8. Biotic Resources / जैविक संसाधनों
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Biotic Resources जैविक संसाधनों |
Conservation and Management of Resources with special reference to: (b) Biotic Resources
परिचय:
प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources) मानव जीवन के आधार हैं, जिनमें जैविक (Biotic) एवं अजैविक (Abiotic) दोनों प्रकार के संसाधन शामिल होते हैं। वर्तमान समय में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण इन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। विशेष रूप से जैविक संसाधनों (Biotic Resources) का संरक्षण एवं प्रबंधन अत्यंत आवश्यक हो गया है, क्योंकि ये जीवन के अस्तित्व और पारिस्थितिक संतुलन के लिए अनिवार्य हैं।
जैविक संसाधनों (Biotic Resources) का अर्थ:
जैविक संसाधन वे संसाधन हैं जो जीवित स्रोतों से प्राप्त होते हैं, जैसे वनस्पति, वन्यजीव, पशुधन, मछलियाँ एवं सूक्ष्मजीव। ये संसाधन न केवल मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, बल्कि पारितंत्र के संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जैविक संसाधनों का महत्व:
जैविक संसाधन मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, क्योंकि ये भोजन, वस्त्र, औषधि और कच्चा माल प्रदान करते हैं। ये पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने, जलवायु नियंत्रण तथा जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनस्पति और वन्यजीव पारितंत्र को स्थिर रखते हैं तथा प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करते हैं। इसके अलावा, ये आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर भी प्रदान करते हैं, जिससे सतत विकास संभव होता है।
जैविक संसाधनों का संरक्षण (Conservation of Biotic Resources):
जैविक संसाधनों का संरक्षण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वनस्पति, वन्यजीव, मछलियाँ और अन्य जीवित संसाधनों को सुरक्षित रखा जाता है, ताकि उनका सतत उपयोग संभव हो सके। इसका मुख्य उद्देश्य जैव विविधता की रक्षा करना तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना है।
संरक्षण के दो प्रमुख तरीके हैं- In-situ और Ex-situ।
In-situ संरक्षण में प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है, जैसे राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य। वहीं Ex-situ संरक्षण में प्रजातियों को कृत्रिम वातावरण में सुरक्षित रखा जाता है, जैसे चिड़ियाघर और बॉटनिकल गार्डन।
इसके अतिरिक्त वनीकरण, पुनर्वनीकरण, अवैध शिकार पर नियंत्रण, प्रदूषण में कमी तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी जैसे उपाय भी महत्वपूर्ण हैं। प्रभावी संरक्षण से न केवल प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा होती है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
भारत में प्रमुख संरक्षण प्रयास
भारत में जैविक संसाधनों के संरक्षण के लिए अनेक महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। वन्यजीव संरक्षण हेतु Project Tiger (1973) शुरू किया गया, जिससे बाघों की संख्या में वृद्धि हुई। इसी प्रकार Project Elephant (1992) के माध्यम से हाथियों के संरक्षण पर ध्यान दिया गया।
इसके अलावा, राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य एवं बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना की गई है, जो जैव विविधता को सुरक्षित रखने में सहायक हैं। जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत संसाधनों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग को बढ़ावा दिया गया है।
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) के माध्यम से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल किया गया है। साथ ही, राष्ट्रीय वन नीति के अंतर्गत वन क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इन सभी पहलों से भारत में जैविक संसाधनों के संरक्षण को मजबूती मिली है।
जैविक संसाधनों का प्रबंधन (Management of Biotic Resources):
जैविक संसाधनों का प्रबंधन उन रणनीतियों एवं उपायों को संदर्भित करता है जिनके माध्यम से वनस्पति, वन्यजीव, मछलियाँ और अन्य जीवित संसाधनों का संरक्षण तथा सतत उपयोग सुनिश्चित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखना है।
इसके अंतर्गत सतत उपयोग (Sustainable Use) को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे संसाधनों का अति-दोहन न हो। वन प्रबंधन के लिए वनीकरण, पुनर्वनीकरण एवं संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। वन्यजीव संरक्षण हेतु संरक्षित क्षेत्र जैसे राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य बनाए जाते हैं। इसके साथ ही, स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे संरक्षण कार्य अधिक प्रभावी बन सके।
आधुनिक तकनीक जैसे GIS एवं Remote Sensing का उपयोग संसाधनों की निगरानी और योजना निर्माण में सहायक होता है। इस प्रकार, प्रभावी प्रबंधन से पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता को बनाए रखा जा सकता है।
प्रमुख चुनौतियाँ:
(i) जनसंख्या वृद्धि का दबाव: बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन, आवास और संसाधनों की मांग बढ़ती है, जिससे जैविक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
(ii) वनों की कटाई (Deforestation): कृषि विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण वन क्षेत्र घट रहे हैं, जिससे जैव विविधता को नुकसान होता है।
(iii) अति-दोहन (Overexploitation): मछली पकड़ने, शिकार और लकड़ी कटाई जैसे कार्यों से संसाधनों का असंतुलित उपयोग होता है।
(iv) प्रदूषण: वायु, जल और भूमि प्रदूषण से जीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित होते हैं और पारितंत्र का संतुलन बिगड़ता है।
(v) जलवायु परिवर्तन: तापमान वृद्धि, वर्षा में अनियमितता और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएँ जैविक संसाधनों को प्रभावित करती हैं।
(vi) अवैध शिकार एवं तस्करी: वन्यजीवों का अवैध शिकार और व्यापार कई प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बन रहा है।
(vii) नीतियों का कमजोर क्रियान्वयन: कानून और नीतियाँ होने के बावजूद उनका प्रभावी पालन नहीं हो पाता।
(viii) जागरूकता की कमी: स्थानीय लोगों में संरक्षण के प्रति जागरूकता का अभाव भी एक बड़ी चुनौती है।
(ix) मानव-वन्यजीव संघर्ष: वन क्षेत्रों के सिकुड़ने से मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है।
सुधार के उपाय:
- सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों को अपनाकर संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना।
- वनीकरण एवं पुनर्वनीकरण कार्यक्रमों को बढ़ावा देकर वन क्षेत्र का विस्तार करना।
- अवैध शिकार एवं तस्करी पर सख्त कानून लागू कर प्रभावी नियंत्रण करना।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाकर संरक्षण कार्यों को मजबूत बनाना।
- पर्यावरण शिक्षा एवं जागरूकता कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना।
- आधुनिक तकनीक (GIS, Remote Sensing) का उपयोग कर निगरानी एवं प्रबंधन को सुदृढ़ करना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने हेतु ठोस नीतियाँ अपनाना।
- केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करना।
निष्कर्ष:
जैविक संसाधनों का संरक्षण एवं प्रबंधन वर्तमान समय की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यह न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि मानव जीवन के अस्तित्व के लिए भी अनिवार्य है। यदि संसाधनों का सतत एवं विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए, तो हम विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं। अतः भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित एवं समृद्ध पर्यावरण सुनिश्चित करने हेतु प्रभावी नीतियों और जनभागीदारी की आवश्यकता है।
