31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात



भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात  

         जब किसी निम्न वायुदाब केंद्र के चारों ओर तीव्र गति से हवा घुमने की प्रवृति रखती है तो उसे चक्रवात कहते है। फेरल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में यह परिसंचरण घड़ी की सुई के उल्टी दिशा में और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा में होती है।

      उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 8º से 20º अक्षांश के बीच होती है। यह उष्ण कटिबंधीय प्रदेश की चक्रवात है। इसकी उत्पत्ति एक निम्न वायु दाब केंद्र के बनने से प्रारंभ होता है जिसे आँख या आवर्त (Vertex) कहा जाता है।

              उष्ण चक्रवात के उत्पत्ति के लिए दो प्रकार के वायु राशि की आवश्यकता पड़ती है। ये दोनों वायु राशि अलग-अलग विशेषताओं के होते है लेकिन तापीय प्रभाव अधिक होने के कारण वायु तेजी से गर्म हो जाती है और अंततः प्रारंभिक गुणों को छोड़ तेजी से ऊपर उठने लगती है और निम्न वायुदाब केंद्र का निर्माण करती है। इस निम्न वायुदाब केंद्र को ठंडी वायु चारों ओर से भरने के लिए दौड़ती है लेकिन पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव में वायु घुमने लगती है और चक्रवात को जन्म देती है।

     भारतीय  उपमहाद्वीप पर आने वाले चक्रवात को पश्चिम बंगाल में नार्वेस्टर, बिहार में आंधी, पंजाब एवं हरियाणा में तूफान कहते है। इसका केंद्र सामान्यत: बंगाल की खाड़ी या उसके तटवर्ती क्षेत्र में होता है। प० तट पर चक्रवातीय प्रभाव सिर्फ गुजरात में देखने को मिलता है। भारत में आनेवाले उष्ण चक्रवात को समय के दृष्टि से तीन भागों भागों में बांटते है-

(1) मानसून पूर्व चक्रवात 

(2) मानसून काल के दौरान आने वाला चक्रवात

(3) मानसून के बाद का चक्रवात

         मानसून पूर्व चक्रवात का आगमन मुख्यत: 15 अप्रैल से जून के प्रथम सप्ताह के बीच आता है। इसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यत: गोदावरी नदी के उत्तरी भाग में होता है। इसका प्रारंभिक केंद्र (15 अप्रैल से 15 मई के बीच) महाद्वीप या स्थलखंड के ऊपर होता है लेकिन 15 मई के बाद यह तट के किनारे अवस्थित होते है।

           प्रारम्भिक चक्रवात कम विनाशकारी होते है जबकि तटीय चक्रवात अधिक विनाशकारी होते है। प्रारंभिक चक्रवात का केंद्र प० बंगाल के ऊपरी मैदान (सामान्यत: मालदा से दिनाजपुर के बीच) में होती है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण मैदान की तुलना में आस-पास के क्षेत्र का उच्च भार क्षेत्र है उच्च भार का क्षेत्र मेघालय का पठार, छोटानागपुर का पठार, उपरी गंगा का मैदान, बंगाल की खाड़ी व हिमालय के ऊपर होता है। इसी चक्रवात को नार्वेस्टर या कालबैशाखी कहते है। इसकी प्रमुख विशेषता है पहले शुष्क तेज वायु चलती है फिर वर्षा होती है। 

           लेकिन मई के उतरार्द्ध में परिस्थितियाँ बदलने लगती है। सम्पूर्ण महाद्वीप क्षेत्र एक गर्म वायु राशि क्षेत्र में बदल जाता है जबकि बंगाल की खाड़ी दूसरी गर्म महासागरीय वायु राशि का निर्माण करती है।

         तापीय प्रभाव के अनिश्चितता के कारण तटवर्ती क्षेत्र में और मुख्यत: दो वायु राशि के बीच मध्य तटवर्ती क्षेत्र में निम्न भार केंद्र का विकास होता है और दो वायु राशियाँ इसी केंद्र के चारों तरफ घुमने लगती है। बंगाल की खाड़ी की वायुराशि बाधा रहित होती है अत: तेजी से महाद्वीपीय क्षेत्र के ऊपर प्रहार करती जो भारी वर्षा और विनाश को जन्म देता है। यह सही अर्थों में प्राकृतिक विपदा के समान होता है। 

अरब सागर में उत्पन्न होने वाले चक्रवात

            अरब सागर भी एक गर्म महासागरीय उष्ण वायु राशि का निर्माण करते है लेकिन यहाँ चक्रवातीय परिस्थितियाँ नहीं बनती है क्योंकि चक्रवातीय परिस्थिति के लिए दो अलग-अलग विशेषताओं की वायु राशि का निर्माण होना आवश्यक है। भारत का पश्चिमी तट अत्यंत ही संकरा एवं रेखीय है जो स्थलीय और समुद्री समीर के लिए तो अनुकूल है लेकिन समान विशेषता की वायु राशि के निर्माण के लिए अनुकूल नहीं है।

           इस संकरे प्रदेश पर पर्वतीय और महासागरीय वायु की विशेषताओं का प्रभाव पड़ जाता है और वे वायु राशि के रूप में काम नहीं कर पाते है। यही कारण है कि भारत के पश्चिमी तट पर चक्रवात की उत्पत्ति नहीं होती है लेकिन गुजरात के काठियावाड़ का प्रायद्वीप एक अपवाद है जहाँ चक्रवातीय प्रभाव पड़ते है लेकिन चक्रवातीय बारंबारता कम होती है।

         गुजरात का क्षेत्र लगभग मैदानी या सपाट है। अत: यह महाद्वीपीय उष्ण गर्म वायु राशि बनाते है। जब भी ये दो गर्म वायु राशियाँ एक-दूसरे के ऊपर दबाव उत्पन्न करती है तो चक्रवात का आगमन होता है लेकिन चक्रवात की कम दबाव बारम्बारता का मूल कारण इस प्रदेश में चलने वाली सन्मार्गी वायु है। सन्मार्ग्री वायु दोनों वायु की दिशा एक तरफ कर देती है। विश्व के सभी उष्ण मरुस्थल सन्मार्ग्री वायु के स्रोत होते है।

        राजस्थान मरुस्थल से चलने वाली वायु का प्रभाव गुजरात प्रदेश पर भी पड़ता है। यही कारण है कि चक्रवातीय प्रवाह तब तक उत्पन्न नहीं होते जब तक कि गुजरात के तटवर्ती क्षेत्र में तापीय प्रभाव अत्यधिक गहन नहीं हो जाता है।

          अधिक तापीय प्रभाव से जब संवहनीक क्रिया होती है तो गुजरात प्रदेश की वायु गर्म होकर विषुवतीय निम्न भार की तरफ न जाकर लम्बवत रूप से ऊपर उठ जाती है। इससे सन्मार्ग्री वायु का प्रवाह बाधित होता है। इसके बाद प्रवाह के मध्य निम्न भार केंद्र उभर जाते है और वायु अपनी दिशा बदल लेती है और चक्रवात को जन्म देती है।

भारत में उष्णकटिबंधीय

            मानसून के समय भी उष्ण चक्रवात उत्पन्न होती है जिसके कारण चक्रवातीय वर्षा होती है। प्रारंभ में यह अवधारणा थी कि मानसूनी वर्षा पर्वतीय वर्षा है लेकिन 1977 के MONEX Expedition के समय से ही यह निश्चित हो चूका है कि भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में मानसूनी वर्षा चक्रवातीय होती है।

          पर्वतीय वर्षा का क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत, हिमालय  और उत्तर का मैदानी क्षेत्र है लेकिन उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र के आंतरिक भागों में अधिकत्तर वर्षा चक्रवातीय होती है।

        सामान्यत: यह देखा जाता है कि उड़ीसा के तटीय क्षेत्र से लेकर शिमला तक तथा उड़ीसा के तटीय क्षेत्र से प० राजस्थान तक ऐसे अक्ष का निर्माण होता है, जिसके अनुरूप निम्न वायुदाब का क्षेत्र स्थानान्तरित होता है और इसी स्थानांतरण के साथ गर्म वायु उठ कर संतृप्त होती है और इन प्रदेशों में वर्षा लाती है।

         मानसून के बाद चक्रवात का आगमन मुख्यत: गोदावरी नदी के द० में देखने को मिलती है। ये चक्रवात 15 अक्टूबर से दिसम्बर के प्रथम सप्ताह के बीच आते है। इसका प्रभाव मुख्यतः दक्षिण आंध्रप्रदेश तथा तमिलनाडू में देखने को मिलता है। इसकी उत्पत्ति का मूल कारण दो गर्म वायु का एक-दूसरे के विपरीत दिशा में अपवाहित होना है। इनसे गर्म वायु राशियों का निर्माण द०-प० मानसूनी वायु तथा उ०-पू० मानसूनी वायु द्वारा होता है।

        प्रायद्वीपीय भारत के द०-पू० तट पर जब ये दो वायु राशि मिलते है तो चक्रवातीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है लेकिन नवम्बर के अंत आते-आते द०-प० मानसून वायु पूर्णत: पीछे हट जाती है और ऐसी स्थिति में उ०-पू० मानसूनी वायु ही सम्पूर्ण महाद्वीपीय क्षेत्र पर अपवाहित होने लगते है। इससे तमिलनाडु में पर्वतीय वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। यही काण है कि दिसंब में चक्रवात नहीं आते है।        

भारत में उष्णकटिबंधीय

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

       34.भारत की प्राकृतिक वनस्पति



भारत की प्राकृतिक वनस्पति

           प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उगने वाले वनस्पतियों के समुच्य को “प्राकृतिक वनस्पति” कहते हैं। दूसरी ओर वैसी वनस्पति जो मानवीय हस्तक्षेप से विकसित होती हैं उन्हें “मानव जनित वनस्पति” कहते हैं। जैसे- बाग-बगीचा, उद्यान आदि।

       प्राकृतिक वनस्पतियों के ऊपर जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। कोपेन के अनुसार उपरोक्त तीनों कारकों में सर्वाधिक प्रभाव जलवायु का पड़ता है। उन्होंने बताया कि- “वनस्पति जलवायु का सूचकांक होता है।”

     प्राकृतिक वनस्पति में पुनर्नवीनीकरण का गुण पाया जाता है। इसका तात्पर्य है कि यदि पृथ्वी को 25 वर्षों तक स्वतंत्र छोड़ दिया जाय तो यह पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों से भर जायेगी। पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों में अनुकूलन की क्षमता भी पायी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार

     भारत की प्राकृतिक वनस्पति प्राकृतिक वातावरण में रहते हुए विविध रूपों में रूपान्तरित हो चुकी है। भारत में लगभग 30 हजार से अधिक प्रकार के वनस्पति पाये जाते हैं। इन वनस्पत्तियों को वर्षा और तापीय स्थिति के आधार पर छ: भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

(4) ज्वारीय वनस्पति

(5) उपोषण पर्वतीय वनस्पति

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति-

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति की तुलना ‘विषुवतीय वनस्पति’ से की जाती है। इसकी सामान्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

(i) इसकी वृक्ष की लम्बाई 30-60 मी० तक होती है।

(ii) इसकी जड़े बहुत गहराई तक नहीं पहुँच पाते हैं क्योंकि धरातल पर ही उन्हें पर्याप्त वर्षा जल प्राप्त हो जाती है।

(iii) पौधों में शाखाएँ कम पायी जाती हैं जिसके कारण इसका बितान कम चौड़ा होता है।

(iv) इसका तना काफी कठोर होता है।

(v) पत्तियाँ चौड़ी होती हैं क्योंकि सूर्य की रोशनी प्राप्त करने के लिए पौधों में प्रतिस्पर्धा चलती है।

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति में विविध प्रकार के वृक्ष एक साथ मिलते हैं। वृक्षों के ऊपर बड़े पैमाने पर अधिपादप (Ekiphyte) पाये जाते हैं। वृक्ष सालोंभर हरे-भरे रहते हैं। ये एक ही बार में सभी पत्तियों को नहीं गिराते, इसीलिए इसे “चिरहरित सदाबहार वनस्पति” कहते हैं। प्रमुख वृक्षों में महोगनी, बालनट, आबनूस, कब्रेका, सिनकोना, गाटापार्चा, एबोनी, रबड़, तेलताड़, सीडर, रोजवुड, आयरन वुड आदि हैं।

       उष्णार्द्र सदावहार वनस्पति सामान्यतः वैसे क्षेत्र में विकसित होती है, जहाँ वर्षा सालों भर होती है। तापमान अति उच्च रहता है। वर्षा 130-250 cm के बीच होती है। औसत तापमान 22°- 27°C, वायुमण्डलीय आर्द्रता 70% तथा तापान्तर 10°C से कम रहता है।

        भारत में विषुवतीय वनस्पति के तीन प्रमुख क्षेत्र है-

(i) अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह,

(i) मालाबार और कोंकण तट,

(iii) उ.-पू. भारत

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

         भारत के मानसूनी जलवायु क्षेत्रों में उगने वाले वनस्पति को मानसूनी वनस्पति कहते हैं। मानसून क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दो शुष्क एवं आर्द्र जलवायु पायी जाती है। उष्णार्द्र मानसूनी वनस्पति शुष्क मौसम में पत्तियाँ गिरा देती है जिसे “पतझड़ मानसूनी वन” कहते हैं। जैसे- शीशम, पीपल, सागवान, इमली, अमलतास, एक्सल, सेमल आदि। मानसूनी प्रदेश में कुछ ऐसे भी वृक्ष मिलते हैं जो एक ही बार पत्तियों को नहीं गिराते हैं। जैसे- आम, अमरूद, बरगद इत्यादि। मानसूनी वनस्पति की जड़े विषुवतीय वनस्पति की तुलना में लम्बी होती है। तना मोटा होता है। बितान चौड़ा होता है। पतियों की चौड़ाई सामान्य होती है। वृक्षों के छाल काफी मोटे होते हैं। शुष्कता से बचने के लिए ही पौधे पत्तियों को गिराती है।

       मानसूनी वनस्पति मानसूनी जलवायु के प्रभाव में उगने वाली वनस्पति है। यहाँ न्यूनतम तापमान 18ºC अधिकतम तापमान 35°C, वर्षा ऋतु में वर्षा की मात्रा 60-130 cm नवम्बर से मई महीने तक मौसम शुष्क पायी जाती है।

        मानसूनी वनस्पति का विस्तार गंगा के मैदानी क्षेत्र, शिवालिक पर्वत, असम के मैदान, कोयम्बटूर के पठार, मध्यवर्ती भारत में हुआ है। भारत में मानसूनी वनस्पति का विस्तार सबसे अधिक क्षेत्र पर हुआ है।

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

          शुष्क जलवायु प्रदेशों में उगने वाले वनस्पति को “शुष्क और अर्द्धशुष्क वनस्पति” कहते हैं। सामान्यतः ऐसे वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं-

(i) अर्द्ध शुष्क वनस्पति

(i) पूर्ण शुष्क वनस्पति

           अर्द्ध शुष्क वनस्पति में घासभूमि और झाड़ियाँ बड़े पैमाने पर मिलती है। झाड़ियों की ऊँचाई 6-9 मी० तक होती है। जबकि पूर्ण शुष्क वनस्पति में कंटीले या कैक्टस वनस्पति का विकास बड़े पैमाने पर होता है। खेजड़ी अर्द्धशुष्क प्रदेश की प्रमुख वृक्ष हैं। जबकि पूर्ण शुष्क प्रदेश में नागफनी, बबूली, खजूर जैसे वृक्ष मिलते हैं। शुष्क वातावरण होने के कारण पौधों की जड़ें जलग्रहण करने हेतु काफी लम्बी हो जाती है। पत्तियाँ काँटों में रूपान्तरित हो जाती है। पति और तना के ऊपर मोम जैसे परत विकसित हो जाते हैं। कीटों को आकर्षित करने हेतु फूलों के रंग काफी चटकदार हो जाते हैं।

       50-100 cm वर्षा वाले क्षेत्रों में अर्द्धशुष्क वनस्पति का विकास होता है। जबकि 50 cm ये कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पूर्ण शुष्क वनस्पति का विकास होता है। शुष्क मानसूनी वनस्पति का विकास वहीं होता है जहाँ 8-11 माह तक शुष्क मौसम रहती है। तापमान और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया अधिक होती है।

        अरावली पर्वत के पूर्वी भाग में, द. भारत के वृष्टिछाया प्रदेश में तथा लेह लद्दाख क्षेत्र में ‘अर्द्धशुष्क वनस्पत्ति’ पायी जाती है। जबकि थार मरुस्थलीय क्षेत्र में “पूर्ण शुष्क वनस्पति” पायी जाती है।

(4) ज्वारीय वनस्पति

        इसे ‘गरान’ या ‘मैंग्रोव वनस्पति’ भी कहा जाता है। इसका विकास तटीय क्षेत्रों में हुआ है। चूँकि तटीय क्षेत्रों में लवण की मात्रा अधिक पायी जाती है। इसलिए लवणीय वातावरण के साथ इनका अनुकूलन हुआ है। ज्वारीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वारीय प्रवाह क्षेत्र के वन-

        इसे सुन्दर वन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सुन्दरी, केन और बेंत नामक वृक्ष मिलते हैं। इन वृक्षों की ऊँचाई 30 मी० तक होती है। लकड़ियाँ काफी नाजुक होती है।

(ii) ज्वारीज प्रवाह से मुक्त प्रदेश की वनस्पति-

         यहाँ ताड़ और नारियल जैसे वृक्ष प्रमुख हैं। इनकी लम्बाई बहुत अधिक होती है। तना में रेशम पायी जाती है जिसके कारण लकड़ियाँ काफी मजबूत होती है।

     ज्वारीय वनस्पति मुख्य रूप से विषुवतीय वातावरण में उगने वाली वनस्पति है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में अधिक लवण पाये जाने के कारण अनुकूलन की क्षमता पायी जाती है। जैसे- धरातल के ऊपर आ जाते हैं ताकि श्वसन की क्रिया आसानी से हो सके।

      भारत में ज्वारीय वनस्पति का विकास तटवर्ती क्षेत्रों में स्थित ज्वारनदमुख, नदियों के मुहानों, संकरी खाड़ियों या निवेशिकाओं में हुआ है। गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा मैन्ग्रोव वनस्पति का क्षेत्र है।

(5) उपोष्ण पर्वतीय वनस्पत्ति

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति का विकास वैसे क्षेत्रों में हुआ है जहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है। लेकिन, ऊँचाई के कारण जलवायु में परिवर्तन हुई है और यह उपोष्ण जलवायु में बदल चुकी है। उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते है। जैसे-

(i) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति और

(ii) आर्द्र शीतोष्ण पहाड़ी वनस्पति

      आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति 1070-1525 मी० की ऊँचाई पर मिलती है। जबकि आर्द्र शीतोष्ण वनस्पति 1525 से भी अधिक ऊँचाई पर मिलती है। ऐसे वनस्पति को ‘सोलास वन या शोला वन के नाम से भी जानते हैं। उपरोक्त दोनों प्रकार के वनों में मिलने वाले वृक्ष सदाबहार प्रकार के होते हैं। ज्यों-2 ऊँचाई बढ़ती जाती है त्यों-2 लकड़ी गुलायम तथा पते की चौड़ाई कम होते जाती हैं। चेस्टनट, रोजवुड, यूकेलिप्टस, देवदार, पाइन इत्यादि वृत मिलती हैं।

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति उपोष्ण जलवायु क्षेत्र में पायी जाती हैं। यह प्रायद्वीपीय भारत की वनस्पति है। जो अरावली, विन्ध्यन, सतपुड़ा, अजन्ता, पूर्वी घाट, प० धाट, नीलगिरि, अन्नामलाई की पहाड़ियों पर 1070 मी० से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलते हैं।

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

         इसे अल्पाइन वनस्पति भी कहते हैं। हिमालय प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति पर निम्न कारकों का प्रभाव पड़ा है। उच्चावच, पवन, वर्षा की मात्रा, ऊँचाई के साथ तापीय परिवर्तन, अक्षांश और ढाल का।

     हिमालय का उत्तरी ढाल मंद और द० ढाल तीव्र है जिसके कारण उत्तरी ढालों पर वनों का विस्तार अधिक तथा दक्षिणी ढालों पर वनों का विस्तार कम हुआ है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर कश्मीर हिमालय में मिलने वाले घास को ‘गुलमर्ग’ और ‘सोनमर्ग’ तथा कुमायूँ हिमालय में बुग्याल और ‘प्यायर’ कहते हैं। यह एक शीतोष्ण प्रकार के मुलायम घास है जिसका प्रयोग पशुचारे के रूप में किया जाता है।

       अक्षांशीय प्रभाव के आधार पर भी हिमालय के वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं।

 (i) पूर्वी हिमालय की वनस्पति और

(ii) पश्चिमी हिमालन की वनस्पति।

        पूर्वी हिमालय निम्न अक्षांश पर है। अतः यहाँ आर्द्रता अधिक, वर्षा 200 cm तक और सूर्य की लम्बवत किरणें मिलती है। जबकि पश्चिम हिमालय अपेक्षाकृत उच्च अक्षांश पर स्थित है जिसके कारण आर्द्रता कम, वार्षिक वर्षा 75 से कम और सूर्य की लम्बवत किरणों का प्रभाव कम पड़ता है। पूर्वी हिमालय में पतझड़ वन मिलते है जबकि प० हिमालय में नहीं। इसी तरह प० हिमालय में शीतोष्ण शुष्क वनस्पति मिलती है जबकि पूर्वी हिमालय में नहीं।

        हिमालय प्रदेश की वनस्पति पर उच्च्वाच का व्यापक प्रभाव पड़ा है। ऊँचाई के अनुसार ताप में परिवर्तन होते है और उसी के अनुरूप वनस्पति बदलते हैं जिसे नीचे के चित्र में दिखाया गया है।

भारत की प्राकृतिक

चित्र: भारत के प्राकृतिक वनस्पति

            इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में अनेक प्रकार के प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती हैं। इन वनस्पतियों पर जलवायु, उच्चावच, ढाल, मिट्टी, सूर्याताप, समुद्र से दूरी इत्यादि भौगोलिक काकों का प्रभाव पड़ा है। इन कारकों में सबसे ज्यादा प्रभाव जलवायु का पड़ा है। इसलिए कोपेन का कथन सत्य प्रतीत होता है कि “भारतीय वनस्पतियाँ जलवायु के सूचकांक होती हैं।”

प्रश्न प्रारूप

1. “भातीय प्राकृतिक वनस्पतियाँ जलवायु के सूचक हैं।” विवेचना करें।

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?



पश्चिमी विक्षोभ

     पश्चिमी विक्षोभ जाड़े की ऋतु में भूमध्यसागरीय भाग में उत्पन्न होने वाली एक शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात है जो पछुआ हवा के द्वारा पूरब की ओर ढकेल दिया जाता है। यह मार्ग में वर्षा कराते चलती है। यही हवा भारत के पंजाब, हरियाणा और गंगा घाटी क्षेत्र में प्रवेश कर वर्षा करती है जिससे इसमें बची-खुची नमी समाप्त हो जाती है।

         वर्षा के पश्चात् जब शुष्क हवा हिमालय के तलहट्टियों से पूरब की ओर बहती है तो वहाँ भीषण हिमपात होती है। परंतु, जब यह हवा मैदानी भाग में पुरब की ओर बढ़ती है तो राजस्थान के रेगिस्तानी प्रदेश की शीतलता को अपने साथ लेकर चलती है जिससे मैदान का तापमान काफी कम हो जाता है। इसे स्थानीय भाषा में “शीतलहर” कहा जाता है।

         चूँकि भूमध्यसागर की अक्षांशीय स्थिति 37°N अक्षांश है और भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ से 37°6’N अक्षांश है। उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटी 30°N से 35°N अक्षांश के बीच स्थित है। चूँकि पछुवा हवा 35°N से 60°N अक्षांश के बीच द०-प० से उ०-पू० की सोर चलती है।

        जब पछुआ हवा उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी से चलती है तो वह भूमध्य सागर से नमी ग्रहण करते हुए उ०-पू० दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं लेकिन उसके मार्ग में अवरोधक के रूप में भूमध्यसागर के उत्तर में आल्प्स पर्वत से लेकर पूरब में हिमालय पर्वत तक पर्वतों की लगातार लम्बी श्रृंखला मिलती है। फलस्वरूप पछुआ हवा इन पर्वतों के दक्षिणी ढाल के सहारे पश्चिम से पूरब दिशा में प्रवाहित होने लगती है जिसे “पछुआ विक्षोभ” कहते हैं। इसी पछुआ विक्षोभ से भारत के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भागों में जाड़े के दिनों में वर्षा होती है।

पछुआ विक्षोभ का आर्थिक प्रभाव

         भारत के आर्थिक जीवन में पछुआ विक्षोभ का प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ता है। जैसे-

(1) कृषि पर प्रभाव⇒

          पछुआ विक्षोभ के कारण जाड़े की ऋतु में वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ की फसल के लिए काफी फायदेमंद होती है। पंजाब में यह वर्षा जनवरी तथा फरवरी महीने में होती है। वहाँ की कृषि के लिए इस वर्षा का काफी महत्व है क्योंकि रबी फसल की सफलता इसी वर्षा पर निर्भर करती है।

     चूँकि पछुआ हवा जब राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों की शीतलता को अपने साथ लेकर मैदानी भागों में प्रवेश करती है तो यहाँ के तापमान में गिरावट आती है। फलतः यहाँ के जायद फसल एवं मसूर के फसलों में पाला लग जाती है और वे बर्बाद होने लगते हैं।

(2) पशुपालन पर प्रभाव⇒

        पछुवा हवा के कारण जाड़े की ऋतु में उत्तर भारत में शीतलहरी पड़ने लगती है जिसके कारण कई पशुओं को ठण्डा लग जाता है और उनकी मृत्यु भी हो जाती हैं। फलत: पशुपालकों को इससे हानि हो जाती हैं।

(3) उद्योगों पर प्रभाव⇒

      पछुआ विक्षोभ के प्रवेश करने से उत्तर भारत में काफी ठण्ड पड़ने लगती है। फलत: ठण्ड से बचने के लिए लोग ऊनी वस्त्रों का इस्तेमाल करते हैं। इसी के निर्माण के लिए पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि में ऊनी वस्त्र उद्योगों का विकास किया गया है।

        पंजाब, हरियाणा में गेहूँ का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है जिसमें पछुआ विक्षोभ का फाफी योगदान होता है। फलतः उत्तर भारत में गेहूँ, दलहन, तेलहन आदि की मीलों का विकास काफी संख्या में की गई है।

(4) पर्यटन उद्योग पर प्रभाव⇒

       जम्मू और कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ के कारण बड़े पैमाने पर बर्फ-बारी होती है। इसी का आनन्द उठाने के लिए यहाँ काफी संख्या में पर्यटक लोग आते हैं। इन पर्यटकों से जम्मू और कश्मीर को काफी आमदनी होती है। यहाँ पर्यटन पर आधारित कई उद्योगों का विकास किया गया है। जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पर्यटन उद्योग पर ही आधारित है।

(5) परिवहन पर प्रभाव⇒

        जम्मू और कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ के कारण जब काफी मात्रा में कई दिनों तक बर्फ-बारी होने लगती है तो सड़कें बर्फ से ढक जाते हैं। फलस्वरूप परिवहन मार्गों में बाधा उत्पन्न हो जाती है।

(6) शादी-विवाह पर प्रभाव⇒

        जब पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा के कारण पंजाब, हरियाणा में रबी फसल का उत्पादन काफी मात्रा में होती है तो किसानों की आमदनी बढ़ जाती है। फलत: जवान बेटा-बेटियों की विवाह काफी धूम-धड़ाके से की जाती है। इस अवसर पर आरकेस्ट्रा, नर्तकी, गायक, बैण्ड बाजा, भोज-भण्डार आदि का बड़े पैमाने पर आयोजन होता है। ‘तिलक’ में वृद्धि हो जाती है। हालाँकि तिलक लेना बहुत बड़ा पाप और अपराध है। मैं ऐसा कभी नहीं करूँगा।

(7) प्रबंधन पर प्रभाव⇒

         जब किसानों को फसलों के उत्पादन से काफी आमदनी होने लगती है तो वे अपने बच्चों को MCA, BCA, MBA मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन करवाते है जिसके कारण प्रबंधकों की आय में वृद्धि होती है।

(8) शिक्षण संस्थानों पर प्रभाव⇒

       जब पछुआ विक्षोभ के कारण होने वाली वर्षा से किसानों की फसलों की पैदावार काफी अच्छी होती है। तब वे अपने बच्चों को उच्च स्तर की पढ़ाई के लिए बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों में नामांकन दर्ज करवाते हैं जिसके कारण शिक्षण संस्थानों की आमदनी बढ़ जाती है।

(9) बैंकिंग पर प्रभाव⇒

       जब अच्छी पैदावार के कारण किसानों की आमदनी बढ़ती है तो वे अनाज को बेचकर बैंक में रुपये जमा करते हैं। यदि पछुवा विक्षोभ के कारण उनकी फसल बर्बाद होती है तब उन्हें पूँजी एवं अन्य कार्य के लिए बैंकों से ऋण लेनी पड़ती है। इससे बैंकों को ब्याज के रूप में आमदनी होती है।

(10) शेयर बाजार पर प्रभाव⇒

       जब किसान एवं व्यवसायियों की आमदनी काफी बढ़ने लगती है तो वे अपना पैसा शेयर बाजार में लगाते है, जिसके कारण शेयर बाजार के सूचकांक में उत्तर एवं चढ़ाव आता है।

(11) स्वास्थ्य पर प्रभाव⇒

        जाड़े की ऋतु में पछुआ विक्षोभ के कारण उत्तर भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगती है जिसके कारण कई लोग सर्दी-जुकाम से पीड़ित हो जाते हैं। कई बुढ़ा-बुढ़ी इसके शिकार भी हो जाते हैं।

(12) बाजार पर प्रभाव⇒

          जब पछुआ विक्षोभ के कारण उत्तरी भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगती है तो लोग इससे बचने के लिए ऊनी वस्त्र, कम्बल, रजाई, हीटर आदि का प्रयोग करते हैं। ये सभी वस्तुएँ बाजार से ही खरीदी जाती हैं। दूसरी तरफ जब फसलों के उत्पादन से किसानों की आमदनी बढ़ती है तो वे बाजार से अन्य कई उपयोगी वस्तुएँ खरीदतें हैं। फलत: बाजार में चहल-पहल का महौल बना रहता है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त आर्थिक गतिविधियों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पछुआ विक्षोभ खासकर उत्तर भारत के कई आर्थिक क्रियाकलापों को सकारात्मक एवं नाकारात्मक दोनों रूपों से प्रभावित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. पश्चिमी जेट प्रवाह जाड़े के दिनों में किस प्रकार पश्चिमी विक्षोभ को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने में मदद कता है? भारत के आर्थिक जीवन पर पछुआ विक्षोभ का क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।



हिमालय के आर्थिक महत्व

हिमालय की उत्पति:-

        हिमालय की उत्पत्ति की व्याख्या हैरीहेस के द्वारा दिया गया सिद्धांत प्लेट विवर्तनिक के सिद्धांत से करते है। प्रारंभ में सारे महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे और उनके चारों ओर अवस्थित महासागर पैन्थालासा कहलाया। मेसोजोइक काल में पैंजिया के धसान से टेथीस महासागर बना।

        टेथिस महासागर के उत्तरी भाग वाला प्लेट अंगारा प्लेट और दक्षिण भाग वाला प्लेट गोंडवाना प्लेट कहलाया। उन प्लेटों से होकर लाखों लाख वर्ष तक नदियाँ गुजरती रही और निक्षेपण का कार्य चलता रहा। इन निक्षेपण के परिणामस्वरूप भूपटल पर अत्याधिक मात्रा में अवसाद जमा हो गया, इन अवसादों के जमाव से भूपटल का भार बढ़ गया, गति उत्पन्न होने लगी, गोंडवाना प्लेट खिसकने लगा परिणामस्वरूप गोंडवाना का अग्रिम भाग बुल्डोजर के समान टेथिस सागर के ऊपर जमा मलवा पर दबाव बनाने लगा। जिसके कारण टेथिस सागर के मलवा के ऊपर बुल्डोजर विस्थापित हो गये, परिणामतः हिमालय की उत्पति हुई।

हिमालय का आर्थिक महत्व:

      हिमालय पर्वत के निर्माण से भारत के भौतिक, आर्थिक एवं जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ा। हिमालय का आर्थिक महत्व निम्नलिखित है:-

(1) हिमालय पर्वत साइबेरिया और रूस की ओर से आनेवाली ठण्डी एवं शुष्क पवन से रक्षा करती है। जब अत्याधिक ठंडी हवा को हिमालय रोकती है तो इसका सीधा प्रभाव हमारे देश के आर्थिक क्रियाकलाप पर पड़ता है जैसे-

       भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ के अधिकतर लोग कृषक है और जब कृषक है तो वे अपने खेत-खलीहान में कार्य करते है। जब वे कार्य करने हेतु खेत को प्रस्थान करते हैं तो मौसम को अपने ध्यान में रखते हुए यदि अत्याधिक ठंड पड़े तो कृषक लोग खेत में कैसे काम करेंगें, परिणामत: हमारे उत्पाद पर असर पड़ेगा। इसलिए हिमालय साइबेरिया से आने वाली ठंडी हवा को रोककर हमारे वातावरण को सामान्य बनाये रखता है।

(2) हिमालय पर्वत भारत के मौसम विज्ञान पर भी गहरा प्रभाव डालता है। हिमालय की उत्तंग हिम चोटियाँ उत्तरी भारत के तापमान एवं आर्द्रता को प्रभावित करती है। अपनी ऊँचाई और अवस्थिति के कारण ही यह अधिकांशत: आर्द्रता को हिम और हिम से जल रूप देती है। हिमालय के हिम क्षेत्रों से अनेक हिमानियाँ विकसित होती है। इससे ही सदानीरा नदी का उद्गम होता है, यहाँ के ढाल पर होने वाली वर्षा और झरना से मिलकर असंख्य नदियों को जन्म देती है।

         गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को जन्म देकर हिमालय अपना सब कुछ उसे अर्पित कर देती है अर्थात हिमालय पर एकत्रित हिम पानी का रूप लेकर इन नदियों में प्रवाहित होकर अपने उत्तमता का प्रमाण दिलाता है। इन नदियों के साथ बहाकर लायी गयी बारीक कांप मिट्टी मैदानों में फैला देती है और यदि कांप मिट्टी जिस मैदान में मिल गया उसकी उर्वरा शक्ति को कहने क्या है? हिमालय की नदियाँ जो बहती हुई भारत के अनेक क्षेत्रों तक जाती है उसका महत्व तो अकथनीय है।

       अतः हिमालय से दूसरी बड़ी फायदा है कि यह भारत वर्ष के लिए सालों भर जल का आपूर्ति कराती है जिसमें बड़े-बड़े शहरों की जलापूर्ति की समस्या को आसानी पूर्वक हल कर देती है। बड़े-बड़े फैक्ट्री में आवश्यक जल की पूर्ती करती है। कृषि प्रधान भारतवर्ष के कृषकों के लिए सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराती है।

(3) हिमालय के हिम आच्छादित शिखर का दर्शन तो ना जाने कैसे कैसे कौतुहल पैदा करता है। उन हिम आच्छादित शिखर और प्राकृतिक सुन्दरता के कारण इस हिमालय का महत्व बहुत अधिक है। उन स्थानों पर भ्रमण करने के लिए लाखों लाख की संख्या में लोग पहुँचते हैं विशेषकर हिमालय के निचले भागों में आते है।

          यहाँ ग्रीष्मावकाश में तो लोग शिमला, कुल्लू, मनाली, कांगड़ी, नैनीताल, मसूरी, देहरादून, चकराता, चम्बा, मुक्तेश्वर, अलमोड़ा, रानी खेत, भुवाली, कसौली, पहलगाँव, लेह, श्रीनगर, दार्जिलिंग का सैर करते हो।

       यहाँ स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक, धार्मिक व सामाजिक वातावरण का लुत्फ उठाते है और ये सब एक दिन में संभव नहीं है। इसके लिए वे होटल में रहते है अर्थात यहाँ का प्रमुख व्यवसाय होटल, ढाबा, परिवहन के साधन, आवश्यक चीज की पूर्ति हेतू छोटे-छोटे दुकान अपनी प्राकृतिक छटा बिखेरती हिमालय ना जाने कितने लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। इससे यहाँ के स्थापित व्यवसाय से कर के रूप में सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है।

(4) हिमालय की घाटियों में जहाँ वृक्षों की सीमा समाप्त और हिम रेखा आरंभ होती है वहाँ छोटे-छोटे चारागाह पाये जाते है जिसे कश्मीर मे मर्ग जैसे- सोनमर्ग, गुलमर्ग और कुमायूँ में बुग्याल या प्यामार कहते हैं। इसमें कश्मीरी और लामा गड़ेरिये, भेड़े, बकरी चराते हैं। अर्थात इन चारागाह स्थल की अवस्थिति है हिमालय में जहाँ भेड़, बकरी के चारागाह उपलब्ध है और इन्हें पालने वाले ऊन, मांस, चमड़े आदि को बेच देते है। जिससे यहाँ के लोगों को जीविकोपार्जन होता है।

(5) पुराण को यदि माने तो हिमालय को देवता स्वरूप माना गया है। इसी के पर्वत श्रेणी में कैलाश, अमरनाथ, मानसरोवर, केदारनाथ, बद्रीनाथ, वैष्णों देवी, तारादेवी, उत्तरकाशी, लक्ष्मण झुला, हरिद्वार आदि प्रमुख तीर्थ स्थल है जहाँ दर्शन हेतु अनेक लोग आते है और इससे भारत सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है।

(6) जलवायु की विभिन्नता और ऊँचाई के कारण हिमालय पर्वत पर विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती है। हिमालय पर्वत के ऊँचे ढालों पर सिल्वर फ्रूट, स्प्रूस, देवदार, बर्च, लार्च, चीड़ आदि वृक्ष मिलते हैं। यहाँ पर अनेक प्रकार के जड़ी-बूटी, कच्चा माल एवं वन्य प्राणियों का आजायबघर है। इन सब उत्पाद से हमारे आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है।

         यहाँ वैसे-वैसे जड़ी-बूटी मिलते है जो शायद ही दूनियाँ में कहीं मिल सके। ऐसे जड़ी-बूटी का उपयोग आज के प्रचलित दवा में मिश्रित कर के हो रहा है। यहाँ अनेक प्रकार के वन्य जीव देखने को मिलते हैं और उन्हें आजायबघर में रखा जाता है लोग इसे देखते है।

(7) बाहरी हिमालय श्रेणी पर असम से लेकर हिमाचल प्रदेश तक चाय और फल की खेती होती है। दार्जीलिंग असम के चाय के कहने क्या है? यहाँ के लोगों के जीविका के मुख्य साधन में से एक है। यह चाय निर्यात किया जाता है जिससे भारत को काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित होता है।

        यहाँ फल की खेती में सेब, बादाम, अंगूर, चेरी, खूवानी, आडू, अखरोट, नाशपाती आदि की खेती होती है। चाय के बाद सेब, अंगूर, चेरी, पूरे भारतवर्ष को उपलब्ध कराता है। इससे भी आय होते हैं।

     इन क्षेत्र में जहाँ कहीं भी समतल भूमि मिल गई वहाँ चावल, गेहूँ, मिर्च, अदरक की खेती होती है। जिससे यहाँ के लोग अपने खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग करते है।

(8) यहाँ पर पेट्रोलियम, सीसा, ताँबा, निकिल, जस्ता, चाँदी, सोना, टंगस्टन, एंटीमनी, मैग्नेसाइट, चूना-पत्थर, बहुमूल्य-पत्थर, रत्न भंडार आदि खनिज पदार्थ के मिलने से इन पर्वतों का आर्थिक महत्व और भी बढ़ गया है। असम में खनिज तेल, भूटान एवं सिक्किम में ताम्बा अयस्क व कोयले के भण्डार पाये गये है।

         यहाँ की जो खनिज की क्षमता है वह भी हिमालय की विशेषता को ही बताता है। इन खनिज की उपलब्धता से भारत दुनिया में अपना सर उठा कर बात करता है। इन खनिज के निष्कासन के लिए बड़ी संख्या में लोगों की आवश्यकता पड़ती है जिससे रोजगार की खाली होती संभावना को यह क्षेत्र पुर्ण करता है। इन खनिज उत्पाद से भारत तरह-तरह के समान बनाता है। अपना आवश्यकता पूरा करता है और अधिशेष को निर्यात कर विदेशी मुद्रा भी अर्जित करता है।

(9) हिमालय से निकलने वाली नदियों के मार्गों में पड़ने वाले जल-प्रपातो से सस्ती जल-विद्युत उत्पन्न की जाती है। सतलज पर भाखड़ा नांगल बाँध परियोजना अंतर्गत बाँध बनाकर जल विद्युत उत्पादन किया जाता है जिससे हमें विद्युत आपूर्ति होती है। इससे बड़ी मात्रा में कोयले का जलना बंद हो जाता है। सीमित संसाधन के वचाव का एक तरीका इन नदियों की उपस्थिति से ही संभव है।

      टोंस, शारदा, गंडक, कोसी आदि नदियों का उपयोग भी जलशक्ति उत्पादन के लिए किया गया है।

    अतः हम कह सकते है कि हिमालय भारत की रक्षा के लिए वचनबद्ध है। क्षा के साथ-साथ आर्थिक उपयोगिता दर्शाते हुए भातवर्ष विकास के किए तत्पर है। हमें आवश्यकता है सही तकनीक दृष्टि डालकर उपयोग करने का।


Read More:

1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश


हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

            हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत है जो भारत के उत्तर में एक चाप के रूप में अवस्थित है। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज/दर्रा से लेकर  ब्रह्मपुत्र गॉर्ज(नामचा बरबा) के मध्य हुआ है। इसकी लम्बाई लगभग 2500Km है। कश्मीर में इसकी चौड़ाई सबसे अधिक (450Km) और अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौड़ाई सबसे कम (150 Km ) है। इस पर्वत में विश्व की कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। ये चोटियाँ सालोंभर हिम से आच्छादित रहती है। इसलिए इसे हिमालय कहते हैं।

          हिमालय का निर्माण अल्पाइन भूसंचलन से तृतीयक काल में हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इसमें तीन प्रमुख श्रृंखलाएँ मिलती हैं। लेकिन पश्चिम से पूर्व की ओर जाने पर स्थलाकृतिक विशेषता के आधार पर इसे चार भागों में वर्गीकृत करते हैं। जैसे-

(1) पंजाब हिमालय / कश्मीर हिमालय / हिमाचल हिमालय

(2) कुमायूँ हिमालय

(3) नेपाल हिमालय

(4) असम हिमालय

हिमालय के स्थलाकृतिक

चित्र: हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

(1) पंजाब हिमालय:- 

        इसे “कश्मीर हिमालय” हिमालय भी कहते हैं। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से लेकर सतलज गॉर्ज (शिपकिला दर्रा) के मध्य हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 560 Km है। यह हिमालय का सबसे चौ० भाग है। चौड़ा होने का प्रमुख कारण हिमालय के साथ-2 ट्रांस हिमालय का पाया जाना है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर क्रमश: काराकोरम, जास्कर श्रेणी, महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय पायी जाती है।

             लघु हिमालय को कश्मीर में पीरपंजाल के नाम से जानते हैं। कश्मीर हिमालय अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस हिमालय में कई क्षेत्रीय विशेषताएं भी पायी जाती हैं। जैसे- ट्रांस हिमालय का निर्माण मुख्य हिमालय के निर्माण से पहले हुआ है। ट्राँस हिमालय पर सालोभर बर्फ, जमी रहती है। हिमानी के अपरदन से सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास हुआ है। यह पूर्णत शीतोष्ण अर्द्धमरुस्थल का भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

            कश्मीर हिमालय में अवस्थित सभी श्रृंखलाओं का उत्तरी ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है। महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में कश्मीर की घाटी अवस्थित है जिसमें डल वुलर झील से होकर झेलम नदी प्रवाहित होती है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मुलायम घास के क्षेत्र मिलते हैं जिसे सोनमर्ग  और गुलमर्ग कहते हैं। पीरपंजाल हिमालय पूर्णतिः वनस्पतियों, जंगलों से ढका हुआ है। इसी पर्वत में पीरपंजाल दर्रा पायी जाती है जिस दर्रे से होकर कुलगाँव से कोठी पहुंचा जाता है।

            बनिहाल दर्रे जम्मू को श्री नगर से जोड़ता है। इसी दर्रा में जवाहर सुरंग का निर्माण किया गया है। महान हिमालय में बुर्जिला और जोजिला जैसे प्रमुख दर्रे मिलते हैं। ट्रांस हिमालय और महान हिमालय में कई हिमानी का प्रमाण मिलता है। जैसे-  काराकोरम श्रेणी का सियाचीन हिमानी सबसे प्रमुख हैं।

(2) कुमायूँ हिमालय:-

        इसका विस्तार सतलज गॉर्ज से लेकर काली नदी के बीच हुआ है। इसका विस्तार हिमाचल प्रदेश और उतराखण्ड में देखा जा सकता है। इसकी लम्बाई मात्र 320Km है। यह हिमालय का सबसे कम लम्बाई वाला हिस्सा है। यहाँ पर महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय तीनों स्पष्ट रूप से पायी जाती है। महान हिमालय में माना और नीति दो प्रसिद्ध कॉल पाये जाते हैं। इसके अलावे नदियों के द्वारा निर्मित कई दर्रे पाये जाते हैं। जैसे थागला दर्रा, लिपुलेख, पिथौरागढ़ दर्रा सबसे प्रमुख है। महान हिमालय में यमुनोत्री, गंगोत्री, मिलाम, पिण्डारी जैसे प्रसिद्ध हिमानी पाले जाते हैं।

          कुमायूँ हिमालय में नंदादेवी (7817m) और कामेट (7756m) जैसे ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मिलने वाले वनस्पति को बुग्याल और पैय्यार कहते हैं। लघु हिमालय को इस क्षेत्र में धौलाधर, मसूरी पहाड़ी और कुमायूँ पहाड़ी के नाम से भी जानते हैं। लघु हिमालय पर नैनीताल, मसूरी, अल्मोड़ा जैसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थल पायी जाती है। लघु हिमालय के दक्षिण से शिवालिक हिमालय अवस्थित है जिसकी ऊँचाई बहुत कम है।

         लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय के बीच में मिलने वाले घाटी को दून के नाम से पुकारते हैं जिसमें ‘देहरादून की घाटी’ सबसे प्रसिद्ध है। यह अनुदैर्ध्य घाटी का अच्छा उदाहरण है। पीरपंजाल और धौलाधर पर्वत एक ही क्रम में स्थित है। इन दोनों के बीच में कुल्लू और मनाली की घाटी अवस्थित है जो अनुप्रस्थ घाटी का उदहारण है।

नोट: नन्दादेवी (7817m) कुमायूँ हिमालय की सर्वोच्च चोटी है। गंगा और यमुना नदी कुमायूँ हिमालय से ही निकलती है।

(3) नेपाल हिमालय:-

            इसका विस्तार नेपाल और सिक्कीम में काली नदी से तिस्ता नदी के बीच में हुआ है। यह हिमालय का सबसे लम्बा भाग है जिसकी लम्बाई 800km है। इसमें भी हिमालय की तीनों श्रृंखलाएँ स्पष्ट रूप से पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिण में तिब्बत का पठार स्थित है। महान हिमालय के दक्षिण में लघु हिमालय स्थित है। जिसे महाभारत श्रेणी के नाम से जानते हैं।

             महान हिमालय और महाभारत श्रेणी के बीच में काठमाण्डु की घाटी अवस्थित है। जो अनुद्धैर्य घाटी का एक उदा० प्रस्तुत करता है। इन क्षेत्र में महान हिमालय पर कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। जैसे- माउण्ट एवरेस्ट (8850m), कंचनजंघा (8598m) इत्यादि। ये क्रमश: हिमालय के प्रथम एवं द्वितीय सबसे ऊँची चोटियाँ हैं। इसके अलावे धौलागिरी, अन्नापूर्णा, मनसालू, गौरीशंकर और मकालू जैसे भी ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती है।

            मध्य हिमालय के दक्षिण में शिवालिक हिमालय स्थित है। अपरदन क्रिया के कारण इसकी ऊँचाई बहुत कम हो चुकी है। यह एक विखण्डित श्रृंखला है। नेपाल और बिहार के सीमा पर शिवालिक पर्वत को ही ‘सोमेश्वर की पहाड़ी’ (874- मी0) कहते हैं। 

(4) असम हिमालय:-

           इसका विस्तार असम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान में हुआ है। इसका सीमांकन तिस्ता नदी से नामचा बरबा गॉर्ज के बीच किया जाता है। इसकी इसकी लम्बाई 750 km है। यहाँ महान हिमालय लगभग 9 महीने तक बर्फ से शिवालिक ढका रहता है और मध्य हिमालय ही पायी जाती है। यहाँ शिवालिक हिमालय की श्रृंखला विलुप्त हो चुकी है। लघु हिमालय को मिश्मी और डाफला नाम से जानते हैं। लघु हिमालय यहाँ पर कई भागों में विभक्त हो चुकी है। लघु हिमालय के दक्षिण में धँसान क्रिया के फलस्वरूप ब्रह्मपुत्र रेम्प घाटी का विकास हुआ है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय की प्रत्येक स्थलाकृतिक प्रदेश अपने-2 विशिष्ट लक्षणों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में मानवीय हस्तक्षेप के कारण भू-दृश्य में तेजी से परिवर्तन हो हा है। अतः आवश्यकता है कि इस प्रदेश के भूदृश्य को विश्व धरोहर में शामिल कर इसे अक्षुण्ण बनाये रखा जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय को स्थलाकृतिक प्रदेशों में विभक्त कीजिए और प्रत्येक प्रदेश के विशिष्ट लक्षणों का वर्णन कीजिए।

11. गंगा का मैदान

11. गंगा का मैदान


गंगा का मैदान

          गंगा भारत की सबसे प्रमुख नदी है जो गंगोत्री हिमानी से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गंगा हरिद्वार के पास मैदानी क्षेत्र में प्रविष्ट करती है। और उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और बांगलादेश से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। गंगा नदी की कई सहायक नदियाँ हैं जो हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से आकर गंगा नदी में मिल जाती है। गंगा का मैदान मूलतः जलोढ़ मिट्टी के निक्षेपण से बना है। इस मैदान में जलोढ़ मिट्टी की गहराई 20oo m है।

          बुर्राड के अनुसार इस मैदान का निर्माण रिफ्ट घाटी में मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर यह मैदान कई भागों में बँटा है। जैसे:-

उत्तरी गंगा का मैदान

(1) रोहिल खण्ड का मैदान

(2) अवध का मैदान

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान

(4) मिथलांचल के मैदान के रूप में विभक्त है।

         जबकि दक्षिणी गंगा का मैदान

(1) बुंदेलखण्ड

(2) इलाहाबाद

(3) भोजपुर

(4) मगध और

(5) अंग के मैदान के रूप विभक्त है।

            भूगोलवेताओं ने गंगा के मैदान को प्रादेशिक स्तर पर तीन भागों में वर्गीकृत करके अध्ययन करने का प्रयास किया है।:-
(1) ऊपरी गंगा का मैदान

(2) मध्य गंगा का मैदान

(3) निम्न गंगा का मैदानगंगा का मैदान(1) ऊपरी गंगा का मैदान

          इसका विस्तार पश्चिम में अरावली पर्वत से लेकर पूरब में इलाहाबाद तक हुआ है। इस मैदान में उत्तर से दक्षिण की ओर गंगा और यमुना नदी प्रवाहित होती है जबकि दक्षिण से उत्तर की ओर और पुनः पश्चिम से पूरब की ओर चम्बल नदी प्रवाहित होती है। इस मैदान के उत्तर में भावर, बाँगर, तराई जैसी संरचनाएँ मिलती है। जबकि दक्षिणी भाग में उत्खात भूमि का निर्माण करता है। यह क्षेत्र पश्चिम उत्तर प्रदेश का भाग है। उपजाऊ मिट्टी का क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र अन्न भण्डार के रूप में प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र की सबसे प्रमुख आर्थिक गतिविधि कृषि कार्य हैं। गंगा और यमुना के दोआब क्षेत्र सदियों से कृषि के लिए प्रसिद्ध रही है।

(2) मध्य गंगा का मैदान

         इसका विस्तार इलाहाबाद से राजमहल की पहाड़ी तक हुई है। पूर्वी उतर प्रदेश और संपूर्ण बिहार मध्य गंगा के मैदान में स्थित है। इस मैदान की औसत ऊँचाई 50-100 m तक है। इस क्षेत्र में नदियाँ मोड़ लेकर प्रवाहित होती है जिसके कारण नदियों के किनारे पर गोखुर झील का निर्माण होती है। जगह-2 पर दियारा क्षेत्र का विकास हुआ है। मध्य गंगा के मैदान में पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र का विकास हुआ है। पुन: बाढ़ से मोकामा के बीच में टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। 

        कोशी, बागमती, गण्डक जैसी नदियाँ हमेशा मार्ग बदलने के लिए प्रसिद्ध है। इन नदियों के पुराने मार्गों को चौर कहा जाता है। उत्तर बिहार के लोग मछली पालन, तालमखाना की खेती करते हैं।

           मध्य गंगा का मैदान कृषि के लिए प्रसिद्ध है। नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। तराई वाले क्षेत्र में गन्ना की खेती की जाती है। गंगा नदी के उत्तरी किनारे पर केला, परबल, तरबूज, खीरा, ककड़ी इत्यादि की खेती की जाती है। पुन: चौर क्षेत्र में मछली और तालमखाना की खेती होती है। पुर्णिया, कटिहार, किशनगंज के क्षेत्र जूट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। मध्यवर्ती गंगा के मैदान का दक्षिणी भाग चावल, गेहूँ, दलहन, तेलहन, सब्जी इत्यादि के उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में बरौनी एक मात्र औद्योगिक नगर

(3) निम्नगंगा का मैदान

          इसका विस्तार राजमहल की पहाड़ी से गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा तक हुआ है। इस मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। यह मूलत: पश्चिम बंगाल और बांगलादेश में विस्तृत है। इस मैदान का ऊपरी भाग ‘बारिन्द क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता है। जबकि इसका दक्षिण भाग डेल्टा के लिए प्रसिद्ध है। इसी मैदान में विश्व का सबसे बड़ा गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा स्थित है। इसका निर्माण खादर मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इस क्षेत्र में नदियाँ कई वितरिकाओं (शाखाओं) में बँटकर प्रवाहित होती है। समुद्री ज्वार के कारण डेल्टाई क्षेत्रों में दलदली भूमि का भी विकास हुआ है।

        निम्नगंगा के मैदान आर्थिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। जैसे डेल्टाई क्षेत्र मैंग्रोव/ सुन्दरवन / ज्वारीय वनस्पति के लिए प्रसिद्ध है। इसमें सुंदरी, बेंत इत्यादि वृक्ष बड़े पैमाने पर मिलते हैं। हुगली नदी घाटी के किनारे वाला भाग जूट उत्पादनों के लिए प्रसिद्ध है जबकि शेष भाग चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। पुन: इस मैदान का ऊपरी क्षेत्र (दार्जलिंग वाला क्षेत्र) उत्तम किस्म के चाय बाँस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

निष्कर्ष:

          इस तह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के उत्तर में अवस्थित गंगा का मैदान अपने विशिष्ट भौतिक एवं आर्थिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है।

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास



हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास 

        कई पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन के कारण प्राचीन टेथिस सागर में नदियों के द्वारा लाकर मलवा जमा किये जाने तथा उनमें पड़े वलन की क्रिया से हिमालय जैसे पर्वत का निर्माण हुआ है। भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय पर्वत का निर्माण केनोजोइक महाकल्प के तृतीयक काल में हुए अल्पाइन भूसंचलन से हुआ है। पुन: भूवैज्ञानिकों के अनुसार ओलीगोसीन में महान हिमालय, मायोसीन में मध्य हिमालय तया प्लायोसीन एवं प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक हिमालय का निर्माण हुआ।

       हिमालय पर्वतीय क्षेत्र के उत्पान और विकास का स्पष्ट प्रभाव नदी के प्रतिरूप पर पड़ा है। जैसे:-   

    कई प्रसिद्ध भूवैज्ञानिकों का मत है कि तृतीयक काल में लघु हिमालय के दक्षिण में उसके समानान्तर एक विशालकाय नदी थी जो पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती थी। यह नदी उत्तर-पश्चिम भारत में जाकर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुड़ जाती थी। पैस्को और पिल्ग्रीम जैसे भूगोलवेताओं ने इस प्राचीन नदी का नाम शिवालिक नदी या ‘इण्डो ब्रह्मा नदी’ दिया है।

       जब इस नदी में हिमालय के नदियों द्वारा मलवा का लगातार निक्षेपण होता रहा तो इसकी तली में दबाव की क्रिया के कारण इस मलवा में पुन: उत्थान की क्रिया सम्पन्न हुई। इस उत्थान से शिवालिक नदी का जल ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने से कई अनुवर्ती नदियों का जन्म हुआ। ये नदियाँ काफी छोटी-2 हैं और मे उत्तर भारत की मुख्य नदियों की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

       सिन्धु, सतलज, कोसी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ पूर्ववर्ती नदी के उदाहरण है। पूर्ववर्ती नदी तात्पर्य वैसे नदी से है जिसका निर्माण किसी भी प्रदेश के उत्थान के पूर्व से ही नदी की प्रवाह जारी है। उपरोक्त पूर्ववर्ती नदी के बारे में भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय के उत्थान का दर नदी के अपरदन के दर से कम था जिसके कारण उपरोक्त पूर्ववर्ती नदियों ने हिमालय पर्वत को जगह-2 पर अपरदित करके गहरे गॉर्ज और दर्रों का निर्माण की हैं।

         जैसे- सिन्धु नदी नंगा पर्वत के पास काटकर विश्व का सबसे गहरा गॉर्ज सिन्धु गॉर्ज 5200 मी० गहरा का निर्माण करती है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी नामचा बरबा के पास गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है। सतलज नदी महान हिमालय को काटकर शिपकीला दर्रा का निर्माण करती है।

        शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र के दक्षिण में ‘बोल्डर क्ले’ के जमाव से भावर प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण की प्रक्रिया भी हिमालय के विकास से जुड़ा हुआ है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जब भावर प्रदेश से गुजरती हैं तो मे विलुप्त हो जाती है जिससे ‘खण्डित अपवाह तंत्र’ का निर्माण करती है। पुनः ये नदियाँ मैदानी क्षेत्र में दृष्टिगत होने लगती है और ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने की प्रवृति रखती हैं जिसके कारण “समानान्तर प्रतिरूप” का विकास करती हैं। पुनः हिमालय से निकलने वाली नदियाँ समुद्र में मिलने से पहले कई वितरिकाओं में विभक्त हो जाती है जिससे गुंफिट या जालीदार प्रतिरूप का विकास होता है।

         हिमालय पर्वत का अक्ष एक चाप के समान है जो पूरब से पश्चिम दिशा की ओर स्थित है। हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढाल तीव्र और उत्तरी ढाल मंद है। वलन की क्रिया से हिमालय पर्वत में कई अनुप्रस्थ एवं अनुद्धैर्य घाटियों का विकास हुआ है। अनुद्धैर्य घाटियों से होते हुए नदियाँ प्रवाहित होती थीं लेकिन जब हिमालय का विकास या उत्थान होने लगा तो अनुद्धैर्य घाटियों में प्रवाहित होने वाली जल प्रवाह बाधित हो गई, जिसके कारण इन अनुद्धैर्य घाटियों में कई बड़े-2 झीलों का निर्माण हुआ।

          इन झीलों में जब जल की मात्रा अधिक हो गई तो पहाड़ों के ऊपर से प्रवाहित होने लगी। जिसके फलस्वरूप बहते हुए जल से कई स्थानों पर हिमालय पर्वत को काटकर अनुप्रस्थ घाटियों का निर्माण कर ली। इन संपूर्ण परिघटना से हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों में समान आयताकार अपवाह तंत्र का विकास हुआ है। जैसे- कोसी नदी अपने उद्‌गम क्षेत्र में आयताकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

        हिमालय के उत्थान के पूर्व कई ऐसी नदियाँ थी जो भिन्न-2 दिशाओं से आकर टेथिस सागर में आकर गिरती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के बाद बड़ी-बड़ी नदियों ने छोटी-2 नदियों के जल को अपहरण कर लिया जिससे क्रमहीन अपवाह तंत्र का विकास हुआ। जैसे- ब्रह्मपुत्र नदी ने लोहित एवं दिवांग नदी के जल को अपहृत कर ‘क्रमहीन अपवाह तंत्र’ का विकास किया है।

       भूगर्भशास्त्रियों का अनुमान है कि प्राचीन काल में सतलज और यमुनी नदी राजस्थान से होकर बहती थी। पुन: सरस्वती नामक पौराणिक नदी प्रयागराज के पास आकर गंगा से मिलती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के दौरान उ०-प० भारत में हुए उत्थान से सतलज नदी का अपवाह क्षेत्र खिसक कर उ०-प० की तरफ चला गया और सरस्वती एवं यमुना नदी आपस में मिलकर एक नदी के रूप में प्रवाहित होकर मिलने लगी। इस तरह हिमालय के उत्थान एवं विकास से उ०-प० भारत के नदी तंत्र में कई परिवर्तन हुए।

निष्कर्ष

     उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय से निकलने वाली नदियों के ऊप हिमालय के उत्थान एवं विकास का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। यही काण है कि हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में नदी के अनेक प्रतिरूप दिखाई देते है।

हिमालय के विकास के संदर्भ

चित्र: हिमालय की उत्पत्ति एवं विकास

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास की विवेचना करें।

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य



प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

        दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार हुआ है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी. है। इसका आकार एक त्रिभुज के समान है। यह 1600 किमी० हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750 मी० मानी गयी है।

          प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल, गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करती हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे “पठारों का पठार” भी कहा जाता है। प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेन्जिया के समकालीन चट्टानें पायी जाती हैं।

        प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच और भूदृश्य का अध्ययन नीचे के दो शीर्षकों में किया जा रहा है। 

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

(2) प्रायद्वीपीय भारत के पठार

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

         प्रायद्वीपीय भारत में छोटी-बड़ी कई पर्वतीय श्रंखलाएँ मिलती है। जैसे-

(i) पश्चिमी घाट-

       यह प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी किनारे पर अवस्थित है। यह अरब सागर के समानान्तर लेकिन तट से दूर स्थित है। लेकिन कर्नाटक में यह श्रृंखला समुद्र के नजदीक आ जाती है। इसका विस्तार उत्तर में ताप्ती नदी के मुहाना से दक्षिण में कन्याकुमारी तक हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 1600 किमी० है। इसकी औसत ऊँचाई 915 मी० है। पश्चिमी घाट को कई छोटे-2 भागों में विभक्त कर उसके भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

       ताप्ती नदी से लेकर 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट को सह्याद्री पर्वत कहते है जिसकी सबसे ऊँची चोटी कालसुबाई (1646 मी०) है। 

    16º उतरी अक्षांश के दक्षिण वाले भाग की सबसे ऊँची चोटी कुद्रेमुख (1892 मी०) है। पश्चिमी घाट के तीसरी शाखा का प्रारंभ नीलगिरि से होता है क्योंकि यहाँ पश्चिमी एवं पूर्वी घाट आपस में आकर मिल जाती है।

     ताप्ती से 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट पर्वत के ऊपर बैसाल्ट चट्टान या लावा उदगार का प्रमाण मिलता है। इसमें थालघाट और भोरघाट दो प्रसिद्ध दर्रे है। गोदावरी और कृष्णा नदी का क्षेत्र में उद्‌गम स्थल पाया जाता है। इस क्षेत्र में स्थित पहाड़ का एक भाग धँसकर भ्रंशोत्थ/ब्लाँक पर्वत का निर्माण करता हैं।

      16º उत्तरी अक्षांश से नीलगिरि पहाड़ी तक अवस्थित पश्चिमी घाट की ऊँचाई बहुत अधिक है। लेकिन इसका पश्चिमी ढाल अधिक तीव्र है जबकि पूर्वी ढाल मंद है।

       पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट के मिलने से एक गाँठ का निर्माण होता है जिसे नीलगिरी कहते हैं। नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी दोदाबेटा (2636 मी०) है। इसी पहाड़ी पर ऊपर बहुत ही प्रसिद्ध पर्यटक स्थल ऊँटी (उटकमण्डलम्) है।

       नीलगिरि के दक्षिण में क्रमश: अन्नामल्लई, कार्डमम, नागर कोयल और स्वामी विवेकानन्द रॉक अवस्थित है। इसे सम्मिलित रूप से दक्षिण की पहाड़ी के रूप में सम्बोधित करते हैं। अन्नामलाई की सबसे ऊँची चोटी अन्नाईमुडी (2695 मी०) है। अन्नामलाई के उत्तर-पूर्व में पालिनी पर्वत श्रृंखला है जिस पर कोडाईकनाल नामक पर्वतीय नगर अवस्थित है।

         नीलगिरि और अन्नामलाई के बीच में पाल नायक दर्रा स्थित है जो किसी प्राचीन नदी के अपरदन द्वारा निर्मित है। इसी तरह अन्नामलई और कार्डमम पहाड़ी के बीच में शेनकोटा दर्रा अवस्थित है। शेनकोट दर्रा के दक्षिण में पहाड़ियों की ऊँचाई बहुत कम हो जाती है और अन्ततः हिन्द महासागर में प्रक्षेपित हो जाती है। इसका अन्तिम बिन्दु स्वामी विवेकानन्द रॉक कहलाता है।

(ii) पूर्वीघाट

        पूर्वी घाट प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी तट के समानान्तर उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर फैला है। यह तट से 200-400 किमी० अन्दर अवस्थित है। इस पर्वत का निर्माण कुडप्पा संरचना से हुआ है। इसमें डोलोमाइट, खोंडोलाइट, चर्कोनाइट जैसे खनिजों से निर्मित चट्टान पाए जाते हैं।

       यह एक विखण्डित श्रृंखला है क्योंकि इसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा जैसी नदियों ने जगह-2 पर काट डाला है। पूर्वी घाट की औसत ऊँचाई 900 मी० मानी जाती है। पूर्वी घाट को मूलतः तीन भागों में बाँटकर भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(a) धुर उत्तरी भाग-

      यह महानदी के उत्तर में अवस्थित है। उड़ीसा के मयूरभंज में इसका विस्तार सर्वाधिक हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इस भाग में कई पर्वतीय चोटी मिलती है। जैसे- मलयगिरि (1187 मी०), मेघासनी (1165 मी०), गन्धमार्तन (1160 मी०) इत्यादि। उड़ीसा में अवस्थित सम्मिलित पर्वतीय श्रृंखला को ‘मलयास्क’ के नाम से जानते हैं।

      उड़ीसा और आन्ध्रप्रदेश में पूर्वी समुद्रतट के समानांतर पूर्वी घाट उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इन क्षेत्र में पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी महेन्द्रगिरि (1501 मी०) अवस्थित है। गोदावरी नदी पूर्वी घाट को काटकर गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है।

(b) मध्यवर्ती श्रृंखला- 

       कृष्णा नदी से लेकर पेलार नदी के बीच स्थित पूर्वीघाट श्रृंखला को मध्यवर्ती श्रृंखला कहते हैं। इनमें नालामाला, पालकोंडा, वेलीकोंडा श्रृंखला प्रमुख हैं। पालकोंडा और वेलीकोंडा पहाड़ी के मध्य भाग से पनेरू नदी प्रवाहित होती है।

(c) तमिलनाडु श्रृंखला-

        पूर्वीघाट को तमिलनाडु में जावदी, गिंजी, शिवराय पहाड़ी के नाम से जानते हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ एक-दूसरे से पृथक-2 हैं।

      पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट बीच-2 में आपस में जुड़े हुए हैं। जैसे- मुम्बई और हैदराबाद के बीच हरिचन्द्र पर्वत और बालाघाट पर्वत स्थित है और बंगलोर के पास बाबाबुदन तथा श्रीसैलम पहाड़ी से जुड़ी हैं।

अरावली पर्वत

       अरावली पर्वत राजस्थान में द०-प० से उ०-पू० दिशा में अवस्थित है। इसका विस्तार गुजरात के सीमा से लेकर दिल्ली तक हुआ है। दिल्ली में अरावली पर्वत को ‘दिल्ली कटक’ के नाम से जानते हैं। हिमालय और अरावली पर्वत के बीच में एक गैप है जिसे अम्बाला गैप कहते हैं। अरावली न सिर्फ भारत की बल्कि विश्व की सबसे पुरानी पर्वत है। यह कभी विश्व का सबसे लम्बा वलित पर्वत हुआ करता था लेकिन अब अवशिष्ट पहाड़ी के रूप में बदल चुका है। इसकी सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर (1722 मी०) है जो राजस्थान के सिरोही जिला में माउण्ट आबू के पास स्थित है।

         अरावली की लम्बाई 800 किमी० और औरत ऊँचाई 700-900 मी० मानी जाती है। अरावली में कई दर्रे भी मिलते हैं जिसमें पिपलीघाट, देवारी, बेसूर दर्रा सबसे प्रमुख हैं। इसके गर्भ में कई खनिज पाये जाते हैं। इसलिए इसे राजस्थान के ‘खनिजों का अजायबघर’ कहा जाता है। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के कारण कई स्थानों पर यह विखण्डित हो चुकी है। लेकिन दक्षिण-पश्चिम अरावली पर्वतीय भाग की ऊँचाई आज भी पर्याप्त है।

सतपुड़ा पर्वत

      सतपुड़ा एक ब्लॉक पर्वत है जो नर्मदा और ताप्ती भ्रंश घाटी के बीच अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 900-1100 मी० है। सतपुड़ा श्रृंखला के पूरब में महादेव, मैकाल, रामगढ़ और गढ़‌जात की पहाड़ी अवस्थित है। सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी धूपगढ़ (1350 मी०) है। जबकि मैकाल की सबसे ऊँची चोटी अमरकंटक (1127 मी०) है। मैकाल पर ही पंचमढ़ी नामक पर्वतीय पर्यटक नगर अवस्थित है। सतपुड़ा पर्वत के समान्तर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिला में अजन्ता की पहाड़ी और नागपुर में गाविलगढ़ की पहाड़ी स्थित है।

विन्ध्यन पर्वत

        विन्ध्यन पर्वत प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी सीमा का निर्माण करती है। यह नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-700 मी० है। इस पर्वत का उत्तरी ढाल भ्रंशन  क्रिया से बना है जिसके कारण उत्तरी भाग का ढाल तीव्र है जबकि दक्षिणी भाग का ढाल मंद है। इसका विस्तार गुजरात की सीमा से लेकर बिहार के गंगा नदी तक हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर इसे क्रमश: विन्ध्यन पर्वत, भारनेर पर्वत, कैमूर की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी और खड़‌गपुर की पहाड़ी के नाम जानते हैं।

राजमहल की पहाड़ी

      राजमहल की पहाड़ी बिहार और झारखण्ड की सीमा पर भागलपुर के पास अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-7oo मी० है। यह उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला हुआ है। राजमहल पहाड़ी के कारण गंगा नदी को भागलपुर के पास उत्तरायण होना पड़ता है। राजमहल की पहाड़ी पर जूरासिक काल में हुए लावा का प्रमाण मिलता है।

गारो, खांसी और जयंतिया की पहाड़ी

      ये मेघालय राज्य में पश्चिम से पूरब की ओर क्रमशः फैला हुआ है। गारो एक अलग पहाड़ी के रूप में अवस्थित है जबकि खाँसी और जयन्तिया आपस में जुड़े हुए हैं। जयन्तिया पहाड़ी से एक भाग पृथक होकर काफी पूरब की ओर चला गया है जिसे मिकिर की पहाड़ी कहते हैं जो असम में अवस्थित है। गारो, खाँसी जयन्तियाँ की सबसे ऊँची चोटी नॉरकेक है जो गारो पहाड़ी पर स्थित है। लेकिन औसत ऊँचाई के दृष्टिकोण से जयन्तिया की पहाड़ी सबसे ऊँची है। जबकि गारो पहाड़ी सबसे नीची है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भात के उच्चावच या भूदृश्य की विशेषता का चर्चा करें।

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र



गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र  

          गंगा तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय से निकलने वाली उत्तर भारत की सबसे प्रमुख नदी हैं। ये नदियाँ लम्बी है तथा अनेक छोटी एवं बड़ी महत्त्वपूर्ण नदियाँ इनमें आकर मिलती हैं। इनके सम्मिलित रूप को गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र कहते हैं। इनकी चर्चा हम दो अलग-2 नदी तंत्र में कर रहे हैं।

(1) गंगा नदी तंत्र

    गंगा भारत के सबसे बड़े भाग की नदी तंत्र है। इसका विस्तार लगभग 18 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र पर है जिसका 8.6 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र भारतीय सीमा के अन्तर्गत है। यह हिमालय के पर्वतीय भाग से लेकर मैदान तथा दक्षिण के पठारी भाग तक विस्तृत है। गंगा नदी तंत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हैं। इसका विकास हिमालय के उत्थान के बाद हुआ लेकिन इसको विकसित करने में पूर्ववर्ती का भी योगदान रहा है। इस नदी तंत्र में गंगा मुख्य नदी है।

     गंगा नदी महान हिमालय में गंगोत्री के पास गोमुख हिमानी से निकलती है। इसकी आरंभिक धारा को ‘भागीरथी’ कहा जाता है। उत्तराखण्ड के देवप्रयाग में भागीरथी में अलकनन्दा धारा आकर मिलती है। दोनों की सम्मिलित धारा को ‘गंगा’ कहते हैं। हरिद्वार तक गंगा पर्वतीय भाग से गुजरती है। इसके बाद यह मैदान में प्रवेश करती है। इलाहाबाद के निकट गंगा में यमुना नदी मिलती है। यमुना नदी महान हिमालय में यमुनोत्री हिमनद से निकलती है। यमुना की सहायक नदी चम्बल, कालीसिन्ध, बेतवा, केन आदि प्रमुख हैं। बिहार के चौसा (बक्सर) नामक स्थान पर गंगा बिहार में प्रवेश करती है और कटिहार तथा भागलपुर जिले के बाद झारखण्ड होते हुए गंगा नदी पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।

      गंगा के दाहिने किनारे पर यमुना, टोंस, सोन, पुनपुन, किऊल इत्यादि नदियाँ आकर मिलती हैं। इसमें यमुना को छोड़कर में सभी नदियाँ प्रायद्वीपीय उच्चभूमि से निकलती हैं। गंगा के बाएँ किनारे पर हिमालय से निकलने वाली अनेक नदियाँ जैसे- रामगंगा, गोमती, घाघरा, गण्डक, बुढी गण्डक, कोसी, महानन्दा इत्यादि आकर मिलती हैं।

     दाहिने एवं बाएँ किनारे की सहायक नदियों के जल से परिपूर्ण होकर गंगा पूरब दिशा में पश्चिम बंगाल के फरक्का तक बहती है। फरक्का गंगा डेल्टा का सबसे उत्तरी भाग है। यहाँ गंगा नदी दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा हुगली के नाम से दक्षिण की तरफ बहती है तथा डेल्टा के मैदान से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

      गंगा की मुख्य धारा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती हैं। यहाँ गंगा नदी को “पदमा” कहा जाता है तथा ब्रह्मपुत्र नदी इससे आकर मिलती है। गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की सम्मिलित धारा को “मेघना” कहा जाता है। अन्ततः यह बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। इन नदियों के द्वारा बनाए गए डेल्टा को “सुन्दरवन का डेल्टा” कहते हैं।

(2) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

       इस नदी तंत्र की ब्रह्मपुत्र सबसे प्रमुख नदी है। बह्मपुत्र नदी तिब्बत में मानसरोवर झील के पूर्व 80 किमी० की दूरी पर स्थित हिमानी से निकलती है। इसकी लम्बाई 2900 किमी० है। यह नदी तिब्बत में सांग्पो ने नाम से हिमालय के समानान्तर पूरब की ओर बहती है। पूरब में नामचा बरबा पर्वत को काटकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में बह्मपुत्र नदी को ‘दिहांग’ कहा जाता है। इसके बाद असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। असम के डुबरी जिले के बाद ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में जमुना के नाम से प्रवेश कती है। यहाँ गंगा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

       ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में दिवांग, लुहित, स्वर्णसिरी, धनसीरी, भाद्री, बण्डी, बुढ़ी दिहंग, मानस, सकोंश, तिस्ता, दिसांग, दिखो, कुलसी, कपिली, कोपिती इत्यादि हैं।

     प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु में यह नदी अपने किनारों से ऊप बहने लगती है एवं बाढ़ के द्वारा असम तथा बांग्लादेश में अधिक क्षति पहुँचती है।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

गंगा ब्रह्मपुत्र नदी

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय) / Drainage System

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय)

(Drainage System)



अपवाह तंत्र

           भारत एक विशाल देश है। हिमालय पर्वत, अरावली पर्वत, विन्ध्याचल पर्वत, सतपुड़ा पर्वत और पश्चिमी घाट मिलकर महान जलविभाजक रेखा का निर्माण करती है। उद्गम क्षेत्र के आधार पर भारतीय नदियों को दो प्रमुख वर्ग में बाँटा जाता है।:-

(1) हिमालय से निकालने वाली नदियाँ
(2) प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियाँ

       उपरोक्त दोनों स्रोतों से निकलने वाली नदियों की अलग-2 विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन नीचे किया जा रहा है:-

(i) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ सदावाहिनी/सदानीरा होती हैं और पठारीय नदियाँ सदावाहिनी नहीं होती है। क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियों का स्रोत ग्लेशियर/ हिमानी होता है। जबकि पठारी क्षेत्र की नदियों का स्रोत क्षेत्र हिमानी नहीं हैं। फिर पठारी भारत के सभी बड़ी नदियों में सालोंभर जल का प्रवाह होता है जिसका प्रमुख कारण उनके उद्गम क्षेत्र में झील या जलप्रपात का मिलना है।

(ii) हिमालय स्रोत की नदियाँ लम्बी होती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटी होती है। इसका प्रमुख कारण हिमालय की महाद्वीपीय स्थिति और दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय का होना है। हिमालय एक महाद्वीपीय पर्वत होने के कारण निकलने वाली नदियों के उद्‌गम एवं मुहाना क्षेत्र काफी पूर्व हो जाता है। इसलिए हिमालय क्षेत्र की नदियाँ लम्बी होती है। पुन: हिमालय क्षेत्र में कई ऐसे पूर्ववर्ती नदी मिलते हैं जो हिमालय के उत्थान से पूर्व से ही प्रवाहित होते आ रहे हैं। जैसे- ब्रह्मपुत्र की लम्बाई 2960 किमी०, सिन्धु की लम्बाई 2880 किमी०, गंगा नदी की लम्बाई 2525 किमी० तक पायी जाती है।

       इसके विपरीत पठारीय भारत के अधिकांश नदियों का उद्गम क्षेत्र प० घाट के पूर्वी ढाल और पश्चिमी ढाल पर पायी जाती है। पश्चिमी ढाल से निकलने वाली नदियाँ तुरंत (समुद्र) में जाकर मिल जाती है। पश्चिमी घाट के पश्चिम में बहने वाली सबसे लम्बी नदी पेरियार (80 किमी०) है। पुनः पश्चिमी घाट पूर्वी ढाल से निकलने वाली नदियों में गोदावरी, कृष्णा और कावेरी प्रमुख हैं। गोदावरी प्रायद्वीपीय पठार की सबसे लम्बी नदी है जिसकी लम्बाई 1465 किमी० है।”

अपवाह तंत्र

(iii) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ वृहद् नदी बेसिन का निर्माण करती है जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटे बेसित का निर्माण करती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र नदियों का मार्ग लम्बा होता है तथा समतलीय मैदान से होकर गुजरती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ तीव्र ढाल से होकर गुजरने के कारण एवं प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण नदी बेसिन का आकार छोटा हो जाता है।

(iv) हिमालय प्रदेश के नदियों की अपरदनात्मक क्षमता तीव्र होती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियाँ युवा अवस्था से होकर गुजर रही है। इसके विपरीत द० भारत की नदियाँ वृद्धा अवस्था से होकर गुजर रही है जिसके कारण उनके अपरदनात्मक क्षमता में जबड़स्त कमी आयी है। हिमालय क्षेत्र की नदियाँ प्राय: V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। वहीं प्रायद्वीपीय भारत नदियाँ खुली हुई V-आकार के घाटी का निर्माण करती है।

(v) हिमालय प्रदेश की नदियाँ कई प्रकार के अपवाह विशेषताओं को विकसित करती है। जैसे- पर्वतीय क्षेत्रों में वृक्षाकार अपवाह प्रणाली, मैदानी क्षेत्र में समामान्तर और मोड़ लेती हुई अपवाही प्रणाली और मुहाना पर जालीनुमा अपवाह प्रणाली का विकास करती है। यद्यपि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ प्रायः वृक्षाकार अपवाह प्रणाली विकास करती है।

         पुनः प्रायद्वीपीय भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ अलग-2 प्रतिरूप का निर्माण करती है। जैसे अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ समानान्तर प्रतिरूप का निर्माण करती है क्योंकि तीव्र ढाल से प्रवाहित होने के कारण मलवा का निक्षेपण नहीं हो पाता है जबकि बंगाल की खाड़ी की ओर गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ लम्बी दूरी तय करती है और तुलनात्मक दृष्टिकोण से मंद ढाल से प्रवाहित होती है। इसलिए वृक्षाकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

(vi) हिमालय प्रदेश की नदियाँ मुहाना पर डेल्टा का निर्माण करती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की वे नदियाँ जो अरब सागर में गिरती है वे डेल्टा के स्थान पर एश्चुरी का निर्माण करती है। जबकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदी डेल्टा का निर्माण करती है।

(vii) हिमालय प्रदेश की नदियों में दो बार जलस्तर ऊपर उठता है। प्रथमत: वर्षा ऋतु में और द्वितीय ग्रीष्म ऋतु में हिम पिघलने के कारण होती। पठारीय भारत की अधिकांश नदियों में केवल एक बार जलस्तर ऊपर उठती है। लेकिन तमिलनाडु को नदियों में द०-प० मानसून और  उ०-पू० मानसून के कारण जल दो बार उठती है।

(viii) हिमालय क्षेत्र की नदी मार्ग में जलप्रपात और उच्छालिका या क्षिप्रिका केवल पर्वतीय क्षेत्रों में बनती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में इसका प्रमाण सम्पूर्ण मार्ग में देखने को मिलता है।

(ix) हिमालय स्रोत से निकलने वाली कोई भी नदी किसी भी पठारीय नदी की सहायक नदी नहीं है। जबकि पठारीय भाग से निकलने वाली नदियाँ हिमालय से निकलने वाली नदियों का सहायक नदी है। जैसे- सोन, दामोदर, किऊल, किर्मनाशा, पुनपुन, इत्यादि नदियाँ पठारीय नदी है। गंगा की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

(x) हिमालय स्रोत से निकलने वाली नदियाँ केवल दो मुहाना का निर्माण करती है। प्रथम सिन्धु नदी का मुहाना और द्वितीय गंगा-ब्रह्मपुत्र का मुहाना। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ अनेक मुहानों का निर्माण करती है। जैसे स्वर्णरेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, ताप्ती इत्यादि ये सभी के सभी स्वतंत्र मुहानों निर्माण करती है।

(xi) हिमालय प्रदेश की कोई भी ऐसी नदी नहीं है जो भ्रंश घाटी से प्रवाहित होती है जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नर्मदा, ताप्ती और दामोदर ऐसी नदी है जो भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है।

निष्कर्ष

      इस प्रका ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय तथा प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियों के बीच कई मौलिक अन्तर है। यह अन्तर धरातलीय विशेषताओं के कारण उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर भारत के जल प्रवाह तंत्र में प्रकृति-जन्य विभिन्नता बतलाइये।

2. प्रायद्वीपीय भारत की अपवाह संबंधी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

3. हिमालय क्षेत्र के अपवाह तंत्र के उत्पत्ति एवं प्रवाह तंत्र का वर्णन कीजिए।

4. हिमालय और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी

(Monsoon of Mechanism)



भारतीय मानसून की प्रक्रिया

      भारत में मानसून की उत्पत्ति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायु-संचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होती है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ द०-प० मानसून से लगभग 80% होती है जबकि 20% वर्षा उ०-पू० मानसून और पछुवा विक्षोभ से होती है।

         ग्रीष्म ऋतु के बाद दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के आगमन से वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। भारत में सबसे पहले द०-प० मानसून 29 मई को अण्डमान & निकोबार द्वीप समूह में 1 जून को केरल के तट पर पहुँचती है।

          केरल के तट पर पहुंचकर द०-प० मानसून पश्चिमी घाट पर्वत से टकराती है और संघनित होकर अचानक मूसलाधार वर्षा करती है जिसे “मानसून विस्फोट” कहा जाता है। 15 जून तक द.-प. मानसून मध्य भारत के आन्तरिक भागों में पहुँच जाती है जिससे 5° से 8°C तापमान में गिरावट दर्ज की जाती है। द०-प० मानसून की दो प्रमुख शाखा है।

(1) अरब सागर की मानसूनी पवन

(2) बंगाल की खाड़ी की मानसूनी पवन

          अरब सागर के मानसून की उत्पत्ति अरब सागर में होती है। जब यह भारत के तट पर पहुंचती है तो यह तीन शाखाओं में बंट जाती है।

(i) पहली शाखा पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदान में 250 cm वर्षा करती है। पश्चिमी घाट से टकराने के बाद‌ यह हवा पूर्वी ढाल के सहारे नीचे उतरती है। लेकिन पूर्वी ढाल के सहारे उतरने वाली इस हवा के कारण वर्षा बहुत कम होती है जिसके कारण पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में वृष्टिछाया प्रदेश का निर्माण होता है।

(ii) अरब सागरीय मानसून की दूसरी शाखा नर्मदा और ताप्ती नदी घाटी के सहारे भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण नर्मदा एवं ताप्ती नदी घाटी क्षेत्र पर्याप्त मात्रा वर्षा प्राप्त करते हैं।

(iii) तीसरी शाखा अरावली पर्वत के समानान्तर राजस्थान में प्रवेश करती है। रास्ते में कोई रुकावट नहीं मिलने के कारण यह राजस्थान के ऊपर से गुजर जाती है जिससे वहाँ वर्षा नहीं हो पाती है। यह शाखा राजस्थान से होते हुए कूल्लू और मनाली के पास जाकर यह हिमालय से टकराती है और वर्षा करती है।

(2) बंगाल की खाड़ी से चलने वाली मानसूनी हवा भी कई छोटे-छोटे शाखाओं में बंट जाती है। इनमें से दो शाखा प्रमुख है-

(i) पहली शाखा बंगलादेश से होते हुए उ०-पूर्वी भारत में प्रवेश करती है।

⇒ इसकी एक शाखा बराक और सूरमा नदी घाटी से गुजरती है जिससे मिजोरम, मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में पर्याप्त वर्षा होती है।

⇒ एक शाखा गारो, खासी, जयंतिया पर्वत से टकराकर विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मासिनराम ग्राम  का निर्माण करती है।

(ii) बंगाल की खाड़ी की दूसरी सबसे प्रमुख शाखा उड़ीसा और प. बंगाल के सहारे भारत में सीधे प्रविष्ट करती है। यह शाखा कोसी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जाकर असम से आने वाली मानसूनी हवा से मिलकर अत्याधिक वर्षण का कार्य करती है।

         धीरे-2 ये दोनों शाखाएँ सम्मिलित रूप से पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होने लगती है जिससे गंगा के उतरी मैदानी क्षेत्र पर्याप्त वर्षा प्राप्त करती है। यह शाखा कुल्लू के पास जाकर अरेबियन शाखा से मिलती है जिसके कारण यहाँ “बादल फटने की घटना” होती है।

          ग्रीष्म ऋतु में गया से प्रयागराज के बीच ITCZ या तीव्र निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाने के कारण बंगाल की खाड़ी की मानसूनी शाखा को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी अक्ष के सहारे धीरे-2 मानसूनी हवा दक्षिण गंगा के मैदान में पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होती है। ज्यों-2 पूरब से पश्चिम की ओर जाती है त्यों-2 आर्द्रता में कमी आने के कारण वर्षा की मात्रा में कमी देखी जाती है।

      पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के दौरान उष्णकटिबंधीय चक्रवात के आँख का विकास होता है जिसके चारों ओर तीव्र गति से हवाएँ चक्र के रूप में घुमकर पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षण कार्य करती है।

मानसून का लौटना

        15 अक्टूबर के बाद भारत से मानसून के लौटने की प्रक्रिया शुरू होती है। मानसून लौटने के दौरान वायु स्थल से समुद्र की ओर चलती है। इसे उत्तर-पूरब मानसून की संज्ञा देते हैं। इस शाखा की एक भाग बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

निकर्ष

       इस तह ऊपर के तथ्यों के स्पष्ट है कि भातीय मानसून की यांत्रिकी काफी जटिल है। इसे नीचे के मानचित्र से भी समझा जा सकता है।

भारतीय मानसून की प्रक्रि

चित्र: द०-प० मानसून की क्रियाविधि

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना



भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

          भारत एक मानसूनी प्रदेश है। यहाँ ही जलवायु मानसूनी है। मानसून एक मौसमी हवा है। ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ (Mausim) अथवा मलायन भाषा के मोनसिन (Monsin) शब्द से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है- मौसम के अनुसार हवाओं का उलट-फेर।

        ब्रिटिश भूगोलवेता हैली महोदय ने बताया कि मानसून एक ऐसी वायु प्रवाह है जो छ: महीने द०-प० से उ०-पू० की ओर (15 मई से 15 नवम्बर तक) तथा अगले छ: महीने (15 नवम्बर से 15 मई तक) उ०-पू० से द०-प० की ओर प्रवाहित होती है। इन्हें चित्रों से समझा जा सकता है:

भारतीय मानसून

मानसून का प्रकार

     भूगोलवेत्ताओं ने मानसून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर करते हुए इसे दो भागों में बाँटा है:- उष्ण कटिबंधीय मानसून और शीतोष्ण प्रदेश की मानसून।

        भारत में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की मानसून है। इसे भी दो भागों में बाँटा गया है :-

(i) द०-प० मानसून,

(ii) उ०-पू० मानसून

             द०-प० मानसून को ग्रीष्मकालीन मानसून तथा उ०-पू० मानसून को शीतकालीन मानसून कहा जाता है। द०-प० मानसून ही भारत की प्रमुख मानसून है। भारत की 80% वर्षा इसी द०-प० मानसून से होती है। यह मानसून अरब सागर से भारतीय उपमहाद्वीप पर जलवाष्प लाकर वर्षा करती है। जबकि उ०-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प लाकर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती है। द०-प० मानसून की तुलना समुद्री समीर से और उ०-पूर्वी मानसून की तुलना स्थलीय समीर से की जा सकती है।

भारतीय मानसून की विशेषताएँ

        भारतीय मानसून की कई विशेषताएँ हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) भारतीय मानसून अपने अनिश्चितताओं के लिए विश्व विख्यात है। अर्थात इनकी आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

(2) भारतीय मानसून भारत का वास्तविक बजट निर्माता है।

(3) मानसून मौसम विशेष की हवा है।

(4) मानसून के कारण भारत में मुख्यत: प्रकार की वर्षा होती है-

(i) पर्वतीय वर्षा

(ii) चक्रवातीय वर्षा।

(5) मानसूनी वर्षा का वितरण अत्यन्त अनियमित है।

(6) मानसूनी वर्षा की मात्रा काफी अनिश्चित है। 

(7) मानसून की विश्वसनीयता संदिग्ध है।

(8) मानसून की वर्षा निरंतर नहीं होती, बल्कि कुछ दिनों के अन्तराल पर रुक-रुक कर होती है।

(9) मानसूनी वर्षा मूल रूप से धरातलीय वर्षा है।

(10) मानसूनी वर्षा भारतीय उपमहाद्वीप के तापमान में कमी लाती है।

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून कई विशेषताओं से युक्त हैं।

भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक:-

       भारतीय मानसून को अनेक कारक प्रभावित करते हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) स्थिति एवं अक्षांशीय विस्तार:-

        भारत मोटे तौर पर 8°4’N से 37°6’N अक्षांशों के मध्य स्थित है। कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है। विषुवत रेखा के पास होने के कारण दक्षिणी भागों में वर्ष भर उच्च तापमान रहता है। दूसरी उतरी भाग गर्म शीतोष्ण पेटी में स्थित है।

       अत: यहाँ विशेषकर शीतकाल में निम्न तापमान रहता है। इसके कारण स्थल और समुद्र पर मिलने वाले वायुदाब में अन्तर आ जाता है। फलत: मध्य मई से मध्य नवम्बर तक द०-प० मानसून सागर से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर और मध्य नवम्बर से मध्य मई तक उ०-पूर्वी मानसून भारतीय उपमहाद्वीप से सागर की ओर अग्रसारित होती है और वे वर्षा करते है।

(2) समुद्र से दूरी:-

        प्रायद्वीपीय भारत अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है। अत: भारत के तटीय प्रदेशों की जलवायु सम है। इसके विपरीत जो प्रदेश देश के आन्तरिक भागों में स्थित हैं, वे समुद्री प्रभाव से अछूते हैं। फलस्वरूप उन प्रदेशों की जलवायु अति विषम या महाद्वीपीय है। समुद्र से निकटवर्ती क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा अधिक और जैसे-2 इससे दूरी बढ़ती जाती है वैसे- वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है।

(3) उत्तरी पर्वतीय श्रेणियाँ:-

       हिमालय तथा उसके साथ की श्रेणियाँ जो उत्तर-पश्चिम में कश्मीर से लेकर उ०-प० में अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई हैं। ये भारत को शेष एशिया से अलग करते हैं। ये श्रेणियाँ शीतकाल में मध्य एशिया से आने वाली अत्याधिक ठण्डी व शुष्क पवनों से भारत की रक्षा करती हैं। साथ ही वर्षादायिनी द०-पश्चिम मानसून पवनों के सामने एक प्रभावी अवरोध बनाती हैं, ताकि वे भारत की उत्तरी सीमाओं को पार न कर सकें। इस प्रकार ये श्रेणियाँ उपमहाद्वीप तथा मध्य एशिया के बीच एक जलवायु विभाजक का कार्य करती है।

(4) स्थलाकृति:-

          देश के विभिन्न भागों में स्थलाकृतिक लक्षण वहाँ के तापमान, वायुमण्डलीय दाब, पवनों की दिशा तथा वर्षा की मात्रा को प्रभावित करते हैं। उत्तर में हिमालय पर्वत नमीयुक्त मानसून पवनों को रोककर समूचे उत्तरी भारत में वर्षा का कारण बनता है। मेघालय पठार में पहाड़ियों की कीपनुमा आकृति से मानसून पवनों द्वारा विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है। अरावली पर्वत मानसून पवनों की दिशा के समानान्तर है।

       अत: यह मानसूनी पवनों को रोकने में असफल होता है। फलस्वरूप वहाँ वर्षा नहीं हो पाती और लगभग सम्पूर्ण राजस्थान एक विस्तृत मरूस्थल में बदल गया है। पश्चिमी घाट द०-प० मानसून पवनों के मार्ग में दीवार की भाँति खड़ा है जिसके कारण इस पर्वत के पश्चिमी ढालों तथा पश्चिमी तटीय मैदान में भारी वर्षा होती है। इसके पूर्व में पवनें नीचे उत्तरती है और ठण्डी व शुष्य हो जाती है। अतः इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है और यह “वृष्टि छाया क्षेत्र” कहलाता है।

(5) मानसूनी पवनें:-

        द०-प० पश्चिमी ग्रीष्मकालीन पवनें समुद्र से स्थल की ओर चलती है और समस्त देश को प्रचुर वर्षा प्रदान करती हैं। इसके विपरीत शीतकालीन उ०-पूर्वी मानसून पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती है और वर्षा करने में असमर्थ होती है। बंगाल की खाड़ी से कुछ जलवाष्प प्राप्त करने के पश्चात ये पवनें तमिलनाडु के तट पर थोड़ी सी वर्षा करती है।

(6) ऊपरी वायु परिसंचरण:-

        भारत में मानसून के अचानक विस्फोट का एक अन्य कारण भारतीय भाग के ऊपर वायु परिसंचरण में होने वाला परिवर्तन भी है। ऊपरी वायुतंत्र में बहने वाली जेट वायुधरायें भारतीय जलवायु को निम्न प्रकार से प्रभावित करती है। जैसे:-

(i) पश्चिमी जेट वायुधारा-

       शीतकाल में, समुद्र तल से लगभग 8Km की ऊँचाई पर पश्चिमी जेट वायुधारा अधिक तीव्र गति से समशीतोष्ण कटिबंध के ऊपर चलती है। यह जेट वायुधारा हिमालय की श्रेणियों द्वारा दो भागों में विभाजित हो जाती है। इस जेट वायुधारा की उत्तरी शाखा इस अवरोध के उत्तरी सिरे के सहारे चलती है। दक्षिणी शाखा हिमालय श्रेणियों के दक्षिण में 25°N अक्षांश के ऊपर पूर्व की ओर चलती है।

       मौसम वैज्ञानिकों का ऐसा विश्वास है कि यह शाखा भारत की शीतकालीन मौसमी दशाओं को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह जेट वायुधारा भूमध्य सागरीय प्रदेशों से पश्चिमी विक्षोभों को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने के लिए उत्तरदायी है। उत्तर पश्चिम मैदानों में होने वाली शीतकालीन व ओलावृष्टि तथा पहाड़ी प्रदेशों में कभी-2 होने वाली भारी हिमपात इन्हीं विक्षाओं का परिणाम है। इसके बाद सम्पूर्ण उतरी मैदानों में शीत लहरें चलती है।

(ii) पूर्वी जेट वायुधारा-

        ग्रीष्मकाल में, उतरी गोलार्द्ध में सूर्य के उत्तरायण के कारण ऊपरी वायु परिसंचरण में परिवर्तन हो जाता है। पश्चिमी जेट वायुधारा के स्थान पर पूर्वी जेट वायुधारा चलने लगती है, जो तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी गर्म जेट वायुधारा विकसित होती है जो 15°N अक्षांश के आस-पास प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर चलती है। यह द०-पश्चिमी मानसून पवनों के अचानक आने में सहायता करती है।

(7) एलनीनो प्रभाव:-

        भारत में मौसमी दशाएँ एलनीनो से भी प्रभावित होती है, जो संसार के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में विस्तृत बाढ़ों और सूखों के लिए उत्तरदायी है। एलनीनो एक सतही उप गर्म जलधारा है। यह कभी-2 द० अमेरिका के पेरू तट से कुछ दूरी पर दिसम्बर के महीने में दिखाई देती है। कई बार पेरू की ठंडी धारा के स्थान पर अस्थायी धर्म धारा के रूप में बहने लगती है। कभी-2 अधिक तीव्र होने पर यह समुद्र के ऊपरी जल के तापमान को 10ºC तक बढ़ा देती है।

         उष्ण कटिबंधीय प्रशान्त महासागरीय जल के गर्म होने से भूमण्डलीय दाब व पवन तंत्रों के साथ-2 हिन्द महासागर में मानसून पवनें भी प्रभावित होती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि 1987 ई. में भारत में भयंकर सूखा एलनीनो का ही परिणाम था।

(8) दक्षिणी दोलन:-

        दक्षिणी दोलन मौसम विज्ञान से संबंधित वायुदाब में होने वाली परिवर्तन का प्रतिरूप है, जो हिन्द व प्रशांत महासागरों के मध्य प्राय: देखा जाता है। ऐसा देखा गया है कि जब वायुदाब हिन्द महासागर में अधिक होता प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र पर अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है अथवा इन दोनों महासागरों पर वायुदाब की स्थिति एक-दूसरे के उलटा होती है। जब वायुदाब प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर  अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है तो भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक शक्तिशाली होती है। इसके विपरीत परिस्थिति में मानसून के कमजोर होने की संभावना अधिक होती है।

     उपरोक्त कारकों के अलावे पश्चिमी विक्षोभ, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब का खिसकाव इत्यादि भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक हैं।

निष्कर्ष

        उपरोक्त तथ्यों विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मानसून ए मौसमी हवा है। इसकी कई विशेषताएँ होती हैं। ये विशेषताएँ मानसून को प्रभावित कने वाले कारकों द्वारा निर्धारित होती हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

error: