Category GEOGRAPHICAL THOUGHT(भौगोलिक चिंतन)

34. The Structuralism (संरचनावाद)

34. The Structuralism

(संरचनावाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. 1. संरचनावाद पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Structuralism.)

उत्तर- संरचनावाद मानता है कि समाज के भीतर सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाएँ हैं और वे व्यक्तिगत अभिन्न व सोच की बातें करते हैं। इसलिए संरचनावाद चीजों के व्यक्तिगत अभिनय व सोच की बात के व्यक्तिगत उद्देश्य और व्याख्या पर केन्द्रित नहीं है बल्कि भौतिक और प्रतीकात्मक सरंचनाओं पर केन्द्रित है। जो सामाजिक व्यवहार में एक मॉडल की तरह कार्य करता है। संरचनाएँ सामाजिक दुनिया का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

एटकेन और वेलेंटाइन में (2006) संरचनावाद को निम्न रूप में परिभाषित किया गया हैं-

“मानव भूगोल के लिए एक सैद्धान्तिक दृष्टिकोण जिसे एक धारणा से दर्शाया गया है कि मानव व्यवहार के सतह पैटर्न को समझने के लिए मानव, कार्यों को उत्पन्न करने या आकार देने वाली संरचनाओं को समझना आवश्यक है।”

       संरचना सिद्धान्त के मुख्य समर्थक ब्रिटश समाजशास्त्री एंथनी गिंडेस और फ्रांसीसी समाजशास्त्री पियरे वोर्डियों हैं। गिडेंस के अनुरूप संरचना का निर्माण एक पहल में नहीं होता-संरचना एक सतत प्रवाह है, एक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः उत्पन्न होती है। यही कारण है कि वह संरचनावाद के आधार पर संरचना को पसंद करते हैं। संरचनात्मक सिद्धान्त समाज को मानवीय गतिविधि से स्वतंत्र नहीं बल्कि मानव गतिविधि के उत्पाद के रूप में भी नहीं देखता है। यह संरचना की द्वंद्व (gidden) के संरचना सिद्धान्त में एक केन्द्रीय बिन्दु है।

      हम कह सकते हैं कि संरचना प्रथाओं के पुनरुत्पादन के माध्यम और परिणाम दोनों हैं। संरचनात्मक सिद्धान्त में यह महत्वपूर्ण है कि गतिशील प्रक्रिया के माध्यम से संरचनाएँ कैसे हो रही हैं। एक और अंतर यह है कि संरचनात्मक सिद्धान्त के दृष्टिकोण से संरचनाओं में स्वयं शक्ति नहीं होती है। मुख्य संवैधानिक शक्ति मानव व्यक्ति की एजेंसी को सौंपी जाती है।

       बेने वेरलेन (2009) ने उसे निम्नानुसार रखा है- “संरचना और सामाजिक अभ्यास का संबंध दोहरी है जिसका अर्थ है कि सामाजिक प्रथाएँ सामाजिक संरचनाओं का संदर्भ देती है और सामाजिक संरचनाएँ पहले किए गए प्रथाओं और सामाजिक कार्यों का परिणाम है।”

       एक और संरचनावादी विचारक जीन पिरगेट हैं जिसने बच्चों के संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक विकास के सिद्धान्त के माध्यम से उनके मनोवैज्ञानिक संरचनावाद के बारे में विचारों को समझाया। उन्होंने कहा कि ज्ञान एकत्र करने की प्रक्रिया में विभिन्न चरणों और संरचनाओं के लिए होते हैं, ज्ञान के विकास में प्रत्येक चरण में अपनी विशेषताओं और प्रणालियों की आवश्यकताएँ होती हैं लेकिन ज्ञान में स्वयं भी संरचनाएँ होती हैं।

          संरचनात्मकता के विचार का कई क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकता है। उन क्षेत्रों में से एक इतिहास है। संरचनावादियों का मानना है कि पूरे इतिहास में उनके कई कार्यक्रम हुए हैं जिन्होंने इतिहास को आकार दिया है जैसा कि आजकल हम जानते हैं। संरचनात्मक घटनाओं का परिणाम कुल इतिहास में होता है, एक इतिहास जो हर किसी के लिए मायने रखता है। वे अलग संदर्भों के बीच भेद नहीं करते हैं। यह भेद आमतौर पर पोस्ट-स्ट्रक्चरल वाद के लिए होता है।

          संरचनावाद भूगोल के भीतर के दृष्टिकोण जो इस तथ्य को इंगित करता है कि मानव व्यवहार के सतह पैटर्न को समझने के लिए विश्वास मानव कार्यों को उत्पन्न करने या आकार देने वाली संरचनाओं के बारे में ज्ञान का होना जरूरी है।

      उदाहरणार्थ नीदरलैण्ड में एक निश्चित क्षेत्र अपने क्षेत्र में नए लोगों को आकर्षित करना चाहता है। फिर उन्हें पहले के विशिष्ट क्षेत्र को स्थानान्तरित करने के लिए लोगों के अन्तर्निहित पैटर्न और उद्देश्यों पर व्यापक शोध होना चाहिए। उसके बाद यह क्षेत्र उन लोगों को अपने क्षेत्र की ओर आकर्षित करने में सशक्त कदम उठा सकता है अन्यथा अपने क्षेत्र में कई नए लोगों को आकर्षित करना लगभग असंभव है। यह उदाहरण दिखाता है कि मानव व्यवहार के उद्देश्यों के बारे में स्पष्ट ज्ञान का होना कितना महत्वपूर्ण है। केवल अगर हमारे पास वह ज्ञान है तो हम मानव व्यवहार को प्रभावित करने में सक्षम होंगे।

       1960 के दशक के आरंभ तक एक आंदोलन के रूप में संरचनावाद अपने आप आ रहा था और कुछ लोगों का मानना था कि यह मानव जीवन के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान करता है जो सभी विषय को गले लगाएगा। रोलैंड वार्थेस और जैक्स डेरिका ने उस बात पर ध्यान केन्द्रित किया कि साहित्य में संरचनावाद कैसे लागू किया जा सकता है।

        आज संरचना वक्ता उत्तर संरचनावाद और विघटन जैसे दृष्टिकोण से कम लोकप्रिय है। उसके कई कारण हैं- संरचनात्मक्ता की अक्सर अनैतिक होने और व्यक्तिगत लोगों की कार्य करने की क्षमता पर निर्धारक संरचनात्मक ताकतों के पक्ष में आलोचना करने में की गई है।

       1960 और 1970 के राजनीतिक अशांति और विशेष रूप से यही 1968 के (छात्र विद्रोह) ने अकाद‌मिक को प्रभावित करना शुरू किया। सत्ता और राजनीतिक संघर्ष के मुद्दे लोगों के ध्यान के केन्द्र में चले गए।

      1980 के दशक में विद्रोह उसकी क्रिस्टलीय तार्किक संरचना के बजाय भाषा की मौखिक स्पष्टता पर जोर लोकप्रिय हो गया। सदी के अंत तक संरचनावाद को विचार के ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्कूल के रूप में देखा गया था लेकिन संरचनात्मकता के बजाय यह आंदोलन प विशेष ध्यान दिया।



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33. Place of Geography in Sciences and Social Sciences (विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान में भूगोल का स्थान)

33. Place of Geography in Sciences and Social Sciences

(विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान में भूगोल का स्थान)



प्रश्न प्रारूप

Q 1. विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान में भूगोल के स्थान की विवेचना करें। (Discuss the place of Geography in Science and Social Science.)

उत्तर-

         विज्ञान के रूप में भूगोल, व्यापक रूप से एक सच्चे व्यक्तिगत और प्रगतिशील विज्ञान के रूप में व्यापक रूप में मान्यता प्राप्त होने से पहले एक लंबा सफर तय किया है। भूगोल का अनुशासन सभी विज्ञानों में सबसे प्राचीन है। ग्रीक विद्वान इरेटास्थनीज (Eratosthenes) को भूगोल का जनक कहा जाता है। उसने पृथ्वी की परिधि ज्ञात करने में वैज्ञानिक तथ्यों तथा सापेक्ष सटीकता छाया के कोणों का उपयोग, दो शहरों के बीच की दूरी और गणितीय सूत्र आदि का सहारा लिया। रोमन विद्वान टॉल्मी का भी भूगोल को एक विज्ञान की श्रेणी में रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

         इतिहास के भिन्न कालों में भूगोल को विभिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है। प्राचीन यूनानी विद्वानों ने भौगोलिक धारणाओं को दो पक्षों में रखा था-

  • प्रथम गणितीय पक्ष, जो कि पृथ्वी की सतह पर स्थानों की अवस्थिति को केन्द्रित करता था
  • दूसरा यात्राओं और क्षेत्रीय कार्यों द्वारा भौगोलिक सूचनाओं को एकत्र करता था। इनके अनुसार, भूगोल का मुख्य उद्देश्य विश्व के विभिन्न भागों की भौतिक आकृतियों और दशाओं का वर्णन करना है। 

           भूगोल में प्रादेशिक उपागम का उद्भव भी भूगोल की वर्णनात्मक प्रकृति पर बल देता है। हम्बोल्ट के अनुसार, भूगोल प्रकृति से सम्बंधित विज्ञान है और यह पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी साधनों का अध्ययन व वर्णन करता है। हेटनर और हार्टशॉर्न पर आधारित भूगोल की तीन मुख्य शाखाएँ है- भौतिक भूगोल, मानव भूगोल और प्रादेशिक भूगोल। भौतिक भूगोल में प्राकृतिक परिघटनाओं का उल्लेख होता है, जैसे कि जलवायु विज्ञान, मृदा और वनस्पति। मानव भूगोल भूतल और मानव समाज के सम्बंधों का वर्णन करता है।

      भूगोल एक अन्तरा-अनुशासनिक विषय है। भूगोल का गणित, प्राकृतिक विज्ञानों और सामाजिक विज्ञानों के साथ घनिष्ठ सम्बंध है। जबकि अन्य विज्ञान विशिष्ट प्रकार की परिघटनाओं का ही वर्णन करते हैं, भूगोल विभिन्न प्रकार की उन घटनाओं का भी अध्ययन करता है, जिनका अध्ययन अन्य विज्ञानों में भी शामिल होता है। इस प्रकार भूगोल ने स्वयं को अन्तर्सम्बंधित व्यवहारों के संश्लेषित अध्ययन के रूप में स्थापित किया है।

      भूगोल स्थानों का विज्ञान है। भूगोल प्राकृतिक व सामाजिक दोनों ही विज्ञान है, जो कि मानव व पर्यावरण दोनों का ही अध्ययन करता है। यह भौतिक व सांस्कृतिक विश्व को जोड़ता है। भौतिक भूगोल पृथ्वी की व्यवस्था से उत्पन्न प्राकृतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है। मानव भूगोल राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और जनांकिकीय प्रक्रियाओं से सम्बंधित है। यह संसाधनों के विविध प्रयोगों से भी सम्बंधित है।

      प्रारंभिक भूगोल सिर्फ स्थानों का वर्णन करता था। हालाँकि यह आज भी भूगोल के अध्ययन में शामिल है परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इसके प्रतिरूपों के वर्णन में परिवर्तन हुआ है। भौगोलिक परिघटनाओंं का वर्णन सामान्यतः दो उपागमों के आधार पर किया जाता है। जैसे- (i) प्रादेशिक और (ii) क्रमबद्ध।

      प्रादेशिक उपागम प्रदेशों के निर्माण व विशेषताओं की व्याख्या करता है। यह इस बात का वर्णन करने का प्रयास करता है कि कोई क्षेत्र कैसे और क्यों एक दूसरे से अलग है। प्रदेश भौतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, जनांकिकीय आदि हो सकता है। क्रमबद्ध उपागम परिघटनाओं तथा सामान्य भौगोलिक महत्वों के द्वारा संचालित है। प्रत्येक परिघटना का अध्ययन क्षेत्रीय विभिन्नताओं व दूसरे के साथ उनके संबंधों का अध्ययन भूगोल आधार पर किया जाता है।

भूगोल का अन्य विषयों से सम्बन्ध

      भूगोल एक समाकलिन विज्ञान है जो सभी प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों से किसी-न-किसी रूप में सम्बन्ध रखता है। भूगोल की विषय-वस्तु में भौतिक एवं मानवीय तथ्य सम्मिलित हैं। अत: भूगोल का इन दोनों ही विज्ञानों से सम्बन्ध पाया जाता है।

भूगोल का विज्ञानों से सम्बन्ध

1. भूगोल एवं खगोल विज्ञान:-

      ब्रह्माण्ड में सौरमण्डल के सदस्य के रूप में पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य आदि की स्थिति का सापेक्ष अध्ययन भूगोल तथा खगोल विज्ञान दोनों में ही किया जाता है, हालांकि दोनों के अध्ययन के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं।

     सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा की सापेक्ष स्थितियों के प्रभाव अनेक रूपों में देखे जाते हैं; जैसे- दिन-रात का होना, ऋतु-परिवर्तन, सूर्यातप की प्राप्ति, चन्द्रमा की कलाएँ इत्यादि। ये सभी भूगोल तथा खगोल विज्ञान के अध्ययन के विषय हैं। अत: दोनों विषय एक-दूसरे के बहुत निकट हैं।

2. भूगोल एवं गणित:-

      गणित का भौगोलिक अध्ययनों में प्राचीन काल से ही गहरा प्रभाव रहा है। देशों व प्रदेशों की अक्षांशीय व देशान्तरीय स्थितियाँ तथा उनकी आकृतियाँ व क्षेत्रफल आदि का भूगोल के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन गणित के सहयोग के बिना सम्भव नहीं है।

    आधुनिक काल में गणित की ही एक शाखा सांख्यिकी के उपयोग से भूगोल के विभिन्न अध्ययनों में मात्राकरण इतना महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है कि गणितीय भूगोल के रूप में भूगोल की एक प्रमुख शाखा के रूप में विकास हो रहा है।

3. भूगोल एवं भूगर्भ विज्ञान:-

     भूगर्भ विज्ञान पृथ्वी के आन्तरिक संरचना के अध्ययन से सम्बन्धित है जबकि भूगोल में भी पृथ्वी की आन्तरिक संरचना, चट्टानों आदि का अध्ययन किया जाता है; क्योंकि इसी अध्ययन से मिट्टियों, खनिजों, भू-आकृतियों के स्वरूपों और भूमिगत जल का अध्ययन जुड़ा हुआ है। इस प्रकार भूगोल और भूगर्भ विज्ञान का एक-दूसरे से गहरा सम्बन्ध नजर आता है।

4. भूगोल एवं जलवायु विज्ञान:-

     जलवायु विज्ञान में मौसम के सभी तत्त्वों के विभिन्न संयोगों से उत्पन्न जलवायवीय दशाओं का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में भौतिक पर्यावरण के अध्ययन में जलवायु को विशेष महत्त्व दिया जाता है जो धरातलीय परिघटनाओं को प्रभावित करती है। इस प्रकार भूगोल को जलवायु विज्ञान से गहरा सम्बन्ध है।

5. भूगोल एवं मृदा विज्ञान:-

       विश्व में खाद्यान्नों की प्राप्ति कृषि-कार्यों से ही होती है। कृषि-फसलों के पर्याप्त उत्पादन के लिए उपजाऊ मिट्टी का होना अति आवश्यक है। शाकाहारी लोगों का भोजन कृषि-उपजों से प्राप्त होता है, जबकि मांसाहारी लोगों का भोजन पशुओं से प्राप्त होता है, जो कि घास एवं वनस्पति पर निर्भर रहते हैं।

     अत: खाद्य पदार्थों की प्राप्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मिट्टी से ही होती है। खाद्यान्न तथा अन्य कच्चे पदार्थों का उत्पादन करने वाली मिट्टियों का अध्ययन भूगोल तथा मृदा विज्ञान का प्रमुख विषय है। इसलिए भूगोल और मृदा विज्ञान परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

6. भूगोल एवं वनस्पति विज्ञान:-

    वनस्पति का मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनसे अनेक उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति होती है। वन बाढ़ों एवं मृदा संक्षरण को रोकने में सहायक होते हैं। अतः ये एक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं। भूगोल में वनस्पति का अध्ययन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। अतः भूगोल का सम्बन्ध वनस्पति विज्ञान से अत्यधिक गहरा है।

7. भूगोल एवं जन्तु विज्ञान:-

     पशुधन से मानव का गहरा सम्बन्ध है। पशुओं से मानव को दूध, मांस, ऊन, चमड़ा आदि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। अनेक पशुओं का उपयोग कृषि-कार्यों, बोझा ढोने एवं यात्रा करने में किया जाता है। इस प्रकार आदिकाल से ही मानव का सम्बन्ध पशुओं से रहा है। इसी कारण भूगोल का सम्बन्ध जन्तु विज्ञान से भी है।

भूगोल का सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

1. भूगोल और अर्थशास्त्र:-

      भूगोल और अर्थशास्त्र दोनों ही सामाजिक विज्ञान हैं तथा एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। भूगोल मनुष्य के प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है, जबकि अर्थशास्त्र मानव की आर्थिक क्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। इसलिए दोनों के अध्ययन का केन्द्र-बिन्दु मनुष्य ही है। प्राकृतिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव मानव-जीवन पर पड़ता है।

      भूगोल में दोनों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। प्रादेशिक स्तर पर प्राकृतिक पर्यावरण ही मानव के आर्थिक क्रियाकलापों का निर्धारण करता है। उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्रों में लोग कृषि कर सकते हैं, जबकि घास के क्षेत्रों में पशुचारण प्रमुख व्यवसाय है। समुद्र तटीय भागों में मत्स्य उद्योग तथा वन-प्रधान क्षेत्रों में लोगों का प्रधान व्यवसाय लकड़ी काटना होता है।

      भूगोल के अध्ययन मात्र से ही हमें ज्ञात हो जाता है कि उस क्षेत्र में मानव की आजीविका के साधन क्या होंगे। सभी प्राकृतिक परिस्थितियाँ; जैसे-भूमि, नदी, पर्वत, मैदान तथा वनस्पतियाँ; मनुष्य के आर्थिक विकास के स्तर का निर्धारण करती हैं।

      कनाडा में लकड़ी काटना, टैगा में समूर एकत्र करना, कांगो बेसिन में जंगली रबड़ एकत्र करना तथा मलाया में रबड़ का उत्पादन वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की ही देन है। मनुष्य अपनी आजीविका के लिए प्रकृति के साथ कठोर संघर्ष करता रहा है। उसके इसी संघर्ष का अध्ययन आर्थिक भूगोल में होता है। अर्थशास्त्र में भी मानव के व्यवसायों; जैसे- कृषि, उद्योग, परिवहन के साधनों तथा व्यापार का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता कि अर्थशास्त्र और आर्थिक भूगोल दोनों में गहरा सम्बन्ध है।

2. भूगोल और इतिहास:-

       इतिहास भूतकालीन घटनाओं का वर्णन करने वाला शास्त्र है। वर्तमान की भौगोलिक घटनाएँ ही भविष्य में इतिहास बन जाती हैं। इतिहास वर्तमान भौगोलिक घटनाओं को अतीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के फ्रेम में व्यवस्थित करता है। किसी देश के इतिहास के निर्माण में वहाँ की भौगोलिक दशाओं का अभूतपूर्व योगदन रहता है। भूगोलवेत्ता बकल महोदय के शब्दों में, “विश्व का सम्पूर्ण इतिहास मनुष्य एवं प्रकृति की क्रिया-प्रतिक्रिया से ओत-प्रोत है। मानव सभ्यता के विकास का इतिहास इने सम्बन्धों से पृथक् नहीं किया जा सकता।’

      ऐतिहासिक घटनाओं की समग्र पृष्ठभूमि भूगोल द्वारा ही तैयार की जाती है। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना का एक विशिष्ट वातावरण होता है, जबकि भौगोलिक घटनाओं का भी एक निश्चित इतिहास होता है। भारत में उत्तर का विशाल मैदान कैसे बना, इसकी एक निश्चित ऐतिहासिक श्रृंखला है। इस क्षेत्र के इतिहास के निर्माण में किन-किन भौगोलिक दशाओं का योग रहा, यह भी इतना ही महत्त्वपूर्ण है।

     आज का भूगोल कल का इतिहास है, जबकि कल का इतिहास आज का भूगोल बन जाता है। कुमारी सैम्पुल के शब्दों में, “वास्तव में आज जो भूगोल है, कल वही काल के अन्तर में इतिहास बन जाता है।” उच्चावच स्थिति, जलवायु, प्रादेशिक विस्तार तथा अन्य भौगोलिक दशाएँ राष्ट्र के ऐतिहासिक स्वरूप का निर्माण करती हैं। मिस्र में नील घाटी की सभ्यता, एशिया में मेसोपोटामिया की सभ्यता, चीन में ह्वांगहो घाटी की सभ्यता वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों की ही देन रही हैं।

     यूनान, इंग्लैण्ड, फ्रांस और जापान देशों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के निर्माण में वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों का विशेष योगदान रहा है। सिकन्दर और नेपोलियन के उत्थान और पतन के पीछे भी वहाँ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों का ही विशेष हाथ रहा है। भूगोल को इतिहास की सहायता से तथा इतिहास को भूगोल की सहायता से भली प्रकार समझा जा सकता है। इस प्रकार इतिहास और भूगोल एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

3. भूगोल और समाजशास्त्र:-

      समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विज्ञान है। यह सामाजिक पृष्ठभूमि में मानव के सामाजिक क्रियाकलापों का विवरण प्रस्तुत करता है। यह मनुष्य की भौतिक-अभौतिक संस्कृति का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र सामाजिक पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में सामाजिक मानव का गहन अध्ययन करता है। सामाजिक परिवेश के निर्माण में प्राकृतिक पर्यावरण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मानव भूगोल का लक्ष्य मानव के सामाजिक और आर्थिक पहलू का अध्ययन करना है। इन दोनों पहलुओं के निर्माण में भौगोलिक दशाओं का विशेष हाथ रहता है।

     समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, परम्पराएँ, धर्म, नैतिकता, भाषा एवं संस्कृति का निर्धारण प्राकृतिक पर्यावरण द्वारा ही किया जाता है। समाजशास्त्र में इन्हीं सभी प्रतिमानों का अध्ययन किया जाता है। समाज के स्वरूप, संस्थाओं और उनके ढाँचे के निर्माण में भौगोलिक दशाओं का ही हाथ रहता है।

     अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही यूनान के लोग वीर और दार्शनिक तथा ब्रिटेन के लोग बुद्धिमान हो गये। मानसूनी जलवायु की अनिश्चितता के कारण ही वहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं, जबकि भूमध्यरेखीय प्रदेशों में आज भी जनमानस में जादू-टोने का प्रचलन है। इस सामाजिक परिवेश का रूप भौगोलिक पर्यावरण की प्रत्यक्ष देन है। अतः हम कह सकते हैं कि भूगोल और समाजशास्त्र एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

4. भूगोल और राजनीतिशास्त्र:-

     राजनीतिशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें राज्य की उत्पत्ति, विकास, प्रभुसत्ता, कानून और सरकारों का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में मानव की विभिन्न दशाओं का अध्ययन किया जाता है। भौगोलिक दशाएँ ही राज्य के स्वरूप तथा सरकारों के ढाँचों का निर्माण करती हैं।

     मैदानी तथा उपजाऊ क्षेत्रों में सदैव राजनीतिक उथल-पुथल तथा युद्ध लगे रहते हैं। सरकार, कानून, प्रशासन और समुदायों का निर्माण भौगोलिक परिवेश की देन है। इन्हीं सबका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रजातंत्र और पूँजीवाद, रूस और चीन में साम्यवाद और समाजवाद वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों की ही देन हैं।

      एशिया महाद्वीप के पृथक्-पृथक् देशों में प्रचलित विभिन्न प्रशासनिक प्रारूप यहाँ की विविध जलवायु की ही देने हैं। ब्रिटेन की द्वीपीय स्थिति के कारण वहाँ जहाजी बेड़ा शक्तिशाली बन सका। उसी के बल पर उसने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित कर साम्राज्यवाद का पोषण किया।

    भूगोल में भूराजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। वर्तमान समय में विश्व में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन भौगोलिक परिस्थितियों की ही उपज है। पर्यावरण-प्रदूषण के बढ़ते खतरों को देखकर ही महाशक्तियाँ आणविक शक्ति प्रसार को तत्पर हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिशास्त्र और भूगोल परस्पर सम्बद्ध हैं।

निष्कर्ष:

      उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भूगोल और अन्य सामाजिक विज्ञान के साथ इसका संबंध निर्विवाद है क्योंकि उसमें से प्रत्येक के लिए उसका महत्व है। यह स्पष्ट है कि जिस तरह से भूगोल अन्य सामाजिक विज्ञान से संबंधित है वह एक छोटी अवधाणा नहीं है वरन् एक व्यापक अवधाणा है।



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32. The functionalsim in Geography (भूगोल में कार्यात्मकवाद)

32. The functionalsim in Geography

(भूगोल में कार्यात्मकवाद)



प्रश्न प्रारूप

2. भूगोल में कार्यात्मकवाद की विवेचना करें ।

(Discuss the functionalsim in Geography.)

उत्तर- भिन्न-भिन्न विज्ञानों और भिन्न-भिन्न काल में कार्यात्मकवाद की परिभाषाएँ भी भिन्न-भिन्न स्वरूप लिए हैं। ‘क्रिया अथवा कार्य’ (Function) का तात्पर्य नीचे पाँच रूपों में व्यक्त है:

(i) समारोह अथवा उत्सव हेतु जन-समुदाय क्रियाएँ (विशेष-अवसर)

(ii) कार्य-भार अथवा कर्त्तव्य (राजनीतिक अर्थ)

(iii) एक ‘चर’ का दूसरे ‘चर’ से संबंध का फलन (गणितीय अर्थ)

(iv) जीवधारियों के संवारने हेतु क्रियाएँ (जीव विज्ञान व समाज विज्ञान)

(v) व्यवसाय (भूगोल के सन्दर्भ में आर्थिक क्रियाएँ)

     तात्पर्य है कि “सरल शब्दों में कार्यात्मकवाद व्यवसायों से जुड़ी अवधारणा है। वह समाज के कार्यों अथवा साामजिक व्यक्तियों की क्रियाएँ हैं।” विश्व को देखने का यह दृष्टिकोण एक ऐसा तंत्र है जो भिन्न-भिन्न, परन्तु अन्तः निर्भर बने तंत्रों का संकुल है। इसकी सम्मिलित क्रियाएँ पुनरावृत्तिजनक है, और पूर्वानुमानित हैं। इनका आकार-कार्य संबंधित है और यह सभी को अबाध बनाए रखने का तंत्र है-

     कार्यात्मकवाद के आधारभूत नियम निम्नलिखित हैं-

(i) समाजों का मूल्यांकन उनकी समस्तता (Wholeness) में किया जाना चाहिए।

(ii) घटित हुई सामाजिक क्रियाएँ वातावरण की अन्योन्याश्रित प्रकृति है। अनेक स्थितियों में ये कारण भी अनेक होते हैं।

(iii) सामाजिक तंत्र प्रायः साम्यावस्था की स्थिति (State of Equilibrium) है।

(iv) कार्यात्मकतावादी समाज के इतिहास में कम, परन्तु सामाजिक अन्तःक्रिया में अधिक रुचि रखते हैं।

(v) कार्यात्मकतावादियों के प्रयास सामाजिक ढाँचे के यौगिक घटकों के मध्य अन्तर्सम्बन्धों की खोज में निहित होते हैं।

      जीन ब्रून्स जैसे भूगोलवेत्ता एवं उनके समकालीन विद्वानों के शोध कार्यों में कार्यात्मक अथवा क्रियात्मक अभिगम उनकी रचनाओं में देखे जा सकते हैं। उन्नीसवीं सदी के अन्त में और बीसवीं सदी के प्रारम्भ काल में फ्रांसीसी विद्वानों को अविभाज्य समस्तता (Indivis- ible Wholeness) बताया। ‘प्रेदश’ (Region) को कार्यात्मक इकाई का जैविक क्षेत्र कहा जो उसके विभागों के योग से भी अधिक उच्च-स्तर की इकाई था और जीववत् क्रियाओं में बंधा था।

      आजकल भूगोल में कार्यपरकता की अवधारणा महत्त्वपूर्ण है। लोग मुंबई, टाटानगर और गुलमर्ग की पहचान क्रमशः एक प्रधान बन्दरगाह, लौह-इस्पात निर्माण केन्द्र और सैलानियों के स्थल के रूप में ही करते हैं। लघु नगरों की पहचान भी उनकी केन्द्र स्थानीय क्रियाओं व गुणों द्वारा की जाती है। इसी आधार पर उनका पदीय श्रृंखला-क्रम (Hierarchy) निर्धारित होता है। प्रत्येक स्थान को उसके दो प्रकार के व्यवसायों, एक ‘प्रकट’ (Manifest Function), और दूसरा ‘अप्रकट’ (Latent Function) के रूप में जाँचा जा सकता है। उदाहरणवत् टाटानगर का लोहा-इस्पात निर्माण कार्य-व्यवसाय प्रकट बना है, जबकि वहाँ के अन्य कार्य-शैक्षिक, सामाजिक, आदि ‘अप्रकट’ व्यवसाय हैं।

     कार्यात्मकतावाद की अलोचना संकल्पनात्मक व कार्य-पद्धतियों, दोनों आधारों पर की जाती है। कार्यात्मकतावाद भौगोलिक यथार्थता को एक संतुलित दशा (Equilibrium) में देखने की संकल्पना है। इसके विपरीत प्रयोजनमूलक (Teleology) एक ऐसा तंत्र है जो भौगोलिक यथार्थता को स्थिर (Static) मानकर उद्देश्यपरक घटना समझती है और परिवर्तनशील है।

     समाज को एक तंत्र में संरचित बना कहने से अन्य समकालीन समस्याएँ, जैसे गरीबी, अकाल, रोग, प्रजातीयता आदि की व्याख्या अछूती ही रह जाएगी। यथार्थता अपूर्ण ही प्रकट होगी। एक तंत्र सीमित उद्देश्य की ओर उन्मुख है, और अन्तर्सम्बन्धित अनेक उपतंत्र व प्रक्रियाएँ महत्त्वहीन ही समझी जाती है। कार्यात्मकतावाद की यह मुख्य कमी है।

     सामाजिक नियंत्रण में विश्वास व्यक्त करने के कारण कार्यात्मकवाद की आलोचना होती है, क्योंकि उस आधार पर परिवर्तनशील दृश्य जगत् की यथार्थता की व्याख्या नहीं हो सकती। सामाजिक परिवर्तन को कार्यात्मकवाद स्पष्ट नहीं करता है।

     तार्किक और पद्धति के आधार पर कार्यात्मकवाद की आलोचना सोद्देश्यवादियों ने की है। दृश्य-जगत् द्वारा स्थान की यथार्थता और स्थान का अधिग्रहण कारण परक नहीं है। (Not by Reference of Causes) अर्थात् स्थानिक घटना कारण-मूलक नहीं घटित बनी है। यह प्रयोजन मूलक घटित बनी है, क्योंकि स्थान को किसी प्रयोजन के लिए उपयोग में लिया गया। (A Given Situation by Reference to Ends Which Determine Its Course) दृश्य-जगत् में प्रकृति ने गिद्धों को इस उद्देश्य हेतु स्थान दिया कि वे शव (मृत जीवों) से पृथ्वी की सतह को मुक्त रखें।

     यद्यपि इसी कार्य के लिए वस्तु-जगत् में अन्य विकल्प (Alternatives of Substitutes) भी है। परन्तु, विकल्पों को समान प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र (Eco-System) का ही होना चाहिए। ऐस्किमो ने गाड़ी व अग्नि जैसे विकल्पों को प्रयोग में लाकर आर्कटिक जीव जगत् के नाजुक तंत्र को अव्यवस्थित (Up-Set) किया है।

     उपर्युक्त तर्कपूर्ण विवरण से कार्यात्मकतावाद में निम्नलिखित छः अवधारणाओं का उपयोग भूगोलवेत्ताओं द्वारा किया जाता है। ये अवधारणाएँ दृश्य-जगत की यथार्थता में अन्त: संबन्धित हैं-

(i) कार्य-व्यवसाय,

(ii) कार्यपरक विकल्प,

(iii) उद्देश्य,

(iv) प्रारूप-संवार, स्व-नियंत्रण अथवा यथा स्थिति

(v) अनुकूलता, और

(vi) एकीकरण।

   भूगोल में कार्यपक प्रदेश (Functional Region) से अभिप्राय प्रदेश का समस्तता में बंधी संचित इकाई के रूप में कार्य सम्पादन से है। वह अपने समस्त तंत्र में आंतरिक एवं बाह्य-तंत्रों की क्रियाओं द्वारा आवश्यकताओं की पूर्ति कर उद्देश्यमूलक प्रदेश है।

31. The Post-modernism and Feminism in Geography (भूगोल में उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद)

31. The Post-modernism and Feminism in Geography

(भूगोल में उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद की विवेचना करें।

(Discuss the Post-modernism and Feminism in Geography.)

उत्तर- मानवीय ज्ञान, दर्शन और समाजिक विज्ञानों व कला में आजकल उत्तर आधुनिकता का आन्दोलन चला है। वह आधुनिक भूगोल में ऐतिहासिकता की प्रतिक्रिया है। ऐतिहासिकतावाद का जोर व्यक्तियों एवं सामूहिक घटनाओं के काल क्रमानुसार वर्णन पर होता है और यह स्थानिकता को नजर अंदाज करता है।

सोजा (Soja, 1989) की राय में ऐतिहासिकतावाद सामाजिक जीवन पर ऐतिहासिक सन्दर्भ की अतिवादी दृष्टि है। वह भौगोलिक अथवा स्थानिक सोच को सामाजिक सैद्धांतिक विश्लेषण के दौरान हाशिए में धकेल देता है। काल की महत्ता में ‘स्थान’ गौण रह जाता है। इससे सामाजिक-जगत् की परिवर्तनशीलता का भौगोलिक निर्वचन अस्पष्ट रह जाता है।

     भूगोल में उत्तर आधुनिकता का जोर सामाजिक और भौगोलिक जाँच-पड़ताल के दौरान खुलेपन पर आधारित है। यह विषमांगता से युक्त पचमेल प्रयोग है। इसमें कलात्मक प्रयोग व राजनीतिक सशक्तता सम्मिलित है। इसका उद्भव स्थापत्य कला व साहित्य के सिद्धान्तों में निहित है। इसके केन्द्र बिन्दु अथवा नाभि (Core) की पहचान कठिन है।

डियर (Dear, 1944) के अनुसार- “Post-modernity is everywhere, from literature, design, art, architecture, philosophy, mass media, clothing, style, music and television. Post modernism raises urgent questions about place, space and landscape in the production of social life.”

अर्थात् उत्तर आधुनिकता सभी ओर है, वह साहित्य में, कला व डिजायन में, सत्यासत्य में, दर्शन और जनसंचार साधनों में, पोशाक के तौर-तरीकों व संगीत, दूरदर्शन सभी में मौजूद है।

     सामाजिक जीवन को गतिवान रखने में उत्तर आधुनिकता स्थान, क्षेत्र और दृश्य-जगत् के बारे में आवश्यक प्रश्नों को खड़ा करता है।

    उत्तर आधुनिकता का समर्थन करने वालों का तर्क है कि सामाजिक व ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की रचना भिन्न-भिन्न स्थानों व प्रदेशों में भिन्न-भिन्न स्वरूपों में हुई है, इसलिए ऐतिहासिक धारा सर्वत्र समान रूप से प्रवाहित नहीं बनी है। उदाहरणवत् आजकल के उपन्यासों की संरचना अस्त-व्यस्त है और आजकल की स्थापत्य कला मूल्यों से वचित बन उठी है।

    भूगोलवेत्ता ने समकालीनता की समस्या को बहुत पहले ही पहचाना जैसा कि डारबी (Darby) ने इंगित किया-

   ऐतिहासिक तथ्यों के सिलसिले को प्रस्तुत करने की अपेक्षा भौगोलिक तथ्यों के क्रमों को व्यक्त करना अधिक कठिन है। घटनाएँ एक के पश्चात दूसरी नाटकीय रूप में समयबद्ध घटित होती हैं। उनको समय बद्ध लिपिबद्ध करना सरल है, परन्तु उनको स्थान में सान्निध्य बनाना कठिन है।

  भौगोलिक विवरण अनिवार्यतः कठिन क्रिया है, जबकि ऐतिहासिक वर्णन अपेक्षाकृत सरल है। डियर (1986) ने उत्तर आधुनिकतावाद को तीन घटकों में विभक्त किया है-

(1) उत्तर आधुनिक शैली,

(2) उत्तर आधुनिक विधि और

(3) उत्तर आधुनिक काल।

(1) शैली रूप में:-

     उत्तर आधुनिकता साहित्य व साहित्यिक समालोचन में शैली रूप में व्यक्त है जहाँ से वह फिल्म, डिजायन, कला, फोटोग्राफी और स्थापत्य में फैला। इसकी सामान्य दिशा और संरचना में समरूपता व अनुरूपता का अभाव प्रवेश कर गया। स्थापत्य शैली की आलोचना उसके दिखावे में भिन्नता, रंग, डिजायन व प्रतिमा-विज्ञान के आधार पर की गई है। वह मात्र उथली व ऊपरी सतही बन शेष रही।

(2) विधि रूप में:-

     विधि रूप में उत्तर आधुनिकता सार्वभौमिक सत्य से परहेज करती है और इसके सोच में सभी कुछ समाया हुआ था। इसका किसी भी अर्थ में प्रयोग होने लगा और विधि निराधार बन उठी। अतः, इसका मूल्यांकन ही दुर्लभ बन गया। इससे रचना सिद्धान्त ही भिन्न भिन्न बन उठा और लेखक को संस्कृति, वर्ग, लिंग आदि सभी प्रभावित बनने लगे जिससे लेखक की स्थिति ही डगमगा गयी। विधि स्वयं लड़खड़ा गयी और विकल्प भी ढीले व कमजोर बन गए। लेखन-विधि में अस्थिरता विकसित हो गई।

       मानव भूगोल में ओलसन (Olsson, 1980) जो रचना के बिखराव के प्रारम्भिक समर्थक थे, उनको नवोन्मेष के अभ्यासी के रूप में जाना जाता है। रचना की तोड़-मरोड़ वस्तुतः अस्थिर विधि का ही परिणाम है।

(3) काल-अवधि के रूप में:-

     उत्तर आधुनिकतावाद का युग उसे ही माना जा सकता है जब संस्कृति सहित दार्शनिक सोच में परिवर्तन उत्पन्न हुआ। भूमण्डीलय अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति का विकास बदले स्वरूप में प्रकट बना और विलम्बित पूँजीवादी सांस्कृतिक प्रकट हुई जो भूतकालीन युग की संस्कृति से बिलकुल भिन्न है।

      नए युग की इस संस्कृति के अन्तर के अध्ययन की विशेषताओं में अनिश्चितता, कृत्रिम, घिसे-पिटे पुराने कुरुचिपूर्ण रंग-ढंग भरे पड़े हैं। अव्यवस्था को ही व्यवस्था मान लिया गया और मुख्य जोर दिया गया विषमता एवं अनूठे कृत्यों पर (ग्रिगरी 1989) ‘न्यूयार्क टाइम्स’ से उद्धृत टिप्पणी की सार्थकता उत्तर आधुनिकतावाद के विषय में व्यक्त है- “The great lesson of the 20th century is that all the great truths are false,” अर्थात्, 20वीं सदी की सबसे बड़ी सीख यही है कि सभी महान् ‘सत्य’ असत्य सिद्ध हुए हैं।

     मानव भूगोल के विद्धानों ने स्थानिक विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए आधुनिकतावाद की ‘व्यवस्था’ (System) पर जोर दिया परन्तु, आनुभाविक प्रेक्षणों (Empirical Observations) ने सिद्ध किया कि आधुनिकतावाद में अव्यवस्था (Disorder) के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यह ऐसी अव्यवस्था है जिसमें न तो कोई लागू करने हेतु सिद्धांत है और न विश्व व्यापक सत्य। बार्न्स (Barnes, 1996) आधुनिकतावाद के आलोचकों के हाथों में दार्शनिक सोच का ऐसा मंत्र आ गिरा जो-

     “आधुनिकतावाद को ‘अव्यवस्था भरा जगत्’ कहने में संकोच नहीं है। हम जिस प्रकार के आधुनिक जगत् में इस समय रह रहे हैं वह नव सैद्धांतिक अतिसंवेदनशीलता से भर उठा है, जहाँ जो कुछ भी करें, सभी सही मान लिया जाता है। क्षेत्र में व्याप्त विभिन्नताएँ भी ऐसी अव्यवस्थित बन गयी हैं। (Gregory, 1989)”

    वस्तुतः मानव भूगोल में उत्तर आधुनिकतावाद उत्तरकालीन प्रतिमान अथवा प्रकरण हैं जिनमें न तो कोई सुरुचिपूर्ण सोच और न यथार्थ। इसके समर्थकों ने वातावरणीय, नियतिवाद, आदि तंत्रों को नकार दिया। 1950 से 1980 के मध्य विकसित भौगोलिक अभिगमों का उत्तरकालीन आधुनिकवाद में कोई स्थान नहीं रहा। वे यह भी स्वीकार नहीं करते कि सामाजिक जीवन में किसी प्रकार की भूमण्डलीय सुसंगति है और प्रति दिन का जन-जीवन प्रणाली किसी पूर्व-शैली और मूल्यों द्वारा संचालित बनी हैं।

    उत्तर आधुनिकवादी ‘क्षेत्रीय’ विभिन्नताओं के सोच की ओर लौटे अवश्य हैं, परन्तु यह वापसी भिन्न प्रकार की है जिसमें ऐसे विश्व की सोच है जो अतिसंवेदनशीलता से भरी है, जहाँ न कोई नीति, न सिद्धांत और न संरचना ही है। वहाँ विषमता, विशिष्टता (व्यवस्था रहित) और अनूठापन जो कुछ भी करने, सोचने और बरतने में संकोच नहीं रखते। इनके मतानुसार “… we need, to go back in parts on the question of areal differentiation, but armed with a new theoretical sensivity towards the world in which we live and to the ways in which we live and to the ways in which we represent it.” (Gregory)

उत्तर आधुनिकता एवं नारीवाद (Post-modernism and Feminism)

    जाति प्रजाति के अतिरिक्त अनेक महत्वपूर्ण संबंधों में से लिंग का तत्व भी उत्तर-आधुनिक साहित्य से संबंधित है। नारीत्व भूगोल आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में दैनिक जन-जीवन से अन्तर्सम्बन्धित है। दूसरे रूप से व्यक्त करें तो यह लिंग-कारक है जो आजकल असमानता और प्रताड़ना जैसे सामाजिक अभिशाप का शिकार है।

      जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में नारी के प्रति भेद-भाव किया जाता है और नारी-दमन समाज में व्यापक बन चुका है। नारी विषयक भेद-भाव को उजागर बनाना और उसका विरोध भूगोल पेशेवरों में अध्ययन के अनेक उद्देश्यों में से एक उद्देश्य है।

जॉनसन (1989) के अनुसार नारीवाद भूगोल में महिलाओं के सामान्य अनुभवों की पहचान करना, पुरुषों द्वारा दमन के प्रति उनका प्रतिरोध और उसको अन्त करने की प्रतिबद्धता आदि विषय सम्मिलित है। नारीवाद भूगोल का उद्देश्य ‘नारी अभिव्यक्ति को प्रकट बनाना और अपने को नियंत्रित करना’ है। भूगोल का सोच और भौगोलिक अभ्यास प्रधानरूप से लिंग-दोष से ग्रसित बना है। भूगोल में केन्द्रित पितृ सत्ता और लैंगिकता केन्द्रित रहे हैं। इनसे मुक्ति राजनीतिक उपायों से मिलेगी।

रोज (Rose, 1993) जैसे नारीवादी भूगोलवेत्ताओं ने जोर देते हुए व्यक्त किया है कि-

1. भूगोल का व्यवस्थित विषय ऐतिहासिक रूप से पुरुष प्रधान है।

2 भूगोल- पेशे में महिलाओं को मात्र निरीह माना गया है और इसी रूप में संरिक्षत किया। वस्तुतः महिलाओं को भूगोल ने हाशिए पर लाकर उनकी उपेक्षा की और उनको सताया है।

3. ‘नारीवाद’ भूगोल के प्रोजेक्टों एवं शोध-विषयों से अछूता विषय बना रहा, और

4. पुरुषों द्वारा भूगोल में प्रभुत्व के कारण इसके दूरगामी दुष्परिणाम निकले हैं। स्थानों अथवा क्षेत्रों और भू-दृश्य जगत् के निवर्चन एकांगी हैं जहाँ प्रेक्षणों व आनुभाविक ज्ञान केवल पुरुष-दृष्टि-प्रधान है।

    अतएव, नियमानुरूप भूगोल विज्ञान (The Discipline of Geography) पुरुष-प्रधान (Masculinist) ही है जिसमें महिलाओं से संबंधित सोच की उपेक्षा है। लिंग भेद-भाव, वस्तुतः मानवीय कृत्य है। समाज के प्रभुत्वशाली समूहों ने समाज में अपने ही दृष्टिकोण से दृश्य-जगत् एवं प्रकृति को देखा और निर्वचित किया। यह भी कहें तो अत्युक्ति नहीं है कि पुरुषों ने अपने द्वारा की गई धरातल की व्याख्या को समाज पर थोपा है। उनके भौगोलिक विवरण स्त्री-पुरुष भेद-भाव की ओर इंगित नहीं बने हैं। वे केवल जाति-प्रजाति और वर्गों तथा यौन-उन्मुख भेदों से भरे हैं।

       उत्तर आधुनिक मानव भूगोलवेत्ताओं ने इस दिशा में निम्नांकित रूप-रेखा शोध हेतु प्रस्तुत की। इसके प्रधान विषय हैं-

1. नीति-संगत दार्शनिकता, नैतिक भूगोल और भूगोलवेत्ताओं का सदाचरण (Moral Philosophy, Moral Geographies and the Geographer’s Morality):-

    इसके अन्तर्गत भूगोल में आर्थिक केन्द्र बिन्दु के स्थान पर जीवनोपयोगी नैतिक-संरचना को विकसित बनाना है।

2. सामाजिक भेद-भाव की प्रक्रियाएँ (Social Differentiation):-

     इसमें जाति, प्रजाति, वर्ग, यौनाचरण, आयु व स्वास्थ्य विषयक सराहना की और ध्यानाकर्षण द्वारा स्थानिक विभिन्नताओं एवं परिवर्तनशीलता का निर्वचन करना सम्मिलित है।

3. ताक (टांड) की रचना और सीमांकन (Shelf Construction):-

      भूगोलविदों द्वारा इसमें विभिन्न श्रेणियों के व्यक्ति व्यक्तियों में परस्पर संबंध और मनोविश्लेषणात्मक साहित्य में ऐसे विषयों की चर्चा जिनका पूर्व में उल्लेख नहीं हुआ है।

4. भूमण्डलीय और प्रदेशीयता (Globality and Territoriality):-

      इसमें स्थानों में व्यक्तियों व समूहों की अवस्थिति विषयक चर्चा और उनके सांस्कृतिक अभ्यासों का निर्वचन सम्मिलित है, और

5. समाज, संस्कृति और प्राकृतिक वातावरण (Society, Culture and Natural Environment):-

     इसके अन्तर्गत विषयों में ‘प्रकृति’ एवं ‘वातावरण’ की सामाजिक रचना की व्याख्या और वातावरणीय समस्याओं के निराकरण हेतु अपनाए गए अभिगमों की महत्ता का उल्लेख होना चाहिए।

     उत्तर आधुनिकता और तर्क प्रधान उत्तरकालीन नारीवाद का मन्तव्य है कि भूगोल में एक पृथक श्रेणी के रूप में महिलाओं की स्थिति, समस्या और स्थानिक निर्वचन को अलग-अलग समूहों से जोड़ा जाए तथा भिन्न उनकी आवश्यकताओं औ अनुभवों की व्याख्या की जाए जो अभी तक भूगोल साहित्य में नदाद सामग्री है।

30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।

30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


           भूगोल एक ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) है, भूगोल के इस स्वरूप को प्रतिपादित करने का मुख्य श्रेय जर्मनी के दो प्रमुख निम्न भूगोलवेत्ताओं को जाता है:

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen)

2. अल्फ्रेड हैटनर (A. Hettner)

     इन दोनों भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के अध्ययक्ष क्षेत्र (scope) की व्याख्या भी की थी और अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों (systematic science) के साथ भूगोल के सम्बन्धों का विश्लेषण (analysis) और संश्लेषण (synthesis) भी किया था।

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen 1833-1905):-

        यद्यपि रिचथोफेन की शिक्षा भूगर्भ विज्ञान या भौमिकी (Geology) में हुई थी, परन्तु यह एक प्रसिद्ध भौतिक भूगोलवेत्ता (Physiographer) थे और साथ ही उन्होंने भूगोल के मानवीय पक्ष का भी ध्यान रखा था। वे बोन, लीपजिंग तथा बर्लिन विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे थे। सर्वप्रथम उनके अन्वेषण आल्पस क्षेत्र में आस्ट्रिया के टिरोल (Tyrol) प्रदेश में हुए थे तत्पश्चात् वह ट्रांसिल्वानिया तक बढ़ा और पूर्वी चीन में जाकर रहा।

        चीन में उसने व्यापक विस्तृत क्षेत्र अध्ययन करके सन् 1882 में ‘चीन का भूगोल’ नामक पुस्तक तथा उसकी मानचित्रावली (Atlas) प्रकाशित की। रिचथोफेन ने चीन के शान्टुग और किआओचाऊ क्षेत्रों में कोयले के भण्डारों को बताया था। वह संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलीफोर्निया भी गया था जहाँ उसने सोने के भण्डारों की भी खोज की थी।

     रिचथोफेन चीन में भू-विज्ञानी (Geologist) होकर गया था और वहाँ से भूगोलवेत्ता (Geographer) बनकर लौटा था। चीन के भूगोल पर रिचथोफेन की ग्रन्थमाला कुछ उसके जीवनकाल में और कुछ उसकी मृत्यु के बाद सन् 1877 से 1912 तक प्रकाशित हुई थी उसमें 5 ग्रन्थ थे। इस ग्रन्थमाला के प्रकाशन से रिचथोफेन विश्वविख्यात हो गया था। प्रथम ग्रन्थ पर ही उसको ‘Royal Geographical Society’ के संस्थापक का पदक मिला था। जर्मनी में वापस आने के बाद बोन विश्वविद्यालय में और फिर लीपजिग विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई। तत्पश्चात् वह बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए थे।

    कई वर्षों तक वह ‘Berlin Geographical Society’ के अध्यक्ष भी रहे थे। उन्होंने महासागरीय संस्थान (Oceanographical Institute of Berlin) को ठोस वैज्ञानिक आधार पर स्थापित किया था।

       रिचथोफेन का मुख्य कार्य भौतिक भूगोल में विशेष भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) के क्षेत्र में है। सर्वप्रथम उसने रिया तटों (Ria Coasts) और फियोर्ड (Fiord Coasts) का अन्तर समझाया था। बाद में उसने प्रदेशों का अध्ययन करके सामान्य तुलनात्मक भूगोल (General Comparative Geography) की स्थापना की थी।

      जर्मनी में रिचथोफेन का निकटतम शिष्य अल्ब्रेट पेंक (Albrecht Penck) था। जर्मनी से बाहर उसके ग्रन्थों की प्रशंसा ब्लाश ने बहुत अधिक की, परन्तु उसका सबसे अधिक प्रमुख सहायक कार्यकर्ता अमेरिकन भौतिक भूगोलशास्त्री डेविस (W. M. Davis) था।

     वॉन रिचथोफेन ने भूगोल को ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) सिद्ध किया था अर्थात् भूगोल में पृथ्वीतल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं (Areal Variations) का अध्ययन होता है। उसने अपने लेखों में कहा था कि भूगोल की अध्ययन सामग्री में अनेक प्रकार के तथ्यों की बहुत बड़ी संख्या होती है, उस सब तथ्यों को मिलाकर एक विषय के अन्तर्गत अध्ययन करने के लिए अध्ययन की विधि को तय करना बहुत अधिक आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता (Areal diversity) का विषय है। रिचथोफेन के अनुसार भौगोलिक अध्ययन में क्षेत्रीय सिद्धान्त (Areal principle) अनिवार्य था।

       “इस प्रकार भूगोल को ‘क्षेत्रीय विज्ञान’ का स्वरूप देने का मुख्य श्रेय वॉन रिचथोफेन को ही है।”

2. अल्फ्रेड हैटनर (Alfred Hettner 1859-1941):-

      हैटनर महोदय बीसवीं शती के अग्रगण्य रीति-विधायक (Methodologist) माने जाते हैं। हैटनर ने अन्य भूगोलवेत्ताओं की अपेक्षा सबसे अधिक मात्रा में भूगोल को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार प्रदान किया था। उसने भूगोल की एक प्रमुख अनुसन्धान पत्रिका (Research Journal) को प्रकाशित किया था। साथ ही कई ग्रन्थ भी लिखे, जिनमें प्रमुख ग्रन्थ भूगोल के विधि तंत्र (Methodology) पर और प्रादेशिक भूगोल पर थे और लगभग 30 व्यक्तियों को डाक्ट्रेट की उपाधि के लिए शोधकार्य कराया था।

भूगोल एक क्षेत्र
      हैटनर भूगोल के ही विद्यार्थी थे। वे रिचथोफेन तथा रेटजेल के शिष्य थे। उनकी नियुक्ति हाइडिलबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर थी। वह मूलतः भौतिक भूगोलवेत्ता तथा प्रादेशिक भूगोलवेत्ता थे। उन्होंने बहुत सी भौगोलिक यात्राएं भी की थीं।

        भौतिक भूगोल पर उसके बहुत से शोध पत्र (Research papers) भी प्रकाशित हुए थे जो 1919 से आगे के वर्षों में 4 खण्डों में छपे थे। यूरोप के भूगोल की पुस्तक 1907 में छप चुकी थी, परन्तु उसका संशोधित संस्करण शेष विश्व के भूगोल के साथ सन् 1923 में प्रकाशित हुआ था। हैटनर की विशेष ख्याति भौगोलिक विधि तंत्र(Geographical methodology) पर लिखे गए ग्रन्थ द्वारा हुई थी जो सन् 1927 में प्रकाशित हुआ था।

      हैटनर ने अपने लेखों में काण्ट द्वारा प्रस्तुत भूगोल की परिभाषा का पुनरावर्तन किया और उस ढांचे के अन्दर हम्बोल्ट, रेटजेल एवं पेशेल के द्वारा लिखे गए क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) को तथा रिचथोफेन, रिटर एवं मार्थे के द्वारा लिखे गए प्रादेशिक अध्ययनों को परस्पर शामिल करके भूगोल को एक समबद्ध पूर्ण (Coherent whole) विषय बना दिया है।

     उसने एक भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zeitschrift’ सन् 1895 में प्रकाशित की थी। वास्तव में हैटनर की विचारधारा का प्रकाशन उस पत्रिका की प्रस्तावना में, उसके बाद सन् 1898 में भूगोल का प्रोफेसर होने के प्रारम्भिक भाषण में, तत्पश्चात् भौगोलिक विधि-तंत्र पर प्रकाशित पुस्तक में हुआ है।      

   अलफ्रेड हैटनर के अनुसार भूगोल सामान्य भू-विज्ञान नहीं है, वरन् पृथ्वी तल का क्षेत्रीय विज्ञान है। “Geography is a Chorological Scinece of the earth’ Surface.”

      इसका सम्बन्ध प्रमुख रूप से प्रकृति और मनुष्यों के बीच पारस्परिक क्रियाओं से होता है इसके अन्तर्गत स्थानिक सम्बन्धों का मूल्यांकन भी होता है। भूगोल का प्राथमिक रूप से उद्देश्य क्षेत्रों या प्रदेशों का अध्ययन करना है। हैटनर ने सामान्य भूगोल एवं विशेष भूगोल अथवा प्रादेशिक भूगोल के अन्तर को भी समझाया है। सामान्य भूगोल के अन्तर्गत भूतल पर विभिन्न भौगोलिक परिघटनाओं (Phenomena) के वितरण का क्रमबद्ध (Systematic) वर्णन होता है। दूसरे विशेष या प्रादेशिक भूगोल (Landerkunde) के अन्तर्गत प्रदेशों के भौगोलिक तत्वों का अध्ययन होता है।

       सन् 1905 में हैटनर ने भूगोल की परिभाषा में कहा, कि भूगोल पृथ्वी का क्षेत्रीय विज्ञान है, जिसमें क्षेत्रों का अध्ययन उनकी विभिन्नताओं और स्थानिक सम्बन्धों के प्रसंग में होता है।

       क्षेत्रों (Area) के अध्ययन में हैटनर ने प्रकृति और मनुष्य दोनों को सम्मिलित किया है। इन दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

   अलफ्रेड हैटनर के भौगोलिक विधि तंत्र (Methodology) पर लिखे गए शोध प्रबन्ध, जिनको वह विधि विहार (Methodological rambles) कहकर सम्बोधित करते थे तथा जलवायु एवं उच्चावचन (relief) पर उनके विवेचन आज भी भौगोलिक ज्ञान और प्रस्तुतीकरण (Presentation) में उच्च स्थान पर हैं। उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zetschrift’ का लेखन सम्पादन निरन्तर नियमित रूप से किया था। सन् 1905 में सोवियत संघ के भूगोल पर एक श्रेष्ठ पुस्तक, सन् 1907 में यूरोप का भूगोल और सन् 1915 में ब्रिटेन का मूल्यांकन हैटनर महोदय ने प्रकाशित कराया था।

        उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका में, पुस्तक के रूप में अपने भू-प्राकृतिक अध्ययन- महाद्वीपों की स्थलाकृति (The terrain Features of the continents) और विश्व के सांस्कृतिक भूगोल (The march of culture over the world) की पुस्तकें भी छपवाई थीं।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगो एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञा (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना



        मानव समाज के स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन का अध्ययन आर्थिक एवं सामाजिक भूगोल में अध्ययन की मुख्य विषय-वस्तु है। पृथ्वी सतह पर या उसके साथ विभिन्न मानव समाजों की होने वाली अन्तर्क्रिया ही स्थानिक व्यवस्था का आधार है। स्थानिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य इस स्थानिक व्यवस्था की संरचना और क्रियाविधि का परीक्षण करते हुए मानवीय गतिविधियों के स्थानिक प्रारूपों एवं प्रक्रियाओं को पहचानना है।

         मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप उत्पन्न स्थानिक प्रारूपों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है, यथा:

(i) अवस्थिति- जो पृथ्वी सतह पर बिन्दु के रूप में है।

(ii) अन्तर्क्रिया- जो संचरण की रेखाएँ हैं जिनके सहारे माल, मनुष्य, विचारों और सेवाओं का वहन होता है।

(iii) प्रदेश- जो पृथ्वी सतह के समरूपी विशेषता वाले स्वरूपी या कर्मोपलक्षी क्षेत्र हैं।

      इन प्रारूपों को जन्म देने वाली स्थानिक प्रक्रियाएँ बड़ी जटिल हैं जिन्हें स्थानिक अन्तर्क्रिया द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इन स्थानिक अन्तर्क्रियाओं में माल और सेवाओं का प्रवाह, प्रवसन, अल्पकालीन संचरण (जैसे- खरीददारी, वासस्थल से कार्यस्थल तक की यात्रा), सामाजिक संचरण, सूचनाओं का प्रसरण, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

      इन प्रक्रियाओं के स्पष्टीकरण में मानवीय व्यवहार के अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विशेषकर इस बात पर कि मानव व्यवहार उन माध्यमों से कैसे प्रभावित होता है। जिन माध्यमों से उसने अपने स्थान का अवबोध या प्रत्यक्षीकरण किया है। इस प्रकार के प्रारूप एवं प्रक्रियाएँ स्थानिक पर्यावरण में उत्पन्न होते हैं, जो बढ़ती दूरी के साथ घटते प्रभाव के कारण स्थानिक अन्तर्क्रिया को बाधित या नियंत्रित करते हैं, लेकिन जिस स्थान में मानव अपनी गतिविधियों को संचालित करता है, वह स्थान सापेक्षिक है, क्योंकि यह स्थान दूरियों पर आधारित है और दूरी सापेक्षिक होती है तथा निरन्तर परिवर्तनशील है।

        स्थानिक संगठन एक जटिल प्रक्रिया है। मानव प्रतिदिन अपने आवास स्थल से अपने कार्यस्थल को जाता है। यह कार्यस्थल खेत हो सकता है, कार्यालय हो सकता है, कोई कारखाना या शिक्षण संस्थान या व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि हो सकता है। इस संचरण (Movement) के फलस्वरूप मार्गों का निर्माण होता है। इस प्रकार, मनुष्य के आवास एवं कार्यस्थल में पारस्परिक रूप से कर्मोपलक्षी अन्तर्प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। कृषि कार्य का क्षैतिज प्रसार अधिक होता है अतः ग्रामीण क्षेत्रों का स्थानिक संगठन ग्रामीण संस्कृति से प्रभावित होता है। उद्योग या व्यापार केन्द्राधारित (Nodal) होते हैं। इन केन्द्रों पर मनुष्य का गमनागमन एक भिन्न प्रतिरूप को जन्म देता है। मार्ग संगम बिन्दुओं पर केन्द्रस्थलों (Central Places) की स्थापना होती है।

           केन्द्रस्थल तृतीयक क्रियाकलापों के केन्द्र होते हैं तथा भूवैन्यासिक संगठन में इनकी प्रमुख भूमिका होती है। गमनागमन के मार्ग पगडंडी, कच्ची सड़क, पक्की सड़क, राज्य मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, आदि स्तरों के होते हैं। इनके संगम बिन्दुओं पर स्थापित केन्द्र स्थल भी अपने कर्मोपलक्षी रूप में छोटे एवं बड़े होते हैं। इसे केन्द्र स्थलों का पदानुक्रम (Hierarchy) कहते हैं। यह स्थानिक संगठन की संरचना का आधार होता है। उपभोक्ता अपनी आवश्यकतानुसार किसी केन्द्र स्थल पर आता-जाता है। इसे उपभोक्ता व्यवहार कहते हैं।

           उपभोक्ता किसी केन्द्र स्थल के चयन का निर्णय मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से करता है। इसके साथ ही निवास या कार्यस्थल से केन्द्र स्थल की दूरी का प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार एवं गमनागमन प्रतिरूप पर पड़ता है। यह सार्वभौमिक प्रवृत्ति होती है कि मानव न्यूनतम श्रम (लागत) से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहता है। साथ ही बढ़ती दूरी के अनुरूप ही केन्द्र स्थलों का प्रभाव घटता भी जाता है। इस प्रकार स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन के मूल तत्व कार्यस्थल, गमनागमन, परिवहन मार्ग, अन्तर्सम्बन्ध, केन्द्र स्थल, पदानुक्रम, दूरी क्षय, आदि हैं।

     स्थानिक संगठन की संरचना गमनागमन की बारम्बारता, केन्द्र स्थल के पदानुक्रमीय वर्ग एवं इनके बीच होने वाली अन्योन्याश्रित प्रक्रिया से सम्बन्धित है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र स्थल कर्मोपलक्षी रूप से छोटे एवं बड़े होते हैं। केन्द्र स्थलों का पदानुक्रमीय महत्व गमनागमन प्रतिरूप एवं बारम्बारता को प्रभावित करता है। इसी आधार पर प्रत्येक केन्द्र स्थल के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है। केन्द्र स्थल सिद्धान्त के अनुसार ये कर्मोपलक्षी प्रदेश षटकोणीय होते हैं तथा न्यूनतम श्रम से अधिकतम लाभ के सिद्धान्त का अनुपालन करते हैं। किसी भी क्षेत्र का स्थानिक संगठन वहाँ की भूमि के मूल्य से प्रभावित होता है।

      स्थानिक संगठन की प्रथम अवस्था में कोई गाँव या नगर दूरी पर स्थित होता है। धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ने से उसका प्रमुख कार्यक्षेत्र नगर के मध्य में स्थित होता है तथा जनसंख्या का बहाव बाहर की तरफ बढ़ता जाता है। इससे संलग्न ग्रामीण क्षेत्र की भूमि का उपयोग नगरीय कार्यों में होने लगता है, अतः इसका मूल्य बढ़ने लगता है। मानव अपनी बुद्धि चातुर्य के द्वारा परिवहन और संचार साधनों का विकास कर स्थानिक पर्यावरण को विशिष्टता प्रदान करता है।

        परिवहन और संचार साधनों के विकास द्वारा पृथ्वी सतह पर माल, सेवाओं, मनुष्यों और सूचनाओं के वहन में वृद्धि हुई है। समय और लागत दूरी को कम करके आपूर्ति एवं माँग के क्षेत्रों को समीप लाकर आर्थिक स्थानों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इसी प्रकार दूरसंचार और शिक्षा द्वारा स्थान के सम्बन्ध में किए गए अवबोधों में विद्यमान अन्तरों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

     इस प्रकार भूवैन्यासिक संगठन के संकल्पना सूत्र से भौगोलिक चिन्तन को न केवल सुनिश्चित दिशा मिली वरन् भौगोलिक अध्ययन मात्र वर्णनात्मक न रहकर प्रक्रिया विश्लेषण, सामान्यीकरण तथा सिद्धान्त प्रतिपादन के सोपानों से बढ़ता हुआ भविष्य के प्रक्षेपण (Projection) तथा पुनर्गठन के स्तर तक पहुँच गया। सभी गुण किसी विषय के सही अर्थ में वैज्ञानिक होने के दावे को स्थापित करते हैं। स्वाभाविक है कि इस स्तर तक पहुँचने में परम्परागत मानचित्र विवेचन के साथ-साथ सशक्त सांख्यिकीय विश्लेषण एवं प्रक्रियात्मक विवेचन की विधि बड़े पैमाने पर अपनाई गई। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय आयामयुक्त व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण तथा समन्वित क्षेत्रीय विकास में अन्य विशेषज्ञों के साथ हाथ बंटाने में अधिक आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हुए।

प्रश्न प्रारूप

1. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना का संक्षिप्त में विवण दीजिए।


27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।

27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।



     अमेरीका में स्कूल व कॉलेजों में भूगोल का अध्ययन मध्य उन्नीसवीं सदी में यूरोपियनों द्वारा प्रारम्भ किया गया। हार्वर्ड , डार्टमाउथ, याले, मेरी, कोलम्बिया, प्रिन्स्टन व पेंसिलवेनिया आदि विश्व विद्यालयों में गणितीय भौतिक व ऐतिहासिक भूगोल की शिक्षा वैसे 1795 से दी जाने लगी थी। आरनोल्ड गुयोट (Arnold Guyot) अमेरीका में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था।

     अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया है, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):-

        मानव भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान है। अमेरीका में सैम्पुल (E. C. Semple), हंटिंगटन (E. Huntington), बोमैन (I. Bowman), ग्रिफिथ टेलर (G. Tailor) जैसे दिग्गज मानव भूगोलवेत्ता हुए हैं। इन्होंने मानव भूगोल की परिभाषा दी व उसका विषय-क्षेत्र निर्धारित किया।

        सैम्पुल की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक Influence of Geographical Environment सन् 1911 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक वातावरण निश्चयवाद का कट्टर समर्थन करती थी। पुस्तक का प्रारम्भ ही इन शब्दों से हुआ है:-

“मनुष्य का जन्म पृथ्वी से हुआ है और वह पृथ्वी का शिशु मात्र ही नहीं है, अर्थात् वह पृथ्वी की धूल का एक पुतला मात्र ही नहीं है वरन् पृथ्वी उसकी माता है, जिसने उसे मातृत्व दिया है, उसका लालन-पालन किया है, उसको भोजन दिया है, उसके कार्यों को नियत किया है, उसके विचारों को निर्देशित किया है, उसके सामने कठिनाइयाँ प्रस्तुत की हैं, जिससे उसका शरीर सुदृढ़ हुआ है तथा उसकी बुद्धि कुशाग्र हुई है।”

      हटिंगटन की प्रसिद्ध पुस्तक Principles of Human Geography है। पुस्तक में हंटिंगटन ने मानव भूगोल की परिभाषा व विषय क्षेत्र निर्धारित करने का प्रयास किया है। साथ ही मानव भूगोल के अन्य पक्षों का भी वर्णन किया है। हंटिंगटन वातावरण निश्चयवाद के समर्थक थे।

   ग्रिफिथ टेलर को मानव भूगोल के क्षेत्र में नव-निश्चयवाद (Neo-Determinism) का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बीसवीं सदी में भूगोल’ (Geography in the Twentieth Century) है।

(ii) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

        भौतिक भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ता डेविस (William Morris Davis) का नाम प्रसिद्ध है। डेविस ने अपरदन चक्र की संकल्पना (Concept of Cycle of Erosion) का प्रतिपादन किया। यह संकल्पना काफी समय तक आदर्श मानी जाती रही। परन्तु पेंक ने इसकी भारी आलोचना की। फिर भी इस संकल्पना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। रोलिन सैलिसबरी, वेलेस स्टाउड भी उच्चकोटि के भौतिक भूगोलवेत्ता थे।

(iii) जलवायु विज्ञान (Climatology):-

      अमेरीका में जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख कार्य जलवायु के वर्गीकरण व जलवायु प्रदेशों के मानचित्र तैयार करने से सम्बन्धित रहा है। थार्नथ्वेट ने 1918 में कोपेन द्वारा प्रस्तुत जलवायु विभाजन की आलोचना की तथा नवीन जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में नए वैज्ञानिक यंत्रों से मदद ली गई।

(iv) स्थानीयकरण सिद्धान्त (Locational Theories):-

       कई अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने स्थानीयकरण सिद्धान्तों में योगदान किया है। सर्वप्रथम 1909 में व्हाइटवेक ने एक शोध पत्र के माध्यम बताया था कि चीनी मिट्टी बर्तनों के उद्योग के लिए मिट्टी की स्थानीय उपलब्धता आवश्यक नहीं। वाल्डर टावर ने 1911 में औद्योगिक स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना की । हूवर ने वेबर के सिद्धान्त में संशोधन किया।

(v) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

          राजनीतिक भूगोल में भी अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रुचि प्रदर्शित की। स्कूलों व कॉलेजों में इसे स्थान दिया गया। जार्ज क्रेसी, प्रेस्टन ई. जेम्स, राबर्ट एस. प्लाट व ईसा बोमैन प्रमुख राजनीतिक भूगोलवेत्ता थे।

         ईसा बोमैन की पुस्तक The New World में विभिन्न देशों के आपसी राजनीतिक सम्बन्धों की चर्चा थी। डी. व्हिटलसी ने एक पुस्तक The Earth and State प्रकाशित कराई। वाल्केनबर्ग की पुस्तक Elements of Political Geography में राजनीतिक भूगोल के विषय क्षेत्र की व्याख्या की गई थी।

(vi) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

      कृषि भूगोल के क्षेत्र में अमेरीका में विशेष कार्य हुआ है। इस दिशा में सर्वप्रथम बरनर सी. फिंच और ओ. ई. वेकर ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। 1917 में इन्होंने ‘संसार का कृषि भूगोल’ एटलस प्रकाशित की। वेकर ने 1921 में ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि उत्पादन के अन्तर पर भौतिक कारकों के प्रभाव का महत्व’ लेख प्रकाशित किया।

1936 में व्हिटलसी ने संसार को कृषि प्रदेशों में विभक्त किया। कृषि व डेरी उद्योग से सम्बन्धित अनेक शोध कार्य किए गए।

(vii) नगरीय-भूगोल (Urban Geography):–

      मार्क जैफरसन (Mark Jafferson) प्रथम अमेरीकी-भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने नगरों की स्थिति (Location) व जनसंख्या पर कार्य किया। उनकी “प्रधान नगर नियम’ संकल्पना” (Law of Primate City, 1939) ने अनेक विद्वानों को आकर्षित किया। सी. डी. हैरिस तथा उल्मान ने अमरीकी नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण किया।

प्रश्न प्रारूप

1. अमेरिकन भौगोलिक विचाधाराओं प प्रकाश डालिए।


26. ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश 

26. ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश


ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश 

            उन्नीसवीं सदी के मध्य तक ब्रिटेन में भूगोल की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। काफी समय बाद स्कूलों व कालेजों में भूगोल का अध्ययन प्रारम्भ किया गया। इस अध्यापन में छात्रों को पर्वतों, नदियों, शहरों आदि के नामों की सूची ही रटायी जाती थी। उन्नीसवीं सदी के अन्त में ब्रिटेन में भूगोल का अध्यापन विश्वविद्यालय स्तर पर प्रारम्भ किया गया। तब से अब तक ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने भी भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया है। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में विशेष योगदान किया है, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

(i) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

         हेफोर्ड मेकिण्डर (Halford Mackinder) सर्वप्रमुख ब्रिटिश राजनीतिक भूगोलवेत्ता था। 1904 में उसने ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी’, लन्दन के समक्ष एक पत्र पढ़ा। यह ‘हृदय स्थल सिद्धान्त’ (Heart Land Theory) था। सिद्धान्त इस प्रकार था:

“जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, हृदय स्थल को नियन्त्रित करता है, जो हृदय स्थल पर शासन करता है, विश्वद्वीप को नियन्त्रित करता है, जो विश्वद्वीप पर शासन करता है, विश्व को नियन्त्रित करता है।”

          रिचर्ड हार्टशोन के अनुसार मेकिण्ड का यह सिद्धान्त, संसार की शक्ति का विश्लेषण था, जो वर्तमान में मानव की राजनीतिक शक्तियों के मूल्यांकन का सबसे बड़ा योगदान हो गया है।

 

ब्रिटिश भौगोलिक

हेफोर्ड मेकिण्डर

(ii) आर्थिक भूगोल (Economic Geography):-

          दोनों महायुद्धों के मध्य ब्रिटेन में आर्थिक भूगोल पर विशेष ध्यान दिया गया था। इसमें प्राकृतिक तथ्यों के संसाधनों व आर्थिक क्रियाओं पर प्रभाव का अध्ययन किया गया। 1949 में स्मिथ (W. Smith) ने ब्रिटेन का ‘आर्थिक भूगोल’ (Economic Geography) लिखा। चिशोम (Chisholm) ने ‘वाणिज्य भूगोल’ (Hand book of Commercial Geography) नामक पुस्तक लिखी। 1930 में स्टाम्प (L. D. Stamp) ने ब्रिटेन के भूमि उपयोग मानचित्र पर कार्य प्रारम्भ किया।

          हरबर्टसन ने 1905 में विश्व के प्रादेशिक व आर्थिक भूगोल के लिये आधार तैयार किया। उसने विश्व को पन्द्रह प्राकृतिक भागों में बांटा था।

(iii) मानव-प्रकृति अन्तर्क्रिया (Man-Nature Interaction):-

           उन्नीसवीं सदी के अन्त से प्रथम विश्वयुद्ध तक ब्रिटेन में मानव व प्रकृति के सम्बन्धों का अध्ययन मुख्य रूप से किया गया। उस समय ब्रिटेन में भूगोल का अर्थ केवल धरातल व मानव पर उसके प्रभावों के वर्णनों तक ही सीमित था। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने विश्व को प्राकृतिक प्रदेशों में बांटा तथा बताया कि प्रत्येक प्रदेश में मानव किस प्रकार वातावरण से प्रभावित होकर कार्य करता है। फोर्डे (Forde) ने मानव के जीवन व कार्यों पर वातावरण का प्रभाव प्रदर्शित करने के लिये एक पुस्तक Habitat, Economy and Society प्रकाशित की।

(iv) ऐतिहासिक भूगोल (Historical Geography):-

         प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन में ऐतिहासिक भूगोल पर अच्छा कार्य हुआ है। मेकिण्डर ने ब्रिटेन में ऐतिहासिक भूगोल के लिये आधार तैयार किया। उसका मत था कि भूगोलवेत्ताओं को वर्तमान के साथ-साथ अतीत की भौगोलिक विशेषताओं का भी अध्ययन करना चाहिये, अन्यथा भूगोल समकालीन घटनाओं का वर्णन मात्र रह जायेगा। ऐतिहासिक भूगोल में जिन ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने विशेष योगदान किया, वे हैं—न्यूबेगिन (M. I. Newbegin), टेलर (E. G. R. Taylor), गिलबर्ट (E. W. Gilbert) व डार्बी (H. C. Darby)।

(v) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

           बीसवीं सदी के आगमन के साथ ही ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने कृषि भूगोल में रुचि लेनी प्रारम्भ कर दी थी । शोध कार्य प्रारम्भ कर दिये थे। परन्तु भूमि उपयोग सर्वेक्षण का कार्य 1920-30 के बाद प्रारम्भ किया गया। 1920 में स्टाम्प (L. D. Stamp) ने ब्रिटेन के भूमि उपयोग मानचित्र तैयार किये। स्टाम्प ने एक पुस्तक ‘ब्रिटेन की भूमि, इसका उपयोग व दुरुपयोग’ (The land of Britain, Its Use and Misuse) भी लिखी।

(vi) मात्रात्मक क्रान्ति (Quantitative Revolution):-

        पिछले 40-50 वर्षों में ब्रिटेन में मात्रात्मक क्षेत्र में, भूगोल को स्थापित किया गया है। हैगेट (Peter Haggett) तथा चोर्ले (Richard Chorley) ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। हैगेट ने सांख्यिकी विधियों का उपयोग, मानव व सामाजिक भूगोल (Human and Social Geography) के क्षेत्र में, मॉडल (Models) बनाने में किया। मात्रात्मक क्रान्ति यद्यपि अमेरिका से प्रारम्भ हुई, परन्तु ब्रिटेन में फैलते भी इसे देर न लगी। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने अपना ध्यान इस ओर केन्द्रित किया और मॉडलों व सांख्यिकी की सहायता से अध्ययन प्रारम्भ किया। ‘मानव भूगोल में मॉडल’ (Models is Human Geography), मानव भूगोल में ‘स्थानीकरण विश्लेषण’ (Locational Analysis in Human Geography) व ‘भौगोलिक शिक्षण की सीमाएं’ (Frontiers in Geographical Teachings) ऐसी ही कृतियां हैं।

       आज ब्रिटेन में ‘यथार्थवाद’ (Positivism or Realism) पर भी कार्य किया जा रहा है। इसमें उन पर जोर दिया जाता है जिनके सम्बन्ध में सही-सही निर्णय नहीं लिया जा सकता जैसे- मानव की व्यावहारिक समस्याओं (Practical ) पर ध्यान दिया जाता है। हंटिंगटन ने मानव भूगोल के तथ्यों को 5 तथा मानवीय आवश्यकताओं को 4 कोटियों में रखा है:

मानव भूगोल के तथ्य-

(i) पृथ्वी एक ग्लोब के रूप में,

(ii) भौम्याकार,

(iii) जलाशय,

(iv) मिट्टियां तथा खजिन पदार्थ,

(v) जलवायु।

मानवीय आवश्यकतायें-

(i) भौतिक आवश्यकताएं,

(ii) मुख्य व्यवसाय,

(iii) चातुर्थ और

(iv) उच्च आवश्यकताएं।

हटिंगटन के अनुसार-

(i) आबादी के घनत्व,

(ii) धन-धान्य तथा स्थिति,

(iii) एकाकीपन की मात्रा,

(iv) मानव झुकाव, साधन तथा उद्योग सम्बन्धी भिन्नता एवं

(v) स्फूर्ति की मात्रा पर भौगोलिक प्रभावों को स्पष्ट किया है।

          हटिंगटन ने आर्थिक तथा सामाजिक भूगोल पर भी कार्य किया है। वास्तव में भूगोल के क्षेत्र में इनका महान योगदान है। इनके भौगोलिक विचारधारा उसके सहयोगियों तथा मानव भूगोलवेत्ताओं के लिए प्रेरणा-स्रोत सिद्ध हुई है।


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25. हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

25. हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन


हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

हम्बोल्ट एवं रिटर

                     यद्यपि हम्बोल्ट तथा रिटर के विचारों में आधारभूत समानता (Similarity) थी, फिर भी दोनों के प्राकृतिक दर्शन (Philosophy of nature) में भिन्नता थी।

(1) हम्बोल्ट प्रकृति की एकता (Unity) में विश्वास करता था तथा वह कार्य-कारण के सम्बन्ध (Inherent causality) में भी विश्वास करता था।

       हम्बोल्ट ने स्वयं लिखा है कि मैंने पृथ्वी पर प्राकृतिक भू-दृश्यों को क्रमबद्ध करके प्रदेशों की सीमायें निर्धारित करने में ऐसा प्रयत्न किया है कि उन प्रदेशों के द्वारा कारण सम्बन्धों (Causal connecions) का स्पष्टीकरण हो जाता है। रिटर ने भी कारण-सम्बन्धों को तुलनात्मक विधि से निश्चित किया था। हम्बोल्ट के मतानुसार, प्रकृति के विभिन्न भू-दृश्यों के वर्गों (Groups of phenomena) में हमको आनुभविक नियमों (Empirical laws) को समझना चाहिये। परन्तु समस्त प्राकृतिक अध्ययन का सबसे ऊंचा लक्ष्य कारण-सम्बन्धों को खोजना होता है।

(2) परन्तु हम्बोल्ट के एकता तथ कारणत्व (causality) के विचार रिटर के विचारों से इस प्रकार भिन्न हैं कि रिटर के अध्ययन में मानव को केन्द्रीय स्थान (Anthropocentric attitude) देकर प्रकृति का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त रिटर में ईश्वरीय उद्देश्यवाद के विचारों (Teleological views) की प्रधानता थी। इस प्रकार हम्बोल्ट और रिटर में दार्शनिकता का भेद था। रिटर का दर्शन आदर्शवादी दार्शनिकों (Idealist philosophers) से मेल खाता था। परन्तु हम्बोल्ट की दार्शनिकता नितान्त आदर्शवादी नहीं थी।

(3) हम्बोल्ट तथा रिटर के कार्य-क्षेत्रों में भिन्नता थी। उनके अध्ययन के दृष्टिकोण अलग-अलग थे। हम्बोल्ट क्रमबद्ध अध्ययन को प्रधानता देता था, जबकि रिटर प्रादेशिक अध्ययन (Landerkunde) को प्रधानता देता था।

(4) समानता-

          रिटर ने अपने भाषणों में बतलाया था, कि प्रादेशिक अध्ययन (Landerkunde) में क्रमबद्ध अध्ययन का महत्व था, और उसने भूगोल की जो ग्रन्थमाला अर्डकुण्डे के नाम से प्रकाशित की थी उसका अन्तिम ग्रन्थ क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) था।

         हम्बोल्ट ने भी प्रादेशिक अध्ययन पर कुछ लेख प्रकाशित किये थे। परन्तु हम्बोल्ट ने प्रादेशिक भूगोल के विषय को अधिक विकसित नहीं किया, क्योंकि उसका लक्ष्य प्रादेशिक भूगोल नहीं था और उसने भौगोलिक ग्रन्थों में उसको कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया था।

(5) पूरकता- 

           इस प्रकार हम कह सकते हैं कि रिटर और हम्बोल्ट दोनों का कार्य एक-दूसरे का पूरक (Complementary) था। हम्बोल्ट ने क्रमबद्ध भूगोल के अध्ययन की विधि बतलाई और उसका स्वरूप भी निश्चित किया था। उदाहरण के लिए, उसने जलवायु विज्ञान (Climatology) तथा वनस्पति भूगोल (Plant geography) पर ग्रन्थ लिखे थे। रिटर ने प्रादेशिक व्यक्तित्व (Regional individuality) के अध्ययन को अपने ग्रन्थ अर्डकुण्डे का आधार बनाया हुआ था, जिसके द्वारा प्रत्येक क्षेत्र के समस्त भौगोलिक तत्वों के विवेचन से उस क्षेत्र की पूर्णता (Totality) का वर्णन किया जाता था, अर्थात् प्रत्येक क्षेत्र को एक सम्पूर्ण इकाई (Individual whole) के रूप में अध्ययन और वर्णित किया गया था। अतः उन दोनों ने मिलकर वर्तमान भूगोल (Modern geography) के कार्य को पूरा किया था।

          रिटर ने यूनिवर्सिटी में अध्यापन का कार्य किया था और विधितन्त्र (Methodology) पर बहुत से पत्र प्रकाशित किये थे। इसलिए आगे आने वाली पीढ़ियों पर हम्बोल्ट की अपेक्षा रिटर का अधिक प्रभाव पड़ा, क्योंकि हम्बोल्ट के लेख बहुत सी पत्रिकाओं में इधर-उधर बिखरे हुए थे और भूगोलवेत्ताओं को उनकी जानकारी अपेक्षाकृत कम थी।

         म्बोल्ट और रिटर दोनों की मृत्यु 1859 में हुई थी। उसी वर्ष डार्विन (Darwin) का विकासवाद का सिद्धान्त, उसके द्वारा लिखी हुई पुस्तक ‘जीवधारियों के जातिवर्गों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) में प्रकाशित हुआ था। इस प्रकार उनकी मृत्यु से भौगोलिक विकास के एक युग का अन्त हो गया था, और वैज्ञानिक तथा दार्शनिक विचारधारा में एक नये आन्दोलन का आरम्भ हो गया था।

       19वीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर मध्य तक की अर्द्धशताब्दी में आदर्शवाद ( Idealism) का बोलबाला रहा था। विज्ञान में ‘पदार्थवाद’ ने प्राकृतिक नियम (Natural law) और कारणत्व (Causality) पर विशेष बल दिया था। लगभग 10 वर्षों बाद पदार्थवाद का प्रभाव भौगोलिक विचारधारा पर भी होने लगा।

उष्मा बजट


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24. भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।

24. भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।


भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।

भूगोल को परिभाषित

          भूगोल के लिए प्रयुक्त होने वाला अंग्रेजी शब्द ‘Geography’ यूनानी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। Geo = पृथ्वी एवं (Graphy) वर्णन, जिसका अर्थ ‘पृथ्वी का वर्णन’ है। इस प्रकार भूगोल अर्थात ज्योग्रॉफी का सामान्य अर्थ है- पृथ्वी का वर्णन करना।

            भूगोल की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानव सभ्यता का इतिहास तथा उतना ही नवीन है जितना कि दैनिक समाचार-पत्र। मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के साथ- साथ भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में भी विकास होता गया है। संक्षेप में कहा जा सकता “भूगोल पृथ्वी तल और उसके निवासियों का विज्ञान है।” (Geography is the Science of the earth’s surface and its inhabitants.) विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात के वर्षों में भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में आवश्यक विस्तार वैज्ञानीकरण और परिवर्तन तीव्र गति से हुआ है।

             विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई भूगोल की परिभाषायें निम्न प्रकार हैं-

1. शब्दकोष द्वारा परिभाषा- भूगोल पृथ्वी तल और पृथ्वी पर रहने वाले निवासियों का विज्ञान है।

2. मोंकहाउस द्वारा परिभाषा- भूगोल पृथ्वी तल का, उसकी क्षेत्रीय भिन्नता के साथ, मानवीय निवास के रूप में अध्ययन है।

3. हार्टशोर्न द्वारा परिभाषा- भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी के एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवर्तनशील स्वरूपों का वर्णन और उनकी व्याख्या ‘मानव के संसार’ के रूप में करता है। यह पृथ्वी तल के घटना दृश्यों के विविध परिवर्ती वितरणों और जटिल अंतर्संबंधों का विश्लेषण करता है और पृथ्वी तल के परिवर्ती स्वरूप की व्याख्या करके उसका शुद्ध क्रमबद्ध और परिमेय वर्णन करता है।

4. रिचथोफेन (Richthofen)- रिचथोफेन के मतानुसार भूगोल में पृथ्वी तल के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन उनकी समस्त विशेषताओं के अनुसार किया जाता है।

5. हेटनर (Hettner)- भूगोल क्षेत्रीय विज्ञान है जिसमें पृथ्वी तल के क्षेत्रों का अध्ययन उनकी भिन्नताओं तथा स्थानिक संबंधों की पृष्ठभूमि में किया जाता है।

6. हैगेट (Haggett)- भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वीतल पर मानव वातावरण के पारिस्थितिक तंत्र और प्रदेशों के स्थानिक तंत्र की संरचनाओं तथा पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन करता है।

7. हेरमेन- भूगोल विज्ञान में पृथ्वी के थल का अध्ययन उपत्यक (Genetic), कारणात्मक (Causal) और कार्यात्मक (Functional) दृष्टिकोणों से किया जाता है।

8. डूडले स्टाम्प (Dudley Stamp)- इनकी परिभाषा को तीन प्रकार से लिखा गया है:
(i) भूगोल में संसार का और उसके निवासियों का वर्णन होता है।

(ii) भूगोल में पृथ्वी का तथा मानव परिस्थितिकी का विज्ञान है।

(iii) भूगोल में पृथ्वीतल का वर्णन, क्षेत्रों की भिन्नताओं और सम्बन्धों के प्रसंग में किया जाता है।

9. काण्ट- भूगोल वह विज्ञान है जिसमें पृथ्वी के उस भाग का अध्ययन किया जाता है जो कि मानव का घर है। काण्ट भूगोल तथा खगोलकी को दो भिन्न विज्ञान मानते थे।

10. रिटर (Ritter)- भूगोल में पृथ्वी तल का अध्ययन किया जाता है जो कि मानव का निवास गृह है।

11. वूल्डरिज तथा ईस्ट द्वारा परिभाषा (Wooldridge and East)- भूगोल में भू-क्षेत्र तथा मानव का अध्ययन होता है। इन विद्वानों ने अपनी परिभाषा में तीन बातों को प्रधानता दी है-

(i) पृथ्वीतल (Earth’s Surface) का वैज्ञानिक अध्ययन,

(ii) पृथ्वीतल की विभिन्नताओं के आधार पर पृथ्वी के विभिन्न प्राकृतिक भाग जिनमें मानवीय क्रियाओं की विभिन्नताएं भी सम्मिलित रहती हैं और

(iii) तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्ध।

12. वर्तमान जर्मन भूगोलवेत्ता- वर्तमान जर्मन भूगोलवेत्ताओं के अनुसार, भूगेल वह विज्ञान है, जिसमें पृथ्वी के विभिन्न प्रदेशों ‘लैण्डशाफ्ट’ का अध्ययन होता है। इस प्रसंग में यह बात भली-भाँति समझ लेने की है कि जर्मन भाषा के शब्द ‘लैण्डशाफ्ट’ का अनुवाद अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘लैण्डस्केप’ से नहीं किया जा सकता है। अंग्रेजी शब्द ‘लैण्डस्केप’ का अर्थ हिन्दी भाषा में ‘दृश्यभूमि’ होता है, जिसमें प्राकृतिक दृश्यभूमि तथा सांस्कृतिक दृश्यभूमि दोनों ही समाविष्ट होते हैं।

           जबकि जर्मन शब्द ‘लैण्डशाफ्ट का प्रयोग दृश्यभूमि तथा प्रदेश दोनों अर्थों का वाचक है, जिसमें प्रदेश को विशेषताएँ और मानवीय क्रियाएँ भी सम्मिलित रहती हैं।

             भूगोल का अन्य भौतिक विज्ञानों से मनिष्ठ सम्बन्ध है। भूगोल की निम्नलिखित वस्तु है-

1. खगोल विज्ञान:-

        सौर मंडल, सूर्य की सीधी किरणों का उत्तरायण और दक्षिणायन होना, दिन-रात का होना और घटना बढ़ना, मौसम में परिवर्तन, चन्द्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का होना, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि के अध्ययन भूगोल तथा खगोल विज्ञान दोनों में होता है। अतः भूगोल तथा खगोल विज्ञान में बहुत निकट का सम्बन्ध है।

2. गणित:-

        भूगोल में प्रदेशों की अवस्थिति और भौमिकीय स्थिति आदि का अध्ययन किया जाता है और इनको अंशों व कलाओं द्वारा व्यक्त करते हैं। इसके अतिरिक्त उस प्रदेश की भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रफल और प्रदेश की आकृति का भी भूगोल में अध्ययन किया जाता है, क्योंकि इन सभी तत्वों का प्रभाव मानवीय उन्नति पर होता है। उन तत्वों का अध्ययन गणित के अन्तर्गत होने से भूगोल का गणित के साथ सम्बन्ध रहता है।

       मानव की अर्थव्यवस्था जैसे-कृषि, निर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार, वाणिज्य आदि में सेवा केन्द्रों तथा नगरों की अवस्थिति विश्लेषण में, मात्राकरण और योजनाकरण में गणित की क्रियाएँ सम्मिलित रहती हैं। अतः भूगोल और गणित के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

3. भौमिकी:-

      प्रदेशों की भू-आकृतियों का जैसे पर्वतों, मैदानों, घाटियों आदि का मानव की क्रियाओं और निवास से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक संसाधनों में खनिज पदार्थों का भी प्रमुख स्थान होता है। इसलिए भूगोल में इन दोनों तत्वों अर्थात् भूमि की रचना और भू-आकृति तथा शैलों और खनिज पदार्थों का विशिष्ट अध्ययन होता है। भू-आकृतियों, शैलों और खनिज पदार्थों का विशिष्ट अध्ययन भौमिकी का भी विषय है। इसलिये भौमिकी और भूगोल के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

4. ऋतु विज्ञान और जलवायु विज्ञान:-

           किसी क्षेत्र में मनुष्य के भोजन, वस्त्र, आवास आदि का क्या रूप होगा, वहाँ कौन सी फसलें उग सकेगा और कहाँ पर अधिक स्वास्थ्यपूर्ण तथा सुविधाजनक जीवन व्यतीत कर सकेगा- इन सब बातों को निश्चित करने में मुख्य भूमिका होती है।

            मनुष्य की दैनिक क्रियाओं को ऋतुएँ प्रभावित करती हैं। जलवायु जलवायु अनुरूप ही विभिन्न प्रदेशों की वनस्पति और जीव-जन्तु होते हैं। भूगोल के अध्ययन में ऋतु की जलवायु का विश्लेषण अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भूगोल का अध्ययन ऋतु और जलवायु के बिना अधूरा ही माना जाएगा। अतः कहा जा सकता है कि भूगोल का ऋतु विज्ञान और जलवायु विज्ञान से घनिष्ठ सम्बन्ध है।

5. मृत्तिका विज्ञान:-

            विश्व भर के मनुष्य अपना भोजन मिट्टी से ही पैदा करते हैं। सभी प्रकार की फसलें, सभी प्रकार के फल मिट्टी में ही पैदा होते हैं। माँसाहारी मनुष्य जिन पशुओं और पक्षियों के माँस का सेवन करते हैं वे पशु भी मिट्टी से उगने वाली घास और फलों से ही अपना भोजन ग्रहण करते हैं। अतः सभी मनुष्यों का भोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से ही प्राप्त होता है। कम उपजाऊ मिट्टी को मनुष्य खाद आदि के प्रयोग से उपजाऊ बनाता है और कृषि फसलों में हेरफेर की पद्धति को अपना कर और अन्य प्रकारों से मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखता है।

           विभिन्न प्रकार की कृषि फसलों के लिए विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ या खाद की आवश्यकता होती है। भोजन सामग्री और कच्चा माल उत्पन्न करने वाली मिट्टियों का अध्ययन भूगोल का भी विषय है। अतः भूगोल और मृत्तिका विज्ञान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

6. भूगोल और जल विज्ञान तथा समुद्र विज्ञान:-

            प्रमुख प्राकृतिक संसाधन जल का महत्व सिर्फ मनुष्य के पीने के लिए ही नहीं है, वरन् सिंचाई एवं विद्युत् पैदा करने के लिए भी जल एक अनिवार्य साधन है। किसी देश-प्रदेश के सिंचाई साधनों तथा जलशक्ति की समता और विकास का अध्ययन मानव भूगोल में होता है, इसलिये इसका सम्बन्ध जल विज्ञान से हैं। समुद्री तटों और समुद्री पत्तनों का महत्व, मछुआराओं तथा समुद्री परिवहन और व्यापार के लिये कितना है, यह सभी को ज्ञात हैं। बन्दरगाहों और समुद्री परिवहन पर ज्वार-भाटे और धाराओं का प्रभाव पड़ता है। चूँकि भूगोल में भी समुद्र ज्वार-भाटा, बन्दरगाहों आदि का अध्ययन किया जाता है। अतः भूगोल और जल विज्ञान तथा समुद्र विज्ञान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

7. भूगोल और वनस्पति विज्ञान:-

              मानव जीवन में वनस्पति का महत्वपूर्ण स्थान है। वनों से केवल मकान बनाने की लकड़ी और जलाने का ईंधन ही नहीं मिलता, वरन् कल-कारखानों और उद्योगों के लिये कई प्रकार का कच्चा माल भी वनों से प्राप्त होता है। वन, बाढ़ और मिट्टी का कटाव रोकने में भी मदद करते हैं। प्राकृतिक वनस्पति का मानव जीवन से गहरा सम्बन्ध है। वनस्पतियों का अध्ययन भूगोल का मुख्य विषय है। अतः भूगोल और वनस्पति विज्ञान के बीच सम्बन्धों की घनिष्ठता को नकारा नहीं जा सकता।

8. भूगोल और जन्तु विज्ञान:-

            मनुष्य के जीवन में पशुओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। पशुओं से मनुष्य को दूध, माँस, ऊन, चमड़ा आदि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं और पशुओं को खेती करने, सामान ढ़ोने तथा यात्रा करने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त कुत्ता इत्यादि पशुओं को मनुष्य स्वामीभक्त पशुओं के रूप में पालता है। इस प्रकार मानव सभ्यता के आदिका से ही मनुष्य और पशुओं के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। चूँकि भूगोल और जन्तु विज्ञान दोनों ही पशुओं का अध्ययन करते हैं, अतः इनके बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।


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23. भूगोल में अल्फ्रेड हेटनर के योगदान 

23. भूगोल में अल्फ्रेड हेटनर के योगदान 


भूगोल में अल्फ्रेड हेटनर के योगदान 

अल्फ्रेड हेटनर

            अल्फ्रेड हेटनर (1859-1941) बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ जर्मन भूगोलवेत्ता था। उसने अपने समकालीन किसी भी अन्य भूगोलवेत्ता से अधिक मात्रा में भूगोल को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार पर स्थापित किया था। उसने भूगोल की एक प्रमुख अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन की, कई ग्रन्थ लिखें जिनमें मुख्य ग्रन्थ भूगोल के विधि-तंत्र और प्रादेशिक भूगोल पर थे। इसके अतिरिक्त हैटनर ने लगभग 30 व्यक्तियों को डॉक्ट्रेट की उपाधि के लिये अनुसंधान कराये थे।

         अलफ्रेड हेटनर की शिक्षा भूगोल में हुई थी। वह रेटजेल और रिचथोफेन का शिष्य था। वह हाईडिलबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था। ये मुख्यतः भौतिक भूगोलवेत्ता और प्रादेशिक भूगोलवेत्ता था। उसने बहुत-सी भौगोलिक यात्रायें की थीं। भौतिक भूगोल पर उसके बहुत से शोधपत्र प्रकाशित हुए थे, जो चार खण्डों में 1919 से आगे के वर्षों में छपे थे। उसकी यूरोप के भूगोल की पुस्तक 1907 में प्रकाशित हुई थी, इस पुस्तक का संशोधित संस्करण संसार के भूगोल के साथ 1923 में प्रकाशित हुआ था।

          हेटनर की विशेष ख्याति उसके भौगोलिक विधि तंत्र पर लिखे गये ग्रन्थ से हुई थी, जो 1927 में प्रकाशित हुआ था।

        हेटनर ने अपने लेखों में काण्ट द्वारा बतलाई गई भूगोल की परिभाषा का पुनरावर्तन किया था, और उस ढाँचे के अन्दर हम्बोल्ट, पेशेल, रेटजेल के द्वारा लिखे गये क्रमबद्ध अध्ययन को तथा रिटर, मार्थे, रिचथोफेन के द्वारा लिखे गये प्रादेशिक अध्ययनों को परस्पर सम्मिलित करके उसने भूगोल को एक सम्बद्ध पूर्ण विषय बना दिया था।

        हेटनर ने अपनी भौगोलिक पत्रिका 1895 में आरम्भ की थी। उस पत्रिका की प्रस्तावना में तथा उसके बाद 1898 में भूगोल का प्रोफेसर होने के आरम्भिक भाषण में, और उसके पश्चात् उसके द्वारा प्रकाशित की गई भौगोलिक विधि-तंत्र की पुस्तक में हेटनर की विचारधारा का प्रकाशन हुआ है।

        हेटनर के भौगोलिक विधि पर लिखे गये शोध-प्रबन्ध, जिनको वह विधि-विहार कहता था तथा जलवायु और उच्चावचन पर उसके विवेचन, आज भी भौगोलिक ज्ञान और प्रस्तुतिकरण के क्षेत्र में बड़े उच्चस्तरीय माने जाते हैं। उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका का लेखन-सम्पादन लग नियमित रूप से किया था। उसने सोवियत रूस के भूगोल पर 1905 में एक श्रेष्ठ पुस्तक प्रकाशित की थी। इसके अतिरिक्त हैटनर ने 1907 में यूरोप का भूगोल तथा 1915 में ब्रिटेन का मूल्यांकन छपवाया था।

        हेटनर ने अपनी भौगोलिक पत्रिका में पुस्तक के रूप में, अपने भूआकृतिक अध्ययन महाद्वीपों की स्थलाकृति और विश्व के सांस्कृतिक भूल की पुस्तकें प्रकाशित की थी।

संकल्पनाएँ:-

1. सामान्य भूगोल- भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है। विशिष्ट भूगोल गौण है।

2. भूगोल पृथ्वी की सतह का अध्ययन है। यह पृथ्वी के सतह के तथ्यों के क्षेत्रीय साहचर्य का अध्ययन करता है। क्षेत्रीय साहचर्य का अध्ययन भूगोल में प्रमुख है तथा प्रादेशिक भूगोल गौण है।

3. भूगोल कोरोलाजिकल विज्ञान है। यह विभिन्न क्षेत्रों के तथ्यों का समाकलित अध्ययन करता है जिसके बिना क्रमबद्ध विज्ञानों का अध्ययन अपूर्ण रहता है। इस दृष्टिकोण से ये कार्ल रिटर के विचारों से अधिक सामंजस्य रखते हैं।

क्रमबद्ध विज्ञान एवं भूगोल में अन्तर:-

             हेटनर ने क्रमबद्ध विज्ञानों तथा भूगोल में अन्तर को स्पष्ट करने का प्रयास किया। इन्होंने यह स्वीकार किया कि भूगोल पृथ्वी की सतह पर पाये जाने वाले तथ्यों के वितरण का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। लेकिन क्रमबद्ध विज्ञान भी तथ्यों के वितरण से सम्बन्धित है। वनस्पति शास्त्र अन्य बातों के साथ वनस्पति के प्रकारों का पृथ्वी की सतह पर वितरण भी देखता है। इसी तरह प्राणी विज्ञान पृथ्वी की सतह पर विभिन्न प्रजातियों के पशुओं के साहचर्य का अध्ययन करता है। भौगोलिक प्राणी-विज्ञान लेकिन पशुओं के किसी स्थान या क्षेत्र में उस क्षेत्र के अन्य सभी तथ्यों के साथ क्षेत्रीय साहचर्य का अध्ययन प्राणी भूगोल है।

           भूगोल पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय साहचर्य को देखता है। वह पृथ्वी की सतह के अन्य तथ्यों के साथ वनस्पति एवं पशुओं के साहचर्य का समकालीन दृष्टिकोण से अध्ययन करता है। इसके लिए वनस्पति अपने में अलग तथा पशु अपने में अलग विषय नहीं हैं, वरन् वे पृथ्वी की सतह की समष्टि के अंग हैं।

           इस तरह वनस्पतिशास्त्र एवं प्राणीशास्त्र जैसे क्रमबद्ध विज्ञानों से भूगोल अलग है। यह अन्तर भौगोलिक अन्तर्दृष्टि एवं भूगोल में समष्टि के समावेश के कारण होता है।

          हेटनर इसे और भी आगे ले जाते हैं। उनके अनुसार अर्थशास्त्र, मांग पूर्ति, आवश्यकता, उपभोग जैसे तथ्यों के किसी विशिष्ट तथ्य का वितरण भी देखता है। यह भौगोलिक अर्थशास्त्र हुआ। लेकिन किसी स्थान या क्षेत्र के अन्य तथ्यों के साहचर्य में स्थित हैं तथा जो उस स्थान या क्षेत्र को उसका वैशिष्ट्य प्रदान करते हैं वे आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत आते हैं। अत: मात्र किसी तथ्य विशेष के वितरण के अध्ययन से या उसे मानचित्र पर प्रदर्शित करने से सम्बन्धित विषय भूगोल को अपने में समाहित करने का दावा नहीं कर सकता। वस्तुतः वह विषय स्वयं वितरण के अध्ययन से भूगोल की विधि का अनुसरण कर अपने दृष्टिकोण को विस्तृत करता है।

भूगोल क्रमबद्ध विज्ञानों की जननी है:-

              हेटनर ने भूगोल की जर्मन विचारधारा का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए सिद्ध किया कि कैसे भूगोल ने शुद्ध विज्ञानों को जन्म दिया। हेटनर के अनुसार भूगोल (अर्डकुंडे) पृथ्वी का विज्ञान नहीं है जैसा कि रिटर ने कहा था। भू-विज्ञान का अध्ययन अनेक विषयों के क्षेत्र में आता है जैसे भू-भौतिकी, भू-रसायन, खगोलशास्त्र, वनस्पति, पशु जगत आदि। ये सब विज्ञान आज स्वतंत्र शाखाओं के रूप में स्थापित हैं किन्तु इनका जन्म भूगोल से हुआ है। भूगोल पृथ्वी की सतह के तथ्यों का पृथ्वी की ब्रह्माण्ड में स्थिति का अध्ययन करता है। मनुष्य की जानकारी बढ़ने पर विभिन्न तथ्यों का स्वतंत्र रूप से अध्ययन होने लगा। इस अध्ययन की भूमिका भूगोल की देन है।

             हेटनर ने रियोफेन की तरह भूगोल की “अर्डीबर लेशन कुण्डे’ कहने से भी असहमति व्यक्त की। उनके अनुसार भूगोल पृथ्वी की सतह का अध्ययन महाद्वीपीय स्तर पर, क्षेत्रीय स्तर पर या स्थानीय स्तर पर करता है। वह पृथ्वी की सतह के तथ्यों को स्थानिक विन्यास क्रम के रूप में देखता है। भूगोल न तो क्रमबद्ध विज्ञानों की तरह वर्गीकृत तथ्यों का अलग-अलग अध्ययन करता है, न मानवीय घटनाओं को इतिहास की तरह कालक्रम में देखता है। यह तो पृथ्वी की सतह के तथ्यों के साहचर्य के वैभिन्य का अध्ययन करता है।

भौतिक जगत के छः परिमण्डल:-

            हेटनर ने भी अपने पूर्ववर्ती जर्मन विद्वानों की तरह पृथ्वी को छः परिमण्डलों में विभाजित मानते हैं, यथा-

1. भूमि,

2 जल,

3. वायुमण्डल,

4. वनस्पति,

5. पशु

6. मनुष्य

        इन छः परिमण्डलों के किसी क्षेत्र में पाये जाने वाले साहचर्य का इन परिमण्डलों के स्थानिक अन्तर्सम्बन्ध एवं कारण-कार्य सम्बन्ध के सन्दर्भ में देखा जाता है।

भूगोल प्राकृतिक एवं मानव विज्ञान के रूप में :-

                हेटन भूगोल को मात्र प्राकृतिक विज्ञान के रूप में भी देखते हैं। उनके अनुसार ‘कोरोलाजिकल’ अध्ययन में मनुष्य का स्थान नहीं है। इसमें मात्र पृथ्वी सतह के प्राकृतिक तथ्य आते हैं। मनुष्य इसके अध्ययन का फोकस नहीं है। यहाँ उन्होंने जीन ब्रून्स (फ्रान्स) की भू-दृश्य की संकल्पना की आलोचना की।

          इनके अनुसार ‘कोरोलाजी’ में अध्ययन को दो भागों में बाँट सकते हैं-

(अ) तंत्र के रूप में- इसके अन्तर्गत भौगोलिक संश्लिष्टों एवं तन्त्रों का अध्ययन होता है जैसे नदी बेसिन, वायुमण्डल, व्यापार, प्रभाव प्रदेश आदि।

(ब) कारण-कार्य अन्तर्सम्बन्ध- इसके अन्तर्गत स्थानिक रूप से व्यवस्थित विभिन्न तथ्य समुच्चयों के बीच कार्य-कारण सम्बन्ध को देखा जाता है।

            इसका अर्थ यह नहीं है कि हेटनर भूगोल में मनुष्य के महत्व को नकारते थे। ‘उन्होंने मनुष्य का भूगोल’ शीर्षक से तीन खण्डों की एक पुस्तक भी लिखी है जिसमें मनुष्य के आर्थिक क्रिया-कलापों एवं परिवहन की भी चर्चा है। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि हम पृथ्वी की सतह का अध्ययन बिना मनुष्य को सम्मिलित किये उसके स्थूल रूप में भी कर सकते हैं। हेटनर यह भी मानते थे कि पृथ्वी की सतह का अध्ययन क्रमबद्ध विज्ञान अलग-अलग मिलकर करें तब भी नहीं कर सकते। बिना भौगोलिक अध्ययन के जिसमें क्षेत्रीय साहचर्य को समझाने का गुण है, पृथ्वी की सतह का पूरा ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता।


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22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त




मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

मेकिण्डर

            1861 में जन्में मेकिण्डर ने ग्रेट ब्रिटेन में भूगोल की सुदृढ़ स्थापना की और अपने भौगोलिक विचारों से विश्व भूगोल को प्रभावित किया।

       मेकिण्डर अपने समय के बड़े प्रभावशाली भूगोलवेत्ता रहे हैं जिनका भूगोल एवं राजनीति में पूरा-पूरा दखल था। इस तरह भूगोल के व्यावहारिक पक्ष को क्रियान्वित करने में इनकी प्रमुख भूमिका रही है। इन्होंने न केवल विश्व मंच की घटनाओं के संचालन में भूगोल के ज्ञान की सार्थकता सिद्ध की वरन् यह भी उदाहरण प्रस्तुत किया कि कैसे भूगोलवेत्ता संसार की समस्याओं को सुलझाने में व्यावहारिक योगदान दे सकता है।

       इन्होंने भूगोल को इतिहास के शिकंजे से उबारा। ज्ञातव्य है कि पूर्व काल में वस्तुतः रिटर महोदय द्वारा भूगोल को इतिहास का विषय वस्तु बना दिया गया था। मेकिण्डर ने भूगोल के स्वंत्रत अस्तित्व का प्रतिपादन किया तथा सिद्ध किया कि भौगोलिक पृष्ठभूमि ही इतिहास को प्रभावित करती है।

      मेकिण्डर ने ऐतिहासिक भूगोल का गम्भीर अध्ययन करके 1902 में एक पुस्तक ‘ब्रिटेन और ब्रिटिश सागर’ प्रकाशित की थी। उसका यह ग्रंथ बहुत समय तक ब्रिटिश भूगोल का एक प्रथम वर्गीय श्रेष्ठ ग्रन्थ माना जाता रहा था। इस ग्रन्थ में ब्रिटिश भूगोल के मूल सिद्धांतों का संक्षिप्त रूप बड़े कौशल से दिया गया है। मेकिण्डर का यह ग्रन्थ उसके विस्तृत अध्ययन और गंभीर विचारों पर आधारित था, जिसमें इस पृष्ठभूमि से संबंधित ब्रिटेन के इतिहास की समीक्षा दी हुई थी।

       ऐतिहासिक भूगोल पर लिखे गये एक अन्य निबन्ध से मैकिण्डर को इतनी ख्याति प्राप्त हुई जिसकी कभी आशा नहीं थी। 1904 में उसने ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी’ की बैठक में एक निबन्ध पढ़ा जिसका शीर्षक था “इतिहास का भौगोलिक धुराग्र” (हृदय स्थल सिद्धान्त)उस निबंध के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित थे।:-

(1) समुद्री (यात्राओं का) युग बीत चुका है, अब थल का कोई बड़ा भाग अन्वेषण द्वारा खोज निकालना शेष नहीं रहा है।

(2) भविष्य में, थल-शक्ति निर्णायक होगी, क्योंकि अब संसार के सभी भाग इतने समीपस्थ हो गये हैं कि महाशक्तियों के बीच होने वाली लड़ाई के विश्वव्यापी प्रभाव होंगे।

(3) सबसे बड़ा थल-खण्ड पुरानी दुनिया में है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों का सम्मिलित थलखण्ड ‘पुरानी दुनिया’ कहलाता है। इसके केन्द्रीय भाग का एक बड़ा भूराजनीतिक महत्व है। इसके हृदय भाग में महाद्वीपीय तथा आर्कटिक जल-प्रवाह वाला एक ऐसा विशाल क्षेत्र है, जो समुद्री शक्ति को पहुँच से पूर्णत: बाहर है। संक्षेपतः यह थल-खण्ड घास स्थल-स्टेपी तथा मरूस्थल है जो घुड़सवार और ऊँटसवार खानाबदोशों का निवास-स्थल रहा है तथा इन खानाबदोशों के आक्रमण सीमावर्ती स्थाई बस्तियों के देशों पर सारे इतिहास भर में लगातार होते रहे हैं।

(4) इस क्षेत्र के स्वरूप में बड़ी तेजी से आमूल परिवर्तन हो रहा है। महाद्वीप के आर-पार जाने वाले रेल मार्गों के निर्माण और उपनिवेशन के आधार पर वहाँ एक शक्ति का सृजन हो रहा है; और वह शक्ति, आन्तरिक मार्गों पर सत्ताधारी होने के कारण, संसार को केन्द्रीय युद्धनीतिक स्थिति को प्राप्त करती रही है।

(5) इस हृदय स्थल के बाहरी भाग में सीमावर्ती महाद्वीपीय राज्यों की एक आन्तरिक अर्द्ध रचनाकार पेटी और उसके परे एक बाहरी अर्द्ध चन्द्राकार पेटी है, जिसमें समुद्रपारीय (समुद्र के पा) शक्तियाँ ब्रिटेन, संयुक्त राज्य, जापान इत्यादि स्थित है।

(6) यदि शक्ति संतुलन इस घुराग्र-राज्य के अत्यधिक अनुकूल हो जाता है तो उसके परिणामस्वरूप उस शक्ति का प्रसार यूरोप-एशिया के सीमावर्ती थल-क्षेत्रों पर हो जायेगा, जिससे इस शक्ति को महासागरीय बेड़ों के निर्माण करने के लिये विस्तृत महाद्वीपीय साधनों का प्रयोग करने की छूट मिल जायेगी और तब संसार का साम्राज्य दृष्टिगोचर होगा। यदि जर्मनी अपनी मित्रता रूस के साथ कर ले तब ऐसा हो जायेगा।

(7) इस धमकी के विरूद्ध, समुद्रपारीय शक्तियों को अपने पुल-पदाधार सैन्य मोरचे फ्रांस, इटली, मिस्र, भारत और कोरिया में बनाये रखने चाहिये, जो धुराग्र मित्रों को अपनी थलीय शक्ति का विकास करने पर बाध्य करेंगे और उनको महासागरीय बेड़े रखने पर ध्यान केन्द्रित करने से रोकेंगे।

       मेकिण्डर की हृदय स्थल की विचारधारा का विकसित रूप उसी पुस्तक लोकतंत्रीय आदर्श और यथार्थता में प्रथम महायुद्ध के पश्चात 1919 में प्रकाशित हुआ था। उसने देखा कि उस युद्ध की उत्पत्ति इस कारण से हुई थी, कि जर्मनी ने रूसी हृदय-स्थल को संसार पर प्रभुत्व जमाने के लिए, प्रयोग करने का प्रयत्न किया था। क्योंकि उस थल-शक्ति ने मित्र राष्ट्रों के जहाजी बेड़ों को बाल्टिक सागर तथा काला सागर में आने से रोक दिया था, इसलिए मेकिण्डर ने अपने हृदय स्थल के क्षेत्र को बढ़ाकर उसमें पूर्वी यूरोप को भी सम्मिलित कर लिया था। यह उसका संसार द्वीप का सिद्धान्त था। उसने एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका के सम्मिलित महाद्वीप यूरेअफ्रेशिया को संसार-द्वीप का नाम दिया था।

         इस संसार द्वीप की विचारधारा में थलीय और समुद्री शक्तियों का तुलनात्मक-पूरक दृष्टिकोण रखा गया था।

      मेकिण्डर ने यह प्रस्ताव किया था कि जर्मनी और रूस के बीच एक स्वतंत्र राज्यों की पेटी बना दी जानी चाहिए। उसका प्रस्ताव यह भी था कि पेलेस्टाइन, सीरिया, मेसोपोटामिया, बोसफोरस, डारडेनलीज तथा बाल्टिक सागर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो जाना चाहिए, तथा भारत और चीन को हृदय स्थल के आक्रमण से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पुरानी दुनिया के केन्द्रीय भाग के इस ‘ह्रदय स्थल’ सिद्धान्त के भूराजनीतिक महत्व से मेकिण्डर को बड़ी ख्याति प्राप्त हुई।

         वायुयान-यात्रा की बहुत अधिक उन्नति हो जाने पर मेकिण्डर के हृदय स्थल सिद्धान्त का महत्व गिर गया है। इस वायुयान युग में मेकिण्डर द्वारा बतलाये गये हृदय स्थल के बजाय उत्तरी ध्रुव का महत्व बढ़ गया है। अब तो आर्कटिक क्षेत्र ही नया या आधुनिक हृदय स्थल बन गया हैं। इस वायुयान युग में उत्तरी ध्रुव की केन्द्रीय स्थिति है, जिसके चारों ओर यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका स्थिति हैं।

     आर्कटिक वृत के चारों ओर स्थित इस आधुनिक हृदय स्थल में केवल जर्मनी और यूरोपीय रूस ही नहीं, वरन् समस्त उत्तरीय यूरोप, सोवियत संघ, उत्तरी चीन, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका का आन्तरिक भाग भी सम्मिलित है। इसमें दो महान् शक्तियाँ सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं। महासागरीय युग में इन राष्ट्रों के बीच विशाल महानगर थे, और नाविक शक्ति द्वारा दोनों एक-दूसरे की पहुँच से बाहर थे, परन्तु वायुयान युग में सोवियत संघ और उत्तरी अमेरिका दोनों उत्तरी ध्रुव के मार्ग से एक दूसरे के सम्मुख स्थित हो गये हैं।

       वर्तमान युग तो परमाणु-युग है, जिसमें प्रक्षेपास्त्रो और रॉकेटों के प्रयोग ने मेकिण्डर के हृदय स्थल (Heartland) सिद्धान्त का महत्व और भी कम कर दिया है।  

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

 

 


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