6. Concept of Planning Region and Methods for Delineation of Regions/ नियोजन क्षेत्र की अवधारणा एवं क्षेत्रों के सीमांकन की विधियाँ
Concept of Planning Region and Methods for Delineation of Regionsनियोजन क्षेत्र की अवधारणा एवं क्षेत्रों के सीमांकन की विधियाँ |

परिचय:
क्षेत्रीय नियोजन (Regional Planning) का मुख्य उद्देश्य किसी देश या क्षेत्र के विभिन्न भागों का संतुलित एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। इसके लिए सबसे पहले “Planning Region” की अवधारणा को समझना आवश्यक है। Planning Region वह भौगोलिक क्षेत्र होता है जिसे समान विशेषताओं, समस्याओं और विकास की संभावनाओं के आधार पर एक इकाई के रूप में नियोजन के लिए चुना जाता है।
नियोजन क्षेत्र की अवधारणा (Concept of Planning Region):
Planning Region एक ऐसा क्षेत्र होता है जहाँ भौतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समानताएँ पाई जाती हैं और जिसे विकास योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन के लिए उपयुक्त इकाई माना जाता है।
भूगोलविदों के विचार:-
✍️ John Friedmann के अनुसार नियोजन क्षेत्र वह क्षेत्रीय इकाई है जहाँ संसाधनों और विकास गतिविधियों का समन्वित उपयोग कर संतुलित विकास सुनिश्चित किया जाता है।
✍️ Peter Haggett के अनुसार नियोजन क्षेत्र ऐसे क्षेत्र होते हैं जिनमें स्थानिक (Spatial) संगठन और कार्यात्मक संबंध स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
✍️ E. G. R. Taylor के अनुसार नियोजन क्षेत्र एक भौगोलिक इकाई है जिसे समान विशेषताओं और समस्याओं के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
✍️ R. L. Singh के अनुसार नियोजन क्षेत्र वह भौगोलिक इकाई है जहाँ प्राकृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक समानताओं के आधार पर योजनाएँ बनाई जाती हैं ताकि संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित हो सके।
✍️ V. L. S. Prakasa Rao के अनुसार नियोजन क्षेत्र एक कार्यात्मक इकाई है, जहाँ संसाधनों, जनसंख्या और आर्थिक गतिविधियों के बीच आपसी संबंधों को ध्यान में रखकर विकास की योजना बनाई जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ:
प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
✍️ भौगोलिक समानता (Homogeneity) के आधार पर क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है।
✍️ कार्यात्मक एकता (Functional Unity) क्षेत्र के विभिन्न भागों को जोड़ती है।
✍️ संसाधनों की उपलब्धता और उपयोग में समानता पाई जाती है।
✍️ सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं की प्रकृति समान होती है।
✍️ प्रशासनिक दृष्टि से क्षेत्र का प्रबंधन करना सुविधाजनक होता है।
✍️ क्षेत्र-विशिष्ट (Area-specific) योजना निर्माण संभव होता है।
✍️ सतत एवं संतुलित विकास को सुनिश्चित करने में सहायक होता है।
Planning Region की आवश्यकता:
Planning Region की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि विभिन्न क्षेत्रों के बीच विकास में संतुलन स्थापित किया जा सके। यह संसाधनों के प्रभावी उपयोग, क्षेत्र-विशिष्ट समस्याओं के समाधान तथा योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन में सहायक होता है। इसके माध्यम से पिछड़े क्षेत्रों के विकास को बढ़ावा मिलता है और क्षेत्रीय असमानताएँ कम होती हैं। साथ ही, यह सतत एवं समावेशी विकास सुनिश्चित कर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Planning Region के प्रकार:
1. भौतिक क्षेत्र (Physical Region): प्राकृतिक विशेषताओं (जैसे- पर्वत, जलवायु) पर आधारित
2. आर्थिक क्षेत्र (Economic Region): आर्थिक गतिविधियों के आधार पर
3. कार्यात्मक क्षेत्र (Functional Region): किसी केंद्र (Node) के प्रभाव क्षेत्र पर आधारित
4. प्रशासनिक क्षेत्र (Administrative Region): शासन की सुविधा के लिए निर्धारित
Planning Region के सीमांकन की विधियाँ (Methods of Delineation):
1. Homogeneous Method (समानता आधारित विधि):
Homogeneous Method वह विधि है जिसमें नियोजन क्षेत्र का निर्धारण समान भौगोलिक, आर्थिक या सामाजिक विशेषताओं के आधार पर किया जाता है। इस विधि में ऐसे क्षेत्रों को एक साथ समूहित किया जाता है जहाँ जलवायु, भूमि, फसल, संसाधन या जनसंख्या की विशेषताएँ समान हों। यह विधि सरल और स्पष्ट होती है तथा डेटा पर आधारित होती है। हालांकि, इसमें क्षेत्रों के बीच कार्यात्मक संबंधों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, जो इसकी प्रमुख सीमा है।
2. Functional Method (कार्यात्मक विधि):
कार्यात्मक विधि में नियोजन क्षेत्र का निर्धारण किसी केंद्रीय स्थान (Node) के प्रभाव क्षेत्र के आधार पर किया जाता है। इसमें आर्थिक, सामाजिक एवं परिवहन संबंधों को ध्यान में रखा जाता है, जैसे शहर और उसके आसपास का क्षेत्र। यह विधि वास्तविक क्रियात्मक संबंधों को दर्शाती है और क्षेत्रीय गतिविधियों के आपसी जुड़ाव को स्पष्ट करती है। हालांकि, इसकी सीमाएँ निर्धारित करना कठिन होता है, क्योंकि कार्यात्मक संबंध समय के साथ बदलते रहते हैं।
3. Nodal Method (नोडल विधि):
4. Administrative Method (प्रशासनिक विधि):
प्रशासनिक विधि में नियोजन क्षेत्र का सीमांकन राज्य, जिला या अन्य प्रशासनिक इकाइयों के आधार पर किया जाता है। यह विधि सरल एवं व्यावहारिक होती है क्योंकि इन क्षेत्रों में डेटा आसानी से उपलब्ध होता है और योजनाओं का क्रियान्वयन भी सुगमता से किया जा सकता है। हालांकि, इसकी सीमा यह है कि यह हमेशा भौगोलिक या कार्यात्मक समानताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती, जिससे वास्तविक क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान प्रभावित हो सकता है।
5. Composite Method (संयुक्त विधि):
Composite Method वह विधि है जिसमें नियोजन क्षेत्र के सीमांकन के लिए विभिन्न तरीकों—जैसे Homogeneous, Functional एवं Administrative—का समन्वित उपयोग किया जाता है। यह विधि अधिक यथार्थवादी और व्यावहारिक मानी जाती है, क्योंकि यह केवल एक पहलू पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक कारकों को एक साथ ध्यान में रखती है। इसके माध्यम से क्षेत्रीय समस्याओं को बेहतर ढंग से समझकर संतुलित एवं प्रभावी विकास योजना बनाई जा सकती है।
Delineation के कारण (Reasons for Delineation of Planning Region):
Delineation के कारण निम्नलिखित हैं-
- क्षेत्रीय असमानताओं को कम कर संतुलित विकास सुनिश्चित करना।
- प्राकृतिक एवं मानव संसाधनों का प्रभावी एवं न्यायसंगत उपयोग करना।
- क्षेत्र-विशिष्ट समस्याओं के समाधान हेतु उपयुक्त योजनाएँ बनाना।
- प्रशासनिक कार्यों को सरल एवं प्रभावी बनाना।
- आर्थिक विकास एवं रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना।
- सामाजिक समानता एवं जीवन स्तर में सुधार सुनिश्चित करना।
- सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करना।
भारत में Planning Region के उदाहरण:
- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR)
- दामोदर घाटी क्षेत्र (Damodar Valley Region)
- पश्चिमी घाट क्षेत्र (Western Ghats Region)
- उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (North Eastern Region)
- बुंदेलखंड क्षेत्र (Bundelkhand Region)
- विदर्भ क्षेत्र (Vidarbha Region)
- कावेरी नदी घाटी क्षेत्र (Cauvery Basin Region)
- दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर (DMIC)
Planning Region के सीमांकन में चुनौतियाँ:
Planning Region के सीमांकन में चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं-
- विश्वसनीय एवं अद्यतन डेटा की कमी सीमांकन को प्रभावित करती है।
- भौगोलिक विविधता (पर्वत, रेगिस्तान, नदियाँ) सीमाएँ निर्धारित करना कठिन बनाती है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप और हितों का टकराव निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
- प्रशासनिक सीमाएँ वास्तविक क्षेत्रीय विशेषताओं से मेल नहीं खातीं।
- विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय की कमी योजना निर्माण को बाधित करती है।
- संसाधनों का असमान वितरण सीमांकन को जटिल बनाता है।
- तकनीकी एवं विशेषज्ञता की कमी वैज्ञानिक निर्धारण में बाधा बनती है।
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधताएँ एक समान क्षेत्र निर्धारित करना कठिन बनाती हैं।
सुधार के उपाय:
Planning Region के प्रभावी सीमांकन के लिए वैज्ञानिक, डेटा-आधारित और समन्वित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसके साथ ही तकनीकी साधनों एवं स्थानीय भागीदारी को बढ़ावा देकर योजनाओं की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है। सुधार के उपाय निम्नलिखित हैं-
- GIS एवं Remote Sensing तकनीकों का उपयोग कर सटीक सीमांकन करना।
- विश्वसनीय एवं अद्यतन डेटा संग्रहण और विश्लेषण को मजबूत बनाना।
- स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी को बढ़ावा देना।
- केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
- क्षेत्र-विशिष्ट (Area-specific) दृष्टिकोण अपनाकर योजनाएँ बनाना।
- प्रशासनिक एवं भौगोलिक सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित करना।
- विशेषज्ञों एवं संस्थानों की भूमिका को सशक्त बनाना।
- सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देना।
निष्कर्ष:
इस प्रकार Planning Region की अवधारणा क्षेत्रीय नियोजन की आधारशिला है। इसके बिना संतुलित एवं समावेशी विकास संभव नहीं है। विभिन्न विधियों के माध्यम से Planning Region का सीमांकन कर क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जा सकता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में प्रभावी क्षेत्रीय नियोजन के लिए वैज्ञानिक एवं समेकित दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
