Category GEOGRAPHY OF INDIA(भारत का भूगोल)

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

         दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी० है। इसका आकार एक  त्रिभुज के समान है। यह 1600 km हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750मी० मानी गयी है।

           प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल तथा गारो, खाँसी और जयन्तिया पर्वत सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करते हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे पठारों का पठार भी कहा जाता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषताएँ                

     प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेंजिया के चट्टानें पायी जाती है। प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषता का अध्ययन नीचे किया जा रहा है।

(i) दक्षिण भारत को जिसके चतुर्दिक मैदानी भूभाग है। भूगर्भवेताओं ने इसे प्रायद्वीपीय भारत से संबोधित किया है। जबकि इसके बाहर वाले क्षेत्र को अतिरिक्त प्रायद्वीपीय भारत (Extra peninsular India, प्रायद्वीपेत्तर भारत) से संबोधित किया है।

(ii) प्रायद्वीपीय भारत प्राचीनतम दृढ भूखण्डों से निर्मित है। इसका निर्माण मूलतः पृथ्वी की गैसीय अवस्था से ठोस अवस्था में परिणत होने की प्रक्रिया से जुड़ा है।

(iv) सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत समप्राय सतह का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस सतह पर मोनैडनॉक, शंकु पहाड़ी, वलित पर्वत, ब्लॉक पर्वत, अवशिष्ट पहाड़ी, भ्रंश घाटी, ज्वालामुखी उदगार, उबड़-खाबड़ भूमि इत्यादि का प्रमाण मिलता है।

(v) दक्षिण भारत प्रायद्वीप के रूप में क्रिटेशियस कल्प में बना क्योंकि गोंडवाना लैण्ड में भ्रंशन की क्रिया से अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अण्टार्कटिका महाद्वीप विलग हो गये।

(vi) प्रायद्वीपीय भारत के मूल या मौलिक चट्टानों का निर्माण आर्कियोजोइक महाकल्प में हुआ था। इस महाकल्प के चट्टानों में ग्रेनाइट और नीस प्रकार के चट्टान मिलते हैं। इन चट्टानों के रूपान्तरण से शिष्ट एवं चारकोनाइट चट्टानों का निर्माण हुआ है।

(vii) प्रायद्वीपीय भारत अधिकांश क्षेत्र कभी भी समुद्र के अन्दर नहीं गया है। प्रायद्वीपीय भारत को ‘भूकम्प रहित क्षेत्र’ माना जाता है। इस पर दीर्घकालिक अपरदन के कारण चट्टानों के जब‌ड़दस्त अपरदन हुआ है।

(viii) कर्नाटक, उड़ीसा, तमिलनाडु इत्यादि में धाड़वाड़ की चट्टानें मिलती है जो प्राचीनतम परतदार चट्टानों का उदाहरण है। यह धात्विक ‘खनिजों’ के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(ix) प्रायद्वीपीय भारत में कुडप्पा एवं विन्ध्यन क्रम की कई चट्टानें मिलती है। इस क्रम की चट्टानों में चुना पत्थर और  बलुआ पत्थर की चट्टानें सबसे प्रमुख है।

(x) कार्बोनीफेरस कल्प में आये हिमयुग का प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इनका प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इसका प्रमाण दामोदरी, महानदी, गोदावरी नदी घाटी में देखा जा सकता है।

(xi) प्रायद्वीपीय भारत का दक्षिणी भूभाग दक्कन का पठार कहलाता है। इसका निर्माण क्रिटेशियस कल्प में हुए ज्वालामुखी उद्‌गार से हुआ है। क्रिटेशियस कल्प में दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन की क्रिया होने के कारण भूगर्भ से क्षारीय प्रकार की लावा बड़े पैमाने पर बाहर की ओर निकला जो फैलकर एवं ठण्डा होकर दक्कन के पठार का निर्माण किया। आज इसी लावा के ऋतुक्षरण से दक्कन के पठार पर काली मिट्टी का प्रमाण मिलता है।

        क्रिटेशियस कल्प में कुछ केन्द्रीय उद्‌गार भी हुए थे जिससे छोटे-2 शंकु पहाड़ियों का भी निर्माण हुआ है। इनके मुख से जब लावा निकलना बंद हो गया तो अनेक क्रेटर और कॉल्डेरा का निर्माण हुआ है। इसी क्रेटर और कोल्डेरा में जल के जमाव से दक्षिण भारत में अनेक तालाबों का विकास हुआ है।

(xii) प्रायद्वीपीय भारत की संरचना पर भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। जैसे- भूसंचलन के ही कारण नर्मदा, ताप्ती और दामोदर नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है। सतपुड़ा जैसे ब्लॉक पर्वत का निर्माण हुआ है। यहाँ तक की पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल धँसकर तीव्र ढाल का निर्माण करती है।

(xiii) कार्बोनिफेरस कल्प में हुए भूसंचलन के कारण सतह पर स्थित वनस्पति भूगर्भ के अंदर दब गये जिसके कारण कोयला जैसे संरचना का निर्माण हुआ है।

(xiv) विगत 20 करोड़ वर्ष से पठारीय भारत में कोई नवीन भूगर्भिक संरचना का विकास नहीं हुआ है। केवल 7 करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के निर्माण हो रहा था तो उस वक्त प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में केवल उत्थान का प्रमाण  मिलता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संर

चित्र: प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

        इस तरह स्पष्ट है कि प्रायद्वीपीय भारत जटिल भूगर्भिक संरचना रखने वाला एक भूखण्ड है।

प्रश्न प्रारूप 

1. प्रायद्वीपीय भात की संचना का संक्षिप्त रूप में चर्चा करें।

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

       10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र


उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

              प्रायद्वीपीय पठार और हिमालय के बीच ‘उत्तर भारत का विशाल मैदान’ अवस्थित है जिसका क्षेत्रफल 7.5 लाख वर्ग किमी० है। उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र मूलत: उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत, पश्चिम में किर्थर और सुलेमान तथा पूरब में पूर्वांचल हिमालय से घिरा हुआ है। भारतीय क्षेत्र में इसकी लम्बाई 2400 km है। पश्चिम में इसकी चौ० लगभग 500Km और पूरब में 150km है।

उत्तर भारत का विशाल

चित्र: उत्तर भारत का विशाल मैदान

        यह मैदान मूलत: सिन्धु, गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र नदी और उनके सहायक नदियों द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से बना है। उत्तर के मैदानी क्षेत्र को कई भौगोलिक इकाई में वर्गीकृत कर अध्ययन किया जा सकता है। जैसे-

(A) सिन्धु सतलज का मैदान

(B) थार मरुस्थलीय क्षेत्र

(C) गंगा-यमुना का मैदान

(D) ब्रह्मपुत्र का मैदान

(A) सिन्धु-सतलज का मैदान

          इसे “पंजाब का मैदान” भी कहते हैं। इसका निर्माण सिन्धु और उसके पाँच सहायक नदी जैसे- सतलज, व्यास, चिनाब, रावी, झेलम नदी के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से बना है।

       पंजाब के मैदान का विस्तार भारत के पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में हुआ है। इस क्षेत्र की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 200m से भी कम है। इसका निर्माण प्लोस्टोसीन कल्प में हुआ है। इस क्षेत्र में कहीं-कहीं शुष्क नदियाँ और शुष्क क्षारीय झील पायी जाती हैं जिसे स्थानीय लोग “धांड़” के नाम से जानते हैं। कहीं-2 पुराने नदियों के सँकरे घाटी का प्रमाण मिलता है जिसे स्थानीय लोग ‘घोरोस’ या ‘तल्ली’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदानी क्षेत्र में कई नदी-दोआब का विकास हुआ है। यहाँ दोआब का तात्पर्य दो नदियों के बीच वाला क्षेत्र से है। कुछ दोआब के उदाहरण निम्नलिखित है:-

(1) बिस्त दोआब (व्यास और सतलज)

(2) बारी दोआब (व्यास और रावी)

(3) रचना दोआब (रावी और चिनाव)

(4) चाझ दोअब (चिनाव और झेलम)

(5) सिन्धु सागर दोअब (सिन्धु, चिनाव और झेलम)

       सिन्धु की सहायक नदियाँ जब शिवालिक पर्वत को पार करती है तो उसे कई जगह अपरदन कर काट डालती है। इस कटे हुए भूभाग को स्थानीय लोग ‘चो’ कहते हैं। इस मैदान में नदियाँ जब आगे की ओर बहती हैं तो अपने किनारे को काटकर ‘ब्लफ’ का निर्माण करती है। स्थानीय लोग ब्लफ को ‘धाया’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदान का ढाल मूलत: उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। इस तरह स्पष्ट है कि सिन्धु सतलज का मैदान की एक अलग पहचान है। इसकी पहचान का दूसरा कारण उर्वर भूमि पर बड़े पैमाने पर कृषि कार्य किया जाना है। इस मैदान को ‘अन्न  के भण्डार’ नाम से सम्बोधित करते हैं।

(B) थार मरुस्थल

         यह भारत के उत्तर के मैदान का ही एक भाग है। थार मरुस्थल का विस्तार भारत और पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसकी लम्बाई 640 km और चौड़ाई 160 km है। अरावली पर्वत के दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर की ओर स्थित होने के कारण यह प्रदेश शुष्क क्षेत्र में बदल चुका है। इस क्षेत्र में सरस्वती नदी कभी मुख नदी के रूप में प्रवाहित होती थी। लेकिन, अब मरुस्थलीय वातावरण के कारण यह विलुप्त हो चुकी है। इस क्षेत्र का ढाल दक्षिण-पक्षिम की ओर है।

         थार मरुस्थलीय क्षेत्र मिसोजोइक कल्प तक अरब सागर में डूबा हुआ था। होलोसीन कल्प के प्रारंभ में हुए भूसंचलन के कारण अरब सागर का उत्तरी भाग ऊपर की ओर उठ गया और दक्षिण वाला भाग धँस गया जिसके कारण उत्तर का जल दक्षिण की ओर प्रवाहित हो जाने से समुद्री भूखण्ड ऊपर की ओर आ गये। आज भी इस क्षेत्र में खारे पानी की कई झीलों का प्रमाण मिलता है। जैसे- साँभर झील, डीडवाना झील, पिछौला झील (उदयपुर)।

         शुष्क प्रदेश के कारण चट्टानों के ऋतुक्षरण से बालू का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है। इस क्षेत्र में बरखान, गारा, बालुका स्तूप जैसे कई मरुस्थलीय स्थलाकृति मिलते हैं। छोटी-2 नदियों के द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से निर्मित मैदान को स्थानीय लोग ‘रोही’ के नाम से सम्बोधित करते हैं।

(C) ब्रह्मपुत्र का मैदान

          इसका विस्तार भारत के उत्तरी-पूर्वी भाग में हुआ है। इसका विस्तार उत्तर में हिमालय, दक्षिण में गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी, पूरब में पटकोईबुम की पहाड़ी तथा पश्चिम में तिस्ता नदी के मध्य हुआ है।

          यह मैदान असम के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। यह मैदान मूलत: ब्रह्मपुत्र और उसके सहायक नदी जैसे दिहांग, बराक, धनश्री, सुवर्णश्री और तिस्ता नदी के द्वारा लायी मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान मूलत: रैम्प घाटी में अवस्थित है। इसका निर्माण कार्य आज भी चल रहा है। भारत का आज भी यह बाढ़ प्रभावित इलाका है। इसका ढाल पूरब से पश्चिम की ओर है। बंगलादेश में इसकी ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 50m से 200m हो जाती है।

         कम ऊँचाई होने के कारण जगह-2 दलदली भूमि का विकास हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी अपने मार्ग में विश्व की सबसे बड़ी नदी द्वीप माजुली का निर्माण करती है।

(D) गंगा-यमुना का मैदान

             गंगा-यमुना के मैदान का विस्तार भारत के उत्तरी भाग में हुआ है। इसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल, पूरब में राजमहल की पहाड़ी और पश्चिम में अरावली की पहाड़ी है। इस मैदान में गंगा नदी रीढ़ की हड्‌डी के समान प्रवाहित होती है। हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियाँ गंगा नदी में ही आकर मिलती है। इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। यह समुद्रतल से 0-300m ऊँचा है। गंगा नदी इस मैदान को दो भागों में बाँट डालती है।- प्रथम उत्तरी गंगा का मैदान और द्वितीय दक्षिणी गंगा का मैदान।

           उत्तरी गंगा के मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है जबकि दक्षिणी गंगा के मैदान का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है। उत्तरी गंगा का मैदान स्थानीय आधार पर कई उपविभागों में विभक्त है। जैसे:-

(1) रोहिलखण्ड का मैदान,

(2) अवध का मैदान,

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान,

(4) मिथलांचल का मैदान

         इसी तरह दक्षिणी गंगा के मैदान भी स्थानीय आधार पर निम्न भागों में विभक्त हैं:-

(1) बुंदेलखण्ड का मैदान

(2) इलाहाबाद का मैदान

(3) भोजपुर का मैदान

(4) मगध का मैदान

(5 ) अंग का मैदान

गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति

         गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रकट किये गये हैं। जैसे:-

(1) ओल्डहम:- “संरचनात्मक दृष्टिकोण से यह मैदान हिमालय के आगे का गर्त (Fore Deep) है, जिसमें नदियों के द्वारा लाये गये अवसाद का औसतन 500m गहरा निक्षेपण से बना है।”

(2) एडवर्ड स्वेस:- “हिमालय निर्माण के समय यहाँ पर एक गर्त था जिसे भूसन्नति (Geo-syncline) कहा जाता था। इसी भूसन्नति में हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत की नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से इस मैदान का निर्माण हुआ है।”

(3) बुरार्ड:- “इसका निर्माण हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के बीच में स्थित रिफ्ट घाटी में नदियों के द्वारा लायी मलवा के विक्षेपण से हुआ है। इन मैदान के निर्माण पर प्लीस्टोसीन काल हुए भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। आज भी हिमालय से निकलने वाली नदियाँ मलवा का निक्षेपण कर रही हैं जिससे इसका निर्माण कार्य जारी है।” यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

        संरचनात्मक दृष्टिकोण से गंगा-यमुना के मैदान को चार भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे-

(1) भावर प्रदेश

           भावर का विस्तार शिवालिक पर्वत के दक्षिण में हुआ है। यह पश्चिम में पोटवार के पठार से लेकर पूरब में तिस्ता नदी तक विस्तृत है। इसकी चौड़ाई 8 से 16km है। इसकी औसत ऊँचाई समुद्रतल से 150-250m है।

भावर की उत्पत्ति

         इसका निर्माण हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गई बोल्डर क्ले के निक्षेपण से हुआ है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

भावर की विशेषता

(1) यह बोल्डर क्ले नामक कंकड़-पत्थर से निर्मित है।

(2) इसका निर्माण शिवालिक पर्वत के पदस्थली में हुआ है क्योंकि मंद ढाल के कारण बड़े-2 और मोटे चट्टानों का निक्षेपण सबसे पहले होता है।

(3) हिमालय से निकलने वाली नदियाँ इस क्षेत्र में आकर विलुप्त हो जाती है जिससे खण्डित नदी प्रवाह का विकास होता है।

(4) कहीं -2 जल जमाव वाले क्षेत्रों में द‌लदली भूमि का विकास हुआ है।

(5) भावर क्षेत्र में कई जलोढ़ पंख और जलोढ़ शंकु का भी प्रमाण मिलता है।

(6) भावर प्रदेश पर्वत और मैदान के बीच संक्रमण पेटी का क्षेत्र है।

(2) तराई प्रदेश

         भाँवर के दक्षिण में तराई प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण नमी युक्त चिपचिपी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 150-200m और चौड़ाई 15-30Km है। यह अत्याधिक नमीयुक्त वाला क्षेत्र है। जहाँ पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है। यह घने जंगलों से ढका हुआ है। कहीं-2 दलदली भूमि का भी विकास हुआ है। भावर क्षेत्र में जो नदियाँ विलुप्त हो गयी थी वे इस प्रदेश (तराई प्रदेश) में दिखाई देने लगती है।

          उष्णार्द्र वातावरण के कारण तराई क्षेत्र मलेरिया के लिए प्रसिद्ध है। इसी प्रदेश में थारू जनजाति के लोग सदियों से निवास करते आ रहे हैं। लेकिन, भारत विभाजन के बाद तराई प्रदेश में सिखों के बसाए जाने के कारण थारूओं की भूमि को हड़प लिया है। तराई प्रदेश में ही मुजफ्फरपुर से मुजफ्फर नगर तक विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(3) बाँगर प्रदेश

       इसे पुरानी जलोढ़ मिट्टी के नाम से जानते हैं। यहाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न नहीं होती है। इसकी औसत ऊँचाई 100-15om है। बाँगर का विस्तार ऊपरी गंगा के मैदान और दक्षिणी गंगा के मैदान में हुआ है। मुरादाबाद के पास बागर क्षेत्र में बालू के बड़े-2 टीले मिलते हैं। जिसे भूर कहते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में बांगर के साथ लैटेराइट मिट्टी से युक्त मैदान मिलता है जिसे बारिन्द्र कहते हैं। बांगर प्रदेश भारत में ‘खाद्यान्न फसल पेटी’ के रूप में प्रसिद्ध है।

(4) खादर प्रदेश

         इसे नवीन जलोढ़ मिट्टी कहते हैं। पंजाब के लोग इसे “बेट भूमि” से सम्बोधित करते हैं। इसका निर्माण नदियों के द्वारा लायी गयी महीन और चिकनी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। ये आज भी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र हैं। नदियों के मुहानों पर खादर के निक्षेपण से ही डेल्टा का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है। इसकी संरचनात्मक विशेषताएँ और विस्तार ही इसे विश्व का सबसे बड़ा जलोढ़ का मैदान के रूप में मान्यता दिलवाता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारत के मुख्य भूआकृति विभाग के नाम लिखे। सिंधुगंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान का वर्णन करे।

2. भावर तथा तराई से आप क्या समझते हैं? संक्षिप्त में उनकी विशेषता बताये।

3.  भावर क्या है? शिवालिक की पदस्थली के बराबर इसका विकास क्यों हुआ?

4. भारत का उत्तरी मैदान हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार से नदियों के द्वारा लायी उत्कृष्ट जलोढ़ का उदाहरण है। इस तथ्य की सत्यता की जाँच करें।

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान


          द०-प० मानसून की उत्पत्ति से संबंधित कई सिद्धांत प्रस्तुत किये गए हैं। इन सिद्धांतों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत “जेट स्ट्रीम सिद्धांत” है। इस सिद्धांत में मानसून की उत्पत्ति में हिमालय एवं तिब्बत के पठार की केन्द्रीय भूमिका निर्धारित की गई है।

         जेट स्ट्रीम सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति पूर्वी जेट हवा के कारण होती है। सूर्य का उत्तरायण होने के बाद तिब्बत का पठार दो कारणों से हिटर के समान गर्म एवं तप्त हो जाता है।

(1) समुद्रतल से 5000m की ऊँचाई के कारण मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पहले सूर्याताप प्राप्त करता है और गर्म हो जाता है।

(2) तिब्बत के पठार का बर्फ पिघलता है तो गुप्त ऊष्मा का परित्याग किये जाने के कारण तिब्बत के पठार की धरातलीय हवा गर्म होकर ऊपर उठने लगती है जिससे धरातल पर LP का निर्माण होता है। यही हवा तिब्बत के पठार के ऊपर उठकर ऊपर में प्रतिचक्रवात की स्थिति उत्पन्न करती है। इस प्रतिचक्रवातीय क्षेत्र से दो तरफ हवाएँ चलती है। एक शाखा चीन की ओर चली जाती है और दूसरी शाखा भारत के ऊपर से गुजरते हुए विषुवत रेखा की ओर अग्रसारित होती है। विषुवत रेखा की ओर जाने वाली हवा धीरे-2 ठंडी होकर अरब सागर के उपर बैठकर HP का निर्माण करती है। जिससे द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

             भारत के उत्तरी भाग में हिमालय पर्वत के अवस्थित होने के कारण साइबेरिया की ओर से आने वाली ठंडी हवा भारत में प्रविष्ट नहीं कर पाती है जिसके कारण चीन के समान यहाँ शीत ऋतु का आगमन नहीं होता है पुनः उत्तर की ओर से भारत में साईबेरिया हवा नहीं पहुंचने के कारण सूर्य के उत्तरायण होते ही थार मरुस्थलीय क्षेत्र और गंगा के मैदानी क्षेत्र तेजी से गर्म होकर L.P. का निर्माण करते हैं। धीरे-2 उत्तर का मैदानी क्षेत्र ITCZ का एक हिस्सा बन जाता है। यही क्षेत्र मानसूनी हवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने का कार्य करती है।

मानसून के विकास

चित्र: द०-प० मानसून की उत्पत्ति

         हिमालय पर्वत की भूमिका मानसून के यांत्रिकी के रूप में भी देखी जा सकता है। जैसे- राजस्थान के ऊपर से गुजरने वाली द०-प० मानसून की अरेबियन शाखा को कुल्लू-मनाली के पास रोककर वहाँ बादल फटने की घटना को जन्म देती है। पुन: बंगाल की खाड़ी वाली शाखा को पुरब से पश्चिम दिशा में अग्रसारित होने के लिए बाध्य करती है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि को निर्धारित करने में तिब्बत के पठार और हिमालय पर्वत की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न प्रारूप

1. द०-प० मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठा का कैसे महत्वपूर्ण योगदान है? इसका वर्ण करें।

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई


भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

               भारत दक्षिण एशिया में अवस्थित एक विशाल देश है जिसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी० है। इसका अक्षांशीय विस्तार भारत के मुख्य भूमि से 8°4’N से 37°6’N के बीच एवं देशांतरीय विस्तार 68°7’E से 97°25’E के मध्य है। भारत एक उत्तरी गोलार्द्ध का देश है जो प्राचीनकाल के गोंडवाना भूखण्ड के ऊपर अवस्थित है। यह एक ऐसा देश है। जिसके दक्षिण में तीन सागर जैसे अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी स्थित हैं। जबकि उत्तरी भाग में हिमालय जैसे विशालकाय पर्वत स्थित है। पुन: भारत एक ऐसा देश है जिसकी संरचनात्मक विशेषता को नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।

भारत के उच्चावच

चित्र: भारत की भूगर्भिक संरचना

              भूगोलवेत्ताओं ने भारत को धरातलीय संरचना एवं उच्चावच के आधार पर मुख्यतः चार भू-आकृतिक इकाईयों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र

(2) उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र

(3) दक्षिण भारत का पठारी क्षेत्र

(4) तटीय मैदानी क्षेत्र एवं द्वीपीय क्षेत्र

चित्र: भारत की भौतिक इकाई

(1) उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र           

         सम्पूर्ण भारत के 10.7% भूभाग पर पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हुआ है। भारत के उत्तर में विशालकाय मोड़दार पर्वतों की कई श्रृंखलाएँ मौजूद है जिसका विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी० पर हुआ है। इसी क्षेत्र में विश्व की कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती है। सुविधा के दृष्टिकोण से उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को तीन भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

1. ट्राँस हिमालय (ट्राँस = उस पार)

2. हिमालय

3. पूर्वांचल हिमालय

1. ट्राँस हिमालय

         मुख्य हिमालय के उत्तर में जितने भी पर्वतीय श्रृंखलाएँ हैं उन्हें ट्राँस हिमालय से संबोधित करते हैं। भारतीय भूभाग पर ट्राँस हिमालय की तीन श्रृंखलाएँ मौजूद हैं:-

(i) काराकोरम श्रेणी

(ii) लद्दाख श्रेणी

(iii) जास्कर श्रेणी।

          उपरोक्त तीन श्रृंखलाओं के अतिरिक्त चीन में स्थित टिएन्सान और क्यूनलून पर्वत और पाकिस्तान में स्थित हिन्दूकुश पर्वत ट्राँस हिमालय के उदाहरण हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ मिलकर कश्मीर के उत्तरी भाग में एक गाँठ का निर्माण करती हैं जिसे पामीर का पठार कहते हैं। इसे ‘दुनिया के छ्त’ से भी सम्बोधित करते है। इसकी ऊँचाई समुद्रतल से 4500 मीटर से अधिक है। भारत में अवस्थित ट्रांस हिमालय श्रृंखलाओं की संक्षिप्त चर्चा नीचे की जा रही है।

(i) काराकोरम श्रेणी 

       सिन्धु नदी के उत्तर में भारत और चीन के सीमा पर स्थित है जो पामीर के पठार से निकलकर उत्तर-पश्चिम से द०- पूरब की ओर विस्तृत है। इसका प्राचीन नाम ‘कृष्णा गिरि’ है। इसकी औसत ऊँचाई 6000 मीटर है। इसकी सबसे ऊँची चोटी K-2 (केल्विन-2 या (गॉडविन ऑस्टिन) है जिसकी ऊँचाई 8611 मीटर है। यह विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। काराकोरम पर्वत की चौड़ाई  80 किमी० है।

            सालों भर बर्फ से ढका रहता है। इस पर्वत पर कई हिमानी मिलते हैं। जैसे:- बटुरा, हिस्पार, स्कामरी, बियाफो, बल्टोरा, सियाचीन हिमानी आदि। काराकोरम पर्वत पर हिमानी के अपरदन से कई दर्रे बने हैं। जैसे- खंजरेब, इन्दिरा कॉल, अगहिल इत्यादि। हिमानी के अपरदन से इसका ढाल सीढ़ीनुमा बन चुका है। यह विशुद्ध रूप से अर्द्ध मरुस्थलीय भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

(ii) लद्दाख श्रेणी

        काराकोरम श्रेणी और जास्कर श्रेणी के बीच स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 5300 मीटर है। हिमानी के अपरदन के कारण यह पठार के रूप में तब्दील हो चुका है। इसका दक्षिणी-पूर्वी भाग चीन में जाकर कैलाश पर्वत के नाम से जाना जाता है। इस श्रृंखला पर प्रसिद्ध पुगा की घाटी मिलती है जो भूतापीय ऊर्जा का विशाल स्रोत है। इस पठार पर सिन्धु की सहायक नदी श्योक नदी बहती है। लद्दाख श्रेणी के उत्तर-पूरब में सोड्डा का मैदान और देप्सांग का मैदान स्थित है।

(iii) जास्कर श्रेणी  

    लद्दाख श्रेणी के दक्षिण में समान्तर रूप से फैला हुआ है। यह पर्वत 76°E देशान्तर रेखा के पास महान हिमालय से निकलती है। इस पर्वत की वहीं विशेषताएँ है जो लद्दाख एवं काराकोरम श्रेणी की है।

चित्र: ट्रांस हिमालय

2. हिमालय

     ‘हिमालय’ दो शब्दों के मिलने से बना है प्रथम- हिम, दूसरा- आलय। हिम का तात्पर्य बर्फ से है जबकि आलय का तात्पर्य घर से है, अर्थात हिमालय एक ऐसा नवीन मोड़दार पर्वत है जहाँ लाखों वर्षों से हिम स्थायी रूप से निवास करता है। वस्तुतः यह पर्वत भारत के उत्तरी भाग में एक चाप के समान है जिसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से लेकर ब्रह्मपुत्र गॉर्ज तक है। इसकी कुल लम्बाई 2500Km. है जबकि इसकी चौड़ाई अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग है। जैसे अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौ० 150 km. है जबकि जम्मू कश्मीर में इसकी चौड़ाई 450 Km. है।

          हिमालय पर्वत में तीन प्रमुख श्रृंखलाएँ हैं जो महान हिमालय, लघु हिमालय, तथा शिवालिक हिमालय के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी उत्पत्ति की व्याख्या हेतु कई सिद्धांत प्रस्तुत किये गये है उनमें सबसे वैज्ञानिक सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत है।

हिमालय की उत्पत्ति

     ‘प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत’ के अनुसार हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत है। आज जहाँ पर हिमालय अवस्थित है वहाँ पर प्लीस्टोसीन कल्प तक एक विशाल सागर अवस्थित था जो टेथिस सागर के नाम से प्रसिद्ध था। टेथिस सागर के उत्तर में अंगारालैण्ड और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड था। अंगारालैण्ड एक स्थिर भूखण्ड था क्योंकि उसके नीचे संवहन तरंग नहीं चल रही थी। जबकि गोंडवानालैण्ड एक ऐसा भूखण्ड था जिसके नीचे संवहन तरंग चल रही थी। इन संवहन तरंग के कारण ही गोंडवानालैण्ड का खिसकाव उत्तर-पूर्व एवं उत्तर दिशा में हो रही थी।

          टेथिस सागर का निर्माण कार्बोनीफेरस कल्प में एक महान भूसंचलन के कारण हुआ था। यह सागर एक भूसन्नति गर्त के समान है। इस भूसन्नति में लाखों वर्षों तक अंगारालैण्ड और गोंडवाना लैण्ड के ऊपर बहने वाली नदियों के द्वारा मालवा का निक्षेपण होता रहा। जब भूसन्नति में अत्याधिक मलवा का जमाव हो गया तो गोंडवाना लैण्ड में उत्तर की ओर खिसकने की प्रवृति प्रारंभ हो गयी।

        चूँकि गोंडवाना लैण्ड की उत्तरी सीमा पर विन्ध्याचल पर्वत स्थित था। जब गोंडवाना लैंड उत्तर की ओर खिसका तो गोंडवाना का अग्र भाग बुलडोजर का काम करने लगा। जिसके परिणामरूवरूप टेथिस सागर में जमे मलबा या अवसाद में वलन की क्रिया प्रारंभ हो गयी जिसके कारण टेथिस सागर के मलवो में वलन एवं उत्थान की क्रिया से हिमालय जैसे विशाल पर्वत का निर्माण हुआ।

चित्र: हिमालय पर्वत की उत्पत्ति

         हिमालय पर्वत को तृतीयक काल का पर्वत भी कहा जाता है क्योंकि इसका निर्माण का कार्य तृतीयक काल में ही सम्पन्न हुआ था। इस काल में महान भू-संचलन की किया सम्पन्न हुई थी जिसे अल्पाइन भू-संचलन के नाम से जानते है। हिमालय पर्वत का निर्माण भी अल्पाइन भूसंचलन से हुआ, इसीलिए हिमालय को अल्पाइन पर्वत के नाम से जानते हैं।

हिमालय पर्वत का विकास 

        अल्पाइन भू-संचलन के फलस्वरूप टेथिस सागर के अवसादों में वलन के फलस्वरूप अचानक हिमालय का निर्माण नहीं हुआ बल्कि इसके विकास में करोड़ों वर्ष का समय लगा है। हिमालय का विकास आज भी जारी है क्योंकि आज भी गोंडवाना लैण्ड के द्वारा हिमालय के भूगर्भ में दबाव लगाये जाने के कारण प्रतिवर्ष 4 से 5 सेमी० हिमालय का उत्थान हो रहा है।

      भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, हिमालय में स्थित दोनों श्रृंखलाओं का विकास अलग-2 अवस्था (समय) में हुआ है। दूसरे शब्दों में हिमालय पर्वत के निर्माण तीन अवस्थाओं में हुआ है।

        प्रथम अवस्था में महान हिमालय का निर्माण हुआ है। महान हिमालय के निर्माण का कल्प मुख्यतः ओलिगोसीन निर्धारित किया गया है क्योंकि उसके भूगर्भ से भी ओलीगोसिन के अवसादों का प्रमाण मिलता है।

       द्वितीय अवस्था लघु हिमालय का निर्माण मयोसीन कल्प में माना जाता है लेकिन कुछ क्षेत्रों का निर्माण प्लायोसीन कल्प तक जारी रहा।

     तीसरी अवस्था में शिवालिक पर्वत का निर्माण कार्य प्लायोसीन में प्रारंभ हुआ और प्लीस्टोसीन में उसका निर्माण कार्य पूरा हुआ।

       शिवालिक पर्वत के बारे में कहा जाता है कि जब महान हिमालय और लघु हिमालय का निर्माण हो गया तो उसके बाद लघु हिमालय के दक्षिणी भाग में टेथिस सागर का अवशिष्ट भाग बचा रहा गया जो शिवालिक नदी या इण्डो ब्रह्मा नदी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस नदी में महान हिमालय और लघु हिमालय के द्वारा लाई गई मलवा का निक्षेपण लाखों वर्षों तक होता रहा। पुन: गोंडवाना लैंड के उत्तर की ओर खिसकने से या मलवा पर दबाव पड़ने से शिवालिक पर्वत का विकास हुआ।

हिमालय की संरचना

         संरचनात्मक दृष्टिकोण से हिमालय को तीन श्रृंखला में बाँटते हैं-

(1) महान हिमालय

(2) लघु/मध्य हिमालय

(3) शिवालिक हिमालय

         महान हिमालय पूर्व से पश्चिम की ओर एक लगातार श्रृंखला के रूप में है। कहीं-2 पूर्ववर्ती नदी (जैसे- सिन्धु, सतलज, कोशी, ब्रह्मपुत्र) के कारण दर्रों का विकास हुआ है। दूसरी ओर लघु हिमालय में महान हिमालय की तुलना में अधिक विखण्डन देखा जा सकता है। पुनः शिवालिक हिमालय एक ऐसा पर्वत है जो पूर्ण रूप से विखण्डित हो चुकी है। पुनः इसका विस्तार पश्चिम में पोटवार के पठार से लेकर पूरब में अरुणाचल प्रदेश तक हुआ है। प्रत्येक हिमालय के श्रृंखलाओं की संरचना की चर्चा नीचे के शीर्षक में की जा रही है:-

(1) महान हिमालय/हिमाद्री-

         इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से नामचा बरबा गॉर्ज तक हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 6000m है। इसका आकार एक चाप के समान है। सालोंभर इसकी चोटियाँ बर्फ से ढकी रहती है। गंगोत्री, यमुनोत्री जैसी कई हिमानी पायी जाती है। इसका उत्तरी ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है।

         महान हिमालय पर विश्व की कई ऊँची-ऊँची चोटियाँ पायी जाती है। जैसे- माउंट एवरेस्ट (8850m) विश्व की सबसे ऊँची चोटी है। कंचनजंघा (8598m) हिमालय की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। इसके अलावे नंगा पर्वत, कामेट, केदारनाथ (6945m), धौलागिरी, गौरीशंकर, गोसाईथान इत्यादि भी ऐसी चोटियाँ है जिसकी ऊँचाई 6000m से भी अधिक है।

महान हिमालय की प्रमुख चोटियाँ:

(i) एवरेस्ट (8850m)

(ii) कंचनजंघा (8598m)

(iii) मकालू  (8481m)

(iv) चोयू (8201m)

(v) धौलागिरी (8172m)

(vi) मंसालू (8156m)

(vii) नंगा पर्वत (8126 m)

(viii) अन्नपूर्णा (8078m)

(ix) नंदादेवी (7817m)

(x) नामचाबरबा (7756m) 

(xi) कामेत (7756m) 

(xii) गौरीशंकर (7145m)

(xiii) बद्रीनाथ (7138m)

(xiv) एपी (7132m)

(xv) नीलकंठ (7073m) 

       हिमालय पर्वत को कई नदियों एवं हिमानियों ने काटकर कई दर्रों एवं कॉल का निर्माण किया है। उतराखंड में अवस्थित माना और नीति दो प्रसिद्ध कॉल के उदाहरण है। जबकि कश्मीर का जोजीला और बुर्जिला, हिमाचल प्रदेश का शिपकीला, उत्तराखण्ड का पिथौरागढ़, थागला और लिपुलेख, अरुणाचल प्रदेश का बोमडिला, सिक्किम का जेलेप्ला और नाथुला प्रमुख दर्रों के उदाहरण है।

        महान हिमालय अवसादी और कांग्लोमरेट चट्टानों से निर्मित है। जिसके कारण नदियों द्वारा अपरदन का कार्य तेजी से किया जा रहा है जिससे कई गौण स्थलाकृतियों का विकास हो रहा है। महान हिमालय की संरचना में कई क्षेत्रीय विषमताएँ भी देखी जा सकती है। जैसे कश्मीर में स्थित महान हिमालय की ऊँचाई कम है जबकि पूर्वी एवं मध्यवर्ती भाग में इसकी अधिक ऊँचाई है। पुन: उत्तरांचल में अत्याधिक दबाव बल के कारण अतिवलन और नेपी का प्रमाण मिलता है।

(2) लघु / मध्य हिमालय / हिमाचल हिमालय

          इसे हिमाचल / लघु हिमालय के नाम से जानते हैं। इसे कश्मीर में पीरपंजाल, हिमाचल प्रदेश में धौलाधर, नेपाल में “महाभारत श्रेणी”, अरुणाचल प्रदेश में “मिश्मी और डाफला” के नाम से जानते हैं। इस पर्वत का भी उतरी  ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है। यह पर्वत अवसादी और कांग्लोमरेट चट्टानों के अलावे रूपान्तरित चट्टानों से निर्मित है। रूपान्तरित चट्टानों का निर्माण अत्याधिक दबाव एवं ताप के कारण हुआ है।

       मध्य हिमालय की औसत ऊँचाई 4500m है। इसमें कई अनुप्रस्थ घाटियों का विकास हुआ है। जैसे- कुल्लू-मनाली की घाटी इसका प्रसिद्ध उदा० है। इस पर्वत पर मसूरी, नैनीताल, दार्जीलिंग, शिमला जैसे कई पर्यटक नगर अवस्थित है।

       महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में लगभग 200Km की दूरी है। कश्मीर में इन दोनों श्रृंखलाओं के बीच में जो स्थिर जल बच गया था वह करेवा झील के नाम से प्रसिद्ध था। डल एवं वुलर झील इसी महान झील का अवशिष्ट भाग है, करेवा झील में मलवा के निक्षेपण से ही कश्मीर घाटी का विकास हुआ है।

    महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में एक विशाल दरार या भ्रांश घाटी स्थित है जिसे Main Central Thrust कहते है।

(3) शिवालिक पर्वत/ उप हिमालय

       शिवालिक पर्वत की औसत ऊँचाई 600 मी० है। इसका विस्तार पूरब में कोशी नदी से पश्चिम में पाकिस्तान के पोटवार पठार तक हुआ है। यह पूर्णत विखंडित श्रृंखला है। कहीं-2 पर इसकी ऊँचाई पर्वतीय मान्यता से भी कम है। शिवालिक पर्वत अवसादी और काँग्लोमरेट चट्टानों से निर्मित है।

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय क्षेत्र अपनी विशिष्ट संरचनात्मक विशेषता के कारण एक विशिष्ट भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

3. पूर्वांचल हिमालय

        पूर्वांचल हिमालय का विस्तार नामचाबरबा गॉर्ज से लेकर वर्मा के अराकान योमा पहाड़ी तक हुआ है। अराकानयोमा पहाड़ी के दक्षिण में अवस्थित द्वीपीय क्षेत्र (अंडमान निकोबार द्वीप समूह) पूर्वांचल हिमालय का ही अवशिष्ट भाग के रूप में है। पूर्वांचल हिमालय का विस्तार भारत के अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर एवं मिजोरम राज्य में हुआ है। यह मूलत: उ०-पूर्वी भारत और म्यानमार के बीच में सीमा का निर्माण करती है। वर्मा में इसी पर्वत को ‘अराकान योमा’ के नाम से जानते हैं।

पूर्वांचल हिमालय की उत्पत्ति

          पूर्वांचल हिमालय का निर्माण संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे हुआ है। पूर्वांचल हिमालय का विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर हुआ है। भूगर्भिक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि गोंडवाना प्लेट तथा अंगारा प्लेट की संरक्षी सीमा इसी पर्वत के सहारे विकसित हुआ है। इन दो प्लेटों के रगड़ के कारण कुछ चट्टानें धरातल से ऊपर उठ गयी जिनसे पूर्वांचल हिमालय का निर्माण हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 2000 से 3000 मी० है। इसकी उत्पत्ति की क्रिया नीचे के चित्र में भी देखा जा सकता है।

पूर्वांचल हिमालय की स्थलाकृतिक विशेषता

          नागचा बरबा के पास हिमालय अचानक दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। नामचा बरबा के पास हिमालय और पूर्वांचल हिमालय मुड़कर Syntaxis मोड़ का निर्माण करती है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर पूर्वांचल हिमालय में पर्वतों का निम्नलिखित क्रम पायी जाती है। अरुणाचल प्रदेश में पटकोईबुम, नागालैण्ड में नागा की पहाड़ी, मणिपुर में मणिपुर पहाड़ी, मिजोरम में मिजों की पहाड़ी या लुशाई की पहाड़ी, त्रिपुरा में अगरतल्ला की पहाड़ी कहलाता है।

         पुन: मेघालय में  जयंतिया की पहाड़ी और मणिपुर की पहाड़ी एक छोटी-सी पहाड़ी से जुड़ जाती है जिसे बैरल की पहाड़ी कहते हैं। पूर्वांचल हिमालय का एक छोटा-सा भाग बंगलादेश में भी है जिसे चटगाँव की पहाड़ी कहते हैं। पूर्वांचल हिमालय का विस्तृत भाग ही म्यांमार में जाकर अराकानयोमा की पहाड़ी कहलाती है। पूर्वांचल हिमालय की सबसे ऊँची चोटी का‌ पटकोईबुम (3826 मी०) है जो नागा की पहाड़ी पर स्थित है। मिजो पहाड़ी की सबासे ऊँची चोटी ‘द ब्लू माऊण्टेन’ (2157 मी०) हैं। 

चित्र: पूर्वांचल हिमालय की पहाड़ियाँ

        पूर्वांचल हिमालय में कई छोटी-छोटी दर्रे भी पाये जाते हैं जैसे दिफू, कुमजावती, हफूंगान, चौकन और पांगशू। पूर्वांचल हिमालय में कई अनुवर्ती घाटियों का विकास हुआ है जिसमें बराक की घाटी, कोहिमा की घाटी सबसे प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. हिमालय के विकास एवं संरचना की विवेचना करें। अथवा हिमालय की उत्पत्ति की व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के माध्यम से करें।

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

भारत के आर्थिक

               भारत एक मानसूनी जलवायु प्रधान देश है। यहाँ मानसून की उत्पति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायुसंचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होता है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से 80% वर्षा होती है जबकि 20% वर्षा  उ०-पू० मानसून एवं पछुआ विक्षोभ से होती है।

        भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव निम्नलिखित क्षेत्रों पर पड़ता है:-

(1) कृषि पर प्रभाव:-

        भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। भारत में कृषि मानसून पर निर्भर करती है। जिस वर्ष मानसून भारत में समय पर आती है और मानसून सामान्य रहती है तो उस वर्ष भारतीय किसानों के घर अन्न से भर जाते हैं। यदि मानसून समय पर नहीं आती है और अनावृष्टि या अतिवृष्टि होती है तो फसलें बर्बाद हो जाती है जिससे हमारे भारतीय किसानों को काफी क्षति उठानी पड़ती है। इसीलिए कहा भी जाता है कि-“भारतीय किसान मानसून के साथ जुआ खेलते है।”

(2) उद्योगों पर प्रभाव:-

       भारत के कई उद्योग कृषि पर आधारित हैं; जैसे- चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, कागज उद्योग, जूट उद्योग, चावल मील, इत्यादि। यदि भारतीय मानसून गन्ना, कपास, धान आदि फसलों को बर्बाद करती है तो इन उद्योगों में कच्चे माल की कमी हो जाती हैं। जब मानसून का प्रभाव अच्छा रहता है तो आसानी से इन उद्योगों को पर्याप्त कच्चे माल मिल जाते हैं।

(3) मत्स्य पालन पर प्रभाव:-

          भारतीय मानसून से पर्याप्त वर्षा होती हैं तो यहाँ के छोटे-बड़े तालाबों में पर्याप्त जल संग्रहित कर लिये जाते हैं जिससे इन जलाशयों में मत्स्य पालन का कार्य किया जाता है।

(4) पशुपालन पर प्रभाव:-

     भारतीय मानसून से अतिवृष्टि या अनावृष्टि होने से फसलें नष्ट हो जाती है। चारागाह पर चारे की फसले नष्ट हो जाती है जिसके कारण पशुओं के लिए चारा की कमी हो जाती है। फलस्वरूप पशुपालन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है। यदि मानसून सामान्य प्रका की होती है तो पशुपालन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फलतः दुध एवं माँस के उत्पादन में वृद्धि होती हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. भात के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव का वर्णन करें

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

भारत में शीतकालीन वर्षा

          भारत में जाड़े की ऋतु में होने वाली वर्षा को शीतकालीन वर्षा कहते हैं। यह वर्षा दो प्रकार की होती है। एक- पछुआ विक्षोभ के कारण होने वाली वर्षा और दूसरा- उ०-पू० मानसून की वर्षा। पछुआ विक्षोभ के कारण उ०-पू० भारत में वर्षा होती है। जबकि उ०-पू० मानसून से भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा होती है। इन दोनों प्रकार की वर्षा से भारत के आर्थिक जीवन की कई क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है। जैसे-

(1) कृषि पर प्रभाव⇒

          भारत में पछुआ विक्षोभ के कारण जाड़े की ऋतु में वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ एवं अन्य रबी फसल के लिए फायदेमंद होती है। पंजाब में यह वर्षा जनवरी या फरवरी महीने में होती है। यहाँ की कृषि के लिए यह वर्षा काफी महत्व रखती है क्योंकि वहाँ की रबी फसल की सफलता इस वर्षा पर निर्भर करती है।

       उ०-पूर्वी मानसून से मुख्यतः भारत के पूर्वी तटीय भागों में वर्षा होती है। यह वर्षा विशेष रूप से तमिलनाडु में होती है। इस वर्षा से मुख्यतः रबी फसलों की सिंचाई होती है, जिसके कारण उसके उत्पादन में वृद्धि होती है। उत्पादन में वृद्धि होने से किसानों की आमदनी बढ़ती है। शीतकालीन वर्षा का कृषि पर कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ते है। जैसे:- यदि एक सप्ताह तक शीतकालीन वर्षा के कारण मौसम गड़बड़ रहती है तो मौसम खराब रहने के कारण आलू, प्याज, मसूर आदि फसलों को पाला लग जाती है। इसके कारण उत्पादन में कमी हो जाती है और किसानों को काफी हानि उठानी पड़ती है।

प्रश्न प्रारूप

1. भात में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन प प्रभाव बतायें।

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व


प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व       

          भारत में प्राचीनतम कल्प से लेकर नवीनतम कल्प की चट्टानें पायी जाती हैं। प्राचीनतम कल्प में एक प्रमुख चट्टान धारवाड़ समूह की है। इसका निर्माण 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 1500 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच मानी जाती है। यह मूलत: प्री कैम्ब्रीयन  कल्प की चट्टान है जिसका खोज सर्वप्रथम राबर्ट ब्रशफुट महोदय ने कर्नाटक के धारवाड़ जिला से किया था।

धारवाड़ क्रम के चट्टानों की विशेषताएँ

      धारवाड़ चट्टान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं। जैसे- 

(1) यह भारत का सबसे प्राचीनतम परतदार चट्टान का उदाहरण है।

(2) लम्बे समय के कारण इसका काफी रूपान्तरण हो चूका है।

(3) धारवाड़ क्रम  के चट्टानों से किसी भी प्रकार का जीवाश्म नहीं मिलता है क्योंकि उस वक्त पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति हुई ही नहीं थी।

(4) धारवाड़ समूह की चट्टानों में नीस और शिस्ट प्रकार की चट्टानें मिलती हैं।

(5) प्री कैम्ब्रीयन कल्प में भूपटल के फैलाव और सिकुड़न से कई महासागरों और प्राचीन मोड़दार पर्वतों का निर्माण हुआ है। राजस्थान की अरावली की पहाड़ी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

(6) भारत में इसका विस्तार 15600 वर्ग किमी० क्षेत्र में हुआ है।

(7) भारत में धारवाड़ प्रकार की चट्टान कर्नाटक के धारवाड़ जिला, विशाखापत्तनम के पास कूदोराइट श्रेणी की चट्टान, रीवा & हजारीबाग के बीच में गोंडाइट क्रम की चट्टान, जम्मू-कश्मीर की सेलखाला क्रम की चट्टान, राजस्थान के अरावली क्षेत्र में, झारखण्ड और उड़ीसा के सीमा पर लौहक्रम की चट्टान, धारवाड़ समूह के चट्टान माने जाते हैं।

प्राचीनतम कल्पआर्थिक महत्व

         धारवाड़ क्रम की चट्टानें भारत में धात्विक खनिजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस चट्टान से लोहा, सोना, मैगनीज, यूरेनियम, ताम्बा, जिंक, क्रोमियम जैसे- धात्विक खनिज प्राप्त किये जाते हैं। राजस्थान की खेतरी का खान ताम्बा के लिए प्रसिद्ध रही है।

         कर्नाटक, गोआ, झारखण्ड, उड़ीसा इत्यादि से हेमाटाइट और मैग्नेटाइट जैसे लौह अयस्क प्राप्त किये जाते है।मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा, बाला घाट, उड़ीसा के कालाहांडी और बोलांगिर क्षेत्र से मैंग्नीज प्राप्त किया जाता है।

        धारवाड़ क्रम की चट्टानों से एस्बेस्ट, कोबाल्ट, अभ्रक, प्लेटीनम, सूरमा, सीसा, फ्यूराइट, इल्मेनाइट (नाभिकीय खनिज का स्रोत), गारनेट, संगमरमर, कोरंडम जैसे खनिज भी प्राप्त किये जाते हैं। 

    धारवाड़ क्रम चट्टानें भारत में लाल और लैटेराइट मिट्टी के निर्माण में भी सहायक रहा है जो विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों के लिए आधार का कार्य करती है।

निष्कर्ष

       इस ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि धावाड़ क्रम की चट्टानें अपनी विशिष्टता एवं आर्थिक महत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध रही हैं।

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व


भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

         भारत में विभिन्न भूगर्भिक काल में निर्मित अनेक प्रकार की चट्टानें पायी जाती हैं। इसका संबंध पैलियोजोइक महाकल्प के कार्बोनीफेरस कल्प से लेकर मीसोजोइक कल्प के मध्य रहा है।

भारत में गोण्डवाना क्रम की चट्टानें

        ‘गोंडवाना’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1872 ई० में एच०बी० मेडलीकॉट और 2876 ई० में ओ० फीस्टमेंटल महोदय ने किया था। इस शब्द की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के गोंड क्षेत्र से हुआ है क्योंकि सबसे पहले गोण्ड जनजातियों के निवास क्षेत्र से ही गोंडवानाक्रम की चट्टानों की खोज की गई थी। बाद में इस प्रकार की चट्टानें जहाँ कहीं भी प्राप्त हुआ उसे गोडवाना क्रम के चट्टानों से सम्बोधित किया।

         वस्तुत: विन्ध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण हो जाने के बाद प्रायद्वीपीय भारत का भूखण्ड लम्बे समय तक भूगर्भिक हलचल/भूकंप से मुक रहा है। लेकिन, कार्बोनीफेरस के पूर्वार्द्ध में भयंकर भूसंचलन हुआ जिसे हर्सीनियन भू-संचलन के नाम से जानते हैं।

      हर्सीनियन भू-संचलन भूसंचलन का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण पृथ्वी पर पड़ा। इस समय जल और स्थल के वितरण में भारी परिवर्तन हुआ। +जैसे: पेन्जिया रूपी विशालकाय भूखण्ड के मध्यवर्ती भाग में धंसान की क्रिया से एक विशाल टेथिस सागर का निर्माण हुआ। इसका विस्तार पश्चिम में भूमध्यसागर से लेकर पूरब में प्रशान्त महासागर तक था। टेथिस सागर के उतरी भाग अंगारालैण्ड कहलाया जबकि दक्षिणी भाग गोण्डवानालैण्ड कहलाया।

भारत में गोण्डवानाक्रम

         कार्बोनीफेरस कल्प में ही पृथ्वी पर कुछ क्षेत्रों में हिमयुग का आगमन हुआ था। पर्वतीय क्षेत्रों / पर्वतों के ऊँचाई वाले भाग में हिम के जमने और हिमस्खलन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों का अपरदन होने लगा। अपरदित सामाग्री गोंडवाना भूखण्ड के विभिन्न नदी घाटियों और गर्तों में जमा कर दिये जाने से उपजाऊ समतल मैदान का विकास हुआ है। उस वक्त मानवीय उद्भव नहीं होने के कारण सभी मैदानी क्षेत्र सघन वनस्पतियों से ढक गये। इन वनस्पतियों में ग्लोसोप्टेरिस और टीलोफाइलम समूह की वनस्पत्ति अधिक थी। भूसंचलन के कारण ये वनस्पति गिरकर यत्र-तत्र जमने लगे।

         पुन: अत्याधिक ताप एवं दाब के कारण ये वनस्पति कोयले में रूपान्तरित हो गये। जगह-2 पर आज भी इन वनस्पतियों के परतों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। चूँकि कार्बोनीफेरस कल्प में इन वनस्पतियों का विकास एवं भूमि के अन्दर दबने की क्रिया नदी घाटी क्षेत्रों में हुआ था। इसीलिए आज भी कोयला की पेटियाँ नदी घाटी क्षेत्रों में मिलती है।

वितरण

      भारत में गोंडवनाक्रम की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपीय भारत के बाहरी क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जैसे-

झारखण्ड- दामोदर नदी घाटी, उत्तरी कोल क्षेत्र, डाल्टेनगंज क्षेत्र।

बिहार- ललमटिया ये लेकर राजमहल की पहाड़ी तक।

उड़ीसा- महानदी घाटी क्षेत्र में।

आन्ध्रप्रदेश- गोदावरी एवं उनके सहायक नदी घाटी क्षेत्र में।

छतीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश- सोन नदी घाटी क्षेत्र।

महाराष्ट्र- वर्दा नदी घाटी क्षेत्र।

पश्चिम बंगाल- दामोदर और बराकर नदी घाटी क्षेत्र में।

         उपरोक्त क्षेत्रों के अलावे कश्मीर, असम, सिक्कीम और दार्जलिंग में भी गोंडवाना प्रकार की चट्टानें पायी जाती है।

भारत में गोण्डवानाक्रम

चित्र: गोंडवाना समूह की चट्टानों का वितरण

आर्थिक महत्व

(1) भारत का 96% एन्थ्रासाइट और बिटुमिनस कोपला गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलता है। थोड़ा-बहुत लिग्नाइट कोयला इस समूह की चट्टान से प्राप्त होता है।

(2) गोंडवानाक्रम की चट्टानों से बलुआ पत्थर मिलता है जिसका उपयोग भवन निर्माण में किया जाता है।

(3) कोयले की खानों ने चिका मिट्टी और फायर क्ले प्राप्त किये जाते हैं जिसका प्रयोग ईट और बर्तन के निर्माण में किया जाता है।

(4) गोंडवानाक्रम की चट्टानें, सीमेन्ट और रासायनिक उर्वरक के निर्माण में काफी उपयोगी माने जाते हैं।

(5) गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलने वाला कंक्रीट का प्रयोग, नाभिकीय भट्टी के निर्माण में किया जाता है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मिलने वाला गोडवानाक्रम की चट्टान से कोयला जैसे ऊर्जा संसाधन के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिसकी महत्ता अपने आप में सर्वविदित है।

प्रश्न प्रारूप

Q. भात में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधा, वितरण एवं आर्थिक महत्व की विवेचना कीजिए।

4. नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर




भारत में नदियों के किनारे बसे प्रमुख नगर
क्रम  नगर का नाम  नदियाँ  
1. आगरा यमुना
2.  बद्रीना      अलकनंदा
3. प्रयागराज    गंगा, यमुना
4. दिल्ली, कोंटासाहेब, मथुरा यमुना 
5. फिरोजपुर सतलज
6. हरिद्वार, ऋषिकेष गंगा
7. कानपुर, बक्सर गंगा
8. अयोध्या, फैजाबाद सरयू
9. कोलकाता, हल्दिया, डायमण्ड हार्बर हुगली
10. लखनऊ गोमती
11.   डिब्रूगढ़ ब्रह्मपुत्र
12. गुवाहाटी ब्रह्मपुत्र 
13. जबलपुर नर्मदा
14. कोटा चम्बल
15. कुर्नूल तुंगभद्रा
16. सोकोवा घाट ब्रह्मपुत्र
17. कन्नौज गंगा
18. श्रीनगर, लेह झेलम
19. सूरत ताप्ती
20. हैदराबाद मूसी
21. मथुरा यमुना
22. अहमदाबाद, गांधीनगर साबरमती
23. राँची, जमशेदपुर स्वर्णरेखा नदी
24. पंढरपुर  भीमा नदी
25. बरेली रामगंगा
26. कटक, भुवनेश्वर महानदी
27. नासिक गोदावरी
28. सम्बलपुर महानदी
29. श्रीरंगपट्टनम कावेरी
30. जौनपुर गोमती
31. ओरछा बेतबा
32. वाराणसी गंगा
33. उज्जैन, कोटा क्षिप्रा
34. लुधियाना सतलज
35. विजयवाड़ा कृष्णा
36. तिरुचिरापल्ली, मैसूर कावेरी
37. पटना  गंगा
38. भागलपुर, फरक्का गंगा
39. मुंगेर  गंगा
40. सोनपुर, हाजीपुर गंडक
41. गोरखपुर  रापती
42. गंगटोक तिस्ता
43. बोधगया निरंजना
44. गया फल्गु
45. लखीसराय किऊल
46. मुम्बई माहिम
47. जम्मू तवी
48. दुर्ग, रायपुर शिवनाथ
 


नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर



1. निम्नलिखित में से कौन-सा शहर गंगा नदी के तट पर स्थित नहीं है?

(a) कानपुर

(b) पटना

(c) वाराणसी

(d) दिल्ली

[read more] (d) दिल्ली [/read]

2. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर गोमती नदी के किनारे स्थित नहीं है?

(a) चित्रकूट

(b) लखनऊ

(c) जौनपुर

(d) सुल्तानपुर

[read more] (a) चित्रकूट [/read]

3. गंगा नदी पर कौन-सी प्रान्तीय राजधानी स्थित है?

(a) कोलकाता

(b) लखनऊ

(c) भुवनेश्वर

(d) पटना

[read more] (d) पटना [/read]

4. गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्थित नगर है-

(a) हरिद्वार

(b) वाराणसी

(c) प्रयागराज

(d) कर्ण प्रयाग

[read more] (c) प्रयागराज [/read]

5. गोवा राज्य की राजधानी पणजी किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) कोयना

(b) माण्डवी

(c) मूठा

(d) भीमा

[read more] (b) माण्डवी [/read]

6. आगरा किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) गंगा

(b) अलकनंदा

(c) यमुना

(d) भागीरथी

[read more] (c) यमुना [/read]

7. आन्ध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) कृष्णा

(b) मूसी

(c) मूठा

(d) माण्डवी

[read more] (b) मूसी [/read]

8. जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) चिनाब

(b) रावी

(c) व्यास

(d) झेलम

[read more] (d) झेलम [/read]

9. सूरत किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) नर्मदा

(b) तापी

(c) सोन

(d) कावेरी

[read more] (b) तापी [/read]

10. उज्जैन किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) नर्मदा

(b) तवा

(c) तापी

(d) क्षिप्रा

[read more] (d) क्षिप्रा [/read]

11. जमशेदपुर किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) दामोदर

(b) स्वर्णरखा

(c) मयूराक्षी

(d) अजय

[read more] (b) स्वर्णरखा [/read]

12. नासिक किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) महानदी

(b) गोदावरी

(c) नर्मदा

(d) कावेरी

[read more] (b) गोदावरी [/read]

13. जौनपुर किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) गंगा

(b) सरयू

(c) गोमती

(d) रिहन्द

[read more] (c) गोमती [/read]

14. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर किसी नदी के तट पर नहीं बसा है?

(a) सू

(b) कटक

(c) भोपाल

(d) मैसूर

[read more] (c) भोपाल [/read]

15. गंगा नदी के किनारे स्थित सबसे बड़ा शहर है-

(a) वाराणसी

(b) पटना

(c) कानपुर

(d) प्रयागराज

[read more] (c) कानपुर [/read]

16. निम्नलिखित में से कौन-सा शहर गंगा के तट पर नहीं बसा है?

(a) कानपुर

(b) पटना

(c) बरौनी

(d) दिल्ली

[read more] (d) दिल्ली [/read]

17. स्टील सिटी राउरकेला किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) महानदी

(b) ब्राह्मणी

(c) वैतरणी

(d) स्वर्णरेखा

[read more] (b) ब्राह्मणी,

व्याख्या: 

    राउरकेला (Steel City) ओडिशा राज्य में स्थित है और ब्राह्मणी नदी के तट पर बसा हुआ है।

नदियों के किनारें बसे [/read]

18. निम्नलिखित में से सरयू नदी के किनारे कौन-सा शहर स्थित है?

(a) पटना

(b) प्रयागराज

(c) अयोध्या

(d) वाराणसी

[read more] (c) अयोध्या [/read]

19. कावेरी नदी के तट पर कौन-सा शहर स्थित है?

(a) तिरूचिरापल्ली

(c) बंगलौर

(b) मैसूर

(d) हैदराबाद

[read more] (a) तिरूचिरापल्ली [/read]

20. साबमती नदी किस शहर के किनारे बहती है?

(a) मुम्बई

(b) अहमदाबाद

(c) हैदराबाद

(d) विजयवाड़ा

[read more] (b) अहमदाबाद [/read]

1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान

(The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)


सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान⇒

             हिमालय पर्वत तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार के बीच सिन्धु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों की निक्षेप क्रिया द्वारा निर्मित एक विशाल मैदान स्थित है, जिसे सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान कहा जाता हैं। भारत के उत्तरी भाग में स्थित होने के कारण इसे उत्तरी भारत का मैदान भी कहते हैं। गंगा और सिन्धु नदियों के मुहाने के बीच पूर्व-पश्चिम दिशा में इसकी लम्बाई लगभग 3,200 किमी तथा चौड़ाई 150 से 300 किमी है। असम में यह मैदान संकरा है और यहां इसकी चौड़ाई 90 से 100 किमी है।

          यह मैदान पूर्व से पश्चिम की ओर चौड़ा होता जाता है। राजमहल की पहाड़ियों के पास इसकी चौड़ाई 160 किमी है जो बढ़कर प्रयागराज के निकट 280 किमी हो जाती है। इस मैदानी भाग में नदियों द्वारा तलछट के निरन्तर निक्षेपण से जलोढ़ की बहुत ही मोटी परतें जम गई हैं। अधिकांश भाग पर जलोढ़ की मोटाई 2,000 मीटर तक पायी गई है। उच्चावच की दृष्टि से इस मैदानी भाग का विवरण निम्नलिखित है :

(i) भाबर प्रदेश (Bhabar Region)-

      भाबर प्रदेश शिवालिक के गिरिपाद प्रदेश में सिन्धु नदी से तिस्ता नदी तक पाया जाता है। यह प्रदेश 8 से 16 किमी चौड़ाई वाली संकरी पट्टी के रूप में स्थित है। गिरिपाद पर स्थित होने के कारण इस क्षेत्र में नदियां बड़ी मात्रा में पत्थर, कंकर, बजरी आदि लाकर जमा कर देती हैं जिससे पारगम्य चट्टानों का निर्माण होता है। अतः इस क्षेत्र में पहुंचकर अनेक छोटी-छोटी नदियां भूमिगत होकर अदृश्य हो जाती हैं। यह प्रदेश कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं है।

(ii) तराई प्रदेश (Terai Region)-

        यह भाबर के दक्षिण में वह मैदानी भाग होता है, जहां भाबर की लुप्त नदियां फिर से भूमि पर प्रवाहित होती हुई दिखाई देने लगती हैं। इसे ही तराई प्रदेश कहते हैं। नदियों द्वारा निक्षेपित जलोढ़ के कण भाबर प्रदेश की तुलना में यहां अपेक्षाकृत महीन होते हैं फलस्वरूप तराई प्रदेश में दलदल की अधिकता होती है।

         इसकी चौड़ाई 20 से 30 किमी होती है। दलदल तथा नमी की अधिकता के कारण तराई प्रदेश में घने वन तथा विविध प्रकार के वन्य जीव पाये जाते हैं। उत्तरी भारत के अधिकांश राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभयारण्य तराई प्रदेश में ही हैं।

(iii) बांगर प्रदेश (Bangar Region)-

       बांगर प्रदेश मैदान का वह ऊंचा भाग होता है जहां नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुंचता है। यह पुरानी जलोढ़ मिट्टी द्वारा बना होता है। इसमें कंकड़ के रूप में चूनायुक्त संग्रहों की अधिकता होती है। यह प्रदेश कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं है। पंजाब के मैदान में बांगर को ‘धाया’ कहते हैं।

(iv) खादर प्रदेश (Khadar Region)-

       खादर प्रदेश वह नीचा भाग है जहां नदियों की बाढ़ का जल प्रति वर्ष पहुंचता है। बाढ़ के जल के साथ नवीन मिट्टी भी इस प्रदेश में बिछती रहती है, अतः खादर प्रदेश का निर्माण नवीन जलोढ़ द्वारा होता है। खादर प्रदेश अत्यधिक उपजाऊ होते हैं और यहां गहन खेती की जाती है। पंजाब के मैदान में खादर प्रदेश को ‘बेट’ कहते हैं।

(v) रेह (Reh)-

        बांगर मिट्टी के उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई कार्यों की अधिकता है, वहां पर कहीं-कहीं भूमि पर एक नमकीन सफेद परत बिछी हुई पायी जाती है। सफेद परत वाली इस मिट्टी को ‘रेह या कल्लर’ के नाम से पुकारते हैं। उत्तर प्रदेश और हरियाणा के शुष्क भागों में इसका विस्तार सबसे अधिक है।

(vi) भूड (Bhur)-

       बांगर मिट्टी के उन क्षेत्रों में जहां आवरण क्षय के फलस्वरूप ऊपर की मुलायम मिट्टी नष्ट हो गई है वहां अब कंकरीली ऊंची भूमि मिलती है। ऐसी भूमि को भूड़ कहते हैं। गंगा और रामगंगा नदियों के प्रवाह क्षेत्रों में भूड़ का जमाव विशेष रूप से पाया जाता है।

(vii) शंकु तथा अन्तःशंकु (Cones and Inter cones)-

        इस विशाल मैदान में नदियों के निक्षेपण के परिणामस्वरूप जलोढ़ पंख अथवा शंकु तथा अन्तः शंकुओं का निर्माण हुआ है। हिमालय की घाघरा नदी को छोड़कर बाकी सभी नदियों ने जलोढ़ शंकुओं का निर्माण किया है। इन शंकुओं का आधार दक्षिण में मैदान की तरफ तथा शीर्ष पहाड़ियों से नदी के निकास बिन्दु की तरफ होता है। इनका तल उत्तल (Convex) होता है। अन्तः शंकुओं का आकार इसके ठीक विपरीत होता है और इसके किनारे अवतल (Concave) होते हैं।

         निक्षेप के विस्तार के साथ-साथ शंकु एवं अन्तः शंकुओं के कुछ स्थानों पर आपस में मिलने से शंकु-पाद मैदानों (Cone-foot Plains) का निर्माण हुआ है। हिमालय की अधिकांश नदियों ने सामान्य शंकु बनाये हैं जबकि व्यास रावी एवं महानन्दा तिस्ता नदियों ने मिश्रित शंकुओं (Composite cones) का निर्माण किया है। उत्तरी बिहार में गंडक और कोसी, झारखण्ड में महानन्दा और तिस्ता नदियों ने बड़े पैमाने पर शंकुओं का निर्माण किया है। ये शंकु एक-दूसरे से अन्तः शंकुओं द्वारा विभाजित हैं।

(viii) डेल्टा (Delta)-

        गंगा तथा सिन्धु नदियों के डेल्टा इस मैदानी भाग के दो महत्वपूर्ण संरचनात्मक अंग हैं। गंगा का डेल्टा राजमहल की पहाड़ियों से सुन्दरवन के किनारे तक 430 किमी की लम्बाई में फैला हुआ है। इसकी चौड़ाई 480 किमी है। गंगा के डेल्टा में तलछट के निक्षेप की मात्रा अधिक तथा अत्यधिक गहराई तक विद्यमान है। इस डेल्टा में निक्षेपित तलछट के कण बहुत ही महीन हैं। सिन्धु नदी का डेल्टा यद्यपि 960 किमी लम्बा है किन्तु इसकी चौड़ाई 160 किमी ही है। सिन्धु नदी के डेल्टा में तलछट के निक्षेप की मात्रा औ गहराई भी कम है। इस डेल्टा में निक्षेपित तलछट के कण भी अपेक्षाकृत मोटे हैं।

प्रश्न प्रारूप

सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान के प्रमुख भू-आकृतिक स्वरूपों का वर्णन कीजिए।


Read More:

1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व

(Distribution and Density of Population of India)


भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व⇒

परिचय –

     किसी देश में उत्पत्ति के संसाधनों में जनसंख्या का अधिक महत्व होता है। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और देश की आर्थिक एवं व्यापारिक उन्नति वहाँ पाए जाने वाले जनसंख्या के वितरण, उसके घनत्व एवं लोगों के स्वभाव पर निर्भर करती है। अतः जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को जानना अति आवश्यक है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.2 करोड़ है तथा औसतन जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। वास्तव में वर्तमान में भारत विश्व का सघन बसे देशों की श्रेणी में सम्मिलित है। संपूर्ण विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4%  भाग भारत के पास है अर्थात क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में सातवाँ परंतु जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। भारत में विश्व की 17.5 % से अधिक जनसँख्या निवास करती है।     

    भारत में जनसंख्या का वितरण बहुत ही असमान है। देश की 16.51% जनसंख्या अकेले उत्तर प्रदेश में निवास करती है। यह जनसंख्या जापान की कुल जनसंख्या के बराबर है। जनसंख्या वितरण का सही ज्ञान जनसंख्या घनत्व से  होता है। प्रति इकाई क्षेत्र पर निवास करने वाली व्यक्तियों की संख्या को जनसंख्या घनत्व कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जनसंख्या घनत्व संपूर्ण जनसंख्या एवं क्षेत्रफल का अनुपात है तथा इसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या दबाव का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

      भारत में जनसंख्या का घनत्व सदैव एक समान नहीं रहा है। यह क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। निम्नलिखित तालिका से इस बात की भली-भांति पुष्टि हो जाती है।

  भारत में जनसंख्या घनत्व (1921-2011)

वर्ष जनसँख्या घनत्व

(प्रति वर्ग किलोमीटर)

1921 81
1931 90
1941 103
1951 117
1961 142
1971 177
1981 216
1991 274
2001 324
2011 382

     इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत के जनसंख्या घनत्व में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। 1931 से 1991 तक छह दशकों में जनसंख्या घनत्व 3 गुना हो गया है। 1951 से 2011 के बीच जनघनत्व में चार गुनी वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। विगत दशक में घनत्व 58 व्यक्ति प्रति किलोमीटर बढ़ा है जो 1921 से 1951 के मध्य तीन दशकों में हुई कुल 36  से भी अधिक है । 1991 की जनगणना के अनुसार देश में जनसंख्या घनत्व 267 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था जो  2001 में 324 तथा 2011 में 382 हो गई। यह एक ओर  बांग्लादेश, नीदरलैंड, जापान जैसे देशों से कम है तो दूसरी ओर कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और विश्व की तुलना में बहुत अधिक है। देश के विभिन्न भागों में जनसंख्या घनत्व में असमानता है। यह असमानता देश, राज्य और जिला स्तर पर देखने को मिलता है।

       प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व एक ओर अरुणाचल प्रदेश में 17 व्यक्ति का है तो दूसरी ओर दिल्ली का जनघनत्व 11320 है। पहला पर्वतीय क्षेत्र है जहां मानव बसाव की परिस्थितियां सर्वथा प्रतिकूल है जबकि दूसरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है जहाँ मानव बसाव की परिस्थियाँ अनुकूल है। बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश,  हरियाणा उच्च जनघनत्व वाला राज्य है जबकि कई राज्यों में जनसंख्या का घनत्व राष्ट्रीय औसत से भी कम है।

     जनसख्या घनत्व के इस असमान वितरण के लिए कई कारण उत्तरदायी होते है–

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

2. मानवीय कारक

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

    जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक

  • धरातलीय संरचना
  • जलवायु
  • मिट्टी का उपजाऊपन
  • जलापूर्ति
  • खनिज पदार्थ

(i) धरातलीय संरचना-

        समतल मैदानी भाग पठारी भूतल की अपेक्षा घने बसे होते हैं, क्योंकि यहां उत्तम जलवायु व कृषि की सुविधाएं, परिवहन सुविधा और व्यापारिक सुविधा अधिक होती है जैसे- सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र। इसके अलावा पर्वतीय तथा पठारी क्षेत्रों में जनसंख्या कम होती है, क्योंकि यहां ऊंची नीची और कम उपजाऊ मिट्टी होती है। जैसे दक्कन का पठार पर्वतीय प्रदेशों में है यहां जनसंख्या बहुत कम है।

(ii) जलवायु-

      अनुकूल जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि रेगिस्तान जैसे चरम जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र काफी कम आबादी वाले क्षेत्र हैं। इसलिए, मुंबई और तमिलनाडु शहर जैसे मध्यम जलवायु का अनुभव करने वाले तटीय क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि थार रेगिस्तान और लेह और लद्दाख क्षेत्र मामूली या कम आबादी वाले हैं।

(iii) मिट्टी का उपजाऊपन-

         जहाँ की मिट्टी उपजाऊ होती है वहां मनुष्य को भोजन, वस्त्र, आवास आदि की सुविधाएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाती है। इसीलिए उपजाऊ मिट्टी वाले भूभाग घने बसे होते हैं इसके विपरीत जहां की मिट्टी कम उपजाऊ होती है वहां कम जनसंख्या पाई जाती है। यही कारण है कि गंगा के मैदान वाले क्षेत्रों में आबादी बहुत घनी है जबकि पश्चिमी राजस्थान और पश्चिमी गुजरात कम आबादी वाले क्षेत्र हैं।

(iv) जल-आपूर्ति-

       जिन भू-भागों में पर्याप्त जल उपलब्ध होते हैं वह सघन बसे होते हैं। इसके विपरीत शुष्क एवं जल आभाव वाले क्षेत्रों में जनसंख्या कम निवास करती है। प्राय: यह देखा गया है कि भारत में नदियों की घाटियों एवं डेल्टाई भागों में अधिकांश जनसंख्या निवास करती है। इसका प्रमुख कारण स्वच्छ जल की उपलब्धता ही है। शुष्क एवं पर्वतीय भागों में, जहाँ भूमिगत जल की प्राप्ति में अधिक कठिनाई होती है, जनसंख्या विरल मिलती है।

(v) खनिज पदार्थ-

         खनिज पदार्थों की उपलब्धता जनसंख्या के घनत्व को बढ़ाती है, इसलिए जहां खनिज पदार्थ की उपलब्धता अधिक होगी वहां जनसंख्या भी अधिक होगी। क्योंकि खनिजों के खनन से अनेकों उद्योग का विकास होता है। छोटानागपुर क्षेत्र में खनिज उपलब्धता के कारण ही जनसंख्या का अधिक जमाव पाया जाता है।

2. मानवीय कारक

      जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले मानवीय कारक

  • नगरीकरण
  • परिवहन साधनों का विकास
  • औद्योगिकरण
  • सामाजिक एवं धार्मिक कारण
  • कृषि  योग्य भूमि की उपलब्धता
  • धान क्षेत्र
  • राजनीतिक कारक
  • सरकार की नीतियां

(i)  नगरीकरण- 

     नगरीकरण का मुख्य कारण सुरक्षा, रोजगार, परिवहन, शिक्षा आदि सुविधाओं का नगरों में पाया जाना है। नगर वाणिज्य व्यापार उद्योग तथा प्रशासन के भी केंद्र होते हैं। अतः नगरों में जनसंख्या की अधिक वृद्धि हुई है।

(ii) परिवहन साधनों का विकास- 

       परिवहन साधनों के विकास के साथ-साथ जनसंख्या में भी वृद्धि होती जाती है। जैसे सड़कों के किनारे कस्बों और नगरों एवं औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना हो जाने से जनसंख्या बढ़ती है।

(iii) औद्योगिकरण- 

    औद्योगिक दृष्टि से विकसित प्रदेशों में जनसंख्या का घनत्व उच्च पाया जाता है क्योंकि इन प्रदेशों में रोजगार के अवसर विद्यमान होते हैं। जैसे- जमशेदपुर, भिलाई, तथा दुर्गापुर आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। इसके अतिरक्त देश के महानगरों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव अन्य कारणों की अपेक्षा वहाँ पर स्थगित औद्योगिक भू-दृश्यों के करण भी होता है ।

(iv) सामाजिक एवं धार्मिक कारण- 

    जन-घनत्व के वितरण में सामाजिक, सांस्कृतिक  एवं धार्मिक कारकों की भी अहम भूमिका होती है । पर्वतीय एवं आदिवासी क्षेत्रों में सांस्कृतिक अलगाव की प्रवृति एवं धार्मिक कारणों से स्थानांतरण पर प्रतिबन्ध मिलता है । अत: इन भागों में जनसँख्या की विरलता मिलती है । जैसे पूर्वोत्तर भारत, झारखंड, छतीसगढ़ आदि राज्यों में ।

(v) कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता-

       कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता भारत में जनसँख्या घनत्व को प्रभावित करने वाला एक सर्वप्रमुख कारक है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर रहती है। अत: देश के ऐसे भू-भाग जहाँ कृषि योग्य भूमि की अधिक उपलब्धता है, साथ ही कृषि भूमि के उपजाऊ होने के साथ-साथ अन्य भौगोलिक दशाएँ कृषि कार्यों के लिए अनुकूल है तो उन क्षेत्रों में जनसंख्या का दबाव अधिक मिलता है। गंगा-यमुना का का मैदानी भाग, पूर्वी तटीय भाग तथा मालाबार तट देश के अति सघन बसे भाग है। यह क्षेत्र कृषि के लिए देश के सर्वोत्तम क्षेत्र माने जाते है, जबकि देश के पर्वतीय भाग समतल भूमि की अनुपलब्धता के कारण विरल आबादी वाले है।

(vi) धान क्षेत्र-

         इस अनाज क्षेत्र में अधिक लोगों के जीवन-निर्वाह करने की बेजोड़ क्षमता है । गंगा का मैदान तथा पूर्वी समुद्र तटीय भाग धान के ही क्षेत्र है। यही कारण है कि यहाँ अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक जनसँख्या मिलती है। पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत (झारखण्ड, बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना) के लोगों का मुख्य आहार चावल है। बिहार और केरल में भी घनी आबादी का यही कारण है।

(vii) राजनीतिक कारक- 

       राजनितिक उथल-पुथल, असुरक्षा, असंतोष आदि राजनितिक कारकों ने देश में जनसंख्या वितरण में असमानता उत्पन्न करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकवाद बढ़ने के कारण स्थानान्तरण दर में तीव्र वृद्धि भी जनसंख्या वितरण में असमानता का कारण बन गई है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब व असम में आतंकवाद के कारण ही विरल जनसंख्या पाई जाती है।

         जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत को तीन भागों में बांटा जा सकता है-

जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत के तीन भाग

1. उच्च घनत्व के क्षेत्र-

      इसके अन्दर पूरे देश के लगभग 1/4 जिलें आते हैं। इसका विस्तार बिहार, पश्चिमी बंगाल, केरल,  उत्तर प्रदेश और हरियाणा में है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व (Population Density) 500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से अधिक मिलता है। ये क्षेत्र भारतीय कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं। 

2. मध्यम घनत्व के क्षेत्र-

        भारत में लगभग 130 जिलों में 300-500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी घनत्व पाया जाता है। भारत में मध्यम घनत्व के क्षेत्र उत्तरी भारत के उच्च घनत्व के निकटवर्ती क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र के तटवर्ती भाग, छोटा नागपुर के पठार आदि हैं। इन क्षेत्रों में धरातल की विषमता और जल की कमी पाई जाती है। इसलिए ये क्षेत्र कृषि में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते. इसलिए इन क्षेत्रों में कम जनसंख्या पाई जाती हैं। पर यहाँ खनिजों का भण्डार है जिससे ये क्षेत्र औद्योगिक और आर्थिक रूप से विकसित हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कृषि तथा लघु उद्योगों के विकास के कारण मध्यम घनत्व के कुछ क्षेत्र विकसित हुए हैं। 

3. निम्न घनत्व के क्षेत्र-

      भारत के लगभग 150 जिलों में 300 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से भी कम जनसंख्या का घनत्व मिलता है। उत्तर-पूर्व हिमालयी क्षेत्र में और पश्चिमी भारत में कमी और जनसंख्या का अल्प घनत्व मिलता है। मध्य प्रदेश और उड़ीसा के पठारी और जनजातीय क्षेत्रों, कर्नाटक के पूर्वी भाग और आंध्र प्रदेश के मध्यवर्ती भाग में भौतिक बाधाओं और कृषि के अविकसित होने के चलते कम जनसंख्या पाई जाती है। कच्छ के दलदल वाले क्षेत्र भी निम्न घनत्व वाले क्षेत्र हैं।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. बिहार – 1106
  2. पश्चिम बंगाल – 1028
  3. केरल – 860
  4. उत्तर प्रदेश – 829
  5. हरियाणा – 573

2011 के जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. अरुणाचल प्रदेश –17
  2. मिजोरम – 52
  3. सिक्किम – 86
  4. नागालैंड- 119
  5. हिमाचल प्रदेश –123

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच केंद्रशासित राज्य है-

  1. राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र दिल्ली –11320
  2. चंडीगढ़ – 9258
  3. पुद्दुचेरी – 2547
  4. दमन एवं द्वीप – 2191
  5. लक्षद्वीप – 2149

          जबकि क्षेत्रीय आधार पर भी भारत को तीन जनसंख्या वर्गों में विभाजित किया गया है-

1. उत्तर का मैदानी भाग: 

       भारत में उत्तर का मैदानी भाग सर्वाधिक जनसंख्या रखने वाला क्षेत्र है जिसमें सन् 2011 में देश की लगभग 52 करोड़ जनसंख्या (42.7 प्रतिशत) निवासित थी। उत्तर के मैदानी क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश (19.96 करोड़), बिहार (10.38 करोड़), प. बंगाल (9.13 करोड़), राजस्थान (6.86 करोड़), पंजाब (2,77 करोड़) तथा हरियाणा (2.54 करोड़) नामक राज्य देश में सवार्धिक जनसंख्या वाले राज्य हैं।

2. दक्षिण के पठारी भाग:

         जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का दूसरा स्थान है। महाराष्ट्र (11.24 करोड़), मध्य प्रदेश (7.26 करोड़), कर्नाटक (6.11 करोड़) तथा आन्ध्र प्रदेश (8.47 करोड़) दक्षिण के पठारी भाग पर विस्तृत राज्य हैं जिनमें सन् 2011 में देश की 27.3 प्रतिशत जनसंख्या निवासित थी।

3. तटवर्ती,पर्वतीय तथा मरुस्थलीय भाग:

       जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का तिसरा स्थान है। देश के सभी तटीय क्षेत्रों, उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों तथा राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थलीय भागों में प्राकृतिक एवं धरातलीय विषमता के कारण जनसंख्या कम निवासित है।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)   उत्तर प्रदेश – 16.51%

(ii)   महाराष्ट्र – 9.28%

(iii)  बिहार – 8.6%

(iv)  पश्चिम बंगाल – 7.54%

(v)   आंध्रप्रदेश – 6.99%

2011 के जनगणना के अनुसार सबसे कम जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)  सिक्किम – 0.05%

(ii)   मिजोरम – 0.09%

(iii)  अरुणाचल प्रदेश – 0.11%

(iv)   गोवा – 0.12%

(v)   नागालैंड  – 0.16%

निष्कर्ष :

       निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भारत में जनसंख्या वितरण व घनत्व सभी क्षेत्रों में एक सामान नहीं है। भारत में लगभग 50 प्रतिशत आबादी मात्र पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,  बिहार,  पश्चिम बंगाल व आंध्रप्रदेश में निवास कती है जबकि 4 प्रतिशत उतरी एवं उत्तरी पूर्वी 10 पर्वतीय राज्यों  में निवास करती है।  साथ ही भारत के जन-घनत्व में 1901 से 2011 तक हमेशा वृद्धि ही  हुआ है।



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