भारत का चीनी उद्योग एक प्रमुख कृषि आधारित उद्योग है, जो मुख्यतः गन्ने पर निर्भर करता है। भारत विश्व के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल है और यह उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन तथा सहायक उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश में चीनी उद्योग के दो प्रमुख क्षेत्र उत्तर भारत और दक्षिण भारत पाए जाते हैं।
बिहार में चीनी उद्योग मुख्यतः गंगा के मैदानी क्षेत्र, विशेषकर उत्तर बिहार में विकसित हुआ है। यहाँ की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, पर्याप्त जल संसाधन और गन्ने की उपलब्धता इसके विकास के प्रमुख कारण हैं। उचित आधुनिकीकरण से यह उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था को और सशक्त बना सकता है।
भारत में चीनी उद्योग
स्थिति
✍️ भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है।
✍️ पहला स्थान: ब्राज़ील
✍️ भारत में चीनी उद्योग मुख्यतः उत्तर भारत और दक्षिण भारत में विकसित है।
कच्चा माल
✍️ गन्ना
✍️ गन्ना भारी एवं शीघ्र नष्ट होने वाला होता है, इसलिए चीनी मिलें गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के पास स्थापित की जाती हैं।
चीनी उद्योग के प्रमुख क्षेत्र
(i) उत्तर भारतीय चीनी क्षेत्र-
उत्तर भारत का चीनी क्षेत्र भारत का प्रमुख गन्ना-उत्पादक एवं चीनी-निर्माण क्षेत्र है। इसमें मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड शामिल हैं। यहाँ की जलोढ़ मिट्टी, उपजाऊ मैदान, पर्याप्त वर्षा तथा नहरों व नलकूपों से सिंचाई की सुविधा गन्ने की खेती के लिए अनुकूल है। रेल-सड़क परिवहन, सस्ती श्रमशक्ति और बड़े उपभोक्ता बाजार के कारण इस क्षेत्र में चीनी उद्योग का तीव्र विकास हुआ है।
विशेषताएँ:
✍️ पुरानी मिलें
✍️ छोटे आकार की मिलें
✍️ कम तापमान के कारण गन्ने में शर्करा कम
(ii) दक्षिण भारतीय चीनी क्षेत्र–
दक्षिण भारतीय चीनी क्षेत्र भारत का एक प्रमुख चीनी उत्पादन क्षेत्र है। इसमें मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं। यहाँ उष्णकटिबंधीय जलवायु, पर्याप्त तापमान, लंबी फसल अवधि और सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जो गन्ने की खेती के लिए अनुकूल हैं। कृष्णा, गोदावरी और कावेरी नदियों से सिंचाई होती है। आधुनिक तकनीक, सहकारी मिलें और अधिक उत्पादक किस्में इस क्षेत्र को चीनी उद्योग में अग्रणी बनाती हैं।
विशेषताएँ:
✍️ नई और आधुनिक मिलें
✍️ बड़े आकार की मिलें
✍️ अधिक तापमान → गन्ने में शर्करा अधिक
✍️ उत्पादकता अधिक
भारत में चीनी उद्योग के प्रमुख राज्य
1. उत्तर प्रदेश (प्रथम स्थान)
2. महाराष्ट्र
3. कर्नाटक
4. तमिलनाडु
5. बिहार
भारत में चीनी उद्योग की समस्याएँ
✍️ गन्ने की अनियमित आपूर्ति
✍️ पुरानी तकनीक
✍️ उच्च उत्पादन लागत
✍️ किसानों को भुगतान में देरी
✍️ जल संकट (विशेषकर महाराष्ट्र)
भारत में चीनी उद्योग का महत्व:
भारत में चीनी उद्योग का विशेष महत्व है। यह कृषि-आधारित उद्योग गन्ना किसानों को नियमित आय और रोजगार प्रदान करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगीकरण को बढ़ावा देकर यह आर्थिक विकास में सहायक है। इस उद्योग से चीनी के साथ-साथ गुड़, शीरा, एथेनॉल और विद्युत उत्पादन भी होता है। यह खाद्य सुरक्षा, निर्यात आय तथा परिवहन, व्यापार और सहायक उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बिहार में चीनी उद्योग
परिचय
बिहार में चीनी उद्योग कृषि-आधारित उद्योगों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, पर्याप्त वर्षा और गंगा व उसकी सहायक नदियों के मैदान गन्ने की खेती के लिए अनुकूल हैं। प्रमुख चीनी मिलें पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण और मुजफ्फरपुर जिलों में स्थित हैं। स्वतंत्रता के बाद कई सरकारी और सहकारी चीनी मिलों की स्थापना हुई, जिससे ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिला। हालाँकि, कच्चे माल की कमी, पुरानी तकनीक, प्रबंधन की समस्याएँ और वित्तीय संकट के कारण कई मिलें बंद हो गईं। वर्तमान में आधुनिकीकरण और निजी निवेश से उद्योग को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
✍️ बिहार में किसी समय पर करीब 130 चीनी मिलें थीं, लेकिन उनमें से अब लगभग 9 से कम ही सक्रिय मिलें हैं जो गन्ना क्रशिंग/उत्पादन कर रही हैं।
✍️ वर्तमान सरकार ने बंद मिलों को पुनर्जीवित करने और 25 मिलों की कुल गतिविधि बढ़ाने की योजना बनाई है; इस योजना के अंतर्गत कई मिलों को चालू किया जाना है, पर वे अभी तक पूर्ण रूप से चालू नहीं हुईं।
स्थिति
✍️ बिहार उत्तर भारत का प्रमुख चीनी उत्पादक राज्य है।
✍️ गंगा के मैदानी क्षेत्र में गन्ने की अच्छी खेती होती है।
✍️ स्वतंत्रता के बाद बिहार में चीनी उद्योग का अच्छा विकास हुआ।
✍️ गन्ना उत्पादक क्षेत्र: पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, गोपालगंज, सारण, मुज़फ्फरपुर
भारत का चीनी उद्योग देश का एक प्रमुख कृषि-आधारित उद्योग है, जो गन्ना उत्पादन पर आधारित होने के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाता है। यह उद्योग रोजगार सृजन, किसानों की आय वृद्धि तथा सह-उत्पादों जैसे शीरा, बगास और इथेनॉल के माध्यम से औद्योगिक विकास में योगदान देता है। बिहार में अनुकूल जलवायु, उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और गंगा के मैदानी क्षेत्र के कारण चीनी उद्योग के विकास की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। हालाँकि, पूँजी की कमी, पुरानी तकनीक और बंद पड़ी मिलें प्रमुख बाधाएँ हैं। यदि आधुनिकीकरण, बेहतर प्रबंधन और सरकारी सहयोग मिले, तो बिहार का चीनी उद्योग पुनः विकास की नई ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है।
बिहार भारत का एक राज्य है जिसकी राजधानी पटना है। बिहार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत और पाली भाषा के शब्द “विहार” से हुई जिसका अर्थ है निवास अर्थात प्राचीन काल में यहाँ बौद्ध भिक्षुओं का निवास हुआ करता था इसीलिए इसे विहार (बिहार) कहा गया।
➤ बिहार तीन बार खण्डित हुआ है। 1912 में पहली बार बंगाल से अलग हुआ। 1936 में उड़ीसा से तथा 15 नवम्बर 2000 में झारखण्ड से अलग हुआ।
➤ बिहार का कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किमी० है।
➤ बिहार क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का 13 वां सबसे बड़ा राज्य है।
➤ बिहार की कुल जनसँख्या 104,099,452 है।
➤ बिहार जनसंख्या की दृष्टि से देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है।
➤ चौहदी: उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में झारखण्ड है।
बिहार का भौगोलिक परिचय
बिहार का भौगोलिक परिचय
अक्षांशीय विस्तार
24° 20′ 10″ से 27° 31′ 15″ उत्तरी अक्षांश
देशांतरीय विस्तार
83° 19′ 50″ से 88° 17′ 40″ पूर्वी देशांतर
आकृति
आयताकार
क्षेत्रफल
94163 वर्ग किमी० (देश के कुल क्षेत्रफल का 2.86%)
लंबाई (उत्तर से दक्षिण)
345 किमी०
लंबाई (पूर्व से पश्चिम)
483 किमी०
समुद्र तल से औसत ऊंचाई
173 फीट (53 मी०)
सीमाएं
उत्तर में नेपाल (7 जिला), दक्षिण में झारखण्ड (9 जिला), पूर्व में पश्चिम बंगाल (3 जिला), पश्चिम में उत्तर प्रदेश (7 जिला)
जलवायु
मानसूनी
सर्वाधिक तापमान वाला जिला
गया (41ºC)
सर्वाधिक ठंडा जिला
गया
औसत वर्षा
1050 मिमी0
वन क्षेत्र
6.6%
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जिला
पश्चिमी चंपारण
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा जिला
शिवहर
सर्वाधिक वर्षा वाला जिला
किशनगंज
सबसे कम वर्षा वाला जिला
औरंगाबाद
सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना
गंडक परियोजना
बिहार राज्य से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
बिहार राज्य से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
बंगाल से बिहार को अलग किया गया
1 अप्रैल 1912
बिहार से उड़ीसा को अलग किया गया
1 अप्रैल 1936
बिहार से झारखण्ड को अलग किया गया
15 नवम्बर 2000
राजधानी
पटना
उच्च न्यायालय
पटना
राजकीय भाषा
हिंदी
द्वितीय राजकीय भाषा
उर्दू
राजकीय पशु
बैल
राजकीय पक्षी
गोरैया
राजकीय पुष्प
गेंदा फूल
राजकीय वृक्ष
पीपल
राजकीय चिन्ह
बोधि वृक्ष
राजकीय मछली
मांगुर
राज्य का महापर्व
छठ पूजा
राजनितिक परिचय
राजनितिक परिचय
लोक सभा सदस्यों की संख्या
40
लोक सभा में अनुसूचित जाति की आरक्षित सीटें
6 (गोपालगंज, हाजीपुर, समस्तीपुर, जमुई, गया तथा सासाराम)
Q. बिहार में ग्रामीण बस्तियों के प्रतिरूप की व्याख्या कीजिए।
वह अधिवासीय क्षेत्र जहाँ की 2/3 जनसंख्या प्राथमिक उत्पादन गतिविधि में संलग्न हो, वैसे बस्ती को ग्रामीण बस्ती कहते हैं। ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप के अन्तर्गत ग्रामीण बस्तियों के आकृतियों का अध्ययन किया जाता है।
प्रतिरूप का निर्धारण मकानों एवं मार्गों की स्थिति और उनका क्रमिक व्यवस्था के आधार पर सुनिश्चित किया जाता है।
ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप के भौगोलिक कारक
ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप पर दो भौगोलिक कारकों का प्रभाव पड़ता है।:-
(1) भौतिक कारक और
(ii) सांस्कृतिक कारक।
भौतिक कारक के अन्तर्गत कुंआ, तालाब, पोखर, (कच्चा मिट्टी) टीले, भूमि का ढाल, सीढ़ीनुमा, ढाल की आकृति, भूमिगत जलस्तर, दलदली भूमि इत्यादि प्रमुख हैं। जबकि सांस्कृतिक कारक के अन्तर्गत ऐतिहासिक घटना क्रम, सड़क एवं गलियों के नियोजित एवं अनियोजित प्रारूप, खेतों का प्रतिरूप, ग्रामीण धार्मिक संस्थाएँ, जातिय संरचना इत्यादि को शामिल करते है।
ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव से गुजरने वाली सड़के एवं गलियाँ ग्रामीण बस्तियों के आतंरिक विन्यास के ढाँचे को सुनिश्चित करते है। भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बिहार में ग्रामीण बस्तियों के निम्नलिखित प्रतिरूप पाये जाते हैं-
(1) रेखीय प्रतिरूप या रीबन प्रतिरुप:-
किसी सड़क या नदी या नहर के किनारे-2 बसे हुए मकानों की बस्तियाँ रेखीय ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप का निर्माण करती है। अगर गाँव से सड़क गुजर रहा हो तो ग्रामीण बस्ती के लोग अपने घर का द्वार सड़क या गली की ओर बनाते हैं। जबकि कोई नहर या नदी के किनारे रेखीय प्रतिरूप का विकास हुआ तो लोग अपने घर के दरवाजे जलाशय के विपरीत दिशा में बनाते हैं। अरबल जिला के अवगिल्ला गाँव नहर के किनारे विकसित हुआ है जो रेखीय प्रतिरूप का एक अच्छा उदाहरण है।
चित्र: रेखीय प्रतिरूप
⇒ गहमर UP और बिहार के सीमा पर भारत का सबसे बड़ा गाँव है।
(2) अरीय त्रिज्या प्रतिरूप:-
अरीय त्रिज्या प्रतिरूप के गाँवों में कई ओर से सड़क मार्ग गाँवों में आकर मिलते हैं।
चित्र: अरीय त्रिज्या प्रतिरूप
मुख्य सड़कें आपस में पतली-2 गलियों से जुड़े रहते है। मकान और घर गलियों एवं सड़कों के किनारे बने होते हैं। बिहार के मैदानी क्षेत्रों में ऐसा ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप के अनेक उदा० मिलते है।
(3) तारा प्रतिरूप:-
यह अरील त्रिज्या प्रतिरूप का विकसित स्वरूप है। जैसे:- अरीय प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती के लोग जब मुख्य सड़कों के किनारे घर बना लेते हैं तो तारा प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती का विकास होता है।
चित्र: तारा पतिरूप
तारा प्रतिरूप का उदाहरण कोशी नदी घाटी में अधिक देखने को मिलती है।
(4) वृताकार प्रतिरूप:-
जब किसी ग्रामीण बस्ती का विकास किसी तालाब या पुरानी हवेली या खण्डहर या धार्मिक स्थल या जमींनदार के घर के चारों ओर घर बन जाते हैं तो वृताकार प्रतिरूप का विकास होता है।
उदा० – लखिसराय के बेला गाँव
चित्र: वृताकार प्रतिरूप
(5) त्रिभुजाकार प्रतिरूप:-
सड़कों के त्रिमुहानी पर या नदियों के संगम पर त्रिभुजाकार प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती विकसित होते हैं। इसका उदाहरण गया, औरंगाबाद, नवादा, बांका जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में देखा जा सकता है।
चित्र: त्रिभुजाकार प्रतिरूप
(6) L प्रतिरूप:-
जब सड़के एक-दूसरे से समकोण पर मिलती है और वहाँ ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपना अधिवासीय घर केवल दो सड़क के किनारे बना लेते हैं तो L-आकार के प्रतिरूप का विकास होता है।
उदा०- बख्तियारपुर
चित्र:- L-प्रतिरूप
(7) अनाकार प्रतिरूप
ऐसे बस्तियों का निर्माण साधारणत: मार्गों के निर्माण के पूर्व होता है। ऐसे बस्तियों का कोई आकार नहीं होता है। बिहार में ऐसे अधिवासीप प्रतिरूप का उदा० सबसे ज्यादा मिलता है।
उपरोक्त प्रतिरूप के अलावे बिहार में कई अन्य प्रतिरूप के बस्ती मिलते हैं। जैसे- तीर प्रतिरुप, T-आकार के प्रतिरूप, अर्द्धवृताकार प्रतिरूप इत्यादि महत्वपूर्ण है। ग्रामीण बस्तियों के प्रतिरूप के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ग्रामीण प्रतिरूप के विकास में भौगोलिक कारकों का योगदान सबसे अधिक होता है।
Q.1 बिहार में जनजातियों की मुख्य समस्याओं एवं उसके निवारण की व्याख्या कीजिए।
Q.2 बिहार की आदिवासी जनसंख्या की विभिन्न विशेषताओं एवं उनके पिछड़ेपन के आधारभूत कारकों के बारे में लिखिए।
Q.3 बिहार की जनजातियों की समस्याओं एवं समाधान की व्याख्या कीजिए।
जनजाति प्राय: आदिवासी, वनवासी, सरल समाज, आदिम समाज, अनुसूचित जनजाति इत्यादि के नाम से जाने जाते हैं। यह एक ऐसा मानवीय समूह है जो दूर दराज के क्षेत्रों में एकांकी जीवन जीता है। वर्तमम बिहार में जनजातियों की कुल जनसंख्या मात्र 1 % है। बिहार के अधिकांश जनजातीय समाज नवगठित झारखण्ड राज्य में चले गये हैं।
वर्तमान बिहार में संथाल परगणा से आये हुए कुछ संथाली जनजाति के लोग सहरसा, पूर्णिया, किशनगंज, भागलपुर, मंगेर, कटिहार इत्यादि जिलों में निवास करते हैं। बिहार के तराई क्षेत्रों में थारू जनजाति के लोग निवास करते हैं। इसी तरह कैमूर क्षेत्र में खैरवार खैरवार जनजाति के लोग पाये जाते हैं। जनजाति की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित है:-
जनजातियों की विशेषताएँ
(1) मध्य भारत में मिलने वाले जनजाति प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति के हैं जबकि हिमालय प्रदेश में निवास करने वाले जनजाति मंगोलायड प्रजाति के है।
(2) ये क्रमशः ऑस्ट्रिक भाषा और तिब्बती-चीनी भाषा का प्रयोग करते हैं।
(3) ये एकांकी जीवन जीते है। इनका निवास स्थान प्रायः घने जंगल, पर्वत, पहाड़, पठार और नदी घाटी क्षेत्र में देखने को मिलता है।
(4) इनका समाज टोटम के आधार पर गोत्र में विभक्त होता है।
(5) ये गोत्र बहिर्विवाही होते हैं। इनके समाज में वधू मूल्य की प्रथा पायी जाती है।
(6) धर्म के दृष्टिकोण से ये आत्मावादी, प्रकृतिवादी, जीववादी और बोंगावादी होते हैं। जादू-टोना में अधिक विश्वास करते हैं।
(7) इसमें विनिमय का कार्य वस्तु विनिमय और उत्सवी विनिमय के रूप में होता है।
(8) समाज में नातेदारी व्यवस्था की भूमिका अधिक होती है।
(9) इनका स्वतंत्र और विशिष्ट जनजातीय पहचान होती है। ये राज्यविहीन के उदाहरण है।
जनजातीय समस्याओं के कारण
स्वीकृत बिहार के जनजातीय समाज कई समस्याओं से ग्रसित है जिसके लिए कई कारण जिम्मेदार माने जाते हैं:-
(1) औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण
(2) जलवायु परिर्वतन
(3) सामाजिक सांस्कृतिक सम्पर्क
(4) कनीय कानून एवं नीतियाँ
(5) जनजातीय समाज में व्याप्त निरक्षरता
(6) आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था
(7) प्रशासनिक राजनीतिक एवं माफियाओं गठजोड़
(8) परम्परागत जनाजातीय संस्कृति
(9) गैर जनजातीय समाज के प्रति गलत नजरिया
उपरोक्त कारणों के चलते जनजातियों निम्मलिखित समस्याओं का अभ्युदय हुआ है-
(1) वातावरणीय समस्या
(2) सामाजिक समस्या
(3) सांस्कृतिक समस्या
(4) आर्थिक समस्या
(5) राजनैतिक समस्या
(6) जैविक समस्या
(7) मनोवैज्ञानिक समस्या
(1) वातावरणीय समस्या:-
जनजातीय समाज प्राय: कठोर एवं प्रतिकूल वातावरण में निवास करती है। ऐसे क्षेत्रों में पहुंच पाना आसान नहीं होता है जिसके कारण जनजातीय क्षेत्रों में परिवहन साधनों का विकास नहीं हो सका है। प्रति इकाई विकास की लागत अधिक आती है। विकास के लिए यहाँ उच्च तकनीक आवश्यकता पड़ती है, इसलिए यहाँ प्रति इकाई लाभ की प्राप्ति सीमित होती है। जनजातिय समाज वनों को काटकर झूम कृषि करते हैं। इसलिए उनके क्षेत्रों में वनीय ह्रास की समस्या उत्पन्न हुई है।
कृषि के लिए भूमिगत जल दोहन के कारण भूमिगत जल स्तर गिरता जा रहा है। औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण सतही जल प्रदूषण के शिकार है। वैश्विक तापन के कारण अनेक क्षेत्रों में भूमि तापन की समस्या उत्पन्न हो रही है। उनके क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक सम्पदा पाये जाते हैं जिसका राष्ट्रीय स्तर पर दोहन किये जाने के कारण भूमि अपरदन की समस्या और प्राकृतिक संपदा ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है। बड़े-बड़े उद्योग एवं बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना के कारण विस्थापन एवं पुनर्वास की गंभीर समस्याएं देखी जा सकती है।
(2) सामाजिक समस्याएँ:-
जनजातीय समाज आज कई समस्याओं से ग्रसित है। जैसे- इनमें संयुक्त परिवार की परम्परा टूट रही है। परिवार में बूढ़े एवं बुजुर्गो की सम्मान घट रही है। बधूमूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा प्रचलन प्रारंभ हो चुका है। मुण्डा, उराँव, हो, संथाल में जनसंख्या वृद्धि की दर काफी तीव्र है जबकि बंजारन समाज की समस्या ह्रास की ओर अग्रसर है। इनके समाज में मध्यपान से समस्या काफी गंभीर है। साक्षरता का स्तर काफी निम्न है। महिला साक्षरता 3% से भी कम है। इनके समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ भी स्थायी रूप से घर बना चुकी है। जिनमें वेश्यावृति की समस्या, भिश्वावृति की समस्या प्रमुरख है।
(3) सांस्कृतिक समस्याएँ:-
वेरियर एल्विन महोदय ने कहा था कि जनजातीय संस्कृति धीरे-2 विलुप्त होते जा रही है। इसका तात्पर्य है कि जनजातीय समाज अपने संस्कृति का परित्याग कर दूसरे की संस्कृति को अपनाने लगे हैं। इनके समाज में गैर जनजातीय धार्मिक संस्थान स्थायी रूप से निवास करते हुए धार्मान्तरण का कार्य करते हैं जिससे साम्प्रदायिक महौल का निर्माण हुआ है।
गैर जनजातीय समाज के कुछ लोग उनके क्षेत्र में जाकर नक्सलवाद की समस्या को जन्म दिया है। उनके समाज में धार्मिक एवं जादूई पम्परा की गहरी जड़े है। इसलिए ये ज्यादा अंधविश्वासी, जादूटोना, मुण्डाखेट जैसे परम्पराओं में विश्वास करते है। गैर जनजातीय भाषा को अपनाये जाने के कारण द्विभाषावाद की समस्या उत्पन्न हुई, जनजातीय नृत्य, संगीत, स्थापत्य कला, वास्तुकला इत्यादि की वास्तविक पहचान न किये जाने के कारण ये पतन की ओर है।
(4) आर्थिक समस्याएँ:-
भूमि हरण, ऋग्रस्ता, बन्धुआ मजदूरी इत्यादि की इनमें गंभीर समस्याएँ है। गैर-जनजातीय समाज की तरह इनके समाज में भी गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या मौजूद है। जनजातीय क्षेत्रों में चलने वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों में इनकी भागीदारी बहुत कम है। जनजातीय समाज के द्वारा उत्पन्न किये गये उत्पादों का सही तरीके से विपणन का कार्य नहीं होने के कारण उन्हें वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता है। गैर जनजातीय समाज उनके आर्थिक शोषण में लगा हुआ है। इसलिए गैर जनजातीय समाज को वे ‘दिकू’ से संबोधित करते हैं।
(5) राजनीतिक समस्याएँ:-
नवीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण परम्परागत जनजातीय परिषद, बुजुर्ग परिषद, युवा गृह इत्यादि विलुप्त होते जा रहे हैं और उसके स्थान पर जटिल राजनीतिक व्यवस्था की जड़े गहरी होती जा रही है। जटिल राजनीतिक व्यवस्था उनके समझ से परे हैं। न्यायपालिका उन्हें न्याय देने में सक्षम नहीं हो पाती है। प्रशासनिक तंत्र में लगे हुए लोग उनके रक्षक कम भक्षक ज्यादा है। उनके समाजों में भी क्षेत्रवाद, नये राज्य, आरक्षण जैसे राजनीतिक मुद्दों को लेकर अक्सर आंदोलित होते रहते हैं।
(6) जैविक समस्याएँ:-
जनजातीय समाज मे कुपोषण एवं प्रोटीन अल्पता की गंभीर समस्याएँ हैं। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के प्रति ज्ञानाभाव के कारण उनमें कई गंभीर संक्रामक बीमारियाँ, सफाई, पेयजल इत्यादि से संबंधित समस्याएँ पायी जाती हैं। वनों से खाद्य- पदार्थों के संग्रहण एवं शिकार पर रोक, झूम कृषि पर रोक, परम्परागत तकनीक इत्यादि के कारण खाद्यान्न संकट की समस्या उत्पन्न हुई है। बाल मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर काफी उच्च है।
(7) मनोवैज्ञानिक समस्याएँ:-
जनजातीय समाज जहाँ उपरोक्त समस्याओं से पीड़ित है वहीं गैर जनजातीय समाज के द्वारा किये जा रहे विकास को देखकर वह भौंचक है। उनमें गंभीर अवसाद (Depression) की समस्या देखी जा सकती है। इसी अवसाद का परिणाम है कि वे अन्य समाजों को शक की दृष्टि से देखते है।
जनजातीय समस्याओं का निवारण
जनजातीय समस्यायों के निवारण हेतु प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही सतत प्रयास किये जाते रहे हैं। जैसे:- 1954 ई० में जनजातीय विकास प्रखण्ड का गठन किया गया था जिसका उद्देश्य था- जनजातीय प्रदेश के विकास को और तीव्र करन।
चौथी पंचवर्षीय योजना में जनजातीय उपयोजना चलाया गया जिसका उद्देश्य निम्नलिखित है:- (1) पारिवारिक लाभ की योजना को प्रारंभ कर लोगों को निर्धनता रेखा के ऊपर उठाना। इस उद्देश्य के आपूर्ति हेतु कुकुट पालन (मुर्गा, बतख), सुअर पालन, पशुपालन, सब्जी एवं फल कृषि, कुटीर उद्योग, उद्योग के लिए ब्याज मुक्त ऋण की व्यवस्या और उसपर भी 80% सब्सीडी दी गयी।
(2) उनके आर्थिक-सामाजिक वातावरणीय परिस्थितियों में सुधार लाना। उनकी भूमि की वापसी, साहुकारों के ऋण जनजाल से बचाना, प्रदूषित देशी शराब के सेवन पर प्रतिबंध और वन संरक्षण ये संबंधित कार्यक्रम चलाये गये।
(3) प्राथमिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, महिला साक्षरता इत्यादि को बढ़ावा देकर जनजातीय क्षेत्रों में मानवीय संसाधनों का विकास करना।
(4) वैसे जनजातीय समाज जो जनसंख्या ह्रास की समस्या से ग्रसित है उन्हें संरक्षण प्रदान करना।
पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान जनजातीय समाज को जनजातीय प्रादेशिक योजना के तहत शामिल किया गया। छठी पंचवर्षीय योजना में ‘मारजिनल एरिया डेवलपमेन्ट एजेन्सी’ की स्थापना की गई। साथ समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) का अंग बनाया गया।
सातवी पंचवर्षीय योजना के दौरान जवाहर रोजगार योजना, इंदिरा आवास योजना के माध्यम से उन्हें लाभ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया।
जनजातीय प्रदेशों में कई कल्याणकारी कार्यक्रम भी चलाये जा रहे हैं। साक्षरता विकास के लिए संथाल परगणा में विशेष कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। जनजातीय बाजारों की स्थापना की जा रही है। स्कूल एवं कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृति प्रदान की जाती है। रोजगार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण की सुविधा प्रदान की गई है। जनजातीय समस्याओं पर अनुसंधान करने के लिए राँची में जनजातीय अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की गई है।
गैर सरकारी प्रयास भी किये जा रहे हैं। जैसे ‘टाटा ग्रुप’ और ‘सेल’ जैसे संस्थाओं ने शिक्षा, रोजगार एवं खेलकूद को बढ़ावा दे रहा है। कई NGO एवं धार्मिक मिशनरियों इनके क्षेत्रों में आकर शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रही है।
निष्कर्ष
इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि जनजातीय समाज जहाँ कई समस्याओं से पीड़ित है वहीं उन समस्याओं पर कार्यक्रम चलाकर चतुर्दिक प्रहार किया जा रहा है ताकि उन्हें समस्याओं से मुक्त किया जा सके।
Q.1 पटना नगर विकास से संबंधित नियोजन के लिए विचारणीय भौगोलिक अभिकर्ताओं का विश्लेषण कीजिए।
Q.2 पटना नगर विकास से संबंधित नियोजन के लिए भौगोलिक कारकों की चर्चा करें।
Q.3 बिहार का किसी नगर जिसका आपने अध्ययन किया है। उसकी आकारिकी की व्याख्या कीजिए और नगर आकारिकी के लिए कौन-सा मॉडल उपयुक्त है।
Q.3 बिहार के एक नगर की आकारिकी पर प्रकाश डालिए।
गैलीयन महोदय ने नगर नियोजन का तात्पर्य बताते हुए कहा था कि नगर में अधिवासित लोगों के स्वास्थ, सम्पति एवं सौदर्य का संतुलित विकास किया जाना नगर नियोजन कहलाता है। इसके अन्तर्गत भूमि उपयोग, सार्वजनिक सुविधा, पर्यावरण, परिवहन तथा मनोरंजन केन्द्रों का संतुलित विकास किया जाता है।
कोई भी नगर मानवीय जनसंख्या का जमघट होता है। ऐसे स्थानों पर अधिवासीय अव्यवस्था न हो इसलिए नियोजन का कार्य किया जाता है। भारत में नगर नियोजन का इतिहास काफी पुरानी है। भारत में नगर नियोजन की शुरुआत सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के नगरों से प्रारंभ मानी जाती है। लेकित आधुनिक नगर नियोजन का इतिहास 1863 ई० से प्रारम्भ माना जाता है, क्योंकि इंगलैण्ड के स्वास्थ्य विभाग के अनुशंसा पर नगर नियोजन का प्रारंभ किया गया था।
पटना नगर नियोजन
जहाँ तक पटना नगर के नियोजन का प्रश्न है। इसकी शुरुआत मुगल काल से हुई थी। लेकिन उस समय पटना सिटी व पश्चिम दरवाजा से पूर्वी दरवाजा के मध्य मुख्य सड़क के दोनों तरफ नगरीय बस्ती बसे हुए थे। ये रेखीय नगरीय बस्ती था। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने प० पटना में नियोजन का कार्य प्रारंभ करवाया। इसका नियोजन अर्द्ध वृत्ताकार विन्यास प्रारूप पर आधारित था।
लेकिन स्वतंत्रता के बाद पटना सहित देश के सभी बड़े नगरों में जनसंख्या वृद्धि की प्रवृति तेज हो गयी। इसका प्रमुख कारण ग्रामीण नगरीय जनसंख्या का स्थानान्तरण था। नगर में लगातार जनसख्या वृद्धि को देखते हुए द्वितीय पंचवर्षीय योजना में नगर नियोजन की दो प्रकार की नीति अपनाई गयी-
(1) एक लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरों के लिए ‘मास्टर प्लान’ का निर्माण किया गया।
(2) लघु या मध्यम आकार वाले नगरों में सार्वजनिक सुविधाओं का विकास करने का निर्णय लिया गया।
पुनः मास्टर प्लान की नीति में भी दो प्रकार के नीति निर्धारित किये गये। प्रथम पूर्णतः नवीन नगरों की नीति और द्वितीय पूर्व के बसे हुए नगरों के विकास की नीति।
नवीन नगरों में मुख्यतः प्रशासन हेतु चण्डीगढ़, औद्योगिक विकास हेतु राऊरकेला, खनन कार्य हेतु कुद्रेमुख और अंकलेश्वर जैसे नियोजित नगर बसाये गये और पूर्व के बसे हुए नगरों में पटना नगर को नियोजित करने का निर्णय लिया गया।
प्रथम चरण में 36 नगरों के लिए मास्टर प्लान का निर्माण किया गया था। उनमें से पहला नगर पटना था। पटना के लिए प्रथम मास्टर प्लान 1965 ई० में, दूसरा 20 वर्ष बाद 1985 ई० में कार्यान्वित किया गया और तीसरा मास्टर प्लान अभी निर्माणाधीन है। प्रथम मास्टर प्लान 1965 में पटना इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट के द्वारा किया गया था। इसी मास्टर प्लान के तहट राजेन्द्र नगर, कदम कुंआ, गर्दनीबाग और पाटलिपुत्रा कोलोनी का नियोजन किया गया था।
1965 ई० में PRDA का प्रस्ताव स्वीकृत करते हुए बिहार सरकार ने नियोजन का स्थायी अधिकार PRDA को ही सौप दिया। दूसरे मास्टर प्लान के तहत फुलवारी शरीफ, कंकड़बाग, दीघा जैसे मुहल्लों का नियोजन किया गया। लेकिन दूसरा मास्टर प्लान को पूरी तरह लागू नहीं किया गया। पटना में नगर नियोजन पूरी तरह लागू नहीं किये जाने के पीछे कई कारण उत्तरदायी रहे हैं। जैसे-
(1) विस्फोटक जनसंख्या वृद्धि:-
1995 ई० के मास्टर प्लान के अनुरूप पटना नगर की जनसंख्या 2001 ई० में 12 लाख होनी चाहिए थी जबकि यह वास्तविक रूप से 17 लाख हो गई। पुनः 1981 ई० में पटना की जनसंख्या 4 लाख 80 हजार थी जो 1991 ई० में बढ़कर 10 लाख 80 हजार हो गयी थी।
2001 ई० में ही पटना भारत का 14 वाँ सबसे बड़ा नगर बन चुका है। मैनपुर, दीघा, फूलवारी शरीफ में मूल रूप से ग्रामीण क्षेत्र से आयी हुई जनसंख्या अधिवासित होती है। यहाँ ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी और भूमिहीनता के कारण जनसंख्या अधिवासित होते रही है।
(2) भूमि उपयोग के नियमों का पालन नहीं होना:-
भूमि उपयोग के दृष्टि से पटना महानगर को चार भागों में बाँटा जा जा सकता है।-
(ⅰ) अनियोजित पटना का सघन बसा हुआ क्षेत्र
(ⅱ) ब्रिटिशकालीन पश्चिम पटना
(iii) स्वतंत्रता के बाद नियोजित ढंग से विकसित क्षेत्र। जैसे – राजवंशी नगर, शास्त्रीनगर, पाटलिपुत्रा कोलनी और मुंशीनगर
(iv) गैर कानूनी ढंग से निर्मित क्षेत्र- यही क्षेत्र पटना नगर नियोजन की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है।
बुद्धा कोलनी फेज-2, राजीव नगर, कंकड़बाग, न्यू वाइपास के दक्षिण का क्षेत्र तथा नगर के पश्चिमी क्षेत्र ये सभी क्षेत्र PRDA के अन्तर्गत आते हैं। इन क्षेत्रों में PRDA के अनुमति से ही निर्माण कार्य किया जा सकता है। लेकिन PRDA के अनुमति के निर्माण कार्य किये जाने से गंदी बस्ती की विकास हुआ है।
(3) परिवहन ही समस्या:-
पटना की अधिकतर सड़कें संकरी है। महात्मा गाँधी सेतु बनने के बाद परिवहन दबाव में भारी वृद्धि हुई है। पटना में ट्रैफिक जाम सामान्य बात हो चुकी है। नगर बस सेवा लगभग असफल से चुकी है। सड़कों पर वाहनो के चलने की रफ्तार लगातार कम होती जा रही है जो नगर नियोजन के विरुद्ध है।
(4) पटना में मलीन बस्तियों का विकास:-
PRDA के अनुसार पटना की आधी जनसंख्या मलीन बस्तियों में निवास करती है क्योंकि पटना में सार्वजनिक सुविधाओं का काफी अभाव है। यहाँ जल विकासी की समस्या यथावत बनी हुई है। पुनः स्वच्छ जलापूर्ति और गंदी नालियों का जबड़दस्त संगम हुआ है। विद्युत आपूर्ति और सार्वजनिक स्थलों का अभाव है। जगह-2 पर पटना में कचड़ों का अम्बार आसानी से देखा जा सकता है।
(5) पटना में मनोरंजन केन्द्रों का जबड़दस्त अभाव:-
यह नगर को अनियोजित और अस्वस्थकर बनाता है। सार्वजनिक स्थल जैसे- Park, Play ground, सामुदायिक भवन, क्लब, थीयेटर हॉल की यहाँ जबड़दस्त कमी है।
(6) पटना में पर्यावरणीय समस्याएँ भी काफी गंभीर है। पर्यावरणीय समस्याओं के रूप में यहाँ प्रदूषित जल की समस्या, वायु प्रदूषण की समस्या और ध्वनि प्रदूषण से समस्या गंभीर है।
उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर पटना का ‘मास्टर प्लान’ तैयार किया गया है। वास्तव में पटना का मास्टर प्लान मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी हुई है। यहाँ के ‘मास्टर प्लान’ में उल्लेखित कुछ विशेषताएं निम्नलिखित है। जैसे-
मास्टर प्लान की विशेषताएँ
(1) पटना का क्षैतिज विस्तार अब संभव नहीं है। इसलिए सरकार ने बहुमंजली इमारतों में बदलने का निर्णय लिया है।
(2) मौर्या कम्प्लेक्स के बाजार का विकास बाजार संकुल के रूप में किया गया है।
(3) पुराने जेल परिसर में नया बाजार विकसित करने का निर्णय किया गया है। लेकिन High Court के निर्देशानुसार जेल परिसर में पार्किंग बनाने का निर्देश मिल जाने के बाद यह कार्य अभी रूका हुआ है।
(4) पटना मुख्य स्टेशन के भार को कम करने के लिए राजेन्द्र नगर टर्मिनल का विकास किया जा रहा है।
(5) बोरिंग रोड चौराहा क्षेत्र को सुपरमार्केट के रूप में बदलने का निर्णय लिया गया है।
(6) मध्यवर्ती पटना के लिए बाजार समीति कैम्पस में सुपर मार्केट विकास करने निर्णय लिया गया है।
(7) अधिवासीय क्षेत्रों के विकास हेतु पटना को चार प्रमुख निकटतम पड़ोसी क्षेत्र में विभाजित किया गया है। जैसे- पश्चिमी पटना में बिहटा, पूर्वी पटना में फतुहा, दक्षिणी पटना में परसा बाजार और गौरीचक एवं उतरी पटना में हाजीपुर को विकसित करने का निर्णय लिया गया है। इन सभी क्षेत्रों में सार्वजनिक सुविधाएँ, बाजार, पार्क, खेल का मैदान, जलापूर्ति की सुविधा विकसित करने के निर्णय बिला गया है।
(8) मास्टर प्लान के तहत फूलवारी शरीफ एयरपोर्ट को बिहटा में, पटना विश्वविद्यालय और PMCH को बाइपास के दक्षिण में, प्राइवेट बस स्टेण्ड को ट्रान्स पोर्ट नगर में और खागौल में विकसित करने का निर्णय लिया गया है लेकिन पूँजी एवं तकनीक की कमी, आम लोग की सहभागिता का अभाव, प्रशासनिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण क्रियान्वित नहीं किया जा सका है।
(9) पटना नगर के परिवहन के समस्या के समाधान हेतु कई महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव है। जैसे- एक रेलवे लाइन दक्षिणी पटना में पुनपुन नदी के किनारे बिहटा से फतुहा तक विकसित करने का निर्णय लिया गया है। साथ ही दीघा में गंगा नदी पर “जयप्रकाश नारायण रेल पुल” का निर्माण किया जा रहा है।
पुनः गंगा नदी के किनारे मुम्बई के मेरीन ड्राइव के तर्ज पर River drive Road दानापुर से पटना सिटी तक विकसित करने का निर्णय लिया गया है। नगर के अन्दर सभी सड़कें को चौड़ा किया जा रहा है। कंकड़बाग जल निकासी योजना के तहत सम्पूर्ण दक्षिणी पटना में चौड़ी-2 नालियों और बड़े-2 ‘सम्प हाउस’ का निर्माण किया जा रहा है तथा नगर से निकलने वाले प्रदूषित जल को साफ करने हेतु ‘मैला टंकी’ के विकास का निर्णय लिया गया है।
(10) स्टेशन एरिया और नगर के अन्य क्षेत्रों में ट्रैफिक जाम वाले क्षेत्र को पहचान कर फ्लाईओवर ब्रिज का निर्माण किया जा रहा है। जैसे- चिरैयाँ टाल पुल, मीठापुर पुल, चारपुर पुल, बहादुरपुर पुल इत्यादि का कार्य प्रगति पर है।
गंगा नदी के किनारे सड़क निर्माण का कार्य 1942 से ही प्रस्तावित है। लेकिन विभिन्न कारणों से यह प्रस्ताव अभी तक कार्य रूप में नहीं आ पाया है क्योंकि गंगा नदी के किनारे निजी अधिवासीय क्षेत्र और कई सरकारी कार्यालय अवस्थित है जिसे हटाना अभी संभव है।
(11) सार्वजनिक सुविधाओं के विकास हेतु मास्टर प्लान में कई प्रस्ताव शामिल किये गये है। जैसे- खाली पड़े जमीन पर पार्कों का विकास किया जा रहा है। शहर के अंदर जगह-2 सुलभ शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। पाटलिपुत्रा कोलनी में और बाजार समीति कैम्पस में मल्टी पलेक्स विकसित करने का निर्णय लिया गया है। कंकड़बाग में ‘इंडोर स्टेडियम’ का निर्माण किया जा रहा है।
(12) पर्यावरणीय नियोजन:-
मास्टर प्लान के अन्तर्गत प्रत्येक मलीन बस्ती को विकसित करने के लिए दो प्रकार के निर्णय लिये गये हैं। मलीन बस्तियों में गरीबी, निवारण कार्यक्रम चलाया जा रहा है तथा मलीन बस्तियों में सस्ते लागत वाले मकान बनाकर गरीबों को उपलब्ध करवाया जा रहा है।
बिहार सरकार गरीब परिवारों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है तथा गंदी बस्तियों में सुलभ इंटरनेशनल के माध्यम से शौचालय निर्माण किया जा रहा है। पर्यावरणीय विकास के अंतर्गत खुले नालों को ढका जा रहा है। निजी शौचालय को नालियों से जोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कचड़ा उठाव के लिए नगर निगम को रात्रि में उठाने को कहा गया है। पटना के चारों ओर एक हरित पेटी (चौ० ½ km) के विकास का निर्णय लिया गया है।
उपयुक्त कार्यक्रमों के द्वारा पटना नगर के नगरीय पर्यावरण में सुधार की पूरी संभावना है। चूंकि पटना एक पुराना नगर है इसलिए इसका पूर्ण नियोजन संभव नही है। इसलिए आंशिक नियोजन और कुछ सुधारों से ही नगरीय लोगों की समस्साओं से निजात दिलायी जा सकती है।
लेकिन पूँजी, और तकनीक, आम लोगों की सहभागिता, प्रशासनिक एवं राजनीतिक इच्छाशक्ति, कानून में संशोधन, विस्थापित लोगों को उचित मुआवजा इत्यादि पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। पुन: इसका भी व्यवस्था किया जाना चाहिए कि गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, आरा, बक्सर जैसे नगरों के इस रूप में विकास किया जाय कि ग्रामीण क्षेत्रों से स्थानान्तरित होने वाली जनसंख्या वहीं अधिवासित हो सके।
नगरीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कार्यिक प्रतिरूप, नगर के आकार और नगर की जनसँख्या में लगातार वृद्धि होती है। आजादी के समय बिहार में कुल आबादी का 10 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती थी और आज 70 साल के बाद भी 11.3 प्रतिशत आबादी ही नगरों में निवास करती है। बिहारी अर्थव्यवस्था की निस्तेजता और स्थिरता की यह सबसे बड़ा उदाहरण है। बिहार में नगरीकरण के नगण्य होने के पीछे कई कारण है:-
1. कृषि उत्पादन की स्थिरता,
2. औद्योगिकीकरण की दर नगण्य होना,
3. सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,
4. बाढ़ और सुखाड़ की स्थायी समस्या,
5. सिंचाई की अपर्याप्त व्यवस्था।
बिहार के 130 शहरों में से 111 स्वतंत्र शहर है और 19 ऐसे शहर है जिन्हें नव-नगर समूहों में बाँटा गया है। ‘नगर समूह’ ऐसे नगरीय बस्ती को कहते है जब दो या दो से अधिक नगरों की सीमा आपस में मिल जाते है। जैसे- पटना, गया, मोतिहारी, समस्तीपुर, भागलपुर, पूर्णिया, बेगुसराय, कटिहार, सीतामढ़ी इत्यादि नगर समूह के उदाहरण है।
भारत में नगरीकरण का औसत प्रतिशत 2.78 प्रतिशत है। भारत के सभी राज्य और केन्द्र प्रशासित राज्यों में बिहार में सबसे कम नगरीय जनसंख्या अधिवासित होती है। कुल जनसंख्या के दृष्टिकोण से बिहार भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है जबकि यहाँ भारत की मात्र 3.04 प्रतिशत जनसंख्या ही बिहार के नगरों में निवास करती है।
जनगणना 2011 के अनुसार बिहार में 11758016 लोग नगरों में निवास करते है। जिसमें से 6204307 पुरूषों तथा 5553709 महिलाओं की संख्या हैं। पिछले 10 सालों में बिहार में नगरीय जनसंख्या में 11.29 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में 26 ऐसे नगर है जिनकी जनसख्या 01 लाख से अधिक है। इस नीचे की तालिका में देखा जा सकता है।
नगर
जनसंख्या (लाख में)
पटना
16.84
गया
4.8
भागलपुर
4.0
मुजफ्फरपुर
3.54
बिहारशरीफ
2.97
दरभंगा
2.96
पूर्णिया
2.82
आरा
2.6
बेगूसराय
2.52
कटिहार
2.26
मुंगेर
2.1
छपड़ा
2.02
दानापुर
1.82
सहरसा
1.56
हाजीपुर
1.47
सहरसा
1.56
डेहरी
1.37
सीवान
1.35
बेतिया
1.32
मोतिहारी
1.26
बगहा
1.26
किशनगंज
1.05
जमालपुर
1.05
जहानाबाद
1.03
बक्सर
1.02
औरंगाबाद
1.02
बिहार में छोटे-बड़े नगरों की संख्या 130 है। उल्लेखनीय है कि 1991 में अविभाजित बिहार की नगरीय जनसंख्या 11353012 थी। वर्तमान बिहार का जो क्षेत्र है उसकी नगरीय जनसंख्या 67.1 लाख थी। 1991-2001 की अवधि में 19.67 लाख तथा 2001-2011 की अवधि में 30 लाख जनसंख्या वर्तमान बिहार में नगरीय जनसंख्या के रूप में बढ़ी।
वर्तमान बिहार में कुल नगरीय जनसंख्या जनगणना 2011 के अनुसार 117 लाख है। बेगुसराय, मधेपुरा, समस्तीपुर और सुपौल ऐसे जिले थे जहाँ नगरीकरण की दर ऋणात्मक रही क्योंकि 2001 की जनगणना 2011 के अनुसार वैसे शहरों में नगरीय जनसंख्या में वृद्धि हुई है। अगर बिहार के नगरों के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट होता है कि बिहार के जिला को 06 समूहों में विभक्त किया जा सकता है।-
क्रम
नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत वृद्धि
जिला
1.
50 प्रतिशत से अधिक नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला
कैमूर, जहानाबाद, शिवहर, सहरसा
2.
40-50 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला
पूर्णिया, मोतिहारी, बक्सर, औरंगाबाद, नवादा, पटना
3.
30-40 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला
पश्चिम चम्पारण, भोजपुर, गया, लखीसराय, जमुई, भागलपुर, वैशाली
4.
20-30 प्रतिशत के बीच कटिहार जनसंख्या वृद्धि वाले जिला
0-20 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला
बिहारशरीफ, मुंगेर
6.
0-6 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला
सुपौल, मधेपुरा, समस्तीपुर, बेगुसराय
इस तरह उपर्युक्त दिए गये आंकड़ों और तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि बिहार नगरीकरण के मामले में भारत का सबसे पिछड़ा राज्यों में से एक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बिहार में नगरीय जनसंख्या जहाँ मात्र 6.5 प्रतिशत थी वही आज भी आजादी के 70 वर्षों के बाद भी मात्र 4.8 प्रतिशत बढ़कर 11.3 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास कर रही है जो कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है। अतः बिहार में कृषि सुधार, औद्योगिकरण इत्यादि को बढ़ावा देकर नगर विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने की आवश्यकता है।
Q. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्रों की भूमिका की विवेचना कीजिए।
बिहार के ग्रामीण-नगरीय क्षेत्रों के विकास के क्रम में कई ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास हुआ है। ग्रामीण बाजार में प्राय: हाट मेला कस्बाई बाजार, सप्ताहिक बाजार या पाक्षिक बाजार इत्यादि के नाम से जानते है। ग्रामीण बाजार केन्द्र बड़े नगर और ग्रामीण क्षेत्र के बीच योजक कड़ी का कार्य करते हैं।
ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास:-
बिहार में ऐसे ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास लगभग पुरे बिहार में हुई है। ऐसे बाजार जैसे क्षेत्रों पर विकसित होते हैं जहाँ पर सड़कों का चौराहा हो या कोई सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ केन्द्र हो या कोई जलाशय उपलब्ध हो सोनपुर, बाढ़, बख्तियारपुर, बिहटा, तारेगना, अकबरपुर, रजौली, गिरियक इत्यादि ऐसे बाजार केंद्र हैं जो पटना महानगर के इर्द-गिर्द स्थित हैं।
ग्रामीण बाजार केन्द्रों की भूमिका:-
बिहार के ग्रामीण बाजार केन्द्रों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित भूमिकाएँ रेखांकित की जा सकती हैं-
(1) ग्रामीण बाजार केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों की मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं तथा उनका जीवन स्तर सुधारने में मदद करते हैं। (2) ग्रामीण बाजार आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु होता है। यहाँ द्वितीयक तथा तृतीयक प्रकार के आर्थिक गतिविधि सम्पन्न किये जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने कृषि उत्पादों को ग्रामीण बाजार केन्द्र में आकर बेचते हैं अपनी आवश्यकता की चीजें खरीदकर ले जाते हैं।
(3) ग्रामीण बाजार केन्द्र नवो उत्पाद विसाण का केन्द्र होता है। इसका तात्पर्य है कि किसानों के कृषि कार्य से संबंधित नवीन उपकरण, बीज, उर्वरक इत्यादि सबसे पहले ग्रामीण बाजार केन्द्र तक पहुंचते है और वहाँ से उनका धीरे-2 ग्रामीण क्षेत्रों में विसरण होता है।
(4) ग्रामीण बाजार केन्द्र बफर स्टॉक का कार्य करते हैं। जैसे- ग्रामीण बाजार केन्द्रों में ‘Cold Storage’स्थापित होते है जहाँ किसान अपने उत्पादों को सुरक्षित एवं संरक्षित रखते हैं।
(5) ग्रामीण कृषि और कुटीर उद्योग से संबंधित उत्पादों का विपनण का कार्य किया करते है।
(6) ग्रामीण बाजार केन्द्र सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केन्द्र बिन्दु होता है। जैसे- एक ओर ग्रामीण केन्द्रों में आर्थिक गतिविधियाँ चल रही होती है वहीं दूसरी ओर मनोरंजन से जुड़े हुए गतिविधि भी चल रहे होते हैं।
(7) ग्रामीण बाजार केन्द्र सूचना के प्रमुख केन्द्र होते हैं। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित NGO, नुक्कड़ नाटक इत्यादि के माध्यम से सरकारी कार्यक्रम, परिवार नियोजन, साक्षरता, स्वास्थ संबंधित जानकारी इत्यादि आसानी से सम्प्रेषित करते हैं।
(8) ग्रामीण बाजार केन्द्र विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों को मिलने-जुलने का अवसर प्रदान करता है जिससे सामाजिक एकता बनी रहती है।
(9) ग्रामीण बाजार में साहुकार, छोटे-छोटे बैंक, बीमा एजेन्ट, व्यापारी इत्यादि का जमघट होता है। ये किसानों को जरूरत के उननुसार धन उपलब्ध करवाते हैं और किसानों के उत्पादों को खरीदकर राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाते हैं।
(1) ग्रामीण बाजार केन्द्र प्रादेशिक असमानता को दूर करने में सहायक है।
इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण बाजार केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल आर्थिक गतिविधियों को संचालित करता है बल्कि समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का भी केन्द्र बिन्दु होता है।
Q. सिन्दरी उर्वरक उद्योग एक वृहत केन्द्र के रूप में व्याख्या कीजिए।
सिन्दरी एकीकृत बिहार राज्य की एक प्रमुख उर्वरक उद्योग का एक महान् केन्द्र रहा है जो वर्तमान समय में झारखण्ड राज्य के धनबाद जिला में अवस्थित है। यह औद्योगिक केन्द्र धनबाद से 82 किमी० दक्षिण में अवस्थित है। यह छोटानागपुर खनिज औद्योगिक प्रदेश के दामोदर नदी घाटी में अवस्थित है। इसकी व्यापना 1951 ई० में किया गया था। यहाँ उर्वरक निर्माण के तीन इकाई है-
1. फर्टिलाइजर्स कारपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (FCIL)-
यह अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइट्रेट और आमोनिया कार्बोनेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।
2. बिहार स्टेट सुपर फॉस्फेट (BBSF)-
यह इकाई सुपर फॉस्फेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।
3. गैनुलर फर्टिलाइजर्स फैक्ट्री-
यह दामोदर उर्वरक का उत्पादन करता है।
सिन्दरी को महान उर्वरक उत्पादन केन्द्र के रूप में विकसित करने पीछे कई भौगोलिक कारक उत्तरदायी रहे है। जैसे-
(i) सिन्दरी भारत के महान कोयला संचित भण्डार क्षेत्र में स्थित है। इसे झरिया क्षेत्र से कोयला की प्राप्ति हो जाती है।यहाँ कोयला से ही उर्वरक का उत्पादन होता है।
(ii) परिवहन मार्ग की सुविधा- सिन्दरी धनबाद से पुरुलिया जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित है। यह रेलवे लाइन ये भी जुड़ी हुई है। रेगवे लाइन धनबाद, कोलकाता, मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों से जुड़े हुए हैं। सिन्दरी में ही मंझोले एयरपोर्ट का भी निर्माण किया गया है। कालकोता एवं पारादीप बंदरगाह पास में ही अवस्थित है।
(iii) श्रमिक उपलब्धता- सिन्दरी सघन जनसंख्या वाले प्रदेश में अवस्थित है। कुशल इंजीनियरों की आपूर्ति हेतु सिन्दरी में ही बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की गई थी।
(iv) सिन्दरी को दामोदर और उसके सहायक नदी बराकर से पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध हो जाती है।
(v) विद्युत आपूर्ति हेतु चन्द्रपुरा और सिन्दरी थर्मल प्लाण्ट से विद्युत मिल जाती है। आकस्मिक बिजली इसे दामोदर भैली कारपोरेशन (DVC) से मिल जाती है।
(vi) किसी उद्योग के विकास हेतु एवं पथरीली भूमि की आवश्यकता होती है जो सिन्दरी उर्वरक कारखाना को आसानी से उपलब्ध है।
(vii) सिन्दरी प० बंगाल और बिहार के मैदानी क्षेत्र के जंक्शन पर अवस्थित है जहाँ नाइट्रोजन एवं फॉस्फेटयुक्त उर्वरक की भारी माँग है। इस तरह इसे विस्तृत बाजार की सुविधा भी उपलब्ध है।
उपरोक्त भौगोलिक कारकों के अलावे आधुनिक तकनीक का अभाव, पूँजी की कमी, बिजली की आपूर्ति न किये जाने, कर्मचारियों के द्वारा अक्सर के द्वारा अक्सर हड़ताल एवं तालाबंदी किये जाने, इंजीनियरिंग कॉलेज की बिगड़ती स्थिति, झारखण्ड की बिगड़ती राजनीतिक अस्थिरता, बेहतर प्रबंधन के अभाव में उर्वरक की यह महान केन्द्र रुग्ण स्थिति में बदल चुका है। लेकिन उपरोक्त समस्याएँ सामयिक दिखाई पड़ती है। ज्यों-ही इन परिस्थितियों में थोड़ी बहुत बदलाव आती है तो सिन्दरी पुनः महान उर्वरक केन्द्र के रूप में तब्दील हो जायेगी। सरकार ने सिन्दरी उर्वरक संयंत्र से निकलने वाले कचड़ों से सीमेंट का निर्माण प्रारंभ कर दिया है तथा इसे हल्दिया गैस पाइप लाइन से भी जोड़ने का निर्णय लिया गया है।
इससे स्पष्ट होता है कि आने वाला समय में इनकी महानता पुनः स्थापित हो के रहेगी।
(बिहार में बाढ़ से सम्बन्धित समस्याओं का वर्णन करें।)
उत्तर- बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ की 80 या 85 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। बिहार से झारखण्ड राज्य के अलग होने के कारण यहाँ केवल कृषि का ही क्षेत्र रह गया है। अब बिहार की आर्थिक उन्नति केवल कृषि पर निर्भर है। बिहार में कई समस्याओं के कारण कृषि सम्पदा से परिपूर्ण बिहार आज भी अपनी निर्धनता के लिए देश में विख्यात है। अतः इन समस्याओं के निदान के बगैर इसकी आर्थिक उन्नति असंभव है।
बाढ़ की समस्या:-
बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। बाढ़ नदियों में अत्यधिक जल के कारण आती है। यहाँ की नदियाँ सदियों से विनाशकारी बाढ़ के लिए प्रसिद्ध रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के कुल बाढ़ग्रस्त क्षेत्र का लगभग 64 लाख हेक्टेयर है। इसका अधिकतर क्षेत्र उत्तरी बिहार में पड़ता है। उत्तर बिहार में अधिकतर नदियाँ हिमालय से निकलती है। इन नदियों में कोसी, कमला, बागमती, गण्डक, बूढ़ी गण्डक आदि सम्मिलित हैं।
ये सभी नदियाँ हिमालय के अतिवृष्टि के क्षेत्र से निकलने के कारण काफी जलराशि लाती है, इनका जलग्रहण क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। इन नदियों में बाढ़ का मुख्य कारण हिमालय के तराई क्षेत्र में अत्यधिक वृष्टि है। इस भाग की कोसी तथा गण्डक नदियों का जलक्षेत्र ऊँचे हिमालय के शिखर पर है।
इस भाग में अधिक वर्षा से यहाँ बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण कोसी नदी में जल का प्रवाह काफी तीव्र है। इसका क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहता है। यह नदी मार्ग परिवर्तन के लिए भी विख्यात है। विगत 200 वर्षों से 150 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसक गई है और बार-बार खिसकने से पुरानी धारा जल प्लावन को बढ़ावा देती है। वर्षाऋतु में पूर्णिया से दरभंगा तक का क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका से प्रभावित रहता है। अतः इस नदी को ‘बिहार का शोक’ (‘Sorrow of Bihar’) कहा जाता है। परन्तु कोसी परियोजना के कार्यान्वयन से अब कुछ राहत मिली है।
हिमालय से जब नदियाँ बिहार के मैदान में प्रवेश करती है तो इनके द्वारा लायी गयी जलोढ़ मिट्टी यहाँ के समतल मैदान पर बिछाकर उथला बना देती है और कहीं-कहीं पर अवरोध भी उत्पन्न कर देती हैं। इसके फलस्वरूप नदी अपने दोनों किनारे पर जल फैला देती है। मन्द ढाल के कारण छाड़न झीलें, दलदली भूमि तथा चौर आदि का निर्माण करती हैं।
इसी प्रकार बूढ़ी गण्डक, कमला, बागमती तथा महानन्दा अपने किनारे पर जल फैलाकर बाढ़ उत्पन्न करती हैं। जल की निकासी ठीक से नहीं होती है। इस प्रकार महीनों पानी भरा रहता है और फसलों को क्षति होती है। उत्तरी बिहार के अररिया, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगुसराय, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, छपरा आदि जिलों में भयंकर बाढ़ आती है।
दक्षिण बिहार की नदियाँ पठारी भाग से निकलकर गंगा में गिरती हैं। इस प्रदेश की प्रमुख नदियाँ, सोन, पुनपुन, फल्गु, मोरहर, पैमार, पंचाने, सकरी, मोहाने, कर्मनाशा आदि है। इस भाग में वर्षा के कारण कुछ महीनों के लिए बाढ़ की समस्या बनी रहती है।
जब गंगा नदी स्वयं जलमग्न रहती है तो सोन, पुनपुन, सकरी, फल्गू आदि नदियों के पानी के निकास को अवरूद्ध कर देती है। इसके फलस्वरूप नदियों के प्रवाह क्षेत्र में भयंकर बाढ़ आ जाती है। इन नदियों से भी दलदली भूमि, दियारा भूमि, तालभूमि, चऊर भूमि, तथा जल प्रदेश बन जाते है। वर्षाऋतु में पटना से मोकामा तक का क्षेत्र जलप्लावित रहता है। दक्षिण बिहार के मैदान में पटना, उत्तरी नालन्दा, उत्तरी मुंगेर, लक्खीसराय तथा उत्तरी भागलपुर के जिले बाढ़ से प्रभावित होते हैं।
बाढ़ की समस्याओं का निदान-
बिहार में बाढ़ से निपटने के लिए अनेक प्रयास किये गये हैं। इसमें केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा भी कई प्रयास किये गये हैं। इधर बिहार की नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ को नियंत्रित किया गया है। इससे जल की निकासी हो जाती है और बाढ़ की विभीषिका से बचाव भी हो जाता है। सोन नदी पर भी बाँध बनाया गया है। इसके अलावे गंगा तट पर कोइलवर बक्सर बाँध, भूतहीबलान बाँध मधुबनी, वैशाली जिले में हाजीपुर-बाजीपुर बाँध, कोसी के किनारे बदलाघाट-नगरपाला बाँध, त्रिमुहानी कुरसेला बाँध, पुनपुन नदी बाँध, बेतवा नहर बाँध, फल्गु नदी पर उदेरास्थान बाँध आदि है।
बाँध निर्माण के अलावा बाढ़ नियंत्रण के लिए और भी कई उपाय किये गये हैं। पेड़-पौधे लगाकर बाढ़ से बचाव किया गया है। इसका प्रयास भी हो रहा है।
Q. Divide Bihar into agricultural regions and discuss their salient characteristics.
(बिहार को कृषि प्रदेशों में विभाजित करें तथा प्रत्येक की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।)
उत्तर- बिहार की कृषि विभिन्न प्राकृतिक तत्वों पर निर्भर करती है। ये तत्व तापमान, वर्षा, स्थलाकृति, मिट्टी, सिंचाई के साधन आदि हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं पर कृषि तथा फसलों के प्रकार निर्भर करते हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं को आधार मानकर बिहार की कृषि को बाँटा गया है। इन्हीं तत्वों पर फसलों का उत्पादन निर्भर करता है। इन्हीं तत्वों से फसलें प्रभावित होती हैं। जिन भागों में जिस प्रकार की दशाएँ हैं, वहाँ की फसल उगाई जाती है।
उदाहरणार्थ, उत्तरी बिहार में उपजाऊ मिट्टी, 40 सेमी० से अधिक वर्षा, समतल भूमि तथा अधिक जनसंख्या मिलती है। अतः वहाँ इन्हीं भौगोलिक दशाओं के अनुरूप धान की फसल लगाई जाती है। इस क्षेत्र के लिए यही फसल सबसे अधिक उपयुक्त है। भौगोलिक दशाओं की अनुकूलता के कारण प्रति एकड़ उत्पादन भी अधिक होता है। इसी कारण बिहार के उत्तरी सीमान्त क्षेत्र में धान की खेती की अधिकता है, यह पट्टी का निर्माण करता है। इस प्रकार बिहार के कृषि क्षेत्र को निम्नलिखित कृषि पट्टियों में बाँट सकते हैं-
1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र
2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र
3. दक्षिणी गंगा के सिंचित प्रदेश
4. छोटानागपुर के पठारी प्रदेश
1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र:-
बिहार का यह कृषि प्रदेश बूढ़ी गंडक नदी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह मुख्य रूप से बिना सिंचाई के धान का क्षेत्र है। यह प्रदेश उत्तर पश्चिम में संकीर्ण तथा पूर्व में चौड़ा होता गया है। यह भूमि निम्न है और यहाँ मकई और रबी की भी खेती की जाती है। यह पूरा क्षेत्र समतल है। इस भाग में अनेक नदियों में प्रतिवर्ष बाढ़ आ जाती है।
यहाँ की मिट्टी जलोढ़ है। जिसमें नमी रखने की क्षमता अधिक है। इस भाग में वर्षा अधिक होती है। जिसके कारण आर्द्रता अधिक रहती है। कोशी नदी के क्षेत्र में बाढ़ अधिक आती है। जिसके फलस्वरूप धान की फसल को हानि होती है। सामान्य रूप से सम्पूर्ण क्षेत्र में धान की ही खेती की जाती है। इस प्रदेश में मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णिया आदि जिले सम्मिलित हैं। इस भाग में चावल कूटने की मिलें स्थित हैं।
2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र:-
यह प्रदेश उत्तर गंगा में धनहर क्षेत्र के दक्षिण में स्थित है तथा गंगा के दक्षिण का छोटा-सा भाग इसमें सम्मिलित है। इसमें दो तरह की भूमि आती है। पहली भूमि ऊँची है। जिस पर बाढ़ का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसे दियारा भी कहते हैं।
दूसरी भूमि निम्म् भूमि है जो वर्षा के दिनों में जल से भरी रहती है। दोनों ही भूमि पर भदई फसल मकई एवं रबी की फसल होती है। रबी फसलों में गेहूँ, चना, जौ, दलहन एवं तेहलन होता है। कहीं-कहीं पर धान भी होता है। इसकी भूमि भी उपजाऊ है और वर्षा भी अच्छी हो जाती है। गंगा के दक्षिण में मोकामा-बड़हिया के क्षेत्र में गेहूँ और चना काफी होता है।
3. दक्षिणी गंगा का सिंचित प्रदेश:-
यह दक्षिणी गंगा के मैदानी भाग का पूर्व प्रदेश है। यह पश्चिम में पुराना शाहाबाद जिला (आरा, रोहतास, बक्सर, कैमूर) से लेकर पूरब में भागलपुर तक फैला है। इस भाग में कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ की कृषि सिंचाई पर आश्रित है। इसी भाग में सोन एवं सकरी नदियों पर नहरें बनाई गई हैं और इस भाग में आहर तथा पईन के द्वारा भी सिंचाई की सुविधा प्रदान की गई है। इन्हीं सुविधाओं के कारण यहाँ सघन कृषि की जाती है।
इस भाग की सबसे महत्त्वपूर्ण कृषि की फसल धान ही है। आरा एवं रोहतास जिलों में सोन नहर से सिंचाई के कारण धान की अच्छी खेती की जाती है। गया, जहानाबाद, पटना तथा नालन्दा जिलों में भी इसकी खेती की जाती है। धान के अलावे इस भाग में गेहूँ, आलू, चना, दलहन, तेलहन तथा अन्य फसलें होती हैं।
4. छोटानागपुर पठारी क्षेत्र:-
छोटानागपुर की स्थलाकृति तथा मिट्टी की दशाएँ उत्तर बिहार से बिल्कुल भिन्न है। अतः इस भाग की कृषि “प्रणाली” भी भिन्न हैं। इस भाग में पठारी भूमि एवं अनुपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि कम होती है। कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नदी घाटियों में धान की खेती की जाती है तथा ऊपरी पठारी भागों पर मकई, मडुआ, दलहन आदि की खेती की जाती है।
मिट्टी की कमी के कारण खेती करने में अधिक कठिनाई है। नदी घाटी के आर्द्र भागों में खेती अधिक की जाती है। वहाँ सिंचाई की भी थोड़ी सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावे इस भाग में कृषि सिंचाई एवं मिट्टी की कमी के कारण सीमित है।
उत्तर- बिहार की जलवायु उष्णार्द्र मानसूनी है। यह जलवायु अल्प वर्षाकाल तथा दीर्घ शुष्ककाल के मानी जाती है। यहाँ की जलवायु में महाद्वीपीयता के लक्षण मिलते हैं, लेकिन अधिक आर्द्रता के कारण यहाँ संशोधित महाद्वीपीय जलवायु है। उत्तर की ओर हिमालय की हिमाच्छादित श्रेणियाँ इसको मध्य एशिया की ओर से आने वाली शीतल वायु से बचाकर महाद्वीपीय जलवायु का स्वरूप प्रदान करती है। इस जलवायु की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(i) न्यून दैनिक ताप परिसर
(ii) ताप परिसर की समानता
(iii) वायु में अधिक आर्द्रता
(iv) वर्षा का न्यूनाधिक रूप में सर्वत्र होना
(v) ऋतु परिवर्तन होना
बिहार की जलवायु निम्नलिखित भौगोलिक तत्त्वों से प्रभावित होती है-
(i) अक्षांशीय विस्तार
(ii) हिमालय पर्वत की स्थिति
(iii) स्थलाकृति का प्रभाव
(iv) बंगाल की खाड़ी से निकटता
(v) नारवेस्टर तथा अन्य ग्रीष्मकालीन तूफान
(vi) दक्षिण-पश्चिम मानसून की क्रियाशीलता
मॉनसूनी जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ के मौसमी परिवर्तन की हैं। यहाँ की ऋतुएँ ऐसी है जो लयबद्ध रूप में आती है। ग्रीष्मकाल की भीषण गर्मी से उबने के बाद वर्षाकाल की फुहारे वातावरण में प्रसन्नता पैदा करती है। जब वर्षाकाल की उमस से मन उब जाता है, तो शरदकालीन ठण्डक से राहत मिलती है। जबकी शीत लहर से मन घबरा जाता है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है तो ग्रीष्म ऋतु राहत पहुँचाती है। इस प्रकार बिहार की जलवायु में तीन ऋतुएँ स्पष्ट अनुभव की जाती है। अतः यहाँ तीन ऋतुएँ निम्नलिखित हैं-
1. ग्रीष्म ऋतु- मध्य मार्च से मध्य जून तक
2. वर्षा ऋतु- मध्य जून से मध्य अक्टूबर तक
3. शरद ऋतु-मध्य अक्टूबर से मध्य मार्च तक
1. ग्रीष्म ऋतु:-
यह ऋतु मध्य मार्च से प्रारम्भ होता है। इस माह के बाद तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है मई के अन्त तक तापमान बहुत बढ़ जाता है। अधिक गर्मी से सापेक्षित आर्द्रता बहुत घट जाती है। मई-जून में कुछ स्थानों का तापमान 46°C तक पहुँच जाता है। बिहार के पश्चिमी भाग के क्षेत्रों में अधिक तापमान रहता है। पछुआ हवा के कारण हवा बहुत ही गर्म हो जाती है। जिसे ‘लू’ कहा जाता है। इसकी तुलना में पूर्वी भाग के क्षेत्रों में तापमान कम रहता है।
इस ऋतु में अधिक गर्मी के कारण हवा का दबाव कम हो जाता है, हवा के निम्नदाब के कारण बिहार के पूर्वी भाग में चक्रवाती तूफान आता है, जिससे वर्षा होती है, इस तूफान से पूर्णियाँ, कटिहार में 4 से 8 सेमी० वर्षा होती है। इस भयंकर तूफान को ‘काल वैशाखी’ कहते हैं। इस आर्द्रयुक्त हवा से वर्षा होती है, जिसे नारवेस्टर या मैंगोसाँवरकहते हैं। इस वर्षा से आम एवं लीची फसलों को फायदा पहुँचती है। इस मौसम में गया शहर का तापमान सबसे ऊँचा 47°C तक चला जाता है।
(2) वर्षा ऋतु:-
ग्रीष्मकाल से भीषण गर्मी के कारण एक विशाल निम्न भार का कटिबन्ध कायम हो जाता है। इस निम्न भार को भरने के लिए बंगाल की खाड़ी से मुड़कर दक्षिण-पश्चिम हवाएँ स्थल की ओर चलने लगती हैं। बिहार में मानसूनी हवा का प्रवेश पूर्व से जानेवाली मानसूनी धारा के रूप में होता है। यह हिमालय के समानान्तर चलती है। सामान्यतः 15-20 जून तक बिहार में मानसून का आगमन हो जाता है। इस मानसून के आगमन से तापमान में कमी होती है और सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे तापमान में कमी होती है और उमस बढ़ जाती है। जुलाई-अगस्त में काफी वृष्टि होती है।
राज्य के पूर्वी भाग में वर्षा अधिक तथा पश्चिम में वर्षा कम होती है। पूर्व में स्थित कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा तथा पश्चिम में स्थित राज्य के कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है। जैसे- पूर्णियाँ 107.5 सेमी०, सहरसा 138.5 सेमी०, दरभंगा 125 सेमी०, पटना 117 सेमी०, गया 99.2 सेमी० इस आँकड़े से पूर्व से पश्चिम आने पर वर्षा में कमी आती जाती है।
बिहार में अधिकतर वर्षा ग्रीष्मकालीन मौनसून से होती है। इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून भी कहते हैं।
मानसून की वापसी तापमान की कमी के कारण अक्टूबर माह में प्रारम्भ होती है। इस काल में वर्षा की स्थिति नहीं बन पाती है। इस समय केवल हथिया नक्षत्र में थोड़ी वर्षा हो जाती है। इस समय रबी की फसल की बुआई शुरू हो जाती है।
3. शरद ऋतु:-
वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर सितम्बर महीने से तापमान में गिरावट शुरू हो जाती है। इसके फलस्वरूप नवम्बर से फरवरी तक की अवधि में शीत शुष्क में बदल जाती है। इस ऋतु में मौसम अच्छा रहता है। यहाँ का औसत तापमान 10°C से नीचे चला जाता है। इस समय पश्चिमी चक्रवात से थोड़ी वर्षा हो जाती है। वर्षा की मात्रा 1 से 2 सेमी० से अधिक नहीं होती है। इस ऋतु में पटना का औसत तापमान 6.1°C, गया का 5.8°C तथा पूर्णियाँ का 4.4°C रहता है। शरद के अन्तिम चरण में तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।