11. Crop Combination and Crop Diversification / फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण

Crop Combination and Crop Diversification

 फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण

Crop Combination and Crop Diversification

परिचय:

      कृषि भूगोल (Agricultural Geography) में फसलों के वितरण, उत्पादन तथा कृषि पद्धतियों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी क्षेत्र में एक से अधिक फसलों की खेती की जाती है, जिनका अनुपात एवं वितरण अलग-अलग होता है। इसी आधार पर फसल संयोजन (Crop Combination) तथा फसल विविधीकरण (Crop Diversification) की अवधारणाएँ विकसित हुई हैं। ये दोनों अवधारणाएँ कृषि प्रदेशों के निर्धारण, कृषि नियोजन तथा संसाधनों के समुचित उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

फसल संयोजन (Crop Combination):

      किसी क्षेत्र में एक साथ उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों के समूह को फसल संयोजन कहते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी कृषि क्षेत्र में जिन फसलों का संयुक्त रूप से सर्वाधिक क्षेत्रफल होता है, उन्हें उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहा जाता है।

परिभाषा:

वीवर (J. C. Weaver, 1954) के अनुसार-

       “किसी क्षेत्र में सर्वाधिक भूमि पर उगाई जाने वाली फसलों का समूह ही उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहलाता है।”

फसल संयोजन की विशेषताएँ (Characteristics of Crop Combination)

1. अनेक फसलों का संयुक्त वितरण (Combined Distribution of Crops):-

      फसल संयोजन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि किसी क्षेत्र में एक से अधिक प्रमुख फसलें एक साथ उगाई जाती हैं। ये फसलें कुल कृषि क्षेत्र के अधिकांश भाग पर फैली होती हैं तथा उस क्षेत्र की कृषि संरचना एवं कृषि व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं। फसलों का यह संयुक्त वितरण कृषि भूगोल के अध्ययन का आधार बनता है।

2. कृषि प्रदेशों के निर्धारण का आधार (Basis for Delineation of Agricultural Regions):-

     फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण का महत्वपूर्ण आधार है। जिन क्षेत्रों में समान प्रकार की प्रमुख फसलें उगाई जाती हैं, उन्हें एक ही कृषि प्रदेश में शामिल किया जाता है। इससे कृषि की क्षेत्रीय विशेषताओं का अध्ययन तथा कृषि नियोजन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

3. प्राकृतिक कारकों से प्रभावित (Influenced by Physical Factors):-

     फसल संयोजन मुख्यतः जलवायु, वर्षा, तापमान, मिट्टी, स्थलाकृति तथा जल संसाधनों जैसे प्राकृतिक कारकों पर निर्भर करता है। इन कारकों में परिवर्तन होने पर फसलों का प्रकार एवं उनका क्षेत्रफल भी बदल जाता है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होता है।

4. कृषि विशेषीकरण का द्योतक (Indicator of Agricultural Specialization):-

       फसल संयोजन किसी क्षेत्र की कृषि विशेषता एवं उत्पादन प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है। इससे यह ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र में कौन-सी फसलें प्रमुख हैं तथा कृषि किस दिशा में विशेषीकृत (Specialized) है। उदाहरण के लिए, पंजाब गेहूँ उत्पादन तथा असम चाय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

5. क्षेत्रीय एवं स्थानिक भिन्नता (Regional and Spatial Variation):-

      फसल संयोजन में स्थानिक (Spatial) एवं क्षेत्रीय (Regional) भिन्नता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है। इसलिए एक ही देश में विभिन्न प्रकार के फसल संयोजन पाए जाते हैं।

6. कृषि नियोजन एवं संसाधन प्रबंधन में उपयोगी (Useful for Agricultural Planning and Resource Management):-

      फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास, भूमि उपयोग नियोजन, सिंचाई प्रबंधन, फसल चक्र, उर्वरक उपयोग, कृषि निवेश तथा क्षेत्रीय कृषि योजनाओं के निर्माण में अत्यंत उपयोगी है। इसके आधार पर संसाधनों का संतुलित उपयोग, कृषि उत्पादकता में वृद्धि तथा सतत कृषि विकास (Sustainable Agricultural Development) को बढ़ावा दिया जा सकता है।

फसल संयोजन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Crop Combination)

1. जलवायु (Climate):-

    जलवायु फसल संयोजन का सबसे महत्वपूर्ण निर्धारक है। किसी क्षेत्र का तापमान, वर्षा, आर्द्रता, सूर्यप्रकाश तथा फसल वृद्धि अवधि (Growing Season) यह निर्धारित करते हैं कि वहाँ कौन-सी फसलें सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान तथा कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में बाजरा, ज्वार एवं दालों की खेती प्रमुख होती है। इसलिए जलवायु में परिवर्तन होने पर फसल संयोजन भी बदल जाता है।

2. मिट्टी (Soil):-

    मिट्टी का प्रकार, उर्वरता, बनावट, जलधारण क्षमता एवं पोषक तत्व फसल संयोजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। प्रत्येक फसल के लिए विशिष्ट प्रकार की मिट्टी उपयुक्त होती है। उदाहरणतः जलोढ़ मिट्टी में धान एवं गेहूँ, काली मिट्टी में कपास, लाल मिट्टी में दलहन एवं तिलहन तथा लेटराइट मिट्टी में चाय एवं रबर जैसी फसलों की खेती अधिक सफल होती है।

3. सिंचाई सुविधाएँ (Irrigation Facilities):-

सिंचाई फसल संयोजन का एक प्रमुख निर्धारक है। जहाँ नहर, ट्यूबवेल, कुएँ एवं अन्य सिंचाई साधनों की पर्याप्त व्यवस्था होती है, वहाँ किसान वर्ष में दो या तीन फसलें उगाने में सक्षम होते हैं। पर्याप्त सिंचाई वाले क्षेत्रों में गेहूँ, धान, गन्ना एवं सब्जियों जैसी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें प्रमुख होती हैं, जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में सूखा-सहिष्णु फसलें अधिक उगाई जाती हैं।

4. बाजार एवं परिवहन (Market and Transportation):-

      बाजार की मांग, कृषि उत्पादों का मूल्य तथा परिवहन सुविधाओं का विकास फसल संयोजन को प्रभावित करता है। जिन क्षेत्रों में बाजार एवं परिवहन की सुविधाएँ बेहतर होती हैं, वहाँ किसान अधिक लाभदायक नकदी फसलें, फल, सब्जियाँ, फूल एवं बागवानी फसलें उगाने के लिए प्रेरित होते हैं। शहरी क्षेत्रों के निकट व्यावसायिक कृषि का विकास इसी कारण अधिक देखा जाता है।

5. आधुनिक तकनीक (Modern Technology):-

     आधुनिक कृषि तकनीक जैसे उच्च उपज देने वाले बीज (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रीकरण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ फसल संयोजन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाती हैं। इन तकनीकों से कृषि उत्पादकता बढ़ती है, उत्पादन लागत कम होती है तथा किसान नई एवं अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इसके परिणामस्वरूप कृषि का आधुनिकीकरण एवं फसल संयोजन में विविधता आती है।

फसल संयोजन के प्रमुख सिद्धांत

(Major Theories of Crop Combination)

1. वीवर का न्यूनतम विचलन सिद्धांत (Weaver’s Minimum Deviation Method, 1954):-

     अमेरिकी भूगोलवेत्ता जे. सी. वीवर (J. C. Weaver) ने 1954 में फसल संयोजन निर्धारण की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं वैज्ञानिक विधि प्रस्तुत की। इस विधि में किसी क्षेत्र की विभिन्न फसलों के वास्तविक क्षेत्रफल प्रतिशत (Observed Percentage) की तुलना सैद्धांतिक प्रतिशत (Theoretical Percentage) से की जाती है। जिस संयोजन में वास्तविक एवं सैद्धांतिक प्रतिशत के बीच न्यूनतम विचलन (Minimum Deviation) प्राप्त होता है, वही उस क्षेत्र का वास्तविक फसल संयोजन माना जाता है। कृषि भूगोल में यह विधि सबसे अधिक प्रचलित है।

2. डोई की संशोधित विधि (Doi’s Modified Method):-

      डोई (Doi) ने वीवर की न्यूनतम विचलन विधि में सुधार करते हुए एक संशोधित पद्धति प्रस्तुत की। इस विधि में गणना अपेक्षाकृत सरल होती है तथा फसल संयोजन का निर्धारण अधिक व्यावहारिक एवं सटीक रूप से किया जा सकता है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ अनेक फसलें समान अनुपात में उगाई जाती हैं, वहाँ यह विधि अधिक उपयोगी मानी जाती है। इसलिए इसे वीवर विधि का उन्नत रूप माना जाता है।

3. रफीउल्लाह विधि (Rafiullah Method):-

       रफीउल्लाह ने भारतीय कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसल संयोजन निर्धारण की एक संशोधित विधि विकसित की। इस पद्धति में भारतीय कृषि की क्षेत्रीय विविधता, बहुफसली कृषि तथा फसलों के वास्तविक वितरण को अधिक महत्व दिया गया है। भारतीय कृषि भूगोल के अध्ययन, कृषि प्रदेशों के निर्धारण तथा क्षेत्रीय कृषि विश्लेषण में इस विधि का व्यापक उपयोग किया जाता है। यह भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त एवं व्यावहारिक मानी जाती है।

फसल संयोजन का महत्व (Importance of Crop Combination)

1. कृषि प्रदेशों का निर्धारण:-

      फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों की पहचान करने में सहायता करता है। इसके आधार पर समान कृषि विशेषताओं वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक वर्गीकरण (Agricultural Regionalization) किया जाता है, जिससे कृषि प्रदेशों का निर्धारण सरल हो जाता है।

2. कृषि नियोजन में सहायता:-

      फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास योजनाओं, सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरकों तथा कृषि तकनीकों के उचित वितरण में सहायक होता है। इससे संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।

3. भूमि उपयोग विश्लेषण:-

     यह किसी क्षेत्र में विभिन्न फसलों के भूमि उपयोग प्रतिरूप (Land Use Pattern) को स्पष्ट करता है। इसके आधार पर भूमि की उत्पादकता का मूल्यांकन तथा उपयुक्त फसल चयन किया जाता है।

4. कृषि उत्पादन में वृद्धि:-

        फसल संयोजन के अध्ययन से क्षेत्र की जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार उपयुक्त फसलों का चयन किया जा सकता है, जिससे कृषि उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि होती है।

5. क्षेत्रीय कृषि विकास का अध्ययन:-

      फसल संयोजन विभिन्न क्षेत्रों की कृषि संरचना, उत्पादन क्षमता तथा विकास स्तर को समझने में सहायक होता है। इससे क्षेत्रीय असमानताओं की पहचान कर संतुलित कृषि विकास की योजनाएँ बनाई जा सकती हैं।

फसल संयोजन (Crop Combination) का उदाहरण

उदाहरण–1 (पंजाब):

यदि पंजाब के किसी जिले में कुल कृषि भूमि का 60% भाग गेहूँ, 25% भाग धान तथा 15% भाग गन्ने के अंतर्गत है, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “गेहूँ-धान-गन्ना (Wheat–Rice–Sugarcane Combination)” कहलाएगा।

उदाहरण–2 (बिहार):

बिहार के उत्तरी मैदानी भागों में यदि किसी क्षेत्र में प्रमुख रूप से धान, गेहूँ एवं मक्का की खेती की जाती है, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “धान-गेहूँ-मक्का (Rice–Wheat–Maize Combination)” कहलाएगा।

उदाहरण–3 (उत्तर प्रदेश):

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूँ–गन्ना (Wheat–Sugarcane Combination) एक प्रमुख फसल संयोजन है।

उदाहरण–4 (राजस्थान):

शुष्क क्षेत्रों में बाजरा–चना–सरसों (Pearl Millet–Gram–Mustard Combination) प्रमुख फसल संयोजन का उदाहरण है।

अर्थात

     यदि किसी क्षेत्र में धान, गेहूँ एवं मक्का सबसे अधिक क्षेत्रफल में उगाई जाती हैं, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “धान–गेहूँ–मक्का फसल संयोजन” कहलाता है। यही Crop Combination का सबसे सरल एवं उपयुक्त उदाहरण है।

फसल विविधीकरण

(Crop Diversification)

परिचय:

      जब किसान केवल एक या दो फसलों पर निर्भर न रहकर अनेक प्रकार की खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, बागवानी एवं नकदी फसलों की खेती करता है, तो इसे फसल विविधीकरण कहा जाता है।

परिभाषा:

   फसल विविधीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कृषि जोखिम कम करने तथा आय बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती की जाती है।

उद्देश्य:

✍️ किसानों की आय बढ़ाना।

✍️ कृषि जोखिम कम करना।

✍️ भूमि की उर्वरता बनाए रखना।

✍️ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।

✍️ बाजार की मांग को पूरा करना।

फसल विविधीकरण के कारण (Causes of Crop Diversification)

1. बदलती बाजार मांग (Changing Market Demand):-

    बाजार में फलों, सब्जियों, फूलों, मसालों, औषधीय पौधों तथा अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों की मांग लगातार बढ़ रही है। अधिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी एवं बागवानी फसलों की खेती अपनाने लगे हैं। इससे कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ा है तथा किसानों की आय में वृद्धि हुई है।

2. सिंचाई सुविधाओं का विकास (Development of Irrigation Facilities):-

    नहरों, ट्यूबवेलों, कुओं तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर) के विस्तार से किसानों को पूरे वर्ष विभिन्न प्रकार की फसलें उगाने की सुविधा प्राप्त हुई है। पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध होने से किसान एक ही भूमि पर दो या तीन फसलें उगाने में सक्षम हुए हैं, जिससे फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिला है।

3. आधुनिक कृषि तकनीक (Modern Agricultural Technology):-

    उन्नत बीज (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्र, आधुनिक सिंचाई तकनीक तथा वैज्ञानिक खेती की पद्धतियों ने कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि की है। इन तकनीकों के कारण किसान नई, उच्च मूल्य वाली एवं अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित हुए हैं।

4. सरकारी नीतियाँ एवं प्रोत्साहन (Government Policies and Incentives):-

    सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल बीमा, कृषि ऋण, सब्सिडी, बागवानी मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) तथा अन्य कृषि विकास योजनाओं के माध्यम से किसानों को विविध फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इन योजनाओं से फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है।

5. जलवायु परिवर्तन एवं जोखिम प्रबंधन (Climate Change and Risk Management):-

    अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, तापमान में वृद्धि तथा अन्य जलवायु संबंधी समस्याओं के कारण एक ही फसल पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो गया है। इसलिए किसान विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती अपनाते हैं, जिससे फसल विफल होने की संभावना कम होती है, कृषि जोखिम घटता है तथा आय की स्थिरता बनी रहती है। फसल विविधीकरण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की एक प्रभावी रणनीति भी है।

फसल विविधीकरण के लाभ (Advantages of Crop Diversification)

1. किसानों की आय में वृद्धि (Increase in Farmers’ Income)

     फसल विविधीकरण के माध्यम से किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ फल, सब्जियाँ, बागवानी, मसाले एवं अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती करते हैं। इन फसलों से अधिक लाभ प्राप्त होता है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है तथा उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

2. कृषि जोखिम में कमी (Reduction in Agricultural Risk)

    यदि किसी एक फसल को प्राकृतिक आपदा, कीट या रोग के कारण नुकसान होता है, तो अन्य फसलें किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। इस प्रकार फसल विविधीकरण कृषि जोखिम को कम करता है तथा किसानों की आय को अधिक स्थिर बनाता है।

3. रोजगार के अवसरों में वृद्धि (Generation of Employment Opportunities):-

     फल, सब्जियाँ, फूल, बागवानी एवं व्यावसायिक फसलों की खेती में श्रम की आवश्यकता अधिक होती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षभर रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तथा कृषि आधारित उद्योगों के विकास को भी प्रोत्साहन मिलता है।

4. भूमि की उर्वरता का संरक्षण (Maintenance of Soil Fertility):-

    विभिन्न प्रकार की फसलों का फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। विशेष रूप से दलहनी फसलें नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से भूमि की उर्वरता बढ़ाती हैं तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।

5. पोषण सुरक्षा में सुधार (Improvement in Nutritional Security):-

     फसल विविधीकरण के कारण केवल खाद्यान्न ही नहीं, बल्कि फल, सब्जियाँ, दालें, तिलहन एवं बागवानी फसलों का उत्पादन भी बढ़ता है। इससे लोगों को संतुलित एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध होता है तथा कुपोषण की समस्या को कम करने में सहायता मिलती है।

6. नकदी फसलों का विकास (Development of Cash Crops):-

     फसल विविधीकरण किसानों को गन्ना, कपास, तंबाकू, मसाले, फल, फूल एवं अन्य व्यावसायिक फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इससे कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ता है, निर्यात में वृद्धि होती है तथा किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।

7. सतत कृषि को बढ़ावा (Promotion of Sustainable Agriculture):-

     फसल विविधीकरण प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग, जैव विविधता के संरक्षण तथा पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रणाली को प्रोत्साहित करता है। इससे भूमि, जल एवं मिट्टी का संरक्षण होता है, रासायनिक इनपुट का अत्यधिक उपयोग कम होता है तथा दीर्घकालीन कृषि उत्पादकता एवं सतत कृषि विकास (Sustainable Agricultural Development) सुनिश्चित होता है।

फसल विविधीकरण की समस्याएँ (Problems of Crop Diversification)

1. सिंचाई का अभाव (Lack of Irrigation Facilities):-

     भारत के अनेक क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है, जिसके कारण किसान आज भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहते हैं। अनिश्चित वर्षा के कारण वे फल, सब्जियाँ, बागवानी तथा अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों को अपनाने का जोखिम नहीं उठा पाते। परिणामस्वरूप फसल विविधीकरण की प्रक्रिया बाधित होती है।

2. छोटे एवं बिखरे जोत (Small and Fragmented Land Holdings):-

     भारत में अधिकांश किसानों के पास भूमि का आकार छोटा तथा विभिन्न स्थानों पर बिखरा हुआ होता है। ऐसी स्थिति में आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग, यंत्रीकरण तथा विभिन्न प्रकार की फसलों का वैज्ञानिक प्रबंधन कठिन हो जाता है। इसलिए किसान पारंपरिक फसलों की खेती तक ही सीमित रह जाते हैं।

3. बाजार सुविधाओं की कमी (Lack of Market Facilities):-

     फसल विविधीकरण के लिए किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलना आवश्यक है। किन्तु अनेक क्षेत्रों में संगठित बाजार, भंडारण, मूल्य सूचना तथा विपणन व्यवस्था का अभाव है। इसके कारण किसानों को लाभकारी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता और वे पारंपरिक कृषि प्रणाली पर निर्भर रहते हैं।

4. भंडारण एवं परिवहन की समस्या (Problems of Storage and Transportation):-

      फल, सब्जियाँ, फूल तथा अन्य शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों के लिए कोल्ड स्टोरेज, शीत-श्रृंखला (Cold Chain) एवं तेज परिवहन व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इन सुविधाओं के अभाव में फसलें खराब हो जाती हैं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है और वे विविधीकरण अपनाने से बचते हैं।

5. तकनीकी जानकारी का अभाव (Lack of Technical Knowledge):-

     कई किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों, वैज्ञानिक फसल प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण तथा नई कृषि प्रणालियों की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। कृषि विस्तार सेवाओं (Extension Services) की सीमित पहुँच के कारण वे नई एवं लाभकारी फसलों को अपनाने में संकोच करते हैं, जिससे फसल विविधीकरण की गति धीमी रहती है।

6. पूँजी एवं ऋण सुविधाओं की कमी (Lack of Capital and Credit Facilities):-

     फसल विविधीकरण के लिए उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक, कृषि यंत्र, बागवानी एवं आधुनिक तकनीकों में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होती है। छोटे एवं सीमांत किसानों के पास सीमित पूँजी होती है तथा उन्हें समय पर सस्ती ऋण सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं। परिणामस्वरूप वे नई फसलों में निवेश करने से बचते हैं और पारंपरिक खेती को ही अपनाए रखते हैं।

भारत में फसल विविधीकरण

    भारत में हरित क्रांति के बाद गेहूँ एवं धान का प्रभुत्व बढ़ा, किन्तु वर्तमान में बागवानी, फल, सब्जी, दलहन, तिलहन, औषधीय पौधे तथा व्यावसायिक फसलों की ओर विविधीकरण तेजी से बढ़ रहा है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात तथा बिहार में भी फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण में अंतर

आधार फसल संयोजन फसल विविधीकरण
अर्थ प्रमुख फसलों का समूह अनेक प्रकार की फसलों की खेती
उद्देश्य कृषि प्रदेशों का निर्धारण आय एवं जोखिम प्रबंधन
आधार क्षेत्रीय वितरण कृषि प्रणाली में परिवर्तन
प्रमुख विद्वान जे. सी. वीवर आधुनिक कृषि नीति
उपयोग कृषि भूगोल कृषि विकास एवं नियोजन

फसल विविधीकरण (Crop Diversification) के उदाहरण

उदाहरण-1: पंजाब एवं हरियाणा

     पहले इन राज्यों में मुख्य रूप से गेहूँ एवं धान की खेती होती थी। वर्तमान में किसान फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन तथा बागवानी फसलों की खेती भी करने लगे हैं। यह फसल विविधीकरण का प्रमुख उदाहरण है।

उदाहरण-2: बिहार

     बिहार में पारंपरिक धान एवं गेहूँ के साथ-साथ मक्का, मखाना, सब्जियाँ, फल (लीची, आम, केला), मसाले एवं बागवानी फसलों की खेती तेजी से बढ़ रही है। यह फसल विविधीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

उदाहरण-3: महाराष्ट्र

     महाराष्ट्र में किसान कपास एवं ज्वार के साथ-साथ अंगूर, अनार, संतरा, गन्ना एवं सब्जियों की खेती कर रहे हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हुई है।

उदाहरण-4: कर्नाटक

     कर्नाटक में रागी एवं धान के साथ कॉफी, काली मिर्च, इलायची, नारियल तथा बागवानी फसलों की खेती की जाती है, जो फसल विविधीकरण को दर्शाती है।

उदाहरण-5: उत्तर प्रदेश

     उत्तर प्रदेश में किसान गेहूँ, धान एवं गन्ने के साथ आलू, सब्जियाँ, सरसों, दलहन तथा बागवानी फसलों की खेती भी करते हैं। इससे कृषि आय एवं रोजगार दोनों में वृद्धि होती है।

अर्थात

    यदि कोई किसान पहले केवल धान की खेती करता था, लेकिन बाद में धान + गेहूँ + मक्का + सब्जियाँ + फल उगाने लगा, तो इसे फसल विविधीकरण (Crop Diversification) कहा जाएगा।

याद रखने का आसान सूत्र:

✍️ फसल संयोजन (Crop Combination) = एक क्षेत्र में प्रमुख फसलों का समूह (जैसे धान–गेहूँ–मक्का)।

✍️ फसल विविधीकरण (Crop Diversification) = आय बढ़ाने एवं जोखिम कम करने के लिए अनेक प्रकार की फसलों की खेती (जैसे धान + गेहूँ + सब्जियाँ + फल + दलहन + तिलहन)।

निष्कर्ष:

    फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण कृषि भूगोल की दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों के वितरण एवं कृषि विशेषीकरण को दर्शाता है, जबकि फसल विविधीकरण कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ एवं जोखिम-मुक्त बनाने की प्रक्रिया है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण अत्यंत आवश्यक माना जाता है। वहीं फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण एवं क्षेत्रीय कृषि नियोजन का आधार प्रदान करता है।

12. Cropping Pattern in India / भारत में फसल प्रतिरूप

Cropping Pattern in India 

भारत में फसल प्रतिरूप

परिचय:

     भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ लगभग 45–46% कार्यशील जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। देश की विविध जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति, वर्षा तथा सिंचाई सुविधाओं के कारण विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। किसी क्षेत्र में एक निश्चित समय पर उगाई जाने वाली फसलों के प्रकार, उनका क्षेत्रीय वितरण तथा उनके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल की व्यवस्था को फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) कहा जाता है।

     फसल प्रतिरूप कृषि भूगोल की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो किसी क्षेत्र की कृषि विशेषताओं, संसाधनों के उपयोग तथा कृषि विकास के स्तर को स्पष्ट करती है। भारत में फसल प्रतिरूप प्राकृतिक एवं सामाजिक-आर्थिक दोनों प्रकार के कारकों से प्रभावित होता है।

परिभाषा:

     फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) से तात्पर्य किसी क्षेत्र में एक निश्चित अवधि के दौरान विभिन्न फसलों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल, उनके अनुपात तथा स्थानिक वितरण से है।

Spedding (1979) के अनुसार-

   “Cropping pattern refers to the yearly sequence and spatial arrangement of crops on a given area of land.”

भारत में फसल प्रतिरूप की प्रमुख विशेषताएँ

(Major Characteristics of Cropping Pattern in India)

1. कृषि की क्षेत्रीय विविधता (Regional Diversity in Agriculture):-

    भारत की जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति एवं वर्षा में अत्यधिक विविधता होने के कारण प्रत्येक क्षेत्र का फसल प्रतिरूप भिन्न-भिन्न है। उत्तर भारत में गेहूँ, पूर्वी भारत में धान, पश्चिमी भारत में कपास तथा दक्षिण भारत में चाय, कॉफी एवं मसालों जैसी फसलें प्रमुख हैं। यह विविधता भारत की कृषि प्रणाली को विशिष्ट बनाती है।

2. खाद्यान्न फसलों का प्रभुत्व (Dominance of Food Crops):-

     भारत में खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता तथा विशाल जनसंख्या के कारण धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा एवं दालों जैसी खाद्यान्न फसलें कृषि क्षेत्र के बड़े भाग में उगाई जाती हैं। विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में धान एवं गेहूँ का प्रभुत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

3. मानसून पर निर्भरता (Dependence on Monsoon):-

     भारत की कृषि का एक बड़ा भाग आज भी दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। समय पर एवं पर्याप्त वर्षा होने पर अच्छी फसल प्राप्त होती है, जबकि कम या अनियमित वर्षा से उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए मानसून की अनिश्चितता भारत के फसल प्रतिरूप एवं कृषि उत्पादन दोनों को प्रभावित करती है।

4. बहुफसली कृषि (Multiple Cropping System):-

     सिंचाई सुविधाओं, उन्नत बीजों एवं आधुनिक कृषि तकनीकों के विकास से अनेक क्षेत्रों में वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं। इससे भूमि का अधिकतम उपयोग होता है, कृषि उत्पादन बढ़ता है तथा फसल सघनता (Cropping Intensity) में वृद्धि होती है। पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

5. व्यावसायिक कृषि का विस्तार (Expansion of Commercial Agriculture):-

    बढ़ती बाजार मांग, कृषि तकनीक के विकास तथा बेहतर परिवहन सुविधाओं के कारण फल, सब्जियाँ, गन्ना, कपास, चाय, कॉफी, रबर, मसाले एवं बागवानी फसलों का क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। इससे किसानों की आय में वृद्धि हुई है तथा भारतीय कृषि धीरे-धीरे व्यावसायिक स्वरूप ग्रहण कर रही है।

6. क्षेत्रीय विशिष्टीकरण (Regional Specialization):-

    भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राकृतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विशिष्ट फसलों का संकेन्द्रण पाया जाता है। उदाहरण के लिए, असम चाय उत्पादन, केरल रबर एवं मसालों, कर्नाटक कॉफी, पंजाब गेहूँ तथा महाराष्ट्र कपास उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्रीय विशिष्टीकरण कृषि नियोजन, कृषि व्यापार एवं क्षेत्रीय विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत में फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक कारक

(Natural Factors Affecting Cropping Pattern in India)

(A) प्राकृतिक कारक

1. जलवायु (Climate):-

    जलवायु फसल प्रतिरूप का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक कारक है। तापमान, वर्षा, आर्द्रता, सूर्य का प्रकाश तथा बढ़वार अवधि (Growing Season) विभिन्न फसलों की उपयुक्तता निर्धारित करते हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान, चाय एवं जूट जैसी फसलें उगाई जाती हैं, जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, ज्वार, बाजरा एवं दलहन की खेती अधिक होती है। इसी प्रकार तापमान एवं आर्द्रता के अंतर के कारण भारत के विभिन्न भागों में फसल प्रतिरूप में स्पष्ट क्षेत्रीय भिन्नता दिखाई देती है।

2. मिट्टी (Soil):-

     मिट्टी का प्रकार, उसकी उर्वरता, बनावट, जलधारण क्षमता तथा पोषक तत्व फसल प्रतिरूप को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ अलग-अलग फसलों के लिए उपयुक्त होती हैं। उदाहरण के लिए, जलोढ़ मिट्टी धान, गेहूँ एवं गन्ने के लिए उपयुक्त है, काली मिट्टी कपास के लिए, लाल मिट्टी मोटे अनाज एवं दलहनों के लिए तथा लेटराइट मिट्टी चाय, कॉफी एवं रबर जैसी बागानी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

3. स्थलाकृति (Relief or Topography):-

    किसी क्षेत्र की ऊँचाई, ढाल तथा भौतिक संरचना भी फसल प्रतिरूप को प्रभावित करती है। समतल एवं उपजाऊ मैदानों में कृषि करना आसान होता है, इसलिए वहाँ धान, गेहूँ, गन्ना एवं अन्य खाद्यान्न फसलें प्रमुख होती हैं। इसके विपरीत पर्वतीय एवं ढाल वाले क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming) की जाती है, जहाँ चाय, कॉफी, फल एवं बागवानी फसलों का अधिक विकास हुआ है। इस प्रकार स्थलाकृति कृषि पद्धति एवं फसल चयन दोनों को प्रभावित करती है।

4. जल उपलब्धता (Availability of Water):-

    जल की उपलब्धता फसल प्रतिरूप का एक प्रमुख निर्धारक कारक है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएँ विकसित हैं, वहाँ वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं तथा धान, गन्ना एवं सब्जियों जैसी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें सफलतापूर्वक उगाई जाती हैं। इसके विपरीत वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में कम जल की आवश्यकता वाली फसलें, जैसे ज्वार, बाजरा, चना एवं दालें प्रमुख होती हैं। इसलिए सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से फसल प्रतिरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है।

(B) सामाजिक एवं आर्थिक कारक (Socio-Economic Factors)

1. जनसंख्या दबाव (Population Pressure):-

   जनसंख्या किसी भी क्षेत्र के फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है। जिन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अधिक होता है, वहाँ खाद्यान्न फसलों जैसे धान, गेहूँ एवं मक्का को प्राथमिकता दी जाती है ताकि स्थानीय खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। दूसरी ओर, कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक एवं नकदी फसलों की खेती का विस्तार अपेक्षाकृत अधिक होता है।

2. बाजार (Market):-

   बाजार की मांग एवं मूल्य (Price) फसल प्रतिरूप को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। जिन फसलों की बाजार में अधिक मांग एवं अच्छा मूल्य मिलता है, किसान उनकी खेती को प्राथमिकता देते हैं। शहरी क्षेत्रों के निकट फल, सब्जियाँ, फूल तथा डेयरी से संबंधित फसलों का उत्पादन अधिक होता है, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में कपास, गन्ना एवं तंबाकू जैसी नकदी फसलों का विस्तार देखा जाता है।

3. परिवहन एवं संचार (Transport and Communication):-

    विकसित परिवहन एवं संचार सुविधाएँ कृषि उत्पादों को शीघ्र एवं सुरक्षित रूप से बाजार तक पहुँचाने में सहायता करती हैं। सड़क, रेल एवं शीत-श्रृंखला (Cold Chain) जैसी सुविधाओं के विकास से शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों, जैसे फल, सब्जियाँ एवं फूलों की खेती को बढ़ावा मिलता है। इसलिए बेहतर परिवहन व्यवस्था वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक कृषि का अधिक विकास होता है।

4. सरकारी नीतियाँ (Government Policies):-

     सरकार की कृषि नीतियाँ फसल प्रतिरूप को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), कृषि सब्सिडी, फसल बीमा, सिंचाई योजनाएँ, उर्वरक सहायता, कृषि ऋण तथा विभिन्न सरकारी योजनाएँ किसानों को विशेष फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में फसल प्रतिरूप में परिवर्तन देखने को मिलता है।

5. तकनीकी विकास (Technological Development):-

    आधुनिक कृषि तकनीकों ने भारत के फसल प्रतिरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। उच्च उपज देने वाली किस्में (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रीकरण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा आधुनिक कृषि उपकरणों के उपयोग से उत्पादकता में वृद्धि हुई है। इन तकनीकों के कारण किसान पारंपरिक फसलों के स्थान पर अधिक लाभदायक एवं व्यावसायिक फसलों की खेती अपनाने लगे हैं, जिससे कृषि का आधुनिकीकरण एवं फसल विविधीकरण दोनों को बढ़ावा मिला है।

भारत की प्रमुख फसल ऋतुएँ
फसल ऋतु बुवाई कटाई प्रमुख फसलें
खरीफ जून–जुलाई सितंबर–अक्टूबर धान, मक्का, बाजरा, कपास, सोयाबीन
रबी अक्टूबर–नवंबर मार्च–अप्रैल गेहूँ, चना, सरसों, जौ
जायद मार्च–अप्रैल जून तरबूज, खरबूज, खीरा, सब्जियाँ

भारत में प्रमुख फसल प्रतिरूप

1. धान प्रधान प्रतिरूप- पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा, छत्तीसगढ़

2. गेहूँ प्रधान प्रतिरूप- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश,

3. कपास प्रतिरूप- महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना

4. गन्ना प्रतिरूप- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक

5. चाय प्रतिरूप- असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु,

6. कॉफी प्रतिरूप- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु

भारत में फसल प्रतिरूप की समस्याएँ (Problems of Cropping Pattern in India)

1. मानसून पर अत्यधिक निर्भरता (Excessive Dependence on Monsoon):-

    भारत के लगभग आधे कृषि क्षेत्र आज भी वर्षा आधारित (Rainfed) कृषि पर निर्भर हैं। यदि मानसून समय पर न आए या वर्षा कम अथवा असमान हो, तो फसल उत्पादन प्रभावित होता है। इससे फसल प्रतिरूप में अस्थिरता आती है तथा किसानों को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।

2. भूमि जोतों का छोटा आकार (Small and Fragmented Land Holdings):-

    भारत में अधिकांश किसानों के पास छोटे एवं बिखरे हुए कृषि जोत हैं। छोटी जोतों के कारण आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग, यंत्रीकरण तथा फसल विविधीकरण कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप किसान पारंपरिक फसलों की खेती तक सीमित रह जाते हैं।

3. सिंचाई सुविधाओं का असमान वितरण (Unequal Distribution of Irrigation Facilities):-

     देश के सभी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएँ समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सिंचाई का व्यापक विकास हुआ है, जबकि पूर्वी एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्र आज भी वर्षा पर निर्भर हैं। इससे विभिन्न क्षेत्रों के फसल प्रतिरूप में असमानता उत्पन्न होती है।

4. मृदा क्षरण एवं उर्वरता में कमी (Soil Erosion and Declining Soil Fertility):-

    लगातार एक ही फसल की खेती (Monocropping), रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई तथा जल एवं वायु अपरदन के कारण मिट्टी की उर्वरता कम होती जा रही है। इससे कृषि उत्पादकता घटती है और फसल प्रतिरूप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

5. जलवायु परिवर्तन (Climate Change):-

     तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएँ फसल प्रतिरूप को प्रभावित कर रही हैं। बदलती जलवायु के कारण कई क्षेत्रों में पारंपरिक फसलें कम उपयुक्त होती जा रही हैं, जिससे किसानों को नई फसलों की ओर जाना पड़ रहा है।

6. नकदी फसलों पर बढ़ती निर्भरता (Increasing Dependence on Cash Crops):-

   अधिक लाभ प्राप्त करने की इच्छा से किसान खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा गन्ना, कपास, तंबाकू, गन्ना, सोयाबीन एवं अन्य नकदी फसलों की खेती को प्राथमिकता देने लगे हैं। इससे कई क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होता है तथा खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

7. कृषि लागत में वृद्धि (Rising Cost of Cultivation):-

     बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली, सिंचाई तथा कृषि मशीनों की बढ़ती लागत के कारण खेती महँगी होती जा रही है। सीमांत एवं छोटे किसानों के लिए नई फसलें अपनाना कठिन हो जाता है, जिससे फसल प्रतिरूप में संतुलित परिवर्तन नहीं हो पाता और कृषि की लाभप्रदता भी प्रभावित होती है।

निष्कर्ष:

    भारत का फसल प्रतिरूप प्राकृतिक संसाधनों, जलवायु, मिट्टी, सिंचाई, बाजार, तकनीकी विकास तथा सरकारी नीतियों का संयुक्त परिणाम है। हरित क्रांति, सिंचाई विस्तार एवं कृषि आधुनिकीकरण के कारण इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। वर्तमान समय में फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, सतत कृषि एवं जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणाली को अपनाकर भारत के फसल प्रतिरूप को अधिक संतुलित, उत्पादक एवं टिकाऊ बनाया जा सकता है। यह खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय वृद्धि तथा ग्रामीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

17. Nearest Neighbor Analysis (निकटतम पड़ोसी विश्लेषण)

Nearest Neighbor Analysis

(निकटतम पड़ोसी विश्लेषण)



Nearest Neighbor Analysis

परिचय

    निकटतम पड़ोसी विश्लेषण (Nearest Neighbor Analysis) एक प्रकार की स्थानिक सांख्यिकीय तकनीक है जिसका उपयोग भौगोलिक प्रतिरूप, वितरण और दूरी के अध्ययन के लिए किया जाता है।

    यह विश्लेषण बताता है कि किसी वस्तु (जैसे कि शहर, पौधे, जीव, अपराध स्थल आदि) का वितरण सांख्यिकीय रूप से समूहित (Clustered), यादृच्छिक (Random) या समान (Regular/Uniform) रूप से फैलाव वाला  है या नहीं।

    भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) और स्थानिक आंकड़ों के अध्ययन में यह तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्थानिक संरचना और प्रतिरूप का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने में मदद करती है।

उद्देश्य

    निकटतम पड़ोसी विश्लेषण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

(i) किसी वस्तु का स्थानिक वितरण पैटर्न पहचानना।

(ii) यह जांचना कि क्या वितरण यादृच्छिक, समूहित या समान रूप से फैला है।

(iii) शहरी और ग्रामीण योजना में केंद्रों की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करना।

(iv) आर्थिक और पर्यावरणीय अध्ययन में प्राकृतिक संसाधनों के वितरण का विश्लेषण।

(v) आपदा प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला योजना में उपयोग।

सिद्धांत

     निकटतम पड़ोसी विश्लेषण निम्नलिखित आधार पर कार्य करता है:

⇒ प्रत्येक बिंदु के लिए सबसे नजदीकी पड़ोसी की दूरी मापी जाती है।

⇒ इन दूरी का औसत लिया जाता है।

⇒ इसे यादृच्छिक वितरण से तुलना की जाती है।

⇒ यदि बिंदु बहुत पास-पास हैं तो सामूहिक (Clustered)

⇒ यदि बिंदु असमान हैं तो यादृच्छिक (Random)

⇒ यदि बिंदु एक समान रूप से फैले हैं तो समान (Regular/Uniform)

मुख्य सूत्र:

Rn (Randomness Index) अनुपात निकालना:

Nearest Neighbor Analysis

उपयोग

(i) शहरी योजना: विद्यालय, अस्पताल, बस स्टॉप आदि का स्थानिक वितरण समझने के लिए।

(ii) पर्यावरण अध्ययन: पौधों और जीवों का वितरण।

(iii) अपराध भूगोल: अपराध स्थलों का क्लस्टरिंग पैटर्न पहचानना।

(iv) संसाधन प्रबंधन: जल स्रोत, खनिज आदि का स्थानिक विश्लेषण।

(v) सामाजिक अध्ययन: बाजार, बैंक या अन्य सेवाओं का वितरण।

निष्कर्ष:

     निकटतम पड़ोसी विश्लेषण एक सरल परंतु शक्तिशाली तकनीक है, जो स्थानिक वितरण पैटर्न को समझने और मूल्यांकन करने में मदद करती है। यह शहरी, पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक अध्ययन में अत्यंत उपयोगी है। सही डेटा और सॉफ्टवेयर टूल के साथ, यह यादृच्छिक, समूहित और समान वितरण को स्पष्ट रूप से पहचान सकता है और नीति निर्माण और योजना में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

PG Regular Semester-III Examination 2025 Question Paper, Patliputra University, Patna

PG Regular Semester-III Examination 2025

 Patliputra University, Patna




PG Regular Semester-III Examination 2025
(Session: 2024-26)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920710

(Quantitative Techniques & Research Methodology)

 

Time: Three Hours]   [Maximum Marks : 70

Note : Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Attempt all MCQ from this part. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

इस भाग से सभी बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

1. (i) Quantitative methods in Geography primarily aim to:

(a) Describe landscapes

(b) Quantify spatial patterns

(c) Study myths

(d) Draw maps

भूगोल में मात्रात्मक विधियों का मुख्य उद्देश्य है:

(a) परिदृश्य का वर्णन करना

(b) स्थानिक प्रतिरूपों को परिमाणित करना

(c) मिथकों का अध्ययन करना

(d) मानचित्र बनाना

(ii) A review of literature helps a Researcher to:

(a) Avoid plagiarism

(b) Define problem precisely

(c) Collect samples

(d) Conduct interviews

साहित्य समीक्षण शोधकर्ता की सहायता करता है:

(a) साहित्यिक चोरी से बचने में

(b) समस्या को सटीक परिभाषित करने में

(c) नमूने एकत्र करने में

(d) साक्षात्कार करने में

(iii) The main difference between a Questionnaire and a Schedule is:

(a) number of questions

(b) field is investigator involvement

(c) method of tabulation

(d) use of diagrams

प्रश्नावली और अनुसूची के बीच मुख्य अन्तर है:

(a) प्रश्नों की संख्या

(b) क्षेत्र अन्वेषक की भागीदारी

(c) सारणीकरण की विधि

(d) आरेखों का प्रयोग

ANOVA (Analysis of Variance) isused to test differences between:

(a) Two variables

(b) Several group means

(c) Time periods

(d) Hypotheses only

एनोवा (विविधता विश्लेषण) का उपयोग किया जाता है:

(a) दो चरों के बीच अंतर जाँचने के लिए

(b) कई समूह माध्यों के बीच अंतर जाँचने के लिए

(c) समय अवधियों के अध्ययन हेतु

(d) केवल परिकल्पनाओं हेतु

(v) The Gravity Potential Model in Geography explain:

(a) Population growth

(b) Spatial Interaction between Places

(c) Weather changes

(d) Migration causes only

भूगोल में गुरुत्वाकर्षण संभाव्य मॉडल समझाता है :

(a) जनसंख्या वृद्धि

(b) स्थलों के बीच स्थानिक अंतःक्रिया

(c) मौसम परिवर्तन

(d) केवल प्रवासन के कारण

(vi) Correlation Coefficient measures:

(a) Causation

(b) Degree of relationship between Variables

(c) Central tendency

(d) Variation within Sample

सह सम्बन्ध गुणांक मापता है:

(a) कारणता

(b) चरों के बीच सम्बन्ध की मात्रा

(c) केन्द्रीय प्रवृत्ति

(d) नमूने के भीतर अन्तर

(vii) Random Sampling ensures that:

(a) All items have equal chance of selection

(b) Large areas are avoided

(c) Data become biased

(d) Samples are small

यादृच्छिक नमूना यह सुनिश्चित करता है कि:

(a) सभी इकाइयों को समान रूप से चुने जाने का अवसर मिले

(b) बड़े क्षेत्र टाले जाएं

(c) आंकड़े पक्षपाती हों

(d) नमूने छोटे हों

(vii) Which of the following tools is used for Primary data collection?

(a) Questionnaire

(b) Gazatteer

(c) Statistical yearbook

(d) Atlas

प्राथमिक आंकड़े एकत्र करने का कौन-सा उपकरण है?

(a) प्रश्नावली

(b) राजपत्र

(c) सांख्यिकीय वर्षपुस्तक

(d) मानचित्र

(ix) Which of the following is a type of research based on existing data?

(a) Field research

(b) Experimental research

(c) Historical research

(d) Descriptive researchनिम्नलिखितमें से कौन-सा अनुसंधान मौजूदा आंकड़ों पर आधारित होता है?

(a) क्षेत्रीय अनुसंधान

(b) प्रयोगात्मक अनुसंधान

(c) ऐतिहासिक अनुसंधान

(d) वर्णनात्मक अनुसंधान

(x) A hypothesis is:

(a) A statement of fact

(b) An untested proposition

(c) Aproven law

(d) A data collection method

परिकल्पना है:

(a) तथ्य का कथन

(b) अपरीक्षित प्रस्तावना

(c) सिद्ध नियम

(d) डाटा संग्रह की विधि

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note : Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. Explain the significance of quantitative methods in geographical research.

भौगोलिक अनुसंधान में मात्रात्मक विधियों के महत्व की व्याख्या कीजिए।

3. Describe the essential elements of a good research design.

एक अच्छे अनुसंधान रूपरेखा के आवश्यक घटकों का वर्णन कीजिए।

4. Differentiate between a Questionnaire and a Schedule with suitable examples.

प्रश्नावली और अनुसूची में उपयुक्त उदाहरणों सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए।

5. What are the main steps involved in Hypothesis formulation and Testing?

परिकल्पना के निर्माण और परीक्षण में सम्मिलित प्रमुख चरण कौन-कौन से हैं?

6. Explain the concept and utility of gravity and population potential models in human geography.

मानव भूगोल में गुरुत्वाकर्षण तथा जनसंख्या संभाव्य मॉडल की संकल्पना और उपयोगिता की व्याख्या कीजिए।

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [10×3=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

7. What is a review of Literature? Explain its purpose, structure and relevance in the process of geographical research.

साहित्य समीक्षण क्या है? भौगोलिक अनुसंधान प्रक्रिया में इसके उद्देश्य, संरचना तथा प्रासंगिकता की व्याख्या कीजिए।
8. Discuss the assumptions, merits and limitations of the Chi-square test in Geographical research. Ilustrate with an example from population geography.

भौगोलिक अनुसंधान में काई स्क्वायर परीक्षण की मान्यताओं, गुणों तथा सीमाओं पर चर्चा कीजिए। जनसंख्या भूगोल से एक उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

9. Discuss the theoretical basis, formulation and geographical applications of the Gravity Potential Model and the Population Potential Model.

गुरुत्वाकर्षण संभाव्य मॉडल तथा जनसंख्या संभाव्य मॉडल के सैद्धान्तिक आधार, निर्माण प्रक्रिया एवं भौगोलिक अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए।

10. Given the following ranks assigned by two geography teachers to eight students in a fieldwork project, compute the Spearman’s rank correlation coefficient between the teacher’s judgments. Calculate all steps, show the formula and interpret the result:

नीचे दी गई तालिका में आठ छात्रों को दो भूगोल शिक्षकों द्वारा दी गई रैंकिंग दर्शाई गई है। स्पीयरमैन के रैंक सहसम्बन्ध गुणांक की गणना कीजिए और परिणाम की व्याख्या कीजिए। सभी चरणों की गणना कीजिए, सूत्र दिखाइए और परिणाम की व्याख्या कीजिए:

11. Discuss the concept, assumptions and methodology of Analysis of Variance (ANOVA).

विचरण विश्लेषण (एनोवा) की अवधारणा, मान्यताओं और कार्यप्रणाली पर चर्चा कीजिए।




PG (Regular) (Sem.-III)

Examination, 2025

(Session : 2024-26)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920711

(Remote Sensing and Geographical Information System)

Time: Three Hours]  [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Attempt all questions. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

1. (i) In which year was the first Indian Remote Sensing Satellite launched?

(a) 1975

(b) 1988

(c) 1980

(d) 1995

भारत का पहला रिमोट सेंसिंग उपग्रह किस वर्ष प्रक्षेपित हुआ था?

(a) 1975

(b) 1988

(c) 1980

(d) 1995

(ii) Which of the following is a Remote Sensing Satellite?

(a) INSAT-3D

(b) IRS-1A

(c) Aryabhata

(d) Bhaskara-1

निम्नलिखित में से कौन एक रिमोट सेंसिंग उपग्रह है?

(a) INSAT-3D

(b) IRS-1A

(c) आर्यभट्ट

(d) भास्कर-1

(iii) Which plate form is used for Remote Sensing?

(a) Ground Station

(b) Aircraft and Satellite

(c) River boat

(d) Only Balloon

रिमोट सेंसिंग के लिए कौन-सा प्लेटफॉर्म उपयोग किया जाता है?

(a) भूमिगत केन्द्र

(b) विमान और उपग्रह

(c) नदी की नाव

(d) केवल गुब्बारा

(iv) Which component is not part of GIS?

(a) Hardware

(b) Software

(c) People

(d) Rocket

कौन-सा घटक जी.आई.एस. का हिस्सा नहीं है?

(a) हार्डवेयर

(b) सॉफ्टवेयर

(c) व्यक्ति

(d) रॉकेट

(v) GIS integrates which types of India?

(a) Spatial and Non-spatial data

(b) Numeric only

(c) Text only

(d) Audio and Video

जी.आई.एस. किस प्रकार की डाटा को एकीकृत करता है?

(a) स्थानिक और गैर-स्थानिक डाटा

(b) केवल संख्यात्मक

(c) केवल पाठ

(d) ध्वनि और वीडियो

(vi) Landsat imagery is mainly used for:

(a) Urban Planning

(b) Agriculture monitoring

(c) Forest mapping

(d) All of the above

लैंडसेट चित्रों का मुख्य रूप से उपयोग किसके लिए किया जाता है?

(a) नगर नियोजन

(b) कृषि निगरानी

(c) वन मानचित्रण

(d) उपर्युक्त सभी

(vii) What is Aerial photography?

(a) Photography from Ground level

(b) Photography from Satellite

(c) Photography taken from Aircraft

(d) Photography taken under Water

हवाई फोटोग्राफी क्या है?

(a) जमीनी स्तर से फोटोग्राफी

(b) उपग्रहों से फोटोग्राफी

(c) विमान से ली गई फोटोग्राफी

(d) जल के नीचे से ली गई फोटाग्राफी

(viii) A Geo-stationary satellite orbits the earth at an altitude of:

(a) 3,600 km

(b) 25,000 km

(c) 35,786 km

(d) 40,000 km

भू-स्थिर उपग्रह पृथ्वी से किस ऊँचाई पर परिक्रमा करता है?

(a) 3,600 किमी.

(b) 25,000 किमी.

(c) 35,786 किमी.

(d) 40,000 किमी.

(ix) Raster data is represented by:

(a) Points

(b) Lines

(c) Grid of cells

(d) Polygon

रास्टर डेटा किस रूप में प्रदर्शित होता है?

(a) बिन्दु

(b) रेखाएँ

(c) कोशिकाओं के ग्रिड के रूप में

(d) बहुभुज

(x) Which country developed the GPS system?

(a) Russia

(b) U.S.A.

(c) India

(d) Japan

जी.पी.एस. प्रणाली किस देश ने विकसित की?

(a) रूस

(b) अमेरिका

(c) भारत

(d) जापान

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note : Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. Explain the difference between Active and Passive Remote Sensing.

सक्रिय एवं निष्क्रिय रिमोट सेंसिंग के बीच अन्तर समझाइए।

3. Write a brief note on IRS.

आई.आर.एस. पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

4. Discuss the elements of Geographical Information System.

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्वों की विवेचना कीजिए।

5. Discuss the utility ofAerial photograph.

हवाई फोटोग्राफ की उपयोगिता की विवेचना कीजिए।

6. Explain the vector data structure.

वेक्टर आंकड़ा संरचना को समझाइए।

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [10×3=30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

7. Describe the historical development of Remote Sensing.

रिमोट सेंसिंग के ऐतिहासिक विकास का वर्णन कीजिए।

8. Explain the application of Remote Sensing and GIS in Geographical studies.

भौगोलिक अध्ययन में रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली के अनुप्रयोगों की व्याख्या कीजिए।

9. Describe the role of Sensors and Resolution.

सेंसर्स और रेजोल्यूशन की भूमिका की विवेचना कीजिए।

10. Discuss the role of Global Positioning System (GPS) in Disaster Management and Transportation Planning.

आपदा प्रबन्धन और परिवहन नियोजन में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जी.पी.एस.) की भूमिका पर चर्चा कीजिए।

11. Explain the concept components and functions of Geographical Information System (GIS) in detail.

भौगोलिक सूचना प्रणाली (जी.आई.एस.) की संकल्पना, घटकों तथा कार्यों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।




PG (Regular) (Sem.-III) Examination, 2025

(Session : 2024-26)

GEOGRAPHY

Paper Code : 920712

(Human and Social Geography)

Time: Three Hours] [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Multiple Choice Type Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Attempt all MCQ from this part. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

इस भाग से सभी बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. (i) Who is known as the Father of Human Geography?

(a) Eratosthenes

(b) Friedrich Ratzel

(c) Carl Ritter

(d) Vidal de La Blache

मानव भूगोल के जनक के रूप में किसे जाना जाता है?

(a) एरेटोस्थनीज

(b) फ्रेडरिक रैटजेल

(c) कार्ल रिटर

(d) विडाल डी ला ब्लॉश

(ii) In which continent do more than 60% of the world’s total population residence?

(a) Asia

(b) Africa

(c) Europe

(d) South America

आनुपातिक दृष्टि से विश्व की कुल जनसंख्या का 60% से अधिक लोग किस महाद्वीप में निवास करते हैं?

(a) एशिया

(b) अफ्रीका

(c) यूरोप

(d) दक्षिण अमेरिका

(iii) Urbanization leads to which of the following problems?

(a) Population

(b) Unemployment

(c) House shortage

(d) All ofthe above

शहरीकरण निम्नलिखित में से किस समस्या को जन्म देता?

(a) जनसंख्या

(b) बेरोजगारी

(c) आवास की कमी

(d) उपर्युक्त सभी

(iv) Which of the following Indian cities is a ‘Mega city’?

(a) Patna

(b) Lucknow

(c) Delhi

(d) Bhopal

निम्नलिखित में से, कौन-सा भारतीय शहर एक ‘मेगा सिटी’ है?

(a) पटना

(b) लखनऊ

(c) दिल्ली

d) भोपाल

(v) The term “Cultural Evolution” is most closely associated with:

(a) Charles Darwin

(b) E.B. Taylor

(c) Max Weber x

(d) Karl Marx

‘सांस्कृतिक विकास’ शब्द सबसे अधिक निकटता से किससे जुड़ा हुआ है?

(a) चार्ल्स डार्विन

(b) ई.बी. टेलर

(c) मैक्स वेबर

(d) कार्ल मार्क्स

(vi) Hindi belongs to which branch of the IndoEuropean language family?

(a) Germanic

(b) Romance

(c) Indo-Aryan

(d) Slavic

हिन्दी इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार किस शाखा से सम्बन्धित है?

(a) जर्मनिक

(b) रोमांस

(c) इंडो-आर्यन

(d) स्लाविक

Social justice is an important objective:

(a) Capitalism

(b) Socialism

(c) Feudalism

(d) Colonialism

सामाजिक न्याय एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है:

(a) पूँजीवाद

(b) समाजवाद

(c) सामन्तवाद

(d) उपनिवेशवाद

(viii) Good health, Education and Income represents:

(a) Political Right

(b) Social indicators of Quality of Life

(c) Economic factor only

(d) Environmental problems

अच्छे स्वास्थ्य, शिक्षा और आय का प्रतिनिधित्व करता है:

(a) राजनीतिक अधिकार

(b) जीवन की गुणवत्ता के सामाजिक संकेतक

(c) केवल आर्थिक कारक

(d) पर्यावरणीय समस्या

(ix) Social transformation in Rural India is mainly influenced by:

(a) Urbanization

(b) Education

(c) Economic Development

(d) All of the above

ग्रामीण भारत में सामाजिक परिवर्तन काफी हद तक किससे प्रभावित हुआ है?

(a) नगरीकरण

(b) शिक्षा

(c) आर्थिक विकास

(d) उपर्युक्त सभी

(x) In which field are social media mainly used in India?

(a) Communication

(b) Entertainment

(c) Business and Marketing

(d) All of the above

सोशल मीडिया का भारत में मुख्य रूप से किस क्षेत्र में उपयोग किया जाता है?

(a) संचार

(b) मनोरंजन

(c) व्यवसाय और विपणन

(d) उपयुक्त सभी

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. Briefly describe the World Population Distribution.

विश्व की जनसंख्या वितरण का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

3. Briefly discuss the age-sex structure of developed countries.

विकसित देशों की आयु-लिंग संरचना पर संक्षेप में वर्णन कीजिए।

4. Briefly discuss the Mongoloid human races of India.

भारत की मंगोलाइड मानव प्रजाति पर संक्षेप में चर्चा कीजिए।

5. Briefly discuss the concept of Social Justice.

सामाजिक न्याय की अवधारणा पर संक्षेप में चर्चा कीजिए।

6. What is the contribution of Social Media in making society aware in India? Briefly describe.

भारत में समाज को जागरूक करने में सोशल मीडिया का क्या योगदान है? संक्षेप में वर्णन कीजिए।

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. Each question carries 10 marks. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

7. Explain the causes and consequences of population migration in the world.

विश्व में जनसंख्या प्रवासन के कारणों और परिणामों की व्याख्या कीजिए।

8. Discuss in detail the occupational structure of developing countries.

विकासशील देशों की व्यावसायिक संरचना पर विस्तृत चर्चा कीजिए।

9. Discuss the origin and spatial distribution of religions in the Asian continent.

एशिया महाद्वीप में धर्मों की उत्पत्ति और स्थानिक वितरण का वर्णन कीजिए।

10. Explain the social changes that have taken place in India due to globalism.

भूमण्डलीकरण के कारण भारत में हुए सामाजिक परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।

11. Elaborate on the recent changes in urban social life in India.

भारत में शहरी सामाजिक जीवन में हाल में हुए परिवर्तनों पर विस्तृत वर्णन कीजिए।




PG (Regular) (Sem.-III) Examination, 2025

(Session : 2024-26)

GEOGRAPHY

Paper Code : 920713

(Land Use and Agriculture Geography)

Time: Three Hours] [Maximum Marks : 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Attempt all MCQs from this Part. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

इस भाग से सभी बहुविकल्पीय प्रश्नों को हल कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. (i) Who has written the book ‘Land of Britain: Its Use and Misuse’?

(a) A. Young

(b) M.Murphy

(c) L.D. Stamp

(d) Coppeck

‘लैण्ड ऑफ ब्रिटेन: इट्स यूज एण्ड मिस्यूस’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?

(a) ए. यंग

(b) एम. मर्फी

(c) एल.डी. स्टाम्प

(d) कोपॉक

(ii) The correct scale of Codastral map is:

(a) 1″= 1 mile

(b) 16″ = 1 mile

(c) 4″ = 1 mile

(d) ½”= 1 mile

भूकर मानचित्र का सही माप है:

(a) 1″ = 1 मील

(b) 16″ = 1 मील

(c) 4″ = 1 मील

(d) 1/2″ = 1 मील

(iii) Original region of Rice is associated with…….

(a) India

(b) China

(c) South-EastAsia

(d) Central Asia

वास्तविक चावल क्षेत्र…….. से सम्बन्धित है।

(a) भारत

(b) चीन

(c) दक्षिण-पूर्व एशिया

(d) मध्य एशिया

(iv) Landuse data are available in India from:

(a) 1947

(b) 1961

(c) 1950

(d) 1980

भारत में भूमि उपयोग के आँकड़े उपलब्ध है:

(a) 1947 से

(b) 1961 से

(c) 1950 से

(d) 1980 से

(v) Agriculture patterns are influenced by:

(a) Traditional practices

(b) Biophysical frameworks

(c) Government policies

(d) All of the above

कृषि प्रारूप प्रभावित होते हैं:

(a) परम्परागत प्रथाओं से

(b) जैव-अजैव ढांचों से

(c) सरकारी नीतियों से

(d) उपरोक्त सभी

(vi) The concentric zones of landuse is given by:

(a) Von Thunen

(b) M. Swaminathan

(c) A.Sharan

(d) L.D. Stamp

भूमि उपयोग वृत्ताकार खण्ड किसने दिया है?

(a) वॉन थ्यूनेन

(b) एम. स्वामीनाथन

(c) ए. शरन

(d) एल.डी. स्टाम्प

(vii) The Green Revolution began from………

(a) 1950

(b) 1960

(c) 1970

(d) 1980

हरित क्रान्ति………से प्रारम्भ हुई।

(a) 1950

(b) 1960

(c) 1970

(d) 1980

(viii) Father of White Revolution is:

(a) Dr. Verghese Kurien

(b) Dr. Norman Borlaung

(c) M. Swaminathan

(d) None of these

श्वेत क्रान्ति के जनक हैं:

(a) डॉ. वर्गीज कुरियन

(b) डॉ. नॉर्मन बोरलॉग

(c) एम. स्वामीनाथन

(d) इनमें से कोई नहीं

(ix) How many Agro-climatic zones are there?

(a) 13

(b) 14

(c) 15

(d) 16

कितने कृषि जलवायु क्षेत्र हैं?

(a) 13

(b) 14

(c) 15

(d) 16

(x) A type of farming in which a single crop is grown on a large area is called:

(a) Primitive

(b) Commercial

(c) Plantation

(d) Intensive

खेती का एक ऐसा प्रकार जिसमें एक बड़े क्षेत्र में एक ही फसल उगाई जाती है, को कहा जाता है:

(a) आदिम

(b) व्यावसायिक

(c) वृक्षारोपण

(d) गहन

PART-B / भाग ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Write short notes on any four from the following. Each

carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए। प्रत्येक 5 अंकों का है।

2. Major Land reforms in India

भारत में प्रमुख भूमि सुधार

3. Landuse classification: U.К.

भूमि उपयोग वर्गीकरण: यू.के.

4. Landuse Planning in India

भारत में भूमि उपयोग की योजना
5. Techniques of Delimitation of Agricultural Region

कृषि भूमि के सीमांकन की तकनीकें

6. Measurement of Agricultural Productivity

कृषि उत्पादकता मापन

7. NewAgricultural Technology

नई कृषि तकनीक

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions from the following. Each question carries 10 marks. [3×10=30[

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Discuss the meaning and scope of Landuse and Agriculture Geography.

कृषि भूगोल एवं भूमि उपयोग के अर्थ एवं कार्यक्षेत्र का वर्णन कीजिए।

9. Explain the crop-combination and diversification in India.

भारत में फसल संयोजन और विविधिकरण की व्याख्या कीजिए।

10. Evaluate the Green Revolution in India.

भारत में हरित क्रान्ति का मूल्यांकन कीजिए।

11. Explain the Agro-climatic regions of India.

भारत के कृषि जलवायु क्षेत्रों की व्याख्या कीजिए।

12. Explain the factors influencing Agricultural pattern in India.

भारत में कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए।




PG (Regular) (Sem.-III) Examination, 2025

(Session: 2024-26)

(COMMON FOR ARTS)

AECC-2

Paper Code: 940193 (A)

(Human Values and Professional Ethics and Gender Sensitisation)

Time: Two Hours] [Maximum Marks: 50

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

Part-1 / भाग-I

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: All questions are compulsory.

सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

1. Choose the correct option from each question:

प्रत्येक प्रश्न के सही विकल्प का चयन कीजिए: [10×1=10]

(i) Preference or Prejudice toward one gender over the other is termed as:

(a) Gender Role

(b) Gender Awareness

(c) Gender Bias

(d) Gender Parity

किसी एक लिंग की अन्य लिंग से प्राथमिकता अथवा पूर्वाग्रह कहलाता है:

(a) लिंग दायित्व

(b) लिंग जागरूकता

(c) लिंग पक्षपात

(d) लिंग समानता

(ii) ‘Sah-Astitva’means:

(a Co-existence

(b) Co-operation

(c) Co-option

(d) Corporate identity

सह-अस्तित्व का अभिप्राय है:

(a) साथ-साथ होना

(b) सहयोग

(c) सहयोजन

(d) कॉर्पोरेट पहचान

(iii) From which Greek word is ethics derived?

(a) Ethika

(b) Ethios

(c) Ethikos

(d) Ethos

एथिक्स किस ग्रीक शब्द से लिया गया है?

(a) एथिका

(b) एथियोस

(c) एथिकोस

(d) एथोज
(iv) What does ethics stand for?

(a) Community

(b) Charity.

(c) Profit

(d) Right or wrong

नैतिकता का क्या अर्थ है?

(a) समुदाय

(b) दान

(c) लाभ

(d) सही या गलत

(v) A person’s biological and physiological characteristics are referred as:

(a) Gender

(b) Personality

(c) Behaviour

(d) Sex

एक व्यक्ति की जैविक और शारीरिक विशेषताओं को कहा जाता है:

(a) लिंग

(b) व्यक्तित्व

(c) व्यवहार

(d) सेक्स

(vi) What is necessary for Morality?

(a) Fate argument

(b) Human freedom

(c) Criminology

(d) None of the above

नैतिकता के लिए क्या आवश्यक है?

(a) भाग्यवाद

(b) मानव स्वतंत्रता

(c) अपराध मनोविज्ञान

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

(vii) What was the tendency of male class in the Ancient time?

(a) Itinerant

(b) Permanent

(c) Temporary

(d) All of the above

आदिकाल में पुरुष वर्ग की प्रवृत्ति किस प्रकार की थी?

(a) भ्रमणशील

(b) स्थायी

(c) अस्थायी

(d) उपरोक्त सभी

(viii) The Government of India has declared 8th March as which day?

(a) International Labour Day

(b) International Education Day

(c) International Women’s Day

(d) None of the above

भारत सरकार ने 8 मार्च को किस दिवस के रूप में घोषित किया है?

(a) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम दिवस

(b) अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस

(c) अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

(ix) On which basis is the division of labour done in modern society?

(a) Political basis

(b) Religious basis

(c) Social basis

(d) Gender basis

आधुनिक समाज में श्रम विभाजन किस आधार पर किया गया है?

(a) राजनीतिक आधार

(b) धार्मिक आधार

(c) सामाजिक आधार

(d) लैंगिक आधार

(x) If you have——-, you will be a trusted person because they will see that you are committed to your company.

(a) Organizational skills

(b) Loyalty

(c) Respect

(d) Productivity

यदि आपके पास—— है, तो आप एक विश्वसनीय व्यक्ति होंगे क्योंकि वे देखेंगे कि आप कम्पनी के लिये प्रतिबद्ध हैं।

(a) संगठनीय योग्यता

(b) निष्ठा

(c) सम्मान

(d) उपादेयता

Part-II / भाग-II

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

2. What is Business Ethics?

व्यावसायिक नैतिकता क्या है?

3. Explain the terms ‘Courage’, ‘Empathy’ and ‘Self Confidence’.

‘साहस’, ‘सहानुभूति’ और ‘आत्मविश्वास’ शब्दों की व्याख्या कीजिए।

4. What do you mean by Corporate culture?

कापोरेट संस्कृति से आप क्या समझते हैं?

5. What are the causes of low status of women in Indian Society?

भारतीय समाज में महिलाओं की निम्न प्रस्थिति के क्या कारण हैं?

6. Describe intellectual property rights.

बौद्धिक संपदा अधिकारों का वर्णन कीजिए।

Part-III / भाग-III

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any two questions. Each question carries 10 marks. [2×10=20]

किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का हैं।

7. Explain Indian Constitutional provision of gender justice and human rights.

लैंगिक न्याय और मानवाधिकारों पर भारतीय संवैधानिक प्रावधान की व्याख्या कीजिए।

8. Throw light on the Moral Philosophy of Vedas.

वेदों के नैतिक दर्शन पर प्रकाश डालिए।

9. Write about the R.N. Tagore’s view on Ethics.

नैतिकता पर आर.एन. टैगोर के दृष्टिकोण के बारे में लिखिए।

10. Write about the duties and rights of employee and employers.

कर्मचारियों और नियोक्ताओं के कर्तव्यों और अधिकारों के बारे में लिखिए।

PG Regular Semester-III Examination 2023 QUESTION PAPER, Patliputra University, Patna

PG Regular Semester-III  Examination 2023

Patliputra University, Patna



PG Regular Semester-III Examination 2023

(Session: 2022-24)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920710

(Quantitative Techniques & Research Methodology)

Time: Three Hours]  [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the marginindicate full marks. Answer from all sectio as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question: [10×2-20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए:

1. (i) Cohort study is a type of:

(a) Case report

(b) Randomised control trial

(c) Cross-sectional study

(d) Longitudinal study

कोहॉर्ट स्टडी निम्नलिखित का एक प्रकार है:

(a) केस रिपोर्ट

(b) यादृच्छिक नियंत्रण परीक्षण

(c) क्रॉस-अनुभागीय अध्ययन

(d) अनुदैर्ध्य अध्ययन

(ii) Which of the following is a basis of the quality of a research journal?

(a) Impact factor

(b) h-index

(c) g-index

(d) i 10-index

निम्नलिखित में से किसी शोध पत्रिका की गुणवत्ता का आधार कौन है?

(a) प्रभाव गुण

(b) एच-इंडेक्स

(c) जी-इंडेक्स

(d) i 10-इंडेक्स

(iii) Correlation between two variables is best viewed in:

(a) Scatter Plot

(b) Bar Graph

(c) Pie diagram

(d) Histogram

दो परिवर्तनशीलों के बीच सहसम्बंध सबसे अच्छे तरीके से देखी जा सकती है :

(a) स्कैटर प्लॉट

(b) बार रेखांकन

(c) पाई आरेख

(d) हिस्टोग्राम

(iv) Which of the following is Non-probability type of sampling?

(a) Simple random

(b) Stratified

(c) Multi-stage

(d) Snowball

निम्न में कौन-सी अप्रायिकता / गैर-संभावना वाले नमूना संग्रह की विधि है?

(a) सरल यादृच्छिक

(b) स्तरित

(c) बहु-स्तरित

(d) स्नो बॉल

(v) Basic research is:

(a) Practical and descriptive

(b) Client-driven

(c) Expands current knowledge

(d) Advancement of technology

मौलिक शोध होता है:

(a) व्यावहारिक और वर्णनात्मक

(b) ग्राहक-प्रेरित

(c) वर्तमान ज्ञान का विस्तार करने वाला

(d) प्रौद्योगिकी में उन्नति लाने वाला

(vi) The depth of research can be estimated by:

(a) Title of research

(b) Objective of research

(c) Total expenditure of research

(d) Duration of research

शोध की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है

(a) शोध कार्य के शीर्षक द्वारा

(b) शोध के उद्देश्य द्वारा

(c) शोध के कुल खर्च द्वारा

(d) शोध की अवधि द्वारा

(vii) An independent variable is defined as:

(a) Change variable

(b) Confrounding variable

(c) Extraneous variable

(d) Outcome variable

एक स्वतंत्र चर को परिभाषित किया जाता है:

(a) परिवर्तनशील चर

(b) भ्रमित चर

(c) बाह्य चर

(d) परिणाम चर

(viii) The English word ‘Research’ derives origin from:

(a) Latin

(b) French

(c) German

(d) Italian

अंग्रेजी शब्द ‘रिसर्च’ (शोध) की व्युत्पति है:

(a) लैटिन

(b) फ्रेंच

(c) जर्मन

(d) इटालियन

(ix) The study design of collecting data at a particular point of time is called.:

(a) Cohort study

(b) Trend study

(e) Cross sectional study

(d) Longitudinal study

किसी विशेष समय बिन्दु पर आंकड़े संग्रहण करने वाला अध्ययन अभिकल्प कहलाता है :

(a) सहगण अध्ययन

(b) प्रवृत्ति अध्ययन

(c) प्रतिनिध्यात्मक अध्ययन

(d) अनुदैर्ध्य (दीर्घकालिक) अध्ययन

(x) Which of the following is an example of a secondary source of information?

(a) Experiment

(b) Survey

(c) Journal

(d) Questionnaire

निम्न में से कौन सूचना के द्वितीयक स्रोत का उदाहरण है?

(a) प्रयोग

(b) सर्वेक्षण

(c) पत्रिका

(d) प्रश्नावली

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

2. Procedure of Interview

साक्षात्कार की प्रक्रिया

3. Types of random sampling.

यादृच्छिक प्रतिदर्श चयन के प्रकार

4. Population potential Model.

जनसंख्या विभव प्रतिमान

5. Procedure of Hypothesis testing

परिकल्पना परीक्षण की प्रक्रिया

6. Research methodology.

शोध प्रविधि

7. Significance of analysis of variance

प्रसरण विश्लेषण का महत्व

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following: [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

8. How will you decide the size of sample?

प्रतिचयन का आकार आप किस प्रकार निर्धारित करेंगे?

9. Calculate correlation co-efficient by karl Pearson’s method from the following data:

निम्नलिखित आँकड़े से कार्ल पियर्सन की विधि द्वारा सहसम्बन्ध गुणांक की गणना कीजिये:

X- 80, 61, 23, 94, 87, 37, 64, 22

Y- 30, 29, 33, 21, 61, 56, 86, 69

10. What is Sampling? What are its objectives? Describe any two methods of sampling.

प्रतिचयन क्या है? इसके कौन-कौन से उद्देश्य हैं? प्रतिचयन की किन्हीं दो विधियों का वर्णन कीजिए।
11. Discuss the merits and limitations of the application of quantitative techniques in geography.

भूगोल में मात्रात्मक तकनीकों के अनुप्रयोग के गुणों एवं सीमाओं की विवेचना कीजिये।

12. Define the research problem. Describe the methods and process of research problem formulation.

शोध समस्या को परिभाषित कीजिए। शोध समस्या के निरूपण की विधियों एवं प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए।



PG (Regular) (Sem.-III)

Examination, 2023

(Session: 2022-24)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920711

(Remote Sensing and Geographical Information System)

Time: Three Hours]   [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the marginindicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question : [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए:

1. (i) Which one of the following software is not a GIS software?

(a) Auto CAD

(b) Map Info

(c) ERDAS

(d) Arc view

निम्नलिखित में से कौन-सा सॉफ्टवेयर जीआईएस सॉफ्टवेयर नहीं है?

(a) ऑटोकैड

(b) मैप इन्फो

(c) एरडास

(d) आर्क व्यू

(ii) The GPS space segment consists of Navigation Satellite Timing and Ranging whose number is:

(a) 8

(b) 12

(c) 16

(d) 24

जीपीएस स्पेस सेगमेंट में नेविगेशन सैटेलाइट टाइमिंग और रैंजिंग शामिल हैं जिसकी संख्या है:

(a) 8

(b) 12

(c) 16

(d) 24

(iii) The National Aeronautics and Space Administration (NASA) is situated in?

(a) Russia

(b) Germany

(c) Israel

(d) U.S.A.

नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) स्थित है?

(a) रूस

(b) जर्मनी

(c) इजरायल

(d) यू.एस.ए.

(iv) The changes in the reflectivity/emissivity with time is called:

(a) Spectral resolution

(b) Spatial resolution

(c) Radiometric resolution.

(d) None of the above

समय के साथ परावर्तन/ उत्सर्जकता में होने वाले परिवर्तन को कहते हैं:

(a) स्पेक्ट्रल विभेदन

(b) स्थानिक विभेदन

(c) रेडिओमेट्रिक विभेदन

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

(v) The normal altitutde of GPS satellite is about?

(a) 16,200 kms

(b) 20,200 kms

(c) 24,400 kms

(d) None of the above

जीपीएस उपग्रह की सामान्य ऊँचाई लगभग होती है:

(a) 16,200 किमी.

(b) 20,200 किमी.

(c) 24,400 किमी.

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

(vi) The infrared portion of EMR lies between:

(a) 0.4-0.7 µm

(b) 0.5 mm-1 µm

(c) 0.7-1.3 µm

(d) 0.7-14 µm

EMR का इन्फ्रारेड भाग बीच में स्थित है:

(a) 0.4 – 0.7 माइक्रोमीटर

(b) 0.5 मिलीमीटर 1 माइक्रोमीटर

(c) 0.7-1.3 माइक्रोमीटर

(d) 0.7-14 माइक्रोमीटर

(vii) Which wave is used in Remote sensing process?

(a) Gamma rays

(b) Electro-magnetic waves

(c) Electric waves

(d) None of these

सुदूर संवेदन प्रक्रिया में किस तरंग का प्रयोग होता है?

(a) गामा किरणें

(b) इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक तरंगें

(c) इलेक्ट्रिक तरंगें

(d) इनमें से कोई नहीं

(viii) The altitude of sunsynchronous satellite is:

(a) 400-600 km

(b) 600-800 km

(c) 800-1000 km

(d) 1000-1200 km

सूर्य समकालिक कक्ष की ऊंचाई है:

(a) 400-600 km

(b) 600-800 km

(c) 800-1000 km

(d) 1000-1200 km

(ix) The ability of a sensor to identify the smallest size detail of a pattern on an image

(a) Spatial resolution

(b) Spectral resolution

(c) Temporal resolution

(d) None of the above

किसी भी वस्तु की सबसे छोटी इकाई को छायाचित्र पर पता लगाने वाली संवेदन (sensor) की क्षमता होती है।

(a) स्थानिक विभेदन

(b) स्पेक्ट्रल विभेदन

(c) टेम्पोरल विभेदन

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

(x) RS-IC LISS-III data has a spatial resolution

(a) 72 meters

(b) 60 meters

(c) 23.5 meters

(d) 5.8 meters

आई.आर.एस.-1 सी.एल.आई.एस.एस.-III आंकड़े का स्थानिक विभेदन है:

(a) 72 मीटर

(b) 60 मीटर

(c) 23.5 मीदर

(d) 5.8 मीटर

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

2. What do you understand by Digital cartography?

डिजिटल कार्टोग्राफी से आप क्या समझते हैं?

3. What is Remote Sensing? Briefly explain remote sensing process.

रिमोट सेंसिंग क्या है? संक्षेप में रिमोट सेंसिंग प्रक्रिया की व्याख्या करें।

4. Describe electromagnetic radiation and its role in remote sensing.

5. विद्युत चुम्बकीय विकिरण एवं सुदूर संवेदन में इसकी भूमिका का वर्णन कीजिए।

Differentiate between GIS data and Remote sensing data.

जी.आई.एस. आंकड़ा और रिमोट सेंसिग आंकड़ा के बीच तुलना कीजिए।
6. What are the different types of Remote Sensing? Explain with examples.

7. सुदूर संवेदन के विभिन्न प्रकार क्या हैं? उदाहरण के साथ व्याख्या कीजिए।

What are the different types of resolution? Explain.

विभेदन के विभिन्न प्रकार क्या है? व्याख्या कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following: [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए

8. Define GIS. Describe the Key element of GIS.

जीआईएस को परिभाषित कीजिए। जीआईएस के प्रमुख तत्वों का वर्णन कीजिए।

9. Explain in detail the different remote sensing platforms.

विभिन्न रिमोट सेंसिंग प्लेटफार्मों के बारे में विस्तार से व्याख्या कीजिए।
10. Explain the remote sensing and GIS application in land information system.

भूमि सूचना प्रणाली में सुदूर संवेदन और जी.आई.एस. अनुप्रयोगों की व्याख्या कीजिए।

11. Define GPS. Explain its application in GIS.

जी.पी.एस. को परिभाषित कीजिए। इसका जी.आई.एस. में प्रयोग की व्याख्या कीजिए।

12. What is the significance of remote sensing in geography? Throw light.

भूगोल में सुदूर संवेदन का क्या महत्व है? प्रकाश डालिए।



 PG (Regular) (Sem.-III)

Examination, 2023

(Session: 2022-24)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920712

(Human and Social Geography)

Time: Three Hours]  [Maximum Marks: 70

Note : Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the margin indicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note Choose the correct option from each question: [10-2-20]

अत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए:

(i) Which of the following regions is not included in dense populated region of the world?

(a) South-east Asia

(b) North west Europe

(c) North east N. America

(d) South west Africa

निम्नलिखित में से किन क्षेत्रों को सबसे अधिक सनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों में सम्मिलित नहीं करते है

(a) द. पूर्वी एशिया

(b). उत्तरी पश्चिमी यूरोप

(c) उ. पूर्वी उत्तरी अमेरिका

(d) दक्षिणी पश्चिमी अफ्रीका

(ii) Village settled around a lake will come under which pattern?

(a) Radial

(b) Star

(c) Rectangular

(d) Circular

झील के चारों ओर बसा गाँव किस प्रतिरूप में आयेगा ?

(a) अरीय

(b) तारा

(c) आयताकार

(d) वृत्ताकार

(iii) In which five year plan, the Panchayati Raj Institution was introduced in India for the first time?

(a) First

(b) Second

(c) Third

(d) Fourth
भारत में पहली बार किस पंचवर्षीय योजना में पंचायती राज संस्था की शुरुआत की गई थी?

(a) प्रथम

(b) द्वितीय

(c) तृतीय

(d) चतुर्थ

(iv) Which of the following is a social-cultural determinant of population change?

(a) Occupation structure

(b) Fertility and Mortality

(c) Migration

(d) Sex Ratio

निम्नलिखित में से कौन जनसंख्या परिवर्तन का सामाजिक सांस्कृतिक निर्धारक है ?

(a) व्यावसायिक संरचना

(b) प्रजननता और मृत्यनता

(c) प्रवास

(d) लिंगानुपात
(v) Who was the founder of human geography?

(a) Ratzel

(b) Ellen Semple

(c) Blache

(d) Carl Sauer

मानव भूगोल का जन्मदाता कौन था?

(a) रेटजेल

(b) एलेन सेम्पल

(c) ब्लाश

(d) कार्ल सावर

(vi) The biggest religion of the world is:

(a) Hindu

(b) Islam

(c) Christian

(d) Jew

विश्व का सबसे बड़ा धर्म है।

(a) हिन्दू

(b) इस्लाम

(c) ईसाई

(d) यहूदी

(vii) Average population size of villages are largest in:

(a) Uttar Pradesh

(b) Kerala

(c) West Bengal

(d) Bihar

गाँवों का औसत जनसंख्या आकार सबसे अधिक है:

(a) उत्तर प्रदेश का

(b) केरल का

(c) पश्चिम बंगाल का

(d) बिहार का
(viii) National Population Commission was formed in India:

(a) In 1952

(b) In 1991

(c) In 2001

(d) In 2004

भारत में राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन हुआ था :

(a) 1952 में

(b) 1991 में

(c) 2001 में

(d) 2004 में

(ix) ‘Man is a Geographical agent and not the least’ statement is of

(a) Febre

(b) Carl O Sauer

(c) Jean Brunhes

(d) Bowman

‘मनुष्य एक भौगोलिक अभिकर्ता है, तुच्छ और लघूत्तम नहीं’ कथन है :

(a) फेब्रे का

(b) कार्ल ओ. सावर का

(c) जीन ब्रुन्श का

(d) बोमेन का

(x) Asian-Agglomeration is located between:

(a) Latitude 10°N-40°N

(b) Latitude 45°N-50°N

(c) Latitude 0°N-30°N

(d) Latitude 6°N -25°N

एशियाई-जनसमूह……… के बीच स्थित है।

(a) अक्षांश 10°N – 40°N

(b) अक्षांश 45°N 50°N

(c) अक्षांश 0°N – 30°N

(d) अक्षांश 6°N – 25°N

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

2. Discuss the recent changes in rural social life in India.

भारत में ग्रामीण सामाजिक जीवन में अभिनव परिवर्तन की विवेचना कीजिए।

3. Discuss the meaning and scope of social Geography.

सामाजिक भूगोल के अर्थ एवं विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

4. Discuss types of rural settlements.

ग्रामीण अधिवासों के प्रकारों की विवेचना कीजिए।

5. Define Human Geography. Give a detailed account of subject-matter of Human Geography.

मानव भूगोल को परिभाषित कीजिए। मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र का विस्तृत वर्णन कीजिए।
6. Define ‘race’ and discuss the main characteristics and classification of races.

‘प्रजाति’ को परिभाषित करते हुए प्रजातियों का वर्गीकरण और उनकी मुख्य विशेषताओं की विवेचना कीजिए।

7. Critical Human Geography.

आलोचनात्मक मानव भूगोल।

Section-C/ खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following: [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

8. What do you understand about social well-being? Describe the indicators of well-being in detail.

सामाजिक कल्याण से आप क्या समझते हैं? कल्याण के संकेतकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

9. Discuss the meaning and scope of human geography.

मानव भूगोल के अर्थ एवं विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
10. Briefly describe the essential facts of Human Geography as given by Huntington.

हंटिंग्टन द्वारा दिए गए मानव भूगोल के आवश्यक तथ्यों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

11. What is urbanization? Discuss briefly the causes of the growth of urbanization in the world.

नगरीकरण क्या है? विश्व में नगरीकरण की वृद्धि के कारणों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।

12. Discuss the factors affecting the distribution and density of population in India.

भारत में जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिए।



PG (Regular) (Sem.-III)

Examination, 2023

(Session: 2022-24)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920713

(Land Use and Agriculture Geography)

Time: Three Hours]    [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the marginindicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question: [10×2-20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए :

1. (i) How many agro-climatic zones are there in India?

(a) 10

(b) 12

(c) 15

(d) 20

भारत में कितने कृषि-जलवायु क्षेत्र हैं?

(a) 10

(b) 12

(c) 15

(d) 20

(ii) The concept of crop combination region is given by:

(a) J.C. Weaver

(b) L.D: Stamp

(c) Whittlessey

(d) J.E. Spencer

शस्य संयोजन प्रदेश की अवधारणा दी:

(a) जे.सी. वीवर ने

(b) एल.डी. स्टाम्प ने

(c) व्हीटलेसे ने

(d) जे.ई. स्पेंसर ने

(iii) New Agriculture policy of India was announced in:

(a) 2000

(b) 2010

(c) 2015

(d) 2020

नई भारतीय कृषि नीति की घोषणा की गई थी:

(a) 2000 में

(b) 2010 में

(c) 2015 में

(d) 2020 में
(iv) Operation Flood is associated with:

(a) Green Revolution

(b) White Revolution

(c) Black Revolution

(d) Pink Revolution

आपरेशन फ्लड सम्बन्धित है:

(a) हरित क्रान्ति से

(b) श्वेत क्रान्ति से

(c) काली क्रान्ति से

(d) गुलाबी क्रान्ति से

(v) Von Thunen theory was propounded in:

(a) 1930

(b) 1918

(c) 1826

(d) 1956

वॉन थ्यूनेन सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ था:

(a) 1930 में

(b) 1918 में

(c) 1826 में

(d) 1956 में

(vi) Who propounded the theory of Agricultural Location?

(a) Philbrick

(b) Walter christaller

(c) Von thunen

(d) Alfred weber

कृषि अवस्थिति का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया?

(a) फिलब्रिक

(b) वाल्टर क्रिस्टालर

(c) वॉन थ्यूनेन

(d) अल्फ्रेड वेबर
(vii) Which of the following organization is developed for the improvement in Indian agriculture?

(a) Indian Council of Agricultural Research

(b) Indian Meteorological Department

(c) Survey of India

(d) None of the above

किस संस्थान को भारतीय कृषि में सुधार करने के लिए विकसित किया गया है?

(a) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद

(b) भारतीय मौसम विभाग

(c) भारतीय सर्वेक्षण विभाग

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

(viii) How many land capability classes are identified by the All India Soil and Land-use Survey Organization?

(a) 4

(b) 6

(c) 8

(d) 10

भारतीय मृदा एवं भू-उपयोग सर्वेक्षण संगठन द्वारा भूमि की क्षमता का वर्गीकरण कितने प्रकार में किया गया है?

(a) 4

(b) 6

(c) 8

(d) 10

(ix) Pink revolution is associated with:

(a) Cereal production

(b) Milk production

(c) Meat production

(d) None of these

गुलाबी क्रान्ति सम्बन्धित है:

(a) खाद्यान्न उत्पादन

(b) दुग्ध उत्पादन

(c) माँस उत्पादन

(d) इनमें से कोई नहीं
(x) How many agro-climatic regions are there in world?

(a) 6

(b) 8

(c) 10

(d) 15

विश्व में कितने कृषि जलवायु क्षेत्र हैं?

(a) 6

(b) 8

(c) 10

(d) 15

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

2. Influence of physical factors on agriculture patterns.

कृषि प्रतिरूपों पर भौतिक कारकों का प्रभाव।
3. Measurement of agricultural productivity.

कृषि उत्पादकता का मापन।

4. Jonasson’s model of Land use.

जोनासन का भूमि उपयोग प्रतिमान।

5. Land use planning in India.

भारत में भूमि उपयोग नियोजन।

6. Green Revolution in India.

भारत में हरित क्रान्ति।

7. History of land use survey.

भूमि उपयोग सर्वेक्षण का इतिहास।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following: [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
8. Analyse the bases and schemes of classification of land use in India.

भारत में भूमि उपयोग के वर्गीकरण के आधारों एवं योजनाओं का विश्लेषण कीजिये।

9. Explain the fundamental concepts of agriculture geography,

कृषि भूगोल की मौलिक संकल्पनाओं की व्याख्या कीजिये।

10. Focus on different agricultural problems and policies of India.

भारत की कृषि समस्या तथा नीति पर प्रकाश डालिए।

11. Discuss the meaning and scope of Agricultural Geography.

कृषि भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

12. What are the different methods used for the demarcation of crop combination regions?

शस्य संयोजन प्रदेश को वर्गीकृत करने के लिए किन विभिन्न तरीकों का प्रयोग किया जाता है?

 15. Trend and Problems of Urbanization / नगरीकरण की प्रवृति एवं समस्याएँ

 15. Trend and Problems of Urbanization 

(नगरीकरण की प्रवृति एवं समस्याएँ)



Q. नगरीकरण से आप क्या समझते है? नगरीकरण से संबंधित समस्याओं की चर्चा करें। 

Trend and Problems of Urbanization 

        नगरीकरण एक प्रक्रिया है जिसके तहत कोई भी ग्रामीण बस्ती धीरे-2 नगरीय बस्ती में बदलती हैं। दूसरे शब्दों में वह कोई भी अधिवासीय बस्ती जहाँ की जनसंख्या प्राथमिक कार्यों को छोड़ती है और लगातार द्वितीयक एवं तृतीयक गतिविधियों में संलग्न होने लगती है तो इस प्रक्रिया को भी नगरीकरण से संबोधित करने लगते हैं। कुछ भूगोलवेताओं का यह भी कहना है कि “नगरों के बढ़ रहे आकार या बढ़ रहे नगरीय जनसंख्या को भी नगरीकरण कहा जाता है। वर्तमान समय में यही परिभाषा सर्वाधिक मान्यता रखता है।

         21वीं शताब्दी को नगरीकरण की शताब्दी कहा जाता है क्योंकि आज विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या नगरों में निवास कर रही है। इस संदर्भ में विश्व की करीब 57% जनसंख्या नगरों में रहती है।

      वैश्विक स्तर पर नगरीकरण की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 1.5-2% मानी जाती है जो नगरीय विस्फोट का प्रतीक है। विकसित देशों में नगरीकरण की प्रक्रिया लगभग शिथिल है। जबकि विकासशील देशों में नगरीकरण की प्रक्रिया दर तीव्र है।

विश्व में नगरीकरण की वर्तमान प्रवृत्ति

1. तीव्र शहरी वृद्धि:-

  • संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट (World Urbanization Prospects, 2022) के अनुसार, वर्तमान में विश्व की लगभग 57% जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करती है।
  • अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या 68% से अधिक हो जाएगी।

2. विकसित देशों में संतृप्ति:-

  • यूरोप, उत्तर अमेरिका और जापान जैसे देशों में नगरीकरण का स्तर पहले से ही 75-85% तक पहुँच चुका है।
  • यहाँ नगरीकरण स्थिर है, लेकिन शहरी जीवन-शैली में तकनीकी व सांस्कृतिक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं।

3. विकासशील देशों में तीव्र नगरीकरण:-

  • एशिया और अफ्रीका में नगरीकरण की गति अत्यधिक तेज है।
  • भारत, चीन, नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में प्रतिवर्ष करोड़ों लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
  • 2050 तक केवल भारत और नाइजीरिया मिलकर विश्व की शहरी जनसंख्या वृद्धि का लगभग 35% योगदान देंगे।

4. मेगासिटीज़ का उभार:-

  • विश्व में 10 मिलियन (एक करोड़) से अधिक जनसंख्या वाले नगरों की संख्या 2022 में लगभग 33 थी, जो 2035 तक 45 से अधिक हो जाएगी।
  • टोक्यो, दिल्ली, शंघाई, साओ पाउलो, मेक्सिको सिटी जैसे नगर इस श्रेणी में आते हैं।

5. प्रवास (Migration) की भूमिका:-

  • ग्रामीण-शहरी पलायन नगरीकरण का मुख्य आधार है।
  • आर्थिक अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य व जीवन-स्तर की बेहतर संभावनाएँ लोगों को शहरों की ओर आकर्षित करती हैं।

      इस प्रकार नगरीकरण की वर्तमान प्रवृति को विकसित और विकासशील देशों के संदर्भ में देखा जा सकता है। विकसित देशों में नगरीकरण की प्रवृति भले ही धीमी हैं लेकिन विकसित देशों की अधिकांश जनसंख्या नगरों में ही निवास करती है। इस प्रवृति से विकसित देशों में कई समस्याएँ उत्पन्न हुआ है। दूसरी ओर विकासशील देशों में तीव्र नरीकरण की प्रकृति के कारण गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही है। विकासशील देशों में नगरीकरण की एक यह भी प्रवृत्ति है कि देश की राजधानी नगर और बड़े-2 महानगरों की जनसंख्या बढ़ रही है। लेकिन छोटे नगरों की जनसंख्या यथावत है।

         विकसित और विकासशील दोनों ही प्रदेशों में इस प्रवृति का विकास हुआ है कि अधिक से अधिक लोग राजधानी या बड़े नगर में निवास करना चाहते हैं क्योंकि इन नगरों में बसने वाले लोगों का यह मानना है कि राजधानी नगर और महानगर में किसी-न-किसी प्रकार का रोजगार मिल ही जाता है। यह अवधारणा आमतौर पर विकासशील देशों में प्रचलित है। दूसरी ओर विकसित देशों में अधिक सुरक्षा, अधिक सार्वजनिक सुविधाएँ और अधिक रोजगार क कारण इन नगरों में निवास करना चाहती है।

        राजधानी एवं महानगरों की बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण मेट्रोपोलिटन नगर के स्थान पर मेगासिटी का विकास होने लगा है। अगर भारत को ही लिया जाय तो पाते हैं कि 1991 में यहाँ मात्र 23 महानगर थे जो 2001 में बढ़‌कर 35 और 2011 में बढ़कर 53  हो चुका है।

         बड़े आकार के नगरों में जनसँख्या विस्फोट से सार्वजनिक सुविधाओं की कमी होने लगी है। पुराने बस्तियाँ मलीन/गंदी बस्ती के रूप में बदलने लगे हैं। प्रदूषण की वहाँ गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होने लगी है। प्रदूषण का आलम यह है कि नगरों में ऑक्सीजन बार खुलने लगे हैं। 1996 में UNICEF के एक अध्ययन के अनुसार विकासशील देशों में 170 करोड़ जनसंख्या नगरों में रहती है जिनमें से 160 करोड़ के पास आवास की कमी है। इसके अलावे स्वच्छ जल, प्राथमिक स्वास्थ्य की सुविधा नगण्य है।

       विकसित एवं विकासशील दोनों ही प्रदेश के नगरों में परिवहन दुर्घटना तेजी से बढ़ी है। वर्ल्ड डिजास्टर रिपोर्ट 1998 में बताया गया कि सर्वाधिक परिवहन दुर्घटना से मृत्यु इथोपिया में होती है। इसके बाद नेपाल, बंगलादेश, चीन, स्वाजीलैण्ड और भारत का स्थान आता है।

भारत में नगरीकरण की प्रवृत्ति (Trend of Urbanization in India):-

    भारत में नगरीकरण की प्रवृत्ति धीमी रही है। इसका प्रमुख कारण कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था तथा सुखद ग्रामीण अनुभूति रही है। सन् 1901 में भारत में केवल 11% जनसंख्या नगरीय थी जो सन् 1931 में बढ़कर 11.97%, 1941 में 13.9% तथा सन् 1951 में बढ़कर 17.9% हो गयी।

   सन् 1961 के बाद देश में नगरीकरण की प्रवृत्ति में तेजी आयी, जब देश की अर्थव्यवस्था में सामाजिक मान्यता, प्राकृतिक प्रकोप पर नियन्त्रण और शिक्षा तथा परिवहन का नवीन दौर शुरू हुआ। सन् 1991 में देश की नगरीय जनसंख्या 25.72% हो गयी। इसके बाद सन् 2011 की जनगणना के अनुसार नगरीय जनसंख्या 31.2% हो गयी।

भारत में नगरीकरण की वर्तमान प्रवृत्ति
वर्ष नगरीय जनसँख्या (%)
1901 10.84
1911 10.29
1921 11.18
1931 11.97
1941 13.86
1951 17.29
1961 17.97
1971 19.91
1981 23.34
1991 25.72
2001 27.78
2011 31.20

नगरीकरण की समस्याएँ

            उपरोक्त सामान्य समस्याओं के अलावे विकसित एवं विकासशील देशों में अलग-2 विशिष्ट समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही है। जैसे:-

(A) विकसित देश की विशिष्ट नगरीय समस्याएँ:-

      विकसित देशों में नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भिक अवस्था में ही सम्पन्न हो चुकी है, इसलिए वहाँ की नगरीय समस्याएँ विकासशील देशों से कुछ भिन्न प्रकार की होती हैं। इन समस्याओं का स्वरूप अधिकतर अत्यधिक औद्योगीकरण, उपभोक्तावाद, जीवन-शैली और तकनीकी प्रगति से जुड़ा होता है। विकसित देशों की प्रमुख नगरीय समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

(1) विकसित देशों के अधिकतर महानगरीय प्रशासन वितीय संकट के दौर से गुजर रही है। जैसे- माण्ट्रीयल, ओसलो, स्टॉकहोम में स्थित नगर प्रशासन को कोई ऋण देने के लिए तैयार नहीं है।

(2) खाली अधिवासों की समस्या:-

        विकसित देशों में जनसंख्या नगर से ग्राम की ओर स्थानान्तरित हो रही है क्योंकि विकसित देशों के ग्रामीण क्षेत्र भी नगर के समान बिजली, परिवहन एवं अन्य संरचनात्मक सुविधाएँ उपलब्ध है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र भीड़-भाड़ और पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त हैं। ऐसे में नगरीय जनसंख्या अधिक-से-अधिक ग्रामीण क्षेत्र में अधिवास करने की प्रवृति रखती है जिसके कारण विकसित देशों के नगरों में लाखों अधिवास खाली पड़े हैं।

(3) नवजनसंख्या का विस्फोट:-

          60 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों को नवजनसंख्या के अन्तर्गत रखते हैं। विकसित देशों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा और पर्याप्त पोषण उपलब्ध होने के कारण बूढ़ों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे लोग प्राय: निर्भर जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों के बच्चे बूढ़े माता-पिता को बुजुर्ग आश्रम में ले जाकर छोड़ देते हैं। इससे पारिवारिक विखण्डन की भी गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है। 

(4) प्रदूषण की समस्या:-

       विकसित देशों के नगर वायु, जल और ध्वनि तीनों प्रकार के प्रदूषण ही समस्या से उलझ रहे हैं। शिकागों में 60% लोग बहरे हो चुके हैं। इसी तरह से USA के 70% नगरीय जनसंख्या प्रदूषित वायु लेने के लिए बाध्य है।

(5) जननांकीय समस्या:-

         विकसित देशों में एकल परिवार के विकास तथा अपने स्वास्थ के प्रति अति जागरूकता के करण जहाँ एक ओर परिवारों का विखंडन हो रहा है। वहाँ विवाह एवं नातेदारी जैसी सामाजिक संस्थाओं का पत्तन हुआ है जिसके कारण वहां नाकारात्मक जनसंख्या वृद्धि की समस्या उत्पन्न हुई है।

(B) विकासशील देशों की विशिष्ट नगरीय समस्याएं:- 

(1) विकासशील देशों में तीव्र ग्रामीण-नगरीय स्थानान्तरण के कारण नगरीय जनसंख्या विस्फोट की समस्या उत्पन्न हुई। 

(2) विकासशील देशों के अधिकतर देशों में अधिवासीय मकान की कमी की समस्या है और जो मकान उपलब्ध है उनका स्तर काफी निम्न है।

(3) गंदी बस्तियों का विकास विकासशील देशों के नगरों की एक गंभीर समस्या है। मुंबई का धरावी क्षेत्र विश्व की सबसे बड़ी गंदी बस्ती क्षेत्र का उदा० है। 

(4) विकासशील देशों के अधिकतर नगरों में नियोजित आन्तरिक संरचना का अभाव है। अनियोजित विकास के कारण नगरीय भूमि का न तो सही तरीके से प्रयोग हमें पता है और न ही उनका विकास हो पाता है। अनियोजित नगरों में परिवहन साधन धीमी गति से चलती है, वहीं दुर्घटना की भी संभावना अधिक होती है।

(5) विकासशील देशों में तीव्र नगरीकरण के कारण अनियोजित उपान्त क्षेत्रों से विकास बहुत तेजी से हो रहा है। उपान्त क्षेत्र से मुख नगर की ओर आने वाली परिवहन साधनों का घोर अभाव है वहीं दूसरी ओर वैसे सड़‌कों पर सड़क जाम एवं अति भीड़-भाड़ की  समस्या देखा जा सकता है।

(6) विकसित देशों की भाँति ही विकासशील देशों के नगरों भी गंभीर प्रदूषण की समस्या से गुजर रहे है।

निष्कर्ष:- 

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विकसित और विकासशील देशों की कुछ सामान्य समस्याएँ हैं वहीं अलग-2 भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कुछ विशिष्ट समस्याएँ भी हैं। ऊपर बताये गये समस्याओं की विवेचना की जाए तो पाते हैं कि गुणवत्ता और गहनता की दृष्टि से विश्व के सभी नगरों प लागू होता है। नगरीकरण एक वैश्विक वास्तविकता है, जो आर्थिक प्रगति और आधुनिक जीवन शैली का प्रतीक है। किंतु अनियंत्रित और अव्यवस्थित नगरीकरण अनेक गंभीर समस्याओं को जन्म देता है। अतः आवश्यक है कि नगरीकरण को सतत, समावेशी और पर्यावरण-सम्मत बनाया जाए, ताकि यह मानव जीवन के लिए अवसर का स्रोत बने, बोझ नहीं।



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 18. Town Planning / नगर नियोजन

 18. Town Planning / नगर नियोजन



Q. नगर नियोजन का तात्पर्य क्या है ? भारत में नगर-नियोजन की प्रक्रिया और उसके इतिहास के पहलू का व्याख्या करें।

               भारतीय जनगणना विभाग के अनुसार वह कोई भी गुच्छित बस्ती जिसकी जनसंख्या 5,000 या उससे अधिक है। जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति/वर्ग km है और वहाँ का 2/3 कार्यकारी पुरुष जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों में संलग्न है। वैसी गुच्छित बस्ती को नगर कहा जाता है जबकि नगर नियोजन का तात्पर्य वैसे नीति एवं कार्यक्रम से है जिसके आधार पर नगरों का विकास किया जाता है।

सामान्यत: नगरों के विकास की प्रक्रिया के आधार पर नगरों को दो भागों में बाँटते हैं:-

(1) अनियोजित नगर

(2) नियोजित नगर

         अनियोजित नगर वैसे नगर को कहते है जिसका विकास जैविक रूप से हुआ हो और नियोजित नगर वैसे नगर को कहते हैं जिसके विकास के पूर्व ही उसके संबंध में सभी नीति एवं कार्यक्रमों का निर्धारण कर लिया जाता है। उसके बाद नगर बसाये जाते हैं। फ्रांसीसी विद्वान गिलियन ने नगर नियोजन के तीन मुख्य उद्देश्य बताते हैं:-

(1) नगरीय स्वाथ्य का विकास करना- इसका तात्पर्य है कि नगर-नियोजन के वक्त इस तरह की नीति अपनाई जानी चाहिए कि नगरों में गंदी बस्ती का विकास न हो सके। नगरों में मनोरंजन के साधन का पूर्ण व्यवस्था हो।(2)नगरीय संपत्ति की सुरक्षा – इसका तात्पर्य है नगर के उत्पादक कार्य और नगर के भू उपयोग  के बीच सतत् संतुलन बना रहे। 

(3) नगरीय सौन्दर्य का विकास- इसका तात्पर्य है नगर में पर्याप्त मात्रा में पार्क, होटल, सॉपिंग कम्प्लेक्स, ट्रेफिक, वृक्षों की पेटी, का पूरा विकास हो।

             नगर नियोजन का कार्य पाँच अवस्थाओं से गुजरकर पूरा होता है। जैसे-

प्रथम चरण- इस चरण में नगर बसाव वाले स्थान का सर्वेक्षण किया जाता है। सर्वेक्षण के दौरान यह जाँच की जाती है कि वह स्थान भूकम्प क्षेत्र में है या नहीं, भूदृश्य कैसा है? मानव बसान के लिए भौगोलिक परिस्थितियाँ कैसी है? भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों के विकास की क्या संभावना है? इत्यादि।

         सर्वेक्षण के द्वारा जो ऑकड़े उपलब्ध होते हैं उसे सांख्यिकी विधि के द्वारा कम्प्यूटर या अन्य तकनीक के माध्यम से सारणीकृत एवं विभिन्न प्रकार के आरेख का निर्माण कर एक रफ मानचित्र का निर्माण करते हैं। उसके बाद यह निर्धारण किया जाता है कि किस स्थान पर किस कार्य के लिए संरचनात्मक सुविधाओं का विकास किया जाए।

दूसरी चरण- नगर के बनाये गये रफ मानचित्र को परिमार्जित कर अंतिम ब्लूप्रिंट तैयार किया जाता है। उसके बाद वास्तविक धरातल पर अलग-2 कार्यों के लिए निर्धारित रेखांकन कर दिया जाता है।

तीसरा चरण- तीसरी अवस्था में सार्वजनिक सुविधाओं, मनोरंजनात्मक स्थल का विकास सबसे पहले किया जाता है उसके बाद लोगों को अधिवासीय वस्तु बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

चौथा अवस्था- चौथा अवस्था में नगर के बाहरी क्षेत्रों के लिए खण्डीय मानचित्र क निर्माण किया जाता है ताकि बढती हुई जनसंख्या को नियोजित किया जा सके।

पाँचवीं अवस्था- पाँचवी अवस्था में नियोजन के कार्यों को वास्तव में कार्य रूप प्रदान किया जाता है। अर्थात् राजनैतिक, प्रशासनिक एवं न्यायिक अड़चनों को दूर किया जाता है और अंतिम बनाये ब्लूप्रिंट मानचित्र में थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके उसे कार्यान्वित किया जाता है।

भारत में नगर नियोजन का इतिहास 

                     भारत में नगर नियोजन की इतिहास सिन्धु घाटी सभ्यता से प्रारंभ होती है क्योंकि सिन्धु घाटी सभ्यता के जिन स्थलों की खुदाई की गई है उन सभी स्थानों पर नियोजित नगर का प्रमाण मिला है। जैसे सड़के समकोण पर काटती थी। जल निकासी की उत्तम व्यवस्था थी। सड़कों के किनारे प्रकाश का उचित प्रबंध था।       

                            भारत में आधुनिक नगर नियोजन 20वीं शताब्दी से मानी जाती है। 20वीं सदी में हुए नगर नियोजन को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है:-

(1) स्वतंत्रता के पूर्व हुए नगर नियोजन का कार्य 

(2) स्वतंत्रता के बाद हुए नगर नियोजन का कार्य

               स्वतंत्रता के पूर्व प्रत्येक बड़े अनियोजित नगर के पास  नियोजित नगर का निर्माण किया गया। इस नियोजित नगर में सिविल लाइन्स, सैनिक छावनी और प्रशासनिक केन्द्र हुआ करते थे। जैसे- दिल्ली के पास दिल्ली कैण्ट, वाराणसी में वाराणसी कैंट, बंगलोर में बंगलौर कैण्ट, पटना में दानापुर सैनिक छावनी क्षेत्र या कैंट इत्यादि।

            स्वतंत्रता के बाद और स्वतंत्रता के पूर्व किये गये नगर नियोजन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारत में नियोजन कार्य की प्रवृति तीन प्रकार की रही है। जैसे:-

(1) वृतीय या अर्द्धवृतीय प्रतिरूप के आधार पर- ऐसे नियोजित नगर के केन्द्र में प्रशासनिक केन्द्र होता है और उसके चारों और अर्द्धवृताकार क्षेत्र में अधिवासीय बस्तियों का विकास किया जाता है।

Town Planning(2) अरीय प्रतिरूप या मकड़ी जाली प्रतिरूप- इस प्रकार के प्रतिरूप में नगर के कई केन्द्र विकसित किये जाते हैं और प्रत्येक नगर को मुख्य नगर से जोड़ दिया जाता है। प्रत्येक उपनगर को जोड़ने के क्रम में सड़के वृत्त के समान दिखाई देने लगती हैं। नई दिल्ली मकड़ी जाल प्रतिरूप पर आधारित नगर है जिसके केन्द्र में कनॉड पैलेस अवस्थित है। इसी तरह से मुम्बई में हुतात्मा चौक को केन्द्र मानते हुए अरीय प्रतिरूप पर आधारित नगर का विकास किया गया है। 

(3) आय‌ताकार प्रतिरूप- आयताकार प्रतिरूप प्रणाली में सड़‌कें, एक-दूसरे के समकोण पर काटती है। ब्रिटिश सरकार के द्वारा आजादी के बाद इसी प्रणाली पर आधारित नगर नियोजन का कार्य दिया जा रहा है। जैसे- जमशेदपुर, ईटानगर, दिसपुर, चण्डीगढ़, भुवनेश्वर इत्यादि सभी आयताकार प्रतिरूप पर आधारित है।

            इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में नगर-नियोजन का इतिहास काफी लम्बा रहा है। वर्तमान समय में भारत के लगभग सभी नगरों में नियोजित नगर विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें सरकार एवं निजी क्षेत्र दोनों एक समान भूमिका निर्वहन क रहे हैं।


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17. Problems of Mumbai Metropolis / मुम्बई महानगर की  समस्याएँ

17. Problems of Mumbai Metropolis

(मुम्बई महानगर की  समस्याएँ)



Q. मुम्बई महानगर की क्या समस्याएँ है और उनका समाधान करने के लिए क्या-क्या उपाय विचाराधीन है? (39वीं BPSC)

         नगरीय जनसंख्या विस्फोट के कारण सामान्य रूप से भारतीय नगरों में कई समस्याओं का अभ्युदय हुआ है। लेकिन महानगरों की स्थिति कुछ विशिष्ट है। मुम्बई भारत का सबसे बड़ा महानगर है जो महाराष्ट्र के पश्चिम में अरब सागर के तट पर माहिम नदी के किनारे अवस्थित है। यह नगर सात टापू और सात पर्वत के ऊपर अवस्थित है। इस नगर के पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में पश्चिमी घाट पर्वत अवस्थित है। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा में एक संकरी पट्टी के रूप में हुआ है जिसे नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।

Problems of Mumbai Metropolis

            मुम्बई महानगरीय नियोजन संस्था के अनुसार मुम्बई महानगर की निम्नलिखित समस्याएँ हैं:-

(1) अधिवासीय मकानों की जबड़‌दस्त  कमी

(2) मकानों में भारी जनसंख्या दबाव 

(3) नगरीय जीवन में भारी गिरावट

(4) काम करने के स्थानों का कुछ सड़क मार्गों के किनारे ही एक लम्बी दूरी तक फैला होना

(5) कुछ क्षेत्रों में भारी उद्योगों का जमाव एवं कुछ क्षेत्रों में अभाव

(6) अभिगमनकर्ताओं का भारी संख्या में आना। 

(7) प्रदूषण की समस्या।  जैसे- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण की समस्या

(8) हवाई अड्डा, बंदरगाह, रेलवे स्टेशन, बसस्टैण्ड पर भारी भीड़-भाड़

 (9) विद्युत् तथा पानी की कमी तथा नगर निगम का बढ़ता टैक्स 

(10) खुले स्थानों और मनोरंजन साधनों का अभाव 

(11) भूमि की जबड़‌दस्त कमी और उनका बढ़ता हुआ कीमत

(12) मुम्बई नगर निगम के सीमावर्ती क्षेत्रों में भूमि पर अतिक्रमण की समस्या 

(13) लोगों में परस्पर सामंजस्य का अभाव एवं एकाकी जीवन 

(14) सामाजिक ढाँचे में भारी विषमता।

          उपरोक्त सभी समस्याएँ मुम्बई महानगर द्वारा पिछले 60-70 वर्षों में की गई कारगुजारियों का परिणाम है। इस समस्या से निपटने के लिए मुम्बई का प्रादेशिक मास्टर प्लान के तहत विकसित करने का योजना बनायी गयी है जिसका प्रमुख उद्देश्य है- मुम्बई तथा उसके प्रदेश में बढ़ती असमानताओं का दूर करना। मुम्बई महानगर के प्रत्येक क्षेत्रों में समुचित सुविधाओं का विकास करना, लोगों के जीवन-स्तर में सुधार लाना और मुम्बई महानगर के अनियंत्रित विकास को रोकना है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु “मुम्बई मास्टर प्लान” का निर्माण 21वीं शताब्दी के अन्त में संभावित जनसंख्या को आधार मानते हुए तैयार किया गया।

             ट्रांस, थाणे क्रीक क्षेत्र में एक नया नगर स्थापित किया जा रहा है। कल्याण, पोलसेट, बालखून, खपोली, मीरा भण्डार, आप्टे तुराडे कम्प्लेक्स को औद्योगिक नगरों को विकसित किया जा रहा है। सड़क और रेलमार्ग के बीच में समन्वय स्थापित कर नगर के अंदर और बाहर के क्षेत्रों में यातायात व्यवस्था को सुधारा जा रहा है।

         मुम्बई नगर में बढ़ते जनसंख्या दबाव को कम करने के लिए नवी मुम्बई का विकास किया जा रहा है। यह माहिम क्रीड के पूर्वी क्षेत्र पर स्थित है। नवी मुम्बई से कोलावा और बेलपुर सड़‌क का विकास किया गया है और कई रिहाइशी बस्ती और कई व्यापारिक क्षेत्रों का विकास किया गया है। चेम्बूर से वार्सी के बीच में रेलपुल सङ्‌क मार्ग का निर्माण किया गया है।

         मुम्बई में ऐसे नवीन सेक्टर का निर्माण किया जा रहा है जो आधुनिक सुख सुविधाओं से युक्त है तथा चार-पाँच सेक्टर के बीच में एक CBD की स्थापना की गई है। नगर के अन्दर तीन बड़े-2 व्यापारिक केन्द्र का निर्माण किया गया है। प्रत्येक सेक्टर में खेल के मैदान एवं पार्कों का विकास किया गया है। प्रत्येक सेक्टर में तथा खाली भूमि पर हरी पेटी का विकास किया गया है ताकि ध्वनि प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

           बदरगाहों पर भीड़-भाड़ को कम करने के लिए नवासेवा बंदरगाह और मँझगाँव डाकयार्ड का निर्माण किया गया है। रेलवे स्टेशनों पर और रेलवे भीड़-भाड़ को कम करने के लिए मुम्बई उपनगरीय रेल तो चलाया गया ही है। इसके बावजूद मुम्बई को एक ओर कोंकण रेलवे से जोड़ दिया गया है। तथा दूसरी ओर मुम्बई हथा अहमदाबाद के बीच में बुलेट ट्रेन चलाने की योजना है तथा मुम्बई उपनगरीय क्षेत्र में स्काई बस चलाने की भोजना है।

             हवाई अड्डों पर भीड़ को कम करने के लिए शान्ता क्रुज और सहार में अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा का निर्माण किया गया है। मुम्बई महानगर का क्षैतिज विस्तार अब संभव नहीं है। इसलिए सरकार ने वहाँ पर उदग्र जनसंख्या विस्तार का निर्णय लिया है। 

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि मुम्बई महानगर को विभिन्न प्रकार के समस्याओं से निजात दिलाने हेतु कई प्रकार एवं संरचनात्मक उपाय किये गये हैं।


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 16. Urban Problem /नगरीय समस्या

16. Urban Problem /नगरीय समस्या



प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय नगरों के आवास की मौलिक समस्या अल्पता नहीं वरन् अत्यन्त निम्न स्तर की गुणवता है।” स्पष्ट कीजिए। (39 BPSC)

2. मुम्बई महानगर के के लिए क्या समस्याएँ है? उनका समाधान के लिए क्या-क्या उपाय विधाराधीन है? (39 BPSC)

3. गंदी बस्ती तथा नगरीय आवास के मुख्य कारकों की व्याख्या कीजिए। (42वीं BPSC)

4. बिहार में गंदी बस्ती एवं नगरीय आवास के मुख्य कारणों की व्याख्या कीजिए। (44वीं BPSC)

5. झोपड़ बस्ती हमारे शहरों का विभाज्य अंग बन गया है। व्याख्या कीजिए (44वीं BPSC)

Urban Problem

        भारत में नगरीय जनसंख्या विस्फोट के कारण कई समस्याओं का अभ्युदय हुआ है। उनमें से दो समस्याएं सबसे प्रमुख है। प्रथम गंदी बस्ती का विकास और द्वितीय आवासों की कमी। इन दोनों समस्याओं में सबसे गंभीर समस्या गंदा बस्ती का विकास है। गंदी बस्ती उस अधिवासीय क्षेत्र को कहा जाता है जहाँ अस्वास्थकर अधिवास पाया जाता है।
       WHO ने गंदी बस्ती को परिभाषित करते हुए कहा है:- “ Slum is an area where is darkness disappearance and Poverty is occurred.” अर्थात जिस अधिवासीय क्षेत्र में गरीबी धुँधले बस्ती तथा घर के अन्दर अन्धेरा का साम्राज्य हो वैसे बस्ती को गंदी बस्ती कहते हैं। भारत में गंदी बस्तियों को अलग-2 नाम से जानते हैं। जैसे- मुम्बई में ‘चाल’, कोलकाता में ‘बस्ती’, कानपुर में अहाता, चेन्नई में चेरी’ और दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी कोलनी (JJ Colong) कहते हैं।

              भारत में सबसे बड़ा गंदी बस्ती का मुम्बाई में हुआ है जो धरावी के नाम से प्रसिद्ध है। यह मुम्बई के उत्तरी भाग में अवस्थित है। यहाँ औद्योगिक श्रमिक बड़े पैमाने पर अधिवासित होते हैं। यहाँ के अधिवासीय मकान ही चाल कहलाते हैं। इन चालों में लोग ऐसे कमरों में रहा करते हैं जहाँ कबूतर एवं मुर्गी भी नहीं पाली जा सकती है। प्रत्येक चाल पर पाँच-छः मंजिले इमारत होते हैं जिसमें प्रकाश और वायु की कोई व्यवस्था नहीं होती हैं। शैौचालय अत्यंत दूषित तथा बदबूदार होता है।

            गंदे पानी निकलने की कोई व्यवस्था नहीं होती है। और कूड़ा-करकट गंदे पानी में बहते हुए नजर आते हैं। इन चालों में ऐसे परिवार होते हैं जो एक रक्त से संबंधित होते हैं। यहाँ समाज विरोधी तत्व सक्रिय रहते हैं और गंदी बस्तियाँ सामाजिक बुराइयों का अड्डा होता है।

           कोलकाता में गंदी अधिवासीय क्षेत्र को ‘बस्ती’ कहते हैं। कोलकाता भारत का दूसरा सबसे बड़ा गंदी बस्ती का क्षेत्र है। कोलकाता में गंदी बस्ती का निर्माण जूट मील मालिक एवं सरदारों ने किया है। इन बस्तियों के निर्माण के पीछे पैसा कमाना मुख्य उद्देश्य है। कोलकाता में इन बस्तियों का विकास बड़े-2 पूजीपतियों एवं मील मालिक के अट्टालिकाओं के इर्द गिर्द हुआ है। इन बस्तियों में बिजली, वायु, शौचालय एवं नाला इत्यादि का घोर अभाव है।

           कानपुर में “श्रमिक जांच समिति” ने कानपुर गंदी बस्ती का विशेषता बताते हुए कहा है कि इन बस्तियों में अपरिचित व्यक्तियों के लिए घुसना खरनाऊ होता है क्योंकि अनजान व्यक्ति उसमें घुसकर अपना हड्‌डी तोड़‌वा सकता है। यद्धपि गंदी बस्ती में रहने वाले व्यक्ति अक्सर कीड़े-मकोड़े, खटमल, जू, मच्छर इत्यादि से शिकार होते रहते हैं। इन बस्तियों के अन्दर नारकीय वातावरण होता है।

            चेन्नई में गंदी बस्ती का विकास हुआ है जो ‘चेरी’ के नाम से प्रसिद्ध है। चेरी में निर्मित मकान मिट्टी के होते हैं। इन मकानों का निर्माण लोगों ने स्वयं किया है। यहाँ मानव पशुओं से भी बदत्तर जीवन जीने के लिए अभ्यस्त है।

        दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी कोलनी (J. J. Colony) यमुना नदी के किनारे सहादरा, यमुना बाजार, किदवई नगर, त्रिलोकपुरी, जहाँगीरपुरी क्षेत्रों में हुआ है। झुग्गी-झोपड़ी में मकान कच्चे मिट्टी से या बाँस और पुराने पॉलिथीन के चादर से बने होते हैं। मकानों के चारों ओर कुड़ा-कड़‌कट के ढेर, यहाँ-वहाँ गंदे जल का जमाव, तंग गलियाँ पायी जाती है। सामान्य दिनों में सौचालय करते हुए लोग दिखाई देते हैं और गर्मी के दिनों में यहाँ आग लगने की घटना बड़े पैमाने पर होती है।

              उपरोक्त नगरों के गंदी बस्ती के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारत के गंदी बस्तियों में निम्न गुणवत्ता वाले मकानों की अधिकता होती हैं वहीं बाहर का पर्यावरणीय एवं सामाजिक वातावरण भी काफी दुषित होता है।

गंदी बस्ती के विकास के कारण

                 किसी भी नगर में गंदी बस्तियों के विकसित होने के निम्नलिखित कारण हैं; 

(1) औद्योगिकीकरण⇒ किसी स्थान पर उद्योगों के लगने से अचानक बड़ी संख्या में मजदुर आकर निवास करने लगते हैं। फलत: ये मजदूर कामचलाऊ मकान बनाकर अधिवासित होने लगते हैं। पुनः उद्योग के मालिक मजदूरो के अधिवासित होने के लिए निम्न स्तरीय मकानों का निर्माण कराकर मजदूरों को बसा देते है। जैसे- कोलकाता नगर के इर्द-गिर्द बड़े पैमाने पर जूट, सूती वस्त्र का उद्योग का विकास हुआ है। इन उद्योगों में बिहार, UP. झारखण्ड स्वयं पश्चिम बंगाल, असम, बांगलादेश से आगे मजदूर कार्य करते हैं और काम चलाऊ अधिवासीय बस्ती में अधिवासित होते हैं।

(2) ग्रामीण-नगरीय जनसंख्या स्थानान्तरण- स्वदेश नागया ने दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी का अध्ययन कर बताया कि यहाँ गंदी बस्ती के विकसित होने का प्रमुख कारण ग्रामीण नगरीय जनसंख्या स्थानान्तरण है। 

(3) गरीबी तथा कम किराया- नगरों में काम करने वाले मजदूर पेट भरने और शरीर ढकने से ज्यादा नहीं कमा पाते हैं जिसके कारण वे अच्छे मकानों में नहीं रह पाते हैं। गंदी बस्ती में कम किराया होने के कारण लोग मजबूरन अधिवासित होने के लिए बाध्य होते हैं।

(4) नगरों में मकानों का अभाव- जिस तेजी से नगरीय जनसंख्या हमें वृद्धि हो रही है। उस दर से मकानों का निर्माण नहीं हो रहा है जिसके कारण लोग गंदी बस्तियों में अधिवासित हो रहे हैं।

(5) मकान मालिकों की मानसिकता- मकान मालिक अधिक से अधिक किराया प्राप्त करने के फिराक में मकानों के देख-भाल में ध्यान नहीं देते हैं तथा मकानों में सुविधाओं का विकास नहीं करते है।

(6) अज्ञानता- गंदी बस्ती के प्रसार में अज्ञानता एवं अशिक्षा प्रमुख योगदान है। बाहरी क्षेत्रों से आये हुए लोग अज्ञानतावश एक स्थान पर झुण्डों में निवास करने लगते है। स्वास्थ, सफाई, बीमारी से निपटने हेतु सामूहिक प्रयास नहीं करते हैं। फलतः गंदी बस्तियों का विकास होता है।

(7) नगर नियोजन का अभाव⇒ भारत में कुछ नगरों के विकास के लिए मास्टर प्लान का  निर्माण किया गया है लेकिन कई ऐसे नगर हैं जिनके लिए कोई मास्टर प्लान नहीं है। मास्टर प्लान लागू होने का दर  काफी धीमी है जबकि नगरीय जनसंख्या वृद्धि की दर तीव्र है।

 (8) अन्य कारण- पारिवारिक कलह, धार्मिक रूढ़िवादिता, सामाजिक बहिष्कार एवं सामाजिक असुरक्षा, अधिकांश नगरों का पुराना होना, नगरों में सार्वजनिक सुविधाओं का आभाव होना, समय-2 पर प्राकृतिक आपदाओं का आना इत्यादि कुछ ऐसे कारण है जिसके चलते गंदी बस्तियों विकास होता है।

                 इस तरह ऊपर के लक्ष्यों से स्पष्ट है कि भारत में बस्तियों के विकास के पीछे कोई एकल कारण नहीं है बल्कि कई समेकित कारण जिम्मेदा हैं।


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8. Law of Primate City / प्रमुख नगर के नियम या प्रमुख शहर एवं श्रेणी आकार प्रणाली की संकल्पना

8. Law of Primate City

(प्रमुख नगर के नियम या प्रमुख शहर एवं श्रेणी आकार प्रणाली की संकल्पना)


           Law of Primate City

    प्राइमेट नगर की संकल्पना का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता माइक जैफरसन को जाता है। किसी भी भौगोलिक प्रदेश में मिलने वाला सबसे बड़ा नगर या प्रथम पदानुक्रम वाले नगर को ‘प्राथमिक नगर/ प्रमुख नगर/ प्राइमेट नगर’ कहते हैं।

          जैफरसन ने अपने नगरों के अध्ययन में पाया कि किसी देश का प्राइमेट सिटी उस देश के द्वितीयक पदानुक्रम वाला नगर के तुलना में दो या तीन गुणा अधिक बड़ा होता है।

         जैफरसन ने देखा कि 28 प्रमुख देशों में मिलने वाला प्राइमेट सिटी द्वितीयक नगर की तुलना में दो गुगा बड़ा था। जबकि 18 देशों में द्वितीयक नगर के तुलना में तीन गुणा बड़ा था। जैफरसन बताया कि प्राइमेट नगर अन्य नगरों की तुलना में अधिक कार्य को सम्पादित करते हैं। पुनः जैफरसन के प्राइमेट सिटी के संबंध में व्यक्त सिद्धांत में तीन तत्व प्रमुख हैं:-

(1) प्राइमेट सिटी का आकार द्वितीय नगर से अधिक बड़ा होता है।
(2) प्राइमेट सिटी किसी राष्ट्र के विकास के प्रवृति और प्रभाव का धोतक होता है।
(3) प्राइमेट सिटी एक बार जब बड़ा हो जाता है तो भविष्य में भी उसका आकार और प्रभाव में वृद्धि होते रहती है।
             
          जैफरसन महोदय ने इस नियम के सहारे 1939 ई० के नगरों के वितरण की व्याख्या काने हेतु प्रतिपादित किया। इस नियम के प्रतिपादन का सैद्धांतिक आधार यह है कि किसी भी वृहद भौगोलिक प्रदेश में वितरित नगर के बीच आकार का तुलनात्मक परीक्षण किया जाय। जैफरसन का यह सिद्धांत निम्नलिखित परिकल्पना पर आधारित है-
(1) किसी भी नगर का पदानुक्रम उस नगर में विकसित संगठन, आकार, प्रभाव और शक्ति को बताता है।
(2) नगर की शक्ति और प्रभाव नगर के आकार से सूचित होता है।
(3) विभिन्न जनसंख्या आकार नगरों के आकार में विभिन्नता को सुनिश्चित करता है। कुछ नगर में तीव्र गति से वृद्धि होने की प्रवृत्ति होती है।
             
             जैफरसन ने प्राथमिक नगरों की पहचान हेतु एक ‘प्राथमिक सूचकांक का विकास किया है। जैसे-
     
            दो नगरों का प्राथमिक सूचकांक = वृहद नगर की जनसंख्या / दूसरे बड़े नगर की जनसंख्या
                       
           जैफरसन का यह सिद्धांत अनुमानित पयर्वेक्षण पर आधारित था जिसके कारण उनके विचारों में कई विसंगतियाँ भी पायी जाती हैं और उन विसंगतियों को दूर करने के लिए कई नवीन विचार भी प्रस्तुत किये गए हैं। 1967 ई० में क्लार्क महोदय ने नगरों के वितरण की व्याख्या हेतु तथा प्राथमिक नगर के संबंध में एक अलग विचार प्रस्तुत किया।
         क्लार्क के अनुसार एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगर को ही प्राथमिक नगर कहा जाना चाहिए। क्लार्क के विचार इस संदर्भ में अल्पतंत्रीय वितरण के विचार से प्रसिद्ध है।
          क्लार्क का विचार जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील जैसे देशों में पाये जाते हैं। पुनः नगरीय वितरण को व्याख्या करने हेतु कोटि-आकार सह-संबंध नियम भी प्रस्तुत किया गया है। इस नियम के अनुसार नगरों के आकार और उसके पदानुक्रम में गहरा संबंध होता है।
         इसके अनुसार किसी आदर्श भौगोलिक परिस्थिति में निम्न पदानुक्रम के नगर एक निश्चित कोटि-आकार नियम के अनुरूप विकसित होते हैं। अगर यह विकास इस नियम के अनुरूप नहीं है तो उस प्रदेश में अस्वस्थ नगरीकरण की प्रवृत्ति है।
        कोटि आका का नियम स्पीयर्समैन के कोटि आकार सह संबंध नियम पर आधारित है। इस नियम का सहारा लेते हुए अमेरिकी भूगोलवेता जिप्स ने निम्न सूत्र विकसित किया है:-
Pr = P1 / r
जहाँ,
Pr = निश्चित कोटि के नगर की अनुमानित जनसंख्या
P1 = प्राथमिक नगर की जनसंख्या
r = निश्चित किये गये कोटि या पदानुक्रम
                     
         1949 ई० में जी. के. जिफ महोदय ने अपने सूत्र का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित सांख्यिकीय मान निर्धारित किये। जैसे 1, 0.500, 0.333, 0.250, 0.200 । जिफ के अनुसार अगर पाँच प्रथम क्रम तक कोटि आकार नियम के पालन होता है तो आगे नगरों पर अपने आप यह नियम लागू हो जाता है। लेकिन जिफ ने यह नहीं बताया कि नगरों के कितने कोटि या पदानुक्रम हो सकते हैं।
           1959 ई० में स्टीवर्ट महोदय ने विश्व के 72 देशों में कार्य करने के बाद यह बताया कि निम्न स्तर के नगर के लिए कोटि आकार नियम का पालन करना आवश्यक नहीं है जितना कि प्रथम पाँच कोटि आकार नियमों के पालन के लिए आवश्यक है। क्योंकि किसी की भौगोलिक प्रदेश में विकसित प्रथम पाँच पदानुक्रम के नगर ही द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों के प्रमुख केन्द्र होते हैं।
        स्टीवर्ट महोदय ने यह भी बताया कि विकसित देशों में कोटि आकार का नियम पूर्णतः लागू होता है लेकिन लेटिन अमेरिका में यह देखने को मिलता है कि वहाँ की अधिकत्तर जनसंख्या उसके राजधानी नगर या प्राथमिक नगर में ही केन्द्रित हैं। इसका तात्पर्य है कि वहाँ प्राथमिक नगर ही चुम्बकीय आकर्षण का कार्य करते हैं।
          लेटिन अमेरिका, USA और जिप्स के द्वारा दिया गया औसत आकार का तुलनात्मक अध्ययन नीचे के तालिका में किया जा रहा है।-       
पदानुक्रम जिप्स का मान  USA का मान ब्राजील के पदानुक्रम का मान
1 1 1 1
2 0.500 0.435 0.210
3 0.333  0.310 0.210
4 0.250  0.200 0.105
5 0.200  0.169 0.079
               
           दिये गये तालिका से स्पष्ट होता है कि ब्राजील में सभी प्रकार की जनसंख्या के लिए प्राथमिक नगर ही आकर्षण का कार्य करते हैं। हैगेट के अनुसार किसी भी नगर के कार्यों की गहनता से प्राथमिक नगरों की पहचान की जाती है।
       पुन: प्राथमिक नगर के संबंध में दिये गए कोटि आकार का निगम भारत जैसे देश में भी प्राथमिक स्तर पर लागू होता है। जैसे:- भारत को गंगा के मैदान है लिए प्राथमिक नगर अलग होगा और पूर्व तटीय मैदान के लिए अलग होगी।
 
        पीटर हैगेट ने कहा कि बड़े देशों में प्रादेशिक नगरों के कोटि- आकार का निर्धारण किया जाना चाहिए। N.B.K. रेड्डी ने गोदावरी और कृष्णा के मैदानी क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए बताया है कि यहाँ हैदराबाद जैसे विशाल नगर के बाद विजयवाड़ा जैसे छोटे नगर है जिसकी जनसंख्या 10 लाख है इसका परिणाम यह है कि प्रादेशिक स्तर पर पिछड़ेपन के कारण महानगर जनसंख्या के जमघट बन चुके हैं।
          कुछ प्रदेशों में एक ही आकार के दो नगर पाये जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्राथमिक नगरों का निर्धारण काफी मुश्किल हो जाता है। जैसे ब्राजील के द०-पूर्वी भाग में स्थित साओ पोली & रियो द जेनरियो नगर। यहाँ साओ-पोलो की जनसंख्या अधिक है जबकि कार्यिक विभिन्नता रियो द जेनरियो में अधिक मिलती है।
          वस्तुतः स्वस्थ कोटि नियम का पालन तभी संभव है जब संपूर्ण प्रदेश में वातावरणीय समरूपता पायी जाती हो साथ ही आर्थिक सामाजिक विकास की प्रक्रिया संतुलित रूप से चल ही हो। यदि ऐसा नहीं होता है तो उन प्रदेशों में प्राथमिक नगर के संबंध में प्रतिपादित नियम लागू नहीं होगा।

7. Internal Structure of Cities / नगरों की आन्तरिक संरचना

7. Internal Structure of Cities

(नगरों की आन्तरिक संरचना)


             Internal Structure of Cities
     
          नगरों की आन्तरिक संरचना का तात्पर्य नगर के आन्तरिक भागों में विकसित भौतिक तथा सांस्कृति स्वरूप से है। भूगोल यह मानता है कि नगर एक जीवित प्राणी के समान है, जो सदैव विकास तथा विस्तार की प्रवृति रखता है। इसी प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप नगरों के आन्तरिक संरचना का विकास होता है। इसी संदर्भ में कुछ भूगोलवेताओं का मानना है कि नगरों की आन्तरिक संरचना की संकल्पना एक गत्यात्मक पहलू है जो मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होती है:-
(1) भौतिक कारक
(2) मानवीय / सांस्कृतिक कारक
(3) नियोजन और प्रशासनिक पहलू
          नगरों के आन्तरिक संरचना नगर के अन्दर भूमि के उपयोग किये जाने के प्रतिरूप से है। भूगोलवेताओं ने कहा है कि नगरों का विकास केन्द्रीय स्थल पर होता है और सभी नगर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों को सम्पन्न करते हैं। लेकिन सभी नगर एक समान द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों को सम्पन्न नहीं करते हैं। ये असमानता ही नगरों के आन्तरिक संरचना में विषमता उत्पन्न करते हैं। नगरों के आन्तरिक संरचना में उत्पन्न असमानता के सैद्धांतीकरण का कार्य किया है। इसके लिए चार निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं:-
(1) सकेन्द्रीय वलय पेटी का सिद्धत (Concentric Zone Theory)- बर्गेस (1927 ई0)
(2) खण्ड सिद्धांत- हॉयट (1939 ई0)
(3) बहुनाभिक सिद्धांत- हैरिस तथा उल्मैन (1945 ई0)
(4) संयुक्त वृद्धि का सिद्धांत- गैरिसन (1962 ई0)
 
(1) सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत
         सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी समाजशास्त्री बर्गेस ने (1927 ई0) में शिकागो नगर का अध्ययन करने के बाद प्रस्तुत किया था। उन्होंने अपने सिद्धांत में कहा था कि नगरों की आन्तरिक संरचना सकेन्द्रीय वलय पेटी के समान होते हैं, जिसे नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।
 
INDEX
1 = केन्द्रीय बाजार क्षेत्र Central Business District (CBD) – केंद्रीय व्यापार जिला
2 = संक्रमण पेटी – अधिवास & व्यापार का कार्य साथ-साथ
3 = श्रमिकों के अधिवासीय क्षेत्र पेटी
4 = मध्यम एवं उच्च आय वर्ग के अधिवासीच पेटी
5 = अभिगमन के क्षेत्र
               
           बर्गेस ने दिये गये मॉडल के अनुसार ही नगरों के आन्तरिक संरचना विकसित होने की संभावना विकसित की है। उन्होंने प्रत्येक पेटी की विशेषता निम्नलिखित प्रकार से बताया है।
(1) CBD (Central Business District)⇒
          इसे केन्द्रीय बाजार या केन्द्रीय व्यापार जिला से सम्बोधित करते है। CBD शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मरफी महोदय ने किया था। GBD वह क्षेत्र है जो नगर के केन्द्र में होता है। जमीन और मकान का किराया अधिक होता है। भूमि के चप्पे-चप्पे प्रयोग व्पायार के रूप में किया जाता है। मकानें बहुमंजिले होते हैं। दिन में भीड़-भाड़ू लेकिन रात में शुन्य -शान का क्षेत्र होता है। रात में स्ट्रीट लाईट चौकीदार कुछ विश्विप्त लोग (पागल) और नगर निगम की सफाई की गाड़ियाँ दिखाई देती हैं। इस क्षेत्र को शिकागो में Loop, न्यूयॉर्क में Up and down Town तथा पीटरसबर्ग में ‘गोल्डेन टेम्पल’ के नाम से जानते हैं।
(2) संक्रमण पेटी⇒ 
              यह पेटी CBD के चारों ओर विकसित होता है। यह वह क्षेत्र है जहाँ पर व्यापार एवं अधिवास का कार्य साथ-साथ किया जाता है। अनियोजन इसकी एक सामान्य विशेषता है।
(3) श्रमिक या निम्न आय वर्ग की पेटी⇒ 
         यह तीसरी पेटी है जो संक्रमण पेटी के चारों ओर विकसित होती है। श्रमिक वर्ग के लोग तीसरी पेटी में निवास करते हैं क्योंकि यहाँ पर एक ओर अधिवासीय खर्च कम पड़ता है और दूसरी तरफ केन्द्रीय बस्ती तक पहुँचने में भाड़ा और समय कम लगता है।
(4) मध्यम और उच्च आय वर्ग की पेटी⇒ 
              इसका विकास चौथी पेटी के रूप में होता है क्योंकि यहाँ पर बसाव के लिए अधिक भूमि उपलब्ध होता है स्वच्छ और खुला वातावरण होता है। इनके पास परिवहन क्षमता अधिक होता है। इसलिए वे सार्वजनिक और निजी परिवहन का सफलतापूर्वक उपयोग कर लेते हैं।
(5) अभिगमन की पेटी⇒ 
           यह पाँचवाँ और अंतिम पेटी है। यहाँ दैनिक अभिगमन करने वाले लोग रहते हैं। कहीं-2 पर उच्च श्रेणी के रिहायसी मकान दिखाई देते हैं। सर्वत्र निर्माण का कार्य दिखाई देता है। बीच-बीच में दुग्ध व्यवसाय या सब्जी व्यवसाय का व्यापार करने वाले लोग दिखाई देते है।
           
       बर्गेस महोदय ने बताया है कि अगर नगरों का तेजी से बिस्तार हो रहा हो तो चार अन्य पेटियाँ भी मिल सकती है। पुन: 5वाँ पेटी (अभिगमन की पेटी), 9वाँ पेटी में चला जाता है। चार सांभावित पेटी को शामिल कर लिये जाने के बाद क्रमश: निम्नलिखित 9 पेटियों का विकास होता है:-
(1) CBD
(2) संक्रमण पेटी
(3) श्रमिकों की पेटी
(4) मध्यम और उच्च वर्ग की पेटी
(5) भारी उद्योग की पेटी
(6) अधिवासीय पेटी
(7) सीमान्त बाजार
(8) औद्योगिक उपनगरीय क्षेत्र
(9) अभिगमन की पेटी
                  उपरोक्त 9वीं पेटियों का विकास शिकागो नगर के अन्दर हुआ है।
आलोचना
(1) बर्गेस ने जिस ज्यामितीय नियम के आधार पर संकेन्द्रीय वलय पेटी के विकास की संभवना व्यक्त किया है वह संभव नहीं है क्योंकि नगर के अन्दर से गुजरने वाला सड़‌क नदी, पुल इत्यादि नगर की आन्तरिक संरचना को प्रभावित कर देते हैं।
(2) नगरों की आन्तरिक संरचना पर भौतिक कारकों का भी प्रभाव पड़ता है जिसकी चर्चा बर्गेस ने नहीं किया है।
(3) एक ही नगर को आधार मानकर पूरे विश्व के नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन किसी भी दृष्टिकोण में औचित्य दिखाई नहीं पड़ता।
(4) विकासशील देशों के CBD में अधिवास का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है, पुनः पूर्वी यूरोप के नगर के केन्द्र सांस्कृतिक जमघट के केन्द्र होते हैं।
(5) इस सिद्धांत के सबसे बड़े आलोचक हॉयट महोदय हुए जिन्होंने बताया कि नगरों की आन्तरिक संरचना का विकास सकेन्द्रीय पेटी के रूप में न होकर खण्डीय होता है।
(6) डिक्सन महोदय में पेरिस का अध्ययन करते हुए बताया कि उसकी संरचना संकेन्द्रीय नहीं हैं बल्कि तारा द्वारा प्रतिरूप में हुआ है।
निष्कर्ष-
       उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद यह सिद्धांत नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन एवं सैद्धान्तीकरण करने का प्रथम प्रयास था जिसकी सराहना मुक्त्त रूप से सभी भूगोलवेताओं ने किया है।
 
2. खण्ड सिद्धान्त (Sector Theory):
               
             इसका प्रतिपादित अमेरिकी समाजशास्त्री होयट महोदय द्वारा 1939 ई. में किया गया था। इसका अध्ययन 142 अमेरिकी नगरों पर आधारित था।
मान्यताएँ : 
     
      होयट का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि-
(i) नगरों की संरचनात्मक फैलाव में केन्द्रीय बाजार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(ii) सभी कार्यों की प्रकृति होती है कि वे केन्द्रीय बाजार तक सहज पहुँच रखते हो। अतः केन्द्रीय बाजार से निकलने वाले मुख्य पथ के किनारे विभिन्न प्रकार के कार्यों का फैलाव होने लगता है।
(iii) नगर के मध्य वाणिज्य तथा व्यापार के कार्य होते है और यह वृत्ताकार प्रवृत्ति में होता है।
(iv) नगरों का विकास एक वृत्त के रूप में होता है जिसके आन्तरिक भाग संकेन्द्रीय पेटी के रूप में नहीं बल्कि कई खण्डों में विकसित होते है।
               
         होयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड देखने को मिलते हैं।
1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र
2. थोक पैमाने पर हल्के विनिर्माण उद्योग
3. निम्न श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
4. मध्यम श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
5. उच्च श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
               
             होयट के अनुसार सड़क मार्ग के किनारे उच्च आय वर्ग की बस्ती होता है। इसके किनारे मध्यम आय वर्ग की बस्ती विकसित होती है और दो मध्यम आय वर्ग के बीच एक उच्च आय वर्ग की खण्ड विकसित होती है। होयट के अनुसार उच्च आय वर्ग के बस्ती का विकास निम्नलिखित तीन प्रवृत्तियों के अनुसार होती है:-
(i) नगर लम्बवत् रूप (Vertical Expansion) से बढ़ सकता है। एक परिवार वाले मकान एक से अधिक परिवार वाले मकानों में परिवर्तित हो जाते हैं।
(ii) मकान खाली पड़े प्लाटों पर भी बनने लगते हैं। इस प्रकार बस्तियों के बीच में खाली हुआ भाग मकानों से घिर जाता है।
(iii) जब नगर पर जनसंख्या का दबाव पड़ता है तब मकान नगरीय सीमा को धक्का देकर बाहर की ओर बढ़ जाते हैं। इस प्रकार का विस्तार अपकेन्द्रीय विस्तार कहलाता है। अपकेन्द्रीय विस्तार के भी तीन रूप होते हैं-
(a) ध्रुवीय विकास
(b) एकाकी बस्तियां और
(c) एकाकी बस्तियों का मिलाप।
          होयट महोदय ने हल्के उद्योगों की स्थापना करें। पुन: होयट कहा है कि सभी पेटियों का बाहर फैलाव भी होता है। अर्थात् जनसंख्या जैसे-जैसे बढ़ेगी पेटी भी बाहर की ओर फैलता जाएगा। इतना ही नहीं नवीन खण्डों का भी निर्माण होता है। जैसे- यदि किसी नगर में बृहद् उद्योग की स्थापना होगी तो उसके लिए एक खण्ड विकसित होंगे जो दूसरे या तीस खण्ड के ऊपर होगी। चौथे खण्ड के ऊपर अधिवासीय उपनगर विकसित होगा जिसमें मध्य व उच्च वर्ग के लोग होंगे। पांचवे खण्ड के ऊपर अधिवासित खण्ड, स्वास्थ्य, शिक्षा खण्ड विकसित होंगे।
आलोचनाएँ
(i) यह सिद्धांत महानगरों के लिए उपयोगी नहीं हैं बल्कि छोटे एवं मध्यम आकार के औद्योगिक नगरों पर लागु होता है।
(ii) वर्तमान नगर नियोजन में उच्चवर्गीय अधिवासीय क्षेत्र को उच्च वर्ग से दूर रखा जाता है।
(iii) इस सिद्धान्त के विश्लेषण से स्पष्ट है कि नगर का मुख्य कार्य अधिवास है जबकि ऐसा नहीं है।
               
            जहाँ तक भारत का प्रश्न है भारतीय नगरों में पूर्णरूपेण खण्डीय विकास की प्रवृत्ति नहीं है लेकिन औपनिवेशिक काल में कुछ नगरों में खण्डीय प्रवृत्ति भी ऐसा इसलिए कि वे लोग भारतीयों के साथ मिश्रित नहीं होना चाहते थे। वाराणसी में खण्डीय प्रवृत्ति विकसित हुई थी। इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान में इस सिद्धांत की उपयोगिता नहीं के बराबर है।
 
3. बहुनाभिक सिद्धान्त (Muittiple Nuclei Theory) :
             
            इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1945 ई. में हैरिस तथा उल्मैन महोदय ने किया है। ये दोनों भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने भौगोलिक सन्दर्भ में नगरों के आन्तरिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इसके निर्धारण में नगर के अधिवासीय कार्यों के अलावे उसके आर्थिक कार्य और परिवहन मार्गों के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। बहुनाभिक सिद्धांत के अनुसार, किसी नगर का विकास केवल एक ही केन्द्र पर नहीं बल्कि कई केन्द्रों पर होता है।
मान्यताएँ :
         
        हैरिस तथा उल्मैन द्वारा विकसित मॉडल निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-
(1) यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि नगर के प्रत्येक कार्यों का विकास निजी स्थानीय गुणां के कारण निकसित होती है। वह दूसरे पर आधारित नहीं होता है। चूंकि प्रत्येक कार्य के अपने आगे बढ़ने की शक्ति होती है, इसलिए प्रत्येक कार्य एक नाभिक केन्द्र का निर्माण करता है और इसी आधार पर उसे बहुनाभिक सिद्धांत कहा गया है।
(2) कुछ नगरीय क्षेत्रों का विकास विशिष्ट सुविधाओं के आधार पर होता है। जैसे- भारी उद्योग का विकास रेल परिवहन सुविधा के कारण होता है।
(3) कई कार्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अत: उसका विकास एक-दुसरे के अगल-बगल में होता है। जैसे-अधिकांश वाणिज्यिक बैंक,का विकास CBD में होता है।
(4) कई नगरीय कार्य एक दूसरे के कार्य से विलगाव रखते है अर्थात् एक-दूसरे के अगल-बगल विकसित नहीं होते। जैसे- उच्च आय वर्ग की बस्ती और औद्योगिक बस्ती, उच्च आय वर्गीय बस्ती और गन्दी बस्ती अगल-बगल में विकसित नहीं होते हैं।
(5) कुछ ऐसे भी कार्य होते है जो अधिक आर्थिक लगान नहीं दे सकते है: अतः उनका विकास नगर के बाह्य क्षेत्रों में कम किराए के मकान पर होता है। जैसे – विश्वविद्यालय, हॉस्पीटल, प्रशासनिक।
       
            उपरोक्त मान्यताओं के आधार पर निम्न मानचित्र दिया गया है-
1. केन्द्रीय व्यापारिक केन्द्र
2. थोक पैमाने पर हल्के निर्माण उद्योग
3. निम्न श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
4. मध्यम श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
5. उच्च श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
6. भारी निर्माण उद्योग
7. भारी व्यापारिक पेटी
8. रिहाइशी उपनगर
9. औद्योगिक उपनगर
10. अभिगमनकर्ताओं की पेटी
आलोचनाएँ:
(i) यह सिद्धान्त सिर्फ महानगरों पर ही लागू होता है, छोटे नगरों के लिए उपयोगी नहीं है।
(ii) यह सिद्धान फैलाव के नियमों पर आधारित नहीं है। बल्कि वस्तुस्थिति का अधिक विश्लेषण करता है।
नोट: रिहाइशी = आवास
(iii) यह मूलतः पश्चिमी देशों के लिए उपयोगी है।
(iv) सिद्धान्त सभी प्रकार के कार्यों के मध्य नाभीय चरित्र की अपेक्षा रखता है जो यथार्थ में सभी क्षेत्र में संभव नहीं है।
(v) भारत जैसे देशों में बहुनाभिक सिद्धांत में वृद्धि की प्रवृत्ति तो है फिर भी यहां सकेन्द्रीय वलय प्रवृत्ति अधिक सशक्त है। नियोजित दिल्ली तथा स्वतंत्रता के बाद विकसित कलकत्ता में बहुनाभिक प्रवृति देखने को मिलता है।
(vi) हैरिस तथा उल्मेन ने यह भी बताया कि नगरीय कार्यिक केन्द्रों में परिवर्तन भी होता है। जैसे –
(1) पुराने उपांत अधिवासीय क्षेत्र का परिवर्तन उपनगरीय बस्ती में होता है।
(2) पुराने औद्योगिक बस्ती का परिवर्तन निम्न आय वर्ग औद्योगिक श्रमिकों के अधिवास क्षेत्र में हो जाता है।
(3) पुराने कम आय वर्ग के क्षेत्र या तो गंदी बस्ती में बदल जाते हैं या हल्के उद्योग वाले क्षेत्र हो जाते हैं।
4. संयुक्त वृद्धि सिद्धान्त (Fused Growth Theory):
           इसका प्रतिपादन अमेरिकी भूगोलवेत्ता गैरिसन में 1962 ई. में कलकत्ता महानगर के सन्दर्भ में किया। गैरिसन के अनुसार ‘विकासशील देशों के महानगरों की तुलना में विकसित देशों की संरचनात्मक प्रवृत्ति भिन्न होती है। विकासशील देशों में प्रारम्भिक नगरीय विकास संकेन्द्रीय था, औपनिवेशिक युग में यह खण्डीय हो गया तथा 1900 के बाद अर्थात् नगरीय विस्फोट के बाद बहुनाभिक हो गया है।
मान्यताएँ :
     गैरिसन का मत है कि नगरों के विकास में संकेन्द्रीय वलय प्रतिरूप खण्ड प्रतिरूप और बहुनाभिक प्रतिरूप तीनों एक दूसरे से नितान्त पृथक नहीं होते हैं बल्कि प्रत्येक मॉडल में शेष दो मंडलों का रूप भी कुछ-न-कुछ अंशों में देखने को मिलता है। इस प्रकार कोई भी एक नगर तीनों प्रकार का मिश्रित प्रतिरूप रखता है तथा उसमें उद्योगों और रिहाइशी केन्द्रों के पृथक-पृथक सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी खण्ड स्थापित हो जाते हैं।
आलोचना:-
(1) यह सिद्धान्त पूर्व के तीन सिद्धान्तों की उपयोगिता को लागू करते हैं।
(2) इसका संरचनात्मक स्वरूप जनसंख्या दबाव का परिणाम है। इससे स्पष्ट है कि अगर ये दबाव न होते तो इस प्रकार की संरचना का निकास नहीं हो।
(3) यह सिद्धांत नगर के अनियोजित चरित्र को स्पष्ट करता है। इसमें विकास की वैज्ञानिकता का अभाव है।
(4) यह छोटे नगरों की संरचना को स्पष्ट नहीं करता है फिर भी विकासशील देशों के महानगरों की आन्तरिक संरचना की अत्यंत ही उपयोगी व्याख्या करता जवत (करांची आदि शहरों के लिए अत्यंत ही उपयोगी व्याख्या करता है।
निष्कर्ष:- 

        ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कोई भी सिद्धांत पूर्णरूप से मान्यता नहीं रखता है। प्रत्येक सिद्धांतो की कुछ सीमाएं हैं तथा प्रत्येक सिद्धांत कुछ विशेष परिस्थितियों में ही उपयोगी प्रतीत होता है। वस्तुतः सभी सिद्धान्तों के अनुरूप उदाहरण मिलते है। यही कारण है कि नगरों की आन्तरिक संरचना के लिए कोई भी सर्वमान्य सिद्धान्त विकसित नहीं जा सकता है फिर भी विकसित देशों के नियोजित नगरों पर प्रथम दो सिद्धांत बहुत हद तक लागू होते है। विकसित देशों के महानगरों प तीसरे सिद्धांत की भी उपयोगिता है जबकि विकासशील देशों के महानगरों में चौथे सिद्धांत की उपयोगिता प्रतीत होती है।


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6. Internal Structure of Indian Cities / भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना

6. Internal Structure of Indian Cities 

(भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना)


प्रश्न प्रारूप

Q.भारत के प्राचीन, मध्ययुगीन तथा ब्रिटिश नगरों से विशिष्ट उदाहरण देते हुए उसके आंतरिक संरचना के विकास का परीक्षण कीजिए। 

Q. भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना से आप क्या समझते है?

Q. नगरों की आन्तरिक संरचना से आप क्या समझते है? Internal Structure of Indian Cities

        नगरों की आंतरिक संरचना का तात्पर्य नगर की उस व्यवस्था से है जिसमें नगरों की विन्यास प्रणाली और नगरों के कार्यिक प्रारूप का अध्ययन किया जाता है। किसी भी नगर का विकास किसी न किसी केन्द्रीय(चौराहा) स्थल पर होता है तथा नगरों के आन्तरिक संरचना की एक निश्चित प्रवृत्ति होती है। इन्हीं प्रवृतियों को कई भूगोलवेताओं ने सैद्धांतीकरण करने का प्रयास किया है। इनमें बर्गेस, हायड, उल्मान, हेरीस तथा गैरीसन जैसे भूगोलवेताओं का नाम उल्लेखनीय है। इन भूगोलवेताओं ने भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर विकसित देशों के नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर सैद्धांतीकरण करने का प्रयास किया था।

भारतीय नगरों के आंतरिक संरचना को प्रभावित करने वाले कारक

      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर निम्नलिखित कारकों का व्यापक प्रभाव पड़ा है।

(1) धार्मिक कार्य-

       धार्मिक कार्यों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- वाराणसी, गया, मथुरा, मदुरई इत्यादि। धार्मिक स्थल से प्रत्येक लोग जुड़े रहना चाहते हैं। इसलिए ऐसे नगरों में संकरी और अनियोजित सड़क प्रणाली विकास हुआ है। भारत के अधिकांश प्राचीनकालीन नगर इसी प्रकार के उदा० प्रस्तुत करते हैं।

(2) धर्म तथा प्रशासन-

      मध्यकाल में नगरों की आंतरिक संरचना पर धर्म एवं प्रशासन दोनों का प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- फतेरपुर सिकरी, आगरा का किला, दिल्ली का लाल किला, जौनपुर, विजयनगर, इत्यादि नगरों पर प्रशासनिक प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

(3) औपनिवेशिक संस्कृति-
      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर औपनिवेशिक संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। औपनिवेशिक काल मे नियोजित एवं अनियोजित दोनों प्रकार के नगरों का विकास हुआ।इस काल में प्रत्येक अनियोजित नगर के पास नियोजित नजर देखने को मिलती है। अंग्रेजों ने अनियोजित नगर के पास ब्रिटिश अधिकारियों को रहने हेतु, सैनिक छावनी एवं प्रशासनिक कार्य हेतु नियोजित नगरों का विकास किया।

(4) ग्रामीण-नगरीय स्थानान्तरण- 

         भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर ग्रामीण नगरीण जनसंख्या स्थानान्तरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसके चलते नगरों में जनसंख्या विस्फोट हुआ है जिसके चलते गंदी बस्ती का विकास तेजी से हो रहा है।

(5) राजनीतिक व प्रशासनिक निर्णय-

     भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर राजनैतिक एवं प्रशासनिक निर्णय का भी प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- स्वतंत्रता के बाद नगरों के विकास के लिए “मास्टर प्लान बनाये गये। इसके लागू होने के कारण ही नगरों के बाहरी क्षेत्रों में नियोजित संरचना दिखाई देती है।

(6) सामाजिक एवं सांस्कृकृतिक कारक- 

      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों का भी प्रभाव देखा जाता है। इन कारकों के कारण सामाजिक विलगाव पर आधारित अधिवासीय क्षेत्र देखने को मिलता है। जैसे- उत्तर भारत के प्रत्येक नगर में बंगालियों का एक अलग मुहल्ला मिलता है।

(7) द्वितीयक व तृतीयक आर्थिक गतिविधियाँ-

      भारतीय नगरों पर द्वितीय एवं तृतीयक आर्थिक गतिविधियों का भी स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। आजादी के बाद भारत में तेजी से हो रहे औद्योगिक विकास के कारण औद्योगिक नगरों का विकास  हुआ है। जैसे- बोकारो, गांधीनगर, ईटानगर, भुवनेश्वर, राउरकेला, दिसपुर इत्यादि।

(8) ग्रामीण संस्कृति का प्रभाव- 

       भारतीय नगरों का विकास प्राय: ग्रामीण क्षेत्रों के लिए हुआ है और ग्रामीण क्षेत्र नगरों का सेवा किया करते है। ग्रामीण लोग नगरों में आकर ग्रामीण परिवेश के आधार पर ही आन्तरिक संरचना विकसित करते हैं।

भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना की विशेषता

      उपरोक्त कारकों के प्रभाव से भारतीय नगरों में निम्नलिखित विशेषताएं दिखाई देती है:-

(1) विकसित देशों में प्रत्येक नगर के मध्य CBD (Central Business District) दिखाई देता है और यह क्षेत्र अट्टालिकाओं का क्षेत्र होता है। यहाँ वाणिज्य, व्यापार थोक मूल्य, खुदरा मूल्य पर आधारित दुकानें होती हैं। रात में CBD खाली हो जाता है। यद्यपि भारत में CBD का विकास हुआ है। तथापि यह अट्टालिकाओं का क्षेत्र नहीं होता है तथा निचले तल्ले पर व्यापार और ऊपरी मंजिल पर अधिवास के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

(2) विकसित देशों के नगर में नगर के केन्द्र से ज्यों-2 बाहर की ओर निकलते हैं त्यों-2 मकानों की ऊँचाई में कमी आते जाती है। लेकिन भारतीय नगरों में ऐसी कोई प्रकृति नहीं पायी जाती है।

(3) भारतीय नगरों में अधिवासीय क्षेत्र सामान्यत: मिश्रित रूप में पायी जाती है। अर्थात यहाँ सभी आय वर्ग के लोग साथ-2 अधिवासित होते हैं। 

(5) यहाँ के नगरों में अधिक आयु वाले मकान देखने को मिलते  और उनमें भी मकान निम्न स्तरीय होता।

(6) भारतीय नगरों में सघन जनसंख्या देखने को मिलती है।

(7) भारतीय नगरों में कार्यों की विशिष्टता के आधार पर नगरीय बस्तियाँ कम ही दिखाई देती है।

भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना का भूगोलवेताओ द्वारा अध्ययन

        भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना का कई भूगोलवेताओं ने अध्ययन किया है जिनमें तीन का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है:-

(1) गैरीसन का अध्ययन

(2) अशोकदत्ता का अध्ययन 

(3) डॉ. कुसुमलता का अध्ययन

(1) गैरीसन का अध्ययन 

        गैरीसन एक अमेरिकी भूगोलवेता थे जिन्होंने 1962ई० में कोलकाता नगर के आन्तरिक संरचना का अध्ययन किया और उन्होंने “संयुक्त वृद्धि का सिद्धांत” प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया कि एक ही नगर में सकेन्द्रीय वलय पेटी या संकेन्द्रीय वलय प्रतिरूप, खण्डीय प्रतिरूप देखने को मिलता है। गैरीसन ने कहा कि वैसा नगर जिसका विकास लम्बी अवधि से हो रहा हो वहाँ तीनों प्रकार के प्रतिरूप मिलते हैं। उन्हेंने कहा कि कोलकाता महानगर में सबसे पहले सकेंद्रीय पेटियों का विकास हुआ और अंत में बहुनाभिक पेटी का विकास हुआ।

      गैरीसन ने बताया कोलकाता में 1887ई० तक सकेन्द्रीय विकास की प्रवृति थी। 1887ई०-1947ई० के बीच सकेन्द्रीय वलय पेटी और खण्डीय प्रतिरूप के विकास की प्रवृति थी और स्वतंत्रता के बाद बहुनाभिक विकास की प्रवृति है।

      गैरीसन के अध्ययन को आधार मानते हुए कानपुर, वाराणसी, बंगलौर एवं नगरीय जनसंख्या विस्फोट वाले नगरों का जब अध्ययन किया गया तो पाया गया कि उपरोक्त सभी नगरों का विकास गैरीसन के सिद्धांत के अनुरूप हुआ है। लेकिन गैरीसन का मॉडल भारत के छोटे नगरों पर लागू नहीं होता है, इसलिए अन्य अध्ययन आवश्यक था।

(2) अशोकदता का अध्ययन

          A.K. एक्रोन विश्वविद्यालय, USA में प्रो० थे। उन्होंने भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर 1974ई० में शोध-पत्र प्रस्तुत किया। उनके अनुसार भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना का निम्नलिखित प्रतिरूप दिखाई देता है।

(1) कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई जैसे ब्रिटिशकालीन महानगरों में पश्चिमी देशों के समान ही नगर के केन्द्र में CBD का विकास हुआ है। लेकिन साथ-2 अधिवासीय क्षेत्र का भी विकास हुआ है।

(2) भारत में ब्रिटिशकाल के पूर्व जितने भी नगर विकसित हुए हैं वे सभी अनियोजित प्रकार के हैं।

(3) भारतीय नगरों में अधिवासीय क्षेत्र विलगाव पर आधारित है। भारतीय नगरों में यह विलगाव भाषा, जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर देखा जा सकता है।

(3) डॉ. कुसुमलता का अध्ययन 

           डॉ. कुसुमलता ने 1968ई० में ही भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का तीन प्रतिरूप देखने को मिलता है।

(i) अनियोजित प्रतिरूप

(ii) अनियोजित सह नियोजित प्रतिरूप

(iii) नियोजित प्रतिरूप

(i) अनियोजित प्रतिरूप वाले नगर-

        डॉ० कुसुमलता के अनुसार संरचनात्मक विकास के आधार पर अनियोजित नगर दो प्रकार के हैं। प्रथम प्रकार में वैसे नगरों को शामिल करते हैं, जो अति प्राचीन है लेकिन, वर्तमान समय में विकसित होकर बहुत बड़े हो चुके हैं। जैसे- वाराणसी नगर इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यहाँ पर नगर का विकास मंदिर के चारों ओर सबसे पहले अनियोजित तरीके से हुआ और आज भी उसका विकास अनियोजित क्रम में जारी है।

          भारत में दूसरे प्रकार के अनियोजित नगर वह है जो हाल के वर्षों में जनसंख्या विस्फोट और कार्यिक संरचना में आये परिवर्तन से हुआ है। उपरोक्त दोनों प्रकार के अनियोजित नगर के केन्द्र में सघन जनसंख्या देखी जा सकती है और वहाँ मिश्रित कार्यों की प्रवृति होती है।

(ii) अनियोजित सह नियोजित नगर-

        इस प्रतिरूप का विकास औपनिवेशिक काल में हुआ जैसे-पुरानी नगरीय बस्ती पहले से ही अनियोजित बस्ती थी। लेकिन उसके सटे ब्रिटिश प्रशासकों ने नियोजित बस्ती का विकास किया। ऐसे बस्ती आयताकार विन्यास प्रणाली पर आधारित थीं। ऐसे नियोजित नगरों में सिविल लाइन, सैनिक छावनी  तथा प्रशासनिक क्षेत्र का विकास किया गया। पुराने नगरों के नजदीक नियोजित नगर बसाने का प्रमुख कारण अनुकूल बसाव स्थान था। उदा०-(पटना और दानापुर, राँची और बामकुम्प, कैट, दिल्ली और दिल्ली कैंट, आगरा और आगरा कैंट आदि।   

(iii) नियोजित प्रतिरूप-

      भारत में पूर्ण नियोजित नगर का अभाव है। फिर भी कई ऐसे नगर हैं जिनका विकास नियोजित तरीक से किया जाता है। जैसे – जमशेदपुर, चण्डीगढ़, गाँधी नगर, भुवनेश्वर, ईटानगर, येहलांका, बंगलोर, दिसपुर इत्यादि।

       चण्डीगढ़ आयताकार विन्यासप्रणाली पर आधारित एक नियोजित नगर है जिसके केन्द्र में सेक्टर-17 है जिसमें CBD विकास हुआ है। अधिवासीय क्षेत्रों का विकास आय के आधार पर किया गया है। आजादी के पूर्व ब्रिटिश काल में मकड़े जाली प्रतिरूप पर नई दिल्ली को नियोजित नगर के रूप में विकसित किया गया था। जिसके केन्द्र में कनॉट पैलेस है। ब्रिटिश काल के पूर्व जयपुर को राजा जयसिंह ने नियोजित नगर के रूप में विकसित किया था।

  निष्कर्ष:- 

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भात में अनियोजित, नियोजित तथा अनियोजित सह नियोजित आन्तरिक संरचना नगरों में देखी जाती है।


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