4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4 / सम्पूर्ण शिक्षा मनोविज्ञान

 4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4

सम्पूर्ण शिक्षा मनोविज्ञान


4. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 4

एक नजर में इन्हें जरुर देखें
अधिगम के सिद्धान्त
            अधिगम मलतब कि “सीखना” एक कला है, परन्तु अधिगम एक प्रक्रिया भी है। जब आप किसी काम को करने की इच्छा रखते हैं, तो आपको उससे पहले उस कार्य को सीखना पड़ता है। उस कार्य को सीखने के लिए आपको एक निश्चित कर्म से या पद्धति से गुजरना होगा, इसे ही अधिगम कहा जाता हैं। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने सीखने की कुछ सिद्धांत भी निर्धारित किए है। अतः किसी भी उद्दीपक के प्रति क्रमबद्ध प्रतिक्रिया की खोज को ही अधिगम का सिद्धांत कहते हैं।
“पावलव ने कुत्ता छोड़ा, थार्नडायिक की बिल्ली पर। 
स्किनर का चूहा मर गया, कोहलर के चिम्पैंजी पर।”
पावलव  का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त
प्रतिपादक – IP पावलव/ शरीर शास्त्री
निवासी – रूस
सिद्धान्त – 1904
नोबेल पुरुस्कार – 1904
प्रयोग  – कुत्ते पर
प्रमुख संकेत 
U.C.S.- UNCONDITIONAL SITIMULUS (स्वभाविक उददीपक अर्थात भोजन)
C.S.-  CONDITIONAL SITIMULUS (अस्वभाविक उददीपक  अर्थात  घण्टी की आवाज)
U.C.R.- UNCONDITIONAL RESPONSE (स्वभाविक अनुक्रिया अर्थात  लार)
C.R. – CONDITIONAL RESPOSE (अस्वभाविक अनुकूलित अनुक्रिया र्अथात अनुबंधित)
पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त :-   इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1904 में पावलन ने एक कुत्ते पर किये प्रयोग से किया। प्रारम्भ में पावलव ने पाया कि भूखे कुत्ते को भोजन दिखाने से उसके मुँह में लार आ जाना स्वभाविक क्रिया है।  बाद में पावलव ने कई दिनो तक कुत्ते को घण्टी बजाकर खाना दिया। (घण्टी +खाना) प्रक्रिया कई दिनो तक दोहराने से पाया कि खाना एवं घण्टी के मध्य सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है एवं लार टपकना स्वभाविक क्रिया होती है।
                 पावलव ने इसके बाद घण्टी बजाई परन्तु खाना साथ में नहीं दिया तथा देखा कि कुत्ता स्वभाविक क्रिया (लार) करता है। 
पावलव के इस प्रयोग हम निम्न 3 चरणों में समझ सकते हैं-
प्रथम चरण = अनुकूलन से पूर्व ⇒  स्वभाविक उददीपक (भोजन) U.C.S अनुबंधित उद्दीपक ⇒ स्वभाविक अनुक्रिया (लार) अनानुबंधित अनुक्रिया U.C.R.
द्वितीय चरण  = अनुकूलन के दौरान ⇒ अस्वभाविक उद्दीपक (घण्टी ) C.R. ⇒ स्वभाविक उद्दीपक (भोजन) U.C.S. अनानुबंधित उददीपक ⇒ स्वभाविक अनुक्रिया (लार) अनानुबंधित अनुक्रिया U.C.R.
तृतीय चरण = अनुकूलन के बाद ⇒ अस्वभाविक उद्दीपक (घण्टी) C.S. अनुबंधित उद्दीपक ⇒ स्वभाविक अनुक्रिया (लार) अनुबंधित व C.R. अनुकूलित अनुक्रिया
Note : अनुकूलित अनुक्रिया:- अस्वभाविक उद्दीपक के प्रति स्वभाविक अनुक्रिया होना। 
पावलव अनुक्रिया सिद्धान्त के उपनाम
➡ शरीर शास्त्री का सिद्धान्त 
➡ शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धान्त
➡ क्लासिकल सिद्धान्त / अनुबंधन
➡ अनुबंधित अनुक्रिया का सिद्धान्त 
➡ सम्बन्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त
➡ अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धान्त  
➡ अस्वभाविक अनुक्रिया का सिद्धान्त
पावलव अनुक्रिया सिद्धान्त का शैक्षिक महत्व – 
➡ भय निवारण में सहायक 
➡ सामाजीकरण में सहायक 
➡ अनुशासन विकसित करने में सहायक 
➡ गणित शिक्षण में सहायक
➡ अभिवृत्ति विकास में सहायक
➡ स्वभाव व आदत निर्माण में सहायक 
थार्नडाइक के सीखने के सिद्धान्त
प्रतिपादक – थार्नडाइक
वर्ष – 1913 ई० 
निवासी – U.S.A. (अमेरिका)
प्रयोग – बिल्ली पर (भूखी)
उद्दीपक – मांस/मछली का टुकड़ा
BOOK – Education Psychology
➡ अपने प्रयोग मे थार्नडाइक में एक भूखी बिल्ली को पिंजड़े में बन्द कर दिया और पिंजड़े के बाहर भोज्य सामग्री रख दी। बिल्ली के लिए भोजन उद्दीपक था, उद्दीपक के कारण उसमे प्रतिक्रिया आरम्भ हुई। बिल्ली ने बाहर निकलकर भोजन प्राप्त करने के लिए कई प्रयास किये, और पिंजड़े के अन्दर चारों ओर घूमकर कई पंजे मारे। प्रयत्न करते करते उसने अचानक उस तार को खींच लिया जिससे पिंजड़े का दरवाजा खुलता था। दोबारा फिर बिल्ली को बन्द करने पर उसे बाहर आने के लिए पहले से कम समय में सफलता मिल गयी। इसी प्रकार तीसरे व चौथे प्रयास में और भी कम प्रयत्नों में सफलता मिल गई। अंततः एक परिस्थिति आई जब वह एक बार में ही दरवाजा खोलकर बाहर आना सीख जाती है। इसलिए थार्नडाइक के इस सिद्धान्त को ‘प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त’ भी कहा जाता है।
NOTE-
           एक विशेष स्थिति / उद्दीपक (Stimulus) होता है, जो उसे एक प्रकार की प्रतिक्रिया / अनुक्रिया (Response) करनें के लिए प्रेरित करती हैं।
थार्नडाइक सिद्धान्त के उपनाम
➡ प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त,
➡ प्रयत्न एवं भूल का सिद्धान्त,
➡ आवृत्ति का सिद्धान्त, 
➡ उद्दीपक, अनुक्रिया का सिद्धान्त,
➡ SR BOND का सिद्धान्त, 
➡ सम्बन्ध वाद का सिद्धान्त,
➡ अधिगम का बन्ध सिद्धान्त।
इस प्रकार एक विशिष्ट उद्दीपक का एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया / अनुक्रिया से सम्बन्ध स्थापित होना SR-BOND कहलाता है। 
बिल्ली के समान ही बालक का चलना, चम्मच से खाना, जूते पहनना। 
वयस्क लोग भी ड्राईविंग, टाई की गाँठ, कोई खेल इसी सिद्धान्त के अनुसार सीखते है।
थार्नडाइक सिद्धान्त का शैक्षिक महत्व –
➡ बड़े व मन्दबुद्धि बालकों के लिए उपयोगी।
➡ धैर्य व परिश्रम के गुणों का विकास। 
➡ सफलता के प्रति आशा।
➡ कार्य की स्पष्ट धारणा।
➡ शिक्षा के प्रति रुचि।
➡ गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र आदि विषयों के लिए उपयोगी। 
➡ अनुभवों से लाभ उठाने की क्षमता का विकास।
स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त
निवासी – U.S.A.
प्रतिपादक – बी. एफ. स्किनर
वर्ष – 1938
प्रयोग – चूहा (1938 व कबूतर 1943)
⇒ यह सिद्धान्त थार्नडाइक के प्रभाव के नियम पर आधारित है।
स्किनर ने अपने आधार पर बताया कि व्यक्ति, प्राणी सीखते समय दो प्रकार के व्यवहार करता है।
(A) एक प्रकार के व्यवहार में उद्दीपक की जानकारी होती है, इसे अनुक्रियात्मक व्यवहार और ज्ञात उद्दीपक के प्रति होने वाली अनुक्रिया प्रकाशित अनुक्रिया कहलाती है।
(B) दूसरे प्रकार के व्यवहार में उद्दीपक की जानकारी नहीं होती है। इसे क्रिया प्रसूत व्यवहार और अज्ञात उद्दीपक के प्रति होने वाली अनुक्रिया निर्गमित या उत्सर्जित क्रिया कहते हैं। 
स्किनर का परीक्षण:-
स्किनर ने अधिगम से सम्बन्धित अपने सिद्धान्त के प्रयोग के लिए एक विशेष बॉक्स बनाया जिसे स्किनर बॉक्स कहा जाता है।
स्किनर ने चूहे को अपने प्रयोग का विषय बनाया। इस बॉक्स में एक लीवर था, जिसके दबते ही खट की आवाज आती थी, इस लीवर का सम्बन्ध एक प्लेट से था, जिसमें खाने का टुकड़ा आ जाता था।
          वह खाना उसकी क्रिया के लिए पुनर्बलन का कार्य करता था। इस प्रयोग में चूहा भूखा होने पर बॉक्स के लीवर को दबाता, और उसे भोजन मिल जाता था।
इसी आधार पर स्किनर ने कहा कि यदि किसी क्रिया के बाद ‘लिवर’ कोई बल प्रदान करने वाला उद्दीपक ‘भोजन’ प्राप्त हो जाता है तो उस क्रिया की शक्ति में वृद्धि हो जाती है।
स्किनर का मत:–
(i) यदि इस प्रकार अनुक्रियाओं को पुनर्बलित कर दिया। जाये तो वे बलवति हो जाती है, और व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाती है।
(ii) अनुक्रिया के लिए सदैव उद्दीपक का होना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी उद्दीपक की अनुपस्थिति में अनुक्रिया होती है। इसलिए स्किनर के बारे में कहा गया।
इन्होंने परम्परागत थ्योरी (S-R) को (R-S) थ्योरी में परिवर्तित कर दिया है।
स्किनर सिद्धान्त का शैक्षिक महत्व:-
➡ अवांछित व्यवहारों को नकारात्मक पुनर्बलन प्रदान करके रोका जा सकता है।
➡ विद्यार्थी को तत्काल पुनर्बलन देना चाहिए। 
➡ शिक्षार्थी का परिणाम शीघ्रातिशीघ्र घोषित करना चाहिए।
➡ अभिक्रमित अनुदेशन, कम्प्यूटर सहायक, शिक्षण मशीन आदि में पुनर्बलन देने के लिए इसी सिद्धान्त का प्रयोग किया जाता है।
➡ अध्यापक छात्रों के वांछित व्यवहार को प्रशंसा पुरुस्कार प्रोत्साहन व अपनी सहमति से पुनर्बलित कर दे तो ‘विद्यार्थी ऐसे व्यवहार को बार-बार करना चाहेगा।
स्किनर सिद्धान्त के उपनाम :-
➡ R-S सिद्धान्त
➡ सक्रिय अनुबंध का सिद्धान्त
➡ व्यवहारिक सिद्धान्त  
➡ नेमेन्तिक वाद का सिद्धान्त
➡ कार्यात्मक प्रतिबद्धता का सिद्धान्त
अभिक्रमित अनुदेशन
➡ एक रेखिय अभिक्रमित अनुदेशन:-
प्रतिपादक – BF स्किनर 
वर्ष – 1952
शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन:-
प्रतिपादक- नार्मन ए क्राउड
वर्ष – 1960
मैथेमेटिक्स या अवरोधी अभिक्रमित अनुदेशन:-
प्रतिपादक – थामस एफ गिलबर्ट
वर्ष – 1962
नोट : भारत में पहली बार प्रयोग इलाहबाद में सन् 1969 में किया गया।
कोहलर का अर्न्तदृष्टि या सूझ का सिद्धान्त:-
प्रतिपादक – कोहलर, मेलस वर्दीमर
प्रयोग कर्ता – कोहलर (1912)
प्रयोग – चिम्पैजी/वनमानुस/सुल्तान 
वर्ष – 1912
प्रसिद्ध 1920
सहयोगी- कोफ्का
गैस्टालवाद- जर्मन भाषा का शब्द (सम्पूर्ण से अंश की ओर)
➡ गैस्टालवादियों के अनुसार सीखना प्रयास व त्रुटि के द्वारा न होकर सूझ के द्वारा होता है।
➡ सूझ से तात्पर्य अचानक उत्पन्न होने वाले एक ऐसे विचार से है, जो किसी समस्या का समाधान कर दें।
➡ सूझ द्वारा सीखने के अन्तर्गत प्राणी परिस्थितियों का भली प्रकार से अवलोकन करता है, तत्पश्चात अपनी प्रक्रिया/प्रतिक्रिया देता है।
➡ सूझ द्वारा सीखने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है, और इस प्रकार के अधिगम में मस्तिष्क का सर्वाधिक प्रयोग होता है।
कोहर सिद्धान्त के उपनाम:-
➡ गेस्टाल का सिद्धान्त
➡ समग्रकार सिद्धान्त
➡ कोहलर का सिद्धान्त
➡ अन्तर्दृष्टि/सूझ का सिद्धान्त
जीन पियाजे का संज्ञानवादी सिद्धान्त
निवासी – स्विटजरलैण्ड
सहयोगी – बारबेल इन्हेलडर
➡ जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते हुए संज्ञानवादी विकास का प्रतिपादन किया इसलिए जीन पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
➡ विकास प्रारम्भ होता है गर्भावस्था से जबकि संज्ञान विकास शैशवावस्था से प्रारम्भ होकर जीवन पर्यन्त चलता है।
➡ जीन पियाजे में मानव संज्ञान विकास चार अवस्थाओं में समझाया है-
(i) संवेदी पेशिय अवस्था (0-2 वर्ष)
(ii) पूर्व सक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष)
(iii) मूर्त सक्रियात्मक अवस्था (7- 11 वर्ष)
(iv) औपचारिक सक्रियात्मक अवस्था (12-15 वर्ष)
(i) संवेदी पेशिय अवस्था (0-2 वर्ष) – 
➡ इसे इन्द्रिय जनित अवस्था भी कहते हैं। इस अवस्था में शिशु अपनी संवेदनाओं व शारीरिक क्रियाओं के द्वारा सीखता है।
➡ वह वस्तुओं को देखकर, सुनकर, स्पर्शकर, गन्ध तथा स्वाद के माध्यम से ज्ञान ग्रहण करता है।
➡ इस अवस्था में शिशु अपने हाथ-पैरो को चलाना व शब्दों को बोलना सीख जाता है।
(ii) पूर्व सक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष) – 
➡ इस अवस्था में शिशु दूसरों के सम्पर्क व खिलौनो तथा अनुकरण के माध्यम से सीखता है।
➡ अक्षर लिखना, गिनती गिनना, रंग की पहिचान करना, हल्का भारी बताना इत्यादि सीख जाता है।
➡ माता-पिता की आज्ञा मानना, नाम बताना, छोटे-छोटे कार्यों में भाग लेना आदि सीख जाता है।
➡ इस अवस्था में बालक तार्किक चिन्तन करने योग्य नहीं होता इसलिए इसे अतार्किक चिन्तन की अवस्था कहते हैं।
(iii) मूर्त सक्रियात्मक अवस्था (7- 11 वर्ष) – 
➡ इसे वैचारिक अवस्था चिन्तन की तैयारी का काल भी कहलाता है। 
➡ इस अवस्था में चिन्तन की शुरूआत हो जाती है, लेकिन उसका चिन्तन केवल मूर्त (प्रत्यक्ष) वस्तुओं तक ही सीमित रहता है। इसलिए इसे मूर्त चिन्तन की अवस्था भी कहते है।
➡ इस अवस्था में बालक दो वस्तुओं के मध्य अन्तर करना, तुलना करना, समानता बताना, सही-गलत में भेद करना आदि सीख जाता है।
➡ इस अवस्था मे बालक दिन, तारीख, वर्ष, महीन आदि बताने के योग्य हो जाता है।
(iv) औपचारिक सक्रियात्मक अवस्था (12-15 वर्ष)
➡ इस अवस्था में किशोर मूर्त के साथ-साथ अमूर्त चिन्तन करने के योग्य भी हो जाता है, इसलिए इसे तार्किक अवस्था भी कहते हैं।
➡ इस अवस्था में चिन्तन करना, कल्पना करना, निरीक्षण करना समस्या, समाधान करना आदि मानसिक योग्यताओं का विकास हो जाता है।
PSYCHOLOGY CAPSULE 4
जीन पियाजे का शिक्षा में योगदान-
➡ बाल केन्द्रित शिक्षा पर बल दिया। 
➡ शिक्षक के पद को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि शिक्षक को बालक की समस्या का निदान करना चाहिए। 
➡ शिक्षा हेतु बालकों को उचित वातावरण प्रदान करना चाहिए।
जी पियाजे ने बुद्धि को जीव विज्ञान की स्कीमा की भाँति बताया है।
स्कीमा- मानसिक संरचना को व्यवहार गत समानान्तर प्रक्रिया जीव विज्ञान में स्कीमा कहलाती है, अर्थात किसी उद्दीपक के प्रति विश्वसनिय अनुक्रिया को स्लीमा कहते है।
नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

3. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 3  / सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान

3. COMPLETE EDUCATIONAL PSYCHOLOGY CAPSULE 3 

सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान


PSYCHOLOGY CAPSULE 3

एक नजर में इन्हें जरुर देखें-

अधिगम (सीखना): 

                        अधिगम शिक्षा मनोविज्ञान का ही मुख्य घटक है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। क्योंकि शिक्षा का सर्वप्रथम उद्देश्य ही सीखना है। हम सभी जानते है कि मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखना ही है। घर, स्कूल एवं अपने आस-पास के वातावरण से मनुष्य कुछ न कुछ निरंतर सीखता ही रहता है और अपना सर्वांगीण विकास करता है। 

             उदाहरण के लिए छोटे बालक के सामने जलता हुआ दीपक ले जाने पर वह दीपक की लौ को पकड़ने का प्रयास करता है। इस प्रयास में उसका हाथ जलने लगता है। वह हाथ को पीछे खींच लेता है। पुनः जब कभी उसके सामने जलता हुआ दीपक लाया जाता है तो वह अपने पूर्व अनुभव के आधार पर लौ पकड़ने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता है बल्कि  वह उससे दूर हो जाता है। इसी विचार को स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करना कहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अनुभव के आधार पर बालक के स्वाभाविक व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। अधिगम का सर्वोत्तम सोपान अभिप्रेरणा है।

सीखने की भूमिका 

                          सीखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, व्यक्ति जन्म से ही सीखना प्रारम्भ कर देता है और मृत्यु पर्यन्त सीखता रहता है।

अधिगम का प्रत्यय 

                          अधिगम से अभिप्राय अनुभवों के द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया से है।

सीखना किसी क्रिया/स्थिति के प्रति – सक्रिय प्रतिक्रिया /अनुक्रिया

अधिगम सम्बन्धित परिभाषाये:-

 स्किनर:- ” सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।”

वुडवर्थ:- “नवीन ‘ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।”

गेट्स :- “सीखना अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन है।”

क्रो एण्ड क्रो :- ‘सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।”

अधिगम की विशेषताऐं:-

अधिगम जीवन-पर्यन्त चलता है।

अधिगम उद्देश्य पूर्ण है। 

अधियम व्यवहार में परिवर्तन लाता है।

अधिगम विकास है।

अधिगम अनुकूलन है। 

अधिगम सार्वभौमिक है।

अधिगम विवेकपूर्ण है।

अधिगम निरन्तर है। 

अधिगम खोज एवं परिवर्तन है।

अधिगम सक्रिय प्रक्रिया है।

अधिगम व्यक्तिगत व सामाजिक होता है। 

अधिगम एक नया कार्य है।

अधिगम अनुभवों का संगठन है। 

अधिगम वातावरण की उपज है।

अधिगम समायोजन है।

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक व दशाएँ

➡वातावरण

प्रेरणा 

परिपक्वता 

बालकों का स्वास्थ्य

सीखने की इच्छा 

शिक्षण प्रक्रिया

विषय सामग्री का स्वरूप

सीखने की विधि 

सम्पूर्ण परिस्थिति

सीखने का समय व थकान 

अधिगम के सिद्धान्त:-

रायबर्न के अनुसार – “यदि शिक्षण विधियों में नियमों व सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाता है, तो सीखने का कार्य अधिक संतोषजनक होता है। “

थार्नडाइक के अधिगम सम्बन्धी नियम –

                                            थार्नडाइक ने कुल 8 नियम दिये जिसमें तीन प्रमुख व पाँच गौण या सहायक नियम दिये।

थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी तीन प्रमुख नियम:

1. तत्परता का नियम:-यदि हम किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहे तो काम तत्काल तथा आसानी से हो जायेगा।” उदाहरण – घोड़े को पानी के तालाब तक ले जाया तो जा सकता है, लेकिन पीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि घोड़ा पानी पीने के लिए तत्पर नहीं है।

2. अभ्यास का नियम:- ” इसे प्रयोग/अनुप्रयोग का नियम भी कहते हैं, ज्ञान को स्थायी करने के लिए अभ्यास करना अति आवश्यक है।”

किसी कवि ने कहा है –

                    “करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर होत निशान”

उपयोग का नियम:- ‘यदि कोई कार्य पहले किया गया है और अब उसको दुबारा किया जाता है तो वह हमारे मस्तिष्क में पुनः आ जाता है और ज्ञान स्थायी हो जाता है।’

अनुप्रयोग का नियम:- “यदि किसी किये हुए कार्य को पुनः नहीं करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसे भुला देता है।”‘

3. प्रभाव संतोष असंतोष अथवा परिमाण का नियम :-

                    “यदि किसी कार्य को करने पर हमे संतोष प्राप्त होता है, वो हम उस कार्य को दुबारा करेंगे और यदि कार्य को करने पर हमे असंतोष होता है तो हम उस कार्य को दुबारा नहीं करेंगें।”

थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित अधिगम सम्बन्धी पाँच गौण या सहायक नियम

1. बहुप्रतिक्रिया का नियम:- कोई नया कार्य करने के लिए कई प्रकार की प्रतिक्रियाओं को अपनाया जाता है तथा उसमें से सही प्रतिक्रिया का पता लगाकर भविष्य में काम किया जाता है।  (ज्ञात से अज्ञात की ओर)

2. मनोवृत्ति का नियम:- किसी कार्य को जिस मनोवृत्ति से (मन/मेहनत) में करेंगे हमे वैसी ही सफलता मिलेगी।

3. आंशिक क्रिया का नियम:- जब किसी कार्य को छोटे-छोटे भागों में बांटकर किया जाता है तो उस कार्य में सफलता प्राप्ति सुगम व सरल हो जाती है। (अंश से पूर्ण की और)

4. आत्मीकरण का नियम :- कोई नया कार्य करने पर उसमें किसी पुराने किये गये कार्य का ज्ञान मिला देना आत्मीकरण प्रक्रिया अधिगम से उसका स्थायी अंग बना लिया जाता है। (ज्ञात से अज्ञात की ओर)

5. साहचर्य परिवर्तन का नियम:- इस नियम में किसी कार्य को पूर्ण करने की क्रिया विधि तो पूर्ववत रखी जाती है, लेकिन परिस्थितियों में परिवर्तन क दिया जाता है। उदाहरण :- पावलब का कुत्ता 

PSYCHOLOGY CAPSULE 3 

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

2. Complete Educational Psychology Capsule 2 / सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान

2. Complete Educational Psychology Capsule 2


Complete Educational Psychology Capsule 2

Psychology Capsule 2Education (शिक्षा)

                     शिक्षा एक जीवनपर्यन्त चलने वाली बालक के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया है, जिसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। यह देश, काल व स्थान आदि के बन्धनों से मुक्त होती है। अर्थात  वास्तव में शिक्षा एक अनियंत्रित वातावरण है, जिसमें रहते हुए बालक स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी प्रकृति एवं क्षमता  के अनुसार विभिन्न अनुभवों को प्राप्त करते हुए सीखता है। 

एक नजर में इन्हें जरुर देखें-

➡शिक्षा शब्द की उत्पत्ति ‘शिक्ष’ धातु से हुई है, जिसका  शाब्दिक अर्थ सीखने, ज्ञान ग्रहण करने या विद्या प्राप्त करने से है।

शिक्षा शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर शब्द Education है। Education शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा एडुकेट ‘Educatum’से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षण कार्य करना।

➡कई विद्वानों के अनुसार Education शब्द की उत्पत्ति ‘Educare’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ  है – पालन पोषण और विकसित करना।

➡ इस प्रकार Education शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Educatum शब्द से हुई है जिसमें E मतलब अन्दर से, Duco मतलब बाहर निकालना। अर्थात शिक्षा का अर्थ होता है, बालक के अन्तर्निहित योग्यताओं को बाहर निकाल कर उसके व्यवहार में परिवर्तन करना है।

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति: 

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है।

इसमें नियम व सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है।

➡ शिक्षा मनोविज्ञान अतीत की अपेक्षा वर्तमान की घटनाओं से, क्या और क्यों से सम्बन्धित है।

 इसके नियम व सिद्धान्त सार्वभौमिक होते हैं।

इसके द्वारा भविष्यवाणी की जा सकती है।

किसी भी वैज्ञानिक पद्धति में हम उसका अध्ययन करते हैं, जिसक निरीक्षण किया जाता है 

शिक्षा मनोविज्ञान व्यवहार का अध्ययन करता है, इसका निरीक्षण किया जा सकता है।

 शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहारात्मक पक्ष का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है।

शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

शिक्षा मनोविज्ञान एक सकारात्मक विद्यालय विज्ञान है, जो शिक्षा के कब, कैसे, और कहाँ आदि प्रश्नों के उत्तर पर ध्यान केन्द्रित करता है।

Complete Educational Psychology Capsule 2

शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता :

स्वयं को पहचानने में सहायक।

बालक को पहचानने में सहायक।

मूल्यांकन की नई-नई विधियों का प्रयोग करना।

शिक्षक के दृष्टिकोण को उन्नत व व्यापक बनाने में सहायक।

 किसी भी प्रकार की कक्षा में शैक्षणिक प्रस्तुतियां जागृत कने में सहायक।

बालको के प्रति प्रेम, सहानुभूति व समदृशी भाव अपनाने में

बालकों के चहुमुखी विकास के लिए उचित शिक्षण विधियों अपनाने में सहायक

बालकों को अभिप्रेरित करते हुए उनमें रुचि जागृत करना। 

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

1. Complete Educational Psychology Capsule 1 / शिक्षा मनोविज्ञान

1. Complete Educational Psychology Capsule 1


Complete Educational Psychology Capsule 1⇒

Psychology Capsule 1

शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा मनोविज्ञान’ दो शब्दों से मिलकर बना है- पहला- ‘शिक्षा’ और दूसरा- ‘मनोविज्ञान’। इस प्रकार शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ शिक्षा संबंधी मनोविज्ञान से है। दूसरे शब्दों में, शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का ही व्यावहारिक रूप है और शिक्षा की प्रक्रिया में मानव व्यवहार का सम्पूर्ण अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

एक नजर में इन्हें जरुर देखें

➡ शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में माना जाता था।

➡ विलियम जेम्स ने दर्शनशास्त्र से मनोविज्ञान को मुक्त कराया। इसलिए मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स को माना जाता है।

➡ मनोविज्ञान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रूडोल्फ गोयल ने किया।

➡ मनोविज्ञान को स्वतन्त्र विषय बनाने के लिए मनीषियों द्वारा इसे परिभाषित करना आरम्भ किया गया।

➡ गेरेट के अनुसार PSYCHOLOGY शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के दो शब्दों PSYCHE और LOGOS से मिलकर हुई हैं।

➡ यहाँ PSYCHE का अर्थ :- आत्मा तथा LOGOS का अर्थ – अध्ययन करना है।

➡ 16वीं शताब्दी में सर्वप्रथम आत्मा को आधार मानकर प्लेटो, अरस्तु और डेकार्डे  के द्वारा मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना गया। 

➡ आत्मा शाब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अन्त में यह परिभाषा अमान्य हो गयी।

➡ 17वीं शताब्दी में इटली के मनोविज्ञानी पॉम्पोनोजी व थासडरीन इसे मन तथा मस्तिष्क का विज्ञान माना। बाद में यह परि भाषा भी अपूर्ण अर्थ के कारण अमान्य कर दी गयी।

➡ 19वीं शताब्दी में विलियम वुण्ट, विलियम जेम्स ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान माना और अपने अपूर्ण अर्थ की वजह से यह भी अमान्य कर दी गयी।

➡ 20वीं शताब्दी में वाटसन, थार्नडाइक, स्किनर तथा मेग्डुगल इत्यादि ने मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना जो आज तक प्रचलित है।

➡ भारत में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला सेन गुप्त के द्वारा 1915 ई0 में कलकत्ता शहर में स्थापित की गयी।

➡ जर्मनी के लिपजिंग शहर में विलियम वुण्ट के द्वारा 1879 ई० में ‘कार्लमार्क्स विश्विद्यालय में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोग शाला स्थापित की गयी। 

➡ विलियम वुण्ट को प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।

➡ वुडवर्थ के अनुसार – “मनोविज्ञान में सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर मन व मस्तिष्क का त्याग किया और फिर उसने अपनी चेतना का त्याग किया तथा तब आज वर्तमान में मनोविज्ञान व्यवहार के विधि स्वरूप स्वीकार करता है।”

➡ वाटसन का कथन – ‘तुम मुझे एक बालक दो मैं उसे वो बना सकता हूँ जो मैं बनाना चाहता हूँ।” 

मनोविज्ञान के अर्थ पर विभिन्न विज्ञानियों के मत
➡ मेग्डुगल- मनोविज्ञान व्यवहार व आचरण का विज्ञान है।’
➡ स्किनर- ‘मनोविज्ञान व्यवहार व अनुभव का विज्ञान है।’
➡ वाटसन- मनोविज्ञान व्यवहार का सुख निश्चित, सकारात्मक धनात्मक विज्ञान है।” 
➡ क्रो एण्ड क्रो- ‘मनोविज्ञान मानव व्यवहार व संबंधों का अध्ययन है।
➡ मन- ‘आधुनिक मनोविज्ञान का संबंध व्यवहार की वैज्ञानिक खोज है।’
➡विलियम मेग्डुगल ने अपनी पुस्तक Outline Psychology में चेतना शब्द की निंदा की है
मनोविज्ञान की प्रमुख शाखायें / क्षेत्र-
1. सामान्य मनोविज्ञान,
2. असामान्य मनोविज्ञान,
3. तुलनात्मक मनोविज्ञान,
4. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान,
5. समाज मनो विज्ञान,
6. औद्योगिक मनोविज्ञान,
7. बाल मनोविज्ञान,
8. किशोर मनोविज्ञान,
9. प्रोढ़ मनोविज्ञान,
10. विकासात्मक मनोविज्ञानी,
11. निदानात्मक / उपचाराला / क्लिनिक मनोविज्ञान,
12. परा मनो विज्ञान,
13. पशु मनो विज्ञान,
14. शिक्षा मनोविज्ञान

➡ मनोविज्ञान की शाखा शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पत्ति 1900 ई० में मानी जाती है। बाद में थार्नडाइक, जड़, टरमन, प्रोबेल, हरबल आदि के प्रयासों से 1920 ई0 में शिक्षा मनोविज्ञान को स्पष्ट स्वरू प्राप्त हुआ।

➡ प्रथम शैक्षिक मनोविज्ञानिक थार्नडाइक को माना जाता है।

➡ शिक्षा में मनोवैज्ञानिक दृष्टि का सूत्रपात रूसो ने किया। रूसो ने अपनी पुस्तक E-mail में लिखा- “शिक्षा संस्कृत के शिक्ष धातु से बना है।”

➡ स्किनर के अनुसार- “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों की तैयारी की आधार शिला है।”

 शिक्षा मनोविज्ञान पर विभिन्न वैज्ञानिकों के मत

➡रूसो- “बालक एक पुस्तक के समान है जिसका अध्ययन प्रत्येक अध्यापक को करना चाहिए।”

➡फ्रॉबेल- “शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक बालक अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास करता है।”

➡क्रो एण्ड क्रो- “शिक्षा मनोविज्ञान जन्म से वृद्धावस्था तक किसी भी व्यक्ति के सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”

➡स्किनर-“मनोविज्ञान शिक्षा का आधार भूत विज्ञान है। 

➡ट्रो-  “शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक प्रस्तुतियों का मनोवैज्ञानिक ‘दृष्टि से अध्ययन है।”

➡ब्राउन- “शिक्षा वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के व्ययवहारों में परिवर्तन होता है।”

➡विवेकानन्द- “अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति प्रदान करना ही शिक्षा है।”

➡महात्मा गांधी- “शिक्षा से अभिप्राय बालक या मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्तम विकास से है।”

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

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