12. उष्मा बजट (Heat Budget)

12. उष्मा बजट

(Heat Budget)



 उष्मा बजट

          ऊष्मा बजट वायुमण्डलीय तापमान के अध्ययन हेतु एक अनिवार्य विषयवस्तु है। वायुमण्डल में ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। सूर्य में संलयन क्रिया के फलस्वरूप ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन हो रहा है। ये ऊर्जा हमारी पृथ्वी तक सौर विकिरण के रूप में पहुँचती है। पृथ्वी का धरातल सौर विकिरण से पार्थिव विकिरण के रूप में पुन: अंतरिक्ष को लौटा देती है। इस तरह हमारे वायुमण्डल में आने वाले सौर विकिरण और लौटायी जानेवाली पार्थिव विकरण के लेखा-जोखा को उष्मा बाजट कहते हैं।

            सूर्य से उत्पन्न ऊर्जा का मात्र 0.0005% भाग ही वायुमण्डल तक पहुँच पाता है। यही ऊर्जा पृथ्वी के धरातल पर तापीय वितरण एवं खाद्य ऊर्जा के विकास का आधार होता है। यह सौर ऊर्जा भी सालों भर एक समान प्राप्त नहीं होता है। इसका प्रमुख कारण पृथ्वी की परिभ्रमण गति है।

         सामान्यत: 3 जनवरी को उपसौर (Perihelion) की स्थिति रहती है। उस दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी न्यूनतम होती है। इस दिन सामान्य दिनों की अपेक्षा 7% अधिक ऊर्जा की प्राप्ति हमारी वायुमण्डल करती है। इसी तरह 4 जुलाई को सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी अधिकतम होती है। जिसे अपसौर (Aphelion) कहते हैं। इस दिन सामान्य दिनों की अपेक्षा 7% कम ऊर्जा प्राप्त होती है।

        पुन: सौर ऊर्जा की प्राप्ति अन्तर सूर्य के किरणों के लम्बवत स्थिति में परिवर्तन तथा दिन और रात की लम्बाई में परिवर्तन पर भी निर्भर करता है। सामान्यत: जब सूर्य उतरायण की स्थिति में होता है तो दक्षिणी गोलार्द्ध की तुलना में उतरी गोलार्द्ध अधिक सौर ऊर्जा की प्राप्ति करती है। इसी तरह जब सूर्य दक्षिणायण होता है तो उतरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त करती है।

       ग्रीष्म ऋतु में दिन की लम्बाई अधिक और रात की लम्बाई कम होती है। इसी तरह शीत ऋतु में दिन की लम्बाई कम और रात की लम्बाई अधिक होती है। इसके अलावे ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें लम्बवत होती है, जबकि शीत ऋतु में सूर्य की किरणें तिरछी हो जाती है। यही कारण है कि शीत ऋतु की तुलना में ग्रीष्म ऋतु में सौर विकिरण अधिक प्राप्त होता है।  इसी तरह रात की तुलना में दिन में अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है।

              सामान्यतः ऊष्मा बजट का अध्ययन दो आधार पर किया जाता है:-

(1) अक्षांशीय ऊष्मा बजट

(2) सौर एवं पार्थिव विकिरण उष्मा बजट

(1) अक्षांशीय ऊष्मा बजट-

        सामान्यतः 37º उत्तरी अक्षांश से 37º दक्षिणी अक्षांश के बीच धरातल अतिरिक्त ऊष्मा प्राप्त करती है। अर्थात् इन क्षेत्रों में सौर विकिरण अधिक और पार्थिव विकिरण कम होता है। इसके विपरीत 37°N तथा  37ºS अक्षांशों से ध्रुवों तक वाला क्षेत्र ऊष्मा घाटे का क्षेत्र है अर्थात सौर ऊर्जा कम प्राप्त होती है और पार्थिव विकिरण अधिक होता है।

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अक्षांशीय ऊष्मा बजट में असंतुलन की स्थिति है। लेकिन वास्तव में अक्षांशीय उष्मा बजट भी संतुलित होती है क्योंकि निम्न अक्षांश से ऊच्च अक्षांश की ओर जाने वाली प्रचलित वायु समुद्री जलधाराएँ अतिरिक्त ऊर्जा को उष्मा घाटे वाले प्रदेश को स्थानांतरित कर देती है। इसी तरह उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आने वाली समुद्री जलधारा एवं वायु वातावरण को अतिरिक्त ऊर्जा वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित कर देती है। इसी तरह धरातल पर अक्षांशीय उष्मा बजट के बीच संतुलन कायम रहता है।

(2) सौर एवं पार्थिव विकिरण उष्मा बजट-

          जलवायुवेताओं ने अपने अध्ययन में बताया है कि पृथ्वी सूर्य से जितना उष्मा सौर विकिरण के रूप में प्राप्त करता है उतना ही उष्मा पार्थिव विकिरण के रूप में पुन: अंतरिक्ष में लौटा दिया जाता है। धरातल पर सौर ऊर्जा या विकिरण लघु तरंगों के रूप में प्राप्त होती है। जबकि पार्थिव विकिरण दीर्घ तरंगों के रूप में अन्तरिक्ष में लौटती है। वायुमण्डल में उपस्थित धुलकण, जलवाष्प और CO2 गैसे दीर्घ एवं लघु तरंगों को अवशोषित करने की प्रवृति रखते हैं। वास्तव में हमारा वायुमंडल सौर विकिरण से गर्म नहीं होता बल्कि पार्थिव विकिरण से गर्म होता है क्योंकि हमारा वायुमंडल सौविकिरण के लिए पारदर्शक जबकि पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शक है।

        सौर विकिरण के द्वारा प्राप्त ऊर्जा और पार्थिव विकिरण द्वारा परित्याग किया गया ऊर्जा के बीच भी अभूतपूर्व संतुलन पाया जाता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे: हमारा वायुमण्डल जितना सूर्यातप प्राप्त करता है उसे अगर 100 इकाई माना जाय तो उसका मात्र 65% इकाई ही वायुमण्डल में प्रविष्ट कर पाता है।

उष्मा बजट

       लेकिन वास्तव में 47% उष्मा धरातल को प्राप्त होती है और शेष 18% को वायुमण्डल अवशोषित कर लेती है। सौर विकिरण का वितरण निम्न प्रकार से बताया गया है। जैसे:-

⇒ 25% इकाई बादल के द्वारा सौर विकिरण का परावर्तन कर दिया जाता है।

⇒ 7% इकाई सौर ऊर्जा वायु से टकराकर सौर विकिरण का परावर्तन हो जाता है।

⇒ 19% इकाई क्षोभमंडल में उपस्थित वायु द्वारा अवशोषित कर ली जाती है।

⇒ 2% इकाई उष्मा पृथ्वी के भूतल के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से परावर्तन कर दिया जाता है।

        उपरोक्त आँकड़े से स्पष्ट है कि 53% इकाई सौर विकिरण को वायुमण्डल के विभिन्न स्तर से परावर्तित कर दिए जाते हैं। शेष 47% सौर विकिरण को धरातल ग्रहण करता है जिसे कालान्तर में पार्थिव विकिरण के रूप में अन्तरिक्ष में पुन: लौटा दी जाती है।

निष्कर्ष:-

      इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि सौर विकिरण और पार्थिव विकिरण के बीच पूर्णरूपेण संतुलन कायम रहता है। यही कारण है कि वायुमंडल का तापमान औसत रूप से नियत बना रहता है।

नोट : उपसौर की स्थिति में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दुरी 14.7 किमी० रहती है तथा अपसौर की स्थिति में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दुरी 15.2 किमी० रहती है।


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15. जेट स्ट्रीम / Jet Sream

15.  जेट स्ट्रीम / Jet Sream


जेट स्ट्रीम

       ऊपरी वायुमण्डल में अर्थात क्षोभमंडल के ऊपर तथा समताप मंडल के नीचे क्षैतिज एवं तीव्र गति से चलने वाले वायु को जेट स्ट्रीम कहते हैं। यह हवा प्रायः 9-18 km की ऊँचाई के बीच चलती है। इस जेटस्ट्रीम की खोज द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों ने किया था। कालान्तर में स्वीडिश वैज्ञानिक रॉक्सबी (स्वेडेन) ने इसका व्यापक अध्ययन किया। इसलिए उनके नाम पर इसे रॉक्सबी तरंग भी कहते हैं।

        जेट स्ट्रीम हमारे वायुमण्डल का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इसे मौसम वैज्ञानिकों ने “मौसम का नियंत्रणकर्ता” बताया है। यह मानसून की उत्पत्ति तथा भारत में आने वाला बाढ़ एवं सुखाड़ का भी वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।

         प्रारंभ में जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति के विषय में मतभेद थे। कुछ वैज्ञानिकों ने इसकी उत्पत्ति की व्याख्या हेडली शेल के माध्यम से किया है।

जेट स्ट्रीम

त्रि- कोशकीय मॉडल

         वर्तमान समय में सेटेलाइट के अध्ययन से भी स्पष्ट हो चुका है कि इसकी उत्पत्ति की व्याख्या हेडली सेल के माध्यम से किया जा सकता है। अर्थात यह कहा जाता है कि जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति का मूल कारण निम्न वायुमण्डल की तापीय विशेषता है। वस्तुतः जब निम्न वायुमण्डल के वायु जब ऊपरी वायुमण्डल में पहुँचते हैं तो ठण्डी एवं भारी होकर क्षैतिज अवस्था में चलने लगते हैं। इसी क्षैतिज वायु को जेट स्ट्रीम कहते हैं। जेट स्ट्रीम कहने का मुख्य कारण इसमें जेट जैसी आवाज उत्पन्न होती है। वस्तुतः मौसम वैज्ञानिकों ने चार प्रकार के जेटस्ट्रीय बताया है:-

(1) ध्रुवीय रात्री जेट वायु

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट वायु

(3) उपोष्ण जेट वायु

(4) उष्ण पूर्वी जेट वायु

(1) ध्रुवीय जेट वायु-

         ध्रुवीय रात्री जेट वायु 60° अक्षांश के आगे दोनों गोलार्द्धों में चला करती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इसे आर्कटिक जेट हवा एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में अण्टार्कटिक जेट हवा कहते हैं। यह पश्चिम से पूरब दिशा की ओर चलती है। यह जेट हवा पूरे विश्व में ध्रुवीय क्षेत्र में चलती है। इसकी उत्पत्ति का आधार उपध्रुवीय निम्न वायुदाब से कोरिऑलिस प्रभाव के कारण ऊपर उठती हुई हवा है।

       कुछ ऊँचाई के बाद तापीय ह्रास के कारण पुनः यह वायु ऊपर नहीं जा पाती और क्षैतिज रूप ग्रहण कर लेती है। इसकी क्षैतिज दिशा मुख्यतः ध्रुवीय ऊपरी भाग में होती है। क्योंकि ध्रुवों के ठीक ऊपर निम्न वायुदाब बना होता है। जाड़े के दिनों में ध्रुवीय प्रदेश में रात की अवधि काफी लम्बी (छ: महीने) होती है। रात में यह वायु अति तीव्र गति से प्रवाहित होती है। इसलिए इसे ध्रुवीय रात्रि जेट हवा कहते हैं।

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा-

       45°-65° अक्षांश के बीच केवल उत्तरी गोलार्द्ध में चलने वाली जेट हवा है। इसकी दिशा भी पश्चिम-पूरब की ओर होती है। यह भी उपरोक्त अक्षांश के बीच पूरे भूमण्डल पर चलती है। ध्रुवीय सीमाग्र जेट वायु की उत्पत्ति निम्न वायुमण्डल के उस क्षेत्र में होती है जहाँ ध्रुवीय एवं पछुआ हवा मिलकर सीमाग्र का निर्माण करते हैं।

         सीमाग्र निर्माण में ध्रुवीय वायु में बैठने की प्रवृत्ति होती है जबकि पछुवा वायु तुलनात्मक दृष्टि से गर्म होने के कारण ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है। ऐसी स्थिति में 9-18 Km. की ऊँचाई के बीच वायुप्रवणता का विकास होता है और इस प्रवणता के अनुसार जब गर्म प्रदेश की वायु ठण्डे प्रदेश की ओर चलने लगती है तो उसे “ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा” कहा जाता है।

(3) उपोष्ण जेट हवा-

       उपोष्ण जेट हवा 20°-35° अक्षांश के बीच मुख्यतः उतरी गोलार्द्ध में चलती है। यह पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित होती है। यह भी एक विश्वस्तरीय हवा है। इसकी उत्पत्ति का कारण विषुवतीय प्रदेश की वह गर्म वायु है जो सूर्य के तापीय प्रभाव कारण वायु गर्म होकर ऊपरी वायुमण्डल तक पहुँचता है, ऊपरी वायुमण्डल में जब तापीय कमी आती है तो यह क्षैतिज रूप से उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने लगती है।

       लेकिन, धीरे-2 कोरिआलिस प्रभाव में वृद्धि होने के कारण पश्चिम से पूरब दिशा की ओर चलने लगती है। ऊपरी वायुमण्डल की यही हवा 30°-35° अक्षांश में बैठकर धरातल पर HP का निर्माण करती है।

(4) उष्ण पूर्वी जेट वायु-

         यह एक स्थानीय जेट हवा है जो 8°- 35° अक्षांश के बीच सिर्फ उतरी गोलार्द्ध में चलती है। यह जेट हवा दक्षिण एशिया, द०-पूर्वी एशिया, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, उ०पूर्वी अफ्रीका के ऊपर ग्रीष्म ऋतु में चलती है। यह जेट हवा स्थलाकृतिक विषमताओं के कारण उत्पन्न होती है। जैसे:- मार्च महीने से ही तिब्बत का पठार तीव्र गति से गर्म होने लगता है और उसके सम्पर्क में आने वाला वालु गर्म होकर ऊपर उठने लगती है।

        ऊपरी वायुमंडल में यही हवा तापीय ह्रास के कारण ठण्डी एवं भारी होने लगती है और पुन: क्षैतिज रूप से उत्तर एवं दक्षिण दिशा में चलने लगती है। लेकिन दक्षिण की ओर आने वाली क्षैतिज हवा फेरल के नियमानुसार प्रारंभ में उ०-पू० से द०-प० की ओर चलने लगती है और बाद में धीरे-धीरे पूर्णत: पूरब से प० दिशा में प्रवाहित होने लगती है, इसीलिए इसे ही उष्ण पूर्वी जेट हवा कहते हैं।

निष्कर्ष:-

         इस तह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रथम तीन जेट, वायु विश्वस्तरीय जेट हवा है जबकि अंतिम स्थानीय जेट हवा का उदाहरण है। कोटेश्वरम महोदय ने बताया कि अंतिम दो जेट वायु का संबंध मानसून की उत्पत्ति से है। उष्ण पूर्वी जेट हवा के कारण दक्षिण-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति होती है जबकि उपोष्ण जेट हवा के कारण लौटती हुई मानसून की उत्पत्ति होती है। मौसम वैज्ञानिकों का यह मानना है कि, जेट स्ट्रीम का अभी पूर्ण अध्ययन किया जाना शेष है। इसके अध्ययन से जलवायु विज्ञान की कई जटिल समस्याएँ समाधान होने की संभावना है।


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11. वायुमंडलीय तापमान / Environmental or Atmospheric Temperature

11. वायुमंडलीय तापमान

(Environmental or Atmospheric Temperature)


वायुमंडलीय तापमान

           वायुमण्डलीय कणों में मौजूद ताप की मात्रा को ही वायुमण्डलीय तापमान कहते हैं। पृथ्वी की औसत वायुमण्डलीय तापमान 15.2°C है। वायुमण्डलीय तापमान के दो प्रमुख स्रोत हैं।

(1) सैर विकिरण / सौर्यिक विकिरण (Solar Radiation)

(2) पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation)

            हमारा वायुमण्डल मुख्यतः पार्थिव विकिरण द्वारा गर्म होता है क्योंकि सौर विकिरण से प्राप्त होने वाली ऊष्मा लघु तरंग के रूप में वायुमण्डल में प्रवेश करती है। जिसके कारण हमारा वायुमण्डल सौर विकिरण लिए पारदर्शक होता है। जबकि पार्थिव विकिरण दीर्घ तरंग के रूप में अंतरिक्ष में फैलता है। वायुमण्डल इन्हीं दीर्घ पार्थिव तरंगो को अवशोषित कर वायुमण्डल को गर्म करती है।
वायुमंडलीय तापमानवायुमण्डलीय तापमान का वितरण

       वायुमण्डलीय तापमान के वितरण में भारी विषमता पायी जाती है। यह विषमता लम्बत, क्षैतिज के अतिरिक्त दैनिक, मासिक एवं वार्षिक भी होते हैं। लम्बवत वायुमण्डलीय तापमान के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है:- 
वायुमंडलीय तापमान

         वायुमण्डल की दैनिक, मासिक और वार्षिक तापीय विषमता तापान्तर के रूप में मापी जाती है। जब वायुमण्डल का दैनिक तापमान सर्वाधिक दोपहर (3PM) और न्यूनतम तापमान सुबह (5AM) मापी जाती है। एक दिन के अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान के अंतर को दैनिक तापान्तर कहते है। सबसे कम दैनिक तापान्तर विषुवतीय क्षेत्रों में होता है जबकि अधिकतम तापान्तर मरुस्थलीय या महाद्वीपीय जलवायु क्षेत्रों में मापी जाती है।

         मासिक एवं वार्षिक तापान्तर का आकलन दैनिक तापान्तर के आधार पर करते हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी का वार्षिक तापान्तर 145°C है। विषुवतीय प्रदेशों में न्यूनतम मासिक एवं वार्षिक तापान्तर मापी जाती है। जबकि मरुस्थलीय तथा उच्च अक्षांशीय महाद्वीपीय क्षेत्रों में सर्वाधिक मासिक एवं वार्षिक तापान्तर Record किया जाता है। लीबिया का अल्जीरिया नामक स्थान विश्व का सबसे गर्म स्थान माना जाता है। यहाँ पिछले 130 वर्षों से लगातार 58℃-60℃ तापमान Record किया जा रहा है। जबकि विश्व का सबसे ठण्डा स्थान बर्खोयांस्क (रूस) माना जाता है। किसी एक दिन का सर्वाधिक तापमान इथियोपिया के दलाल में Record किया गया है। जबकि सबसे कम तापमान अण्टार्कटिका के बोस्टक नामक स्थान पर Record किया गया है।

        वायुमण्डलीय तापमान के क्षैतिज वितरण में काफी विषमता पायी जाती है। जिसके कई कारण है:-

(i) अक्षीय प्रभाव –

        5°N-5°S के बीच सूर्य की किरणों का सालों भर लम्बवत प्रभाव होता है। जिसके कारण यह उच्च तापमान का प्रदेश होता है। ज्यों-2 निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाते हैं त्यों-2 सूर्य की किरणें तिरछी होते जाती हैं, और अंततः ध्रुवीय क्षेत्रों में सालों भर तिरछी किरणों के कारण तापीय प्रभाव कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप ध्रुव हिमाच्छादित रहते हैं।वायुमंडलीय तापमान

(2) ऊँचाई का प्रभाव-

         ज्ञात है कि क्षोभमंडल में प्रति 165मी0 की ऊँचाई पर 1°C तापमान में कमी आती है। यही कारण है कि अफ्रीका का किलीमंजारो पर्वत और इक्वेडोर का कोटोपैक्सी तथा चिम्बराजो की चोटी पर विषुवत रेखा के नजदीक होने के बावजूद तापमान बहुत कम होता है।

(3) स्थलखण्ड एवं समुद्र का विषम वितरण-

          वायुमण्डलीय तापमान के वितरण पर स्थल एवं समुद्र के वितरण का व्यापक प्रभाव पड़ता है। स्थलीप क्षेत्र ग्रीष्म ऋतु में तेजी से गर्म और शीत ऋतु में तेजी से ठण्डी होने की प्रवृत्ति रखती है। जबकि महासागरीप प्रदेश तुलनात्मक रूप से ग्रीष्म ऋतु में धीरे-2 गर्म और‌ शीत ऋतु में धीरे-2 ठण्डी होते है। इसी स्थल एवं जल के ठंडा एवं गर्म होने के समयान्तराल के कारण तापमान के वितरण में विषमता पाई जाती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारतीय उपमहाद्वीप है। जैसे – सूर्य के उतरायण होते ही भारतीय उपमहाद्वीप गर्म हो जाता है और गर्म होकर निम्न वायुदाब का निर्माण है जबकि सूर्य के दक्षिणायन होते ही भारतीय उपमहाद्वीप तेजी से ठण्डा होकर उच्च वायुदाब के इस में तब्दील हो जाता है।

        इसे एक दूसरा उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे:- यूरेशिया महाद्वीप के ऊपर ग्रीष्म ऋतु में 50°F. समताप रेखा 60° उतरी अक्षांश के पास से गुजरती है लेकिन जाड़े की ऋतु में यह समताप रेखा 30° उत्तरी अक्षांश के पास से गुजरती है। इसी तरह महासागरीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में 50°F समताप रेखा 52° उत्तरी अक्षांश के पास से गुजरती है। जबकि स्पष्ट है कि ये तापीय वितरण में विषमता स्थल एवं जल के असमान वितरण के कारण उत्पन्न होता है।

(4) समुद्री जलधाराओं का प्रभाव:-

          समुद्री जलधाराएँ दो प्रकार की होती है:-

(1) गर्म समुद्री जलधारा और

(2) ठण्डी समुद्री जलधारा।

              समुद्री जलधारा का प्रभाव तटीय क्षेत्रों में अधिक पड़ता है। जैसे:- उत्तरी अटलांटिक प्रवाह के कारण प० यूरोप की जलवायु सालोभर समशीतोष्ण बना रहता है। इसके विपरीत महाद्वीपों के किनारे जहाँ-2 ठण्डी समुद्री जलधारा प्रवाहित होती है वहाँ पर वर्षा के कम होने से शुष्क या मरुस्थलीय जलवायु का विकास हुआ है। प्रशान्त महासागर में अवस्थित ग्लैपोगस द्वीप विषुवत रेखा पर अवस्थित है। हम्बोल्ट ठण्डी जलधारा के कारण यहाँ का तापमान सतत् कम रहता है।

(5) प्रचलित वायु-

       यदि कोई गर्म वायु किसी प्रदेश से होकर गुजरती है तो उसके आस-पास मौसमी परिस्थितियों को गर्म कर देती है जबकि ठण्डी वायु वायुमण्डलीय तापमान को गिरा देती है। पछुआ हवा निम्न असांश से उच्च अक्षांश की ओर ऊष्मा (तापमान) को ले जाती है। जबकि ध्रुवीय हवा उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर तापमान को घटाती है।

      वायुमण्डलीय तापमान के कई अन्य निर्धारक हैं। जैसे:- बादल का प्रभाव, स्थलाकृतिक विशेषता, बढ़ते महानगर & औद्योगिकीकरण, वनीय ह्रास और वायुमण्डल में CO2 की बढ़ती हुई मात्रा।

निष्कर्ष:-

          इस तह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि वायुमण्डलीम तापमान में कई प्रकार की विषमताएँ पायी जाती हैं। इन विषमताओं के लिए उपरोक्त कई कारक जिम्मेदार हैं।


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8.  AIRMASS (वायुराशि)

8.  AIRMASS (वायुराशि)



AIRMASS (वायुराशि)

नोट:-
c = महाद्वीपीय (Continental)
m = महासागरीय (Maritime)
P = ध्रुवीय (Polar)
T = उष्ण कटिबंधीय (Tropical)
s =  स्थिर (Stable)
u = अस्थिर (Unstable)
k = ठंडी (Kant or Cold)
w = गर्म (Warm) 

संकल्पना

     वायुराशि जलवायु विज्ञान की अध्ययन की एक प्रमुख घटक मानी जाती है। वायुराशि की संकल्पना को जलवायु विज्ञान में लाने का श्रेय टॉर, बर्गरान, जे.बर्कनीज और सोलबर्ग को जाता है। इस संकल्पना का विकास 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में किया गया था

      वायुराशि को भिन्न-भिन्न जलवायुवेताओं ने परिभाषित करने का प्रयास किया है जिनमें ट्रीवार्था, डी. पैटरसन और जे. क्रिचफील्ड का नाम उल्लेखनीय है। ट्रीवार्था महोदय ने वायुराशि को परिभाषित करते हुए कहा “वायुराशियाँ वायुमंडल का ही एक ऐसा सुविस्तृत अंश है जिसका ताप एवं आर्द्रता संबंधी विशेषता लगभग समान होता है।” ट्रीवार्था की ही परिभाषा को सर्वमान्य परिभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनके परिभाषा की व्याख्या करते हुए कहा जाता है कि किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में समान भौतिक विशेषताओं के साथ उपस्थित वायुपूँज को वायुराशि कहते हैं। यहाँ समान भौतिक विशेषता का तात्पर्य वायु के तापमान, आर्द्रता एवं स्थिरता जैसे गुणों से होता है। जहाँ इन गुणों में एकाएक असमानता प्रकट होती है वहीं वायुराशि की सीमा समझी जाती है। किसी भी वायुराशि की भौतिक गुण स्रोत क्षेत्र, सतह की विशेषता, निम्न अथवा उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में गमन एवं समय पर निर्भर करता है।

वायुराशि की विशेषताएँ

       वायुराशियाँ की निम्नलिखित विशेषताएँ होती है-

◆ किसी भी वायुराशि में समताप एवं समदाब रेखाएँ एक-दूसरे के समानांतर होती है। इस स्थिति को जलवायु विज्ञान में बैरोट्रैपिक से संबोधित किया जाता है।

◆ अगर किसी वायुराशि में समदाब एवं समताप रेखाएँ एक-दूसरे को काटने लगती है तो उस स्थिति को जलवायु विज्ञान में बैरोक्लिनिक  स्थिति से संबोधित करते हैं। 

बैरोक्लिनिक  स्थिति

◆ वायुमंडल के निचले भाग में उच्च वायुदाब के क्षेत्र वायुराशि की उत्पत्ति के स्रोत क्षेत्र होते हैं और निम्न वायुदाब के क्षेत्र वायुराशि के लक्षण होते हैं।

◆ स्रोत क्षेत्र में वायुराशि में ऊर्ध्वाधर गमन की स्थिति होती है। इसलिए स्रोत क्षेत्र की वायुराशि को स्थिर वायुराशि कहते है। इसमें क्षैतिज गतिशीलता पायी जाती है। ज्यों-ज्यों कोई भी वायुराशि अपने स्रोत क्षेत्र से दूर जाती है त्यों-त्यों उसके भौतिक विशेषता में परिवर्तन आता जाता है। जैसे-

(i) स्रोत क्षेत्र में वायु प्रतिचक्रवात के स्थिति में रहती है तथा वायु ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती हैं जबकि स्रोत क्षेत्र से दूर जाती हुई वायुराशि में वायु क्षैतिज रूप से गमन करती है तथा प्रति चक्रवात की स्थिति नहीं रहती।

(ii) स्रोत क्षेत्र की वायुराशि में तापमान कम, आर्द्रता का अभाव एवं दृश्यता अधिक होती है जबकि लक्ष्य क्षेत्र की ओर जाती हुई वायुराशि में भौतिक विशेषताएँ अक्षांश, धरातलीय स्थिति, स्रोत क्षेत्र से दूरी और समय जैसे कारकों पर निर्भर करती है।

◆ स्रोत क्षेत्र के वायुराशि में बादल एवं वर्षण का अभाव होता है। जबकि स्रोत क्षेत्र से आती हुई वायुराशि में उपरोक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है।

◆अगर क्षैतिज रुप से गमन करती हुई वायुराशि निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाती है तो उसका तापमान धीरे-धीरे घटता है। जबकि उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आने वाले वायुराशि की तापमान बढ़ती है। जिसके कारण कई प्रकर के मौसमी परिवर्तन होते हैं। जैसे- दृश्यता में परिवर्तन होता है। बादल का निर्माण एवं वर्षण का कार्य होता है।

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि अलग-अलग वायुराशियों के अलग-अलग भौतिक विशेषताएँ होती हैं। ये विशेषताएँ धरातल की विशेषता, अक्षांश जैसे कारकों पर निर्भर करती हैं।

वायुराशियों का वर्गीकरण

          विभिन्न भूगोलवेत्ताओं ने वायुराशि को भिन्न-2 प्रकार से वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। सामान्य तौर पर वायुराशियों का वर्गीकरण चार आधार पर किया जाता है-

(1) वायुराशि की उत्पत्ति क्षेत्र के आधार पर

(2) उत्पति क्षेत्र की धरातलीय विशेषता के आधार पर

(3) वायुराशि की तापीय विशेषता के आधार पर

(4) वायुराशि की स्थिरता एवं अस्थिरता के आधार पर

वायुराशि को उत्पत्ति क्षेत्र के आधार पर दो भागों में बाँटते है-

(i) उष्ण कटिबंधीय वायुराशि

(ii) ध्रुवीय वायुराशि

     उष्ण कटिबंधीय वायुराशि उत्पत्ति निम्न अक्षांशीय क्षेत्रों/उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होती है। ऐसी वायुराशि को अंग्रेजी के बड़े अक्षर T के द्वारा दर्शाया जाता है।     

    ध्रुवीय वायुराशि की उत्पत्ति उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में होती है। इसे अंग्रेजी के बड़े अक्षर P के द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

     उत्पत्ति क्षेत्र की धरातलीय विशेषता के आधार पर वायुराशि को पुनः दो भागों में बाँटते है:-

(i) महासागरीय वायुराशि

(ii) महाद्वीपीय वायुराशि

    महाद्वीपीय वायुराशि को अंग्रेजी के छोटे अक्षर c और महासागरीय वायुराशि को m के द्वारा निरूपित करते हैं।

    साधारणत: कोई भी वायुराशि अपने स्रोत क्षेत्र से उत्पन्न होकर लक्ष्य क्षेत्र की ओर गमन करने की प्रवृत्ति रखती है। इसे ऊष्मा गति परिवर्तन भी कहते हैं। निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली वायुराशि धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रवृत्ति रखती है जबकि उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आने वाली वायु गर्म होने की प्रवृत्ति रखती है। गर्म वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटा अक्षर w और ठंडी वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटा अक्षर k का प्रयोग किया जाता है

     अधिकांश मौसम वैज्ञानिक उपरोक्त तीनों आधार पर ही वायुराशि के वर्गीकरण को औचित्यपूर्ण मानते हैं लेकिन कुछ मौसम वैज्ञानिक वायुराशि की स्थिरता एवं अस्थिरता के आधार पर भी वायुराशि को दो भागों में बाँटते हैं:-

(i)  स्थिर वायुराशि

(ii) अस्थिर वायुराशि

     स्थिर वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटे अक्षर  s और अस्थिर वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटा अक्षर u का प्रयोग किया जाता है।

     उपरोक्त सभी अक्षरों को मिलाकर जैकोब एवं  जक्रेन्स  महोदय ने वायुराशि का एक संशोधित वर्गीकरण प्रस्तुत किया जिसे नीचे के फलों चार्ट में देखा जा सकता है।

वायुराशियों के वर्गीकरण में यदि मौसमी विशेषताओं को छोड़ दिया जाए तो मुख्य रूप से चार वायुराशि मानी जाती है –

(1) महाद्वीपीय ध्रुवीय वायुराशि (cP)

(2) महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि (mP)

(3) महाद्वीपीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (cT)

(4) महासागरीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (mT)

वायुराशियों की उत्पत्ति

    वायुराशियों की उत्पत्ति की व्याख्या हेडली कोशिका के माध्यम से करते हैं। धरातल पर अवस्थित सभी उच्च वायुदाब के क्षेत्र ही वायुराशि के स्रोत क्षेत्र या स्थिर वायुराशि के क्षेत्र होते हैं। ज्यों ही स्रोत क्षेत्र से वायुराशियाँ अपने लक्ष्य क्षेत्र की ओर गमन करती है त्यों ही प्रचलित वायु या अस्थिर वायुराशि को जन्म देती है। अस्थिर वायुराशियाँ ही अक्षांशीय एवं धरातलीय विशेषता को ग्रहण कर गौण वायुराशियों को जन्म देती है।

प्रमुख वायुराशियों का वितरण, संचलन एवं मौसमी विशेषताएँ

      मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार वायुराशियाँ मुख्यतः चार प्रकार की होती है। शेष वायुराशियों को गौण वायुराशि कहा जाता है। प्रमुख वायुराशियों की वितरण, संचालन एवं उसमें विशेषताएँ निम्नलिखित प्रकार से हैं-

(1) महाद्वीपीय ध्रुवीय वायुराशि (cP)

       इस वायुराशि का वास्तविक फैलाव उतरी अमेरिका के उत्तरी एवं मध्यवर्ती भाग में, ग्रीनलैण्ड और साइबेरिया क्षेत्र में पायी जाती है। उत्तरी अमेरिका में जाड़ें की ऋतु में सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण इस वायुराशि का फैलाव महान झील तक हो जाता है। गर्मी की ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने के कारण यह वायुराशि हडसन की खाड़ी तक स्थानांतरित हो जाती है।  

       ध्रुवीय महाद्वीपीय वायुराशि के कारण मौसम में व्यापक बदलाव देखी जाती है क्योंकि यह ठंडी वायुराशि का स्रोत क्षेत्र है। शीत ऋतु में बर्फीली हवाओं को जन्म देती है। ध्रुवीय महाद्वीपीय वायुराशि धरातल पर बैठ कर दो दिशाओं में बहती है।

(i) उ०-पूर्व से द०-पश्चिम की ओर

(ii) द०-प० से उ०-पूर्व की ओर

       उत्तर-पूर्व से द० पश्चिम की ओर चलने वाली ध्रुवीय महाद्वीपीय हवाएँ USA के दक्षिणी भाग तक तापमान में भारी गिरावट लाती है। इससे कड़ाके की सर्दी पड़ती है। बर्फीली हवाएँ चलती है। मौसम कष्टदायक बन जाता है। पाला पड़ने से कपास, आलू, प्याज, तम्बाकू जैसे फसलें बर्बाद हो जाती है। जब यह वायुराशि बर्फ से युक्त होती है तो ब्लिजार्ड और नॉर्थन जैसे स्थानीय हवा को जन्म देती है।

     लेकिन जो वायुराशि द-प० से उ०-पूरब दिशा की ओर जाती है तो वह समुद्री सतह से ताप एवं आर्द्रता ग्रहण करने की प्रवृति रखती है। लेकिन स्रोत क्षेत्र छोड़ने के कुछ देर बाद अक्षांशीय प्रभाव पड़ने लगता है जिसके कारण संघनन क्रिया के द्वारा तटीय क्षेत्रों में कुहरा का निर्माण करती है जिससे दृश्यता बहुत कम हो जाती है। कभी-कभी ठण्डी हवा एवं कुहरा भरे वातावरण के कारण बूँदा-बाँदी वर्षा भी होती है। न्यूफाउंडलैंड के पास विश्व का सबसे घना कुहरा का निर्माण इसी के कारण होता है।

       साइबेरिया प्रदेश की ध्रुवीय वायुराशि की हवाएँ मुख्यतः प्रशांत महासागर की ओर जाती है जिसके कारण रूस का सखालिन द्वीप जापान के होकैडो एवं होंशू द्वीप के पश्चिमी तट पर कड़ाके की सर्दी उत्पन्न करती है। इसी क्षेत्र की वायुराशि में भी ऋतु बदलाव एवं संकुचन देखा जाता है। शीत ऋतु में यह वायुराशि दक्षिण की ओर फैल कर भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँच जाती है जिसके कारण शीत ऋतु में उत्तर भारत में शीतलहरी का आगमन होता है।

(2) महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि (mP)

      महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि का फैलाव मुख्यतः उत्तरी अटलांटिक महासागर और आर्कटिक महासागर के ऊपर होता है। यहाँ चलने वाली वायु को महासागरीय ध्रुवीय वायु भी कहा जाता है। इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। चूँकि यह हवा समुद्र के ऊपर से होकर गुजरती है इसलिए इसके तापमान आर्द्रता इत्यादि में वृद्धि क्रमबद्ध तरीके से होती है। यह पछुआ हवा से मिलकर शीतोष्ण चक्रवात को जन्म देती है। पश्चिमी यूरोप की जलवायु इसी वायुराशि से नियंत्रित होती है। 

(3) महाद्वीपीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (cT)

     यह वायुराशि वाणिज्यिक एवं पछुआ हवा को जन्म देती हैं। इस वायुराशि की उत्पत्ति दोनों गोलार्द्धों में महाद्वीपों के ऊपर 30° से 35° अक्षांश के बीच होता है। इससे चलने वाली हवाएँ उच्च एवं निम्न दोनों अक्षांश की ओर जाती है। उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली हवाओं की आर्द्रता में तो वृद्धि होती है लेकिन कुछ दूरी तय करने के बाद उसके ताप में गिरावट आती है। तापीय गिरावट के कारण बादलों का निर्माण होता है। कभी-कभी बूँदा-बूँदी वर्षा भी होती है। निम्न अक्षांश की ओर जाने वाली वायु और अधिक आर्द्रता एवं ताप ग्रहण कर कभी-कभी उष्णकटिबंधीय चक्रवात को जन्म देती है। विषुवतीय क्षेत्रों में जाकर अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का निर्माण करती है।

(4) महासागरीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (mT)

    महासागरीय उष्ण वायुराशि का जन्म महासागरीय सतह पर 30° से 35° अक्षांश के बीच होता है। यह हवाएँ उच्च एवं निम्न अक्षांश की ओर चला करती है। उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली महासागरीय उष्ण वायुराशि महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि से मिलकर शीतोष्ण चक्रवात को जन्म देती है। शीतोष्ण चक्रवात में 4 तरह के वाताग्र का निर्माण होता है जिसके कारण प्रत्येक वाताग्र में अलग-अलग मौसमी परिस्थितियाँ को जन्म देती है।

     निम्न अक्षांश की ओर चलने वाले महासागरीय उष्ण वायुराशि विषुवतीय क्षेत्रों में जाकर डोलड्रम/शांत पेटी का निर्माण करती है। शांत पेटी में वायु स्थिर रूप से ऊपर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है। यहां दोपहर के बाद प्रतिदिन संवहनीय वर्षा होती है।

निष्कर्ष:-

         इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि अलग-अलग वायुराशियों की क्षेत्रीय वितरण, संचालन और मौसमी विशेषताओं  में काफी विभिन्नताएँ पाई जाती है।


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16. Humidity / आर्द्रता

16. Humidity / आर्द्रता


Humidity/आर्द्रता⇒

आर्द्रता (Humidity) :वायुमंडल में उपस्थित अदृश्य जलवाष्प (नमी की मात्रा) को आर्द्रता कहते है।

◆ वायुमंडल की आर्द्रता को विशिष्ट आर्द्रता,निरपेक्ष आर्द्रता तथा सापेक्षिक आर्द्रता के रूप में प्रकट करते है।

◆ वायु की आर्द्रता का मापन वायु के प्रति घनफुट आयतन पर ग्रेन इकाई या प्रति घन सेंटीमीटर पर ग्राम में किया जाता है।

आर्द्रता सामर्थ्य (Humidity Capacity):-

                 किसी निश्चित तापक्रम पर वायु में निश्चित आयतन पर अधिकतम नमी धारण करने की क्षमता को आर्द्रता सामर्थ्य कहते है।

◆ तापमान तथा आर्द्रता सामर्थ्य में सीधा संबंध होता है।

◆ बढ़ते तापक्रम पर आर्द्रता सामर्थ्य की वृद्धि के अनुपात में भी वृद्धि होती है। इसीलिए शीतकाल की अपेक्षा ग्रीष्मकाल में तथा रात्रि की अपेक्षा दिन में वायु की आर्द्रता सामर्थ्य अधिक होती है।

निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity): 

           वायु के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते है। इसका मात्रक ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर या ग्रेन प्रति घनफूट है।

विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity): 

          वायु के प्रति इकाई भार में विद्यमान जलवाष्प के भा को विशिष्ट आर्द्रता कहते है।

सापेक्षिक आर्द्रता ( Relative Humidity): 

         किसी निश्चित तापक्रम पर निश्चित आयतन वाली वायु की आर्द्रता सामर्थ्य (अधिकतम नमी धारण करने की क्षमता) तथा उसमें मौजूद आर्द्रता की वास्तविक मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) के अनुपात को सापेक्षिक आर्द्रता कहते है।

सापेक्षिक आर्द्रता 

        = निरपेक्ष आर्द्रता÷आर्द्रता सामर्थ्य X 100

◆ इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

◆ तापक्रम एवं सापेक्षिक आर्द्रता में विपरीत संबंध होता है, अर्थात तापक्रम बढ़ने पर सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है तथा घटने पर बढ़ने लगती है,जबकि सामर्थ्य में अंतर आता रहता है।

◆ सापेक्षिक आर्द्रता सुबह अधिकतम तथा शाम में न्यूनतम होती है।

सापेक्षिक आर्द्रता का महत्त्व

◆ सापेक्षिक आर्द्रता का जलवायु में अधिक महत्त्व होता है। इसी की मात्रा पर वर्षा की संभावना होती है । अधिक प्रतिशत पर वर्षा की संभावना तथा कम प्रतिशत पर शुष्क मौसम की भविष्यवाणी की जाती है।

◆ सापेक्षिक आर्द्रता से स्वास्थ्य का सीधा संबंध है। सापेक्षिक आर्द्रता अधिक या कम होने पर, दोनों स्थितियों में स्वास्थ्य की हानी होती है। यही कारण है कि अधिक सापेक्षिक आर्द्रता वाले भूमध्य रेखीय प्रदेश तथा न्यून सापेक्षिक आर्द्रता वाले उष्णकटिबंधीय मरुस्थलीय प्रदेश स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

ओस बिंदु या ओसांक- 

          वायु का कोई भी नमूना जिस तापमान पर संतृप्त हो जाए, उस तापमान को ओस बिंदु या ओसांक (Dew Point) कहते है।

Humidity


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17. विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ / MAJOR PRESSURE BELTS OF THE WORLD

17. विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ

(MAJOR PRESSURE BELTS OF THE WORLD)


विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ⇒

           धरातल पर इकाई क्षेत्रफल पर वायु द्वारा लगाया जाने वाला बल को वायुदाब कहते है। धरातल पर औसतन 1013 mb वायुदाब लगता है। विश्व में सर्वाधिक वायुदाब साईबेरिया में स्थित बैकाल झील के ऊपर मापा गया है और सबसे कम वायुदाब उत्तरी अमेरिका में आने वाले टॉरनेडो चक्रवात के केंद्र में मापा गया है। अत: इससे स्पष्ट होता है कि निम्न वायुमंडलीय क्षेत्र में सभी जगह वायुदाब परिस्थितियाँ एक सामान नहीं है। वायुदाब की विषमता मुख्यतः तीन कारणों से उत्पन्न होती है-

1. सूर्य का तलीय प्रभाव

2. कोरियालिसिस प्रभाव

3.  स्थलमंडल और जलमंडल के वितरण में विषमता

         ये तीनों कारकों के कारण ही वायुदाब में विषमताएँ उत्पन्न होती है फिर भी ये अक्षांशीय विस्तार को बनाये रखते है। जलवायुवेताओं ने वायुदाब का अध्ययन कर यह बतलाया है की वायुदाब पेटी दो प्रकार के होते है–

(A) निम्न वायुदाब पेटी

1. विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी

2. उ० गोलार्द्ध की उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी

3. द० गोलार्द्ध की उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी

(B) उच्च वायुदाब पेटी 

1.  उ० गोलार्द्ध की ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी 

2.  उ० गोलार्द्ध की उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी

3.  द० गोलार्द्ध की ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी

4.. द० गोलार्द्ध की उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी

         उपरोक्त वर्गीकरण से स्पष्ट है कि पुरे पृथ्वी पर कुल सात वायुदाब पेटी मिलते हैं जिसमें तीन निम्न और चार उच्च वायुदाब पेटी है। इनका वितरण उपरोक्त चित्र में देखा जा सकता है।

विश्व की प्रमुख वायुदाब प

विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी

        इसका विस्तार 5°N से 5°S के बीच विषुवतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यहाँ प निम्न वायुदाब का प्रमुख कारण सालों भर सूर्य के लम्बवत किरण पड़ने के कारण उच्च तापमान का होना है। इसके परिणाम यह होता है कि दोनों गोलार्द्धों से आने वाली हवा प्रारंभ में आपस में मिलकर अंतरउष्ण अभिसरण (डोलड्रम/शांत पेटी) का निर्माण करती है। उसके बाद सूर्य के तापीय प्रभाव के कारण वायु गर्म होकर ऊपर उठने की प्रवृति रखती है जिससे संवहन तरंग का निर्माण होता है और अंतत: स्थायी निम्न वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है।

उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी

           इसका विस्तार दोनों गोलार्द्धों में 30° से 35° अक्षांश के बीच हुआ है। इसके उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण है-

(i) तुलनात्मक दृष्टि से इस क्षेत्र में कोरियालिसिस प्रभाव और सूर्य के तापीय प्रभाव कम होना है।

(ii) विषुवतीय प्रदेश और उपध्रुवीय प्रदेश से उठने वाली वायु उपरी वायुमंडल में क्षैतिज हो जाती है और ठंडा होकर पुन: इस प्रदेश में बैठने की प्रवृति रखती है। जिसके कारण उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी का निर्माण होता है।

उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी

       इसका निर्माण दोनों गोलार्द्धों में 60° से 65° अक्षांश के बीच हुआ है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण पृथ्वी का घूर्णन गति या कोरियालिसिस प्रभाव है। कोरियालिसिस प्रभाव के कारण पृथ्वी के सतह से सटे वायु के कण ऊपर की ओर ऊठने की प्रवृति रखती है। इसका सर्वाधिक प्रभाव मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में (खासकर 60° से 65°) के बीच होता है।

ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी   

         इसका विस्तार दोनों गोलार्द्धों में 70° से 90° अक्षांश के बीच हुआ है। इसके उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण है-

◆ ध्रुवीय क्षेत्रों में सालोंभर तापमान का निम्न होना।

◆ उपध्रुवीय क्षेत्र से ऊपर उठने वाली वायु का पुन: 70° से 90° के बीच बैठना।

वायुदाब पेटी में मौसमी संशोधन         

        यद्धपि ऊपर में बतलाये गए सभी वायुदाब की पेटियाँ स्थायी प्रकृति की होती है। लेकिन सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने से थोड़ा बहुत अक्षांशीय खिसकाव भी होती है। सामान्तय: यह खिसकाव 2° से 7° अक्षांश तक होता है। लेकिन उत्तरी गोलार्द्ध में यह खिसकाव मौसमी विशेषताओं के दृष्टिकोण से अधिक महत्पूर्ण है। उ० गोलार्द्ध में स्थल एवं जल के असमान वितरण के कारण विरूपित हो जाती है। जबकि द० गोलार्द्ध में जलमंडल के समान वितरण के कारण अपने अक्षांशीय स्थिति को बनाये रखते है।

      उ० गोलार्द्ध में जब गर्मी की ऋतू होती है तो विषुवतीय वायुदाब पेटी उत्तर की ओर खिसकर स्थलीय भागों में 30°N से 35°N अक्षांश के बीच चली आती है। अर्थात सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप और द०पू०, द० USA निम्न वायुदाब क्षेत्र में बदल जाते है जिसके कारण यहाँ कई मौसमी, स्थानीय और चक्रवातीय वायु का निर्माण होता है।

        शीत ऋतु में सूर्य दक्षिणायन हो जाता है जिसके कारण उ० गोलार्द्ध की सभी वायुदाब पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसकने की प्रवृति रखती है। तिब्बत के पठार के अत्यधिक ऊँचाई होने के कारण सम्पूर्ण चीन और साइबेरिया ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी में बदल जाती है। और उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र जाफना प्रायद्वीप के पास पहुँच जाती है। तिब्बतीय क्षेत्र में ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्र के बनने से बुरान,पुर्गा जैसे स्थानीय हवा का जन्म होता है।

       लेकिन द० गोलार्द्ध में इस तरह का कोई परिवर्तन नहीं होता है। 30°S से 35°S अक्षांश के बीच निर्मित होने वाली उपोष्ण उच्च वायुदाब करीब 9 महीने तक स्थिर रहती है। यह विश्व का सर्वाधिक स्थिर वायुदाब पेटी है। इसे अश्व अक्षांश के नाम से भी संबोधित करते है क्योंकि औपनिवेशिक काल में वायुमंडलीय विशेषताओं का पूर्ण ज्ञान नहीं था तो घोड़ा से लदे जहाज डूबने लगते थे तो कुछ घोड़ों को समुद्र में फेंक कर जहाज के दबाव को कम कर दिया जाता था। इसी कारण से इसे अश्व अक्षांश भी कहते है।


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7. Cause and Effect of Global Warming (भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम)

7. Cause and Effect of Global Warming 

(भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम)


Cause and Effect of Global Warming 

भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम⇒Cause and Effect of Global Warming

           भू-मंडल के निरंतर बढ़ते हुए तापमान को ‘भूमंडलीय उष्मण’ कहा जाता है। इसे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ या ‘वैश्विक तापन’ के नाम से भी जाना जाता है। भूमंडलीय उष्मण वर्तमान समय की प्रमुख विश्वव्यापी पर्यावरणीय समस्या है। वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने वाली प्रमुख गैस है। इसके अलावा मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, हैलोन आदि ग्रीन हाउस गैसें भी भूमंडलीय उष्मण वृद्धि में योगदान देती है। ये गैसें दीर्घ तरंगी पार्थिव विकिरण को वायुमंडल से बाहर जाने से रोक देती है। परिणाम स्वरूप तापमान बढ़ने से पृथ्वी का ताप संतुलन बिगड़ जाता है। भूमंडलीय तापमान में इस वृद्धि को ही वैज्ञानिक शब्दावली में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ करते हैं।

         सौर विकिरण ऊर्जा का लगभग 51% भाग लघु तरंगों के रूप में वायुमंडल को पार कर पृथ्वी के धरातल पर पहुंचता है। पृथ्वी का वायुमंडल लघु तरंग सौर्यीक विकिरण के लिए पारदर्शी होता है। अतः सौर विकरण बिना किसी रूकावट के धरातल पर पहुँचता है।लघु तरंगें पृथ्वी से टकराकर ऊष्मा में परिवर्तित हो जाती है। यह ऊष्मा दीर्घ तरंगों को अवशोषित कर लेती है तथा ऊष्मा की तरंगों को वायुमंडल से बाहर जाने से रोक देती है।

      पार्थिव विकिरण (दीर्घ तरंग) अवरुद्ध हो जाने से पृथ्वी के धरातल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। ऐसी अवस्था में वायुमंडल ‘ग्रीन हाउस’ के शीशे की भाँति काम करता है और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो जाती है। इसे ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ कहा जाता है।Cause and Effect of Global Warming

       निरंतर बढ़ता हुआ सान्द्रण भूमंडलीय तापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी है। 1861 के बाद पृथ्वी के तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है क्योंकि 1861 से तापमान संबंधी उपकरणों द्वारा अंकित विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध है। ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में उचित जानकारी प्राप्त करने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1988 में ‘Inner Governmental Pannel on Climate Change (IPCC) का गठन किया।

         1995 ई० में UNO द्वारा गठित IPCC के अंतर्गत दो हजार वैज्ञानिकों ने वैश्विक तापमान के संबंध में आँकड़े एकत्रित किये जिससे यह साबित हुआ कि विश्व के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार 1861 से 1990 तक पृथ्वी का औसत तापमान में 0.6℃ की वृद्धि हुई जो 2020 तक बढ़कर 1.5℃ तक होने की संभावना है। WHO के अनुसार 1900-1990 के बीच विश्व के तापमान में 0.5℃ तापमान में वृद्धि हुई है। विश्व में तापमान बढ़ने के अगर यही प्रवृत्ति रही तो 2050 ई० तक विश्व का औसत तापमान बढ़कर 19℃ हो जाने की संभावना है।

        वैश्विक तापन कोई नई घटना नहीं है। भूगर्भिक काल के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कार्बोनिफेरस युग और प्लेस्टोसीन युग में कई बार हिमयुग एवं अंतर हिमानी का युग आया। हिमयुग के दौरान तापमान में कमी आ जाती थी और अंतरहिमयुग में तापमान में बढ़ोतरी हो जाती थी। लेकिन ये सभी प्रक्रियाएँ प्राकृतिक कारकों द्वारा नियंत्रित होती थी। लेकिन वर्तमान समय में हो रहे तापमान में वृद्धि मानव क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप हो रहा है। वैश्विक तापन किसी एक कार्य का परिणाम नहीं है बल्कि अनेक अंतर क्रियाओं की देन है।

भूमंडलीय उष्मण के कारण: 

       भूमंडलीय उष्मण के कई कारण हैं। इनमें प्रमुख कारण निम्नवत है-

(i) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि,

(ii) वनीय ह्रास,

(iii) ताप विद्युत संयंत्रों की स्थापना,

(iv) ओजोन परत में छिद्रीकरण,

(v) एलनीनो जलधारा,

(vi) निर्माण कार्य,

(vii) जीवाश्म ईंधनों का दहन,

(viii) औद्योगिकरण,

(ix) नगरीकरण,

(x) जनसंख्या में वृद्धि इत्यादि।

(i) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि-

            भूमण्डलीय उष्मण के लिए मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, हेलोन इत्यादि गैसें उत्तरदायी है। इन गैसों का सान्द्रण वायुमंडल में निरंतर बढ़ता जा रहा है। ये गैसें वायुमंडल में ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा भूमंडलीय ऊष्मण के लिये सर्वाधिक उत्तरदायी हैं।

       वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड बड़ी मात्रा में जीवाश्म ईंधन के जलने से, परिवहन साधनों से, औद्योगिकरण एवं नगरीकरण से, बढ़ती हुई जनसंख्या से प्राप्त हो रहा है। औद्योगिक क्रांति के पूर्व प्रतिवर्ष 2.8 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता था और उसका भी 30% भाग समुद्री वातावरण द्वारा अवशोषित कर लिया जाता था। 1997 में यह मात्रा बढ़कर 5.5 बिलियन टन प्रतिवर्ष हो गया। 2050 में इसका उत्सर्जन बढ़कर 5.6 बिलियन टन हो जाने की संभावना है। समुद्री वातावरण द्वारा इसकी अवशोषण की मात्रा नियत होने के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से वैश्विक तापन की समस्या उत्पन्न हुई है।

(ii) वनीय ह्रास-

      पेड़-पौधों कार्बन डाइऑक्साइड के अच्छे अवशोषक होते हैं। अर्थात पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड भोजन निर्माण के दौरान ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं लेकिन जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के साथ वनों की अंधाधुंध कटाई ने विकट पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।

      आवास एवं कृषि योग्य भूमि में विस्तार के कारण बीसवीं शताब्दी में उष्णकटिबंधीय वनों का तीव्र गति से ह्रास हुआ। भारत में प्रतिवर्ष अनुमानत: 17 लाख हेक्टेयर वनों की कटाई हो रही है। फलत: वनीय ह्रास के कारण कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण घटने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ते जा रही है। इसके कारण भूमंडलीय ऊष्मण में वृद्धि हो रही है।

(iii) तापविद्युत संयंत्रों की स्थापना-

       विश्व में बढ़ती हुई विद्युत ऊर्जा की माँग एवं पूर्ति हेतु काफी संख्या में तापीय संयंत्रों की स्थापना की गई है। इन संयंत्रों में वृहत पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का प्रयोग विद्युत उत्पादन हेतु किया जाता है। इसके कारण इससे भारी मात्रा में CO2, CO, NO2, NO, SO2, इत्यादि हानिकारक गैस उत्सर्जित होते हैं। ये सभी गैसें तापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं।

(iv) ओजोन परत में छिद्रीकरण- 

       ओजोन परत के छिद्रीकरण से तात्पर्य वायुमंडल की ओजोन परत में ओजोन नामक विशिष्ट गैस की कमी हो जाने से है। ओजोन एक त्रि-परमाण्विक गैस है जिसमें ऑक्सीजन के 3 परमाणु (O3) होते हैं। ओजोन समताप मंडल में धरातल से 20 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई तक सर्वाधिक पाई जाती है। इसी भाग को ‘ओजोन परत’ कहा जाता है।

      यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी के वायुमंडल में आने से रोक कर सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है किंतु विगत कुछ दशकों से मानवीय क्रियाकलापों द्वारा उत्सर्जित हानिकारक रसायनों जैसे- क्लोरोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन टेट्राक्लोराइड, क्लोरोफॉर्म और क्लोरीन इत्यादि के कारण ओजोन परत पतली होती जा रही है। जिसे ‘ओजोन छिद्रीकरण’ कहते हैं। ओजोन छिद्रीकरण भूमंडलीय उष्मण का एक प्रमुख कारण माना जाता है। 

(v) एलनीनो जलधारा- 

       अलनीनो उपसतही गर्म जलधारा है जो पेरू के तट से उत्पन्न होता है और विषुवत रेखा के सहारे पूर्वी अफ्रीका के तट तक फैल जाता है। इसके कारण समुद्र का तापमान 3℃ से 6℃ तक बढ़ जाता है। 1998 के पूर्व अलनीनो का प्रभाव चक्रीय रूप से 4 वर्ष के बाद दिखाई देता था। लेकिन 1998 के बाद इसका प्रभाव प्रत्येक वर्ष देखा जा रहा है। 

(vi) निर्माण कार्य- 

         बढ़ती हुई जनसंख्या के मद्देनजर लगातार निर्माण का कार्य जारी है। अर्थात शहर के नाम पर सीमेंट और कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। यह ऐसे जंगल है जिनमें वृक्ष का अभाव है। इसके कारण ये थोड़ी सी ताप प्राप्त कर स्थानीय वातावरण को गर्म कर देते हैं। जैसे- वर्ष 1998 में शिकागो नगर का तापमान 50℃ पहुँच गया। वर्ष 2004 में फ्रांस के कई नगरों का तापमान इतना अधिक बढ़ गया कि लगभग 200 लोग लू लगने से मर गए।

         उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त जीवाश्म ईंधनों का दहन, औद्योगिकरण, नगरीकरण, उपभोक्तावादी जीवन, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि के कारण भी भूमंडलीय उष्मण में वृद्धि हो रही है।

भूमण्डलीय उष्मण के परिणाम:- 

          भूमंडलीय उष्मण वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्या है। 3 फरवरी 2007 में आई.पी.सी.सी. द्वारा जारी की गई विश्वसनीय रिपोर्ट में भूमंडलीय उष्मण के कारण उत्पन्न भयानक परिणामों की ओर संकेत किया गया है। इसके कारण पृथ्वी के वातावरण पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकते है:-

(i) समुद्री जल स्तर में वृद्धि- भूमंडलीय उष्मण के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों तथा पर्वतीय हिमनदों के पिघलने से समुद्री जल स्तर के ऊपर उठने की आशंका है। इसके कारण तटीय इलाके जलमग्न हो जाएगे।

(ii) समुद्री जीवों पर संकट- तापमान वृद्धि का बुरा प्रभाव समुद्री जीवों पर भी पड़ेगा। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव पर रहने वाले सील, पेंग्विन, व्हेल आदी समुद्री जीवों के नष्ट हो जाने की आशंका है।

(iii) जलवायु परिवर्तन- तापमान में वृद्धि के कारण मौसम में लगातार अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहे हैं। परिणामस्वरूप अनावृष्टि, अतिवृष्टि, अकाल, लू और गर्म हवाओं का प्रकोप बढ़ने की संभावना है।

(iv) जमीन की उर्वरता में कमी- भू-मंडलीय उष्मण के कारण जमीन की उर्वरता घटने की आशंका है। परिणामस्वरूप फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

(v) जैव विविधत का ह्रास- पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण जैव-विविधता का ह्रास होने की आशंका है। कई जीव-जंतु और वनस्पतियाँ जलवायु परिवर्तन के कारण विलुप्त हो जाएगे।

(vi) प्रवाल भित्तियों का क्षरण- तापमान में बढ़ोतरी और असमान परिवर्तन के कारण विश्व प्रसिद्ध प्रवाल भित्तियाँ कुछ दशकों में नष्ट हो जायेंगे।

(vii) पर्वतीय हिमनदों का सिकुड़ना- तापमान में वृद्धि के कारण पर्वतीय हिमनद निरंतर पिघलते जा रहे हैं। जिन नदियों का उद्गम स्रोत पर्वतीय हिमनद है, उनमें भयंकर बाढ़ आने की आशंका है तथा हिमनद के नष्ट हो जाने से सदावाहिनी नदियों के सूखने का अंदेशा है। हिमालय क्षेत्र में कई हिमनद सिकुड़ते जा रहे हैं।

(viii) मानव स्वास्थ्य को खतरा- तापमान वृद्धि से मानव स्वास्थ्य को भी गंभीर खतरा है। जलवायु में परिवर्तन के कारण मध्य एवं उच्च अक्षांशों में कई जल जनित और कीटाणु जनित रोगों के फैलने की आशंका है। त्वचा कैंसर एवं आंखों से संबंधित बीमारियाँ बढ़ेंगी।

(ix) पारिस्थितिक असंतुलन- भूमंडलीय उष्मण के कारण पृथ्वी पर अवस्थित सभी पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन बढ़ रही है। परिणाम स्वरूप समस्त जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

(x) दावानल में वृद्धि- वैश्विक तापन के कारण दावानल में वृद्धि की संभावना है। USA के कैलिफोर्निया क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा इंडोनेशिया के जंगलों में यह समस्या प्रतिवर्ष उत्पन्न होने लगी है।

(xi) ऊर्जा संकट- तापमान में वृद्धि के कारण मध्य अक्षांशीय प्रदेशों में एयर कंडीशनर, पंखा, कूलर आदि के अधिक प्रयोग से विद्युत खपत बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा संकट उत्पन्न हो जाएगी।

भूमंडलीय उष्मण को नियंत्रित करने के उपाय:-

        भूमंडलीय उष्मण के नियंत्रण को लेकर विश्व स्तर  पर कई सम्मेलन और समझौते हुए जिनमें प्रथम विश्व सम्मेलन (1972) मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, (1987) पृथ्वी सम्मेलन, रियो डे जेनरियो (1992), क्योटो संधि (1997 व 2005), कोपनहेगन 2009 इत्यादि प्रमुख है। वर्ष 1997 में आयोजित क्योटो संधि 141 देशों द्वारा स्वीकार की गई कि 34 औद्योगिक राष्ट्रों का ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन वर्ष 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत कम करना है। किंतु इस दिशा में कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिए। अमेरिका जो सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करता है, स्वंय अपना हाथ पीछे खींचता नजर आ रहा है।

         भूमंडलीय उष्मण को कम करने की दिशा में निम्नलिखित कदमों के पहल की आवश्यकता है:-

(i) वनों की कटाई रोकते हुए भूमंडल के 33% भूभाग पर सघन वृक्षारोपण किया जाए ताकि अधिक उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण वृक्षों द्वारा किया जा सके।

(ii) कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन कम-से-कम किया जाए।

(iii) जनसंख्या तीव्र वृद्धि पर प्रभावी अंकुश लगाई जाए।

(iv) क्लोरो फ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन कम-से-कम किया जाए, साथ ही इसके विकल्प की खोज की जाए।

(v) उर्जा प्रदूषण रहित तकनीकों का विकास हो और इसके अनुसंधान की ओर ध्यान दिया जाए।

(vi) प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा वैकल्पिक स्रोत का विकास किया जाए।

(vii) पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु जन सहभागिता कार्यक्रमों को संचालित किया जाए।

(viii) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस और कारगर कानून बनाकर उसका दृढ़ता से अनुपालन किया जाए।

       अर्थात प्रत्येक विकसित और विकासशील दोनों देशों को मिलकर इस पर नियंत्रण रखना होगा। यदि समय रहते इस पर काबू नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम सभी इससे झुलस जाएंगे और जल प्रलय की विभीषिकाओं से बच नहीं पाएंगे।

निष्कर्ष:-

       उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी का बढ़ता हुआ तापमान वर्तमान विश्व की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्या है। यह समस्या मानवीय क्रियाकलापों की देन है। बेशक विकास की धारा को मोड़ा नहीं जा सकता है किंतु इसे मानवीय हित में इतना नियंत्रित तो अवश्य किया जा सकता है कि जिससे पृथ्वी पर मंडरा रहे इस गंभीर संकट को दूर किया जा सके। ऐसे विकास का कोई औचित्य नहीं है जिस कारण मानव अस्तित्व खतरे में पड़ जाए। पृथ्वी मानव के अलावा असंख्य जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों का भी घर है। अतः मानव को अपनी करतूतों पर लगाम लगानी चाहिए तथा “जियो और जीने दो” के सिद्धांत का पालन करते हुए पर्यावरण सुरक्षा में जुट जाना चाहिए।


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  6. Clouds (बादल)

  6. Clouds (बादल)


Clouds (बादल)⇒

Clouds (बादल)

संघनन- जल के गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को संघनन कहा जाता है। यदि हवा का तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे पहुंच जाये तो संघनन की क्रिया प्रारंभ होती है। संघनन की प्रक्रिया पर वायु के आयतन, तापमान, वायुदाब एवं आर्द्रता का प्रभाव पड़ता है।

यदि संघनन हिमांक (Freezing Point) से नीचे होता है, तो तुषार (Frost), हिम (Snow) एवं पक्षाभ मेघ (Cirrus Cloud) का निर्माण होता है।

यदि संघनन हिमांक से ऊपर होता है तो ओस, कुहरा, कुहासा एवं बादलों का निर्माण होता है।

 यदि संघनन पृथ्वी के धरातल के समीप होता है तो ओस (Dew), पाला (Frost), कुहरा एवं कुहासे का निर्माण होता है।

 जब संघनन की क्रिया अधिक ऊँचाई पर होती है तो बादलों का निर्माण होता है।

ओस (Dew)- हवा का जलवाष्प जब संघनित होकर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में धरातल पर पड़ी वस्तुओं (घास पत्तियों आदि) पर जमा हो जाता है, तो इसे ओस कहा जाता है। ओस के निर्माण के लिए साफ आकाश, लगभग शांत वायुमंडल, उच्च सापेक्षिक आर्द्रता एवं ठंडी तथा लंबी रात का होना आवश्यक है।

 ओस के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि तापमान हिमांक से ऊपर हो।

तुषार या पाला (Frost)- जब संघनन की क्रिया हिमांक से नीचे होती है (0°C या उससे कम पर) तो जलवाष्प जल कणों के बदले हिम कणों में परिवर्तित हो जाता है। इसे ही तुषार या पाला कहा जाता है। पाला के निर्माण के लिए उन सभी अन्य परिस्थितियों का होना आवश्यक है, जो ओस के निर्माण के लिए हैं।

नोट :- ओस या पाला ऊपर से नहीं गिरता है, बल्कि यह वहीं बनता है जहां हम इसे देखते हैं।

कुहरा (Fog)- कुहरा एक प्रकार का बादल है। जब जलवाष्प का संघनन धरातल के बिल्कुल समीप होता है तो कुहरे का निर्माण होता है। कुहरे में कुहासे की तुलना में जल के कण अधिक छोटे एवं सघन होते हैं।

कुहासा (Mist)- कुहासा भी एक प्रकार का कुहरा है, जिसमें कुहरे की अपेक्षा दृश्यता (Visibility) दूर तक रहती है। इसमें दृश्यता एक किलोमीटर से अधिक, परंतु दो किलोमीटर से कम होती है।

धुआंसा (Smog)- बड़े-बड़े शहरों में फैक्टरियों के निकट जब कुहरे में धुएं के कण मिल जाते हैं तो उसे धुआंसा (Smoke+Fog = Smog) कहा जाता है। धुआंसा कुहरे की तुलना में और अधिक सघन होता है एवं इसमें दृश्यता और भी कम होती है।

बादल (Clouds):- वायुमंडल में संघनन के पश्चात हिमकणों अथवा जलसीकरों (Droplets/Rain Drops) के समूह को बादल कहा जाता है। अर्थात् जब वायु का तापमान ओसांक (Dew-point) से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प धूल तथा धुँए के कणों पर केन्द्रित होकर बादल का रूप धारण कर लेती है।

कुहरा (Fog)- जब 100 मीटर से कम दूरी दिखाई दे।

कुहासा (Mist)- जब 100 मीटर से अधिक दूरी दिखाई दे।

तुषार/पाला (Frost)- पानी से हिम बनना

बादलों का निर्माण प्रायः क्षोभमंडल के ऊपरी भाग में होता है। बादल निर्माण हेतु वायुमंडल में जलवाष्प का होना एक अनिवार्य तत्व है।  वायुमंडल में जलवाष्प की प्राप्ति मुख्यतः तीन प्रक्रियाओं से होती है। 

(i) वाष्पीकरण (Evaporation)

(ii) वाष्पोत्सर्जन 

(iii) उर्ध्वपातन

       किसी वाष्प या गैस का द्रव या ठोस के रूप में परिवर्तन होना संघनन कहलाता है। वस्तुतः संघनन वाष्पीकरण का उल्टा प्रक्रिया होता है। वाष्पीकरण में जल गैस के रूप में तब्दील करता है जबकि संघनन में गैस द्रव्य या ठोस के रूप में बदलता है। वाष्पीकरण में गुप्त ऊष्मा ग्रहण किया जाता है जबकि संघनन क्रिया में गुप्त ऊष्मा बाहर की ओर निकलता है।

 वायु में जितना जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता है उतना ही जलवाष्प मौजूद हो तो उसे संतृप्त वायु कहते हैं।

जिस वायु में जितना आर्द्रता ग्रहण करने की क्षमता है और अगर उतनी मात्रा में जलवाष्प मौजूद नहीं हो तो वैसी वायु को असंतृप्त वायु कहते हैं।

 अगर संतृप्त वायु का तापमान बढ़ा दिया जाए तो वह असंतृप्त वायु में तब्दील कर जाती है।

 जब असंतृप्त वायु का तापमान घटा दिया जाए तो वह संतृप्त वायु में बदल जाती है।

 जिस तापमान पर वायु संतृप्त हो जाती है उस तापमान को ओसांक बिंदु (Dew Point) कहते हैं।

 जल के वाष्पीकरण से वर्षण तक निम्नलिखित चरण पाये जाते है:-

जल का वाष्पीकरण- असंतृप्त वायु- ओसांक बिंदु- संतृप्त वायु- संघनन- वर्षण

 संतृप्त वायु में संघनन की क्रिया तब ही प्रारंभ होती है जब वायुमंडल में सूक्ष्म जलग्राही नाभिक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। वायुमंडल में निम्नलिखित जलग्राही नाभिक मौजूद होते हैं।

1. लवण

2. सल्फर डाइऑक्साइड 

3. नाइट्रिक ऑक्साइड

डी. ब्रन्ट – वायुमंडल में 2000-5000 की संख्या में जल ग्राही नाभिक मौजूद रहने के बाद ही संघनन प्रारंभ होता है।

 जलग्राही कणों का आकार 0.01 माइक्रोन से 50 माइक्रोन तक होता है।

 जलग्राही नाविकों का तापमान सबसे कम होता है तभी उसके चारों ओर जलवाष्प का संघनन होता है। संघनन के पूर्व वायुमंडल की सापेक्षिक आर्दता 100% पहुँच जाती है।

 संघनन के बाद पहले धूंध या कुहासा उसके बाद कुहरा, कुहरा के बाद बादल और बादल के बाद जल बूँदों या हिमकणों का निर्माण होता है।

मेघाच्छान्नता का विश्व वितरण

        आकाश का जितना भाग मेघों से आच्छादित रहता है उसे  मेघाच्छान्नता कहते हैं। इसके वितरण नीचे के तालिका में देखा जा सकता है – 

 क्षेत्र-  मेघाच्छान्नता का विश्व में क्रम-  कारण- वर्षा

1. विषुवतीय क्षेत्र- दूसरे स्थान- संवहन धारा- सर्वाधिक

2. 30°-60° अक्षांश- प्रथम स्थान- शीतोष्ण चक्रवात- दूसरे स्थान पर

3. उपोष्ण कटिबंध उच्च वायुदाब – अति अल्प- प्रतिचक्रवात- अल्प

बादलों का वर्गीकरण

       बादलों का वर्गीकरण कई आधार पर किया जाता है। अन्तराष्ट्रीय मौसम विभाग ने 1932 ई० में बादलों को 3 वर्गों में बाँटा है-

1. अधिक ऊँचाई वाले बादल- 7-12 Km के बीच

2. मध्यम ऊँचाई वाले बादल- 2.5 -7 Km के बीच

3. निम्न ऊँचाई वाले बादल- 2.5Km के नीचे

1. अधिक ऊँचाई वाले बादल- 3 प्रकार

(i) Cirus Clouds (पक्षाभ बादल)

(ii) Cirro Stratus (पक्षाभ स्तरी बादल)

(iii) Cirro Cumulus (पक्षाभ कपासी बादल)

(i) Cirus Clouds (पक्षाभ बादल)-

        पक्षाभ बादल सबसे अधिक ऊँचाई पर बनने वाला बादल है। देखने में बच्चों के घुंघराले बाल या पंख की भांति होता है। बादलों में सूक्ष्म हिमकण पाए जाते हैं। जब यह आसमान में असंगठित रूप में मौजूद होता है तो मौसम साफ होने का सूचना देता है। लेकिन जब संगठित रूप से इसका विस्तार बहुत अधिक होता है तो मौसम खराब होने का सूचना देता है। इस बादल के कारण शाम के वक्त नैनाभिराम दृश्य (जो देखने में आकर्षित कर ले) उत्पन्न होता है।

(ii) Cirro Stratus (पक्षाभ स्तरी बादल)- 

         पक्षाभ स्तरी बादल 7 से 12 Km के बीच बनता है वर्गीकरण में इसे दूसरा स्थान प्राप्त है। इस कारण दूधिया और स्वरूप चादर के समान है। यह बादल सूर्य और चंद्रमा के चारों ओर प्रभामंडल (Halo) का निर्माण करते हैं। इस बादल की उपस्थिति बताती है कि निकट भविष्य में चक्रवात आने वाला है।

(iii) Cirro Cumulus (पक्षाभ कपासी बादल)-

         7-12 Km के बीच पाया जाता है। इसे वर्गीकरण में तीसरा स्थान प्राप्त है। इसकी संरचना रुई के ढेर के समान होती है। इसका रंग श्वेत होता है और इसका आकार लहरनुमा होता है।

        इसे मैकरल स्काई क्लाइड भी कहते हैं। ऐसे बादल से धरातल पर छाया का निर्माण नहीं होता।

2. मध्यम ऊँचाई वाले बादल- 2 प्रकार

(i) मध्य स्तरी बादल (Alto Stratus Clouds)

(ii) मध्य कपासी बादल (Alto Cumulus Clouds)

(i) मध्य स्तरी बादल (Alto Stratus Clouds):-

         यह मध्यम ऊँचाई का बादल है जो देखने में रुई के ढेर के समान होता है। इस बादल का रंग ग्रे या काला होता है। इससे कभी-कभी बूँदा-बूँदी होती है।

(ii) मध्य कपासी बादल (Alto Cumulus Clouds)

        इसे पताका मेघ कहा जाता है। यह भी रुई के ढ़ेर के समान होता है लेकिन इसका मध्य भाग काला या भूरा रंग का होता है जबकि बाहरी भाग चमकीला होता है। इस बादल के कारण कभी इंद्रधनुष का निर्माण होता है। ऐसे बादल पर्वतों के शिखर पर बनते हैं। इसलिए इसे पर्वतीय मेघ बादल कहा जाता है।

3. निम्न ऊँचाई वाले बादल- 3 प्रकार

(i) स्तरी कपासी बादल (Strato Cumulus Clouds

(ii) स्तरी बादल (Stratus Clouds)

(iii) स्तरी बर्षी बादल या बर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus Clouds)

         निम्न ऊँचाई पर ही दो अन्य विशिष्ट प्रकार के बादल बनते है:-

(i) कपासी बादल 

(ii) कपासी बर्षी बादल

(i) स्तरी कपासी बादल (Strato Cumulus Clouds) 

        यह 300-2500 m के बीच बनती है। इसमें बादल के कई स्तर मिलते हैं। जिसके कारण पृथ्वी पर गहरा छाया उत्पन्न होता है। इस बादल में कई स्तर उत्पन्न होते हैं तथा इससे कभी-कभी भारी वर्षा होती है।

(ii) स्तरी बादल (Stratus Clouds) 
       यह कुहासा के समान होता है। इस बादल का निर्माण दो विपरीत स्वभाव वाली हवाओं के मिलने से उत्पन्न होता है। इस बादल के कारण आकाश लंबे समय तक धुंधला रहता है और बूँदा-बाँदी की संभावना रहती है।
(iii) स्तरी बर्षी बादल या बर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus Clouds)
       इसे वर्षा वाला बादल भी कहते हैं क्योंकि इससे वर्षा अधिक होती है। यह बादल शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के उष्ण वाताग्र के क्षेत्र में तथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात के दौरान इस बादल का निर्माण होता है। इस बादल के कारण कभी-कभी ओले भी गिरते हैं।
कपासी बादल (Cumulus Clouds)
       इसका आकार फूल गोभी के समान होता है। इस बादल का निर्माण दोपहर के बाद विषुवतीय क्षेत्र में होता है। इस बादल का लम्बवत विस्तार अधिक होता है। यह बादल गर्जन एवं चमक के साथ वर्षा लाती है।
कपासी बर्षी बादल (Cumulo Nimbus Clouds)
          इसे थंडर क्लाउड या ओलावृष्टि या तूफान को जन्म देने वाला बादल कहा जाता है। इस बादल का आकार कीप के समान होता है। इस बादल के निचले भाग में वर्षा वाले बादल पाए जाते हैं। भारत में यह बादल मार्च-अप्रैल में बनता है। तड़ित झंझा, मूसलाधार वर्षा तथा ओला कपासी वर्षी बादल की प्रमुख विशेषता है।

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5. वर्षण / Precipitation

5. वर्षण / Precipitation


वर्षण (Precipitation)

             वर्षण का तात्पर्य जलचक्र के उस अवस्था से है जिसमें वायुमंडलीय आर्द्रता, जलबूँद, हिमकण या ओला के रूप में पृथ्वी की सतह पर गिरते हैं। जलबूँद एवं हिमकण का तात्कालिक स्रोत बादल होता है। बादलों का निर्माण संतृप्त वायु की संघनन क्रिया से होता है। बादलों का निर्माण बहुस्तरीय होता है।

      सामान्यत: निम्न ऊँचाई वाले बादल से जलबूंदों का वर्षण होता है जबकि ऊँचाई वाले बादल से हिमकणों का। जलबूँद या हिमकण का निर्माण जलग्राही नाभिक तापमान निम्न होने से प्रारंभ होता है। जलग्राही नाभिकों के चारों ओर जल के संघनन से जलबूँदों तथा हिमकणों का निर्माण होता है। जब संतृप्त वायु का तापमान गिर जाती है तो वायु आर्द्रता धारण करने की क्षमता खो देती है जिसके फलस्वरूप वर्षण की क्रिया प्रारंभ हो जाती है।

         मौसम वैज्ञानिकों ने वर्षण क्रिया को तीन वर्गों में बाँटा है:-

(1) हिम वर्षण

(2) जल वर्षण

(3) मिश्रित वर्षण

(1) हिम वर्षण – हिम वर्षण के  अंतर्गत हिमकण बादल से धरातल की ओर आते हैं। विश्व में हिमवर्षण के दो प्रमुख क्षेत्र है:-

(i) उच्च अक्षांशीय क्षेत्र 

(ii)उच्च पर्वतीय क्षेत्र

         उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में दोनों गोलार्ध के ध्रुवीय क्षेत्रों को शामिल करते हैं। आर्कटिक वृत्त के उत्तर और आर्कटिक वृत्त के दक्षिण हिमवर्षण सालों भर संपन्न होती है। उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड, साइबेरिया और अंटार्कटिका हिमवर्षण के प्रमुख क्षेत्र है।

           ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में हिमालय,आल्प्स, रॉकी तथा एंडीज जैसे पर्वतीय क्षेत्रों को शामिल करते हैं। हिमवर्षण के लिए यह आवश्यक है कि वायुमंडल तथा धरातल का तापमान हिमांक बिंदु से नीचे होना चाहिए लेकिन अगर दोनों के तापमान में भिन्नता हुई तो सहिम वर्षण (Sleet Precipitation)  होता है।

       इस प्रकार का वर्षण प्रायः आर्द्र प्रदेशों में होता है। इसमें कभी-कभी जलबूंदों का वर्षा होता है तो कभी हिमकणों का। सहिम वर्षण के लिए साइबेरिया का क्षेत्र विश्व प्रसिद्ध है। साइबेरिया क्षेत्र में ही मकान का आकार त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय होता है। जिसे परमाफ्रास्ट (Perma Frost) के नाम से जानते हैं।

★ परमाफ्रास्ट शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग पेल्टियर महोदय ने किया था।

(2) जल वर्षण:-   

      जब बादल से धरातल की ओर जलबूँद के रूप में वर्षण का कार्य होता है तो उसे जल वर्षण कहते हैं। जल वर्षण में जलबूँदों का आकार भिन्न-भिन्न हो सकता है। जब जलबूँद हवा में तैरते रहते हैं तो उसे फुहारा कहते हैं। जल वर्षण उष्ण एवं शीतोष्ण जलवायु प्रदेशों की विशेषता है।  जलवर्षण के लिए वायुमंडलीय तापमान ओसांक बिंदु से नीचे लेकिन हिमांक बिंदु से ऊपर होना चाहिए। जल वर्षण प्रक्रिया के दृष्टि से वर्षा तीन प्रकार की होती है:-

(i) संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall)

(ii) पर्वतीय वर्ष (Orographic Rainfall)

(iii) चक्रवाती वर्षा (Cyclonic Rainfall)

(i) संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall):-  

       संवहनीय वर्षा विषुवतीय प्रदेशों की विशेषता है। विषुवतीय के क्षेत्रों में सालों भर उच्च तापमान के कारण तथा न्यूनतम कोरियालिस प्रभाव के कारण गर्म (उष्ण) जलवाष्प से युक्त वायु लंबवत रूप से ऊपर उठती है। ऊपरी वायुमंडल में ताप की कमी के कारण संघनन की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। जिससे प्रतिदिन दोपहर के बाद (3-4 बजे) वर्षा होती है।

       यह वर्षा 5°N से 5°S अक्षांश के बीच होती है।  इन प्रदेशों में औसत वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है। यह वर्षा प्रति दिन 4:00 बजे शाम के आस-पास होती है। इसीलिए इसे 4 O’Clock कहते है। इस वर्षा के प्रमुख तीन क्षेत्र निम्न है – अमेजन बेसिन, जायरे बेसिन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपीय समूह।

वर्षण

        अफ्रीका के पूर्वी भाग और अमेजन बेसिन के पश्चिमी भाग में उच्चावच के प्रभाव के कारण संवहनीय वर्ष नही होती है।

(ii) पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall):- 

          पर्वतीय वर्षा में आर्द्र एवं उष्ण वायु पर्वतीय ढाल के सहारे अति ऊँचाई पर पहुँच जाते हैं। बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापीय ह्रास के कारण वायु संतृप्त होती है। पुनः जब संतृप्त वायु का तापमान ओसांक बिंदु के नीचे चला जाता है तो वर्षण की क्रिया प्रारंभ हो जाती है।

           पर्वतीय वर्षा में जिस ढाल के सहारे वायु ऊपर की ओर चढ़ती है उस भाग को अभिमुख ढाल कहते है। अभिमुख ढाल पर ही वर्षण का कार्य अधिक होता है। जबकि अभिमुख ढाल के विपरीत दूसरे ढाल को विमुख ढाल कहते हैं।

        विमुख ढालों पर वायु ढाल के सहारे नीचे उतरने की प्रवृत्ति रखती है और वर्षा नगण्य होती है। फलत: वृष्टि छाया प्रदेश का निर्माण करती है।

      पर्वतीय वर्षा दक्षिणी दिल्ली में एंडीज पर्वत के कारण, आस्ट्रेलिया के पूर्वी भाग में ग्रेट डिवाइडिंग रेंज के कारण, दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी भाग में ड्रेकेन्सवर्ग पर्वत के कारण, भारत के पश्चिमी तट में पश्चिमी घाट पर्वत के कारण पर्वतीय वर्षा होती है।

Precipitation

(iii) चक्रवाती वर्षा (Cyclonic Rainfall):-

         चक्रवाती वर्षा वह वर्षा है जब किसी निम्न वायुदाब केंद्र को भरने के लिए उच्च वायुदाब क्षेत्र से हवा चलती है तो ऐसी स्थिति में आर्द्र एवं उष्ण वायु लम्बवत रूप से ऊपर उठ जाते हैं और संघनित होकर जल वर्षण का कार्य करते हैं। चक्रवातीय वर्षा भी दो प्रकार की होती है। 

(a) उष्ण चक्रवाती वर्षा तथा 

(b) शीतोष्ण चक्रवाती वर्षा 

         8°-20° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्ध में उष्ण चक्रवात का निर्माण होता है। इसमें वायु तेजी से लंबवत रूप से ऊपर उठती है और मोटे बादलों का निर्माण कर जलबूँद के रूप में वर्षण का कार्य करती है।

         शीतोष्ण चक्रवातीय चक्रवात के कारण शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र का निर्माण होता है। इन्हीं वाताग्रो के सहारे मध्य प्रशांत क्षेत्रों में जल वर्षण का कार्य होता है। दक्षिण यूरोप, पश्चिम यूरोप शीतोष्ण चक्रवातीय वर्षा के लिए प्रसिद्ध है। शेतोष्ण चक्रवातीय वर्षा में जलवर्षण का कार्य धीरे-धीरे लेकिन कई दिनों तक चलता रहता है।

Precipitation

(3) मिश्रित वर्षण:-

     जब हिमकण एवं जलकण साथ-साथ धरातल की ओर गिरते हैं तो उसे मिश्रित वर्षण कहते हैं। यह उपोष्ण एवं महाद्वीपीय जलवायु क्षेत्रों की विशेषता है क्योंकि जब महाद्वीपीय क्षेत्र तेजी से गर्म होते हैं तो हवाएँ तीव्रता से लंबवत उठने लगती है। अगर उठती हुई वायु में आर्द्रता रही तो 7 किलोमीटर की ऊँचाई पर बहुस्तरीय बादलों का निर्माण करते हैं। नीचले क्रम के बादल से जलबूँदों का तथा ऊँचाई वाले बादल से हिमकणों का वर्षण होता है। जब जलबूँदों के साथ बड़े आकार के हिमकण धरातल पर गिरते हैं तो उसे ओला कहते हैं। भारत में अप्रैल एवं मई माह में ऐसे वर्षण को देखा जा सकता है। यह वर्षण समसामयिक एवं विनाशकारी होता है।


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4. HYDROLOGIC CYCLE / जलचक्र

4. HYDROLOGIC CYCLE / जलचक्र


HYDROLOGIC CYCLE / जलचक्र⇒

जलचक्र:- जल चक्र क्रिया हमारे वायुमंडल एवं पृथ्वी तंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता है। इसके अंतर्गत पार्थिव जल सतत स्थान एवं अवस्था में परिवर्तन लाते रहते हैं। अवस्था परिवर्तन  वाले जल चक्र को नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।

               जलचक्र में स्थान परिवर्तन जलवायु विज्ञान में विशेष महत्व रखता है। इसके अंतर्गत पृथ्वी की सतह से जल का गैसीय स्थानांतरण वायुमंडल में होता है। जब वायुमंडल की वायु संतृप्त हो जाती है और तापमान ओसांक बिंदु के नीचे चला जाता है तो पहले बादल उसके बाद जलबूँद एवं हिमकण का निर्माण होता है। ये जलबूँद एवं हिमकण वर्षण की क्रिया से पुनः धरातल पर गिरते हैं और जल स्रोतों में समाहित हो जाते हैं। इस तरह पृथ्वी के धरातलीय जल का वायुमंडल में जाना और वायुमंडल से पुनः धरातल की ओर आना ही भौगोलिक जलचक्र कहलाता है।

       जलचक्र के अंतर्गत जलीय अधिवास में सतत परिवर्तन होता है। लेकिन पृथ्वीतंत्र में अवस्थित जलीय अधिवासों में जल की मात्रात्मक अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे 97% जल महासागरों में स्थित है जबकि मात्र 3% भाग ही महाद्वीपों पर स्थित है।
         स्थलीय जल अधिवास में भी सन्तुलन की स्थिति कायम रहती है। स्थलीय जल का तात्पर्य स्वच्छ जल से है। जलचक्र के बावजूद इसका निश्चित अधिवासीय वितरण इस प्रकार से है:-
क्रम  स्वच्छ जल का अधिवासित क्षेत्र  स्वच्छ जल का प्रतिशत (अगर 3% को 100 इकाई माना जाय)
1. हिम चादर और हिमानी  75%
2. भूमिगत जल  24.575%
3. झील  0.300%
4. मृदा नमी  0.060%
5. वायुमंडल 0.035%
6. नदी  0.030%

        MTC के अनुसार (1971) जल के प्रमुख स्रोत आधिवासीय क्षेत्र है। इन आधिवासीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न अवधि तक अधिवासित होते हैं। इन अधिवासित क्षेत्रों के जल भी जलचक्र में भाग लेते हैं। अधिवासीय समय को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

क्रम अधिवासीय क्षेत्र औसत समय 
1. वायुमंडल 10 दिन तक जल रहता है 
2. नदी दो सप्ताह 
3. झील 10 सप्ताह 
4. मृदा 2-50 सप्ताह 
5. भूमिगत जल  1 वर्ष से 10 हजार वर्ष 
6. समुद्री जल  3600 वर्ष
7. ध्रुवीय जल  15000 वर्ष 
             
       इस तरह ऊपर के तथ्यों/तालिका से स्पष्ट है कि अलग-अलग अधिवासीय क्षेत्र के जल अलग-अलग समय तक अधिवासित होते हैं।
    जलवायु विज्ञानवेताओं ने पृथ्वीतंत्र में चलने वाला जलचक्र को 5 वर्गों में बाँटा है:-
(i) वायुमंडलीय जलचक्र क्रिया
(ii) बाधित जलचक्र क्रिया
(iii) लघु जलचक्र क्रिया
(iv) लंबित जलचक्र क्रिया
(v) सामान्य जलचक्र क्रिया
(i) वायुमंडलीय जलचक्र क्रिया
          वायुमंडल में बादल तैराव की स्थिति में होते हैं। जब उसका तापमान ओसांक बिंदु के नीचे जाता है तो जलबूँद के रूप में तब्दील होकर धरातल पर आने का प्रयास करते हैं लेकिन वायुमंडलीय जलचक्र में जलबूँद पृथ्वी के धरातलीय सतह पर नहीं पहुँच पाते। सूर्य के तापीय प्रभाव में आकर वर्षा के जल वाष्प के रूप में बदलकर पुनः बादल के रूप में तब्दील कर जाते हैं। चूँकि यह संपूर्ण क्रिया वायुमंडल में चलती रहती है इसीलिए इसे वायुमंडलीय जलचक्र क्रिया कहते हैं।
(ii) बाधित जलचक्र क्रिया
              जब समुद्र का वाष्पीकृत जल वायुमंडल में पहुँचता है और संघनित होकर बादल का निर्माण करता है तथा पुनः बादल से जलबूँद या हिमकण स्थलखंड पर वर्षण के रूप में पहुँचते हैं। लेकिन वर्षण के ये जलबूँद या हिमकण पुनः समुद्र में न पहुँचकर मृदा या वनस्पति में समाहित हो जाते हैं। चूँकि यह स्रोत तक नहीं पहुँच पाते हैं और वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया में जल वायुमंडल में आ जाते हैं। इसीलिए इसे बाधित जलचक्र कहते है।
 
(iii) लघु जलचक्र क्रिया
           विषुवतीय क्षेत्रों में प्रतिदिन समुद्र का जल वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में पहुँचता है और दोपहर के बाद संघनित होकर पुनः धरातल या समुद्री सतह पर वर्षा के रूप में लौट आता है। ऐसे जलचक्र को ही लघु जलचक्र क्रिया कहते हैं।

(iv) लंबित जलचक्र क्रिया
            जिस जलचक्र में वर्षण का जल ध्रुवीय हिमानी या भूमिगत जल का अंग बन जाता है तो वैसी स्थिति में जल लंबे समय तक हिमानी या भूमिगत जल के रूप में अधिवासित होते हैं। ऐसे ही जलचक्र को लंबित जलचक्र किया कहते हैं।
 
(v) सामान्य जलचक्र क्रिया
         सामान्य जलचक्र में समुद्री जल वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में पहुँचता है यह जलवाष्प संघनित होकर पहले बादल का निर्माण करता है। उसके बाद संघनित होकर जलबूँद के रूप में स्थल पर गिरता है। पुनः यहाँ से जल अपवाह तंत्र के माध्यम से समुद्र तक पहुँच जाता है ऐसे ही जलचक्र को सामान्य जलचक्र कहते हैं।
निष्कर्ष

    इस तरह ऊपर के तथ्यों  से स्पष्ट है कि जलचक्र हमारे वायुमंडल का प्रमुख घटक है। यही वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से आर्द्रता एवं जल का सतत वितरण होता रहता है। इसके अलावा जल के सभी अधिवासीय क्षेत्र में जलीय अनुपात को नियत रखता है। वायुमंडल को स्वच्छ बनाए रखने में मदद करता है। पर्यावरणीय संतुलन को कायम रखता है। अतः जलचक्र रोके जाने वाले किसी कदम को रोका जाना आवश्यक है।


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3. हवाएँ / Winds

3. हवाएँ (Winds)



हवाएँ

       हवा तीन प्रकार के होते है- 

1. प्रचलित हवा (Permanent or Planetary Winds)

     वैसी हवा जो सलोंभर निश्चित दिशा में बहती है। जैसे- वाणिज्यिक हवा, पछुआ हवा, ध्रुवीय हवा।

2. मौसमी हवा (Periodic or Seasonal Winds)

       वैसी हवा जो मौसमी विशेष में निश्चित दिशा में बहती है।

3. स्थानीय हवा (Local Winds)

        वैसी हवा जो स्थानीय परिस्थितियों के प्रभाव से उत्पन्न होती है। ये प्रभाव इसके दिशा निर्धारित करते है। यही कारण है कि अलग-अलग स्थानीय हवा के अलग-अलग दिशा होती है

स्थायी /प्रचलित/ग्रहीय वायु

      उच्च वायुदाब पेटियाँ ही वायु के स्रोत क्षेत्र होते हैं। H.P. से ही वायु L.P. की ओर चला करती है। फेरल नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में वायु दायीं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में वायु बायीं ओर मुड़ जाती है। अपने मार्ग से विचलन का प्रमुख कारण पृथ्वी की घूर्णन गति है। अतः पृथ्वी रूपी ग्रह का प्रभाव वायु पर पड़ता है इसलिए ऐसे वायु को ग्रहीय वायु करते हैं। यह तीन प्रकार के होते हैं

1. वाणिज्यक/व्यापारिक/सन्मार्गी वायु (Trade Winds)

2. पछुआ वायु (Westerlies)

3. ध्रुवीय वायु (Polar Winds)

1. वाणिज्यक/व्यापारिक/सन्मार्गी वायु-

       इसका स्रोत क्षेत्र उपोष्ण भार का क्षेत्र होता है। उत्तरी गोलार्ध में इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूरब से उत्तर-पश्चिम की ओर होती है। इस हवा का लक्ष्य क्षेत्र विषुवतीय निम्न भार का केंद्र होता है।

      दोनों गोलार्द्धों से चलने वाली वाणिज्यिक हवाएँ विषुवतीय निम्न वायुदाब के अंतर्गत मिलने की प्रवृत्ति रखती है। जिसे अंतर उष्ण अभिसरण (ITCZ) कहते हैं। इस अभिसरण के बाद वायुदाब में थोड़ी वृद्धि होती है जिसके कारण वायु में गतिशीलता समाप्त हो जाती है, जिसे शांत पेटी या डोलड्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। डोलड्रम का निर्माण प्रायः समुद्री सतह पर होता है। विषुवतीय क्षेत्र में वायु के अभिसरण से प्रतिरोधी विषुवतीय वायु भी उत्पन्न होती है जिसे विषुवतीय पछुआ हवा कहते हैं।

2. पछुआ वायु

       इस वायु का भी स्रोत क्षेत्र उपोष्ण उष्ण वायुदाब का क्षेत्र होता है लेकिन इसका लक्ष्य क्षेत्र उपध्रुवीय निम्नवायु दाब का क्षेत्र होता है। उतरी गोलार्द्ध में इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में उतर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। यह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली वायु है जिसके  कारण तापमान में सामान्यतः कमी आती है।

      इस वायु का अभिसरण ध्रुवीय वायु से होता है। ध्रुवीय वायु अत्यधिक ठंडा जबकि उसके तुलना में पछुआ वायु गर्म होता है। इसीलिए दोनों मिलकर एक वाताग्र का निर्माण करते है और अंततः वाताग्र के सहारे (शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात) की उत्पति होती है।

      दक्षिण गोलार्द्ध में पछुआ वायु तुलनात्मक दृष्टि से अधिक स्थिर और बाधारहित मार्ग से गुजरती है क्योंकि दक्षिण गोलार्द्ध में समुद्र का विस्तार अधिक हुआ है। जब पछुआ हवा 40° दक्षिण अक्षांश के पास से गुजरती है तो उसे गरजता चालीसा (Roaring Forties) कहते है। 50°S अक्षांश के पास प्रचण्ड पचासा या गरजता पचासा (Furious Fifties) और 60°S अक्षांश के पास चीखता साठा (Shrieking Sixties) कहलाता है।

3. ध्रुवीय वायु

      इसका स्रोत क्षेत्र ध्रुवीय उच्च वायुदाब का क्षेत्र होता है और लक्ष्य क्षेत्र उपध्रुवीय निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में उतर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूरब से उत्तर-पश्चिम की ओर चलती है।  ध्रुवीय वायु की पछुआ वायु से मिलकर शीतोष्ण चक्रवात को जन्म देती है।

निष्कर्ष:

     ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के जलवायु और मौसमी परिस्थतियों के निर्माण में वायुदाब पेटी और स्थायी हवा का विशेष योगदान है।

स्थानीय हवा/LOCAL WINDS

         स्थानीय वायु मौसम विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है क्योंकि ये बादल निर्माण में मदद करते है। यह दो प्रकार का होता है।

(A) गर्म स्थानीय वायु

(B) ठंडी स्थानीय वायु

(A) गर्म स्थानीय वायु 

1. सिरक्को (Sirocco)

◆ यह हवा सहारा मरुस्थल में उत्पन्न होकर भूमध्यसागरीय भागों में प्रवाहित होती है।

◆ तापमान 3.7℃

◆ सापेक्ष आर्द्रता 10-20%

◆ यह हवाएँ लगातार 24 घंटे से 43 घंटे तक चला करती है।

स्रोत क्षेत्र- सहारा मरुस्थल

◆ धूल के कणों से वायुमंडल इतना अंधेरा हो जाता है कि सूर्य भी दिखाई नहीं पड़ता।

◆ यह हवाएँ भूमध्य सागर को पार करके दक्षिण फ्रांस तथा इटली पहुँचती है तो इनमें आर्द्रता की मात्रा अधिक पाई जाती है। इस आर्द्रता को यह भूमध्य सागर से प्राप्त कर लेती है।

◆ इटली में जब बारिश होती है तो इन बालू के कणों के कारण वर्षा की बूँदे लाल रंग की हो जाती है जिसे Blood Rain कहते हैं।

◆ सिरक्को को अलग-अलग देश में अलग-अलग नाम से जानते हैं।

(i) खमसिन

◆ मिस्र के डेल्टा की ओर चलने वाली धूल भरी आँधी है जिसका स्रोत क्षेत्र सहारा है।

◆ प्रायः वसंत ऋतु में ही चलती है।

(ii) लेवेची

◆ स्पेन में सहारा क्षेत्र से चलने वाली हवा।

(iii) लेस्ट

◆ मदिरा तथा कनारी द्वीप समूह में चलने वाले गर्म एवं शुष्क पूर्वी हवाओं को, जो सहारा के उष्ण मरुस्थल से चलती है, लेस्ट के नाम से पुकारा जाता है।

(iv) हरमट्टान

◆ इस पवन की उत्पत्ति शीतकाल में सहारा मरूमदेश में होती है।

◆ यह पश्चिम अफ्रीका के सहारा से उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में चलने वाले गर्म एवं अति शुष्क हवा है।

◆ गिनी के तट पर इसका प्रभाव शीतलकारी होता है।

◆ नाइजीरिया और घाना में इसे डॉक्टर हवा कहते हैं क्योंकि वहाँ के निवासियों को आर्द्र मौसम से राहत देती है।

◆ परंतु सहारा के मरुस्थल में यह पवन ऊँट के काफीलों के लिए काफी कष्टदायक होती है।

2. ब्रिकफील्डर (Brick Filder)

◆ ऑस्ट्रेलिया में मरुस्थलीय प्रदेशों में चलने वाले गर्म एवं शुष्क पवन को ब्रिकफील्डर कहा जाता है।

◆ दक्षिण आस्ट्रेलिया (एडिलेड के पश्चिम) में उत्तर से दक्षिण की ओर चलने वाली हवा है।

3. ब्लैक रोलर

◆ उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदान में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर तेज धूल भरी आँधियाँ चला करती है। जिनसे कभी-कभी मार्ग में पड़ने वाली इमारतें रेत के ढेर के नीचे दब जाती है। इन स्थानीय हवा को ब्लैक रोलर कहा जाता है।

स्रोत क्षेत्र- कोलरेडो के मरुस्थलीय क्षेत्र (न्यू मैक्सिको)

प्रभाव- मिसीसिपी मिसौरी के मध्यवर्ती क्षेत्र में

◆धूल कण का आकार बड़ा-बड़ा होता है।

4. शामल

◆ मेसोपोटामिया तथा फारस की खाड़ी की ओर उत्तर-पूरब से चलने वाली गर्म हवा को शामिल कहा जाता है।

◆ इराक में चलने वाली हवा है।

◆ वस्तुतः यह सिमूम हवा ही है।

5. नार्वेस्टर

◆ न्यूजीलैंड में वहाँ की पर्वत मालाओं से उत्पन्न गर्म, शुष्क तथा  झोंकेंदार पवन को नॉर्वेस्टर कहा जाता है।

6. गिबली

◆ लीबिया में सहारा क्षेत्र में चलने वाली हवा।

7. चिली

◆ ट्यूनीशिया की स्थानीय हवा जो सहारा क्षेत्र से चलती है।

◆ यह धूल भरी आंधी के समान है।

8. सिमूम

◆ अफ्रीका एवं अरब के मरुस्थलों में गर्म एवं शुष्क आँधियाँ चलती है जिनको सिमूम कहते हैं।

◆ यह अरब मरुस्थल के मध्य से चलने वाली हवा है जो इराक और कुवैत की ओर (पर्शियन गल्फ) चलती है।

◆ इनके साथ रेत की मात्रा अधिक होती है जिससे दृश्यता समाप्त हो जाती है।

◆ यह बवण्डर की तरह उठती है।

◆ यह दमघोंटू हवा है।

9. लू 

◆ गर्मी के महीने में उत्तरी भारत में चलने वाली पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी गर्म तथा अत्यधिक शुष्क वायु को लू कहते हैं।

◆ थार के मरुस्थल से उत्तरी भारत एवं पाकिस्तान के मैदान में मई एवं जून में प्रवाहित होती है।

◆ इनकी गति पर प्रायः 20 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक होती है।

◆ उत्तर में लू दोपहर के थोड़ा पहले से सूर्यास्त तक प्रभावित होती है।

◆ मानसून के आविर्भाव के साथ लू खत्म हो जाती है।

◆ यह गर्म हवा है जिसकी धूलकण बनारस तक और इसका प्रभाव भागलपुर तक रहता है।

तापमान- 40℃ से 50℃

◆ इसे Heat Waves भी कहते हैं।

10. काराबूरान

यह मध्य एशिया के तारिम बेसिन और गोबी मरूस्थल से चलने वाली गर्म हवा है।

यह धूल से भरी वायु है।

मध्य एशिया में लोएस का मैदान का निर्माण इसी वायु से हुआ है।

11.  सांता आना (Santa Ana)

पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित घाटियों में जब ऊँचाई पर एकत्रित वायु पूंज तीव्र गति से नीचे उतरती है, तो उन शुष्क और गर्म हवाओं को फॉल विन्डस (fall winds) की संज्ञा प्रदान की जाती है।

उ० अमेरिका के कैलिफोर्निया में सांताआना कैनियन (घाटी) से होकर तटवर्ती मैदानों (कैलिफोर्निया) की ओर चलने वाली धूल भरी आँधी को सांताआना कहा जाता है।

ये आंधियाँ उत्तर अथवा उत्तर- पू० की ओर से चलती है।

उत्पति का मूल स्थान- ग्रेट बेसिन

शुष्कता अत्यधिक

अत्यधिक शुष्क एवं गर्म हवाओं से कैलीफोर्निया के फल के बगीचों की अपार क्षति होती है।

प्रबल वेग

इन हवाओं से पेड़ सूख जाती है तथा जंगलों में आग लग जाती है।

हवा में रेत की महीन कणों की मात्रा अधिक होने के कारण श्वास लेना भी कठिन हो जाता है।

12. योमा (Yoma)

सांताआना के समान जापान में चलने वाली गर्म हवा को योमा कहा जाता है।

➤  पश्चिमी तट पर ताप को बढ़ा देता है।

यह जाड़े की ऋतु में साइ‌बेरिया से आने वाली ठंडी हवा के प्रभाव को कम करती है।

इसका प्रभाव होन्शू द्वीप पर पड़ता है।

13. जोंडा (zonda)

एंडीज पर्वत से प० पेंटागोनियाँ में चलने वाली स्थानीय हवाओं को जोंडा कहते है।

यह सांताआना के समान है।

पम्पास प्रदेश (द० अमेरिका) में चलने वाली है।

यह पम्पास के मैदान में चारे की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

यह घाटियों से एंडीज पर्वत के पूरब की ओर उतरने वाली हवा है।

14. फॉन (Fochn)

➤ उन पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ चक्रवातीय तुफान चला करते हैं, फॉन नामक गर्म और शुष्क स्थानीय हवायें पायी जाती है।

➤ इनकी उत्पति पर्वतों के वायु विमुख ढाल की ओर वायु के अवतलन के कारण होती है।

➤ यह आल्प्स से उत्तर की ओर चलने वाली हवा है।

➤ चीनूक और फॉन का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से 15 डिग्री सेल्सियस तक होता है इसलिए जाड़े के लिए यह उपयुक्त होती है।

➤ इस स्थानीय हवा को तथा ऑस्ट्रिया तथा जर्मनी में फॉन कहा जाता है।

➤ इसका प्रभाव स्वीटजरलैंड पर भी पड़ता है।

➤ यह हवा सेब, अंगूर की खेती के लिए उपयुक्त होती है।

15. चिनूक (chinook)

➤ संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तरी अमेरिका) में रॉकी पर्वत के पश्चिमी ढाल के सहारे चढ़ती है एवं पूर्वी ढाल के सहारे गर्म होकर उतरती है जो कोलेरेडो से कोलंबिया तक के प्रांतों को प्रभावित करती है।

इन हवाओं को पश्चिमी कनाडा तथा USA में चिनूक कहा जाता है।

ये हवाएं अधिकांशत: जाड़े के ऋतु में प्रभावित होती है।

➤ मृत घाटी सियरा नेवादा के पवन विमुख ढाल पर स्थित है।

➤ फॉन तथा चिनूक हवाओं के गर्म होने के दो प्रमुख कारण है:-

(i) वायु अभिमुख ढाल पर आरोही पवन में संघनन की गुप्त ऊष्मा द्वारा वायु के तापमान में वृद्धि है।

(ii) उन हवाओं के अवरोहण के समय संपीडन के कारण उनके तापमान में अतिरिक्त वृद्धि है।

इसके तापमान बढ़ने की दर 10 से 15 मिनट में 3ºC से 10ºC तक रहती है। 24 घंटे में 12 से 15ºC तापमान बढ़ जाता है।

➤ इसे हिम भक्षिणी Snow Eaters भी कहा जाता है।

➤चिनूक हवा शुष्क रुद्दोष्म दर से गर्म होता है

अन्य गर्म हवा

16. बाग्यो (Bayuio)

➤ फिलिपिंस में चलने वाली उष्ण कटिबंधीय चक्रवातीय हवा है

➤ यह उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात भी है।

17. सुखोवे

➤ रूस एवं कजाकिस्तान में चलने वाली गर्म हवा है।

18. गोरिच

➤ ईरान में प्रवाहित होने वाली गर्म एवं शुष्क पवन है।

19. मारिन

➤ द० फ्रांस में बहने वाली गर्म एवं आर्द्र पवन है।

20. अयाला

➤ फ्रांस के मध्य मैसिफ में चलने वाली गर्म हवा है।

21. कोयम बैग

➤ यह इंडोनेशिया में चलने वाली गर्म हवा है।

➤ इससे तम्बाकू के फसल को हानि होती है।

22. सिस्टन (seistan या 120 दिन की पवन)

➤ पूर्वी ईरान की गर्म हवा है।

23. वीरोजन (virozon)

➤ पेरू तथा चिली के प० तटों पर बहने वाली हवा है।

24. वेन्डावेल्स (vendavales)

➤ जिब्राल्टर तथा स्पेन के पूर्वी तट पर चलने वाली ठंडी हवा को वेन्डावेल्स कहते है।

25. टेम्पोराल्स (Temporals)

➤ मध्य अमेरिका के प्रशांत तट पर की हवा है।

➤ मैक्सिको की भी हवा है।

26. सोमून (Somun)

➤ ईरान में कुर्दिस्तान पर्वत से उत्तर-पश्चिम की हवा है।

27. हबूब (Haboob)

➤ सूडान में उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चलने वाली हवा है।

➤ स्रोत- सहारा मरुस्थल

28. ग्रेगल

➤ पश्चिमी यूरोप में उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चलने वाली हवा है।

29. मेस्ट्रो (Maestro)

➤ भूमध्यसागरीय क्षेत्र से उ०-प० (स्पेन और पुर्तगाल की ओर चलने वाली हवा)

30. बर्ग

➤ द० अफ्रीका में फॉन के समान वायु, जो आंतरिक पठारी भाग से तटवर्ती क्षेत्र की ओर चलती है।

(B) ठंडी स्थानीय वायु

गुरुत्व पवन (Gravity Winds):-

     समुद्र के तटवर्ती क्षेत्रों में जहां पठार अथवा पर्वतों से घिरे मैदानी भाग है वहां शीत ऋतु में भारी मात्रा में शीतल वायु एकत्रित हो जाती है। इन पठारों अथवा पर्वतों के ढालों से खिसक कर वायु की कुछ राशि घाटियों तथा नदी कंदराओं में एकत्रित हो जाती है।

     साधारण स्थिति में ये हवाएं मंद पवन या समीर के रूप में तट की ओर प्रवाहित होती है। किंतु जब कभी चक्रवातों का आगमन होता है तो न्यून वायु भार व्यवस्था के अंतर्गत शीतल और भारी वायु राशि प्रबल वेग के रूप में तट की ओर प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार के पवनों को अवरोही पवन, गुरुत्व पवन, फॉल विंड्स (Fall Winds), ड्रेनेज विंड्स (Drainage Winds) अथवा केटाबेटिक विंड्स आदि कई नामों से अलंकृत किया जाता है।

    इन अवरोही पवनोंं को विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है:-

गुरुत्व पवन (Gravity Winds):-

(i) बोरा (Bora)

➤ बोरा एक शीतल स्थानीय पवन है जो उत्तर/उ०-पू० दिशा से एड्रियाटिक सागर के उत्तरी तट पर चला करता है।

➤ इन पवनों का वेग 128 km/h से लेकर 196 km/h hota है।

➤ तीव्र झोंका के साथ चलने वाली शीतल हवा है।

➤ यह आल्प्स पर्वत की हवा है।

➤ यह आल्प्स पर्वत के दर्रों से आनेवाली हवा है।

➤ यह फॉन का उल्टा हवा है।

➤ यह इटली, यूनान, युगोस्लाविया के तट पर कष्टकर स्थिति उत्पन्न करती है।

➤ रसेदार फसलों के लिए हानिकारक है।

(ii) गिरती पवन (Fall Winds)

➤ नार्वेजियन तट पर इसको गिरती पवन (Fall Winds) कहा जाता है।

(iii) मिस्ट्रल (Mistral)

➤ फ्रांस के भूमध्यसागरीय तट पर गुरुत्व पवन को मिस्ट्रल कहा जाता है।

➤ यह द० फ्रांस की हवा है जो मध्यवर्ती यूरोप से आती है और भूमध्यसागर की ओर बहती है।

➤ रसेदार फसलों के लिए हानिकारक होती है।

हिमझंझा (Blizzard)

➤ अत्यधिक सर्द, वेगवान तथा हिमकणों से युक्त पवन को हिम झंझा कहा जाता है।

➤ प्रारंभ में इस पवन का नामकरण USA स्थित रॉकी पर्वत के पूर्व की ओर मैदानी भागों में चलने वाली बर्फीली आंधियों के लिए किया गया था।

➤ इनकी उत्पत्ति शीतकालीन चक्रवातों के पृष्ठ भाग में स्थित प्रतिचक्रवातों से होती है।

➤ इनमें भारी मात्रा में हिमकण प्रवाहित होती है।

➤ यह जाड़े की ऋतु में उत्तरी अमेरिका में ध्रुवीय प्रदेश से आने वाली हवा है।

➤ कपास, प्याज के लिए हानिकारक साबित होता है।

➤ इससे उत्तरी अमेरिका में पाला पड़ने लगता है।

➤ आजकल उच्च अक्षांशों में चलने वाली पवनों में यदि हिमकण मिश्रित होते है तो उन्हें ब्लिजार्ड कहा जाता है।

➤ अंटार्कटिका में प्राय: ऐसे हिमझंझावत चला करते है जिनमें पवन का वेग कभी-कभी 80 Km/h तथा तापमान -7ºC होता है।

(i) बुरान (Buran)/ पुर्गा

➤ सोवियत रूस तथा मध्य साइबेरिया में उ०-पू० से चलने वाली अत्यधिक सर्द हवाओं को बुरान कहा जाता है तथा बर्फीली आंधियों को पूर्गा (Purga) कहते है।

(ii) बाइज (Bise)/लेवांतर

➤ शीत ऋतु में प्रबल वेग से चलने वाली अत्यधिक ठंडी हवाओं को दक्षिणी फ्रांस में बाइज कहा जाता है तथा स्पेन में लेवांतर (Levanter) कहा जाता है। स्रोत क्षेत्र- Northerly Winds.

➤ तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है जबकि मिस्ट्रल का तापमान हिमांक से ऊपर रहता है।

(iii) पैम्पीरो (Pampero)

➤ द० अमेरिका में अर्जेंटीना के पंपास क्षेत्र में उरुग्वे से प्रचंड वेग वाली सर्द हवाएं चला करती है जिन्हें वहां पैम्पीरो कहते है।

➤ इन हवाओं के साथ धूल भरी आंधियां भी चला करती है।

(iv) पापागायो (Papagayo)

➤ कोस्टा रीका के उत्तरी-पश्चिमी तट तथा समीपवर्ती प्रशांत तटवर्ती क्षेत्रों में पापागायो की खाड़ी में शीतकालीन उत्तर-पूर्वी हवाएं चलती है जिन्हें उस खाड़ी के नाम पर पापागायो कहा जाता है।

➤ ये हवाएं बड़ी प्रचंड होती है।

(v) टेहुयांटिपेकर (Tehuanterpecer)

➤ दक्षिणी मैक्सिको तथा उत्तरी मध्य अमेरिका से जाड़े के मौसम में धूलभरी तेज आंधियाँ चला करती है जिसे टेहुयांटिपेकर कहा जाता है।

➤ कोलेरेडो और ग्रेट बेसिन से जाड़े की ऋतु में चलती है।

(vi) फ्राइजेम (Friagem)

➤ ब्राजील के उष्ण कटिबंधीय कम्पोज तथा मध्य अमेजन घाटी में मई तथा जून के महीनों में भीषण शीत लहरी का प्रकोप हो जाता है, फ्राइजेम कहा जाता है।

➤ इन सर्द हवाओं का प्रकोप 3 से 5 दिन रहता है।

➤ जाड़े की ऋतु में एंडीज पर्वत से नीचे उतरने वाली हवा है।

➤ यह भी आनंददायक हवा है।

सदर्न बस्टर (Southern Buster)

➤ ध्रुवीय प्रदेशों से द० ऑस्ट्रेलिया (न्यू साउथ वेल्स) में प्रवाहित होने वाली हवा है।

नेवाडोह

➤ यह दक्षिणी अमेरिका के एंडीज के हिम क्षेत्रों से इक्वाडोर की उच्च घाटियों में प्रवाहित होने वाली पवन है।

➤ यह एक पर्वत समीर है।

ट्रामोण्टाना

➤ पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में शीत काल में प्रवाहित होने वाली शुष्क एवं शीतल हवा है।

केप डाक्टर

➤ द० अफ्रीका के पठारी क्षेत्र से दक्षिणी तट की ओर बहती है।

➤ इस हवा को टेबल क्लॉथर कहा जाता है क्योंकि यह पवन पर्वतीय क्षेत्रों में बादलों का निर्माण करती है।

नार्दर (Norther)

➤ यह वास्तव में एक ध्रुवीय पवन है जो अवरोध के अभाव के कारण दक्षिण में अमेरिका के टेक्सास एवं खाड़ी तटीय क्षेत्रों तक पहुंच जाती है।

➤ इसका अगला क्रम मध्य अमेरिका में Norte कहलाता है।

विलीवाव (Willywaw)

➤ यह एक गुरुत्व पवन है।

➤ अंटार्कटिका में शीतल और भारी हवाएं पठारी ढालों से नीचे उतरकर तीव्र वेग से चलती है जिसे विलीवाव कहा जाता है।

➤ अलास्का में इस पवन को बिलिबॉब कहते है।

➤ जब सूर्य दक्षिणायन होती है तब यह पवन चलती है।

मौसमी हवा या सामयिक पवन

      मौसम के अनुसार या समय के साथ चलने वाली हवा को मौसमी हवा कहते हैं। यह कुल तीन प्रकार के होते हैं-

1. स्थलीय समीर और सागर समीर 

2. पर्वत समीर और घाटी समीर 

3. मानसून पवनें

1. स्थलीय समीर और सागर समीर (Land Breeze and Sea Breeze)

दिन के समय समुद्र के निकटवर्ती क्षेत्र, समुद्र की तुलना में जल्दी गर्म हो जाते हैं जिससे स्थल पर LP का और समुद्र पर HP का निर्माण हो जाता है जिससे हवा समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने लगती है, इसे सागरीय या समुद्री समीर कहते हैं। 

इसके विपरीत रात के समय पार्थिव विकिरण के कारण स्थलीय भाग सागरीय भाग की तुलना में शीघ्रता से ठंडी हो जाती है जिससे स्थल पर HP एवं समुद्र पर LP का निर्माण होता है, जिसके कारण हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है, इसे स्थलीय समीर कहते हैं।

हवाएँ

स्थलीय समीर और समुद्री समीर की निम्नलिखित विशेषताएँ है-

◆ 24 घंटे में इनकी दिशा में दो बार परिवर्तन होता है।

◆ ये समीर तटीय क्षेत्रों को एक पतली पेटी में प्रभावित करती है।

◆ इसी समीर के कारण तटीय क्षेत्रों में मौसम हमेशा सम बना रहता है। दिन के समय समुद्र से आने वाली हवा के कारण वायु में आर्दता की मात्रा अधिक रहती है जबकि स्थालीय समीर के कारण रात के समय मौसम शीतल हो जाता है। यही कारण है कि तटीय क्षेत्रों में अवस्थित नगरों में आर्थिक गतिविधियाँ देर रात तक संचालित होती रहती है।

2. पर्वत समीर और घाटी समीर

ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में दो प्रकार की दैनिक हवाएँ चलती है- पर्वत समीर एवं घाटी समीर।

 दिन के समय पर्वतीय ढाल बाला क्षेत्र घाटियों की तुलना में जल्दी एवं अधिक गर्म हो जाते हैं जिससे ढलानों पर LP और घाटी में HP का निर्माण हो जाता है। जिसके कारण पवन का संचरण ढालों के सहारे नीचे से ऊपर की ओर होने लगती है, इसे घाटी समीर कहते हैं।

इसके विपरीत रात्रि के समय बढ़ती ऊँचाई के कारण तापमान में कमी आ जाती है जिससे पर्वतों के ऊपरी क्षेत्रों में हवा ठंडी एवं भारी हो जाती है एवं HP का निर्माण कर लेती है जबकि घाटी में LP की स्थिति बनती है। अतः हवा पर्वतीय ढालों के सहारे नीचे की ओर संचरित होने लगती है, इसे पर्वतीय समीर कहा जाता है।

विशेषताएँ

◆ यह एक दैनिक हवा है जो पर्वतीय ढालों के सहारे चलती है। घाटी समीर ‘एनावेटिक हवा’ है जबकि पर्वतीय समीर एक ‘केटावेटिक’ हवा है।

◆ उष्ण एवं शीतोष्ण प्रदेशों में 35° से 50° अक्षांश के बीच इस हवा को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।

◆ यह हेडली सेल के विपरीत कार्य करता है। इसी समीर के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में फलों के बागान, नगरों का विकास, या अधिवासी क्षेत्र का निर्माण न तो घाटी में होता है और न ही पर्वतीय कटकों पर बल्कि इनका विकास पर्वतीय ढलान पर होता है।

3. मानसूनी हवा

      यह मौसम विशेष की हवा है। हेडली महोदय ने इसे परिभाषित करते हुए कहा है कि मानसून एक ऐसी हवा है जो 6 महीने स्थल से समुद्र की ओर और अगले 6 महीने समुद्र से स्थल की ओर चलती है।

विशेषताएँ

◆ मानसून की उत्पत्ति के संबंध में चार सिद्धांत दिए हैं-

(i) तापीय सिद्धांत

(ii) पछुआ हवा सिद्धांत

(iii) जेट स्ट्रीम सिद्धांत और

(iv) अलनीनो सिद्धांत

◆ यह एक अनिश्चिताओं से भरी हुई हवा है क्योंकि इसके आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

◆ इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।

◆ वर्षा का वितरण एवं मात्रा दोनों अनिश्चित है।

◆ बादल विस्फोट की घटना घटित होती है।

◆ इस हवा की उत्पत्ति 8° से 35° अक्षांश के बीच में होती है। इसका विस्तार भारतीय उपमहाद्वीप, उत्तरी-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्वी ब्राजील, दक्षिणी चीन, मेडागास्क, संयुक्त राज्य अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य इत्यादि में हुआ है



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2. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण / Koppens’ Climatic Classification 

2. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण 

(Koppens’ Climatic Classification)


कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

      विश्व के जलवायु वर्गीकरण की दिशा में अनेक कार्य किए गए हैं जिनमें कोपेन की योजना को आधारभूत योजना के रूप में मान्यता प्राप्त है। कोपेन का पूरा नाम व्लादिमिर कोपेन था जिसका जन्म जर्मनी में हुआ था। लेकिन आस्ट्रिया के ग्राज विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान के प्राध्यापक थे। उन्होंने 1900 से 1936 ई० तक अनुसंधान प्रपत्र के माध्यम से कई बार जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। अनुसंधान प्रपत्र में इनका वर्गीकरण 1900, 1918 तथा 1936 में प्रकाशित हुआ। कोपेन के द्वारा प्रस्तुत संशोधित और मान्य जलवायु वर्गीकरण 1936 ई० में “हैंडबुक डर क्लाइमेटोलॉजी” पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। वर्तमान समय में कोपेन के द्वारा प्रस्तुत 1936 ई० की योजना विश्वव्यापी मान्यता रखती है।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण की विशेषता:-

◆ कोपेन अपना जलवायु वर्गीकरण अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया था। इसीलिए इनकी योजना को आनुभाविक विधि (Empirical Method) पर आधारित माना जाता है।

◆ इनका वर्गीकरण मुख्यतः वनस्पति के वर्गीकरण पर आधारित है। कोपेन ने डी. कैंडोल के द्वारा प्रस्तुत वनस्पति वर्गीकरण को ही जलवायु वर्गीकरण का आधार माना।

◆ कोपेन का मानना था कि वनस्पति के विकास पर तापमान और वर्षा की वास्तविक मात्रा का भी प्रभाव पड़ता है। इसीलिए उन्होंने जलवायु वर्गीकरण के दौरान तापमान तथा वर्षा के वास्तविक मात्रा को भी ज्ञात किया और उसे अपने जलवायु वर्गीकरण में शामिल किया। यही कारण है कि इनके वर्गीकरण को परिणात्मक वर्गीकरण या मात्रात्मक वर्गीकरण (Quantitative Classification) भी कहते हैं।

◆ कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में कई सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग किया है जिसका मूल उद्देश्य मौसमी विशेषताओं को सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत करना है। इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण के द्वारा जलवायु के विभिन्न घटकों का मूल्यांकन एक ही नजर में किया जा सकता है।

◆ कोपेन का जलवायु वर्गीकरण तीन पदानुक्रम में प्रस्तुत किया गया है। प्रथम पदानुक्रम में उन्होंने विश्व की जलवायु को 5 भागों में बाँटा है। इसके लिए कोपेन ने A, B, C, D और E अक्षरों का प्रयोग किया है।

      दूसरे पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण को प्रस्तुत करने के लिए चार सांकेतिक बड़े अक्षर S, W, T, F का प्रयोग किया है। 

        तीसरे पदानुक्रम के लिए उन्होंने अंग्रेजी के 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया है। जैसे- a,  b, c, d, f, g, h, i, k, k’, m, n, s, w, w’, w”, x। इस तरह उन्होंने अंग्रेजी के 9 बड़े एवं 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण को एक व्यवहारिक वर्गीकरण माना जाता है, क्योंकि इनके जलवायु वर्गीकरण से जलवायु प्रदेशों की विशेषताओं का बोध होता है।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में दो जलवायु प्रदेशों के बीच किसी भी संक्रमण पेटी का विकास नहीं होता है।

◆ कोपेन ने प्रथम पदानुक्रम वाले जलवायु प्रदेशों को एक अक्षर से, दूसरे पदानुक्रम के जलवायु को दो अक्षर से और तीसरे पदानुक्रम के जलवायु को तीन अक्षर से प्रस्तुत किया।

     इस तरह इनका वर्गीकरण एक बहु स्तरीय योजना है।

◆कोपेन ने विश्व को प्रथम पदानुक्रम में 5 और द्वितीय पदानुक्रम में 13 और तृतीय पदानुक्रम में 24 भागों में जलवायु को बाँटा है। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर तापमान और वर्षा का आँकड़ा लघु स्तर पर इकट्ठा किया जाता है तो तीसरे पदानुक्रम में जलवायु वर्गीकरण की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है।

◆ कोपेन का जलवायु वर्गीकरण जलवायु के कारकों पर आधारित है। इसलिए इनके वर्गीकरण को अनुवांशिक वर्गीकरण (Genetic Classification) भी कहा माना जाता है।

जलवायु वर्गीकरण के आधार

        कोपेन ने अपना जलवायु वर्गीकरण हेतु चार कारकों को आधार बनाया जैसे – वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच।

      कोपेन का जलवायु वर्गीकरण मुख्यतः डी. कैंडोल द्वारा प्रस्तुत वनस्पति वर्गीकरण पर आधारित है। डी. कैंडोल महोदय (वनस्पति शास्त्री) ने विश्व को 5 वनस्पति क्षेत्रों में बाँटा था। इसलिए कोपेन महोदय ने भी प्रारंभ में विश्व को 5 जलवायु प्रदेशों में वर्गीकरण किया और उन्होंने बताया कि प्राकृतिक वनस्पति के प्रदेश ही प्रमुख जलवायु प्रदेश है। ऐसा बताने के पीछे उनका उद्देश्य था कि जलवायु प्रदेशों की सीमा का निर्धारण किया जा सके।

       कोपेन तापमान को दूसरी बार प्रथम एवं द्वितीय पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण हेतु आधार माना। जबकि वर्षा को द्वितीय एवं तृतीय पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण को प्रस्तुत करने में प्रयोग किया। कोपेन ने यह भी बताया कि औसत वार्षिक तापमान प्रथम पदानुक्रम की वृहद जलवायु प्रदेशों को निर्धारित करने में मदद करता है जबकि जलवायु के अन्य कारण क्षेत्रीय विषमता उत्पन्न करते हैं। इसलिए उन्होंने अन्य कारणों को लघु स्तर पर जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत करने के लिए उनका प्रयोग किया।

      कोपेन ने प्रारंभ में केवल वनस्पति को ही आधार मानकर जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जब उनकी आलोचना होने लगी तो उन्होंने अपना वर्गीकरण हेतु वनस्पति के अलावे तापमान एवं वर्षा को आधार बनाया। पुनः जब उन्हें यह पता चला कि उच्चावच के कारण भी जलवायु में संशोधन होता है तो पुनः उन्होंने 1936 ई० में वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच को ध्यान में रखते हुए जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया।

कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की योजना/प्रणाली

         कोपेन के द्वारा प्रारंभ की गई यह परंपरा आगे चलकर थार्नथ्वेट और ट्रीवार्था ने भी इनका अनुसरण किया। कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में अंग्रेजी के 9 बड़े तथा 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग सांकेतिक रूप से किया जिनका अर्थ निम्नवत है-

 रोमन लिपि के 9 बड़े अक्षर एवं अर्थ:

 A = उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेश

 B = उपोष्ण शुष्क जलवायु प्रदेश

 C = शीतोष्ण आर्द्र जलवायु प्रदेश

 D = शीत जलवायु प्रदेश

 E = ध्रुवीय जलवायु प्रदेश

       कोपेन उपरोक्त 5 बड़े अक्षरों के अलावे चार अन्य बड़े अक्षरों का प्रयोग किया है जो B और E जलवायु प्रदेश को लघु स्तर पर जलवायु वर्गीकरण में मदद करता है।

S  =  अर्द्ध शुष्क / स्टेपी जलवायु

W= शुष्क / मरुस्थलीय जलवायु

T = टुण्ड्रा प्रकार की जलवायु

F = हिमाच्छादित जलवायु

रोमन लिपि के 17 छोटे अक्षर एवं अर्थ:

       कोपेन दूसरे तथा तीसरे पदानुक्रम के लिए रोमन लिपि के 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया जिनमें प्रमुख निम्नवत है:-

f  = वर्ष भर वर्षा /आर्द्र

m = मानसूनी प्रचुर वर्षा

w = शीतकाल शुष्क

s = ग्रीष्मकाल शुष्क

a = गर्म ग्रीष्म ऋतु 

b = सामान्य गर्म ग्रीष्म ऋतु

c = लघु कालीन एवं कम गर्म ग्रीष्म ऋतु

d = शीत ऋतु अत्यधिक सर्द, सबसे ठंडे माह का औसत मासिक तापमान -38℃ से कम।

h = औसत वार्षिक तापमान 18℃ से अधिक

k = औसत वार्षिक तापमान 18℃ से कम

        उपरोक्त सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग करते हुए विश्व को प्रथम पदानुक्रम में 5 द्वितीय पदानुक्रम में 13 और तृतीय पदानुक्रम में 24 या उससे अधिक भागों में प्रस्तुत किया है। तीसरे स्तर में संख्या नियत / निश्चित नहीं है। इसलिए प्रथम और द्वितीय पदानुक्रम तक ही विशेष मान्यता रखता है। कोपेन के द्वारा प्रस्तुत जलवायु वर्गीकरण की योजना को नीचे की तालिका में देखा जा सकता है। 

कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की योजना
क्रम संख्या  प्रथम पदानुक्रम का जलवायु या प्रमुख जलवायु प्रदेश-5 द्वितीय पदानुक्रम का जलवायु या उपजलवायु प्रदेश-13 तृतीय पदानुक्रम का जलवायु या गौण जलवायु प्रदेश-24 
1. A-उष्ण आर्द्र जलवायु Af-विषुवतीय जलवायु

Am-मानसूनी जलवायु

Aw-सवाना जलवायु

2. B-उपोष्ण शुष्क जलवायु BS-स्टेपी तुल्य जलवायु

BW-मरुस्थलीय जलवायु

BSh,

BSk,

BWh, BWk

3. C-शीतोष्ण आर्द्र जलवायु Cf-प० यूरोपीय तुल्य जलवायु

Cw-चीन तुल्य जलवायु

Cs-भूमध्यसागरीय जलवायु

Cfa,

Cfb,

Cfc,

Cwa,

Cwb,

Cwc,

Csa,

Csb

4. D-शीत जलवायु Df-पछुआ प्रभाव वाला जलवायु क्षेत्र

Dw-पूर्वी तटीय जलवायु क्षेत्र

Ds- शीतल एवं आर्द्र जलवायु, जिसमें ग्रीष्म ऋतु शुष्क होता है।

Dfa,

Dfb,

Dfc,

Dfd,

Dwa, Dwb, Dwc, Dwd,

Dsa,

Dsb,

Dsc,

Dsd

5. E-ध्रुवीय जलवायु ET-टुन्ड्रा तुल्य जलवायु

EF-टैगा जलवायु या हिमाच्छादित जलवायु

निर्धारित नहीं 
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की आलोचना

      कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की कई आधार पर आलोचना की गई है जैसे-

◆ कोपेन के वर्गीकरण को डी. कैंडोल के वनस्पति वर्गीकरण का प्रतिलिपि माना जाता है।

◆ कोपेन अपना वर्गीकरण कई बार प्रस्तुत किया। 1936 में प्रस्तुत वर्गीकरण भी पूर्ण नहीं था इसलिए पुनः इसमें संशोधन कर 1948 (कोपेन तथा उनके मित्र) में प्रस्तुत किया।

◆ इनका वर्गीकरण अनुभावाश्रित विधि पर आधारित है अर्थात वैज्ञानिक तथ्यों की कमी के कारण गलत परिणाम आ सकते हैं।

◆ इन्होंने अपना जलवायु वर्गीकरण हेतु वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच इत्यादि को आधार माना लेकिन जलवायु के अन्य घटकों को उन्होंने नजरअंदाज किया। जबकि वे घटक भी जलवायु को प्रभावित करते हैं। जैसे- वायु की दिशा, वायुदाब, वायुमंडलीय दृश्यता, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, समुद्री जलधारा जैसे कारकों का महत्व नहीं दिया।

◆ इन्होंने अपना जलवायु वर्गीकरण में कई सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग किया जिससे वर्गीकरण के जटिल होने का आभास होता है।

◆ कुछ जलवायुविज्ञानवेता इनके वर्गीकरण को अति सरल रूप में प्रस्तुत करने का आरोप लगाता है।

◆ थार्नथ्वेट ने इनका आलोचना करते हुए कहा है कि कोपेन महोदय ने अपने वर्गीकरण में तापमान एवं वर्षा की मात्रा को वर्गीकरण का आधार माना है जबकि वास्तव में वर्षा एवं तापमान के प्रभावोत्पादकता पर वर्गीकरण किया जाना था।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में दो जलवायु पेटी के बीच बनने वाले संक्रमण पेटी का भी उल्लेख नहीं किया है जबकि वास्तव में एक जलवायु प्रदेश की सीमा समाप्त होते है तो अचानक ही दूसरी जलवायु क्षेत्र प्रारंभ नहीं होती बल्कि दोनों के बीच एक संक्रमण पेटी का निर्माण होता है।

निष्कर्ष

     उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद कई अन्य गुण भी है जिसकी चर्चा विशेषता रूपी शीर्षक के अंतर्गत किया गया है। उन विशेषताओं के अलावे जलवायु वर्गीकरण की दिशा में किया गया यह पहला प्रयास था। कोपेन ने जिन आधारों पर अपना जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया वही आधार कुछ संशोधन कर अपना वर्गीकरण को प्रस्तुत करते रहे। उपरोक्त गुणों के काण इनके जलवायु वर्गीकरण को आज भी विशेष मान्यता प्राप्त है।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

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