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7. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास / Development of Quantitative Revolution in Geography

 7. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास




भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास⇒

भूगोल में मात्रात्मक क्र (नोट:- क्रांति ⇒ किसी भी विषय वस्तु में त्वरित परिवर्तन को क्रांति कहते है। मात्रात्मक क्रांति = परमाणीकरण)

        भूगोल में गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों का प्रयोग करना मात्रात्मक क्रांति कहलाता है। मात्रात्मक क्रांति का स्रोत गणित एवं सांख्यिकी जैसे विषय है। जबकि लक्ष्य प्रारंभ में केवल मानव भूगोल था। लेकिन वर्तमान में गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों का प्रयोग मानव भूगोल के अलावे भौतिक भूगोल और Cartography (चित्रात्मक भूगोल) में किया जाने लगा है।

    भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का आगमन मूल रूप से विधितंत्र एवं विषय वस्तु में हुआ है। गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों के प्रयोग से त्वरित परिवर्तन हुआ जिसके कारण भूगोल में वैज्ञानिकता, तर्क, वस्तुनिष्ठता का आगमन हुआ। इस सम्पूर्ण गतिविधि को मात्रात्मक क्रांति से संबोधित करते हैं।

      भूगोल में मात्रात्मक क्रांति लाने का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता जिफ को जाता है क्योंकि इन्होंने 1949 ई. में सांख्यिकी के कोटि(क्रम) आकार सह-संबंध तकनीक का प्रयोग कर USA के नगरों का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि ज्यों-2 कोटि वृद्धि होती है त्यों-2 नगरों के आकारिकी में परिवर्तन होता है। जिन क्षेत्रों में कोटि और आकार के बीच में यह संबंध पाये जाते हैं वह स्वस्थ्य आर्थिक विकास का घोतक है और जहाँ पर यह संबंध नहीं पाया जाता है वह अस्वास्थ्य आर्थिक विकास का घोतक है।

                भूगोल में गणित एवं सांख्यिकी से आयात कर जिन तकनीकों का प्रयोग किया गया उसे दो भागों में बाँटते हैं-

(1) अनुमोदनात्मक तकनीक

(2) विवरणात्मक तकनीक

        अनुमोदनात्मक तकनीक के तहत किसी सिद्धांत या परिकल्पना की जाँच करते हैं। इसके तहत सांख्यिकी में प्रयोग होने वाले Simple रिग्रेशन, लीनियर रिग्रेशन, संभाव्यता (Probablity), t- test, Chi- square, Index इत्यादि का प्रयोग करते हैं।

        विवरणात्मक तकनीक के अन्तर्गत सामाजिक आर्थिक आकड़ों को इकट्ठा किया जाता है और उसका औसत माध्य, मध्यिका, बहुलक, अपसरण, मानक विचलन इत्यादि का प्रयोग कर सार निकालने का प्रयास करते हैं।

भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

       द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका के द्वारा गिराये गये परमाणु बम ने सभी मानवीकी विषय के ऊपर प्रश्न चिह्न लगा दिए थे। कला क्षेत्र के विद्वान विज्ञान से भयभीत होने लगे थे। कई विश्वविद्यालयों में मानवीकी विषय में विद्यार्थियों की सीटें खाली रहने लगी। फलतः सामाजिक विज्ञान के विद्वानों ने 1949 ई० में अमेरिका के प्रीस्टन विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक सम्मेलन बुलवाया। इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि मानवीकी विषय के विधितंत्र को तार्किक एवं वैज्ञानिक बनाया जाय। इन विषयों में वैसे विषयवस्तु को शामिल किया जाय जो मानव के लिए उपयोगी हो।

      अगर इन उद्देश्यों को पूरा करता है तो विज्ञान से हमें डरने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसके तकनीक को मानवीकी विषय में प्रयोग करने की आवश्यकता है अर्थात इसी सम्मेलन के बाद अंतर विषयक अध्ययन पर अधिक जोर दिया जाने लगा। इसी अन्तर विषयक अध्ययन के फलस्वरूप भूगोल में मात्रात्मक क्रांति की शुरुआत हुई। भूगोल में इसके विकास के इतिहास को चार चरणों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

(1) प्रथम चरण (1950-58)

            प्रथम चरण का काल 1950- 58 ई० तक रहा। इस चरण में जिफ, नेल्सन, बेरी, हार्टशोन और बंगी जैसे भूगोलवेतओं ने गणितीय एवं सांख्यिकीय तकनीक का प्रयोग किया। प्रथम चरण में अवलोकन विधि, प्रश्नावली विधि, अनुसूची विधि और प्रतिदर्श / नमूना विधि से प्राथमिक आँकड़े इक्कठे किये जाने लगे। प्राप्त आँकड़ों को वर्गीकृत एवं सारणीकरण किया जाने लगा। माध्य, माध्यिका, बहुलक, मानक विचलन इत्यादि का प्रयोग कर प्राप्त आकड़ों का सार संग्रह निकालने का प्रयास किया गया।

(2) दूसरा चरण (1956-68 ई०)

          द्वितीय चरण में एकरमैन, बेरी, स्पीयर्स मैन और पीयरसन जैसे भूगोलवेताओं ने सांख्यिकी तकनीक का प्रयोग प्रारंभ किया। द्वितीय चरण में कोटि आकार सह संबंध रिग्रेशन, सूचकांक जैसे तकनीक का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया गया। इन तकनीकों के प्रयोग से भूगोल के विभिन्न घटकों के बीच सहसंबंध स्थापित कर तथ्यों का विश्लेषण किया जाने लगा।

(3) तीसरा चरण (1968-78 ई०)

         तीसरा चरण में सोर्ले, हेगेट, इबान्स, इरासी, मॉर्स जैसे भूगोलवेताओं ने भौगोलिक तथ्यों की व्याख्या हेतु बहुचरण विश्लेषण विधि, नजदीकी पड़ोसी सांख्यिकी विधि जैसे तकनीक का प्रयोग हुआ।

(4) चौथा चरण (1978 के बाद से अब तक)

          चौथा चरण में भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का प्रयोग अपने चरम अवस्था में पहुँच गया। इस चरण में भौगोलिक तथ्यों का विश्लेषण, वर्गीकरण, चित्र निर्माण करने में कम्प्यूटर, कृत्रिम उपग्रह, सुदूर संवेदन प्रणाली इंटरनेट, वायु फोटोग्राफी इत्यादि का प्रयोग किया जाने लगा। इन आधुनिक तकनीकों के माध्यम से प्राप्त किये गये आँकड़ों को विश्लेषण करने हेतु GIS (भौगोलिक सूचना तंत्र) का विकास किया गया है। ब्रिटिश भूगोलवेता डडले स्टम्प ने सही कहा है कि “वर्तमान समय में मात्रात्मक क्रांति का सुनहरा बछड़ा कम्प्यूटर है।”

भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का महत्व / प्रभाव

          मात्रात्मक क्रांति के प्रयोग से भूगोल पर कई प्रकार के प्रभाव पड़े। जैसे:-

(1) मात्रात्मक कांति के प्रयोग से भूगोल में तार्किकता एवं वैज्ञानिकता का आगमन हुआ। इनके आगमन से भौगोलिक तथ्यों की वस्तुनिष्टता का आगमन हुआ।

(2) भूगोल में प्राथमिक आँकड़ों, संग्रहण, विश्लेषण और सार संग्रह निकला जाने लगा।

(3) मात्रात्मक क्रांति के पूर्व भूगोल का अध्ययन अनुभावाश्रित, वर्णात्मक और चित्रात्मक भा लेकिन मात्रात्मक कांति से भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से किया जाने लगा। भूगोल में चित्र द्विआयामी से त्रिआयामी बनने लगे।

(4) भूगोलवेताओं में सांख्यिकी के ज्ञान होने के कारण इनकी माँग नियोजन एवं विकास कार्यों में होने लगा।

(5) सांख्यिकी के प्रयोग से भौगोलिक तथ्यों बीच सह-संबंध स्थापित कर उनका प्रदेशीकरण किया जाने लगा। जैसे- कृषि भूगोल में बीबर एवं डोई ने फसल संयोजन प्रदेश का निर्धारण किया। सांख्यिकी तथ्यों का प्रयोग कर अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रो० एम.एस. सफी ने भारत के फसल संयोजन का निर्धारण किया।

(6) मात्रात्मक क्रांति के प्रयोग से भूगोल में मॉडल का निर्माण, सिद्धांतों का निर्माण और परिकल्पनाओं का निर्माण किया जाने लगा। हैगेट एवं सोर्ले को मॉडल निर्माण का चैम्पियन कहा जाता है। बेबर महोदय ने औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत सांख्यिकी के नियमों पर ही प्रस्तुत किया था।

(7) नगरीय भूगोल में जनसंख्या भूगोल में, आर्थिक भूगोल में, परिवहन भूगोल में, आपदा प्रबंधन में, मौसम पूर्वानुमान में आज सांख्यिकी विधियों का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा हैं।

आलोचना

          मात्रात्मक क्रांति का कई भूगोलवेताओं ने आलोचना किया है। जैसे:-

(1) डडले स्टम्प महोदय ने कहा है कि भूगोल का अध्ययन वर्णात्मक एवं चित्रात्मक विधि से करना उपयुक्त है न कि मात्रात्मक विधि से अध्ययन किया जाना चाहिए।

(2) कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि मात्रात्मक क्रांति का प्रारंभ 1950 ई० से नहीं हुआ है बल्कि भूगोल में सांख्यिकी तथ्यों का प्रयोग इसके पूर्व काल से होता रहा है। हार्वे महोदय ने अपने पुस्तक Explanation in Geography में इसका आलोचना करते हुए कहा कि मात्रात्मक क्रांति अपने चरम अवस्था में पहुँच चुका है। अत: इसमें धीरे-2 ह्रास की प्रवृति प्रारंभ हो चुकी है।

(3) 1950 ई० में ‘आर्थिक भूगोल’ नामक पत्रिका USA से प्रकाशित होती थी। इस पत्रिका में बेरी महोदय ने सांख्यिकी के प्रयोग का समर्थन किया जबकि स्पेट महोदय ने आलोचना करते हुए कहा कि भूगोलवेताओं में सांख्यिकी सोच-विचार का अभाव होता है। ऐसे में अगर सांख्यिकी के कम जानकार व्यक्ति इसका प्रयोग करता है तो नाकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

(4) मात्रात्मक क्रांति के माध्यम से मानव के भावनात्मक पहलू, व्याहारिकतावाद, मानवतावाद, कल्याणकारी भूगोल के तथ्यों का विश्लेषण संभव नहीं है।

(5) वर्तमान समय में मात्रात्मक क्रांति वाहक कम्प्यूटर एवं इंटरनेट है। आज इनके माध्यम से सूचना प्रदूषण फैलाने का दौर प्रारंभ हो चुका है।

निष्कर्ष

           इन सीमाओं के बाबजूद मात्रात्मक क्रांति एक वैज्ञानिक विषय बना दिया है। यह उपलब्धि कुछ खामियों के बावजूद क्रान्ति के समतुल्य है।



भूगोल में मात्रात्मक क्रांति पर उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



भूगोल में मात्रात्मक क्रांति

(Quantitative Revolution in Geography)

(नोट: क्रांति = त्वरित परिवर्तन, उत्परिवर्तन = अचानक परिवर्तन, आंदोलन = मंद परिवर्तन)

प्रारूप

1. परिचय

2. मात्रात्मक क्रांति का उद्देश्य / लक्ष्य

3. मात्रात्मक क्रांति में प्रयुक्त तकनीक

  3.1 विवराणात्मक तकनीक

  3.2 अनुमोदनात्मक तकनीक

4. मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

5. मात्रात्मक क्रांति का प्रभाव / महत्त्व

6. आलोचना

7. निष्कर्ष

1. परिचय

         मात्रात्मक क्रांति दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम-मात्रा और द्वितीय क्रांति। मात्रा का तात्पर्य गणित या सांख्यिकी ये है। जबकि क्रांति का तात्पर्य त्वरित परिवर्तन से है। अतः भूगोल में सांख्यिकी के आगमन से उसके तथ्यों में जो वैज्ञानिक एवं त्वरित परिवर्तन हुआ उस परिवर्तन को ही मात्रात्मक क्रांति कहते है।

           द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन की विधि परम्परागत थी जिसके तहत भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन अनुभव और मानचित्र के आधार पर किया जाता था। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मात्रात्मक क्रांति के आगमन ने भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन की पद्धति को ही बदल दिया है। इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मात्रात्मक क्रांति का स्रोत क्षेत्र गणित का उपभाग सांख्यिकी रहा है जबकि लक्ष्य क्षेत्र मानव भूगोल रहा है।

      वस्तुतः द्वितीय विश्व के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराया गया बम न केवल दो नगरों पर गिराया गया बम था बल्कि सम्पूर्ण मानवीय चिंतन पर किया गया अद्यात था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानविकी विषय के विद्वानों ने देखा कि अगर विज्ञान चाहे तो सम्पूर्ण दृष्टि का विनाश कुछ ही क्षण में कर सकता है। इस वैज्ञानिक और तकनीकी विकास पर आधारित चिन्तव ने विश्व के सभी सामाजिक विज्ञान के समक्ष उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।

      अतः 1949 ई०  में USA के प्रीस्टन विश्वविद्यालय ने सभी मानविकी एवं वैज्ञानिक विषयों से सम्बंधित विद्वानों का सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि मानविकी विषय को विज्ञान की विषय से डरना नहीं चाहिए बल्कि सामाजिक विज्ञान के विधितंत्र में परिवर्तन लाकर उसे वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय बनाया जाना चाहिए। इसी निर्णय का परिणाम था कि मानव भूगोल में सांख्यिकी के तकनीक के उपयोग पर जोर दिया गया और भूगोल को ‘अन्तरविषयक’ विषय बनाने का प्रयास किया गया।

         भूगोल में मात्रात्मक तकनीक का प्रयोग करने का प्रथम श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता जे.के.जिफ को जाता है क्योंकि इन्होंने ही 1949 ई० में सांख्यिकी के ‘कोटि-आकार-सह-संबंध‘ तकनीक का प्रयोग कर यू.एस.ए. के नगरों का अध्ययन किया।

 2. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का प्रमुख उद्देश्य / लक्ष्य

(i) वर्णात्मक भूगोल को वैज्ञानिक बनाना।

(ii) भौगोलिक तथ्यों की वैज्ञानिक तथा तार्किक व्याख्या करना।

(iii) साहित्यिक भाषा की जगह गणितीय भाषा का उपयोग।

(iv) अवस्थिति वर्ग के बारे में परिशुद्ध कथन करना।

(vi) परिकल्पना के लिए मॉडल, नियमों तथा सिद्धांतों का सूत्रण करना।

(vii) भूगोल की क्रिया पद्धति को वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक बनाना।

3. मात्रात्मक क्रांति में प्रयुक्त तकनीक

            मानव भूगोल में मात्रात्मक क्रांति से संबंधित अपनायी तकनीक को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

3.1  विवराणात्मक तकनीक

      इसमें सामाजिक-आर्थिक आंकडों का संग्रह कर निष्कर्ष निकाला जाता है और उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। यह औसत, माध्य, माध्यिका, बहुलक, अपसरण, मानक विचलन जैसे सांख्यिकीय तकनीक पर किया जाता है।

3.2  अनुमोदनात्मक तकनीक  

     इस तकनीक के द्वारा मानव भूगोल में विकसित किया गया सिद्धांत या परिकल्पना की वैज्ञानिक जाँच की जाती है। जैसे: इसके लिए सिम्पल रिग्रेशन (प्रतिगमन), लीनियर रिग्रेशन, संभाव्यता (Probability) जैसे तकनीक प्रयोग करते हैं।

4. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

            भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास अचानक नहीं हुआ बल्कि कई अवस्थाओं से गुजरने के बाद हुआ है।

चरण काल प्रयुक्त सांख्यिकीय तकनीक प्रमुख विद्वान एवं एजेंसी
पहला 1950-58 नमूना विधि, मानक विचलन, माध्य, माध्यिका, बहुलक बेरी, बंगी, हार्टशोन, जिफ, हार्वे, एकरमैन एवं नेल्सन
दूसरा 1958-68 को-रिलेशन, रिग्रेशन, सूचकांक बेरी, स्पीयर्समैन, पीयर्सन
तीसरा 1968-78 बहुचर विधि, विश्लेषण विधि, नजदीकी पड़ोसी सांख्यिकी विधि चोर्ले, हैगेट, इबान्स, मोसर, एल.सी.किंग, इराशी, स्कॉट
चौथा 1978 से अबतक कम्प्यूटर, GIS, एरियल फोटोग्राफी पर आधारित तकनीक IRS नासा, इसरो, यूरोपीय स्पेस एजेंसी

5. मात्रात्मक क्रांति का प्रभाव एवं महत्व

         भूगोल में मात्रात्मक क्रांति के आगमन से कई प्रकार के प्रभाव पड़े। जैसे:

(i) भूगोलवेता स्वंय प्राथमिक आंकड़ों का संग्रहण तथा उसका विश्लेषण करने लगे।

(ii) मानव भूगोल में कई नवीन सिद्धांत, परिकल्पना एवं मॉडल का विकास किया गया।

(iii) मात्रात्मक क्रांति ने मानव भूगोल को एक वैज्ञानिक विषय बना दिया।

(iv) भूगोलवेताओं में सांख्यिकी का ज्ञान होने के कारण नियोजन के कार्यों में इनकी माँग बढ़ गयी।

(v) मानचित्र के गुणों एवं स्तर में वृद्धि हुई।

(vi) प्रदेश एवं नगरों का वर्गीकरण, प्रादेशिकरण एवं नियोजन में वैज्ञानिकता का आगमन हुआ।

(vii) जटिल आर्थिक-सामाजिक चरो विश्लेषण कर भूगोल में भविष्यवाणी की जाने लगी।

(viii) भूगोल में ‘रैंक साइज’ नियम के आधार पर जनसंख्या भूगोल, नगरीय भूगोल का अध्ययन किया गया।

(ix) स्टैण्डर्ड डिविएशन के आधार पर बीबर एवं डोई ने फसल संयोजन, केन्द्रीय स्थल सिद्धांत और कई स्थानीयकरण के सिद्धांत विकसित किये गये।

6. आलोचना

        मात्रात्मक  क्रांति ही आलोचना कई भूगोलवेताओं द्वारा की गई है। जैसे:-

(i) स्पेट महोदय ने कहा कि एक भूगोलवेता में सांख्यिकी पर आधारित सोच और विचार का अभाव होता है। ऐसी स्थिति में अगर वह प्रयोग करता है तो परिणाम गलत आ सकते हैं।

(ii) डडले स्टाम्प महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि “कम्प्यूटर मात्रात्मक क्रांति का सुनहला बछड़ा है।”  पुन: उन्होंने कहा कि भूगोल के परम्परागत तकनीक ही सर्वोत्तम तकनीक है।

(iii) व्यावहारवादियों ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि मात्रात्मक क्रांति भावात्मक पहलू एवं मानवीय मूल्यों के विश्लेषण करने में सक्षम नहीं हैं।

(iv) हार्वे महोदय ने कहा कि मात्रात्मक क्रांति अपने चरम अवस्था को प्राप्त कर चुका है। अब धीरे-2 इसमें ह्रास की प्रवृत्ति देखी जा रही है।

7. निष्कर्ष

           उपरोक्त सीमाओं के बावजूद मात्रात्मक क्रांति ने मानव भूगोल को एक वैज्ञानिक विषय बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है। अवः भूगोल में विकसित अन्य चिन्तन को इसकी आलोचना न कर इसके विश्लेषणात्मक क्षमता को देखा जाना चाहिए।

 5. Determinism vs Possibilism (नियतिवाद बनाम सम्भववाद)

 Determinism vs Possibilism

नियतिवाद बनाम सम्भववाद 




नियतिवाद बनाम सम्भववाद (Determinism vs Possibilism)

          नियतिवाद बनाम सम्भववाद भूगोल में तृतीय चरण का द्वैतवाद है जो विषय वस्तु से जुड़ा हुआ है। नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ और मनुष्य को प्रकृति का दास माना गया है। दूसरी ओर नियतिवाद के विरोध में संभववाद का उदय हुआ है। संभववाद में मानव को श्रेष्ठ माना गया है और कहा गया है कि मानव प्रकृति का दास नहीं है बल्कि वह प्रकृति के अन्दर रहकर संभावनाओं का सृजन करता है।

Determinism vs Possibilism

नियतिवाद का विकास

              मानव सभ्यता के प्रारंभ से लेकर हजारों वर्षों तक इसी विचारधारा का वर्चस्व रहा। नियतिवाद के विकास का श्रेय हम्बोल्ट और रीटर को जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि भूगोल में नियतिवादी चिन्तन का विकास ग्रीक और रोमन भूगोल के विकास के समय में हुआ था।

⇒ इस संदर्भ में हिप्पोक्रेटस का कार्य सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इनके द्वारा लिखित पुस्तक “Airs, Waters & Places” में यह बताया गया कि मैदानी प्रदेश मानवीय अधिवास के लिए अधिक अनुकूल है जहाँ जल एवं वायु उपलब्ध हो।

⇒ मध्ययुगीन चिंतकों में बेदिन तथा माण्टेस्क्यू ने नियतिवाद का समर्थन करते हुए कहा है कि जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी मानवीय संस्कृति के विकास का आधार है।

⇒ आधुनिक समय में हम्बोल्ट तथा रीटर क्रमश: ‘Cosmos’ एवं ‘Erdkunde’ नामक पुस्तकों के माध्यम से इस चिन्तन को विकसित किया।

⇒ हम्बोल्ट ने ‘Cosmos’ में मानव को एक भौतिक कारक माना है और कहा कि “Physical geography is general Geography”

⇒ यद्यपि रीटर के प्रादेशिक उपागम के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन को अनिवार्य बताया। लेकिन वे स्वतंत्र अध्ययन को भूगोल की आवश्यकता नहीं बताया। वे मूलतः ईश्वरवादी और प्रकृतिप्रेमी थे।

⇒ इस प्रकार दोनों ने उपागम के मतभेद के बावजूद नियतवादी चिन्तन का समर्थन किया।

⇒ ब्रिटिश इतिहासकार बकेल द्वारा भी अपनी “History of Civilisation in England” पुस्तक में सभ्यता के विकास का आधार वातावरण को मानते हुए कहा है कि वे भौगोलिक प्रदेश आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न है जहाँ जलवायु, खाद्य संसाधन तथा मृदा माननीय आवश्यकताओं के दृष्टि से अनुकूल है।

⇒ ब्रिटिश भूगोलवेता लेप्ले ने स्थान, कार्य और संस्कृति की संकल्पना प्रस्तुत की। इनके अनुसार स्थान अर्थात् वातावरण मानवीय कार्यो का निर्धारण करता है और कार्य ही लोकसंस्कृति का।

Place → Work → folk

(स्थान)    (कार्य)   (संस्कृति)

         जैसे- गंगाघाटी में मनुष्य मुख्यतः कृषि कार्य ही कर सकता है, वह चाह कर भी यहाँ खनन नहीं कर सकता क्योंकि यहाँ खनिज तो है ही नहीं।

⇒ अमेरिकी भूगोलवेता में डेविस, हटिंग्टन तथा मिस सेम्पल नियतिवाद के महान समर्थकों में थे।

⇒ हटिंग्टन और मिस सेम्पल वातावरणीय नियतिवाद पर जोर दिया। जैसे- मानवीय क्रियाओं पर पर्वतीय वातावरण का प्रभाव पड़ता है न कि मनुष्य का प्रभाव पर्वत पर पड़ा हैं।

⇒ मिस सेम्पल ने “Influences of Geopraphic Environment” में लिखा है “Man is the Product of Environment”

⇒ मिस सेम्पल के कार्य को नियतिवाद के क्षेत्र में अन्तिम महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है क्योंकि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही फ्रांसीसी भूगोल का उदय हो चुका था, जो संभववादी संकल्पना के पक्षधर थे। इस तरह नियतिवादी संकल्पना का आलोचना प्रारंभ हो गया क्योंकि प्राकृतिक शक्तियों के साथ-2 मानवीय क्रियाओं का भी महत्व बढ़ गया।

आलोचनाएँ

⇒ नि:संदेह यह सत्य है कि वातावरण मानव को प्रभावित करता है। परन्तु, मानव भी वातावरण में परिवर्तन ला सकता है।

⇒ मनुष्य की शारिरीक गुणों पर वातावरण की अपेक्षा वंशानुगत प्रभाव होता है।

⇒ समान वातावरण में भी जीवनशैली में विभिन्नता पायी जाती है।

⇒ मनुष्य ने विज्ञान में प्रगति कर प्रकृति के कई क्षेत्रों पर विजय पाई है।

⇒ वातावरण की प्रतिकूलता के बावजूद कृषि मनुष्य उत्पादन कर रहा है। जैसे-पंजाब व कैलीफोर्निया में चावल की खेती।

⇒ मनुष्य ने प्रतिकूलता के बावजूद जापान को औद्योगिक राष्ट्र बनाया। यह औद्योगिक क्रांति मनुष्य की श्रेष्ठता स्थापित करता है और यही श्रेष्ठता संभववाद का आधार है।

       इस प्रकार नियतिवाद को 20वीं शताब्दी में नकार दिया गया तथा इसके स्थान पर संभववाद का प्रतिपादन हुआ जिसमें प्रकृति के प्रभावों को भी दिखाया गया। इसे पूर्णतः नहीं नकारा गया क्योंकि मनुष्य प्रकृति पर निर्भर है और प्रकृति पर भी मनुष्य के कुछ हस्तक्षेप है। दोनों के बीच एक संक्रमण रेखा है मगर विभाजक रेखा नहीं।

सम्भववाद का विकास

     सम्भववाद का उदय नियतिवाद के विरोध में हुआ। सम्भववाद में जहाँ मानव को श्रेष्ठ बताया गया है वहीं नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ बताया गया है। नियतिवाद में मानव को प्रकृति का दास बताया गया तथा मोम का पुतला कहा गया है। इतना ही नहीं प्रकृति मानव को अपनी इच्छानुसार ढाल सकती है। वहीं सम्भववाद में कहा गया है कि मानव प्रकृति पर विजय पा सकता है। मानव प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। मानव प्रकृति के द्वारा खड़ा किए गए अवरोधों को पार कर सकता है। प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार हो सकता है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।

सम्भववाद के उदय का कारण

      नियतिवाद का उद‌य जर्मनी में हुआ जबकि संभववाद का उदय फ्रांस में हुआ। फ्रांस में संभववाद के उदय के कई कारण है। जैसे-

(i) औद्योगिक क्रांति का प्रभाव⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेताओं पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव था जिसमें भूगोलवेताओं ने देखा कि मानव बड़े-2 कलकारखाने स्थापित कर बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करता है।

(ii) इतिहास के घटनाओं का प्रभाव⇒ फ्रांस में अधिकांश भूगोलवेताओं इतिहास के घटनाओं के प्रभाव में थे जिसके कारण लोगों में उन्होंने मानवीय श्रेष्ठता की संकल्पना विकसित किया।

(iii) महानगरों का विकास⇒ फ्रांसीसी विद्वानों ने देखा कि मानव सामूहिक अधिवास करते हुए महानगरों को विकसित कर लिया है। इन महानगरों में सर्वत्र मानवीय श्रेष्ठता दिखाई देती है न कि प्रकृति। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व ही पेरिस और लंदन जैसे नगर महानगरों में बदल चुके थे।

(iv) महाद्वीपीय रेलवे का विकास⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के ऊपर महाद्वीपीय रेलवे का भी प्रभाव था। जैसे-लोगों ने यह देखा था कि प्रकृति ने दूरी और अनेक प्रकार के अवरोध खड़ा कर दिया। मानव को मानव से अलग कर दिया था लेकिन मानव दूरियों को पाटने के लिए सभी अवरोधों को पार कर महाद्वीपीय रेलवे का विकास किया जो प्रकृति पर विजय का अद्‌भूत उदाहरण है।

(v) वाणिज्य एवं व्यापार⇒ मानव अपने बलबूते कई देशों को गुलाम बनाने में सफल हुआ था वैश्विक वाणिज्य एवं व्यापार का विकास कर भावन ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दो।

       उपरोक्त कारणों के ही कारण 19वीं शताब्दी के अन्त आते-आते नियतिवादी चिन्तन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा। भौगोलिक चिन्तन के क्षेत्र में संभववाद का उदय 1900-20ई० तक हुआ। सम्भववाद को व्यवस्थित रूप से विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, ब्रूंश, डिमांजिया, किरचॉफ, जिमरमैन, कार्लसावर, टैथम, ईसा बोमेन जैसे भूगोलवेताओं से जाता है।

          “सम्भववाद” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इतिहासकार फेब्रे महोदय ने किया था उन्होंने अपनी पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि “मानव एक पशु के समान नहीं है बल्कि मानव एक भौगोलिक रूप है वह अपनी सोच के आधार पर प्रकृति के नियमों में एवं रचनाओं की विवेचना करता है तथा उसमें परिवर्तन लाता है।”

             भूगोल में सम्भववाद के सबसे बड़े समर्थक विडॉल डी ला ब्लाश हुए। ब्लाश न केवल मानव को श्रेष्ठ बताया बल्कि यह भी कहा कि प्रकृति की भूमिका अधिक-से-अधिक सलाहकार की हो सकती है। मानव प्रकृति की सलाह मान भी सकता या नहीं भी। ब्लाश के इस चिन्तन का इतना व्यापक प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेता पर पड़ा था कि वहाँ डीमोरटोनी को छोड़कर कोई भी विद्वान नियतिवाद समर्थक नहीं निकला।

                पॉल वाइडल डि लॉ ब्ला के एक शिष्य जीन ब्रूंश महोदय थे। उन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था‘ की संकल्पना (Robber Economy) प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने सम्भववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज को बाहर निकाल लेता है और पृथ्वी मूक बनी रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव भूतल पर निवास करता है तथा अपने परिवेश में रहकर कार्य करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मानव प्रकृति का दास है।

              ब्लाश के दूसरे शिष्य डिमांजिया थे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में विकसित मानवीय गतिविधि जैसे कृषि, उद्योग को देखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव आस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में भी अपनी परचम (विजयी पताका) लहरा चुका है।

         दो अन्य भूगोलवेता किरचॉफ एवं ब्लेंचार्ड ने सम्भववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने यहाँ तक कहा कि मानव कोई मशीन नहीं है कि उसे रिमोट कंट्रोल के द्वारा नियंत्रित किया जा सके। इसी तरह ब्लेंचार्ड महोदय ने नगरीय भूगोल पर शोध करके यह बताया कि नगरों पर ज्यादा मानवीय इच्छाओं का प्रभाव होता है।

       अमेरिका में जिमरमैन कार्लसावर और ईसा बोमैन जैसे संभववादी भूगोलावेता जन्म लिये। जिमरमैन ने कहा कि “संसाधन होते नहीं, बनते हैं।” इनके ही तर्कों का समर्थन करते हुए जापान के पूर्व प्रधानमंत्री टनाका ने कहा कि “जापान का सबसे बड़ा संसाधन उसके पास कोई भी प्राकृतिक संसाधन न होना है।”

          अमेरिकी भूगोल‌वेता ईसा बोमेन ने भी जिमरमैन के समान तर्क प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास कर रहे मानव और उसके समाज के स्वरूप भौतिक कारक सुनिस्चित नहीं करता बल्कि मानव अपने प्रयास से उसके स्वरूप के निर्धारण करता है।

          अमेरिकी भूगोलवेता कार्लसावर ने कहा कि पृथ्वी के तल पर सांस्कृतिक भूदृश्य के विकास में प्रकृति का योगदान नहीं होता है बल्कि मानव स्वयं सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण करता है। लेकिन उन्होंने “Morphology and Lamd Soap” नामक शोध लेख में यह स्वीकार किया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्तियाँ मानव को सामान्य रूप से प्रभावित करती है। इसीलिए उन्होंने कहा था कि सम्भववाद के स्थान पर सांभाव्यवाद की संकल्पना विकसित किया जाए।

            इनके संकल्पना को समर्थन करते हुए प्रसिद्ध पारिस्थैतिक वैज्ञानिक बोरो ने “मानव पारिस्थतिकी” (Human Ecology) की संकल्पना विकसित किया जिसमें बताया गया कि “प्रकृति मानव को प्रभावित करता है और मानव प्रकृति को प्रभावित करता है।”

निष्कर्ष

        इस प्रकार फ्रांसीसी चिन्तकों ने जर्मन चिन्तकों के समक्ष एक नवीन चिन्तन प्रस्तुत किया अर्थात नियतिवादी के विरोध में सांभाव्यवाद की संकल्पना प्रस्तुत किये। जिसके कारण भूगोल में द्विविभाजन का संकट उत्पन्न हो गया है। बाद में ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेताओं के प्रयास से इस विभाजन को रोका गया और यह बताया गया कि नियतिवाद और सम्भववाद की संकल्पना को दो अलग-अलग संकल्पना नहीं माना जाय बल्कि दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाय। इनके प्रयास से भूगोल में नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद का उदय हुआ।

2. Dichotomy and Dualism (द्विविभाजन एवं द्वैतवाद)

Dichotomy and Dualism

द्विविभाजन एवं द्वैतवाद



Dichotomy and Dualism(नोट- द्वि, द्वै = दो, विभाजन = बँटवारा, वाद = विचारधारा)

             किसी विषय के कोई भी विषयवस्तु को लेकर दो प्रकार के विचार प्रस्तुत करना द्वैतवाद कहलाता है। जबकि किसी विषय के विषयवस्तु पर प्रस्तुत किया गया दो दृष्टिकोण में से किसी एक दृष्टिकोण को ही प्रमुख मान लेना द्विविभाजन कहलाता है अर्थात द्विविभाजन में दो प्रकार के स्वतंत्र विचारधारा प्रस्तुत किये जाते हैं। जबकि द्वैतवाद में किसी विषयवस्तु पर दो अन्तर संबंधित विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। द्विविभाजन का प्रमुख उद्देश्य किसी भी विषय-वस्तु को बाँटना है। जबकि द्वैतवाद का मुख्य उद्देश्य बिना बँटवारा किये हुए वाद-विवाद के आधार पर विषय को विकसित करना है।

      16वीं शताब्दी तक भूगोल में किसी भी प्रकार के द्विविभाजन एवं द्वैतवाद का आगमन नहीं हुआ था। भूगोल में द्विविभाजन को जन्म देने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है क्योंकि इन्होंने ही भूगोल को इतिहास से अलग करने का कार्य किया था। काण्ट के अनुसार किसी भी विषयवस्तु का अध्ययन दो संदर्भों में किया जा सकता है। प्रथम समय के संदर्भ में और द्वितीय स्थान के संदर्भ में।

    समय के संदर्भ में किसी विषयवस्तु का अध्ययन करना इतिहास कहलाता है। जबकि स्थान के संदर्भ में किसी विषयवस्तु का अध्ययन भूगोल कहलाता है। इस तरह स्पष्ट होता है कि इमैनुएल काण्ट महोदय ने द्विविभाजन की संकल्पना को जन्म देकर भूगोल को इतिहास से पृथक करने का कार्य किया।

इमैनुएल काण्ट

          इमैनुएल काण्ट

         16वीं शताब्दी तक भूगोल में द्वैतवाद की कोई भी संकल्पना विकसित नहीं हुई। 17वीं शताब्दी में बर्नहार्ड वारेनियस ने पहली बार भूगोल के सामान्य भूगोल एवं विशिष्ट भूगोल में बाँटकर अध्ययन करने का प्रयास किया। लेकिन इनका उद्देश्य भूगोल को बाँटना नहीं था बल्कि भूगोल से संबंधित विषयवस्तु के अध्ययन को विकसित करना था। इस तरह वारेनियस के कार्य से भूगोल द्वैतवाद का श्रीगणेश हुआ।

बर्नहार्ड वारेनियस

बर्नहार्ड वारेनियस

        19 वीं शताब्दी में भूगोल के विषयवस्तु को लेकर पुनः द्वैविभाजन की स्थिति उत्पन्न हो गई क्योंकि कुछ भूगोलवेता भूगोल में केवल प्राकृतिक भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे तो कुछ भूगोलवेता केवल मानव भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे। हम्बोल्ट, रीटर, डेविस, पेंक, मिस सेम्पल इत्यादि प्राकृतिक भौतिक भूगोल के अध्ययन को समर्थन करते थे।

      वहीं ब्लाश, ब्रूंस, डिमांजिया, मैकिन्डर जैसे भूगोलवेता मानव भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे। इस तरह भूगोल द्विविभाजन के आगमन के कारण बँटने के कगार पर पहुँच गया। भूगोल में विभाजन की समस्या उत्पन्न न हो इसलिए द्वैतवाद पर अधिक जोर दिया जाने लगा। इस तरह भूगोल में विधितंत्र से संबंधित और भूगोल के विषयवस्तु को लेकर कई द्वैतवाद को जन्म देकर अध्ययन करने की परम्परा प्रारंभ हुई। जैसे:-

(1) सामान्य भूगोल बनाम विशिष्ट भूगोल

(2) भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल

(3) सैद्धांतिक भूगोल बनाम व्यावहारिक भूगोल

(4) क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्रादेशिक भूगोल

(5) नियतिवाद बनाम सम्भववाद

        द्विविभाजन एवं द्वैतवाद के कारण भूगोल के ऊपर मिश्रित प्रभाव देखा जा सकता है। द्विविभाजन के कारण कोई भी विषय बँटवारे के कगार पर पहुँच जाता है जबकि द्वैतवाद के कारण भूगोल के विषयवस्तु और उसके अध्ययन के तकनीक के विकास में मदद मिलती है। भूगोल के अलावे सभी कला विषय में द्विविभाजन एवं द्वैतवाद की समस्या उत्पन्न हुई है। भूगोल में अब द्विविभाजन एवं द्वैतवाद की घटना इतिहास की घटना माना जाने लगा है। भूगोल को इस समस्या से मुक्त करने का श्रेय टेलर, सावर, हार्टसोन, हरबर्टसन जैसे भूगोलवेताओं को जाता है।

निष्कर्ष

     निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि द्विविभाजन एवं द्वैतवाद से भूगोल के विषयवस्तु को विकसित करने में मदद अवश्य मिलती है लेकिन इनकी चरम परकाष्ठा भूगोल को विभाजित भी कर सकती है।

नोट :- हालाँकि यूनानी, रोमन और अरब भूगोलवेत्ताओं के लेखों में भी द्वैतवाद की धुंधली झलक मिलती है। हिरोडोटस ने जन-जातियों के विवरण के साथ-साथ उनकी प्राकृतिक परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है। स्ट्रेबो का प्रादेशिक विवरण और टॉलमी का गणितीय भूगोल पर ध्यान भी ऐसे विवरण हैं जो द्वैतवादी हैं। हिप्पोक्रेट्स, अरस्तु जिनोफोन, आर्यभट्ट, अल-मसूदी और इब्नखाल्दून ने अनेक लोगों के जन-जीवन शैली को प्राकृतिक वातावरण के प्रभावों द्वारा उनको स्पष्ट बनाया है।



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1. Ancient Classical Times in Geography (भूगोल में प्राचीन चिरसम्मत काल)

 Ancient Classical Times in Geography

(भूगोल में प्राचीन चिरसम्मत काल)




  Ancient Classical Times in Geography

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न- प्राचीन चिरसम्मत काल (Classical Ancient Times) के भौगोलिक ज्ञान के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

अथवा, भूगोल में चिरसम्मत शास्त्रीय कालीन भूगोलवेताओं के योगदान का वर्णन कीजिए।

        चिरसम्मत शास्त्रीय काल में मुख्यतः यूनानी व रोमन भूगोलवेत्ताओं को सम्मिलित किया जाता है। इस काल में अधिकांश समय यूनानी भूगोलवेत्ताओं का प्रभुत्व ही भूगोल पर रहा। उन्होंने भूगोल को एक स्वतन्त्र विषय के रूप में तो मान्यता दिलाई ही साथ ही विभिन्न भौगोलिक पक्षों (Aspects) का वर्णन भी अपने ग्रन्थों में किया।

         यूनानी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल का विकास प्रमुखतः तीन विधाओं द्वारा किया गया— अन्वेषण, मानचित्र और परिकल्पना।

यूनानी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल की समस्त प्रमुख शाखाएँ स्थापित कर ली गई थीं। गणितीय भूगोल का जन्म, थेल्स, अनेग्जीमेण्डर तथा अरस्तु के द्वारा हुआ जिसे इरेटॉस्थनीज ने चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। पृथ्वी का गोल आकार जो कि आश्चर्यजनक रूप से शुद्धता के निकट था तथा विभिन्न स्थानों के अक्षांश व देशान्तर ज्ञात कर लिए गए थे। 

Ancient Classical Times in Geography

यूनानी भूगोलवेत्ताओं का योगदान 

1. महाकवि होमर (Homer) ⇒ 900 ई० पू०

         लगभग 900 ई० पू० में ये वस्तुतः एक इतिहासकार थे। इन्होंने दो महाकाव्य ओडिसी व इलियड लिखे। इनमें बहुत से क्षेत्रों, मानव वर्गों तथा जनपदों के वर्णन हैं। इनके अनुसार पृथ्वी तैरती हुई वृत्ताकार मानी गई थी। 500 वर्षों तक यह विचारधारा ठीक मानी जाती रही। दूसरे महाकाव्य ओडिसी में सुदूर पूर्व के विभिन्न भू-भागों को वर्णित किया गया है। इसमें यातायात तथा अन्य देशों के निवासियों के भी वर्णन हैं। होमर ने चार स्वर्गों की कल्पना की थी जो पृथ्वी के चारों कोनों पर स्थित माने जाते थे। उन्होंने चार प्रकार की पवनों का उल्लेख किया है—बोरस (उत्तरी हवा, साफ-स्वच्छ नीला आकाश, हवा ठण्डी और तेज); यूरस (पूर्वी हवा, गर्म और मन्द); नोटस (दक्षिणी पवन, यह वर्षा और झंझा युक्त होती हैं) और जेफिरस (पश्चिमी पवन, झंझावाती वेग) 

2. थेल्स (Thales) 700 ई० पू०

         यह एक दार्शनिक था जो यूनान में प्राकृतिक विज्ञान व दर्शनशात्र (Philosophy) का जन्मदाता था। 500 BC में इन्होंने विश्व की उत्पत्ति व नक्षत्रों के विषय में एक पुस्तक लिखी, जिससे उस समय गणितीय भूगोल का जन्म हुआ। थेल्स ने भी पृथ्वी  को चपटी, वृत्ताकार व पानी पर तैरती हुई माना था। इन्होंने बताया था कि जल में तैरने के कारण ही पृथ्वी पर भूकम्प आते हैं। सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण के सन्दर्भ में भी इन्होंने अपने मत प्रकट किए थे।

3. पाइथागोरस (Pythagorus) ⇒ 

       सर्वप्रथम 582 BC में उन्होंने ब्रह्माण्ड विज्ञान के सन्दर्भ में अपने विचार प्रकट किए। इन्होंने मत प्रकट किया था कि पृथ्वी गोलाकार व अस्थिर है। यह अन्य आकाशीय पिण्डों की परिक्रमा करती है। इन्होंने सूर्य व चन्द्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करते बताया था।

4. अनेग्जीमेण्डर (Anaximander) ⇒ 610-546 ई० पू०

          यह थेल्स के शिष्य थे। इनको नक्षत्र विज्ञान व ब्रह्माण्ड विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान था। पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार के बारे में इनके विचार प्रगतिवादी थे। इनका मत था कि पृथ्वी गोल है तथा ठोस पिण्ड के रूप में ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित है। वे विश्व के प्रथम मानचित्र के निर्माण में योगदान किया। सर्वप्रथम सूर्य घड़ी (Gnomon) का निर्माण किया। जैव भूगोल जैसे स्वतन्त्र विषयों की नींव रखी। विभिन्न जीव उत्पत्ति तथा प्रकाश सम्बन्धी लेख लिखे। उनका मत था कि पृथ्वी तल के समस्त जीव एक निरन्तर विकास प्रक्रिया के परिणाम है। उन्होंने कहा कि मानव की उत्पत्ति इसी विकास प्रक्रिया के परिणामस्वरूप मछली से हुई है।

5. अनेग्जीमैनस (Anaximenes) ⇒ 

          यह अनेग्जीमेण्डर का शिष्य था। ब्रह्माण्ड विज्ञान के सन्दर्भ में इन्होंने अपने स्वतन्त्र विचार प्रकट किए थे। इनका विचार था कि सूर्य व तारे पृथ्वी से काफी दूर हैं व पर्वतों द्वारा सूर्य का प्रकाश अवरुद्ध हो जाने से रात हो जाती है।

6. हिकेटियस (Hecataeus ⇒ 520 ई० पू०

        हिकेटियस (मलेशियम्) नगर का निवासी था। इन्होंने व्याख्यात्मक भूगोल पर अपने विचार प्रकट किए थे और पृथ्वी का वर्णन’ (Gesperiodos) नाम की पुस्तक लिखी। इसमें उस समय के ज्ञात विश्व का प्रादेशिक वर्णन था। इस ग्रन्थ द्वारा इन्होंने यूनान में प्रादेशिक भूगोल की नींव रखी। इसी पुस्तक में मलेशियस नगर का मानचित्र भी दिखाया गया था। पृथ्वी को इन्होंने वृत्ताकार माना था। हिकेटियस को भूगोल का जनक (Father of Geography) कहा जाता है।

7. हिरोडोटस (Herodotus) ⇒ 485-425ई० पू०

         इनको इतिहास का जन्मदाता मानते हैं। हिरोडोटस ने उन भौगोलिक क्षेत्रों का निरीक्षण एवं अन्वेषण किया था जो उस समय तक अज्ञात थे। इन्होंने दक्षिणी इटली, भूमध्यसागरीय क्षेत्रों, मिस्र, वेबीलोन, आदि क्षेत्रों का विशद वर्णन प्रस्तुत किया। इन्होंने विश्व के मानचित्र का भी निर्माण किया था और नील नदी के डेल्टा के निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन किया था। हेरोडोटस ने ही सबसे पहले विश्व मानचित्र पर याम्योत्तर (Meridian) खींचा। हेरोडोटस ने विश्व की भूसंहति को तीन महादेशों- यूरोप, एशिया तथा लीबिया (अफ्रीका) में बांटा।

8. प्लेटो (Plato) ⇒ 428-348 ई० पू०

          प्लेटो (428-348 ई. पू.) का नाम तो सदैव दर्शनशास्त्र के साथ जोड़ा जाता है। परन्तु उन्होंने भौगोलिक अवधारणाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। निगमनात्मक तर्कणा (Deductive Reasoning) के प्रबल प्रतिपादक प्लेटो को यह बताने का श्रेय प्राप्त है कि धरती एक गोलाभ (Sphare) की भांति है और ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है तथा सूर्य सहित शेष सभी खगोलीय पिण्ड धरती के चारों ओर चक्कर काटते हैं। उनकी यह खोज उनके जमाने में बड़ी क्रांतिकारी सिद्ध हुई।

9. अरस्तु (Aristotle) – 384-322 ई० पू०

        यह प्रसिद्ध विचारक प्लेटो का शिष्य था। इसको वैज्ञानिक भूगोल का जन्मदाता माना जाता है। अरस्तु दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, जीवविज्ञान, आदि विषयों में प्रकाण्ड पण्डित थे। गणितीय भूगोल में इनका योगदान सराहनीय है। उन्हाने पृथ्वी की आकृति गोलाकार बताई थी। सर्वप्रथम जलवायु कटिबन्धों का निर्धारण किया था और मौसम विज्ञान पर ग्रन्थ लिखा था। इसमें वायु ऋतु परिवर्तन, वर्षा, ओला, भूकम्प आदि का वर्णन किया था। वातावरणवाद (Environmental Determinism) को सर्वप्रथम व्यवस्थित रूप में अरस्तु ने ही प्रस्तुत किया था।

10. सिकन्दर (Alexander) ⇒

        यह एक अन्वेषक यात्री थे। इन्होंने युद्धों के सन्दर्भ में अनेक यात्राएं की थी। इन यात्राओं के वर्णनों में भौगोलिक ज्ञान के दर्शन होते हैं तथा उन्होंने दक्षिण-पश्चिमी एशिया, दक्षिणी एशिया, मिस्र, आदि की खोज की थी। इनके वर्णन प्रादेशिक व सामान्य भूगोल के विकास में सहायक सिद्ध हुए तथा उनसे व्याख्यात्मक भूगोल को भी बल मिला।

11. थियोफ्रेस्टस (Theophrastus) ⇒ 

        यह अरस्तु के शिष्य थे। इन्होने अरस्तु के कार्यों को आगे बढ़ाया। जलवायु विज्ञान पर अपने स्वतन्त्र विचार भी प्रस्तुत किए। जलवायु व वनस्पति के सम्बन्धों का वर्णन किया। चट्टानों एवं मिट्टियों का अध्ययन किया। इन्होंने ‘हिस्ट्री ऑफ प्लेनेटस’ (History of Planets) नाम की पुस्तक लिखी जिसमें मैसिडोनिया के मैदानी क्षेत्रों, निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों तथा अन्य क्षेत्रों की वनस्पति का तुलनात्मक अध्ययन किया था। इस प्रकार वनस्पति भूगोल की नींव डाली।

12. इरेटास्थनीज (Eratosthenes) ⇒ 276-196 ई० पू०इरेटास्थनीज           यह प्रसिद्ध गणित भूगोलवेत्ता थे और सिकन्दरिया (Alexandria) स्थित संसार की सर्वोच्च शिक्षा संस्था के पुस्तकालयाध्यक्ष थे। यहां इन्होंने अपने भौगोलिक ज्ञान में वृद्धि की तथा नक्षत्र विज्ञान व गणितीय भूगोल पर काफी लेख लिखे। इन्होने पृथ्वी की परिधि की गणना की थी जो शुद्ध माप से 14% अशुद्ध थी। उन्होंने उस समय के ज्ञात विश्व का मानचित्र भी बनाया था और पृथ्वी के वर्णन के लिए सर्वप्रथम ज्यॉग्राफी (Geography) शब्द का प्रयोग किया या भूगोल विषय पर पहली औपचारिक कृति ‘The Geographica’ नाम से इरेटास्थनीज ने ही लिखी।

इरेटास्थनीज

13. हिप्पार्कस (Hipparchus) ⇒ 190-125 ई० पू०

           हिप्पार्कस एक खगोलशास्त्री तथा गणितज्ञ था जिसने Equinoxes का पता लगाया तथा वर्ष की लम्बाई बतायीं। यह पहला विद्वान था जिसने असीरियाई गणित के आधार पर वृत्त को 360º में विभक्त किया था। इसने विषुवत रेखा तथा देशांतरीय वृत्त को वृहत्त वृत्त (Great Circle) बताया। इन्होंने ही नक्षत्रों के अध्ययन के लिए एस्ट्रोलेब (Astrolabe) नामक यंत्र का अविष्कार किया और इसकी सहायता से अक्षांश एवं देशांतर वृतों का भी निर्धारण किया। एस्ट्रोब नोमान की तुलना में सरलता से प्रयोग किया जा सकता था।

            अक्षांस एवं देशांतर के आधार पर उसने विश्व को क्लाइमाटा (Climata) अर्थात अक्षांश पेटियों में विभाजित किया। अक्षांश एवं देशांतर रेखा जाल की सहायता से इसने ज्ञात विश्व को 11 जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया था।

         हिप्पार्कस ही पहला व्यक्ति था जिसने त्रि विमीय (Three Dimension) गोलाभ को दो विमीय (Two Dimension) तल में बदलने का तरीका खोज निकला, परिणामस्वरुप पृथ्वी के गोलीय भाग को समतल क्षेत्र में बनाना संभव हो पाया। इसने दो प्रक्षेप बनाने की विधि बताएँ- (1) समरूपीय प्रक्षेप (Stereographic Projection) और (2) लंबरेखीये प्रक्षेप (Orthographic Projection)। इसने अक्षांश और देशांतर के महत्व पर बल दिया। इस प्रकार उन्होंने वैज्ञानिक मानचित्र कला (Scientific Cartography) के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किये।

14. पोसीडोनियस (Posidonius) ⇒ 135-50 ई० पू०

          पोसिडोनियस एक महत्वपूर्ण यूनानी इतिहासकार और भूगोलवेता था। इन्होंने ने “द ओसियन” नामक पुस्तक लिखा था। इसको समुद्र विज्ञान का विशेषज्ञ माना जाता है। क्योंकि  सर्वप्रथम इन्होंने ही बताया की पूर्णिमा (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी तीनो के एक सीध में होने के कारण समुद्र में दीर्घ ज्वार (Spring Tide) आते है और साथ ही कृष्ण पक्ष (Waning Moon) और शुक्ल पक्ष (Waxing Moon) को समकोण की स्थिती में होने के कारण लघु ज्वार (Neap Tide) आते हैं। महासागरों की गहराई ज्ञात करने वाला यह पहला भूगोलवेत्ता था। पोसिडोनियस ने भौतिक भूगोल को तर्कसंगत ढंग से विक्सित किया जिसके कारण इसे भौतिक भूगोल का पिता भी कहा जाता है। 

रोमन भूगोलवेताओं का योगदान 

1.  स्ट्रेबो (Strabo) ⇒ 64-20 ई० पू०

स्ट्रेबो

⇒ स्ट्रैबो ने उस समय के बसे हुए संसार के ज्ञात भाग का वर्णन 17 पुस्तकों की ग्रंथमाला (Geographical Encyclopedia) के रूप में संकलित किया था।

⇒ स्ट्रेबो द्वारा तत्कालीन समस्त भौगोलिक ज्ञान को एक साथ एकत्रित कर एक सामान्य पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने का सबसे पहला प्रयास किया गया।

⇒ प्राचीन भूगोल के विषय में जो जानकारी आज उपलब्ध है वह मुख्य रूप से स्ट्रेबो की ‘ज्योग्राफी’ से ही ली गई है, क्योंकि प्रारंभिक भूगोलवेत्ताओं द्वारा लिखी गई अधिकांश पुस्तकें विलुप्त हो चुकी हैं। स्ट्रैबो ने 43 ग्रंथों की रचना ‘ऐतिहासिक स्मृतियाँ’ (Historical Memories) के शीर्षक से की है।

⇒ स्ट्रैबो प्रथम विद्वान था जिसने संपूर्ण भौगोलिक प्रबंध, उसकी सभी चारों शाखाओं (गणितीय, भौतिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक) के संबंध में लिखे।

⇒ भूगोल एवं इतिहास के बीच के गहरे संबंध को उसने स्पष्ट करने का प्रयास किया। इतिहास के विकास पर भूगोल के प्रभाव का वर्णन करते हुए उसने यह लिखा कि इटली की विशेष सुरक्षित भौगोलिक स्थिति के कारण ही इस देश के निवासी प्रगतिशील एवं विकासशील रहे हैं।

⇒ स्ट्रैबो को नियतिवादी चिंतन का प्रथम महत्त्वपूर्ण विचारक माना जाता है।

⇒ उसने पहली बार एटलस एवं विसुवियस पर्वत का वर्णन किया है। विसुवियस को उसने ‘जलता हुआ पर्वत’ कहा है।

⇒ उसने अधिवासित प्रदेशों के लिए ‘ओकुमेन’ (Oikoumene) शब्द का प्रयोग किया, जिसे वर्तमान समय में ‘इकुमेन’ (Ecumene) कहा जाता है।

⇒ स्ट्रैबो ने पृथ्वी को दीर्घायत अर्थात (Oblong) माना था।

2. प्लिनी (Pliny) ⇒ 27-79 ई० पू०

           इन्होंने ‘हिस्टोरिया नेचुरेलिस‘ (Historia Naturalis) नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की थी जिसमें उसने ब्रह्माण्ड, जीव विज्ञान तथा मानव विज्ञान का वर्णन किया था।

3. टॉलमी (Ptolemy) ⇒ 90-168 ई० 

         टॉलमी ज्योतिष विज्ञान के प्रकाण्ड पण्डित थे। इनके अध्ययन के प्रमुख क्षेत्र गणितीय भूगोल, मानचित्र विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, आदि थे। इनके कार्य इरेटास्थनीज व स्ट्रैबों से काफी मिलते जुलते हैं। टॉलमी ने पृथ्वी को गोलाकार बताया था। अल्मागेस्ट (Almagest) टॉलमी की प्रसिद्ध पुस्तक है। इसमें गणितीय भूगोल तथा खगोलिकी की जटिल समस्याओं की चर्चा है। इन्होंने खगोलीय कार्यों के लिए कुछ यन्त्रों का प्रयोग किया था जिसमें टॉलमी मापक, म्यूरल चक्र यन्त्र (Mural Quardrand), गोला यन्त्र (Armillary), आदि प्रमुख हैं। मानचित्रांकन में टॉलमी ने प्रक्षेपों का सहारा लिया। टॉलमी ने अपने कार्यों में कुछ त्रुटियाँ भी की जिनका उत्तकालीन भूगोलवेत्ताओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

3. पोम्पोनियस मेला (Pomponiums)  ⇒ 335-391 ई०

          इसकी पुस्तक दो खण्डों में लैटिन भाषा में प्रकाशित हुई। प्रथम खण्ड कॉस्मोग्राफी (Cosmography) एवं द्वितीय खंड डी-कोरोग्राफिया (De-Georographia) के नाम से जाना जाता है।

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