7. Smith Model of Industrial Location (स्मिथ का औद्योगिक अवस्थिति मॉडल)
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Smith Model of Industrial Location (स्मिथ का औद्योगिक अवस्थिति मॉडल) |
परिचय:
औद्योगिक अवस्थिति (Industrial Location) का अध्ययन आर्थिक भूगोल का महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें यह समझा जाता है कि उद्योग किसी विशेष स्थान पर क्यों स्थापित होते हैं। विभिन्न विद्वानों ने इस विषय पर अनेक सिद्धांत दिए, जिनमें David M. Smith का मॉडल विशेष महत्व रखता है।
डी. एम. स्मिथ ने 1971 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “Industrial Location” में औद्योगिक अवस्थिति का एक सरल एवं व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत किया, जो ब्राजील में इस्पात उद्योग के उनके अध्ययन पर आधारित था। Smith का दृष्टिकोण लाभ अधिकतम (Profit Maximization) के बजाय लागत न्यूनकरण (Cost Minimization) और व्यवहारिक (Behavioral) कारकों पर आधारित है।
Smith Model का अर्थ:
Smith Model औद्योगिक अवस्थिति का एक व्यवहारिक (Behavioral) मॉडल है, जिसमें यह माना गया है कि उद्योग हमेशा अधिकतम लाभ प्राप्त करने के बजाय न्यूनतम लागत एवं संतोषजनक लाभ (Satisficing Profit) के आधार पर स्थान का चयन करते हैं।
✍️ यह मॉडल वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखता है, जहाँ निर्णय पूर्णतः तर्कसंगत (Perfectly Rational) नहीं होते।
मान्यताएँ (Smith Model Assumptions):
स्मिथ ने अपने सिद्धांत के काम करने के लिए निम्नलिखित कुछ शर्तों को मान लिया, जो इस प्रकार हैं।
- उत्पादकों को लागत एवं राजस्व की स्थानिक भिन्नताओं का पूर्ण नहीं, बल्कि अपूर्ण ज्ञान होता है।
- भूमि, श्रम और पूंजी जैसे उत्पादन कारकों के स्रोत भौगोलिक रूप से स्थिर होते हैं तथा असमान रूप से वितरित रहते हैं।
- उत्पादन कारकों की आपूर्ति पर्याप्त (लगभग असीमित) मानी जाती है।
- उत्पादक तर्कसंगत (Rational) व्यवहार करते हैं, लेकिन पूर्णतः आदर्श नहीं होते।
- वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग समय के साथ स्थिर रहती है, परंतु स्थान के अनुसार भिन्न होती है।
- उत्पादक ऐसे स्थान का चयन करते हैं जो उन्हें संतोषजनक (Satisficing) लाभ प्रदान करे।
- औद्योगिक समूह (Industrial Clusters) हमेशा सभी उत्पादकों के लिए उपयुक्त नहीं होते, फिर भी कुछ उत्पादक अधिक लाभ के लिए वहाँ स्थापित हो सकते हैं।
स्मिथ के औद्योगिक स्थान सिद्धांत की कार्यप्रणाली:
स्मिथ ने प्रारंभ में वेबर की तरह न्यूनतम लागत वाले स्थान की खोज के लिए आइसोडेपेन्स का उपयोग किया, लेकिन इसे अव्यावहारिक मानते हुए उन्होंने वास्तविक दुनिया के तत्व—जैसे अपूर्ण ज्ञान और “संतोषजनक लाभ” (Satisficing) को शामिल किया। उन्होंने लागत कंटूर एवं राजस्व कंटूर (आइसोप्लेथ्स) के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर लागत व राजस्व के परिवर्तन को दर्शाया, इसलिए इसे क्षेत्र-लागत वक्र सिद्धांत भी कहा जाता है।
1. स्थिर लागत – परिवर्तनीय राजस्व
इस स्थिति में लागत सभी स्थानों पर समान रहती है, जबकि राजस्व स्थान के अनुसार बदलता है। मांग सामान्यतः शहरी क्षेत्रों में अधिक और ग्रामीण क्षेत्रों में कम होती है। इसलिए उद्योग ऐसे स्थान का चयन करता है जहाँ राजस्व लागत से अधिक हो। जहाँ लागत और राजस्व बराबर हो जाते हैं, उनके बीच का क्षेत्र लाभप्रदता का स्थानिक मार्जिन कहलाता है।

2. परिवर्तनीय लागत – स्थिर राजस्व
इसमें राजस्व स्थिर रहता है, जबकि लागत स्थान के अनुसार बदलती है। कच्चे माल के स्रोत के निकट लागत कम होती है (जैसे लोहा-इस्पात उद्योग)। इसलिए उद्योग लागत को न्यूनतम करने हेतु स्रोत के पास स्थापित होता है, क्योंकि लाभ बढ़ाने का एकमात्र तरीका लागत घटाना होता है।

3. परिवर्तनीय लागत – परिवर्तनीय राजस्व
यह वास्तविक स्थिति है, जहाँ लागत और राजस्व दोनों स्थान के अनुसार बदलते हैं। उद्योग ऐसे स्थान का चयन करता है जहाँ राजस्व लागत से अधिक हो और लाभ अधिकतम (या संतोषजनक) हो। प्रतिस्पर्धा, परिवहन लागत और बाजार की दूरी इस चयन को प्रभावित करते हैं, जिससे एक निश्चित भौगोलिक सीमा के भीतर ही उद्योग टिके रहते हैं।

Smith Model की प्रमुख विशेषताएँ:
- यह मॉडल व्यवहारिक (Behavioral) दृष्टिकोण पर आधारित है।
- उद्योग अधिकतम लाभ के बजाय संतोषजनक लाभ (Satisficing Profit) को प्राथमिकता देते हैं।
- निर्णय सीमित जानकारी और अनिश्चितता की स्थिति में लिए जाते हैं।
- लागत न्यूनकरण (Cost Minimization) पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- मानवीय व्यवहार एवं वास्तविक परिस्थितियों को शामिल किया जाता है।
मॉडल के मुख्य घटक:
(i) लागत (Cost Factors):
इस मॉडल में उद्योग उस स्थान का चयन करता है जहाँ कुल लागत न्यूनतम हो। इसमें परिवहन लागत, श्रम लागत, भूमि एवं किराया, ऊर्जा तथा कच्चे माल की उपलब्धता जैसे कारक शामिल होते हैं, जो उत्पादन की कुल लागत को प्रभावित करते हैं।
(ii) राजस्व (Revenue):
उद्योग के लिए बाजार की निकटता, उत्पाद की मांग और मूल्य निर्धारण महत्वपूर्ण होते हैं। जहाँ मांग अधिक और बाजार सुलभ होता है, वहाँ उद्योग को अधिक आय प्राप्त होने की संभावना रहती है।
(iii) लाभ (Profit):
लाभ = राजस्व – लागत के आधार पर निर्धारित होता है, परंतु Smith Model में उद्योग अधिकतम लाभ के बजाय “संतोषजनक लाभ” (Satisficing Profit) को प्राथमिकता देते हैं, जो व्यवहारिक निर्णय को दर्शाता है।
- कच्चे माल की उपलब्धता उद्योग के स्थान चयन को प्रभावित करती है।
- बाजार की निकटता उत्पाद की मांग और बिक्री को सुनिश्चित करती है।
- परिवहन सुविधा लागत को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- श्रम की उपलब्धता और लागत उद्योग के लिए आवश्यक होती है।
- ऊर्जा एवं बिजली की आपूर्ति उत्पादन के लिए अनिवार्य है।
- भूमि की लागत और उपलब्धता स्थान चयन को प्रभावित करती है।
- सरकारी नीतियाँ एवं प्रोत्साहन उद्योगों को आकर्षित करते हैं।
Smith Model के लाभ:
- यह मॉडल वास्तविक परिस्थितियों और मानवीय व्यवहार को ध्यान में रखता है।
- निर्णय प्रक्रिया में अनिश्चितता और सीमित जानकारी को शामिल करता है।
- “संतोषजनक लाभ” (Satisficing) की अवधारणा से व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
- आधुनिक औद्योगिक निर्णयों और बाजार स्थितियों के अधिक अनुकूल है।
- केवल लागत ही नहीं, बल्कि अन्य व्यवहारिक कारकों को भी महत्व देता है।
Smith Model की सीमाएँ:
- यह मॉडल स्पष्ट गणितीय आधार प्रदान नहीं करता, जिससे सटीक विश्लेषण कठिन होता है।
- सभी प्रकार के उद्योगों पर समान रूप से लागू नहीं होता।
- “संतोषजनक लाभ” (Satisficing) की अवधारणा अस्पष्ट और व्यक्तिपरक होती है।
- निर्णय प्रक्रिया जटिल होती है और कई कारकों पर निर्भर करती है।
- डेटा एवं जानकारी की उपलब्धता सीमित होने पर मॉडल की उपयोगिता घट जाती है।
आधुनिक संदर्भ में महत्व:
वर्तमान वैश्वीकरण और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के दौर में Smith Model का महत्व काफी बढ़ गया है। यह मॉडल बताता है कि उद्योग केवल अधिकतम लाभ पर नहीं, बल्कि व्यवहारिक परिस्थितियों, जोखिम और सीमित जानकारी के आधार पर निर्णय लेते हैं।
आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ स्थान चयन में लागत के साथ-साथ बाजार, श्रम कौशल, जीवन गुणवत्ता और नीतिगत वातावरण को भी ध्यान में रखती हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था और ई-कॉमर्स के बढ़ते प्रभाव में भी लचीलापन और त्वरित निर्णय महत्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे में Smith Model का “संतोषजनक लाभ” दृष्टिकोण आधुनिक औद्योगिक नियोजन को समझने में अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक सिद्ध होता है।
निष्कर्ष:
Smith Model औद्योगिक अवस्थिति के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण व्यवहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह मॉडल यह स्पष्ट करता है कि वास्तविक जीवन में उद्योग पूर्ण तर्कसंगत निर्णय नहीं लेते, बल्कि सीमित जानकारी और जोखिम को ध्यान में रखते हुए संतोषजनक विकल्प चुनते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ विविधता और अनिश्चितता अधिक है, यह मॉडल औद्योगिक नियोजन को समझने में अत्यंत उपयोगी है।
नोट:
Important Points
✍️ औद्योगिक अवस्थिति सिद्धांतों में ‘लाभप्रदता के स्थानिक उपांत’ (Spatial Margin of Profitability) की अवधारणा David M. Smith द्वारा प्रस्तुत की गई थी।
✍️ डी. एम. स्मिथ ने 1971 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “Industrial Location” में औद्योगिक अवस्थिति का एक सरल एवं व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत किया, जो ब्राज़ील में इस्पात उद्योग के उनके अध्ययन पर आधारित था।
✍️ यह सिद्धांत बताता है कि एक निश्चित भौगोलिक सीमा (उपांत) के भीतर स्थित उद्योगों को लाभ प्राप्त होता है, जबकि इस सीमा के बाहर स्थित उद्योगों को हानि होती है। इसलिए इसे “स्थानिक उपांत सिद्धांत” कहा जाता है।
✍️ साथ ही, लागत और राजस्व के स्थानिक परिवर्तन को दर्शाने के कारण इसे “क्षेत्र-लागत वक्र सिद्धांत” (Area Cost Curve Theory) के नाम से भी जाना जाता है।
✍️ निष्कर्षतः, ‘लाभप्रदता के स्थानिक उपांत’ की अवधारणा डी. एम. स्मिथ द्वारा प्रतिपादित की गई थी।
