Category CARTOGRAPHY(मानचित्र कला)

31. Wind Rose / Star Diagram (पवनारेख / तारा आरेख)

31. Wind Rose / Star Diagram

(पवनारेख / तारा आरेख)



         पवनारेखों को तारा आरेख भी कहा जाता है। किसी स्थान के पवनों की दिशा तथा बारंबारता प्रकट करने के लिए इस आरेख का प्रयोग किया जाता है।

      तारा आरेखों को वृत्त या घड़ी आरेख (Clock Diagram), रोज आरेख (Rose Diagram) तथा वेक्टर आरेख (Vector Diagram) आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। इन आरेखों के द्वारा सदिश या वेक्टर मूल्यों को केंद्र या मूल बिंदु से संबंधित दिशाओं में सरल रेखाएँ या कॉलम खींचकर प्रकट करते हैं तथा इन आरेखों या कॉलमों की लंबाइयों को दिए हुए मूल्यों के अनुपात में मापनी (Scale) के अनुसार निश्चित करते हैं।

      किसी स्थान पर दिशाओं के अनुसार वर्ष में पवनों की बारंबारता दिखलाने के लिए यह आरेख बहुत उपयोगी होते हैं परंतु आर्थिक वितरण जैसे व्यापार की दिशा अथवा विभिन्न दिशाओं में जनसंख्या के स्थानांतरण के आंकड़ों को भी इन आरेखों के द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

पवनारेख के प्रकार (Types of Wind Rose)

1. साधारण पवनारेख (Simple Wind Rose):-

    इस आरेख के द्वारा किसी स्थान की एक वर्ष में पवन की दिशा तथा शांत दिनों की संख्या को प्रदर्शित किया जाता है। पवन चलने के दिनों को लंबी रेखाओं द्वारा तथा शांत पवन वाले दिनों को केन्द्र पर बनाये गये छोटे वृत्त के भीतर अंकों में लिखकर इंगित करते हैं।

उदाहरण:

(i) निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से जयपुर का पवनारेख बनाइए।

Wind Direction / पवन की दिशा
N NE E SE S SW W NW Calm
No. of Days 24 23 25 15 29 58 77 79 17

रचना विधि:

      साधारण पवनारेख बनाने हेतु पहले सुविधानुसार कोई अर्द्धव्यास लेकर एक छोटा वृत्त खींचते हैं एवं इसके भीतर शांत पवनों की दिश (17) लिखते हैं। इसके बाद वृत्त के केन्द्र से दी हुई दिशाओं की ओर सरल रेखाएँ खींचते हैं। अब इन रेखाओं में किसी उचित मापनी के अनुसार वृत्त की परिधि से मापते हुए संबंधित दिनों की संख्या के बराबर दूरियाँ काटकर रेखाओं के सिरों का सरल रेखाओं द्वारा मिला देते हैं। इस प्रकार बने अष्टभुज के प्रत्येक कोने पर उसकी दिशा लिख देते हैं एवं आरेख के नीचे दिनों की मापनी बनाकर Windrose पूर्ण कर लेते हैं।

       सामान्यतः साधारण पवन आरेख में पवन की आठ दिशाएँ (उत्तर, उत्तर-पूर्व, पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिम) प्रकट की जाती है परंतु आवश्यकता होने पर उत्तर-उत्तर पूर्व, उत्तर पूर्व-पूर्व आदि शेष आठ दिशाओं की पवनों की बारंबारताओं को भी आरेख में प्रदर्शित किया जा सकता है।

2. पवन तथा दृश्यता रोज (Wind and Visibility Rose):

     ये साधारण पवनारेखों की भाँति ही बनाए जाते हैं, परन्तु इनमें केवल इतना अंतर है कि इस आरेख में किसी स्तंभ की लंबाई उस दिशा में चलने वाली पवनों के कुल दिनों में उत्तम दृश्यता (Good Visibility) अथवा अत्यल्प दृश्यता (Bad Visibility) के दिनों की बारंवारता का प्रतिशत प्रकट करती है।

उदाहरण :

(ii) किसी काल्पनिक स्थान पर प्रेक्षित निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर एक पवन तथा दृश्यता रोज की रचना कीजिए।

 पवन की दिशा
पवन की बारम्बारता (दिन) N NE E SE S SW W NW Calm
30 20 30 50 12 20 80 100 23
अत्यल्प दृश्यता की बारंबारता (दिन) 12 14 18 20 3 3 8 5

रचना विधि:

    पवन तथा दृश्यता रोज बनाने के लिए सर्वप्रथम एक छोटा वृत्त बनाकर उसमें शांत दिनों की संख्या (23) लिख दिया जाता है। उसके बाद कोई उचित मापनी लेकर पहले बतलाई गयी विधि के अनुसार वृत्त की परिधि से संबंधित दिशाओं में अत्यल्प दृश्यता की बारंबारताओं के प्रतिशत मूल्यों के बराबर लंबाईयों वाले स्तंभ खींचा जाता है। अंत में अब आरेख के नीचे मापनी बनाक आरेख पूर्ण क लिया जाता है।

Wind Rose

33. Interpretation of Weather Map (मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)

33. Interpretation of Weather Map

(मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)



मौसम सम्बन्धी तत्व और उनके निरूपण (Weather Phenomena and their Representation)

संघनन- जल के गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को संघनन कहा जाता है। यदि हवा का तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे पहुंच जाये तो संघनन की क्रिया प्रारंभ होती है। संघनन की प्रक्रिया पर वायु के आयतन, तापमान, वायुदाब एवं आर्द्रता का प्रभाव पड़ता है।

यदि संघनन हिमांक (Freezing Point) से नीचे होता है, तो तुषार (Frost), हिम (Snow) एवं पक्षाभ मेघ (Cirrus Cloud) का निर्माण होता है।

यदि संघनन हिमांक से ऊपर होता है तो ओस, कुहरा, कुहासा एवं बादलों का निर्माण होता है।

 यदि संघनन पृथ्वी के धरातल के समीप होता है तो ओस (Dew), पाला (Frost), कुहरा एवं कुहासे का निर्माण होता है।

 जब संघनन की क्रिया अधिक ऊँचाई पर होती है तो बादलों का निर्माण होता है।

ओस (Dew)- हवा का जलवाष्प जब संघनित होकर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में धरातल पर पड़ी वस्तुओं (घास पत्तियों आदि) पर जमा हो जाता है, तो इसे ओस कहा जाता है। ओस के निर्माण के लिए साफ आकाश, लगभग शांत वायुमंडल, उच्च सापेक्षिक आर्द्रता एवं ठंडी तथा लंबी रात का होना आवश्यक है।
ओस के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि तापमान हिमांक से ऊपर हो।

तुषार या पाला (Frost)- जब संघनन की क्रिया हिमांक से नीचे होती है (0°C या उससे कम पर) तो जलवाष्प जल कणों के बदले हिम कणों में परिवर्तित हो जाता है। इसे ही तुषार या पाला कहा जाता है। पाला के निर्माण के लिए उन सभी अन्य परिस्थितियों का होना आवश्यक है, जो ओस के निर्माण के लिए हैं।

नोट :- ओस या पाला ऊपर से नहीं गिरता है, बल्कि यह वहीं बनता है जहां हम इसे देखते हैं।

कुहरा (Fog)- कुहरा एक प्रकार का बादल है। जब जलवाष्प का संघनन धरातल के बिल्कुल समीप होता है तो कुहरे का निर्माण होता है। कुहरे में कुहासे की तुलना में जल के कण अधिक छोटे एवं सघन होते हैं।

कुहासा (Mist)- कुहासा भी एक प्रकार का कुहरा है, जिसमें कुहरे की अपेक्षा दृश्यता (Visibility) दूर तक रहती है। इसमें दृश्यता एक किलोमीटर से अधिक, परंतु दो किलोमीटर से कम होती है।

धुआंसा (Smog)- बड़े-बड़े शहरों में फैक्टरियों के निकट जब कुहरे में धुएं के कण मिल जाते हैं तो उसे धुआंसा (Smoke+Fog = Smog) कहा जाता है। धुआंसा कुहरे की तुलना में और अधिक सघन होता है एवं इसमें दृश्यता और भी कम होती है।

बादल (Clouds):-

    जब वायु का तापमान ओसांक (Dew-point) से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प धूल तथा धुँए के कणों पर केन्द्रित होकर बादल का रूप धारण कर लेती है। बादलों को निम्नलिखित चार प्रमुख प्रकारों में विभक्त किया जाता है:-

1. वर्षा-मेघ (Nimbus):-

    काले-काले मेघ जब आकाश घेर लेते हैं तथा पृथ्वी के निकट होते हैं, तो इन्हें वर्षा-मेघ कहते हैं। इनसे काफी वर्षा होती है।

2. स्तरी मेघ (Stratus):-

   ये पृथ्वी से 300-2500 मीटर की ऊँचाई पर होते हैं तथा आकाश पर पूर्णतया छा जाते हैं। इनका निर्माण दो भिन्न पवनों के मिलने से होता है।

3. कपासी पेघ (Cumulus):-

   इनकी आकृति, रूई के ढेर जैसी होती है। इन बादलों में गड़गड़ाहट होती है।

4. पक्षाभ मेघ (Circus):-

   ये बहुत अधिक ऊँचाई (5-13 किमी) पर होते हैं। प्राय: ये घुँघराले बालों जैसे दिखाई पड़ते हैं। इनके द्वारा वर्षा नहीं होती।

समवायु-दाब रेखाओं का अध्ययन

    मौसम-मानचित्रों में समवायु-दाब रेखाएँ खींची जाती हैं। किसी भी मौसम-मानचित्र का अध्ययन इन रेखाओं के अध्ययन पर ही अधिकतर अवलम्बित होता है। समभार रेखाओं के अनेक आकार होते हैं, परन्तु इसके निम्न तीन मुख्य आकार हैं:

(क) चक्रवात (Cyclone),

(ख) प्रतिचक्रवात (Anti-Cyclone),

(ग) कोल (Coal)।

चक्रवात (Cyclones):-

    इसमें समदाब-रेखाओं का आकार वृत्ताकार होता है तथा रेखाएँ मिली होती हैं और वायु-दाब भीतर की ओर कम होता जाता है। सबसे कम वायु-दाब रेखा के भीतर ‘Low’ लिखा रहता है। प्रत्येक चक्रवात एक निश्चित दिशा की ओर चलने लगता है। उत्तरी गोलार्द्ध के चक्रवात में पवनें अन्दर की ओर घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में चलती हैं।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

ब्यूफोर्ट संकेत (Beaufort Notation)

b नीला आकाश

h ओले (Hail)

bc आकाश कुछ साफ (Sky partly clean)

p वर्षा के मेघ गुजर रहते हैं (Passing Shower)

e आकाश अधिकतर बादलों से घिरा हुआ (Generally cloudy sky)

f धुन्ध (Fog)

m कुहरा (Mist)

o आकाश बादलों से सम्पूर्ण घिरा हुआ (Over-cast sky)

x पाला (Frost)

w ओस (Dew)

d फुहार (Drizzle), वर्षा (Rain), हिम (Snowfall)

q अल्पकालिक झंझा (Squall)

t गरज (Thunder)

I बिजली (Lighting)

s सहिम वृष्टि (Sleet)

i कभी चमक कभी गरज (Intermittent)

Interpretation of Weatherकोल (Col):-

    दो चक्रवातों अथवा दो प्रति चक्रवातों से घिरे मध्यस्थ क्षेत्र को हम ‘कोल’ कहते हैं। यहाँ पर पवन शांत रहती है। ग्रीष्म ऋतु में गरज तथा विद्युत की कड़क सुनाई देती है।

गौण अपदान (Secondary Depresion):-

     जब विशाल चक्रवात में छोटा वायु-दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) बन जाता है, तो उसे गौण अपदाब कहते हैं। इसमें मौसम अस्थायी (Varaible) होता है, कभी शांत होता है, कभी विद्युत की गरज होती है। गौण अवदाब मुख्य चक्रवात के साथ ही आगे बढ़ता है।

‘V’ आकार का चक्रवात:-

    जब चक्रवात का न्यून वायु-दाब क्षेत्र ‘V’ के आकार का हो जाता है, तो से Trough of Low Pressure कहते हैं। इसके अगवाड़े में गर्मी तथा वर्षा होती है। यदि वह उष्ण वाताग्र (Warm Front) प्रकार का होता है तो धूप तथा ठंड होती है। इसमें वायु-दाब बाहर की ओर बढ़ता जाता है।

फान (Wedge):-

    अनेक बार दो चक्रवातों के बीच समदाब रेखाओं का आकार उल्टे ‘V’ की भाँति हो जाता है तथा भीतरी वायु-दाब अधिक होता जाता है। इसके अग्रभाग (Front Part) में मौसम शांत तथा सुहावना होता है, ज्योंहि पिछला भाग (Rear Part) आता है, मौसम बादलों से घिरा तथा खराब हो जाता है।

भारत का सामान्य मौसम मानचित्र

    भारतीय मौसम मानचित्रों के अध्ययन में देश में पाई जाने वाली विभिन्न मौसमों की जानकारी की अधिक आवश्यकता पड़ती है। परम्परानुसार भारत में एक वर्ष की अवधि को तीन ऋतुओं में विभक्त किया जाता है:

(i) जाड़े की ऋतु (नवम्बर से फरवरी के अन्त तक)

(ii) गर्मी की ऋतु (प्रारम्भिक मार्च से मध्य जून तक)

(iii) वर्षा ऋतु (मध्य जून से अक्टूबर के अन्त तक)

    मौसम की दृष्टि से वर्षा का महत्व अधिक होता है इस मौसम के मानचित्रों पर अनेक संश्लिष्ट दृश्य भी उभरते है।

दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की ऋतु (मध्य जून से मध्य सितम्बर या अक्टूबर तक):-

     इस मौसम के मानचित्र की प्रमुख विशेषता यह है कि उत्तरी-पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर निम्न वायु दाब केन्द्र तथा हिन्द महासागर में प्रायः श्रीलंका के पश्चिम उच्च वायु दाब पाया जाता है। इसके फलस्वरूप उच्च दाब का एक उभार या गर्त बना जाता है और पश्चिमी तट पर विशेष रूप से उसके दक्षिणी भाग में समदाब रेखाएँ कुछ उत्तर की ओर मुड़ जाती है। प्रायद्वीप के दक्षिणी अर्द्धभाग में ये रेखाएँ दक्षिण की ओर मुड़ जाती है।

    पश्चिम के आधे भाग पर ये प्रायः पश्चिम दिशा में फैली होती है। पूर्व में समदाब रेखाओं की आकृति चक्रवात की उपस्थिति पर निर्भर करती है। उत्तरी प्रायद्वीप को पार करने वाली समदाब रेखाएँ प्रायः चक्रवात को दक्षिण भाग में घेरने की कोशिश करती है। यदि चक्रवात नहीं है तो ये प्राय: उत्तर की ओर से बंगाल की खाड़ी के ऊपर मुड़ जाती है और हिमालये से 60° के कोण पर मिलती है।

लौटती मानसून की ऋतु (मध्य सितम्बर से दिसम्बर)-

    मानसून के समाप्त होते ही पश्चिमोत्तर भारत का निम्न दाब क्षेत्र धीरे-धीरे उच्च दाब में बदल जाता है। पश्चिमी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में एक उच्च दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। इस केन्द्र से गंगा के मैदान में उच्च दाब का एक कटक (Wedge) फैला रहता है फिर भी यहाँ दाब प्रवणता बहुत कम रहता है। समदाब रेखाएँ पहले उत्तरी पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर चलती है और फिर गुजरात तथा काठियावाड़ा से पूर्व पश्चिम हो जाती है।

    श्रीलंका के पूर्व में बंगाल की खाड़ी पर एक निम्न दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। जब गंगा के मैदान पर उच्च दाब क्षेत्र रहता है, पश्चिमी पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत पर फैली समभार रेखाएँ उच्च दाब के पश्चिम किनारे के समान्तर हो जाती है और उनकी दिशा उत्तर-दक्षिण हो जाती है।

शीत ऋतु या जाड़े का मौसम (जनवरी से मार्च के मध्य तक)-

     इस समय के मौसम मानचित्र पर उत्तरी-पश्चिमी उच्च दाब के स्थान पर एक हल्का निम्न दाब क्षेत्र बन जाता है। क्षेत्र की वास्तविक स्थिति चक्रवात पर निर्भर करती है।

ग्रीष्म ऋतु (मार्च से जून तक)-

    इस समय गर्मी अधिक बढ़ जाने से भारत के उत्तरी-पश्चिम भाग और पाकिस्तान के ऊपर निम्न दाब का क्षेत्र बनना प्रारम्भ हो जाता है। बाद में वह गंगा के मैदान में फैलता है। उच्च दाब क्षेत्र अरब सागर पर स्थित रहता है। अतः समभार रेखाएँ पश्चिमी घाट पर उत्तर से दक्षिण मुँह की हो जाती हैं। मध्य प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में समदाब रेखाएँ अपनी दिशा को बदल उत्त-पूर्वी दिशा में मुड़ जाती हैं। वायुदाब रेखाओं के कम होने के कारण दाब प्रवणता अल्प तथा इस प्रकार वायुगति अधिक तेज नहीं होती।

भारतीय मौसम मानचित्रों की व्याख्या

     किसी दैनिक मौसम मानचित्र का अध्ययन निम्न शीर्षकों में किया जाता है:-

1. भूमिका- दिन, मानचित्र की तिथि तथा समय, ऋतु आदि।

2. आकाश की दशा (Sky Conditions)

(i) मेघ आवरण की मात्रा (Amount of Cloudiness)

(ii) मेघों के प्रकार या प्रकृति

(iii) अन्य घटनाएँ-कोहरा, बिजली, तुषार आदि वायुमण्डलीय तत्व

3. वायुदाब का वितरण:

(i) मौसमी निम्न वायुदाब (Low) क्षेत्र की स्थिति

(ii) मौसमी उच्च वायुदाब (High) को स्थिति

(iii) समदाब रेखाओं की प्रवृत्ति (Trends of isobars)

(iv) वायुदाब को प्रवणता (Pressure Gradient)

(v) चक्रवात को उपस्थिति और मौसम पर उसका प्रभाव

4. वायु (Wind)

(1) पवन की दिशा और

(ii) पवन की गति

5. सामान्य वायुदाब से विचलन

6. वर्षा का वितरण (Precipitation)

(i) सामान्य वितरण, साधारण, अधिक, कम आदि

(ii) भारी वर्षा के प्रमुख क्षेत्र

7. सामान्य तापमान से विचलन (Departure from normal Temp.)

8. समुद्र की दशा (Sea Condition)

   उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत सामान्यतः प्रातः कालीन (08.30) मुख्य मानचित्र का सविस्तार वर्णन मानचित्र पर उद्धत कुछ प्रमुख संकेतों की सहायता से करते हैं। छोटे मानचित्र भी उपरोक्त समय की दशा को ही दर्शाते हैं जिनका उपयोग पठन में किया जाता है।

शीतकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 31 जनवरी, सन् 1973 शक्, 11 माघ 1894):-

(a) प्रारम्भिक सूचना-

    शीतकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 31 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशाओं का चित्रण किया गया है। ऋतु मानचित्र के ऊपरी भाग में दिनांक, दिन एवं भारतीय समय के अतिरिक्त ग्रीनविच समय (0300 GMT) दिया है। यहाँ ई० सन् के साथ-साथ शक् संवत् भी दिया रहता है। ऋतु मानचित्र में मंगलवार दिनांक 30 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार सायं 5.30 17.30) की मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन किया गया है। मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन करते समय दोनों पृष्ठों के मुख्य एवं सहायक मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सर्वत्र सहायता ली गयी है।

(b) वायुदाब व्यवस्था-

    मानचित्र में वायुदाब व्यवस्था अधिक सरल है। इसमें वायुदाब की सामान्य प्रवणता हिन्द महासागर से उ०-५० भारत की ओर है। सम्पूर्ण मानचित्र में समदाब रेखाएँ दूर- दूर फैली हुई हैं। हिन्द महासागर एवं केरल तट के सहारे 1014 मिलीबार की समदाब रेखा अण्डाकार स्वरूप बनाती हुई सर्पिल मार्ग से पूर्व की ओर चली गयी है। अधिकांश दक्षिण का पठार 1014 और 1016 मिलीबार समभार रेखा की सीमा में आ जाता है।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    ऋतु मानचित्र में स्पष्टत: उ० प० भारत और संलग्न पाकिस्तान में निम्न वायुदाब का विकास हुआ है। यहाँ पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में 1018 मिलीबार समभार रेखा अण्डाक्ति बनाती है। इसी भाँति दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग को 1010 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। यह दोनों ही निम्न भार के केन्द्र हैं।

उच्च वायुदाब के क्षेत्र-

    सर्वाधिक वायुदाब पृष्ठ छः के मुख्य ऋतु मानचित्र में उत्तरी-पश्चिमी भारत एवं पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में विकसित हुआ है। यहाँ 1022 मिलीबार वायुदाब पाया जाता है। यह वायुदाब उत्तरी राजस्थान और उत्तरी-पूर्वी भारत में उपूसी और सलंग्न वर्मा में विकसित हुआ है। सामान्यतः सारे ही उत्तरी भारत में 1020 से 1022 मिलीबार के बीच उच्च वायुदाब की दिशा पायी जाती है। यहाँ की समभार रेखाएँ उत्तर प्रदेश के पश्चिम में पश्चिमोत्तर दिशा में और पूर्व में पूर्वोत्तर दिशा में मुड़ गयी हैं।

     दक्षिणी भारत में 1014, 16 और मिलोबार की तीन समभार रेखाएँ अरब सागर से भूमि की ओर तेजी से मुड़कर एवं पुनः सागर की ओर झुककर पूर्व की ओर चली गयी हैं। उत्तरी भारत में इनका वितरण अधिक व्यवस्थित एवं दो उपखण्डों पूर्वोत्तर और पश्चिमोत्तर में बँट गया है। समदाब रेखाओं की उपयुक्त व्यवस्था से तो यही आभास होता है कि स्थानीय अपवादों को छोड़ कुछ घण्टों तक सर्वत्र मौसम खुला एवं स्वच्छ रहना चाहिए।

सामान्य वायुदाब के विचलन (प्रातः 8.30 बजे)-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने में दिये गये लघु मानचित्र को ध्यान से देखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रायः सारे ही देश में औसत से अधिक वायुदाब की दशा का विकास हुआ है। केवल मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के कुछ ही भागों में औसत वायुदाब मिलता है। सामान्यतः ज्यों-ज्यों हम उत्तर की ओर जाते हैं वायुदाब उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। सर्वाधिक विचलन पश्चिमोत्तर एवं पूर्वोत्तर भारत +4 मिलीबार और दक्षिण भारत में +2 मिलीबार से कम पाया गया है।

वायु दिशा एवं वायुवेग-

    ऋतु मानचित्र के उत्तरी-पश्चिमी भाग में वायु प्रायः शान्त है। उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में वायु धीमी गति (5 नॉट या कम) से बह रही है। कंवल बारीसाल (बंगला देश) के निकट इसकी सर्वाधिक गति 20 नॉट प्रति घण्टा कित की गई है। इस ऋतु मानचित्र में कंवल उत्तरी भारत में ही ‘अ’ श्रेणी के बीस ऐसे केन्द्र बनाए गए हैं जहाँ कि वायु शान्त है। दक्षिणी भारत के अधिकांश केन्द्रों पर वायु प्रवाह की गति 5 से 15 नॉट के बीच है। इस भाग में वायु प्रवाह की सामान्य दिशा अरब सागर की ओर है। निकोबार के दक्षिण-पश्चिमी सागर में वायु गति 20 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गई है। यहाँ पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है।

1.5 किमी0 ऊँचाई पर वायु की स्थिति-

    दक्षिण-पूर्व कोने में ऑकत लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊँचाई पर देश के विभिन्न स्टेशनों से लिये गये प्रेक्षण के आधार पर वायु की दिशा एवं गति दर्शायी गई है। मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि उपर्युक्त ऊँचाई पर वायु की गति 5 से 20 नॉट के बीच है। पश्चिमी तट एवं हिमालय के ढालों के निकट वायु प्रवाह अपेक्षाकृत तेज है। सम्पूर्ण उत्तरी भारत में वायु की दिशा भूमि की भाँति ही है। दक्षिणी भारत के विक्षोभ मण्डल में पवन धीमी गति से पश्चिम से पूर्व, उत्तर-पूर्व से पश्चिम की ओर बह रही है।आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता-

    शीत ऋतु होने से देश के अधिकांश मौसम केंन्द्र मेघ रहित है। पूर्ण मेघाच्छन्नता श्रीनगर, शिमला, चांदा और देहरादून में पायी जाती है। खण्डित मेघाच्छन्नता कहीं-कहीं उत्तरी मध्य और दक्षिण-पश्चिमी भारत एवं दोनों सागरों में एक-चौथाई से तीन-नौथाई तक पायी जाती है। सर्वत्र निम्न मेघों का ही वितरण दर्शाया गया है। आधे से अधिक मेघान्छन्नता भारत में जबलपुर और दक्षिणी भारत में औरंगाबाद व बंगलौर और मिनिकोय, कोलम्बो एवं वर्मा के दक्षिण में मिलती है। आकार में मेघों के अतिरिक्त जबलपुर के निकट तड़ित (lightning) अंकित की गयी है। मानचित्र में पूर्ण मेघाच्छन्नता पश्चिमी उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में अंकित की गई है।

वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप-

     उच्च भार एवं प्रायः मेघरहित आकाश होने से देश के अधिकांश भाग में वर्षा रहित मौसम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में शिमला और श्रीनगर के निकट हिमपात होता हुआ बताया गया है। दिल्ली और इलाहाबाद में हल्का कुहरा एवं कहीं-कहीं धुंध (Haze) भी फैली हुई है। पिछले 24 घण्टों में कहीं भी जलवृष्टि, हिमपात या ओलावृष्टि अंकित नहीं की गयी है।

समुद्र की दशा-

    बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की दशा प्रायः शान्त बतायी गयी है। बंगाल की खाड़ी में गंगा के डेल्टा के मुहाने, मद्रास और खाड़ी के दीपों के निकट कहीं भी दशा विशेष को उल्लिखित नहीं किया गया है। मद्रास व म्यांसार के बीच सागर मध्य तरंगित (moderate) बताया गया है। इसी भाँति अरब सागर में द्वीपों के निकट सागर कुछ अशान्त है, शेष भागों में यह प्रायः शान्त है।

न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सायं 8.30 बजे):-

    पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत न्यूनतम तापमान से वास्तविक न्यूनतम तापमान 2° स 4°C कम रहे हैं। गुजरात, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 4°C या अधिक नीचे तापमान रहे हैं। दूसरी ओर सम्पूर्ण दक्षिणी-पूर्वी और पूर्वी भारत के तापमान औसत से 2°C तक ऊँचे अंकित किये गये हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं आंध्र के संलग्न भागों में वृद्धि 4°C तक अंकित की गई है। औसत तापमान रेखा या 0°C विचलन रेखा मार्मा गोआ एवं भारत के मध्यवर्ती भागों से होकर सुदूर पूर्वी भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गई है।

अधिकतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सांय 5.30 बजे):-

    दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के सारे उत्तर और मध्य भाग में अधिकतम तापमान औसत से 2° से 4°C तक कम अंकित किये गये हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के वास्तविक तापमान 4°C से भी कम अंकित किये गये हैं। देश के शेष भागों में अधिकतम तापमान प्राय: औसत के निकट रहे। केवल महाराष्ट्र में कहीं-कहीं औसत से 2°C अधिक तापमान अंकित किये गये। औसत समताप रेखा अत्यधिक बल खाती हुई भूमि की ओर मुड़कर पूर्व एवं पूर्वोत्तर भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गयी है।

ग्रीष्मकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 16 मई सन् 1973, शक 26 वैशाख 1895)

(i) प्रारंभिक सूचना:-

    ग्रीष्मकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 16 मई, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र के ऊपरी भाग में भारतीय समय के साथ-साथ ग्रीनविच समय (3.00 बजे) एवं ईसवी सन् के साथ-साथ शक् सम्वत् भी दिया गया है। मानचित्र में मंगलवार 15 मई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मौसम की वास्तविक दशा का वर्णन करते समय दोनों ही मुख्य मानचित्रों एवं उनके नीचे के चारों लघु मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सहायता ली गयी है।

(ii) वायुदिशा एवं वायुवेग:-

    मुख्य ऋतु मानचित्र के अधिकांश भाग में पवन धीमी गति से बह रही है। उत्तरी भाग में वायु की गति 10 से 5 नॉट के बीच और मध्यवर्ती भाग में 5 से 15 नॉट के बीच ऑकत की गई है। देश में सबसे तेज पवन नागपुर के निकट 25 नॉट प्रति घण्टा की गति से चल रही है। उत्तरी भारत में वायु के प्रायः शान्त रहने का मुख्य कारण वहाँ पायी जाने वाली वायुदाब और समदाब रेखाओं का दूर-दूर होना है।

   दक्षिणी-पश्चिमी भारत एवं तटवर्ती भाग में वायु प्रायः पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी दिशा में प्रवाहित हो रही है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी तट पर इसकी दिशा अनिश्चित है। पूर्वी तट पर हवा एक-दूसरे से विपरीत दिशा में प्रवाहित होती हुई दर्शायी गयी है। मध्यवर्ती भारत में हवाएँ उत्तर-पश्चिम और पश्चिम दिशा से और पूर्व में दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व से प्रवाहित हो रही है। देश के शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है। मानचित्र में वायुदाब की भाँति ही वायु प्रवाह की दिशा भी अधिक व्यवस्थित है, यहाँ पश्चिमी भारत एवं पश्चिमी तट पर हवा पश्चिम या उत्तर-पश्चिम से एवं मध्यवर्ती भारत में उत्तर-पश्चिम से प्रवाहित हो रही है। शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है।

(iii) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

     ग्रीष्म ऋतु के कारण मुख्य मानचित्र के अधिकांश मौसम केन्द्रों पर आकाश मेघरहित बताया गया है। परन्तु तटवर्ती मौसम केन्द्रों की स्थिति इससे कुछ भिन्न है। यहाँ पर कच्छ से कोचीन तक न्यूनाधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है। कोचीन, कालीकट और त्रिवेन्द्रम के निकट 7/8 से लेकर पूर्ण आकाश मेघाच्छादित है। इसी भाँति पूर्वी भारत में पूर्ण मेघाच्छन्नता कटक, बालासोर और गौहाटी में, पश्चिम भारत में चण्डीगढ़ में पूर्ण, दिल्ली व देहरादून में 7/8, अण्डमान निकोबार में 5/8 और बीकानेर में 1/2 भाग मेघाच्छादित है। मानचित्र के दक्षिण और पूर्वी तट, द्वीप समूहों और पूर्वी भारत में अधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है।

     दोनों ही मुख्य ऋतु मानचित्रों में उत्तरी और मध्यवर्ती भारत में कई स्थानों पर धूल भरी आँधियाँ चलती हुई बतायी गयी हैं। इसके अतिरिक्त, मद्रास के निकट तड़ित (lightning) चमकते हुए भी बताया गया है।

(iv) सामान्य वायुदाब से विचलन (प्रातः 8.30 बजे):-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने के लघु मानचित्र से स्पष्ट है कि इस समय देश के अधिकांश भाग में लगभग औसत बायुदाब की दशा ही पायी जाती है। मध्यवर्ती व उत्तरी भारत में कहीं-कहीं औसत से 2 मिलीबार अधिक एवं मद्रास के निकट 2 मिलीबार कम वायुदाब दर्शाया गया है। सम्पूर्ण पूर्वी व दक्षिणी-पूर्वी भाग में औसत से कम और शेष भागों से औसत से अधिक वायुदाब पाये जाते हैं। (५०-५० मानचित्र देखें)

(v) 1.5 किमी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    दक्षिण-पूर्व के लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊंचाई पर प्रवाहित हवाओं को देखने से स्पष्ट है कि यहाँ की वायु गति अधिक तीव्र है, और इसकी दिशा में भी अव्यवस्था है। सम्पूर्ण पश्चिमी भारत में उत्तर से दक्षिण तक वायु गति से 10 से 40 नॉट के बीच है। सर्वाधिक गति 40 नॉट भुज के निकट ऑकत की गई है। देश के मध्यवर्ती भागों में हवाएँ उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर की ओर से और पूर्वी भारत में अनिश्चित दिशा में प्रवाहित हो रही है। यहाँ इनकी गति धीमी है।

(vi) वायुदाब व्याख्या:-

    मानचित्र की वायुदाब व्याख्या विषम है। इस समय देश के उत्तरी और दक्षिण दोनों भागों में वायुदाब वितरण भिन्न प्रकार का है। दक्षिणी प्रायद्वीप के पश्चिमी एवं मध्यवर्ती भाग और सौराष्ट्र में समदाब रेखाएँ अपेक्षाकृत अधिक निकट हैं। मध्यवर्ती एवं सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी एवं अधिकांश उत्तरी भारत को केवल 1002 और 1004 मिलीबार की दो समभार रेखाएँ घेरे हुए हैं। देश के इस भाग से बाहर की ओर सर्वत्र वायुदाब बढ़ता हुआ है। मानचित्रों की समभार रेखाएँ अधिक स्पष्ट विकसित हैं। इस पर निम्न एवं उच्च भार केन्द्रों का अधिक व्यवस्थित विकास हुआ है। यहाँ भी पश्चिम घाट के सहारे समभार रेखाएँ तेजी से निकट होती हुई चली गई हैं।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    मानचित्र में तीन भार के केन्द्र बने हुए हैं। इनमें से दो केन्द्रों का न्यूनतम वायुभार 1001 मिलीबार है। पहला वृत्ताकार केन्द्र द० पू० मध्य प्रदेश और उत्तरी-पश्चिमी उड़ीसा की सीमा पर दूसरे विषम आकृक्ति के केन्द्र का वायु भार भी 1001 मिलीबार है, यह पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ है। अर्द्ध-विकसित निम्न भार की दशा हिमाचल प्रदेश, जम्मू और संलग्न पाकिस्तान में दर्शायी गई है।

    मानचित्र में भी सुस्पष्ट दो निम्न वायुदाब के केन्द्र विकसित हुए हैं। पहला अण्डाकार केन्द्र उत्तर-पश्चिमी राजस्थान एवं संलग्न पाकिस्तान की सीमा पर 996 मिलीबार वायुदाब दर्शाता है। इतने ही निम्न वायुदाब का दूसरा केन्द्र पूर्वी मध्य प्रदेश की सीमा पर विकसित हुआ है।

उच्च वायुदाब क्षेत्र-

     ऋतु मानचित्रों में भारतवर्ष के बाहर निकटवर्ती सागरों के सुदूर क्षेत्र में उच्च भार की दशा दर्शायी गई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की बाहरी सीमा पर 1008 मिलीबार एवं मानचित्र में लगभग इन्हीं स्थानों पर 1010 मिलीबार समभार रेखाएँ गुजरती हैं। यहीं पर ‘H’ (उच्च भार) लिखा है। इस भाँति मानचित्र में पूर्वांचल अरब सागर में सहायक उच्च भार के क्षेत्र दर्शाये गये हैं।

    उत्तरी एवं मध्य भारत में सामान्यतः निम्नदाब की दशा ग्रीष्म के लक्षणों को ही सुस्पष्ट करते हैं।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     ग्रीष्म ऋतु होने से बहुत ही कम स्थानों पर पिछले 24 घण्टों में वर्षा अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा निकोबार द्वीपसमूह के दोनों केन्द्रों पर क्रमश: 8 और 7 सेमी०, नेपाल में काठमाण्डू में । सेमी० वर्षा व माण्डले में 2 सेमी० वर्षा अंकित की गई है। केवल मेघालय और निकोबार में ही प्रेक्षण के समय वर्षा हो रही थी। अहमदाबाद केन्द्र पर हल्का कुहरा (Haze) छाया हुआ है। शेष भागों में वायुमण्डल स्वच्छ और मौसम शुष्क बताया गया है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     मानचित्र में अधिकांश अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की दशा को नहीं बताया गया है जो कि सम्भवतः सामान्य मानी गयी है। विशाखापतनम से श्रीलंका से बीच का सागर सरल एवं मन्द तरंगित (Smooth & Slight) और दक्षिण में मध्य तराँगत (mod) बताया गया है। पश्चिमी अरब सागर की दशा को भी कहीं-कहीं सरल एवं मन्द तरंगित (Slight & smooth) बताया गया है।

(ix) अधिकतम तापमान का औसत दशा में विचलन (सायं 5.30 बजे):-

      दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सारे उत्तर-पश्चिम और पूर्वी मध्यवर्ती भारत में अधिकतम ताप का औसत से विचलन 0° से 8°C तक रहा। सबसे कम 8°C (या -8°C) दिल्ली, निकटवर्ती राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर अंकित किये गये। दूसरी ओर सारे दक्षिणी भारत और पूर्वांचल के तापमान का विचलन 0° से 6°C के बीच अधिक (+) रहा। दक्षिणी-पूर्वी भारत में यह विचलन 2° से 4° के बीच और मद्रास एवं उसके उत्तरी तट पर 6°C (या +6°C) तक अधिक रहा। औसत समताप रेखा गुजरात से बांग्लादेश की ओर लहरदार मार्ग से चली गयी है। बर्मा के अधिकांश भाग में औसत से 0° से 6°C के बीच कम तापामन अंकित किया गया है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्रात: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार औसत न्यूनतम तापमान से विचलन की दशा अधिक विषम है। उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत 0° से 6°C (या -6°C) के बीच तापमान अंकित किये गये, जबकि निकट ही उत्तर, प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं विहार की सीमा पर तापमान औसत से 0° से 4°C (या +4°C) के बीच अधिक अंकित किये गये। देश के शेष भागों में तापमान औसत या औसत से कुछ अधिक अंकित किये गये।

    पहली औसत समताप रेखा उत्तरी-पश्चिमी भारत में कच्छ के तट से महाराष्ट्र की ओर मुड़कर पुनः कर्नाटक से उत्तर की ओर घूमती हुई पश्चिमी एवं मध्य उत्तर प्रदेश होकर जम्मू-कश्मीर तक चली गयी है। दूसरी औसत समताप रेखा मध्य नेपाल से पश्चिमी बिहार के दक्षिण से उड़ीसा होकर वहाँ से पुनः उ०-पु० बंगाल की ओर घूमती हुई हिमाचल की ओर चली गयी है। वर्मा के अधिकांश भाग और खाड़ी के द्वीपों में तापमान औसत के निकट अंकित किये गये हैं। (चित्र द०पू० लघु मानचित्र देखें)

वर्षा काल का ऋतु मानचित्र (शुक्रवार 6 जुलाई, सन् 1973; शक 15 आषाढ़ 1895)

(i) प्रारम्भिक सूचना:-

    वर्षाकाल के इस मुख्य मानचित्र पें शुक्रवार दिनांक 6 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजै की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र में गुरुवार दिनांक 5 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा को दर्शाया गया है। आगे के वर्णन एवं विश्लेषण में दोनों बड़े व चार लघु मानचित्रों के मौसम के विभिन्न तत्वों की विकसित एवं परिवर्तनशील दशाओं का भी सर्वत्र ध्यान रखा गया है।

(ii) वायुदाब व्यवस्था:-

     मुख्य मानचित्र की वायुदाब व्यवस्था वर्षा काल होने से विशेष प्रकार से विकसित है। सारे भारतीय उपमहाद्वीप की समभार रेखाएँ विकसित चक्रवातों का अनुसरण करती हैं। दक्षिणी भारत और निकटवर्ती सागरों पर समभार रेखाएँ रेखाओं 998, 996 और 994 मिलीबार का ही विस्तार है। समभार रेखाओं की सामान्य व्यवस्था भी इससे मिलती-जुलती है।

निम्न वायुदाब के केन्द्र और गर्त चक्र-

     मानचित्र में भारतीय उप-महाद्वीप में तीन वायुदाब के केन्द्र बताये गये हैं इनमें से सबसे महत्वपूर्ण पूर्वी भारत का विकसित चक्रवात (Depresion) है। यहाँ मानचित्र में D लिखा है। वृत्ताकार आकृक्ति के इस चक्रवात को 922 और 994 दो समभार रेखाएँ सभी ओर से एवं अगली चार समभार रेखा तीन ओर से घेरे हुए हैं। उपर्युक्त सभी सम्भार रेखाएँ एक-दूसरे से प्रायः समानान्तर हैं। इनकी प्रवणता पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व की ओर अधिक तीव्र है। मानचित्र में अंकित इसी चक्रवात के अध्ययन से स्पष्ट है कि यह धीमी गति से भीतर की ओर बढ़ रहा है। इसमें गर्त चक्र या चक्रवात की भीतरी समभार रेखा 900 मिलीबर है। यह वायुदाब सामान्य से बहुत निम्न है।

    दूसरे निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास सौराष्ट्र के निकट हुआ है, जहाँ कि 995 मिलीबार के घेरे में L (निम्न भार) लिख है। इसे एवं पूर्व के चक्रवात दोनों को ही वृहद अण्डाकार में 994 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। ये समतल भाग में दो गर्ती जैसी प्रतीत होती है, क्योंकि दोनों ही निम्न भार के बीच कोई भी समभार रेखा नहीं गुजरती है। इस वृहद व्यवस्था के उत्तर और दक्षिण की ओर वायुदाब बराबर बढ़ता जाता है। तीसरे निम्न वायुदाब के केन्द्र का विकास पाकिस्तान के सुदूर पश्चिम में एवं ईरान की सीमा पर हुआ है।

     ऋतु मानचित्र में कटक के निकट के चक्रवात या गर्त चक्र के अतिरिक्त राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी निम्न वायुदाब केन्द्रों का विकास हुआ है। इनमें से पूर्वी निम्न भार स्फान (wedge) की भाँति फैला हुआ है। सभी को 990 मिलीबार समभार रेखा प्रायः वृत्ताकार घेरे हुए हैं।

उच्च वायुदाब के केन्द्र:-

   ग्रीष्मकालीन वर्षा काल के इस ऋतु मानचित्र के हिन्द महासागर या मानचित्र के सुदूर दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व और उत्तर में कश्मीर के उत्तरी भाग में उच्च वायुदाब की दिशा का विकास बताया गया है। इसमें हिन्द महासागर में 1006 मिलीबार रेखा और कश्मीर में 1002 मिलीबार रेखा पूर्व-पश्चिम दिशा में गयी है। इस प्रकार दक्षिणी उच्च वायुदाब अधिक गहन और विकसित है। इस कारण भी 8.30 बजे वाले ऋतु मानचित्र में दक्षिणी भारत में समभार रेखाएँ अधिक निकट हैं।

     सामान्यतः समभार रेखाओं की दिशा पूर्व-पश्चिम है, और सागर पर यह अधिक नियमित है। मध्यवर्ती और पूर्वी भारत में यह निम्न वायुदाब के केन्द्रों की ओर मुड़ गयी है। इसी कारण सुदूर पूर्व की समभार रेखाओं की दिशा उत्तर-दक्षिण हो गयी है।(iii) सामान्य वायुदाब से विचलन:-

     प्रातः 8.30 बजे के सम्बन्धित मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग को छोड़ सर्वत्र औसत से कम वायुदाब पाया जाता है। यही नहीं कर्क रेखा में दक्षिण में यह औसत से 4 से 8 मिलीबार तक कम है। सबसे कम वायुदाब-8 मिलीबार दक्षिणी सौराष्ट्र, कोंकण के तट और निकटवर्ती सागर एवं पूर्वी भारत में उड़ीसा के तट व निकटवर्ती सागर पर पाया जाता है।

    स्पष्टतः इसका सीधा सम्बन्ध उस निम्न वायुदाब व्यवस्था से है जो कि इन केन्द्रों के निकट ही विकसित हुए हैं। औसत से 6 मिलीचार समदाब रेखा उपर्युक्त दोनों केन्द्रों पर, -8 मिलीबार समुदाब रेखा को घेरे हुए हैं। औसत वायुदाब की 0 समभार रेखा पाकिस्तान से उत्तरी राजस्थान होकर पश्चिमी भारत को घेरते हुए कश्मीर की ओर मुड़ गयी है। पूर्वी भारत में यद्यपि औसत से कुछ कम वायुदाब (-2 से -4 तक) पाया जाता है परन्तु यहाँ इसकी प्रवणता धीमी है।

(iv) वायु दिशा एवं वायु वेग:-

      सारे भारतीय उप महाद्वीप में इस समय स्पष्टतः दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवाएँ चल रही हैं। ये हवाएँ दक्षिणी भारत में दक्षिण-पश्चिम, उत्तरी बंगाल की खाड़ी में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व और देश के शेष भागों में पूर्व दिशा से चल रही है। पश्चिमी तट एवं बंगाल की खाड़ी के तट पर इन हवाओं का वेग देश के अन्य भागों की तुलना में अधिक है।

    यहाँ हवा की गति 10 से 30 नॉट के बीच है। 30 नॉट की गति मार्मा गोआ और पूना के निकट अंकित की गयी है। देश के शेष भागों में वायु वेग सामान्यतः 0 से 10 नॉट प्रति घण्टा के बीच है। अधिकांश भागों में वायु वेग 5 नॉट से भी कम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में सर्वाधिक वायु वेग उत्तरी लक्षद्वीप में 40 नॉट प्रति घण्टा विशेष उल्लेखनीय है।

    पूर्वी भारत के चक्रवात के कारण यहाँ वायु दिशा औसत दिशा से भिन्न है और स्थानीय रूप से प्रभवित हुई है।

(v) 1.5 कि० मी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    इस ऊँचाई पर देश के अधिकांश विक्षोभ मण्डल में वायु तीव्र गति से चल रही है। दक्षिणी भारत में इसकी गति 30 से 70 नॉट है जबकि पूर्वी भारत में 10 से 30 नॉट एवं सबसे धीमी गति उत्तरी-पश्चिमी भारत में 5 से 15 नॉट के बीच है।

    सबसे तेज गति से वायु मछलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) में 70 नॉट एवं दक्षिणी लक्षद्वीप में 65 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गयी है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ऊँचाई पर भी वायु की दशा सर्वत्र दक्षिण-पश्चिमी मानसून हवाओं के अनुसार ही है।

(vi) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

    वर्षाकाल होने से देश के सभी भागों में मेघ छाये हुए हैं। कोटा, डाल्टेनगंज, लखनऊ और तेजपुर ही अपवाद स्वरूप ऐसे मौसम केन्द्र हैं, जहाँ कि मेघाच्छन्न 1/8 से कम है। सर्वाधिक मेघाच्छन्नता दक्षिणी भारत में पायी जाती है।

    यहाँ के अधिकांश केन्द्र पूर्ण मेघाच्छादित बताये गये हैं। इनमें से अधिकांश केन्द्रों पर या तो वर्षा हो रही है या पिछले 24 घण्टों में वर्षा हुई है। शेष भारत में मेघाच्छन्नता अनिश्चित है। 7/8 या अधिक मेघाच्छन्नता पश्चिमी भारत में उदयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, जयपुर, देहरादून, शिमला एवं गंगा के डेल्टा, उड़ीसा और खाड़ी के द्वीपों में दर्शायी गयी है।

    सारे ऋतु मानचित्र में एक भी केन्द्र ऐसा नहीं है जहाँ कि आकाशीय दशा अनिश्चित बतायी गयी हो। पूर्व दिन की संध्या के मानचित्र में भी मेघाच्छन्नता प्रायः इसी भाँति ही है।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     वर्षा काल, अधिक मेघाच्छन्नता और चक्रवात सभी व्यापक वर्षा के लिए अनुकूल दशाएँ उत्पन्न करते हैं। ऋतु मानचित्र में पिछले 24 घण्टों में दूर-दूर तक वर्षा हुई भी है। वर्षा की मात्रा प्रत्येक केन्द्र के वृत्त के दक्षिण-पूर्व दिशा में अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा पश्चिमी तट पर हुई है। यहाँ पिछले 24 घण्टों में पूना में 18, कोलावा में 16, होनावर में 14, रत्नागिरी और कोल्हापुर में 11-11, मंगलौर एवं मुम्बई में 9.9 और शेष स्थानों पर 3 से 8 सें० मी० के बीच वर्षा ऑकत की गयी है।

    मुख्य पठार पर नागपुर में 9 से० मी० और शेष भागों में ०.25 से 3 से० मी० के बीच, बंगाल की खाड़ी के उत्तरी तट पर 1 से 3 से० मी० के बीच, खाड़ी के द्वीपों में क्रमशः 7 से 11 से० मी० और उत्तरी लक्षद्वीप में 3 से० मी० वर्षा अंकित की गयी। इस मानचित्र में उत्तरी एवं उत्तरी-पश्चिमी भारत में वर्षा प्रायः नहीं के बराबर हुई है। यहाँ सबसे अधिक वर्षा झालावाड़ में 3 से० मी०, उदयपुर और जोधपुर में 1-1 से० मी० अंकित की गयी।

    वर्तमान में (6 जुलाई, 1973) को प्रातः 8.30 बजे) सारे पश्चिमी तट पर एवं खाड़ी द्वीपों में दूर-दूर तक वर्षा हो रही है। मुख्य पठार और उत्तरी बंगाल की खाड़ी में कहीं-कहीं वर्षा और बौछारें हो रही हैं, देश के शेष भागों में इस समय वर्षा प्रायः नहीं हो रही है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में समभार रेखाएँ पास-पास होने से यहाँ तेज पवन चल रही है। सागर में सभी स्थानों पर 20 से 25 नॉट के बीच पवन बह रहा है अतः सामान्य सागर की दशा भी प्रतिकूल है।

    अरब सागर में अशान्त (Rough) और बंगाल की खाड़ी में अति अशान्त (V. Rough) से उत्तंग तरंग गति (V. High) के बीच सागर दशा अंकित की गयी है। यद्यपि अरब सागर में केवल एक स्थान पर और बंगाल की खाड़ी में दो स्थानों पर ही सागर की दशा अंकित की गयी है। परन्तु इसमें ही सागर की दशा का स्पष्ट आभास हो जाता है।

(ix) अधिकतम तापमान का सामान्य दशा से विचलन (सायं 5.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार अधिकांश दक्षिणी और उत्तरी-पश्चिमी भारत में अधिकतम तापमान औसत से कम अंकित किये गये। सबसे कम -4°C उत्तरी आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी कश्मीर और निकटवर्ती पाकिस्तान में अंकित किये गये। औसत से अधिक तापमान +4°C हाड़ौती (राजस्थान) और मालवा (मध्य प्रदेश) एवं उत्तरी-पूर्वी उत्तर प्रदेश में अंकित किये गये।

    अधिकतम औसत या 0°C विचलन वाली समताप रेखा देश की तीन स्थानों से होकर गुजरती है। पहली दक्षिणी-पश्चिमी कर्नाटक से केरल होती हुई श्रीलंका की तरफ चली गयी है। दूसरी सौराष्ट्र, पूर्वी गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, उत्तरी-पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा और दक्षिणी-पश्चिमी बंगाल होती हुई खाड़ी की ओर मुड़ गयी है और तीसरी पाकिस्तान से पश्चिमी व उत्तरी राजस्थान की सीमा से पूर्व की ओर मुड़कर पश्चिम उत्तर प्रदेश से हिमालय की ओर मुड़ गयी है। इस प्रकार औसत अधिकतम तापमान की दशा इस समय प्रायः विषम है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्राय: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के अधिकांश मध्यवर्ती, उत्तरी-पूर्वी और सुदूर पूर्वी भागों में न्यूनतम तापमान औसत से अधिक से अधिक और शेष दक्षिण पठार और उत्तरी-पश्चिम भारत में औसत से कम तापमान अंकित किये गये हैं।

     औसत दशा से कहीं भी +2℃ या -2°C से अधिक का विचलन नहीं पाया जाता। अधिकांश दक्षिणी पठार और मध्यवर्ती भारत में यह विचलन इससे भी कम है। औसत तापमान रेखा रेखा सर्वाकार मार्ग से प्रथम उत्तर से दक्षिण की ओर जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र होकर पुनः उत्तर-पूर्व की ओर कर्नाटक, महाराष्ट्र, पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तरी बंगाल व बंग्लादेश होती हुई सुदू पूर्व की ओ चली गयी है।

34. Climograph and Hythergraph

Climograph and Hythergraph



क्लाइमोग्राफ

         Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था।

Climograph X-अक्ष पर Relative Humidity (सापेक्षिक आर्द्रता) को और Y-अक्ष पर Wet Bulb Temperature (आर्द्र बल्ब तापमान) को ध्यान में रखकर मानचित्र या ग्राफ बनाया जाता है।

इंग्लैण्ड के निवासी औपनिवेशिक काल में Climograph का उपयोग वैश्विक स्तर पर निवास करने योग्य स्थान के निर्धारण में किया कर‌ते थे।

जबकि हीदरग्राफ का प्रयोग स्थानीय स्तर पर निवास करने योग्य स्थान का निर्धारण किया करते थे।

प्रश्न 1. क्लाइमोग्राफ (Climograph) के अभिप्राय को समझाते हुए दिए आँकड़ों के आधार पर भोजपुर का क्लाइमोग्राफ बनाइए।

 

Months JAN. FUB. MAR. APR. MAY. JUN. JUL. AUG. SEP. OCT. NOV. DEC.
आर्द्र-वल्ब तापमान (0°C) 13 15 17 19 22 24 26 25 23 20 18 14
आपेक्षिक आर्द्रता 40 30 14 10 12 42 71 74 74 60 42 40

उत्तर-

       Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था। इनके द्वारा क्लाइमोग्राफ का विकास शीत कटिबन्ध में निवास करने वाले यूरोपियों के लिए उष्ण कटिबन्ध में निवास करने की संभावना को ध्यान में रख कर किया गया।

     इससे किसी स्थान के आर्द्र बल्ब तापमान (Wet bulb temperature) तथा प्रतिशत में सापेक्षिक आर्द्रता (Relative humidity) की आवश्यकता होती है इन्हीं दोनों आँकड़ों की सहायता से ग्राफ पेपर पर स्केल के अनुसार x-अक्ष पर सापेक्षिक आर्द्रता तथा y-अक्ष पर आर्द्र बल्ब तापमान को प्रदर्शित करके, प्रत्येक महीना के लिए निर्देशांक से 12 बिन्दु प्राप्त करके उन्हें क्रम से रेखा में मिला देते हैं। इससे क्लाइमोग्राफ का निर्माण हो जाता है।

     टेलर महोदय ने एक निवास्यता मापक्रम का भी निर्माण किया है। जिससे हमें वहाँ की जलवायु सुखद है या दुःखद है, इसका भी आसानी से ग्राफ देखकर पता चलता है।

निवास्यता मापक्रम (Hability Scale)

क्रम सुखद या दुःखद के प्रकार तापमान
1. अत्यल्प दुःखद (Very rarely uncomfortable) 40° से 45° F (4° से 7° C)
2. आदर्श (Ideal) 45° से 55° F (7° से 13° C)
3.

अत्यल्प दुःखद (Very rarely uncomfortable)

55° से 60° F (13° से 16° C)
4. बहुधा दुःखद (Sometimes uncomfortable) 60° से 70° F (16° से 19° C)
5.

बहुधा दुःखद (Often comfortable)

65° से 70° F (19° से 21° C)
6. हमेशा दुःखद (Usually uncomfortable) 70° से 75° F (21° से 24° C)

          टेलर ने कुछ विशेष प्रकार की जलवायु को भी दर्शाया है जो क्लाइमोग्राफ के चारों कोनों पर होता है। इसके चार प्रकार हैं:

1. झुलसता हुआ (SCORCHING):-

        NW कोने पर, आर्द्र बल्ब तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् उष्ण-शुष्क जलवायु।

2. उमसदार (MUGGY):-

       NE कोने पर तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् उष्णार्द्र जलवायु।

3. शीतार्द्र (RAW):-

      SE कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् ठंडी आर्द्र जलवायु।

4. शीत-शुष्क (KEEN):-

       SW कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् शीत व शुष्क जलवायु।

    इस प्रकार क्लाइमोग्राफ की आकृतियों से विभिन्न स्थानों की जलवायु में भिन्नता का पता चलता है। जैसे- शुष्क क्षेत्रों के लिए क्लाइमोग्राफ की आकृति तकुए की भाँति होती है, भूमध्यसागरीय जलवायु हेतु विकर्ण तथा मानसूनी जलवायु हेतु उल्टे विकर्ण की आकृति बनती है। जिससे विभिन्न स्थानों की जलवायु का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

CLIMOGRAPH OF BHOJPUR

रचना विधि:

      एक ग्राफ कागज लेकर क्षैतिज रेखा खींचा जो X-अक्ष हुआ। इस पर समान दूरी के अंतर पर आपेक्षिक आर्द्रता के आँकड़ों के अनुसार मापनी निश्चित कर 0, 10, 20, 30, 40, 50, 60, 70, 80 लिखा। इसके नीचे मोटे अक्षरों में RELATIVE HUMIDITY (In %) लिख दिया। X-अक्ष पर लंब डाला और Y-अक्ष बनाया। अब भोजपुर के आर्द्र बल्ब तापमान (Wet bulb Temperature) के आँकड़ों के अनुसार मापनी निश्चित कर 0, 10, 20, 30 व 40 लिखा तथा इसके समीप ही WET BULB TEMPERATURE (°C) लिख दिया।

    अब January के आर्द्र बल्ब तापमान 13°C और आपेक्षिक आर्द्रता 40% के आँकड़ों को मिलाते हुए सीधी रेखाएँ खीचीं। जिस बिन्दु पर ये दोनों रेखाएँ मिलती हैं उसे चिह्नित कर J लिखा। इसी प्रकार Febuary, March से November तथा December तक के आर्द्र बल्ब तापमान और आपेक्षिक आर्द्रता के आँकड़ों को मिलाते हुए खीचें बिन्दुओं पर क्रमशः F, M ……. N व D लिखा।

     अब सरल रेखा द्वारा January के बिन्दु को Febuary के बिन्दु से, Febuary के बिन्दु को March के बिन्दु से… November के बिन्दु को December के बिन्दु से तथा अंततः December के बिन्दु को January के बिन्दु से मिलाते हुए 12 रेखाएँ खींची। इस प्रकार प्राप्त 12 भुजी आकृति ही हमारा अभीष्ट Climograph होगा। Climograph के NW कोने पर SCORCHING, NE कोने पर MUGGY, SE कोने पर RAW तथा SW कोने पर KEEN लिख दिया।

Climograph



हीदरग्राफ

          हीदरग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम टेलर महोदय ने किया था।

हीदरग्राफ में जलवायु के आँकड़े को प्रदर्शित किया जाता है।

हीदरग्राफ में X-अक्ष पर वर्षा और Y-अक्ष पर तापमान को दिखाया जाता है।

हीदरग्राफ का प्रयोग औपनिवेशिक काल में अँग्रेज लोग बड़े पैमाने पर किया करते थे।

हीदरग्राफ पर बहुत अधिक गर्म, बहुत अधिक ठण्डा, बहुत अधिक सूखा और बहुत अधिक आर्द्रता के साथ-2 अधिवासित होने के लिए उपयुक्त क्षेत्र को प्रदर्शित किया जाता था।

प्रश्न 1. हीदरग्राफ (Hythergraph) के अभिप्राय को समझाते हुए दिये गये आँकड़ों के आधार पर भोजपुर के हीदरग्राफ की रचना कीजिए।

Months JAN. FUB. MAR. APR. MAY. JUN. JUL. AUG. SEP. OCT. NOV. DEC.

औसत मासिक तापमान (0°C)

17 20 27 30 32 31 30 28 28 27 23 18
औसत मासिक वर्षा (cm) 2 2 1 1 3 12 28 25 18 5 1 1

उत्तर-

      हीदरग्राफ (Hydhergraph) एक ऐसा आरेख है जिसमें वर्षा और तापमान के सम्बन्धों एक साथ को प्रदर्शित किया जाता है। इसमें वर्षा तथा तापमान के मासिक वितरण को प्रदर्शित किया जाता है।

    इसमें क्षैतिज भुजा (X-axis) पर मिलीमीटर या इंचों में वर्षा और लम्बवत् भुजा (Y-axis) पर °F या °C में तापमान बताये जाते हैं। टेलर का हीदरग्राफ पहले के विद्वानों फास्टर व हटिंगटन द्वारा बनाया गया क्लाइमोग्राफ ही है। इसमें मासिक वर्षा और शुष्क तापमान को टेलर के क्लाइमोग्राफ की भाँति प्रतिमास अंकित कर बारह बिन्दु प्राप्त करते हैं। इन्हें आपस में जोड़कर बन्द आकृति बना दी जाती है।

     इसके द्वारा किसी स्थान विशेष की वर्षा और वाष्पीकरण के सम्बन्ध को समझाकर वास्तविक जल उपलब्धता को समझा जा सकता है। टेलर के हीदरग्राफ में तापमान और वर्षा की सीमा नहीं दी गई है। जिन भागों में गर्मियों में वर्षा होती है वाष्पीकरण भी अधिक होने से वास्तविक जल उपलब्धता तेजी से घटने लगती है।

HYTHERGRAPH OF BHOJPUR

रचना विधि:

     एक ग्राफ कागज लेकर आधार के समानांतर एक रेखा खींचा जो X-अक्ष होगा। इस अक्ष पर एक लंबवत् रेखा खींचा जो Y-अक्ष होगा। X-अक्ष पर औसत मासिक वर्षा के आँकड़ों के अनुसार समान दूरी के अंतर पर मापनी निश्चित करके 0, 5, 10, 15, 20, 25, 30 व 35 की संख्याएँ लिखीं। इनके नीचे मोटे अक्षरों में AVERAGE MONTHLY RAINFALL (CM) लिख दिया।

    अब Y-अक्ष पर औसत मासिक तापमान के आँकड़ों को आधार मानकर मापनी निश्चित करके 0, 5, 10, 15, 20, 25, 30 व 35 की संख्याएँ लिख दीं। इसके ऊपर मोटे अक्षरों में AVERAGE MONTHLY TEMPERATURE (°C) लिख दिया।

     अब January के तापमान 17°C और वर्षा 2 cm के आँकड़ों को मिलाते हुए रेखाएँ खींची। जहाँ ये दोनों रेखाएँ मिलती हैं, उस बिन्दु को चिह्नित क J लिखा। इसी प्रका Febuary, March….. November, December के तापमान एवं वर्षा के आँकड़ों के आधार पर 12 बिन्दु चिह्नित करके संबंधित बिन्दुओं क्रमशः F, M, N, तथा D लिखा।

      अब January के बिन्दु को सरल रेखा द्वारा Febuary के बिन्दु से, Febuary के बिन्दु को March के बिन्दु से November के बिन्दु को December के बिन्दु से तथा अंततः December के बिन्दु को January के बिन्दु से मिलाते हुए 12 भुजी बहुभुज बनाया जो अभीष्ट Hythergraph हुआ।

29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना

 29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना



            क्षेत्रीय विभेदन भूगोल की आत्मा स्वरूप है। अन्तर्सम्बन्ध की प्रक्रिया तो मात्र यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्य कैसे एक जैविक इकाई की तरह परस्पर ससंजित एवं क्रियाशील हैं, लेकिन इन तथ्यों की जिनमें प्राकृतिक वातावरण एवं मनुष्य आते हैं, अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं।

     यदि हम पृथ्वी की सतह को देखें तो पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा जल है एवं एक-तिहाई भाग थल है। थल पर मिट्टी की असमान परत है तथा अनेक भू-आकृतियाँ हैं, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ एवं उसके विविध रूप। जल भी अनेक छोटे-बड़े सागरों, नदियों, झीलों में विभक्त है। थल पर नदियाँ, हिमानी, झरने, भूमिगत जल, अन्तरादेशीय प्रवाह प्रणालियाँ, जंगल, घास के मैदान, पशुजीवन, मरुस्थल, कृषि क्षेत्र आदि दृष्टव्य हैं।

       जल की सतह पर कोरल रीफ, जल से प्राप्त पदार्थ, थल से प्राप्त पदार्थ, जलीय वनस्पतियाँ, मछलियाँ, कछुए आदि अनेक जीव हैं। वायुमण्डल भी पृथ्वी की सतह का अंग है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23°30′ अंश झुकी है एवं सूर्य की परिक्रमा करती है। वायुमण्डल भी उसके साथ घूमता है। पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप का वितरण असमान है जो सूर्य से सापेक्ष स्थिति के अनुसार बदलता है। इससे पृथ्वी की जलवायु में विविधता आती है। इस तरह वैभिन्न्य पृथ्वी की सतह की मूल विशेषता है।

      दूसरी ओर मनुष्य हैं। मनुष्य अकेला नहीं होता। वह वस्तुतः समाज में रहता है। आज भी पृथ्वी की सतह पर आदिवासी जनजातियाँ हैं जो परस्पर युद्धरत रहती हैं। पशुचारण करने वाले समूह भी हैं। उन्नत समाज स्थायी कृषि करते हैं और उद्योग, व्यापार परिवहन में रत रहते हैं। उनके अधिवास हैं जो कहीं बिखरे हैं तो कहीं सघन हैं, ग्राम एवं नगर हैं, ये सब भी स्थान घेरते हैं।

     उपरोक्त दोनों तथ्य कैसे एक-दूसरे से एक जीव की तरह अन्तर्सम्बन्धित हैं, यह ऊपर विवेचित है। इस तरह यह अन्तर्सम्बन्धित वैविध्य पृथ्वी की सतह पर पहचाना जा सकता है तथा इसके छोटे-बड़े क्षेत्र दृष्टव्य होते हैं। उदाहरणार्थ ध्रुवीय क्षेत्र के एस्किमों निवासियों को अपना स्पष्ट क्षेत्र है, तो अफ्रीका के पिग्मी एवं कलाहारी के बुशमैन का अपना रहन-सहन एवं स्पष्ट क्षेत्र है।

        इतना ही नहीं असम घाटी में धान की खेती, कनाडा में गेहूँ की खेती के विस्तृत क्षेत्र, अर्जेन्टाइना में पशुचारक प्रदेश, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं जापान में औद्योगिक प्रदेश सब वैभिन्य से परिपूर्ण होते हुए भी क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में पहचाने जाते हैं। इस तरह, समाज एवं वातावरण के अन्तर्सम्बन्ध की परिणति क्षेत्रीय इकाई में होती है। ऐसी क्षेत्रीय इकाइयों का अध्ययन भूगोल का उद्देश्य है।

    यहीं से भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का समावेश होता है। पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय वैभिन्न्य का विषम स्वरूप पृथ्वी को विभिन्न प्रखण्डों में बांट देता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान का धरातल, जलप्रवाह, मिट्टियाँ, मानव अधिवास, आदि मिलकर एक विशिष्ट जीवन पद्धति का गठन करते हैं। यह कृषि प्रधान क्षेत्र कहा जा सकता है, सीमांकित किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रदेश में जीवन पद्धति की एकरूपता या समरूपता मिलती है। इस समरूपता के आधार पर इसे गंगा-यमुना प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

       इसी तरह, पहाड़ी प्रदेश, पर्वतीय क्षेत्र, भूमध्यसागरीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय प्रदेश आदि सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपने आन्तरिक क्षेत्रीय विस्तार में एक रूप होते हैं। इसलिए इन्हें प्रदेश कहते हैं।

     प्रदेश की संकल्पना भूगोल का क्रोड है। प्रदेश की परिभाषा, प्रदेश की पहचान एवं सीमांकन आदि सब अपने आप में विवेचना की विषय-वस्तु हैं। प्रदेश भौगोलिक भी होते हैं तथा प्रदेश की पहचान कराने वाले एक या अधिक तत्वों पर आधारित भी होते हैं। इस तरह प्रदेश अतिव्यापित भी हो सकते हैं।

     भूगोल के सैद्धान्तिक स्वरूप के उपरोक्त दोनों तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अन्तर्सम्बन्ध पृथ्वी की सतह के तथ्यों को संसंजित करता है तथा क्षेत्रीय वैभिन्न्य भौगोलिक तथ्यों के स्थानिक प्रसार एवं उनके भौगोलिक व्यक्तित्व एवं अन्तर्निहित समरूपता को स्थापित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल में क्षेत्रीय विभेद अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना को विवेचित कीजिए।

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

(Conventional Signs and Symbols)


रूढ़ चिन्ह और संकेत

          स्थलाकृति मानचित्र पर भौगोलिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को एक विशिष्ट चिन्ह के द्वारा प्रदर्शित किया है, जो रूढ़ चिन्ह कहे जाते है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा इन संकेतों का मापनीकरण किया जा चुका है। भारतीय स्थलाकृति मानचित्र में प्रयुक्त संकेत को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। प्राय: 1:50,000 और 1:25000 मापनी वाले पत्रक में रूढ़ चिन्ह समरूपी होते है। कुछ रूढ़ चिन्ह निम्नांकित है-

        यह मुख्यत: दो प्रका के होते है-

1. मौसम विज्ञान के लिए

2. स्थलाकृतिक पत्रक के लिए

 रूढ़ चिन्ह और संकेत

 


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20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ

20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ


हीदरग्राफ

       हीदरग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम टेलर महोदय ने किया था।

⇒ हीदरग्राफ में जलवायु के आँकड़े को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ में X-अक्ष पर वर्षा और Y-अक्ष पर तापमान को दिखाया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ का प्रयोग औपनिवेशिक काल में अँग्रेज लोग बड़े पैमाने पर किया करते थे।

⇒ हीदरग्राफ पर बहुत अधिक गर्म, बहुत अधिक ठण्डा, बहुत अधिक सूखा और बहुत अधिक आर्द्रता के साथ-2 अधिवासित होने के लिए उपयुक्त क्षेत्र को प्रदर्शित किया जाता था।

हीदरग्राफ

 

 

क्लाइमोग्राफ

       Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था।

⇒ Climograph X-अक्ष पर Relative Humidity (सापेक्षिक आर्द्रता) को और Y-अक्ष पर Wet Bulb Temperature (आर्द्र बल्ब तापमान) को ध्यान में रखकर मानचित्र या ग्राफ बनाया जाता है।

⇒ इंग्लैण्ड के निवासी औपनिवेशिक काल में Climograph का उपयोग वैश्विक स्तर पर निवास करने योग्य स्थान के निर्धारण में किया कर‌ते थे।

⇒ जबकि हीदरग्राफ का प्रयोग स्थानीय स्तर पर निवास करने योग्य स्थान का निर्धारण किया करते थे।

⇒ टेलर ने कुछ विशेष प्रकार की जलवायु को भी दर्शाया है जो क्लाइमोग्राफ के चारों कोनों पर होता है। इसके चार प्रकार हैं:

1. झुलसता हुआ (SCORCHING):-

        NW कोने पर, आर्द्र बल्ब तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् उष्ण-शुष्क जलवायु।

2. उमसदार (MUGGY):-

       NE कोने पर तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् उष्णार्द्र जलवायु।

3. शीतार्द्र (RAW):-

      SE कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् ठंडी आर्द्र जलवायु।

4. शीत-शुष्क (KEEN):-

       SW कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् शीत व शुष्क जलवायु।

 

Cartogram (मानारेख)

        मानारेख में किसी क्षेत्र की मूल आकृति को किसी विशेष उद्देश्य से विकृत कर सांख्यिकीय आंकड़ों का आरेखी विधि से मानचित्र पर प्रदर्शन किया जाता है। यह एक अति सारगर्भित एवं सरल मानचित्र होता है तथा आधुनिक भूगोल में काफी लोकप्रिय है।

⇒ इरविन रेख ने मानारेख को परिभाषित करते हुए कहा कि-“किसी एकल विचार को आरेखी ढंग से दिखाने के लिए बनाया गया अमूर्त और सरलीकृत मानचित्र को मानारेख कहते हैं।”

       मानारेख चार प्रकार का होता है:-

(1) क्षेत्र मूल मानारेख

        क्षेत्र मूल मानारेख में संसार अथवा किसी महाद्वीप, देश अथवा राज्य के क्षेत्रफल को आयत चित्र के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

क्षेत्र मूल मानारेख

(2) यातायात परिवहन मानारेख (Traffic flow Cartogram)

        वैसा मानारेख जिस पर सड़‌क पर चलने वाली गाड़ियों के भार को प्रदर्शित किया जाता है। इसे Star Diagram भी कहते हैं।

⇒ Star Diagram पर नियत समय में दिशा के अनुरूप चलने वाली वायु को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ इस आरेख में  शांत दिनों की संख्या को केन्द्र में लिख दिया जाता है या नहीं तो Calm Days लिख दिया जाता है। ऐसे Diagram को Wind Diagram कहते है।

यातायात परिवहन मानारेख

(3) Isochronic Diagram (समकालीन मानारेख)

         किसी निश्चित बिन्दु से समान समय में पहुँच वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समकालीन रेखा कहते हैं।

⇒ जब परिवहन मार्ग पर समकालीन रेखा को प्रदर्शित किया जाता है तो Isochronic Diagram का निर्माण होता है।

Isochronic Diagram

(4) समान मूल्य दूरी मानारेख

         किसी भी क्षेत्र के संदर्भ में सड़क अथवा रेलमार्ग पर तय की जाने वाली समान दूरी अन्तराल पर खींचे जाने वाली क्रमिक ट्रैफिक को प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को समान मूल्य दूरी मानारेख कहते है।

⇒ समान मूल्य दूरी मानारेख पर दूरी एवं परिवहन के भार को साथ-2 प्रदर्शित किया जाता है।

समान मूल्य दूरी मानारेख

अरगोग्राफ

       अरगोग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम गेडिज महोदय ने किया था।

⇒ अरगोग्राफ कृषकों के लिए काफी उपयोगी है।

⇒ अरगोग्राफ प तापमान, वर्षा, फसलों की संख्या और उत्पादन को एक साथ प्रदर्शित किया जाता है।


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3. मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

3. मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण


मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

      प्रकाश या ज्यामितीय विधि द्वारा समतल सतह पर निर्मित अक्षांश व देशांतर रेखाओं के जाल या भू-ग्रिड को मानचित्र प्रक्षेप कहा जाता है। गोलाकार पृथ्वी अथवा इसके किसी बड़े भू-भाग का समतल सतह पर मानचित्र बनाने के लिए मानचित्र प्रक्षेप का प्रयोग किया जाता है। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के जाल को Graticule, Net या Mesh के नाम से भी जाना जाता है।

मानचित्र प्रक्षेपों

           पृथ्वी की आकृति का यथार्थ चित्रण केवल ग्लोब के द्वारा ही संभव है एवं कोई भी मानचित्र प्रक्षेप आकार, क्षेत्रफल एवं दिशा, तीनों ही दृष्टि से सही नहीं होता है। परन्तु समक्षेत्र, यथाकृतिक अथवा शुद्ध दिशा के गुणों में से किसी विशेष गुण का प्रक्षेप बनाना संभव है। अतः मानचित्र के उद्देश्य को ध्यान में रखकर उपयुक्त प्रक्षेप का चयन किया जाता है।

    मानचित्र प्रक्षेप को तीन आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

(1) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

(2) गुण के आधार पर

(3) रचना विधि के आधार पर

(I) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

            प्रकाश के प्रयोग के आधार पर प्रक्षेप दो प्रकार के होते हैं:-

(1) संदर्श मानचित्र-प्रक्षेप (Perspective Map Projection or Geometrical Projection):-

         यह एक ऐसा Projection है जिसमें ग्लोब पर स्थित भूग्रिड को समतल कागज पर प्रकाश के माध्यम से प्रक्षेपित करते हैं।

        इस प्रक्षेप में प्रकाश के स्रोत की तीन स्थिति हो सकती है। जैसे-

(1) केन्द्र में,

(2) पृथ्वी के परिधि पर और

(3) अनन्त पर।

          इन तीनों स्थितियों के आधार पर प्रक्षेप तीन प्रकार के होते हैं:-
(i) केन्द्रक प्रक्षेप (Gnomonic Projection)

⇒ इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के केंद्र में होता है।

(ii) त्रिविम प्रक्षेप (Stereograophic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के परिधि पर होता है।

(iii) लम्ब-कोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत अनंत पर होता है।

(2) असंदर्श मानचित्र प्रक्षेप (Non-Perspective Map Projection):-

          इसमें गणितीय विधि के आधार पर भूग्रिड को समतल कागज पर प्रक्षेपित किया जाता है। इस विधि में प्रकाश स्रोत को केन्द्र में स्थिर कर दिया जाता है और समतल कागज को अलग-2 स्थितियों में बदलकर प्रक्षेपण का कार्य किया जाता है। इसके आधार पर यह Projection तीन प्रकार का होता है-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज को ग्लोब के ध्रुव पर फैलाकर रखा जाता है।

(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज विषुवत रेखा को स्पर्श करता है।
(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज ध्रुव और विषुवत रेखा के बीच के किसी स्थान को स्पर्श करता है।

(II) गुण के आधार पर 

             गुण के आधार पर प्रक्षे तीन प्रकार के होते हैं:-

(1) यथाआकृति प्रक्षेप (Orthomorphic Projection)

(2) समक्षेत्र प्रक्षेप (Homolographic Projection or Equal Area Projection)

(3) शुद्ध दिशा प्रक्षेप (Azimuthal Projection)

(III) रचना विधि के आधार पर

           इसमें गणित और प्रकाश दोनों का सहारा अपने सुविधा के अनुसार लिया जाता है।

⇒ रचना विधि के आधार पर प्रक्षेप कई प्रकार के होते हैं:-
(1) शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)

      शंकु प्रक्षेप चार प्रकार का होता है-

(i) One Standard Parallel Conical Projection (एक मानक अक्षांश वाला शंकु-प्रक्षेप)

(ii) Two Standard Parallel Conical Projection (दो मानक अक्षांशों वाला शंकु प्रक्षेप)

(iii) Bonne’s Projection (बोन प्रक्षेप)

(iv) Polyconic Projection (बहुशंकुक प्रक्षेप)

(2) बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)

(i) Cylindrical Equi-Distance Projection (समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप)

(ii) Cylindrical Equal-Area Projection (बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप)

(iii) Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप या यथाकृति प्रक्षेप)

(iv) Gall Projection (गॉल प्रक्षेप)

(3) Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)
              प्रकाशीय स्थिति के आधार पर खमध्य प्रक्षेप तीन प्रकार का होता है:-

(1) Gnomonic Projection (केन्द्रक नोमॉनिक प्रक्षेप)

(ii) Stereograophic Projection (त्रिविम प्रक्षेप)

(ii) Orthographic Projection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)

             खमध्य प्रक्षेप कागज तल स्थिति के आधार पर तीन प्रकार का होता है:-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

(ii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक प्रक्षेप)

(iii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

(4) रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Porojection)

(i) मॉलवीड प्रक्षेप (Mollveide Projection)

(ii) ज्यावक्रीय या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

(iii) गोलाकार प्रक्षेप (Globular Projection)

(iv) विच्छिन्न मॉलवीड प्रक्षेप (Interrupted Mollveide Projection)

(v) विच्छिन्न सैन्सन फ्लैम्स्टीड या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Interrupted Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण


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19. आरेख का प्रकार एवं उपयोग

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

(Diagram: Types & uses or Statistical Representation of Data)


आरेख का प्रकार एवं उपयोग

         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भूगोल के विषयवस्तु एवं विधि तंत्र में मात्रात्मक क्रांति का आगमन हुआ। इसी मात्रात्मक क्रान्ति का यह प्रभाव था कि भूगोल में अनेक प्रकार के भौगोलिक तत्वों का निरूपण हेतु आरेख (Diagram) का निर्माण किया जाने लगा।

⇒ मात्रात्मक क्रान्ति- भूगोल में गणितीय विधि का प्रयोग करना।

भौगोलिक तत्वों को ग्राफ या चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित करने की विधि को आरेख (Diagram) कहते हैं।

⇒ भूगोल में प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के किसी तत्व का वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को वितरण मानचित्र कहते है।

⇒ वितरण मानचित्र को दो भागों में बाँटते हैं-

(1) अमात्रात्मक विधि के द्वारा निर्मित वितरण मानचित्र या गुण प्रधान वितरण मानचित्र

(2) मात्रात्मक विधि पर आधारित वितरण मानचित्र या सांख्यिकी मानचित्र

गुण प्रधान मानचित्र /वितरण मानचित्र

       गुण प्रधान मानचित्र मोटे तौर पर चार प्रकार का होता है:-

(1) रंगारेखा विधि (Choro-Chromatic Method)

(2) सामान्य छाया विधि (Sketching Map) पर आधारित मानचित्र

(3) चित्रीय विधि (Pictorial Map) पर आधारित मानचित्र

(4) वर्ण प्रतीकी विधि पर आधारित मानचित्र (Choros-Chematic Map)

मात्रात्मक मानचित्र

      मात्रात्मक मानचित्र भी चार प्रकार का होता है-

(i) वर्णमात्री विधि पर आधारित मानचित्र

(ii) सममान प्रतीक विधि पर आधारित मानचित्र

(iii) बिन्दु विधि पर आधारित मानचित्र

(iv) आरेखी विधि आधारित मानचित्र

(1) रंगारेखी विधि मानचित्र (Colour patch Map)

⇒ इसे Colour Map या Choro-Chromatic Map भी कहते हैं।

⇒ प्राकृतिक, राजनीतिक एवं प्रशासकीय ने प्रदेशों के विस्तार, भूमि उपयोग, मिट्टी एवं वनस्पतियों के प्रकार का वितरण प्रदर्शित करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है।

⇒ रंगारेखी मानचित्र पर अलग-2 भौगोलिक तत्वों को अलग-2 रंग से प्रदर्शित करते हैं।

(2) Sketching Map (सामान्य छाया विधि)

⇒ sketching Map में एक भौगोलिक तत्व के उपविभाग को एक ही रंग से अलग-2 तीव्रता (Intensity) प्रदर्शित करते हैं।

(3) चित्रीय विधि पर आधारित मानचित्र

        किसी देश के दर्शनीय स्थान, पर्यटन केन्द्र, वेष-भूषा एवं ऐतिहासिक इमारतों के चित्रों के माध्यम से मानचित्र परम प्रस्तुत करना चित्रीय मानचित्र कहलाता है।

(4) वर्ण प्रतीकी मानचित्र

        वैसा मानचित्र जिस पर कई तत्त्वों के वितरण को एक ही मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ वर्ण प्रतीकी मानचित्र पर खनिजों का वितरण, औद्योगिक वितरण एवं फसल उत्पादन के वितरण प्रदर्शित करते हैं और Index बनाकर इसमें संकेत के रूप प्रदर्शित कर देते हैं।

⇒ कभी-2 Index का निर्माण कर सीधे-2 भौगोलिक तत्व के पहला अक्षर को मिलने वाले स्थान पर लिख दिया जाता है। ऐसे मानचित्र को नामांकन विधि मानचित्र कहते है।

मात्रात्मक विधि

       जब भौगोलिक तत्वों जैसे वस्तुओं के मूल्य, मात्रा, घनत्व इत्यादि को भौगोलिक मानचित्र पर या सांख्यिकी विधि द्वारा प्रकट किया जाता है तो उसे मात्रात्मक विधि घर आधारित आरेख (मानचित्र) कहते हैं।

यह कई प्रकार का होता है। जैसे-

(1) वर्णमात्री विधि (Choropleth)

        ऐसे मानचित्र में भिन्न-2 घनत्त्व वाली भौगोलिक तत्त्वों को मानचित्र पर प्रति इकाई औसत या प्रतिशत के मूल में प्रदर्शित करते हैं। जैसे- जनघनत्व (प्रति इकाई क्षेत्रफल पर निवासित जनसंख्या), कृषि भूमि का प्रतिशत, उत्पादकता (kg प्रति इकाई क्षेत्रफल) को दिखाया जाता है।

⇒ इसमें मूल्यों के बढ़ने के साथ रंगों के गहराई में भी वृद्धि होते जाती है।

(2) सममान रेखा विधि (Isopleth Map)

          मानचित्र पर किसी वस्तु के समान मूल्य या धनत्व को मिलाने वाली रेखा को Isopleth रेखा कहते हैं।

⇒ Isopleth जलवायु के तत्वों को दिखलाने के लिए काफी उपयोगी है। इसके अलावे इस पर निम्नलिखित तत्त्वों को प्रदर्शित किया जा सकता है। जैसे- समताप रेखा, सममेघ रेखा, समवर्षा रेखा, समदाब रेखा इत्यादि।

1. आइसोनीफ (Isonif)⇒ समान हिम वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनीफ कहते है।

2.  सममेघ रेखा या आइसोनेफ (Isoneph)⇒ समान मेघ आच्छादन वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनेफ कहते है।

3. आइसो बाथ (Isobath)⇒ समुद्र के अंदर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाकर खींचे जाने वाली रेखा को आइसो बाथ कहते है।

4. आइसो ब्रांट (Isobront)⇒ एक समान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

5. समपवनवेग रेखा या आइसोटैक (Isotach)⇒ मौसम मानचित्र पर पवन की समान गति वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखा।

6. समताप रेखा (Isotherm)⇒ समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

7. आइसोपैच (Isopach)⇒ हिमानी अथवा चट्टानों के समान मोटाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

8.  समकाल रेखा या आइसोक्रोन (Isochrone)⇒ किसी बिंदु से एक समान समय में तय कि गई दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

(3) बिन्दु विधि (Dot Method)

          इसे बनाने से पूर्व चार तथ्यों पर ध्यान देना पड़ता है-

(i) बिन्दुओं के आकार को निश्चित करना पड़ता है।

(ii) बिन्दु मूल्य सुनिश्चित करना पड़ता है।

⇒ बिन्दुओं के मूल्य का निर्धारण दो आधार पर होता है:

(a) क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि (क्षेत्रफल के लिए)

(b) आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि (आयतन के लिए)

(iii) बिन्दुओं को अंकित करना- यह भी दो प्रकार का हो सकता है:-

(a) समवितरण प्रणाली पर आधारित

(b) असमवितरण प्रणाली पर आधारित

(iv) एक समान बिन्दु बनाना।

⇒ बिन्दु विधि या आधारित मानचित्र में केवल एक वस्तु का विवरण दिखाते हैं। जैसे:- जनसंख्या,पालतू पशु

क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि

⇒ यह बिन्दु विधि वितरण मानचित्र का एक संशोधित रूप है।

⇒ इस विधि के द्वारा ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या को स्पष्ट रूप से दिखाया जा सकता है।

⇒ इस विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिंदु के द्वारा और नगरीय जनसंखा को अनुपातिक वृत के द्वारा दिखाया जाता है।

इसमें आनुपातिक वृत को क्षेत्रफल के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ वृतों की त्रिज्या सम्बंधित जनसंख्या का वर्गमूल निकालकर बिन्दु के आकार से गुणा करके प्राप्त किया जाता है।

आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि

⇒ इसमें भी ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के वितरण को मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ बोअर विधि में कभी-2 नगरीय केन्द्र की जनसंख्या अधिक होने पर आकार बहुत बड़ा हो जाता है, जिसके कारण वृत नगर सीमा के बाहर चली जाती है।

⇒ अत: इस समस्या से निपटने हेतु नगरीय जनसंख्या को समानुपातिक गोला के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। 

⇒ गोला का अर्द्ध व्यास जनसंख्या के घनमूल निकालकर ज्ञात करते हैं।

⇒ स्टेन डी गियर विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिन्दुओं एवं नगरीय जनसंख्या को गोलों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

(4) आरेखी विधि पर आधारित मानचित्र

         वैसा मानचित्र जिसमें भौगोलिक तत्वों को सरल रेखा, वृत, दण्ड इत्यादि के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। उसे आरेख कहते हैं।

आरेख चार प्रकार के होते हैं-

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

        दण्ड-आरेख पा पिछले शताब्दी के जनसंख्या को प्रदर्शित किया जा सकता है। इसमें समय को x-axis पर और जनसंख्या को Y-axis पर दिखाया जाता है।

      वस्तुतः दण्डारेख दो प्रकार का होता है:-

(a) साधारण दण्ड आरेख (Simple Bar Diagram):- साधारण दण्ड आरेख में कुल मात्रा को एक दण्ड के रूप में प्रदर्शित करते है।

साधारण दण्ड आरेख

(b) मिश्रित दण्ड आरेख (Compound Bar Diagram):- यदि दिया गया डाटा सतत (Continuous) हो तो दण्डारेख आयत चित्र के रूप में बनते है। 

मिश्रित दण्ड आरेख

(c) बहुदण्ड आरेख (Multiple Bar Diagram):- इसमें दो या अधिक वस्तुओं के आँकड़े एक साथ प्रदर्शित किये जाते हैं। तुलनात्मक अध्ययन में ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

बहुदण्ड आरेख

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

                  यह आँकड़ों को प्रदर्शित करने की एक सरल ज्यामितीय विधि है। वृत्तारेख में वृत्त का कुल क्षेत्रफल आँकड़ों का कुल योग तथा विभिन्न त्रिज्याखंड आँकड़ों के प्रत्येक घटक को प्रदर्शित करते हैं। वृत्तारेख बनाने के लिए सर्वप्रथम सुविधानुसार कोई अर्द्धव्यास से वृत्त खींचकर आँकड़ों के योग को प्रदर्शित करते हैं। इसके बाद आँकड़ों के विभिन्न घटकों या उपविभागों के अंशों में मान निम्न प्रकार ज्ञात करते हैं:

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

            इस प्रकार ज्ञात किये गये कोणों को वृत्त में कहीं भी अर्द्धव्यास खींचकर बनाया जा सकता है, परन्तु उत्तर दिशा से प्रारंभ करके घड़ी की सूई की दिशा में तथा अवरोही क्रम में बनाये गये कोण अधिक श्रेयस्कर होते हैं।

वृत आरेख

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

              Line Diagram प्रवृति का द्धोतक है। Line Diagram से जनसंख्या वृद्धि, Market Price, Index को पर्दर्शित करते है। 

Line Diagram

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

               जैसा कि नाम से पता चलता है, इन आरेखों के तीन आयाम होते हैं, अर्थात लंबाई, चौड़ाई और गहराई। घनीय और गोलाकार आरेख त्रिविम या त्रिआयामी आरेखों के मुख्य उदाहरण हैं। त्रिवि या त्रिआयामी रेखाचित्रों का आयतन उनके द्वारा दर्शायी जाने वाली मात्राओं के समानुपाती होता है, और इसीलिए उन्हें आयतन आरेख भी कहा जाता है। यह आरेख द्विविम या द्विआयामी आरेखों की तुलना में बहुत कम जगह घेरते हैं। इस प्रकार, वे विशेष रूप से उपयोगी होते हैं जब दिए गए मात्राओं के मूल्य बहुत भिन्न होते हैं। इन आरेखों को वितरण मानचित्रों पर स्थित आरेखों के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

त्रिविम आरेख

त्रिविम आरेख


पिरामिड आरेख (Piramidal Diagram) 

                     पिरामिड Diagram द्वारा दो विपरीत भौगोलिक आंकड़ों को विरूपित किया जाता है। जैसे- पुरुष-महिला के लिंगानुपात, आयात-निर्यात, औसत आयु (स्त्री- पुरुष) को दिखाते है।

पिरामिड आरेख

पट्टिका-ग्राफ (Band Graph)

             जब किसी उत्पादन का आंकड़ा कई वर्षों का और कई देशों का उपलब्ध हो तो उसे Band Graph के माध्यम से प्रदर्शित करते है।

पट्टिका-ग्राफ

Poly Graph 

⇒ Poly Graph  का प्रयोग जनसँख्या भूगोल में किया जाता है

⇒ Poly Graph  पर मृत्यु दर, जन्म दर और प्राकृतिक वृद्धि दर को प्रदर्शित किया जाता है

Poly Graph 


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18. आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)

आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)



आलेखी / रैखिक विधि⇒

            आलेखी विधि का प्रयोग कर मानचित्र पर की दूरी को और धरातल के वास्तविक दूरी को मापने हेतु एक रेखा खींचकर उस पर मापनी अंकित कर दिया जाता है।

गुण एवं उपयोगिता के आधार पर रेखीय मापनी निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(1) साधारण रेखीय मापक (Simple Linear Seale)

       यह मानचित्र पर दूरी मापने का सर्वोत्तम Scale है। इस मापनी को मानचित्र के एक भाग में एक साधारण रेखा खींचकर दो भागों में बाँट देते हैं। एक भाग प्राथमिक पैमाना कहलाता है और दूसरा भाग द्वितीयक पैमाना कहलाता है। प्राथमिक पैमाना को हमेशा दाईं ओर प्रदर्शित करते हैं। जबकि द्वितीयक पैमाना को हमेशा बाईं ओर प्रदर्शित करते हैं।          

आलेखी

साधारण रेखीय मापक

       प्राथमिक मापनी में केवल एक उपविभाग होता है जबकि द्वितीयक मापनी में दस उपविभाग होता है। इसका तात्पर्य है कि साधारण मापनी से 1km के 10वें भाग के दूरी को भी ज्ञात कर सकते हैं।

(2) तुलनात्मक मापनी (Comaprative Scale)

        तुलनात्मक मापनी को बनाने के पीछे उद्देश्य यह है कि मानचित्र की विभिन्न मापों के मापकों जैसे- मील और किमी०, मीटर और गज, फैदम और मीटर इत्यादि में एक साथ दूरियाँ ज्ञात कर ली जाय।

       रचना के दृष्टि से तुलनात्मक मापनी भी साधारण मापनी के समान होता है। लेकिन इसमें एक ही स्थान पर दो मापनी अलग-2 इकाई के बना दिये जाते हैं।

तुलनात्मक मापनी

तुलनात्मक मापनी

⇒ तुलनात्मक मापक दो साधारण मापकों का समिश्रण है।

⇒ दोनों साधारण मापक समान लम्बाई के होते हैं।

⇒ दोनों साधारण मापक का मापन एक ही प्रदर्शक भिन्न पर निर्मित किये जाते हैं।


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17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल (Vernier and Diagonal Scale)

17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल

(Diagonal and Vernier Scale)



विकर्ण मापनी (Diagonal Scale)⇒

        विकर्ण मापनी एक ऐसा मापनी है जिसके माध्यम से तीन इकाई तक दूरियों का मापन कर सकते हैं। या इसी शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इसके द्वारा दशमलव के बाद दो अंकों तक (100वाँ भाग तक) की दूरी को ज्ञात किया जा सकता है।

       इस मापनी में विकर्णों की सहायता से द्वितीयक मापनी को पुन: और छोटे-2 भागों में विभाजित कर दिया जाता है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है।

विकर्ण मापनी

विकर्ण मापनी

 

वर्नियर स्केल (Vernier Scale)⇒

वर्नियर स्केल

वर्नियर स्केल

         वर्नियर स्केल एक ऐसा यंत्र है जिसके माध्यम से सूक्ष्म दूरियों को पढ़ा जा सकता है। 

⇒ सर्वेक्षण कार्य के दौरान और वायुयान के पायलट अपने पास वर्नियर स्केल रखते है, ताकि सूक्ष्मतम स्तर तक दूरियों का मापन कर सके।

⇒ वर्नियर पैमाना का आविष्कार पियरे वर्नियर ने किया था।

⇒ सर्वेक्षण के दौरान थियोडोलाइट नामक उपकरण के साथ इसका प्रयोग किया जाता है।

⇒ भारत में वार्नियर स्केल का निर्माण मुजफ्फरनगर के मोती झील (मुहल्ला) में किया जाता है।

⇒ वर्नियर मापनी के द्वारा मापा जाने वाला सबसे छोटी दूरी को Least Count (लीस्ट काउंट) कहते हैं।

Least Count = 1/N XP

यहाँ, P = प्राथमिक मापनी के सबसे छोटे भाग का मान

N = वर्नियर मापनी में बनाए गए भागों की कुल संख्या।

⇒ वर्नियर पैमाना में दो प्रकार का स्केल होता है।

(1) प्राथमिक/प्रधान पैमाना,

(2) वर्नियर पैमाना

⇒ जर्मनी में निर्मित वर्नियर में 0 के स्थान पर “तीर” का  प्रयोग होता है। 

⇒ किसी गोल पृष्ठ वाले सतह का सूक्ष्मतम मोटाई या वक्रता का मापन स्फैरोमीटर के द्वारा करते हैं। 


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21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ

21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ


जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ⇒

           जनसंख्या वितरण एवं घनत्व मानचित्रों का भूगोल के अध्ययन में विशेष महत्व है। इन मानचित्रों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि धरातल, जलवायु तथा अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों का मनुष्य के घनत्व एवं वितरण के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है। समय अथवा स्थान परिवर्तन के साथ-साथ किस प्रकार मनुष्य की भौतिक तथा सामाजिक परिस्थिति परिवर्तित होती है तथा इस परिवर्तन का मनुष्य के वितरण एवं घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है, इन सभी प्रश्नों का उत्तर जनसंख्या-मानचित्र के अध्ययन से प्राप्त होता है।

जनसंख्या मानचित्र के प्र

जनसंख्या मानचित्र के प्रकार

             जनसंख्या मानचित्रों के निम्नलिखित तीन मुख्य प्रकार होते हैं:- 

1. जनसंख्या वितरण मानचित्र (Maps Showing Population Distribution):-

           इस प्रकार के मानचित्रों से जनसंख्या के वितरण का चित्रण किया जाता है। यह चित्रण वास्तविक आंकड़ों (Absolute Figures) के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार के जनसंख्या वितरण मानचित्र जनसंख्या के वितरण का शुद्ध एवं सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या का सांख्यिकीय वितरण भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

2. जनसंख्या घनत्व मानचित्र (Maps Showing Relative Density of Population or Choropleth Maps):-

           इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के औसत घनत्व को प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार मानचित्रों द्वारा क्षेत्र की भौगोलिक एवं अन्य परिस्थितियों का जनसंख्या के घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है। रेखा द्वारा छाया देकर विभिन्न घनत्व प्रदर्शित किए जाते हैं।

3. परिमाणविहीन मानचित्र (Non-Statistical Population Maps or Chorochromatic Maps):-   

           इस प्रकार के मानचित्र द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी ऐसी दशाओं का वितरण प्रस्तुत होता है, जिनमें आंकड़ों की आवश्यकता नहीं होती, जैसे—धर्म, भाषा, जाति, आदि का वितरण। परिमाणविहीन मानचित्रों में नामांकन विधि, चित्रात्मक विधि तथा रंगछाया-विधि द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी दशाओं का क्षैतिज वितरण प्रस्तुत किया जाता है।

             जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को निम्नलिखित विधियों द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

1. समान बिन्दु विधि (Uniform Dot Method):-

             मापनी के अनुसार एक-समान गोलाई के बिन्दुओं द्वारा क्षेत्र की जनसंख्या का क्षेत्रीय वितरण प्रदर्शित किया जाता है। बिन्दुओं को भरने में विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। इसका उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। इस विधि द्वारा जनसंख्या वितरण के प्रदर्शन का मुख्य दोष यह है कि ग्रामीण अथवा शहरी जनसंख्या का अलग-अलग प्रदर्शन इस विधि द्वारा सम्भव नहीं है।

2. आनुपातिक बिन्दु तथा वृत्त विधि (Proportional Dot and Circle Method):-

              इस विधि द्वारा जनसंख्या के वितरण आदि का प्रदर्शन मापनी के अनुसार मानचित्र के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के बिन्दु तथा वृत्त बनाकर किया जाता है। इस विधि का दोष यह है कि कभी-कभी वृत्त एक-दूसरे को ढंक लेते हैं तथा मानचित्र स्पष्ट (Clear) आंकड़े प्रदर्शित नहीं करता।

3. बिन्दु एवं वृत्त विधि (Dot and Circle Method):-

               इस विधि को स्टिलजेनबौर विधि (Stilgenbaur’s Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगर जनसंख्या वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। नगरों की विभिन्न जनसंख्या विभिन्न क्षेत्रफल वाले वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। इस विधि के आंकड़ों के प्रदर्शन हेतु बनाए गए वृत्तों तथा बिन्दुओं के अर्द्धव्यास में महान असमानताएं होने के कारण यह विधि अधिक प्रचलित नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि 1/20 इंच के अर्द्धव्यास का बिन्दु 103 जनसंख्या प्रदर्शित करता है तो 10,00,000 जनसंख्या वाले नगर के लिए 5 इंच के अर्द्धव्यास का वृत्त खींचा जाएगा जो अत्यन्त असंगत होगा। इस दोष को दूर करने के लिए गोलीय आरेखों (Spherical Diagrams) का प्रयोग बिन्दु विधि साथ करते हैं। बिन्दु एवं वृत्त विधि में वृत्तों का अर्द्धव्यास वर्गमूल सूत्र विधि द्वारा निकाला जाता है।

4. बिन्दु एवं गोला विधि (Dot and Sphere Method):-

               इस विधि को स्टेन डी गियर विधि (Sten De Geer Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या गोलों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। गोलों के अर्द्धव्यास विभिन्न नगरों की जनसंख्या के आंकड़ों की सहायता से परिकलित (Calculate) किए जाते हैं। बिन्दु समान अर्द्धव्यास के होते हैं तथा नगरों की जनसंख्या का प्रदर्शन करने वाले गोले मापनी के अनुसार ही अर्द्धव्यास के होते हैं। इनकी मापनी भी बिन्दुओं की मापनी के अनुसार होती है। गोलों का अर्द्धव्यास निकालने के लिए घनमूल मापनी विधि प्रयोग में लाते हैं।

5. आनुपातिक बिन्दु विधि (Multiple Dot Method):-

            इस विधि द्वारा जनसंख्या प्रदर्शन में बिन्दुओं का आकार जनसंख्या के साथ घटता-बढ़ता रहता है। अधिक जनसंख्या प्रदर्शित करने के लिए बड़े आकार के बिन्दु मानचित्र में भरे जाते हैं तथा छोटे आकार के बिन्दु कम जनसंख्या प्रदर्शित करते हैं।

जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन विधियाँ

             जनसंख्या घनत्व मानचित्र मनुष्य तथा भूमि का साधारण आनुपातिक सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के सम्बन्ध को गणितीय घनत्व (Arithmetric Density) भी कहते है। इस घनत्व का यह अर्थ समझा जाता है कि प्रति वर्ग किमी भूमि पर कितने मनुष्य रहते हैं।

             कृषि योग्य भूमि तथा जनसंख्या के घनत्व के सम्बन्ध को भी मानचित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार का घनत्व (Physiological Density) जनसंख्या तथा कृषि योग्य भूमि का आनुपातिक घनत्व कहलाता है। इसी प्रकार जनसंख्या का खेतिहर घनत्व (Agricultural Density) अथवा आर्थिक घनत्व (Economic Density) अथवा पौष्टिक घनत्व (Nutrition Density) आदि का भी प्रदर्शन जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन मानचित्रों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

              इस प्रकार के मानचित्रों में विभिन्न घनत्व प्रदर्शन के लिए साधारण रेखा छाया विधि (Simple Shading Method or Choropleth Method) का प्रयोग करते हैं। इस विधि द्वारा जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन की सीमाओं का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है।

            जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन के लिए समरेखा विधि (Isopleth Method) का भी उपयोग कर सकते हैं, परन्तु यह विधि इस कार्य के लिए अधिक रुचिकर नहीं है तथा प्रचलित भी नहीं है।

              अन्य प्रकार के मानचित्र, जैसे Stock Maps, आदि में बिन्दु विधि तथा छाया विधि प्रयोग में लाते हैं। यही विधि कृषि मानचित्रों (Crop Maps) में क्षेत्रफल अथवा पैदावार की मात्रा प्रदर्शन के लिए प्रयोग की जाती है। फसलों अथवा विशेष क्षेत्रफल के अनुपात के लिए वृत्त चित्रों का प्रयोग करते हैं। जलवायवीय मानचित्रों में समरेखा विधि (Isopleth Method) का प्रयोग करते हैं तथा अन्य प्रकार के मानचित्रों में अन्य यथायोग्य विधियों का प्रयोग करते हैं।

             जनसंख्या की वृद्धि रैखिक आरेख (Line Graph) द्वारा आयु तथा लिंग-भेद (Age and Sex Structure) पिरामिड विधि द्वारा तथा व्यावसायिक विशेषताएँ (Occupational Structure) चक्राकार आरेख (Wheel Diagrams) अथवा दण्डारे (Bar Diagrams) द्वारा प्रदर्शित करते हैं।


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16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप

16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप



रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Projection)

⇒ किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वेच्छा के अनुसार छाटे गये सिद्धांतों पर निर्मित प्रक्षेप को रूढ़ प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप पर समस्त संसार की मानचित्र बनायी जाती है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप इतना संशोधित प्रक्षेप है कि इसे न तो शंकु, न बेलनाकार, न खमध्य प्रक्षेप के वर्ग में रखते हैं। अत: यह पूर्णतः गणितीय विधि पर आधारित है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:-

(1) मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सिनुस्वायडल प्रक्षेप

(1) मॉलवीड प्रक्षेप  (Mollweide’s Projection)

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप का निर्माण 1805 ई० में जर्मन मानचित्रकार ब्रेडन मॉलवीड ने किया था।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण पाया जाता है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण उत्पन्न करने के लिए दो प्रकार के संशोधन किये जाते हैं:

(i) मॉलवीड प्रक्षेप में 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा को एक वृत्त मानते हुए दिखाया जाता है जिसका अर्द्धव्यास (त्रिज्या) √2 x R होता है।

(ii) भूमध्यरेखा की लम्बाई केन्द्रीय मध्याहन रेखा की दुगनी होती है अर्थात् प्रक्षेप में बनाये गये वृत्त के अर्द्धव्यास का चार गुणा (4 x√2 x R) के बराबर भूमध्यरेखा होती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप पृथ्वी के वास्तविक अर्द्धव्यास को भी घटाकर निर्मित होता है।

⇒ सभी अक्षांश वृत्त सरल और समान्तर रेखाओं की तरह होते हैं। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होती जाती है।

⇒ 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा केन्द्रीय मध्याहन रेखा होती है। यही रेखा एक सरल देशान्तर रेखा होती है। जबकि शेष देशान्तर देखा दीर्घवृताकार होती है।

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा अक्षांश को समकोण पर काटती है, शेष देशान्तर रेखा अक्षांश को तिरछी काटती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी रहती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा से पूरब या पश्चिम की ओर जाने पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटते जाती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप विश्व मानचित्र बनाने हेतु, फसलों के उत्पादन दिखाने हेतु उपयोगी होता है। अत: यह संसार के वितरण मानचित्र बनाने के लिए सबसे उपयोगी है।

रूढ़ प्रक्षेप

मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सैन्सन-फ्लैम्स्टीड या सिनुस्वायडल प्रक्षेप (Sanson-Flamsteed or Sinusoidal Projection)

सिनुस्वायडल प्रक्षेप का निर्माण 1650 ई० में निकोलस सैन्सन ने किया तथा बाद में जॉन फ्लैम्स्टीड ने इसमें संशोधन किया।

⇒ इसीलिए इसे सैन्सन-फ्लैम्स्टीड प्रक्षेप कहते है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप वास्तव में शंक्क्वाकार प्रक्षेप या बोन प्रक्षेप का एक भाग है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर क्षेत्रफल शुद्ध होता है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 2πR के बराबर रखा जाता है। इसलिए भूमध्यरेखा पर लम्बाई शुद्ध होता है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर भूमध्यरेखा की लम्बाई πR के बराबर होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना में Sine Curve (ज्या वक्र) का प्रयोग होता है। इसलिए इसे ज्यावक्रीय या सिनुस्वायडल प्रक्षेप भी कहते हैं।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखायें सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होते हैं।

⇒ विषुवत रेखा मानक अक्षांश रेखा का कार्य करता है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक लम्बवत एवं सरल रेखा होती है। लेकिन शेष सभी देशान्तर रेखाएँ मिश्रित वक्र होती है।

⇒ लेकिन एक ही अक्षांश रेखा पर दो देशान्तर रेखा के बीच की दूरी नियत रहती हैं। 

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा विषुवतीय अक्षांश को समकोण पर काटती है और शेष को तिरछे काटती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा पर मापनी शुद्ध होती है लेकिन अन्य देशान्तर रेखाओं पर अशुद्ध होती है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर सीमावर्ती भागो में आकृति काफी विकृत हो जाती है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप वैसे महाद्वीपों के लिए उपयोगी है जो विषुवत रेखा के दोनों ओ स्थित है। जैसे- अफ्रीका, द० अमेरिका।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1:250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 30 हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) भूमध्य रेखा की लम्बाई = 2πR

= 2× 22/7 × 1″

= 6.28″

(iii) केन्द्रीय मध्याह्न रेखा की लम्बाई = 2πR/2

= 6.28″/2

= 3.14″

रूढ़ प्रक्षेप

सिनुस्वायडल प्रक्षेप

         उपरोक्त  चित्र A के अनुसार 1″ का अर्द्धव्यास लेकर वृत्त के चतुर्थांश ABO की रचना करते हैं। OB रेखा के O बिन्दु पर 30 के अन्तराल पर कोण बनाती हुई OC तथा OD रेखायें खींचते हैं।

    फिर BC की चापीय दूरी से O बिन्दु से एक चाप लगाते हैं जो OC तथा OD कोणिक रेखाओं को क्रमशः E तथा F बिन्दुओं पर काटता है। E तथा F बिन्दुओं से OA रेखा पर EE’ तथा FF’ लम्ब डालते हैं (अर्थात् OB के समान्तर रेखा खींचते हैं)। यही क्षैतिज दूरियाँ प्रक्षेप में सम्बन्धित अक्षांशों पर देशान्तरों के मध्य की दूरी को प्रकट करेंगी।

   अब चित्र B के अनुसार 6.28″ लम्बी क्षैतिज रेखा खींचते हैं जो भूमध्यरेखा कहलाती है। इस रेखा को BC की चापीय दूरी 2πR x Interval/360 से 360/ 30 = 12 समान भागों में विभाजित करते हैं।

   तत्पश्चात् इस रेखा के मध्यवर्ती बिंदु से ऊपर तथा नीचे दोनों ओर NS लम्ब डालते हैं, जिसकी लम्बाई भमध्यरेखा की आधी होती है। अर्थात् NS रेखा पर BC की चापीय दूरी से भूमध्यरेखा के ऊपर तथा नीचे तीन-तीन चिह्न अंकित करते हैं तथा इन चिन्हों से भूमध्यरेखा के समान्तर रेखायें खींचते हैं। ये समान्तर रेखायें क्रमशः 30 तथा 60 उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्त होंगे और N व S बिन्दु क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव होंगे।

     देशान्तर रेखायें बनाने के लिए 30° तथा 60 उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्तों पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दायें-बायें दोनों ओर क्रमशः EE’ एवं FF’ दूरी से छः छः चिह्न लगाते हैं।

     तदुपरान्त अक्षांश वृत्तों पर अंकित समान देशान्तरीय मान वाले इन चिन्हों को ध्रुवों (N तथा S बिन्दुओं) से फ्रेंच कर्व द्वारा मिला कर देशान्तर रेखाओं की रचना पूर्ण करते हैं। चित्र की भांति केन्द्रीय मध्याह्न रेखा को 0° की देशान्तर मान कर शेष देशान्तर रेखाओं पर उनके अंशों में मान अंकित करते हैं।



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