण, जनसंख्या आँकड़ा इत्यादि। यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि धरातलीय आँकड़ों के संचालन के लिए कई प्रकार के तकनीक शब्द प्रयोग किये जाते हैं जिनमें कुछ इस प्रकार हैं-

(a) भू-सूचना प्रणाली (Geo-Information System-GIS)

(b) धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System-SIS)

(c) भूमि सूचना प्रणाली (Land Information System-LIS)

(d) बहु-उद्देशीय भू-आधारित प्रणाली (Multi-Purpose Cadastre-MPC)

       अंत में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “भौगोलिक सूचना प्रणाली एक कम्प्यूटर सहायता प्राप्त तंत्र है जो भौगोलिक संसार के विभिन्न पहलुओं से संबंधित आँकड़ों को एकत्र, संग्रह, विश्लेषण, परिचालन, प्रस्तुतीकरण तथा पुनर्प्रसाण करता है। यह किसी निर्णय पर पहुँचने का शक्तिशाली साधन या प्रणाली है।”

प्रश्न प्रारूप

Q. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम की विवेचना को

(Discuss the Concept and approaches of GIS.)



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7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

( Indian remote sensing satellite-IRS)


भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

                   भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह श्रृंखला का प्रथम उपग्रह IRS-1A को मार्च 1988 में सोवियत वोस्टक रॉकेट (Soviet Vostak Rocket) की सहायता से अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। इसी श्रृंखला का द्वितीय उपग्रह IRS-1B को अगस्त, 1991 को प्रक्षेपित किया गया जो अभी भी निरन्तर कार्य कर रहा है। इस पर 72.5 मीटर विभेदन के LISS-1 तथा 36.25 मीटर के LISS-2A व LISS-2B संवेदक के दो कैमरे लगे हुये हैं। ये कैमरे चार स्पैक्ट्रम बैंड 0.45 से 0.86 माइक्रोमीटर पर कार्य करते हैं। इसी प्रकार तृतीय उपग्रह IRS-1C को 28 दिसम्बर, 1995 में रूसी रॉकेट द्वारा मोलिया से प्रक्षेपित किया गया। इस पर निम्नलिखित तीन कैमरे लगे हुये थे-

(i) पेंक्रोमेटिक कैमरा (Panchromatic Camera-PAN):-

             यह एक उच्च विभेदक (5.8 मीटर) पेंक्रोमेटिक बैंड पर कार्य करता है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 70 किमी० होती है। इसमें स्टीरियोस्कोपित विम्ब देखने की क्षमता है। 

(i) LISS-3 (A Linear Imaging Self Scanning Sensor):-

           यह चार स्पेक्ट्रल बैंड पर कार्य करता है। इनमें तीन दृश्य अवरक्त स्पैक्ट्रल (VNIR) बैंड तथा एक लघु तरंग अवरक्त (SWIR) प्रभाग है। इसका भूमि विभेदन VNIR बैंड पर 23.5 मीटर तथा SWIR बैंड पर 70.5 मीटर है जिनकी स्वाथ चौड़ाई क्रमशः 41 किमी० तथा 148 किमी० है।

(iii) WIFS (A Wide Field Sensor-WIFS):-

          यह एक निम्न विभेदक (188.3 मीटर) कैमरा है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 810 किमी० है। उपग्रह में एक टेपरिकार्डर भी है जो आंकड़ों को अंकित करता है।

              चतुर्थ उपग्रह IRS-1D को 29 सितंबर 1997 को प्रक्षेपित किया गया जो IRS-1C के ही समान है। IRS-P2, तथा IRS-P1, को भारत में निर्मित PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) द्वारा क्रमश: 15 अक्टूबर, 1994 व 21 मार्च, 1996 को प्रक्षेपित किया गया। IRS-1A व 1B की ही भांति IRS-P2, में भी LISS-2 कैमरा लगा है जबकि IRS-P1 में WIFS कैमरा लगा हुआ है।

            IRS-P4, को PSLV-C2 द्वारा 26 मई, 1999 को सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में छोड़ा गया। यह अपने तरह का एक नया प्रयोग था। इस पर समुद्रीय रंगीन मोनीटर (Ocean Colour Monitor) तथा बहु आवृत्ति स्कैनिंग लघुतरंग रेडियोमीटर (Multi Frequency Scanniring Microwave Radiometer) लगे हुये हैं।

          उपग्रह नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में स्थित है। इसके अतिरिक्त लखनऊ तथा माउरीटियस उपस्टेशन भी निरन्तर आई. आर. एस. उपग्रह का प्रबोधन (Monitor) करते हैं। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (NRSA) का आंकड़ों को प्राप्त करने वाला स्टेशन हैदराबाद के पास सादनगर में स्थित है। यहां पर उपग्रह से आंकड़ों को प्राप्त कर इन्हें प्रयोग के योग्य बनाया जाता है। तत्पश्चात् हैदराबाद में NRSA द्वारा आंकड़ों को वितरित करने की सुविधा है।

           भारतीय सुदूर संवेदन प्रणाली का सबसे मुख्य आधार राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन प्रणाली (National Natural Resources Management System-NNRMS) है जो भारत के प्राकृतिक संसाधनों के आंकड़ों का प्रभावशाली ढंग से प्रबन्धन करती है। आई. आर. एस. के आंकड़ों को कई उपयोगों में लाया जाता है जैसे कि कृषि फसलों का उत्पादन अनुमान, सूखाग्रस्त क्षेत्रों का प्रबन्धन, बाढ़ क्षेत्रों का मानचित्रण, भूमि उपयोग मानचित्रण बेकार भूमि का प्रबन्धन, जल संसाधनों का प्रबन्धन, समुद्रीय संसाधनों का सर्वेक्षण, नगरीय योजनायें, खनिज संभावनायें, वन सर्वेक्षण इत्यादि।

              आई. आर. एस. आंकड़ों का अनोखा उपयोग IMSD (Intergrated Mission for Sustainable Development) है। वास्तव में IMSD के अन्तर्गत 174 जिलों को सम्मिलित किया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य उपग्रहीय तथा सामाजिक व आर्थिक धरातलीय आँकड़ों की सहायता से सतत विकास (Sustainable Development) करना है। IRS श्रृंखला के सामान्य लक्षणों तथा उनके संवेदकों की विशेषताओं को इस प्रकार नीचे देखा जा सकता है-

आई. आर. एस. श्रृंखला की कक्षीय विशेषतायें
क्षण (Features) IRS-1A/1B IRS-P2
ऊँचाई (Altitude) 904 किमी० 817 किमी०
कक्षीय काल (Orbital Period) 103.2 मिनट 101.35 मिनट
सम-सामयिक विभेदन   (Temporal Resolution)  22 दिन 24 दिन

भूमध्य रेखा पार करने का समय (Equatorial Crossing Time)

10 बजे सुबह 10 बजे सुबह
संवेदक (Sensors) LISS-1 व LISS-2 LISS-2
आई. आर. एस. 1C की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-1C
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.69
दूरी (Ditance between Adjacent Traces) 117.5 किमी०
पुनरावृत्ति (Repitative for LISS-3) 24 दिन
पुनरावृत्ति (Repitative for WIFS) 5 दिन
दृश्यालोकन (Revisit of Pan) 5 दिन
नादिर बिन्दु पर कवरेज (Coverage) 398 किमी०
स्टीरियोग्राफिक क्षमता (Stereo Coverage Capacity) 5 दिन
आई. आर. एस. P3 की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-P3
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
कक्षीय प्रकार (Orbital Period) 101.35 मिनट
भूमध्य रेखा पार करने का समय 10.30 बजे सुबह
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.73
संवेदक (Sensors) WIFS, MOS, X-Ray

          भारत ने प्रथम प्रयास 1975 से लेकर 2014 तक 73 भारतीय उपग्रहों को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया है। भारत के सभी उपग्रहों का उत्तरदायित्व भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन के अधीन है।

     भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (INSAT) को भू-तुल्यकालिक कक्षों में स्थापित किया गया है। यह प्रणाली एशिया-प्रशान्त क्षेत्र की सबसे बृहत घरेलू संचार उपग्रह प्रणाली (Domestic Communication Satellite System) है। इसे वर्ष 1983 में INSAT-B के प्रक्षेण के साथ ही स्थापित किया गया था। भारत के इतिहास में संचार सेक्टर के क्षेत्र में एक क्रांति है जो निरन्तर चल रही है। समय-समय पर इसमें कई परिवर्तन होते चले गये हैं। INSAT अन्तरिक्ष प्रणाली के अन्तर्गत 24 उपग्रह प्रक्षेपित है उनमें से 10 सफलतापूर्वक अब भी कार्यरत हैं।

भारत के प्रक्षेपणयान (India Launch Vehicles)

            भारत के प्रमुख प्रक्षेपणयान निम्नलिखित हैं-

उपग्रह प्रक्षेपणयान (Satellite Launch Vehicle – SLV-3):-

          इस क्षेत्र में भारत की क्षमता का पहला प्रदर्शन SLV-3 का निर्माण था। 1980 में SLV-3 ने अपनी सफलतम उड़ान भरी जिसने 40 किग्रा० के रोहणी उपग्रह को ध्रुवीय कक्ष के नजदीक पहुंचाया। SLV-3 की लम्बाई 22.7 मीटर है जिसकी क्षमता 17 टन वजन उठाने की है। SLV-3 के दो अन्य प्रक्षेपण मई, 1981 व अप्रैल, 1983 में सम्पन्न किये गये।

आवर्धक उपग्रह प्रक्षेपणयान (The Augmented Satellite Launch Vehicle-ASLV):-

         ASLV की प्रथम सफलता 20 मई, 1992 को प्राप्त हुई जब रोहणी उपग्रह (SROSS-C) को पृथ्वी के नजदीक कक्ष में स्थापित किया गया। ASLV के द्वारा दूसरा प्रक्षेपण 4 मई, 1994 को सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ जब SROSS-C2, उपग्रह को छोड़ा गया था। ASLV पांच अवस्थाओं वाला यान है जो 150 किलो० पेलोड (Payload) की क्षमता रखता है।

ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान (Polar Satellite Launch Vehicle-PSLV):-

              ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान के विकास में यह भारत की तीसरी सफलता थी। 21 मार्च, 1996 में PSLV की सफलता से भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि यह आई. आर. एस. उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की क्षमता रखता है। PSLV-D, द्वारा सुदूर संवेदक उपग्रह IRS-P, को 817 किमी० दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में स्थापित किया गया। PSLV-D3 को द्वितीय विकास उड़ान 15 अक्टूबर, 1994 को हुई जब IRS-P2, उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्ष में स्थापित किया गया।

              PSLV, 283 टन भार वाला 44 मीटर लम्बा यान है। यह 1000 से 1200 किग्रा भार वाले सुदूर संवेदन उपग्रह को 900 किमी० की दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में पहुंचाने की क्षमता रखता है। यह यान चार अवस्थाओं का है। इसकी पहली अवस्था 2.8 मीटर व्यास की 129 टन भारी है। इस पर एक ठोस मोदक मोटर (Solid Propellant Motor) है जिसके चारों ओर 6 मोटर जड़ी हुई हैं। 2.8 मीटर व्यास वाली दूसरी अवस्था है जो तरल इन्जन तकनीक पर आधारित है। यह 37.5 टन (Liquid Propellant) का उपयोग करता है।

             तीसरी अवस्था में 7.2 टन ठोस मोदक मोटर है तथा चौथी अवस्था में पुनः तरल मोदक की है जिसमें 2 टन मोदक है। इस पर एक संकीर्ण लूप निर्देशन प्रणाली है।

भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपणयान (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle- GSLV):-

           भारत ने भृतुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपणयान का भी निर्माण किया है जिसकी प्रक्षेपण क्षमता 2500 किग्रा० के संचार उपग्रहों को भू-स्थैतिक कक्ष में स्थापित की है। GSLV का निर्माण PSLV को परिवर्तित करके तैयार किया गया है जिस पर 6 ठोस मोदक स्ट्रैप मोटर तथा 4 तरल मोदक स्ट्रेप मोटर लगी है। इसमें PSLV की दो अन्य अवस्थाओं को बदलकर एक क्रायोजिनिक अवस्था की गई है।

भारतीय अन्तरिक्ष केन्द्र तथा इकाईयाँ (Indian Space Centers and Units):-

           भारत में अन्तरिक्ष विज्ञान के विकास एवं अनुसंधान के लिये देश के विभिन्न भागों में अन्तरिक्ष केन्द्रों की स्थापना की गई है जिनमें प्रमुख निम्न हैं-

1. विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केन्द्र (VSSC):-

             यह केन्द्र तिरुअनन्तपुरम में स्थित है। प्रक्षेपणयान के विकास तथा रॉकेट अनुसंधान में इस केन्द्र की अग्रणी भूमिका है। केन्द्र इसरो के प्रक्षेपणयान विकास प्रोजेक्ट की योजनायें तैयार कर उन्हें क्रियान्वित करता है।

2. इसरो उपग्रह केन्द्र (ISAC):-

              यह केन्द्र बंगलौर में स्थित है। यहां पर वैज्ञानिक तकनीक तथा उपयोग मिशन (Application Mission) के लिये उपग्रह प्रणाली का डिजाइन, निर्माण, परीक्षण तथा प्रबन्धन किया जाता है।

3. अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (SAC):-

          इसरो के अहमदाबाद केन्द्र पर अनुसंधान एक विकास कार्य किये जाते हैं। इनमें मुख्यतः अन्तरिक्ष तकनीक के व्यावहारिक उपयोग के लिए सोच, विचार (Conceiving), संगठन तथा निर्माण प्रणाली तैयार करना है। क्रियाकलापों का मुख्य विषय क्षेत्र उपग्रहीय संचार प्रणाली, सुदूर संवेदन, मौसम विज्ञान, ज्योडेसी इत्यादि हैं।

4. सहार केन्द्र (SHAR):-

             यह आन्ध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा में इसरो का प्रमुख प्रक्षेपण केन्द्र है। यहां पर उपग्रह प्रक्षेपण के अतिरिक्त ठोस मोदक रॉकेट मोटर का  वृहद पैमाने पर प्रक्रीयन तथा भूमि परीक्षण भी किया जाता है।

भारतीय सुदूर संवेदन उपग

अंतरिक्ष केंद्र और भारत में इकाइयाँ

5. तरल मोदक प्रणाली केन्द्र (Liquid Propulsion System Center-LPS):-

           इस प्रकार की सुविधा तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर तथा महेन्द्रगिरी (तमिलनाडु) केन्द्रों में उपलब्ध है जहां पर इसरो प्रक्षेपणयान व उपग्रह प्रोग्राम के लिये तरल मोदक प्रणाली का खाका, निर्माण तथा परीक्षण किया जाता है।

6. विकास एवं शैक्षिक संचार इकाई (Development and Educational Communication Unit-DECU):-                       

              अहमदाबाद केन्द्र आन्तरिक उपयोग प्रोग्रामों के संकल्पन (Conception), परिभाषा, योजना तथा सामाजिक आर्थिक मूल्यांकन के लिये प्रमुख हैं।

7. इसरो टेलीमेटरी, ट्रेकिंग व कमान्ड नेटवर्क (ISTRAC):-

              इसका केन्द्रीय कार्यालय तथा स्पेसक्राफ्ट नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में है। इसके भूमि नेटवर्क केन्द्र श्रीहरिकोटा, तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर, लखनऊ, पोर्टब्लेयर तथा माउरीटियस में है।

8. प्रधान नियंत्रण सुविधा (Master Control Facility- MCF):-

           कर्नाटक में स्थित हसन केन्द्र प्रक्षेपण के बाद की क्रियाओं के लिये उत्तरदायी है। विशेषकर इन्सेट उपग्रह के कक्षीय मैनुअवर (Manoeuvers) स्टेशन का रख-रखाव तथा कक्षीय संचालन इत्यादि क्रियायें हैं।

9. इसरो जड़त्व प्रणाली इकाई (ISRO Inertial Systems Unit):-

             तिरुअनन्तपुरम केन्द्र उपग्रह तथा प्रक्षेपणयान के लिये जड़त्व प्रणाली का बाहरी खाका तथा निर्माण करता है।

10. भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory-PRL):-

                यह प्रयोगशाला अन्तरिक्ष विभाग के अधीन अहमाबाद में स्थित है जो अन्तरिक्ष अनुसंधान एवं अन्य विज्ञानों के अनुसंधान का अग्रणी राष्ट्रीय केन्द्र है।

11. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (National Remote Sensing Agency-NRSA):-

                 यह केन्द्र भी अन्तरिक्ष विभाग के अधीन हैदराबाद में स्थित है। यहां पर सुदूर संवेदन उपग्रह के आंकड़ों को प्रक्रियन के पश्चात प्रयोगकर्ता तक उपलब्ध कराता है। इसके द्वारा वायु सुदूर संवेदन का संचालन भी किया जाता है।

12. राष्ट्रीय मेसोस्फीयर-स्ट्रेटोस्फीयर-ट्रोपोस्फीयर रडार सुविधा (National Mesophere Stratosphere Toposphere Radar Facilitiy):-

               इस केन्द्र पर वायुमण्डलीय विज्ञान अनुसंधान किया जाता है। अन्तरिक्ष विभाग के अधीन यह केन्द्र तिरुपति में स्थित है।

13. भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (Indian Institute of Remote Sensing- IIRS):-

               भारती सुदूर संवेदन संस्थान एक प्रमुख शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान है जो कि भारत सरकार के अन्तरिक्ष विभाग में राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेन्सी के अन्तर्गत आता है। इसकी स्थापना सुदूर संवेदन के क्षेत्र में दक्ष व्यवसायियों को विकसित करने के लिये की गई है। संस्थान का प्रमुख कार्य क्षेत्र के प्रयोगकर्ता समुदाय में तकनीक हस्तान्तरण द्वारा अपनी क्षमताओं का निर्माण करना है। यह संस्थान सुदूर संवेदन के विभिन्न उपयोगों के क्षेत्रों में डिप्लोमा एवं स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्रदान करता है। यह संस्थान देहरादून में स्थित है।

         इस संस्थान का प्रमुख मिशन सुदूर संवेदन तथा ज्योइनफारमेटिक्स के क्षेत्र में शिक्षा एवं परिशिक्षण के द्वारा व्यावसायिक श्रेष्ठता को जारी रखना तथा प्रोत्साहन करना है। इसका दूसरा उद्देश्य भूविज्ञान, मानचित्रण, प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण, पर्यावरण प्रबन्धन इत्यादि विषयों में धरातलीय अनुभवों तथा प्रयोगकर्ता के संवाद को एकीकृत करना है। इसका तीसरा महत्वपूर्ण कार्य प्राकृतिक संसाधनों के विकास तथा प्रबन्धन के लिये सामाजिक-आर्थिक सोच-विचार का ध्यान रखते हुये अन्तर विषयी अन्तरापृष्ट की स्थापना करना है।

          उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिये संस्थान में तकनीक तथा उपयोग के लिये कई विभाग हैं जो फोटोग्रामेंट्री सुदूर संवेदन, ज्योइन्फोरमेटिक्स तथा विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन को संचालित करते हैं। इनमें प्रमुख विभाग हैं-

(i) फोटोग्राफी एवं सुदूर संवेदन,

(ii) भू-विज्ञान,

(iii) कृषि एवं मृदा

(iv) जल संसाधन

(v) समुद्र विज्ञान

(vi) वन एवं पारिस्थितिकी

(vii) मानव अधिवास विश्लेषण तथा

(viii) ज्योइन्फोर्मेटिक।

प्रश्न प्रारूप

Q. भारतीय सुदूर संवेदक उपग्रह प प्रकाश डालें।

(Throw light on the Indian remote sensing satellite-IRS.)



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6. लैण्डसेट उपग्रह

    6. लैण्डसेट उपग्रह

(Landsat Satellites)


लैण्डसेट उपग्रह

             लैंडसेट उपग्रह को भू-संसाधन तकनीक उपग्रह (Earth Resource Technology Satellite-ERTS) कहते हैं। इसको संयुक्त राज्य अमेरिका के नासा द्वारा ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया गया। ERTS-1 का प्रक्षेपण 13 जुलाई, 1972 में किया गया था जो 6 जनवरी, 1978 से कार्य करना बन्द कर दिया था। यह तितली की आकृति का 3 मीटर लम्बा तथा 1.5 मी० अर्द्धव्यास का है। इस पर 4 मीटर लम्बे सौर्य ऊर्जा पैनल लगे हुये हैं। यह एक सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह है जो भूमध्यरेखा को प्रत्येक पथ में ठीक एक समय (स्थानीय समय) पर पार करता है। लैंडसेट 1, 2 व 3 भूमध्यरेखा को सुबह 11 बजे पार करता है। सुबह के समय आसमान स्वच्छ एवं साफ रहता है जो कि सौर्य ऊर्जा के परावर्तन विशेषताओं के लिये तथा फोटोग्राफिक उपयोगों के लिये बहुत उपयुक्त होता है।

लैण्डसेट उपग्रह

लैण्डसेट उपग्रह

               संयुक्त राज्य अमेरिका के 43 राज्यों तथा 36 देशों में ERTS-1 में 300 प्रयोग किये गये थे। 22 जनवरी, 1975 को ERTS-B को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित करने से पूर्व नासा (NASA) ने ERTS प्रोग्रम का नाम बदलकर ‘लैंडसेट’ (Landsat) प्रोग्राम रख दिया। इसके क्रम में जो भी उपग्रह छोड़े गये उनका नाम लैंडसेट रखा गया। इस प्रकार पांच लैंडसेट उपग्रह सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किये गये। लैंडसेट-6, प्रक्षेपण के दौरान असफल हो गया था।

लैण्डसेट उपग्रह

लैण्डसेट उपग्रह

लैण्डसेट उपग्रह द्वारा लिया गया फोटो

लैंडसेट के उद्देश्य (Objects of Landsat):-

          लैंडसेट का प्रमुख उद्देश्य सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा बहुआयामी धरातलीय सूचनाओं को प्राप्त करना एवं इनको भू-स्थित केन्द्र (Ground Station) को भेजना है। दूसरा, प्राप्त आंकड़ों को भू-केन्द्र पर परिष्कृत कर उपयोग के योग्य तैयार करना तथा उपयोगकर्ता तक पहुँचाना है।

लैंडसेट उपग्रह की विशेषता (Characteristics of Landsat Satellite):-

             लैंडसेट उपग्रह की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं-

1. यह उपग्रह ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर (82° उ० तथा 82° द०) अन्य सम्पूर्ण पृथ्वी के सुदूर संवेदन सूचनाओं को एकत्र करने की क्षमता रखता है।

2. सभी लैंडसेट पृथ्वी का एक चक्कर 103 मिनट में लगा लेते हैं तथा एक दिन में पृथ्वी का 14 चक्कर लगाते हैं।

3. सामान्य रूप से ये भूमध्यरेखा को 9° के कोण पर पार करते हैं जहाँ पर भूमध्यरेखा से इनकी दूरी 2760 किमी० होती है।

4. इनका दृश्यांश की चौड़ाई (Swath Width) लगभग 185 किमी० हैं।

5. यहाँ प्रतिदिन के क्रमिक घुमाव के मध्य बिम्ब विस्तार (Image Coverage) में लम्बे समय का अन्तर होता है। प्रत्येक आने वाले दिन में उपग्रह का घुमाव कक्षा धीरे-धीरे पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है। इसलिये बीते हुये दिन एवं आने वाले दिन के बिम्बों में अति व्यापन (Overlap) पाया जाता है।

6. लैंडसेट 1, 2 एवं 3 सम्पूर्ण पृथ्वी को 18 दिन में तय कर लेते हैं जबकि लैंडसेट 4 व 5 पृथ्वी को 16 दिन में तय कर लेते हैं।

7. इस प्रकार एक ही क्षेत्र के प्रति 16 अथवा 18 दिनों के अन्तराल पर बिम्ब प्राप्त होते रहते हैं। एक दृश्य को एक वर्ष में उपग्रह के द्वारा 20 बार तय किया जाता है। 

8. भूमध्यरेखा प अतिव्यापक (Overlap) 14% तथा अन्य अक्षांशों पर निम्न रहता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. लैण्डसेट उपग्रह के उद्देश्य एवं विशेषताओं का वर्णन करें।

(Describe the objectives and characteristics of Landsat Satellites.)



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5. भू-स्थैतिक उपग्रह,  सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह एवं ध्रुव कक्षीय उपग्रह

5. भू-स्थैतिक उपग्रह, सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह एवं ध्रुव कक्षीय उपग्रह

(The Geostationary Satellite,  Sun-Synchronous Satellite and Polar Orbit Satellite)


भू-स्थैतिक उपग्रह, सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह एवं ध्रुव कक्षीय उपग्रह

भू-स्थैतिक उपग्रह (Geostationary Satellite):-

           भू-स्थैतिक उपग्रहों 36000 किमी० की ऊँचाई पर प्रक्षेपित किया जाता है तथा इनकी गति पृथ्वी की गति के समान होती है। इस प्रकार पृथ्वी के घूर्णन काल से मेल खाने वाले वेग से गतिमान उपग्रह को भू-स्थैतिक (Geostationary) उपग्रह कहते हैं। इनका कोणीय वेग पृथ्वी के कोणीय वेग के समान होता है। इनकी कक्षा वृत्ताकार होती है जो पश्चिम से पूर्व की ओर गति करते हुये 24 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेते हैं।

भू-स्थैतिक उपग्रह

Geostationary Orbit

              समय की इतनी ही अवधि में पृथ्वी अपने ध्रुवीय अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती हुई एक चक्कर पूरा कर लेती है। इस प्रकार पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) पथ व उपग्रह के परिक्रमण (Revolution) की दिशा तथा समय अन्तराल समान होने के कारण ये पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि इन्हें भू-स्थैतिक (Geostationary) भू-उपग्रह कहा जाता है। स्थैतिक (Stationary) होने के कारण ये सम्पूर्ण गोलार्द्धीय डिस्क को देख सकते हैं। इनका विस्तार (Coverage) 70°N से 70°S अक्षांश तक सीमित होता है तथा एक उपग्रह पृथ्वी का 1/2 भाग को ढक सकता है। समस्त पृथ्वी को तय करने के लिये तीन भू-स्थैतिक उपग्रहों की आवश्यकता होती है।

भू-स्थैतिक उपग्रह

Earth Coverage by Geostationary Satellite

             ज्योस्टेशनरी भू-उपग्रह दूर संचार सेवाओं एवं मौसम विज्ञान से सम्बन्धित जानकारियों के लिये उपयोग किये जाते हैं। वर्तमान समय में भूमध्य रेखा के ऊपर 36000 किमी० से अधिक दूरी पर भूस्थैतिक उपग्रह स्थित हैं।

प्रमुख भू-स्थैतिक (Geostationary) उपग्रह है-

(i) GOES-E (संयुक्त राज्य अमेरिका),

(ii) GOES-W (संयुक्त राज्य अमेरिका),

(iii) METEOSA (यूरोपीय अन्तरिक्ष संस्था),

(iv) GOMS (रूस),

(v) GMS (जापान) तथा

(vi) INSAT (भारत) 

सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह (Sun-Synchronous Satellite):-

              सूर्य तुल्यकालिक उपग्रहों को ध्रुवीय कक्ष के नजदीक वाले भू-उपग्रह भी कहते हैं। इनका कक्षीय पक्ष ठीक ध्रुव से न होकर ध्रुव के नजदीक से गुजरता है। अधिकतर सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह ठीक 10:30 बजे भूमध्य रेखा को पार करते हैं। इस समय सूर्य का कोण कम होता है। जिसके परिणामस्वरूप धरातलीय उच्चावच की छाया परिलक्षित होती है। दिन के अतिरिक्त सूर्य-तुल्यकालिक उपग्रह रात्रि में भी तापीय बिम्ब लेने में सक्षम होते हैं। जो भाग उपग्रह पथ के रात्रि में पड़ते हैं, उनके बिम्ब रात्रि में लिये जा सकते हैं। उनकी ऊँचाई इतनी होती है कि उपग्रह पृथ्वी के सम्पूर्ण भाग को तय कर सकता है तथा प्रत्येक अक्षांश रेखा को स्थानीय समय के अनुसार दो बार पार करता है। ध्रुवीय कक्ष में ये उपग्रह ऐसे गति करते हैं कि वे प्रत्येक बार भूमध्य रेखा को एक ही स्थानीय समय पर पार कर सकते हैं। चूँकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है इसलिये उपग्रह की कक्षा का धरातलीय मार्ग सूर्य की दिशा में अर्थात् पूर्व से पश्चिम की ओर की निरन्तर आगे बढ़ता जाता है। इस प्रकार इन भू-उपग्रहों की सहायता से निरन्तर सम्पूर्ण पृथ्वी का अवलोकन किया जा सकता है तथा ये सामयिक आधार (Periodic Basis) पर पुनरावृत्तिक (Repitative) कवरेज देते रहते हैं।

सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह

Sun-Synchronons Orbits (Landsat)

         उपरोक्त चित्र में किसी सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह की कार्यशैली को दर्शाया गया है। उपग्रह धरातल से 900 किमी० की ऊँचाई पर वृत्ताकार ध्रुवीय कक्षा में चक्कर लगाता है। उपग्रह का कक्षा पथ भूमध्य रेखा पर 98.22° का कोण बनाता है। यह 103 मिनट में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरा कर लेता है। इस प्रकार 24 घंटे में सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह पृथ्वी के 14 बार परिक्रमा करते हैं। ध्रुव कक्षीय एवं सूर्य तुल्यकालिक उपग्रहों में लेडसेट, स्पाट तथा आई. आर. एस. प्रमुख हैं।

स्वाथ (Swath):-

          यहाँ पर यह भी समझना आवश्यक है कि उपग्रह का संवेदक किस प्रकार धरातल के सफर को तय करता है। जैसे ही कोई भू-उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करता है तो संवेदक द्वारा पृथ्वी के धरातल का कुछ भाग तय किया जाता है। इस तय किये गये पट्टिका को उपग्रह का स्वाथ (Swath) कहते हैं।

          अलग-अलग भू-उपग्रहों में स्वाथ की चौड़ाई अलग-अलग 10 किमी० से 100 किमी० के मध्य रहती है। जब भू-उपग्रह जैसे कि लैण्डसेट (Landsat) पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं तो इनके संवेदक द्वारा एक बार में घरातल की 158 किमी० चौड़ी पट्टी को कवर किया जाता है। इस प्रकार एक दिन में केवल 14 पट्टियों का ही संवेदन हो पाता है तथा इन क्रमोत्तर पट्टियों के मध्य का भाग बिना कवर किये ही छूट जाता है। यह स्थिति अलग-अलग अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न होती है। भूमध्य रेखा पर दो उत्तरोत्तर परिक्रमणों के धरातलीय मार्गो के बीच की दूरी लगभग 2760 किमी० तथा 40° उ० अक्षांश पर लगभग 2100 किमी० होती है। यह दूरी उच्च अक्षांशों की ओर निरन्तर कम होती जाती है जिससे अतिव्यापन (Overlap) बढ़ता जाता है। भूमध्यरेखा पर अतिव्यापन (Overlap) की मात्रा 14% तथा 81° उत्तरी अक्षांश पर सबसे अधिक 85% होती है। संवेदन पट्टियों के निरन्तर पश्चिम की ओर खिसकने से अक्षांशों को छोड़कर पृथ्वी के शेष भागों को 18 दिन में कवर कर देता है।

स्वाथ

Swath-Area Sensed by a Satellite in One Pass

            सभी सुदूर संवेदन संसाधन उपग्रहों (Resource Satellite) को सूर्य तुल्यकालिक श्रेणी में रखा गया है। इनमें से कुछ लैण्डसेट (Landsat), स्पॉट (Spot), आई. आर. एस. (IRS), नोआ (NOAA), सीसैट (SEASAT), टीरोंस (Tiros, एच.सी.एम.एम. (HCMM), स्काइलैब (Skylab), अन्तरिक्ष सटल (Space Shuttle) इत्यादि हैं। इन भूउपग्रहों का उपयोग धरातल में अतिरिक्त आकाशीय पिण्डों को देखने के लिए भी किया जा सकता है। जिस पर वायुमण्डल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। भू-उपग्रहों द्वारा पृथ्वी का सिंहावलोकन सामयिक रूप से किया जाता है जो कम खर्च पर प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन (Management) के लिये बहुत उपयोगी होते हैं। प्रारम्भ में इनके विकास तथा निर्माण पर अत्यधिक खर्च होता था परन्तु पृथ्वी के पुनरावृत्ति सिंहावलोकन से अन्तरिक्षयान (Space Craft) सेवायें वायुयान आधारित सुदूर संवेदन की तुलना में मितव्यायी होते हैं। अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म को निम्न तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

(i) निम्न उँचाई वाले उपग्रह (Low Altitude Satellite)

(ii) अधिक ऊँचाई वाले ज्योस्टेशनरी उपग्रह (High Altitude Geostationary Satelles)

(iii) अन्तरिक्ष शटल या अन्तरिक्ष यान (Space Shuttle)

ध्रुव कक्षीय उपग्रह (Polar Orbit Satellite):-

            ध्रुव कक्षीय एक ऐसी कक्षा पथ है जो 80° से 100° कोण पर झुका रहता है। 90° से अधिक झुकाव से अभिप्राय यह है कि उपग्रह की गति (Motion) पश्चिम दिशा की ओर होना है। ऐसा इसलिये किया गया है क्योंकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है तथा पूर्व दिशा की ओर ऊर्जा की कम आवश्यकता होती है। ध्रुव कक्षीय उपग्रह सम्पूर्ण पृथ्वी का अवलोकन करने में असमर्थ होते हैं। उपग्रहों को 600 किमी० से 1000 किमी० की ऊँचाई प प्रतिनिधिक रूप से स्थापित किया जाता है

प्रश्न प्रारूप

Q. स्थैतिक उपग्रह एवं सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Geostationary Satellite and sun-synchronous tellite.)



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4. सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

4. सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

(Remote Sensing Platforms)


सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

                     प्लेटफार्म का अर्थ है कि अन्तरिक्ष में ऐसा स्थान या स्थिति जहाँ पर कैमरा या संवेदक (Sensor) लगा हुआ होता है तथा जो लक्ष्य या घरातल के किसी भाग की सूचनाओं को प्राप्त करता है। सुदूर संवेदन में प्रयोग किये जाने वाले सभी गुब्बारों, हैलीकाप्टरों, वायुयानों, अन्तरिक्ष शटल, राकेटों तथा अन्तरिक्षयानों को सुदूर संवेदन का प्लेटफार्म कहा जा सकता है।

            इनका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के आधार पर किया जाता है। सुदूर संवेदन के प्रोग्राम के उद्देश्य, संवेदक के प्रकार (Types of Sensor), प्रचालन उँचाई (Operating Height), पेलोड (Payload), प्रचालन परास (Operating Range), समय (Time), लागत (Cost) इत्यादि को ध्यान में रखकर किसी भी प्लेटफार्म का चयन किया जा सकता है।

प्लेटफार्म के प्रकार (Types of Platform)

          पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई के आधार पर सुदूर संवेदन प्लेटफार्म को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

1. भू-आधारित प्लेटफार्म (Ground Based Platform)

2. वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म (Air Based Platform)

3. अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म (Space Based Platform)

सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

1. भू-आधारित प्लेटफार्म (Ground Based Platform):-

           सुदूर संवेदन प्रणाली में धरातल पर आधारित प्लेटफार्म का उपयोग मुख्यतः धरातलीय संसाधनों के अध्ययन के लिये किया जाता है। भूमि सत्यापन द्वारा वास्तविक स्थिति से सम्बन्धित सूचनाओं को एकत्रित कर प्रयोगशाला में अध्ययन किया जाता है। इस प्लेटफार्म के अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता स्वयं घटना स्थल पर जाकर पूर्व एकत्रित सूचनाओं का सत्यापन कर नई सूचनाओं को सम्मिलित करने के पश्चात किसी परिणाम या निष्कर्ष पर पहुँचता है।

        भू-धरातल की वास्तविक सत्यता का अवलोकन एवं मापन कई प्रकार से जा किया सकता है। वायुमण्डल विज्ञान तथा जलवायु विज्ञान से सम्बन्धित घटनाओं को धरातल पर अवलोकन करना एक रोचक विषय है। इसका उपयोग तब और भी अधिक हो जाता है जब कई प्रकार की क्रियायें वायुमण्डल के 4 या 5 किलोमीटर की ऊँचाई तक घटित होती है। रडार, डॉपलर, लीडर, लघुतरंग रेडियोमीटर, डॉवसन, स्पेक्ट्रोमीटर इत्यादि कई स्थल आधारित सुदूर संवेदन के यंत्र हैं जिनका उपयोग मौसम एवं जलवायु विज्ञान की सूचनाओं को एकत्र करने के लिए किया जाता है।

2. वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म (Air Based Platform):-

          वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म का प्रयोग मुख्यतः वायु फोटोचित्रों को खींचने के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य, फोटो-विश्लेषण (Photo Interpretation) तथा फोटोग्रामेट्रिक अध्ययन करना होता है । इनको प्राप्त करने के लिये वायुयानों पर क्रमवीक्षक (Scanner) लगे होते हैं। क्रमवीक्षक की उपयोगिता एवं कार्य के परख की जाँच, वायुयान एवं उपग्रह मिसन से पूर्व भलीभाँति की जाती है। उद्देश्य एवं उपयोगिता के आधार पर क्रमवीक्षक में भिन्नतायें होती हैं। वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म को पुनः दो उप वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) गुब्बारा आधारित प्लेटफार्म (Balloon Based Plafform)

(ii) वायुयान निर्मित प्लेटफार्म (Aircraft Based Platform)

गुब्बारा आधारित प्लेटफार्म (Ballon Based Platform):-

      सुदूर संवेदन उद्देश्य की पूर्ति के लिये गुब्बारों की उपयोगिता 1900 के बाद प्रारम्भ हुई थी। सर्वप्रथम पृथ्वी के धरातल के अध्ययन के लिये गुब्बारे विकसित किए गये थे। प्रारम्भ में गुब्बारों का उपयोग विभिन्न ऊँचाइयों पर संवेदक (Sensor) की उपयोगिता प्रमाणित करने के लिये किया गया था। मौसम विज्ञान में गुब्बारों का उपयोग हवा की गति को नापने के लिये किया गया था। आजकल मौसम सम्बन्धी वायुमण्डलीय दशाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिये इन प्लेटफार्मों का काफी प्रयोग होता है। भिन्न-भिन्न आकार व आकृति के आधार पर गुब्बारा आधारित प्लेटफार्म को निम्नलिखित तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-

(a) स्वतंत्र गुब्बारे (Free Balloons),

(b) बन्धन सूत्र गुल्बारे (Tithered Balloons) तथा

(c) शक्तियुक्त गुब्बारे (Powered Balloons)।

वायुयान आधारित प्लेटफार्म (Air Based Platform):-

        विस्तृत धरातलीय दृश्य को देखने के लिये लगभग 20 मीटर की ऊंचाई से वायुयानों का उपयोग किया जाता है। हवाई सर्वेक्षण (Aerial Survey), यंत्रों के भार (Equipment Weight) तथा सर्वेक्षण लागत के आधार पर अलग-अलग प्रकार के वायु आधारित साधन प्रयोग किये जाते हैं। जैसे कि हैलीकॉप्टर, लघु वायुयान, इत्यादि जिन पर वायु कैमरे लगे रहते हैं। हवाई कैमरे अत्यधिक भारी होते हैं जो वायुयान के तल पर एक छिद्र पर जड़े होते हैं। अधिकतर वायुयान 8 किमी० से नीचे लेकिन धरातल से 500 मीटर की ऊँचाई से उड़ते हैं। प्रायः ये 150 किमी० प्रति घंटे की गति से उड़ते हैं।

      हवाई कैमरे अत्यधिक नाजुक (Sophisticated) तथा खर्चीले होते हैं। अब धीरे-धीरे इनके भार (30 किलो) एवं खर्च को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। हैलीकॉप्टर कम रफ्तार से कम ऊँचाई पर आसानी से उड़ सकता है जो अति उच्च विभेदन (Resolution) के विवरणों को प्राप्त करता है। सामान्यतः वायुयानों का प्रयोग सुदूर संवेदन के रूप में वायु फोटो चित्रों तथा क्रमवीक्षक (Scanner) बिम्बों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। वायुयान में कुछ सावधानी रखना अति आवश्यक है। वायुयान अत्यधिक स्थिर, कम्पन रहित तथा समान गति क्षमता रखने वाला होना चाहिए। ऊँचाई के आधार पर वायुयानों को वर्गीकृत किया जा सकता है। भारत में सुदूर संवेदन के उपयोग में लाये जाने वाले वायुयानों को निन्मलिखित वर्गों में बाँटा गया है-

 वायुयानों के प्रकार

वायुमान का नाम ऊँचाई (मीटर) न्यूनतम उड़ान गति (किमी प्रति घंटा)
डकोटा (Dakota) 18000-20000 240
एवरो (Avro) 25000 600
सेसना (Cessna) 29000 350
केनबरा (Canbera) 45000 360
U-2 21300 798
रॉकवेल (Rockwell) 108000 6620

          परम्परागत वायुयान के अतिरिक्त हैलीकॉप्टर, ड्रोनें (Drones), डाईरीजीबल (Dirigible) तथा सेलप्लेन (Sailplane) का उपयोग भी सुदूर संवेदन के लिये किया जाता है। टेलीविजन तथा फोटोग्राफी (कम ऊंचाई से) में इनका विशेष प्रयोग होता है।

वायु-आधारित सुदूर संवेदन प्रणली के यन्त्र

            भारत में वायुयान आधारित सुदूर संवेदन प्रणाली के निम्न यंत्र हैं जिनको सर्वहित सम्वन्धी उपयोगों में लाया जाता है।

(i) समुद्रीय रंगीन रेडियोमीटर (Ocean Colour Radiometer)

(ii) मॉड्लर बहु स्पेक्ट्रल क्रमवीक्षक (Modular Multispectural Scanner)

(iii) इसरो-एम. एस. एस. (ISRO MISS)

(iv) कैमरा (Camera)

कैमरा (Camera)-

          लघु आकार की फोटोग्राफी के लिये विभिन्न प्रकार के वायु कैमरे प्रयोग में लाये जाते हैं। विभिन्न ऊंचाइयों से प्राप्त वायव चित्रों को स्टीरियो मॉडल पर देखा जा सकता है। दृश्य प्रभाग (Visible) तथा अवरक्त (Infrared) स्पैक्ट्रम बैंड के अन्तर्गत विभिन्न फिल्टर तथा फिल्मों का उपयोग वायु फोटोग्राफी के लिये किया जाता है। अवरक्त (Infrared) श्याम और श्वेत रंग की फिल्में, रंगीन एवं श्याम श्वेत फोटोग्राफी के लिये की जाती है। इस प्रकार के फोटोचित्रों को देखकर विश्लेषण किया जा सकता है। वायु फोटोग्राफी के लिये निम्न प्रकार के कैमरों का उपयोग किया जाता है:-

(i) हैसलब्लेड- 70 मिलीमीटर फिल्म (श्याम व श्वेत एवं रंगीन)

(ii) निकोन, कैमरा इत्यादि- 35 मिलीमीटर फिल्म

(iii) मैट्रिक कैमरा- 9 इंच फिल्म (श्याम व श्वेत, रंगीन, अवरक्त इत्यादि)

हवाई सर्वेक्षण मिशन (Aerial Survey Mission):-

              यहाँ पर मिशन से अभिप्राय हवाई सर्वेक्षण कार्य को सम्पन्न कराने से है। आधुनिक वायुजन्मित संवेदक प्रणाली में उच्च भेदन के जी. पी. एस. रिसीवर लगे होते हैं तथा कुछ पर आई.एम.यू. (I.M.U.)। जी.पी.ए. का उपयोग नौकायन एवं संवेदक की स्थिति निर्धारण के लिये किया जाता है। सर्वेक्षण कार्य कैमरे के उदभासन स्टेशन के लिये तथा किसी आकृति के विम्ब की धरातल पर जानने लिये निर्देशांकों की आवश्यकता होती है। इस कार्य के लिये वायुयान के 30 किमी० के दाररे में जी.पी.एस. स्टेशन के सन्दर्भ की आवश्यकता होती है।

            IMU (Inertial Measuring Unit) के दो प्रमुख लाभ हैं-

(i) IMU द्वारा दी गई गणना का उपयोग, जी.पी.एस. द्वारा लिये गये निर्देशांकों में सुधार के लिये किया जा सकता है।

(ii) IMU संवेदक का कोण नापने में सहायक होता है।

          IMU पर घूर्णादर्शी (Gyro) तथा गति या वेग बढ़ाने वाला मीटर जुड़ा होता है। यह एक नाजुक, भारी तथा महंगा यंत्र है। इसे प्रत्यक्ष संवेदक दिगविन्यास (Direct Sensor Orientation) कहते हैं जिसके द्वारा संवेदक की स्थिति तथा रुख ज्ञात किया जा सकता है। GPS तथा IMU, निर्धारण स्थिति (Position) तथा दिगविन्यास प्रणाली के लिये अति आवश्यक हैं। इनके द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भूसन्दर्भित (Georeperencing) किया जा सकता है।

         प्रायः यह देखा गया है कि मिशन योजना (Mission Planning) तथा इसका सम्पादन किसी व्यापारिक सर्वेक्षण कम्पनी या वृहत राष्ट्रीय संस्था या सेना द्वारा किया जाता है।

वायु आधारित प्लेटफार्म के लाभ (Advantages of Aricraft Platforms)

             वायु आधारित प्लेटफार्म के निम्न लाभ हैं-

1. उच्च विभेदन (High Resolution):-

            वायुयान आधारित सर्वेक्षणों में प्राप्त विभेदन (Resolution) उपग्रहों से प्राप्त विभेदन की तुलना में अधिक होता है। स्थानीय विभेदन (Spatial Resolution) की दृष्टि से उच्च स्तरीय फोटोचित्रों की प्राप्ति होती है।

2. विभिन्न मापनियों के बिम्ब (Images of Different Scale):-

          चूँकि ऊँचाई पर वायुयान की उड़ान चालक अथवा प्रयोग करने वाले की इच्छा पर निर्भर है। इसलिये ऊँचाई के अनुसार अलग-अलग मापनियों पर आधारित वायुफोटो चित्रों को प्राप्त किया जा सकता है। विभेदन (Rsolution) की क्षमता के आधार पर इनका अलग-अलग उपयोग किया जाता है।

3. सूक्ष्म सर्वेक्षण (Micro Survey):-

             उच्च विभेदन (Resolution) तथा वृहत् मापनी (Large Scale) पर बने वायु फोटो चित्रों का सूक्ष्म तथा सामरिक सर्वेक्षणों में उपयोग किया जाता है। स्टीरियोमॉडल में देखने से इनकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। समस्या मूलक अध्ययनों, सूक्ष्म सर्वेक्षणों तथा क्षेत्रीय योजनाओं के लिये वृहत् मापनी पर बने फोटोग्राफ का उपयोग किया जाता है।

4. पुनरावृत उड़ानें (Repetitive Flights):-

                  पुनरावृत्ति उड़ानों के द्वारा दृश्य-क्षेत्र के अल्पकालीन परिवर्तिनों को समझने की सुविधा होती है।

5. दूर-दराज क्षेत्रों का सर्वेक्षण (Remote Arca Survey):-

                दूर-दराज के दुर्गम पर्वतीय, वन व मरुस्थलीय क्षेत्रों के सर्वेक्षण की सरलता पुनरावृत्तिक उड़ानों के द्वारा सम्पन्न की जाती है।

3. अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म (Space Based Plateform):-

                   अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म वायुमण्डल के प्रभाव से अछूते रहते हैं। इस प्रकार के प्लेटफार्म पृथ्वी के चारों ओर ध्रुवीय कक्ष में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं तथा एक निश्चित अन्तराल पर सम्पूर्ण पृथ्वी या पृथ्वी के किसी भाग को तय करते हैं। भूभाग को तय करना उपग्रह के मार्ग कक्ष पर निर्भर करता है। अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म के कारण ही हम असाधारण मात्रा से सुदूर संवेदन आँकड़ों को प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि सुदूर संवेदन अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बहुत लोकप्रिय हुआ है।

उपग्रह मिशन (Satellite Mission):-

             उपग्रह के संवेदक द्वारा नियमित रूप से रिकॉर्ड करने की क्षमता का निर्धारण गहन रूप में किया जाता है। यह उपग्रह परिक्रमा पथ (Orbit) के प्राचलों (Parameter) की विशेषताओं पर निर्भर करता है।

परिक्रमा पथ (Orbit):-

            जिस पथ से होकर उपग्रह पृथ्वी का चक्कर लगाता है उसे परिक्रमा पथ कहा जाता है। यह गोल या गोलाकार होता है। अलग-अलग उद्देश्यों के लिये अलग-अलग प्रकार के परिक्रमा पथ अपनाये जाते हैं। उद्देश्यों के आधार पर परिक्रमा पथ की विशेषतायें निम्न प्रकार से हैं-

(i) कक्षीय पथ की ऊँचाई (Orbital Attitude):-

             पृथ्वी के धरातल से उपग्रह के मध्य की दूरी (किमी०) को परिक्रमा पथ की ऊँचाई कहते हैं। पथ की ऊँचाई धरातल के दृश्य विस्तार (Coverage) एवं विभेदन (Resolution) को प्रभावित करता है। यदि उपग्रह पथ की ऊँचाई अधिक होगी तो धरातलीय विस्तार अधिक होगा लेकिन धरातलीय विभेदन कम होगा। इसके विपरीत कम ऊँचाई पथ पर धरातलीय विस्तार कम होगा लेकिन विभेदन (Resolution) अधिक होगा।

(ii) कक्षीय पथ का झुकाव कोण (Orbital Inclination Angle):-

            कक्षीय तल एवं भूमध्य रेखीय तल के मध्य के कोण को कक्षीय पथ का झुकाव कोण कहते हैं। झुकाव कोण, किसी आक्षांश रेखा पर संवेदक द्वारा देखे गये धरातलीय विस्तार (Field of View) को निर्धारित करता है। उदाहरण के लिये यदि उपग्रह पथ का झुकाव कोण 60° है तो यह पृथ्वी के धरातल पर 60° उ० तथा 60° द० के मध्य ही परिक्रमा करेगा। यदि कक्षीय पथ का कोण 60° से कम होगा तब यह धरातल के कम भाग को कवर करेगा। ध्रुवीय क्षेत्रों का अवलोकन इसके द्वारा नहीं हो सकेगा।

(iii) कक्षीय काल (Orbital Period):-

         कक्षीय काल से अभिप्राय यह है कि कोई उपग्रह पृथ्वी का एक चक्कर कितने समय में पूरा कर लेता है। उदाहरण के लिये यदि कोई ध्रुवकक्षीय उपग्रह 806 किमी० की ऊँचाई पर स्थिति है जो इसका कक्षीय भ्रमण काल 101 मिनट का होगा। चन्द्रमा का कक्षीय काल 27.3 दिन है। उपग्रह की गति का प्रभाव, प्राप्त की जा सकने वाली इमेज के प्रकारों पर परिलक्षित होता है।

(iv) पुनरावृत्ति चक्र (Repeat Cycle):-

          पुनरावृतिक चक्र दो क्रमिक काल के मध्य का समय है । पुनरावलोकन काल से अभिप्राय यह है कि एक ही स्थान की अलग-अलग दो दिनों में ली गई इमेज है। इसका निर्धारण उपग्रह संवेदक की Pointing Capability पर निर्भर करता है। Pointing क्षमता यह दर्शाता है कि कोई भी उपग्रह केवल नीचे के अलावा दाँये-बाँये, ऊपर-नीचे कितना घूम सकता है। आधुनिक उपग्रहों में इस प्रकार की क्षमतायें विकसित की गई हैं। यदि इस प्रकार की क्षमता उपग्रह संवेदक में हो तो पुनरावृत्ति काल कम-ज्यादा किया जा सकता है। 

कृत्रिम उपग्रह (Artificial Satellites):-

         अंतरिक्ष आधारित प्लेटफार्म के कृत्रिक उपग्रह सुदूर संवेदन का प्रमुख प्लेटफार्म है तो वायुमण्डल की दशाओं एवं भू-संसाधनों का ग्लोबीय स्तर पर लगातार प्रेक्षण एवं प्रबोधन (Monitor) करता है। पृथ्वी के गुरुत्वबल से बचने के लिये इन्हें 600 किमी० से अधिक ऊँचाई पर अलग-अलग कक्षों में निर्धारित किया जाता है। किसी उपग्रह की ऊँचाई, वेग तथा परिक्रमणकाल में परस्पर गहरा सम्बन्ध होता है तथा इन्हें उपग्रह छोड़ने से पूर्व निर्धारित किया जाता है। प्रत्येक उपग्रह का एक ग्रहपथ होता है जिसमें वह गति करता है। इसकी कक्षा (Orbit) पूर्व में ही निर्धारित की जाती है। सुदूर संवेदन मिशन में ग्रह पथ के आधा पर उपग्रहों के निम्नलिखित कक्षीय प्रकार प्रमुख है-

1. ध्रुव कक्षीय उपग्रह (Polar Orbit Satellite)

2. सूर्य तुल्यकालिक कक्षीय उपग्रह (Sun-syanchronous Orbit Satellite)

3. भू-स्थैतिक कक्षीय उपग्रह (Geostationary Orbit Satellite)

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न 1. प्लेटफार्म से क्या तात्पर्य है? इसके प्रकार की विवेचना करें।

(What do you mean by Platform? Discuss its types.)



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3. भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता / The Significance and Utility of Remote Sensing in Geography

3. भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता

(The Significance and Utility of Remote Sensing in Geography)


भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता⇒

                 भू-धरातलीय आंकड़ा अर्जित करना भू-अवलोकन का केन्द्रीय पहलू है। भू-अवलोकन का अभिप्राय है हमारे ग्रह (पृथ्वी) के भौतिक (Physical) रासायनिक (Chemical), जैविक (Biological) तथा ज्यामितिय (Geometrical) विशेषताओं के बारे में सूचनाओं को एकत्र करना। ये हमें प्राकृतिक (Natrual) तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के परिवर्तनों के स्तर एवं प्रबोधन (Monitor) या रिकार्ड करने में सहायता प्रदान करता है। इस प्रकार पृथ्वी अवलोकन के निम्नलिखित तीन उपयोग प्रमुख है:-

(i) मानचित्रण ( Mapping),

(ii) प्रबोधन (Monitoring) तथा

(iii) भविष्यवाणी (Forecasting)

           भू-अवलोकन हमें भू-धरातलीय आंकड़े प्रदान करता है। भूधरातलीय आंकड़े अर्जित करने को विकास चक्र का प्रथम बिन्दु के रूप में माना जा सकता है, जिसके अंतर्गत अवलोकन (Observing), विश्लेषण (Analysis), रूपरेखा (Designing) या योजना निर्माण (Planning), निर्माण (Contruction), विकास (Developing) इत्यादि को प्रमुखता से लिया जाता है। भू-धरातलीय आँकड़े सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व को निम्न रूप में देख सकते हैं-

(1) भू-सम्पत्ति सीमांकन (Land Record Demarcation):-

            एक भूमि प्रशासक जैसे की पटवारी, तहसीलदार, अमीन इत्यादि को राजस्व भूमि के अभिलेखों का रख-रखाव, भूमि सीमांकन भू-सम्पत्ति का निर्धारण इत्यादि की समय-समय पर सर्वेक्षण एवं अवलोकन की आवश्यकता होती है। भू-सम्पत्ति की सीमायें धरातलीय आकृतियों पर निर्भर करती हैं जिनको सर्वेक्षण एवं अवलोकन करके शुद्ध व दुरुस्त किया जाता है।

(2) सिविल इंजीनियरिंग कार्य (Civil Engineering Works):-

              सिविल इन्जीनियरिंग के क्षेत्र में सड़क, नहर, रेल लाइन, टेलीग्राफ लाइन, पावर लाइन, पावर हाउस, भवन निर्माण इत्यादि कई सिविल कार्यों के डिजाइन, दिगविन्यास तथा निर्धारण व समतलीकरण के लिये धरातलीय आकृति से संबंधित आंकड़ों की आवश्यकता होती है। इसके लिये निर्माण व्यय, मार्ग व्यय, इत्यादि खर्चों का आकलन धरातलीय उच्चावचन सर्वेक्षण व पुनः सर्वेक्षण के आधार पर किया जाता है। ऐसी स्थिति में धरातलीय सूचनाओं की अति शीघ्र आवश्यकता होती है।

(3) नगरीयकरण कार्य (Urbanization Works):-

               वर्तमान समय में नगरीकरण की प्रवृत्ति हमारे देश में तेजी से बढ़ रही है। नगरीय क्षेत्रों का अनियंत्रित विकास हो रहा है। एक नगर योजनाकार को नगरीय योजना (Planning) में अधिवास प्रतिरूपों, कार्यों, प्रकारों इत्यादि की पहचान की अति आवश्यकता होती है। विभिन्न कार्यों का निर्धारण करके नगर पालिकाओं व नगर निगमों का निर्धारण किया जाता है। आधारभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराने के लिए क्षेत्रों का चिन्हित कर योजनाओं की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार नगर योजनाकार पूर्ण योजना तैयार करने से पूर्व अतीत में घटित प्रभावों का प्रबोधन (Monitoring) करके नई योजना को मूर्त रूप देता है। इन सभी कार्यों में धरातलीय आंकड़ों की नितान्त आवश्यकता होती है।

(4) कृषि उत्पादन कार्य (Agricultural Production Works):-

            एक कृषि विज्ञानी (Agronomist) की कृषि फसलों के वितरण, क्षेत्र एवं उत्पादन में रुचि होती है जिससे वह भविष्यवाणी करता है। इसके लिये भूमि उपयोग के विभिन्न स्वरूपों का सर्वेक्षण एवं अवलोकन हेतु धरातलीय सूचनाओं की आवश्यकता है। इसी प्रकार मिट्टी के प्रकारों एवं वितरण को दर्शाने के लिये भी धरातलीय सर्वेक्षण की आवश्यकता होती है। मिट्टी के प्रकारों के अनुरूप फसलों के उत्पादन एवं वितरण के लिये कृषि वैज्ञानिकों को भू-आधारित अंकड़ों का प्रबोधन करना पड़ता है।

(5) वन संसाधनों का वितरण (Distribution of Forest Resourse):-

             किसी भी वनाधिकारी (Forester) को प्राकृतिक वनस्पति के वितरण एवं प्रकारों के उचित आकलन के लिये भू-धरातलीय आंकड़ों की नितान्त आवश्यकता महसूस की जाती है, जिससे वह प्रजाति क्रम से वन संसाधनों के आंकड़ों को प्रस्तुत कर वनीकरण एवं वन कटान की योजना तैयार करता है। इसी प्रकार वन विनाश, वनों में अग्नि, भूमि कटाव इत्यादि समस्याओं का भी आंकलन करने में भू-धरातल की सूचनाओं का उपयोग किया जाता है। भू आधारित सूचनाओं से सम्पूर्ण बायोमास का भी आकलन वन वैज्ञानिकों के द्वारा सरलता पूर्वक किया जाता है।

सुदूर संवेदन के महत्व

(6) पर्यावरणीय विश्लेषण (Enviromnental Analysis):-

             वर्तमान समय में कहीं भी पर्यावरण के नाम पर शोर मचाया जाता है। पर्यावरण विकास, संरक्षण एवं विनाश में  भू-धरातलीय सूचनायें अपना विशेष स्थान रखती हैं। इनका तीव्रगति से प्रबोधन की आवश्यकता महसूस की जाती है। ये आंकड़े हमें कहां से सरलता पूर्वक प्राप्त किये जा सकते हैं। यह हमारी आवश्यकता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य नये-नये आविष्कार कर विभिन्न माध्यमों से इनकी पूर्ति करता है।

        पर्यावरणविद हमेशा पर्यावरण प्रदूषण के प्रति चिन्तित रहते हैं। नगरों में नगरों के कूड़े डम्प करने के उपयुक्त स्थान का चयन, डम्प पदार्थों का आकार व प्रकारों के निर्धारण के लिए वायु, धूल, एवं अन्य प्रदूषणों का विचार करने के पश्चात् ही निर्धारण किया जाता है।

सुदूर संवेदन के महत्व

(7) जलवायु एवं मौसम की पूर्वानुमान (Climate and Weather Forecast):-

               जलवायु वैज्ञानिकों को जलवायु एवं मौसम संबंधी जानकारियों के लिये धरातलीय एवं वायुमण्डलीय सूचनाओं की अति आवश्यकता होती है। इसके लिए समुद्री तल के तापमान प्रतिरूप, समुद्रीय धाराओं का प्रतिरूप, हवा की दशा व गति तथा स्थलमण्डल एवं जलमण्डल के अंतर्क्रिया के प्रक्रियाओं के बारे में सूचनायें इत्यादि की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार बादलों की स्थिति, वर्षा, चक्रवात, तूफान, बादल फटना, बाढ़ इत्यादि की जानकार के लिए तथा मौसम संबंधी घटनाओं पर तुरन्त कार्यवाही करने के लिए आंकड़ों के प्रबोधन की आवश्यकता होती है, जिससे समस्याओं का अति शीघ्र निवारण किया जा सके। भू-धरातलीय आंकड़ों की उपलब्धता से उपरोक्त अध्ययनों का व्यावहारिक भी बनाया जाता है।

             उपरोक्त कुछ उदाहरण यह दर्शाते हैं कि हमारा भू-अवलोकन किसी लक्ष्य (Object), दृश्य (Scene) तथा घटना (Phenomena) में रुचि रखता है जो अलग-अलग घरातलीय विस्तार लिये होते हैं। इतना ही नहीं हम किसी लक्ष्य के अलग-अलग पहलुओं, विभिन्न स्तरों के विवरणों, विभिन्न अन्तरालों तथा विभिन्न पुनर्रावृतिक दरों में भी अपनी रुचि रखता हैं। इन्हीं आवश्यकताओं के अनुरूप हम भू-अवलोकन की विभिन्न विधियों एवं तकनीकियों का विस्तृत रूप से उपयोग करते हैं। उच्च-स्तरीय समस्याओं का समाधान भू-अवलोकन से प्राप्त आंकड़ों के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। किसी क्षेत्र के सतत आर्थिक विकास में भू-आधारित आंकड़े अपना विशेष स्थान रखते हैं।

         भू-अवलोकन में सुदूर संवेदन तकनीकि का विशेष महत्व है। जैसे कोई भूमि एवं जल प्रबन्धक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साक्षात्कार द्वारा या प्रतिचयन प्रयोगशाला में विश्लेषण द्वारा सूचनाओं को एकत्र करते हैं, उसी प्रकार भू-अवलोकन के अन्तर्गत किसी भू-सर्वेक्षण के लिये कैमरा एवं स्कैनर की सहायता से वायु सर्वेक्षण किया जाता है। इसी प्रकार विस्तृत दृश्य अवलोकन के लिये भू-संसाधन उपग्रह या किसी अन्य उपग्रह पथ आधारित अन्तरिक्ष प्लेटफार्म का उपयोग किया जाता है। मौसम पूर्वानुमान के लिये मिटियोरालाजिक उपग्रह का उपयोग किया जाता है क्योंकि उपग्रह अन्तरिक्ष में लगभग 36000 किमी० की दूरी से धरातलीय सूचनाओं को प्रदान करते हैं।

जी. आई. एस. के उपयोग (Application of GIS)

              भौगोलिक सूचना प्रणाली को कई क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है जिसमें निम्नलिखित प्रमुख है:-

(i) कृषि विकास के क्षेत्र में (In the field of Agricultural Development)

(ii) धरातलीय मूल्यांकन के विश्लेषण के लिये (Land Evaluation Analysis)

(iii) वनस्पति क्षेत्रों के परिवर्तन पहचान के लिये (Change Detection of Vegetation Areas)

(iv) वन कटाव का विश्लेषण तथा उससे संबंधित पर्यावरणीय आपदा विश्लेषण (Analysis of Deforstation and Associated Environmental Hazards)

(v) प्राकृतिक वनस्पति के प्रबोधन के लिये (Monitoring Vegetation Health)

(vi) भूमि ह्रास के प्रबन्धन के लिये वनस्पति आवरण का मानचित्रण करना (Mapping Percentage Vegetation Cover for the Management of Land Degradation)

(vii) बेकार मृदा का मानचित्रण करना (Waste Land Mapping)

(viii) मृदा संसाधन का मानचित्रण कना (Soil Resource Mapping)

(ix) भूमिगत जल के संभावित मानचित्रण के लिये (Ground Water Potential Mapping)

(x) भूगर्भिक एवं खनिज विदोहन के लिए (Geological and Mineral Exploration)

(xi) पिघलते बर्फ के निस्तारण की भविष्यवाणी (Snow-melt runoff forecasting)

(xii) वनों की आग प्रबोधन (Forest fire Minitoring)

(xiii) समुद्रीय उत्पादकता इत्यादि का प्रबोधन (Monitoring of Ocean Productivity)

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न  भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता का वर्णन करें।

(Describe the significance and utility of remote sensing in Geography.)



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