Category BA SEMESTER/PAPER-VI

10. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलाप

10. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलाप



 गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कला

गोंड जनजाति

          गोंड मध्य प्रदेश की सबसे महत्त्वपूर्ण जनजाति है जो प्राचीनकाल में उस क्षेत्र में रहती थी जिसे गोंडवानालैण्ड कहते हैं। यह एक स्वतंत्र जनजाति थी।

निवास क्षेत्र:-

           गोंड जनजाति के वर्तमान निवास स्थान मध्य प्रदेश के पठारी भाग (जिसमें छिन्दवाड़ा, बैतूल, सिवनी और मांडला के जिले सम्मिलित है) छत्तीसगढ़ मैदान के दक्षिणी दुर्गम क्षेत्र (जिसमें बस्तर जिला सम्मिलित है), छत्तीसगढ़ और गोदावरी एवं वेनगंगा नदियों के पर्वतीय क्षेत्रों के अतिरिक्त बालाघाट, बिलासपुर, दुर्ग, रायगढ़ एवं रायसेन जिलों में है। इनका सर्वाधिक जमाव मध्य प्रदेश में मध्यवर्ती पहाड़ी एवं वनाच्छादित पठारों तथा सतपुड़ा पर्वत के पूर्वी और दक्षिणी अगम्य क्षेत्रों में पाया जाता है। इनका निवास क्षेत्र 17°46′ से 23°22′ उत्तरी अक्षांश और 80°15′ तथा 82°15′ पूर्वी देशान्तरों के बीच है।

वातावरण सम्बन्धी परिस्थितियाँ:-

           गोंडों का निवास क्षेत्र पूर्णतः पहाड़ी और वनाच्छादित है। ऊँची-नीची भूमि, वनस्पति एवं पशुओं का गोंडों के जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। एकान्त में रहने से ये पिछड़े हुए किन्तु ईमानदार और सरल चित्त, उदार, साहसी एवं चतुर और स्पष्टवादी होते हैं। ये आलसी नहीं होते किन्तु परिस्थितियों ने इन्हें निष्क्रिय अवश्य बना दिया है। वनों से जंगली कन्दमूल फल, गृह निर्माण और टोकरियाँ बनाने के लिए अनेक प्रकार की बेंते एवं शराब बनाने के लिए महुआ, ताड़, खजूर आदि का रस प्राप्त किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में लोहा मिलने से ये उसे पिघलाकर सामान्य औजार भी बना लेते हैं।

शारीरिक गठन:- 

            गोंड लोग काले तथा गहरे रंग के होते हैं। उनका शरीर सुडौल होता है किन्तु अंग भद्दे होते हैं। बाल मोटे, गहरे और घुंघराले, सिर गोल, चेहरा अण्डाकार, आँखे काली, नाक चपटी, ओठ मोटे, मुँह चौड़ा, नथुने फैले हुए, दादी एवं मूँछ पर बाल कम कद 165 सेमी० होता है। गोंडों की स्त्रियाँ पुरुषों की तुलना में कद में छोटी, शरीर सुगठित एवं सुन्दर रंग पुरुषों की अपेक्षा कुछ कम काला, होठ मोटे, आँखें काली और बाल लम्बे होते हैं। 

 

बस्तियाँ और घर:-

           गोंडों के घर और बस्तियों के बसाव में सामान्यतः दो बातों का ध्यान रखा जाता है-भौगोलिक अनुकूल स्थिति एवं जल प्राप्ति की सुविधा।

         ये पठारों, मैदानों, ऊँचे-नीचे पहाड़ी ढालों तथा निम्न मैदानी भागों में बनाये जाते हैं जहाँ प्राकृतिक रूप से सुरक्षा मिल सके। इनके खेतों के निकट ही जल के स्रोत उपलब्ध हों। गाँव की स्थिति में वनों की निकटता का महत्व अधिक होता है क्योंकि इसी से इन्हें लकड़ियों, कन्द-मूल फल एवं शिकार की प्राप्ति करने की सुविधा होती है।

         गोंडों की सभी झोंपड़ियाँ आँगन के चारों ओर बनायी जाती हैं। नयी झोपड़ियाँ फसल कटाई के बाद और पुरानी झोंपड़ियों की मरम्मत वैशाख महीने में की जाती है।

भोजन:-

            गोंड अपने वातावरण द्वारा प्रस्तुत भोजन-सामग्री पर अधिक निर्भर रहते हैं। इनका मुख्य भोजन कोदों और कुटकरी मोटे अनाज होते हैं जिन्हें पानी में उबालकर झोल (Broth) या राबड़ी अथवा दलिये के रूप में दिन में तीन बार खाया जाता है-प्रातःकाल, मध्यान्ह और राधि में।

          रात्रि में चावल अधिक पसन्द किये जाते हैं। कभी-कभी कोदों और कुटकी के साथ सब्जी एवं दाल का भी प्रयोग किया जाता है। कोदों के आटे से रोटी (गोदाला) भी बनायी जाती है। महुआ, टेंगू और चर के ताजे फल भी खाये जाते हैं। आम, जामुन, सीताफल और आँवला तथा अनेक प्रकार के कन्द-मूल भी खाने के लिए काम में लाये जाते हैं। रोटी को तेल से चुपड़ते हैं। सब्जियों में कद्दू, ककड़ी, चने की पत्तियाँ, रतालू, इमली तथा आम मुख्य होते हैं। बाँस की कॉपल कुकरमुत्ता, प्याज, लहसुन, मिर्च आदि का भी उपयोग किया जाता है। चावल, उबली हुई दाल और मसाले मुख्यतः उत्सवों व दावतों के अवसर पर ही अधिक काम में लेते हैं। कन्द-मूल और लाल चीटियाँ इनके प्रिय खाद्य पदार्थ हैं।

          मैदानी क्षेत्रों में शिकार से प्राप्त सुअर, गाय, बकरी, बतख, कुत्ते, हिरण, मगरमच्छ, साँप, कबूतर आदि का माँस बड़े शौक से खाया जाता है। ये लोग चूहे, गोह, गिलहरी का माँस भी खाते हैं। जिन क्षेत्रों में मछलियाँ मिल जाती हैं, वहाँ मछलियाँ भी खायी जाती हैं। ये लोग भोजन में कन्द-मूल, पशु-पक्षी, सभी का उपयोग करते हैं। इनमें मद्यपान का प्रचलन अधिक है। विवाह और उत्सवों के अवसर पर विशेष रूप से शराब पी जाती है।

             महुआ के फूलों से मंडिया, ताड़ और खजूर के रस से ताड़ी (Toddy) और चावल से लोंगा शराब का प्रचलन अधिक है। गाँजा, भाँग, तम्बाकू, पान, सुपारी खाने का भी काफ रिवाज है। तम्बाकू मिट्टी या पत्तों से बनी चिलम से पी जाती है। गाय, भैंस और बकरी का दूध भी पिया जाता है। वनों से प्राप्त शहद का भी प्रयोग करते हैं।

वस्त्राभूषण:-

        आरम्भ में गोंड लोग या तो पूर्णतः नंगे रहते थे अथवा पत्तियों से अपने शरीर को ढँक लेते थे। अब वे वस्त्रों का प्रयोग करने लगे हैं किन्तु वस्त्र कम ही होते हैं। अधिकांश पुरुष लंगोटी से अपने गुप्तांगों एवं जांघों को ढँक लेते हैं। कभी-कभी सिर पर एक अंगोछे प्रकार का कपड़ा भी बाँध लेते हैं। कुछ लोग पेट और कमर ढँकने के लिए अलग से पिछ लपेट लेते हैं। स्त्रियाँ धोती पहनती हैं जिससे शरीर के ऊपर और नीचे का भाग ढँक जाता। ये चोली नहीं पहनतीं छातियाँ खुली रहती हैं। 7-8 वर्ष तक के बालक नंगे रहते हैं तथा 5-6 साल की लड़कियाँ लंगोटी बाँधे रहती हैं। वर्षा से बचाव के लिए बरसाती कोट और टोप भी उपयोग किया जाता है जो पतियों और बाँस की खपच्चियों का बना होता है।

                सर्दियों में शरीर को ढँकने के लिए ऊनी कम्बल काम में लाया जाता है। अपने शरीर को सजाने के लिए राख तथा रंगों से इसे पोत लेते हैं। अनेक प्रकार के पशुओं और बतखों के पंखों को सिर पर लगा लेते हैं। पुरुषों के बाल लम्बे होते हैं। बैलों के सींगों से भी सिर को सजाया जाता है। पुरूष गले में सफेद या लाल मोतियों की माला और कानों में बालियाँ पहनते हैं तथा बालों में कंघी खोंसे रहते हैं। स्त्रियाँ अपने चेहरे, जाँघों तथा हाथों पर गोदने गुदवाती हैं। ये नकली बालों के जूड़े में फूल लगाती हैं तथा उसमें सीगों की कंघियाँ अनिवार्य रूप से लगाती हैं। कमर में पीतल की छोटी-छोटी घण्टियों वाली कमरधनी पहनी जाती है, कानों में बालियाँ पहनी जाती हैं। हाथों में काँच की चूड़ियाँ या चाँदी के दस्तबन्द पहने जाते हैं।

           उत्सव अथवा पर्व के समय स्त्री-पुरुष आकर्षक रूप से अपने शरीर को प्राकृतिक वस्तुओं द्वारा सजाते हैं। नृत्य के समय विशेष प्रकार की पोशाक पहनी जाती हैं। ढोल, नगाड़े, बाँसुरी इनके प्रमुख वाद्य यंत्र होते हैं।

आर्थिक क्रियाकलाप:-

            गोंडों का प्राचीन व्यवसाय शिकार करना और मछली मारना था किन्तु अब पशुओं के शिकार पर रोक लगा दिये जाने से चोरी-छिपे शिकार किया जाता है। पहले चीतों, जंगली भैसों, हिरणों और चिड़ियों का शिकार अधिक किया जाता था, अब प्रायः हिरणों, खरगोशों और जंगली भैसों का ही शिकार अधिक किया जाता है। सामान्यतः शिकार के लिए विष बुझे तीरों का प्रयोग किया जाता है, केवल खरगोश आदि के लिए जालों और फन्दों का उपयोग किया जाता है। गोंडों को जंगली पशु-पक्षियों के विभिन्न रूपों और आदतों का पूरा ज्ञान होता है। अतः उन्हें शिकार में पूरी सफलता मिलती है। स्त्रियाँ शिकार को शोर-गुल मचाकर नदियों की घाटियों में खदेड़ लाने का काम करती हैं।

           अन्य बड़े जंगली पशुओं को फँसाने के लिए कई तरकीबें की जाती हैं। खेतों के चारों ओर बाँस का घेरा खींच दिया जाता है और एक स्थान पर मुख्य द्वार छोड़ देते हैं और दूसरे स्थान पर सँकरा रास्ता जिसके सामने एक लम्बा गड्ढ़ा खोदकर उसे टहनियों, पत्तियों, घास-फूस से पाटकर उस पर बालू मिट्टी डाल देते हैं। रात्रि में जब पशु खेत में घुस जाता है तो रक्षा करते हुए खेत का मालिक चिलाता है जिससे पशु घबड़ाकर सँकरे मार्ग की ओर भागता है और वहाँ बने गढ्ढे में गिर जाता है। चूहों और बन्दरों को भी मारा जाता है।

          मछलियाँ सामान्यतः तालाबों और नदियों में मुख्यतः मारिया गोंड़ों द्वारा टोकरियों, जाल और बाँसों के सहारे पकड़ी जाती हैं। मछली पकड़ने का कार्य सभी वयस्कों द्वारा व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से किया जाता है। अनेक बार नदियों के जल को जहरीला कर दिया जाता है जिससे मछलियाँ मर जाती हैं और स्त्रियाँ उन्हें निकाल लेती हैं।

            वनों से जंगली कन्द-मूल, फल, गाँठदार सब्जियाँ, जड़ी-बूटियाँ, शहद, फूल-पत्तियाँ, गूलर, महुआ, सेमल की रूई, चिरौंजी, कचनार, अमलतास, हारसिंगार, खजूर, ताड़ के फल, लाख, इमली, जामुन, साबूदाना एकत्रित कर उसे निकटवर्ती बाजारों में बेच दिया जाता है। इन्हें खाया भी जाता है। वनों से पशुओं की खालें भी एकत्रित की जाती हैं। गोंड लोग दूध के लिए गाय, भैंस, बकरी, बोझा ढोने के लिए बैल तथा माँस के लिए सुअर, बतखें और कबूतर भी पालते हैं।

      अब अधिकांश गोंड़ खेती भी करते हैं जिसे स्थानान्तरित कृषि कहा जाता है। इस प्रकार की खेती में वृक्षों अथवा झाड़ियों को काटकर जला दिया जाता है, फिर 2-3 वर्ष उस पर खेती करने के बाद अन्यत्र दूसरे खेत तैयार किये जाते हैं। इस प्रकार की कृषि को डिप्पा (Dippa) या परका (Parka) कहा जाता है। परका कृषि में वृक्ष जलाये जाते हैं, जबकि डिप्पा में झाड़ियाँ। इस प्रकार की कृषि में फावड़े से खोदकर बीज बोया जाता है। बीज बो देने पर वन देवी एवं देवताओं को अच्छी फसल की प्राप्ति हेतु पशुओं की बलि चढ़ायी जाती है।

         जब पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा आकार के खेत बनाकर कृषि की जाती है तो उसे पेंडा कृषि कहते हैं। यह सामान्यत: बस्तर में की जाती है। इसमें खेत बिना जोते ही बोये जाते हैं। दो-चार फसलें लेने के उपरान्त खेत खुले छोड़ दिये जाते हैं जिससे उन पर जब पुनः घास-फूस उग आती  है तो उसे जला दिया जाता है। ढाल के निचले भागों की ओर लट्ठों या मिट्टी-पत्थर की मेंड़ बनाकर मिट्टी रोकी जाती है।

          स्थानान्तरण खेती आज भी मांडला के वैगाचाक, बस्तर के अबूझमाड़, सरगुजा, बिलासपुर और रायगढ़ के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में की जाती है। खेती करने के ढंग पुराने हैं। लोहे के कुदाली और कुल्हाड़ी ही उनके औजार होते हैं। खाद, अच्छे बीज और सिंचाई की सुविधा न होने से उत्पादन कम होता है।

        खेती सामान्यतः घरों के पास ही की जाती है। खेती में स्त्री-पुरुष सभी का सहयोग मिलता है। अनाज मांडने, उड़ाने और साफ करने का कार्य पुरूष और लड़के करते हैं। स्त्रियाँ खेतों को तैयार करने का कार्य करती हैं। खेती हेर-फेर के साथ भी की जाती है। यह क्रम इस प्रकार होता है-मोटे अनाज, मक्का, दाल और फलियाँ। घर के निकट कुछ ऊँची सामने वाली भूमि पर बाड़ियाँ होती हैं जिसमें पशुओं के गोबर तथा विष्टा का खाद देकर उसमें तम्बाकू, ककड़ी, चना, कद्दू आदि सब्जियाँ पैदा की जाती हैं।

           खेती के अतिरिक्त गोंड लोग निर्माण कार्यों में मजदूरी, लकड़ी काटने, ग्वाले, कुम्हार, बढ़ई, लुहार, पालकियाँ उठाने तथा अन्य प्रकार के कार्य करते हैं। कुछ गोंड स्त्रियाँ टोकरियाँ और रस्सियाँ बनाती हैं। ये अन्य घरेलू काम भी करती हैं।

सामाजिक व्यवस्था:-

            गोंड लोग अनेक छोटे-छोटे समूहों में विभक्त होते हैं। समूहों का वर्गीकरण सामान्यतः उस क्षेत्र के नाम पर होता है जिसमें गोंड लोग रहते हैं। बस्तर जिले में इन्हें मुरिया या मारिया कहते हैं। मुरिया तीन विभागों में बाँटें गये हैं- जगदलपुर मुरिया, झोरिया मुरिया और घोटुल मुरिया।

         मुरिया(मारिया) लोगों के दो उप-विभाग हैं- पहाड़ी मारिया (Hill Marias) तथा सॉंग लगाने वाले मारिया (Bisan Horn Marias)। मण्डला जिले में गोंडों के चार उप-विभाग पाये जाते है-देव गोंड, राज गोंड, सूर्ववंशी देवगाड़िया गोंड और रावणवंशी गोंड। अन्तिम प्रकार के गोंडों का समाज व्यवस्था में सबसे निम्न स्थान होता है, जबकि अन्य तीन अपने को क्षत्रियों के समवर्ती मानते हैं।

        झारखण्ड में तीन उप-विभाग हैं-राजगोंड, जो उच्च वर्ग की श्रेणी में आते हैं; धूरगोंड, जो कृषक श्रेणी अथवा सामान्य श्रेणी के होते हैं और कमिया जो श्रमिक श्रेणी के होते हैं।

       राजगोंडों के अन्तर्गत मालगुजार, पटेल और गाँव की भूमि के स्वामी, गाँव का प्रधान मण्डल आते हैं। कृषक वर्ग पहले वर्ग से भूमि किराये या लगान पर लेकर खेती करता है, तीसरे वर्ग में श्रमिक आते हैं, इसमें ओझा, बैगा, गुनिया, लोहार आदि आते हैं जो विभिन्न वर्गों की सेवा करते हैं।

गोत्र:-

       अधिकांश गोंड गोत्र पर आधारित होते हैं जो बहिर्विवाही हैं अर्थात् ये लोग अपने मित्र समूह के बाहर ही विवाह करते हैं। गोंडों के गोत्र पशुओं अथवा वृक्षों के नाम पर होते हैं। उदाहरणार्थ, तुमरीहावीका गोत्र तेंदू के वृक्ष से, टीकम गोत्र टीकम वृक्ष से, नाग से सम्बन्धित नागवान, बकरी से सम्बन्धित किटीमरबी, सुअर से सम्बन्धित पडीमरबी।

        गोत्र का निर्धारण पिता के गोत्र से होता है। एक गोत्र के समस्त सदस्यों में एक सम्बन्ध माना जाता है तथा पारस्परिक विवाह निषिद्ध होता है। प्रायः एक गाँव में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं।

          गोंडों में संयुक्त परिवार और वैयक्तिक परिवार दोनों ही प्रथाएँ मिलती हैं। संयुक्त परिवार को भाईबन्द कहा जाता है। एक भाईबन्द में पति पत्नी, उनके अवयस्क लड़के-लड़कियाँ, विवाहित पुत्र एवं उनकी पत्नियाँ और बच्चे होते हैं। ये सब मिलकर एक सामाजिक और आर्थिक इकाई बनाते हैं। कृषि, शिकार, गृहनिर्माण आदि कार्यों में सभी सदस्य सामूहिक रूप से काम करते हैं। इनका मुखिया सरदार कहलाता है। इसके निर्देशानुसार सारी क्रियाएँ की जाती हैं और इसी का पारिवारिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

        इस परिवार की सम्पत्ति संयुक्त सम्पत्ति मानी जाती है। वैयक्तिक परिवार में पति, पत्नी और उनके अवयस्क पुत्र-पुत्रियाँ सम्मिलित होते हैं। परिवार पितृसतात्मक होती है। स्त्री-पुरुष का कार्य विभाजन स्पष्ट होता है। स्त्रियाँ घरेलू कार्य (सफाई झांडू-पोंछा, भोजन बनाना, पशुओं की देखभाल करना), कृषि कार्यों में सहयोग देना तथा वन से लकड़ियाँ और अन्य वस्तुएँ एकत्रित कर लाने का काम करती हैं। पुरुष खेती, शिकार, व्यापार आदि करने का कार्य करते हैं।

विवाह:-

         गोंडों में विवाह पद्धति विकसित अवस्था में पायी जाती है। बाल-विवाह प्रायः नहीं होते। जब तक लड़की रजस्वला न हो और जब तक उसने यौन-क्रियाओं का आनन्द न लिया हो, सामान्यतः विवाह नहीं किया जाता। लड़का 24-25 वर्ष की उम्र में विवाह करता है। जीवन-साथी का चुनाव वयस्क लड़के-लड़कियाँ स्वयं करते हैं। सामान्यतः एक विवाह की प्रथा प्रचलित है किन्तु सम्पन्न गोंड एक से अधिक पत्नियाँ रख सकते हैं। बहु-पत्नी प्रथा बाँझपन से छुटकारा पाने के लिए, यौन शक्ति का अतिरिक्त आनन्द उठाने के लिए तथा सम्पन्नता और सामाजिक श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए प्रचलित है।

        गोंडों में मामा, बुआ की लड़की से विवाह करना (Cross-cousin marriage) सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ऐसे विवाह को ‘दूध लौटाना’ कहते हैं। यदि किसी कारणवश ऐसा न हो तो दोषी पक्ष को हर्जाना देना पड़ता है जिसे ‘दूध बुँदा’ कहा जाता है। विवाह की दूसरी प्रथा पारस्परिक सम्पत्ति द्वारा विवाह करने की है जिसमें लड़की अपनी पसन्द के लड़के पर कुछ व्यक्तियों की मौजूदगी में हल्दी घोलकर डाल देती है और तब लड़का उसे घर ले जाकर बिरादरी को भोज दे देता है। जिससे विवाह वैध हो जाता है। विवाह की तीसरी प्रथा सेवा द्वारा पत्नी प्राप्त करने (लमसेना, लमना) की होती है जिसमें लड़का, लड़की के पिता के यहाँ 5 वर्षों तक खेती-बाड़ी और घर का काम करता है। इसके बाद दोनों का विवाह हो जाता है।

             कभी-कभी लड़का अपने साथियों के साथ, अवसर पाकर लड़की को उसके गाँव से भगा लाता है और वह उस पर हल्दी का पानी घोलकर डाल देता है जिससे लड़की उसकी पत्नी बन जाती है। बाद में अन्य रस्में लड़के के दरवाजे पर पूरी की जाती हैं। एक अन्य पद्धति में लड़की अपने पसन्द के लड़के के घर में जा बैठती है, विशेषतः जब वह उससे गर्भवती हो जाती है।

             इस प्रकार गोंडों के विवाह में इतनी विभिन्नता और लचीलापन पाया जाता है कि यह कहना प्रायः कठिन होता है कि कौन-सा विवाह नियमित और कौन-सा अनियमित और अस्वीकृत है। सभी प्रकार के विवाह के रूप यौन क्रियाओं के बाद पूरे हो जाते हैं और बिरादरी को दावत देकर स्त्री-पुरूष के सभी प्रकार के यौन सम्बन्धों को वैध बना दिया जाता है। विवाह की क्रियाओं में खम्भे के चारों ओर घूमना, लड़के-लड़की पर हल्दी का पानी डालना, तेल लगाना, नाच-गाना, मदिरापान करना मुख्य होते हैं।

          पति या पत्नी दोनों में कोई भी विवाह विच्छेद कर सकता है किन्तु सामान्यतः तलाक बहुत ही कम होते हैं। चरित्रहीनता, झगड़ालूपन, यौन व्याधियाँ आदि तलाक के मुख्य कारण होते हैं। तलाक में गाँव पंचायत के समक्ष यदि पत्नी तलाक देती है तो नये पति को उसके पूर्व पति को पर्याप्त हर्जाना तथा बिरादरी को भोज देना पड़ता है। एक वर्ष बाद विधवा दूसरा विवाह कर सकती है। प्रायः बड़े भाई की विधवा पत्नी का विवाह छोटे भाई के साथ ही होता है किन्तु यदि विधवा किसी अन्य पुरुष को चाहे तो उस पर हल्दी और तेल लगा देती है और पुरूष उसे माला पहना देता है या अँगूठी अथवा चूड़ियाँ किन्तु उस पुरुष को बिरादरी को भोज देना आवश्यक होता है।

ग्रामीण संस्थाएँ:-

          प्रत्येक गाँव में एक पंचायत अथवा अनेक गाँवों को मिलाकर (एक पंचायत) होती है जिसके प्रमुख को मण्डल पटेल या मुकद्दम कहते हैं। पंचायत का कार्य गाँव की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना, समस्याओं और विवादों को सुलझाना है। पंचायत के अन्य पदाधिकारी प्रमुख पुजारी (भूमा-गैत), जाति के पुजारी (वदाई) और गुनिया या वैध होते हैं। पुजारी का काम धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करना होता है। गुनिया जड़ी-बूटियों से गाँव के लोगों की चिकित्सा करता है तथा झाड़-फूंक द्वारा भूत-प्रेत सम्बन्धी व्याधियों को दूर करता है।

नोट:

निवास क्षेत्र (Residential area)

वातावरण सम्बन्धी परिस्थितियाँ (Environmental conditions)

शारीरिक गठन (Physical structure)

बस्तियाँ और घर (Settlements and houses)

भोजन (Food)

वस्त्राभूषण (Clothes and ornaments)

आर्थिक क्रियाकलाप (Economic activities)

सामाजिक व्यवस्था (Social system)

गोत्र (Clan)

विवाह (Marriage)

ग्रामीण संस्थाएँ (Rural institutions)

प्रश्न प्रारूप @

1. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलापों पर प्रकाश डालें।

अथवा गोंड के अधिवास, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषताओं की विवेचना कीजिए।


Read More:

9. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक-आर्थिक अध्ययन

9. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक-आर्थिक अध्ययन



एस्किमों के निवास तथा सामाजिक-आर्थिक अध्ययन

एस्किमों के निवास

                 70° या 80º के उत्तरी अक्षांश के निकट एस्किमो लोगों का निवास स्थान है। अति शीतल जलवायु का प्रभाव इनके जीवन पर प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ता है। प्रकृति की इन कठिन परिस्थितियों में रहकर जीवन निर्वाह करने वाले मानव की कल्पना भी करना कठिन कार्य होगा। यहाँ मनुष्य ने प्रकृति की प्रतिकूलता पर विजय पाने में कमाल कर दिखाया है।

                  सैकड़ों वर्षों से ऐसे जगह एस्किमों इतनी कठोर जलवायु के प्रदेश में रहते चले आ रहे हैं। जहाँ भूमि लगभग वर्ष भर बर्फ से ढँकी रहती है। शरद ऋतु में यह बर्फ अधिक मोटी और कठोर हो जाती है। जनवरी मास का औसत तापमान -45 सेन्टीग्रड होता है। ग्रीष्म ऋतु बहुत छोटी होती है। इस ऋतु में दिन का ताप कभी-कभी 10° सेन्टीग्रेड तक पहुँच जाता है। यहाँ मिट्टी की परत बहुत पतली है और यह भी सदैव बर्फ से ढकी रहती है।

शारीरिक बनावट:-

            एस्किमो नाम से अभिप्राय कच्चा माँस खाने वाले व्यक्ति से है। यह  नाम अमरीकन इण्डियों द्वारा दिया गया था। एस्किमो अपने आपको ‘इनुइत’ अर्थात् ‘मानव’ कहते हैं। सम्भवतः ये लोग संसार के अन्य निवासियों को मानव नहीं अपितु किसी अन्य वर्ग के जीव समझते हैं।

           एस्किमो कुछ भूरे एवं पीले रंग के होते हैं। इनका चेहरा गोल और चौड़ा होता है। किन्तु शरीर का डौल सुन्दर नहीं होता। इनका कद मध्यम होता है। शरीर मजबूत और गोश्तदार होता है। शरीर के ऊपरी भाग की अपेक्षा कमर से नीचे का भाग दुर्बल होता है। ये लोग संसार में अपनी प्रसन्नचित मुद्रा के लिए विख्यात हैं। ये लोग भूखे रह सकते हैं किन्तु बिना मुस्कराए नहीं रह सकते। यह प्रसन्नता एस्किमो के आन्तरिक सुख की सूचक है।

निवास क्षेत्र:-

          एस्किमों का निवास-क्षेत्र ग्रीनलैण्ड, बेफिन द्वीप के चारों ओर तथा कनाडा के उत्तरी भाग में मुख्यतः पाया जाता है। यह क्षेत्र लगभग 5000 किलोमीटर लम्बा है। एस्किमो की संख्या इतने विस्तृत क्षेत्र में केवल 30,000 के लगभग है। प्रकृति की क्रूरता इन लोगों को यहाँ से भगा न सकी, किन्तु ये लोग प्रकृति का सामना करते हुए अधिकाधिक बल प्राप्त कर रहें हैं। एस्किमो ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य कठोरतम वातावरण में भी अपने आपको उसके अनुकूल बना सकता है।

           इन लोगों के लिये यदि कोई कठिन कार्य है तो वह कठोर वातावरण से बाहर निकलना। विश्व के अन्य आदिवासी की भाँति इन लोगों के लिए भी सभ्य लोगों का सम्पर्क घातक सिद्ध हुआ। जिस जाति को ध्रुवीय आंधियों और कठोर शीत और भोजन की कमी विचलित न कर सकी उसे सभ्य समाज के सम्पर्क द्वारा हानि का भय प्रतीत हुआ।

         सभ्य लोगों को पहुँच के बाहर सुरक्षित निवास प्राप्त करके ही ये लोग अपने आपको बचा पाये हैं। एस्किमो जिस क्षेत्र में रहते हैं वहीं चारों ओर बर्फ ही बर्फ दिखाई पड़ती है। पेड़-पौधे कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते। कोहरा, धुन्ध और अन्धकार सदैव छाया रहता है। सूर्य के दक्षिण की ओर पलायन कर जाने के पश्चात् यह महीनों तक दिखलाई नहीं पड़ता। शीतकाल में शरीर को चुभती हुई असह्य बर्फीली आंधियाँ बहुत तीव्रगति से चलती हैं।

जीव-जन्तु:-

          यहाँ के बर्फीले वातावरण में श्वेत भालू, रेण्डियर, समूर वाले विभिन्न पशु पाये जाते हैं। समुद्र में बर्फ की तह के नीचे मछलियाँ पाई जाती हैं जैसे- वालरस, ह्वेल, सील, वेलुगा आदि। स्थल पर आर्कटिक खरगोश, कैरिबा, मुस्क और चिड़ियाँ प्राप्त होती है जिनसे भोजन प्राप्त होता है। जीव-जन्तुओं से न केवल खाने के लिये माँस किन्तु चमड़ा और खालें भी प्राप्त होती हैं जिनका प्रयोग वस्त्रों के रूप में किया जाता है।

वस्त्र:-

      आखेट की क्रिया इस प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु में अधिक की जाती है। इसलिये एस्किमो इस ऋतु में आखेट से प्राप्त खालों द्वारा वस्त्र तैयार करते हैं। एस्किमो के वस्त्र उनकी कुशल कारीगरी को प्रदर्शित करते हैं। इनके वस्त्र बहुत ही अच्छे कटे तथा सिले होते हैं। जल और आर्द्रता से बचाव के लिये ‘वाटर प्रूफ’ वस्त्रों को तैयार किया जाता है। इनको बनाने का कार्य स्त्रियाँ करती हैं। सील, कैरिबो की खाल सील की खाल से हल्की और गर्म होती है। उत्तरी ग्रीनलैंड में कैरिबो नहीं प्राप्त होता। यहाँ ध्रुवीय भालू के रूएँ से वस्त्र बनाये जाते हैं।

            एस्किमो स्त्री-पुरुषों का पहनावा लगभग समान होता है। पुरुषों की बाहदार जर्सी को ‘तिमियार’ कहा जाता है। सिर पर एक प्रकार की टोपी पहनी जाती है। कालर और बांहों के किनारों पर कुत्ते की बालदार खाल लगी होती है। तिमियार के ऊपर एक और वस्त्र भी पहनते हैं जिसे ‘अनोराक’ कहा जाता है।

             पैरों को ढंकने के लिये ये लोग ऊनी पाजामा या सील की खाल पहनते हैं। जूते भी सील की खाल के बनाए जाते हैं जिन्हें ‘कामिर’ कहते हैं। यह जूते दोहरे बनाये जाते हैं ताकि इनमें पानी न जा सके। स्त्रियों और पुरुषों की पोशाक अवश्य एक सी होती है किन्तु स्त्रियों की पोशाक में कुछ सजावट कार्य अधिक होता है। स्त्रियों के वस्त्र रेशमी पट्टियों और रंगीन मनकों से सजाए हुए होते हैं। माताएँ एक प्रकार का वस्त्र ओढ़ती है जिसे ‘अमाउत’ कहते हैं। पीठ की ओर इनमें एक बड़ा थैला होता है जिसमें यह अपने बच्चे को रखकर काम काज करती है।

गृह:-

           जलवायु का प्रतिकूल होना, कृषि के लिए मिट्टी का अभाव और लकड़ी न प्राप्त होना एस्किमो लोगों के स्थायी गृहों के निर्माण में बहुत बाधा पहुँचाता है। इसलिए अधिकांश लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को भ्रमण किया करते हैं। स्थानान्तरण इन लोगों को अपने शिकार की तलाश में भी करना पड़ता है अथवा जब एक स्थान पर शिकार की कमी पड़ जाती है।

             एस्किमों का जीवन भौगोलिक वातावरण द्वारा पूर्णतया सीमित है। अपने गृह निर्माण के लिए इन लोगों को लकड़ी तथा अन्य उपयुक्त पदार्थ प्राप्त नहीं होते। समुद्र की लहरों द्वारा बहकर आई लकड़ी तथा स्थानीय पत्थर का ये लोग गृहनिर्माण में प्रयोग करते हैं। पशुओं की हड्डी तथा चमड़े का भी प्रयोग गृह-निर्माण में किया जाता है।

             जाड़े की भयानक ऋतु से बचाव के लिये बड़े-बड़े गुम्बजनुमा घर बनाए जाते हैं जिन्हें ‘इग्लू’ कहते हैं। बर्फ की शिलाएं काटकर इन्हें ईंटों के पत्थरों की तरह एक-दूसरे पर रखकर गुम्बज जैसी आकृति की एक गुफा बना ली जाती है। मकान में एक ही बड़ा कमरा होता है। कमरे में लोग बर्फ की शिलाओं पर ही खालों की कई परतें बिछाकर सोते व उठते-बैठते हैं। इग्लू में से निकलने तथा घुसने के लिए एक ही लम्बा सुरंग जैसा ढकाँ हुआ मार्ग होता है।

               इग्लू में प्रकाश तथा गर्मी के लिए दिन-रात चर्बी के दिये जलाये जाते हैं। सील की चर्बी का एक टुकड़ा जिसे ‘ब्लवर’ कहते हैं, दीपक की शिखा के ऊपर लटका दिया जाता है ताकि पिघलकर लटकी हुई चर्बी दीपक की शिखा को प्रज्ज्वलित करती रहे। दीपक का पात्र पत्थर से बनाया जाता है।

औजार:-

         शरद ऋतु में एस्किमो बर्फ के ऊपर और ग्रीष्म ऋतु में टुन्ड्रा की चिकनी काई के ऊपर अपनी स्लेज नामक गाड़ी और कुत्ते को साथ लेकर चलते हैं। स्लेज गाड़ी या तो व्हेल मछली की हड्डी की बनायी जाती है या जहाँ लकड़ी पायी जाती है वहाँ उसके निर्माण में लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इस गाड़ी को कुते खींचते हैं जो कि बहुत मजबूत होते हैं।

           ग्रीष्मकाल में जब ये लोग नदियों, झीलों और तटीय जल की ओर मुड़ते हैं उस समय कयाक नामक गाड़ी का उपयोग करते हैं। व्हेल मछली की हड्डी या लकड़ी के बने ढाँचों को जो लम्बी संकरी नाव के समान होते हैं, सील मछली के चमड़े से बने तांतों द्वारा बांधा जाता है, जो कि ढक्कन का कार्य करता है।

व्यवसाय:-

         शीतकाल के होते-होते एस्किमो परिवार तट के समीप एकत्र होने लगते हैं। यहाँ ये लोग मार्च-अप्रैल तक रहते हैं ये लोग तट के निकट सील मछली को पालते हैं। तैरते हुये बर्फ के टुकड़ों में ये लोग छिद्र बना देते हैं जिसके द्वारा सील मछली सांस लेती है। जब यह छिद्र बर्फ की पतली पर्त से ढँक जाती है तो इनके कुत्ते सूँघते हुये यहाँ पहुँचकर इसे खुरच देते हैं।

      एस्किमी शिकारी सील मछली के आने की आहट पाकर अपने हारयून से उसके मुख को काट देता है और इस प्रकार आखेट करता है। इस प्रकार के आखेट को एस्किमो ‘माउपाक’ कहते हैं। सील मछली के माँस को खाया जाता है, साथ ही साथ इसकी चर्बी को जलाकर शीतकाल में मकानों को गर्म करते हैं एवं रोशनी भी प्राप्त करते हैं।

        ग्रीष्मकाल में बेरी, कन्दमूल तथा अन्य प्रकार की वनस्पति उपयोग के लिये स्त्रियाँ एकत्रित करती हैं। ग्रीष्म ऋतु के अन्त में एस्किमो पुनः तटवर्ती भागों में आ जाते हैं। मार्च के आते-आते जब दिन बड़े होने लगते हैं तो एस्किमो परिवार सील मछली के आखेट के लिये निकल पड़ते हैं। जब सील मछली साँस लेने के लिये अपने छिद्र से बाहर आकर धूप लेने लगती हैं तो उसका शिकार बहुत ही आसानी से किया जाता है। एस्किमी शिकारी अपनी स्लेज गाड़ी और अपनी पार्टी को छोड़कर एवं शिकारी कुत्ते के साथ आगे बढ़ता है और सील मछली के झुण्डों का शिकार करता है।

          ग्रीष्म ऋतु के मध्य जब बर्फ पिघलती है और नाना प्रकार की वनस्पतियाँ उगने लगती है उस समय वहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय जंगली जानवरों का शिकार होता है। जब ये प्रदेश के भीतर की ओर अग्रसर होते हैं तो कैरिबाऊ के बड़े-बड़े झुण्डों और रेण्डियर के झुण्डों को ढूँढते हुये आगे बढ़ते हैं। कभी-कभी एस्किमो इन शिकारों की तलाश में 300-300 किमी० तक दक्षिणी प्रदेश की ओर बढ़ जाते हैं। कैरिबाऊ और रेन्डियर के अतिरिक्त गीदड़ एवं खरगोश भी जालों द्वारा पकड़े जाते हैं। वैसे मछली पकड़ना ही यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है। सामन एवं ट्राउन मछलियाँ विशेष रूप से पकड़ी जाती है।

भोजन एवं शिकार:-

             एस्किमी का भोजन सील, ह्वेल, बालरस आदि जल जीव हैं। इनको ये लोग शिकार करके प्राप्त करते हैं। कैरिबो नामक बारहसिंगा का भी शिकार किया जाता है। काफी मांस तो एस्किमो लोग कच्चा ही खा जाते हैं। कभी-कभी मांस को उबालकर तथा सुखाकर खाते हैं। समुद्री वनस्पति भी खाये जाते हैं।

              भोजन की अधिक तंगी के समय तम्बुओं की खाल के टुकड़े उबाल कर शोरधा पी जाते हैं। एस्किमो के भोजन का निश्चित समय नहीं होता है। जब भी इन्हें भूख लगती है तभी खाने बैठ जाते हैं। एस्किमी का उत्तम भोजन समुद्री जीवों पर निर्भर होता है। इसलिये ये लोग आखेट की खोज में समुद्रतट पर जाते हैं। आर्कटिक सागर में आखेट ग्रीष्म ऋतु में किया जाता है। सागर में कायक (Kayak) नामक नौकाओं का प्रयोग आखेट के लिए किया जाता है।

               शीत ऋतु में कुत्ता या बारहसिंगा द्वारा खींची जाने वाली स्लेज गाड़ी पर ये बर्फीले भागों में आखेट की खोज करते हैं। कायक नाव का प्रयोग केवल शिकार के लिए होता है। इस पर पुरुष ही बैठते हैं बाकी लोग साधारण नावों पर ही चढ़े होते हैं। नावें समुद्रों में पाई गई लकड़ी से बनाई जाती हैं। इनके ऊपर खाल मढ़ी होती है जिससे इनके अन्दर पानी न घुसे।

            आखेट के लिए हार्पून (Harpoon) या बर्छी का प्रयोग करते हैं। ये शस्त्र सील व अन्य पशुओं की हड्डियों से बने होते हैं। सागरों में प्रयोग करने के लिए एस्किमों के शस्त्र ऐसे होते हैं कि पानी पर दूर फेंके जाने पर शिकार के साथ खो न जाएँ। हथियारों में डोरी बँधी होती है। उसके एक छोर पर पशु की खाल की हवा भरी तुम्बी बँधी होती है ताकि वह पानी पर तैरती रहे और हथियार डूब न सके।

             भोजन एकत्रित करने का कार्य पुरुषों द्वारा होता है। घर और बच्चों की देखभाल स्त्रियाँ करती हैं। शिकार को काटना व बनाना भी स्त्रियों द्वारा होता है। खाल तैयार करना, सुखाना, चमड़े की पोशाक बनाना और झोपड़ी बनाने का कार्य स्त्रियाँ ही करती हैं।

           पुरुष तो सुबह होते ही आखेट की खोज में घर से बाहर चल देते हैं। कौन-सा आखेट कहाँ मिलता है इसका एस्किमो को बहुत ज्ञान होता है। वे लोग अपने शिकार को बाँट कर खाते हैं। कुछ अस्त्र और वस्त्रों को छोड़कर एस्किमो की अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होती। ये लोग अतिथि सत्कार बहुत करते हैं।

           सील मछली का आखेट और उसका भोजन एस्किमो लोगों को बहुत रुचिकर होता है। ये लोग बर्फ में छेद बना देते हैं जिनके द्वारा सील मछली श्वास लेने आती है। जब यह छेद पतली बर्फ से ढक जाता है तो एस्किमो का कुत्ता इसे सूंघ कर ढूँढ़ लेता है और फिर खुरच कर छेद को खोल देता है। एस्किमो शिकारी सील मछली के आने की आहट पाकर अपने हार्पून से उसके मुँह को नाथ देता है और इस प्रकार आखेट पकड़ लिया जाता है। इस प्रकार के आखेट को एस्किमो लोग ‘मउपाक’ कहते हैं।

प्रश्न प्रारूप @

1. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक आर्थिक कार्यकलापों का वर्णन करें।

अथवा, एस्किमों के सामाजिक- सांस्कृतिक, निवास एवं आर्थिक पक्षों को प्रस्तुत कीजिए।

8. बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन

8. बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन



बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन

बुशमैन की शारीरिक

                    दक्षिणी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल के निवासी बुशमैन मरुस्थल में ही भ्रमण करने वाली एक खानाबदोश जनजाति है। इन लोगों को बुशमैन नाम से सम्बोधन हालैंड निवासियों ने 17वीं शताब्दी में किया था। उस समय यह लोग दक्षिणी-पश्चिमी संघ के उत्तरी-पश्चिमी भाग की बंजर भूमि में विस्तारपूर्वक फैल हुए थे। इनका विस्तार वास्तव में उत्तर तथा पूर्व में बसूटोलैंड, नैटाल और दक्षिण रोडेशिया तक था। इनका जीवन-निर्वाह आखेट पर पूर्णतया आधारित था।

              हालैंड वासियों ने इनके क्षेत्र पर आक्रमण करके इनको निश्चित भू-भागों में बसने के लिए बाध्य किया। इन प्रदेशों पर धीरे-धीरे अफ्रीका में अन्य लोगों का अधिकार हो गया। बांटू भाषा वाले नीत्री लोगों ने इन्हें पूर्वी तटीय प्रदेश, रोडेशिया, ट्रांसवाल और बेचुआनालैंड के मध्य पठारों से हटाया। दक्षिण-पश्चिम से होटेनटोट लोगों ने इन्हें उत्तर की ओर खदेड़ दिया। बांटू जाति की प्रगति एवं यूरोपीय निवासियों के आवास के कारण बुशमैन लोगों की संख्या बहुत कम रह गई है।

जलवायु:-

        यहाँ तापमान प्रायः ऊँचा रहा करता है। जनवरी का तापमान 30º से 32º सेंटीग्रेड तक रहता है। शीतकाल में तापमान 15° सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है। मरुस्थल होने के कारण यहाँ दैनिक तापमान में काफी अन्तर होता है। दिन के समय तापमान 45° सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है और रात्रि के समय तापमान गिरकर केवल 10° सेंटीग्रेड रह जाता है। इस प्रकार तापान्तर 30º सेंटीग्रेड या 35° सेंटीग्रेड देखा जाता है। यहाँ ग्रीष्मकाल का मौसम अधिक लम्बा होता है और शीतकाल का मौसम छोटा होता है। शीतकाल में रात्रि के समय ठण्ड इतनी अधिक पड़ती है जो कि बुशमैन को भी असह्ज होती है।

         इस क्षेत्र के उत्तरी किनारे पर स्थित गामी झील के निकट वर्षा लगभग 30 से०मी० होती है। दक्षिण में मोलामो नदी के निकट वर्षा होती है। साधारण वर्षा के फलस्वरूप यहाँ की कुछ भूमि वनस्पति से ढँक जाती है, जो कि पशुओं के लिए उत्तम चराने के स्थान होते हैं। कुछ चारागाहों में घास एक-एक मीटर से भी लम्बी होती है। वन यहाँ बिल्कुल नहीं पाये जाते हैं। दक्षिण में वनस्पति का बहुत अभाव है। यहाँ के निवासियों में मलेरिया और पेचिस की बीमारियाँ अधिक प्रचलित हैं। वर्षा की ऋतु छोटी होने के कारण यहाँ के लोगों को विभिन्न चरागाहों में प्रवास करना पड़ता है।

शारीरिक लक्षण:-

            बुशमैन देखने में नीग्रोइड जाति से मिलते-जुलते हैं किन्तु इनका जबड़ा उनके समान बाहर को निकला हुआ नहीं होता और न ही इनके होठ बाहर की ओर उलटे हुए होते हैं। इनकी आँखें चौड़ी होती हैं जो कि नीग्रो एवं नेग्रीटो के मुख्य लक्षण हैं। इनकी स्त्रियों की शारीरिक रचना में एक विशेषता होती है। इनके नितम्ब पर वसा होने की प्रवृति होती है। इस कारण इनके नितम्ब काफी मोटे और विकसित होते हैं। इन्हें आंग्ल भाषा में ‘स्टीटो पिगमी’ कहते है।

आखेट:-

        बुशमैन आखेट करने में बहुत निपुण होते हैं। इस प्रदेश में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के पशु पाये जाते हैं। गामी और औकाबांगो क्षेत्रों में वर्षा के पश्चात् कीचड़ हो जाती है तथा कहीं-कहीं जल पाया जाता है। इन आर्द्र भू-भागों के समीप बहुत से पौधे उग आते हैं जो कि पशुओं की भोजन पूर्ति करते हैं। शाकाहारी पशु एन्टीलोप, ब्लेसवाक, जेन्सबाक, जेब्रा, जिराफ आदि यहाँ भोजन की खोज में घूमते हैं। इन पशुओं पर आधारित मांसाहारी पशु मिलते हैं जैसे शेर, चीता, जंगली बिलाउ, लिंक्स, हैना, गीदड़ आदि।

             यहाँ हर प्रकार की दीमक पाई जाती है जिसे ‘बुशमैन का चावल’ कहा जाता है जो कि इन लोगों के भोजन का मुख्य अंग है। बुशमैन का यदि घायल शिकार किसी दूसरे क्षेत्र में पहुँच जाता है तो उसे यहाँ हिस्सा देना पड़ता है।

गृह एवं परिवार:-

            बुशमैन एक खानाबदोश जाति है। इसलिये इनके निवास स्थान स्थायी नहीं होते। इनके गृह झोपड़े होते हैं जो कि डेढ़ मीटर ऊँचे खम्भों पर तैयार किये जाते हैं। झोपड़ों का निर्माण स्त्रियाँ करती है। झोपड़ों की दीवारें घास की बनायी जाती हैं। फर्श पर भी घास के गद्दे बनाकर बिछाये जाते हैं। झोपड़ों के निर्माण की व्यवस्था गामी क्षेत्र के निकट उत्तम मिलती है। झोंपड़े का दरवाजा सुरक्षा के उद्देश्य से छोटा रखा जाता है। सर्दियों में मौसम से बचने के लिए बुशमैन गुफायें बनाकर रहते हैं। इन गुफाओं के ऊपर घास या चमड़े के छप्पर डालते हैं। गुफा के मुख के समीप रात्रि के समय आग जलती रहती है ताकि हिंसक पशुओं से सुरक्षा हो सके।

           बुशमैन सामाजिक टुकड़ियों अथवा दलों में रहते हैं जिसमें 20 से लेकर 100 व्यक्ति तक होते हैं। इनमें विवाह-सम्बन्ध एक अन्य टुकड़ी के मध्य होते हैं। बुशमैन उष्ण प्रदेश का प्राणी है, इसके उपर वातावरण का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है। ये लोग भोजन और जल के अभाव में कई दिनों तक बिना भोजन और जल के रह सकते हैं। पुरुष का मुख्य कार्य आखेट करना है जिससे इन लोगों को भोजन प्राप्त होता है। घूमते-फिरते समय पुरुष अपने साथ हथियार सदैव रखते हैं क्योंकि उसे शिकार की सदैव चिन्ता रहती है। स्त्रियाँ बोझा ढोने का कार्य करती हैं और बच्चों को पीठ पर लाद लेती हैं।

वस्त्र:-

          ये लोग वस्त्रों का बहुत कम प्रयोग करते हैं। वस्त्र पशुओं के चमड़े से बने होते हैं। पुरुष एक तिकोना लंगोट पहनते हैं स्त्रियाँ भी चमड़े के टुकड़ों को पहनती हैं जो कि कमर से लेकर पैर तक लटका रहता है। इनके सिर खुले रहते हैं। स्त्रियाँ चमड़े या छाल के जूतों का प्रयोग करती हैं। स्त्रियों के वस्त्र का मुख्य भाग एक चोगा होता है जिसे ‘कारोस’ कहा जाता है। यह चोगा वस्त्र एवं होल्ड दोनों के काम आता है। इस कारोस द्वारा स्त्रियाँ भोजन की सामग्री और नवजात शिशुओं को लपेटे रहती है। बुशमैन के कुछ दल चमड़े की टोपी और जूते भी पहनते हैं।

भोजन-संग्रह:-

         प्रायः सभी आदिवासियों की तरह बुशमैनों को भी अपना अधिकांश समय भोजन-संग्रह में ही लगाना पड़ता है। प्रत्येक परिवार को अपना भोजन स्वयं संग्रह करना पड़ता है। स्त्रियाँ कन्दमूल, मेढक, छिपकली, गोह और कछुवों आदि का संग्रह करती हैं। पुरुष बड़े पशुओं का शिकार करते हैं। इस कार्य के लिए उन्हें नित्य बाहर जाना पड़ता है। वे लोग या तो अकेले जाते हैं या कभी-कभी अपने सम्बन्धी अथवा पुत्र को साथ ले जाते हैं जिसे शिकार की शिक्षा देनी होती है।

               ये लोग शिकार में पालतू कुत्तों की भी सहायता लेते हैं। शिकार प्रायः तीर-कमान से किया जाता है। इनके तीर विष बुझे होते हैं। विष या तो साँपों की विषैली थैली से निकालते हैं या विषैले वृक्षों के रस से प्राप्त करते हैं। इसी विष में तीरों को डूबोकर उन्हें विषैला बनाते हैं, लेकिन यह विष इतना तीव्र नहीं होता है कि किसी पशु के बाण लगते ही वह तुरन्त मर जाय। इसका परिणाम यह होता है कि शिकार के घायल हो जाने के बाद बुशमैन को शिकार का मीलों पीछा करना पड़ता है।

           बुशमैनों में जो व्यक्ति खाद्य सामग्री के स्रोतों का पता लगा लेता है, उन पर उसका विशेषाधिकार हो जाता है। बुशमैनों के लिए पानी की समस्या प्रायः बनी रहती है। पानी लेने के लिए उन लोगों को डेरे से प्रायः मीलों दूर जाना पड़ता है। पानी लाने का कार्य प्रायः औरतें करती हैं।

 

बुशमैनों का शिल्प:

          बुशमैन शिल्प और कला-कौशल की दृष्टि से बहुत ही सामान्य स्तर पर होते हैं। उनके क्षेत्र में जो साधन उपलब्ध हैं, उनका भी वे समुचित उपयोग नहीं जानते हैं। उनके हथियार और औजार मुख्य रूप से लकड़ी के बने होते हैं। लकड़ी से धनुष, भाले, आग जलाने की अरणी बनाते हैं। घास की रस्सियाँ बनाना भी जानते हैं।

             जब पानी का अभाव हो जाता है और पानी जमीन से निकालना होता है, तो वे नर कुल की पीली नली के एक सिरे पर काफी घास बाँध देते हैं और इस घास वाले हिस्से को ऐसी जमीन में घुसा देते हैं, जहाँ पानी मिलने की सम्भावना होती है, जिससे नीची सतह का पानी घास में (फिल्टर) साफ होकर मुँह में आता है।

बुशमैनों का सामुदायिक संगठन-

            बुशमैन छोटे-छोटे सामाजिक समूहों में रहते हैं। प्रत्येक समूह में 20 से लेकर 100 तक व्यक्ति हो सकते हैं। ये लोग रक्त से सम्बन्धित होते हैं। एक समूह का अपना क्षेत्र निर्धारित होता है। इसी के अन्तर्गत वह अपना शिकार करता है। किसी समूह का व्यक्ति दूसरे समूह के क्षेत्र में शिकार करने नहीं जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति पहुँच जाता है, तो दूसरे समूह के व्यक्ति उस पर आक्रमण करते हैं।

             यदि कभी कोई घायल शिकार दूसरे के क्षेत्र में पहुँच जाय तो शिकारी को इस बात की सूचना दूसरे समूह के सदस्यों को देनी होती है और उसे शिकार से उन लोगों को हिस्सा भी देना पड़ता है। कई समूह परस्पर बहुत कम मिलते हैं। जब जाड़े के दिनों में शिकार बहुत मिलता है, तब दो या तीन समूह मिलकर सामूहिक रूप से कभी-कभी शिकार करते हैं।

               एक समूह के व्यक्ति की शादी दूसरे समूह में हो सकती है और वह व्यक्ति अपने बच्चों और स्त्री को लेकर अपने सास-ससुर से मिलने कुछ दिन के लिए जा सकता है। वस्तुओं की अदला-बदली के लिए भी कभी-कभी एक समूह के व्यक्ति दूसरे समूह में जा सकते हैं।

बुशमैनों का राजनीतिक संगठन:-

              बुशमैनों का कोई राजनीतिक संगठन नहीं होता, और न राजनीतिक इकाई होती है। उनका न कोई शासन होता है, और न कोई शासन करने वाला। इस प्रकार बुशमैन कला, व्यवसाय, राजनीति और संस्कृति की दृष्टि से पर्याप्त पिछड़े हुए लोग हैं। लेकिन इसके लिए इनकी भौगालिक परिस्थितियाँ ही उत्तरदायी हैं। इन्हें ऐसी विषम परिस्थितियों में रहना पड़ता है, जिनमें इनका सारा समय और शक्ति केवल भोजन-संग्रह में ही नष्ट हो जाती है और अन्य किसी कार्य के लिए अवसर ही नहीं मिल पाता है।

प्रश्न प्रारूप

 1. बुशमैन जाति के निवास क्षेत्र, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक जीवन का विवरण दीजिए। 

अथवा, बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन करें।

अथवा, बुशमैन के जीवन शैली का वर्णन कीजिए।

7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन


  मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

मानसून क्षेत्र           

       मानूसन क्षेत्र की निम्न विशेषताएँ होती हैं:-

अक्षांशीय स्थिति:-

       मानसूनी जलवायु का विस्तार भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5º से 36° अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। वास्तव में ये प्रदेश व्यापारिक हवाओं की पेटी में आते हैं, जिनमें ऋतुवत उत्तर तथा दक्षिण की ओर खिसकाव होता रहता है; जिस कारण मानूसन प्रकार की विशिष्ट जलवायु की उत्पत्ति होती है, जिसमें 6 महीने तक हवायें सागर से स्थल की ओर तथा शेष 6 महीने में स्थल से सागर की ओर चला करती हैं। इस जलवायु के अन्तर्गत पाकिस्तान, भारत, बांगलादेश, बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस, उ० तथा द० वियतनाम, पू० द्वीप समूह, आस्ट्रेलिया के उत्तरी भाग आदि को शामिल किया जाता है।

तापक्रम:-

        तापक्रम वर्ष भर ऊँचा बना रहता है, परन्तु सूर्य की उत्तरायण तथा दक्षिणायन की स्थितियों की वजह से ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल का आविर्भाव होता है। कुल मिलाकर यहाँ पर तीन मौसम होते हैं-

(i) ग्रीष्मकाल

(ii) वर्षाकाल और

(iii) शीतकाल

        इनमें ग्रीष्मकाल मार्च से जून, वर्षाकाल जुलाई से अक्टूबर और अन्तिम शीतकाल नवम्बर से फरवरी तक रहता है। ग्रीष्मकाल का औसत तापक्रम 80° से 90° फ० रहता है, परन्तु मई तथा जून में तापक्रम कई स्थानों पर 105° से 120° फा० तक पहुँच जाता है। उत्तरी भारत में तो मई और जून में कई बार गर्म हवायें चलने लग जाती हैं। तटीय भागों में तापक्रम 80° से 950 फ० के बीच आंका जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उच्च तापक्रम पर धरातलीय प्रभाव की छाप है।

        शीतकाल में औसत तापक्रम 50º से 80º फा० के बीच होता है। सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है, जिस कारण वह मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है, परिणामस्वरूप इस भाग का तापक्रम गिर जाता है। इस तरह वार्षिक तापान्तर अधिक हो जाता है। वार्षिक तापान्तर पर सागर से दूरी तथा वर्षा की मात्रा का पर्याप्त प्रभाव होता है। तट से दूर शुष्क भागों में वार्षिक तापान्तर बढ़ता जाता है। दैनिक तापान्तर 10° से 20° फा० के बीच रहता है। वर्षाकाल में तापक्रम ग्रीष्मकाल की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है।

वायु दाब तथा हवायें:-

        ग्रीष्म तथा शीतकाल के कारण मानसूनी प्रदेश क्रमशः निम्न तथा उच्च दाब से प्रभावित होता रहता है। ग्रीष्म काल में 21 मार्च से सूर्य उत्तरायण होने लगता है तथा 21 जून को कर्क रेखा पर लम्बबत् चमकता है, परिणामस्वरूप उच्च तपक्रम के कारण निम्न वायुदाब का निर्माण हो जाता है जिस कारण सागर से स्थल की ओर हवायें चलने लगती है जो द०-पू० मानसून होती है।

        23 सितम्बर के बाद सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है और वह 24 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण उत्तरी गोलार्द्ध के मानसूनी प्रदेशों में शीतकाल के कारण उच्च वायुदाब का निर्माण होता है। परिणामस्वरूप स्थल से सागर की और हवायें चलने लगती है। ये हवायें ‘उ०-पू० मानसून’ कही जाती है।

          वास्तव में उ०-पू० मानसूनी हवायें व्यापारिक हवायें होती है, जो कि सूर्य की दक्षिणामण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के द० की ओर खिसकाव के कारण द०-पू० एशिया आदि पर स्थापित हो जाती है। चूँकि ये हवायें स्थल से होकर आती है, अतः ये शुष्क होती हैं, परन्तु जहाँ कहीं भी ये सागर के ऊपर से चलती हैं, नमी धारण कर लेती है तथा वर्षा कर बैठती हैं। मानसून की तापीय उत्पत्ति के सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार द०-प० मानसूनी हवायें भी द०-पू० व्यापारिक हवायें ही होती है।

          सूर्य की उत्तरायण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के कारण द०-पू० व्यापारिक हवायें भूमध्य रेखा को पार कर लेती हैं तथा ‘फेरल के नियम’ के अनुसार उनकी दिशा द०-प० हो जाती है, चूँकि ये हवायें सागर से होकर आती है। अतः आर्द्र होने के कारण वर्षा करती हैं।

             मानसून की गतिक उत्पत्ति के समर्थकों के अनुसार सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय डोलड्रम की पेटी का द०-पू० एशिया पर विस्तार हो जाता है तथा उसमें प्रवावित होने वाली विषुवत रेखीय पछुवा ही द०-पू० मानसून हवा होती है। डोलड्रम के साथ द०-पू० एशिया पर चक्रवातीय दिशायें व्याप्त हो जाती है। ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात प्रायः पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर चलते हैं तथा पर्याप्त वर्षा प्रदान करते हैं। विभिन्न स्थानों पर इन्हें “टाइफून” चक्रवात तथा “हरीकेन” नाम से पुकारा जाता है।

वर्षा:

      मानसून प्रदेशों में वर्षा मुख्यतः चक्रवातीय तथा पर्वतीय प्रकार की होती हैं। परन्तु कुछ वर्षा संवहनीय प्रकार की होती है। अर्द्ध मानसून हवायें जब पर्वतीय अवरोध का सामना करती हैं तो उन्हें ऊपर उठना पड़ता है परिणामस्वरूप पर्याप्त वर्षा हो जाती है। हिमालय के दक्षिणी ढाल पर आसम से लेकर काश्मीर तक इन हवाओं से पर्याप्त वर्षा होती है परन्तु जैसे-जैसे ये हवायें आगे बढ़ती जाती है वर्षा की मात्रा घटती जाती है। जून से अक्टूबर तक द०-पू० मानसून हवाओं से वर्षा प्राप्त होती है। शरद काल में पश्चिम से आने वाले चक्रवातों से कुछ वर्षा होती है।

         वर्षा के वार्षिक वितरण में पर्याप्त विषमता पाई जाती है। वर्षा का अधिकांश भाग केवल चार महीनों (जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर) में प्राप्त हो जाता है। यहाँ वर्षा भी लगातार नहीं होती है। बीच-बीच में सूखा भी पड़ जाता है। वर्षा के प्रादेशिक वितरण में भी पर्याप्त अन्तर होता है। उदाहरणार्थ भारत के चेरापूँजी में वार्षिक वर्षा 426″ तक होती है जबकि थार के रेगिस्तान में 10″ से भी कम होती है। इस तरह मानसून वर्षा की मात्रा, वितरण, समय आदि सभी अनिश्चित होते हैं जिस कारण कृषि कार्य भी अनिश्चित हो जाती है।

वनस्पति:-

       मानसूनी प्रदेशों में वर्षा की मात्रा में विषमता के कारण कई प्रकार की वनस्पति मिलती है। 200 से० मी० से अधिक वर्षा वाले भागों में सदाबहार वन मिलते हैं। उदाहरणार्थ भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र में 100 से 200 से० मी० वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वृक्ष मिलते हैं। 50 से 100 सेमी० वर्षा वाले भागों में घास पर्णपाती वन मिलते हैं। शुष्क भाग में झाड़ियाँ आदि  मिलती है।

प्रश्न प्रारूप

1. मानसूनी भूमि की स्थिति, जलवायु तथा वनस्पति के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिये।

अथवा, मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप


 समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

समशीतोष्ण घास

                 प्रकृति के विस्तृत आँगन पर अनेकों प्रकार की वनस्पतियाँ सृष्टि के आरम्भ से ही उगती बढ़ती आई हैं। इन वनस्पतियों का समय विशेष पर विनाश हो जाता है और उसके स्थान पर पुनः उसी तरह की वनस्पति उग आती है। संसार के ग्लोव पर नजर डालने पर हमें ज्ञात होता है कि वनस्पति चारों ओर एक सी नहीं है। कहीं पर विस्तृत सघन वन है तो कहीं पर घास के मैदान, कहीं कांटेदार झाड़ियाँ हैं, तो कहीं फूलदार वनें।

                 अतः स्थान-स्थान पर तरह-तरह की वनस्पतियाँ दिखाई देती हैं। इन विभिन्नता के कारण तापमान की दशा, वर्षा की मात्रा, मिट्टी की प्रकृति, प्रकाश प्राप्ति, पवन आदि की प्राप्ति की विभिन्नता है। संसार में घास के मैदानों को प्राकृतिक दशाओं के अनुसार दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।:-

1. उष्ण घास के मैदान तथा

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान।

1. ऊष्ण घास के मैदान:-

         भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में 10° से 20° अक्षांशों के बीच भूमध्य रेखीय वनों को घेरे हुए विस्तृत घास के मैदान फैले हुए हैं। ये घास के मैदान उष्ण मरुस्थलों और मानसूनी प्रदेशों के बीच फैले हैं। इस प्रकार की जलवायु अफ्रीका के सूडान राज्य में अधिक होने से इन प्रदेशों को सूडान तुल्य जलवायु वाले प्रदेश कहते हैं। वेनेजुएला में इन घास के मैदानों में ‘लानोज’, ब्राजील में कम्पास तथा इन्हीं अक्षांशों के बीच मध्य आस्ट्रेलिया के भाग शामिल हैं।

अफ्रीका के सवाना प्रदेश:

          अफ्रीका में भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण में ये घास के मैदान फैले हैं। इन घास के मैदानों की घास 3 मीटर तक लम्बी है। यहाँ प्रमुख धंधा पशुपालन है। सूडान का सबसे प्रसिद्ध नगर तुम है। अधिक वर्षा वाले भागों में गाय, बैल और शुष्क भागों में भेड़, बकरियां और ऊँट पाले जाते हैं।

          नील और श्वेत नील के दोआब कपास के लिये प्रसिद्ध है। खजूर, मूंगफली और बाजरा तथा बबूल के पेड़ों से अरबी गोंद प्राप्त होता है। पश्चिमी सूडान का प्रसिद्ध नगर टिम्बकटू है।

           दक्षिणी अफ्रीका के सवाना प्रदेश में न्यासालैंड, उत्तर रोडेशिया और अंगोला सम्मिलित हैं। इन घास के मैदानों में अन्य जानवर बहुत रहते हैं। अतः यहाँ के लोग अपने निवास के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बाड़े बनाकर उनके बीच में अपनी भेड़, बकरियाँ और अन्य पशुओं को रात के समय रखते हैं।

             यहाँ टिसीटिसी मक्खी, जो जहरीली होती है पाई जाती है, जो घोड़ों और पशुओं को हानि पहुँचाती है। यहाँ की घास लम्बी और सघन होने के कारण यहाँ तापमान और वर्षा की अधिकता है। यहाँ घास नदियों के पास तो बहुत ही सघन और लम्बी-लम्बी होती है।

दक्षिणी अमरीका के सवाना प्रदेश

ओरिनिको बेसिन के लानोज:

         ओरिनिको के बेसिन में विस्तृत घास के मैदान मिलते हैं। इन्हें बेनेजुएला के ‘लानोज’ कहा जाता है। पशुपालन भी यहाँ अधिक होता है। गायें यहाँ खूब पाली जाती हैं। यहाँ मच्छरों की भरमार है और जलवायु गर्म है अतः यहाँ पशुओं की दशा अच्छी नहीं हैं। यहाँ मांस का व्यापार घरेलू खपत के लिये हैं।

ब्राजील के कैम्पास:

           इस क्षेत्र में भी पशु पाले जाते हैं, परन्तु गर्म जलवायु परिवहन की कठिनाई और मांस के जल्दी खराब होने के कारण यहाँ पशुपालन महत्वपूर्ण नहीं हैं। कहबे की कृषि के कारण इस भाग की बहुत उन्नति हुई है। साओपाली और रियोडिजेनेरी कहवा की उपज के मुख्य क्षेत्र हैं। इस प्रदेश का पूर्वी भाग लोहा, ताँबा, हीरे, सोना, मैगनीज आदि खनिज पदार्थों से सम्पन्न है।

आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश:

            आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश उत्तरी प्रान्त और क्वीसलैंड के मध्य में फैला हुआ है। इस प्रदेश के उत्तर में मानसूनी खण्ड, दक्षिण में शुष्क मरुस्थल और पूर्व में ग्रेट डिवाइडिंग रेंज पर्वत है। इस प्रदेश का प्रमुख धन्धा पशुपालन है। पानी की कमी के कारण यहाँ भेड़ें अधिक पाली जाती है।

            जहाँ कहीं पानी की सुविधा है, वहीं गेहूँ की कृषि की जाती है। सवाना घास के मैदानों में वार्षिक मध्यमान 30° सेन्टीग्रेड और वार्षिक ताप परिसर 120° सेन्टीग्रेड है। ये घास के मैदान ध्रुवों की ओर तो मरुस्थलों में बदलकर झाड़ियाँ मात्र रह जाते हैं और भूमध्य रेखा की ओर वनों में परिणत हो जाते हैं। इन प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होती है।

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान:-

           ये घास के मैदान 30° से 45° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के मध्य भागों में पाये जाते हैं। इस प्रदेश के भाग विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से पुकारे जाते हैं। ये भाग पूर्णतया घास के मैदान हैं।

        समशीतोष्ण घास के मैदान में छोटी-छोटी झकड़ेदार घासों की हरीतिमा सर्वव्याप्त होती है। कम तापमान और साधारण नमी से इस क्षेत्र में घास के विकास के लिए आदर्श परिस्थिति उपलब्ध होती है। यहाँ की अधिकांश वर्षा ग्रीष्म काल में होती है तथा शीतकाल ठण्डा और कम आर्द्र होता है। घासों के साथ झाड़ियाँ और बौने वृक्ष भी उगते हैं। ऐसे परिवेश में शाकाहारी और मांसाहारी जीव-जन्तुओं का साम्राज्य पाया जाता है। मानव के लिए ये आदर्श पशुपालन की स्थिति है। यही कारण है कि युगों से यहाँ पशुपालन मुख्य पेशा रहा है।

                मध्य एशिया के किरगीज न जाने कब से इस पेशे से अपना जीवन-यापन करते चले आ रहे हैं। इनकी अधिकांश आवश्यकताएँ पशु उत्पादों से पूरी हो जाती हैं। पर्वतों के ऊँचे भागों पर भी इस प्रकार की घास पाई जाती है, जहाँ पशुपालन प्रचलित पेशा है।

                 जिन भागों में कृषि का विस्तार हुआ है, वहाँ समशीतोष्ण घास के मैदान लुप्त हो गये हैं, जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पूर्वी और मध्यवर्ती भागों में ऐसे घास के मैदानों पर अब व्यापारिक पशुपालन का विकास भी किया गया है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी भाग, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और साइबेरिया में। यहाँ सिंचाई और उर्वरक का प्रयोग कर घास के मैदानों को अधिक उपजाऊ बनाया गया है।

            ये क्षेत्र आज पशु उत्पादों के प्रधान क्षेत्र हैं। आल्पस और रॉकी क्षेत्रों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के क्षेत्र हैं। हिमालय में कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की पहाड़ियों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के आधार हैं।

         समशीतोष्ण घास के मैदानों में आदिवासी जातियों का अर्थतंत्र पशुपालन पर आधारित होता है। पशुओं से प्राप्त दूध, मांस उनका भोजन, ऊन, चमड़ा, हड्डी उनका वस्त्र, तम्बू और हथियार और कुछ पशु उत्पाद व्यापार के आधार होते हैं, जिन्हें बेचकर वे अपनी आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं।

              पशुओं के साथ घूमते रहने के कारण तम्बू इनके गृह का काम करता है। कभी-कभी ये अपनी बस्ती भी बनाते हैं, जहाँ बहुधा जाड़े के मौसम में निवास करते हैं। अब विकसित चारागाहों पर स्थायी निवास भी बनाये गये हैं और अतिरिक्त पेशा के रूप में कृषि करने का रिवाज भी बढ़ता जा रहा है। रूसी सरकार द्वारा किरगीज चरवाहों के लिए इस प्रकार की व्यवस्था की गई है।

               व्यावसायिक पशुपालन वाले घास के मैदानों में विशेषकर आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रिया, स्विट्जरलैण्ड, अर्जेण्टाइना आदि में विकसित नस्ल के पशु और रोपित घास का प्राधानता पाया जाता है। रूस के साइबेरिया क्षेत्र में भी ऐसे घास फार्मों का विकास किया गया है। स्पष्ट है कि जीवन-पद्धति के निर्धारण में घास की भूमिका प्रधान है। ऐसे क्षेत्रों में आदिवासी, जीवन-पद्धति का आदर्श रूप साइबेरिया के किरगीज में पाया जाता है।

            जनवरी का मध्यमान 10° सेन्टीग्रेट और जुलाई का 20° सेन्टीग्रेड है। उन भागों में बर्फ पिघलने से घास और फूलों के उगने के लिए पर्याप्त आर्द्रता मिल जाती है। यहाँ बौछार के रूप में थोड़ी वर्षा भी हो जाती है जो घास के लिये पर्याप्त है। संसार में इन घास के मैदानों का वितरण निम्नलिखित प्रकार है-

यूरेशिया के स्टेपीज:

         अजरबेजान, जोर्जिया और जार्मिनिया तीन एशियायी राज्य जो कैस्पियन, अरब सागर तटीय भाग सम्मिलित है। यहाँ शीत ऋतु में तापमान गिर जाता है और वर्षा नहीं होती है। ग्रीष्म ऋतु में पठार के गर्म हो जाने पर दोनों सागरों पर अपेक्षाकृत अधिक दबाव होता है, जिससे वर्षा होती है। काकेशस पर्वत उत्तर की ओर से आने वाली बर्फीली पवनों को रोक लेते हैं। वर्षा पश्चिम से पूर्व की ओर घटती जाती है। यह भाग रूस के लिये बड़े महत्त्व का है।

           क्यूबान के स्टैपी प्रदेश में मुख्यतः गेहूँ उगाया जाता है, जलवायु मृदु होने के कारण काले सागर के सामने वाली पर्वत श्रेणियों के निचले ढलानों पर अंगूरों और चाय के वृक्ष लगे हैं। ग्रीष्म ऋतु गर्म होती है। पूर्वी भाग में पशुचारण का काम होता है। सम्पूर्ण रूस का 90 प्रतिशत तेल यूरेशिया के इन्हीं भागों से प्राप्त होता है।

उत्तरी अमेरिका के प्रेरीज:

            उत्तरी अमेरिका में प्रेरीज प्रदेश का विस्तार मिसीसिपी नदी और उसकी सहायक नदियों के बेसिन में फैला है। यदि ओहियो और मिसीसिपी नदियों के संगम स्थान को दक्षिण आकोटा राज्य की ब्लैक पर्वत श्रेणियाँ और मेक्सिको देश के सियरा मोद्र पर्वत के पूर्वी भाग की तली पर स्थित मोन्टेरे नगर से मिला दिया जाये तो इस प्रदेश की सीमा बन जायेगी।

          यहां वर्षा थोड़ी बहुत वर्ष के हर माह में हो जाती है। अधिकतम वर्षा 70 सेन्टीमीटर और न्यूनतम 5 सेन्टीमीटर होती है। मुख्य उपज घास है, पश्चिम की ओर से ग्रेट प्लेन में घास भी कम पाई जाती है। आजकल इन प्रदेश का मुख्य धन्धा कृषि हो चला है। गेहूँ की प्रधानता है। यहाँ संसार का सबसे अधिक तेल निकाला जाता है।

दक्षिणी अमेरिका के पैम्पाज:

            अर्जेन्टाइना में घास के समतल मैदानों को पैम्पाज कहते हैं। आरम्भ में चमड़ा और चर्बी बिक्रय धन्धा बहुत उन्नति कर गया था वहाँ से आज भी संसार का सबसे अधिक गोमांस निर्यात होता है। यहाँ गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम के शुष्क भाग में भेड़ें पाली जाती हैं, जिनसे ऊन और चमड़ा प्राप्त हो जाता है।

आस्ट्रेलिया के डार्लिंग डाउन्स:

           डार्लिंग नदी के पूर्वी पर्वतों तक के चरागाहों को आस्ट्रेलिया में डाउन्स कहते हैं। इस मैदान के पूर्वी भाग में वर्षा की मात्रा पर्याप्त होती है, जिससे गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम की ओर का भाग शुष्क होने से भेड़ों के चराने योग्य है।

अफ्रीका के वेड:

             अफ्रीका में इन घास के मैदानों को ‘बेल्ड’ कहा जाता है। यहाँ भी पशुचारण का महत्व अधिक है। अब कृषि का भी पर्याप्त विस्तार हो चला है। इन घास के मैदानों में घास की कम सघनता और कृषि के उपयुक्त जलवायु होने से घास के मैदानों को साफ करके कृषि की जाने लगी है।

प्रश्न प्रारूप

1. उष्ण घास एवं शीतोष्ण घास प्रदेश में आर्थिक विकास की सम्भावनाओं का परीक्षण कीजिए।

अथवा, समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलापों की विवेचना करें।

अथवा, शीतोष्ण घास के मैदान में मानवीय कार्यकलापों का परीक्षण कीजिए।

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप


विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

विषुवतरेखीय प्रदेश

                      भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाओं का अध्ययन करने से पूर्व निम्न तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।

भौगोलिक स्थिति:-

          यह जलवायु प्रदेश भूमध्यरेखा के दोनों तरफ 5º उत्तरी व 5º दक्षिणी अक्षाशों के मध्य फैला हुआ है। यहाँ दिन में सूर्य की सीधी एवं तीव्र गर्मी से वायु हल्की होकर ऊपर उठती है। वायु ऊपर उठकर फैल जाती है, जिससे उसमें जलवाष्प ग्रहण करने की शक्ति क्षीण हो जाती है अर्थात् वायु ठण्डी हो जाती है। वायु ठण्डी होने से वर्षा होने लगती है। यह वर्षा कम समय के लिए परन्तु प्रतिदिन होती है।

              जलवायु के इस कटिबन्ध को शान्त कटिबन्ध भी कहते हैं- यह जलवायु अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, घाना व जंजीबार का तट, दक्षिणी-पूर्वी एशिया के द्वीपों (हिन्देशिया व मलेशिया) सहित एशिया महाद्वीप के कुछ भाग व आस्ट्रेलिया के कुछ भागों में पायी जाती है। इस जलवायु प्रदेश में हर ऋतु में दिन व रात बराबर होते हैं। सालो भर गर्मी पड़ती है लेकिन तापक्रम अधिक नहीं होता। वर्षा प्रत्येक महीने में होती है।

जलवायु:-

      भूमध्य रेखा प स्थित होने के कारण यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं। यहाँ औसत वार्षिक तापक्रम 27° सेन्टीग्रेड रहता है। ताप में मौसमी परिवर्तन बहुत कम होता है इसलिए वार्षिक ताप परिसर अधिक-से-अधिक 3º सेन्टीग्रेड रहता है। औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी० से अधिक होती है। यहाँ किसी-किसी क्षेत्र में 250 से 500 सेमी० तक वार्षिक वर्षा नापी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति:-

          विषुवतीय प्रदेश की उष्णार्द्र जलवायु में घने वन पाये जाते हैं। वनों में वृक्ष की इतनी अधिक सघनता होती है कि सूर्य का प्रकाश भी आसानी से भूमि पर नहीं पहुँच पाता है। इन वृक्षों के अतिरिक्त लताएँ व झाड़ियाँ भी उगती हैं। इन वनों से होकर गुजरना बहुत कठिन है। जंगली जानवरों के लिए यह उपयुक्त क्षेत्र हैं। इन वनों में महोगनी, सिनकोना, गटापार्चा, सीडर, चन्दन, रोजवुड, आबनूस, ताड़, रबड़, बाँस व बेंत आदि प्रमुख वृक्ष पाये जाते हैं।

मिट्टियाँ:-

         यहाँ पुरानी लाल रंग की मिट्टी पायी जाती है। यह मिट्टी कम उपजाऊ होती है। इस क्षेत्र में वर्षा की अधिकता के कारण खनिज पदार्थ भूमि के नीचे की ओर खिसक जाते हैं। इस प्रकार मिट्टी की उत्पादकता कम हो जाती है। यहाँ की मिट्टियों में लोहे व ऐल्यूमिनियम के कण अधिक पाये जाते हैं।

जीव-जन्तु:-

       यहाँ के वनों में अनेक प्रकार के पशु-पक्षी व कीड़े-मकोड़े पाये जाते हैं। खुले जंगलों में हाथी, गैंडा, भैंस, हिरन, जंगली सुअर आदि पाये जाते हैं। नदियों में मगर, घड़ियाल व दरयाई घोड़े पाये जाते हैं। पेड़ों पर रहने वाले जीवों में चिड़ियाँ, साँप, बन्दर, छिपकली गिरगिट आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त भी असंख्य जहरीले कीड़े-मकोड़े व जीव पाये जाते हैं।

भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियायें:-

          कांगो बेसिन के ‘पिग्मी’ लोगों की अर्थव्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि कांगो तथा अमेजन बेसिन क्षेत्र में घने जंगलों की प्रतिकूल जलवायु में मानवीय विकास रूक गया है। इस क्षेत्र में बीमारियों के कारण यहाँ के लोगों की लम्बाई 90 से०मी० से 150 से०मी० तक होती है।

             ये लोग आखेट करने में बहुत चतुर होते हैं। जंगली जानवरों के मांस, मछलियाँ, फल, कन्दमूल व पत्तियाँ आदि इनका भोजन है। ये लोग तोड़ की पत्तियों या वृक्षों की छाल को कमर से नीचे लटकाये रहते हैं। इन लोगों का स्थायी निवास नहीं होता, ये घूमते-फिरते रहते हैं।

            इस क्षेत्र में लकड़ी-व्यवसाय अधिक उन्नति इसलिये नहीं कर पाया है। क्योंकि यहाँ प्रतिकूल जलवायु परिवहन मार्गों की कमी, उपयोगी वृक्षों का असमान वितरण एवं वनों को काटने के लिये साधनों की कमी आदि की सुविधा नहीं है। लकड़ी-व्यवसाय ने उन्नति केवल समुद्र तटीय भागों में की है।

            इन वनों में महत्त्वपूर्ण वृक्षों के अतिरिक्त रबड़, गोंद, आइवरी नट, ताड़, तेल, कुनेने आदि वस्तुओं को भी एकत्र किया जाता है। दलदली भूमि, घने जंगलों में प्रतिकूल जलवायु के कारण ये क्षेत्र शक्तिहीन प्रदेश कहलाते हैं। इस क्षेत्र में विश्व की कुल जनसंख्या का केवल 10% भाग निवास करता है। इस क्षेत्र में वनों को साफ करके आदिम ढंग से मकई, ज्वार व बाजरा आदि की खेती की जाती है।

           इण्डोनेशिया व मलेशिया के द्वीपीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूल पायी जाती है। इस क्षेत्र में यूरोपीय लोग पहाड़ी ढालों और समुद्र तटीय भागों के वनों को साफ करके रबड़, ताड़, कहवा, चाय, नारियल व गन्ने आदि की बागानी कृषि करते हैं।

          इस क्षेत्र में बागानी कृषि वैज्ञानिक ढंग से की जाती है, इसलिए बागानी फसलों के उत्पादन में यह क्षेत्र विश्व प्रसिद्ध है। संसार की कुल रबड़ उत्पादन का लगभग दो-तिहाई रबड़ इसी क्षेत्र से उत्पादित किया जाता है। रबड़ के अतिरिक्त इस क्षेत्र में गन्ना, कहवा व चावल आदि खाद्यान्न फसलों का भी उत्पादन किया जाता है।

        मलेशिया व इण्डोनेशिया में टिन व पेट्रोलियम का उत्पादन भी किया जाता है। संसार का लगभग 50% दिन उत्पादन इस क्षेत्र में किया जाता है। इस प्रदेश में जावा द्वीप का विकास अन्य द्वीपों की में अधिक हुआ है। यहाँ मत्स्यपालन भी समुद्र तटीय भागों में अधिक विकसित हुआ है।

          इक्वेडोर तुल्य उच्च पठारी क्षेत्रों में कृषि, पशुचारण, उत्खनन, लकड़ी काटना आदि प्रमुख व्यवसाय हैं। यहाँ की प्रमुख फसलें चावल, गन्ना, कपास, गेहूँ, तम्बाकू, फल, चाय व कहवा आदि हैं। इक्वेडोर व कोलम्बिया के पठारी क्षेत्र में सोने-चाँदी, मैगनीज व ताँबे की खानें पायी जाती हैं।

           सोने, चाँदी, ताँबे, नमक, ग्रेफाइट टिन आदि के भण्डार पूर्वी अफ्रीका के पठारी क्षेत्रों में मिलते हैं। इस क्षेत्र में परिवहन के साधन भी अच्छी तरह से विकसित हैं।

           इस प्रदेश के अधिकांश नगर तटीय क्षेत्रों में समुद्री मार्गों पर बसे हुए हैं। मनाओस, बेलमपारा, बगोटा, नैरोबी, एका, लैगोस, स्टेनलेविले, लियोलिविले, लियोपोल्डविले, जकार्ता व सिंगापुर आदि प्रमुख नगर हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व के विषुवतरेखीय प्रदेशों या भूमध्य रेखीय प्रदेशों के मानवीय कार्य-कलापों का विवरण दीजिये।

अथवा, विषुवतरेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाकलापों का परीक्षण कीजिए। 

4. मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

4. मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप


मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

मरूस्थलीय वातावरण

                 मरुस्थलीकरण एक ऐसी भौगोलिक प्रक्रिया है, जिसमें समतल मैदानी उपजाऊ क्षेत्रों में भी मरुस्थल जैसी विशिष्टताएँ विकसित होने लगती हैं। जिसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय गतिविधियाँ है। इससे शुष्क, अर्द्ध-शुष्क, निर्जल इलाकों की मिट्टी रेगिस्तान में बदल जाती है तथा मिट्टी की उत्पादन क्षमता ह्रास होने लगता है। मरुस्थलीकरण से प्राकृतिक वनस्पतियों का ह्रास तो होता ही है, साथ ही कृषि उत्पादकता, पशुधन एवं जलवायवीय घटनाएँ भी प्रभावित होती हैं।

अक्षांशीय स्थिति:-

           यह प्रदेश भूमध्य रेखा के दोनों ओर 20° से 30° अक्षांशों के बीच अर्थात् उष्ण कटिबन्ध में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में फैला हुआ है।

सम्मिलित क्षेत्र:-

         अफ्रीका में सहारा तथा कालाहारी मरुस्थल हैं। एशिया में भारत एवं पाकिस्तान का थार मरुस्थल तथा अरब मरुस्थल आस्ट्रेलिया में पश्चिमी आस्ट्रेलिया का मरुस्थल। उत्तरी अमेरिका में कोलोरेडी ऐरीजीना तथा दक्षिणी कैलीफोर्निया के मरुस्थल। दक्षिणी अमेरिका में चिली तथा दक्षिणी पेरू का एटाकामा मरुस्थल।

तापमान एवं वर्षा:-

             ग्रीष्म ऋतु अत्यधिक गर्म और शीत ऋतु कम गर्म होती है। इस प्रदेश में संसार के उच्चतम तापमान वाले स्थान स्थित हैं। इस प्रदेश में वर्षा बहुत कम होती है। वर्ष भर में 25 सेन्टीमीटर से भी कम वर्षा होती है।

वनस्पति:-

           अति गर्म एवं शुष्क जलवायु के कारण यहाँ वनस्पति बहुत ही कम होती है। इस प्रदेश में वह वनस्पति है जो गर्मी तथा शुष्कता सहन कर सके, जिनकी जड़ें लम्बी हो ताकि भूमि के भीतर दूर गहराई से जल ले सकें, जिनकी पत्तियाँ मोटी हों ताकि वाष्पीकरण द्वारा उनमें जल की कमी न हो।

आर्थिक विकास:-

             आर्थिक विकास की दृष्टि से यह प्रदेश बहुत पिछड़ा हुआ है। इसके पिछड़ेपन के कारण निम्नलिखित हैं-

(1) भूमि के अधिकतर भाग में रेत फैली हुई हैं।

(2) वर्षा नहीं होती।

(3) गर्मी बहुत पड़ती है।

(4) अति शुष्क पवनें चलती हैं।

(5) आंधियाँ आती हैं।

(6) जल की कमी है।

(7) यातायात के साधनों की कमी है।

(8) जनसंख्या बहुत कम है।

कृषि:-

         इस प्रदेश के अधिकतर भाग में रेत फैली हुई है जिसके कारक कृषि योग्य भूमि बहुत कम है। अत्यधिक गर्मी, शुष्क पवनों तथा जल की कमी के कारण कृषि का विकास अधिक नहीं हो सकता है। नदी घाटियों में सिंचाई द्वारा कृषि की जाती है। मिस्र तथा सूडान की नील घाटी में इस प्रकार की कृषि की जाती है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा, कपास तथा तम्बाकू यहाँ की मुख्य फसलें हैं।

उद्योग:-

         अरब तथा कैलिफोर्निया में तेल साफ करने के कारखाने हैं। थार तथा कैलिफोर्निया में झीलों से नमक प्राप्त करने का उद्योग है। लोग भेड़ एवं बकरियाँ पालकर ऊन प्राप्त करते हैं जिससे ऊन उद्योग चलता है। चारों ओर रेत फैले होने के कारण यातायात के साधनों की कमी तथा जनसंख्या कम होने के कारण उद्योग का विकास नहीं हो सका है।

          यहाँ दो प्रकार के लोग निवास करते हैं। एक तो वे जो कि यूरोप के उन्नतशील लोगों के सम्पर्क में आने से पर्याप्त प्रगति कर गये हैं। उदाहरणार्थ अरब के लोग कैलिफोर्निया तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया में भी यूरोप के उन्नतशील लोग बसे हैं। अतः यहाँ पर लोगों का रहन-सहन आधुनिक ढंग का है।

प्रश्न प्रारूप

1. मरुस्थलों में मानव जीवन तथा कार्यकलापों पर वातावरण के प्रभाव की विवेचना कीजिये।

अथवा, मरूस्थलीय पर्यावरण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

अथवा, मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रियाओं का वर्णन कीजिए।

अथवा, मरूस्थलीय क्षेत्र की विशेषताओं और मानवीय कार्यकलाप का विवरण दीजिए।


3. पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

3. पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप


पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

पर्वतीय वातावरण

                भूपृष्ठ की बनावट मानव जीवन को अत्यन्त प्रभावित करती है। भूपृष्ठीय रचना के अनुरूप स्थलरूपों को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा गया है- पर्वत, पठार और मैदान। मानव पर प्रभाव डालने में प्रत्येक की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं।

(1) पर्वत और मानव जीवन:-

          पर्वतों पर मानव जीवन के सामने अनेक तरह की कठिनाइयाँ आती हैं जिनका आभास समतल मैदानी भागों में नहीं होता। पर्वतीय क्षेत्रों में समतल भूमि अत्यन्त सीमित होती है। तीव्र ढाल की अपेक्षा साधारण ढाल वाले क्षेत्र मानव के लिए अधिक उपयोगी होते हैं। साधारण ढाल भूमि पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जाती है किन्तु ऊपरी डालों पर सिंचाई की सुविधा प्रदान नहीं की जाती, वहाँ केवल शुष्क कृषि की जाती है।

         अधिक ऊँचाई पर तापमान गिर जाता है या बर्फ गिरने की वजह से मानव का रहना सम्भव नहीं होता। इसके अलावा ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वायुदाब घटता जाता है। 6000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर मनुष्य को साँस लेने में कठिनाई होती है। अतः ऐसे स्थानों पर मानवीय कार्य-कलाप नगण्य मिलता है।

      पर्वतों की ऊँची नीची भूमि पर परिवहन के साधनों को बनाया जाना भी काफी कठिन होता है।

(2) पर्वत एवं जलवायु:-

          एक देश की जलवायु पर पर्वतों का भी प्रभाव पड़ता है। ऊँचाई पर जाते हुए तापमान कम होता जाता है। लगभग 160 मीटर की ऊँचाई पर 90 से०ग्रे० ताप कम हो जाता है। उष्ण देशों में जहाँ पर्वत स्थित है वहाँ, पर्वतों पर स्वास्थ्यवर्धक जलवायु मिल जाती है। पर्वत-शिखरों पर पर्यटक केन्द्र बन जाते हैं। भारत में शिमला, मंसूरी, दार्जिलिंग, उटकमण्ड आदि इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय नगर हैं।

         पर्वतीय प्रदेश आर्द्रतापूर्ण पवनों को रोकने में पूर्ण सक्षम होते हैं इसलिए वर्षा भी मैदानों की अपेक्षा अधिक होती है। साथ ही पर्वत श्रेणियाँ एक देश को ठंडी पवनों से सुरक्षा भी प्रदान करती है। भारत के उत्तर में हिमालय स्थित होने के कारण मध्य एशिया की ठंडी पवनें भारत में प्रवेश नहीं कर पाती जबकि यही ठंडी पवनें चीन के आधे से अधिक भाग को प्रभावित करती हैं। इसी प्रकार उत्तरी अमेरीकी में कनाडा की ठंडी पवनें संयुक्त राज्य अमेरीका के दक्षिण तक पहुँच जाती है और तापमान को पर्याप्त गिरा देती है।

(3) पर्वत एवं वनस्पति:-

        पर्वतों पर ऊँचाई के अनुसार वनस्पति के प्रकार में काफी भिन्नता पाई जाती है। अत: भूमि उपयोग भी प्रभावित होता है। पर्वतों पर एक विशिष्ट ऊँचाई से ऊपर वृक्ष नहीं उगते, केवल घास के मैदान पाये जाते हैं। यहाँ पशुओं के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं।

            ग्रीष्मकाल में यह क्षेत्र चरागाहों के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं। पशुओं में भेड़, बकरियाँ ही ज्यादा पाई जाती हैं क्योंकि इनमें ठंड सहने की शक्ति ज्यादा होती है। चरागाहों के नीचे शंकुधारी वनों का कटिबन्ध मिलता है जहाँ मुलायम लकड़ी के अधिक उपयोगी वृक्ष उगे हुए पाये जाते हैं। शंकुधारी वनों से नीचे पर्णपाती वनों का कटिबन्ध मिलता है, इन दोनों के बीच मिश्रित वनों का कटिबन्ध मिलता है।

           पर्वतीय क्षेत्रों में वनों की अधिकता की वजह से लकड़ी काटने का धन्या अत्यन्त लोकप्रिय होता है किन्तु यहाँ की ढालू भूमि पर लकड़ी काटना, छाँटना तथा लट्ठों को लकड़ी के चीरने वाले कारखानों तक पहुँचाना अत्यन्त कठिन काम होता है। इन कामों के लिये सरल उपाय खोज निकाले गये हैं। नार्वे और स्वीडन में लकड़ी के लट्ठों को बर्फ पर फिसलाकर जमी हुई नदियों तक पहुँचाया जाता है। हिमालय क्षेत्र के वृक्ष को काटकर तनों को नदियों में बहा दिया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पक्की सड़कें बना दी गई हैं। लट्ठों को ढोने का काम मोटर ठेलों से लिया जाता है। कहीं-कहीं पर बाँधकर लट्ठों को खिसकाकर ले जाया जाता है।

          लकड़ी का उपयोग अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। अतः लकड़ी की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, इसलिए वनों को निर्दयतापूर्वक काटा जा रहा है। वन केवल उच्च क्षेत्रों में ही शेष रह गये हैं।

(4) पर्वत एवं कृषि:-

           पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि कार्य केवल सीमित मात्रा में सम्भव है। यहाँ किसानों को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जैसे-

(क) समतल भूमि की कमी,

(ख) मिट्टी का अधिक क्षरण,

(ग) मिट्टी का कम गहरा होना, तथा

(घ) जलवायु की बाधाएँ।

              कृषि के काम के लिए समतल भूमि की जरूरत होती है। समतल भूमि पर ही पूर्ण सिंचाई का लाभ प्रदान किया जा सकता है तथा कृषि यंत्रों का भी उपयोग सम्भव होता है। इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि मानव के कठिन परिश्रम पर ही टिकी है। यहाँ खेत जोतने से लेकर फसल काटने तक समस्त कार्य हाथों से ही करने होते हैं कहीं-कहीं तो मनुष्य को हल भी स्वयं ही चलाना पड़ता है, इसीलिए पहाड़ी भागों में हल्के किस्म के हलों का प्रचलन है।

             कृषि योग्य समतल खण्ड बनाने के लिए पर्वतीय ढालों पर सीढ़ियाँ काटकर सोपानी कृषि की जाती है। ऐसा करने से खेतों में वर्षा या सिंचाई का जल कुछ समय तक रूकने में समर्थ होता है। स्पष्ट है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कृषि नहीं की जा सकती।

        सीढ़ीनुमा, लम्बाकार तथा कम चौड़े खेत पर्वतों के चारों तरफ गोलाई में स्थित मिलते हैं। इस प्रकार के खेत विश्व के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ जलवायु अनुकूल होती है, पाये जाते हैं। किन्तु जापान का उदाहरण इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है। यहाँ किसानों ने अत्यधिक मेहनत करके जगह-जगह भूमि को सीढ़ीनुमा खेतों में तब्दील कर दिया है। मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए अनेक तरह की खादों को प्रयोग में लाया गया है। अतः प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद प्रति हैक्टेयर उत्पादन अत्यधिक है।

           पर्वतीय क्षेत्रों में ढालू भूमि होने के कारण मिट्टी का क्षरण भी तीव्र गति से होता है। वर्षा के समय मिट्टी तेजी से कट कटकर जल के साथ बहती रहती है। पहाड़ी भागों में वर्षा भी अधिक होती है। निरन्तर मिट्टी के क्षरण से मिट्टी की गहराई कम रह जाती है और पथरीली भूमि उभर जाती है। कहीं-कहीं पर गहरी नालियाँ बन जाती हैं जहाँ भविष्य में कृषि सदा के लिए असम्भव हो जाती है। वैसे पर्वतीय क्षेत्रों में स्वभावतः मिट्टी की गहराई कम पाई जाती है। मिट्टियाँ अधिकतर कठोर होती हैं जो कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं होती।

        पर्वतों पर कृषि के लिए सभी स्थानों की जलवायु अनुकूल नहीं होती। विषुवत रेखा से 30° अक्षांशों तक 2500 से 3000 मीटर की ऊँचाई तक 30° और 45° अक्षांशों के मध्य 2000 से 3000 मीटर की ऊँचाई तक 45° से 55° अक्षांशों के मध्य 1500 से 2000 मीटर की ऊँचाई तक 55° अक्षांशों के निकट लगभग 200 मीटर की ऊँचाई तक कृषि सम्भव होती है।

            ऊँचाई अथवा अक्षांशों के अन्तर का प्रभाव तापमान पर पड़ता है। पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा द्वारा वांछित लाभ नहीं उठाया जा सकता, जबकि वर्षा काफी होती है। ढालू भूमि होने के कारण वर्षा का जल जल्दी बह जाता है।

           पर्वतों का सबसे ज्यादा लाभ यह है कि उनकी चट्टानों से बहुमूल्य खनिज सम्पत्ति का भण्डार मिलता है। प्राचीन पर्वतों में खनिज पदार्थ ज्यादा मिलते हैं। इसकी वजह यह है कि प्रकृति की क्षरण करने वाली शक्तियाँ ऊपर की परतों को बहाकर ले जाती हैं और खनिज पदार्थ भूपृष्ठ के ऊपरी भाग में उभर आता है।

            इसके अतिरिक्त अन्तर्जात बलों के प्रभाव में जब भूमि की परतें मुड़ती हैं तो खनिज पदार्थ भी मुड़कर ऊपर पहुँच जाते हैं। इन्हीं कारणों के फलस्वरूप यूराल पर्वतों पर सभी खनिज पदार्थों का भण्डार है। अपलेशियन पर्वतों पर कोयला, लोहा और मिट्टी के तेल का भण्डार पाया जाता है। दक्षिणी भारत के प्राचीन पठार पर मैगनीज, लोहा, सोना, कोयला और अभ्रक आदि खनिज बहुतायत से मिलते हैं।

            वर्तमान सभ्यता का आधार खनिज पदार्थों पर टिका हुआ है। खनिज पदार्थों का अधिक-से-अधिक उत्पादन और उपयोग किया जा रहा है। मानव खनिजों की खोज में दूर पर्वतीय भागों में कठिनाइयों का सामना करते हुए भटकना मंजूर कर लेता है। पर्वतों पर खान खोदना भी अत्यन्त मुश्किल का कार्य है।

       अधिक ऊँचाई पर वायुदाब की कमी की वजह से श्रमिकों को कार्य करने में भी कठिनाई होती है। भारी मशीनों को ले जाकर स्थापित करना भी कठिन होता है क्योंकि उत्तम किस्म के सड़कों के निर्माण में कठिनाई होती है। इसके अलावा खानों से निकले पदार्थ को ढ़ोने की समस्या भी अत्यन्त जटिल होती है क्योंकि परिवहन के साधन अपर्याप्त होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में अपनी-अपनी अलग समस्याएँ हैं।

        पर्वतीय क्षेत्रों में औद्योगिक केन्द्रों की स्थापना भी सरल नहीं उद्योगों की स्थापना के लिए तरह-तरह की वस्तुएँ जुटानी पड़ती हैं। कच्चे माल, श्रमिकों की व्यवस्था, शक्ति के साधनों की सफलता तथा परिवहन के साधनों की व्यवस्था करना आवश्यक है।

प्रश्न प्रारूप

1. पर्वतीय वातावरण मानवीय क्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित करता है? संक्षेप में लिखिए।

अथवा, पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलापों का वर्णन कीजिए।


2. मानव एवं वातावरण के बीच के सम्बन्ध

2. मानव एवं वातावरण के बीच के सम्बन्ध


मानव एवं वातावरण के बीच के सम्बन्ध

मानव एवं वातावरण

              मानव भूगोल में मानव एवं वातावरण के पारस्परिक सम्बन्ध अटूट हैं। मानव की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्रियाएँ उस पर्यावरण या वातावरण द्वारा प्रभावित और प्रायः निश्चित होती हैं जिनमें वह रहता है। इसीलिए कभी-कभी कहा जाता है कि मानव अपनी परिस्थितियों का जीव है। इसमें सन्देह नहीं कि मानव का प्रत्येक पहलू पर्यावरण द्वारा प्रभावित होता है, अतः पर्यावरण का विस्तृत अध्ययन आवश्यक हो जाता है।

          साधारण शब्दों में, “वातावरण उन सभी तथ्यों या दशाओं को कहते हैं जो किसी स्थान (आवास) या वस्तु को घेरे हैं एवं उसको प्रभावित करते हैं।” दूसरे अर्थों में, “वातावरण अर्थात् भौतिक वातावरण में वे सभी दशाएँ, तथ्य एवं प्रभाव सम्मिलित हैं जिनकी उपस्थिति पृथ्वी पर मानव के न होने पर भी बनी रहेगी।” यही बात महान् समाजशास्त्रीय प्रो० सोरोकिन ने भी कही।

ताँसले के अनुसार, “प्रभावकारी दशाओं का वह सम्पूर्ण योग जिनमें जीव रहते हैं, वातावरण कहलाता है।”

अमेरिकी भूगोलवेत्ता डॉ० डेविस के अनुसार, “मनुष्य के सन्दर्भ में मानव भूगोल से अर्थ भूमि या मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है जिनका उसकी आदतों एवं कार्यों पर प्रभाव पड़ता है।” 

जर्मन वैज्ञानिक ए० फिटिंग के अनुसार, “जीवन की परिस्थिति के समस्त तथ्य मिलकर वातावरण कहलाते हैं।”

       इसी भाँति अमेरिकी मानवशास्त्री डॉ० हर्सकोविट्ज के अनुसार, “वातावरण उन सभी बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग है जो कि किसी प्राणी के विकास व क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।

        वर्तमान में वातावरण शब्द के उपयोग के साथ-साथ परिस्थिति की विद्वानों (Ecologist) द्वारा आवास या परिस्थान (Habitat) अथवा निवास (Milieu) शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा है।

पार्क के अनुसार, “वातावरण (पर्यावरण) का अर्थ उन दशाओं के योग से होता है जो मनुष्य को निश्चित समय में निश्चित स्थान पर आवृत्त करती हैं।”

ए० गाउडी ने ‘The Nature of the Environment’ में पृथ्वी के भौतिक घटकों को ही वातावरण का प्रतिनिधि माना तथा पर्यावरण को प्रभावित करने में मानव को एक महत्वपूर्ण इकाई माना।

के० आर० दीक्षित के अनुसार, “वातावरण विश्व का समग्र दृष्टिकोण है क्योंकि यह किसी समय सन्दर्भ में बहुस्थानिक तत्वीय एवं सामाजिक-आर्थिक तन्त्रों, जो जैविक एवं अजैविक रूपों के व्यवहार/आचरण पद्धति तथा स्थान की गुणवत्ता तथा गुणों के आधार पर एक-दूसरे से अलग होते हैं, के साथ कार्य करता है।”

          मानव जिस धरती पर रहता है, उसे प्राकृतिक तत्वों के चारों ओर से घेर रखा है। ये प्राकृतिक तत्व मानव के कार्यकलापों पर प्रभाव डालते हैं और उनके प्रभाव से मानव के कार्यकलापों में परिवर्तन हो जाता है। आधुनिक समय में मानव इन प्राकृतिक तत्वों का दास तो नहीं है परन्तु इनके प्रभाव से वंचित भी नहीं रह सकता है।

       मानव समयानुसार और क्षमतानुसार इन तत्वों का रूपान्तरण कर देता है और जहाँ रूपान्तरण सम्भव नहीं होता है, वहाँ अनुकूलन कर देता है। भौगोलिक वातावरण से तात्पर्य उन अवस्थाओं से है जिनका अस्तित्व एवं कार्य स्वतन्त्र हैं जो मानव रचित नहीं और जो मानव के अस्तित्व एवं कार्यों से प्रभावित हुए बिना स्वतः परिवर्तित होती है।

       इस प्रकार पृथ्वी पर घटित होने वाली ये प्राकृतिक दशाएँ जिनका प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है, प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।

           मानव भूगोल के सिद्धान्तों को पूर्ण रूप से समझने के लिए मानव और उसके वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। इसके लिए वातावरण के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ह्राइट और रैनर ने भौगोलिक वातावरण के महत्व को निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया है-

         “भौतिक वातावरण मानव के बड़े समूहों को बहुत ही प्रत्यक्ष रूप से और प्राथमिक तरीके से प्रभावित करता है। प्रत्येक ऐसे समूह, जनजाति, राज्य, राष्ट्र और पृथ्वी के सभी साम्राज्य (देश-प्रदेश) इसके द्वारा सीधे तौर पर निरन्तर रूप से प्रभावित होते हैं। मानव की सभी महत्वपूर्ण क्रियाएँ भौतिक वातावरण की अनुकूलता की रुकावटों एवं उनमें निहित निर्देशों से स्वतंत्र नहीं हैं। प्राकृतिक वातावरण मानव समाज के लिए वही करता है जो कि सांस्कृतिक वातावरण व्यक्तिगत मनुष्य के लिए।”

          मानव और वातावरण के सम्बन्ध को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

1. सीधे भौतिक प्रभाव (Direct Physical Effects):-

      पर्यावरण के सभी तत्वों में जलवायु का प्रभाव सबसे अधिक महत्वपूर्ण है जो मानव को सीधा प्रभावित करता है। जलवायु का प्रभाव प्राकृतिक वनस्पति और मिट्टियों द्वारा मनुष्य पर पड़ता है। जलवायु का प्रभाव मनुष्य के कद, शरीर की बनावट, रंग आदि पर पड़ता है। इसी प्रकार वातावरण मनुष्य की शारीरिक शक्ति को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है जिससे उसके शरीर का एक भाग दूसरे की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ और बलिष्ठ बन जाता है।

          कुमारी सैम्पल ने उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया है कि पर्वतीय भागों में मनुष्य के पैर बलिष्ठ और हाथ कम बलिष्ठ होते हैं, जबकि नदियों वाले मैदानी भागों में जहाँ उसे हाथ से नाव चलानी पड़ती है, हाथ बलिष्ठ और पैर कम बलिष्ठ होते हैं। प्रतिकूल वातावरण में रहने पर आँखों और त्वचा पर भी प्रभाव पड़ता है। तुर्कमान लोगों की आँखें छोटी और पलकें भारी होती हैं क्योंकि वे हमेशा मरूस्थलीय भागों में रहते हैं। इसी प्रकार कुमारी सैम्पल ने बताया कि मानव के क्रिया-कलापों पर भौतिक वातावरण के सभी तत्वों (कारकों) का प्रभाव बहुरूपी एवं निर्णायक रहता है।

2. मानसिक प्रभाव (Mental Effects):-

       इस प्रकार के प्रभाव मनुष्यों के धर्म, उनके साहित्य, भाषा, आचार-विचार में दिखाई देते हैं। मनुष्य के धार्मिक विचार उसके वातावरण की ही उपजें हैं। उदाहरण के लिए, मनुष्य के धार्मिक विश्वास उसके पर्यावरण की ही उपज है। एक एस्किमो के लिए नर्क वह स्थान है जहाँ सदैव अंधेरा रहता है, तूफान आते हैं और कठोर सर्दी पड़ती है, जबकि एक ज्यू के लिए नर्क निरन्तर जलती हुई आग का स्थान है।

          हिन्दू धर्म में स्वर्ग का अर्थ निर्वाण या मोक्ष प्राप्त करना माना गया है। भाषा पर भी वातावरण का अमिट प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, उत्तरी रूस के सेमोइड लोग अपने रेण्डियरों के लिए 11 या 12 शब्दों का प्रयोग करते हैं। यही बात पशुपालक लोगों के बारे में; जैसे-मैग्यार, मलैय एव खिरगीज लोगों पर लागू होती है किन्तु सैम्पल का कथन है कि मानसिक प्रभाव केवल अनुमान लगाने की ही वस्तु है जिससे भूगोलशास्त्री का कोई मतलब नहीं।

3. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव (Economic and Social Effects):-

               किसी स्थान की भौगोलिक अवस्थाएँ ही इस बात का निर्धारण करती हैं कि वहाँ आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति सरलता से होगी अथवा कठिनाई से, वहाँ किस प्रकार के उद्योग स्थापित किये जा सकते हैं। इस प्रकार के प्रभाव ही मानव समाज में आकार को निर्धारित करते हैं। जिन क्षेत्रों, द्वीपों या पर्वतीय भागों में आर्थिक संसाधन कम मात्रा में पाये जाते हैं, वहाँ मनुष्य भी छोटे समुदायों में पाये जाते हैं क्योंकि उन क्षेत्रों में उनके लिए उपयुक्त वातावरण नहीं मिलता।

4. मानव की गतियों को प्रभावित करने वाले प्रभाव:-

             मानव समूह को प्रभावित करने वाले ये तत्व वास्तव में अधिक प्रभावी होते हैं। पहाड़ों, मरूस्थलों, दलदलों, समुद्रों आदि का प्रभाव मानव के प्रवास पर पड़ता है। यह सभी उनके मार्ग का निर्धारण करते हैं, सहयोग अथवा असहयोग देते हैं। नदियों द्वारा मार्गों को सुलभ करना तथा यातायात के साधनों के रूप में सहयोग प्रदान करना जिससे अनेक मानव जातियों ने दूर-दूर जाकर अपनी बस्तियाँ स्थापित की। पर्वत अवरोध उत्पन्न करते हैं। भारतवर्ष के उत्तर में हिमालय पर्वत ने मध्य एशिया से सम्पर्क को हमेशा से ही रोकने का प्रयास किया है।

           कुमारी सैम्पल, प्रो० रेटजल एवं अन्य नियतिवादी विद्वानों ने जो कुछ कहा, उसका सार यह है कि अल्प विकसित एवं जनजाति समाज में भौतिक वातावरण का प्रभाव आज भी पूरी तरह शासक बना रहता है। ऐसे मानव समूह वही क्रिया-कलाप, उद्यम एवं व्यवसाय अपनाते हैं जो कि वहाँ की प्राकृतिक दशा की विशेष व्यवस्था में सम्भव है। ध्रुवीय प्रदेश का मानव समाज मात्र शिकार करके अपना पेट पालता है। चारागाह प्रदेशों में घुमन्तु पशुपालन (Trans-humnance) ही महत्वपूर्ण व्यवसाय रहा है।

             इसी भाँति उष्ण मरूस्थलीय जैसे सीमित संसाधनों वाले प्रदेशों में मनुष्य या समाज को ऐसे सीमित साधनों में ही संघर्षपूर्ण जीवन जीना पड़ता है। इस प्रकार मानव भौतिक वातावरण की प्रतिकूलता में सीमित समूहों में ही रहकर विशेष प्रकार से सामंजस्य स्थापित करने का निरन्तर प्रयास करता रहता है।

           द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अनेक प्रकार से मानवीय तकनीक, उद्यम एवं सामंजस्य स्थापित करने के सबल तौर-तरीके विकसित होते जाने से अब प्रतिकूल प्रदेशों में भी स्थिति पहले से अनुकूल बनने लगी है किन्तु बाढ़, सूखा व अकाल मौत की छाया यह सभी प्रतिकूल प्रदेशों में आज भी अभिशाप हैं। इसके साथ-साथ मानव ने वनों की निर्दयतापूर्वक काटकर प्राकृतिक सन्तुलन को बिना सोचे-समझे नष्ट करके अपनी कठिनाइयों को बढ़ाया है। प्रकृति मानव पर अब बाढ़, सूखा, रोग, प्रदूषण, नये-नये प्रतिकूल कीटाणु व उनके जहरीले प्रभाव से (अब विकसित समाज पर भी अपना स्पष्ट प्रभाव दिखा रही है। इनसे छुटकारा पाने के लिए मानव को भी वातावरण का मित्र बनना व उससे सार्थक रूप से सामंजस्य करना आवश्यक है।

प्रश्न प्रारूप

1. मानव एवं वातावरण के बीच के सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।

अथवा, मानव एवं पर्यावरण में संबंधों की विवेचना कीजिए।


20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान




भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

फ्रेडरिक रेटजेल

            रेटजेल का जन्म 1844 में जर्मनी में हुआ था। इनके पिता एक डयूक के मैनेजर थे। परिवार में कुल चार सदस्य थे। रेट्जेल ने सर्वप्रथम प्राणी विज्ञानी के रूप में हेडलबर्ग विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। बाद में (Jena) विश्वविद्यालय में चले गये।

        31 वर्ष की आयु में रेटजेल म्यूनिख के एक स्कूल में अध्यापक हो गये तथा 1886 तक वहीं रहे। उन्होंने म्यूनिख के नृजाति संग्रहालय में मोरिस वेगनर के साथ कार्य किया। यहीं वे प्रजातियों के आव्रजन से प्रभावित हुये। इस विचार ने उनके भौगोलिक दर्शन को प्रभावित किया। 1886 में रिचथोफेन के बर्लिन जाने के बाद रेटजेल लीपजिंग आये। यहाँ फिशर एवं हेटनर जैसे भूगोलविदों ने रेटजेल के निर्देशन में कार्य किया। रेटजेल मृत्यु पर्यन्त (1904) यहीं रहे।

         फ्रांस के मॉन्टपेलियर नगर में उसने प्रसिद्ध प्राणी-वैज्ञानिक चार्ल्स मार्टिन्स के साथ कार्य किया था। उस समय उसने एक पत्रिका में अपने कुछ लेख प्रकाशित किये थे जिनका शीर्षक ‘भूमध्यसागरीय तट से जीव वैज्ञानिक पत्र’ था। इन लेखों ने वैज्ञानिकों और सरकार का ध्यान उसकी ओर आकर्षित किया था। उसने 1870 के युद्ध में सेवा की थी, जिसके बाद उसको पत्रकार बनाकर पूर्वी यूरोप के देशों में तथा इटली, संयुक्त राज्य, मैक्सिको और क्यूबा में भेजा गया था।

      अपनी इन यात्राओं में उसने भौगोलिक अध्ययन किये, और धीरे-धीरे प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन लिखने की कला में सिद्धहस्त हो गया। उसने कैलिफोर्निया, मैक्सिको और क्यूबा में ‘चीन से प्रवास’ के तथ्यों का अध्ययन किया था। ‘चीनी प्रवास’ पर उसने अपना शोध-प्रबन्ध लिखा था, जिस पर उसे शोध-डिग्री मिली थी।

      1878 में रेटजेल ने उत्तरी अमेरिका के भूगोल पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी। उसके विख्यात ग्रन्थ एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ का प्रथम खण्ड 1882 में और दूसरा खण्ड 1891 में प्रकाशित हुआ। यह एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय ग्रन्थ है, जिसके कारण रेटजेल को मानव भूगोल का जन्मदाता कहा जाता है।

         रेटजेल ने राजनीतिक भूगोल का भी गम्भीर अध्ययन किया था। उसने ‘राजनीतिक भूगोल ग्रन्थमाला’ का प्रथम खण्ड 1897 में, और दूसरा खण्ड 1903 में प्रकाशित किया था। इन ग्रन्थों के अलावा रेटजेल ने कुछ पुस्तकें सामान्य जनता की रूची के लिए भी लिखा थी। उसने भूविज्ञान, मानवजातिशास्त्र, जीवविज्ञान, भौतिक भूगोल तथा मानव समाजों पर बहुत से लेख लिखे थे।

       रेटजेल ने वातावरण तथा मानवीय तथ्यों एवं उनके पास्परिक सम्बन्धों का विश्लेषण किया था। उसने मानव एवं वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों में वातावरण के प्रभावों को महत्वपूर्ण बतलाया था, इसीलिए उसे वातावरण निश्चयवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादक माना जाता है।

        रेटजेल ने ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के प्रथम खण्ड में डार्विन के विकासवाद सिद्धान्त से मिलते-जुलते विचार व्यक्त किये थे। इन विचारों में उसने मानवीय समाजों के इतिहास पर भौगोलिक वातावरण के प्रभावों का दिग्दर्शन किया था। इस खण्ड में उसने ‘इतिहास पर भूगोल का अनुप्रयोग’ समझाया था। ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के दूसरे खण्ड (1891) में सांस्कृतिक वातावरण जनसंख्या, मानवीय बस्तियाँ, जनसंख्याओं के प्रवास तथा सांस्कृतिक लक्षणों के वर्णन किये गये थे।

         रेटजेल ने भौतिक भूगोल के क्षेत्र में भी अनुसंधान किये थे तथा एक भौगोलिक ग्रन्थमाला का सम्पादन किया था। इस ग्रन्थमाला में प्रसिद्ध भूगोलवेत्ताओं की वैज्ञानिक शोध प्रकाशित हुई थी। इस ग्रन्थमाला में हाइम की पुस्तक हिमनदी पर थी। हान की पुस्तक जलवायु विज्ञान पर थी और पैंक की पुस्तक भू-आकृति विज्ञान पर थी। रेटजेल की रूची भौतिक भूगोल में बहुत अधिक थी, इसी कारण अपने जीवन में आगे चलकर जब उसने मानव भूगोल का वर्णन किया, तब उसने वातावरण की शक्तियों को सदा ध्यान में रखा था।

       फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता ब्रूंज ने लिखा है, रेटजेल को पार्थिव सत्यता का बहुत ऊँचा ज्ञान था। वह पृथ्वी पर मानवीय तथ्यों को केवल एक दार्शनिक या इतिहासकार अथवा अर्थशास्त्री की दृष्टि से नहीं, वरन् भूगोलवेत्ता की दृष्टि से देखता था। उसने मानवीय तथ्यों से बहुत से विभिन्न सम्बन्धों को भौतिक तथ्यों के साथ परखा था- जिनमें भूमि की ऊँचाई, जलवायु, वनस्पति आदि भी थे। उसने पृथ्वी के गोले पर मानव समूहों को बसते हुए, जीवकोपार्जन करते हुए, और इतिहास का निर्माण करते हुए देखा था। उसकी दृष्टि एक सच्चे प्रकृतिवादी की दृष्टि थी।

         रेटजेल उन गिने-चुने विद्वानों में से थे जिन्होंने बहुमुखी प्रतिभा के आधार पर भूगोल की सेवा की। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल को विकसित किया एवं यह शीघ्र ही वैज्ञानिक स्वरूप लेकर पौधों से विशाल वटवृक्ष की भाँति चहुँदिशा में प्रसारित हो गया। सभी यूरोपीय भूगोलवेत्ताओं ने उसके बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों की सराहना की। वह जीव विज्ञान, भू-विज्ञान, मौसम विज्ञान, आदि विषयों के विद्वान रहे। उसने जीव विज्ञान पर लिखना प्रारम्भ किया और यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के भ्रमण के उपरान्त वह भी हम्बोल्ट की भाँति एक मँजे हुए भूगोलवेत्ता बन गये।

        रेटजेल ने अपनी पूर्व के अनुभवों का मानव भूगोल चिन्तन के विकास में लाभ उठाया। वह डार्विन क विकासवादी सिद्धान्त से बहुत प्रभावित हुए, इसी से उन्होंने भौतिक परिवेश, उसके तत्व एवं उसका मानव पर प्रभाव का बहुमुखी रूप में पता लगाया। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल के लिए शब्द का प्रयोग किया। उसके अनुसार मानव भूगोल को भौतिक भूगोल की पृष्ठभूमि में ही सही-सही समझा जा सकता है। मानव भूगोल भू-मण्डल पर स्थल एवं भौतिक परिवेश से नियंत्रित मानवता के विस्तार एवं विवरण समझाता है। वास्तव में, उसने मानव भूगोल साथ-साथ कई विज्ञानों पर लिखा, इसी कारण रेटजेल को जर्मनी में मानव भूगोल के पिता होने का श्रेय प्राप्त है।

एन्थ्रोपोज्योग्राफी (मानव भूगोल):-

         रेटजेल रिटर के विचारों से विशेष रूप से प्रभावित हुआ और स्वयं उसने यह स्वीकार किया कि वह रिटर की अर्डकुंडे रचना को भूतल पर गतिशील विकास के सन्दर्भ में विकसित करना चाहता है। उसने पृथ्वी को एक इकाई के रूप में तो स्वीकार किया परन्तु उसका चिन्तन इस ग्रन्थ में निम्न दो बातों के आधार पर रिटर से भिन्न है:-

(i) उसने इसमें प्रादेशिक वर्णन के स्थान पर मानव भूगोल एवं परिवेश सम्बन्धी व्यवस्थित वर्णन प्रस्तुत किये।

(ii) उसने डार्विन के सिद्धान्त में विश्वास करते हुए मानव को विकास की अन्तिम कड़ी माना।

         अतः उसके इस ग्रन्थ में मानव वितरण के लिए उत्तरदायी कारक एवं प्राकृतिक परिवेश के तत्वों की व्याख्या सरल एवं स्पष्ट भाषा में की गयी है। अतः प्रथम खण्ड को ‘Application of geography to history भी कहा जाता है। उसके अनुसार भूतल पर हमारे कार्यकलापों के निर्धारण में परिवेश के निम्न चारों प्रभावी समूह महत्वपूर्ण हैं।

(i) शारीरिक प्रजातीय लक्षणों वाले प्रभाव,

(ii) मनोवैज्ञानिक प्रभाव,

(iii) जनसमूह की आर्थिक एवं सामाजिक गतिशीलता की न्यूनाधिकता के स्वरूप में फैली प्राकृतिक शाक्तियों के भौगोलिक प्रभाव, एवं

(iv) मानवता के वितरण एवं गतिशीलता को नियंत्रित एवं निर्धारित करने वाले प्रभाव।

           उपरोक्त चारों प्रभावों के कारकों का समूह ही प्राकृतिक परिवेश का प्रमुख आधार है। उसने मानव मन को भी प्राकृतिक परिवेश की उपज माना। उसने प्रथम ग्रन्थ में प्रायः कठोर निश्चयवाद का अनुसरण किया। उसके अनुसार, नियति द्वारा दी गई भूमि पर ही मानव को निवास करना चाहिए एवं उसे वहाँ विधना (प्राकृतिक परिवेश व भाग्य) के नियमों के अनुसार ही मौत का भी वरण करना चाहिये।

         उसने दूसरे खण्ड में मानव समुदाय के तात्कालिक विश्व वितरण की व्याख्या की। उसने भूतल के बसे हुए एवं निर्जन प्राय प्रदेशों के विस्तार को बताते हुए उनकी सीमा निश्चित की। रेटजल ने बताया कि बसी हुई दुनियाँ की सीमा पर बसे हुए बिखरे मानव समुदाय सभ्यता की चौकियाँ हैं। जलवायु के प्रभाव को महत्वपूर्ण बताते हुए उसने प्राचीन सभ्यता-केन्द्रों के उद्भव एवं विकास का कारण भी इसे ही बताया। जल संसाधन असभ्य मानव के लिए प्रमुख बाधा थे परन्तु ज्योंहि मानव ने नौवहन सीख लिया यह बाधा उसके लिए महान राजमार्ग बन गया। 

         मानव एवं उसके विकास के लिए रेटजेल ने तीन कारणों को उत्तरदायी माना, यह है-

(i) (Lage Situation) स्थिति- यह स्थिति अन्य मानव समूहों के सन्दर्भ में है। 

(ii) Raum (Space) स्थान- क्षेत्र की सहसम्बद्धता, क्षेत्र की केन्द्रीयता एवं उनकी सीमावर्ती स्थिति इसके अंग हैं। ऐसा क्षेत्र जनसंख्या की अधिकता के साथ-साथ प्राकृतिक अथवा मानवीय बाघाएँ स्वीकार नहीं करता, एवं

(iii) Rahmen (limits) सीमाएँ- मानव समुदाय प्राकृतिक ढाँचे अथवा निर्धारित सीमा में विकसित होते हैं।

       संक्षेप में, रेटजेल के एन्थ्रोपोज्योग्राफी ग्रन्थ में निम्न तीन समस्याओं की ओर विशेष ध्यान दिया गया है:-

(i) भूतल पर मानव समूहों का वितरण-

       इसमें मानव के जातीय, राष्ट्रीय भाषा एवं धार्मिक स्तर विषयक वर्णन हैं जिन्हें समझने के लिए वांछित मानचित्र चाहिए। वर्तमान में यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूगोल का अभिन्न अंग माने गये हैं।

(ii) उपरोक्त वितरण किस प्रकार भौतिक परिवेश द्वारा प्रभावित है एवं उस पर निर्भर है।

(ii) मानव एवं उसके समाज पर भौतिक परिवेश का स्पष्ट प्रभाव। जैसे जलवायु एवं धरातल का प्रभाव।

           उसने इस प्रकार एन्थ्रोपोज्यॉग्राफी में सामान्यीकरण की प्रक्रिया को अपनाया। अपनी दूरदृष्टी के कारण उसने अपनी ग्रन्थ रचना में वारेनियस की भाँति कोई योजना नहीं बनायी। वह अपने अनुभवों के सहारे बढ़ता गया एवं ज्यों-ज्यों उसका कार्य आगे बढ़ा कई समस्याएँ उसके सम्मुख आयीं तो रेटजेल उनके निराकरण में तथा उससे सम्बन्धित विषय को समझने में लग गया।

       समुचित अध्ययन हेतु प्रदेशों एवं क्षेत्रों के अध्ययन के दर्शन को रेटजेल के साथ-साथ रिचथोफेन एवं हेटनर ने भी (ऐसे ही अध्ययन को) क्षेत्रीय अध्ययन के सिद्धान्तों को भूगोल का अनिवार्य अंग माना। वर्तमान में इस चिन्तन को विकसित करने का श्रेय हार्टशोर्न को है।

        रेटजेल की मानव भूगोल की धारणा की परिणति राजनीतिक भूगोल में हुई।  रेटजेल की राजनीतिक भूगोल नामक पुस्तक का प्रकाशन 1897 में हुआ था। वे राज्य को पृथ्वी की सतह पर एक विशिष्ट किस्म की भौगोलिक इकाई के रूप में देखते थे। वे राज्य की तुलना जैविक इकाई (जीवशास्त्र) से करते थे। उनके अनुसार राज्य वस्तुतः पृथ्वी पर मनुष्य द्वारा रचित एक संगठन होता है जिसमें जनसंख्या का निवास पाया जाता है।

         उनके अनुसार राज्य एक स्थानिक जीव की तरह है जो अपनी प्रकृति प्रदत्त सीमाओं तक प्रसार करता है। यदि उसके प्रसार को अवरोध नहीं मिलता तो वह अपनी प्राकृतिक सीमाओं को लांघ कर अपनी सीमा का विस्तार करता है। यह प्रवृत्ति विकसित मानव समूहों, बंजारों, चरवाहों, शिकारी समूहों आदि सभी में मिलती है। यहीं से लेवांसराम की सकल्पना का जन्म होता है।

          इस तरह रेटजेल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे मानव भूगोल के प्रणेता थे। उन्हें नियतिवादी कहना गलत है। यह एक भ्रान्ति थी। भ्रांति का कारण जर्मन भाषा के उनके ग्रन्थों का अंग्रेजी अनुवाद था जिसमें मनुष्य एवं प्रकृति के सम्बन्ध के मापन पर जोर देने के कारण रेटजेल को प्रकृतिवादी कहा गया।

     चूँकि इनकी शिष्या कुमारी ऐलेन सेम्पुल ने आगे चलकर अति कठोर प्रकृतिवादी विचारधारा प्रस्तुत की अतः उनके गुरू के प्रकृतिवादी होने की धारणा अपने आप पुष्ट होती गई जब आधुनिक लेखकों ने उनके मूल योगदान को पढ़ा तो यह तथ्य स्पष्ट हुआ। रेटजेल ने लीपजिंग में एक भूगोल संस्था की भी स्थापना की थी जो शीघ्र अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की संस्था बनी।

       रेटजेल के समय में या तो भौतिक भूगोल का अधिक अध्ययन हो रहा था या मनुष्य का। मनुष्य के विकास को यंत्रवत् बतलाया गया था तथा मनुष्य का भौगोलिक स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं माना जाता था। रेटजेल ने इस अन्तर को पाटने का प्रयास किया। उनके कार्य भौतिक भूगोल एवं मनुष्य के अध्ययन के बीच की कड़ी है। वे प्रकृति के उन नियमों के अध्ययन को आवश्यक मानते थे जो पृथ्वी पर जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करते हैं। उन्होंने मनुष्य को पृथ्वी की एक ईकाई के रूप में भूगोल में समाविष्ट किया। इस प्रयास से भूगोल पुर्नजीवित हो उठा।

 13. अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट का भूगोल के विकास में योगदान

 13. अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट का भूगोल के विकास में योगदान




अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट

प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल के विकास में अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट द्वारा दार्शनिक तथा विधितंत्र योगदान का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

          अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट एक महान जर्मन भूगोलवेता था। जिसका जन्म 1769 ई० में और मृत्यु 1859 ई० में हुआ। हम्बोल्ट छायावादी युग (1800-59 ई०) का भी महान भूगोलवेता था। इनके समकालीन जर्मनी में रिटर और हॉर्टशोन जैसे महान भूगोलवेत्ता तथा शिलर और गेटे जैसे साहित्यकार भी सक्रिय थे।

अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्टअलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट की जीवनी

        अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट को आधुनिक भूगोल का जन्मदाता माना जाता है। हेटनर महोदय ने कहा है कि आधुनिक भूगोल की शुरुआत 1799 ई० से माना जाना चाहिए क्योंकि हम्बोल्ट ने इसी वर्ष विश्व प्रसिद्ध द० अमेरिका की यात्रा पर निकला था। हम्बोल्ट का जन्म बर्लिन में एक करोड़पति के घर में हुआ था। इसकी शिक्षा-दीक्षा जर्मनी के बड़े-2 विद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में हुई थी। इसने फ्रैंकफर्ट विश्व विद्यालय में वनस्पतिशास्त्र, गाटिंगन विश्वविद्यालय में भूगर्भशास्त्र का अध्ययन किया।

       1789 ई० में हम्बोल्ट ने बैसाल्ट के उद्भव पर भूगोल लिखा जिसकी सर्वत्र चर्चा हुई। किशोरावस्था में ही जॉर्ज फोस्टर के साथ हॉलैंड, बेल्जियम, फ्रांस और इंगलैंड का यात्रा कर चुका था। अक्सर हम्बोल्ट अपने बड़े भाई विल्हेम वॉन हम्बोल्ट से मिलने स्वीट्जरलैण्ड के ‘जेना’ नगर में आता जाता रहता था। अर्थात हम्बोल्ट के जीवन में यात्रा की नींव बचपन में ही रख दी गई थी। हम्बोल्ट अपने जीवन में लगभग 60,000 मील की यात्रा किया। इस यात्रा के दौरान उसने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जो अनुभव किया उसे ‘Cosmos’ नामक पुस्तक में लिपिबद्ध कर पूरे विश्व में अपनी पहचान स्थापित कर दिया। 

हम्बोल्ट की यात्राएँ

        1799 ई० में हम्बोल्ट के द्वारा की गई यात्रा का अगर विश्लेषण की जाय तो स्पष्ट होता है कि उसने अपनी यात्रा का प्रारंभ किरुना (स्पेन) नामक बंदरगाह से किया था। स्पेन से चलकर वह सबसे पहले बेनेजुएला के कुमाना बंदरगाह पर उतरा। हम्बोल्ट वेनेजुएला में बहनेवाली औरिनिको नदी के सहारे आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र पहुँचा और आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र का खोज किया।         

        आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र खोजे जाने के बाद वह क्यूबा लौट आया। पुन: हम्बोल्ट लौटकर मैग्डालिना घाटी के सहारे एण्डीज पर्वत के ऊपर चढ़ाई किया। एण्डीज पर्वत पर चढ़ने के क्रम में वह चिम्बराजो चोटी पर चढ़ाई किया था, चिम्बराजो के क्रेटर में उत्तरा और बैसाल्ट का अध्ययन किया। चिम्बराजो पर चढ़ाई करने के बाद क्वीटो घाटी के सहारे पेरू की राजधानी लीमा पहुँचा। पेरू के तट पर उसने पेरू की ठण्डी जलधारा का खोज किया और उसका नामाकरण अपने नाम पर किया।

      हम्बोल्ट पेरू के तट पर गवानो पक्षी का विशिष्ट रूप से अध्ययन किया। लीमा के बाद एकापुल्का बंदरगाह से होते हुए वह मैक्सिको पहुँचा और सलाह दिया कि प्रशान्त महासागर और अटलांटिक महासागर जोड़ने के लिए पनामा नहर का निर्माण किया जाए। मैक्सिको से पूरब क्यूबा की राजधानी हवाना और हवाना से USA के प्रसिद्ध नगर फिलाडेल्फीया और वाशिंगटन का यात्रा किया। पुनः वाशिंगटन से वह पेरिस लौट आया और पेरिस में ही वह बस गया।

       पुनः 1827 ई० में रूसी सरकार के निमंत्रण पर  यूराल पर्वत, साइबेरिया और अल्टाई पर्वत श्रृंखला का यात्रा किया। इस यात्रा के लौटने के बाद ही उसने अपने ‘Cosmos’ नामक पुस्तक की रचना प्रारंभ किया। हम्बोल्ट के जीवन पर श्रीमती कैरोलीन फान वाल्सगाने के इस कथन का जबरदस्त प्रभाव था। जैसे- पृथ्वी के एक-एक तत्व परस्पर एक-दूसरे से गुथे हुए हैं। प्रत्येक तत्व एक-दूसरे को जीता और जीलाता है।” हम्बोल्ट ने अपने यात्रा के दौरान इस कथन का प्रत्यक्ष दर्शन किया था और इसे सत्य माना।

अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट के दर्शन एवं विधितंत्र

          अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट ने भूगोल के दर्शन एवं अध्ययन विधि या विधितंत्र में निम्नलिखित योगदान दिया है।

    हम्बोल्ट अपनी पुस्तक ‘कॉसमास’ में सात प्रकार की संकल्पना विकसित की हैं:-

(1) पृथ्वी के सतह का अध्ययन मानवीय अधिवास के रूप में करते हैं।

(2) भूगोल का अध्ययन क्षेत्रीय वितरण के रूप में करते हैं।

(3) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है।

(4) भूगोल का मुख्य उद्देश्य भौतिक वातावरण मानवीय संबंधों का अध्ययन होना चाहिए।

(5) भूगोल में पृथ्वी के सभी घटकों का अध्ययन किया जाना चाहिए। 

(6) भूगोल में क्रमबद्ध पद्धति का विकास किया जाना चाहिए।

(7) भूगोल प्रकृति के एकता का भी अध्ययन करता है।

           हम्बोल्ट के द्वारा विकसित उपरोक्त 7 संकल्पनाओं के अलावे भी उसने कई और दर्शन विकसित किए। जैसे उसने कहा कि प्रकृति जीवन्त समष्टि हैं। उसने इसे अन्योन्याश्रिता के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। उसने कहा है कि मुझे आमेजन के वनों में विचरण करते हुए एण्डीज पर्वत पर चढ़ाई करते हुए इसका सदा बोध होता रहा कि सम्पूर्ण प्रकृति एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक बसा हुआ है तथा उन सबमें एक ही आत्मा से अनु-प्रामाणिक है।

            हम्बोल्ट ने भूदृश्य की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा है कि “एक ही जीवंत समष्टि (आत्मा) भूतल के विभिन्न भागों में विभिन्न रूपों में प्रकट होती है जिसकी अपनी विशिष्टता होती है।” इसी संदर्भ में उन्होंने “वन लाइफ” एक जीवन की संकल्पना प्रस्तुत किया।

          हम्बोल्ट पार्थिव एकता की संकल्पना को समझाने के लिए ‘वाटर फ्लाई संकल्पना’ प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने कहा है कि एक तितली विषुवतीय प्रदेश में अपना पंख हिलाती है तो इसका असर संपूर्ण विश्व के जलवायु पर पड़ता है।

          हम्बोल्ट वेनेजुएला के वेलेन्सिया झील के सूखने का कारण बताया कि इस झील के किनारे में अवस्थित वनों का तेजी से कटाव किये जाने के कारण यह झील सूख रहा है।

         हम्बोल्ट ने बताया कि भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से अपने ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव करके किया जाना चाहिए। यही कारण है कि इनके अध्ययन की पद्धति को प्रत्यक्ष अनुभव परक कहा जाता है। पुन: इन्होंने बताया कि भौगोलिक तत्त्वों का विकास आगमानात्मक (Inductive) रूप से हुआ है। इससे लगता है कि इनके जीवन पर डार्विन के द्वारा विकसित जैव उद्दविकास के सिद्धांत का प्रभाव था।

           अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट को भूगोल में जलवायु विज्ञान, पादप भूगोल का श्रीगणेश करने का श्रेय जाता है। अर्थात हम्बोल्ट को जैव भूगोल का संस्थापक माना जाता है क्योंकि इन्होंने ही सर्वप्रथम विश्व की प्राकृतिक वनस्पति तथ फसलों का ऊँचाई तथा तापमान से सम्बन्ध को स्पष्ट किया था। उसने अपने यात्रा के दौरान समताप रेखा (Isotherm) पहली बार खींचने का प्रयास किया था। हम्बोल्ट अपनी पुस्तक को कई खण्डों में बाँटकर लिखा है। इसका सबसे अन्तिम खण्ड 1859 ई० में पूरा किया। पूरे जीवन में उसने लगभग 40 ग्रंथ लिखे। 

आलोचना

   हम्बोल्ट मूलतः नियतिवादी दर्शन का समर्थक था जिसमें उसने प्रकृति की श्रेष्ठता को स्वीकार किया था। इसी विचारधारा के विरोध में फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने मानव की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए संभववाद की संकल्पना का विकास किया। इस तरह भूगोल में नियतिवाद बनाम संभववाद का द्वैतवाद का प्रारंभ हुआ। 

निष्कर्ष 

        इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हम्बोल्ट एक महान भूगोलवेता था। इसके विचारधारा से निश्चित रूप से कई द्वैतवाद का विकास हुआ। लेकिन हम्बोल्ट का उद्देश्य भूगोल को विभाजित करना नहीं था बल्कि उसके प्रत्येक अंगों का सम्पूर्ण विकास करना था।

नोट : हम्बोल्ट ने प्राकृतिक प्रदेश की आधारभूत समरसता को “जुसामेनहैंग” की संज्ञा दी।

12. जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान

12. जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान




जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान⇒

                     आधुनिक भूगोल के विकास का श्रेय यूरोपीय चिंतकों को जाता है। यूरोप में भूगोल के विकास को दो काल में बाँटा जा सकता-

(1) पुनर्जागरण काल के पूर्व का भूगोल

(2) पुनर्जागरण काल के बाद का भूगोल

        यूरोप में पुनर्जागरण के साथ ही वैज्ञानिक चिन्तन शुरू हुआ जिसका प्रभाव लगभग सभी विषयों पर पड़ा। पुनः जब इंगलैण्ड में औद्योगिक क्रांति हुई तो इस क्रांति का प्रभाव अन्य विषयों पर पड़ा। वैज्ञानिक चिन्तन और औद्योगिक क्रांति का परिणाम था कि भूगोल जैसे विषय में भी गत्यात्मकता का आगमन हुआ। पुनर्जागरण काल के पहले भूगोल में यूनानी और रोमन भूगोलवेताओं का विशेष योगदान था जबकि पुनर्जागरण काल के बाद जर्मन, फ्रांसीसी और ब्रिटिश भूगोलवेताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। 

जर्मन भूगोलवेत्ताओं

    उपरोक्त चिन्तनों में जर्मनी भूगोलवेताओं को आधुनिक चिंतन विकसित करने का श्रेय जाता है। जर्मनी में भूगोल के अध्ययन की शुरुआत 18वीं शताब्दी के पूर्व से माना जाता है क्योंकि इसी काल में भूगोल का अध्ययन विद्यालय स्तर पर किया जाने लगा था। प्रारंभिक जर्मन भूगोलवेताओं में इमैनुएल काण्ट तथा फॉस्टर जैसे भूगोलवेताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। क्योंकि इन दोनों ने पहली बार उच्च शिक्षण संस्थानों में भौगोलिक अध्ययन पर विशेष जोर दिया। काण्ट महोदय की विशेष रुची खगोल विज्ञान अध्ययन में थी जबकि फॉस्टर की विशेष रुची भूआकृति विज्ञान में था। अत: भूगोल में खगोलशास्त्र और भूआकृति विज्ञान के विकास का श्रेय काण्ट और फॉस्टर को जाता है।

       प्रारंभ में भूगोल का अध्ययन इतिहास के अन्तर्गत किया जाता था। भूगोल को इतिहास से अलग करने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है क्योंकि इन्होंने ही सबसे पहले बताया कि किसी भी घटना का अध्ययन स्थान (space) और काल के संदर्भ में किया जाता है। समय के संदर्भ में किसी भी घटना का अध्ययन इतिहास कहलाता है जबकि स्थान के संदर्भ में किसी भी घटना का अध्ययन भूगोल कहलाता है। पुनः काण्ट एवं फॉस्टर ने भूगोल में कई नवीन चिंतन को प्रस्तुत किया है। लेकिन इन दोनों ने ही मिलकर जर्मनी के उच्च शिक्षण संस्थानों में भूगोल को एक विषय के रूप में मान्यता नहीं दिलवा सके।

       वास्तव में आधुनिक भूगोल का जन्मदाता हम्बोल्ट और रिटर को माना जाता है। ये दोनों भूगोलवेत्ता एक-दूसरे के समकालीन थे। हम्बोल्ट का जन्म 1769 ई० में हुआ था जबकि रिटर का जन्म 1779 ई० हुआ था लेकिन दोनों की मृत्यु एक ही वर्ष 1859 ई० हुई थी। ये दोनों भूगोलवेता आधुनिक भूगोल के विकास के पोषक थे। लेकिन दोनों के दृष्टिकोण अलग-2 था। सामान्यता दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर भूगोल के विधितंत्र से संबंधित था।

     जैसे:- हम्बोल्ट का मानना था कि भूगोल का विकास Inductive Method (आगमानात्मक विधि) से हुआ। जबकि रिटर के अनुसार Deductive Method (निगमानात्मक विधि) से हुआ है। इन दोनों के मौलिक विचार में अन्तर का प्रमुख कारण दोनों के अलग-2 जीवन का पृष्ठ भूमि था। जैसे- हम्बोल्ट बर्लिन के एक करोड़पति बाप का इकलौता बेटा था। जबकि रिटर एक गाँव से आने वाला गरीब गड़ेडिया का बेटा था।

       हम्बोल्ट की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। इसलिए उसने शुरू से वैज्ञानिक विषय की पढ़ाई की और वैज्ञानिक चिन्तन का विकास किया। जबकि रिटर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसलिए दर्शनशास्त्र जैसे मानविकी विषय का अध्ययन किया। इसलिए वह ईश्वरवादी विचारों पर जोर दिया।

      हम्बोल्ट ने अपना वैज्ञानिक विचार “Cosmos” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया जबकि रिटर ने ‘अर्डकुण्डे’ नामक पुस्तक में अपना चिंतन प्रस्तुत किया। हम्बोल्ट विश्व के यात्रा करने के बाद अपना विचार प्रस्तुत किया। उसने अपने जीवन काल में 60,000 मील से भी अधिक यात्रा की। दूसरी ओर रिटर को आरामकुर्सी पर बैठने वाला चिंतक माना जाता है।

         हम्बोल्ट ने अपनी यात्रा के दौरान अमेजन नदी के उद्गम स्थल की खोज की। यूरोप का वह पहला व्यक्ति बना जो एण्डीज पर्वत को पार कर पेरू की ठण्डी जलधारा की खोज की। यहाँ तक की चिम्बराजो ज्वालामुखी के क्रेटर में उतरकर बैसाल्टिक चट्टानों का अध्ययन किया। यात्रा के दौरान हमबोल्ट अपने नाव पर एक प्रयोगशाला भी लेकर चलता था। अपने यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों का तापमान का मापन किया और उसके बाद पहली बार समताप रेखा खींचा।

      पुन: हमबोल्ट मैक्सिको और न्यूयार्क की यात्रा करते हुए यूरोप पहुँचा। यूरोप में आने के बाद रूस के जार (राजा) के अनुरोध पर पुन: उसने यूराल पर्वत और साइबेरियाई क्षेत्र की यात्रा की। वहीं दूसरी ओर रिटर महोदय ने जर्मनी में रहकर विभिन्न प्रकार के भौगोलिक सूचनाओं को एकत्रित कर चिन्तन एवं लेखन का कार्य किया।

         हम्बोल्ट अपनी पुस्तक कॉसमॉस में सात संकल्पना विकसित किये हैं।-

(1) पृथ्वी के धरातल का अध्ययन ‘मानवीय अधिवास’ के रूप में किया जाना चाहिए।

(2) भूगोल का अध्ययन क्षेत्रीय वितरण के रूप में किया जाना चाहिए।

(3) भौतिक भूगोल ही सामान्य भूगोल है।

(4) भौगोलिक अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य भौतिक भूगोल और मानवीय संबंधों के अध्ययन होना चाहिए।

(5) भूगोल में पृथ्वी के सभी घटकों का अध्ययन होना चाहिए।

(6) भूगोल में क्रमबद्ध अध्ययन पर जोर दिया जाना चाहिए।

(7) भूगोल के सभी घटक एक-दूसरे से जुड़े हुए है। इसे पार्थिव एकता का सिद्धांत भी कहते हैं।

          रिटर ने अपने अध्ययन में हम्बोल्ट के अधिकार संकल्पना को शामिल किया लेकिन दो संकल्पना में रिटर के मत भिन्न था। जैसे:- रिटर के क्रमबद्ध अध्ययन के स्थान पर प्रादेशिक अध्ययन पर विशेष जोर दिया। वहीं प्रकृति या पृथ्वी के स्थान पर मानव के अध्ययन पर इसने विशेष जोर दिया। लेकिन वास्तव में ये दोनों ही भूगोलवेत्ता नियतिवाद के समर्थक थे।

          रैटजल अगले महान जर्मन भूगोलला थे। जिन्हें ‘मानव भूगोल’ शुरुआत करने का श्रेय जाता है। इन्होंने भूगोल में “भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल” का द्वैतवाद शुरू किया। इन्होंने नियतिवाद के स्थान पर पर्यावरण नियतिवाद की संकल्पना विकसित किया। इन्हें भूगोल में राजनीतिक भूगोल और सांस्कृतिक भूदृश्य संकल्पना विकसित करने का श्रेय जाता है। राजनीतिक भूगोल में उन्होंने कहा है कि कोई भी राज्य या समाज जैविक उद्दविकास के समान ही अनेक अवस्थाओं से गुजरकर विकसित होते हैं।”

      इसी तरह से संस्कृतिक भूदृश्य में उन्होंने बताया कि “अलग-अलग वातावरण में अलग-अलग रहन-सहन, खान-पान पोषक, विश्वास, भाषा इत्यादि का विकास होता है। जिससे अलग-2 सांस्कृतिक भूदृश्य विकसित होते हैं। “ रैटजेल ने कई पुस्तकों की भी रचना की। जैसे- “एंथ्रोपोज्योग्रफिया”, “पॉलिटिकल ज्योग्रफी”  और “प्रिंसिपुल ऑफ ह्यूमैन ज्योग्रफी”। रैटजेल ने अपने चिंतन पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि “मैने यात्रा की रेखा खींची और उसके बाद मैने वर्णन किया यही मेरा भूगोल है।” उन्होंने यह भी कहा है कि भूगोल एक वर्णात्मक विषय है। पुनः उन्होंने कहा है कि भूगोल में विश्लेषण पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए।

        उपरोक्त भूगोलवेताओं के अलावे कई और ऐसे भूगोलवेत्ता हुए जिन्होंने भूगोल में व्यकिगत योगदान देकर भौगोलिक चिन्तन के विकास को समृद्ध किया है। रीचथोपेन महोदय ने भूगोल में क्षेत्रीय विज्ञान को जन्म दिया। वहीं हेटनर महोदय ने मानव भूगोल, विश्व का ‘वृहत प्रादेशिक भूगोल, भूगोल का इतिहास, लक्षण और विधि’ नामक पुस्तक में स्थलाकृतिक विज्ञान और विभिन्न प्रदेशों का अध्ययन विकसित किया।

      जैलेन महोदय ने ‘भूराजनीति का सिद्धांत’ विकसित किया। जिसमें बताया कि “कोई भी राज्य भूमि की राजनीति करता है।” जैलेन के इस विचारधारा को सबसे अधिक समर्थन हिटलर और उसके सेनापति कार्ल हाउशोफर के द्वारा प्राप्त हुआ। कार्ल हाउशोफर ने भूराजनीति के अध्ययन हेतु “इन्स्टीच्यूट ऑफ ज्यो पोलिटिक्स स्कूल” की स्थापना करवायी।

         जर्मन भूगोलवेता में अल्बर्ट पेंक और बाल्थर पेंक जैसे भूगोलवेत्ता प्रमुख हैं, जिन्होंने अमेरिकी भूगोलवेत्ता डेविस के द्वारा प्रस्तुत सामान्य अपरदन चक्र सिद्धांत के विरोध में ‘आधुनिक एवं वैज्ञानिक अपरदन चक्र का सिद्धांत’ प्रस्तुत किया। इसी तरह वॉन थ्यूनेन ने कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत, बेबर ने औधोगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत, क्रिस्टॉलर ने केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत प्रस्तुत कर जर्मन भौगोलिक चिन्तन को समृद्ध किया है।

निष्कर्ष

       इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि आधुनिक भूगोल के विकास में जर्मन भूगोलवेत्ताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। इनके योगदान को आज भी विश्व के कई देशों में न केवल मान्यता प्राप्त है बल्कि उसका अध्ययन भी किया जाता है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

       आधुनिक वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना में जर्मनी को प्रथम स्थान दिया जाता है। वहाँ अठारहवीं सदी (कान्ट के समय) से ही भूगोल में आधुनिकता एवं वैज्ञानिकता की नींव पड़ चुकी थी। कान्ट ने सर्वप्रथम भूगोल के लिए कुछ नियमों का प्रतिपादन किया, इस प्रकार यद्यपि उन्होंने भूगोल में वैज्ञानिकता की आधारशिला रखी, परन्तु भूगोल की वास्तविक रूपरेखा उन्नीसवीं सदीं में हम्बोल्ट (Humbolt) व रिटर (C. Ritter) ने तैयार की।

       कान्ट, रिटर, रेटजेल, हम्बोल्ट, रिचथोफेन व हेटनर जैसे भूगोलवेत्ताओं ने वातावरण निश्चयवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। रिचथोफेन तथा हेटनर ने भूगोल को क्षेत्रवर्णी विज्ञान के रूप में समझाने का प्रयत्न किया। जर्मनी के वर्तमान भूगोलवेत्ताओं ने लैण्डशाफ्ट (Landchaft) की विचारधारा का समर्थन किया। भू-राजनीति की विचारधारा का उदय जर्मनी में ही हुआ। हम्बोल्ट ने क्रमबद्ध व रिटर ने प्रादेशिक भूगोल का प्रतिपादन किया। इसी प्रकार की अनेक विचारधाराएँ जर्मन भूगोलवेत्ताओं ने प्रतिपादित की। प्रमुख विचारधाराओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

(i) वैज्ञानिक भूगोल (Scientific Geography):-

      अठारहवीं सदी में रीनहॉल्ड फॉर्स्टर तथा जार्ज फॉर्स्टर ने वैज्ञानिक ढंग से पृथ्वी के विभिन्न भागों के भौगोलिक तथ्यों के प्रेक्षण (Observations) किए। उन्होंने तथ्यों को एकत्र किया, उनकी तुलना की, वर्गीकरण किया-इस वर्गीकरण में तथ्यों का सामान्यीकरण (Generalization) किया और उनकी कारणात्मक व्याख्याएं लिखीं। उन्होंने भौगोलिक सामग्री का वैज्ञानिक विवेचन किया। इस प्रकार रीनहॉल्ड फॉर्स्टर प्रथम विधितन्त्रीय भूगोलवेत्ता था। जॉर्ज फॉर्स्टर ने उसका अनुसरण किया। कान्ट ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान किया। इनके द्वारा तैयार आधार (Foundation) पर ही उत्तरकालीन भूगोलवेत्ताओं ने वर्तमान भूगोल के भव्य भवन का निर्माण किया।

(ii) क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography):-

       रीनहॉल्ड फॉर्स्टर, जॉर्ज फॉर्स्टर व कान्ट ने क्रमबद्ध भूगोल में काफी योगदान किया, परन्तु क्रमबद्ध भूगोल का सबसे महान भूगोलवेत्ता हम्बोल्ट था। वस्तुतः वर्तमान भूगोल का संस्थापक व प्रवर्तक हम्बोल्ट को ही माना जाता है। उसकी प्रसिद्ध ग्रन्थमाला कॉसमॉस (Cosmos) में क्रमबद्ध भूगोल है। हम्बोल्ट ने दो ग्रन्थ ‘मध्य एशिया’ (Vol. 1 & Vol. 2) फ्रांसीसी भाषा में प्रकाशित कराए।
(iii) वातावरण निश्चयवाद (Environmental Deter- minism):-

     वातावरण निश्चयवाद का जन्म जर्मनी में हुआ। रिटर, रेटजेल व हम्बोल्ट का इसमें मुख्य योगदान था। इस विचारधारा में मानवीय क्रियाओं को प्रकृति द्वारा नियंत्रित बताया गया था।

(iv) भूगोल : क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Geography: Chorological Science):-

      भूगोल को क्षेत्रवर्णी विज्ञान के रूप में प्रतिपादित करने का श्रेय जर्मन भूगोलवेत्ताओं को ही है। रिचथोफेन व हेटनर का इसमें विशेष योगदान था। इन्होंने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र की व्याख्या की थी तथा अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों के साथ भूगोल के सम्बन्धों का संश्लेषण किया था:

     “Geography is a Chorological Science of the earth’s surface, of the science of earth areas in terms of their differences and their spatial relations.” -Hatner

(v) भू-राजनीति (Geo-Politics):-

     ‘भू-राजनीति’ शब्द यद्यपि एक स्वीडिश भूगोलवेत्ता द्वारा प्रस्तावित था, परन्तु इसके पूर्व ही रेटजेल के ‘राजनीतिक भूगोल’ से इसका बीजारोपण हो चुका था। सूपान (Supan) की पुस्तक ‘सामान्य राजनीतिक भूगोल के मार्गदर्शक सिद्धान्त’ 1922 में प्रकाशित हुई।

        द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व व युद्ध के समय जर्मन लोगों ने अपनी जातीय व सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा किया था। इसी आधार पर रहने के स्थान का नारा लगाया। इसी के परिणामस्वरूप भू-राजनीति का विकास हुआ।

       इस क्षेत्र में कार्ल हाशोफर (Karl Haushofer) अत्यन्त प्रभावशाली था। उसने अपनी भू-राजनीति की विचारधारा को अपनी पुस्तक ‘मीन कैम्फ’ (Mein Kampf) में प्रस्तुत किया था।

(vi) प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography):-

        प्रादेशिक भूगोल का विकास रिटर द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ ‘अर्डकुण्डे’ से हुआ। रेटजेल के ‘मानव भूगोल’ व ‘मानव जाति का इतिहास’ आदि ग्रन्थों में विभिन्न देशों व प्रदेशों के अध्ययन किए गए थे। वॉन रिचथोफेन के ग्रन्थों में चीन के प्रादेशिक वर्णन मानचित्रों के साथ दिए गए थे।

       1925 में जर्मन सरकार ने अनेक भूगोलवेत्ताओं को खर्चा देकर भौगोलिक अन्वेषणों के लिए विदेश भेजा। लौटकर उन्होंने वहाँ के प्रादेशिक वर्णन लिखे।

(vii) अवस्थिति सिद्धान्तों का प्रतिपादन (Location theories):-

       जर्मनी में अनेक अवस्थिति सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया-

(क) वॉन थूनेन का कृषिवलय सिद्धान्त-

    वॉन थूनेन ने कृषि के स्थानीकरण का सिद्धान्त प्रस्तुत किया था। कोई भी कृषक वही फसल उत्पन्न करता है जिससे उसे सर्वाधिक लाभ होता है। किसी नगर के चारों ओर कृषि फसलों का स्थानीयकरण सकेन्द्रीय वृत्त खण्डों के रूप में होगा। प्रथम वलय में शाक, दुग्ध; द्वितीय में ईंधन की लकड़ी का उत्पादन, तृतीय में खाद्यान्न उत्पादन बिना परती भूमि छोड़े, चतुर्थ में खाद्यान्न परती भूमि छोड़कर व पंचम वलय में चरागाह होगा। वॉन थूनेन ने परिवहन लागत को बहुत अधिक महत्व दिया था।

(ख) वेबर का उद्योग अवस्थिति सिद्धान्त-

       अल्फ्रेड वेबर (Alfred Weber) जर्मन अर्थशास्त्री था। 1909 में उसने उद्योगों की अवस्थिति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। वेबर ने किसी उद्योग की स्थापना में परिवहन लागत, श्रम व एकत्रीकरण के प्रभाव को प्रदर्शित किया है।

(ग) क्रिस्ट्रालर के केन्द्रीय स्थिति सिद्धान्त-

      वाल्टर क्रिस्ट्रालर (Walter Christraller) आर्थिक भूगोलवेत्ता था। उसने नगरों व व्यापारिक केन्द्रों पर परिवहन, पारस्परिक क्रिया तथा मध्यवर्ती अवसर के प्रभावों व उनके परिणामों को विश्लेषित किया है।

(viii) लैण्डशॉफ्ट का अध्ययन (Study of Landchaft):-

     जर्मन विचारधारा के अनुसार भूगोल वह विज्ञान है, जिसमें ‘लैण्डशॉफ्ट’ का अध्ययन होता है। ‘लैण्डशॉफ्ट’ जर्मन भाषा का शब्द है। इसका अर्थ दृश्य, प्रदेश व प्रदेश की विशेषताएं हैं।

(ix) भूगोल की शाखाओं का विशेषीकरण (Specialization of Branches of Geography):-

      अठारहवीं सदी में ही कान्ट ने भूगोल की शाखाओं का वर्गीकरण कर दिया था। उन्नीसवीं सदी में रिटर व हम्बोल्ट ने इसको और अधिक स्पष्ट किया। साथ ही उन्होंने इसका विशेषीकरण करना भी प्रारम्भ किया। बीसवीं सदी के मध्य से इस दिशा में विशेष कार्य किया गया है। भूगोल की शाखाओं का विशेषीकरण इस प्रकार किया गया है कि प्रत्येक शाखा एक स्वतंत्र विज्ञान भी हो गई है। जैसे जलवायु विज्ञान, मृदा विज्ञान, भू-भौतिकी, भू-गणित, स्वास्थ्य भूगोल, कृषि भूगोल, परिवहन भूगोल, सैन्य भूगोल, आचरण भूगोल, वाणिज्य भूगोल, आदि।

error: