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Chapter 14 Movements of Oceanic Water (महासागरीय जल संचलन)

Chapter 14 Movements of Oceanic Water

(महासागरीय जल संचलन)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 14 Movements of Oceanic Water

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है

(क) ज्वार

(ख) तरंग

(ग) धाराएँ

(घ) ऊपर में से कोई नहीं

उत्तर- (ख) तरंग

व्याख्या:

     महासागरीय जल की ऊपर-नीचे (up and down) गति मुख्य रूप से तरंगों (Waves) से संबंधित होती है। तरंगें हवा के प्रभाव से समुद्र की सतह पर बनती हैं और ये जल को ऊपर-नीचे चलाती हैं।

⇒ ज्वार (Tides) – समुद्र जल का नियमित ऊपर-नीचे उठना-गिरना है, लेकिन यह पूरे समुद्र स्तर पर होता है।

⇒ धाराएँ (Currents) – समुद्र जल का क्षैतिज दिशा में बहाव दर्शाती हैं।

    इसलिए, प्रश्न में “ऊपर एवं नीचे गति” विशेष रूप से तरंगों द्वारा होती है।

(ii) वृहत् ज्वार आने का क्या कारण है?

(क) सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल

(ख) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा एक-दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल

(ग) तटरेखा का दंतुरित होना

(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (क) सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल

व्याख्या:

     वृहत् ज्वार (Spring Tide) आने का कारण है-

सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल लगाना।

⇒ जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में होते हैं (अमावस्या और पूर्णिमा के समय), तब दोनों का गुरुत्वाकर्षण बल मिलकर ज्वार की ऊँचाई को बहुत बढ़ा देता है। इसी को वृहत् ज्वार कहा जाता है।

(iii) पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?

(क) अपसौर

(ख) उपसौर

(ग) उपभू

(घ) अपभू

उत्तर- (ग) उपभू

व्याख्या:

     जब चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है, उस अवस्था को उपभू (Perigee) कहा जाता है।

⇒ उपभू = पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी

⇒ अपभू (Apogee) = पृथ्वी और चन्द्रमा की अधिकतम दूरी

⇒ उपसौर/अपसौर सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी के लिए उपयोग किए जाते हैं।

(iv) पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?

(क) अक्टूबर

(ख) जुलाई

(ग) सितम्बर

(घ) जनवरी

उत्तर- (घ) जनवरी

व्याख्या:

    सही उत्तर इनमें से कोई भी विकल्प शत-प्रतिशत सही नहीं है, क्योंकि पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी “उपभू (Perigee)” पर होती है, और उपभू हर 27.3 दिन (एक चन्द्र मास) में आता है, किसी एक निर्धारित महीने में नहीं।

      लेकिन यदि यह प्रश्न महीने के आधार पर एक उत्तर चुनने के लिए दिया गया है, तो परीक्षा में सामान्यतः माना जाता है कि:

➡ जनवरी (घ)
    क्योंकि जनवरी में पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (उपसौर) होती है, जिससे पृथ्वी-चन्द्रमा दूरी कई वर्षों में औसतन थोड़ी कम पाई जाती है।

अतः परीक्षा-उन्मुख उत्तर: (घ) जनवरी

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) तरंगें क्या हैं?

उत्तर- तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं। तरंगों में जल का कण छोटे वृत्ताकार रूप में गति करते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं।

    दूसरे शब्दों में तरंगें जल की वह गति हैं जिसमें जल के कण ऊपर-नीचे दोलन करते हैं, परंतु वे आगे नहीं बढ़ते। केवल तरंग का रूप आगे बढ़ता है। यह मुख्यतः हवा के दबाव और वेग से उत्पन्न होती हैं। समुद्र की सतह पर दिखाई देने वाली ऊँच-नीच यही तरंगें कहलाती हैं।

(ii) महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?

उत्तर- वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं। बड़ी तरंगें खुले महासागरों में पायी जाती हैं। तरंगें जैसे ही आगे की ओर बढ़ती हैं बड़ी होती जाती हैं तथा वायु से ऊर्जा को अवशोषित करती हैं।

        दूसरे शब्दों में महासागरीय तरंगें मुख्य रूप से वायु (हवा) के प्रवाह से ऊर्जा प्राप्त करती हैं। जब तेज हवा समुद्र की सतह पर बहती है तो वह घर्षण पैदा करती है, जिससे पानी की सतह पर तरंगें बनती हैं। इसके अलावा भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और चन्द्रमा-सूर्य के गुरुत्वाकर्षण भी कुछ तरंगों को ऊर्जा प्रदान करते हैं।

(iii) ज्वार-भाटा क्या है?

उत्तर- ज्वारभाटा समुद्र के जलस्तर का नियमित रूप से ऊपर उठना और नीचे गिरना है। यह मुख्यतः चन्द्रमा तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण आकर्षण के कारण होता है। जलस्तर का बढ़ना ज्वार तथा घटकर न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाना भाटा कहलाता है। यह प्रक्रिया प्रतिदिन दो बार होती है।

(iv) ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?

उत्तर- ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के मुख्य कारण निम्नलिखित है-

1. चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण – ज्वार-भाटा का सबसे बड़ा कारण चन्द्रमा का पृथ्वी के महासागरों पर आकर्षण बल है।

2. सूर्य का गुरुत्वाकर्षण – सूर्य भी ज्वार-भाटा को प्रभावित करता है, हालांकि इसका प्रभाव चन्द्रमा से कम होता है।

3. पृथ्वी का घूर्णन – पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, जिससे जलस्तर में नियमित उतार-चढ़ाव होता है।

4. सूर्य-चन्द्रमा-पृथ्वी की स्थिति – जब सूर्य और चन्द्रमा एक सीध में होते हैं, तो वृहत् ज्वार (Spring tide) बनती है; विपरीत स्थिति में क्षीण ज्वार (Neap tide)।

5. समुद्री तटरेखा का आकार – खाड़ी, मुहाना या संकरी तटीय संरचना में ज्वार की ऊँचाई बढ़ जाती है।

(v) ज्वार-भाटा नौका संचालन से कैसे संबंधित हैं?

उत्तर- ज्वार-भाटा नौका संचालन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऊँचा ज्वार (High Tide) होने पर समुद्र का जल स्तर बढ़ जाता है, जिससे जहाज और नौकाएँ आसानी से तट पर आ-जा सकती हैं तथा उथले स्थानों में भी संचरण सम्भव हो जाता है।

    कम ज्वार (Low Tide) के समय जल स्तर घटने से कई तटीय क्षेत्र उथले हो जाते हैं, जिससे नौकाओं के फँसने या टकराने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए बंदरगाहों में जहाजों की आवाजाही, माल लोडिंग-अनलोडिंग तथा नौकायन का समय प्रायः ज्वार-भाटा तालिकाओं के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) जलधाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं ? उत्तर पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये कैसे प्रभावित करते हैं?

उत्तर- जलधाराएँ (Ocean Currents) और तापमान पर उनका प्रभाव:

    जलधाराएँ महासागरों में बहने वाली विशिष्ट दिशा वाली गर्म तथा शीतल धाराएँ होती हैं, जो अपने साथ ताप ऊर्जा (Heat Energy) का स्थानांतरण करती हैं। गर्म जलधाराएँ जिन क्षेत्रों से गुजरती हैं, वहाँ का तापमान बढ़ा देती हैं, क्योंकि वे उष्ण कटिबंध से अधिक गर्म पानी को उच्च अक्षांशों की ओर ले जाती हैं।

    इसके विपरीत, शीत जलधाराएँ ध्रुवीय या शीत क्षेत्रों का ठंडा पानी भूमध्य रेखा की ओर ले जाती हैं और जिन तटों के पास बहती हैं, वहाँ तापमान घटा देती हैं। इस प्रकार जलधाराएँ किसी क्षेत्र के जलवायु नियंत्रण (Climate Regulation) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उत्तर-पश्चिम यूरोप पर प्रभाव:

     उत्तर-पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को मुख्य रूप से गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) तथा उसकी शाखा नॉर्थ अटलांटिक ड्रिफ्ट प्रभावित करती है। ये गर्म जलधाराएँ मैक्सिको की खाड़ी से अत्यधिक गर्म पानी को यूरोप की ओर लेकर जाती हैं। परिणामस्वरूप-

⇒ ब्रिटेन, आयरलैंड, नॉर्वे व आस-पास के तटीय क्षेत्रों का सर्दी का तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहता है।

⇒ समान अक्षांशों वाले कनाडा या रूस की तुलना में यहाँ ठंड कम पड़ती है।

⇒ बंदरगाह सालभर बर्फमुक्त रहते हैं, जिससे व्यापार व नौपरिवहन सुगम होता है।

    इस प्रकार जलधाराएँ उत्तर-पश्चिम यूरोप को अपेक्षाकृत मृदु तथा संतुलित जलवायु प्रदान करती हैं।

(ii) जलधाराएं कैसे उत्पन्न होती हैं?

उत्तर- जलधाराएँ (Ocean Currents) महासागरों में बहने वाली विशाल जल-धाराएँ हैं, जो पृथ्वी की जलवायु, तापमान और देशों के समुद्री व्यापार को प्रभावित करती हैं। इनका निर्माण कई भौतिक कारणों से होता है। जलधाराओं के उत्पन्न होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

जलधाराओं के उत्पन्न होने के कारण:

1. पवन (Wind):-

    समुद्री पवनें जैसे ट्रेड विंड्स और वेस्टरलीज सतही जल को धकेलती हैं, जिससे सतही जलधाराएँ बनती हैं।

2. तापमान का अंतर (Temperature Difference):-

       भूमध्य रेखा पर गर्म जल ऊपर उठता है और ध्रुवों की ओर बहता है, जबकि ठंडा जल नीचे की ओर डूबकर भूमध्य रेखा की ओर आता है। इस तापमान अंतर से जलधाराएँ उत्पन्न होती हैं।

3. लवणता (Salinity Difference):-

     अधिक लवणता वाला जल भारी होता है और नीचे की ओर जाता है, जबकि कम लवणता वाला जल ऊपर रहता है। इस घनत्व के अंतर से गहरी जलधाराएँ बनती हैं।

4. पृथ्वी का घूर्णन (Coriolis Force):-

    पृथ्वी के घूमने से जलधाराओं की दिशा मुड़ जाती है—उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर।

5. समुद्री तल का ढाल और आकार (Ocean Basin Relief):-

     समुद्र के तल पर पहाड़, घाटियाँ, ढलान और तटरेखाओं का आकार जलधाराओं की दिशा और गति को प्रभावित करते हैं।

6. ज्वार-भाटा (Tides):-

    चन्द्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से ज्वार-भाटा उत्पन्न होते हैं, जो तटीय क्षेत्रों में स्थानीय जलधाराएँ बनाते हैं।

निष्कर्ष:-

    जलधाराएँ कई प्राकृतिक कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती हैं और पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण भाग हैं।

Chapter 15 Life on the Earth (पृथ्वी पर जीवन)

Chapter 15 Life on the Earth

(पृथ्वी पर जीवन)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 15 Life on the Earth

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं

(क) केवल पौधे

(ख) केवल प्राणी

(ग) सभी जैव व अजैव जीव

(घ) सभी जीवित जीव

उत्तर- (ग) सभी जैव व अजैव जीव

व्याख्या:

     जैवमंडल (Biosphere) में पृथ्वी के वे सभी भाग सम्मिलित होते हैं जहाँ जीवन पाया जाता है, और इसमें जैव घटक (जीवित – पौधे, प्राणी, सूक्ष्मजीव) तथा अजैव घटक (निर्जीव — वायु, जल, मृदा आदि) दोनों शामिल होते हैं।

(ii) उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं

(क) प्रेयरी

(ख) स्टेपी

(ग) सवाना

(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (ग) सवाना

व्याख्या:

       उष्णकटिबंधीय घास के मैदानों को सवाना (Savanna) कहा जाता है। ये क्षेत्र मुख्यतः अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं, जहाँ वर्षा सीमित और मौसमी होती है।

(iii) चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है

(क) आयरन कार्बोनेट

(ख) आयरन ऑक्सइड

(ग) आयरन नाइट्राइट

(घ) आयरन सल्फेट

उत्तर- (ख) आयरन ऑक्सइड

व्याख्या:

     चट्टानों में मौजूद लोहा (Iron) जब ऑक्सीजन के संपर्क में आता है तो वह ऑक्सीकरण (oxidation) क्रिया द्वारा आयरन ऑक्साइड (Iron Oxide) बनाता है। यह प्रक्रिया “जंग लगना (rusting)” कहलाती है और चट्टानों के लाल या भूरे रंग का कारण भी यही है।

(iv) प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है

(क) प्रोटीन

(ख) कार्बोहाइड्रेट्स

(ग) एमिनोएसिड

(घ) विटामिन

उत्तर- (ख) कार्बोहाइड्रेट्स

व्याख्या:

      प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया में पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) को मिलाकर कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़ – C₆H₁₂O₆) और ऑक्सीजन (O₂) बनाते हैं।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i) पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- पारिस्थितिकी (Ecology) वह विज्ञान है जिसमें जीवों और उनके परिवेश के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। यह बताती है कि जीव अपने वातावरण में कैसे रहते हैं, एक-दूसरे पर कैसे निर्भर करते हैं तथा पर्यावरणीय कारकों जैसे जल, वायु, मिट्टी और प्रकाश से उनका क्या संबंध होता है।

(ii) पारितंत्र (Ecological System) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएँ।

उत्तर- पारितंत्र (Ecological System) जीवित (जैव) और निर्जीव (अजैव) तत्वों का ऐसा तंत्र है जो आपस में परस्पर क्रिया करके जीवन को बनाए रखता है। प्रमुख पारितंत्र प्रकार हैं- स्थलीय पारितंत्र (जैसे वन, मरुस्थल, घासभूमि) और जलीय पारितंत्र (जैसे मीठे जल और समुद्री पारितंत्र)।

(iii) खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य श्रृंखला का एक उदाहरण देते हुए उसके अनेक स्तर बताएं?

उत्तर- खाद्य श्रृंखला वह क्रम है जिसमें एक जीव दूसरे जीव को भोजन के रूप में खाता है और ऊर्जा एक स्तर से दूसरे स्तर तक प्रवाहित होती है।
उदाहरण (चराई खाद्य श्रृंखला):
घास → हिरण → बाघ।
      इसमें घास उत्पादक, हिरण प्राथमिक उपभोक्ता और बाघ द्वितीयक उपभोक्ता होता है।

अन्य उदाहरण –

♣ घास → हिरण → शेर।

♣ घास → कीट → मेढ़क → पक्षी।

(iv) खाद्य जाल (food wed) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएँ।

उत्तर- खाद्य जाल (Food Web) से तात्पर्य उस जटिल तंत्र से है जिसमें एक पारितंत्र (ecosystem) के अनेक खाद्य श्रृंखलाएँ (food chains) आपस में जुड़ी होती हैं। इसमें विभिन्न जीव एक-दूसरे पर भोजन के लिए निर्भर रहते हैं।
उदाहरण: घास → हिरण → बाघ तथा घास → खरगोश → लोमड़ी — ये मिलकर खाद्य जाल बनाते हैं।

(v) बायोम (Biome) क्या है?

उत्तर- बायोम (Biome) पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला एक बड़ा भौगोलिक क्षेत्र होता है, जहाँ जलवायु, मिट्टी, वनस्पति और प्राणी एक समान प्रकार के होते हैं। उदाहरण के लिए – उष्णकटिबंधीय वर्षावन, मरुस्थल, घास के मैदान और टुंड्रा बायोम कहलाते हैं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।

(i) संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ का वर्णन करें।

उत्तर- संसार के विभिन्न वन बायोम की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ

     वन बायोम पृथ्वी के उन प्रमुख पारिस्थितिक तंत्रों को कहते हैं जहाँ वनस्पतियाँ और प्राणी विशिष्ट जलवायु एवं भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित होते हैं। इनकी प्रमुख किस्में हैं – उष्णकटिबंधीय वर्षावन, समशीतोष्ण वन, और शीतोष्ण (टैगा) वन।

(1) उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Tropical Rain Forests):-

     ये भूमध्य रेखा के समीप स्थित क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जैसे अमेज़न बेसिन, कांगो, वेस्टर्न घाट आदि। यहाँ वर्षभर उच्च तापमान (25–30°C) और भारी वर्षा (200–400 से.मी.) होती है। पेड़ घने और ऊँचे होते हैं तथा जैव विविधता अत्यधिक होती है।

(2) समशीतोष्ण वन (Temperate Forests):-

    ये मध्यम अक्षांशों में पाए जाते हैं, जैसे यूरोप, उत्तर अमेरिका, चीन आदि। यहाँ चारों ऋतुएँ स्पष्ट होती हैं और पर्णपाती वृक्ष जैसे ओक, मेपल, बर्च प्रमुख हैं।

(3) शीतोष्ण या टाइगा वन (Taiga Forests):

     ये उच्च अक्षांशों में, जैसे कनाडा, रूस, और स्कैंडिनेविया में पाए जाते हैं। यहाँ सर्दी लंबी और कठोर होती है तथा वृक्षों में अधिकांश शंकुधारी प्रजातियाँ (जैसे पाइन्स, स्प्रूस, फ़र) होती हैं।

निष्कर्षतः, प्रत्येक वन बायोम पृथ्वी के जलवायु संतुलन, ऑक्सीजन उत्पादन और जैव विविधता संरक्षण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है, वर्णन करें?

उत्तर- जैव-भूरासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पृथ्वी के विभिन्न घटकों जैवमंडल (जीव), वायुमंडल (हवा), जलमंडल (पानी) और स्थलमंडल (भूमि)  के बीच पोषक तत्वों और रासायनिक तत्वों का निरंतर चक्रण होता है।

    यह चक्र पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रमुख जैव-भूरासायनिक चक्रों में कार्बन, नाइट्रोजन, जल, ऑक्सीजन और फॉस्फोरस चक्र शामिल हैं। इन चक्रों से पौधों और प्राणियों को आवश्यक तत्व बार-बार उपलब्ध होते रहते हैं।

नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Nitrogen Fixation) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा वायुमंडल में उपस्थित निष्क्रिय नाइट्रोजन गैस (N₂) को जीवित प्राणी उपयोग के योग्य यौगिकों – जैसे अमोनिया (NH₃) या नाइट्रेट (NO₃⁻) – में बदला जाता है। यह प्रक्रिया तीन मुख्य तरीकों से होती है:

1. जैविक यौगिकीकरण (Biological fixation): Rhizobium, Azotobacter जैसे सूक्ष्मजीव नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करते हैं।

2. वायुमंडलीय यौगिकीकरण (Atmospheric fixation): बिजली (Lightning) की क्रिया से नाइट्रोजन और ऑक्सीजन मिलकर नाइट्रिक ऑक्साइड बनाते हैं, जो वर्षा के साथ धरती पर आता है।

3. औद्योगिक यौगिकीकरण (Industrial fixation): हैबर-बॉश (Haber-Bosch) विधि द्वारा नाइट्रोजन और हाइड्रोजन से अमोनिया का निर्माण किया जाता है।

    इस प्रकार, नाइट्रोजन यौगिकीकरण प्रक्रिया पृथ्वी पर नाइट्रोजन चक्र को संतुलित रखती है और पौधों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है।

(iii) पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।

उत्तर- पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) से तात्पर्य उस स्थिर स्थिति से है जिसमें जीव-जंतु, पौधे, सूक्ष्मजीव और उनका भौतिक परिवेश (जैसे जल, वायु, मिट्टी आदि) परस्पर सहयोग और सामंजस्य के साथ कार्य करते हैं। जब प्रत्येक घटक अपनी भूमिका सही प्रकार से निभाता है, तब प्रकृति में ऊर्जा, पोषक तत्वों और गैसों का संतुलित चक्र बना रहता है, जिससे पृथ्वी पर जीवन संभव होता है।

    जब मानव गतिविधियाँ जैसे- वनों की कटाई, प्रदूषण, औद्योगीकरण, शिकार, भूमि क्षरण, तथा जनसंख्या वृद्धि अत्यधिक बढ़ जाती हैं, तब यह संतुलन बिगड़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी, मृदा अपरदन, और प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

पारिस्थितिक असंतुलन को रोकने के उपाय:

⇒ वनों का संरक्षण एवं वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।

⇒ जल, मृदा और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना।

⇒ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) का प्रयोग बढ़ाना।

⇒ वन्यजीवों और जैव विविधता की रक्षा करना।

⇒ पर्यावरण शिक्षा और जन-जागरूकता को प्रोत्साहित करना।

     इस प्रकार, पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना न केवल मानव अस्तित्व के लिए आवश्यक है, बल्कि पृथ्वी पर समस्त जीव-जगत के सतत् विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Chapter 16 Biodiversity and Conversation (जैव विविधता एवं संरक्षण)

Chapter 16 Biodiversity and Conversation

(जैव विविधता एवं संरक्षण)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 16 Biodiversity and Conversation

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) जैव-विविधता का संरक्षण निम्न में किसके लिए महत्वपूर्ण है

(क) जन्तु

(ख) पौधे

(ग) पौधे और प्राणी

(घ) सभी जीवधारी

उत्तर- (घ) सभी जीवधारी

व्याख्या:

     जैव-विविधता (Biodiversity) का संरक्षण सभी जीवधारियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पृथ्वी पर जीवन के संतुलन, पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता, भोजन, औषधि, जलवायु नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों की निरंतरता को बनाए रखता है।

(ii) असुरक्षित प्रजातियाँ कौन-सी हैं

(क) जो दूसरों को असुरक्षा दें

(ख) बाघ व शेर

(ग) जिनकी संख्या अत्याधिक हों

(घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

उत्तर- (घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

(iii) राष्ट्रीय पार्क (National Parks) और अभ्यारण (Sanctuaries) किस उद्देश्य के लिए बनाये गए हैं

(क) मनोरंजन के लिए

(ख) पालतू जीवों के लिए

(ग) शिकार के लिए

(घ) संरक्षण के लिए

उत्तर- (घ) संरक्षण के लिए

व्याख्या:

     राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) और अभ्यारण्य (Sanctuaries) वन्य जीवों, वनस्पतियों तथा उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से बनाए जाते हैं, ताकि जैव विविधता बनी रहे और लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा की जा सके।

(iv) जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र हैं

(क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

(ख) शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र

(ग) ध्रुवीय क्षेत्र

(घ) महासागरीय क्षेत्र

उत्तर- (क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

व्याख्या:

     उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical regions) में तापमान अधिक, वर्षा प्रचुर मात्रा में तथा अनुकूल जलवायु पाई जाती है, जिसके कारण यहाँ पौधों और जीवों की विविधता सबसे अधिक होती है। इसलिए ये क्षेत्र जैव-विविधता के समृद्ध क्षेत्र कहलाते हैं।

(v) निम्न में से किस देश में अर्थ सम्मेलन (Earth summit) हुआ था

(क) यू. के. (U.K.)

(ख) ब्राजील

(ग) मैक्सिको

(घ) चीन

उत्तर- (ख) ब्राजील

व्याख्या:

     अर्थ सम्मलेन (Earth Summit) 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो (Rio de Janeiro) में आयोजित किया गया था। इसे “रियो सम्मेलन” या “United Nations Conference on Environment and Development (UNCED)” भी कहा जाता है।

(vi) प्रोजेक्ट टाईगर निम्नलिखित में से किस उद्देश्य से शुरू किया गया है।

(क) बाघ मारने के लिये

(ख) बाघ को शिकार से बचाने हेतु

(ग) बाघ को चिड़ियाघर में डालने हेतु

(घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु

उत्तर- (घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु

व्याख्या:

    “प्रोजेक्ट टाइगर” (Project Tiger) भारत सरकार द्वारा 1973 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य देश में तेजी से घटती हुई बाघों की संख्या की रक्षा करना और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण करना है।

(vii) प्रोजेक्ट एलिफेन्ट (Project Elephent) किस वर्ष लागू किया गया?

(क) 1992

(ख) 1993

(ग) 1994

(घ) 1995

उत्तर:- (क) 1992

व्याख्या:

    प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant) भारत सरकार द्वारा 1992 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य जंगली हाथियों का संरक्षण, उनके आवास (habitat) की रक्षा, और मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है।

(viii) होमो-सेपियंश (Homo-Speiens) प्रजाति किस से संबंधित है?

(क) पौधे

(ख) शाकाहारी जीव

(ग) मांशहारी जीव

(घ) मानव

उत्तर- (घ) मानव

व्याख्या:

     होमो-सेपियन्स (Homo sapiens) आधुनिक मनुष्य की वैज्ञानिक प्रजाति का नाम है। यह होमो वंश (Genus) की एकमात्र जीवित प्रजाति है, जो लगभग 3 लाख वर्ष पहले अफ्रीका में उत्पन्न हुई थी।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i) जैव-विविधता क्या है?

उत्तर- किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव-विविधता कहते हैं। इसका संबंध पौधों के प्रकार, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवाणुओं से है, उनकी आनुवंशिकी और उनके द्वारा निर्मित पारितंत्र से है। जैव-विविधता सजीव सम्पदा है। 

   अर्थात इसमें सूक्ष्मजीवों से लेकर बड़े जीवों तक सभी शामिल होते हैं। यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और जीवन को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(ii) जैव-विविधता के विभिन्न स्तर क्या हैं?

उत्तर- जैव-विविधता को तीन मुख्य स्तरों पर समझा जा सकता है-

(1) आनुवंशिक विविधता (Genetic diversity): एक ही प्रजाति के जीवों में जीन का अंतर।

(2) प्रजातीय विविधता (Species diversity): किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या।

(3) पारिस्थितिकी तंत्र विविधता (Ecosystem diversity): यह विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता को दर्शाती है, जैसे – वन, मरुस्थल, पर्वतीय क्षेत्र, नदी, झील, समुद्र आदि।

(iii) हॉट-स्पॉट (Hot spots) से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- हॉट-स्पॉट (Hot Spots) वे क्षेत्र होते हैं जहाँ जैव विविधता अत्यधिक होती है, परंतु यह क्षेत्र मनुष्य की गतिविधियों से गंभीर खतरे में हैं। इन क्षेत्रों में बहुत-सी दुर्लभ एवं स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।  उनमें संसाधनों को उपलब्ध कराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण संघ (IUCN) ने जैव-विविधता हॉट-स्पॉट (Hot spots) क्षेत्र के रूप में निर्धारि किया गया है।

    हॉट-स्पॉट उनकी वनस्पति के आधार पर परिभाषित किये गए हैं। भारत में पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय आदि प्रमुख जैव विविधता हॉट-स्पॉट हैं।

(iv) मानव जाति के लिए जंतुओं के महत्त्व का वर्णन संक्षेप में करें।

उत्तर- जंतुओं का मानव जाति के जीवन में अत्यंत महत्त्व है। वे भोजन (दूध, मांस, अंडे), वस्त्र (ऊन, रेशम, चमड़ा) और श्रम (बैल, घोड़े) प्रदान करते हैं। अनेक जंतु औषधियों के निर्माण में उपयोगी होते हैं तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(v) विदेशज प्रजातियों (Exotic species) से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- वे प्रजातियाँ जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं, लेकिन उस तंत्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें ‘विदेशज प्रजातियाँ’ कहा जाता है।

    अर्थात विदेशज प्रजातियाँ (Exotic species) वे जीव हैं जिन्हें किसी अन्य देश या क्षेत्र से लाकर नए स्थान पर बसाया जाता है। ये वहाँ की प्राकृतिक प्रजातियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ सकती हैं। उदाहरण- भारत में जलकुंभी (Water Hyacinth) और नीलगिरी (Eucalyptus) पेड़।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) प्रकृति को बनाए रखने में जैव-विविधता की भूमिका का वर्णन करें

उत्तर- प्रकृति के संतुलन और स्थायित्व को बनाए रखने में जैव-विविधता (Biodiversity) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैव-विविधता का अर्थ है- पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीवों की विविधता, जिसमें पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव तथा उनके पारस्परिक संबंध शामिल हैं। यह प्रकृति की स्थिरता, पारिस्थितिक संतुलन तथा मानव जीवन के अस्तित्व की आधारशिला है।

     प्रकृति में प्रत्येक जीव का अपना विशिष्ट स्थान और कार्य होता है। उदाहरण के लिए, पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध रहता है। शाकाहारी और मांसाहारी जीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हुए भोजन श्रृंखला और जाल (food chain and web) का निर्माण करते हैं। यदि किसी एक प्रजाति का विनाश हो जाए, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।

    जैव-विविधता मिट्टी की उर्वरता, परागण, जल चक्र और अपघटन जैसी प्रक्रियाओं को भी बनाए रखती है। यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करती है और प्राकृतिक आपदाओं से पारिस्थितिक तंत्र की पुनर्बहाली में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त, जैव-विविधता मानव को औषधि, भोजन, ईंधन और वस्त्र जैसे अनेक संसाधन उपलब्ध कराती है।

    इस प्रकार, जैव-विविधता न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है, बल्कि यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता और मानव सभ्यता के विकास की आधारशिला भी है। इसलिए, जैव-विविधता का संरक्षण हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ भी स्वस्थ और संतुलित प्रकृति का आनंद ले सकें।

(ii) जैव-विविधता के विनाश के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करें। इसे रोकने के उपाय भी बताएँ।

उत्तर- जैव-विविधता (Biodiversity) का अर्थ है- पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पौधों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों की विविधता। वर्तमान समय में मानव गतिविधियों के कारण जैव-विविधता में तीव्र गति से कमी आ रही है।

जैव-विविधता के विनाश के प्रमुख कारक:

1. वनों की कटाई:-

     कृषि विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण वनों का नाश हो रहा है।

2. प्रदूषण:-

      जल, वायु और भूमि प्रदूषण से अनेक जीव प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं।

3. जनसंख्या वृद्धि:-

    बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाल रही है।

4. अवैध शिकार और व्यापार:-

     बाघ, हाथी, गैंडा जैसी प्रजातियाँ शिकार और अवैध व्यापार से प्रभावित हैं।

5. विदेशी (Exotic) प्रजातियाँ:-

     बाहरी प्रजातियों के आगमन से स्थानीय प्रजातियाँ प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रही हैं।

6. जलवायु परिवर्तन:-

     तापमान वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव से प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।

रोकथाम के उपाय:

⇒ वनों की सुरक्षा और वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।

⇒ प्रदूषण नियंत्रण और स्वच्छ तकनीकों का उपयोग।

⇒ वन्यजीव संरक्षण कानूनों का कठोर पालन।

⇒ राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारणों का विस्तार।

⇒ जनजागरूकता और पर्यावरण शिक्षा को प्रोत्साहन देना।

⇒ जैव-विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष:

    जैव-विविधता का संरक्षण पृथ्वी पर जीवन के संतुलन और मानव अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।

Chapter 1 India Location (भारत-स्थिति)

Chapter 1 India Location

(भारत-स्थिति)

(भाग – 2 : भारत- भौतिक पर्यावरण)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) भारत के विस्तार के संबंध कौन-सा कथन सही है

(क) 8°41’N-35°5’N

(ख) 8°4’N-35°6’N

(ग) 8°4’N-37°6’N

(घ) 6°45″N-35°6’N

उत्तर- (ग) 8°41’N-37°6’N

व्याख्या:

   भारत 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तथा 68°7′ पूर्वी देशांतर से 97°25′ पूर्वी देशांतर तक फैला है।

⇒ भारत का अक्षांशीय विस्तार लगभग 29° है।

⇒ भारत का देशांतरिक विस्तार लगभग 30° है।

⇒ भारत का कुल क्षेत्रफल लगभग 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है।

⇒ 82°30′ पूर्व देशांतर को भारतीय मानक समय (IST) के रूप में अपनाया गया है।

(ii) भारत के साथ किस देश की स्थल सीमा सबसे लम्बी है

(क) बंग्लादेश

(ख) पाकिस्तान

(ग) चीन

(घ) म्यांमार

उत्तर- (क) बंग्लादेश

  भारत की सबसे लंबी स्थल सीमा बांग्लादेश के साथ है, जिसकी लंबाई लगभग 4096 किलोमीटर है।

(iii) कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से अधिक बड़ा है

(क) चीन

(ख) फ्रांस

(ग) मिस्र

(घ) ईरान

उत्तर- (क) चीन

(iv) निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?

(क) 69°30’E

(ख) 75°30’E

(ग) 82°30’E

(घ) 90°30’E

उत्तर- (ग) 82°30’E

(v) यदि आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैंड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किसको आर-पार नहीं करेंगे?

(क) यमुना

(ख) सिंधु

(ग) ब्रह्मपुत्र

(घ) गंगा

उत्तर- (ख) सिंधु

(vi) क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में भारत का स्थान है।

(क) तीसरा

(ख) चौथा

(ग) पांचवाँ

(घ) सातवाँ

उत्तर- (घ) सातवाँ

   भारत का क्षेत्रफल लगभग 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है, और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व में सातवाँ सबसे बड़ा देश है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ, तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?

उत्तर- हाँ, भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है क्योंकि देशांतर रेखाओं के मानों से स्पष्ट होता है कि इनमें लगभग 30 डिग्री का अंतर है जो हमारे देश के सबसे पूर्वी व सबसे पश्चिमी भागों के समय में लगभग 2 घंटों का अंतर पैदा करता है। कुछ ऐसे देश हैं जिनमें अधिक पूर्व-पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक देशांतर रेखाएँ हैं। उदाहरण : संयुक्त राज्य अमेरिका में छह समय कटिबंध हैं।

(ii) भारत की लम्बी तटरेखा के क्या प्रभाव है?

उत्तर- भारत की लंबी तटरेखा के कारण देश को अनेक लाभ प्राप्त हैं, जैसे- समुद्री व्यापार और मत्स्य पालन का विकास, बंदरगाहों की स्थापना, पर्यटन उद्योग का विस्तार, तटीय कृषि व खनिज संपदा का उपयोग, तथा विदेशी देशों से सांस्कृतिक और आर्थिक संपर्क सुदृढ़ होना।

(iii) भारत का देशंतारीय फैलाव इसके लिए किस प्रकार लाभप्रद है?

उत्तर- भारत का देशांतरिक फैलाव लगभग 30° है, जो देश के पूर्व से पश्चिम तक समय, जलवायु और कृषि विविधता प्रदान करता है। यह फैलाव विभिन्न फसलों की खेती, विविध उद्योगों के विकास और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने में लाभप्रद है। इससे क्षेत्रीय संतुलित विकास संभव होता है।

(iv) जबकि पूर्व में उदाहरणत: नागालैंड में सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, फिर कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय क्यों दिखाती है?

उत्तर- भारत में संपूर्ण देश के लिए एक ही समय निर्धारित है, जिसे भारतीय मानक समय (IST) कहते हैं। यह समय रेखा प्रयागराज के निकट 82°30′ पू. देशांतर से गुजरती है। इसलिए नागालैंड (कोहिमा) और नई दिल्ली, दोनों जगहों पर घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं, भले ही सूर्य उदय-अस्त का समय अलग हो।

Chapter 1 India Location

Chapter 2 Structure and Physiography (संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान)

Chapter 2 Structure and Physiography

(संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान)

(भाग – 2 : भारत- भौतिक पर्यावरण)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 2 Structure and Physiography

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) हिमालय के किस भाग में करेवा मिलते हैं

(क) उत्तर-पूर्वी हिमालय

(ख) पूर्वी हिमालय

(ग) हिमाचल-उत्तरांचल हिमालय

(घ) कश्मीर हिमालय

उत्तर- (घ) कश्मीर हिमालय

व्याख्या:

   करेवा (Karewas) कश्मीर घाटी में पाए जाने वाले मोटे झील- अवसाद (lake deposits) हैं। ये उपजाऊ मिट्टी से बने होते हैं और इनमें केसर की खेती प्रसिद्ध है। करेवा हिमालय के कश्मीर भाग की एक विशिष्ट भौगोलिक विशेषता है।

(ii) लोटक झील किस राज्य में स्थित है

(क) केरल

(ख) मनीपुर

(ग) उत्तरांचल

(घ) राजस्थान

उत्तर- (ख) मनीपुर

व्याख्या:

     लोटक झील (Loktak Lake) मणिपुर राज्य में स्थित है। यह उत्तर-पूर्व भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है, जो अपने तैरते द्वीपों (फुमदी) के लिए प्रसिद्ध है।

(iii) अंडमान द्वीप तथा निकोबार द्वीप को कौन-सी रेखा पृथक् करती है

(क) 11° चैनल

(ख) 10° चैनल

(ग) मन्नार की खाड़ी

(घ) अंडमान सागर

उत्तर- (ख) 10° चैनल

व्याख्या:

      10° चैनल अंडमान द्वीप समूह और निकोबार द्वीप समूह को एक-दूसरे से पृथक् करता है। यह रेखा लगभग 10 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित है।

(iv) डोडावेटा चोटी निम्नलिखित में से कौन-सी पहाड़ी शृखंला में स्थित है?

(क) नीलगिरी

(ख) कार्डामम

(ग) अनामलाई

(घ) नल्लामाला

उत्तर- (क) नीलगिरी

व्याख्या:

      डोडाबेट्टा (Doddabetta) चोटी नीलगिरी पर्वत शृंखला में स्थित है। यह तमिलनाडु राज्य में ऊटी (उधगमंडलम) के पास स्थित है और नीलगिरी की सबसे ऊँची चोटी है, जिसकी ऊँचाई लगभग 2637 मीटर है।

(v) हिमालय किस प्रकार का पर्वत है?

(क) ज्वालामुखी

(ख) मोड़दार

(ग) अविशष्ट

(घ) भ्रन्शोथ

उत्तर- (ख) मोड़दार

व्याख्या:

     हिमालय पर्वत का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के आपस में टकराने से हुआ है। इस टकराव से टेथिस सागर की मलवा मुड़कर ऊपर उठीं, जिससे हिमालय जैसे मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) बने।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 शब्दों में दीजिए

(i) यदि एक व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो वह कौन-से तटीय मैदान होकर जायेगा और क्यों?

उत्तर- लक्षद्वीप जाने वाला व्यक्ति केरल के मालाबार तटीय मैदान होकर जाएगा, क्योंकि यह तट अरब सागर के किनारे स्थित है और यहीं से लक्षद्वीप द्वीपसमूह (280 किलोमीटर से 480 किलोमीटर) के लिए मार्ग मिलता है।

(ii) भारत में ठण्डा मरुस्थल कहाँ स्थित है ? इस क्षेत्र की मख्य श्रेणियों के नाम बताएँ।

उत्तर- भारत में ठण्डा मरुस्थल लद्दाख क्षेत्र में स्थित है, जो केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख (पूर्व में जम्मू-कश्मीर का भाग) का हिस्सा है।

इस क्षेत्र की मुख्य पर्वत श्रेणियाँ हैं –

⇒ कराकोरम पर्वत श्रेणी

⇒ लद्दाख पर्वत श्रेणी

⇒ जास्कर पर्वत श्रेणी

    यह क्षेत्र ऊँचाई, अत्यधिक ठंड और कम वर्षा के कारण “ठण्डा मरुस्थल” कहलाता है।

(iii) पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा क्यों नहीं है?

उत्तर- पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा नहीं है क्योंकि यहाँ नदियाँ छोटी, तीव्र ढाल वाली हैं और सीधे अरब सागर में गिरती हैं, जिससे गाद जमने का अवसर नहीं मिलता।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए

(i) अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर- अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह भौगोलिक, संरचनात्मक तथा उत्पत्ति की दृष्टि से भिन्न हैं।

    अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप द्वीप समूह प्रवाल (Coral) उत्पत्ति के हैं। ये छोटे, समतल एवं लैगूनयुक्त द्वीप हैं, जो मुख्यतः प्रवाल भित्तियों से बने हैं। इनकी संख्या लगभग 36 है और ये केरल तट के समीप स्थित हैं। यहाँ जलवायु उष्णकटिबंधीय तथा आर्द्र है।

    बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह ज्वालामुखीय और पर्वतीय उत्पत्ति के हैं। ये द्वीप ऊँचे, वनाच्छादित तथा श्रृंखलाबद्ध हैं। इनकी संख्या 572 के लगभग है। यहाँ सक्रिय ज्वालामुखी बैरन द्वीप भी स्थित है।

    इस प्रकार, लक्षद्वीप प्रवाल उत्पत्ति के निम्न द्वीप हैं, जबकि अंडमान-निकोबार ज्वालामुखीय उत्पत्ति के ऊँचे द्वीप हैं।

(ii) नदी घाटी मैदान में पाए जाने वाली महत्त्वपूर्ण स्थालाकृतियाँ कौन-सी हैं? इनका विवरण दें।

उत्तर- नदी घाटी मैदानों में कई प्रकार की स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं, जो नदी के अपरदन, परिवहन और निक्षेपण क्रियाओं से निर्मित होती हैं। प्रमुख स्थलाकृतियों में बालू के टीले (Natural levees), बाढ़ का मैदान (Flood plains), गोखुर झीलें (Oxbow lakes), मोड़दार धाराएँ (Meanders) और डेल्टा प्रमुख हैं।

    नदी अपने प्रवाह के दौरान किनारों को काटती और तलछट जमा करती है, जिससे मोड़दार धाराएँ बनती हैं। जब नदी का मोड़ टूट जाता है तो वहाँ अर्द्धचंद्राकार झीलें बनती हैं जिन्हें गोखुर झीलें कहते हैं।

    बाढ़ के समय जमा तलछट से बाढ़ का मैदान बनते हैं जो अत्यंत उपजाऊ होते हैं। नदी के मुहाने पर निक्षेपण से डेल्टा बनता है। इन स्थलाकृतियों के कारण नदी घाटी मैदान कृषि, बसावट और मानव विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त बनते हैं।

(iii) यदि आप बद्रीनाथ से संदर वन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ चलते हैं तो आपके रास्ते में कौन-सी स्थलाकृतियाँ आएंगी?

उत्तर- यदि हम बद्रीनाथ से सुंदरवन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ यात्रा करें, तो हमारे मार्ग में विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियाँ दिखाई देंगी। बद्रीनाथ हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ से गंगा की सहायक धाराएँ जैसे अलकनंदा उत्पन्न होती हैं। अलकनंदा और भागीरथी देवप्रयाग में मिलकर गंगा नदी के नाम से जानी जाती है।

     यहाँ स्थलाकृति पर्वतीय और दुर्गम होती है, जहाँ गहरी घाटियाँ और जलप्रपात मिलते हैं। आगे बढ़ने पर नदी तराई क्षेत्र में प्रवेश करती है, जहाँ भूमि अपेक्षाकृत समतल होती है और जलोढ़ मिट्टी से भरपूर होती है। इसके बाद गंगा गंगा मैदान में प्रवेश करती है। यह उपजाऊ जलोढ़ मैदान भारत का सबसे बड़ा समतल क्षेत्र है।

     यहाँ अनेक सहायक नदियाँ जैसे घाघरा, गंडक, यमुना इत्यादि मिलती हैं। अंततः गंगा दक्षिण-पूर्व दिशा में बहते हुए पश्चिम बंगाल के सुंदरवन क्षेत्र में पहुँचती है, जहाँ यह अनेक शाखाओं में बँटकर विस्तृत सुंदरवन डेल्टा का निर्माण करती है। यह विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा है।

Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents (महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents

(महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 4 Distribution of Oceans

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की संभावना व्यक्त की?

(क) अल्फ्रेड वेगनर

(ख) अब्राहम आरटेलियस

(ग) एनटोनियो पेलग्रिनी

(घ) एमंड हैस

उत्तर- (ख) अब्राहम आरटेलियस

व्याख्या:

    अब्राहम आरटेलियस (Abraham Ortelius) ने सन् 1596 में सर्वप्रथम यह विचार प्रस्तुत किया कि यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका महाद्वीप पहले एक साथ जुड़े हुए थे, परंतु बाद में वे अलग हो गए।

    यह विचार आगे चलकर अल्फ्रेड वेगनर (1912) के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) का आधार बना।

(ii) पोलर फ्लिंग बल (Polar fleeing force) निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?

(क) पृथ्वी का परिक्रमण

(ख) पृथ्वा का घूर्णन

(ग) गुरुत्वाकर्षण

(घ) ज्वारीय बल

उत्तर (ख) पृथ्वा का घूर्णन

व्याख्या:

    पोलर फ्लिंग बल (Polar Fleeing Force) या अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force) पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) से उत्पन्न होता है।

    जब पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, तो इसके कारण भूमध्य रेखा (Equator) पर वस्तुओं को बाहर की ओर धकेलने वाली एक काल्पनिक बल उत्पन्न होती है। इस बल का प्रभाव ध्रुवों पर न्यूनतम और भूमध्य रेखा पर अधिकतम होता है। इसी कारण पृथ्वी का आकार थोड़ा चपटा (Oblate Spheroid) है।

(iii) इनमें से कौन सी लघु (Minor) प्लेट नहीं है?

(क) नाजका

(ख) फिलिप्पिन

(ग) अरब

(घ) अंटार्कटिक

उत्तर- (घ) अंटार्कटिक

व्याख्या:

     पृथ्वी की प्लेटों को दो श्रेणियों में बाँटा गया है-

1. मुख्य (Major) प्लेटें

2. लघु (Minor) प्लेटें

मुख्य प्लेटें हैं-

→ प्रशांत (Pacific)

→ उत्तर अमेरिकी (North American)

→ दक्षिण अमेरिकी (South American)

→ अफ्रीकी (African)

→ यूरेशियन (Eurasian)

→ अंटार्कटिक (Antarctic)

→ इंडो-ऑस्ट्रेलियाई (Indo-Australian)

लघु प्लेटें हैं —

→ नाजका (Nazca)

→ अरब (Arabian)

→ फिलिप्पिन (Philippine)

→ कोकोस (Cocos) आदि

     इसलिए अंटार्कटिक प्लेट लघु नहीं बल्कि मुख्य प्लेट है।

(iv) सागरीय तल विस्तार सिद्धांत की व्याख्या करते हुए हेस ने निम्न से किस अवधारणा को नहीं विचारा?

(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ

(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना।

(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु।

उत्तर- (ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

व्याख्या:

    हेस (Harry H. Hess) ने सागरीय तल विस्तार सिद्धांत (Sea Floor Spreading Theory) में यह बताया कि महासागरीय मध्य कटकों (Mid-Oceanic Ridges) से नए बेसाल्टिक पदार्थ निकलते हैं, जिससे समुद्री तल दोनों ओर फैलता है।

   उन्होंने अपने सिद्धांत में निम्न अवधारणाओं पर विचार किया था-

(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ

(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियाँ

(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु में भिन्नता

    लेकिन विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण का विचार अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) से संबंधित है, न कि हेस के सिद्धांत से।

(v) हिमालय पर्वतों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है?

(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण

(ख) अपसारी सीमा

(ग) रूपांतर सीमा

(घ) महाद्वीपीय अभिसरण

उत्तर (घ) महाद्वीपीय अभिसरण

व्याख्या:

   हिमालय पर्वतों का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव (अभिसरण) से हुआ है। दोनों ही महाद्वीपीय प्लेटें हैं।

    जब भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट से टकराई, तो इस टक्कर से पृथ्वी की परतें मुड़कर ऊपर उठीं और हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। इसलिए यह एक महाद्वीपीय-अभिसरण (Continental Convergent) सीमा का उदाहरण है।

(vi) महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?

(क) वेगनर

(ख) बेकन

(ग) टेलर

(घ) हेनरी हेस

उत्तर- (क) वेगनर

व्याख्या:

      महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत (Continental Drift Theory) अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) ने सन् 1912 में प्रस्तुत किया था।

    उन्होंने यह विचार दिया कि सभी महाद्वीप पहले एक साथ जुड़े हुए थे और एक महाद्वीप पैंजिया (Pangaea) के रूप में अस्तित्व में था, जो बाद में टूटकर वर्तमान महाद्वीपों में विभाजित हो गया।

(vii) निम्नलिखित में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?

(क) हिन्द महासागर

(ख) आर्कटिक महासागर

(ग) अटलांटिक महासागर

(घ) प्रशांत महासागर

उत्तर- (ख) आर्कटिक महासागर

व्याख्या:

    आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean) पृथ्वी का सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर है। यह उत्तरी ध्रुव के चारों ओर स्थित है और अधिकांश भाग वर्षभर बर्फ से ढका रहता है।

(viii) निम्नलिखित में से कौन-सा पटल विरूपण से संबंधित नहीं है?

(क) पर्वत बल

(ख) प्लेट विवर्तनिक

(ग) महादेश जनक बल।

(घ) संतुलन

उत्तर- (घ) संतुलन।

व्याख्या:

     पटल विरूपण (Crustal deformation) से तात्पर्य पृथ्वी की भूपर्पटी में होने वाले मोड़, भ्रंश, उत्थान आदि परिवर्तनों से है, जो मुख्यतः अंतर्जात बलों जैसे- पर्वत निर्माण बल (ओरोजेनी), प्लेट विवर्तनिकी आदि के कारण होते हैं।

    जबकि “संतुलन” (Isostasy) पृथ्वी के पर्पटीय द्रव्यमान के संतुलित स्थिति से संबंधित है, न कि विरूपण से।

(ix) समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब कितना होता है?

(क) 1031.25 मिलीबार

(ख) 1013.25 मिलीबार

(ग) 1013.52 मिलीबार

(घ) 1031.52 मिलीबार

उत्तर- (ख) 1013.25 मिलीबार

व्याख्या:

   समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब को मानक वायुमंडलीय दाब (Standard Atmospheric Pressure) कहा जाता है, जिसका मान 1013.25 मिलीबार (या 1 वायुमंडल, 760 mm Hg) माना जाता है।

(x) लवणता को प्रति, समुद्र तल में घुले हुए नमक (ग्राम) को मात्रा से व्यक्त किया जाता है

(क) 10 ग्राम

(ख) 100 ग्राम

(ग) 1000 ग्राम

(घ) 10,000 ग्राम

उत्तर- (ग) 1000 ग्राम

व्याख्या:

      समुद्र जल की लवणता (Salinity) को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है-

       “1000 ग्राम (अर्थात् 1 किलोग्राम) समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा (ग्राम में)”।

    उदाहरण: औसत लवणता ≈ 35‰ (प्रति हजार) होती है, अर्थात् 1000 ग्राम समुद्री जल में लगभग 35 ग्राम नमक घुला होता है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने निम्नलिखित में से किन बलों का उल्लेख किया?

उत्तर- वेगनर ने महाद्वीपों के प्रवाह के लिए दो बलों का उल्लेख किया- ज्वारीय बल (Tidal Force) और पोलर फ्लिंग बल (Polar Fleeing Force), जो पृथ्वी के घूर्णन व चंद्रमा के आकर्षण से उत्पन्न होते हैं।

(ii) मैंटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने और बने रहने के क्या कारण हैं?

उत्तर- मैंटल में संवहन धाराओं (Convection Currents) के आरम्भ होने और बने रहने के मुख्य कारण हैं-

1. पृथ्वी के अन्दर ऊष्मा का असमान वितरण:-

     पृथ्वी के भीतरी भाग (कोर) में अत्यधिक ताप होता है, जबकि ऊपर के भाग अपेक्षाकृत ठंडे होते हैं।

2. गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव:-

     गर्म, हल्का पदार्थ ऊपर उठता है और ठंडा, भारी पदार्थ नीचे की ओर जाता है।

3. रेडियोधर्मी तत्त्वों का अपक्षय:-

    यूरेनियम, थोरियम आदि तत्त्वों के अपघटन से निरंतर ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो संवहन को बनाए रखती है।

    परिणामस्वरूप, यह ऊष्मा प्रवाह मैंटल में निरंतर ऊपर-नीचे की गति पैदा करता है, जिसे संवहन धाराएँ कहते हैं।

(iii) प्लेट की रूपांतर सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमान्त में मुख्य अन्तर क्या है?

उत्तर- रूपांतर सीमा में प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर सरकती हैं, अभिसरण सीमा में प्लेटें टकराती हैं, जबकि अपसारी सीमा में प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं।

(iv) दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थलखण्ड की स्थिति क्या थी?

उत्तर- दक्कन ट्रैप के निर्माण के समय भारतीय स्थलखण्ड गोंडवाना भूभाग का हिस्सा था और भूमध्यरेखीय क्षेत्र के दक्षिण में स्थित था। लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व, जब भारत अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया से अलग होकर उत्तर की ओर बढ़ रहा था, तब इस क्षेत्र में तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियाँ हुईं।

   इन्हीं विस्फोटों से विशाल मात्रा में बेसाल्ट लावा निकला, जिसने परत-दर-परत फैलकर दक्कन ट्रैप का निर्माण किया। उस समय भारतीय प्लेट तेजी से यूरेशियाई प्लेट की ओर बढ़ रही थी, जिससे इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिये गये प्रमाणों का वर्णन करें?

उत्तर-  अल्फ्रेड वेगनर ने सन् 1912 में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, आज के सभी महाद्वीप एक समय में “पैंजिया” नामक एक महाद्वीप के भाग थे, जो बाद में टूटकर वर्तमान स्थिति में आ गए।

         इस सिद्धांत के समर्थन में वेगनर ने कई वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत किए-

1. भौगोलिक प्रमाण:-

      अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के तटरेखाएँ पज़ल के टुकड़ों की तरह एक-दूसरे से मिलती हैं, जिससे पता चलता है कि ये कभी जुड़े हुए थे।

2. जीवाश्म प्रमाण:-

     विभिन्न महाद्वीपों जैसे दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत और ऑस्ट्रेलिया में एक ही प्रकार के जीवाश्म (जैसे ग्लॉसोप्टेरिस पौधा और मेसोसॉरस जन्तु) पाए गए, जो यह दर्शाते हैं कि ये स्थलखंड पहले जुड़े हुए थे।

3. भूगर्भिक संरचना:-

     एक जैसे पर्वत शृंखलाएँ और चट्टानों की बनावट अलग-अलग महाद्वीपों पर पाई जाती हैं, जैसे उत्तरी अमेरिका और यूरोप की अपलाचियन तथा कैलिडोनियन पर्वतमालाएँ।

4. जलवायु प्रमाण:-

     आज ठंडे क्षेत्रों में कोयले की परतें और गर्म क्षेत्रों में हिमनदीय अवशेष मिलते हैं, जो पूर्व की जलवायु में परिवर्तन का संकेत देते हैं।

     इन सभी प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि महाद्वीप वास्तव में अतीत में एक साथ जुड़े थे और धीरे-धीरे अलग हुए।

(ii) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त में मूलभूत अंतर बताइए।

उत्तर- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) का प्रतिपादन 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने किया था।

    इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक समय “पैंजिया” नामक एक ही भूखंड का भाग थे, जो लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले टूटकर विभिन्न दिशाओं में खिसक गए और वर्तमान स्थिति में आ गए। वेगनर ने महाद्वीपों के प्रवाह के लिए “ज्वारीय बल” और “पोलर फ्लिंग बल” को कारण बताया।

    यद्यपि उनके सिद्धांत ने महाद्वीपों के समान तट रेखाओं, जीवाश्मों और शैल संरचनाओं में समानता का उल्लेख किया, परंतु इसमें महाद्वीपों के विस्थापन के वास्तविक बलों की वैज्ञानिक व्याख्या का अभाव था, इसलिए इसे पूर्णतः स्वीकार नहीं किया गया।

     दूसरी ओर, प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत (Plate Tectonic Theory) 1960 के दशक में विकसित हुआ, जो सागरीय तल विस्तार (Seafloor Spreading) और महाद्वीपीय विस्थापन दोनों को समाहित करता है। इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का बाहरी कठोर भाग कई बड़ी और छोटी लिथोस्फेरिक प्लेटों में विभाजित है, जो पृथ्वी की दुर्बल मंडल (Asthenosphere) पर तैरती हैं। इन प्लेटों की गति के कारण ही पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी और महासागरीय गर्त जैसी भौगोलिक घटनाएँ होती हैं।

      इस प्रकार, मुख्य अंतर यह है कि वेगनर का सिद्धांत केवल महाद्वीपों की गति तक सीमित था, जबकि प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत सम्पूर्ण पृथ्वी की प्लेटों की गति और उनसे जुड़ी भौगोलिक प्रक्रियाओं की वैज्ञानिक व्याख्या करता है।

(iii) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरान्त की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली?

उत्तर- अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (Continental Drift Theory) के उपरांत 20वीं शताब्दी के मध्य में वैज्ञानिकों ने कई महत्वपूर्ण खोजें कीं, जिनसे महासागर के वितरण और संरचना के अध्ययन में पुनः गहरी रुचि उत्पन्न हुई।

      इनमें सबसे प्रमुख खोज थी “सागरीय तल प्रसार सिद्धांत (Sea Floor Spreading Theory)”, जिसे 1960 के दशक में हैरी हेस (Harry Hess) ने प्रस्तुत किया।

   इस सिद्धांत के अनुसार, महासागरों के मध्य में स्थित मध्य-महासागरीय पर्वतमालाओं (Mid-Oceanic Ridges) से नये भू-पटल का निर्माण होता है, और यह धीरे-धीरे दोनों ओर फैलता जाता है।

     इसके समर्थन में चुंबकीय अनियमितताओं (Magnetic anomalies), समुद्री तल की आयु, तथा गहराई के सर्वेक्षणों से प्राप्त प्रमाण मिले। यह भी पाया गया कि महासागरों का तल अपेक्षाकृत नया है और इसका निरंतर पुनर्निर्माण होता रहता है। इस खोज से यह स्पष्ट हुआ कि महाद्वीप वास्तव में गतिशील हैं और पृथ्वी की सतह प्लेटों में विभाजित है जो आपस में गतिमान हैं।

   इस प्रकार, सागरीय तल प्रसार सिद्धांत तथा प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) के विकास ने वेगनर के विचारों को वैज्ञानिक आधार दिया और पृथ्वी के महाद्वीपोंमहासागरों के वितरण, गति तथा उनके विकास को समझने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया।

Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth (पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास)

Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth

(पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 2 The Origin and Evolution

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करती है?

(क) 46 लाख वर्ष

(ख) 4600 मिलियन वर्ष

(ग) 13.7 अरब वर्ष

(घ) 13.7 खरब वर्ष

उत्तर- (ख) 4600 मिलियन वर्ष

व्याख्या:

    वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष (यानी 4600 मिलियन वर्ष) मानी जाती है। यह अनुमान रेडियोधर्मी तत्वों जैसे यूरेनियम और सीसा के विश्लेषण द्वारा लगाया गया है।

(ii) निम्न में कौन-सी अवधि सबसे लम्बी है

(क) इओन (Eons)

(ख) कल्प (Period)

(ग) महाकल्प (Era)

(घ) युग (Epoch)

उत्तर- (क) इओन (Eons)

व्याख्या:

    भूवैज्ञानिक समय को विभिन्न इकाइयों में बाँटा गया है-

1. इओन (Eon) – सबसे बड़ी और सबसे लंबी समय इकाई।

2. महाकल्प (Era) – इओन का उपविभाग।

3. कल्प (Period) – महाकल्प का उपविभाग।

4. युग (Epoch) – कल्प का उपविभाग।

अतः क्रम होगा: Eon > Era > Period > Epoch

       इसलिए सबसे लंबी अवधि इओन (Eon) होती है।

(iii) निम्न में कौन सा-तत्त्व वर्तमान वायुमण्डल के निर्माण व संशोधन में सहायक नहीं है?

(क) सौर पवन

(ख) गैस उत्सर्जन

(ग) विभेदन

(घ) प्रकाश संश्लेषण

उत्तर- (ग) विभेदन 

व्याख्या:

  सौर पवन, गैस उत्सर्जन, और प्रकाश संश्लेषण ये तीनों तत्त्व पृथ्वी के वायुमण्डल के निर्माण और संशोधन में योगदान देते हैं।

सौर पवन ने प्रारम्भिक वायुमण्डल की गैसों को प्रभावित किया।

गैस उत्सर्जन (Volcanic emission) ने नए गैसों को वायुमण्डल में जोड़ा।

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) ने ऑक्सीजन बढ़ाकर वायुमण्डल की संरचना बदली।

जबकि विभेदन (Differentiation) पृथ्वी के आन्तरिक भागों के अलग-अलग स्तरों (कोर, मेंटल, क्रस्ट) में विभाजन से सम्बन्धित है, न कि सीधे वायुमण्डल के निर्माण या संशोधन से।

(iv) निम्नलिखित में से भीतरी ग्रह कौन से हैं

(क) पृथ्वी व सूर्य के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

(ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

(ग) वे ग्रह जो गैसीय हैं।

(घ) बिना उपग्रह वाले ग्रह।

उत्तर- (ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

व्याख्या:

    भीतरी ग्रह (Inner Planets) वे हैं जो सूर्य और क्षुद्र ग्रहों की पट्टी (Asteroid Belt) के बीच स्थित हैं।

   इनमें चार ग्रह शामिल हैं-

1. बुध (Mercury)

2. शुक्र (Venus)

3. पृथ्वी (Earth)

4. मंगल (Mars)

    ये ग्रह छोटे, ठोस तथा चट्टानी होते हैं, जबकि बाहरी ग्रह गैसीय होते हैं।

(v) पृथ्वी पर जीवन निम्नलिखित में से लगभग कितने वर्षों पहले आरम्भ हुआ।

(क) 1 अरब 37 करोड़ वर्ष पहले

(ख) 460 करोड़ वर्ष पहले

(ग) 38 लाख वर्ष पहले

(घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

उत्तर- (घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

व्याख्या:

   वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार, पृथ्वी पर जीवन का आरंभ लगभग 3.8 अरब (380 करोड़) वर्ष पहले हुआ था। प्रारंभिक जीवन सूक्ष्म जीवों (micro organisms) के रूप में समुद्रों में उत्पन्न हुआ था।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?

उत्तर- ये ग्रह पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से बने हैं और अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। अर्थात पार्थिव ग्रह चट्टानी हैं क्योंकि ये सूर्य के निकट बने, जहाँ उच्च तापमान के कारण हल्की गैसें उड़ गईं और केवल भारी तत्व जैसे लोहा, सिलिका आदि रह गए, जिनसे ठोस सतह बनी।

   ये ग्रह छोटे होने के कारण उनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी कम रही जिसके फलस्वरूप इनसे निकली हुई गैस इन पर रुकी नहीं रह सकी।

(ii) पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधित दिये गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिकों के मूलभूत अंतर बताएँ-

(क) कान्ट व लाप्लेस (ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन

उत्तर-

(क) कान्ट व लाप्लेस: कान्ट व लाप्लेस की परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल से हुआ जो कि सूर्य की युवा अवस्था से संबद्ध थे।

(ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन: चैम्बरलेन व मोल्टेन ने कहा कि ब्रह्मांड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के पास से गुजरा। इसके परिणामस्वरूप तारे के गुरुत्वाकर्षण से सूर्य-सतह से सिगार के आकार का कुछ पदार्थ निकलकर अलग हो गया।

    यह पदार्थ सूर्य के चारों तरफ घूमने लगा और यहीं पर धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।

(iii) विभेदन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?

उत्तर-  विभेदन प्रक्रिया से तात्पर्य है- जब पृथ्वी के निर्माण के दौरान भारी तत्व (जैसे लोहा, निकेल) केंद्र में और हल्के तत्व (जैसे सिलिका, एल्युमिनियम) ऊपर की ओर आ गए, जिससे परतें बनीं।

विस्तार से व्यख्या- पृथ्वी की उत्पत्ति के दौरान और उत्पत्ति के तुरंत बाद अत्यधिक ताप के कारण, पृथ्वी आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रह गई और तापमान की अधिकता के कारण ही हल्के और भारी घनत्व के मिश्रण वाले पदार्थ घनत्व के अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गए ।

     इसी अलगाव से भारी पदार्थ (जैसे लोहा), पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह या ऊपरी भाग की तरफ आ गए। समय के साथ यह और ठंडे हुए और ठोस रूप में परिवर्तित होकर छोटे आकार के हो गए।

    अंततोगत्वा यह पृथ्वी की भूपर्पटी के रूप में विकसित हो गए। हल्के व भारी घनत्व वाले पदार्थों के पृथक होने की इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है।

(iv) प्रारंभिक काल में पृथ्वी के धरातल का स्वरूप क्या था?

उत्तर- प्रारंभ में पृथ्वी, चट्टानी गर्म और वीरान ग्रह थी जिसका वायुमण्डल विरल था जो हाइड्रोजन व हीलीयम से बना था।

    अर्थात प्रारंभिक काल में पृथ्वी का धरातल अत्यंत गर्म, अस्थिर और पिघले हुए पदार्थों से बना था। इसमें ठोस भू-पर्पटी नहीं थी तथा ज्वालामुखीय क्रियाएँ निरंतर होती रहती थीं।

(v) पृथ्वी के वायुमंडल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन-सी थीं?

उत्तर- हाइड्रोजन व हीलीयम।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) बिग बैंग सिद्धांत का विस्तार से वर्णन करें।

उत्तर- बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार निम्न अवस्थाओं में हुआ है-

1. आरम्भ में वे सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्मांड बना है, अति छोटे गोलक (एकाकी परमाणु) के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे। जिसका आयतन अत्यधिक सूक्ष्म एवं तापमान तथा घनत्व अनंत था ।

2. बिग बैंग की प्रक्रिया में इस अति छोटे गोलक में भीषण विस्फोट हुआ। इस प्रकार की विस्फोट प्रक्रिया से वृहत् विस्तार हुआ। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि बिग बैंग की घटना आज से 13.7 अरब वर्षों पहले हुई थी।

    ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट (Bang) के बाद एक सेकेंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहत् विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गई। बिग बैंग होने के आरम्भिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ।

3. बिग बैंग के कारण 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500° केल्विन तक गिर गया और परमाणवीय पदार्थ का निर्माण हुआ। ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया। ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ है आकाशगंगाओं के बीच की दूरी में विस्तार का होना।

    हॉयल (Hoyle) ने इसका विकल्प ‘स्थिर अवस्था संकल्पना’ (Steady State Concept) के नाम से प्रस्तुत किया । इस संकल्पना के अनुसार ब्रह्मांड किसी भी समय में एक ही जैसा रहा हैं। यद्यपि ब्रह्मांड के विस्तार संबंधी अनेक प्रमाणों के मिलने पर वैज्ञानिक समुदाय अब ब्रह्मांड विस्तार सिद्धांत के ही पक्षधर हैं।

(ii) पृथ्वी के विकास संबंधी अवस्थाओं को बताते हुए हर अवस्था या चरण को संक्षेप में वर्णित करें।

उत्तर- पृथ्वी के विकास की प्रक्रिया अत्यंत दीर्घ और जटिल रही है, जो लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौरमंडल के निर्माण के साथ आरंभ हुई। इस विकास को विभिन्न अवस्थाओं या चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

1. निहारिका अवस्था (Nebular Stage):-

    सौरमंडल प्रारंभ में गैसों और धूल कणों के विशाल बादल के रूप में था। गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से यह निहारिका सिमटने लगी और इसके केंद्र में सूर्य का निर्माण हुआ, जबकि परिक्रमा करती धूल और गैस से ग्रहों की उत्पत्ति हुई।

2. प्रोटो-पृथ्वी अवस्था (Proto-Earth Stage):-

     संकुचन और संलयन के परिणामस्वरूप धूल और गैस के कण आपस में मिलकर प्रोटो-पृथ्वी का निर्माण करने लगे। इस समय पृथ्वी अत्यंत गर्म और अस्थिर अवस्था में थी।

3. विभेदन अवस्था (Differentiation Stage):-

     पृथ्वी के भीतर तापमान बढ़ने के कारण भारी तत्व (जैसे लोहा, निकेल) केंद्र की ओर चले गए और हल्के तत्व (जैसे सिलिका, एलुमिनियम) ऊपर की ओर आ गए। परिणामस्वरूप पृथ्वी का आंतरिक ढांचा – कोर, मेंटल और क्रस्ट बना।

4. वायुमंडल और महासागर निर्माण अवस्था:-

     ज्वालामुखीय गैसों और जलवाष्प के उत्सर्जन से प्रारंभिक वायुमंडल बना। जलवाष्प के संघनन से वर्षा हुई और महासागरों का निर्माण हुआ।

5. जैविक विकास अवस्था:-

     लगभग 3.8 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर जीवन का उद्भव हुआ, जिसने धीरे-धीरे पृथ्वी के वायुमंडल और पर्यावरण को परिवर्तित कर वर्तमान स्वरूप दिया।

     इस प्रकार, पृथ्वी का विकास एक सतत भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रिया का परिणाम है।

Chapter 1 Geography as a Discipline (भूगोल एक विषय के रूप में)

Chapter 1 Geography as a Discipline

(भूगोल एक विषय के रूप में)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 1 Geography as a Discipline

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने भूगोल (Geography) शब्द (Terms) का प्रयोग किया?

(क) हेरोडोटस

(ख) गैलिलियो

(ग) इरेटास्थिनीज

(घ) अरस्तू

उत्तर- (ग) इरेटास्थिनीज

व्याख्या:

“भूगोल” (Geography) शब्द का प्रयोग सबसे पहले यूनानी विद्वान इरेटास्थिनीज (Eratosthenes) ने किया था। यह शब्द दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है:

Geo = पृथ्वी,  Graphy = वर्णन या लेखन अर्थात्, Geography का अर्थ हुआ ‘पृथ्वी का वर्णन या अध्ययन’।

(ii) निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?

(क) बंदरगाह

(ख) मैदान

(ग) सड़क

(घ) जल उद्यान

उत्तर- (ख) मैदान

व्याख्या:

   भौतिक लक्षण (Physical features) वे होते हैं जो प्रकृति द्वारा निर्मित होते हैं, जैसे- पर्वत, नदियाँ, मैदान, पठार आदि। जबकि अन्य विकल्प- बंदरगाह, सड़क, जल उद्यान – ये मानव द्वारा निर्मित (मानव निर्मित या कृत्रिम) लक्षण हैं।

(iii) स्तम्भ I एवं II के अंतर्गत लिखे गए विषयों को पढ़िए।

स्तम्भ I प्राकृतिक सामाजिक विज्ञान स्तम्भ II भूगोल की शाखाएँ
1. मौसम विज्ञान अ. जनसंख्या भूगोल
2. जनांकिकी ब. मृदा भूगोल
3. समाजशास्त्र स. जलवायु विज्ञान
4. मृदा विज्ञान द. सामाजिक भूगोल

सही मेल को चिह्नांकित कीजिए

(क) 1.ब, 2.स, 3.अ, 4.द

(ग) 1.अ, 2.द, 3.ब, 4.स

(ख) 1.द. 2.ब, 3.स, 4.अ

(घ) 1.स, 2.अ, 3.द, 4.ब

उत्तर- (घ) 1.स, 2.अ, 3.द, 4.ब

(iv) निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण सम्बन्ध से जुड़ा हुआ है?

(क) क्यों

(ख) क्या

(ग) कहाँ

(घ) कब

उत्तर- (क) क्यों

व्याख्या:
   “क्यों” प्रश्न का प्रयोग किसी घटना या स्थिति के कारण (cause) को जानने के लिए किया जाता है। इसलिए यह कार्य-कारण संबंध (cause-effect relationship) से जुड़ा हुआ प्रश्न होता है।

(v) निम्नलिखित में से कौन-सा विषयकालिक संश्लेषण करता है?

(क) समाजशास्त्र

(ख) मानवशास्त्र

(ग) इतिहास

(घ) भूगोल

उत्तर- (घ) भूगोल

व्याख्या:

    भूगोल (Geography) एक ऐसा विषय है जो स्थानिक (spatial) और कालिक (temporal) दोनों प्रकार के विश्लेषण करता है।

   यह विभिन्न समय अवधियों (कालों) में पृथ्वी की सतह पर घटित परिवर्तनों का अध्ययन करता है- जैसे स्थलरूप, जलवायु, जनसंख्या, उद्योग आदि में समय के साथ होने वाले परिवर्तन।

   इसीलिए भूगोल को “विषयकालिक संश्लेषण” (Temporal Synthesis) करने वाला विषय कहा जाता है।

(vi) निम्नलिखित में से किस विद्वान द्वारा क्रमबद्ध भूगोल प्रवर्तित किया गया?

(क) इरेटॉस्थनीज

(ख) हम्बोल्ट

(ग) स्ट्रेबो

(घ) टॉलेमी

उत्तर- (ख) हम्बोल्ट

व्याख्या:
   क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) की अवधारणा अलेक्ज़ेंडर वॉन हम्बोल्ट ने दी थी। उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को कारण-कार्य संबंध के आधार पर व्यवस्थित रूप से अध्ययन करने की परंपरा शुरू की।

   वहीं, कार्ल रिटर (Carl Ritter) ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) की परंपरा को आगे बढ़ाया।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए:

(i) आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?

उत्तर- हम विद्यालय जाते समय मानव द्वारा सृजित ग्रामों, नगरों, सड़कों, रेलों, बदंरगाहों, बाजारों, मंदिर, मस्जिद, वस्त्र, भाषा एवं मानव-जनित अन्य कई महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं। वे सभी लक्षण असमान हैं। उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि ये मानव-पर्यावरण संबंध को दर्शाते हैं।

(ii) आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना?

उत्तर- पृथ्वी का आकार जियोइड (Geoid) है, क्योंकि पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी चपटी और विषुवत् रेखा पर उभरी होती है, इसलिए व्यवहार में इसे संतरे की तरह गोल माना जाता है।

(iii) क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधारोपण क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं?

उत्तर- हाँ, हमारे विद्यालय में वन महोत्सव मनाया जाता है। हम पर्यावरण संरक्षण हेतु पौधारोपण करते हैं। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर और ऑक्सीजन छोड़कर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं।

(iv) आपने हाथी, हिरण केंचुए, वृक्ष एवं घास को देखा है। ये कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मण्डल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मण्डल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?

उत्तर- हाथी, हिरण, केंचुआ, वृक्ष एवं घास को हमने वनों में देखा है जहाँ वे रहते हैं, एवं बढ़ते हैं। उस जगह को जैवमण्डल का नाम दिया गया है। इसमें वायु, जल और भूमि के जीवित तत्व परस्पर क्रिया करते हैं।

(v) आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुंचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी का क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान तथा, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते?

उत्तर- मुझे अपने निवास से विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता है। यदि विद्यालय मेरे घर की सड़क के उस पार होता, तो मात्र 2–3 मिनट में पहुँच सकता था। इससे स्पष्ट होता है कि घर और विद्यालय के बीच की दूरी आने-जाने के समय को सीधे प्रभावित करती है- दूरी जितनी अधिक होगी, समय भी उतना ही अधिक लगेगा।

    वास्तव में, दूरी और समय का गहरा संबंध है; हम दूरी को समय में और समय को दूरी में परिवर्तित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि विद्यालय 2 किलोमीटर दूर है और मैं 6 किमी/घंटा की गति से चलता हूँ, तो विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट लगेंगे। 

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) आप अपने परिस्थान (Surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तथ्यों में भिन्नता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पशु एवं पक्षी जिसे आप देखते हैं भिन्न-भिन्न होते हैं। ये सभी भिन्न तत्व धरातल पर पाये जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है?

उत्तर- हाँ, हम यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक (क्षेत्रीय) भिन्नता का अध्ययन है, क्योंकि भूगोल का मूल उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले प्राकृतिक और सांस्कृतिक तत्वों की विविधता को समझना है।

     जब हम अपने आसपास के वातावरण का अवलोकन करते हैं, तो पाते हैं कि कहीं पर्वत हैं तो कहीं मैदान, कहीं वन हैं तो कहीं रेगिस्तान। इसी प्रकार, मानव जीवन की संस्कृति, निवास, वेशभूषा, भाषा और जीवनशैली भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न होती है।

    इन सभी भिन्नताओं का अध्ययन भूगोल करता है और यह समझने का प्रयास करता है कि इन भिन्नताओं के पीछे कौन-से प्राकृतिक कारण (जैसे जलवायु, स्थलरूप, मृदा) तथा मानवीय कारण (जैसे आर्थिक क्रियाएँ, तकनीकी विकास, संस्कृति) जिम्मेदार हैं। अतः भूगोल वास्तव में पृथ्वी की सतह पर क्षेत्रीय विविधताओं और उनके पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है।

(ii) आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।

उत्तर- भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र ये चारों सामाजिक विज्ञान के प्रमुख घटक हैं, जो मानव समाज के विभिन्न पहलुओं को समझने में एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

     इतिहास हमें समय के साथ मानव सभ्यता के विकास और परिवर्तन की जानकारी देता है, जबकि भूगोल यह बताता है कि भौगोलिक परिस्थितियाँ मानव जीवन और समाज को कैसे प्रभावित करती हैं।

    अर्थशास्त्र संसाधनों के उत्पादन, वितरण और उपभोग का अध्ययन करता है, जो भौगोलिक संसाधनों और ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

    नागरिक शास्त्र समाज में शासन, अधिकारों और दायित्वों की समझ प्रदान करता है, जो इतिहास और आर्थिक संरचना दोनों से प्रभावित होते हैं।

    इन विषयों का अंतरापृष्ठ (interface) यह दर्शाता है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय प्रक्रियाएँ परस्पर निर्भर हैं। इस प्रकार, इनका समाकलन मानव समाज की समग्र समझ विकसित करने में सहायक होता है।

34. Sound pollution and their remedial measures (ध्वनि प्रदूषण और इसके उपचारात्मक उपाय)

Sound pollution and their remedial measures

(ध्वनि प्रदूषण और इसके उपचारात्मक उपाय)



Sound pollution and their remedialपरिचय

     ध्वनि हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। यह हमारे संचार, आनंद, संगीत और पर्यावरण का हिस्सा है। किंतु जब ध्वनि अपनी प्राकृतिक सीमा को पार कर जाती है और व्यक्ति, समाज अथवा जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य, मानसिक शांति एवं कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव डालती है, तो उसे ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution) कहा जाता है।

   आधुनिक युग में औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, वाहनों की वृद्धि, मशीनों एवं लाउडस्पीकरों के अत्यधिक उपयोग के कारण यह एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बन चुकी है।

परिभाषा

     ध्वनि प्रदूषण वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में ध्वनि की तीव्रता (Sound Intensity) मानव श्रवण सीमा (लगभग 60 डेसिबल) से अधिक हो जाती है और वह असहनीय या हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार –

“जब किसी क्षेत्र में ध्वनि की तीव्रता 85 डेसिबल से अधिक हो जाती है, तो वह मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी जाती है।”

ध्वनि का मापन (Measurement of Sound)

   ध्वनि को डेसिबल (Decibel, dB) नामक इकाई में मापा जाता है। नीचे कुछ सामान्य ध्वनियों की तीव्रता दी गई है:

ध्वनि का स्रोत तीव्रता (dB)
सामान्य बातचीत 60
भारी यातायात 90
रेल इंजन 100
लाउडस्पीकर या संगीत कार्यक्रम 110-120
जेट विमान 130-140

     85 dB से अधिक ध्वनि निरंतर सुनना खतरनाक माना जाता है।

ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत (Major Sources of Sound Pollution)

(i) वाहन यातायात (Transportation Noise):-

       बसें, ट्रक, ऑटोमोबाइल, मोटरसाइकिलें, ट्रेनें, हवाई जहाज आदि निरंतर शोर उत्पन्न करते हैं। महानगरों में यह प्रमुख कारण है।

(ii) औद्योगिक स्रोत (Industrial Noise):-

     कारखानों में चलने वाली भारी मशीनें, टरबाइन, जनरेटर, प्रेस मशीनें आदि लगातार शोर उत्पन्न करती हैं।

(iii) निर्माण कार्य (Construction Activities):-

     इमारतें, पुल, सड़कें, मेट्रो आदि निर्माण कार्यों में ड्रिलिंग मशीन, क्रेन और अन्य उपकरण शोर करते हैं।

(iv) सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम (Social and Religious Functions):-

   विवाह, जुलूस, त्यौहारों, राजनीतिक रैलियों और धार्मिक आयोजनों में लाउडस्पीकरों और पटाखों का अत्यधिक प्रयोग होता है।

(v) घरेलू उपकरण (Domestic Appliances):-

    टेलीविजन, मिक्सर, वैक्यूम क्लीनर, कूलर, वॉशिंग मशीन आदि भी शोर का कारण बनते हैं।

(vi) विमानन क्षेत्र (Aviation Noise):-

    एयरपोर्ट के आसपास लगातार विमान उड़ान भरने और उतरने की आवाज से वातावरण अत्यधिक शोरग्रस्त रहता है।

ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Sound Pollution)

1. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

⇒ श्रवण क्षमता में कमी: लगातार ऊँची आवाज़ सुनने से कान की नसें क्षतिग्रस्त होती हैं और स्थायी बहरापन आ सकता है।

⇒ मानसिक तनाव और अनिद्रा: निरंतर शोर मानसिक अशांति, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, चिंता और अवसाद उत्पन्न करता है।

⇒ रक्तचाप में वृद्धि: अत्यधिक ध्वनि से हार्मोनल असंतुलन और रक्तचाप बढ़ता है।

⇒ हृदय रोग: निरंतर शोर से हृदय गति बढ़ती है और हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

⇒ एकाग्रता में कमी: छात्रों और कर्मचारियों में एकाग्रता और उत्पादकता कम होती है।

2. पशु-पक्षियों पर प्रभाव

⇒ पक्षियों की दिशा निर्धारण क्षमता प्रभावित होती है।

⇒ शोर के कारण कई पक्षी अपने प्रजनन स्थल छोड़ देते हैं।

⇒ जलीय जीव भी सोनार तरंगों से प्रभावित होते हैं।

3. पर्यावरण पर प्रभाव

⇒ शोर प्रदूषण से प्राकृतिक पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ता है।

⇒ वन्यजीव क्षेत्रों में प्रजनन दर घटती है।

⇒ पेड़ों की वृद्धि और पौधों की संवेदनशीलता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भारत में ध्वनि प्रदूषण की स्थिति

    भारत में ध्वनि प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियंत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के अनुसार, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पटना और लखनऊ जैसे महानगरों में औसतन ध्वनि स्तर 80 से 100 डेसिबल तक पहुँच गया है।

    यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा निर्धारित मानक (55 dB – दिन में, 45 dB – रात में) से कहीं अधिक है।

कानूनी प्रावधान (Legal Provisions)

(i) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986:-

  ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए इसे पर्यावरण प्रदूषण के दायरे में शामिल किया गया है।

(ii) Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000:-

    औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय और मौन क्षेत्रों के लिए अलग-अलग ध्वनि सीमा निर्धारित की गई है। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर या ध्वनि यंत्रों के उपयोग पर प्रतिबंध है।

(iii) भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 268, 290, 291:-

    सार्वजनिक उपद्रव या असुविधा उत्पन्न करने वाले शोर को दंडनीय अपराध माना गया है।

ध्वनि प्रदूषण के उपचारात्मक उपाय (Remedial Measures for Sound Pollution)

1. तकनीकी उपाय :-

⇒ ध्वनि अवरोधक (Sound Barriers): सड़कों और उद्योगों के आसपास दीवारें, वृक्ष पंक्तियाँ लगाकर ध्वनि अवरोध बनाए जाएँ।

⇒ ध्वनि अवशोषक सामग्री: भवन निर्माण में ध्वनि अवशोषक सामग्री जैसे रबर, फोम, ग्लास वूल का प्रयोग।

⇒ मशीनों की नियमित मरम्मत: पुरानी और शोर करने वाली मशीनों की मेंटेनेंस से ध्वनि कम होती है।

⇒ वाहन नियंत्रण: साइलेंसर यंत्रों का उचित रखरखाव और पुराने वाहनों पर नियंत्रण।

2. नीतिगत और प्रशासनिक उपाय

⇒ ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र निर्धारण: स्कूल, अस्पताल और कोर्ट के आसपास “Silence Zone” बनाना।

⇒ ध्वनि मानक पालन: औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में निर्धारित डेसिबल सीमा का पालन।

⇒ कानूनी प्रवर्तन: लाउडस्पीकर, पटाखों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में ध्वनि सीमा उल्लंघन पर दंड।

⇒ शहरी योजना: आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों का अलग-अलग नियोजन।

3. सामाजिक और व्यक्तिगत उपाय

⇒ जन-जागरूकता: ध्वनि प्रदूषण के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षण संस्थानों और मीडिया द्वारा प्रचार-प्रसार।

⇒ व्यक्तिगत अनुशासन: लाउडस्पीकर, टीवी, रेडियो आदि की आवाज़ सीमित रखें।

⇒ त्यौहारों और समारोहों में संयम: पटाखों और तेज ध्वनि वाले उपकरणों का सीमित प्रयोग।

⇒ पेड़-पौधों का रोपण: वृक्ष ध्वनि अवरोधक की तरह कार्य करते हैं, जिससे ध्वनि तीव्रता कम होती है।

4. वैज्ञानिक उपाय

⇒ Noise Mapping: शहरों के विभिन्न हिस्सों में ध्वनि स्तर का वैज्ञानिक मापन और मानचित्रण।

⇒ Noise Monitoring Systems: निरंतर ध्वनि मापन के लिए ऑटोमेटिक उपकरणों का प्रयोग।

⇒ Green Belt Development: औद्योगिक क्षेत्रों के चारों ओर हरित पट्टी विकसित करना।

⇒ Soundproof Technology: शोर नियंत्रित मशीनों और वाहनों का विकास।

सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास

⇒ CPCB और SPCB (State Pollution Control Board) द्वारा नियमित ध्वनि सर्वेक्षण।

⇒ NGO द्वारा जनजागरूकता अभियान और ध्वनि सीमाओं का पालन सुनिश्चित कराने हेतु कार्य।

⇒ स्वच्छ भारत अभियान और ग्रीन सिटी प्रोग्राम में ध्वनि प्रदूषण को शामिल करना।

अंतरराष्ट्रीय प्रयास

⇒ WHO और UNEP ने ध्वनि प्रदूषण को वैश्विक स्वास्थ्य समस्या के रूप में स्वीकार किया है।

⇒ कई देशों में “Noise Abatement Policies” और “Quiet City Zones” लागू हैं।

यूरोपीय देशों ने “Environmental Noise Directive (END)” लागू कर नागरिकों के लिए शांत वातावरण सुनिश्चित किया है।

शिक्षा और अनुसंधान की भूमिका

⇒ उच्च शिक्षण संस्थानों में पर्यावरणीय शिक्षा के अंतर्गत ध्वनि प्रदूषण को विशेष रूप से पढ़ाया जाए।

⇒ अनुसंधान संस्थान ध्वनि नियंत्रण की नई तकनीकों का विकास करें।

⇒ स्थानीय निकायों को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे नियमों का पालन करा सकें।

निष्कर्ष

    ध्वनि प्रदूषण एक अदृश्य लेकिन गंभीर पर्यावरणीय खतरा है जो मानव स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और पारिस्थितिक तंत्र को गहराई से प्रभावित करता है। इसका समाधान केवल कानूनों या तकनीकी उपायों से नहीं बल्कि जन-सहयोग और जागरूकता से संभव है।

     हमें यह समझना होगा कि शांति ही प्रगति का आधार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ध्वनि सीमा का पालन करना चाहिए। जन-जागरूकता, कानूनी नियंत्रण और तकनीकी सुधार के माध्यम से हम एक Noise-Free India का निर्माण कर सकते हैं।

33. International Standard of Drinking Water (पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक)

International Standard of Drinking Water

(पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक)



International Standard of Drinking Water

परिचय

       जल जीवन का मूल स्रोत है। पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए जल का शुद्ध एवं सुरक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। मानव शरीर का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से निर्मित है, अतः इसका सेवन शुद्ध, स्वच्छ तथा रोगाणु रहित होना चाहिए।

     किंतु आधुनिक युग में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण जल प्रदूषण की समस्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया कि पेयजल के लिए कुछ निश्चित मानक निर्धारित किए जाएँ, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित जल मिल सके।

    इसी उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने पेयजल की गुणवत्ता से संबंधित मानक निर्धारित किए हैं, जिन्हें “अंतरराष्ट्रीय पेयजल मानक (International Drinking Water Standards)” कहा जाता है।

परिभाषा

    पेयजल (Drinking Water) वह जल है जो मनुष्य द्वारा पीने, भोजन तैयार करने तथा घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त हो। यह जल भौतिक, रासायनिक और जैविक दृष्टि से शुद्ध होना चाहिए। इसमें कोई हानिकारक तत्व, सूक्ष्मजीव या प्रदूषक नहीं होना चाहिए जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करें।

अंतरराष्ट्रीय पेयजल मानकों की आवश्यकता

(i) स्वास्थ्य सुरक्षा हेतु – दूषित जल अनेक जलजनित रोगों जैसे टाइफाइड, हैजा, पेचिश, हेपेटाइटिस आदि का कारण बनता है।

(ii) वैज्ञानिक तुलना हेतु – विभिन्न देशों में जल की गुणवत्ता का तुलनात्मक मूल्यांकन करने हेतु।

(iii) विकासशील देशों में नीति निर्माण हेतु – स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के कार्यक्रमों और योजनाओं में दिशा देने हेतु।

() औद्योगिक नियंत्रण हेतु – उद्योगों द्वारा उत्सर्जित अपशिष्ट से जल स्रोतों की रक्षा करने हेतु।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पेयजल मानक

    WHO ने अपने “Guidelines for Drinking-water Quality” में पेयजल के लिए विभिन्न मानदंड निर्धारित किए हैं, जो मुख्यतः तीन श्रेणियों में बाँटे गए हैं –

1. भौतिक मानक (Physical Standards)

2. रासायनिक मानक (Chemical Standards)

3. जैविक मानक (Biological Standards)

भौतिक मानक (Physical Standards)

     भौतिक मानक जल के बाह्य गुणों से संबंधित होते हैं जैसे रंग, गंध, स्वाद, तापमान, और मटमैलापन।

मानक तत्व WHO अनुशंसित सीमा विवरण
रंग (Colour) 15 TCU (True Colour Unit) से अधिक नहीं अधिक रंग होने पर जल अस्वच्छ प्रतीत होता है।
गंध (Odour) अप्रिय गंध नहीं होनी चाहिए जैविक या रासायनिक पदार्थों के कारण गंध उत्पन्न होती है।
स्वाद (Taste) सामान्य और प्राकृतिक होना चाहिए क्लोरीन या अन्य रसायनों की अधिकता स्वाद को प्रभावित करती है।
मटमैलापन (Turbidity) 5 NTU से कम अधिक मटमैलापन रोगाणुओं की उपस्थिति का संकेत हो सकता है।
तापमान (Temperature) 25°C से कम अधिक तापमान वाले जल का स्वाद खराब हो जाता है।

रासायनिक मानक (Chemical Standards)

      रासायनिक मानक जल में उपस्थित विभिन्न रासायनिक तत्वों एवं यौगिकों की सीमा निर्धारित करते हैं। इन तत्वों की अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।

तत्व स्वीकार्य सीमा (WHO) प्रभाव
pH मान 6.5 – 8.5 बहुत अम्लीय या क्षारीय जल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कुल घुलित ठोस (TDS) 500 mg/L स्वाद और उपयोगिता पर प्रभाव डालता है।
क्लोराइड (Chloride) 250 mg/L अधिक मात्रा में खारापन बढ़ाता है।
सल्फेट (SO₄) 250 mg/L अधिक मात्रा दस्त या उल्टी का कारण बन सकती है।
नाइट्रेट (NO₃) 50 mg/L बच्चों में “ब्लू बेबी सिंड्रोम” का कारण बनता है।
फ्लोराइड (F⁻) 1.0 mg/L कम मात्रा में दाँतों के लिए लाभदायक, अधिक मात्रा में फ्लोरोसिस।
आयरन (Fe) 0.3 mg/L अधिक मात्रा जल का स्वाद बदलती है, पाइपों में जंग लगाती है।
मैंगनीज (Mn) 0.1 mg/L तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव डालता है।
आर्सेनिक (As) 0.01 mg/L कैंसरजनक तत्व, दीर्घकालीन सेवन से त्वचा रोग।
सीसा (Pb) 0.01 mg/L तंत्रिका तंत्र को क्षति पहुँचाता है।
पारा (Hg) 0.001 mg/L गुर्दों और मस्तिष्क को नुकसान।
कैडमियम (Cd) 0.003 mg/L हड्डियों और किडनी पर प्रतिकूल प्रभाव।

जैविक मानक (Biological Standards)

     जल में उपस्थित सूक्ष्मजीव रोगों के प्रमुख स्रोत हैं। अतः WHO ने जैविक मानकों के लिए विशेष दिशा-निर्देश दिए हैं।

सूक्ष्मजीव WHO अनुशंसा
E. coli (Escherichia coli) 0 प्रति 100 ml जल में
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया 0 प्रति 100 ml
वायरस, प्रोटोजोआ, हेल्मिंथ्स अनुपस्थित होने चाहिए

     यदि जल में उपर्युक्त किसी भी प्रकार के रोगाणु पाए जाते हैं, तो वह पेयजल के लिए अनुपयुक्त माना जाता है।

भारत में पेयजल मानक (BIS – IS 10500:2012)

    भारत में पेयजल की गुणवत्ता मानक भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। ये मानक अधिकांशतः WHO के दिशा-निर्देशों पर आधारित हैं।

तत्व स्वीकार्य सीमा अधिकतम अनुमेय सीमा
pH 6.5 – 8.5
कुल कठोरता (Hardness) 200 mg/L 600 mg/L
TDS 500 mg/L 2000 mg/L
फ्लोराइड 1.0 mg/L 1.5 mg/L
नाइट्रेट 45 mg/L
आयरन 0.3 mg/L
आर्सेनिक 0.01 mg/L
सीसा 0.01 mg/L

     भारत सरकार द्वारा “जल जीवन मिशन”, “स्वच्छ भारत मिशन”, और “राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम” के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानकों के अन्य संगठन

1. यूएस एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (USEPA) अमेरिका में पेयजल की गुणवत्ता के लिए मानक निर्धारित करती है।

2. यूरोपीय संघ (European Union Drinking Water Directive) यूरोपीय देशों के लिए गुणवत्ता मानक तय करता है।

3. ISO (International Organization for Standardization) जल गुणवत्ता के मापदंडों के लिए तकनीकी दिशा-निर्देश प्रदान करता है (ISO 10500 आदि)।

4. FAO/UNESCO संयुक्त आयोग जल संसाधनों के संरक्षण और गुणवत्ता मानकों पर कार्य करता है।

पेयजल गुणवत्ता के मूल्यांकन के प्रमुख पैरामीटर

(i) भौतिक पैरामीटर रंग, गंध, मटमैलापन, तापमान।

(ii) रासायनिक पैरामीटर pH, TDS, नाइट्रेट, फ्लोराइड, भारी धातुएँ।

(iii) जैविक पैरामीटर बैक्टीरिया, वायरस आदि।

(iv) रेडियोधर्मी पदार्थ ट्रिटियम, रेडियम आदि की उपस्थिति नहीं होनी चाहिए।

पेयजल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत

⇒ औद्योगिक अपशिष्ट और रासायनिक कारखाने।

⇒ कृषि में प्रयुक्त कीटनाशक और उर्वरक।

⇒ घरेलू सीवेज और अपशिष्ट जल।

⇒ भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड या नाइट्रेट की प्राकृतिक अधिकता।

⇒ असुरक्षित जल भंडारण और पाइपलाइन लीक।

पेयजल की गुणवत्ता सुधार के उपाय

(i) जल का शोधन (Treatment)- क्लोरीनीकरण, उबालना, फिल्ट्रेशन, रिवर्स ऑस्मोसिस (RO)।

(ii) स्रोत संरक्षण नदी, झील, भूमिगत जल स्रोतों का प्रदूषण से बचाव करना।

(iii) जनजागरूकता स्वच्छता और जल संरक्षण के प्रति लोगों को शिक्षा देना।

(iv) नियमित परीक्षण समय-समय पर जल की गुणवत्ता की जांच करना।

(v) नीति निर्माण सरकार द्वारा कठोर मानक और निगरानी तंत्र की स्थापना करना।

निष्कर्ष:

     पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक मानव स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। WHO और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा निर्धारित दिशानिर्देश यह सुनिश्चित करते हैं कि जल में किसी भी प्रकार का रासायनिक, जैविक या भौतिक प्रदूषण मानव जीवन को प्रभावित न करे।

     भारत जैसे विकासशील देशों के लिए इन मानकों का पालन करना न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा का प्रश्न है बल्कि सतत विकास का भी आधार है। इसलिए प्रत्येक नागरिक, संस्था और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर व्यक्ति को स्वच्छ, सुरक्षित और मानक के अनुरूप पेयजल उपलब्ध हो।

42. Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau (छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)

Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau

(छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)



Description of Chhotanagpur Plateauपरिचय

     छोटानागपुर पठार भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक अत्यंत प्राचीन भू-आकृतिक इकाई है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के भूगर्भीय विकास का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

    यह पठार न केवल अपने खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी स्थलाकृति, संरचना, नदियों की व्यवस्था, और मानव-भू-संबंधों के कारण यह भारत के भौतिक भूगोल में विशेष स्थान रखता है। छोटानागपुर पठार को भारतीय भू-रचना का “खनिज हृदय” (Mineral Heart of India) भी कहा जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

     छोटानागपुर पठार का विस्तार मुख्यतः झारखंड राज्य में है, जबकि इसके कुछ भाग छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक फैले हुए हैं।

⇒ इसका भौगोलिक विस्तार लगभग 22° से 25° उत्तर अक्षांश तथा 83° से 87° पूर्व देशांतर तक है।

⇒ पठार का औसत ऊँचाई स्तर 700 मीटर से 1100 मीटर के बीच है।

⇒ इसके उत्तर में गंगा समतलभूमि, दक्षिण में महानदी बेसिन, पूर्व में संथाल परगना की पहाड़ियाँ और पश्चिम में बघेलखंड पठार स्थित है।

भूगर्भीय संरचना

     छोटानागपुर पठार भारतीय भू-गर्भ के अरावली-धारवाड़ प्रणाली का हिस्सा है। यह क्षेत्र अत्यंत प्राचीन प्री-कैम्ब्रियन शैलों (Pre-Cambrian rocks) से निर्मित है।

⇒ यहाँ नीश, ग्रेनाइट, शिस्ट, क्वार्ट्जाइट, बेसाल्ट और ट्रैप जैसी रूपांतरित शिलाएँ प्रमुख हैं।

⇒ पठार की चट्टानें कठोर और अग्निय प्रकृति की हैं, जिनके बार-बार अपक्षय और अपरदन से वर्तमान स्थलाकृति बनी है।

⇒ भूगर्भीय दृष्टि से यह क्षेत्र स्थिर शील्ड क्षेत्र (Stable Shield Area) है, जहाँ भूकंपीय गतिविधियाँ सीमित हैं।

स्थलाकृति (Relief Features)

    छोटानागपुर पठार की स्थलरूप विशेषताएँ अत्यंत विविध हैं। इसे मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है—

(i) उत्तर छोटानागपुर पठार

⇒ यहाँ की ऊँचाई लगभग 300-700 मीटर तक है।

⇒ प्रमुख पहाड़ियाँ हैं- हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा आदि।

⇒ इस भाग में नदियों द्वारा गहरी घाटियाँ काटी गई हैं।

(ii) मध्य छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का सबसे विस्तृत क्षेत्र है।

⇒ राँची, लोहरदगा, गुमला और खूंटी जिले इसी भाग में हैं।

⇒ औसत ऊँचाई 700-900 मीटर है।

⇒ यहाँ की सबसे ऊँची चोटी पारसनाथ (1366 मीटर) है।

(iii) दक्षिण छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का उच्चतम भाग है, जहाँ ऊँचाई 900-1100 मीटर तक पहुँचती है।

⇒ नेतरहाट, लुपुंग, टोटो और रायरंग जैसे पठारी क्षेत्र इसी भाग में हैं।

⇒ इसे “छोटानागपुर का पठारी प्रांगण” भी कहा जाता है।

नदी तंत्र (River System)

    छोटानागपुर पठार से अनेक प्रमुख नदियाँ निकलती हैं जो भारत की पूर्वी दिशा की ओर बहती हैं।
मुख्य नदियाँ –

(i) दामोदर नदी – “बंगाल का शोक” कही जाती है, क्योंकि यह बार-बार बाढ़ लाती थी।

(ii) सुवर्णरेखा नदी – राँची से निकलकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

(iii) कोएल, बराकर, शंख, दक्षिण कोएल, ब्रह्मणी और बैतरणी ये सभी पठार की जल निकासी में सहायक हैं।

       नदियाँ प्रायः पूर्ववाहिनी (East-flowing) हैं। जल निकासी का स्वरूप डेंड्राइटिक पैटर्न (Dendritic Pattern) का है। नदियों ने घाटियाँ काटकर कई जगह गॉर्ज और जलप्रपात बनाए हैं –

जैसे – हुंडरू फॉल्स, दशम फॉल्स, जोंरी फॉल्स, हिरनी फॉल्स आदि।

जलवायु (Climate)

     पठार की जलवायु उष्ण कटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है, परन्तु ऊँचाई के कारण यहाँ तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।

ग्रीष्म ऋतु: अप्रैल से जून तक, तापमान 35°C–40°C तक जाता है।

⇒ वर्षा ऋतु: जून से सितंबर तक, औसत वार्षिक वर्षा 1200–1500 मिमी।

⇒ शीत ऋतु: नवम्बर से फरवरी तक, तापमान 10°C–15°C तक गिर जाता है।

    राँची और नेतरहाट जैसे स्थानों में जलवायु अत्यंत सुखद है, इसलिए इन्हें “भारत के छोटे शिमला” कहा जाता है।

मृदा (Soil)

    पठार की मृदाएँ मुख्यतः अपक्षय से बनी हैं-

⇒ लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil) – सबसे अधिक क्षेत्र में पाई जाती हैं।

⇒ लेटराइट मृदा (Laterite Soil) – उच्च पठारी भागों में, लौह ऑक्साइड से युक्त।

⇒ काली मृदा – कुछ दक्षिणी क्षेत्रों में, ज्वालामुखीय चट्टानों के कारण।

⇒ ये मृदाएँ पोषक तत्वों में गरीब हैं, इसलिए कृषि उत्पादकता कम है।

वनस्पति और जीव-जंतु

    छोटानागपुर पठार में घने वन पाए जाते हैं, जो मुख्यतः उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों (Tropical Deciduous Forests) के रूप में हैं।

मुख्य वृक्ष- साल, सागौन, बांस, अर्जुन, बेल, महुआ, तेंदू, और पलाश।

वन्यजीव- हाथी, बाघ, भालू, लोमड़ी, और कई प्रकार के पक्षी।

      यह क्षेत्र भारत का एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट माना जाता है।

खनिज संपदा (Mineral Resources)

    छोटानागपुर पठार को भारत का “खनिज भंडार गृह” कहा जाता है। यहाँ से भारत के कुल खनिज उत्पादन का लगभग 40% प्राप्त होता है।

मुख्य खनिज-

⇒ लौह अयस्क (सिंहभूम, चिरिया, गोवा)

⇒ कोयला (दामोदर घाटी, गिरिडीह, झरिया, बोकारो)

⇒ अभ्रक (गया, हजारीबाग, कोडरमा)

⇒ बॉक्साइट, तांबा, मैंगनीज, क्रोमाइट आदि।

    खनिज संसाधनों ने यहाँ के औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया है।

मानव बसावट एवं आर्थिक गतिविधियाँ

    पठार की आबादी अपेक्षाकृत विरल है, किन्तु संसाधनों की प्रचुरता ने यहाँ उद्योगों और नगरों के विकास को बढ़ावा दिया है।

मुख्य नगर- राँची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग।

मुख्य उद्योग-

⇒ इस्पात उद्योग (जमशेदपुर, बोकारो, रौरकेला)

⇒ कोयला और बिजली उद्योग

⇒ खनन और परिवहन

⇒ कुटीर उद्योग और वन आधारित उद्योग।

    कृषि की दृष्टि से यह क्षेत्र अपेक्षाकृत पिछड़ा है, क्योंकि मृदा उर्वरता कम और वर्षा अस्थिर है।

भू-आकृतिक विकास की प्रक्रिया

       छोटानागपुर पठार की भू-आकृति का निर्माण दीर्घकालिक अपक्षय, अपरदन और उत्थान की प्रक्रियाओं से हुआ है।

⇒ प्रारंभिक काल में यह एक विशाल पेनिप्लेन (Peneplain) था।

⇒ बाद में टेक्टोनिक उत्थान के कारण इसमें दरारें (faults) बनीं, जिससे पठारी रूप प्राप्त हुआ।

⇒ नदियों ने समय के साथ घाटियाँ और जलप्रपात बनाए।

⇒ वर्तमान में यह अपक्षय की परिपक्व अवस्था में है।

संतुलित भूआकृतिक दृष्टि से विश्लेषण

      “संतुलित भूआकृतिक विवरण” का अर्थ है- क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना, स्थलरूप, जलवायु, जैविक तत्वों और मानव क्रियाओं के बीच संतुलन की व्याख्या।

(क) भौतिक संतुलन

    पठार की ऊँचाई, ढाल और नदियों की दिशा में प्राकृतिक संतुलन दिखाई देता है। नदियाँ पूर्व की ओर प्रवाहित होकर जल निकासी संतुलित करती हैं।

(ख) जैविक संतुलन

   वनस्पति और मृदा का पारस्परिक संबंध क्षेत्रीय पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखता है। जहाँ वन नष्ट हुए हैं, वहाँ मृदा अपरदन बढ़ा है।

(ग) मानव-प्राकृतिक संतुलन

     खनन, उद्योग और शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव से यह संतुलन कुछ हद तक बिगड़ा है, किंतु वन संरक्षण, पुनर्वनीकरण और पर्यावरणीय योजनाओं से संतुलन पुनः स्थापित करने के प्रयास जारी हैं।

पर्यावरणीय समस्याएँ

⇒ खनन और औद्योगीकरण से मृदा एवं जल प्रदूषण।

⇒ वनक्षेत्र में कमी और जैव विविधता का ह्रास।

⇒ जल स्रोतों का क्षरण एवं नदियों में गाद जमाव।

⇒ आदिवासी समुदायों का विस्थापन।

भूमि अपरदन और मरुस्थलीकरण की प्रवृत्ति।

संरक्षण और विकास के उपाय

⇒ सतत खनन नीति अपनाना।

⇒ वन पुनर्जीवन और वृक्षारोपण कार्यक्रम।

⇒ मृदा संरक्षण तकनीकें – सीढ़ीदार खेती, कंटूर बंडिंग।

⇒ जल निकासी का नियोजन।

⇒ पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक नीति।

⇒ स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

    इस प्रकार छोटानागपुर पठार भारतीय भू-आकृति का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ प्रकृति और मानव दोनों ने मिलकर भू-दृश्य को आकार दिया है। इसकी कठोर चट्टानें, जलप्रपात, खनिज संपदा, और वन इसे विशेष पहचान देते हैं।

     यह पठार न केवल भारत की औद्योगिक शक्ति का आधार है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अतः आवश्यक है कि इसके संसाधनों का दोहन संतुलित एवं सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित हो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस भू-आकृतिक धरोहर का लाभ उठा सकें।

प्रश्न प्रारूप

1. छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण प्रस्तुत करें।

नोट: डेंड्राइटिक पैटर्न– डेंड्राइटिक पैटर्न वह जल निकासी आकृति है जो किसी पेड़ की शाखाओं जैसी दिखती है और समान रूप से अपक्षयित भू-भाग पर विकसित होती है।

32. Natural disaster: Drought, Flood and Earthquake (प्राकृतिक आपदाएँ: सूखा, बाढ़ और भूकंप)

Natural disaster: Drought, Flood and Earthquake

(प्राकृतिक आपदाएँ: सूखा, बाढ़ और भूकंप)



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परिचय

     प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन के लिए एक गंभीर चुनौती हैं। ये ऐसी घटनाएँ हैं जो प्राकृतिक शक्तियों के कारण अचानक घटित होती हैं और जिनका प्रभाव पर्यावरण, समाज, अर्थव्यवस्था तथा जनजीवन पर व्यापक रूप से पड़ता है। आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति के बावजूद मानव आज भी प्रकृति के प्रकोपों से पूर्णतः सुरक्षित नहीं हो पाया है।

     सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएँ न केवल भौतिक विनाश करती हैं बल्कि मानव जीवन की संरचना, संसाधनों और विकास प्रक्रिया को भी बाधित करती हैं। भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में इन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों अत्यधिक हैं।

1. सूखा (Drought)

     भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने सूखा को परिभाषित करते हुए बतलाया है की मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 सेमी० या उससे कम हो, सूखा की स्थिति कहलाएगी। यही समयावधि मानसून के आगमन का है, इसीलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है। यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है।

    अर्थात सूखा एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसमें किसी क्षेत्र में वर्षा की कमी लंबे समय तक बनी रहती है। इसके परिणामस्वरूप भूमि की नमी घट जाती है, फसलें नष्ट हो जाती हैं, जलस्रोत सूख जाते हैं और पशु-पक्षी तथा मनुष्य दोनों ही जीवन संकट में पड़ जाते हैं।

सूखे के प्रकार

(i) मौसमी सूखा (Meteorological Drought):-

     जब किसी क्षेत्र में औसत वर्षा से 25% या अधिक कमी हो जाती है, तो इसे मौसमी सूखा कहते हैं।

(ii) कृषि सूखा (Agricultural Drought):-

    जब मिट्टी की नमी इतनी कम हो जाती है कि फसलों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित होता है।

(iii) जलवैज्ञानिक सूखा (Hydrological Drought):-

       जब जलाशयों, नदियों, तालाबों और भूजल स्तर में असामान्य कमी हो जाती है।

(iv) सामाजिक-आर्थिक सूखा (Socio-economic Drought):-

    जब सूखे के कारण मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।

सूखे के कारण

⇒ अनियमित या असमान वर्षा वितरण

⇒ वनों की कटाई और भूमि का अत्यधिक दोहन

⇒ जल संसाधनों का अनुचित प्रबंधन

⇒ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग

⇒ भूजल का अत्यधिक दोहन

सूखे के प्रभाव

(i) कृषि पर प्रभाव:-

      फसलों की उपज घट जाती है, पशुधन मर जाते हैं और खाद्य संकट उत्पन्न हो जाता है।

(ii) सामाजिक प्रभाव:-

     पलायन, बेरोजगारी, गरीबी और भूखमरी जैसी स्थितियाँ बढ़ती हैं।

(iii) पर्यावरणीय प्रभाव:-

     भूमि बंजर हो जाती है, वनस्पतियाँ सूख जाती हैं और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाता है।

(iv) आर्थिक प्रभाव:-

     किसानों की आय घटती है, उत्पादन लागत बढ़ती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सूखा प्रबंधन

⇒ जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन

⇒ सूखा प्रतिरोधी फसलों की खेती

⇒ वनीकरण और भूमि संरक्षण

⇒ सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली

⇒ सरकार द्वारा राहत पैकेज और रोजगार योजनाएँ (जैसे मनरेगा)

2. बाढ़ (Flood)

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

   अर्थात बाढ़ वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में जल की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वह अपनी सामान्य सीमाओं को पार कर मानव बस्तियों, कृषि भूमि और सड़कों को डुबो देती है। यह सबसे सामान्य और व्यापक प्राकृतिक आपदा है।

बाढ़ के प्रकार

(i) नदी बाढ़:

       जब नदियाँ अपने तटों से बाहर निकल जाती हैं, जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी आदि की बाढ़।

(ii) शहरी बाढ़:-

    जब शहरों में जल निकासी की कमी के कारण वर्षा जल जमा हो जाता है।

(iii) फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़):-

     पहाड़ी क्षेत्रों में तीव्र वर्षा या ग्लेशियर पिघलने से अचानक उत्पन्न बाढ़।

(iv) तटीय बाढ़:-

     चक्रवात या समुद्री तूफानों के कारण समुद्र का जल तटवर्ती क्षेत्रों में फैल जाता है।

बाढ़ के कारण

⇒ अत्यधिक वर्षा और बादलों का फटना

⇒ नदियों का तल भर जाना और अवैध अतिक्रमण

⇒ जल निकासी प्रणाली का अभाव

⇒ वनों की कटाई और भूमि का क्षरण

⇒ बांधों या तटबंधों का टूटना

बाढ़ के प्रभाव

(i) मानव जीवन पर प्रभाव:-

     जन-धन की हानि, बीमारियों का फैलाव, विस्थापन और पलायन।

(ii) कृषि पर प्रभाव:-

     फसलों का नष्ट होना, मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का बह जाना।

(iii) आर्थिक प्रभाव:-

     बुनियादी ढाँचे, सड़कें, पुल, घर आदि का भारी नुकसान।

(iv) पर्यावरणीय प्रभाव:-

     जल प्रदूषण, मृदा अपरदन और जैव विविधता पर विपरीत असर।

बाढ़ प्रबंधन उपाय

⇒ बांध, नहरें और तटबंध निर्माण

⇒ वर्षा जल संचयन और जल निकासी सुधार

⇒ नदी तटों पर निर्माण प्रतिबंध

⇒ सटीक मौसम पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली

⇒ पुनर्वास और राहत कार्य

    भारत सरकार ने राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण नीति (National Flood Control Programme) के तहत कई योजनाएँ लागू की हैं, जैसे – गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, ब्रह्मपुत्र बोर्ड आदि।

3. भूकंप (Earthquake)

    भूकंप पृथ्वी की सतह के भीतर स्थित टेक्टोनिक प्लेटों के आपसी घर्षण या टकराव के कारण उत्पन्न होने वाली एक प्राकृतिक आपदा है। इसमें धरती की सतह अचानक हिलने लगती है, जिससे इमारतें, पुल, सड़कें और जनजीवन प्रभावित होता है।

भूकंप के प्रकार

(i) टेक्टोनिक भूकंप:-

    पृथ्वी की प्लेटों की गति और टकराव के कारण उत्पन्न होते हैं। ये सबसे सामान्य और शक्तिशाली होते हैं।

(ii) ज्वालामुखीय भूकंप:-

     ज्वालामुखी विस्फोट के साथ उत्पन्न होने वाले भूकंप।

(iii) संवेदनशील भूकंप (Collapse Earthquake):-

    भूमिगत खानों या गुफाओं के धंसने से उत्पन्न।

(iv) कृत्रिम भूकंप:-

     विस्फोट या परमाणु परीक्षणों के कारण होने वाले भूकंप।

भूकंप की तीव्रता का मापन

    भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल और मर्काली स्केल से मापी जाती है। रिक्टर पैमाने पर 2 से कम भूकंप सामान्य होता है जबकि 7 या उससे अधिक तीव्रता वाला भूकंप विनाशकारी होता है।

भूकंप के प्रभाव

    भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है जो पृथ्वी की सतह के भीतर ऊर्जा के अचानक विस्फोट के कारण होती है। इसके प्रभाव व्यापक और विनाशकारी होते हैं।

    सबसे पहले, भूकंप से इमारतें, पुल, सड़कें और अन्य संरचनाएँ ढह जाती हैं, जिससे भारी जन-धन की हानि होती है।

    भूकंप के कारण भूमिगत पाइपलाइनें टूट जाती हैं, जिससे गैस और पानी की आपूर्ति बाधित हो जाती है। कई बार आग लगने और विस्फोट जैसी घटनाएँ भी होती हैं।

    भूकंप से पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन (landslide) की समस्या उत्पन्न होती है, जिससे सड़कें और गाँव नष्ट हो जाते हैं। तटीय क्षेत्रों में यह सुनामी (tsunami) का रूप ले सकता है, जो समुद्री लहरों के रूप में तटीय बस्तियों को पूरी तरह डुबो देती है।

    सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी इसके गहरे प्रभाव पड़ते हैं- लोग बेघर हो जाते हैं, रोजगार के साधन नष्ट हो जाते हैं, तथा प्रभावित क्षेत्रों में भय और असुरक्षा का माहौल फैल जाता है।

    इसके अतिरिक्त, भूकंप पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। नदियों का मार्ग बदल सकता है और भूमिगत जल स्रोतों में परिवर्तन आ सकता है। अतः भूकंप न केवल मानव जीवन के लिए बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है।

भारत में भूकंप संभावित क्षेत्र

      भारत को पाँच भूकंपीय जोनों में बाँटा गया है-

⇒ जोन V : अत्यधिक संवेदनशील (जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य)

⇒ जोन IV : उच्च संवेदनशील (दिल्ली, बिहार, हिमाचल प्रदेश)

⇒ जोन III : मध्यम (गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश)

⇒ जोन II एवं I : कम संवेदनशील क्षेत्र

भूकंप प्रबंधन

⇒ भूकंप प्रतिरोधी भवन निर्माण

⇒ आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और पूर्व चेतावनी प्रणाली

⇒ सुरक्षित निकासी मार्ग और राहत केंद्र

⇒ जनजागरूकता अभियान

भारत में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन

    भारत में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (Disaster Management Act) लागू किया गया। इसके तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया गया है।
इसके अतिरिक्त-

⇒ प्रत्येक राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)

⇒ जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) कार्यरत हैं।

     इन संस्थाओं का कार्य आपदा पूर्व तैयारी, राहत एवं पुनर्वास कार्यों का संचालन तथा जन-जागरूकता बढ़ाना है।

निष्कर्ष:-

     इस प्रकार प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें पूर्णतः रोका नहीं जा सकता, लेकिन इनके प्रभाव को वैज्ञानिक तकनीक, सुविचारित नीति और जनसहभागिता से अवश्य कम किया जा सकता है। सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही सतत् विकास संभव है।

     जल संरक्षण, वनीकरण, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, आपदा प्रबंधन शिक्षा और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से हम इन आपदाओं के दुष्प्रभावों को न्यूनतम कर सकते हैं। अतः आवश्यकता है कि हम आपदा को आपदा न बनने दें, बल्कि उसे सीख और सुधार का अवसर बनाएँ।”

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