4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4
सम्पूर्ण शिक्षा मनोविज्ञान
4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4
एक नजर में इन्हें जरुर देखें

सम्पूर्ण शिक्षा मनोविज्ञान

सम्पूर्ण शिक्षा मनोविज्ञान
एक नजर में इन्हें जरुर देखें-
अधिगम (सीखना):
अधिगम शिक्षा मनोविज्ञान का ही मुख्य घटक है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। क्योंकि शिक्षा का सर्वप्रथम उद्देश्य ही सीखना है। हम सभी जानते है कि मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखना ही है। घर, स्कूल एवं अपने आस-पास के वातावरण से मनुष्य कुछ न कुछ निरंतर सीखता ही रहता है और अपना सर्वांगीण विकास करता है।
उदाहरण के लिए छोटे बालक के सामने जलता हुआ दीपक ले जाने पर वह दीपक की लौ को पकड़ने का प्रयास करता है। इस प्रयास में उसका हाथ जलने लगता है। वह हाथ को पीछे खींच लेता है। पुनः जब कभी उसके सामने जलता हुआ दीपक लाया जाता है तो वह अपने पूर्व अनुभव के आधार पर लौ पकड़ने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता है बल्कि वह उससे दूर हो जाता है। इसी विचार को स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करना कहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अनुभव के आधार पर बालक के स्वाभाविक व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। अधिगम का सर्वोत्तम सोपान अभिप्रेरणा है।
सीखने की भूमिका
सीखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, व्यक्ति जन्म से ही सीखना प्रारम्भ कर देता है और मृत्यु पर्यन्त सीखता रहता है।
अधिगम का प्रत्यय
अधिगम से अभिप्राय अनुभवों के द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया से है।
➡सीखना किसी क्रिया/स्थिति के प्रति – सक्रिय प्रतिक्रिया /अनुक्रिया
अधिगम सम्बन्धित परिभाषाये:-
➡ स्किनर:- ” सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।”
➡वुडवर्थ:- “नवीन ‘ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।”
➡गेट्स :- “सीखना अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन है।”
➡क्रो एण्ड क्रो :- ‘सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।”
अधिगम की विशेषताऐं:-
➡अधिगम जीवन-पर्यन्त चलता है।
➡अधिगम उद्देश्य पूर्ण है।
➡अधियम व्यवहार में परिवर्तन लाता है।
➡अधिगम विकास है।
➡अधिगम अनुकूलन है।
➡अधिगम सार्वभौमिक है।
➡अधिगम विवेकपूर्ण है।
➡अधिगम निरन्तर है।
➡अधिगम खोज एवं परिवर्तन है।
➡अधिगम सक्रिय प्रक्रिया है।
➡अधिगम व्यक्तिगत व सामाजिक होता है।
➡अधिगम एक नया कार्य है।
➡अधिगम अनुभवों का संगठन है।
➡अधिगम वातावरण की उपज है।
➡अधिगम समायोजन है।
अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक व दशाएँ
➡वातावरण
➡प्रेरणा
➡परिपक्वता
➡बालकों का स्वास्थ्य
➡सीखने की इच्छा
➡शिक्षण प्रक्रिया
➡विषय सामग्री का स्वरूप
➡सीखने की विधि
➡सम्पूर्ण परिस्थिति
➡सीखने का समय व थकान
अधिगम के सिद्धान्त:-
रायबर्न के अनुसार – “यदि शिक्षण विधियों में नियमों व सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाता है, तो सीखने का कार्य अधिक संतोषजनक होता है। “
थार्नडाइक के अधिगम सम्बन्धी नियम –
थार्नडाइक ने कुल 8 नियम दिये जिसमें तीन प्रमुख व पाँच गौण या सहायक नियम दिये।
थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी तीन प्रमुख नियम:–
1. तत्परता का नियम:- “यदि हम किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहे तो काम तत्काल तथा आसानी से हो जायेगा।” उदाहरण – घोड़े को पानी के तालाब तक ले जाया तो जा सकता है, लेकिन पीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि घोड़ा पानी पीने के लिए तत्पर नहीं है।
2. अभ्यास का नियम:- ” इसे प्रयोग/अनुप्रयोग का नियम भी कहते हैं, ज्ञान को स्थायी करने के लिए अभ्यास करना अति आवश्यक है।”
किसी कवि ने कहा है –
“करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर होत निशान”
➡उपयोग का नियम:- ‘यदि कोई कार्य पहले किया गया है और अब उसको दुबारा किया जाता है तो वह हमारे मस्तिष्क में पुनः आ जाता है और ज्ञान स्थायी हो जाता है।’
➡अनुप्रयोग का नियम:- “यदि किसी किये हुए कार्य को पुनः नहीं करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसे भुला देता है।”‘
3. प्रभाव संतोष असंतोष अथवा परिमाण का नियम :-
“यदि किसी कार्य को करने पर हमे संतोष प्राप्त होता है, वो हम उस कार्य को दुबारा करेंगे और यदि कार्य को करने पर हमे असंतोष होता है तो हम उस कार्य को दुबारा नहीं करेंगें।”
थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी पाँच गौण या सहायक नियम
1. बहुप्रतिक्रिया का नियम:- कोई नया कार्य करने के लिए कई प्रकार की प्रतिक्रियाओं को अपनाया जाता है तथा उसमें से सही प्रतिक्रिया का पता लगाकर भविष्य में काम किया जाता है। (ज्ञात से अज्ञात की ओर)
2. मनोवृत्ति का नियम:- किसी कार्य को जिस मनोवृत्ति से (मन/मेहनत) में करेंगे हमे वैसी ही सफलता मिलेगी।
3. आंशिक क्रिया का नियम:- जब किसी कार्य को छोटे-छोटे भागों में बांटकर किया जाता है तो उस कार्य में सफलता प्राप्ति सुगम व सरल हो जाती है। (अंश से पूर्ण की और)
4. आत्मीकरण का नियम :- कोई नया कार्य करने पर उसमें किसी पुराने किये गये कार्य का ज्ञान मिला देना आत्मीकरण प्रक्रिया अधिगम से उसका स्थायी अंग बना लिया जाता है। (ज्ञात से अज्ञात की ओर)
5. साहचर्य परिवर्तन का नियम:- इस नियम में किसी कार्य को पूर्ण करने की क्रिया विधि तो पूर्ववत रखी जाती है, लेकिन परिस्थितियों में परिवर्तन कर दिया जाता है। उदाहरण :- पावलब का कुत्ता

नोट : मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।
Thank You @ By Dr. Amar Kumar
Education (शिक्षा)
शिक्षा एक जीवनपर्यन्त चलने वाली बालक के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया है, जिसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। यह देश, काल व स्थान आदि के बन्धनों से मुक्त होती है। अर्थात वास्तव में शिक्षा एक अनियंत्रित वातावरण है, जिसमें रहते हुए बालक स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी प्रकृति एवं क्षमता के अनुसार विभिन्न अनुभवों को प्राप्त करते हुए सीखता है।
एक नजर में इन्हें जरुर देखें-
➡शिक्षा शब्द की उत्पत्ति ‘शिक्ष’ धातु से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ सीखने, ज्ञान ग्रहण करने या विद्या प्राप्त करने से है।
➡शिक्षा शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर शब्द Education है। Education शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा एडुकेट ‘Educatum’से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षण कार्य करना।
➡कई विद्वानों के अनुसार Education शब्द की उत्पत्ति ‘Educare’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है – पालन पोषण और विकसित करना।
➡ इस प्रकार Education शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Educatum शब्द से हुई है जिसमें E मतलब अन्दर से, Duco मतलब बाहर निकालना। अर्थात शिक्षा का अर्थ होता है, बालक के अन्तर्निहित योग्यताओं को बाहर निकाल कर उसके व्यवहार में परिवर्तन करना है।
शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति:
➡शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है।
➡इसमें नियम व सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है।
➡ शिक्षा मनोविज्ञान अतीत की अपेक्षा वर्तमान की घटनाओं से, क्या और क्यों से सम्बन्धित है।
➡ इसके नियम व सिद्धान्त सार्वभौमिक होते हैं।
➡इसके द्वारा भविष्यवाणी की जा सकती है।
➡किसी भी वैज्ञानिक पद्धति में हम उसका अध्ययन करते हैं, जिसक निरीक्षण किया जाता है।
➡शिक्षा मनोविज्ञान व्यवहार का अध्ययन करता है, इसका निरीक्षण किया जा सकता है।
➡ शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहारात्मक पक्ष का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है।
➡शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।
➡शिक्षा मनोविज्ञान एक सकारात्मक विद्यालय विज्ञान है, जो शिक्षा के कब, कैसे, और कहाँ आदि प्रश्नों के उत्तर पर ध्यान केन्द्रित करता है।
शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता :
➡स्वयं को पहचानने में सहायक।
➡बालक को पहचानने में सहायक।
➡मूल्यांकन की नई-नई विधियों का प्रयोग करना।
➡शिक्षक के दृष्टिकोण को उन्नत व व्यापक बनाने में सहायक।
➡ किसी भी प्रकार की कक्षा में शैक्षणिक प्रस्तुतियां जागृत करने में सहायक।
➡बालको के प्रति प्रेम, सहानुभूति व समदृशी भाव अपनाने में।
➡बालकों के चहुमुखी विकास के लिए उचित शिक्षण विधियों अपनाने में सहायक।
➡बालकों को अभिप्रेरित करते हुए उनमें रुचि जागृत करना।
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शिक्षा मनोविज्ञान
शिक्षा मनोविज्ञान’ दो शब्दों से मिलकर बना है- पहला- ‘शिक्षा’ और दूसरा- ‘मनोविज्ञान’। इस प्रकार शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ शिक्षा संबंधी मनोविज्ञान से है। दूसरे शब्दों में, शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का ही व्यावहारिक रूप है और शिक्षा की प्रक्रिया में मानव व्यवहार का सम्पूर्ण अध्ययन करने वाला विज्ञान है।
➡ शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में माना जाता था।
➡ विलियम जेम्स ने दर्शनशास्त्र से मनोविज्ञान को मुक्त कराया। इसलिए मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स को माना जाता है।
➡ मनोविज्ञान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रूडोल्फ गोयल ने किया।
➡ मनोविज्ञान को स्वतन्त्र विषय बनाने के लिए मनीषियों द्वारा इसे परिभाषित करना आरम्भ किया गया।
➡ गेरेट के अनुसार PSYCHOLOGY शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के दो शब्दों PSYCHE और LOGOS से मिलकर हुई हैं।
➡ यहाँ PSYCHE का अर्थ :- आत्मा तथा LOGOS का अर्थ – अध्ययन करना है।
➡ 16वीं शताब्दी में सर्वप्रथम आत्मा को आधार मानकर प्लेटो, अरस्तु और डेकार्डे के द्वारा मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना गया।
➡ आत्मा शाब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अन्त में यह परिभाषा अमान्य हो गयी।
➡ 17वीं शताब्दी में इटली के मनोविज्ञानी पॉम्पोनोजी व थासडरीन इसे मन तथा मस्तिष्क का विज्ञान माना। बाद में यह परि भाषा भी अपूर्ण अर्थ के कारण अमान्य कर दी गयी।
➡ 19वीं शताब्दी में विलियम वुण्ट, विलियम जेम्स ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान माना और अपने अपूर्ण अर्थ की वजह से यह भी अमान्य कर दी गयी।
➡ 20वीं शताब्दी में वाटसन, थार्नडाइक, स्किनर तथा मेग्डुगल इत्यादि ने मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना जो आज तक प्रचलित है।
➡ भारत में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला सेन गुप्त के द्वारा 1915 ई0 में कलकत्ता शहर में स्थापित की गयी।
➡ जर्मनी के लिपजिंग शहर में विलियम वुण्ट के द्वारा 1879 ई० में ‘कार्लमार्क्स विश्विद्यालय में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोग शाला स्थापित की गयी।
➡ विलियम वुण्ट को प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
➡ वुडवर्थ के अनुसार – “मनोविज्ञान में सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर मन व मस्तिष्क का त्याग किया और फिर उसने अपनी चेतना का त्याग किया तथा तब आज वर्तमान में मनोविज्ञान व्यवहार के विधि स्वरूप स्वीकार करता है।”
➡ वाटसन का कथन – ‘तुम मुझे एक बालक दो मैं उसे वो बना सकता हूँ जो मैं बनाना चाहता हूँ।”
➡ मनोविज्ञान की शाखा शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पत्ति 1900 ई० में मानी जाती है। बाद में थार्नडाइक, जड़, टरमन, प्रोबेल, हरबल आदि के प्रयासों से 1920 ई0 में शिक्षा मनोविज्ञान को स्पष्ट स्वरूप प्राप्त हुआ।
➡ प्रथम शैक्षिक मनोविज्ञानिक थार्नडाइक को माना जाता है।
➡ शिक्षा में मनोवैज्ञानिक दृष्टि का सूत्रपात रूसो ने किया। रूसो ने अपनी पुस्तक E-mail में लिखा- “शिक्षा संस्कृत के शिक्ष धातु से बना है।”
➡ स्किनर के अनुसार- “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों की तैयारी की आधार शिला है।”
➡रूसो- “बालक एक पुस्तक के समान है जिसका अध्ययन प्रत्येक अध्यापक को करना चाहिए।”
➡फ्रॉबेल- “शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक बालक अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास करता है।”
➡क्रो एण्ड क्रो- “शिक्षा मनोविज्ञान जन्म से वृद्धावस्था तक किसी भी व्यक्ति के सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”
➡स्किनर-“मनोविज्ञान शिक्षा का आधार भूत विज्ञान है।
➡ट्रो- “शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक प्रस्तुतियों का मनोवैज्ञानिक ‘दृष्टि से अध्ययन है।”
➡ब्राउन- “शिक्षा वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के व्ययवहारों में परिवर्तन होता है।”
➡विवेकानन्द- “अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति प्रदान करना ही शिक्षा है।”
➡महात्मा गांधी- “शिक्षा से अभिप्राय बालक या मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्तम विकास से है।”
नोट : मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।
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