Category GEOGRAPHY OF INDIA(भारत का भूगोल)

8. Social Forestry (सामाजिक वानिकी)

8. Social Forestry

(सामाजिक वानिकी)



प्रश्न प्रारूप

Q.1 सामाजिक वानिकी क्या है? क्यों इसे सक्रिय रूप में बढ़ायी जा रही है?

Q.2 भारत में वन प्रबंधन में जन भागीदारी पर प्रकाश डालिए।

Social Forestry

      सामाज के द्वारा समाज के लिए वन लगाने की प्रक्रिया और कार्यक्रम को सामाजिक वानिकी कहते है। सामाजिक वानिकी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1967 में वेस्टानी महोदय ने किया था। भारतीय संदर्भ में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग ने किया था। कृषि आयोग की अनुसंशा पर ही इसकी प्रायोगिक शुरुआत 1980 ई० में किया गया और 1981 ई० में 101 जिला में शुभारम्भ किया गया। 1983 में इसे सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया। 1983 ई० में वानिकी कार्यक्रम हेतु एक “A Tree for every child” का नारा दिया गया तथा हिमाचल प्रदेश में चल रहे मृदा संरक्षण कार्यक्रम की सामाजिक वानिकी का अंग बना दिया गया।

सामाजिक वानिकी के प्रकार

        सामाजिक वानिकी चार प्रकार के होते हैं:-

(1) कृषि वानिकी

(2) ग्रामीण वानिकी

(2) नगरीय वानिकी

(4) क्षति पूर्ति वानिकी

         कृषि वानिकी के अंतर्गत किसानों के द्वारा अपने निजी भूमि पर और खेतों के मेढ़ पर वन लगाया जाता है।

         ग्रामीण वानिकी के तहत गाँव में परती पड़े सरकारी भूमि के ऊपर ग्रामीणों के द्वारा वन लगाया जाता है। यह कार्य सहकारिता संस्था, सामुदायिक संस्था तथा पंचायतों के द्वारा होता है।

         जबकि नगरीय वानिकी के तहत नगरीय लोगों को घरों में एवं नगर में खाली पड़े जमीन पर वन लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

       जबकि क्षतिपूर्ति वानिकी के तहत वैसे औद्योगिक घरानों को जो उद्योग लगाना चाहते हैं उन्हें औद्योगिक संस्थानों के इर्द-गिर्द वन लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। पुनः जिस क्षेत्र में जितना वन काटा जाता है उसके एवज में उससे भी अधिक वन लगाने के लिए लोगों प्रेरित किया जाता है।

सामाजिक वानिकी के उद्देश्य

        सामाजिक वानिकी के निम्नलिखित उद्देश्य स्थापित की गई है:-

(i) जलावन या ईंधन की लकड़ी सुनिश्चित करना,

(ii) ग्रामीण क्षेत्रों में फल-फूल एवं अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बढ़ाना,

(iii) खेतों को छाया प्रदान करना और वाष्पोत्सर्जन को कम करना,

(iv) पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना,

(v) कृषि उपकरणों तथा अन्य उपयोग के लिए लकड़ी की उपलब्धता बढ़ाना,

(vi) भूमिगत जल स्तर में सुधार लाना इत्यादि।

          प्रसिद्ध सामाजिक वानिकीविद डा० डी० पी० सिंहा ने सामाजिक वानिकी के उद्देश्यों को एक मॉडल के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। जैसे- 

Social Forestry

         ऊपर के मॉडल के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सामाजिक वानिकी के काफी व्यापक उद्देश्य निर्धारित किये गये हैं। इन्हीं उद्देश्यों की आपूर्ति हेतु सामाजिक वानिकी कार्यक्रम को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है।

सामाजिक वानिकी की असफलता के कारण

(1) आमलोगों की सहभागिता का अभाव- आम जनता की सहभागिता दो कारणों से नहीं बढ़ पा रही है।

(i) आम जनता इसे सरकारी कार्यक्रम समझती है। इसलिए उनका मानना है कि पेड़ लगाने का कर्तव्य सरकार को है।

(ii) लोग लगाये गये वन क्षेत्र को अपना समझ नहीं पाते हैं।

(2) जलवायु के अनुकूल वृक्ष के किस्मों का चुनाव न होना।

(3) क्षेत्र का सर्वेक्षण या मूल्यांकन किए बगैर ही वृक्षारोपण की कार्यक्रम किया गया।

(4) तकनीकी ज्ञान का अभाव:- आम धारणा यह है कि वृक्षों को रोपने के लिए तथा उसके संवर्धन के लिए कोई विशेष तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। जबकि पौधों की पांच साल की सुरक्षा अनिवार्य है तथा वन लगाने के लिए तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है। सरकार के द्वारा इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नहीं किया गया।

(5) अंधाधुन वृक्षों की कटाई तथा पौधो की पशुचराई आम समस्या है।

(6) उत्पादन योग्य वन होने के पूर्व ही उनका शोषण प्रारंभ हो जाता है।

(7) कानूनी सुरक्षा का अभाव।

(8) वृक्षारोपण के दौरान छोटे-2 पौधों का रोपा जाना।

(9) वृक्ष काटने तथा उनके परिवहन एवं विपणन के नीति का दोषपूर्ण होना।

(10) सरकारी कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न एवं गैर कानूनी शुल्क की वसूली।

          उपरोक्त कारणों के चलते सामाजिक वानिकी अपेक्षित सफलता नहीं दे पायी।

सामाजिक वानिकी में NGO की भूमिका

           सामाजिक वानिकी के क्षेत्र में गैर सरकारी संगठन (NGO) कई प्रकार से भूमिकाएँ निर्वहन कर सकती है।

(1) ये आम जनता को वन लगाने के लिए उत्प्रेरित कर सकती है।

(2) NGO प्रारंभ में वानिकी के लिए नेतृत्व प्रदान कर सकते है और धीरे-2 लोगों को नेतृत्त्व का काम सीखाकर वहाँ से हट सकते हैं।

(3) NGO आम जनता और सरकारी तंत्र के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।

(4) NGO सामाजिक वानिकी के प्रत्येक पहलू से आम लोगों को अवगत करवा सकते हैं।

(5) NGO सही गुणवत्ता वाले बीज, पौधे, औजार, पॉलीथीन और सुरक्षा सामाग्री लोगों को उचित मूल्य पर उपलब्ध करवा सकते हैं और इसके प्रयोग हेतु लोगों को प्रशिक्षित कर सकते हैं।

(6) NGO लोगों के समुदाय के रूप मैं संगठित कर सकते हैं।

        इस तरह सामाजिक वानिकी के क्षेत्र में NGO की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती हैं। महाराष्ट्र के गरद गाँव में डॉ. अरविन्द रेड्डी और उनके सहयोगियों का NGO ने सामाजिक वानिकी कार्यक्रम को सफलतापूर्वक लागू क सामाजिक वानिकी में निर्धारित प्रत्येक उद्देश्य को सफलतापूर्वक हासिल किया है। इस कार्य के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से उन्हें पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

7. Crop Pattern (कृषि प्रतिरूप / फसल प्रतिरूप / शस्यन प्रतिरूप)

7. Crop Pattern

(कृषि प्रतिरूप / फसल प्रतिरूप / शस्यन प्रतिरूप)



प्रश्न प्रारूप

Q.1  फसल प्रतिरूप से आप क्या समझते है?

Q.2 फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाले कारक;

Q.3 फसल प्रतिरूप का वितरण, महत्व तथा मूल्यांकन एवं सुझाव।

फसल प्रतिरूप क्या है?

       फसल प्रतिरूप का तात्पर्य किसी निश्चित समय में विभिन्न फसलों के अन्तर्गत प्रयोग किये जाने वाले भूमि से है। प्रत्येक वर्ष सरकार इस प्रकार का आंकड़ा प्रस्तुत करती है, जिसमें यह बताया जाता है कि किस फसल के अन्तर्गत कितना भूमि का उपयोग किया गया है।

     कृषि प्रतिरूप एक गत्यात्मक संकल्पना है जो समय तथा स्थान के संदर्भ में परिवर्तन होता रहता है। किसी भी भौगोलिक प्रदेश के फसल प्रतिरूप कई कारकों के द्वारा प्रभावित होता है जिनमें भौगोलिक कारक, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक महत्वपूर्ण है।

     भौगोलिक कारकों के अन्तर्गत धरातल की विशेषता जैसे- पर्वत, पठार और मैदान, जलवायु से संबंधित कारक मृदा और जल की उपलब्धता को शामिल करते हैं। जहाँ पर भौगोलिक कारक प्रतिकूल होते हैं वहाँ पर विभिन्न फसलों के अन्तर्गत प्रयुक्त किये जाने वाले भूमि का क्षेत्रफल कम होता है। लेकिन, जहाँ पर भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल होती है, वहाँ फसल प्रतिरूप का स्तर ऊँचा होता है।

      भौगोलिक विविधता, फसल प्रतिरूप को कैसे प्रभावित करती है, इसे उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे- राजस्थान में कम वर्षा वाला क्षेत्र के किसान अधिकतर भूमि का प्रयोग बाजरा की खेती में करते हैं जबकि असम के ब्रह्मपुत्र घाटी में अधिकतर भूमि का प्रयोग चावल कृषि के अन्तर्गत किया जाता है।

     भौगोलिक कारकों के अलावे कई सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक भी फसल प्रतिरूप को प्रभावित करते है। भूमि स्वामित्व, भूमि काश्तकारी, जोत का आकार, चकबंदी कृषि विकास के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम इत्यादि जैसे कारक प्रमुख मानवीय कारक है। छोटे भूमि रखने वाला किसान खेती के लिए श्रम वाले फसल का चयन करते हैं, वहीं बड़े जोत रखने वाले किसान गहन पूंजी पर आधारित फसलों की प्रधानता देते हैं।

       वर्तमान समय में मानव के द्वारा किया जा रहा तकनीकी विकास भौतिक सीमाओं में सुधार लाकर फसल प्रतिरूप में परिवर्तन ला रहा है जैसे- पंजाब, हरियाणा, उ० राजस्थान में चावल की कृषि संभव नहीं है लेकिन यहाँ के किसानों ने सिंचाई साधनों का विकास कर अधिकाधिक उर्वरकों का प्रयोग कर चावल की कृषि करने लगे हैं। जिसके कारण उस क्षेत्र का कृषि प्रतिरूप लगातार परिवर्तित होता जा रहा है।

      कृषि प्रतिरूप का आकलन आपेक्षिक उपज सूचकांक तथा आपेक्षिक विस्तार के आधार पर ज्ञात किया जाता है। आपेक्षिक उपज सूचकांक और आपेक्षिक उपज विस्तार निम्न सूत्र से ज्ञात करते हैं:-

(1) आपेक्षिक सूचकांक = क्षेत्रीय इकाई क्षेत्रफल में किसी फसल का औसत उपज /  कुल क्षेत्रफल का औसत उपज X 100

(2) आपेक्षिक विस्तार सूचकांक = किसी विशिष्ट फसल के अंतर्गत प्रयुक्त भूमि का क्षेत्रफल (% के रूप में) / कुल फसल के अंतर्गत प्रयुक्त भूमिका क्षेत्रफल X 100

     भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने संपूर्ण भारत को चार फसल प्रतिरूप में विभक्त किया है:-

(1) अधिक उपज अधिक विस्तार वाला क्षेत्र, जैसे- धान एवं गेहूँ का फसल प्रतिरूप।

(2) अधिक उपज निम्न विस्तार का क्षेत्र,जैसे- फल एवं सब्जी कृषि फसल प्रतिरूप।

(3) निम्न उपज अधिक विस्तार का क्षेत्र, जैसे- मोटे अनाज फसल प्रतिरूप।

(4) निम्न उपज निम्न विस्तार का क्षेत्र, जैसे- दहलन तथा तेलहन फसल प्रतिरूप।

      उपरोक्त वर्गीकरण से स्पष्ट है कि भारत में विविध फसल प्रतिरूप का विकास हुआ है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि ऊपर बताया गया फसल प्रतिरूप कोई दीर्घकालिक वर्गीकरण नहीं है बल्कि समय तथा स्थान के संदर्भ में परिवर्तित होता रहा है।

फसल प्रतिरूप का महत्व

      फसल प्रतिरूप संकल्पना का अध्ययन कृषि अर्थव्यवस्था के विकास हेतु महत्वपूर्ण है। इसके अध्ययन से किस फसल के अंतर्गत कितना भूमिका उपयोग होता है, इसके संबंध में जानकारी प्राप्त कर कितना संस्थागत तथा संरचनात्मक कारकों का निवेश किया जा सकता है। इसका आकलन किया जा सकता है। इसके अलावे किस भौगोलिक क्षेत्र में किस फसल को प्राथमिकता दी जाय? इसका निर्धारण किया जा सकता है।

      फसल प्रतिरूप के अध्ययन से ही यह ज्ञात हुआ है कि भारत के 72% योग्य भूमि पर खाद्यान्न फसलों की खेती होती है उसमें भी धान तथा गेहूँ की महत्ता अधिक है। भारत में जीवन निर्वाह फसलों की खेती अधिक होती है। यहाँ का किसान आधुनिक तकनीक तथा पूंजी का निवेश कम करता है। इसका मूल्यांकन हम आपेक्षिक विस्तार सूचकांक के माध्यम से ज्ञात करते हैं।

      अत: भारत में अधिक उपज देने वाले फसल-प्रतिरूप को बढ़ावा देने हेतु ज्यादा से ज्यादा संस्थागत एवं संरचनात्मक कारकों के पुनर्निवेशन को बढ़ावा देना होगा। फसल चक्र प आधारित कृषि कार्य को महत्ता प्रदान कनी होगी।

6. Intensity of Cropping (फसल गहनता / शस्य गहनता / फसल तीव्रता)

6. Intensity of Cropping

(फसल गहनता / शस्य गहनता / फसल तीव्रता)



       शस्य गहनता का अर्थ यह है कि एक खेत में एक वर्ष में कितनी बार फसलें ली जाती है। शस्य गहनता भूमि उपयोग की गहनता को व्यक्त करता है। शस्य गहनता का सूचकांक जितना अधिक होगा, भूमि उपयोग की क्षमता भी उतनी अधिक होगी।

भारत का शस्य गहनता सूचकांक 136% (2021 में) है। 

       खाद्यान्नों के उत्पादन को बढ़ाने के दो उपाय है-

(i) कृषि योग्य भूमि का विस्तार कर और

(ⅱ) फसल गहनता में वृद्धि कर।

    भारत के संदर्भ में अब, कृषि योग्य भूमि का विस्तार किसी सीमा तक ही बढ़ाया जा सकता है, उसके बाद नहीं। अतः खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए शस्य गहनता में वृद्धि एक मात्र विकल्प नजर आता है।

    शस्य गहनता कुल बोया गया क्षेत्र तथा कुल कृषि योग्य भूमि का अनुपात होता है। इसे प्रतिशत (%) में व्यक्त किया जाता है। भूगोलवेत्ता डॉ. ब्रजभूषण सिंह ने फसल गहनता निकालने के लिए 1979 ईo में निम्न सूत्र विकसित किया है-

शस्य गहनता = कुल बोया गया क्षेत्र/ कुल कृषि योग्य भूमि X 100

       उदाहरण के लिए माना कि किसी किसान के पास 10 हेक्टेयर कृषि भूमि है। उसने खरीफ के मौसम में पूरे 10 हेक्टेयर क्षेत्र पर फसलें बो दी और खरीफ की फसल काटने के बाद उसने पुनः 6 हेक्टेयर भूमि पर रबी की फसलें बो दीं। इसका अर्थ यह हुआ कि उसने 10+6 = 16 हेक्टेयर भूमि से फसलें ली, हालांकि उसके पास कुल भूमि 10 हेक्टेयर ही है। इस उदाहरण में शस्य गहनता 160% हुई।

शस्य गहनता = 16 /10 ×100

                     = 160%

     इस प्रकार, शस्य गहनता भूमि उपयोग की गहनता/क्षमता/दक्षता को व्यक्त करता है। शस्य गहनता का सूचकांक जितना अधिक होगा, भूमि उपयोग की क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी।

शस्य गहनता को प्रभावित करने वाले कारक

(1) सिंचाई

(2) उर्वक

(3) शीघ्र पकने वाली तथा उन्नत बीज (HYV)

(4) कृषि का यंत्रीकरण

(5) कीटनाशक दवाएँ

(6) मृदा की उर्वरता

(7) कृषि पद्धति

(8) जलवायु

(9) संस्थागत एवं संस्चनात्मक सुविधाओं का विकास

शस्य गहनाता का वितरण

      सम्पूर्ण भारत में औसत शस्य गहनता सूचकांक 135% है। यह विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न है जिससे विभिन्न क्षेत्रों में भूमि की उपयोगिता तथा खाद्यान्नों के उत्पादन का अनुमान लगाया जा सकता है। शस्य गहनता का सूचकांक एक बार से अधिक बोये गये क्षेत्र के विस्तार पर निर्भर करता है। जितना एक बार से अधिक बोया गया क्षेत्र विस्तृत होगा, उतना ही शस्य गहनता का सूचकांक भी अधिक होगा। जिन क्षेत्रों में शस्य गहनता का सूचकांक अधिक होगा, वहाँ पर खाद्यान्नों का उत्पादन भी अधिक होगा।

भारत में शस्य गहनता का वितरण
गहनता का वर्ग गहनता का % क्षेत्र कारण
अति न्यून गहनता 10 % से कम प० राजस्थान, लद्दाख, वृष्टि छाया प्रदेश मरुस्थलीय भाग, पहाड़, कम वर्षा
न्यून गहनता 10-30 % उ०-पू० भारत, सिक्किम, कुमायूं हिमालय पर्वतीय स्थिति
मध्यम गहनता 30-70% मध्यवर्ती भारत, प्रायद्वीपीय भारत के 50-100 cm वर्षा वाला क्षेत्र पठारीय स्थिति
अधिक गहनता 70-130 % हरित क्रांति एवं कमांड एरिया वाले क्षेत्र हरित क्रांति, संरचनात्मक एवं संस्थागत सुविधा का विकास
अत्यधिक गहनता 130 % से अधिक पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महानगरों के चारों ओर  हरित क्रांति, महानगरीय सुविधा

स्रोत: कृषि संगणना वर्ष (2005-06)Intensity of Cropping

फसल गहनता बढ़ाने के उपाय

(1) सिंचाई का विकास

(2) HYV

(3) उर्वरक तथा कीटनाशक का प्रयोग

(4) कृषि का यंत्रीकरण

(5) फसल चक्र

(6) वैज्ञानिक कृषि पद्धति

(7) इन्द्रधनुषी क्रांति

(8) पशु और फसलों का संयोजन

        इत्यादि आधारभूत संरचना एवं संस्थागत सुविधाओं का विस्तार कर फसल गहनता बढ़ायी जा सकती है।

निष्कर्ष:

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भारत में फसल गहनता में काफी विषमता देखी जाती है। अतः निम्न फसल गहनता वाले क्षेत्रों में ऊप बताये गये उपायों को लागू क फसल गहनता बढ़ायी जा सकती है।

5. Agro-Climatic Regions of India (भारत का कृषि जलवायु प्रदेश)

5. Agro-Climatic Regions of India

(भारत का कृषि जलवायु प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. भारत में कृषि जलवायु प्रदेश के भौगोलिक आधार की विवेचना कीजिए।

Q. भारत के कृषि जलवायु प्रदेश के निर्धारण के आधार, वर्गीकरण तथा विशेषता बतलाइए।

    कृषि जलवायु प्रदेश के वर्गीकरण का कार्य भारतीय कृषि के नियोजन और विकास की दिशा में किया गया एक महत्वपूर्ण कार्य है। यह वर्ष योजना आयोग के आवश्यकता पर आधारित है। योजना आयोग के अनुशंसा पर 1988 ई० में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कृषि जलवायु प्रदेश का निर्धारण किया था। कृषि जलवायु प्रदेश एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ जलवायु के अनुरूप कृषि कार्य किया जाता है। भारतीय कृषि जलवायु प्रदेश का निर्धारण पाँच कारकों के आधार पर किया गया है। जैसे-

(1) कृषि उत्पादों की माँग एवं आपूर्ति,

(2) कृष्‌कों की वास्तविक आय,

(3) कृषि प्रदेश में भूमिहीन कृषकों का अनुपात,

(4) कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रबंधन का स्तर,

(5) सतत् विकास की अवधारणा।

       भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का यह कार्य भारत के 456 जिलों के अध्ययन पर आधारित था। ऊपर बताये गये कारकों का पुनः सह संबंध जलवायु से स्थापित कर कृषि जलवायु प्रदेश के निर्धारण किया गया। ICAR ने भारत को कुल 15 कृषि जलवायु प्रदेशों में बांटा है। :-

(1) पश्चिम हिमालय क्षेत्र,

(2) पूर्वी हिमालय क्षेत्र,

(3) निचली गंगा का मैदान,

(4) मध्यवर्ती गंगा का मैदान,

(5) ऊपरी गंगा का मैदान,

(6) गंगा का तराई क्षेत्र,

(7) पूर्वी पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(8) मध्य पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(9) पश्चिमी पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(10) द० पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(11) पूर्वी तटीय मैदान और पहाड़ी क्षेत्र,

(12) प० तटीय मैदान और प० घाट,

(13) गुजरात का मैदान और पहाड़ी क्षेत्र,

(14) पश्चिमी शुष्क क्षेत्र,

(15) द्वीपीय क्षेत्र।

      ICAR द्वारा सभी प्रदेशों में उत्पन्न होने वाले सभी फसलों का तालिका बनाया गया। उसके बाद उत्पादन और उत्पादकता का विश्लेषण किया। विश्लेषण के क्रम में ICAR ने अनुभव किया कि किसान जलवायु और भूमि की दक्षता के अनुरूप फसलों का उत्पादन नहीं करते है। जहाँ की पारिस्थैतिकी चावल के लिए उपयुक्त नहीं है वहाँ भी चावल की खेती की जाती है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कृषि जलवायु प्रादेशीकरण की योजना प्रस्तुत की गई। प्रत्येक कृषि जलवायु प्रदेश की विशेषता निम्न है:- 

(1) पश्चिम हिमालय क्षेत्र:-

    यहाँ की जलवायु उपोष्ण तथा शीतोष्ण प्रकार की है। यहाँ बगानी फसलों की प्रधानता दी गई है। लेकिन, अन्तर पर्वतीय मैदानी भाग में चावल, गेहूँ, मक्का और दलहन को प्रमुख फसल माना गया है। लद्दाख के पहाड़ पर मक्का तथा सोयाबीन जैसे फसलों की अनुसंशा की गई है।

(2) पूर्वी हिमालय क्षेत्र:-

     यहाँ की जलवायु विषुवतीय एवं मानसूनी प्रकार की है जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहाँ पर झूम कृषि की जा सकती है। जिन क्षेत्रों में सिंचित भूमि उपलब्ध है, वहाँ पर चावल, गेहूं और सरसों की खेती अनुशंसा की गई है। पुनः वर्षा आधारित सिंचाई वाले क्षेत्रों में चावल और जूट प्रमुख फसल माना गया है।

(3) निम्न गंगा मैदान:-

      यह मूलतः प० बंगाल और पूर्वी बिहार में फैला हुआ है। यहाँ चावल तथा जूट की खेती की अनुसंशा की गई है। पुनः प० बंगाल के उत्तरी भाग में चाय की खेती और दक्षिण में स्थित मिदनापुर में गन्ना को एक महत्त्वपूर्ण फसल माना गया है।

(4) मध्यवर्ती गंगा के मैदान:-

     इसका विस्तार इलाहाबाद से लेकर राजमहल की पहाड़ी तक हुआ है। यहाँ चावल की खेती सघन निर्वाह कृषि के रूप में किया जाता है। हाल के वर्षों में सिंचाई की मदद से गेहूं की कृषि प्रारंभ की गई है। ICAR ने चावल, गेहूँ, दलहन को जलवायु के अनुकूल माना है।

(5) ऊपरी गंगा के मैदान:-

     इसका विस्तार इलाहाबाद के पश्चिम में हुआ है। यहाँ सिंचित भूमि पर गेहूँ और असिंचित भूमि पर मक्का तथा दिलहन की खेती की जाती है। लेकिन नवीन योजना में निम्नलिखित फसल समूह को विकसित करने पर जोर दिया है-

(i) चावल-गेहूँ-मूंग

(iⅰ) मक्का-दलहन-प्याज

(6) गंगा के तहाई प्रदेश:-

     यहाँ गेहूं तथा गन्ना प्रमुख फसल है। लेकिन, जलवायु प्रदेश योजना में उपरोक्त फसल के अलावे आलू और चावल की अनुसंशा की गई है।

(7) पूर्वी पठार तथा पहाड़ी क्षेत्र:-

    यहाँ का कृषक मुख्यतः मडुवा, दलहन और चावल उत्पन्न करते रहे हैं। यह क्षेत्र छोटानागपुर के पठार पर स्थित है। ICAR ने यहाँ उपरोक्त फसल के अलावे गेहूँ चावल तथा चना की खेती करने की अनुसंशा की है।

(8) मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र:-

    यह मध्य भारत में अवस्थित है। यहाँ सिंचाई साधनों का सीमित विकास हुआ है जिसके चलते मृदा में नमी कम पायी जाती है। यहाँ पर मोटे अनाजों की खेती की जाती है।

     यही परिस्थितिक (9) पश्चिमी पठार और पहाड़ी क्षेत्र में पुन: (10) दक्षिण पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र में मिलती है। इसलिए इन दोनों में मृदा की नमी पर आधारित फसलों की अनुसंशा की गई है। मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में चावल, मूंगफली और गेहूँ की खेती के लिए अनुकूल माना गया है। असिंचित क्षेत्रों में सोयाबीन ज्वार, अरहर और बाजरा की खेती को अनुकूल माना गया है। इसी प्रकर की अनुशंसा प‌श्चिमी और दक्षिण के पठारी क्षेत्रों के लिए किया गया।

(11) पश्चिमी तटीय मैदान और पहाड़ी क्षेत्र:-

      इस क्षेत्र को सिंचित एवं असिंचित क्षेत्र में बाँटा जा सकता है। सिंचित क्षेत्र में चावल, अरहर, दलहन, खासकर के मूंग को प्रमुख फसल माना गया है। जबकि असिंचित क्षेत्र में मूंगफली, सोरघम (ज्वार) और अरहर को प्रमुख फसल माना गया है। पुनः केरल के लैटेराइट वाला पठार पर चावल, टोपाइका और नारियल की खेती की अनुसंशा की गई।

(12) पूर्वी तटीय मैदान और पहाड़ी क्षेत्र:-

      इसमें पूर्वी घाट, कोरोमंडल तट और उत्तरी सरकार तट को शामिल करते हैं। यहाँ ज्वार, बाजरा की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। यहाँ सिंचित क्षेत्रों में चावल और गेहूँ जबकि असिंचित क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, दलहन एवं तेलहन की अनुशंसा की गयी है।

(13) गुजरात का मैदानी एवं पहाड़ी क्षेत्र:-

        गुजरात में सूरत जिला को छोड़कर सिंचाई साधनों का अभाव है, लेकिन संभावित सिंचित क्षेत्र अधिक है। वर्तमान समय में असिंचित क्षेत्र में मूँगफली, ज्वार, बाजरा, अरहर और मूंग की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इस क्षेत्रों में अरहर, मूंगफली और गेहूँ अथवा मूँगफली- अरहर- गेहूँ या फिर चावल- सरसों- मूँग फसल समूह की चर्चा की गयी है।

(14) प० का शुष्क क्षेत्र:-

     यह पश्चिमी राजस्थान और उसके निकटवर्ती क्षेत्र में विस्तृत है। ज्वार, बाजरा, दलहन और तेलहन यहाँ की प्रमुख फसल है। यहाँ पर इन्हीं फसलों को मान्यता दिया गया है।

(15) द्वीपीय क्षेत्र:-

      अंडमान-निकोबार पर चावल, नारियल और बगानी कृषि की अनुशंसा की गयी है जबकि लक्षद्वीप पर नारियल और चावल को प्रमुख फसल माना गया है।

Agro-Climatic Regions of India

निष्कर्ष:

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ICAR ने कृषि-जलवायु प्रदेश का निर्धारण कर एक सराहनीय कार्य किया है। इस योजना के आधार पर कृषक फसलों का चुनाव, जलवायु के अनुरूप कर सकता है। इससे भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था जहाँ एक ओ सुदृढ़ होगी वहीं दूसरी ओ किसान प्रतिकूल जलवायु से भी लड़ सकेंगे।

4. Agricultural Region of India (भारत का कृषि प्रदेश)

4. Agricultural Region of India

(भारत का कृषि प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. भारत को कृषि प्रदेशों में वर्गीकृत करें और प्रत्येक प्रदेश की विशेषता लिखें।

Q. कृषि प्रदेश के वर्गीकरण के आधार को स्पष्ट करें तथा कृषि प्रदेशों का वर्गीकरण करते हुए प्रत्येक प्रदेश की विशेषता लिखें।

उत्तर-

         वैश्विक स्तर पर कृषि प्रदेश का अध्ययन कई भूगोलवेताओं के द्वारा किया गया है जिनमें जर्मन भूगोलवेता व्हिटलसी के द्वारा प्रस्तुत कृषि प्रदेश सबसे प्रमुख है। इन्होंने 5 कारकों को आधार मानते हुए विश्व को 13 कृषि प्रदेश में वर्गीकृत किया था। किसी भी भौगोलिक प्रदेश में कृषि के विभिन्न तत्वों के बीच अगर समरूपता पायी जाती है तो वैसे प्रदेश को कृषि प्रदेश कहते हैं। कृषि प्रदेश के निर्धारण में प्रमुख फसल, उत्पादन की प्रक्रिया, पूंजी एवं तकनीक के प्रयोग का स्तर, फसल और पशुओं तथा फसलों के बीच साहचर्य, कृषि उत्पादों का विपणन इत्यादि को ध्यान में रखकर किया जाता है।

          कृषि प्रदेश के निर्धारण हेतु द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अनुभावाश्रित विधि को महत्व दिया जाता था लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कृषि प्रदेशों के निर्धारण हेतु सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया जाने लगा। सांख्यिकी विधि के आधार पर फसल संयोजन को प्राथमिकता दी गई। वर्तमान समय में सांख्यिकी विधि पर आधारित फसल संयोजन के आधार पर भारतीय कृषि प्रदेश का निर्धारण किया जा रहा है।

     भारतीय भूगोलवेत्ता प्रो० मुहम्मद शफी, पीठावाला, चतुर्भुज ममोरिया जैसे लोगों ने फसल संयोजन, फसलों की विशेषता, फसलों की प्रमुखता के अलावे स्थलाकृतिक विशेषता जलवायु, मृदा तथा जनसंख्या दबाव को आधार मानते हुए कृषि प्रदेश का निर्धारण किया है। वास्तव में यह विधि अनुभावाश्रित सह सांख्यिकी विधि पर आधारित है। इन भूगोलवेत्ताओं ने भारत को छः कृषि प्रदेशों में वर्गीकृत दिया है। जैसे-

(1) फल एवं सब्जी कृषि प्रदेश

(2) चावल, जूट और चाय कृषि प्रदेश

(3) गेहूँ एवं गन्ना कृषि प्रदेश

(4) ज्वार, बाजरा एवं तेलहन कृषि प्रदेश

(5) मक्का एवं मोटे अनाज वाले कृषि प्रदेश

(6) कपास आधारित कृषि प्रदेश

(1) फल एवं सब्जी कृषि प्रदेश:-

      इसके अन्तर्गत हिमालय प्रदेश को शामिल करते हैं। हिमालय प्रदेश के पर्वतीय मिट्टी मुख्यतः शिवालिक के ढाल तथा अन्तरा पर्वतीय घाटियों में मिलती है। ढाल पर फलों की खेती होती है जबकि घाटी में सब्जी की खेती होती है। वस्तुतः इस प्रदेश में होने वाले पर्यटन, नगरीकरण और अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार में होने वाली माँग के कारण इस कृषि प्रदेश का विकास हुआ है।

      वस्तुतः फल एवं सब्जी कृषि प्रदेश के अन्तर्गत 10% भूमि शामिल है। लेकिन आर्थिक मूल्य के दृष्टि से सबसे प्रमुख प्रदेश है। परंपरागत रूप से यह कृषि प्रदेश झूम कृषि, सीढ़ीनुमा कृषि तथा यायावर जीवन के लिए प्रसिद्ध रहा है। पुन: इस कृषि प्रदेश में कश्मीर की घाटी में चावल & उत्तरी-पूर्वी भारत के ढालों पर चाय की खेती की जाती है। हिमालय प्रदेश के कृषि प्रदेश को पुनः दो भागों में बांटा जाता है-

(i) प० हिमालय की कृषि प्रदेश

(ii) पूर्वी हिमालय की कृषि प्रदेश

      दोनों प्रदेशों में पहाड़ी के ढालों पर आलू कृषि की प्राथमिकता दी जाती है। प० हिमालय में इसकी सर्वाधिक खेती लाहूल एवं स्फीति घाटी में की जाती है। पूर्वी हिमालय में मुख्यतः उष्णकटिबंधीय फलों की व्यापारिक खेती की जाती है जिसमें अनानस तथा नारंगी प्रमुख है। प० हिमालय सेब की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कुल्लू तथा कांगड़ा घाटी उच्च कोटि के सेब उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

      पुनः प० हिमालय कशर उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीर का डोडा जिला और हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में इसकी कृषि होती है। पश्चिम हिमालय अखरोट और अंगूर जैसे फसलों के लिए प्रसिद्ध है। अंगूर की कृषि, पीर-पंजाल के दक्षिणी ढाल पर, आखरोट की खेती बनिहाल में सबसे अधिक की जाती है।

    स्पष्ट है कि हिमालय क्षेत्र फल एवं सब्जी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ इटली और बुल्गारिया के सहयोग से फल एवं सब्जी का उत्पादन किया जा रहा है। इस क्षेत्र के उत्पाद अपनी गुणवत्ता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(2) चावल, जूट और चाय कृषि प्रदेश:-

      इस प्रदेश में भारत के वैसे क्षेत्र को शामिल किया जाता है जहाँ वार्षिक वर्षा 100-200 cm और तापमान 80°F से 90°F होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, सम्पूर्ण बिहार बंगाल, असम की घाटी, पूर्वी एवं पश्चिमी तटवर्ती मैदान को इसमें शामिल करते हैं। ये क्षेत्र भारत के 3/4 चावल का उत्पादन करते है। बंगाल, आन्ध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश चावल के सबसे बड़े उत्पादक राज्य है।

    जलोढ़ समतल मैदान, अनुकूल वर्षा एवं श्रम के अधिकता के कारण चावल कृषि का विकास अधिक हुआ है। इस प्रदेश का कृषक जूट, चाय व नारियल की खेती वाणिज्यिक फसल के रूप में करता है। जूट की कृषि तराई, प० बंगाल, पूर्वी बिहार ‌और महानदी के डेल्टाई भाग में की जाती है। चाय की खेती असम और प० बंगाल के पर्वतीय ढालों पर की जाती है। तटवर्ती मैदान में नारियल की कृषि होती है। इस प्रदेश में तम्बाकू हाल के वर्षों में प्रवेश किया है।

      ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि यह प्रदेश विविध प्रकार के फसलों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन चावल एक ऐसा फसल है जो सम्पूर्ण प्रदेश को जोड़ता है।

(3) गेहूँ एवं गन्ना कृषि प्रदेश:-

       यह प्रदेश भारत के उपार्द्र जलवायु प्रदेश में स्थित है। इसके अंतर्गत सतलज के मैदान पंजाब, हरियाणा, उ० राजस्थान और प० UP को शामिल करते हैं। इस प्रदेश की सबसे प्रमुख फसल गेंहूँ है। जोड़े की ऋतु में पछुआ विक्षोभ से हल्की बारिश होती है जो गेहूँ फसल के लिए लाभकारी होता है। इस प्रदेश में गेहूँ एवं गन्ना की खेती किये जाने के अन्य कारण भी मौजूद है। जैसे- पुरानी जलोढ़ मिट्टी के मैदान उपलब्ध है। इस क्षेत्र में जुझारू किसान रहते है। सिंचाई साधनों का विकास बड़े पैमाने पर किया गया है।

          UP गेहूँ और गन्ना उत्पादन में सबसे अग्रणी राज्य है। यह प्रदेश अन्न भण्डार के रूप में जानी जाती है। इस क्षेत्र में संरचनात्मक सुविधाओं के विकास के कारण नवीन फसल जैसे- चावल, कपास, चारा, तेलहन और दलहन फसलों का आगमन हुआ है। भारत में हरित क्रांति और दुग्ध क्रांति सर्वाधिक सफल इसी प्रदेश में हुआ है।

(4) ज्वार, बाजरा एवं तेलहन कृषि प्रदेश:-

     इसके अन्तर्गत प्रायद्वीपीय भारत के 50-125 cm वर्षा वाले क्षेत्र को शामिल करते हैं। इन फसलों का क्षेत्र मुख्यतः लाल एवं लेटेराइट मिट्टी पर आधारित है। वर्षा की कम मात्रा और वर्षा की अनिश्चितता के कारण यहाँ के कृषक मोटे अनाजों की खेती करते हैं। ज्वार तथा बाजरा के उत्पादन में भारत विश्व का अग्रणी देश है। ज्वार उत्पादन में महाराष्ट्र और बाजरा के उत्पादन में राजस्थान सबसे अग्रणी है। इस प्रदेश में परंपरागत रूप से टोपायका मडुवा की खेती की जाती है।

(5) मक्का एवं मोटे अनाज वाले कृषि प्रदेश:-

      यह कृषि प्रदेश के शुष्क जलवायु कृषि प्रदेश में स्थित है। यहाँ वर्षा 50 cm से कम होती है। भारत में इस कृषि प्रदेश का विकास तीन क्षेत्रों में हुआ है:-

(i) प्रायद्वीपीय भारत के वृष्टि छाया प्रदेश- यहाँ की मक्का और ज्वार प्रमुख फसल है।

(ii) प० राजस्थान और गुजरात- यहाँ का प्रमुख फसल मक्का है।

(ii) लद्दाख क्षेत्र- यहाँ का मुख्य फसल मक्का है।

     वस्तुतः ये प्रदेश अत्यन्त ही सूखा ग्रस्त क्षेत्र है। भूमिगत जलस्तर काफी नीचे है। भौगोलिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल है। संरचनात्मक सुविधाओं का विकास नहीं हो सका है। जिसके कारण उत्पादकता बहुत कम है।

(6) कपास आधारित कृषि प्रदेश:-

        यह दक्वन लावा पठारीय भाग पर स्थित है। यह प्रदेश महाराष्ट्र, गुजरात, मालवा के पठार, तेलंगाना के पठार, कोयम्बटूर पठार, कर्नाटक का पठार पर स्थित है। यह विश्व का सबसे बड़ा कपास की पेटी है। यहाँ की सबसे प्रमुख फसल कपास है क्योंकि इस प्रदेश में अति उर्वर काली मिट्टी पायी जाती है। मिट्टी में लम्बे समय तक नमी धारण करने की क्षमता होती है। वर्षा 75-100 cm तक हो जाती है।

     कपास आधारित कृषि प्रदेश में ज्वार की खेती की जाती है। हाल के वर्षों में गन्ना का आगमन नकदी फसल के रूप में हुआ है।

निष्कर्ष:-

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के अलग-2 क्षेत्रों में मुख्यतः 6 कृषि प्रदेश का विकास हुआ है। पुनः प्रत्येक कृषि प्रदेश में अभूतपूर्व फसलों में विविधता दिखाई देती है। पुनः यह कृषि प्रदेश गत्यात्मक है क्योंकि प्रत्येक प्रदेश परंपरागत रूप से विशेष फसलों के लिए जाने जाते थे, लेकिन वर्तमान समय में विभिन्न फसलों के लिए जाने जाते है अर्थात जिन प्रदेशों में संस्थागत संरचनात्मक सुविधाओं का ज्योंहि विकास किया जाता है त्यों ही उस प्रदेश में नवीन फसलों का आगमन हो जाता है। इस प्रकार सरंपरागत पह‌चान को त्यागक नवीन पहचान स्थापित क देते हैं।

9. Eco-Tourism (पारिस्थैतिक पर्यटन)

Eco-Tourism

(पारिस्थैतिक पर्यटन)



           यह दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- पारिस्थैतिकी और दूसरा- पर्यटन। पारिस्थैतिकी का तात्पर्य उस समस्त भौगोलिक तत्त्व से है जो धरातल पर या उसके चारों ओर जैविक एवं अजैविक घटकों के रूप में मौजूद है। पुनः पर्यटन का तात्पर्य स्वेच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर घूमना-फिरना है।

       सदियों से लोग सांस्कृतिक तत्वों को समझने हेतु पर्यटन का सहारा लेते रहे हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में पारिस्थैतिकी के प्रति दिलचस्पी रखने वाले लोग पारिस्थैतिक केन्द्र की ओर आकर्षित होने लगे हैं, जिसे “पारिस्थैतिकी पर्यटन” कहते हैं। भूगोल में पारिस्थैतिकी पर्यटन का विशेष महत्व है क्योंकि एक ओर कई पर्यटक स्थल अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से प्रदूषित हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए पारिस्थैतिक पर्यटन की आवश्यकता पड़ती है। पारिस्थैतिक पर्यटन के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्त्वों पर जोर दिया जाता है:-

(1) जैविक, अजैविक तथा सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण दिया जाता है।

(2) पारिस्थैतिकी पर्यटन (Eco-Tourism) स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध करने में सहायक होती है।

(3) पारिस्थैतिक पर्यटन सतत् विकास की अवधारणा के बढ़ावा देता है।

(4) पर्यटन में स्थानीय लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करता है।

(5) पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव की प्राथमिकता दी जाती है।

(6) इस प्रकार के पर्यटन में भौतिक वस्तुओं के कम से कम प्रयोग को बढ़ावा दिया जाता है।

(7) वनस्पति, जीव-जन्तु एवं विभिन्न प्रकार के भौगोलिक स्थलाकृति पारिस्थैतिक पर्यटन के केन्द्र बिन्दु होता है।

      कुछ देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पारिस्थैतिक पर्यटन विशेष योगदान दिया है। जैसे- कोस्टारिका, इक्वेडोर, मेडागास्कर तथा नेपाल इत्यादि। “पारिस्थैतिक पर्यटन संकल्पना” का उदय 1980 के दशक से माना जाता है। भारत में इस प्रकार के पर्यटन का तेजी से विकास हो रहा है। UNO ने वर्ष 2002 को पारिस्थैतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए “पारिस्थैतिकी पर्यटन अन्तरर्राष्ट्रीय वर्ष” की घोषणा की थी।

    भारत में पारिस्थैतिकी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई स्थानीय पहल किये जा रहे हैं:-

(1) जम्मू-कश्मीर सरकार ने लद्दाख के कई गाँवों में पर्यटकों के लिए स्थानीय घरों में रहने की व्यवस्था की है। इससे जो आमदनी होती है, उससे ग्रामीण विकस और पर्यावरण के संरक्षण पर खर्च की जाती है।

(2) नागालैण्ड में कोहिमा के पास एक स्थानीय संस्था के द्वारा पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास हेतु पर्यटकों को प्रशिक्षण देती है।

(3) केरल के पेरियार बाघ संरक्षित क्षेत्र में वन विभाग के अधिकारियों ने “इको- टूरिज्म योजना” का निर्माण कर लागू की है ताकि लोग नजदीक से बाघों की मुआयना करें तथा पर्यावरण को भी हानि नहीं पहुंचे।

(4) सिक्कीम खनचेनजोंगा जीव मण्डल संरक्षित क्षेत्र में लेवचा समुदाय के लोग “पारिस्थैतिकी पर्यटन समिति” चला रहे हैं जो लोगों के प्राकृ‌तिक वातावरण में प्रकृति के साथ रहने के लिए प्रेरित करते हैं।

(5) पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन के डेल्टा पर अवस्थित कुछ गाँव के लोगों में ने “वन्य जीव संरक्षण समाज” की स्थापना की है। यह समाज पारिस्थैतिक पर्यटन की दिशा में सराहनीय कार्य कर रही है।

(6) सरकार विज्ञापनों के मध्यम से पारिस्थैतिक पर्यटन के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ विज्ञापनों से देती है।

(7) राष्ट्रीय जैविक उद्यान, जैवमंडल, अभ्यारण, सफारी इत्यादि निर्माण का एक ओर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के इन घटकों को बचाने के लिए भी कई प्रयास किये जा रहे हैं। जैसे- पर्यटक स्थलों पर प्लास्टिक वस्तुओं के प्रयोग पर रोक, बैटरी चालित वाहनों का प्रयोग, कचड़ा प्रबंधन केन्द्रों की स्थापना की जा रही है।

पारिस्थैतिक पर्यटन का प्रभाव

     पारिस्थैतिक पर्यटन के कारण दो प्रकार के प्रभाव देखे जा सकते हैं।

(A) सकारात्मक प्रभाव:-

(1) पारिस्थैतिक के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है।

(2) पारिस्थैतिक तत्वों का संरक्षण एवं उनका विकास हो रहा है।

(B) नकारात्मक प्रभाव:-

(1) ऐसे पर्यटन से पारिस्थैतिक तत्वों का व्यापारीकरण होने लगा है जिसके कारण स्थानीय लोगों के विस्थापन और मौलिक अधिकारों के हनन को बढ़ावा मिला है।

(2) पारिस्थैतिक पर्यटन नीतियों का निर्धारण तो ठीक से करती हैं लेकिन, उसे  धरातल पर आदर्श रूप में लागू नहीं कर पाती है जिसके कारण पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़‌ता है।

(3) पारिस्थैतिक केन्द्रों को अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से विभिन्न प्रकार के प्रदुषण की समस्या भी जन्म ले रही है।

(4) पारिस्थैतिक पर्यटन का बूरा प्रभाव जीव-जगत पर पड़ रहा है। जैसे- पशुओं को देखने के लिए, अनका चित्र उतारने के लिए उनसे छेड़-छाड़ करते हैं।

(5) पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास से अछूते एवं अप्रयुक्त जंगली, पहाड़ी भूमि का अतिक्रमण होने लगा है।

(6) इस तरह के पर्यटन से याता‌यात साधनों बेहताशा वृद्धि होती है जिसका स्पष्ट प्रभाव जैविक विविधता पर पड़‌ती है।

(7) जंगली जानवरों के व्यापार तथा तस्करी को बढ़ावा मिलता है।

(8) स्थानीय संस्कृति खतरे में पड़ जाती है।

(9) स्थानीय लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(10) पर्यटन स्थलों का सही तरीके से प्रबंधन न होने पर कई प्रकार के सामजिक और आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती है।

निष्कर्ष:

       इस तरह ऊपर के तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पारिस्थैतिक पर्यटन का उद्देश्य भले ही सकारात्मक है लेकिन, इसके कई नकारात्मक प्रभाव पड़े है। अत: इन नकारात्मक समस्याओं से निपटने हेतु ऐसी योजना और रणनीति की आवश्यकता है जो सतत् विकास (पर्यावरण को बिना हानि पहुँचाये) की अवधारणा को आदर्श रूप में लागू क सके। यह उद्देश्य तभी हासिल हो सकेगा जब पारिस्थैतिक पर्यटन में स्थानीय सहभागिता को बढ़ाया जाएगा। प्रशिक्षित गाइड को उतारा जाएगा एवं पर्यावरण संक्षण कार्यक्रमों को भली- भाँति लागू किया जायेगा।

8. Liberalization (उदारीकरण)

Liberalization

(उदारीकरण)



      भारत द्वारा वर्ष 1991 ई० में आर्थिक सुधार नीति के तहत उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्विकरण की नीति को अपनाया गया था। उदारीकरण की नीति मुख्यतः उद्योगों से जुड़े हुए थे। 1991 ई० के औद्योगिक नीति का मुख्य उद्देश्य दो थे-

(4) भारत का तेजी से आर्थिक विकास करना।

(2) अर्थव्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के योग्य बनाना।

    जब 1995 में WTO की स्थापना हुई तो भारतीय उदारीकरण को विशेष बल प्राप्त हुआ। भारत के द्वारा अपनायी गयी उदारीकरण की प्रक्रिया की मुख्य विशेषता निम्नलिखित हैं:-

(1) 1991 के औद्योगिक नीति में घोषणा की गई थी कि औद्योगिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोला जायेगा।

उद्योगों में सरकार का प्रशासनिक हस्तक्षेप कम होगा और देश में प्रतिस्पर्द्धात्मक महौल बनाया जायेगा। इसी घोषणा का पालन करते हुए उदारीकरण के नीति को अपनाया गया।

(2) उदारीकरण नीति को अपनाते हुए सरकार ने सभी उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया लेकिन तीन उद्योगों के आरक्षित उद्योग घोषित किया। जैसे- नाभिकीय ऊर्जा, रेल तथा अन्तरिक्ष।

(3) उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया।

(4) प्रतिबंधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1991 में सुधार लाकर विदेशों से पूंजी लाने की सीमा को समाप्त कर दिया गया तथा देशी कंपनियों के अधिग्रहण तथा समावेशन पर से प्रतिबंध हटा दिये गये।

(5) आयात एवं निर्यात से जुड़े हुए प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया गया।

(6) विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया।

(7) सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश की प्रक्रिया प्रारंभ की गई।

(8) कृषि को उद्योग का दर्जा देते हुए देश में संगठित कृषि तथा ठेका कृषि की शुरुआत की गई।

(9) श्रम कानून और कर संरचना में सुधार लाया गया।

उदारीकरण के प्रभाव

     उदारीकरण की उपयुक्त विशेषताओं के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर चतुर्दिक प्रभाव पड़ा है। प्रभाव को लेकर अर्थशास्त्रियों के मध्य दो तरह के विचार है:-

      प्रथम विचार इसका समर्थन करता है और दूसरा विचार इसका विरोध करता है। फिर भी, उदारीकरण के प्रभाव को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है-

(1) प्रत्याक्ष विदेशी निवेश में तेजी से वृद्धि हुई है। इसका अनुमान बढ़ते हुए विदेशी मुद्रा भण्डार से लगाया जा सकता है।

(2) अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि का अनुमान बढ़ते हुए शेयर बाजार के सूचकांक से लगाया जा सकता है।

(3) सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि 1990-91 ई० में GDP का विकास दर 4% था जो 2023-24 में बढकर 8.2% हो गई।

(4) मंदी का कम प्रभाव-

     पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है फिर भी, भारत की अर्थव्यवस्था का विकास  7.5% दर से हो रहा है।

(5) रोजगार में वृद्धि-

     उदारीकरण नीति के कारण देश में शिक्षित एवं अशिक्षित लोगों को नए-2 रोजगार के अवसर प्रदान हो रहे हैं।

(6) आधारभूत संरचना का विकास-

     देशी एवं विदेशी निवेश के कारण आधारभूत संरचनाओं का विकास तेजी से हो रहा है।

(7) प्रादेशिक असंतुलन में वृद्धि-

      देश का आर्थिक विकास तेजी से हो रहा है लेकिन, विकसित क्षेत्र और विकसित होने जा रहे हैं तथा पिछड़े क्षेत्र और पिछड़ते जा रहे हैं।

(8) कुटीर एवं लघु उद्योगों पर बूरा प्रभाव पड़ रहा है।

(9) मंहगाई पर नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रही है।

(10) विदेशों से उच्च तकनीक एवं आगमन बड़े पैमाने पर हो रहा है।

(11) आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता में कमी आई है।

(12) कृषि क्षेत्र की उपेक्षा अभी जारी है।

(13) संगठित कृषि, ठेका कृषि और SEZ के कारण लगातार विवाद बढ़ते जा रहे है।

निष्कर्ष:

     इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि उदारीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ रहे हैं फिर भी, सकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील एवं प्रतिस्पर्द्धात्मक स्वरूप प्रदान कने में सक्षम हो रही है।

7. Nano Technology (नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)

Nano Technology

(नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)



प्रश्न प्रारूप

Q. नैनो टेक्नोलॉजी से आप क्या समझते है? उसके संभावित उद्योग पर विस्तार से चर्चा करें या प्रकाश डालें।

उत्तर- नैनो टेक्नोलॉजी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1974 ई० में जापानी विद्वान नोरियो तनीगुची ने किया था। लेकिन यह शब्द 1980 के आस-पास काफी लोकप्रिय हुआ। इस शब्दों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय एरिक ड्रेक्सलर को जाता है। क्योंकि डेक्सलर महोदय ने “इंजन ऑफ क्रिएशन नामक पुस्तक में ‘नैनो टेक’ शब्द का प्रयोग किया और कई संभावित एवं काल्पनिक उपयोग पर प्रकाश डाला।

        ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ शब्द दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- नैनो और द्वितीय- टेक्नोलॉजी। नैनो एक ग्रीक शब्द है जिसका तात्पर्य बौना होता है। यहाँ पर नैनो शब्द नैनो मीटर (10-9 मी०) का संक्षिप्त भाग है। किसी भी एक इकाई (जैसे- 1m या 1 sec या 1g) का अरबवाँ हिस्सा ‘नैनो मीटर’ या नैनो सकेण्ड या ‘नैनो ग्राम’ कहलाता है। दूसरी ओर टेक्नोलोजी का तात्पर्य उस तकनीक या प्रौद्योगिकी से है, जिसके माध्यम से नवीन भौतिक उत्पादों को जन्म दिया जाता है।

       अतः नैनो टेननोलॉजी का तात्पर्य उस तकनीक से है जिसके माध्यम से हम नैनो स्तर के भौतिक उत्पादों का निर्माण कर सकते हैं। विश्व की सबसे प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका (Science) ने नैनो टेक्नोलोजी को वर्ष 2001 का तथा 21वीं शताब्दी की सबसे बड़ा उपलब्धि माना है।

      वैज्ञानिकों के द्वारा नैनो स्तर पर ही सूक्ष्म निर्माण की दिशा में प्रयोग करने का कारण यह है कि जब स्कूल स्तर से सूक्ष्म स्तर की ओर जाते हैं तो पदार्थों के विशेषताओं में एक खास स्तर तक कोई परिवर्तन नहीं होता है लेकिन एक नियत स्तर के बाद गुणों में परिवर्तन होने लगता है। यह स्तर है- नैनो इकाई (10-9 इकाई)।

        दूसरे शब्दों में परमाणु का औसत का स्तर 10-9 मी० होता है। अतः कोई भी स्थूल पदार्थ जब परमाण्विक स्तर पर (10-9 मी०) अते हैं तो उनके गुण धर्म में परिवर्तन होने लगता है। इसी स्तर को मानकर किया जा रहा शोध एवं अनुसंधान कार्यों से संबंधित प्रक्रिया, निर्मित उत्पाद इत्यादि को नैनो टेक्नोलॉजी कहा जाता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के विकास होने से कई प्रकार के संभावित उपयोग किये जाने की संभावना है। जैसे-

(1) नैनो टेक्नोलोजी के प्रयोग के द्वारा विभिन्न यौगिक के बंधन संरचना को बदलकर और उन्हें आपस में मिलाकर एक नये पदार्थ का निर्माण किया जा सकता है। जैसे- प्रयोगशाला में कोयला को हीरे में परिवर्तन किया जा सकता है। इसी तरह हवा, धूल, और पानी के अणुओं को दुबारा समायोजन करके फुल, फल इत्यादि बनाया जा सकता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से दुनिया भर के लोगों को स्वस्थ्य, शिक्षित और प्रदूषण रहित वातावरण प्रदान किया जा सकता है। इसका समुचित विकास हो जाने पर टिकाऊ विकास, सुरक्षित तथा कुशल उत्पादों का निर्माण, दूर संचार, परिवहन, दवा, कृषि तथा उद्योगों हेतु किया जा सकता है। यह तकनीक उन सारे चीजों को संभव बना सकता है जो अभी कल्पना के स्तर पर है।

        जैसे- नैनो टेक्नोलोजी और बायोटेक्नोलोजी के संयोग से मानव को विलुप्त किया जा सकता है। गंतव्य स्थान पर कुछ सेकेण्ड में भेजा जा सकता है तथा उन्हें पुनः प्रकट किया जा सकता है। इच्छा के अनुसार किसी भी वस्तु के आकार को बदला जा सकता है तथा कम लागत में अच्छे गुणो वाले उत्पादों के निर्माण किया जा सकता है।

     वर्तमान समय में विश्व के अलग-2 देशों में नैनो टेक्नोलॉजी पर अनुसंधान का कार्य चल रहा है। यह टेक्नोलॉजी जहाँ एक ओर विकास की नवीन द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी ओर संभावित खतरे उत्पन्न करेंगे। जैसे- अगर किसी भी पदार्थ के कण को नैनो स्तर (109 मी०) पर विभाजित किया जाता है तो उसे पुनः विभक्त कर और नष्ट नहीं कि जा सकता है।

      नैनो कण मानव के शरीर में सांस के जरिये, गले के जरिये, त्वचा एवं इंजेक्शन के जरिये शरीर के कोशिका में पहुंचकर अनेक प्रकार के बीमारियाँ उत्पन्न कर सकती है। ये कण किसी जीव के अन्दर पहुंचकर किस तरह का व्यवहार करेंगें? यह अभी अज्ञात है।

        ये कण शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर सकते हैं। शरीर में इन्जाइम, प्रोटीन और DNA के निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण स्वरूप वैज्ञानिकों ने कार्बन पर आधारित एक कार्बन नैनो ट्यूब का निर्माण किया है। इसमें कार्बन-60 नामक समस्थानिक का प्रयोग किया गया है। यह समस्थानिक काफी रेडियो सक्रिय होता है। अगर कहीं पर कार्बन ट्यूब का प्रयोग किया जाता है तो वह उत्पाद रेडियो सक्रियता से कैसे बच सकता है।

     नैनो टेक्नोलॉजी से कई प्रकार के पर्यावरणीय संबंधी खतरे उत्पन्न हो सकते है। जैसे- पर्यावरण में नैनो पार्टिकिल के माध्यम/मौजूदगी से वायु, जल, अंतरीक्ष, मृदा इत्यादि प्रदूषित हो सकते हैं।

उपलब्धि

(1) कार्बन नैनो ट्यूबश (CNTs):-

     नैनो तकनीक से विकसित किया गया यह एक ऐसा निर्वात नली है जो शीशे के बजाए कार्बन अणुओं से बनी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन के अणु काफी अभिक्रियाशील होते हैं। वे दूसरे पदार्थों के सम्पर्क में आकर उनके साथ किसी तरह के प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। अतः कार्बन ट्यूब का प्रयोग आदर्श कन्टेनर के रूप में किया जा सकता है। इनमें कोई पदार्थ भरकर इन्हें शीलबन्द कि जा सकता और उन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है।

      CNTs को जोड़‌कर तार जैसी संरचना बनायी जा सकती है और कई पदार्थों का आसानी से परिवहन किया जा सकता है। शरीर के अन्दर किसी विशेष जगह पर केन्सर की दवा नैनो ट्यूबश के माध्यम से आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद अल्ट्रा वॉयलेट तरंग के जरिये उन नलिकाओं को तोड़‌कर दवा को सही स्थान पर फैलाया जा सकता है।

(2) प्रकाश अथवा कण माधारित पैनी टेक्नोलोजी:-

     यह ज्ञात है कि प्रकाश कण और तरंग दोनों की तरह व्यवहार करते हैं। अगर इस टेक्नोलॉजी की विकास हो जाता है तो इसके जरिये बिना तार के इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान संभव हो जायेगा। परमाणु के प्रत्येक इलेक्ट्रॉन को अपनी इच्छानुसार तोड़ा-मड़ोड़ा जा सकता है।

(3) नैनों क्रिस्टल:-

     ध्वनि तरंगों के साथ नैनो कण प्रतिक्रिया करना प्रारंभ कर देगी। नैनो- क्रिस्टल किसी दृश्यमान स्रोत को रंग बदलकर विलुप्त कर देगी। नैनो क्रिस्टल का प्रयोग गाड़ियों के विभिन्न पार्ट्स बनाने में किया जा सकेगा। इससे ऑटोमोबाइल क्षेत्र में नवीन क्रान्ति का युग प्रारंभ होने वाला है।

(4) DNA कम्प्यूटिंग:-

     DNA नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से किसी भी जीव के DNA में मनचाहा परिवर्तन करके नये-2 जीवों में विकास किया जा सकता है।

(5) क्वांटम नैनो टेक्नोलॉजी:-

      नैनो टेक्नोलॉजी वस्तुततः क्वांटम टेक्नोलॉजी ही है। इसके माध्यम से परमाणु के इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का नियंत्रण संभव हो जायेगा। इसी तरह से रेडिकल नैनो टेक्नोलॉजी, आण्विक नैनो टेक्नोलॉजी इत्यादि का भी विकास किया जा रहा है।

     विश्व के अलग-2 देशों में नैनो- टेक्नोलॉजी पर इसके संभावना को देखते हुए कई तरह के कार्यक्रम चल रहें है। भारत में इस पर अनुसंधान हैदराबाद तथा बंगलोर में किया जा रहा है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि नैनो टेक्नोलॉजी भविष्य में जहाँ कई संभावित द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी और कई विसंगतियों को जन्म देगा। अतः इस तकनीक को सावधानी पूर्वक विकसित करने की आवश्यकता है।

6. Export Processing Zone (निर्यात संवर्धन क्षेत्र)- EPZ

Export Processing Zone

(निर्यात संवर्धन क्षेत्र-EPZ)



       विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात हेतु “निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र” का विकास किया गया है। EPZ की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य देश से निर्यातित वस्तुओं के लिए उपयुक्त वातवरण उत्पन्न करना है ताकि वे अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपना स्थान बना सके। EPZ स्थापना की संकल्पना चीन से ली गई है। निर्यात संवर्धन क्षेत्र 1981 ई० में निर्यातों उन्मुख योजना के रूप में शुरू की गई थी। आगे चलकर निर्यातों उन्नमुख इकाई योजना को निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र के रूप में बदला गया और पुनः निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र को आगे चलकर विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में बदलने की योजना है।

    EPZs के अन्तर्गत कई विशिष्ट सुविधाएँ और मानदण्डों को अपनाया गया है जैसे:-

(1) EPZ वाले क्षेत्र में सरकार के द्वारा निर्धारित मानदण्ड के अनुरूप ही उत्पादन का कार्य किया जा सकता है।
(2) उत्पादन हेतु कच्चे माल आप देशी एवं विदेशी दोनों स्रोतों से मंगाकर उपयोग कर सकते हैं।

(3) निर्यात के लिए बंदरगाह की सुविधा दी जाती है।

(4) परियोजनाओं के लिए बड़े-2 भूखण्ड सरकार उपलब्ध करवाती है ताकि वैसे स्थानों पर आधारभूत औद्योगिक ढाँचा खड़ा किया जा सके।

(5) EPZs में दक्ष व्यक्ति उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाता है।

(6) EPZs में निर्यातों-उन्मुख उत्पादन का कार्य किया जाता है।

       निर्यातोंन्मुख उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों के सह‌योग से अगस्त 1994 ई० में EPZs और Export Promotion/Processing Industrial Park (EPIP) योजना प्रारंभ की। ऐसी सुविधाओं के विकास हेतु राज्य सरकार को केन्द्र सरकार 75% अनुदान देती है वशर्ते उसका लागत 10 करोड़ रुपया से अधिक न हो।

     भारत में अब तक 8 EPZs की  स्थापना हो चुकी है। जैसे-

(1) कांडला- गुजरात

(2) सूरत- गुजरात 

(3) सान्ताक्रुज- मुम्बई

(4) कोची- केरल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(7) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(8) विशाखापत्तनम- आन्ध्रप्रदेश

      निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र का निर्माण निर्यात प्रोत्साहन हेतु एक प्रभावी घटक के रूप में स्थापित किया गया था। लेकिन निर्यात के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी। भारत का योगदान निर्यात क्षेत्र में लगातार घटता ही जा रहा है। जैसे- भारत सरकार के द्वारा जारी जून 2009 के आँकड़े बताते हैं कि निर्यात में 11% से अधिक की कमी आ चुकी है। EPZ निर्यात के लिए प्रभावी घटक नहीं बन सका। क्योंकि-

(1) EPZs के विविध प्रकार के नियंत्रणों और अनुमतियों के दौर से गुजरना पड़ता है।

(2) EPZs में अभी तक विश्व स्तरीय आधारभूत ढाँचा का विकास नहीं किया जा सका है।

(3) अस्थिर वित्तीय व्यवस्था से भी प्रभावित होते रहे हैं।

       उपरोक्त सीमाओं के बावजूद निर्यात को बढ़ावा देने के दिशा में उठाया गया एक सकरात्मक कदम था। आज चीन जैसा साम्यवादी देश EPZ का प्रयोग कर निर्यात को बढ़ावा दे सकता है तो भारत भी ऐसा क्यों नहीं कर सकता है?

नोट: वर्तमान में सभी आठ निर्यात संवर्द्धन/प्रसंस्करण क्षेत्र (ईपीजेड) कांडला तथा सूरत (गुजरात), सांताक्रूज (महाराष्ट्र), कोची (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), फाल्टा (पश्चिम बंगाल) और नोएडा (उत्तर प्रदेश) में स्थित हैं, को विशेष आर्थिक क्षेत्रों में परिवर्तित क दिया गया है।

Export Processing Zone

5. Trade Balance and Trade Policy (व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)

Trade Balance and Trade Policy

(व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)



      उत्पादों का उत्पादनकर्ताओं के द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की प्रक्रिया को व्यापार कहते हैं। व्यापार तृतीय क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। व्यापार का कार्य स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर सम्पन्न होते हैं। मोटे तौर पर व्यापार को दो भागों में बाँटते है।:-

(1) देशी व्यापार और

(2) विदेशी व्यापार।

       जब कोई उत्पाद विदेशों में भेजा जाता है तो उसे निर्यात कहते हैं और जब विदेशों से कोई वस्तु/उत्पाद देश में मंगायी जाती है तो उसे आयात कहते हैं। आयात एवं निर्यात के रूप में उत्पाद किसी वस्तु या सेवा के रूप में हो सकता है। आयात और निर्यात से संबंधित सभी आँकड़े बंदरगाहों एवं एयरपोर्ट पर रिकॉर्ड किये जाते हैं और उसका मौद्रिक मूल्य में तब्दील किये जाते हैं।

      व्यापार में प्रयुक्त होने वाले वस्तु जो हमें दिखाई देते हैं उन्हें दृश्य वस्तु कहते हैं। वस्तुओं को छोड़‌कर सेवा क्षेत्र जो कि हमें दिखाई नहीं देते हैं उसे अदृश्य मद कहते हैं। जब किसी देश के निर्यात और आयात की मौद्रिक मूल्य बराबार होता है तो उसे व्यापार संतुलन कहते हैं। जब निर्यात अधिक और आयात कम होता है तो उसे अनुकूल व्यापार कहते है। इसी तरह निर्यात कम हो और आयात ज्यादा हो तो उसे प्रतिकूल व्यापार कहते हैं।

     आजादी के पूर्व भारत में अनुकूल व्यापार की स्थिति थी जबकि आजादी के बाद से प्रतिकूल व्यापार की स्थिति रही है। संतुलित व्यापार एक आदर्श स्थिति है जिसे सभी राष्ट्र प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नीचे के तालिका में विदेशी व्यापार से संबंधित आँकड़े प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जैसे:-

वर्ष निर्यात (करोड़ रू० में) आयात (करोड़ रू० में) कुल व्यापार (करोड़ रू० में) व्यापार घाटा (करोड़ रू० में)
1950-51 606 608 1214 -2
1960-61 642 1122 1764 -480
1970-71 1535 1634 3169 -99
1980-81 6710 12549 19259 -99
1990-91 32558 43193 75751 -10635
2000-01 203571 230873 434444 -27302
2005-06 45798 630527 1085444 -175727

स्रोत- योजना 2008, जून-जुलाई

     ऊपर के तालिका से स्पष्ट है कि भारत में आजादी के बाद से कभी भी व्यापार संतुलन की स्थिति नहीं रही है। भारत सरकार व्यापार संतुलन की स्थिति प्राप्त करने के लिए समय-समय पर कई उपाय करती रही है। जैसे-

(1) मुद्रा का अवमूल्यन,

(2) मुद्रा के विनिमय पर नियंत्रण,

(3) मुद्रा के संकुचन एवं विस्तार,

(4) राजकोषीय घाटे से कम करना,

(5) निर्यात को बढ़ावा देने हेतु EPZ और SEZ की स्थापना,

(6) आयात पर नियंत्रण,

(7) पर्यटन का विकास,

(8) विदेशी ऋण एवं सहायता लेना,

(9) समय-2 प व्यापार नीति की घोषणा।

व्यापार नीति

    भारतीय व्यापार विभिन्न प्रकार के अधिनियमों एवं नियमों के द्वारा निर्देशित होता है। भारत सरकार के पहली आयात-निर्यात नीति (Exim Policy/Trade Policy) अर्थात् एक्जिम नीति तत्कालीन वाणिज्य मंत्री श्री वी.पी. सिंह ने 12 अप्रैल, 1985 को घोषणा की। इस नीति की तीन प्रमुख विशेषता थी-

(1) औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भारतीय उद्योगों की कच्चे माल, उच्च तकनीकी, यंत्रों एवं पूँजी तक पहुँच सुनिश्चित करना था।

(2) उद्योगों के आधुनिकीकरण एवं तकनीकी संवर्धन को बढ़ावा देना।

(3) भारतीय उद्योगों को उत्तरोत्तर (लगातार) अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बनाना।

      वर्तमान समय में 31 अगस्त 2004 को घोषित आयात-निर्यात नीति के तहत विदेशी व्यापार संचालित हो रहा है। भारत सरकार भारत को विश्व स्तर पर एक प्रमुख निर्यातक देश के रूप में स्थापित करना चाहती है। अत: 2004 की व्यापार नीति में व्यापक दृष्टिकोण समाहित करते हुए “पंचवर्षीय (2004-09) नीति” की घोषणा की थी। इस नीति के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित थे-

(1) अगले 5 वर्षों में वस्तुगत व्यापार को बढ़ाकर दुगुना करना है।

(2) विदेशी व्यापार को आर्थिक विकास और रोजगार सृजन का प्रभावी हाथियार बनाया जायेगा।

(3) उपरोक्त उद्देश्यों के पूर्ति हेतु निमलिखित रणनीति पर कार्य की जायेगी-

(ⅰ) विभिन्न प्रकार के नियंत्रणों को समाप्त कर उद्योगपतियों और व्यापारियों की आन्तरिक उद्यमशीलता को प्रोत्साहित किया जायेगा।

(ii) विदेशी व्यापार से जुड़े सभी कार्यों को सरलीकृत किया जायेगा।

(iii) निर्यात लागत को कम किया जायेगा।

(iv) भारत को विनिर्माण, व्यापार और सेवाओं का वैश्विक केंद्र बनाया जयेगा।

(v) वैसे क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जायेगा जो ग्रामीण एवं अर्द्धनगरीय क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा दे सकेंगें।

(vii) देश के व्यापार को विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्द्धी बनाया जायेगा।

(viii) तकनीक, पूँजी और आधुनिक यंत्रों के आयात को बढ़ावा दिया जायेगा।

(ix) घरेलू व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न देशों से मुक्त व्यापार समझौता एवं अधिमान्य व्यापार समझौता के द्वारा व्यापार घाटा पाटने का प्रयास होगा।

(x) व्यापार बोर्ड की भूमिका को पुनः परिभाषित की जायेगी।

(xi) देश की निर्यात रणनीति के निष्पादन में भारतीय दूतावासों की भूमिका सुनिश्चित की जायेगी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यमों का अधिक से अधिक प्रयोग किया जा सकेगा।

     ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में घोषित व्यापार नीति में कई उल्लेखनीय तथ्यों को शामिल किया गया है। वर्तमान समय में इन नीतियों का व्यापार पर सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके पीछे मंदी का दौर/आर्थिक मंदी को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है। मंदी समाप्त होते ही भारतीय व्यापार पर इसका सारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

4. Information Technology (सूचना प्रौद्योगिकी)

Information Technology

(सूचना प्रौद्योगिकी)



Q. सूचना प्रौद्योगिकी से आप क्या समझते है? सूचना प्रौद्योगिकी के अर्थव्यवस्था एवं समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की संक्षिप्त विवेचना करें।

Information Technology

    मानव संस्कृति के उद्‌विकास में तीन महत्त्वपूर्ण क्रांतियाँ हुई हैं:-

(1) नव पाषाणिक क्रांति (Neolithic Revolution)

(2) औद्योगिकी क्रांति (Industrial Revolution) और 

(3) सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति (Information Techonology Revolution)।

      इन तीनों क्रांतियों ने मानव जीवन में त्वरित परिवर्तन लाने का कार्य किया। अगर 20वीं शताब्दी को औद्योगिकी क्रांति की सदी कही जाय तो 21वीं सदी को सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति कहा जाएगा।

     मानव जिन युक्तियों के माध्यम से सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सम्प्रेषण करता है, उस युक्ति को सूचना प्रौद्योगिकी कहते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी विकास के क्रम में निम्नलिखित तथ्यों पर गौर किया जाता है-

(1) सम्प्रेषण में समय कम-से-कम लग सके।

(2) सूचना को यथावत एक स्थान से दूसरे स्थान भेजा जा सके।

(3) ऐच्छिक मात्रा में सूचनाओं का सम्प्रेषण हो सके।

     कोई भी सूचना तीन रूपों में पायी जाती है जैसे- Digital, Graphics, शब्द एवं अक्षर के रूप में। इन सूचनाओं को सम्प्रेषित करने के लिए कई प्रकार के प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता है। जैसे- रेडियो, टीवी, पेजर, मोबाइल, फैक्स, कम्प्यूटर, इंटरनेट, टेलीफोन, ऑप्टीकल फाइबर इत्यादि। इन उपकरणों में प्रयुक्त तकनीक को पुनः दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है-

प्रथम- हार्डवेयर तकनीक

द्वितीय- सॉफ्टवेयर तकनीक

      हार्डवेयर तकनीक के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के उपकरणों के निर्माण संयोजन का कार्य किया जाता है जबकि सॉफ्टवेयर तकनीक के अन्तर्गत सूचना प्रौद्योगिकी में प्रयुक्त होने वाले Programme का निर्माण होता है। अत: सूचना प्रौद्योगिकी विभिन्न प्रकार के हार्डवेयर और साफ्टवेयर के संयोजन से निर्मित आधुनिक उपकरण है।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी का विकास

     भारत में सूचना प्रौद्योगिकी का विकास एक नवीन घटना है। भारत में इस प्रौद्योगिकी का विकास भारत सरकार और निजी क्षेत्र के माध्यम से किया जा रहा है। 1992 ई० में केन्द्र सरकार द्वारा देश में दूर संचार सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु दूर संचार क्षेत्र को उदारता नीति के तहत लाकर निजी क्षेत्र की अनुमति प्रदान की। 1993 ई० में दूर संचार तकनीक के विकास हेतु प्रति वर्ष 20.6 मिलियन रुपये निवेश करने का लक्ष्य रखा।

      1994 ई० में भारत के चार प्रमुख महानगर दिल्ली, मुम्बई और कोलकाता में मोबाइल सेवा उपलब्ध करने वाले कंपनी के लिए लाइसेंस जारी किये गये। सूचना प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए 1997 ई० में “भारतीय दूर संचार नियामक प्राधिकरण” (TRAI) की स्थापना की गई। मार्च 1999 ई० में पहली राष्ट्रीय दूरसंचार नीति की घोषणा की गई।

     वर्तमान समय में ट्राई और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत कंपनियाँ Call Rate घटाने में तथा ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए प्रयासरत है। वर्तमान समय में 99% भारतीय जनसंख्या के पास सूचनायें मोबाइल, TV तथा रेडियों के माध्यम से पहुँच रहा है। वर्तमान समय में 90 करोड़ से भी अधिक लोगों के पास मोबाइल की सुविधा उपलब्ध है। इस तरह कहा जा सकता है कि भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के विकास की गति काफी तीव्र है।

भारतीय अर्थव्यवस्था तथा समाज पर IT का प्रभाव

   सूचना प्रौद्योगिकी (IT) ने भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। इसने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और व्यापार के क्षेत्र में दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाई है। IT उद्योग ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख सेवा केंद्र बनाया है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जन और आर्थिक वृद्धि को बल मिला है।

    समाज में डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन शिक्षा, ई-गवर्नेंस और संचार के नए अवसर विकसित हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल सेवाओं से जीवन स्तर में सुधार हुआ है। इस प्रकार IT भारत के सर्वांगीण विकास का प्रमुख आधार बन गया है, इसे निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत विस्तार से समझता जा सकता है- 

(i) समय तथा स्थान के बीच की दूरी घटी:-

       IT के कारण समय तथा स्थान के बीच भी दूरी घट चुकी है। इससे ऐच्छिक मात्रा में और पूर्ण शुद्धता के साथ सूचनाओं का सम्प्रेषण संभव हो गया है।

(ii) यातायात के साधनों में मदद:-

     IT के विस्तार एवं प्रसार से यातायात साधनों पर बढ़ते हुए दबाव को कम करने में मदद मिली है।

(iii) सूचनाओं का आसानी से ग्रहण:-

     कम्प्यूटर, E-mail, www के संकलन से इंटरनेट का विकास किया गया है। इंटरनेट अपना पैर पूरे दुनियाँ में फैलता जा रहा है। लोग विश्व की सभी प्रकर की सूचनाएं इन्टरनेट पर उपलब्ध करवा देते हैं जिसके कारण शिक्षा, वाणिज्य, विज्ञान, मनोरंजन इत्यादि से संबंधित सभी प्रकार की सूचनाएँ इंटरनेट पर मौजूद रहती है। इन्टरनेट Connection लिए हुए व्यक्ति कोई भी सूचना आसानी से ग्रहण कर सकता है।

    दूसरे शब्दों में, इंटरनेट ने पूरे दुनिया को Global village में बदल दिया है।

(iv) E-Commerce:-

    सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से E. Commerce की शुरुआत की गई है। जिसके माध्यम से व्यापार, बीमा, वित्त से संबंधित कार्यों को आसानी से संपादित किया जाने लगा है।

(v) E-प्रशासन

      सूचना प्रौद्योगिकी का एक घटक E-प्रशासन है। इसके माध्यम से दूर दराज के गांवों को जिला मुख्यालय से और जिला मुख्यालय को राजधानी से जोड़‌कर प्रशासन का कार्य आसानी से किया जा सकता है।

(vi) इंटरनेट के माध्यम से विवाह, तलाक, कानूनी सहायता, आवेदन पत्रों का सम्प्रेषण, प्रतियोगिता परीक्षा, मनचाही जानकारी एवं परामर्श लेना संभव हो चूका है।

(vii) नये रोजगारों का सृजन

     सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षित एवं अशिक्षित दोनों प्रकार के लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। ये रोजगार IT पार्क, सोफ्टवेयर पार्क, Call Centre, साइबर कैफे, B.P.O., आउट सोर्सिंग इत्यादि के माध्यम से उपलब्ध हो रहे हैं।

(viii) रुढ़िवादी परंपराओं तथा अधविश्वासों से मुक्ति:-

    IT के माध्यम से भारतीय समाज अनेक प्रकार के परम्परागत अवधारणा एवं अंधविश्वासों से मुक्त हो रहा है।

(ix) IT के माध्यम से रेलवे एवं विमानन में आरक्षण, बैंकिग, बीमा एवं शेयर बाजार में त्वरित परिवर्तन लाया है। इस क्षेत्रों में IT के कारण गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन तो हुआ ही है। इसके अलावे इन क्षेत्रों में पारदर्शिता का भी आगमन हुआ है।

(x) कार्यालयों को मोटे-मोटे रजिस्टरों से मुक्ति:-

    आईटी के माध्यम से सरकारी एवं गैर सरकारी office मोटे-2 रजिस्टर एवं दस्तावेजों से मुक्त हो रहे हैं। आज एक लाइब्रेरी की संपूर्ण जानकारी को DVD के एक कैसेट में संग्रहित किया जा सकता है जिसके कारण आज विभिन्न प्रकर के सेवा का सार्वभौमीकरण संभव हो सका है।

(xi) आईटी के माध्यम से दूर-दराज के भूमि, कृषि, सिंचाई से संबंधित विविध  जानकारी को आसानी से पहुँचाया जा रहा है।

(xii) आईटी के माध्यम से नगरीय परिवहन व्यवस्था को नियंत्रित किया जा रहा है।

(xiii) आपदा प्रबंधन में प्रयोग:-

     सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग आपदा प्रबंधन के दौरान बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

आईटी का प्रभाव

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि सूचना प्रौद्योगिकी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था एवं समाज पर कई प्रकार के सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। वहीं दूसरी ओर कई नकारात्मक प्रभाव भी रेखांकित किया जा सकता है। जैसे- साइबर अपराध, पाइरेसी (Piracy- DVD, CD का नकल), पोरनोग्राफी (ब्लू फिल्म), सूचनाओं की चोरी, गोपनीय दस्तावेजों से छेड़छाड़, कंप्यूटर कचड़ा, सूचना प्रदूषण की समस्या इत्यादि समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।

निष्कर्ष

   अतः स्पष्ट है कि सूचना प्रौद्योगिकी के कारण कई प्रकार के सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रभाव दृष्टिगत होने लगे हैं। कुछ विद्वानों का तर्क है कि नारात्मक प्रभावों को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी के विकास पर रोक लगा दी जाय। लेकिन मेरे विचार के अनुसार इस पर रोक नहीं लगयी जानी चाहिए बल्कि इससे उत्पन्न होने वाले नाकारात्मक प्रभावों से प्रभावी तरीके से निपटा जाना चाहिए और सूचना प्रौद्योगिकी के दिशा में सतत् विकास जारी खा जाना चाहिए।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




परिचय

     सूचना प्रौद्योगिकी (IT) आधुनिक समाज की रीढ़ बन चुकी है। यह सूचना के उत्पादन, संग्रहण, संचार, प्रसंस्करण तथा प्रबंधन से संबंधित तकनीकों और उपकरणों का समुच्चय है। कंप्यूटर, इंटरनेट, संचार नेटवर्क, क्लाउड सेवाएँ, सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज की IT संरचना के मूल घटक हैं। 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में आईटी न केवल नवाचार का केंद्र है बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, शासन, उद्योग, व्यापार तथा सामाजिक जीवन को भी गतिशील बनाती है।

सूचना प्रौद्योगिकी का विकास (Evolution of IT)

      सूचना प्रौद्योगिकी का विकास मुख्यतः चार चरणों में देखा जाता है:

1. प्रारम्भिक युग (1940-1960)- वैक्यूम ट्यूब तथा ट्रांजिस्टर आधारित कंप्यूटर; सीमित गणनात्मक क्षमता।

2. मेनफ्रेम युग (1960-1980)- बड़े कंप्यूटर, व्यवसायिक डेटा प्रोसेसिंग में विस्तार।

3. पर्सनल कंप्यूटर युग (1980-2000)- माइक्रोप्रोसेसर का विकास; PC का सामान्य उपयोग; इंटरनेट क्रांति।

4. डिजिटल एवं क्लाउड युग (2000-वर्तमान)- स्मार्टफोन, क्लाउड कंप्यूटिंग, AI, IoT, बिग डेटा, साइबर सुरक्षा उन्नति।

     IT आज ubiquitous computing की ओर बढ़ रहा है जहाँ कम्प्यूटिंग क्षमता हर वस्तु, उपकरण और प्रक्रिया में समाहित हो रही है।

सूचना प्रौद्योगिकी के प्रमुख घटक (Core Components of IT)

(A) हार्डवेयर (Hardware)

⇒ कंप्यूटर, सर्वर, लैपटॉप

⇒ इनपुट डिवाइस: Keyboard, Mouse, Scanner

⇒ आउटपुट डिवाइस: Printer, Monitor, Plotter

⇒ Networking devices: Router, Switch, Hub, Modem

(B) सॉफ्टवेयर (Software)

⇒ System Software- Operating System (Windows, Linux), device drivers

⇒ Application Software- MS Office, ERP, MIS, DBMS

⇒ Utility Software- Antivirus, Backup tools

(C) डाटाबेस प्रबंधन (Database Management)

⇒ DBMS और RDBMS जैसे MySQL, Oracle, SQL Server

⇒ डेटा का संग्रहण, पुनर्प्राप्ति, सुरक्षा और प्रबंधन

(D) कंप्यूटर नेटवर्किंग (Networking)

⇒ LAN, MAN, WAN

⇒ Wired और Wireless technologies

⇒ Network topologies, IP addressing, DNS, VPN

(E) इंटरनेट एवं वेब टेक्नोलॉजी (Internet & Web Technology)

⇒ HTTP/HTTPS, Web servers, Browsers

⇒ Web 2.0, Web 3.0, APIs

(F) साइबर सुरक्षा (Cyber Security)

⇒ Encryption, Firewalls, Intrusion Detection Systems

Malware, phishing, ransomware से सुरक्षा

सूचना प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग (Applications of IT)

(A) शिक्षा क्षेत्र

⇒ स्मार्ट क्लास, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म (MOOCs)

⇒ ऑनलाइन परीक्षाएँ और डिजिटल मूल्यांकन

⇒ वर्चुअल लैब और शैक्षिक सॉफ्टवेयर

(B) स्वास्थ्य क्षेत्र

⇒ ई-हॉस्पिटल, टेली-मेडिसिन, ई-प्रिस्क्रिप्शन

⇒ रोगी डेटा प्रबंधन (EHRs)

⇒ मेडिकल इमेज प्रोसेसिंग

(C) व्यापार एवं उद्योग

⇒ ई-कॉमर्स, ऑनलाइन भुगतान

⇒ सप्लाई चेन मैनेजमेंट (SCM)

⇒ Enterprise Resource Planning (ERP)

(D) शासन (E-Governance)

⇒ आधार, डिजिटल इंडिया, UPI, e-Courts, DigiLocker

⇒ नागरिक सेवाओं में पारदर्शिता और त्वरित कार्य

(E) बैंकिंग एवं वित्त

⇒ कोर बैंकिंग, ऑनलाइन लेन-देन, मोबाइल बैंकिंग

⇒ FinTech, Blockchain आधारित समाधान

(F) मनोरंजन एवं मीडिया

⇒ OTT प्लेटफार्म (Netflix, Amazon Prime Video, Disney+ Hotstar, Sony LIV, ZEE5, JioCinema, MX Player), डिजिटल फिल्म निर्माण

⇒ सोशल मीडिया, डिजिटल मार्केटिंग

आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के उभरते क्षेत्र (Emerging Trends in IT)

(1) क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud Computing)

⇒ IaaS, PaaS, SaaS मॉडल

⇒ ऑन-डिमांड संसाधन और लागत-प्रभावशीलता

(2) बिग डेटा (Big Data)

⇒ विशाल डाटा सेट का विश्लेषण

⇒ निर्णय निर्माण में उपयोग

⇒ Hadoop, Spark जैसी तकनीकें

(3) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन लर्निंग (AI & ML)

⇒ Predictive analytics, NLP, Chatbots

⇒ स्वचालन और स्मार्ट निर्णय

(4) इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT)

⇒ स्मार्ट होम, स्मार्ट सिटी, स्मार्ट फार्मिंग

Sensor-based data processing

(5) साइबर सुरक्षा (Advanced Cyber Security)

⇒ Zero Trust architecture

Digital Forensics, Ethical Hacking

(6) ब्लॉकचेन (Blockchain)

⇒ Decentralized ledgers

⇒ Cryptocurrency, Smart contracts

सूचना प्रौद्योगिकी के लाभ (Advantages of IT)

(i) सूचना का त्वरित प्रसारण- Seconds में data access।

(ii)उत्पादकता में वृद्धि- Automation से efficiency बढ़ती है।

(iii) वैश्वीकरण में मदद- World-wide connectivity।

(iv) सस्ती सेवाएँ- ऑनलाइन सेवाओं से लागत कम होती है।

(v) सुविधा और पारदर्शिता- ई-गवर्नेन्स से नागरिकों को लाभ।

(vi) रोजगार के अवसर- IT sector में विशाल human resource demand।

सूचना प्रौद्योगिकी की चुनौतियाँ (Challenges of IT)

(i) साइबर अपराधों में वृद्धि- डेटा चोरी, हैकिंग, financial fraud।

(ii) गोपनीयता संकट- Personal data misuse का खतरा।

(iii) डिजिटल विभाजन- Rural-Urban gap, internet accessibility की कमी।

(iv) तकनीकी बेरोजगारी- ऑटोमेशन के कारण पारंपरिक नौकरियों में कमी।

(v) इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी- Developing nations में कमजोर IT आधार।

(vi) Dependence on technology- Data failure या cyber-attack होने पर बड़ी समस्या।

भारतीय संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी (IT in India)

      भारत IT services के क्षेत्र में विश्व का अग्रणी देश है।

⇒ Bangalore – Silicon Valley of India

⇒ TCS, Infosys, Wipro जैसी कंपनियाँ global IT services प्रदान कर रही हैं।

⇒ Digital India Mission ने देश में डिजिटल पहुँच को व्यापक बनाया है।

⇒ UPI, Aadhaar, Rupay ने ICT-based governance को विश्व में एक मॉडल के रूप में स्थापित किया।

⇒ भारत विश्व के सबसे बड़े IT manpower exporters में से एक है।

     IT क्षेत्र का भारत की GDP में योगदान लगभग 7-8% है और यह रोजगार का प्रमुख स्रोत बन चुका है।

भविष्य की दिशा (Future of Information Technology)

     सूचना प्रौद्योगिकी का भविष्य AI-driven systems, data-centric governance, pervasive computing और cybersecurity excellence पर आधारित होगा।

⇒ Quantum Computing जटिल समस्याओं को सेकंडों में हल करेगा।

⇒ Metaverse नया डिजिटल अनुभव प्रस्तुत करेगा।

⇒ 5G/6G ultra-low latency networks को सक्षम करेगा।

     IT का उद्देश्य एक बुद्धिमान, सुरक्षित, समावेशी और स्वचालित समाज की ओर बढ़ना है।

निष्कर्ष (Conclusion)

     इस प्रकार कहा जा सकता कि सूचना प्रौद्योगिकी आज की दुनिया का परिवर्तनकारी तत्व है। यह अर्थव्यवस्था, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा शासन सभी में दूरगामी प्रभाव डालती है। डिजिटल क्रांति ने नए अवसरों के साथ कई चुनौतियाँ भी प्रस्तुत की हैं, जिनके समाधान के लिए मजबूत नीतियों, साइबर सुरक्षा ढांचे और डिजिटल साक्षरता की आवश्यकता है। इसके बावजूद IT भविष्य की प्रगति, नवाचार और विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना रहेगा।

3. Special Economic Zone (विशेष आर्थिक क्षेत्र)

Special Economic Zone

(विशेष आर्थिक क्षेत्र)



परिभाषा

      विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ऐतिहासिक पक्ष

     रॉबर्ट सी हेवर्ड के अनुसार SEZ की अवधारणा काफी प्राचीन है। प्राचीनतम SEZ का प्रमाण यूनान के टायर नगर से मिलता है। 1960 ई० में चीन ने SEZ का निर्माण कर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास किया। जबकि भारत ने अप्रैल 2000 ई० में पहले SEZ नीति की घोषणा की।

प्रकार/वर्गीकरण

      SEZ कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) निर्यात संवर्धन क्षेत्र (Export Prossising Zone), मुक्त क्षेत्र (Free Zone), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Estate), मुक्त बंदरगाह, नगरीय उद्यम क्षेत्र इत्यादि।

उद्देश्य

     SEZ की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य है।

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

स्वरूप एवं विशेषता

      किसी भी एक आदर्श SEZ के अंतर्गत एक हजार हेक्टेयर भूमि पर स्थापित किया जा सकता है और उसमें कम से कम 10 हजार करोड़ रूपये का निवेश होना चाहिए। पुनः उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए:-

(1) SEZ के अंतर्गत कार्य करने वाले इकाइ‌यों के द्वारा वस्तु तथा सेवाओं का मुक्त संचलन होना चाहिए।

(2) विश्व स्तर की आधारभूत संरचना का विकास किया जाना चाहिए।

(3) निर्माण या उत्पादन का कार्य गहन तरीके से होना चाहिए।

(4) निर्यात अभिमुख होना चाहिए।

(5) उन्नत तकनीक होना चाहिए।

(6) उचित प्रबंधन तथा उच्च तकनीक का उपयोग होना चाहिए।

वर्तमान स्थिति एवं महत्त्व

     वर्तमान में 379 SEZs अधिसूचित हैं, जिनमें से 265 चालू हैं। लगभग 64% SEZ पाँच राज्यों- तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित हैं। इससे एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। SEZ पर बाबा कल्याणी समिति की सिफारिशों के अनुसार, SEZ में MSME योजनाओं को जोड़कर तथा वैकल्पिक क्षेत्रों को क्षेत्र-विशिष्ट SEZ में निवेश करने की अनुमति देकर MSME निवेश को बढ़ावा देना है।

      इसके अतिरिक्त सक्षम और प्रक्रियात्मक छूट के साथ-साथ SEZ को अवसंरचनात्मक स्थिति प्रदान करने हेतु वित्त तक उनकी पहुँच में सुधार करके तथा  दीर्घकालिक ऋण को सक्षम करने के लिये भी अग्रगामी कदम उठाए गए। कुछ SEZ के उदाहरण निम्नलिखित है:-

(1) काण्डला तथा सूरत- गुजरात

(2) कोचीन- केरल

(3) सांताक्रुज- मुम्बई

(4) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) विशाखापतनम- आन्ध्र प्रदेश

(7) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(8) इंदौर- मध्य प्रदेश

(9) राजीव गाँधी इंटेफोर्ट पार्क- हिंजेवादी, पूना।

(10) जयपुर- राजस्थान

(11) सिंगुर (टाटा मोटर्स कंपनी)- पश्चिम बंगाल 

नोट: टाटा मोटर्स कंपनी 2008 में सिंगूर परियोजना को छोड़ने के बाद कंपनी ने अपनी विनिर्माण इकाई को साणंद, गुजरात में स्थानांतरित कर दिया।

Special Economic Zone

टाटा मोटर्स कंपनी साणंद, गुजरात

(12) नन्दीग्राम (सलीम अली ग्रुप केमिकल फैक्ट्री)- पश्चिम बंगाल

आलोचना

    भारत की SEZ नीति का काफी विरोध किया जा रहा है क्योंकि किसानों का आरोप है कि सरकार किसानों से जबरन कृषि योग्य भूमि छीन रही है और भूमि का सही मुआवजा नहीं दे रही है। नंदीग्राम तथा सिंगुर विवाद इसके उदाहरण है। पुनः विद्वानों का कहना है कि SEZ देश के अन्दर एक औपनिवेशिक क्षेत्र के रूप में सक्रिय होगा जो धीरे-2 देश की आर्थिक संप्रभुता पर प्रहार करेगी।

निष्कर्ष

       किसानों के द्वारा लगाया गया आरोप काफी गंभीर है। अतः सरकार को चाहिए कि किसानों की शिकायत सुनकर न केवल उनके समस्याओं का समाधान करे बल्कि SEZ की स्थापना वैसे बंजर भूमि एवं पत्थरीली भूमि पर किया जाय जिसका प्रयोग आज नहीं किया जा रहा है।

      पुनः SEZ के अन्तर्गत निवेश करने वाली कंपनियों को पर्यावरण को क्षति नहीं पहुंचाने वाले तकनीकी प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाय। पुनः स्थानीय लोगों को तरजीह दी जाय।

     उपरोक्त सुझावों प अमल करने के बाद ही SEZ आर्थिक विकास के दूत बन सकेंगे।

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