21. भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान

21. भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान


भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान

भूगोल के विकास में विडाल ड

            20वीं सदी के भूगोलवेत्ताओं में ब्लाश का नाम सर्वप्रथम आता है। इस महान विचारक ने सन् 1877 में इस महान कार्यक्षेत्र में कदम रखा था। भूगोल विषय पर पेरिस में अपने भाषण देना प्रारम्भ किया और यह कार्य अन्तिम समय तक चलता रहा। सन् 1898 में ब्लाश की नियुक्ति पेरिस के सार्वोनी विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के रूप में हुआ था।

    उन्होंने अपने प्रादेशिक अध्ययन पर अधिक जोर दिया जिसके अंदर किसी क्षेत्र के भौतिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा ऐतिहासिक कारणों के प्रभावों का स्पष्टीकरण किया जाना आवश्यक था। ब्लाश ने सारे विश्व के प्रादेशिक भूगोल का वर्णन प्रस्तुत करने वाली ग्रन्थ माला ‘विश्व भूगोल’ की योजना बनाई थी। उसने पेरिस के निवास काल में भूगोल की महान सेवा करते हुए निम्नांकित कार्य किये-

1. सन् 1889 में यूरोप के राज्य और राष्ट्र नामक प्रथम पुस्तक प्रकाशित हुई।

2. सन् 1894 में यूरोप का एटलस प्रकाशित हुआ।

3. सन् 1891 में विभिन्न प्रदेशों में किए गये शोध कार्यों के प्रकाशन हेतु उसने औपनिवेशिक भूगोल के विज्ञान ‘दुबोइस’ के सहयोग से वार्षिक ग्रंथमाला, नामक भौगोलिक पत्रिका प्रकाशित की थी जिसमें अनेक लेख प्रकाशित हुए।

4. ब्लाश ने बिब्लियोग्राफी के प्रकाशन की भी व्यवस्था की थी।

5. सन् 1903 में ‘फ्रांस का भूगोल’ नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया था। यह भूगोल के अलावा साहित्य का उत्कृष्ट ग्रंथ माना गया।

6. सन् 1917 में उसके प्रारम्भिक अध्ययन तथा शोध कार्यों पर आधारित पूर्वी फ्रांस का भूगोल प्रकाशित हुआ।

7. ब्लाश ने मानव के भूगोल सिद्धांतों पर सामग्री की मार्लोनी के महान प्रयासों में से एकत्र कर लिया था। सन् 1921 में ब्लाश की मृत्यु के पश्चात उसकी पुस्तक मानव भूगोल के सिद्धान्त प्रकाशित करायी गयी।

8. ब्लाश साम्यवादी विचारधारा का प्रवर्तक था।

9. प्रादेशिक अध्ययन के अन्तर्गत किसी प्रदेश के भौतिक, आर्थिक, राजनैतिक और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रभावों को स्पष्ट करना ब्लाश ने आवश्यक माना था।

10. ब्लाश ने प्राकृतिक वातावरण तथा मानव के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन पर विशेष बल दिया।

भूगोल  में योगदान:-

          विडाल डी लॉ ब्लाश फ्रांसीसी भूगोल के संस्थापक माने जाते हैं। उनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं:-

        ब्लाश ने Annals में 1913 में भूगोल के विशिष्ट लक्षण पर एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने स्पष्टतः कहा कि भूगोलवेत्ता का स्थान प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों विज्ञानों में होना चाहिए। उसने भूगोल के निम्न छः लक्षण बताये-

(i) भूगोल में पार्थिव घटनाओं की एकता महत्वपूर्ण है। अतः इसमें विश्व की पार्थिव घटनाओं एवं उनकी प्रकृति की सकारण व्याख्या की जाती है। दूसरे अर्थों में, भौतिक कारक तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित होकर पार्थिव घटक का निर्माण करते हैं।

(ii) पार्थिव घटनाएँ विविधता रूपी योग एवं समायोजन में स्थित हैं। विभिन्न घटनाक्रमों में विकास एवं परिवर्तन इसी कारण होता है।

(iii) ऐसी यौगिक एवं सह-विविधताओं की स्थिति, उनका वर्णन एवं व्याख्या भूगोल में होती है।

(iv) भूगोल में परिवेश या वातावरण के विभिन्न तत्वों का मानव पर प्रभाव का अध्ययन होता है। इसमें विशेषतः जलवायु, धरातल, वनस्पति, आदि का प्रभाव महत्वपूर्ण है। इन सबसे मानव के सामंजस्य का अध्ययन भी भूगोल में समान रूप से महत्वपूर्ण है।

(v) भूगोल में ऐसी वैज्ञानिक विधियों की खोज करना है, जिसके द्वारा पार्थिव घटनाओं को परिभाषित कर उन्हें वर्गीकृत किया जा सके। यहाँ ब्लाश ने ऐसे नियमों एवं गणितीय आधार की कल्पना की जो कि भूतल की विभिन्न घटनाओं की प्रवृत्ति को तथ्यात्मक आधार प्रदान कर सके। ब्रूंस पर भी ब्लाश के इस लक्षण का प्रभाव पड़ा एवं उसने पार्थिव घटनाओं को वर्गीकृत एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया।

(vi) भूगोल में मानव द्वारा भूतल पर लाये गये परिवर्तन एवं उसके महत्वपूर्ण कार्यों का सही-सही मूल्यांकन कर उनकी तर्कसंगत स्थिति निश्चित की जानी चाहिए।

        भूगोल के उपरोक्त लक्षणों की ऐसी व्यावहारिक व्याख्या वह सन् 1889 से लेकर जीवन पर्यन्त अपनी रचनाओं द्वारा करता रहा। ब्लाश के विचार प्रारंभ से ही परिपक्व एवं स्पष्ट रहे। उसने कांट की भांति दर्शन पर भी अधिक जोर दिया। उसने भौतिक, प्रादेशिक एवं मानव में से किसी एक पक्ष को भूगोल में कभी भी विशेष प्रबल नहीं माना। वह तीनों के समन्वित विकास का समर्थक रहा। अतः उसने पृथ्वी के विभिन्न प्रदेशों, उसकी घटनाओं एवं उन घटनाओं में मानव के योग की सम्यक व्याख्या को महत्वपूर्ण माना। भूगोल के वैज्ञानिक विकास के लिए उसने Annals में, स्वेस, स्टीन एवं अन्य कई भूगोल से संबंधित विज्ञानों के जर्मन एवं अंग्रेजी विद्वानों के लेखों और खोजों का फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद कराकर उन्हें प्रकाशित किया।

वातावरण मानव एवं सम्भावनाएँ:-

        ब्लाश ने भूगोल के अन्तर्गत भौतिक विश्व या प्रकृति जिसे उसने भौगोलिक वातावरण कहा, का अध्ययन एवं मानव का अध्ययन दोनों को अनिवार्य माना। भूतल पर पार्थिव अन्तः सम्बन्ध के रूप में पाये जाने वाले भौतिक एवं मानवीय तत्वों को स्वतंत्र रखकर उनकी सही-सही व्याख्या नहीं की जा सकती। जहाँ प्राकृतिक परिवेश विविध स्तरीय सम्भावनाओं की ओर मानव आकर्षित करता है वहीं मानव स्वेच्छा से अपनी क्षमता एवं आवश्यकता के अनुसार इनको चुनता है। इस प्रकार ब्लाश ने अपने समय के नियतिवादी चिन्तन की पकड़ से अपने को मुक्त ही नहीं रखा वरन एक साहसी और निर्भीक अग्रणी की भाँति वह स्पष्टतः सम्भववाद की ओर भी आगे बढ़ता गया। इस प्रकार उसने ल्यूसिन फेब्रे का समर्थन किया। मानव प्राकृतिक क्रियाओं से सामंजस्य एवं सम्बन्धों में अपने को एकाकी नहीं पाता। ब्लाश ने स्पष्ट किया कि वह भूमि पर आवास के द्वारा अपने से राज्य, इकाई क्षेत्र या प्रदेश को स्वरूपित करता है। ऐसे स्वरूपों के विकास को समझने के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं तत्कालिक परिस्थितियों को भी समझना आवश्यक है। इसके द्वारा ही पूर्व की प्रवृत्ति की व्याख्या एवं भविष्य का पूर्वानुमान सम्भव है। संक्षेप में वह व्यावहारिक भूगोलवेत्ता रहा।

सम्भववादी नियम:-

        ब्लाश का चिन्तन प्रारम्भ से ही यही रहा कि मानव स्वयं एक क्रियाशील प्राणी है। वह अपने परिवेश का उपयोग स्वयं के अनुभव के आधार पर करता है। जैसा कि पूर्व में लिखा गया है, प्रकृति सम्भावनाएँ व्यक्त करती है और मानव अपनी क्षमता एवं आवश्यकतानुसार उनका उपयोग कर सकता है। मानव का प्रवाहित जल, कटावयुक्त मिट्टी, वृक्ष आदि परिवेश के कुछ तत्वों पर नियंत्रण नहीं है परंतु कुछ अन्यों पर उसका नियंत्रण है। उदाहरणार्थ, प्रत्येक सभ्यता काल में विशेष फसलों का प्रादुर्भाव होता रहा है, आज मानव ने इन फसलों के उपज क्षेत्र का इतना विस्तार कर दिया है जिसकी कल्पना भी नहीं थी। इस प्रकार आज यह पूर्व के प्रतिकूल प्रदेशों में भी इनकी कृषि कर रहा है। ब्लाश ने उदाहरण देकर इन्हें स्पष्ट किया है।

         ब्लाश लिखते हैं, “समस्त भौगोलिक प्रगति में प्रबल विचारधारा यदि है तो वह है सार्वभौमिक एकता” मानव भूगोल के गोचर पदार्थ अर्थात् मानव रचित दृश्य भूमि सार्वभौमिक एकता से सम्बन्धित है, जिसकी रचना स्वयं पृथ्वी के प्रत्येक भाग में भौतिक दशाओं के योग से हुई है। ब्लाश ने रेटजेल की भांति प्रकृति के आधिपत्य या नियंत्रणकारी प्रभाव को कहीं भी स्वीकार नहीं किया।

प्रदेशों की संकल्पना:-

         ब्लाश ने कभी भी प्रदेश का चहारदीवारी की भाँति सीमांकित नहीं माना। उसने उन विद्वानों की आलोचना की जो कि प्रदेश को Water tight compartment मानते हैं। उसने अन्ततः प्रदशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में संक्रमण अथवा परस्परव्यापी क्षेत्र से भी इन्कार नहीं किया। ऐसे प्रदेशों का अध्ययन ही उसने व्यावहारिक माना। एक प्रदेश में पार्थिव घटनाओं एवं कारकों की अन्त: निर्भरता की खोज करके उनकी अन्य प्रदेशों की ऐसी घटनाओं एवं कारकों से समता एवं विषमता के आधार पर अन्यों से तुलना की जानी चाहिए। एक प्रदेश के कारकों के प्राकृतिक परिवेश के साथ-साथ वहाँ के निवासियों की परम्पराएँ, तकनीकी कुशलता, अन्य आर्थिक और सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रभाव को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसे सहयोग से ही प्रदेश में स्वरूपित लक्षणों को उत्कृष्ट विधि से समझा जा सकता है। हम्बोल्ट ने भी इसे प्रकृति एवं मानव के अन्तः सम्बन्धों के रूप में स्वीकार किया।

प्रादेशिक अध्ययन:-

       ब्लाश ने किसी भी राजनैतिक इकाई में प्राकृतिक परिवेश की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता के अनुसार विकसित लघु इकाइयों या प्रदेशों का बहुत ही सुन्दर ढंग से या सजीव वर्णन प्रस्तुत कया है। उसने सर्वप्रथम 1889 में अपनी रचना में भूतल पर निर्मित एवं लघु स्वरूपीय क्षेत्रों में मानव एवं प्राकृतिक परिवेश की क्रियाओं के घनिष्ठ सम्बन्धों के अध्ययन एवं उनके विश्लेषण पर विशेष बल दिया। उसने ऐसे अध्ययन की आवश्यकता क्षेत्र के भौतिक, ऐतिहासिक एवं आर्थिक तथ्यों के विकास, उनके सम्बन्ध और अन्तः निर्भरता का स्वरूप एवं उसमें आने वाले परिवर्तन (गतिशीलता) को समझने के लिए आवश्यक माना। उसने स्वीकार किया कि प्रकृति एवं मानव निर्मित तथ्य एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। भूतल पर इन दोनों का सम्बन्ध इतना गहरा है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। यूरोप के राज्य एवं राष्ट्र ग्रन्थ में उसने बताया कि एक प्रदेश में रहने वाला समाज स्थानीय होता है। वह ग्रामीण होता है।

             ब्लाश के समय फ्रांस एवं अधिकांश यूरोप की व्यवस्था भिन्न थी। तब विशिष्ट नगर, औद्योगिक इकाइयाँ एवं गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का अभाव था। अधिकांश प्रदेशों की आबादी ग्रामीण थी। उसने समझाया कि यहाँ के निवासियों का भूमि से गहरा संबंध होता है। युद्ध, महामारी, अकाल, बाढ़, विद्रोह आदि के समय ही ऐसे प्रदेश में व्याप्त सामान्य लक्षण कुछ समय के लिए अदृश्य होते हैं जैसे कि स्वच्छ जल के तालाब में एकाएक तेज हिलोरों से थोड़े समय के लिए तली के लक्षण दीखने बन्द हो जाते हैं परन्तु प्रतिकूलता समाप्त होते ही पूर्व की सामाजिक व्यवस्था पुनः स्थापित होने लगती है। आगे चलकर उसने औद्योगिकरण के कारण सामाजिक व्यवस्था एवं ग्रामीण आत्मनिर्भरता व्यवस्था में आने वाले स्थाई परिवर्तनों का भी पूर्वानुमान लगाया। उसके अनुसार 1896 के बाद से ही फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था तेजी से शहरी बनने लगी है, इसके लिए सहायक तत्व मशीनें विकसित यातायात, कोयला एवं नवीन उद्योग रहे नवीन समाज में आत्मनिर्भरता, अन्तः निर्भरता में बदल गयी। ब्लाश के ऐसे सुन्दर निष्कर्ष तथ्यात्मक एवं सही-सही विश्लेषण एवं उसकी विलक्षण क्षमता के कारण ही सम्भव हो सके। क्षेत्रीय अध्ययन को ब्लाश ने ‘Annals ‘ के माध्यम से विशेष लेखों द्वारा उद्देश्यपूर्ण बनाने का प्रयास किया।

भौतिक वातावरण:-

          यद्यपि ब्लाश ने हम्बोल्ट, रिचथोफन एवं पेश्चल की भाँति भूतल के प्राकृतिक तत्वों का अलग से व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया फिर भी उसने इनके अध्ययन को भूगोल के विकास के हित में महत्वपूर्ण माना। अतः जब भी भौतिक भूगोल सम्बन्धी कोई मुख्य अथवा रचना उपलब्ध हुई उसने ‘Annals’ में विशेष स्थान दिया। इस प्रकार उसका दर्शन बहुमुखी एवं विस्तृत आधार वाला रहा। उसने कभी भी भूगोल को संकुचित क्षेत्र या उद्देश्य हेतु निर्धारित अथवा व्यवस्थित विज्ञान या सामाजिक विज्ञान का ही अंग वाला विज्ञान नहीं माना।

        उसने स्पष्टतः समझाया कि भौतिक वातावरण जिसका कि निर्माण भूतल के भौतिक तत्वों से होता है, के लक्षणों को समझे बिना उनके प्रभाव के स्त को स्पष्ट नहीं किया जा सकता। किसी भी प्रदेश के अध्ययन में ऐसे भौतिक तत्वों के सम्मिलित प्रभाव को मानवीय तत्वों के साथ स्थान मिलना आवश्यक है। ऐसे सम्बन्धों के योग से एक मानव संस्कृति एवं सभ्यता के विकास के साथ-साथ उनकी गतिशीलता से अन्तःसम्बन्ध भी समझा जाना चाहिए।

20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान




भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

फ्रेडरिक रेटजेल

            रेटजेल का जन्म 1844 में जर्मनी में हुआ था। इनके पिता एक डयूक के मैनेजर थे। परिवार में कुल चार सदस्य थे। रेट्जेल ने सर्वप्रथम प्राणी विज्ञानी के रूप में हेडलबर्ग विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। बाद में (Jena) विश्वविद्यालय में चले गये।

        31 वर्ष की आयु में रेटजेल म्यूनिख के एक स्कूल में अध्यापक हो गये तथा 1886 तक वहीं रहे। उन्होंने म्यूनिख के नृजाति संग्रहालय में मोरिस वेगनर के साथ कार्य किया। यहीं वे प्रजातियों के आव्रजन से प्रभावित हुये। इस विचार ने उनके भौगोलिक दर्शन को प्रभावित किया। 1886 में रिचथोफेन के बर्लिन जाने के बाद रेटजेल लीपजिंग आये। यहाँ फिशर एवं हेटनर जैसे भूगोलविदों ने रेटजेल के निर्देशन में कार्य किया। रेटजेल मृत्यु पर्यन्त (1904) यहीं रहे।

         फ्रांस के मॉन्टपेलियर नगर में उसने प्रसिद्ध प्राणी-वैज्ञानिक चार्ल्स मार्टिन्स के साथ कार्य किया था। उस समय उसने एक पत्रिका में अपने कुछ लेख प्रकाशित किये थे जिनका शीर्षक ‘भूमध्यसागरीय तट से जीव वैज्ञानिक पत्र’ था। इन लेखों ने वैज्ञानिकों और सरकार का ध्यान उसकी ओर आकर्षित किया था। उसने 1870 के युद्ध में सेवा की थी, जिसके बाद उसको पत्रकार बनाकर पूर्वी यूरोप के देशों में तथा इटली, संयुक्त राज्य, मैक्सिको और क्यूबा में भेजा गया था।

      अपनी इन यात्राओं में उसने भौगोलिक अध्ययन किये, और धीरे-धीरे प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन लिखने की कला में सिद्धहस्त हो गया। उसने कैलिफोर्निया, मैक्सिको और क्यूबा में ‘चीन से प्रवास’ के तथ्यों का अध्ययन किया था। ‘चीनी प्रवास’ पर उसने अपना शोध-प्रबन्ध लिखा था, जिस पर उसे शोध-डिग्री मिली थी।

      1878 में रेटजेल ने उत्तरी अमेरिका के भूगोल पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी। उसके विख्यात ग्रन्थ एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ का प्रथम खण्ड 1882 में और दूसरा खण्ड 1891 में प्रकाशित हुआ। यह एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय ग्रन्थ है, जिसके कारण रेटजेल को मानव भूगोल का जन्मदाता कहा जाता है।

         रेटजेल ने राजनीतिक भूगोल का भी गम्भीर अध्ययन किया था। उसने ‘राजनीतिक भूगोल ग्रन्थमाला’ का प्रथम खण्ड 1897 में, और दूसरा खण्ड 1903 में प्रकाशित किया था। इन ग्रन्थों के अलावा रेटजेल ने कुछ पुस्तकें सामान्य जनता की रूची के लिए भी लिखा थी। उसने भूविज्ञान, मानवजातिशास्त्र, जीवविज्ञान, भौतिक भूगोल तथा मानव समाजों पर बहुत से लेख लिखे थे।

       रेटजेल ने वातावरण तथा मानवीय तथ्यों एवं उनके पास्परिक सम्बन्धों का विश्लेषण किया था। उसने मानव एवं वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों में वातावरण के प्रभावों को महत्वपूर्ण बतलाया था, इसीलिए उसे वातावरण निश्चयवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादक माना जाता है।

        रेटजेल ने ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के प्रथम खण्ड में डार्विन के विकासवाद सिद्धान्त से मिलते-जुलते विचार व्यक्त किये थे। इन विचारों में उसने मानवीय समाजों के इतिहास पर भौगोलिक वातावरण के प्रभावों का दिग्दर्शन किया था। इस खण्ड में उसने ‘इतिहास पर भूगोल का अनुप्रयोग’ समझाया था। ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के दूसरे खण्ड (1891) में सांस्कृतिक वातावरण जनसंख्या, मानवीय बस्तियाँ, जनसंख्याओं के प्रवास तथा सांस्कृतिक लक्षणों के वर्णन किये गये थे।

         रेटजेल ने भौतिक भूगोल के क्षेत्र में भी अनुसंधान किये थे तथा एक भौगोलिक ग्रन्थमाला का सम्पादन किया था। इस ग्रन्थमाला में प्रसिद्ध भूगोलवेत्ताओं की वैज्ञानिक शोध प्रकाशित हुई थी। इस ग्रन्थमाला में हाइम की पुस्तक हिमनदी पर थी। हान की पुस्तक जलवायु विज्ञान पर थी और पैंक की पुस्तक भू-आकृति विज्ञान पर थी। रेटजेल की रूची भौतिक भूगोल में बहुत अधिक थी, इसी कारण अपने जीवन में आगे चलकर जब उसने मानव भूगोल का वर्णन किया, तब उसने वातावरण की शक्तियों को सदा ध्यान में रखा था।

       फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता ब्रूंज ने लिखा है, रेटजेल को पार्थिव सत्यता का बहुत ऊँचा ज्ञान था। वह पृथ्वी पर मानवीय तथ्यों को केवल एक दार्शनिक या इतिहासकार अथवा अर्थशास्त्री की दृष्टि से नहीं, वरन् भूगोलवेत्ता की दृष्टि से देखता था। उसने मानवीय तथ्यों से बहुत से विभिन्न सम्बन्धों को भौतिक तथ्यों के साथ परखा था- जिनमें भूमि की ऊँचाई, जलवायु, वनस्पति आदि भी थे। उसने पृथ्वी के गोले पर मानव समूहों को बसते हुए, जीवकोपार्जन करते हुए, और इतिहास का निर्माण करते हुए देखा था। उसकी दृष्टि एक सच्चे प्रकृतिवादी की दृष्टि थी।

         रेटजेल उन गिने-चुने विद्वानों में से थे जिन्होंने बहुमुखी प्रतिभा के आधार पर भूगोल की सेवा की। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल को विकसित किया एवं यह शीघ्र ही वैज्ञानिक स्वरूप लेकर पौधों से विशाल वटवृक्ष की भाँति चहुँदिशा में प्रसारित हो गया। सभी यूरोपीय भूगोलवेत्ताओं ने उसके बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों की सराहना की। वह जीव विज्ञान, भू-विज्ञान, मौसम विज्ञान, आदि विषयों के विद्वान रहे। उसने जीव विज्ञान पर लिखना प्रारम्भ किया और यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के भ्रमण के उपरान्त वह भी हम्बोल्ट की भाँति एक मँजे हुए भूगोलवेत्ता बन गये।

        रेटजेल ने अपनी पूर्व के अनुभवों का मानव भूगोल चिन्तन के विकास में लाभ उठाया। वह डार्विन क विकासवादी सिद्धान्त से बहुत प्रभावित हुए, इसी से उन्होंने भौतिक परिवेश, उसके तत्व एवं उसका मानव पर प्रभाव का बहुमुखी रूप में पता लगाया। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल के लिए शब्द का प्रयोग किया। उसके अनुसार मानव भूगोल को भौतिक भूगोल की पृष्ठभूमि में ही सही-सही समझा जा सकता है। मानव भूगोल भू-मण्डल पर स्थल एवं भौतिक परिवेश से नियंत्रित मानवता के विस्तार एवं विवरण समझाता है। वास्तव में, उसने मानव भूगोल साथ-साथ कई विज्ञानों पर लिखा, इसी कारण रेटजेल को जर्मनी में मानव भूगोल के पिता होने का श्रेय प्राप्त है।

एन्थ्रोपोज्योग्राफी (मानव भूगोल):-

         रेटजेल रिटर के विचारों से विशेष रूप से प्रभावित हुआ और स्वयं उसने यह स्वीकार किया कि वह रिटर की अर्डकुंडे रचना को भूतल पर गतिशील विकास के सन्दर्भ में विकसित करना चाहता है। उसने पृथ्वी को एक इकाई के रूप में तो स्वीकार किया परन्तु उसका चिन्तन इस ग्रन्थ में निम्न दो बातों के आधार पर रिटर से भिन्न है:-

(i) उसने इसमें प्रादेशिक वर्णन के स्थान पर मानव भूगोल एवं परिवेश सम्बन्धी व्यवस्थित वर्णन प्रस्तुत किये।

(ii) उसने डार्विन के सिद्धान्त में विश्वास करते हुए मानव को विकास की अन्तिम कड़ी माना।

         अतः उसके इस ग्रन्थ में मानव वितरण के लिए उत्तरदायी कारक एवं प्राकृतिक परिवेश के तत्वों की व्याख्या सरल एवं स्पष्ट भाषा में की गयी है। अतः प्रथम खण्ड को ‘Application of geography to history भी कहा जाता है। उसके अनुसार भूतल पर हमारे कार्यकलापों के निर्धारण में परिवेश के निम्न चारों प्रभावी समूह महत्वपूर्ण हैं।

(i) शारीरिक प्रजातीय लक्षणों वाले प्रभाव,

(ii) मनोवैज्ञानिक प्रभाव,

(iii) जनसमूह की आर्थिक एवं सामाजिक गतिशीलता की न्यूनाधिकता के स्वरूप में फैली प्राकृतिक शाक्तियों के भौगोलिक प्रभाव, एवं

(iv) मानवता के वितरण एवं गतिशीलता को नियंत्रित एवं निर्धारित करने वाले प्रभाव।

           उपरोक्त चारों प्रभावों के कारकों का समूह ही प्राकृतिक परिवेश का प्रमुख आधार है। उसने मानव मन को भी प्राकृतिक परिवेश की उपज माना। उसने प्रथम ग्रन्थ में प्रायः कठोर निश्चयवाद का अनुसरण किया। उसके अनुसार, नियति द्वारा दी गई भूमि पर ही मानव को निवास करना चाहिए एवं उसे वहाँ विधना (प्राकृतिक परिवेश व भाग्य) के नियमों के अनुसार ही मौत का भी वरण करना चाहिये।

         उसने दूसरे खण्ड में मानव समुदाय के तात्कालिक विश्व वितरण की व्याख्या की। उसने भूतल के बसे हुए एवं निर्जन प्राय प्रदेशों के विस्तार को बताते हुए उनकी सीमा निश्चित की। रेटजल ने बताया कि बसी हुई दुनियाँ की सीमा पर बसे हुए बिखरे मानव समुदाय सभ्यता की चौकियाँ हैं। जलवायु के प्रभाव को महत्वपूर्ण बताते हुए उसने प्राचीन सभ्यता-केन्द्रों के उद्भव एवं विकास का कारण भी इसे ही बताया। जल संसाधन असभ्य मानव के लिए प्रमुख बाधा थे परन्तु ज्योंहि मानव ने नौवहन सीख लिया यह बाधा उसके लिए महान राजमार्ग बन गया। 

         मानव एवं उसके विकास के लिए रेटजेल ने तीन कारणों को उत्तरदायी माना, यह है-

(i) (Lage Situation) स्थिति- यह स्थिति अन्य मानव समूहों के सन्दर्भ में है। 

(ii) Raum (Space) स्थान- क्षेत्र की सहसम्बद्धता, क्षेत्र की केन्द्रीयता एवं उनकी सीमावर्ती स्थिति इसके अंग हैं। ऐसा क्षेत्र जनसंख्या की अधिकता के साथ-साथ प्राकृतिक अथवा मानवीय बाघाएँ स्वीकार नहीं करता, एवं

(iii) Rahmen (limits) सीमाएँ- मानव समुदाय प्राकृतिक ढाँचे अथवा निर्धारित सीमा में विकसित होते हैं।

       संक्षेप में, रेटजेल के एन्थ्रोपोज्योग्राफी ग्रन्थ में निम्न तीन समस्याओं की ओर विशेष ध्यान दिया गया है:-

(i) भूतल पर मानव समूहों का वितरण-

       इसमें मानव के जातीय, राष्ट्रीय भाषा एवं धार्मिक स्तर विषयक वर्णन हैं जिन्हें समझने के लिए वांछित मानचित्र चाहिए। वर्तमान में यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूगोल का अभिन्न अंग माने गये हैं।

(ii) उपरोक्त वितरण किस प्रकार भौतिक परिवेश द्वारा प्रभावित है एवं उस पर निर्भर है।

(ii) मानव एवं उसके समाज पर भौतिक परिवेश का स्पष्ट प्रभाव। जैसे जलवायु एवं धरातल का प्रभाव।

           उसने इस प्रकार एन्थ्रोपोज्यॉग्राफी में सामान्यीकरण की प्रक्रिया को अपनाया। अपनी दूरदृष्टी के कारण उसने अपनी ग्रन्थ रचना में वारेनियस की भाँति कोई योजना नहीं बनायी। वह अपने अनुभवों के सहारे बढ़ता गया एवं ज्यों-ज्यों उसका कार्य आगे बढ़ा कई समस्याएँ उसके सम्मुख आयीं तो रेटजेल उनके निराकरण में तथा उससे सम्बन्धित विषय को समझने में लग गया।

       समुचित अध्ययन हेतु प्रदेशों एवं क्षेत्रों के अध्ययन के दर्शन को रेटजेल के साथ-साथ रिचथोफेन एवं हेटनर ने भी (ऐसे ही अध्ययन को) क्षेत्रीय अध्ययन के सिद्धान्तों को भूगोल का अनिवार्य अंग माना। वर्तमान में इस चिन्तन को विकसित करने का श्रेय हार्टशोर्न को है।

        रेटजेल की मानव भूगोल की धारणा की परिणति राजनीतिक भूगोल में हुई।  रेटजेल की राजनीतिक भूगोल नामक पुस्तक का प्रकाशन 1897 में हुआ था। वे राज्य को पृथ्वी की सतह पर एक विशिष्ट किस्म की भौगोलिक इकाई के रूप में देखते थे। वे राज्य की तुलना जैविक इकाई (जीवशास्त्र) से करते थे। उनके अनुसार राज्य वस्तुतः पृथ्वी पर मनुष्य द्वारा रचित एक संगठन होता है जिसमें जनसंख्या का निवास पाया जाता है।

         उनके अनुसार राज्य एक स्थानिक जीव की तरह है जो अपनी प्रकृति प्रदत्त सीमाओं तक प्रसार करता है। यदि उसके प्रसार को अवरोध नहीं मिलता तो वह अपनी प्राकृतिक सीमाओं को लांघ कर अपनी सीमा का विस्तार करता है। यह प्रवृत्ति विकसित मानव समूहों, बंजारों, चरवाहों, शिकारी समूहों आदि सभी में मिलती है। यहीं से लेवांसराम की सकल्पना का जन्म होता है।

          इस तरह रेटजेल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे मानव भूगोल के प्रणेता थे। उन्हें नियतिवादी कहना गलत है। यह एक भ्रान्ति थी। भ्रांति का कारण जर्मन भाषा के उनके ग्रन्थों का अंग्रेजी अनुवाद था जिसमें मनुष्य एवं प्रकृति के सम्बन्ध के मापन पर जोर देने के कारण रेटजेल को प्रकृतिवादी कहा गया।

     चूँकि इनकी शिष्या कुमारी ऐलेन सेम्पुल ने आगे चलकर अति कठोर प्रकृतिवादी विचारधारा प्रस्तुत की अतः उनके गुरू के प्रकृतिवादी होने की धारणा अपने आप पुष्ट होती गई जब आधुनिक लेखकों ने उनके मूल योगदान को पढ़ा तो यह तथ्य स्पष्ट हुआ। रेटजेल ने लीपजिंग में एक भूगोल संस्था की भी स्थापना की थी जो शीघ्र अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की संस्था बनी।

       रेटजेल के समय में या तो भौतिक भूगोल का अधिक अध्ययन हो रहा था या मनुष्य का। मनुष्य के विकास को यंत्रवत् बतलाया गया था तथा मनुष्य का भौगोलिक स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं माना जाता था। रेटजेल ने इस अन्तर को पाटने का प्रयास किया। उनके कार्य भौतिक भूगोल एवं मनुष्य के अध्ययन के बीच की कड़ी है। वे प्रकृति के उन नियमों के अध्ययन को आवश्यक मानते थे जो पृथ्वी पर जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करते हैं। उन्होंने मनुष्य को पृथ्वी की एक ईकाई के रूप में भूगोल में समाविष्ट किया। इस प्रयास से भूगोल पुर्नजीवित हो उठा।

19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान (Contribution by Arab scholars)

19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

(Contribution by Arab scholars)


अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

           700 A. D. से 1100 A. D. तक का समय अरबी भूगोलवेत्ताओं का समय माना जाता है। इस समय जबकि यूरोपीय ईसाई राष्ट्र भूगोल को अवनति की ओर धकेल रहे थे, अरबी भूगोलवेत्ता न केवल भूगोल के चिरसम्मत शास्त्रीय कालीन ज्ञान की रक्षा क रहे थे वरन् उसकी उत्तरोत्तर वृद्धि के लिए भी प्रयत्न कर रहे थे।

        पूर्ववर्ती अन्धकार युग में भूगोल के पथ भ्रष्ट हो जाने का सर्वप्रमुख कारण था, भूगोल पर धर्म का आरोपण। अरब भूगोलवेत्ता भी यद्यपि भूगोल को धर्म के पंजे से पूर्णतः मुक्त तो नहीं कर सके तथापि उन्होंने उसके प्रभाव को कम अवश्य किया। उन्होंने तर्क शक्ति के आधार पर धर्म को भूगोल में स्थान दिया। धर्म के प्रभाव के कारण उनके कार्य पूर्णतः तो वैज्ञानिक नहीं थे, परन्तु काफी हद तक वैज्ञानिक थे।

       अरबी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल में यह महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए उनको प्रेरित करने वाले कारकों में अरब साम्राज्य की स्थिति व विस्तार, उसकी यूनानी सभ्यता के देशों पर विजय, यातायात मार्गों का विकास, भारत से सम्पर्क, व्यापार में उन्नति व मरुस्थलीय वातावरण प्रमुख थे। अरब भूगोलवेत्ताओं ने जो योगदान भूगोल के क्षेत्र में किए वे संक्षेप में इस प्रकार हैं :

(1) प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा:-

            अरब भूगोलवेत्ताओं का कार्य अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। परिणामतः इनको अनेक भ्रामक धारणाओं से भूगोल को मुक्ति दिलानी पड़ी। साथ ही इन्होंने प्राचीन शास्त्रीय कालीन ज्ञान को भी जीवित रखा। अरस्तु, टॉलमी, स्ट्रैबो, आदि भूगोलवेत्ताओं का सतत परिश्रम से अध्ययन किया व उनके ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद किया। अन्वेषण कार्य किए तथा मौलिक ग्रन्थों की रचना की। 776 A. D. में अरब में अब्बासी वंश का साम्राज्य था। उस समय खलीफा का प्रशासनिक कार्यालय दमिश्क (सीरिया) में था जिसे बदलकर बगदाद में ले जाया गया। यहां पर यूनानी व अरब सभ्यताओं का मेल हुआ जिससे भौगोलिक ज्ञान के प्रसार में सहायता मिली। 

अरब भूगोलवेत्ताओं का योग

टॉलमी

(2) गणित में विशेष प्रगति:-

        अरब भूगोलवेताओं ने पृथ्वी के आकार को निश्चित करने के अनेक प्रयास किए थे। मानचित्र बनाने के लिए कुछ प्रक्षेपों की गणनाएं की गई थी।

         बगदाद में गणितीय भूगोल का काफी विकास किया गया था। भू-सर्वेक्षण के लिए पृथ्वी की आकृति (Shape) और आकार (Size) निश्चित करने के लिए मानचित्रों के निर्माण और परिवहन आदि के लिए गणितीय भूगोल का प्रयोग किया जाता था। शीराज (ईरान), काहिरा (मिस्र), टॉलेडो (स्पेन) में खगोलिकी तथा गणित के उच्च अध्ययन किए गए थे।

        अल-खालिजामी, अल हबीब, इब्ने यूनुस, अब्दुल रहमान, अल अजीज, आदि भूगोलवेत्ताओं ने गणितीय भूगोल में विशेष योगदान किया। अल इदरीसी ने पृथ्वी की परिधि 22,900 मील मानी थी। उसने पृथ्वी की जलवायु प्रदर्शित करने के लिए 60 मानचित्र बनाए थे।

(3) खगोलिकी में प्रगति:-

           इस काल में खगोलिकी के क्षेत्र में भी विशेष प्रगति हुई । फलक यन्त्र की सहायता से नक्षत्रों की गति, चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण की दशाओं, पृथ्वी की विषुवतरेखीय स्थितियों तथा सूर्य व चन्द्र की राशियों के सन्दर्भ में खोज कार्य किए गए। खगोलिकी में प्रगति के लिए तीन तथ्य विशेष रूप से उत्तरदायी हैं-

(i) अरब का मरुस्थलीय एवं अर्धमरुस्थलीय वातावरण जहां रात्रि में आकाश स्वच्छ रहता है, जिससे खगोलिकीय वेधों (Astronomical observations) में सहायता मिलती है।

(ii) पूर्ववर्ती कालों में खगोलिकीय यन्त्रों का आविष्कार हो चुका था। यूनान व रोम से भी इस सम्बन्ध में काफी ज्ञान प्राप्त हुआ था।

(iii) अरबी भूगोलवेत्ताओं के भारत से अच्छे सम्बन्ध थे, भारत में इस क्षेत्र में पर्याप्त विकास हो चुका था।

        इस क्षेत्र में अल-ममून, अल फर्घानी, अल वतानी व अल खालिजामी आदि भूगोलवेत्ताओं ने विशेष योगदान किया।

(4) अक्षांश व देशान्तर रेखाओं की शुद्ध गणना:-

           टॉलमी के समय की अपेक्षा इस युग में पृथ्वी के अक्षांशों व देशान्तरों की दूरियों को अरब विद्वानों ने अधिक शुद्धता के साथ निश्चित कर दिया था। पूर्ववर्ती अन्धकार युग की प्रवृत्ति के विपरीत मुसलमानों के तीर्थ स्थान मक्का की स्थिति के सन्दर्भ में पृथ्वी के निर्देशकों को शुद्धता के साथ निश्चित करने की प्रेरणा इन विद्वानों को अपने धर्म से मिली, ताकि दूरस्थ क्षेत्रों में निवास करने वाले मुसलमानों की दोपहर की नमाज एक साथ हो सके। मक्के में जब दोपहर के बारह बजते थे तभी सब मुसलमान अपने स्थानीय नमाज पढ़ते थे। इसके अतिरिक्त देश में एक मस्जिद बनाई जाती थी, उनका निर्माण इस प्रकार किया जाता था कि का मूँह मक्का की ओर रहे। इस प्रकार धार्मिक रीति रिवाजों से भी देशान्तरों व दिशाओं का शुद्ध ज्ञान करने में सहायता मिली।

(5) भौगोलिक ग्रन्थों का विकास:-

          मध्य युग में वर्णनात्मक भूगोल का भी प्रचलन हो गया था। भ्रमण कार्य लोगों के लिए रुचिकर हो गया था। यह धार्मिक, व्यापारिक या ज्ञानार्जन के दृष्टिकोण से होता था। यात्रियों ने उस समय पूर्व दिशा में देखे हुए व बिना देखे स्थानों के वर्णन विभिन्न नगरों, मार्गों, बीच की दूरियों, उत्पादन, व्यापार, समाज व्यवस्था आदि के परिप्रेक्ष्य में किए।

          वर्णनात्मक भूगोल पर खलीफाओं के संरक्षण में जो ग्रन्थ लिखे गए उनमें अरब साम्राज्य, भारत, मध्य एशिया व अरब के प्रादेशिक वर्णन बहुत श्रेष्ठ थे। सर्वाधिक संख्या में ग्रन्थ अल इदरीसी ने लिखे, जो वैज्ञानिक ढंग से की गई सविस्तार प्रादेशिक व्याख्या के लिए प्रशंसनीय हैं।

(6) भौगोलिक शिक्षा के केन्द्र:-

       अरब साम्राज्य में भौगोलिक ज्ञान को विकसित करने के लिए सात केन्द्र थे- येरूसलम, काहिरा, टॉलेडो, कुस्तुनतुनिया, दमिश्क, शीराज। हारू-अल रशीद ने बगदाद में एक संस्था की स्थापना की जिसमें भाषा विशेषज्ञों द्वारा यूनानी, रोमन व भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद होते थे।

(7) मानचित्र कला:-

          पूर्ववर्ती अन्धकार युग में ईसाई धर्म के प्रभाव से मानचित्रों का वास्तविक परिचय ही समाप्त हो गया था। अरबी भूगोलवेत्ताओं ने उन्हें पुनर्स्थापित किया। उन्होंने टॉलमी व स्ट्रैबो,आदि भूगोलवेत्ताओं के मानचित्रों को संशोधित रूप में प्रस्तुत किया। ये मानचित्र पूर्ववर्ती मानचित्रों से अधिक शुद्ध, परन्तु वास्तविकता से दूर थे, परन्तु ये सजावटी मानचित्र उच्चकोटि के थे।

          इस काल में विभिन्न मानचित्र प्रक्षेपों का निर्माण किया गया। स्कूलों में भूगोल पढ़ाने के लिए मानचित्रावलियों का निर्माण किया गया। इदरीसी इस काल का प्रमुख मानचित्रकार था। उसने अपने मानचित्रों को सजावट तो उच्चकोटि की प्रदान की थी, परन्तु उसमें तथ्यों का अभाव था।

(8) अनुवाद कार्य:-

         इस विधा पर सर्वप्रथम अरबी भूगोलवेत्ताओं ने ही कार्य किया। इस कार्य से ही उन्होंने प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा की। अनुवाद कार्य का प्रमुख केन्द्र बगदाद था। सर्वप्रथम अल-बातरीक (Al-Batriq) ने ट्रॉलमी के अल्मागेस्ट का अनुवाद अबी भाषा में किया। उसने ही गैलेव हिप्पोक्रेट्स के ग्रन्थों का भी अनुवाद किया। अरस्तु व स्ट्रैबो के ग्रंथों का अनुवाद किया गया।

(9) भौगोलिक शब्द-कोश:-

            भौगोलिक शब्द-कोश का निर्माण करके अरब भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक ज्ञान के समृद्ध होने का परिचय था। महत्वपूर्ण शब्दकोश का निर्माण इब्नयाकूत ने किया। इब्न फिदा ने सामान्य ज्ञान कोश का निर्माण किया। अलबरूनी, इब्ने-सिना, जकाउट (Jakout) व अल-बाकरी ने भी इस क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया।

निष्कर्ष: 

      इस प्रकार स्पष्ट है कि अरब भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यद्यपि उनके कार्य वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक शुद्ध नहीं थे, तथापि उनमें सत्यता का पुट था। उनके कार्य इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनका काल अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। भूगोल पर अन्धका का पर्दा उठाकर उसको सही दिशा प्रदान करना ही इन भूगोलवेत्ताओं का सबसे बड़ा कार्य है।

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास (Development of Geographical ideas in Ancient India)

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास


प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास

             प्राचीन भारत की कई हजार वर्ष ईसा पूर्व की संस्कृति व नगरीय निर्माण कला के अवशेष देखकर आज विकसित पाश्चात्य देशों के महान विद्वान भी असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं। पुरातनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान का विवरण विभिन्न स्थलों की खुदाई से प्राप्त सामग्री तथा तत्कालीन विभिन्न ग्रन्थों से प्राप्त होता है।

         प्राचीनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान को संक्षेप में निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है:-

(1) सौरमण्डलीय ज्ञान:-

          प्राचीन काल में ही ब्रह्माण्ड विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने पर्याप्त उन्नति कर ली थी। सूर्य, चन्द्र व पृथ्वी के सम्बन्धों, ऋतु परिवर्तनों, दिवस-रात्रि, उषः, मध्याह्न अपरान्ह, आदि के प्रसंग ऋग्वेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद में, बहुत से मन्त्रों में आते है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष के वर्णन तथा मृगशिरा, कृत्तिका, चित्रा, रेवती आदि सत्ताईस नक्षत्रों के वेदों व ब्रह्माण्ड ग्रन्थों में पढ़े जा सकते हैं। विषुव दिवस (Equatorial Day) का उल्लेख वेदों में अनेक स्थानों पर है। सौर वर्ष (Solar Year), सौर मास (Solar Month), आदि की गणनाओ, सत्ताइस नक्षत्रों की चालों और सूर्य नक्षत्रों की गणनाओं के आधार पर वैदिक ज्योतिष का प्रतिपादन किया गया।

        ईसा की पांचवीं सदी से सातवीं सदी तक भारतीय विद्वानों ने खगोलीय भूगोल (Astronomical Geography) में बहुत उन्नति की। इसी काल में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, आदि विख्यात गणितज्ञ थे। इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों में ‘सूर्य सिद्धान्त’ प्रमुख है।

प्राचीन भारत में भौगोलिक

आर्यभट्ट

            प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में पृथ्वी की उत्पत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद के मन्त्रों से अनुमान लगाया गया है कि आर्यों ने पृथ्वी के पिघले रूप की कल्पना की थी, जिसे आज सभी स्वीकार करते हैं। रामायण-महाभारत में भूचाल तथा ज्वालामुखी के प्रसंग हैं। “जब शक्तिशाली गज थक कर सिर हिलाता है, तब भूचाल आता है।’ यही कारण बताया गया है भूचाल का। महाभारत में ज्वालामुखी पर्वत के उभार की चर्चा है- “पृथ्वी अपने सातों महाद्वीपों के साथ उठ गई, जिसके साथ पर्वत, नदियां, वन, आदि भी ऊंचे उठ गए।’

        पुराणों में महाद्वीपों व पर्वतों की उत्पत्ति विषयक कल्पनाएं की हैं- ‘पृथ्वी महासागर में एक बृहत् नौका के रूप में तैरती है। ब्रह्मा ने पृथ्वी का समतलन किया व उसे सात द्वीपों में विभक्त किया।’ इससे पृथ्वी के तैरने की वर्तमान संकल्पना (सियाल के बने महाद्वीप सीमा पर तैरते हैं) के समकक्ष विचारधारा का अनुमान होता है। पृथ्वी की आयु की कल्पना भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में की गई है। ‘मनुस्मृति’ उल्लेख है कि पृथ्वी अब तक 1,96,91,03,000 वर्ष पूर्ण कर चुकी है। समकालीन विद्वान भी पृथ्वी की आयु करीब दो अरब मानते हैं। रामायण में सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण की भी चर्चा है। इसके कारण राहु-केतु बताए गए हैं। सौरमण्डल के अन्य ग्रहों- मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, आदि की चर्चा भी कई स्थलों पर है।

(2) वायुमण्डलीय ज्ञान:-

          ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय के आर्यों को वायुमण्डल के सम्बन्ध में अच्छा ज्ञान था। उन्होंने वर्ष को छः ऋतुओं में विभक्त किया था। मन्त्रों में 49 से 63 प्रकार की पवनों की चर्चा है। वाल्मीकि रामायण में बादलों का वर्णन है। इसमें तीन प्रकार के बादल व सात प्रकार की पवन की चर्चा है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में,  विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का वितरण समझाया गया है जो आज के वितरण के अनुकूल है। कृषि तथा वर्षा का सम्बन्ध स्थापित करते हुए कौटिल्य ने लिखा है- कुछ ऐसे बादल होते हैं जो क्रमशः सात दिन तक वर्षा करते हैं, 80 ऐसे हैं जिनमें कम वर्षा होती है, 60 ऐसे होते हैं जो खेतों को जोतने योग्य बनाते हैं। कौटिल्य ने वर्षा मापक यन्त्र भी तैयार किया था।

(3) जलमण्डलीय ज्ञान:-

            वैदिक मन्त्रों में महासागरों का वर्णन है। सामवेद तथा अथर्ववेद में महासागरों की संख्या 4 बताई गई है, परन्तु अन्य वेदों में इनकी संख्या 7 बताई गई है। सामवेद में महासागरों में जल के उठने का वर्णन मिलता है, जिससे ज्वार-भाटा की कल्पना की जा सकती है। रामायण में कई स्थानों पर ज्वार-भाटा का उल्लेख है, इसका कारण चन्द्रमा बताया गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मूंगा, मोती की चर्चा है। महासागरों में किन स्थानों पर ये मिलते हैं, इसका भी विस्तृत वर्णन ग्रन्थ में पढ़ा जा सकता है।

(4) स्थलमण्डलीय ज्ञान (सामान्य भौगोलिक वर्णन):-

       प्राचीन काल के स्थलमण्डलीय ज्ञान को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-

(i) भौतिक भूगोल- भौतिक भूगोल विषयक ज्ञान में पर्वतों, नदियों व वनस्पति का वर्णन मिलता हैं:-

(क) पर्वत- पुराणों के अनुसार संसार की समस्त पर्वत श्रृंखलाएं पामीर (मेरु) के चारों ओर जाती हैं। पर्वतों को पांच प्रकारों में विभक्त किया गया है- मध्य पर्वत (मेरु), विषकम्भ पर्वत (जो मेरु के चतुर्दिक विस्तृत हैं), वर्ष पर्वत (विभिन्न देशों की कुल पर्वत (मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं) तथा मर्यादा पर्वत (सीमा पर स्थित पर्वत)।

         भारत के पर्वतों का पुराणों में विस्तृत वर्णन है। इनमें महेन्द्र (पूर्वी घाट), मलय (पश्चिमी घाट का दक्षिणी भाग), सह्य (पश्चिमी घाट का उत्तरी भाग), रिक्ष (मध्य विंध्य), आदि प्रमुख है।

(ख) नदियां- वेदों में नदियों के विस्तृत वर्णन हैं। वेदों व उपनिषदों में अफगानिस्तान, पंजाब व गंगा-यमुना क्षेत्र की नदियों का वर्णन है। पुराणों के अनुसार मेरु (पामीर) के दिशाओं में नदियां प्रवाहित होती हैं। दक्षिण की ओर गंगा, पश्चिम की ओर चक्षु, पूर्व की और सीता व उत्तर की ओर भद्रसोन नदी बहती है। मार्कण्डेय पुराण में भारतीय नदियों का विस्तृत वर्णन है। गंगा की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन है। अन्य नदियों में यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, कृष्णा व ताम्रपर्णी का विशेष वर्णन है।

(ग) वनस्पति- मार्कण्डेय पुराण में विभिन्न प्रकार की वनस्पति का वर्णन मिलता है। तत्कालीन फसलों का भी वर्णन है। शिव पुराण में दुग्ध वृक्ष (रबर) का प्रसंग है।

(ii) मानव भूगोल विषयक ज्ञान-

          ऋग्वेद में पृथ्वी पर पांच प्रकार के लोगों के निवास का वर्णन है। इनमें असुर तथा दास भी सम्मिलित हैं। वाजसनेयि संहिता में चार वर्णों का उल्लेख है: ब्राह्मण्ड, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। रामायण में अनेक भारतीय आदिम जातियों के वर्णन है। इनमें राक्षस, वानर, निषाद, किन्नर, सावर, गन्धर्व, नाग, असुर, देव, आदि जातियां मुख्य हैं। विदेशी जातियों में शक एवं यवनों को गौर वर्ण की जातियां कहा गया है। राक्षसों का रंग काला व रूप भयानक बताया गया है।

         महाभारत में भी अनेक जातियां, उनके रूप-रंग, विवाह पारिवारिक सम्बन्धों आदि के वर्णन है। मनु के धर्म शास्त्र में आठ प्रकार के विवाह बताए गए हैं: ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गन्दर्व, पैशाच व राक्षस। इनमें से छः को सामाजिक समर्थन प्राप्त था। कौटिल्य ने भी विवाह पद्धति व स्त्री-पुनर्विवाह की चर्चा की है।

(iii) सांस्कृतिक भूगोल विषयक ज्ञान-

          प्राचीन समय से ही कृषि भारतीयों का मुख्य व्यवसाय रहा है। अथर्ववेद में वर्णन है कि कृषि में किन सावधानियों की आवश्यकता होती है। ऋग्वेद में खेत जोतने का आदेश दिया गया है। पातञ्जलि के महाभाष्य में फसलें बोने की विधियों, कृषि क्षेत्रों, बीजों व अनाज भण्डारण का वर्णन है। पाणिनि प्रातञ्जलि व मनु ने भूमि का वर्गीकरण भी किया है। बाढ़ से प्रभावित भूमि द्वारा अनुपयोगी भूमि ऊसर, पशुचारण के लिए प्रयुक्त भूमि गोचर व जोतने योग्य भूमि (शील्य) कही गई। पातञ्जलि ने फसलों के प्रादेशिक वितरण का भी वर्णन किया है। सिंचाई के साधनों पर भी प्रकाश डाला गया है। कुएं व तालाब सिंचाई के प्रमुख साधन थे।

           प्राचीन भारत में विभिन्न उद्योग धन्धे भी पर्याप्त विकसित अवस्था में थे। वर्तन, वस्त्र निर्माण, सिक्के, आभूषण आदि सम्बन्धी उद्योगों का वर्णन वेदों में है। भवन निर्माण, काष्ट शिल्प, मृतिका शिल्प, लौह शिल्प भी इस समय अपनी उन्नति की चरम सीमा पर थे। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप स्थापित जंगरहित लौह स्तम्भ, जो कि गुप्त काल में निर्मित बताया जाता है, भारतीय लौह-शिल्पियों की दक्षता का प्रमाण हैं।

         परिवहन मार्ग भी प्राचीन भारत में अच्छी अवस्था में थे। ब्रह्माण्ड पुराण में दस प्रका की सड़कों का वर्णन है: दिशा मार्ग, ग्राम मार्ग, सीमा मार्ग, राज, पथ, शाखा रथ्या, रथोपरथ्या, उपरथ्या, जंघापथ, गृहान्तपथ तथा धृति मार्ग।

          विदेशी व्यापार भी प्राचीन काल से भारतीय विशेषता है। विष्णु पुराण में कम्बोज के घोड़ों तथा मत्स्य पुराण में नेपाल के कम्बलों का उल्लेख है।

        अधिवास सम्बन्धी ज्ञान भी प्राचीन भारतीय साहित्य से प्राप्त होता है। मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई से प्राचीन भारतीय नगर नियोजन व भवन निर्माण कला का परिचय मिलता है। मानवीय बस्तियों का वर्गीकरण ‘मायामतम’ में किया गया है।

(iv) राजनीतिक व प्रादेशिक भूगोल विषयक ज्ञान-

           वैदिक साहित्य में भारतीय जनपद प्रदेशों के वर्णन हैं। इनमें काशी, कोशल, मगध, पांचाल, विदर्भ, सौराष्ट्र व आन्ध्र प्रमुख थे।

निष्कर्ष:          

         उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारतीय भौगोलिक ज्ञान उच्चकोटि का था परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि भौगोलिक विचारधाराओं के विकास के इतिहास में उसे स्थान नहीं दिया गया है।

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास


19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

           वर्तमान समय में भूगोल का जो वैज्ञानिक स्वरूप उभर कर सामने आया है, वह वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी की ही देन है। यह वह युग था, जिनमें हम्बोल्ट (Humboldt), रिटर (Ritter) व रेटजेल (Ratzel) जैसे महान भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक तथ्यों को भलीभांति संगठित करके प्रस्तुत किया था। उन्होंने भूगोल को परिभाषित किया व उसकी विषय वस्तु को निर्धारित किया। यद्यपि इसके युग से पूर्व के भूगोलवेत्ताओं के अध्ययन में वैज्ञानिक छाप थी, परन्तु उनमें वैज्ञानिकता कम व दार्शनिकता अधिक थी। इसी युग में वस्तुतः वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना हुई। इसका श्रेय जर्मनी के तीन महान भूगोलवेत्ताओं (हम्बोल्ट, रिटर व रेटजेल) को है। इनके द्वारा जो भी ग्रन्थ प्रकाशित किए गए, उनमें अन्वेषण की विधियों, अभिलेखों तथा वर्णनों की सूक्ष्मता देखने को मिलती है। बीसवीं सदी का भूगोल इसी सूक्ष्मता व शुद्धता के आधार पर विकसित हुआ।

         इस युग के भूगोलवेत्ताओं का भूगोल में योगदान संक्षेप में प्रस्तुत है:-

(1) हम्बोल्ट (Alexander Von Humboldt):-

         हम्बोल्ट बहुमुखी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक था। भूगोल में उसके योगदान का मूल्यांकन करना कोई हंसी-खेल नहीं। बनस्पति विज्ञान, भू-विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, शरीर क्रिया विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आदि क्षेत्रों में हम्बोल्ट का योगदान रहा है। बहुत से विज्ञान इस बात के लिए उसके ऋणी हैं कि उसने उनको नए तथ्य व नई सूझें प्रदान की थीं, परन्तु भूगोल का तो वह एक जन्मदाता था।

      हम्बोल्ट की सबसे प्रसिद्ध रचना कॉसमॉस (Cosmos) है। इसमें सम्पूर्ण विश्व का प्रादेशिक वर्णन विस्तार से किया गया है। इसमें पांच खण्ड हैं। यह ग्रन्थ लिखने में हम्बोल्ट को सत्रह वर्ष का समय लगा था। हम्बोल्ट का दूसरा प्रसिद्ध ग्रन्थ मध्य एशिया (Asia Centrale) है। यह जर्मन भाषा में 1843 में दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था।

    हम्बोल्ट ने प्रारम्भ से ही यात्राओं में रुचि प्रदर्शित की थी। उसने प्रथम यात्रा 1799 में प्रारम्भ की थी। वह जहाँ भी जाता था, कुछ यन्त्र प्रेक्षण के लिए अपने साथ-साथ रखता था।

       हम्बोल्ट ने भूगोल मे सात संकल्पनाओं का भी प्रतिपादन किया था। ये संकल्पनाएं थी-

(i) पृथ्वी तल का मानव निवास के रूप में अध्ययन,

(ii) भूगोल संसार में स्थानिक वितरणों का विज्ञान,

(iii) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है,

(iv) भूगोल सम्बन्धों का अध्ययन है,

(v) सांसारिक दृश्य घटनाओं का अध्ययन है,

(vi) प्रकृति की एकता का अध्ययन तथा

(vii) दृश्य घटनाओं की विषमांगता का अध्ययन

        हम्बोल्ट ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियाँ अपनाई जैसे- आनुभविक, तुलनात्मक, कार्टोग्राफिक, क्रमबद्ध, आदि।

(2) रिटर (Carl Ritter):-

         रिटर का जन्म 1779 में हुआ था। भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने वाले आधार स्तम्भों में रिटर भी एक था।

     रिटर का सर्वप्रमुख ग्रन्थ एर्डकुण्डे (Erdkunde) था। इसके अतिरिक्त ‘यूरोप का भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांख्यिकीय चित्रण’ भी रिटर का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। यह रिटर का प्रथम ग्रन्थ था।

       1828 में रिटर ने भौगोलिक ज्ञान के प्रचार व प्रसार के लिए एक भौगोलिक समिति की स्थापना की थी। वह जीवन पर्यन्त, 31 वर्ष तक इसका अध्यक्ष रहा था।

       रिटर की विचारधारा पर हम्बोल्ट का बहुत प्रभाव था, हम्बोल्ट से रिटर की मुलाकात 1827 में हुई। दोनों ने मिलकर भूगोल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया।

          रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का समर्थन करता था। वह पृथ्वी तल के वर्णन मात्र को भूगोल नहीं मानता था। उसका मत था कि इस अध्ययन में मानव की मुख्य भूमिका होनी चाहिए। रिटर प्रकृति की एकता में विश्वास करता था। प्रादेशीकरण की विचारधारा का रिटर ने समर्थन किया था।

          रिटर ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियां अपनाई। इनमें अधिकांश हम्बोल्ट की विधियों के समान थीं-आनुभविक, तुलनात्मक व मानचित्रण इसके अतिरिक्त रिटर ने विश्लेषणात्मक व संश्लेषणात्मक विधि भी अपनाई।

(3) रेटजेल (Friedrich Ratzel 1844-1904):-

     उन्नीसवीं सदी के अन्तिम समय में जर्मनी के भौगोलिक क्षेत्र में रेटजेल ने शासन किया। भूगोल में मानव के स्थान को स्थायी बनाने का कार्य रेटजेल ने किया, अतः उसे मानव भूगोल का जन्मदाता (Father of Human Geography) कहा जाता है।

     एन्थ्रोपोज्योग्राफी (Anthropogeographic) रेटजेल की सबसे महत्वपूर्ण रचना है। यह ग्रन्थ 1882 में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रन्थ से ही वस्तुतः मानव भूगोल का जन्म हुआ।

रेटजेल ने स्वयं यात्राएं करके आनुभविक विधि से भौगोलिक ज्ञान का एकत्रीकरण किया था। रेटजेल ने ही लिखा है:

“I travelled, I sketched, I described. Thus, I was led to the description of nature.”

       रेटजेल का दूसरा प्रमुख ग्रन्थ ‘राजनीतिक भूगोल’ (Politische geographie) था, यह दो खण्डों में क्रमशः 1897 व 1903 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त रेटजेल ने कई अन्य पुस्तकें लिखी। भौमिकी (Geology) मानव जातिशास्त्र (Ethnography), जीव विज्ञान (Biology), भौतिक भूगोल (Physical Geography), आदि पर अनेक लेख लिखे।

         रेटजेल ने मानव व वातावरण के सम्बन्धों का अध्ययन किया था तथा वातावरण निश्चयवाद (Environmental determinism) का प्रतिपादन किया था।

(4) फ्रोबेल (Frobel):-

         फ्रोबेल की विचारधारा हम्बोल्ट व रिटर की विचारधारा से मेल नहीं खाती थी। उसने रिटर की आलोचना की थी तथा उससे ‘तुलनात्मक’ (Comparative) शब्द का स्पष्टीकरण मांगा था, परन्तु रिटर उसे सन्तुष्ट न कर सका था। फ्रोबेल का मत था कि विभिन्न अवयवों की तुलना, जैसे एक पर्वत की दूसरे पर्वत से, एक नदी की दूसरी नदी से की जा सकती है, परन्तु किसी सम्पूर्ण प्रदेश की तुलना दूसरे सम्पूर्ण प्रदेश से करना उचित नहीं है। फ्रोबेल ने भूगोल को परिभाषित किया था :

          “Geography” he claimed, “was a natural science, concerned with the earth’s surface, studied in a systematic way, i. e. taking in form, relief, climate, vegetation, animal and man; attempting throughout to make clear the interrelation of the various factors.”

          इस प्रकार फ्रोबेल ने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को सीमित करके मात्र भौतिक भूगोल बताया।

(5) पेशेल (Oscar Peshcel):-

           पेशेल जर्मनी में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। वह भौगोलिक पत्र (Das Ausland) का सम्पादक भी था। इसमें विदेशी भूगोलवेत्ताओं के लेख प्रकाशित होते थे। पेशेल ने विभिन्न क्षेत्रों की तुलना की तथा तुलनात्मक भूगोल का विकास किया। पेशेल ने, जिसने भौतिक भूगोल का आधार तैयार किया था, भूगोल में मानव को अधिक महत्व नहीं दिया था।

(6) रिचथोफेन (Ferdinand von Richthofen) (1833-1905):-

         रिचथोफेन मूलतः भौमिकीविद (Geologist) था। वह बोन, बर्लिन व लीपजिंग विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक रहा था। बाद में इन्हीं विश्वविद्यालयों में भूगोल का प्रोफेसर रहा। ‘बर्लिन ज्योग्राफीकल सोसाइटी’ का कई वर्षों तक वह अध्यक्ष रहा था।

19वीं शताब्दी के दौरान भूगो

रिचथोफेन

          रिचथोफेन ने चीन में प्रेक्षण किए थे। चीन पर उसकी ग्रन्थमाला पांच खण्डो में प्रकाशित हुई थी। इसमें प्रथम खण्ड पर ही उसे ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी’ का पदक मिला था। उसने चीन की एक एटलस भी प्रकाशित की थी।

          रिचथोफेन की मुख्य देन भौतिक भूगोल के क्षेत्र (भू-आकृति विज्ञान) में है। उसने तुलनात्मक भूगोल की स्थापना की थी।

         भूगोल को रिचथोफेन ने क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Chorological Science) बताया था। इसमें पृथ्वी तल पर पाए जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन होता है।

        रिचथोफेन ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) और सामान्य भूगोल (General Geography) में अन्तर स्पष्ट किया था। उसने बताया था कि प्रादेशिक भूगोल में किसी तथ्य विशेष के पृथ्वी पर वितण का अध्ययन करते हैं।

14. कार्ल रिटर

14. कार्ल रिटर




कार्ल रिटर⇒

कार्ल रिटर

प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल के विकास में रिटर के योगदानों का मूल्यांकन कीजिए।

अथवा, “रिटर उन्नीसवीं शताब्दी का महत्वपूर्ण भूगोलवेत्ता था”। विवेचना कीजिये।

परिचय

      आनुभाविक अनुसंधान में विश्वास रखने वाले, उद्देश्यवादी और सशक्त प्रकृतिवादी रिटर ने भूगोल को अपने अथक प्रयास से एक नया स्वरूप प्रदान किया है, इसलिए इन्हें आधुनिक भूगोल के भवन का आधार कहा जाता है। कार्ल रिटर एवं अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट दोनों ही समकालीन, आधुनिक वैज्ञानिक भूगोल के संस्थापक एवं भूगोल के चिरसम्मत काल के पर्याय थे।

    कार्ल रिटर भौगोलिक प्रतिरूपों में ईश्वर की झलक देखता था जबकि हम्बोल्ट धर्मनिरपेक्ष एवं तत्कालीन जर्मन आदर्शवाद का पैरोकार था। 

जीवनी- जन्म- 1789 ई० में जर्मनी के क्लेडिलन बर्ग में एक साधारण  चिकित्सक परिवार में हुआ। 

शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा रूसो तथा पेस्टोलॉजी के सिद्धांतों पर आधारित स्नेप पेंथल नामक स्कूल में 1785 ई० से प्रारंभ हुई। इसके बाद, 

◆ 17 वर्ष की आयु में हाले विश्वविद्यालय में प्रवेश।

◆ 19 वर्ष की आयु में फ्रैंकफर्ट नगर में प्राइवेट शिक्षक।

◆ 1814 ई० में गोटेंजन विश्वविद्यालय में शोध कार्य किया।

◆ 1819 ई० में जिम्नेशियम ऑफ फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय में इतिहास भूगोल के प्रोफेसर बने।

◆ 1820-59 ई० तक बर्लिन विश्विद्यालय में प्राध्यापक।

नोट: 1807 में रिटर की मुलाकात हम्बोल्ट से हुई तथा इसके बाद दोनों ने मिलकर भूगोल का विकास किया।

मृत्यु- 1859 ई० को बर्लिन में

भूगोल रिटर का योगदान 

         रिटर के योगदान की चर्चा निम्न शीर्षकों के अंतर्गत की जा सकती है-

(1) भौगोलिक समिति के संस्थापक के रूप में:-

            भौगोलिक ज्ञान के प्रसार तथा भौगोलिक पत्रिका के प्रकाशन हेतु 1828 में ‘बर्लिन भौगोलिक संस्था’ (Berlin Geographical Society) की स्थापना की।

 

(2) एक भौगोलिक लेखक के रूप में:-

कार्ल रिटर

(3) भौगोलिक विधितंत्र के विश्लेषक के रूप में:-

(i) आनुभविक विधि (Emperical Method)

(ii) तुलनात्मक विधि (Comperative Method)

(iii) प्रादेशिक विधि (Regional Method)

(iv) विश्लेषण तथा संश्लेषण विधि (Analysis and Synthesis Method) 

(v) मानचित्र विधि (Cartographic Method)

(vi) निगमनात्मक विधि (Deductive Method)

          इसके अलावे विभिन्न दर्शनग्राही विधि, क्षेत्र वर्णनी विधि, परिस्थितिकी विधि को भूगोल में रिटर की देन है।

नोट: भौगोलिक अध्ययन विधि के क्षेत्र में रिटर ने फॉरस्टर को महान माना।

(4) प्रदेशों के पदानुक्रम को स्पष्ट करने में:-

          प्रदेशों के पदानुक्रम को स्पष्ट करना रिटर का भूगोल में एक प्रमुख योगदान है। इसने भू-आकृतियों का द्वि-स्तरीय वर्गीकरण प्रस्तुत किया है:-

कार्ल रिटर

नोट: महाद्वीप को रिटर ने जर्मन भाषा में ‘आर्डटिल’ (Erdteule) कहा है।

कार्ल रिटर

चित्र: रिटर के तृतीय कोटि प्रदेश का उच्चावच

(5) भौगोलिक संकल्पनाओं के क्षेत्र में:-

कार्ल रिटर

नोट: रिटर को ‘आर्म चेयर ज्योग्रफर’ कहा जाता है।           

(6) भौगोलिक विचारधाराओं के प्रतिपादक के रूप में:-

(A) भूगोल के क्षेत्र (The Field of Geography)- रिटर के अनुसार भूगोल में तीन चीजों का होना आवश्यक है-

कार्ल रिटर

(B) नियतिवाद (Determinism)- रिटर के अनुसार भौगोलिक विविधता के द्वारा ऐतिहासिक विविधता उत्पन्न   होती है। अत: मानव स्वतंत्र नहीं है बल्कि प्रकृति के नियत्रण में उसके अधीन है। 

कार्ल रिटर

(C) सम्पूर्णता की संकल्पना (Concept of Wholeness)- रिटर के अनुसार केवल प्राकृतिक तथा मानवीय पक्ष से भूगोल का निर्माण नहीं होता। अत: सम्पूर्णता के लिए विभिन्न शक्तियों का संयोजन आवश्यक है।

कार्ल रिटर

(D) मानव केन्द्रित भूगोल (Anthropocentric)- केवल पृथ्वी तल का अध्ययन ही भूगोल का उद्देश्य नहीं है बल्कि मानवीय क्रियाओं का वर्णन विशेष महत्व रखता है।

कार्ल रिटर

(E) क्षेत्रीय अध्ययन (Chorological Study)- रिटर के अनुसार, जिस तरह कालक्रम इतिहास का आधार होता है, उसी तरह कोई क्षेत्र भौगोलिक अध्ययन का आधार होता है।

(F) भूगोल आनुभाविक विज्ञान है- रिटर के अनुसार भूगोल एक आनुभाविक विज्ञान है जो प्रेक्षण, परिणाम और सूचना पर आधारित है। 

(G) प्रादेशिक अध्ययन- रिटर ने प्रादेशिक अध्ययन की व्याख्या के लिए ‘Landerkunde’ और ‘Augemeine Erdkunde’ नामक शब्द का प्रयोग किया।

धरातल विभाजन का आधार⇒ प्राकृतिक 

  • Landerkunde (प्राकृतिक प्रदेश)⇒ विशिष्ट अध्ययन से सम्बंधित
  • Augemeine Erdkunde (सामान्य भूगोल)⇒ प्राकृतिक +मानवीय

नोट: रिटर को प्रादेशिक भूगोल का जनक कहा जाता है।

कार्ल रिटर

(H) ईश्वरवादी विचारधारा (Teleological Approach)- रिटर का मानना था कि पृथ्वी की रचना ईश्वर ने उद्देश्यपूर्वक की है। इनके अनुसार पृथ्वी मानव की शिक्षण और पोषण भूमि है। 

(I) विविधता में एकता (Unity in Diversity)- प्रकृति में विविधता में एकता इनके प्रादेशिक भूगोल का मूल मंत्र था।

(J) मानचित्र विधि (Cartographic Process)- भौगोलिक वर्णन के लिए रिटर ने मानचित्र विधि को एक प्रमुख अस्त्र बनाया।

आलोचना

(i) रिट अपनी प्रादेशिक अध्ययन में तुलनात्मक विधि का व्यवहार करने में असफल रहे।

(ii) रिटर भूगोल का स्पष्ट तथा युक्तिपूर्ण ढाँचा गढ़ने में लगभग असफल रहे।

(iii) बाद के वर्षों में उन पर द्वैधता का पोषक होने का भी आरोप लगा। 

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद रिटर का योगदान भौगोलिक ज्ञान के प्रसारण में महत्वपूर्ण रहा है। अंततः हम कह सकते हैं कि कार्ल रिटर ही भूगोल में वस्तुत: द्वैतवाद का जनक था। उसी ने इस अवधारणा का सृजन किया कि पृथ्वी का अध्ययन मनुष्य के लिए किया जाता है। उसने यह भी कहा कि मनुष्य का अध्ययन पृथ्वी का अंग मानकर किया जाता है। इस तरह भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल दोनों की नींव पड़ी।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

           यदि उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में भूगोलवेत्ताओं ने अपने नवीन विज्ञान की अधिकांश संकल्पनाओं को विकसित किया तो उनके “विचारों, मांगों तथा इच्छाओं को तथ्यों में परिणत करने” का श्रेय बहुत कुछ अलेक्जेन्डर वॉन हम्बोल्ट तथा कार्ल रिटर को जाता है। रिटर का जन्म जर्मनी की हार्ल्स पहाड़ियों में स्थित क्वेडली बुर्ग गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा, पिता की मृत्यु व आर्थिक कठिनाई के कारण घर पर ही हुई थी। घरेलू अध्यापक गुटस मुथ्स थे। 1776 में इन्होंने हाल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया।

      1825 में फ्रिडरीश विश्वविद्यालय, बर्लिन में प्रोफेसर बने। 1828 में जब बर्लिन में भूगोल परिषद की स्थापना हुई तो वे इसके प्रथम अध्यक्ष बने और जीवन पर्यन्त इसके अध्यक्ष रहे।

रिटर की रचनायें (Works of Ritter):-

      रिटर ने भूगोल के प्रचार-प्रसार के लिये अनेक ग्रन्थ लिखे, मानचित्र बनाये व शोध पत्र प्रकाशित किये। 1804 में रिटर का प्रथम ग्रन्थ- Europe: A Geographical, Historical and Statistical Painting प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का दूसरा खण्ड 1806 में प्रकाशित हुआ। 1817 में रिटर की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना अर्डकुण्डे (Erdkunde) का प्रथम खण्ड (अफ्रीका महाद्वीप) प्रकाशित हुआ। 1818 में अर्डकुण्डे का दूसरा खण्ड (एशिया महाद्वीप) प्रकाशित हुआ। इस प्रकार 1859 तक अर्डकुण्डे के 19 खण्डों का प्रकाशन हुआ। अन्तिम खण्ड रिटर की मृत्यु के मात्र दो दिन पूर्व प्रकाशित हुआ था। रिटर ने यूरोप की मानचित्रावली भी 1806 में प्रकाशित की थी। इसमें छः मानचित्र थे।

रिटर का विधि-तंत्र (Methodology of Ritter):-

      रिटर की अध्ययन प्रणाली भी हम्बोल्ट की अध्ययन प्रणाली के समान ही थी। उसने अपने अध्ययन के लिये निम्नलिखित विधियाँ अपनायीं-

(i) आनुभविक विधि (Empirical Method):-

      रिटर आनुभविक विधि द्वारा क्षेत्र सर्वेक्षण (Field Survey) करने में विश्वास करता था। उसका मत था कि सावधानीपूर्वक शुद्ध प्रेक्षण करना व सत्य का पता लगाना अध्ययन का उद्देश्य होना चाहिये। रिटर भूगोल को आनुभविक विज्ञान (Empirical Science) मानता था।

(ii) विश्लेषण एवं संश्लेषण विधि (Analysis and Synthesis Method):-

      भौगोलिक तथ्यों को प्रेक्षणों (Observations) द्वारा एकत्र करना व उनका संश्लेषण एवं विश्लेषण करना तथा अन्त में सामान्यीकरण करना-रिटर की इस पद्धति ने भूगोल को वैज्ञानिकता प्रदान की।

(iii) तुलनात्मक विधि (Comparative Method):-

      रिटर ने विभिन्न तथ्यों में कार्य कारण सम्बन्ध (Causal relationship) व अन्तर समझाने के लिये तुलनात्मक विधि अपनाई।

(iv) मानचित्र विधि (Cartographic Method):

       मानचित्रण को रिटर ने भूगोल का अभिन्न अंग माना था। उसने स्वयं अपने ग्रन्थों आदि में मानचित्रों का उपयोग किया। यूरोप के मानचित्रों की एक मानचित्रावली प्रकाशित की।

रिटर की विचारधारा (Ritter’s Ideology)-

     रिटर व हम्बोल्ट समकालीन विद्वान थे। आयु में हम्बोल्ट रिटर से 10 वर्ष बड़ा था। रिटर पर हम्बोल्ट का काफी प्रभाव पड़ा था। रिटर ने स्वयं भी इस तथ्य को स्वीकार किया था। परन्तु फिर भी इन दोनों महान विद्वानों की विचारधाराओं में पर्याप्त अंतर था। रिटर की विचारधारा के मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:-

(i) रिटर के विभिन्न ग्रन्थों व लेखों को पढ़ने पर ज्ञात होता है कि रिटर की विचारधारा विकासशील थी।

(ii) रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का पोषक था। उसने मानव व वातावरण के सम्बन्धों के अध्ययन को भूगोल का अभिन्न अंग बताया था तथा स्वयं ने इन सम्बन्धों का अध्ययन करके वातावरण को अधिक शक्तिशाली बताया था।

(iii) रिटर ने होम्मेयर व गट्टेरेर की शुद्ध भूगोल (Reine/Pure Geography) की विचारधारा की न केवल आलोचना की, वरन् उसे अवैज्ञानिक बताते हुए अस्वीकार भी कर दिया था। उसके अनुसार- “Pure Geography is nothing more than a general description of terrain.”

(iv) रिटर ने प्रादेशिक अध्ययन पद्धति को अपनाया था तथा प्रादेशिक व्यक्तित्व में सम्पूर्ण की कल्पना की थी। रिटर का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ अर्डकुण्डे (Erdkunde) इसी विचारधारा पर आधारित था। उसने अर्डकुण्डे के प्रथम खण्ड में ही अफ्रीका महाद्वीप को विभिन्न प्रदेशों में बांट कर प्रत्येक का सम्पूर्ण वर्णन किया है।

(v) रिटर की विचारधारा ईश्वरवादी (Teleological) विचारधारा थी । उसका मत था कि ईश्वर ने पृथ्वी पर प्रत्येक वस्तु किसी न किसी उद्देश्य से बनाई है।

(vi) रिटर के अनुसार उसका उद्देश्य- ‘समस्त थल’ (Whole Land) का सजीव चित्रण प्रस्तुत करना है, जिसमें उसके प्राकृतिक और कृषि के (Cultivated) उत्पादनों को, उसके प्राकृतिक और मानवीय लक्षणों (Features) को तथा इन सबको एक सम्बद्धपूर्ण (Coherent whole) के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाना है कि मानव और प्रकृति (Nature) के विषय में सबसे अधिक महत्वपूर्ण अनुमान स्वयं प्रत्यक्ष हो जायें, विशेषकर जब उनकी साथ-साथ तुलना की जाय।

(vii) रिटर के अनुसार भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी तल का वर्णन करना मात्र नहीं वरन् उसकी घटनाओं का सकारण (Causal) वर्णन करना है।

10. आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद / Behavioral Revolution

10. आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद




आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद

          द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अन्तरविषयक अध्ययन का दौर प्रारंभ हुआ। अन्तरविषयक अध्ययन के परिणाम स्वरूप भूगोल में कई क्रांतियों का आगमन हुआ जिनमें मात्रात्मक क्रांति और आचारपरक या व्यावहारात्मक क्रांति प्रमुख था। आचारपरक क्रांति का अभ्युदय मात्रात्मक क्रांति के विरोध में हुआ क्योंकि मात्रात्मक क्रांति ने मानव को पूर्णतः मशीनीकृत बना दिया था। मात्रात्मक क्रांति ने मानवीय चेतना, बौद्धिकता, व्यवहार, सौंदर्य, श्रृंगार रस इत्यादि को कोई महत्व नहीं दिया था।

     अर्थात मात्रात्मक क्रांति ने भूगोल को एक निर्जीव विषय बना दिया था। इस तरह भूगोल में मनोविज्ञान तथ्यों का अध्ययन प्रारंभ किया गया ताकि भूगोल को मानवीय चेतनाओं से मुक्त विषय बनाया जाय।

       भूगोल में मनोविज्ञान के तथ्यों का अध्ययन भौगोलिक संदर्भ में करना ही आचारपरक क्रांति कहलाती है। इस क्रांति का स्रोत विषय मनोविज्ञान और लक्ष्य क्षेत्र मानव भूगोल था। अमेरिकी भूगोलवेता ओलसन ने कहा है कि “आचारपरक क्रांति मानव भूगोल या सामाजिक भूगोल की पूँजी है।” व्यवहारात्मक क्रांति प्रारंभ करने का श्रेय अमेरिका के गेस्टोल्ट समप्रदाय को जाता है। लेकिन भूगोल में आचारपरक क्रांति को मान्यता दिलाने का कार्य डब्लू. किर्क महोदय ने किया।

       आचारपरक क्रांति में इस तथ्य का अध्ययन किया जाता है कि मानव के व्यवहार पर पर्यावरण का प्रभाव और पर्यावरण पर मानव का प्रभाव कैसे पड़ता है? आचारपरक भूगोलवेताओं का कहना है कि वास्तविक पर्यावरण और आचारपरक पर्यावरण दोनों अलग-अलग चीजें हैं। जैसे वास्तविक पर्यावरण का अध्ययन प्रत्यक्ष साधनों के द्वारा किया जाता है। जबकि आचारपरक पर्यावरण का अध्ययन अप्रत्यक्ष साधरों के द्वारा किया जा सकता है।

     वास्तविक पर्यावरण के अन्तर्गत जैविक घटक, अजैविक घटक और उन दोनों के बीच चलने वाला ऊर्जा का प्रवाह का अध्ययन करते हैं जबकि आचारपरक क्रांति में एक व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करते हैं। आचारपरक क्रांति एक ऐसी क्रांति है जो मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के गर्भ से उत्पन्न हुआ है। भूगोल में आचारपरक क्रांति के विकास के चरण को चार भागों में बाँटते है:-

(1) प्रथम चरण (1955-60) ⇒ प्रथम चरण में डब्लू. किर्क, जे.के. राइट,  गिलबर्ट व्हाइट और हैगर स्टैंड का मुख्य योगदान है। हैगर स्टैंड ने अपने नव उत्पाद सिद्धांत के माध्यम से कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसमें यह बताया कि कृषि के स्थानीयकरण पर मानव व्यवहार का प्रभाव पड़ता है। फेटर और हॉटली महोदय ने अमेरिका के म्यामी बिच पर साफ्टी (आईसक्रीम ) उद्योग विकसित होने के पीछे मानव के व्यवहार को ही उत्तरदायी माना है।

(2) दूसरा चरण (1960-65) ⇒ दूसरा चरण में किट्स, वोल्पर्ट, डेविडहफ और लोवेंथल जैसे भूगोलवेताओं का योगदान है। इस चरण में प्रथम चरण की तुलना में और अधिक मनोविज्ञान के तथ्यों का प्रयोग भूगोल में किया गया है। ओल्पर्ट महोदय ने बताया कि मानवीय जनसंख्या के स्थानान्तरण पर आचारपरक क्रांति का प्रभाव पड़‌ता है। जैसे उन्होंने कहा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूरों का प्लायन पंजाब की ओर होना व्यावहारात्मक क्रान्ति का परिणाम है।

(3) तीसरा चरण (1965-71)⇒ तीसरा चरण में एलेन व्रेड, मरफी और पीटर गोल्ट, बोल्डिंग जैसे भूगोलवेताओं का योगदान प्रमुख है।

         बोल्डिंग महोदय ने आचारपरक क्रांति को एक मॉडल से समझाने का प्रयास किया है। 

आचारपरक क्रांति

   एलेन प्रेड महोदय ने व्यावहारात्मक क्रांति समझाने के लिए निम्नलिखित मैट्रिक्स चर का विकास किया।

आचारपरक क्रांति

(4) चौथा चरण (1971ई० के बाद से)⇒ चौथा चरण में डाउन्स और सोनेन फील्ड जैसे भूगोलवेताओं का विशेष योगदान है। सोनेन फील्ड ने व्यावहारात्मक क्रान्ति को समझाने के लिए एक संकेन्द्रीय मॉडल का प्रयोग किया है।

आचारपरक क्रांति

              पर्यावरण और व्यावहार को समझने के लिए डाउन्स महोदय ने भी एक मॉडल का प्रयोग किया है।

आचारपरक क्रांति

          उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूगोल में व्यवहारात्मक क्रांति का विकास कई चरणों में हुआ है और मनोविज्ञान के तथ्यों के आधार पर उद्योगों के स्थानीयकरण, कृषि स्थानीकरण, जनसँख्या स्थानान्तरण के संबंध में कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए है। 

आचारपरक क्रान्ति का भूगोल पर प्रभाव

           भूगोल में आचारपरक क्रांति के आगमन ने भूगोल को कई तरह से प्रभावित किया है।

(i) इस क्रांति से मानव पर्यावरण और भौतिक पर्यावरण को समझने में मदद मिलती हैं।

(ii) प्रादेशिक प्रारूप और मानवीय गतिशीलता को समझने में मदद करती है। जैसे 1980 ई0 तक बिहार के अधिकांश लोग कलकत्ता की ओर स्थानान्तरण करते थे। लेकिन ज्यों ही यहाँ के लोगों को पंजाब और सूरत के संबंध में अधिक सूचनाएँ प्राप्त हुई त्यों ही स्थानान्तरण इन क्षेत्रों की ओर होने लगा।

(iii) स्थानीयकाण से संबंधित मानवीय निर्णय को भी आचारपरक क्रांति प्रभावित करता है। जैसे- फेटर और स्मिथ महोदय ने बताया है कि अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में स्थित नियामी बिच पर आइसक्रीम उद्योग का विकास मानव के व्यवहार के कारण हुआ है न कि भौतिक पर्यावरण के करण।

(iv) हैगरस्टैंड ने नवोत्पाद विसरण का सिद्धांत आचारपरक सिद्धांत से ही समझाते का प्रयास किया है।

आलोचना

(i) डेविड हार्वे महोदय ने अपनी पुस्तक “Explanation in Geography” में इसका आलोचना करते हुए कहा कि मानव का व्यवहार एक जटिल तंत्र है। इसे इतनी सफलता पूर्वक समझा नहीं जा सकता।

(ii) मानव का आचरण यदि सूचनाओं से नियंत्रित होता है तो यह संभव है कि गलत सूचना देकर मानव के व्यवहार को प्रभावित किया जाय इसके चलते गुलत परिणाम भी आ सकते हैं।

(iii) इसी संदर्भ में स्किनर महोदय ने कहा कि व्यवहारात्मक क्रांति के अध्ययन से प्रदूषित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिन्तन विकसित हो सकता है।

निष्कर्ष

      उपरोक्त सीमाओं के बावजूद व्यावहारात्मक क्रान्ति की शुरुआत भूगोल में एक नयी पहल थी जिसके चलते भूगोल के विषयस्तु और विधितंत्र में स्पष्ट परिवर्तन हुए।



व्यवहारात्मक क्रांति याआचारपरक क्रांति उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



व्यवहारात्मक क्रांति याआचारपरक क्रांति (Behavioral Revolution)

            द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भूगोल के विधितंत्र में कई क्रांतियों का आगमन हुआ। उनमें से एक व्यवहारात्मक क्रांति था। इस क्रांति का आगमन मात्रात्मक क्रांति के विरुद्ध माना जाता है क्योंकि मात्रात्मक क्रांति के अन्तर्गत मानवीय मूल्यों का अध्ययन संभव नहीं था।

           प्रिस्टन विश्वविद्यालय (USA) में मानविकी विषयों के विद्वानों के सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया था कि अन्तरविषाक अध्ययन पर विशेष जोर दिया जाय। इसी चिन्तन का परिणाम था कि कई भूगोलवेताओं ने दूसरे विषय के तथ्यों को भूगोल में आयात किया। मानव भूगोल में मनोविज्ञान के जो तथ्य आयात किये गये उससे मानवीय भूगोल के चिन्तन में त्वरित परिवर्तन हुआ। उसी त्वरित परिवर्तन को आचारपरक क्रांति / व्यवहारात्मक क्रांति से संबोधित किया गया।

           भूगोल में आचारपरक क्रांति का शुरुआत करने का श्रेय डब्लू. किर्क महोदय को जाता है। इनके कार्यों के बाद USA के गेस्टॉल्ड सम्प्रदाय ने भूगोल में आचारपरक क्रांति को विकास करने में विशेष भूमिका निभायी।

          आचारपरक क्रांति इस तथ्य का अध्ययन करता है कि मानव के द्वारा विकसित सामाजिक आर्थिक भूदृश्य पर मानव के आचारपरक वातावरण का प्रभाव पड़ता है। ओल्सन महोदय ने कहा है कि आचारपरक क्रांति सामाजिक आर्थिक भूगोल की कूंजी है।

आचारपरक क्रांति का विश्लेषण

       आचारपक क्रांति के समर्थक भूगोलवेताओं ने कहा है कि पर्यावरण को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(1) वास्तविक पर्यावरण – प्रत्यक्ष साधन

(2) आचारपरक पर्यावरण – अप्रत्यक्ष साधन

             वास्तविक पर्यावरण का अध्ययन प्रत्यक्ष साधनों या तकनीक के द्वारा किया जा सकता है। जबकि आचारपरक पर्यावरण का अध्ययन अप्रत्यक्ष साधनों के द्वारा किया का जा सकता है। आचारपरक क्रांति वास्तविक पर्यावरण की तुलना में एक व्यक्ति के आचारपरक पर्यावरण के अध्ययन पर विशेष जोर देता है। भूगोल में आचारपरक क्रांति का विकास निम्नलिखित चार चरणों में हुआ है।

चरण  काल (ई० में) प्रमुख भूगोलवेता
प्रथम चरण 1955-60 जे.के.राइट, डब्लू. किर्क, हैगरस्टैंड, गिल्वर्ट व्हाइट
दूसरा चरण  1960-65 वालपर्ट, कीट्स,डेविड हफ
तीसरा चरण 1965-71 एलेन प्रेड, मर्फी, पीटर गॉल्ड, बोल्डिंग,
चौथा चरण 1971 से आगे डाउन्स, सोनेनफील्ड

आचारपरक भूगोल के मॉडल

                आचारपरक भूगोलवेताओं में अलग-अलग मॉडल से समझने का प्रयास किया है। जैसे-

(1) बोल्डिंग महोदय ने मानव और पर्यावरण के बीच मिलने वाला संबंध को निम्नलिखित मॉडल से प्रस्तुत किया है। जैसे- 

चित्र: बोल्डिंग के अनुसार मानव-वातावरण संबंध का एक पम्परागत मॉडल (1956)

(2) एलेनप्रेड ने व्यवहारात्मक क्रांति को समझाने के लिए मैट्रिक्स मॉडल का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि मानव के व्यवहार पर सूचनाओं का प्रभाव पड़ता है। जैसे- इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है।

चित्र : एलेन प्रेड  का आचारपरक मैट्रिक्स (1969)

(3) डाउन्स महोदय ने पर्यावरण बोध और मानव के व्यवहार को निम्नलिखित मॉडल से समझाने का प्रयत्न किया है।

चित्र: पर्यावरण बोध तथा व्यवहार (1970)     

(4) सोनेनफील्ड ने आचारपरक क्रांति को समझने के लिए निम्नलिखित मॉडल को प्रस्तुत किया है-

चित्र: सोनेनफील्ड का सकेंद्रीय मॉडल (1972)

आचारपरक क्रान्ति का भूगोल पर प्रभाव

          भूगोल में आचारपरक क्रांति के आगमन ने भूगोल को कई तरह से प्रभावित किया है।

(i) इस क्रांति से मानव पर्यावरण और भौतिक पर्यावरण को समझने में मदद मिलती हैं।

(ii) प्रादेशिक प्रारूप और मानवीय गतिशीलता को समझने में मदद करती है। जैसे 1980 ई0 तक बिहार के अधिकांश लोग कलकत्ता की ओर स्थानान्तरण करते थे। लेकिन ज्यों ही यहाँ के लोगों को पंजाब और सूरत के संबंध में अधिक सूचनाएँ प्राप्त हुई त्यों ही स्थानान्तरण इन क्षेत्रों की ओर होने लगा।

(iii) स्थानीयकाण से संबंधित मानवीय निर्णय को भी आचारपरक क्रांति प्रभावित करता है। जैसे- फेटर और स्मिथ महोदय ने बताया है कि अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में स्थित नियामी बिच पर आइसक्रीम उद्योग का विकास मानव के व्यवहार के कारण हुआ है न कि भौतिक पर्यावरण के करण।

(iv) हैगरस्टैंड ने नवोत्पाद विसरण का सिद्धांत आचारपरक सिद्धांत से ही समझाते का प्रयास किया है।

आलोचना

(i) डेविड हार्वे महोदय के इसका आलोचना करते हुए कहा है कि मानव का व्यवहार एक जटिलतंत्र है। इसे सफलता पूर्वक नहीं समझा जा सकता है।

(ii) मानव का आचारण प्राप्त सूचनाओं से नियंत्रित होता है। अगर ऐसा मान लिया जाय तो किसी को गलत सूचना देकर उससे गलत कार्य भी करवाया जा सकता है।

(iii) स्किनर महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा कि व्यवहारात्मक क्रांति के अध्ययन से सामाजिक आर्थिक चिन्तन प्रदूषित हो सकता है। ऐसे आचारपरक क्रांति का अध्ययन सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

        उपरोक तथ्यों से स्पष्ट है कि आचारपरक क्रांति की कई सीमाएँ हैं। इन सीमाओं के बावजूद आचारपरक क्रांति ने भूगोलवेताओं को सोचने/चिन्तन के लिए एक नवीन विचा प्रस्तुत किया है।

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल (World: Cultural Region/Realm)

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

(World: Cultural Region/Realm)



विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल⇒

प्रश्न प्रारूप 

Q.1. विश्व के वृहत सांस्कृतिक परिमंडल

Q.2. संसार के सांस्कृतिक प्रदेश

Q.3. सांस्कृतिक प्रदेश से आप क्या समझतें है? विश्व को सांस्कृतिक प्रदेशों में वर्गीकृत करने वाले आधार को स्पष्ट करें तथा सर्वमान्य वर्गीकरण की योजना प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक के विशेषता लिखें।

(नोट : संस्कृति– रीति-रीवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, रहन-सहन, संगीत कला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, रंगमंच के समुच्च को संस्कृति कहते हैं।)

विश्व के सांस्कृतिक प्रद

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

            मानव भूगोल में संस्कृति का अध्ययन एक अनिवार्य घटक है क्योंकि संस्कृति की उत्पत्ति, विकास और निर्धारण में पर्यावरण की भूमिका महत्वपूर्ण है। अलग-2 पर्यावरण में अलग-2 संस्कृतियों का विकास हुआ है। संस्कृति के आधार पर भौगोलिक प्रदेशों का निर्धारण करना सांस्कृतिक प्रदेश कहलाता है। ब्लाश महोदय ने कहा कि “सांस्कृतिक प्रदेश वह भौगोलिक क्षेत्र है जिसकी सांस्कृतिक दृश्यावली आस-पास के क्षेत्रों से भिन्न होती है।

           संस्कृति मानव की जीवनशैली को कहते हैं। मानव के जीवनशैली में रीति-रिवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, संगीतकला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, नृत्यकला, इत्यादि को शामिल करते हैं। मानव के जीवन शैली में शामिल उपरोक्त तत्वों के समुच्च को संस्कृति कहते हैं। अलग-2 भौतिक पर्यावरण में अलग-2 प्रकार के सांस्कृतिक प्रदेश का विकास हुआ है। इन्हीं विविधताओं को ध्यान में रखकर कई इतिहासकार, मानवशास्त्री एवं भूगोलवेता विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है।

        भूगोल में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक प्रदेश का वर्गीकरण ब्रोक एवं बेल महोदय के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इन दोनों की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम “A Geography of Mankind” है। इस पुस्तक में ब्रोक ने 8 संस्कृति के तत्वों को आधार मानकर सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है। जैसे- (1) धर्म (2) भाषा (3) लोककार्य (4) प्रजातीय संरचना (5) आर्थिक क्रिया (6) खान-पान (7) लोक संगीत और (8) सामाजिक विश्वास एवं मान्यताएँ।

          ब्रोक के अनुसार सभी चरों/घटकों के आधार पर स्वतंत्र रूप से अनेक सांस्कृतिक प्रदेश विकसित किये जा सकते हैं। लेकिन, सभी को मिलाकर के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण किया जा सकता है। ब्रोक महोदय ने संश्लिष्ट विधि (सभी को मिलाकर) का प्रयोग करते हुए विश्व को चार प्रमुख और दो लघु सांस्कृतिक प्रदेश में वर्गीकृत किया है:-

विश्व के वृहत / प्रमुख सांस्कृतिक प्रदेश

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

(3) इंडिक सांस्कृतिक प्रदेश

(4) पूर्वी एशियाई या बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश

विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश

(i) मिजो अफ्रिकन एवं जनजातीय सांस्कृतिक पदेश

(ii) दक्षिण-पूर्वी एशियाई संक्रमण सांस्कृतिक प्रदेश

             इन सांस्कृतिक प्रदेश के नामाकरण से स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक प्रदेश के निर्धारण में धर्म की भूमिका सर्वाधिक है। धर्म के आधार पर ही ईसाई प्रधान और इस्लामिक प्रधान संस्कृति का नामाकरण किया गया है। जबकि अन्य सांस्कृतिक प्रदेश का नामकरण स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया है।

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेशों की विशेषता

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

             ईसाई प्रधान संस्कृति का विकास विश्व के वृहत भौगोलिक क्षेत्रों में हुआ है। ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का विकास उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और साइबेरियाई क्षेत्रों में हुआ है। इन सभी क्षेत्रों में ईसाई धर्म का बोलवाला है। लेकिन इनमें भी कई आन्तरिक विविधताएँ पायी जाती हैं। इन विविधताओं को आधार मानते हुए पुन: इसे 7 उप सांस्कृतिक प्रदेश में बाँटते हैं।

जैसे:-

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश 

(iii) दक्षिणी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

(vi) अस्ट्रेलिया-न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश 

(vii) अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

         पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग निवास करते हैं जो प्रत्येक धार्मिक मान्यता को वैज्ञानिक तर्क और महत्त्व के दृष्टिकोण से देखते हैं। ये लोग अंधविश्वासी नहीं होते हैं। यूरोप में पुनर्जागरण का श्रेय इन्हीं को जाता है। विश्व में पहली बार औद्योगिक क्रांति का जन्म इसी प्रदेश में हुआ। जीवन शैली पर नगरीकरण एवं वाणिज्यिककरण का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। इनके प्रभाव के कारण ही सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों क पतन हुआ है। परिवार एवं विवाह जैसी संस्थाएँ कमजोड़ हुई है। व्यक्तिवाद का विकास अधिक हुआ है। मानव के जीवन पर धर्म का प्रभाव कम और आर्थिक कार्यों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। अपने साहस एवं तर्क के आधार पर विश्व के कई क्षेत्रों में स्थानान्तरित होकर बड़े-2 उपनिवेशों की स्थापना किया है। 

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

          पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में वर्तमान CIS (Common-wealth of Indipendent state) में शामिल प्रदेशों को रखा जाता है। इस सांस्कृतिक प्रदेश को समय के आधार पर तीन भागों में बाँटते हैं-

(a) अक्टूबर क्रांति के पूर्व का सांस्कृतिक भूदृश्य- उस वक्त यहाँ कैथोलिक धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव था। अधिकतर बस्तियाँ चर्च के इर्द-गिर्द बसी थी। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था था। भूमिपतियों के द्वारा कृषकों का शोषण किया जाता था।

(b) अक्टूबर क्रांति के बाद पूर्वी यूरोप की सांस्कृतिक भूदृश्य- अक्टूबर क्रांति के बाद इस क्षेत्र में गत्यात्मक परिवर्तन देखा गया। अक्टूबर क्रांति के पूर्व सोवियत संघ का उदय हुआ जिसके कारण इन क्षेत्र में साम्यवादी दर्शन का विकास हुआ जिसमें धर्म को ‘विष’ से तुलना किया गया। आर्थिक एकीकरण को बढ़ाना दिया गया। 65 वर्षों तक साम्यवाद का दर्शन यहाँ कायम रहा।

(c) ग्लास्नोस्ट पेरिस्तोत्रिक के बाद का पूर्वी यूरोप- इन दोनों संकल्पना के जन्मदाता गोर्बाचेव है जिसका तात्पर्य खुलापन एवं उदारीकरण है। इसके कारण वहाँ से साम्यवादी दर्शन का प्रभाव समाप्त हो गया। चुले एवं उदार अर्थव्यवस्था के आगमन से नवीन सांस्कृतिक भूदृश्य का विकास हो रहा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में यह सांस्कृतिक प्रदेश पश्चमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश का हिस्सा बन जायेगा ।

(iii) दक्षिण यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

        यहाँ के जीवन शैली पर कैथोलिक धर्म और बेटिकन सिटी का प्रभाव अधिक रहा है। इटली, स्पेन, पुर्तगाल, यूनान इसके प्रतिनिधि राष्ट्र है। यहाँ लैटिन भाषा बोली जाती है। अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का योगदान अधिक है। यहाँ कभी अंधविश्वास का इतना अधिक बोलवाला था कि चर्चों से स्वर्ग के टिकट दिये जाते थे। इस प्रदेश के लोगों ने दक्षिण अमेरिका में जाकर अपने उपनिवेश का स्थापना किया। 

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

       आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश की तुलना पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से की जा सकती है, क्योंकि यहाँ के लोग भी प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग है। यहाँ काकेसाइड प्रजाति के लोग बसे हैं। भाषा एवं संस्कृति के अन्य घटक पश्चिम यूरोप से आंग्ल अमेरिका में आयात किये गये हैं। लेकिन आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से इस माइने में भिन्न है कि पश्चिम यूरोप में उद्योग एवं खनन जैसे आर्थिक गतिविधियों का वर्चस्व है जबकि आंग्ल अमेरिका में उद्योग, खनन एवं कृषि कार्यों का महत्त्व अधिक है।

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

            ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश में यह विकासशील सांस्कृतिक प्रदेश का उदाहरण है। यहाँ नीग्रोइड प्रजाति के लोग निवास करते हैं। गरीबी एवं पिछड़ेपन की समस्या अधिक है। यहाँ कैथोलिक धर्म और लैटिन का आयात दक्षिण यूरोप से किया गया है। पुर्तगाल, स्पेन के लोग सोना ही खोज में अपने क्रोस (#) लेकर पहुँच गये। समाज में आज भी जनाजातिय संस्कृति का बोलबाला है।

(vi) आस्ट्रेलियाई – न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश

         इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास अब यूरोपीय लोगों के द्वारा किया गया है जो औपनिवेशिक देशों के आजाद होने के बाद बेघर हो गये थे। यहाँ प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग रहते हैं। यहाँ की भाषा अंग्रेजी और प्रजाति काकेसाइड है। आर्थिक दृष्टिकोण से पश्चिम यूरोप और आंग्ल अमेरिका के सदृश्य है। ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि एवं उद्योग पर आधारित है। जबकि न्यूजीलैण्ड की अर्थव्यवस्था वाणिज्यिक पशुपालन पर आधारित है। 

(vii) अफ्रीकी सांस्कृतिक प्रदेश

           अफ्रीका महाद्वीप में ईसाई संस्कृति यो क्षेत्रों में देखी जाती है- (a) दक्षिण अफ्रीका के केप प्रान्त और (b) पूर्वी अफ्रीका के उच्च भूमि पर। इन दोनों क्षेत्रों में पश्चिमी यूरोप के काकेसाइड प्रजाति के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग आकर बसे हैं। केपप्रान्त के लोगों ने कृषि उद्योग और व्यापार का विकास किया है जबकि पूर्वी अफ्रीका में बगानी कृषि एवं खनन कार्यों के आधार पर निर्माण किया है सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण किया है।

        अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ईसाई संस्कृति का व्यापक क्षेत्र में विकास हुआ है। कई लघु सांस्कृतिक प्रदेश मिलकर एक एकीकृत ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का निर्माण करते हैं।

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

         इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का विकास मरुस्थलीय एवं अर्द्ध मरुस्थलीय क्षेत्रों में हुआ है। इसका विस्तार दक्षिण में सहारा मरुस्थल, उत्तर में मध्य एशिया, पूर्व में ब्लूचिस्तान से लेकर पश्चिम में तुर्की तक हुआ है। इसी प्रदेश में मक्का एवं मदीना अवस्थित है जहाँ इस्लाम धर्म का उदय हुआ। इस संस्कृति पर पर्यावरण का प्रभाव अध्याधिक पड़ा है। पर्यावरण के ही कारण यहाँ भूगोल, गणित, खगोल विज्ञान, मानचित्रकला इत्यादि का विकास हुआ है। जल की कमी के कारण जल का मितव्ययी उपयोग, खाद्य पदार्थो की कमी के कारण खान-पान में माँस का प्रयोग एवं लम्बे समय तक उपवास रखने की परंपरा प्रारंभ हुई है। मक्का की ओर मुँह करके नवाज पढ़ते हैं। धूल से बचने हेतु बुर्का और साफा का प्रयोग करते हैं। परम्परागत रूप से यह घुमक्कड़ जनजातियों का क्षेत्र है। वनस्पति का अभाव होता है। बाहर का जीवन अल्याधिक कठोर एवं प्रतिस्पर्द्धा से युक्त होते है। इसलिए महिलाओं को चार दीवारी में रखा जाता है। यह सांस्कृतिक प्रदेश के धर्म शिया और सुन्नी में विभक्त हैं। सुन्नी परम्परावादी होते हैं जबकि शिया आधुनिक एवं तर्क में विश्वास करते हैं। इनके जीवन शैली पर कुरान का प्रभाव अधिक देखा जाता है। हाल के वर्षो में इन क्षेत्रों में पेट्रोलियम खनिज मिलने के कारण श्रमिक, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। पेट्रो-डॉलर जैजी संकल्पना का विकास हुआ है। OPEC जैसे संगठन तेल के मूल्यों पर नियंत्रण स्थापित कर विश्व के सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

(3) इण्डिक सांस्कृतिक प्रदेश

        इण्डिक सांस्कृतिक प्रदे का विकास मुख्यत दक्षिण एशिया में हुआ है। यहाँ हिन्दू धर्मावलम्बी है के अलावे अनेक धर्म के लोग निवास करते हैं। विश्व में सर्वाधिकक हिन्दू, मुसलमान, सिख और जैन समुदाय के लोग यहाँ रहते हैं। यह अभूतपूर्व सहिष्णुता का प्रदेश है। यहाँ धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, इसलिए इस प्रदेश को धान प्रधान संस्कृति (Paddy Cultures) कहते हैं। यहाँ की सम्पूर्ण जीवनशैली मानासून के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए इसे मानसूनी सांस्कृतिक प्रदेश भी कहते हैं। यहाँ ग्रामीण जीवनशैली, बैलगाड़ी, परम्परागत हल, धान की कृषि, मानसूनी जलवायु इत्यादि मिलकर इंण्डिक संस्कृति को जन्म देते हैं। इस प्रदेश में कई क्षेत्रीय भाषाएँ जैसे, बंगाली, तमिल, तेलगू, कन्नड इत्यादि बोली जाती है। यहाँ कई प्रकार के लिखित प्रजातियों का विकास हुआ है। इसलिए इस प्रदेश को “मेल्टिंग पॉट ऑफ रेस” (Melting Pot of Race) का क्षेत्र भी कहते हैं। यहाँ के लोग धोती, कुर्ता, गमछा, साड़ी, लहंगा आदि जैसे वस्त्र धारण करते हैं। लोक संस्कृति में प्राकृतिक तत्व की प्रचुरता अधिक मिलती हैं।

        इस तरह इ‌ण्डिक संस्कृति पूरे विश्व में अलग पहचान रखती है।

(4) बौद्ध या पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश⇒

      इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास जापान, चीन, ताइवान, मंगोलिया वियतनाम जैसे देशों में हुआ है। इस प्रदेश को पुनः दो भागों में बाँटते हैं:- (i) चीनी सांस्कृतिक प्रदेश (ii) जापानी सांस्कृतिक प्रदेश

          चीनी सांस्कृतिक प्रदेश में साम्यवाद प्रभाव से धार्मिक प्रभाव कम हुआ है, लेकिन सर्वत्र सांस्कृतिक एकरूपता में वृद्धि हुई है। हाल के वर्षों में खुलेपन एवं उदारीकरण के कारण चीन में भी श्रम, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। इससे जबड़दस्त औद्योगिकीकरण, नगरीकरण इत्यादि को बढ़ावा मिला है। 

      बौद्ध संस्कृति में जापान का सांस्कृतिक प्रदेश औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, वाणिज्यिकरण और प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। जापान एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास प्राकृतिक संसाधन नगण्य है फिर भी विश्व का विकसित राष्ट्र है। यहाँ की लोक संस्कृति मे राष्ट्रीयता का प्रभाव अधिक देखा जाता है।

अप्रत्यक्ष रूप से चीनी और जापानी सांस्कृतिक प्रदेश पर मानसूनी संस्कृति या इण्डिक इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का प्रभाव देखा जा सकता है क्योंकि यहाँ भारत से ही बौद्ध धर्म आयात होकर आया है और द्वितीय इण्डिक संस्कृति के सामन ही मानसूनी जलवायु का प्रभाव है।

        विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश 

(i) दक्षिणी-पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश

      इस संस्कृति का विकास इण्डोनेशिया, वियतनाम, थाइलैण्ड, म्यांमार, लाओसा, कंबोडिया जैसे देशों में हुआ है। यह प्रदेश प्रजातीय दृष्टिषेण से बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश नहीं हैं जबकि संस्कृति है दृष्टिकोण से इण्डिक संस्कृति से नजदीक है।

(ii) मिजो अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

        इस संस्कृति का विकास मध्य अफ्रीका एवं विश्व के अनेक जनजातीय प्रदेशों में हुआ है। यहाँ के लोग प्रकृतिवादी, टोटेमवादी, अंधविश्वासी ज्यादा होते हैं। प्राथमिक-आर्थिक क्रिया कलाप में दक्ष होते हैं। प्राय: घुमक्कड जीवन शैली को जीते हैं। गरीबी, बेरोजगारी जैसे समस्याओं का बोलावाला है। 

निष्कर्ष: इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश विशिष्ट भौगोलिक पर्यावरण के कारण ही अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।


15. फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान

15. फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान



फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान⇒

प्रश्न प्रारूप
Q. भूगोल की विभिन्न शाखाओं के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के योगदान की समीक्षा कीजिए।

              20वीं शताब्दी के फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने भूगोल की सभी शाखाओं को विकसित करने का प्रयास किया लेकिन मानव भूगोल एवं प्रादेशिक भूगोल पर विशेष जोर दिया था। फ्रांस में मूलत: उच्च कोटि के मानव भूगोलवेता बड़ी संख्या में सामने उभरकर आये। फेब्रे, ब्लाश, लीप्ले, जीन ब्रून्श, डिमांजिया, डि मार्टोनी, चोर्ले जैसे भूगोलवेताओं का नाम उल्लेखनीय है। इसके अलावे गालो, ब्लेन्चार्ड, सीगफ्रायड जैसे भूगोलवेताओं ने राजनीतिक भूगोल के विकास में योगदान दिया।

फ्रांसीसी भूगोलवेताओं

               जर्मनी की तुलना में यहाँ भूगोल का विकास देरी से हुआ। जर्मनी में जहाँ नियतिवाद का समर्थन करने वाले भूगोलवेता अधिक उभरे वहीं फ्रांस में संभववाद का समर्थन करने वाले भूगोलवेता उभरकर सामने आये। इसके पीछे कई कारण थे।
(1) फ्रांस में संभववाद का समर्थन करने वाले जो भी भूगोलवेता उभरकर सामने आये उन सभी का शैक्षणिक पृष्ठभूमि इतिहास से संबंधित थी।
(2) फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने यह प्रत्यक्ष रूप से अपने आँखों से देखा कि किस तरह मानव ने बड़े-2 महानगरों, ट्रांस साइबेरियन रेलवे और बड़े-2 उद्योगों की स्थापना कर प्रकृति पर विजय प्राप्त किया है।

          उपरोक्त दो कारकों का प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के चिन्तन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। फ्रांस में विकसित भूगोल को पुष्ट करने का प्रयास कई भूगोलवेताओं द्वारा किया गया है। जैसे-
(1) एलिसी रेकलस ⇒ इन्होंने 1875 ई० से 1894 ई० के बीच ‘विश्व का नवीन भूगोल’ नामक पुस्तक की रचना की। यह पुस्तक रिटर के द्वारा लिखित ‘अर्डकुण्डे’ के समकक्ष माना जाता है। रेकलस के इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद ‘पृथ्वी एवं उनके निवासी’ (Earth and its Inhavitent) के रूप में किया गया है।

(2) फेब्रे⇒ फेब्रे को भूगोल में संभववाद का जन्मदाता माना जाता है क्योंकि इन्होंने ही सबसे पहले ‘संभववाद’ शब्द का प्रयोग किया था।

(3) बिडाल डि-ला-ब्लाश (1845-1918 ई०)⇒  फ्रांस में आधुनिक भूगोल का विकास करने का श्रेय ब्लाश को जाता है। फ्रांस में रहते हुए इन्होंने भूगोल पर चिन्तन का कार्य किया। इसका परिणाम यह हुआ कि फ्रांस में उनके कई शिष्य उभरकर सामने आये। एक समय आलम यह था कि फ्रांस का शायद ही कोई ऐसा विद्यालय या विश्वविद्यालय हो जहाँ पर उनका शिष्य शिक्षक के रूप में कार्यरत नहीं हो।

             ब्लाश को मानव भूगोल का संस्थापक माना जाता है। वे नियतिवाद के घोर विरोधी और संभववाद के समर्थक थे। ब्लाश ने कहा कि भूगोल में प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों दृश्यों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने भूगोल के कुल 6 लक्षणों / विशेषताएँ बतलाये।

(1) भूगोल में पार्थिव घटनाओं की एकता का अध्ययन होता है।

(2) पार्थिव घटनाएँ विभिन्न प्रकार के समायोजन या परिवर्तन का परिणाम है।

(3) भूगोल स्थानों का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विषय है।

(4) पार्थिक घटनाओं का विश्लेषण करने हेतु वैज्ञानिक विधि का अपनाया जाना चाहिए।

(5) मानव के द्वारा अपने पर्यावरण में किये जा रहे परिवर्तन का अध्ययन आवश्यक है।

(6) पर्यावरण के सभी तत्वों का समाकलन एवं विश्लेषण भूगोल में आवश्यक है।

         ब्लाश क्षेत्रीय भूगोल / प्रादेशिक भूगोल में विश्वास करते थे। उन्होंने 1903 ई० में फ्रांस का भूगोल नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। जिसमें उन्होंने लघु समरूप प्रदेश की संकल्पना विकसित किया। पुन: उन्होंने भौगोलिक प्रदेश को परिभाषित करते हुए कहा कि “प्रदेश एक ऐसी क्रियान्वित प्रणाली है जहाँ की असमान दिखाई देने वाली कई वस्तुएं आपस में जुड़े होते हैं और कालान्तर में एक विशिष्ट पहचान देते हैं।”

         ब्लाश मानव को एक क्रियाशील प्राणी मानते थे। इसके आधार पर उन्होंने अपना समर्थन संभववाद की ओर प्रकट किया। उनका मानना था कि मानव अपने विवेक से वातावरण के विभिन्न तत्वों का प्रयोग करता है। वे प्रकृति को एक सलाहकार से अधिक कुछ नहीं मानते थे। ब्लाश महोदय ने जैविक प्रदेशों की व्याख्या करने हेतु “जेनरा-डी-बाइस” की भी संकल्पना प्रस्तुत किया था।
         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ब्लाश फ्रांस के एक विलक्षण भूगोलवेता थे।

(4) जीन ब्रून्श (1869-1930 ई०)⇒ जीन ब्रून्श ब्लाश के ही शिष्य थे। इन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था’  Robber Economy की संकल्पना विकसित किया जिसमें उन्होंने संभववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े प्रकृति के गर्भ से खनिजों को निकालता रहता है और प्रकृति मौन बनी रहती है। ब्रून्श ने भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन  हेतु दो सिद्धांतों का प्रतिपादन किया-

(1) क्रियाशीलता का सिद्धांत

(2) अंतर संबंधों का सिद्धांत

            पुन: ब्रून्श महोदय ने मानव भूगोल के विषय क्षेत्र को तीन वर्गों में विभक्त किया है-

(i) प्रथम वर्ग- इसमें मिट्टी के अनुत्पादक प्रयोग, जैसे- मकान, सड़क इत्यादि के अध्ययन को शामिल किया है।
(ii) दूसरा वर्ग– इसमें वनस्पति और जन्तु जगत पर मानव विजय से संबंधित तथ्यों को शामिल किया है।
(iii) तीसरा वर्ग- इसमें मिट्टी का वर्गीकरण उपयोग, पौधों एवं पशुओं का विनाश और खनिजों का शोषण जैसे तत्वों को शामिल किया है।
          जीन ब्रून्श ने भौगोलिक चिंतन को प्रस्तुत करने के लिए 1920 ई० में ‘ह्यूमन जियोग्राफी डी ला फ्रांस’ नामक पुस्तक प्रस्तुत किया। इस पुस्तक के प्रथम खंड में प्रादेशिक भूगोल पर प्रकाश डाला गया है।
(5) अल्बर्ट डिमांजिया (1872-1940 ई०)⇒ डिमांजिया भी ब्लाश के सर्वोत्तम शिष्यों में से एक थे। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘मानव भूगोल की समस्या’ है। उन्होंने ग्रामीण बस्तियों पर शोध विशेष रूप से किया है। यह भी संभववाद के समर्थक के। इस तथ्य का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा है कि मानव सतत् अपने प्रयास से वातावरण को परिमार्जित और रूपांतरित करता रहता है। डिमांजिया भूमि का वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया है, जिसकी प्रशंसा फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने मुख्य रूप से किया है।
(6) डि मार्टोनी (1873-1955 ई०)⇒ डि मार्टोनी ब्लाश का और दामाद दोनों था। इसकी रूची भौतिक भूगोल में अधिक थी। इन्होंने आल्पस पर्वत पर होने वाले हिमनद से अपरदन और उससे निर्मित स्थलाकृतियों का विस्तार से अध्ययन किया है। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम भूगोल भूगोल है।
(7) ब्लैंचार्ड⇒ ब्लैंचार्ड का अध्ययन मूलत: नगरीय भूगोल से सम्बंधित है। इन्होंने फ्रांस में ‘स्कूल ऑफ अरबन ज्योग्रफर’ नामक संस्था की भी स्थापना की। उन्होंने ‘फ्रेंच आल्पस’ पुस्तक की रचना की जिसमें ग्रामीण घरों के प्रकारों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला।
(8) सीगफ्रायड⇒ यह फ्रांस का एक मात्र ऐसा भूगोलवेता है जिसकी रुची राजनीतिक भूगोल और चुनाव भूगोल में था। उन्होंने अपने विचारों को फ्रांस का राजनैतिक भूगोल नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया। सिगफ्रायड राज्यों के सीमा का निर्धारण हेतु कई तकनीकों का विकास किया।
(9) एम.शोरे⇒ एम. शोरे का मुख्य योगदान औपनिवेशिक भूगोल में रहा है। इन्होंने उपनिवेश बनाने वाले देशों और बनने वाले देशों की विशेषता और प्रक्रिया पर विशेष रूप से प्रकाश डाला है। औपनिवेशिक भूगोल में डुबॉय जैसे भूगोलवेता का भी विशिष्ट योगदान रहा है।
(10) गालो⇒ आधुनिक भूगोलवेताओं में एक महान भूगोलवेता रहा है। इन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उत्तरी-पूर्वी फ्रांस, मध्य यूनान और स्वेज नहर का अध्ययन किया है।
       उपरोक्त भूगोलवेताओं के अलावे भी ऐसे कई भूगोलवेता हैं जिन्होंने फ्रांसीसी भूगोल के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जैसे- गॉट मैन नामक भूगोलवेता ने ‘मेगैलोपोलिश’ (Magalopolis) शब्द का प्रयोग किया। चोर्ले महोदय ने भूगोल में मॉडल निर्माण पर प्रकाश डाला। जे. अन्सेल महोदय ने राजनीतिक भूगोल में योगदान दिया।
निष्कर्ष – इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने भूगोल के विभिन्न शाखाओं को विकसित करने में अपना विशिष्ट योगदान दिया है। लेकिन मानव भूगोल, राजनीतिक भूगोल, नगरीय भूगोल इत्यादि के विकास पर इनका विशेष योगदान रहा है।
उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

        भौगोलिक ज्ञान के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं का अतुलनीय योगदान है। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने अनेक नई संकल्पनाओं का प्रतिपादन किया तथा अनेक पूर्ववर्ती संकल्पनाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। मानव भूगोल व प्रादेशिक भूगोल के क्षेत्रों में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने जितना योगदान किया हैं उतना विश्व के किसी अन्य देश के भूगोलवेत्ताओं ने नहीं किया। ब्लाश (Blache), ब्रून्स (J. Brunches), डिमांजियाँ (Demangeon), गालो (Gallois), ब्लैचार्ड (Blanchard), डि-मार्तोनी (De-Mortonne), चोर्ले (Chorley) आदि फ्रांसीसी भूगोल के क्षितिज पर दीप्तिमान भूगोलवेत्ता हैं। फ्रांस में जिन भौगोलिक विचारधाराओं को बल मिला, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):–

       मानव भूगोल के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं का किसी भी अन्य देश के भूगोलवेत्ताओं से अधिक योगदान है। व्लाश, ब्रूस, डिमांजियां, आदि मानव भूगोल के सर्वप्रमुख विद्वान थे।

     ब्लाश ने Principles of Human Geography ग्रन्थ लिखा। इसमें संसार की जनसंख्या के वितरण, घनत्व व प्रवसन, मानव अधिवास, मानव वातावरण सम्बन्ध, आदि पर प्रकाश डाला गया है। ब्लाश को सम्भववाद का प्रवर्तक माना जाता है।

    जीन ब्रूस मानव भूगोल का दूसरा प्रमुख विद्वान था। इसकी पुस्तक ‘मानव भूगोल’ (Geographie-Humanie) 1910 में प्रकाशित हुई। ब्रूस ने मानव भूगोल के तथ्यों का यथार्थ विभाजन प्रस्तुत किया था। ब्रूस ने परिवर्तनशीलता के सिद्धान्त (Principle of Activity) व अन्तर्क्रिया सिद्धान्त (Principle of Interaction) का प्रतिपादन किया। ब्रूस का अन्तर्क्रिया सिद्धान्त ब्लाश के पार्थिव एकता के सिद्धान्त पर आधारित था।

     डिमांजियां ने ‘मानव भूगोल की समस्याएँ’ (Problems of Human Geography) लिखी। इसमें मानव भूगोल की परिभाषा दी गई है व विषय क्षेत्र पर भी प्रकाश डाला गया है।

(ii) सम्भववाद (Possibilism):-

      इस विचारधारा का जन्म फ्रांस में हुआ। ब्लाश इसका प्रवर्तक माना जाता है। फेब्रे (Febre), ब्रूस (Brunhes), डिमांजियां (Demangeon) व ब्लैचार्ड (Blanchard) इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक थे।

      सम्भववाद की विचारधारा, वातावरण निश्चयवाद की विरोधी विचारधारा है। सम्भववाद के समर्थकों का मत है कि मानव अपने कार्यकलापों के लिए स्वतन्त्र होता है। उस पर प्रकृति का कोई नियन्त्रण नहीं होता। दूसरे शब्दों में, मानव प्रकृति से अधिक शक्तिशाली है। मानव प्रकृति के नियन्त्रण में नहीं है, वरन् प्रकृति मानव के नियन्त्रण में है।

(iii) प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography):-

     फिलिप बुआचे (Phillippe Buache) प्रथम भूगोलता था, जिसने राजनीतिक सीमाओं के आधार पर किए जाने वाले भौगोलिक अध्ययनों का विरोध किया। उसने कहा कि हमें आंकड़ों का एकत्रीकरण व भौगोलिक अध्ययन प्राकृतिक सीमाओं पर करना चाहिए। उसके अनुसार नदी द्रोणियां सर्वोत्तम प्राकृतिक सीमाएँ हैं।

     इसी आधार पर फ्रांस में प्रादेशिक भूगोल का विकास हुआ यश गालो दि मर्तीनी, आदि ने इस विचारधारा को महत्वपूर्ण आश्रय दिया। प्रादेशिक भूगोल के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ‘विश्व भूगोल’ (Geographie Univer selle) नामक ग्रन्थमाला ने अदा की। इसकी योजना ब्लाश ने तैयार की थी, परन्तु उसकी मृत्यु के बाद गालो ने यह कार्य सम्भाला। यह ग्रन्थमाला वैज्ञानिक शुद्धता के साथ उत्कृष्ट शैली में लिखी गई थी।

(iv) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

       फ्रांस में भौतिक भूगोल का भी पर्याप्त विकास हुआ। दि मर्तोनी सर्वप्रमुख भौतिक भूगोलवेत्ता था। उसने 1909 में भौतिक भूगोल की प्रथम पाठ्य पुस्तक (Traite de Geographie Physique) प्रकाशित की। उसने आल्पस मध्य यूरोप तथा फ्रांस का भौतिक भूगोल भी लिखा। ब्लैँचाई ने 1938 में आल्पस का भौतिक भूगोल प्रकाशित कराया। बौलिंग (Bauling) ने फ्रांस के मध्यवर्ती पठार का भौतिक भूगोल लिखा।

(vi) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

       सीगफ्रीड (Siegfried) व असेल (J. Ancel) के नेतृत्व में फ्रांस में राजनीतिक भूगोल का विकास हुआ। सीगफ्रीड ने फ्रांस में राजनीतिक दलों और चुनावों में भौगोलिक कारकों का विश्लेषण किया था। उसने राजनीतिक भूगोल पर अनेक वक्तव्य दिए थे तथा पुस्तकें प्रकाशित कीं। अन्सेल ने ‘यूरोप का राजनीतिक भूगोल’ तीन ग्रन्थों में प्रकाशित किया था।

(vii) औपनिवेशिक भूगोल (Colonial Geography):-

      डुबोइस (M. Dubois), पेरिस में, 1892 में, औपनिवेशिक भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। 1902 में औपनिवेशिक भूगोल का अध्ययन पेरिस के अतिरिक्त सियोन्स, मार्सली, बोर्डियो काएन, टूलाउज, आदि विश्वविद्यालयों में भी फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के सहयोग से होने लगा था।

  औपनिवेशिक भूगोल प फ्रांसीसी विचारधारा की सर्वोत्तम पुस्तक डिमांजियां की ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ (L’ Empire Britamnique) 1923 में प्रकाशित हुई थी। बर्नार्ड, गौतियर, ट्रेश, गोरो, मोनोड, रोबीक्युएन, आदि अन्य मुख्य औपनिवेशिक भूगोलवेत्ता थे।


 13. अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट का भूगोल के विकास में योगदान

 13. अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट का भूगोल के विकास में योगदान




अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट

प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल के विकास में अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट द्वारा दार्शनिक तथा विधितंत्र योगदान का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

          अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट एक महान जर्मन भूगोलवेता था। जिसका जन्म 1769 ई० में और मृत्यु 1859 ई० में हुआ। हम्बोल्ट छायावादी युग (1800-59 ई०) का भी महान भूगोलवेता था। इनके समकालीन जर्मनी में रिटर और हॉर्टशोन जैसे महान भूगोलवेत्ता तथा शिलर और गेटे जैसे साहित्यकार भी सक्रिय थे।

अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्टअलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट की जीवनी

        अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट को आधुनिक भूगोल का जन्मदाता माना जाता है। हेटनर महोदय ने कहा है कि आधुनिक भूगोल की शुरुआत 1799 ई० से माना जाना चाहिए क्योंकि हम्बोल्ट ने इसी वर्ष विश्व प्रसिद्ध द० अमेरिका की यात्रा पर निकला था। हम्बोल्ट का जन्म बर्लिन में एक करोड़पति के घर में हुआ था। इसकी शिक्षा-दीक्षा जर्मनी के बड़े-2 विद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में हुई थी। इसने फ्रैंकफर्ट विश्व विद्यालय में वनस्पतिशास्त्र, गाटिंगन विश्वविद्यालय में भूगर्भशास्त्र का अध्ययन किया।

       1789 ई० में हम्बोल्ट ने बैसाल्ट के उद्भव पर भूगोल लिखा जिसकी सर्वत्र चर्चा हुई। किशोरावस्था में ही जॉर्ज फोस्टर के साथ हॉलैंड, बेल्जियम, फ्रांस और इंगलैंड का यात्रा कर चुका था। अक्सर हम्बोल्ट अपने बड़े भाई विल्हेम वॉन हम्बोल्ट से मिलने स्वीट्जरलैण्ड के ‘जेना’ नगर में आता जाता रहता था। अर्थात हम्बोल्ट के जीवन में यात्रा की नींव बचपन में ही रख दी गई थी। हम्बोल्ट अपने जीवन में लगभग 60,000 मील की यात्रा किया। इस यात्रा के दौरान उसने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जो अनुभव किया उसे ‘Cosmos’ नामक पुस्तक में लिपिबद्ध कर पूरे विश्व में अपनी पहचान स्थापित कर दिया। 

हम्बोल्ट की यात्राएँ

        1799 ई० में हम्बोल्ट के द्वारा की गई यात्रा का अगर विश्लेषण की जाय तो स्पष्ट होता है कि उसने अपनी यात्रा का प्रारंभ किरुना (स्पेन) नामक बंदरगाह से किया था। स्पेन से चलकर वह सबसे पहले बेनेजुएला के कुमाना बंदरगाह पर उतरा। हम्बोल्ट वेनेजुएला में बहनेवाली औरिनिको नदी के सहारे आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र पहुँचा और आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र का खोज किया।         

        आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र खोजे जाने के बाद वह क्यूबा लौट आया। पुन: हम्बोल्ट लौटकर मैग्डालिना घाटी के सहारे एण्डीज पर्वत के ऊपर चढ़ाई किया। एण्डीज पर्वत पर चढ़ने के क्रम में वह चिम्बराजो चोटी पर चढ़ाई किया था, चिम्बराजो के क्रेटर में उत्तरा और बैसाल्ट का अध्ययन किया। चिम्बराजो पर चढ़ाई करने के बाद क्वीटो घाटी के सहारे पेरू की राजधानी लीमा पहुँचा। पेरू के तट पर उसने पेरू की ठण्डी जलधारा का खोज किया और उसका नामाकरण अपने नाम पर किया।

      हम्बोल्ट पेरू के तट पर गवानो पक्षी का विशिष्ट रूप से अध्ययन किया। लीमा के बाद एकापुल्का बंदरगाह से होते हुए वह मैक्सिको पहुँचा और सलाह दिया कि प्रशान्त महासागर और अटलांटिक महासागर जोड़ने के लिए पनामा नहर का निर्माण किया जाए। मैक्सिको से पूरब क्यूबा की राजधानी हवाना और हवाना से USA के प्रसिद्ध नगर फिलाडेल्फीया और वाशिंगटन का यात्रा किया। पुनः वाशिंगटन से वह पेरिस लौट आया और पेरिस में ही वह बस गया।

       पुनः 1827 ई० में रूसी सरकार के निमंत्रण पर  यूराल पर्वत, साइबेरिया और अल्टाई पर्वत श्रृंखला का यात्रा किया। इस यात्रा के लौटने के बाद ही उसने अपने ‘Cosmos’ नामक पुस्तक की रचना प्रारंभ किया। हम्बोल्ट के जीवन पर श्रीमती कैरोलीन फान वाल्सगाने के इस कथन का जबरदस्त प्रभाव था। जैसे- पृथ्वी के एक-एक तत्व परस्पर एक-दूसरे से गुथे हुए हैं। प्रत्येक तत्व एक-दूसरे को जीता और जीलाता है।” हम्बोल्ट ने अपने यात्रा के दौरान इस कथन का प्रत्यक्ष दर्शन किया था और इसे सत्य माना।

अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट के दर्शन एवं विधितंत्र

          अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट ने भूगोल के दर्शन एवं अध्ययन विधि या विधितंत्र में निम्नलिखित योगदान दिया है।

    हम्बोल्ट अपनी पुस्तक ‘कॉसमास’ में सात प्रकार की संकल्पना विकसित की हैं:-

(1) पृथ्वी के सतह का अध्ययन मानवीय अधिवास के रूप में करते हैं।

(2) भूगोल का अध्ययन क्षेत्रीय वितरण के रूप में करते हैं।

(3) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है।

(4) भूगोल का मुख्य उद्देश्य भौतिक वातावरण मानवीय संबंधों का अध्ययन होना चाहिए।

(5) भूगोल में पृथ्वी के सभी घटकों का अध्ययन किया जाना चाहिए। 

(6) भूगोल में क्रमबद्ध पद्धति का विकास किया जाना चाहिए।

(7) भूगोल प्रकृति के एकता का भी अध्ययन करता है।

           हम्बोल्ट के द्वारा विकसित उपरोक्त 7 संकल्पनाओं के अलावे भी उसने कई और दर्शन विकसित किए। जैसे उसने कहा कि प्रकृति जीवन्त समष्टि हैं। उसने इसे अन्योन्याश्रिता के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। उसने कहा है कि मुझे आमेजन के वनों में विचरण करते हुए एण्डीज पर्वत पर चढ़ाई करते हुए इसका सदा बोध होता रहा कि सम्पूर्ण प्रकृति एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक बसा हुआ है तथा उन सबमें एक ही आत्मा से अनु-प्रामाणिक है।

            हम्बोल्ट ने भूदृश्य की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा है कि “एक ही जीवंत समष्टि (आत्मा) भूतल के विभिन्न भागों में विभिन्न रूपों में प्रकट होती है जिसकी अपनी विशिष्टता होती है।” इसी संदर्भ में उन्होंने “वन लाइफ” एक जीवन की संकल्पना प्रस्तुत किया।

          हम्बोल्ट पार्थिव एकता की संकल्पना को समझाने के लिए ‘वाटर फ्लाई संकल्पना’ प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने कहा है कि एक तितली विषुवतीय प्रदेश में अपना पंख हिलाती है तो इसका असर संपूर्ण विश्व के जलवायु पर पड़ता है।

          हम्बोल्ट वेनेजुएला के वेलेन्सिया झील के सूखने का कारण बताया कि इस झील के किनारे में अवस्थित वनों का तेजी से कटाव किये जाने के कारण यह झील सूख रहा है।

         हम्बोल्ट ने बताया कि भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से अपने ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव करके किया जाना चाहिए। यही कारण है कि इनके अध्ययन की पद्धति को प्रत्यक्ष अनुभव परक कहा जाता है। पुन: इन्होंने बताया कि भौगोलिक तत्त्वों का विकास आगमानात्मक (Inductive) रूप से हुआ है। इससे लगता है कि इनके जीवन पर डार्विन के द्वारा विकसित जैव उद्दविकास के सिद्धांत का प्रभाव था।

           अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट को भूगोल में जलवायु विज्ञान, पादप भूगोल का श्रीगणेश करने का श्रेय जाता है। अर्थात हम्बोल्ट को जैव भूगोल का संस्थापक माना जाता है क्योंकि इन्होंने ही सर्वप्रथम विश्व की प्राकृतिक वनस्पति तथ फसलों का ऊँचाई तथा तापमान से सम्बन्ध को स्पष्ट किया था। उसने अपने यात्रा के दौरान समताप रेखा (Isotherm) पहली बार खींचने का प्रयास किया था। हम्बोल्ट अपनी पुस्तक को कई खण्डों में बाँटकर लिखा है। इसका सबसे अन्तिम खण्ड 1859 ई० में पूरा किया। पूरे जीवन में उसने लगभग 40 ग्रंथ लिखे। 

आलोचना

   हम्बोल्ट मूलतः नियतिवादी दर्शन का समर्थक था जिसमें उसने प्रकृति की श्रेष्ठता को स्वीकार किया था। इसी विचारधारा के विरोध में फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने मानव की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए संभववाद की संकल्पना का विकास किया। इस तरह भूगोल में नियतिवाद बनाम संभववाद का द्वैतवाद का प्रारंभ हुआ। 

निष्कर्ष 

        इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हम्बोल्ट एक महान भूगोलवेता था। इसके विचारधारा से निश्चित रूप से कई द्वैतवाद का विकास हुआ। लेकिन हम्बोल्ट का उद्देश्य भूगोल को विभाजित करना नहीं था बल्कि उसके प्रत्येक अंगों का सम्पूर्ण विकास करना था।

नोट : हम्बोल्ट ने प्राकृतिक प्रदेश की आधारभूत समरसता को “जुसामेनहैंग” की संज्ञा दी।

12. जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान

12. जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान




जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान⇒

                     आधुनिक भूगोल के विकास का श्रेय यूरोपीय चिंतकों को जाता है। यूरोप में भूगोल के विकास को दो काल में बाँटा जा सकता-

(1) पुनर्जागरण काल के पूर्व का भूगोल

(2) पुनर्जागरण काल के बाद का भूगोल

        यूरोप में पुनर्जागरण के साथ ही वैज्ञानिक चिन्तन शुरू हुआ जिसका प्रभाव लगभग सभी विषयों पर पड़ा। पुनः जब इंगलैण्ड में औद्योगिक क्रांति हुई तो इस क्रांति का प्रभाव अन्य विषयों पर पड़ा। वैज्ञानिक चिन्तन और औद्योगिक क्रांति का परिणाम था कि भूगोल जैसे विषय में भी गत्यात्मकता का आगमन हुआ। पुनर्जागरण काल के पहले भूगोल में यूनानी और रोमन भूगोलवेताओं का विशेष योगदान था जबकि पुनर्जागरण काल के बाद जर्मन, फ्रांसीसी और ब्रिटिश भूगोलवेताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। 

जर्मन भूगोलवेत्ताओं

    उपरोक्त चिन्तनों में जर्मनी भूगोलवेताओं को आधुनिक चिंतन विकसित करने का श्रेय जाता है। जर्मनी में भूगोल के अध्ययन की शुरुआत 18वीं शताब्दी के पूर्व से माना जाता है क्योंकि इसी काल में भूगोल का अध्ययन विद्यालय स्तर पर किया जाने लगा था। प्रारंभिक जर्मन भूगोलवेताओं में इमैनुएल काण्ट तथा फॉस्टर जैसे भूगोलवेताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। क्योंकि इन दोनों ने पहली बार उच्च शिक्षण संस्थानों में भौगोलिक अध्ययन पर विशेष जोर दिया। काण्ट महोदय की विशेष रुची खगोल विज्ञान अध्ययन में थी जबकि फॉस्टर की विशेष रुची भूआकृति विज्ञान में था। अत: भूगोल में खगोलशास्त्र और भूआकृति विज्ञान के विकास का श्रेय काण्ट और फॉस्टर को जाता है।

       प्रारंभ में भूगोल का अध्ययन इतिहास के अन्तर्गत किया जाता था। भूगोल को इतिहास से अलग करने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है क्योंकि इन्होंने ही सबसे पहले बताया कि किसी भी घटना का अध्ययन स्थान (space) और काल के संदर्भ में किया जाता है। समय के संदर्भ में किसी भी घटना का अध्ययन इतिहास कहलाता है जबकि स्थान के संदर्भ में किसी भी घटना का अध्ययन भूगोल कहलाता है। पुनः काण्ट एवं फॉस्टर ने भूगोल में कई नवीन चिंतन को प्रस्तुत किया है। लेकिन इन दोनों ने ही मिलकर जर्मनी के उच्च शिक्षण संस्थानों में भूगोल को एक विषय के रूप में मान्यता नहीं दिलवा सके।

       वास्तव में आधुनिक भूगोल का जन्मदाता हम्बोल्ट और रिटर को माना जाता है। ये दोनों भूगोलवेत्ता एक-दूसरे के समकालीन थे। हम्बोल्ट का जन्म 1769 ई० में हुआ था जबकि रिटर का जन्म 1779 ई० हुआ था लेकिन दोनों की मृत्यु एक ही वर्ष 1859 ई० हुई थी। ये दोनों भूगोलवेता आधुनिक भूगोल के विकास के पोषक थे। लेकिन दोनों के दृष्टिकोण अलग-2 था। सामान्यता दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर भूगोल के विधितंत्र से संबंधित था।

     जैसे:- हम्बोल्ट का मानना था कि भूगोल का विकास Inductive Method (आगमानात्मक विधि) से हुआ। जबकि रिटर के अनुसार Deductive Method (निगमानात्मक विधि) से हुआ है। इन दोनों के मौलिक विचार में अन्तर का प्रमुख कारण दोनों के अलग-2 जीवन का पृष्ठ भूमि था। जैसे- हम्बोल्ट बर्लिन के एक करोड़पति बाप का इकलौता बेटा था। जबकि रिटर एक गाँव से आने वाला गरीब गड़ेडिया का बेटा था।

       हम्बोल्ट की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। इसलिए उसने शुरू से वैज्ञानिक विषय की पढ़ाई की और वैज्ञानिक चिन्तन का विकास किया। जबकि रिटर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसलिए दर्शनशास्त्र जैसे मानविकी विषय का अध्ययन किया। इसलिए वह ईश्वरवादी विचारों पर जोर दिया।

      हम्बोल्ट ने अपना वैज्ञानिक विचार “Cosmos” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया जबकि रिटर ने ‘अर्डकुण्डे’ नामक पुस्तक में अपना चिंतन प्रस्तुत किया। हम्बोल्ट विश्व के यात्रा करने के बाद अपना विचार प्रस्तुत किया। उसने अपने जीवन काल में 60,000 मील से भी अधिक यात्रा की। दूसरी ओर रिटर को आरामकुर्सी पर बैठने वाला चिंतक माना जाता है।

         हम्बोल्ट ने अपनी यात्रा के दौरान अमेजन नदी के उद्गम स्थल की खोज की। यूरोप का वह पहला व्यक्ति बना जो एण्डीज पर्वत को पार कर पेरू की ठण्डी जलधारा की खोज की। यहाँ तक की चिम्बराजो ज्वालामुखी के क्रेटर में उतरकर बैसाल्टिक चट्टानों का अध्ययन किया। यात्रा के दौरान हमबोल्ट अपने नाव पर एक प्रयोगशाला भी लेकर चलता था। अपने यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों का तापमान का मापन किया और उसके बाद पहली बार समताप रेखा खींचा।

      पुन: हमबोल्ट मैक्सिको और न्यूयार्क की यात्रा करते हुए यूरोप पहुँचा। यूरोप में आने के बाद रूस के जार (राजा) के अनुरोध पर पुन: उसने यूराल पर्वत और साइबेरियाई क्षेत्र की यात्रा की। वहीं दूसरी ओर रिटर महोदय ने जर्मनी में रहकर विभिन्न प्रकार के भौगोलिक सूचनाओं को एकत्रित कर चिन्तन एवं लेखन का कार्य किया।

         हम्बोल्ट अपनी पुस्तक कॉसमॉस में सात संकल्पना विकसित किये हैं।-

(1) पृथ्वी के धरातल का अध्ययन ‘मानवीय अधिवास’ के रूप में किया जाना चाहिए।

(2) भूगोल का अध्ययन क्षेत्रीय वितरण के रूप में किया जाना चाहिए।

(3) भौतिक भूगोल ही सामान्य भूगोल है।

(4) भौगोलिक अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य भौतिक भूगोल और मानवीय संबंधों के अध्ययन होना चाहिए।

(5) भूगोल में पृथ्वी के सभी घटकों का अध्ययन होना चाहिए।

(6) भूगोल में क्रमबद्ध अध्ययन पर जोर दिया जाना चाहिए।

(7) भूगोल के सभी घटक एक-दूसरे से जुड़े हुए है। इसे पार्थिव एकता का सिद्धांत भी कहते हैं।

          रिटर ने अपने अध्ययन में हम्बोल्ट के अधिकार संकल्पना को शामिल किया लेकिन दो संकल्पना में रिटर के मत भिन्न था। जैसे:- रिटर के क्रमबद्ध अध्ययन के स्थान पर प्रादेशिक अध्ययन पर विशेष जोर दिया। वहीं प्रकृति या पृथ्वी के स्थान पर मानव के अध्ययन पर इसने विशेष जोर दिया। लेकिन वास्तव में ये दोनों ही भूगोलवेत्ता नियतिवाद के समर्थक थे।

          रैटजल अगले महान जर्मन भूगोलला थे। जिन्हें ‘मानव भूगोल’ शुरुआत करने का श्रेय जाता है। इन्होंने भूगोल में “भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल” का द्वैतवाद शुरू किया। इन्होंने नियतिवाद के स्थान पर पर्यावरण नियतिवाद की संकल्पना विकसित किया। इन्हें भूगोल में राजनीतिक भूगोल और सांस्कृतिक भूदृश्य संकल्पना विकसित करने का श्रेय जाता है। राजनीतिक भूगोल में उन्होंने कहा है कि कोई भी राज्य या समाज जैविक उद्दविकास के समान ही अनेक अवस्थाओं से गुजरकर विकसित होते हैं।”

      इसी तरह से संस्कृतिक भूदृश्य में उन्होंने बताया कि “अलग-अलग वातावरण में अलग-अलग रहन-सहन, खान-पान पोषक, विश्वास, भाषा इत्यादि का विकास होता है। जिससे अलग-2 सांस्कृतिक भूदृश्य विकसित होते हैं। “ रैटजेल ने कई पुस्तकों की भी रचना की। जैसे- “एंथ्रोपोज्योग्रफिया”, “पॉलिटिकल ज्योग्रफी”  और “प्रिंसिपुल ऑफ ह्यूमैन ज्योग्रफी”। रैटजेल ने अपने चिंतन पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि “मैने यात्रा की रेखा खींची और उसके बाद मैने वर्णन किया यही मेरा भूगोल है।” उन्होंने यह भी कहा है कि भूगोल एक वर्णात्मक विषय है। पुनः उन्होंने कहा है कि भूगोल में विश्लेषण पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए।

        उपरोक्त भूगोलवेताओं के अलावे कई और ऐसे भूगोलवेत्ता हुए जिन्होंने भूगोल में व्यकिगत योगदान देकर भौगोलिक चिन्तन के विकास को समृद्ध किया है। रीचथोपेन महोदय ने भूगोल में क्षेत्रीय विज्ञान को जन्म दिया। वहीं हेटनर महोदय ने मानव भूगोल, विश्व का ‘वृहत प्रादेशिक भूगोल, भूगोल का इतिहास, लक्षण और विधि’ नामक पुस्तक में स्थलाकृतिक विज्ञान और विभिन्न प्रदेशों का अध्ययन विकसित किया।

      जैलेन महोदय ने ‘भूराजनीति का सिद्धांत’ विकसित किया। जिसमें बताया कि “कोई भी राज्य भूमि की राजनीति करता है।” जैलेन के इस विचारधारा को सबसे अधिक समर्थन हिटलर और उसके सेनापति कार्ल हाउशोफर के द्वारा प्राप्त हुआ। कार्ल हाउशोफर ने भूराजनीति के अध्ययन हेतु “इन्स्टीच्यूट ऑफ ज्यो पोलिटिक्स स्कूल” की स्थापना करवायी।

         जर्मन भूगोलवेता में अल्बर्ट पेंक और बाल्थर पेंक जैसे भूगोलवेत्ता प्रमुख हैं, जिन्होंने अमेरिकी भूगोलवेत्ता डेविस के द्वारा प्रस्तुत सामान्य अपरदन चक्र सिद्धांत के विरोध में ‘आधुनिक एवं वैज्ञानिक अपरदन चक्र का सिद्धांत’ प्रस्तुत किया। इसी तरह वॉन थ्यूनेन ने कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत, बेबर ने औधोगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत, क्रिस्टॉलर ने केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत प्रस्तुत कर जर्मन भौगोलिक चिन्तन को समृद्ध किया है।

निष्कर्ष

       इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि आधुनिक भूगोल के विकास में जर्मन भूगोलवेत्ताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। इनके योगदान को आज भी विश्व के कई देशों में न केवल मान्यता प्राप्त है बल्कि उसका अध्ययन भी किया जाता है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

       आधुनिक वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना में जर्मनी को प्रथम स्थान दिया जाता है। वहाँ अठारहवीं सदी (कान्ट के समय) से ही भूगोल में आधुनिकता एवं वैज्ञानिकता की नींव पड़ चुकी थी। कान्ट ने सर्वप्रथम भूगोल के लिए कुछ नियमों का प्रतिपादन किया, इस प्रकार यद्यपि उन्होंने भूगोल में वैज्ञानिकता की आधारशिला रखी, परन्तु भूगोल की वास्तविक रूपरेखा उन्नीसवीं सदीं में हम्बोल्ट (Humbolt) व रिटर (C. Ritter) ने तैयार की।

       कान्ट, रिटर, रेटजेल, हम्बोल्ट, रिचथोफेन व हेटनर जैसे भूगोलवेत्ताओं ने वातावरण निश्चयवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। रिचथोफेन तथा हेटनर ने भूगोल को क्षेत्रवर्णी विज्ञान के रूप में समझाने का प्रयत्न किया। जर्मनी के वर्तमान भूगोलवेत्ताओं ने लैण्डशाफ्ट (Landchaft) की विचारधारा का समर्थन किया। भू-राजनीति की विचारधारा का उदय जर्मनी में ही हुआ। हम्बोल्ट ने क्रमबद्ध व रिटर ने प्रादेशिक भूगोल का प्रतिपादन किया। इसी प्रकार की अनेक विचारधाराएँ जर्मन भूगोलवेत्ताओं ने प्रतिपादित की। प्रमुख विचारधाराओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

(i) वैज्ञानिक भूगोल (Scientific Geography):-

      अठारहवीं सदी में रीनहॉल्ड फॉर्स्टर तथा जार्ज फॉर्स्टर ने वैज्ञानिक ढंग से पृथ्वी के विभिन्न भागों के भौगोलिक तथ्यों के प्रेक्षण (Observations) किए। उन्होंने तथ्यों को एकत्र किया, उनकी तुलना की, वर्गीकरण किया-इस वर्गीकरण में तथ्यों का सामान्यीकरण (Generalization) किया और उनकी कारणात्मक व्याख्याएं लिखीं। उन्होंने भौगोलिक सामग्री का वैज्ञानिक विवेचन किया। इस प्रकार रीनहॉल्ड फॉर्स्टर प्रथम विधितन्त्रीय भूगोलवेत्ता था। जॉर्ज फॉर्स्टर ने उसका अनुसरण किया। कान्ट ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान किया। इनके द्वारा तैयार आधार (Foundation) पर ही उत्तरकालीन भूगोलवेत्ताओं ने वर्तमान भूगोल के भव्य भवन का निर्माण किया।

(ii) क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography):-

       रीनहॉल्ड फॉर्स्टर, जॉर्ज फॉर्स्टर व कान्ट ने क्रमबद्ध भूगोल में काफी योगदान किया, परन्तु क्रमबद्ध भूगोल का सबसे महान भूगोलवेत्ता हम्बोल्ट था। वस्तुतः वर्तमान भूगोल का संस्थापक व प्रवर्तक हम्बोल्ट को ही माना जाता है। उसकी प्रसिद्ध ग्रन्थमाला कॉसमॉस (Cosmos) में क्रमबद्ध भूगोल है। हम्बोल्ट ने दो ग्रन्थ ‘मध्य एशिया’ (Vol. 1 & Vol. 2) फ्रांसीसी भाषा में प्रकाशित कराए।
(iii) वातावरण निश्चयवाद (Environmental Deter- minism):-

     वातावरण निश्चयवाद का जन्म जर्मनी में हुआ। रिटर, रेटजेल व हम्बोल्ट का इसमें मुख्य योगदान था। इस विचारधारा में मानवीय क्रियाओं को प्रकृति द्वारा नियंत्रित बताया गया था।

(iv) भूगोल : क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Geography: Chorological Science):-

      भूगोल को क्षेत्रवर्णी विज्ञान के रूप में प्रतिपादित करने का श्रेय जर्मन भूगोलवेत्ताओं को ही है। रिचथोफेन व हेटनर का इसमें विशेष योगदान था। इन्होंने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र की व्याख्या की थी तथा अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों के साथ भूगोल के सम्बन्धों का संश्लेषण किया था:

     “Geography is a Chorological Science of the earth’s surface, of the science of earth areas in terms of their differences and their spatial relations.” -Hatner

(v) भू-राजनीति (Geo-Politics):-

     ‘भू-राजनीति’ शब्द यद्यपि एक स्वीडिश भूगोलवेत्ता द्वारा प्रस्तावित था, परन्तु इसके पूर्व ही रेटजेल के ‘राजनीतिक भूगोल’ से इसका बीजारोपण हो चुका था। सूपान (Supan) की पुस्तक ‘सामान्य राजनीतिक भूगोल के मार्गदर्शक सिद्धान्त’ 1922 में प्रकाशित हुई।

        द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व व युद्ध के समय जर्मन लोगों ने अपनी जातीय व सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा किया था। इसी आधार पर रहने के स्थान का नारा लगाया। इसी के परिणामस्वरूप भू-राजनीति का विकास हुआ।

       इस क्षेत्र में कार्ल हाशोफर (Karl Haushofer) अत्यन्त प्रभावशाली था। उसने अपनी भू-राजनीति की विचारधारा को अपनी पुस्तक ‘मीन कैम्फ’ (Mein Kampf) में प्रस्तुत किया था।

(vi) प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography):-

        प्रादेशिक भूगोल का विकास रिटर द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ ‘अर्डकुण्डे’ से हुआ। रेटजेल के ‘मानव भूगोल’ व ‘मानव जाति का इतिहास’ आदि ग्रन्थों में विभिन्न देशों व प्रदेशों के अध्ययन किए गए थे। वॉन रिचथोफेन के ग्रन्थों में चीन के प्रादेशिक वर्णन मानचित्रों के साथ दिए गए थे।

       1925 में जर्मन सरकार ने अनेक भूगोलवेत्ताओं को खर्चा देकर भौगोलिक अन्वेषणों के लिए विदेश भेजा। लौटकर उन्होंने वहाँ के प्रादेशिक वर्णन लिखे।

(vii) अवस्थिति सिद्धान्तों का प्रतिपादन (Location theories):-

       जर्मनी में अनेक अवस्थिति सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया-

(क) वॉन थूनेन का कृषिवलय सिद्धान्त-

    वॉन थूनेन ने कृषि के स्थानीकरण का सिद्धान्त प्रस्तुत किया था। कोई भी कृषक वही फसल उत्पन्न करता है जिससे उसे सर्वाधिक लाभ होता है। किसी नगर के चारों ओर कृषि फसलों का स्थानीयकरण सकेन्द्रीय वृत्त खण्डों के रूप में होगा। प्रथम वलय में शाक, दुग्ध; द्वितीय में ईंधन की लकड़ी का उत्पादन, तृतीय में खाद्यान्न उत्पादन बिना परती भूमि छोड़े, चतुर्थ में खाद्यान्न परती भूमि छोड़कर व पंचम वलय में चरागाह होगा। वॉन थूनेन ने परिवहन लागत को बहुत अधिक महत्व दिया था।

(ख) वेबर का उद्योग अवस्थिति सिद्धान्त-

       अल्फ्रेड वेबर (Alfred Weber) जर्मन अर्थशास्त्री था। 1909 में उसने उद्योगों की अवस्थिति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। वेबर ने किसी उद्योग की स्थापना में परिवहन लागत, श्रम व एकत्रीकरण के प्रभाव को प्रदर्शित किया है।

(ग) क्रिस्ट्रालर के केन्द्रीय स्थिति सिद्धान्त-

      वाल्टर क्रिस्ट्रालर (Walter Christraller) आर्थिक भूगोलवेत्ता था। उसने नगरों व व्यापारिक केन्द्रों पर परिवहन, पारस्परिक क्रिया तथा मध्यवर्ती अवसर के प्रभावों व उनके परिणामों को विश्लेषित किया है।

(viii) लैण्डशॉफ्ट का अध्ययन (Study of Landchaft):-

     जर्मन विचारधारा के अनुसार भूगोल वह विज्ञान है, जिसमें ‘लैण्डशॉफ्ट’ का अध्ययन होता है। ‘लैण्डशॉफ्ट’ जर्मन भाषा का शब्द है। इसका अर्थ दृश्य, प्रदेश व प्रदेश की विशेषताएं हैं।

(ix) भूगोल की शाखाओं का विशेषीकरण (Specialization of Branches of Geography):-

      अठारहवीं सदी में ही कान्ट ने भूगोल की शाखाओं का वर्गीकरण कर दिया था। उन्नीसवीं सदी में रिटर व हम्बोल्ट ने इसको और अधिक स्पष्ट किया। साथ ही उन्होंने इसका विशेषीकरण करना भी प्रारम्भ किया। बीसवीं सदी के मध्य से इस दिशा में विशेष कार्य किया गया है। भूगोल की शाखाओं का विशेषीकरण इस प्रकार किया गया है कि प्रत्येक शाखा एक स्वतंत्र विज्ञान भी हो गई है। जैसे जलवायु विज्ञान, मृदा विज्ञान, भू-भौतिकी, भू-गणित, स्वास्थ्य भूगोल, कृषि भूगोल, परिवहन भूगोल, सैन्य भूगोल, आचरण भूगोल, वाणिज्य भूगोल, आदि।

11. मानवतावादी भूगोल या मानवतावाद एवं कल्याण उपागम 

11. मानवतावादी भूगोल या मानवतावाद एवं कल्याण उपागम



मानवतावादी भूगोल ⇒

         भूगोल के विषय वस्तु को विकसित करने के लिए अनेक उपागम विकसित किये गये। भूगोल में इस उपागम की शुरूआत 1960-70 के दशक के बीच माना जाता है। ‘मानवतावादी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1976 में ‘तुआन’ ने किया था। भूगोल में इस उपागम का जन्म मात्रात्मक भूगोल, प्रत्यक्षवाद और क्षेत्रीय विश्लेषण जैसे उपागम के विरुद्ध हुआ। यह उपागम मात्रात्मक क्रान्ति के विरुद्ध है क्योंकि मात्रात्मक क्रांति में मानवीय विषय तथा मानवीय मुद्दे (जैसे- मानवीय मूल्य, प्रथा, परम्परा, सामाजिक संस्था, सौंदर्य, बोध, प्रेम, घृणा) जैसे तथ्यों का अध्ययन नहीं करता है जबकि ये भूगोल के ही विशिष्ट विषय-वस्तु है।

           मानवतावादी भूगोल प्रत्यक्षवाद के भी विरुद्ध है क्योंकि प्रत्यक्षवाद उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे आँखों से देखा जा सके। लेकिन मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम वैसे तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे मात्र अनुभव किया जा सके।

मानवतावादी भूगोल

        मानवतावाद एवं कल्याणकारी भूगोल की एक ऐसी उपागम है जिसके अंतर्गत निम्नलिखित तथ्यों के ऊपर ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

(1) यह उपागम मानव को एक सक्रिय एवं केन्द्रीय उपागम मानते हुए भूगोल का अध्ययन करता है। यह उपागम मानव के विभिन्न संस्थाओं, मानवीय जागरूकता, मानव की क्रियाशीलता, मानव की बौद्धिकता इत्यादि का अध्ययन करता है।

(2) यह उपागम भूगोल का अध्ययन सम्पूर्णता से करके मानव कल्याण की दिशा निर्धारित करना चाहता है।

(3) यह एक ऐसा दर्शन है, जो वैज्ञानिक जाँच के पूर्व विश्व के रहस्यों को उद्घाटित करता है।

(4) मानवतावादी भूगोल किसी स्थान या स्थलाकृति का केवल मूर्त अध्ययन नहीं करता है बल्कि उसके कार्य एवं कारण का भी अध्ययन करता है।

           भूगोल में मानवतावादी भूगोल एवं कल्याणकारी भूगोल शुरुआत करने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है। इसके अलावे फ्रांसीसी भूगोलवेता फेब्रे एवं ब्लाश भी इसके बड़े समर्थक रहे हैं। आधुनिक संदर्भ में गुल्के एनी बंटीमर और यी-फू तुआन जैसे भूगोलवेता इसके सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। इसके अलावे व्यवहारवादी भूगोल / आचारपरक भूगोलवेता विलियम किर्क, फेनोमेनोलोजी के समर्थक कार्लसावर एवं टेल्फ जैसे भूगोलवेता भी इसके समर्थक रहे हैं।

           गुल्के महोदय ने इस उपगम का समर्थन करते हुए कहा है कि “मानसिक क्रियाशीलता का नियंत्रण पदार्थ एवं क्रियाशीलताओं से नहीं हो सकता वरन विश्व को अप्रत्यक्ष रूप से विचारों को जाना जा सकता है जो अन्त: व्यक्ति के विषयगत अध्ययन पर आधारित होता है। जैसे-

          एनीबंटीगर अपने पुस्तक “The challange of Geographic Humanic in Humanistic Geographic” में कहा है कि “किसी घटना तथा वहाँ के लोगों का अध्ययन उनके निकट जाकर किया जाना चाहिए न कि दूर हटकर तभी उनके समस्याओं को जानकर आप कल्याण की बात कर सकते हैं।

मानवतावादी भूगोल

यी-फू तुआन

     यी-फू तुआन महोदय ने अपने पुस्तक “Geography, Phenomenology & the study of Human Nature” में कहा है कि मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम मानव भूगोल का दर्पण है जो मानव अस्तित्व तथा जीवन के सार को बताता है। इस तरह मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम को विकसित करने में कई भूगोलवेताओं का योगदान रहा है।

       यह एक ऐसा उपागम है जो भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल के बीच अन्तर स्थापित करता है तथा जो केवल सहयोगी अवलोकन पर विशेष ध्यान देता है। लेकिन सहयोगी अवलोकन के आधार पर भूगोल में सिद्धांत का निर्माण, निष्कर्ष निकालते का कार्य इत्यादि नहीं किया जा सकता। मानवतावादी भूगोल, भूगोल के विधितंत्र से संबंधित नहीं है बल्कि मानव भूगोल को समझते हेतु एक नई दृष्टिकोण देता है।

आलोचना

           मानवतावाद एवं कल्याकारी उपागम का कई आधारों पर आलोचना भी की जाती है। जैसे:-

(i) यह मानवीय गुणों के प्रति अत्याधिक संवेदनशील होता है।

(ii) यह उपागम मॉडल निर्माण, सिद्धांत निर्माण, स्थानीयकाण विश्लेषण, भूमि उपयोग जैसे तथ्यों के समझने या व्याख्या करने में मदद नहीं करता है।

(iii) 1976 ई० में इन्द्रीकीन महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि यह एक उपदेश देने वाला उपागम है न कि मात्रात्मक क्रांति जैसे अन्य उपागम की तरह मानव भूगोल के अध्ययन का वैकल्पिक प्रारूप प्रस्तुत करता है।



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