3. Conventional Energy Resources: Coal – Distribution, Production, and Conservation / पारंपरिक ऊर्जा संसाधन: कोयला – वितरण, उत्पादन एवं संरक्षण
Conventional Energy Resources: Coal – Distribution, Production, and Conservationपारंपरिक ऊर्जा संसाधन: कोयला – वितरण, उत्पादन एवं संरक्षण |

परिचय:
ऊर्जा संसाधन किसी भी देश के आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं। पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों (Conventional Energy Resources) में कोयला (Coal) सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत सहित विश्व के कई देशों में बिजली उत्पादन, उद्योग एवं परिवहन में कोयले का व्यापक उपयोग होता है। कोयला एक जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) है, जो लाखों वर्षों पूर्व वनस्पतियों के अवशेषों के दबाव एवं ताप के कारण बना है। हालांकि, यह एक सीमित (Non-renewable) संसाधन है, इसलिए इसके संरक्षण और कुशल उपयोग की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कोयले के प्रकार
(i) एंथ्रासाइट (Anthracite): उच्च गुणवत्ता, अधिक कार्बन
(ii) बिटुमिनस (Bituminous): औद्योगिक उपयोग के लिए प्रमुख
(iii) लिग्नाइट (Lignite): निम्न गुणवत्ता, अधिक नमी
(iv) पीट (Peat): प्रारंभिक अवस्था
विश्व में कोयले का वितरण (Distribution of Coal in World):
विश्व में कोयले का वितरण असमान है और यह मुख्यतः प्राचीन भूवैज्ञानिक संरचनाओं, विशेषकर गोंडवाना एवं टर्शियरी कालीन चट्टानों से संबंधित है। एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में कोयले के प्रमुख भंडार पाए जाते हैं। चीन विश्व का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता है, जबकि अमेरिका में विशाल भंडार विशेषकर एपलाचियन क्षेत्र में स्थित हैं।
रूस के साइबेरिया क्षेत्र में भी बड़े कोयला भंडार हैं। ऑस्ट्रेलिया प्रमुख निर्यातक देश है, जो उच्च गुणवत्ता वाले कोयले के लिए जाना जाता है। भारत, दक्षिण अफ्रीका और जर्मनी भी प्रमुख कोयला उत्पादक देशों में शामिल हैं।
इस प्रकार, कोयले का वितरण औद्योगिक विकास एवं ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत में कोयले का वितरण
भारत में कोयले के भंडार मुख्यतः दो श्रेणियों में पाए जाते हैं-
1. गोंडवाना कोयला (Gondwana Coal):
गोंडवाना कोयला भारत में पाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक कोयला प्रकार है, जो लगभग 250 मिलियन वर्ष पूर्व गोंडवाना काल में बना था। यह भारत के कुल कोयला भंडार का लगभग 98% हिस्सा बनाता है और मुख्यतः कठोर, उच्च गुणवत्ता वाला बिटुमिनस कोयला होता है, जो उद्योगों एवं तापीय विद्युत उत्पादन के लिए उपयुक्त है।
इसका वितरण मुख्य रूप से दामोदर, महानदी, सोन एवं गोदावरी नदी घाटियों में पाया जाता है। प्रमुख क्षेत्र हैं- झारखंड (झरिया, बोकारो), पश्चिम बंगाल (रानीगंज), छत्तीसगढ़ (कोरबा), ओडिशा (तालचेर) और मध्य प्रदेश।
गोंडवाना कोयला भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, हालांकि इसके खनन से पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं, जिनका समाधान आवश्यक है।
2. टर्शियरी कोयला (Tertiary Coal):
टर्शियरी कोयला अपेक्षाकृत नवीन भूवैज्ञानिक काल, अर्थात टर्शियरी युग (लगभग 15-60 मिलियन वर्ष पूर्व) में बना है। यह मुख्यतः निम्न गुणवत्ता का होता है, जिसमें कार्बन की मात्रा कम तथा नमी और अशुद्धियाँ अधिक होती हैं। इस कारण इसकी ऊष्मा उत्पादन क्षमता गोंडवाना कोयले की तुलना में कम होती है।
भारत में टर्शियरी कोयला मुख्यतः पूर्वोत्तर राज्यों में पाया जाता है, जैसे- असम, मेघालय, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश। इसके अतिरिक्त कुछ भंडार जम्मू-कश्मीर में भी मिलते हैं।
यह कोयला प्रायः स्थानीय उपयोग के लिए प्रयोग किया जाता है, जैसे घरेलू ईंधन एवं छोटे उद्योगों में। हालांकि इसकी गुणवत्ता कम होने के कारण बड़े औद्योगिक उपयोग में इसकी सीमित भूमिका होती है, फिर भी यह क्षेत्रीय ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
कोयला उत्पादन (Coal Production):
भारत विश्व के प्रमुख कोयला उत्पादक देशों में शामिल है और चीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। हाल के वर्षों में भारत का कोयला उत्पादन निरंतर बढ़ा है, जो ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
वर्ष 2022-23 में भारत का कुल कोयला उत्पादन लगभग 893 मिलियन टन (MT) रहा, जबकि 2023-24 में यह बढ़कर लगभग 997 मिलियन टन तक पहुँच गया। सरकार का लक्ष्य 2025-26 तक उत्पादन को 1.5 बिलियन टन तक बढ़ाने का है।
भारत में कोयला उत्पादन का अधिकांश हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी Coal India Limited द्वारा किया जाता है, जो कुल उत्पादन का लगभग 80% योगदान देती है। इसके अलावा SCCL (Singareni Collieries Company Limited) और निजी क्षेत्र की कंपनियाँ भी उत्पादन में भागीदारी करती हैं।
प्रमुख उत्पादक राज्य हैं- झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल। इनमें छत्तीसगढ़ और ओडिशा अग्रणी हैं, जहाँ बड़े कोयला क्षेत्र जैसे कोरबा और तालचेर स्थित हैं।
भारत में लगभग 85% कोयला ओपन-कास्ट (Open Cast Mining) विधि से निकाला जाता है, जो सस्ता और अधिक उत्पादन देने वाला है।
कोयले का प्रमुख उपयोग तापीय विद्युत उत्पादन (लगभग 70%), इस्पात उद्योग और सीमेंट उद्योग में होता है।
हालाँकि उत्पादन में वृद्धि से ऊर्जा उपलब्धता बढ़ती है, लेकिन इससे पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं, इसलिए संतुलित एवं सतत उत्पादन आवश्यक है।
कोयले का संरक्षण (Conservation of Coal):
कोयला एक सीमित एवं अपुनर्नवीकरणीय संसाधन है, इसलिए इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए ऊर्जा का कुशल उपयोग, उन्नत एवं स्वच्छ कोयला तकनीकों (Clean Coal Technology) का अपनाना और खनन में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करना जरूरी है। कोयले के अपशिष्ट का पुनः उपयोग तथा ऊर्जा दक्षता बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए।
इसके साथ ही सौर, पवन एवं जल ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्बन उत्सर्जन को कम करना और भूमि पुनर्वास (Land Reclamation) जैसे उपाय भी महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष
कोयला पारंपरिक ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसने औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, इसके सीमित भंडार और पर्यावरणीय प्रभावों को देखते हुए इसका विवेकपूर्ण उपयोग एवं संरक्षण आवश्यक है। भारत को ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर भी ध्यान देना होगा, ताकि संतुलित एवं सतत विकास सुनिश्चित किया जा सके।
