Category CARTOGRAPHY(मानचित्र कला)

41. Significance of Statistical Methods in Geography/भूगोल में सांख्यिकीय विधियों का महत्व

Significance of Statistical Methods in Geography

(भूगोल में सांख्यिकीय विधियों का महत्व)

Significance of Statistical Methodsपरिचय:

       भूगोल एक समन्वयात्मक विज्ञान है, जो प्राकृतिक तथा मानव निर्मित दोनों प्रकार की घटनाओं का अध्ययन करता है। आधुनिक भूगोल केवल वर्णनात्मक (descriptive) विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक विश्लेषणात्मक, मात्रात्मक और वैज्ञानिक अनुशासन बन चुका है। इसी परिवर्तन के साथ सांख्यिकीय विधियों (Statistical Methods) का महत्व भूगोल में अत्यधिक बढ़ गया है।

        सांख्यिकी भूगोल को मात्रात्मक आधार प्रदान करती है, जिससे भौगोलिक तथ्यों का मापन, वर्गीकरण, विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन संभव होता है। जनसंख्या, जलवायु, कृषि, उद्योग, परिवहन, नगरीकरण, संसाधन वितरण आदि सभी क्षेत्रों में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग अनिवार्य हो गया है।

सांख्यिकी और भूगोल का संबंध:

      सांख्यिकी और भूगोल के बीच घनिष्ठ एवं पूरक संबंध है। भूगोल प्राकृतिक तथा मानव निर्मित घटनाओं का स्थानिक और कालिक अध्ययन करता है, जबकि सांख्यिकी इन घटनाओं से संबंधित आंकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण, विश्लेषण एवं व्याख्या की वैज्ञानिक विधि प्रदान करती है।

      जनसंख्या वितरण, वर्षा, तापमान, कृषि उत्पादन, औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण जैसे भौगोलिक तथ्यों को समझने में सांख्यिकी अत्यंत सहायक है। सांख्यिकीय विधियों के माध्यम से भौगोलिक पैटर्न, क्षेत्रीय असमानता तथा कारण–परिणाम संबंधों का स्पष्ट विश्लेषण संभव होता है। इस प्रकार सांख्यिकी भूगोल को वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ एवं विश्लेषणात्मक आधार प्रदान करती है।

भूगोल में सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग के कारण:

     भूगोल में सांख्यिकी के प्रयोग के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(i) भौगोलिक तथ्यों की विशाल मात्रा

(ii) क्षेत्रीय विविधता और जटिलता

(iii) तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता

(iv) पूर्वानुमान (forecasting) की मांग

(v) नीति निर्माण और योजना में उपयोग

भूगोल में सांख्यिकीय विधियों का महत्व:

    यह स्पष्ट है कि सांख्यिकीय विधियाँ आधुनिक भूगोल की आधारशिला हैं। इनके बिना भूगोल न तो वैज्ञानिक बन सकता है और न ही व्यावहारिक। इसलिए भूगोल के अध्ययन में सांख्यिकी का महत्व अत्यंत व्यापक और अनिवार्य है। इसके महत्व निम्नलिखित है-

(i) भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करना:-

        सांख्यिकीय विधियाँ भूगोल को केवल वर्णनात्मक विषय न बनाकर वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ और विश्लेषणात्मक अनुशासन बनाती हैं। इनके माध्यम से भौगोलिक तथ्यों का मात्रात्मक विश्लेषण संभव होता है।

(ii) भौगोलिक आंकड़ों के संग्रह और संगठन में सहायता:-

       भूगोल में विशाल मात्रा में आंकड़े प्राप्त होते हैं, जैसे- जनगणना, जलवायु, कृषि, उद्योग आदि। सांख्यिकीय विधियाँ इन आंकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण और सारणीकरण को सरल और व्यवस्थित बनाती हैं।

(iii) क्षेत्रीय विविधता एवं असमानता की व्याख्या:-

      भूगोल का मूल उद्देश्य क्षेत्रीय अंतर को समझना है। सांख्यिकी की सहायता से क्षेत्रीय असमानता, विविधता और वितरण पैटर्न का स्पष्ट विश्लेषण किया जाता है।

(iv) तुलनात्मक अध्ययन में उपयोगिता:-

      सांख्यिकीय विधियाँ विभिन्न क्षेत्रों, देशों एवं समयावधियों के बीच तुलनात्मक अध्ययन को संभव बनाती हैं, जैसे—राज्यों की जनसंख्या घनत्व, विकास स्तर, साक्षरता दर आदि।

(v) कारण-परिणाम संबंध की व्याख्या:-

      भूगोल में केवल तथ्यों का वर्णन नहीं, बल्कि उनके कारण और परिणाम की व्याख्या भी आवश्यक है। सहसंबंध एवं प्रतिगमन जैसी सांख्यिकीय तकनीकें इन संबंधों को स्पष्ट करती हैं।

(vi) प्रवृत्ति विश्लेषण और पूर्वानुमान:-

       जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण, जलवायु परिवर्तन आदि के अध्ययन में सांख्यिकी द्वारा प्रवृत्तियों (Trends) का विश्लेषण तथा भविष्य के लिए पूर्वानुमान लगाया जाता है।

(vii) मानचित्रण (Cartography) में महत्व:-

       विषयगत मानचित्रों जैसे- कोरॉप्लेथ, डॉट, आइसोप्लिथ मानचित्रों के निर्माण में सांख्यिकीय आंकड़े अनिवार्य होते हैं। इससे भौगोलिक तथ्यों की दृश्यात्मक प्रस्तुति संभव होती है।

(viii) भौतिक भूगोल में योगदान:-

       तापमान, वर्षा, नदी प्रवाह, भूकंप, सूखा आदि के अध्ययन में सांख्यिकी द्वारा औसत, विचलन और परिवर्तनशीलता का विश्लेषण किया जाता है।

(ix) मानव भूगोल में उपयोग:-

       जनसंख्या, बस्ती, आर्थिक गतिविधियाँ, परिवहन आदि मानव भूगोल के सभी पक्ष सांख्यिकीय मापों पर आधारित होते हैं, जिससे मानव–पर्यावरण संबंधों की स्पष्ट समझ मिलती है।

(x) योजना निर्माण एवं नीति निर्धारण में सहायता:-

        क्षेत्रीय योजना, शहरी विकास, संसाधन प्रबंधन और आपदा प्रबंधन में सांख्यिकीय विश्लेषण वैज्ञानिक निर्णय लेने में सहायक होता है।

(xi) अनुसंधान एवं मात्रात्मक क्रांति का आधार:-

       भूगोल में आई मात्रात्मक क्रांति का मूल आधार सांख्यिकी है। शोध, परिकल्पना परीक्षण और मॉडल निर्माण में इसका विशेष महत्व है।

भूगोल में प्रयुक्त प्रमुख सांख्यिकीय विधियाँ: 

      भूगोल में सांख्यिकीय विधियाँ भौगोलिक तथ्यों के मापन, विश्लेषण और व्याख्या के लिए प्रयोग की जाती हैं। प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-

(i) केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप (Measures of Central Tendency):-

    इनमें औसत (Mean), माध्यिका (Median) तथा बहुलक (Mode) शामिल हैं। इनका उपयोग किसी क्षेत्र की सामान्य स्थिति को समझने के लिए किया जाता है, जैसे औसत वर्षा, औसत तापमान या औसत जनसंख्या घनत्व।

(ii) विचलन के माप (Measures of Dispersion):-

    इनमें परास (Range), मानक विचलन (Standard Deviation) तथा परिवर्तन गुणांक (Coefficient of Variation) प्रमुख हैं। ये किसी भौगोलिक घटना में असमानता और परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हैं, जैसे वर्षा की अस्थिरता।

(iii) सहसंबंध विश्लेषण (Correlation Analysis):-

    इसका प्रयोग दो भौगोलिक चरों के बीच संबंध की दिशा और तीव्रता जानने के लिए किया जाता है, जैसे वर्षा और फसल उत्पादन के बीच संबंध।

(iv) प्रतिगमन विश्लेषण (Regression Analysis):-

     यह कारण-परिणाम संबंध की व्याख्या तथा पूर्वानुमान में सहायक है, जैसे जनसंख्या वृद्धि के आधार पर शहरी विस्तार का अनुमान।

(v) समय श्रेणी विश्लेषण (Time Series Analysis):-

    इसका उपयोग समय के साथ होने वाले परिवर्तनों और प्रवृत्तियों के अध्ययन में किया जाता है, जैसे दशकों में तापमान या जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्ति।

(vi) सूचकांक संख्या (Index Numbers):-

     ये तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रयुक्त होते हैं, जैसे जीवन स्तर, कृषि उत्पादन या औद्योगिक विकास सूचकांक।

(vii) संभाव्यता एवं नमूना विधियाँ (Probability and Sampling Techniques):-

    सीमित आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालने और भौगोलिक अनुसंधान को वैज्ञानिक बनाने में इनका महत्वपूर्ण स्थान है।

सीमाएँ (Limitations):

      यद्यपि सांख्यिकीय विधियाँ भूगोल को वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक एवं मात्रात्मक आधार प्रदान करती हैं, फिर भी इनकी कुछ व्यावहारिक और सैद्धांतिक सीमाएँ हैं। इन सीमाओं को समझना आवश्यक है ताकि सांख्यिकी का प्रयोग संतुलित एवं विवेकपूर्ण ढंग से किया जा सके।

✍️ सांख्यिकीय निष्कर्ष पूर्णतः आंकड़ों की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं।

✍️ मानवीय व्यवहार, संस्कृति और भावनाओं को संख्याओं में व्यक्त करना कठिन है।

✍️ अति-मात्रात्मकता से भूगोल का मानवीय पक्ष उपेक्षित हो सकता है।

✍️ अपूर्ण या गलत आंकड़े भ्रामक निष्कर्ष दे सकते हैं।

✍️ सांख्यिकीय विधियाँ सामान्यीकरण पर आधारित होती हैं, जिससे स्थानीय विशेषताएँ छूट सकती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

       निष्कर्षतः भूगोल में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। ये भौगोलिक तथ्यों को वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ एवं विश्लेषणात्मक रूप प्रदान करती हैं। सांख्यिकी के माध्यम से आंकड़ों का संग्रह, वर्गीकरण, तुलनात्मक अध्ययन तथा कारण-परिणाम संबंध की व्याख्या संभव हो पाती है।

    आधुनिक भूगोल में क्षेत्रीय योजना, पूर्वानुमान, शोध एवं नीति निर्माण के लिए सांख्यिकीय विधियाँ अनिवार्य हो चुकी हैं। इनके बिना भूगोल का आधुनिक, व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक स्वरूप अधूरा माना जाएगा।

17. Nearest Neighbor Analysis (निकटतम पड़ोसी विश्लेषण)

Nearest Neighbor Analysis

(निकटतम पड़ोसी विश्लेषण)



Nearest Neighbor Analysis

परिचय

    निकटतम पड़ोसी विश्लेषण (Nearest Neighbor Analysis) एक प्रकार की स्थानिक सांख्यिकीय तकनीक है जिसका उपयोग भौगोलिक प्रतिरूप, वितरण और दूरी के अध्ययन के लिए किया जाता है।

    यह विश्लेषण बताता है कि किसी वस्तु (जैसे कि शहर, पौधे, जीव, अपराध स्थल आदि) का वितरण सांख्यिकीय रूप से समूहित (Clustered), यादृच्छिक (Random) या समान (Regular/Uniform) रूप से फैलाव वाला  है या नहीं।

    भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) और स्थानिक आंकड़ों के अध्ययन में यह तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्थानिक संरचना और प्रतिरूप का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने में मदद करती है।

उद्देश्य

    निकटतम पड़ोसी विश्लेषण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

(i) किसी वस्तु का स्थानिक वितरण पैटर्न पहचानना।

(ii) यह जांचना कि क्या वितरण यादृच्छिक, समूहित या समान रूप से फैला है।

(iii) शहरी और ग्रामीण योजना में केंद्रों की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करना।

(iv) आर्थिक और पर्यावरणीय अध्ययन में प्राकृतिक संसाधनों के वितरण का विश्लेषण।

(v) आपदा प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला योजना में उपयोग।

सिद्धांत

     निकटतम पड़ोसी विश्लेषण निम्नलिखित आधार पर कार्य करता है:

⇒ प्रत्येक बिंदु के लिए सबसे नजदीकी पड़ोसी की दूरी मापी जाती है।

⇒ इन दूरी का औसत लिया जाता है।

⇒ इसे यादृच्छिक वितरण से तुलना की जाती है।

⇒ यदि बिंदु बहुत पास-पास हैं तो सामूहिक (Clustered)

⇒ यदि बिंदु असमान हैं तो यादृच्छिक (Random)

⇒ यदि बिंदु एक समान रूप से फैले हैं तो समान (Regular/Uniform)

मुख्य सूत्र:

Rn (Randomness Index) अनुपात निकालना:

Nearest Neighbor Analysis

उपयोग

(i) शहरी योजना: विद्यालय, अस्पताल, बस स्टॉप आदि का स्थानिक वितरण समझने के लिए।

(ii) पर्यावरण अध्ययन: पौधों और जीवों का वितरण।

(iii) अपराध भूगोल: अपराध स्थलों का क्लस्टरिंग पैटर्न पहचानना।

(iv) संसाधन प्रबंधन: जल स्रोत, खनिज आदि का स्थानिक विश्लेषण।

(v) सामाजिक अध्ययन: बाजार, बैंक या अन्य सेवाओं का वितरण।

निष्कर्ष:

     निकटतम पड़ोसी विश्लेषण एक सरल परंतु शक्तिशाली तकनीक है, जो स्थानिक वितरण पैटर्न को समझने और मूल्यांकन करने में मदद करती है। यह शहरी, पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक अध्ययन में अत्यंत उपयोगी है। सही डेटा और सॉफ्टवेयर टूल के साथ, यह यादृच्छिक, समूहित और समान वितरण को स्पष्ट रूप से पहचान सकता है और नीति निर्माण और योजना में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

16. Regression Analysis (प्रतीगमन या प्रत्यागमन विश्लेषण)

Regression Analysis

(प्रतीगमन या प्रत्यागमन विश्लेषण)



Regression Analysis

परिचय

      ‘प्रतीपगमन’ (Regression) शब्द का अर्थ ‘पीछे लौटना’ अथवा ‘वापस आना’ (to regress or return back) है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1877 में सर फ्रांसिस गाल्टन (Sir Francis Galton) ने अपने शोध लेख ‘पैतृक ऊँचाई में मध्यमता की ओर प्रतीपगमन’ (Regression towards mediocrity in hereditary stature) में किया था।

     प्रत्यागमन विश्लेषण (Regression Analysis) सांख्यिकी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक उपकरण है, जिसका उपयोग दो या दो से अधिक चर (Variables) के बीच संबंधों का अध्ययन करने के लिए किया जाता है। यह न केवल चर के बीच संबंधों की दिशा एवं ताकत को मापता है, बल्कि इस आधार पर भविष्य के मूल्यों का पूर्वानुमान (Prediction) भी करता है। इसीलिए इसे पूर्वानुमान के लिए सबसे प्रभावी सांख्यिकीय विधियों में से एक माना जाता है।

      प्रत्यागमन विश्लेषण मुख्य रूप से निर्भर चर (Dependent Variable) और स्वतंत्र चर (Independent Variable) के बीच संबंधों पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए, यदि हम जानना चाहें कि किसी छात्र के परीक्षा-अंक उसकी पढ़ाई के घंटों पर कैसे निर्भर करते हैं, तो हम Regression Analysis का उपयोग करेंगे।

प्रत्यागमन विश्लेषण की परिभाषा     

      “Regression उस सांख्यिकीय तकनीक को कहते हैं जिसके द्वारा दो चर के बीच मात्रात्मक संबंध स्थापित किया जाता है और उसके आधार पर संबंधित चर के मूल्यों का अनुमान लगाया जाता है।”

सक्षेप में-

    Regression वह पद्धति है जिसमें हम एक चर के माध्यम से दूसरे चर के मूल्यों का अनुमान लगाते हैं।

Regression Analysis की आवश्यकता और उपयोगिता

(i) पूर्वानुमान (Prediction):-

          Regression Analysis की आवश्यकता और उपयोगिता पूर्वानुमान में इसलिए है कि यह चर (variables) के बीच संबंध स्थापित कर भविष्य के मानों का अनुमान लगाने, रुझान पहचानने और निर्णय-निर्धारण में सहायता करता है।

    बिक्री, उत्पादन, मांग, तापमान, GDP, जनसंख्या आदि का भविष्य अनुमान लगाने में उपयोगी।

(ii) निर्णय-निर्माण (Decision Making):-

    Regression Analysis की आवश्यकता निर्णय-निर्माण में इसलिए होती है क्योंकि यह भविष्य के रुझानों का अनुमान, चर-परिवर्तनशीलताओं का प्रभाव और नीतिगत या व्यावसायिक विकल्पों की सटीकता को बढ़ाता है।

(iv) चर-संबंधों का अध्ययन:-

  Regression Analysis की आवश्यकता चर-संबंधों को मात्रात्मक रूप से समझने, पूर्वानुमान बनाने, कारण-प्रभाव दिशा पहचानने और विभिन्न स्वतंत्र चरों का आश्रित चर पर प्रभाव मापने में होती है;

(v) प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों की माप

   जैसे- आय का उपभोग पर प्रभाव, शिक्षा का आय पर प्रभाव।

(vi) वैज्ञानिक व सामाजिक अनुसंधान में उपयोग

    मनोविज्ञान, जनसांख्यिकी, भौतिकी, जीवविज्ञान, भूगोल आदि में व्यापक उपयोग।

Regression के प्रकार (Types of Regression Analysis)

1. Simple Regression (सरल प्रत्यागमन)

     जब एक स्वतंत्र चर और एक निर्भर चर के बीच संबंध स्थापित किया जाता है।

उदा.—उपभोग (Y) = f (आय X)

Regression Equation: Y = a+bX

2. Multiple Regression (बहु-प्रत्यागमन)

जब अनेक स्वतंत्र चर किसी एक निर्भर चर को प्रभावित करते हैं।

उदा.- आय (Y) = शिक्षा (X₁) + अनुभव (X₂) + कौशल (X₃)

Equation: Y=a+b1X1+b2X2+b3X3…….

3. Linear Regression (रेखीय प्रत्यागमन)

    जहाँ निर्भर चर और स्वतंत्र चर के बीच संबंध सीधी रेखा के रूप में हो।

Y = a+bX

Regression Line (प्रत्यागमन रेखा)

    Regression Analysis का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी रेखा खोजना होता है जो स्वतंत्र चर और निर्भर चर के बीच न्यूनतम त्रुटि (Minimum Error) के साथ संबंध दर्शाए।

Regression Coefficient (प्रत्यागमन गुणांक)

     Regression coefficient (b) यह बताता है कि स्वतंत्र चर में एक इकाई परिवर्तन होने पर निर्भर चर में कितना परिवर्तन होगा।

उदाहरण:

यदि b = 0.8

तो X में 1 इकाई वृद्धि होने पर Y में 0.8 इकाई वृद्धि होगी।

Regression coefficient के गुण:

⇒ b का मान धनात्मक (+) या ऋणात्मक (–) दोनों हो सकता है।

⇒ b = 0 मतलब दोनों चरों में कोई संबंध नहीं।

⇒ यदि दोनों b (bxy और byx) धनात्मक हों = सीधा संबंध।

⇒ यदि दोनों b ऋणात्मक हों = व्युत्क्रम संबंध।

Regression Analysis का एक सरल उदाहरण

        मान लीजिए किसी छात्र ने पढ़ाई (X) के घंटे और परीक्षा-अंक (Y) का विवरण दिया:

X (घंटे) Y (अंक)
2 40
3 50
4 60
5 70

Regression Equation:

Y=a+bX

यदि गणना से प्राप्त हो:

a = 20, b = 10

तो समीकरण होगा:

Y = 20+10X

यदि X = 6 घंटे पढ़ाई →

Y = 20+10(6)=80

अर्थात छात्र अनुमानतः 80 अंक प्राप्त करेगा।

Correlation और Regression में अंतर

बिंदु Correlation Regression
उद्देश्य संबंध मापना पूर्वानुमान करना
संबंध दिशा केवल दिशा/मजबूती बताता है आश्रित व स्वतंत्र का संबंध बताता है
Variables कोई dependent नहीं Y dependent, X independent
मान सीमा -1 से +1 कोई भी मान
परिणाम r (सहसंबंध गुणांक) Y = a + bX (प्रतिगमन समीकरण)
उपयोग संबंध की मजबूती Prediction (पूर्वानुमान)
निष्कर्ष

     प्रत्यागमन विश्लेषण एक अत्यंत प्रभावी एवं वैज्ञानिक सांख्यिकीय तकनीक है जो विभिन्न क्षेत्रों में भविष्य के अनुमान लगाने, संबंधों को समझने और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह केवल दो चरों के बीच संबंधों का मात्रात्मक विश्लेषण ही नहीं करता, बल्कि इसके आधार पर व्यावहारिक समाधान भी प्रदान करता है।

   सटीक एवं विश्वसनीय आंकड़ों के साथ उपयोग करने पर Regression Analysis शोध, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, समाजशास्त्र, नीति-निर्माण और व्यावसायिक क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।

नोट:  गाल्टन ने लगभग एक सहस्र पिताओं तथा पुत्रो की ऊँचाइयों का अन्वेषण करके यह ज्ञात किया कि “लम्बे पिताओं के पुत्र भी लम्बे होते है, तथा छोटे पिताओं के पुत्र भी छोटे होते हैं, परन्तु लम्बे पिताओं के पुत्री की औसत ऊँचाई उनके पिताओं की ऊँचाई की औसत से कम होती है तथा छोटे पिताओं के पुत्रों की औसत ऊँचाई उनके पिताओं की ऊँचाई की औसत से अधिक होती है।”

     गाल्टन ने मानव जाति में सामान्य ऊँचाई (normal height) की ओर लौटने की प्रवृत्ति को प्रतीपगमन को संज्ञा दी है।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




Regression Analysis

Introduction:

     The mutual relationship between two Series is measured with the help of Correlation. Under correlation the direction and magnitude of the relationship between two variables is measured. But it is not possible to make the best estimate of the value of a dependent Variable on the basis of the given value of the Independent Variable by correlation analysis.

     Therefor, to make the best estimates and future estimation, the Study of regression analysis is very Important useful.

Meaning:

     Regression is the Study of the nature of relationship between that one may be able to Predict the Unknown value of one variable for a known value of another Variable.

     In regression, one variable is considered as an independent Variable and another Variable is taken as dependent Variable. with the help of regression, possible values of the dependent Variable are estimated on the basis of values of the independent variable.

     for example demand and price.

On the basis of this relationship between demand and price probable Value of demand can be estimated Corresponding to the different Values of place.

⇒ Regression Analysis is the technique for measuring or estimating the relationship among Variables.

⇒ Regression Analysis provides estimates of Values of the dependent Variable From the Values of the independent Variable.

⇒ The device used to accomplish this estimation procedure is the regression line.

⇒ The regression line describes the average relationship existing between x and y.

Exmple-

x y
4 100
7 92
15 90
18 82
20 79
25 74
28 68
. .
. .
35 ?    (here, x given, y=?)
. .
. .
?  (here, y given, x=?) 20

Difference Between Correlation and Regression

Correlation Analysis Regression Analysis
1. Correlation coefficient  is a measure of degree of covariability between x and y. 1. Objective of regression analysis is to Study the nature of relationship between Variables.
2. In Correlation analysis we can not say that one Variable is the cause & other the effect. 2. in regression analysis it is possible to study Cause & effect relationship.
3. In Correlation analysis both rxy & ryx are Symmetric (rxy=ryx) 3. In regression analysis bxy & byx are not Symmetric. (bxy≠byx)
4. There may be measure Correlation which has no practical relevance such as Increase in income & increase in weight. 4. There is nothing like non-Sense regression.
5. Correlation coeff. is independent of change of scale and origin.  5. Regression coefficientsare independent of change of origin but not of scale.

Similarity: Correlation coeff. (r) and regression coeff. (bxy & byx always have Same Sign.

UTILITY OF REGRESSION

(i) Nature of Relationship:-

    Regression analysis explains the nature of relationship between two variables.

(ii) Estimation of Relationship:-

     The mutual relationship between two or more variables can be measured easily by regression analysis.

(iii) Prediction:-

      By regression analysis, the value of a dependent variable can be predicted on the basis of the value of an independent variable. For example, if the price of a commodity rises, what will be the probable fall in demand, this can be predicted by regression.

(iv) Useful in Economic and Business research:-

    Regression analysis is very useful in business and economic research. With the help of regression, business and economic policies can be formulated.

TYPES OF REGRESSION ANALYSIS

1. Simple and Multiple Regression:-

      In simple regression analysis, we study only two variables at the time, in which one variable is dependent and another is independent. For example income and expenditure.

      on the contrary, we study more than two variables at a time in multiple, regression analysis in which one is dependent variable and others are independent variable. For example the study of rain and irrigation, the study of effect of rain and irrigation on yield of wheat.

2. Linear and Non-Linear Regression:-

    when one variable changes with other variable in some fixed ratio, this is called linear regression. such type of relationship is depicted on a graph by means of straight line.

    On the other hand when one variable varies with other variable in a changing ratio, then it is referred to as curvi-linear or Non-linear regression. This relationship, expressed on a graph paper takes the form of curve.

3. Partial and Total Regression:-

     When two or more variables are studied for functional relationship but at a time relationship between only two variables is studied and other variables held constant then it is known as partial regression. On the other hand, in total regression all variables are studied simultaneous for the relationship among them.

Simple Linear Regression

Regression lines:

     Regression lines are linear equations that show the relationship between two variables. These help in making predictions, understanding trends and determining the direction of changes in the data.

Regression lines
Regression line of y on x Regression line of x on y
1. y-ȳ = byx (x-x̄)

byx is regression coeff. of y on x

byx =

1. x-x̄ = bxy (y-ȳ)

bxy is regression coeff. of x on y

bxy =

Both lines intersect at point (x̄, ȳ),  x̄ = Mean of x, ȳ = Mean of y
2. x→ Independent variable

y→ Dependent variable

2. x→Dependent variable

y→ Independent variable

3. Used to calculate y for given x 3. Used to calculate y for given y
4. Regression equation of y on x, y = a+bx 4. Regression equation of x on y, x = a+by

Methods of Obtaining Regression Lines

(i) Scatter Diagram Method:-

      This is the simplest method of constructing regression lines, In this method, values of the related variables are plotted on a graph. A straight line is drawn passing through the plotted points. The straight line is drawn with free hand. This shape of regression line can be linear or non-linear also. This depends upon the location of plotted points. This method is very rarely used in practicle because in this method, the decision of the person who draws the regression lines very much affects the result.

(ii) Least Square Method:-

    Regression lines are also constructed by least Square method. Under this method, the two regression lines, is fitted through different points in such a way that the sum of squares of the deviations of the observed values from the fitted line shall be least. The line drawn by this method is called the Line of Best Fit. In other words, regression line of Y on X is so drawn such that vertically, the sum of squared deviation becomes minimum relating to the different points and the regression line on X on Y is so drawn such that horizontally, squared deviations of different points add up to minimum.

Regression Lines

and

Degree of Correlation

REGRESSION EQUATIONS

   Regression equations are the algebraic formulation of regression lines. Regression equations present Regression lines.

(i) Regression equation of x on y

     This equation is used to estimate the probable value of x on the basis of the given value of y.

⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

(ii) Regression Equation of y on x

     This equation is used to estimate the probable value of y on the basis of given value of x.

⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

REGRESSION COEFFICIENTS

    Regression Coefficient measures the average change in the value of one variable for a unit change in the value of another variable. r Infact, it represents the slope of a regression line.

(i) Regression Coefficient x on y

     This Coefficient shows that with the unit change in the value of y variable, what will be the average change in the value of x variable.

bxy = r . σx/σy

(ii) Regression coefficient of y on x

    This Coefficient shows that with a unit change in the value of x variable, what will be the average change in the value of y variable.

byx = r . σy/σx

Example (i) Find both regression lines (x on y and y on x) for the following data.

x y
6 9
2 11
10 5
4 8
8 7

Calculation:

x y x2 y2 xy
6 9 36 81 54
2 11 4 121 22
10 5 100 25 50
4 8 16 64 32
8 7 64 49 56
30 40 220 340 214

n = 5

x̄ = Σx/n = 30/5 = 6

ȳ = Σy/n = 40/5 = 8

byx =

= 5×214 – 30×40 / 5×220 – 30×30

= -0.65

bxy =

= 5×214 – 30×40 / 5×340 – 40×40

= -1.3

now,

x on y ⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

⇒ x-6 = -1.3(y-8)

⇒ x-6 = -1.3y + 1.3×8

⇒ x = -1.3y + 10.4 + 6

⇒ x = -1.3y + 16.4

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

⇒ y-8 = -0.65 (x-6)

⇒ y-8 = -0.65x + 0.65×6

⇒ y = -0.65x + 3.9+8

⇒ y = -0.65x + 11.9

Example (ii) From the following data:

(a) Obtain two regression lines

(b) Calculate correlation coeff.

(c) Estimate the value of y for x = 6.2

x y
1 9
2 8
3 10
4 12
5 11
6 13
7 14
8 16
9 15

Calculation:

(a) Obtain two regression lines

Note: x on y ⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

(i) For direct method 

We’ll need ⇒ x̄, ȳ, bxy, byx

r =

bxy =

byx =

Finally we’ll need ⇒ n, Σx, Σy, Σx2, Σy2, Σxy 

(ii) For Short-cut method :-

       समानान्तर माध्य की संख्या पूर्णांक में हो तो प्रत्यक्ष रीति द्वारा प्रतीपगमन गुणांक सरलता से प्राप्त किये जा सकते हैं, लेकिन यदि ये माध्य पूर्णांक में नहीं आये तब लघु रीति अपनाना अधिक उपयुक्त होगा। इस रीति में अग्र सूत्रों की सहायता से प्रतीपगमन गुणांकों की गणना की जाती है:

Note: x→ dx = x-A,

y→ dy = y-B

x y d

(x-5)

dy

(y-12)

dx2  dy2 dx dy
1 9 -4 -3 16 9 12
2 8 -3 -4 9 16 12
3 10 -2 -2 4 4 4
4 12 -1 0 1 0 0
5 (A) 11 (B) 0 -1 0 1 0
6 13 1 1 1 1 1
7 14 2 2 4 4 4
8 16 3 4 9 16 12
9 15 4 3 16 9 12
45 108 0 0 60 60 57

Regression Co-efficient of X on Y

bxy = 9(57) – 0(0) / 9(60) – (0)2 

        = 0.95

Regression Co-efficient of Y on X

byx = 9(57) – 0(0) / 9(60) – (0)2

        = 0.95

x̄ = Σx/n = 45/9 = 5

ȳ = Σy/n = 108/9 = 12

now,

x on y ⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

⇒ x – 5 = 0.95(y-12)

⇒ x – 5 = (0.95)y – 0.95(12)

⇒ x = (0.95)y – 11.4 + 5

⇒ x = (0.95)y – 6.4

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

⇒ y – 12 = 0.95(x – 5)

⇒ y – 12 = (0.95)x – 0.95 (5)

⇒ y – 12 = (0.95)x – 4.75

⇒ y = (0.95)x – 4.75 + 12

⇒ y = (0.95)x + 7.25

(b) Calculate correlation coeff.

(c) Estimate the value of y for x = 6.2

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

⇒ y = (0.95)x + 7.25

⇒ y = (0.95)6.2 + 7.25

⇒ y = 5.89 + 7.25

⇒ y = 13.14

41. Weather map- Difference between climate and weather (मौसम मानचित्र- जलवायु और मौसम के बीच अंतर)

Weather map- Difference between climate and weather

(मौसम मानचित्र- जलवायु और मौसम के बीच अंतर)



Weather map

मौसम (Weather) की परिभाषा

     मौसम किसी स्थान विशेष पर किसी निश्चित समय या अल्प अवधि (जैसे- कुछ घंटे या एक दिन) के लिए वायुमंडलीय दशाओं का सूचक होता है। यह अत्यंत परिवर्तनशील होता है, अर्थात् कुछ ही घंटों में इसमें बदलाव आ सकता है। जैसे- सुबह धूप, बादल बनना, दोपहर में वर्षा, शाम को ठंडी हवा चलना- ये सब मौसम के परिवर्तन हैं।

जलवायु (Climate) की परिभाषा

     जलवायु किसी स्थान विशेष की दीर्घकालीन वायुमंडलीय दशाओं का औसत है। अर्थात् यदि किसी स्थान के मौसम का 30 वर्ष या उससे अधिक अवधि का औसत लिया जाए, तो वह जलवायु (Climate) कहलाता है। जैसे- राजस्थान की जलवायु शुष्क और गर्म है तथा केरल की जलवायु आर्द्र और उष्णकटिबंधीय है।

मौसम और जलवायु में अंतर

(Difference between Weather and Climate)

क्रम आधार मौसम (Weather) जलवायु (Climate)
1 समय अवधि अल्पकालीन (कुछ घंटे या दिन) दीर्घकालीन (30 वर्ष या अधिक)
2 क्षेत्रीय प्रभाव छोटे क्षेत्र तक सीमित बड़े क्षेत्र पर लागू
3 स्थायित्व अस्थिर और परिवर्तनशील स्थिर एवं स्थाई प्रवृत्ति
4 अध्ययन का उद्देश्य दैनिक पूर्वानुमान दीर्घकालीन प्रवृत्ति का विश्लेषण
5 परिवर्तन की गति तीव्र गति से बदलता है धीमी गति से परिवर्तन
6 उदाहरण आज वर्षा हुई यह क्षेत्र उष्णकटिबंधीय है

मौसम और जलवायु पर प्रभाव डालने वाले कारक

(i) अक्षांश (Latitude)

(ii) ऊँचाई (Altitude)

(iii) समुद्र से दूरी (Distance from Sea)

(iv) स्थलाकृति (Relief)

(v) वायु दाब और पवन प्रणाली (Pressure & Wind System)

(vi) समुद्री धाराएँ (Ocean Currents)

(vii) मानव क्रियाएँ (Human Activities)

जलवायु परिवर्तन एवं मौसम पर प्रभाव

       जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे गंभीर वैश्विक समस्याओं में से एक है। यह पृथ्वी के तापमान में निरंतर वृद्धि, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण के कारण हो रहा है। जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव मौसम के पैटर्न पर देखा जा रहा है। पहले जहाँ मौसम के चक्र नियमित हुआ करते थे, वहीं अब अनियमित वर्षा, अत्यधिक गर्मी, लू, तूफान, चक्रवात और सूखे जैसी घटनाएँ बढ़ गई हैं।

      इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है, जल संसाधनों की कमी बढ़ रही है और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं, जबकि कई क्षेत्रों में वर्षा की कमी से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज हो रही है। समुद्र तल में वृद्धि तटीय क्षेत्रों के लिए खतरा बन रही है।

     इसलिए, जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। इसके समाधान के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग, वृक्षारोपण, ऊर्जा संरक्षण और वैश्विक स्तर पर सहयोग आवश्यक है, ताकि पृथ्वी की जलवायु और मौसम का संतुलन बनाए रखा जा सके।

जलवायु और मौसम अध्ययन का शैक्षणिक महत्व

     जलवायु और मौसम का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा है, जिसका सीधा संबंध मानव जीवन, कृषि, पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था से है। मौसम अल्पकालिक परिवर्तनों को दर्शाता है जबकि जलवायु दीर्घकालिक औसत परिस्थितियों का सूचक होती है। इन दोनों का अध्ययन छात्रों को पृथ्वी के वायुमंडलीय तंत्र, तापमान, आर्द्रता, पवन, वर्षा तथा वायुदाब जैसी घटनाओं की वैज्ञानिक समझ प्रदान करता है।

      शैक्षणिक दृष्टि से यह अध्ययन भूगोल, पर्यावरण विज्ञान, कृषि विज्ञान, तथा आपदा प्रबंधन जैसे विषयों के लिए आधारभूत ज्ञान प्रदान करता है। इससे विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक सोच विकसित होती है और वे मौसम पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, तथा सतत विकास से संबंधित समस्याओं के समाधान हेतु तैयार होते हैं।

      इसके अतिरिक्त, मौसम और जलवायु अध्ययन का उपयोग नीतिनिर्माण, जल संसाधन प्रबंधन, तथा कृषि नियोजन में भी किया जाता है। इस प्रकार, यह विषय न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में योगदान देता है बल्कि समाज के समग्र विकास में भी सहायक सिद्ध होता है।

     इस प्रकार जलवायु और मौसम का शैक्षणिक अध्ययन मानव जीवन की स्थिरता, पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक आधार प्रदान करता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

      मौसम और जलवायु, दोनों पृथ्वी के वायुमंडल की प्रकृति को समझने के आधार हैं। जहाँ मौसम तात्कालिक घटनाओं का दर्पण है, वहीं जलवायु दीर्घकालीन प्रवृत्ति का चित्रण करती है। मौसम मानचित्र इन दोनों के अध्ययन को सुसंगठित, दृश्यात्मक और वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुत करने का माध्यम है।

   यह न केवल मौसम पूर्वानुमान के लिए उपयोगी है, बल्कि कृषि, परिवहन, रक्षा, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः कहा जा सकता है कि-

“मौसम मानचित्र पृथ्वी के वायुमंडलीय व्यवहा का जीवंत दस्तावेज़ है, जो मानव जीवन को सुक्षित और संगठित बनाने में अत्यंत सहायक है।”

42. Significance of the weather map (मौसम मानचित्र का महत्व)

Significance of the weather map

(मौसम मानचित्र का महत्व)



  Significance of the weather map

      मौसम मानव जीवन का अभिन्न अंग है। कृषि, परिवहन, उद्योग, व्यापार, और मानव स्वास्थ्य सभी किसी-न-किसी रूप में मौसम पर निर्भर करते हैं। मौसम की जानकारी और उसके पूर्वानुमान के लिए वैज्ञानिकों ने जो सशक्त उपकरण विकसित किया है, वही मौसम मानचित्र (Weather Map) है

   यह मानचित्र पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में वायुमंडलीय दशाओं जैसे- तापमान, वायुदाब, आर्द्रता, वर्षा, पवन की दिशा और वेग आदि को एक साथ प्रदर्शित करता है।

    मौसम मानचित्र के माध्यम से मौसम वैज्ञानिक न केवल वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करते हैं, बल्कि आने वाले दिनों का पूर्वानुमान भी लगाते हैं। इस प्रकार, यह मानचित्र न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए बल्कि समाज के व्यावहारिक जीवन में भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।

मौसम मानचित्र की परिभाषा

    मौसम मानचित्र वह भौगोलिक चित्र या नक्शा है, जिस पर किसी निश्चित समय पर पृथ्वी के विभिन्न भागों की वायुमंडलीय परिस्थितियों को चिन्हों, रेखाओं और प्रतीकों के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है।

   इस पर तापमान (Temperature), वायुदाब (Air Pressure), आर्द्रता (Humidity), वर्षा (Rainfall), पवन दिशा (Wind Direction) और पवन वेग (Wind Velocity) जैसी सूचनाएँ दर्शाई जाती हैं।

    यह मानचित्र सामान्यतः मौसम विभाग द्वारा प्रतिदिन या प्रतिघंटा तैयार किए जाते हैं, जिन्हें सिनॉप्टिक चार्ट (Synoptic Chart) भी कहा जाता है।

मौसम मानचित्र के प्रकार

        मौसम मानचित्र कई प्रकार के होते हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:

(i) सिनॉप्टिक मौसम मानचित्र (Synoptic Weather Map):- 

       यह किसी निश्चित समय पर पूरे देश या विश्व का मौसम दिखाता है।

(ii) वायुदाब मानचित्र (Isobaric Map):- 

    इसमें समान वायुदाब वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएँ (आइसोबार्स) खींची जाती हैं।

(iii) तापमान मानचित्र (Isothermal Map):- 

     इसमें समान तापमान वाले बिंदुओं को जोड़ने वाली रेखाएँ (आइसोथर्म्स) प्रदर्शित होती हैं।

(iv) वर्षा मानचित्र (Isohyetal Map):- 

     इसमें समान वर्षा वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएँ (आइसोहाइट्स) होती हैं।

(v) पवन मानचित्र (Wind Map):- 

     इसमें पवन की दिशा और वेग दर्शाए जाते हैं।

(vi) आर्द्रता मानचित्र (Isohume Map):-

      समान आर्द्रता वाले स्थानों को जोड़कर आर्द्रता वितरण दिखाया जाता है।

मौसम मानचित्र का उपयोग और महत्व

1. मौसम पूर्वानुमान में सहायता

      मौसम मानचित्र मौसम वैज्ञानिकों को वायुमंडलीय प्रवृत्तियों का अध्ययन करने और आगामी मौसम का पूर्वानुमान लगाने में सहायता करता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में निम्न वायुदाब का क्षेत्र विकसित हो रहा है तो वहाँ वर्षा या आंधी-तूफान की संभावना बताई जा सकती है।

2. कृषि कार्यों में महत्व

    कृषक मौसम मानचित्र के आधार पर बुवाई, सिंचाई, फसल कटाई और उर्वरक के उपयोग का समय निर्धारित करते हैं। इससे फसल हानि से बचाव और उत्पादकता में वृद्धि होती है।

3. परिवहन प्रणाली में उपयोग

     वायुयान, जलयान और रेल परिवहन में मौसम मानचित्र अत्यंत आवश्यक होते हैं। विमानन विभाग उड़ानों की दिशा, ऊँचाई और समय मौसम की अनुकूलता के अनुसार तय करता है।

   जहाजरानी में तूफान या चक्रवात की पूर्व जानकारी से जहाजों को सुरक्षित मार्ग दिया जाता है।

4. आपदा प्रबंधन में योगदान

    मौसम मानचित्र प्राकृतिक आपदाओं जैसे- चक्रवात, तूफान, बाढ़, सूखा आदि की चेतावनी देने में सहायक होते हैं। इससे समय रहते राहत एवं बचाव कार्य आरंभ किए जा सकते हैं।

5. सैन्य एवं सामरिक उपयोग

     सैन्य अभियानों की योजना बनाते समय मौसम की स्थिति का ज्ञान अत्यंत आवश्यक होता है। मौसम मानचित्र इस दिशा में रक्षा बलों की सहायता करते हैं।

6. वैज्ञानिक अनुसंधान में योगदान

     मौसम मानचित्र दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, और पर्यावरणीय अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनसे वैज्ञानिक पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में तापमान और वर्षा के दीर्घकालिक परिवर्तन को समझ सकते हैं।

7. पर्यटन और जनजीवन पर प्रभाव

    पर्यटक मौसम के अनुकूल क्षेत्रों में यात्रा की योजना बनाते हैं। साथ ही नागरिक भी अपने दैनिक जीवन जैसे यात्रा, विवाह समारोह या निर्माण कार्य की योजना मौसम पूर्वानुमान देखकर करते हैं।

मौसम मानचित्र की वैज्ञानिक उपयोगिता

      मौसम मानचित्र एक वैज्ञानिक दस्तावेज है जो निम्न प्रकार से उपयोगी होता है-

⇒ यह वायुमंडलीय परतों के बीच होने वाली क्रियाओं का ग्राफिक चित्रण प्रदान करता है।

⇒ यह जटिल डेटा को सरल रूप में दृश्यात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।

⇒ यह मौसम मॉडल्स के परीक्षण और सत्यापन में प्रयोग किया जाता है।

⇒ यह विभिन्न समयांतराल पर परिवर्तनशीलता का तुलनात्मक अध्ययन करने में सहायक होता है।

भारत में मौसम मानचित्रण का विकास

    भारत में मौसम विभाग (India Meteorological Department – IMD) की स्थापना 1875 में हुई थी।

⇒ दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में प्रमुख मौसम केंद्र स्थापित किए गए।

⇒ 20वीं सदी में राडार, उपग्रह और कंप्यूटर तकनीक के प्रयोग से मौसम मानचित्र अधिक सटीक हुए।

⇒ आज भारत में INSAT उपग्रह, Doppler राडार नेटवर्क, और Numerical Weather Prediction (NWP) मॉडल्स का उपयोग कर IMD प्रतिदिन अद्यतन मौसम मानचित्र जारी करता है।

⇒ मौसम ऐप्स और वेबसाइट्स के माध्यम से जनता तक यह जानकारी रियल-टाइम में पहुँचाई जाती है।

मौसम मानचित्र का भविष्य

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग, और बिग डेटा एनालिटिक्स के प्रयोग से भविष्य में मौसम मानचित्र और भी उन्नत एवं सटीक होंगे।

⇒ 3D Weather Visualization और Real-Time Cloud Simulation तकनीकें मौसम की गहराई से समझ को बढ़ाएँगी।

⇒ Mobile-based interactive weather maps किसानों और नागरिकों के लिए अधिक सुलभ होंगे।

निष्कर्ष

    मौसम मानचित्र आधुनिक मानव सभ्यता का एक अनिवार्य वैज्ञानिक उपकरण है। यह न केवल मौसम विज्ञानियों के लिए विश्लेषण और अनुसंधान का साधन है, बल्कि आम जनता, किसानों, यात्रियों और प्रशासन के लिए जीवनरक्षक भूमिका निभाता है।

   यह मानचित्र हमें प्राकृतिक परिस्थितियों को समझने, पूर्वानुमान लगाने और आपदाओं से निपटने की क्षमता प्रदान करता है।

   आज के युग में जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है, तब मौसम मानचित्र की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है।
इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि-

मौसम मानचित्र केवल आंकड़ों का चित्र नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा, कृषि प्रगति और पर्यावरण संरक्षण का मार्गदर्शक है।”

40. SCALES OF MEASUREMENT (मापन के पैमाने)

SCALES OF MEASUREMENT

(मापन के पैमाने)



      भौगोलिक आँकड़ों के मापन का तात्पर्य नियमों के अनुसार आँकड़ों का वर्गीकरण, विश्लेषण और मानचित्रण है। आँकड़ों में अन्तरनिहित समरूपता के आधार पर आँकड़ों का कई तरह से प्रदर्शन ही मापक कहा जाता है। सामान्यतया भौगोलिक आँकड़ों के मापन स्तर के 4 वर्ग हैं।

1. नामिक मापक (Nominal Scale):-

     इसे प्रतीक मापक कहा जा सकता है क्योंकि यह आँकड़ों की किसी उल्लेखनीय विशेषता के आधार पर उनका वर्णन नहीं करता है। केवल प्रतीक रूप में वर्गीकरण और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जैसे- पशुओं का गाय, बैल, भैंस, बकरी में विभाजन या यौनानुपात में स्त्री-पुरुष, मिट्टी विभाजन में दोमट, बलुई आदि नामिक मापक के उदाहरण है।

    इस मापक से आँकड़ों के वास्तविक मूल्य का बोध नहीं होता है, बल्कि उनके प्रतीकों का बोध होता है। भौगोलिक विश्लेषण में बहुलक (Mode) का प्रयोग इसके आधार पर किया जाता है।

2. क्रमसूचक मापक (Ordinal Scale):-

      इसके अन्तर्गत विभिन्न आँकड़ों को अधिकतम और न्यूनतम परिमाण के आधार पर आरोही अथवा अवरोही क्रमों में रखते हैं। इस तरह आँकड़ों में अन्तर का आधार उनकी मात्रा (Quantity) रहती है। जैसे आकार के आधार पर नगरों, गाँवों का वर्गीकरण, दुकानों की संख्या, खुलनशीलता के आधार पर वर्गीकरण, उत्पादन के अनुसार विभिन्न इकाइयों का वर्गीकरण इसके उदाहरण हैं।

   इस प्रकार के आँकड़ों के विश्लेषण में अनेक सांख्यिकीय विधियों, आरेख और मानचित्र उपयोगी हैं। जैसे नगरों या गाँवों के वितरण में क्रमशः आकार के अनुसार वर्गीकरण, उच्चावचन में अधिक ऊँचा, मध्यम या न्यून ऊँचा क्षेत्र आदि है।

3. अन्तराल मापक (Interval Scale):-

    अन्तराल मापन समान इकाई मापक के आधार पर आँकड़ों का वर्णन करता है। इसमें क्रमसूचक मापक के अनुसार आँकड़ों के बीच का अन्तराल परिवर्तनशील होता है। इससे असंख्य आँकड़ों को संक्षेप में व्यवस्थित कर लेते हैं और आँकड़ों का क्रम भी बना रहता है। जैसे- < 5, 5-10, 10-15, 15-20 आदि। इसमें 0 से 20 तक जितने भी प्रेक्षण हैं, सभी किसी भी अन्तराल वर्ग में रखे जा सकते हैं। इस पर माध्य, मानक विचलन, सहसम्बन्ध आदि अनेक सांख्यिकीय विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं।

4. आनुपातिक मापक (Ratio Scale):-

    आनुपातिक मापक का प्रयोग करके बड़ी संख्या में आँकड़ों को लघुतम रूप में व्यक्त कर सकते हैं। जैसे 10/100 को 1/10, 5/50, 2/20 आदि रूप में व्यक्त कर सकते हैं। अधिकांश भौगोलिक आँकड़े आनुपातिक मापक पर ही पाये जाते हैं।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

(i) नाममात्र पैमाना (Nominal Scale):-

     नाममात्र पैमाना मापन का सबसे सरल और प्रारंभिक पैमाना है। इसमें आँकड़ों को केवल नाम या श्रेणी के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें संख्याएँ केवल पहचान (Identification) के लिए होती हैं

✍️ न तो क्रम होता है और न ही परिमाण

✍️ गणितीय क्रियाएँ संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ भूमि उपयोग के प्रकार (कृषि, वन, बंजर)

✍️ मिट्टी के प्रकार

✍️ जलवायु के प्रकार

✍️ धर्म, भाषा, जाति

महत्व

     नाममात्र पैमाना भूगोल में वर्गीकरण और मानचित्रण के लिए उपयोगी है, जैसे- भूमि उपयोग मानचित्र।

(ii) क्रमिक पैमाना (Ordinal Scale):-

    क्रमिक पैमाने में आँकड़ों को क्रम या रैंक के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें क्रम (Order) होता है

✍️ परंतु दो मानों के बीच का अंतर ज्ञात नहीं होता

✍️ केवल तुलना संभव होती है

भूगोल में उदाहरण

✍️ जनसंख्या घनत्व: उच्च, मध्यम, निम्न

✍️ विकास स्तर: विकसित, विकासशील, अविकसित

✍️ नगरीय श्रेणीकरण

महत्व

     यह पैमाना भूगोल में क्षेत्रीय तुलना और स्तरीकरण (Ranking) के लिए अत्यंत उपयोगी है।

(iii) अंतराल पैमाना (Interval Scale):-

     अंतराल पैमाने में आँकड़ों के बीच समान अंतर होता है, परंतु पूर्ण शून्य (True Zero) नहीं होता।

विशेषताएँ

✍️ क्रम और अंतर दोनों मौजूद

✍️ शून्य केवल सांकेतिक होता है

✍️ गुणा और भाग संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ तापमान (सेल्सियस, फारेनहाइट)

✍️ तिथियाँ और वर्ष

✍️ ऊँचाई (समुद्र तल के सापेक्ष)

महत्व

    यह पैमाना भौतिक भूगोल में-

✍️ जलवायु विश्लेषण

✍️ तापमान प्रवृत्ति

✍️ समय आधारित अध्ययन के लिए उपयोगी है।

(iv) अनुपात पैमाना (Ratio Scale):- 

    अनुपात पैमाना मापन का सबसे उन्नत और पूर्ण पैमाना है। इसमें समान अंतर के साथ-साथ पूर्ण शून्य भी होता है।

विशेषताएँ

✍️ क्रम, अंतर और अनुपात तीनों मौजूद

✍️ सभी गणितीय क्रियाएँ संभव

✍️ सबसे विश्वसनीय पैमाना

भूगोल में उदाहरण- जनसंख्या, वर्षा की मात्रा, दूरी, क्षेत्रफल, उत्पादन

महत्व

     अनुपात पैमाना भूगोल में-

✍️ सांख्यिकीय विश्लेषण

✍️ मॉडल निर्माण

✍️ पूर्वानुमान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मापन के पैमानों का तुलनात्मक सार

पैमाना क्रम अंतर पूर्ण शून्य
नाममात्र
क्रमिक
अंतराल
अनुपात

भूगोल में मापन पैमानों का महत्व

✍️ भौगोलिक आँकड़ों की वैज्ञानिक व्याख्या

✍️ उपयुक्त सांख्यिकीय विधि का चयन

✍️ मानचित्रण एवं मॉडलिंग

✍️ क्षेत्रीय योजना और नीति निर्माण

✍️ शोध एवं परियोजना कार्य

निष्कर्ष 

       मापन के पैमाने भूगोल में सांख्यिकीय अध्ययन की आधारशिला हैं। ये आँकड़ों को अर्थपूर्ण, तुलनात्मक और विश्लेषण योग्य बनाते हैं। प्रत्येक पैमाने की अपनी सीमाएँ और उपयोगिता है। भूगोल के छात्र के लिए इन पैमानों की स्पष्ट समझ आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना सांख्यिकीय विश्लेषण अधूरा माना जाता है।

39. Relief and Slope Analysis / उच्चावच एवं ढाल विश्लेषण

Relief and Slope Analysis

(उच्चावच एवं ढाल विश्लेषण)



उच्चावच (Relief)

     धरातल के किसी भूभाग का सबसे अधिक तथा सबसे कम ऊँचाई में जो अन्तर होता है, वह उस भूभाग का उच्चावच (Relief) कहलाता है। उच्चावच कई विधियों द्वारा दर्शाया जाता है, जैसे समुद्रतल स्थल की ऊँचाई (Spot height), समोच्च रेखायें (Contour lines), छाया (Shading) एवं रंग (Colouring)।

    “धरातलीय मानचित्र में Spot height किसी स्थान का समुद्रतल से ऊंचाई दिखता है। नीचे चित्र में Spot height, समोच्च रेखा द्वारा, छाया द्वारा तथा रंग द्वारा दिखाया गया है। यह रंग भारत के सर्वेक्षण विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त है। मैदानी भाग को हरा रंग से, अधिक ऊँचे भाग को भूरा, पठारी भाग को पीला तथा जलीय भाग को नीला रंग से प्रदर्शित किया जाता है।

    समोच्च रेखा द्वारा धरातल पर विद्यमान अनेक भूआकृतियों को दिखाया जाता है। यह समोच्च रेखा का मान, उसकी आकृति दो समोच्च रेखा के बीच की दूरी से पता चलता है कि धरातल पर कौन-सा पहाड़ी भाग है और कौन सा मैदानी भाग कहाँ झील है तो कहाँ जलप्रपात तो कहाँ पर घाटी है। अतः भू-आकृतियों को प्रदर्शित करने का यह उत्तम विधि है।

    समोच्च रेखा के माध्यम से धरातल की ढाल तथा उसकी दिशा की भी जानकारी होती है। किस स्थान की ढाल कैसी है, इसकी जानकारी भी समोच्च रेखा देती है। जहाँ समोच्च रेखा सटी-सटी रहती है, वहाँ की ढाल तीव्र होती है तथा जहाँ पर समोच्च रेखा दूर-दूर पर रहती है, वहाँ की ढाल कम रहती है।

     ऐसे तो हैश्यूर विधि (Hachure Method), ब्लॉक आरेख (Block diagram) द्वारा भी उच्चावच प्रदर्शित किया जाता है। परन्तु समोच्च रेखा सबसे अधिक उपयुक्त है। समोच्च रेखा द्वारा किसी क्षेत्र का प्रोफाइल (Profile) बनाया जाता है।

ढाल (Slope)

   मानचित्र (Map) में भूमि की ऊँचाई गहराई तथा पृथ्वी की सतह की सूक्ष्म स्थलाकृतियों (Details of topography) को मुख्यतः समोच्च रेखाओं (Contours lines) के द्वारा दिखलाया जाता है। इसीलिए समोच्च्च रेखाओं की आकृति (Shape) और पारस्परिक समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी (Relative distance) की सहायता से मानचित्र में विभिन्न स्थल रूपों (Land forms) को पहचाना जाता है।

     प्रत्येक स्थलरूप को दिखाने के लिए समोच्च रेखाओं की एक निश्चित आकृति होती है और प्रत्येक में उनकी पारस्परिक दूरी भी विशेष प्रकार की होती है। उदाहरण स्वरूप एक गुम्बद (Dome), एक शंक्वाकार पहाड़ी (Conical hill) दोनों में समोच्च रेखायें लगभग गोलाकार (Round) होती है परन्तु इन स्थलरूपों में उनकी पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है।

     इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की समोच्च रेखायें एक-दूसरे के लगभग समानान्तर होती है। परन्तु उनकी पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है। जहाँ भूमि की ढाल अधिक होती है (जैसे एक कगार (Escarpment), वहाँ समोच्च रेखायें लगभग समानान्तर और एक-दूसरे के बहुत समीप होती है।

    दूसरी ओर जहाँ भूमि की ढाल बहुत कम होगी वहाँ भी समोच्च रेखायें लगभग समानान्तर परन्तु एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर पर होती है। इसी प्रकार सम ढाल (Regular slope), असमान ढाल (Irregular slope) सोपान ढाल (Terraced slope), नतोदर ढाल (Concave slope) तथा उन्नतोदर ढाल (Convex slope) इत्यादि में समोच्च रेखाओं की पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है।

     मानचित्र में स्थल रूपों को पहचानने तथा उनका वर्णन और व्याख्या करने के लिए समोच्च रेखाओं की आकृति तथा उनकी पारस्परिक दूरी का विश्लेषण करना आवश्यक है। मानचित्र के किन्हीं दो स्थानों के बीच की ढाल की गणना (Calculation) करने के लिए दो तथ्यों की आवश्यकता होती है-

(1) दोनों स्थानों के बीच की ऊँचाई का अन्तर (Difference of elevation), जिसे लम्बवत् अन्तर (Vertical interval) कहा जाता है।

(2) दोनों स्थानों के बीच की क्षैतिजीय दूरी (Horizontal distances) जिसे क्षैतिजीय अन्तर अथवा क्षैतिजीय तुल्यांक (Horizontal equivalent) कहा जाता है।

      मान लिया जाए कि एक पहाड़ी की चोटी A की ऊँचाई समुद्रतल से 3275 मीटर है और उसके नीचे स्थित नदी घाटी का निम्नतल (Bottom) B की ऊँचाई समुद्रतल से 2475 मीटर है। A और B बिन्दुओं के बीच की ढाल ज्ञात करना है।

      सबसे पहले A और B के बीच लम्बवत् अन्तर 3275-2475 = 800 मीटर हुआ। यदि मानचित्र में इन स्थानों की दूरी 8 सेन्टीमीटर है और मानचित्र का मापक 1 सेमी. = 5 किमी. है तो A और B की वास्तविक दूरी अर्थात् उनके बीच क्षैतिजीय दूरी 40 किमी. होगी।

     A और B स्थानों के बीच की ढाल को निम्नलिखित अनुपात से व्यक्त किया जा सकता है-

Relief and Slope Analysis

     यहाँ ध्यान देने की एक आवश्यक बात यह है कि ढाल व्यक्त करने वाले भिन्न में अंश (Numerator), हमेशा इकाई (Unit) में होता है और अंश (Numerator) तथा हर (Denominator) दोनों मापन की एक ही इकाई (Unit of measurement), होती है।

    उपरोक्त उदाहरण में ढाल व्यक्त करने वाला भिन्न है, जिसमें अंश (Numerator) ‘एक’ है और हर (Denominator) ‘पचास’ है। दोनों मापन की 50 एक ही इकाई ‘मीटर’ में है। इस सम्बंध को एक अनुपात (Ratio) के रूप में अर्थात् 1: 50 में व्यक्त किया जा सकता है।

    ढाल व्यक्त करने वाले भिन्न 1/50 अथवा अनुपात 1:50 से यह समझना चाहिए कि 50 मीटर की क्षैतिजीय दूरी पर भूमि पहले की अपेक्षा एक मीटर नीची हो जाती है। इस नियम का उल्लंघन करके ढाल को ‘फीट प्रति मील’ अथवा ‘सेंटीमीटर प्रति किलोमीटर’ में व्यक्त करने का प्रचलन सा हो गया है।

     जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि ढाल का क्षैतिज रेखा से कोणीय दूरी (Angular distance) अर्थात् अंशों (Degrees) में भी व्यक्त किया जाता है। उपरोक्त उदाहरण में वर्णित दो स्थानों को यदि चित्र में A और B मान लिया जाए तो AB रेखा की लम्बाई 2 मील है। A से AC लम्ब है जो A और B के बीच के लम्बवत् अन्तर अर्थात् 4750 फीट का प्रतिनिधित्व करती है। C पर AB, के बराबर और समानान्तर CB1 रेखा खींची गयी है तथा A और B के बीच के क्षैतिजीय दूरी है। CB को मिला दिया। यह AB से AB’ की झुकाव अर्थात् A और B के बीच की ढाल का प्रतिनिधित्व करती है।

     ABC एक समकोण त्रिभुज है, जिसका आधार AB 2 मील है तथा लम्ब AC = 4750 फीट है।

 

    अब साधारण tan टेबुल से जिस कोण का tan मान (Value) .4481 है, उसका मान Log Table द्वारा अंशों में निकाल लिया जा सकता है।

जैसे- .44981 का tan का मान 24°12′ होता है। अर्थात् AB की ढाल 24°12′ की हुई है।

38. Nature and Scope of Cartography

38. Nature and Scope of Cartography



         मानचित्र कला को सामान्यतः मानचित्र की रूपरेखा तैयार करने, रचना करने एवं उत्पत्ति करने की विज्ञान एवं कला समझा जाता है।

⇒ अमेरिकन सोसाइटी ऑफ सिविल इंजीनियर्स के अनुसार, “Cartography is the art of map construction and the science on which it is based. It combines the achievements of the astronomer and mathematician with those of the explorer and surveyor in presenting of the physical characteristics of the earth’s surface.”

⇒ संयुक्त राष्ट्र की सामाजिक कार्य विभाग (1949) के अनुसार, “Cartography is considered as the science of preparing all types of maps and charts, and includes every operation from origional surveys to final printing of copies.” इस प्रकार मानचित्र कला (Cartography) मानचित्र बनाने की कला है एवं वह विज्ञान है जिस पर मानचित्र की रचना आधारित है। यह पृथ्वी की भौतिक विशेषताओं की तस्वीर को मानचित्र पर प्रस्तुत करता है और इस क्रम में खोजकर्त्ता एवं सर्वेक्षणकर्त्ता की उपलब्धियों को खगोलविद् एवं गणितज्ञ की उपलब्धियों के साथ सम्बद्ध करता है।

     मानचित्र कला वह विज्ञान है जो सभी प्रकार के मानचित्र एवं चार्ट को तैयार करता है और इसके अन्तर्गत मौलिक सर्वेक्षण से लेकर मानचित्रों एवं चार्यों की अन्तिम छपाई तक की सभी क्रियाएँ शामिल हैं।

मानचित्र कला की प्रकृति (Nature of Cartography):-

     मानचित्र कला के दो पक्ष हैं-

(i) वैज्ञानिक, तथा

(ii) कलात्मक

     विज्ञान के रूप में यह पृथ्वी से संबंधित जटिल तथ्यों को मानचित्रों, चारों, आरेखों इत्यादि के द्वारा सरल, बोधगम्य एवं सुस्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है। मानचित्र कला एक भौगोलिक विज्ञान है। इसकी विषय-वस्तु धरातल एवं कुछ सीमा तक ग्रह एवं तारे हैं । इसलिए मानचित्र कला के ज्ञाता को भौगोलिक तथ्यों का पृथ्वी पर वास्तविक वितरण एवं सम्बन्धित स्थानों की अवस्थिति का ज्ञान होना जरूरी है। भौगोलिक ज्ञान के आधार पर ही कोई मानचित्र रययिता किसी मानचित्र में आवश्यक तथ्यों का समावेश एवं अनावश्यक तथ्यों के त्याग करने का निर्णय ले सकता है।

      मानचित्र कला के ज्ञाता को भूगोल के साथ-साथ उन विषयों की जानकारी होना भी आवश्यक है जिनका समावेश मानचित्र में होता है। ज्ञातव्य है कि मानचित्र धरातल के जटिल विवरणों का सामान्यीकृत स्वरूप प्रदर्शित करता है। विभिन्न विषयों से सम्बन्धित तथ्यों का मानचित्र में समावेश होने के कारण मानचित्र कला एक अन्तरानुशासनिक (Interdisciplinary) विज्ञान है। यह भौतिक, सामाजिक तथा मानवीय विज्ञानों को संयोजित करने का कार्य करता है।

    कला के रूप में मानचित्र खगोलीय पिण्डों तथा धरातल पर पाये जानेवाले तथ्यों को चित्रित करता है, यह चित्रण निश्चित वैज्ञानिक नियमों पर तो आधारित होता ही है, यह चित्रमय एवं कलात्मक भी होता है। इस प्रकार मानचित्र के चित्रण का अध्ययन होता है। कोई भी अच्छा मानचित्र कला रहित या भोंडा नहीं हो सकता है क्योंकि कला चित्रण का श्रेष्ठतम् रूप है। अतः मानचित्र कला की प्रकृति में कला का अंश है। हालांकि यह भी सत्य है कि मानचित्र कला एवं कला के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं।

         मानचित्र कला का ज्ञाता मानचित्र निर्माण के नियमों से बँधा रहता है। उसका उद्देश्य ऐसा मानचित्र बनाना होता है जो सिर्फ कलात्मक नहीं हो बल्कि स्वतः स्पष्ट (Self explanatory) भी हो एवं उपयोग में लाने योग्य हो। इसके विपरीत कलाकार स्वच्छन्द होता है। अपनी कल्पना या विचार को मूर्तरूप देने में वह किसी नियम से बँधा नहीं होता है भले ही उसकी कलाकृति अस्पष्ट एवं सामान्य व्यक्ति के समझ से परे हो।

     उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मानचित्र कला वैज्ञानिक विधियों एवं तर्कों पर आधारित ऐसा विषय है जिसकी प्रकृति वैज्ञानिक एवं कलात्मक दोनों है। यह न तो भौतिक विज्ञान एवं रसायन शास्त्र की भाँति कोई विशुद्ध विज्ञान है और न ही समाजशास्त्र या अर्थशास्त्र जैसे विषयों की तरह सामाजिक विज्ञान है।

     मानचित्र कला का एक अन्य पक्ष मानव-संचार के विज्ञान के रूप में भी है। मानचित्र कला का उद्देश्य तथ्यों एवं विचारों को आरेखणों, शब्दों एवं प्रतीकों के संयोग द्वारा स्पष्ट एवं प्रभावपूर्ण ढंग से संचारित करना है। मानचित्र की सफलता का निर्धारण प्रायः इसके द्वारा संवादों के प्रेषण की प्रभावपूर्णता के आधार पर होता है।

      इस प्रकार मानचित्र कला एक संचार विज्ञान हो जाता है। अब चूँकि धरातल के हर भाग का सर्वेक्षण हो चुका है और मानव अन्य ग्रहों एवं उपग्रहों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है, पृथ्वी से सम्बन्धित तथ्यों का अधिक प्रभावपूर्ण निरूपण मानचित्र कला का दायित्व हो गया है। अब तथ्यों के प्रभावपूर्ण प्रदर्शन का तात्पर्य उनके प्रभावपूर्ण संचार से है।

     किसी संचार प्रणाली के निम्नलिखित पाँच अवयव हो सकते हैं-

(i) स्रोत (Source),

(ii) प्रेषक (Transmitter),

(iii) मार्ग (Channel),

(iv) ग्राही (Receiver) तथा

(v) गन्तव्य (Destination)।

     एक आदर्श संचार प्रणाली निम्न प्रकार से कार्य करता है- प्रेषक स्रोत से संवाद प्राप्त करता है। वह इस संवाद को ऐसी भाषा में कूटबद्ध करता है जिसे संवाद के प्रेषण हेतु चयनित मार्ग (Channel) में भरा जा सके। मार्ग में अगर शोर (Noise) हो तो संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूसरे छोर पर स्थित ग्राही कूटबद्ध संवाद को प्राप्त कर उसे कूटानुवाद (Decode) करता है तो गन्तव्य को प्राप्त होता है। अगर इस प्रणाली को मानचित्र के क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाय तो हमें निम्नलिखित व्यवस्था प्राप्त होगी-

1. सूचना स्रोत- पृथ्वी एवं धरातल के अध्ययन से सम्बन्धित सभी प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान।

2. संवाद- पृथ्वी एवं धरातल साथ ही खगोलीय पिण्डों से सम्बन्धित तथ्य एवं विचार।

3. प्रेषक- मानचित्रकार जो इन तथ्यों एवं विचारों को शब्दों, आरेखण्डों एवं प्रतीकों में परिवर्तित करते हैं।

4. संकेत- शब्द, आरेखण एवं प्रतीक तथा उनकी पारस्परिक व्यवस्था।

5. मार्ग- मानचित्र एवं अन्य मानचित्रण उत्पाद।

6. शोर स्रोत- घटिया रूपरेखा या आरेखण, प्रतीकों का घाल-मेल, प्रासंगिक तथ्यों को क्षति पहुँचाकर अनावश्यक तथ्यों का समावेशन, घटिया छपाई इत्यादि।

7. प्राप्त संकेत- शब्द, आरेखण, प्रतीक इत्यादि जैसा कि मानचित्र के उपयोगकर्ता के द्वारा समझा जाता है।

8. गन्तव्य- सम्पूर्ण विश्व के पैमाने पर मानचित्र के उपयोगकर्ता।

      इस प्रकार मानचित्रकला की प्रकृति कलात्मक, वैज्ञानिक एवं मानव संचार विज्ञान के रूप में है।

मानचित्र कला के विषय-क्षेत्र (The scope of cartography):-

    मानचित्र कला का अध्ययन क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसके अन्तर्गत मानचित्र, ग्लोब, चार्ट, आरेख, मानारेख इत्यादि का निर्माण एवं निर्माण की विभिन्न प्रक्रियाएँ सभी शामिल हैं। मानचित्र कला की विषय-वस्तु विशाल है, इसके निर्माण की प्रक्रियाएँ प्रारम्भ से अन्त तक असंख्य हैं एवं विविधताओं से भरे हैं। हाल के वर्षों में मानचित्र कला की कई शाखाओं का विकास हुआ है यथा भौगोलिक मानचित्र कला (Geographical Cartography), विषयक मानचित्र कला (Thematic Cartography), वैज्ञानिक मानचित्र कला (Scientific Cartography), वायु आकाशीय मानचित्र कला (Aerospace Cartography), सांख्यिकी मानचित्र कला (Statistical Cartography) इत्यादि।

      मानचित्र कला के विभिन्न शाखाओं के विकास से इसे विशिष्टिकरण एवं बढ़ती लोकप्रियता का बोध होता है। लेकिन इनके मूल नियम एवं तकनीक समान हैं एवं उस अनुसार इन शाखाओं में मौलिक अन्तर नहीं है। मानचित्र कला की प्रकृति के आधार पर इसके अध्ययन क्षेत्र को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(i) सैद्धान्तिक मानचित्र कला (Theoretical Cartography), एवं

(ii) प्रयुक्त मानचित्र कला (Applied Cartography)

     सैद्धान्तिक मानचित्र कला के अन्तर्गत अवधारणात्मक एवं सैद्धान्तिक पक्ष का अध्ययन होता है। यह मानचित्र की रूप रेखा एवं विषय-वस्तु, प्रतिनिधित्व की लेखा चित्रीय विधि तथा मानचित्र संपादन के सिद्धान्तों इत्यादि का आलोचनात्मक परीक्षण एवं अग्रेत्तर विकास का अध्ययन करता है।

      सैद्धान्तिक मानचित्रकार मानचित्र के प्रयोगकर्ताओं के सम्पर्क में रहना चाहता है ताकि वह उनकी भविष्य की आवश्यकताओं एवं उपलब्ध मानचित्र के बारे में उनकी प्रतिक्रिया की जानकारी प्राप्त कर सके । वह ऐसे मानचित्र की परिकल्पना करता है तथा आविष्कार करने का प्रयास करता है जो मानचित्र के उपयोगकर्ता की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और साथ-साथ चाक्षुण संचारण (Visual Communication) का प्रभावकारी माध्यम के रूप में कार्य कर सके ।

     प्रयुक्त मानचित्रकला के अन्तर्गत मानचित्र के विन्यास एवं अन्तिम आरेखण जैसी क्रियाएँ शामिल हैं। प्रयुक्त मानचित्रकार सैद्धान्तिक मानचित्रकार के द्वारा निर्धारित नियमों एवं मार्गदर्शन के अनुरूप कार्य करता है, इसके अन्तर्गत मानचित्रों के पुनरुत्पादन एवं आरेखण के विकसित विधि का विकास भी शामिल है। इसलिए यांत्रिकरण एवं स्वचालन प्रयुक्त मानचित्र कला के अन्तर्गत आते हैं। स्थलाकृतिक एवं सामाजिक-भौगोलिक सर्वेक्षण भी प्रयुक्त मानचित्र कला के पक्ष समझे जाते हैं।

    मानचित्रों के वास्तविक आरेखण की तकनीक प्रयुक्त मानचित्र कला का मुख्य क्षेत्र है। हमारे समाज के सामने अनेक समस्याएँ हैं। मानचित्रिक विधियों के अनुप्रयोग से उन समस्याओं के समाधान में सहायता मिल सकती है। प्रयुक्त मानचित्रकार ऐसे मानचित्रिक विधियों के अनुप्रयोग के विकास हेतु अनुसंधान में रुचि लेता। वह नियोजनकर्त्ता, विस्तार कार्य के अभिकर्ता तथा शिक्षकों के उनके भावों और विचारों को प्रसारित करने में सहायता करता है।



प्रश्न प्रारूप 1. मानचित्र कला से क्या आशय हैं? इसकी प्रकृति तथा विषय-क्षेत्र की विवेचना करें।

(What do you mean cartography? Discuss its nature and scope.)

36. Distribution Maps- Dot, Choropleth and Isopleth Method (वितरण मानचित्र: बिंदु, वर्णमात्री तथा सममान रेखा विधि)

Distribution Maps- Dot, Choropleth and Isopleth Method

(वितरण मानचित्र: बिंदु, वर्णमात्री तथा सममान रेखा विधि)



वितरण मानचित्र:-

          प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक वातावरण के किसी तत्व का दिये हुए क्षेत्र में वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को वितरण मानचित्र कहते हैं।

           वितरण मानचित्र बनाने की विधियों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(1) अमात्रात्मक विधियाँ (Non-Quantitative Methods) तथा

(2) मात्रात्मक विधियाँ (Quantitative Methods)।

    अमात्रात्मक विधियों के द्वारा बनाये गये वितरण मानचित्रों को गुण प्रधान मानचित्र कहते हैं तथा मात्रात्मक विधियों के अनुसार बनाए गए वितरण मानचित्र को सांख्यिकीय मानचित्र कहते हैं।

      गुण प्रधान मानचित्रों में किसी तत्व या वस्तु का वितरण दिखाते समय वितरण के घनत्व पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके विपरीत सांख्यिकीय मानचित्रों का मूल उद्देश्य किसी तत्व या वस्तु के मूल्य, मात्रा या घनत्व की क्षेत्रीय भिन्नता को चित्रित करना होता है। दोनों प्रकार के मानचित्रों का यही एकमात्र अंतर है।

1. अमात्रात्मक विधियां

(i) रंगारेख विधि (Colour-Patch Method):-

         अमात्रात्मक वितरण मानचित्र बनाने की यह एक सरल एवं लोकप्रिय विधि है। इस विधि के अनुसार बनाए गए वितरण मानचित्रों को रंगारेख मानचित्र (Colour Patch Map), रंगक मानचित्र (Tint Map), वर्ण मानचित्र (Colour Map) तथा कोरोकोमैट्रिक मानचित्र (Chorochomatic Map) आदि, भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। उन मानचित्रों में भिन्न-भिन्न तत्वों या वस्तुओं के वितरण क्षेत्रों को रंग भरकर स्पष्ट करते हैं।

      प्राकृतिक प्रदेशों, राजनीतिक व प्रशासनिक क्षेत्रों, भूमि उपयोग के प्रकारों, भूवैज्ञानिक क्षेत्रों तथा प्राकृतिक वनस्पति व मिट्टियों के प्रकारों को प्रदर्शित करने के लिए प्रायः इस विधि का प्रयोग करते हैं।

  • रंगारेख मानचित्रों में अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के अनुसार निर्धारित रंग प्रयोग किये जाते हैं।
  • प्राकृतिक प्रदेश प्रदर्शित करने वाले मानचित्रों में पर्वतीय क्षेत्रों को गहरे भूरे रंग से, पठारी भागों को हल्के भूरे रंग से तथा मैदानों को पीले रंग से दिखाते हैं।
  • वनस्पति मानचित्रों में वनों के लिए हरे रंग का घास के मैदानों के लिए पीले रंग का तथा मरूस्थलीय वनस्पति के लिए भूरे रंग का प्रयोग होता है।

(ii) सामान्य छाया विधि (Simple Shade Method):-

    इसमें रंगों के स्थान पर काली स्याही से बनायी गयी छायाएं प्रयोग में लाते हैं। इस मानचित्र का एकमात्र उद्देश्य भिन्न-भिन्न प्रकार के क्षेत्रों को दिखाना होता है तथा इन मानचित्रों में प्रयुक्त छायाओं का वितरण के घनत्व से कोई संबंध नहीं होता है। इसके विरीत वर्णमात्री मानचित्रों में वितरण के घनत्व के अनुसार छायाओं को हल्का या भारी करना आवश्यक होता है। सामान्य छाया विधि के अनुसार ग्रेट ब्रिटेन में कृषि भूमि उपयोग को दिखलाया जाता है।

  • पुस्तकों में रंगारेख मानचित्रों के स्थान पर सामान्य छाया मानचित्रों की सहायता से भिन्न-भिन्न प्रकार के क्षेत्रों, जैसे- जलवायु, कटिबंध, कृषि पेटियाँ, फसलों के क्षेत्र, मिट्टियों के प्रकार, औद्योगिक पेटियाँ व खनिज क्षेत्र आदि का वितरण दिखलाते हैं।

(iii) चित्रीय विधि (Pictorial Method):-

    इस विधि में जिन-जिन वस्तुओं के स्थान, क्षेत्र या वितरण दिखाने होते हैं, उन वस्तुओं के वास्तविक फोटोचित्रों पर आधारित रेखाचित्रों को मानचित्र में यथा स्थान बना दिया जाता है।

  • किसी देश के दर्शनीय स्थानों, पर्यटक केंद्रों, वेश-भूषा के प्रकारों, जनजातियों तथा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक वैभव को प्रायः इसी विधि के द्वारा दर्शाया जाता है।
  • पर्यटन कार्यालयों एवं बड़े-बड़े रेलवे स्टेशनों पर इस प्रकार के चित्रीय मानचित्र देखे जा सकते हैं।

(iv) वर्णप्रतीकी या प्रतीक विधि (Choro-Schematic or Symbol Method):-

   प्रतीक या चिह्नों की सहायता से वितरण प्रदर्शित करने की विधि को वर्णप्रतीकी या प्रतीक विधि कहते हैं। इस विधि में जिन वस्तुओं का वितरण दिखलाना होता है उन सबके अलग-अलग चिह्न या प्रतीक निश्चित करके उन्हें मानचित्र में यथा स्थान अंकित कर देते हैं।

  • चित्रमय प्रतीकों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इन्हें देखने मात्र से प्रदर्शित की गई वस्तुओं का बोध हो जाता है तथा मानचित्र के संकेत में प्रतीकों का अर्थ देखने की आवश्यकता नहीं है।

(v) नामांकन विधि (Noming Method):-

     यह विधि मूलाक्षर प्रतीक विधि के समान होती है, केवल इतना अंतर है कि मूलाक्षर विधि में प्रदर्शित की जाने वाली वस्तुओं के नाम के प्रथम अक्षर या अक्षरों को प्रतीक के रूप में प्रयोग करते हैं जबकि नामांकन विधि में मानचित्र पर वस्तुओं के यथास्थान पूरे नाम लिखे जाते हैं।

2. मात्रात्मक विधियाँ

     किसी तत्व या वस्तु के मूल्य, मात्रा अथवा घनत्व की क्षेत्रीय भिन्नता प्रकट करने वाली सांख्यिकीय मानचित्रों जैसे, वर्षा-मानचित्र, जनसंख्या मानचित्र, तथा प्रति हेक्टेयर उत्पादन वाले कृषि मानचित्र आदि की रचना करने के लिए मात्रात्मक विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं। इस प्रकार के वितरण मानचित्रों का भूगोल में काफी महत्त्व है। इन विधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i)  वर्णमात्री विधि (Choropleth Method)

(ii) सममान रेखा विधि (Isopleth Method)

(iii) बिंदु-विधि (Dot Method)

(iv) सांख्यिकीय आरेख विधि (Statistical Diagram Method)



(i)  वर्णमात्री विधि (Choropleth Method)



       इस विधि द्वारा प्रशासकीय इकाइयों को आधार मानकर पदार्थों की मात्रा तथा घनत्व का वितरण, मानचित्र पर एक ही रंग की कई आभाओं तथा साधारण रेखा छाया द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र दी हुई सांख्यिकीय तालिका की सहायता से खींचे जाते हैं। सर्वप्रथम, इस तालिका की सहायता से विभिन्न प्रशासकीय इकाइयों के लिए क्रमबद्ध घनत्व आंकड़ों (Graded Density Figures) की तालिका निश्चित कर लेते हैं। तत्पश्चात् एक रंग की विभिन्न आभाओं तथा रेखाओं द्वारा व विभिन्न छायाओं द्वारा पदार्थों के घनत्व एवं मात्रा को प्रदर्शित कर देते हैं।

       ऊंचाई दर्शाने के लिए रंग छाया विधि अधिक उपयोगी है, परन्तु अन्य पदार्थों के घनत्व एवं मात्रा का वितरण रेखाओं द्वारा छाया देकर प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र छाया-वितरण अथवा वर्णमात्री वितरण-मानचित्र (Choropleth Maps) कहलाते हैं। वर्णमात्री-मानचित्र (Choropleth Maps) द्वारा कृषि, उद्योग-धन्धों तथा यातायात सम्बन्धी आंकड़े प्रदर्शित किए जाते हैं।

  • इन मानचित्रों में घनत्व आदि की भिन्नता को राजनीतिक अथवा प्रशासकीय क्षेत्रों के आधार पर प्रदर्शित किया जाता है।
  • इस प्रकार के मानचित्र में सबसे कम घनत्व वाले क्षेत्र में सबसे हल्की छाया, उससे अधिक घनत्व वाले क्षेत्र में और भारी छाया तथा सबसे अधिक घनत्व वाले क्षेत्र में सबसे भारी छाया भरी जाती है।

     छाया विधि द्वारा पदार्थों की मात्रा एवं घनत्व का प्रदर्शन करने के लिए विभिन्न घनत्वों एवं मात्राओं पर आधारित एक छाया-तालिका (Index to Shading) बना ली जाती है। यह छाया तालिका क्रमानुसार (Graded) होती है। तत्पश्चात् विभिन्न घनत्व के क्षेत्रों में इस तालिकानुसार छाया दी जाती है। उदाहरण के लिए, वर्षा के घनत्व को प्रदर्शित करने के लिए 75 सेमी० से कम, 76 सेमी० से 100 सेमी० तक, 101 सेमी० से 135 सेमी० तक वर्षा के विभिन्न घनत्वों के लिए घनत्व की रेखाएं खींच देते हैं। 135 सेमी० अथवा सबसे अधिक घनत्व को काले रंग अथवा अत्यधिक पास खींची गई रेखाओं द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

     यहां एक तत्व अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वह यह है कि केवल वही मानचित्र कोरोप्लेथ मानचित्र (Choropleth Maps) कहलाते हैं जिनमें वितरण प्रशासकीय सीमाओं (Administrative Boundaries) के अनुसार, उन सीमाओं को मानचित्र में खींचकर प्रदर्शित किया जाता है। ऐसे मानचित्रों में चाहे एक ही रंग की विभिन्न आभाओं द्वारा वितरण का घनत्व प्रदर्शित किया जाए चाहे रेखा छाया द्वारा घनत्व प्रदर्शित किया जाये, घनत्व प्रशासकीय इकाइयों के अनुसार मानचित्र में भरा जाता है। अतः ऐसे मानचित्रों (Choropleth Maps) में प्रशासकीय इकाइयां खींचना आवश्यक होता है।

      इस विधि द्वारा पदार्थों की मात्रा तथा घनत्व का प्रदर्शन प्रायः अशुद्ध रहता है। इसका कारण यह है कि घनत्व के विभिन्न क्षेत्र अधिकतर राजनीतिक सीमाओं का अनुसरण करते हैं। इसके अतिरिक्त समस्त क्षेत्र में पदार्थ के समान घनत्व का भ्रम होता है, यद्यपि अधिक न्यून घनत्व भी उस क्षेत्र में हो सकता है। 



(ii) सममान रेखा विधि (Isopleth Method)



        इस विधि द्वारा रेखाओं द्वारा घनत्व अथवा मात्रा का वितरण प्रदर्शित करते हैं। पदार्थों के समान मात्रा एवं घनत्व वाले स्थानों को रेखाओं द्वारा मिला देते हैं। इन रेखाओं को सममान रेखाएं (Isopleth) कहते हैं।

     दूसरे शब्दों में मानचित्रों पर किसी वस्तु के समान मूल्य या घनत्व वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएँ को सममान रेखाएँ कहा जाता है। 

(नोट : सम = बराबर, मान = मूल्य अर्थात मानचित्र पर किसी तत्व या वस्तु के समान मूल्य / घनत्व) 

    उदाहरण के लिए, समान तापक्रम वाले स्थानों को मिलाने वाली समताप रेखाएं (Isotherms), समान वायु दाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएं समदाब रेखा (Isobars), तथा समान वर्षा वाले स्थानों को मिलाने वाली समवर्षा रेखाएं (Isohyets) कहलाती हैं। समोच्च रेखाएं (Contours) भी इसी प्रकार की रेखाएं होती हैं।

     इसी प्रकार कृषि के समान उपज वाले स्थानों को मिलाने के लिए रेखाएं खींचकर Agricultural Isopleth Maps आदि बना सकते हैं, परन्तु इस विधि का उपयोग जलवायु के तत्वों के प्रदर्शन के लिए किया जाता है।

    इस विधि द्वारा निर्मित मात्रात्मक वितरण-मानचित्र भूगोल में अति उपयोगी होती हैं। समान रेखाएं किसी देश अथवा क्षेत्र को विभिन्न मात्रा एवं घनत्व के क्षेत्रों में विभाजित कर देती हैं। उदाहरण के लिए, समवृष्टि रेखाओं द्वारा अधिक एवं न्यून वर्षा क्षेत्रों के विषय में मानचित्र को एक ही बार देखने से वर्षा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। सममान रेखाएं (Isopleth Lines) शुद्ध आंकड़ों के प्राप्त होने पर ही खींची जा सकती हैं। इन रेखाओं के खींचने में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए :

  • सममान रेखाओं का मान निश्चित अन्तिम मान शून्य से प्रारम्भ करके निर्धारित करते हैं।
  • सममान रेखाएं निश्चित अन्तर पर खींची जाती हैं।
  • पास-पास खिंची सममान रेखाएं वितरण के अधिक परिवर्तन की द्योतक हैं। इसी प्रकार दूर-दूर खिंची समरेखाएं वितरण का न्यून परिवर्तन दर्शाती हैं।

मानचित्रों पर दर्शाएँ जाने वाली प्रमुख सममान रेखाएँ

1. आइसोनीफ (Isonif)⇒ समान हिम वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनीफ कहते है।

2.  सममेघ रेखा या आइसोनेफ (Isoneph)⇒ समान मेघ आच्छादन वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनेफ कहते है।

3. आइसो बाथ (Isobath)⇒ समुद्र के अंदर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाकर खींचे जाने वाली रेखा को आइसो बाथ कहते है।

4. आइसो ब्रांट (Isobront)⇒ एक समान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

5. समपवनवेग रेखा या आइसोटैक (Isotach)⇒ मौसम मानचित्र पर पवन की समान गति वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखा।

6. समताप रेखा (Isotherm)⇒ समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

7. आइसोपैच (Isopach)⇒ हिमानी अथवा चट्टानों के समान मोटाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

8.  समकाल रेखा या आइसोक्रोन (Isochrone)⇒ किसी बिंदु से एक समान समय में तय कि गई दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

9. समदिक्पाती रेखा (Isogone)⇒ समान चुंबकीय झुकाव वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

10. समलवणता रेखा (Isohaline)⇒ समुद्री जल में खारेपन की समान मात्रा मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा

11. आइसोरेमे (Isoraime)⇒ पाला गिरने की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

12. आइसोस्टेड (Isostade)⇒ समान अधिवासीय संख्या को मिलाने वाली रेखा।

13. समभूकंपीय (Isoseismal)⇒ भूकंपीय तीव्रता की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

14. सहभूकंप रेखा या होमोसिस्मल (Homoseismal) ⇒ भूकंप के एक ही समय आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

15. आइसोथेरे (Isothere)⇒ ग्रीष्मकाल के समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

16. समदाब रेखा (Isobars)⇒ समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

17. इसालोबार (Isallobar)⇒ एक विशिष्ट अवधि में वायुमंडलीय दबाव में होने वाले समान परिवर्तन के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

18. आइसोहेल (Isohel)⇒ सूर्य के प्रकाश की समान अवधि वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

19. समोच्च रेखा या आइसोहाइप (Contour lines or Isohypes)⇒ समुद्र तल से समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

20. आइसोपाइकनिक (Isopycnic)⇒ मानव जनसंख्या के समान घनत्व वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

21. आइसोकाइनेटिक (Isokinetic)⇒ समान पवन वेग के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

22. समवर्षा रेखा (Isohytes)⇒ वर्षा की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

23. आइसोमेर (Isomer)⇒ वर्षा की वार्षिक मात्रा की प्रतिशत के रूप में व्यक्त की जाने वाली उसकी औसत मासिक मात्रा के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

24. आइसोपाथ (Isopath)⇒ भूगर्भिक अथवा भू भौतिक परत की समान मोटाई वाले बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा।

25. आइसोसिस्ट (Isoseist)⇒ समान भूकंपीय लहरों को एक समय में ही अनुभव करने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

26. आइसोटालेंटोज (Isotalantose)⇒ औसत मासिक तापांतर की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

27. आइसोइकेते (Isoikete)⇒ लोगों केहने योग्य निवास की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

28. आइसोफीन (Isophene)⇒ समान मौसमी घटनाओं को दर्शाने वाली रेखा।

29. आइसोथर्मो बाथ (Isothermobath)⇒ सागरीय जल की गहराई के अनुसा समान ताप वाले बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा।

30. आइसोचाइम (Isochime)⇒ औसत शीत की तापमान की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

31. आइसोफाइट (Isophite) ⇒ वनस्पतियों की समान ऊंचाई अथवा समान ऊंचाई वाले वनस्पति के स्तरों को मिलाने वाली रेखा।

32. आइसोप्रैक्ट (Isopract)⇒ मानव जनसंख्या के समान वितरण वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।



(iii) बिंदु-विधि (Dot Method)



        वितरण मानचित्र बनाने की इस विधि में किसी वस्तु के वितरण के घनत्व को समान आकार व आकृति वाले बिंदुओं के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह एक ऐसा वर्णप्रतीकी मानचित्र होता है जिसमें एक ही प्रतीक की बार-बार पुनरावृत्ति होती है। चूंकि बिंदुकित मानचित्र में बिंदुओं की कुल संख्या तथा प्रदर्शित मात्राओं के मध्य निरपेक्ष अनुपात होता है। अतः बिंदु विधि को कभी-कभी निरपेक्ष विधि (Absolute Method) नाम से भी जाना जाता है।

    इस कार्य के लिए एक बिन्दु का कोई मान, जैसे- 5,000 व्यक्ति, 4,000 पशु अथवा 5,000 हेक्टेअर, आदि निश्चित कर लेते हैं। इसके बाद दिए गए क्षेत्र के प्रत्येक विभाग जैसे- देश, राज्य, जिला, तहसील या विकास खण्ड जिसके अनुसार आंकड़े दिए गए हों, में सम्बन्धित वस्तु की सम्पूर्ण संख्या अथवा मात्रा प्रकट करने के लिए बिन्दुओं की संख्या ज्ञात करते हैं तथा अन्त में इन बिन्दुओं को उस क्षेत्र के रूपरेखा मानचित्र में अंकित कर देते हैं।

    यहाँ पर अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि बिन्दुकित मानचित्र बनाने का कार्य उतना सरल नहीं है जितना कि यह दिखता है। इसका कारण निम्नलिखित चार समस्यएं हैं, जिन्हें मानचित्र बनाने से पूर्व हल कर लेना अत्यन्त आवश्यक है:-

(i) बिन्दु मूल्य निश्चित करना

(ii) बिन्दुओं का आकार

(iii) बिन्दुओं को अंकित करना-

(a) सम वितरण प्रणाली तथा

(b) असम वितरण प्रणाली

(iv) एक समान बिन्दु बनाना, आदि।

     जनसंख्या का वितरण प्रदर्शित करने वाले बिंदुकित मानचित्र में कोई ऐसा बिंदु-मूल्य चुनना कठिन होता है जिससे नगरीय व ग्रामीण दोनों प्रकार की जनसंख्या का सही-सही वितरण दिखाया जा सके।

     उपर्युक्त समस्याओं को हल करने की निम्नांकित दो विधियां हैं-:

(A) स्टिलजेन बोर विधि (Stilgen Baur’s Method):-

     इसे बिन्दु तथा वृत्त विधि भी कहते हैं। इसमें बिन्दु तथा वृत्तों द्वारा जनसंख्या का प्रदर्शन किया जाता है। इस विधि का आविष्कार 1930 ई० में नगरीय एवं ग्रामीण जनसंख्या को एक ही मानचित्र पर प्रदर्शित करने के लिए अमेरिकी मानचित्रकार स्टिलजेन बोर महोदय ने किया। इसमें ग्रामीण जनसंख्या को समान आकार वाले बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या को वृत्तों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नगरीय जनसंख्या को प्रदर्शित करने वाले वृत्तों के अर्द्धव्यास निम्नलिखित सूत्र द्वारा निकाले जाते हैं।

Distribution Maps

Stilgen Baur’s Method

(B) स्टेन डी गीयर विधि (Sten De Geer’s Method):-

     इसे बिन्दु तथा गोला विधि भी कहते हैं। इस विधि का आविष्कार अमेरिकी मानचित्रकार स्टेन डी गीयर ने 1917 ई. में किया। इसमें ग्रामीण जनसंख्या को बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या को गोलों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। गोले बनाने के लिए घनमूल निकालना पड़ता है। इसे निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता है:

Sten De Geer’s Method

बिन्दु विधि के गुण (Merits of dot Methods)-

     बिन्दु विधि के निम्नलिखित गुण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:-

1. चूंकि बिन्दु स्वयं असांतत्य रूप (Discountinuous Form) में होते हैं, अतः यह विधि असांतत्य इकाइयों में मिलने वाली वस्तुओं (जैसे- जनसंख्या, पालतू पशु तथा फसलों, आदि) के वितरण को प्रदर्शित करने में बहुत उपयोगी है।

2. साधारणतया किसी बिन्दुकित मानचित्र में केवल एक वस्तु का वितरण प्रदर्शित करते हैं, लेकिन विशेष परिस्थिति में एक ही मानचित्र में कई सम्बन्धित वस्तुओं को भिन्न-भिन्न प्रकार के बिन्दुओं द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

3. बिन्दु विधि का प्रयोग क्षेत्रफल सम्बन्धी आंकड़ों का वितरण दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस विधि के द्वारा मूल्य, आयतन, भार, आदि आंकड़ों का वितरण भी प्रदर्शित किया जा सकता है।

4. चूंकि बिन्दुकित मानचित्रों में वर्णमात्री मानचित्रों की तरह बार-बार संकेत देखने की जरूरत नहीं होती है, अतः इन मानचित्रों को शीघ्रतापूर्वक आसानी से पढ़ा जा सकता है।

5. बिन्दु विधि के द्वारा सही-सही बनाए गए मानचित्र से किसी वस्तु के वास्तविक वितरण का काफी सीमा तक यथार्थ चित्रण सम्भव है।

6. आवश्यकता पड़ने पर किसी सांख्यिकीय इकाई के बिन्दुओं को गिनकर पुनः आंकड़ों में बदला जा सकता है, लेकिन बिन्दु गिनने में होने वाली कठिनाई व त्रुटि की सम्भावना के कारण यह गुण विवादास्पद है।

बिन्दु विधि के दोष (Demerits of Dot Method)-

       बिन्दु विधि के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं :

1. पर्याप्त अभ्यास के बिना समान आकार व आकृति के बिन्दु बनाना कठिन होता है।

2. छोटी-छोटी सांख्यिकीय इकाइयों के आधार पर आंकड़े उपलब्ध न होने की दशा में बिन्दु विधि के द्वारा किसी वस्तु के वितरण की वास्तविक दशाओं का यथार्थ चित्रण करना असम्भव है।

3. बिन्दु विधि मानचित्र बनाने के लिए ऐसे आधार मानचित्र की आवश्यकता होती है जिसमें आव- श्यक सांख्यिकी इकाई क्षेत्रों में सीमाएं हों। इस तरह के आधार मानचित्र सदैव उपलब्ध नहीं होते हैं, अतः सहायक मानचित्रों की सहायता से आधार मानचित्र में इन सीमाओं को अंकित करने के लिए अतिरिक्त परिश्रम व समय की आवश्यकता पड़ती है।

4. विषय की जानकारी एवं दिए हुए क्षेत्र के भौगोलिक ज्ञान के अभाव में सही-सही बिन्दुकित मानचित्र बनाना कठिन होता है।

5. बिन्दुकित मानचित्र की नकल करके उसकी प्रतिलिपि बनाना कठिन होता है।

6. बिन्दु अंकित करने की प्रक्रिया में मानचित्रकार के द्वारा की गई त्रुटियों को मानचित्र में पहचानना कठिन होता है।



(iv) सांख्यिकीय आरेख विधि (Statistical Diagram Method)



       आंकड़ों का प्रदर्शन भिन्न-भिन्न प्रकार के आरेखों (Diagrams) द्वारा भी किया जा सकता है। यह आरेख मानचित्र पर स्थान-विशेष पर खींचकर अध्यारोपित (Superimpose) कर दिए जाते हैं। इस प्रकार आंकड़ों का प्रदर्शन निम्न प्रकार के आरेखों द्वारा किया जाता है:-

(i) रैखिक आरेख (Line Graph)।

(ii) दण्ड या पट्टिका या स्तम्भ आलेख अथवा स्तम्भाकार आरेख (Bar Graph and Columnar Diagrams)।

(iii) मिश्रित अथवा संयुक्त स्तम्भ, दण्ड अथवा पट्टिका आरेख (Compound Bar Graph)।

(iv) द्वि-विस्तारीय मान आयताकार आरेख (Two Dimensional Value Area Rectangular Diagrams)।

(v) वृत्ताकार तथा चक्रारेख (Ring, Pie, Circle or Wheel Diagrams)।

(vi) घनक अथवा इष्टिका पुंज आरेख (Block Pile Diagrams)।

(vii) पिण्ड अथवा गोलाकार आरेख (Spherical Diagrams)।

(viii) चित्रात्मक चित्र (Pictorial Diagrams)।

(ix) तारक आरेख (Star Diagrams)।

31. Wind Rose / Star Diagram (पवनारेख / तारा आरेख)

31. Wind Rose / Star Diagram

(पवनारेख / तारा आरेख)



         पवनारेखों को तारा आरेख भी कहा जाता है। किसी स्थान के पवनों की दिशा तथा बारंबारता प्रकट करने के लिए इस आरेख का प्रयोग किया जाता है।

      तारा आरेखों को वृत्त या घड़ी आरेख (Clock Diagram), रोज आरेख (Rose Diagram) तथा वेक्टर आरेख (Vector Diagram) आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। इन आरेखों के द्वारा सदिश या वेक्टर मूल्यों को केंद्र या मूल बिंदु से संबंधित दिशाओं में सरल रेखाएँ या कॉलम खींचकर प्रकट करते हैं तथा इन आरेखों या कॉलमों की लंबाइयों को दिए हुए मूल्यों के अनुपात में मापनी (Scale) के अनुसार निश्चित करते हैं।

      किसी स्थान पर दिशाओं के अनुसार वर्ष में पवनों की बारंबारता दिखलाने के लिए यह आरेख बहुत उपयोगी होते हैं परंतु आर्थिक वितरण जैसे व्यापार की दिशा अथवा विभिन्न दिशाओं में जनसंख्या के स्थानांतरण के आंकड़ों को भी इन आरेखों के द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

पवनारेख के प्रकार (Types of Wind Rose)

1. साधारण पवनारेख (Simple Wind Rose):-

    इस आरेख के द्वारा किसी स्थान की एक वर्ष में पवन की दिशा तथा शांत दिनों की संख्या को प्रदर्शित किया जाता है। पवन चलने के दिनों को लंबी रेखाओं द्वारा तथा शांत पवन वाले दिनों को केन्द्र पर बनाये गये छोटे वृत्त के भीतर अंकों में लिखकर इंगित करते हैं।

उदाहरण:

(i) निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से जयपुर का पवनारेख बनाइए।

Wind Direction / पवन की दिशा
N NE E SE S SW W NW Calm
No. of Days 24 23 25 15 29 58 77 79 17

रचना विधि:

      साधारण पवनारेख बनाने हेतु पहले सुविधानुसार कोई अर्द्धव्यास लेकर एक छोटा वृत्त खींचते हैं एवं इसके भीतर शांत पवनों की दिश (17) लिखते हैं। इसके बाद वृत्त के केन्द्र से दी हुई दिशाओं की ओर सरल रेखाएँ खींचते हैं। अब इन रेखाओं में किसी उचित मापनी के अनुसार वृत्त की परिधि से मापते हुए संबंधित दिनों की संख्या के बराबर दूरियाँ काटकर रेखाओं के सिरों का सरल रेखाओं द्वारा मिला देते हैं। इस प्रकार बने अष्टभुज के प्रत्येक कोने पर उसकी दिशा लिख देते हैं एवं आरेख के नीचे दिनों की मापनी बनाकर Windrose पूर्ण कर लेते हैं।

       सामान्यतः साधारण पवन आरेख में पवन की आठ दिशाएँ (उत्तर, उत्तर-पूर्व, पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिम) प्रकट की जाती है परंतु आवश्यकता होने पर उत्तर-उत्तर पूर्व, उत्तर पूर्व-पूर्व आदि शेष आठ दिशाओं की पवनों की बारंबारताओं को भी आरेख में प्रदर्शित किया जा सकता है।

2. पवन तथा दृश्यता रोज (Wind and Visibility Rose):

     ये साधारण पवनारेखों की भाँति ही बनाए जाते हैं, परन्तु इनमें केवल इतना अंतर है कि इस आरेख में किसी स्तंभ की लंबाई उस दिशा में चलने वाली पवनों के कुल दिनों में उत्तम दृश्यता (Good Visibility) अथवा अत्यल्प दृश्यता (Bad Visibility) के दिनों की बारंवारता का प्रतिशत प्रकट करती है।

उदाहरण :

(ii) किसी काल्पनिक स्थान पर प्रेक्षित निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर एक पवन तथा दृश्यता रोज की रचना कीजिए।

 पवन की दिशा
पवन की बारम्बारता (दिन) N NE E SE S SW W NW Calm
30 20 30 50 12 20 80 100 23
अत्यल्प दृश्यता की बारंबारता (दिन) 12 14 18 20 3 3 8 5

रचना विधि:

    पवन तथा दृश्यता रोज बनाने के लिए सर्वप्रथम एक छोटा वृत्त बनाकर उसमें शांत दिनों की संख्या (23) लिख दिया जाता है। उसके बाद कोई उचित मापनी लेकर पहले बतलाई गयी विधि के अनुसार वृत्त की परिधि से संबंधित दिशाओं में अत्यल्प दृश्यता की बारंबारताओं के प्रतिशत मूल्यों के बराबर लंबाईयों वाले स्तंभ खींचा जाता है। अंत में अब आरेख के नीचे मापनी बनाक आरेख पूर्ण क लिया जाता है।

Wind Rose

33. Interpretation of Weather Map (मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)

33. Interpretation of Weather Map

(मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)



मौसम सम्बन्धी तत्व और उनके निरूपण (Weather Phenomena and their Representation)

संघनन- जल के गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को संघनन कहा जाता है। यदि हवा का तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे पहुंच जाये तो संघनन की क्रिया प्रारंभ होती है। संघनन की प्रक्रिया पर वायु के आयतन, तापमान, वायुदाब एवं आर्द्रता का प्रभाव पड़ता है।

यदि संघनन हिमांक (Freezing Point) से नीचे होता है, तो तुषार (Frost), हिम (Snow) एवं पक्षाभ मेघ (Cirrus Cloud) का निर्माण होता है।

यदि संघनन हिमांक से ऊपर होता है तो ओस, कुहरा, कुहासा एवं बादलों का निर्माण होता है।

 यदि संघनन पृथ्वी के धरातल के समीप होता है तो ओस (Dew), पाला (Frost), कुहरा एवं कुहासे का निर्माण होता है।

 जब संघनन की क्रिया अधिक ऊँचाई पर होती है तो बादलों का निर्माण होता है।

ओस (Dew)- हवा का जलवाष्प जब संघनित होकर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में धरातल पर पड़ी वस्तुओं (घास पत्तियों आदि) पर जमा हो जाता है, तो इसे ओस कहा जाता है। ओस के निर्माण के लिए साफ आकाश, लगभग शांत वायुमंडल, उच्च सापेक्षिक आर्द्रता एवं ठंडी तथा लंबी रात का होना आवश्यक है।
ओस के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि तापमान हिमांक से ऊपर हो।

तुषार या पाला (Frost)- जब संघनन की क्रिया हिमांक से नीचे होती है (0°C या उससे कम पर) तो जलवाष्प जल कणों के बदले हिम कणों में परिवर्तित हो जाता है। इसे ही तुषार या पाला कहा जाता है। पाला के निर्माण के लिए उन सभी अन्य परिस्थितियों का होना आवश्यक है, जो ओस के निर्माण के लिए हैं।

नोट :- ओस या पाला ऊपर से नहीं गिरता है, बल्कि यह वहीं बनता है जहां हम इसे देखते हैं।

कुहरा (Fog)- कुहरा एक प्रकार का बादल है। जब जलवाष्प का संघनन धरातल के बिल्कुल समीप होता है तो कुहरे का निर्माण होता है। कुहरे में कुहासे की तुलना में जल के कण अधिक छोटे एवं सघन होते हैं।

कुहासा (Mist)- कुहासा भी एक प्रकार का कुहरा है, जिसमें कुहरे की अपेक्षा दृश्यता (Visibility) दूर तक रहती है। इसमें दृश्यता एक किलोमीटर से अधिक, परंतु दो किलोमीटर से कम होती है।

धुआंसा (Smog)- बड़े-बड़े शहरों में फैक्टरियों के निकट जब कुहरे में धुएं के कण मिल जाते हैं तो उसे धुआंसा (Smoke+Fog = Smog) कहा जाता है। धुआंसा कुहरे की तुलना में और अधिक सघन होता है एवं इसमें दृश्यता और भी कम होती है।

बादल (Clouds):-

    जब वायु का तापमान ओसांक (Dew-point) से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प धूल तथा धुँए के कणों पर केन्द्रित होकर बादल का रूप धारण कर लेती है। बादलों को निम्नलिखित चार प्रमुख प्रकारों में विभक्त किया जाता है:-

1. वर्षा-मेघ (Nimbus):-

    काले-काले मेघ जब आकाश घेर लेते हैं तथा पृथ्वी के निकट होते हैं, तो इन्हें वर्षा-मेघ कहते हैं। इनसे काफी वर्षा होती है।

2. स्तरी मेघ (Stratus):-

   ये पृथ्वी से 300-2500 मीटर की ऊँचाई पर होते हैं तथा आकाश पर पूर्णतया छा जाते हैं। इनका निर्माण दो भिन्न पवनों के मिलने से होता है।

3. कपासी पेघ (Cumulus):-

   इनकी आकृति, रूई के ढेर जैसी होती है। इन बादलों में गड़गड़ाहट होती है।

4. पक्षाभ मेघ (Circus):-

   ये बहुत अधिक ऊँचाई (5-13 किमी) पर होते हैं। प्राय: ये घुँघराले बालों जैसे दिखाई पड़ते हैं। इनके द्वारा वर्षा नहीं होती।

समवायु-दाब रेखाओं का अध्ययन

    मौसम-मानचित्रों में समवायु-दाब रेखाएँ खींची जाती हैं। किसी भी मौसम-मानचित्र का अध्ययन इन रेखाओं के अध्ययन पर ही अधिकतर अवलम्बित होता है। समभार रेखाओं के अनेक आकार होते हैं, परन्तु इसके निम्न तीन मुख्य आकार हैं:

(क) चक्रवात (Cyclone),

(ख) प्रतिचक्रवात (Anti-Cyclone),

(ग) कोल (Coal)।

चक्रवात (Cyclones):-

    इसमें समदाब-रेखाओं का आकार वृत्ताकार होता है तथा रेखाएँ मिली होती हैं और वायु-दाब भीतर की ओर कम होता जाता है। सबसे कम वायु-दाब रेखा के भीतर ‘Low’ लिखा रहता है। प्रत्येक चक्रवात एक निश्चित दिशा की ओर चलने लगता है। उत्तरी गोलार्द्ध के चक्रवात में पवनें अन्दर की ओर घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में चलती हैं।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

ब्यूफोर्ट संकेत (Beaufort Notation)

b नीला आकाश

h ओले (Hail)

bc आकाश कुछ साफ (Sky partly clean)

p वर्षा के मेघ गुजर रहते हैं (Passing Shower)

e आकाश अधिकतर बादलों से घिरा हुआ (Generally cloudy sky)

f धुन्ध (Fog)

m कुहरा (Mist)

o आकाश बादलों से सम्पूर्ण घिरा हुआ (Over-cast sky)

x पाला (Frost)

w ओस (Dew)

d फुहार (Drizzle), वर्षा (Rain), हिम (Snowfall)

q अल्पकालिक झंझा (Squall)

t गरज (Thunder)

I बिजली (Lighting)

s सहिम वृष्टि (Sleet)

i कभी चमक कभी गरज (Intermittent)

Interpretation of Weatherकोल (Col):-

    दो चक्रवातों अथवा दो प्रति चक्रवातों से घिरे मध्यस्थ क्षेत्र को हम ‘कोल’ कहते हैं। यहाँ पर पवन शांत रहती है। ग्रीष्म ऋतु में गरज तथा विद्युत की कड़क सुनाई देती है।

गौण अपदान (Secondary Depresion):-

     जब विशाल चक्रवात में छोटा वायु-दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) बन जाता है, तो उसे गौण अपदाब कहते हैं। इसमें मौसम अस्थायी (Varaible) होता है, कभी शांत होता है, कभी विद्युत की गरज होती है। गौण अवदाब मुख्य चक्रवात के साथ ही आगे बढ़ता है।

‘V’ आकार का चक्रवात:-

    जब चक्रवात का न्यून वायु-दाब क्षेत्र ‘V’ के आकार का हो जाता है, तो से Trough of Low Pressure कहते हैं। इसके अगवाड़े में गर्मी तथा वर्षा होती है। यदि वह उष्ण वाताग्र (Warm Front) प्रकार का होता है तो धूप तथा ठंड होती है। इसमें वायु-दाब बाहर की ओर बढ़ता जाता है।

फान (Wedge):-

    अनेक बार दो चक्रवातों के बीच समदाब रेखाओं का आकार उल्टे ‘V’ की भाँति हो जाता है तथा भीतरी वायु-दाब अधिक होता जाता है। इसके अग्रभाग (Front Part) में मौसम शांत तथा सुहावना होता है, ज्योंहि पिछला भाग (Rear Part) आता है, मौसम बादलों से घिरा तथा खराब हो जाता है।

भारत का सामान्य मौसम मानचित्र

    भारतीय मौसम मानचित्रों के अध्ययन में देश में पाई जाने वाली विभिन्न मौसमों की जानकारी की अधिक आवश्यकता पड़ती है। परम्परानुसार भारत में एक वर्ष की अवधि को तीन ऋतुओं में विभक्त किया जाता है:

(i) जाड़े की ऋतु (नवम्बर से फरवरी के अन्त तक)

(ii) गर्मी की ऋतु (प्रारम्भिक मार्च से मध्य जून तक)

(iii) वर्षा ऋतु (मध्य जून से अक्टूबर के अन्त तक)

    मौसम की दृष्टि से वर्षा का महत्व अधिक होता है इस मौसम के मानचित्रों पर अनेक संश्लिष्ट दृश्य भी उभरते है।

दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की ऋतु (मध्य जून से मध्य सितम्बर या अक्टूबर तक):-

     इस मौसम के मानचित्र की प्रमुख विशेषता यह है कि उत्तरी-पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर निम्न वायु दाब केन्द्र तथा हिन्द महासागर में प्रायः श्रीलंका के पश्चिम उच्च वायु दाब पाया जाता है। इसके फलस्वरूप उच्च दाब का एक उभार या गर्त बना जाता है और पश्चिमी तट पर विशेष रूप से उसके दक्षिणी भाग में समदाब रेखाएँ कुछ उत्तर की ओर मुड़ जाती है। प्रायद्वीप के दक्षिणी अर्द्धभाग में ये रेखाएँ दक्षिण की ओर मुड़ जाती है।

    पश्चिम के आधे भाग पर ये प्रायः पश्चिम दिशा में फैली होती है। पूर्व में समदाब रेखाओं की आकृति चक्रवात की उपस्थिति पर निर्भर करती है। उत्तरी प्रायद्वीप को पार करने वाली समदाब रेखाएँ प्रायः चक्रवात को दक्षिण भाग में घेरने की कोशिश करती है। यदि चक्रवात नहीं है तो ये प्राय: उत्तर की ओर से बंगाल की खाड़ी के ऊपर मुड़ जाती है और हिमालये से 60° के कोण पर मिलती है।

लौटती मानसून की ऋतु (मध्य सितम्बर से दिसम्बर)-

    मानसून के समाप्त होते ही पश्चिमोत्तर भारत का निम्न दाब क्षेत्र धीरे-धीरे उच्च दाब में बदल जाता है। पश्चिमी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में एक उच्च दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। इस केन्द्र से गंगा के मैदान में उच्च दाब का एक कटक (Wedge) फैला रहता है फिर भी यहाँ दाब प्रवणता बहुत कम रहता है। समदाब रेखाएँ पहले उत्तरी पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर चलती है और फिर गुजरात तथा काठियावाड़ा से पूर्व पश्चिम हो जाती है।

    श्रीलंका के पूर्व में बंगाल की खाड़ी पर एक निम्न दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। जब गंगा के मैदान पर उच्च दाब क्षेत्र रहता है, पश्चिमी पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत पर फैली समभार रेखाएँ उच्च दाब के पश्चिम किनारे के समान्तर हो जाती है और उनकी दिशा उत्तर-दक्षिण हो जाती है।

शीत ऋतु या जाड़े का मौसम (जनवरी से मार्च के मध्य तक)-

     इस समय के मौसम मानचित्र पर उत्तरी-पश्चिमी उच्च दाब के स्थान पर एक हल्का निम्न दाब क्षेत्र बन जाता है। क्षेत्र की वास्तविक स्थिति चक्रवात पर निर्भर करती है।

ग्रीष्म ऋतु (मार्च से जून तक)-

    इस समय गर्मी अधिक बढ़ जाने से भारत के उत्तरी-पश्चिम भाग और पाकिस्तान के ऊपर निम्न दाब का क्षेत्र बनना प्रारम्भ हो जाता है। बाद में वह गंगा के मैदान में फैलता है। उच्च दाब क्षेत्र अरब सागर पर स्थित रहता है। अतः समभार रेखाएँ पश्चिमी घाट पर उत्तर से दक्षिण मुँह की हो जाती हैं। मध्य प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में समदाब रेखाएँ अपनी दिशा को बदल उत्त-पूर्वी दिशा में मुड़ जाती हैं। वायुदाब रेखाओं के कम होने के कारण दाब प्रवणता अल्प तथा इस प्रकार वायुगति अधिक तेज नहीं होती।

भारतीय मौसम मानचित्रों की व्याख्या

     किसी दैनिक मौसम मानचित्र का अध्ययन निम्न शीर्षकों में किया जाता है:-

1. भूमिका- दिन, मानचित्र की तिथि तथा समय, ऋतु आदि।

2. आकाश की दशा (Sky Conditions)

(i) मेघ आवरण की मात्रा (Amount of Cloudiness)

(ii) मेघों के प्रकार या प्रकृति

(iii) अन्य घटनाएँ-कोहरा, बिजली, तुषार आदि वायुमण्डलीय तत्व

3. वायुदाब का वितरण:

(i) मौसमी निम्न वायुदाब (Low) क्षेत्र की स्थिति

(ii) मौसमी उच्च वायुदाब (High) को स्थिति

(iii) समदाब रेखाओं की प्रवृत्ति (Trends of isobars)

(iv) वायुदाब को प्रवणता (Pressure Gradient)

(v) चक्रवात को उपस्थिति और मौसम पर उसका प्रभाव

4. वायु (Wind)

(1) पवन की दिशा और

(ii) पवन की गति

5. सामान्य वायुदाब से विचलन

6. वर्षा का वितरण (Precipitation)

(i) सामान्य वितरण, साधारण, अधिक, कम आदि

(ii) भारी वर्षा के प्रमुख क्षेत्र

7. सामान्य तापमान से विचलन (Departure from normal Temp.)

8. समुद्र की दशा (Sea Condition)

   उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत सामान्यतः प्रातः कालीन (08.30) मुख्य मानचित्र का सविस्तार वर्णन मानचित्र पर उद्धत कुछ प्रमुख संकेतों की सहायता से करते हैं। छोटे मानचित्र भी उपरोक्त समय की दशा को ही दर्शाते हैं जिनका उपयोग पठन में किया जाता है।

शीतकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 31 जनवरी, सन् 1973 शक्, 11 माघ 1894):-

(a) प्रारम्भिक सूचना-

    शीतकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 31 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशाओं का चित्रण किया गया है। ऋतु मानचित्र के ऊपरी भाग में दिनांक, दिन एवं भारतीय समय के अतिरिक्त ग्रीनविच समय (0300 GMT) दिया है। यहाँ ई० सन् के साथ-साथ शक् संवत् भी दिया रहता है। ऋतु मानचित्र में मंगलवार दिनांक 30 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार सायं 5.30 17.30) की मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन किया गया है। मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन करते समय दोनों पृष्ठों के मुख्य एवं सहायक मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सर्वत्र सहायता ली गयी है।

(b) वायुदाब व्यवस्था-

    मानचित्र में वायुदाब व्यवस्था अधिक सरल है। इसमें वायुदाब की सामान्य प्रवणता हिन्द महासागर से उ०-५० भारत की ओर है। सम्पूर्ण मानचित्र में समदाब रेखाएँ दूर- दूर फैली हुई हैं। हिन्द महासागर एवं केरल तट के सहारे 1014 मिलीबार की समदाब रेखा अण्डाकार स्वरूप बनाती हुई सर्पिल मार्ग से पूर्व की ओर चली गयी है। अधिकांश दक्षिण का पठार 1014 और 1016 मिलीबार समभार रेखा की सीमा में आ जाता है।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    ऋतु मानचित्र में स्पष्टत: उ० प० भारत और संलग्न पाकिस्तान में निम्न वायुदाब का विकास हुआ है। यहाँ पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में 1018 मिलीबार समभार रेखा अण्डाक्ति बनाती है। इसी भाँति दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग को 1010 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। यह दोनों ही निम्न भार के केन्द्र हैं।

उच्च वायुदाब के क्षेत्र-

    सर्वाधिक वायुदाब पृष्ठ छः के मुख्य ऋतु मानचित्र में उत्तरी-पश्चिमी भारत एवं पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में विकसित हुआ है। यहाँ 1022 मिलीबार वायुदाब पाया जाता है। यह वायुदाब उत्तरी राजस्थान और उत्तरी-पूर्वी भारत में उपूसी और सलंग्न वर्मा में विकसित हुआ है। सामान्यतः सारे ही उत्तरी भारत में 1020 से 1022 मिलीबार के बीच उच्च वायुदाब की दिशा पायी जाती है। यहाँ की समभार रेखाएँ उत्तर प्रदेश के पश्चिम में पश्चिमोत्तर दिशा में और पूर्व में पूर्वोत्तर दिशा में मुड़ गयी हैं।

     दक्षिणी भारत में 1014, 16 और मिलोबार की तीन समभार रेखाएँ अरब सागर से भूमि की ओर तेजी से मुड़कर एवं पुनः सागर की ओर झुककर पूर्व की ओर चली गयी हैं। उत्तरी भारत में इनका वितरण अधिक व्यवस्थित एवं दो उपखण्डों पूर्वोत्तर और पश्चिमोत्तर में बँट गया है। समदाब रेखाओं की उपयुक्त व्यवस्था से तो यही आभास होता है कि स्थानीय अपवादों को छोड़ कुछ घण्टों तक सर्वत्र मौसम खुला एवं स्वच्छ रहना चाहिए।

सामान्य वायुदाब के विचलन (प्रातः 8.30 बजे)-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने में दिये गये लघु मानचित्र को ध्यान से देखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रायः सारे ही देश में औसत से अधिक वायुदाब की दशा का विकास हुआ है। केवल मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के कुछ ही भागों में औसत वायुदाब मिलता है। सामान्यतः ज्यों-ज्यों हम उत्तर की ओर जाते हैं वायुदाब उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। सर्वाधिक विचलन पश्चिमोत्तर एवं पूर्वोत्तर भारत +4 मिलीबार और दक्षिण भारत में +2 मिलीबार से कम पाया गया है।

वायु दिशा एवं वायुवेग-

    ऋतु मानचित्र के उत्तरी-पश्चिमी भाग में वायु प्रायः शान्त है। उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में वायु धीमी गति (5 नॉट या कम) से बह रही है। कंवल बारीसाल (बंगला देश) के निकट इसकी सर्वाधिक गति 20 नॉट प्रति घण्टा कित की गई है। इस ऋतु मानचित्र में कंवल उत्तरी भारत में ही ‘अ’ श्रेणी के बीस ऐसे केन्द्र बनाए गए हैं जहाँ कि वायु शान्त है। दक्षिणी भारत के अधिकांश केन्द्रों पर वायु प्रवाह की गति 5 से 15 नॉट के बीच है। इस भाग में वायु प्रवाह की सामान्य दिशा अरब सागर की ओर है। निकोबार के दक्षिण-पश्चिमी सागर में वायु गति 20 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गई है। यहाँ पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है।

1.5 किमी0 ऊँचाई पर वायु की स्थिति-

    दक्षिण-पूर्व कोने में ऑकत लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊँचाई पर देश के विभिन्न स्टेशनों से लिये गये प्रेक्षण के आधार पर वायु की दिशा एवं गति दर्शायी गई है। मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि उपर्युक्त ऊँचाई पर वायु की गति 5 से 20 नॉट के बीच है। पश्चिमी तट एवं हिमालय के ढालों के निकट वायु प्रवाह अपेक्षाकृत तेज है। सम्पूर्ण उत्तरी भारत में वायु की दिशा भूमि की भाँति ही है। दक्षिणी भारत के विक्षोभ मण्डल में पवन धीमी गति से पश्चिम से पूर्व, उत्तर-पूर्व से पश्चिम की ओर बह रही है।आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता-

    शीत ऋतु होने से देश के अधिकांश मौसम केंन्द्र मेघ रहित है। पूर्ण मेघाच्छन्नता श्रीनगर, शिमला, चांदा और देहरादून में पायी जाती है। खण्डित मेघाच्छन्नता कहीं-कहीं उत्तरी मध्य और दक्षिण-पश्चिमी भारत एवं दोनों सागरों में एक-चौथाई से तीन-नौथाई तक पायी जाती है। सर्वत्र निम्न मेघों का ही वितरण दर्शाया गया है। आधे से अधिक मेघान्छन्नता भारत में जबलपुर और दक्षिणी भारत में औरंगाबाद व बंगलौर और मिनिकोय, कोलम्बो एवं वर्मा के दक्षिण में मिलती है। आकार में मेघों के अतिरिक्त जबलपुर के निकट तड़ित (lightning) अंकित की गयी है। मानचित्र में पूर्ण मेघाच्छन्नता पश्चिमी उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में अंकित की गई है।

वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप-

     उच्च भार एवं प्रायः मेघरहित आकाश होने से देश के अधिकांश भाग में वर्षा रहित मौसम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में शिमला और श्रीनगर के निकट हिमपात होता हुआ बताया गया है। दिल्ली और इलाहाबाद में हल्का कुहरा एवं कहीं-कहीं धुंध (Haze) भी फैली हुई है। पिछले 24 घण्टों में कहीं भी जलवृष्टि, हिमपात या ओलावृष्टि अंकित नहीं की गयी है।

समुद्र की दशा-

    बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की दशा प्रायः शान्त बतायी गयी है। बंगाल की खाड़ी में गंगा के डेल्टा के मुहाने, मद्रास और खाड़ी के दीपों के निकट कहीं भी दशा विशेष को उल्लिखित नहीं किया गया है। मद्रास व म्यांसार के बीच सागर मध्य तरंगित (moderate) बताया गया है। इसी भाँति अरब सागर में द्वीपों के निकट सागर कुछ अशान्त है, शेष भागों में यह प्रायः शान्त है।

न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सायं 8.30 बजे):-

    पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत न्यूनतम तापमान से वास्तविक न्यूनतम तापमान 2° स 4°C कम रहे हैं। गुजरात, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 4°C या अधिक नीचे तापमान रहे हैं। दूसरी ओर सम्पूर्ण दक्षिणी-पूर्वी और पूर्वी भारत के तापमान औसत से 2°C तक ऊँचे अंकित किये गये हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं आंध्र के संलग्न भागों में वृद्धि 4°C तक अंकित की गई है। औसत तापमान रेखा या 0°C विचलन रेखा मार्मा गोआ एवं भारत के मध्यवर्ती भागों से होकर सुदूर पूर्वी भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गई है।

अधिकतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सांय 5.30 बजे):-

    दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के सारे उत्तर और मध्य भाग में अधिकतम तापमान औसत से 2° से 4°C तक कम अंकित किये गये हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के वास्तविक तापमान 4°C से भी कम अंकित किये गये हैं। देश के शेष भागों में अधिकतम तापमान प्राय: औसत के निकट रहे। केवल महाराष्ट्र में कहीं-कहीं औसत से 2°C अधिक तापमान अंकित किये गये। औसत समताप रेखा अत्यधिक बल खाती हुई भूमि की ओर मुड़कर पूर्व एवं पूर्वोत्तर भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गयी है।

ग्रीष्मकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 16 मई सन् 1973, शक 26 वैशाख 1895)

(i) प्रारंभिक सूचना:-

    ग्रीष्मकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 16 मई, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र के ऊपरी भाग में भारतीय समय के साथ-साथ ग्रीनविच समय (3.00 बजे) एवं ईसवी सन् के साथ-साथ शक् सम्वत् भी दिया गया है। मानचित्र में मंगलवार 15 मई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मौसम की वास्तविक दशा का वर्णन करते समय दोनों ही मुख्य मानचित्रों एवं उनके नीचे के चारों लघु मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सहायता ली गयी है।

(ii) वायुदिशा एवं वायुवेग:-

    मुख्य ऋतु मानचित्र के अधिकांश भाग में पवन धीमी गति से बह रही है। उत्तरी भाग में वायु की गति 10 से 5 नॉट के बीच और मध्यवर्ती भाग में 5 से 15 नॉट के बीच ऑकत की गई है। देश में सबसे तेज पवन नागपुर के निकट 25 नॉट प्रति घण्टा की गति से चल रही है। उत्तरी भारत में वायु के प्रायः शान्त रहने का मुख्य कारण वहाँ पायी जाने वाली वायुदाब और समदाब रेखाओं का दूर-दूर होना है।

   दक्षिणी-पश्चिमी भारत एवं तटवर्ती भाग में वायु प्रायः पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी दिशा में प्रवाहित हो रही है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी तट पर इसकी दिशा अनिश्चित है। पूर्वी तट पर हवा एक-दूसरे से विपरीत दिशा में प्रवाहित होती हुई दर्शायी गयी है। मध्यवर्ती भारत में हवाएँ उत्तर-पश्चिम और पश्चिम दिशा से और पूर्व में दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व से प्रवाहित हो रही है। देश के शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है। मानचित्र में वायुदाब की भाँति ही वायु प्रवाह की दिशा भी अधिक व्यवस्थित है, यहाँ पश्चिमी भारत एवं पश्चिमी तट पर हवा पश्चिम या उत्तर-पश्चिम से एवं मध्यवर्ती भारत में उत्तर-पश्चिम से प्रवाहित हो रही है। शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है।

(iii) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

     ग्रीष्म ऋतु के कारण मुख्य मानचित्र के अधिकांश मौसम केन्द्रों पर आकाश मेघरहित बताया गया है। परन्तु तटवर्ती मौसम केन्द्रों की स्थिति इससे कुछ भिन्न है। यहाँ पर कच्छ से कोचीन तक न्यूनाधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है। कोचीन, कालीकट और त्रिवेन्द्रम के निकट 7/8 से लेकर पूर्ण आकाश मेघाच्छादित है। इसी भाँति पूर्वी भारत में पूर्ण मेघाच्छन्नता कटक, बालासोर और गौहाटी में, पश्चिम भारत में चण्डीगढ़ में पूर्ण, दिल्ली व देहरादून में 7/8, अण्डमान निकोबार में 5/8 और बीकानेर में 1/2 भाग मेघाच्छादित है। मानचित्र के दक्षिण और पूर्वी तट, द्वीप समूहों और पूर्वी भारत में अधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है।

     दोनों ही मुख्य ऋतु मानचित्रों में उत्तरी और मध्यवर्ती भारत में कई स्थानों पर धूल भरी आँधियाँ चलती हुई बतायी गयी हैं। इसके अतिरिक्त, मद्रास के निकट तड़ित (lightning) चमकते हुए भी बताया गया है।

(iv) सामान्य वायुदाब से विचलन (प्रातः 8.30 बजे):-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने के लघु मानचित्र से स्पष्ट है कि इस समय देश के अधिकांश भाग में लगभग औसत बायुदाब की दशा ही पायी जाती है। मध्यवर्ती व उत्तरी भारत में कहीं-कहीं औसत से 2 मिलीबार अधिक एवं मद्रास के निकट 2 मिलीबार कम वायुदाब दर्शाया गया है। सम्पूर्ण पूर्वी व दक्षिणी-पूर्वी भाग में औसत से कम और शेष भागों से औसत से अधिक वायुदाब पाये जाते हैं। (५०-५० मानचित्र देखें)

(v) 1.5 किमी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    दक्षिण-पूर्व के लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊंचाई पर प्रवाहित हवाओं को देखने से स्पष्ट है कि यहाँ की वायु गति अधिक तीव्र है, और इसकी दिशा में भी अव्यवस्था है। सम्पूर्ण पश्चिमी भारत में उत्तर से दक्षिण तक वायु गति से 10 से 40 नॉट के बीच है। सर्वाधिक गति 40 नॉट भुज के निकट ऑकत की गई है। देश के मध्यवर्ती भागों में हवाएँ उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर की ओर से और पूर्वी भारत में अनिश्चित दिशा में प्रवाहित हो रही है। यहाँ इनकी गति धीमी है।

(vi) वायुदाब व्याख्या:-

    मानचित्र की वायुदाब व्याख्या विषम है। इस समय देश के उत्तरी और दक्षिण दोनों भागों में वायुदाब वितरण भिन्न प्रकार का है। दक्षिणी प्रायद्वीप के पश्चिमी एवं मध्यवर्ती भाग और सौराष्ट्र में समदाब रेखाएँ अपेक्षाकृत अधिक निकट हैं। मध्यवर्ती एवं सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी एवं अधिकांश उत्तरी भारत को केवल 1002 और 1004 मिलीबार की दो समभार रेखाएँ घेरे हुए हैं। देश के इस भाग से बाहर की ओर सर्वत्र वायुदाब बढ़ता हुआ है। मानचित्रों की समभार रेखाएँ अधिक स्पष्ट विकसित हैं। इस पर निम्न एवं उच्च भार केन्द्रों का अधिक व्यवस्थित विकास हुआ है। यहाँ भी पश्चिम घाट के सहारे समभार रेखाएँ तेजी से निकट होती हुई चली गई हैं।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    मानचित्र में तीन भार के केन्द्र बने हुए हैं। इनमें से दो केन्द्रों का न्यूनतम वायुभार 1001 मिलीबार है। पहला वृत्ताकार केन्द्र द० पू० मध्य प्रदेश और उत्तरी-पश्चिमी उड़ीसा की सीमा पर दूसरे विषम आकृक्ति के केन्द्र का वायु भार भी 1001 मिलीबार है, यह पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ है। अर्द्ध-विकसित निम्न भार की दशा हिमाचल प्रदेश, जम्मू और संलग्न पाकिस्तान में दर्शायी गई है।

    मानचित्र में भी सुस्पष्ट दो निम्न वायुदाब के केन्द्र विकसित हुए हैं। पहला अण्डाकार केन्द्र उत्तर-पश्चिमी राजस्थान एवं संलग्न पाकिस्तान की सीमा पर 996 मिलीबार वायुदाब दर्शाता है। इतने ही निम्न वायुदाब का दूसरा केन्द्र पूर्वी मध्य प्रदेश की सीमा पर विकसित हुआ है।

उच्च वायुदाब क्षेत्र-

     ऋतु मानचित्रों में भारतवर्ष के बाहर निकटवर्ती सागरों के सुदूर क्षेत्र में उच्च भार की दशा दर्शायी गई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की बाहरी सीमा पर 1008 मिलीबार एवं मानचित्र में लगभग इन्हीं स्थानों पर 1010 मिलीबार समभार रेखाएँ गुजरती हैं। यहीं पर ‘H’ (उच्च भार) लिखा है। इस भाँति मानचित्र में पूर्वांचल अरब सागर में सहायक उच्च भार के क्षेत्र दर्शाये गये हैं।

    उत्तरी एवं मध्य भारत में सामान्यतः निम्नदाब की दशा ग्रीष्म के लक्षणों को ही सुस्पष्ट करते हैं।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     ग्रीष्म ऋतु होने से बहुत ही कम स्थानों पर पिछले 24 घण्टों में वर्षा अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा निकोबार द्वीपसमूह के दोनों केन्द्रों पर क्रमश: 8 और 7 सेमी०, नेपाल में काठमाण्डू में । सेमी० वर्षा व माण्डले में 2 सेमी० वर्षा अंकित की गई है। केवल मेघालय और निकोबार में ही प्रेक्षण के समय वर्षा हो रही थी। अहमदाबाद केन्द्र पर हल्का कुहरा (Haze) छाया हुआ है। शेष भागों में वायुमण्डल स्वच्छ और मौसम शुष्क बताया गया है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     मानचित्र में अधिकांश अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की दशा को नहीं बताया गया है जो कि सम्भवतः सामान्य मानी गयी है। विशाखापतनम से श्रीलंका से बीच का सागर सरल एवं मन्द तरंगित (Smooth & Slight) और दक्षिण में मध्य तराँगत (mod) बताया गया है। पश्चिमी अरब सागर की दशा को भी कहीं-कहीं सरल एवं मन्द तरंगित (Slight & smooth) बताया गया है।

(ix) अधिकतम तापमान का औसत दशा में विचलन (सायं 5.30 बजे):-

      दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सारे उत्तर-पश्चिम और पूर्वी मध्यवर्ती भारत में अधिकतम ताप का औसत से विचलन 0° से 8°C तक रहा। सबसे कम 8°C (या -8°C) दिल्ली, निकटवर्ती राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर अंकित किये गये। दूसरी ओर सारे दक्षिणी भारत और पूर्वांचल के तापमान का विचलन 0° से 6°C के बीच अधिक (+) रहा। दक्षिणी-पूर्वी भारत में यह विचलन 2° से 4° के बीच और मद्रास एवं उसके उत्तरी तट पर 6°C (या +6°C) तक अधिक रहा। औसत समताप रेखा गुजरात से बांग्लादेश की ओर लहरदार मार्ग से चली गयी है। बर्मा के अधिकांश भाग में औसत से 0° से 6°C के बीच कम तापामन अंकित किया गया है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्रात: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार औसत न्यूनतम तापमान से विचलन की दशा अधिक विषम है। उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत 0° से 6°C (या -6°C) के बीच तापमान अंकित किये गये, जबकि निकट ही उत्तर, प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं विहार की सीमा पर तापमान औसत से 0° से 4°C (या +4°C) के बीच अधिक अंकित किये गये। देश के शेष भागों में तापमान औसत या औसत से कुछ अधिक अंकित किये गये।

    पहली औसत समताप रेखा उत्तरी-पश्चिमी भारत में कच्छ के तट से महाराष्ट्र की ओर मुड़कर पुनः कर्नाटक से उत्तर की ओर घूमती हुई पश्चिमी एवं मध्य उत्तर प्रदेश होकर जम्मू-कश्मीर तक चली गयी है। दूसरी औसत समताप रेखा मध्य नेपाल से पश्चिमी बिहार के दक्षिण से उड़ीसा होकर वहाँ से पुनः उ०-पु० बंगाल की ओर घूमती हुई हिमाचल की ओर चली गयी है। वर्मा के अधिकांश भाग और खाड़ी के द्वीपों में तापमान औसत के निकट अंकित किये गये हैं। (चित्र द०पू० लघु मानचित्र देखें)

वर्षा काल का ऋतु मानचित्र (शुक्रवार 6 जुलाई, सन् 1973; शक 15 आषाढ़ 1895)

(i) प्रारम्भिक सूचना:-

    वर्षाकाल के इस मुख्य मानचित्र पें शुक्रवार दिनांक 6 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजै की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र में गुरुवार दिनांक 5 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा को दर्शाया गया है। आगे के वर्णन एवं विश्लेषण में दोनों बड़े व चार लघु मानचित्रों के मौसम के विभिन्न तत्वों की विकसित एवं परिवर्तनशील दशाओं का भी सर्वत्र ध्यान रखा गया है।

(ii) वायुदाब व्यवस्था:-

     मुख्य मानचित्र की वायुदाब व्यवस्था वर्षा काल होने से विशेष प्रकार से विकसित है। सारे भारतीय उपमहाद्वीप की समभार रेखाएँ विकसित चक्रवातों का अनुसरण करती हैं। दक्षिणी भारत और निकटवर्ती सागरों पर समभार रेखाएँ रेखाओं 998, 996 और 994 मिलीबार का ही विस्तार है। समभार रेखाओं की सामान्य व्यवस्था भी इससे मिलती-जुलती है।

निम्न वायुदाब के केन्द्र और गर्त चक्र-

     मानचित्र में भारतीय उप-महाद्वीप में तीन वायुदाब के केन्द्र बताये गये हैं इनमें से सबसे महत्वपूर्ण पूर्वी भारत का विकसित चक्रवात (Depresion) है। यहाँ मानचित्र में D लिखा है। वृत्ताकार आकृक्ति के इस चक्रवात को 922 और 994 दो समभार रेखाएँ सभी ओर से एवं अगली चार समभार रेखा तीन ओर से घेरे हुए हैं। उपर्युक्त सभी सम्भार रेखाएँ एक-दूसरे से प्रायः समानान्तर हैं। इनकी प्रवणता पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व की ओर अधिक तीव्र है। मानचित्र में अंकित इसी चक्रवात के अध्ययन से स्पष्ट है कि यह धीमी गति से भीतर की ओर बढ़ रहा है। इसमें गर्त चक्र या चक्रवात की भीतरी समभार रेखा 900 मिलीबर है। यह वायुदाब सामान्य से बहुत निम्न है।

    दूसरे निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास सौराष्ट्र के निकट हुआ है, जहाँ कि 995 मिलीबार के घेरे में L (निम्न भार) लिख है। इसे एवं पूर्व के चक्रवात दोनों को ही वृहद अण्डाकार में 994 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। ये समतल भाग में दो गर्ती जैसी प्रतीत होती है, क्योंकि दोनों ही निम्न भार के बीच कोई भी समभार रेखा नहीं गुजरती है। इस वृहद व्यवस्था के उत्तर और दक्षिण की ओर वायुदाब बराबर बढ़ता जाता है। तीसरे निम्न वायुदाब के केन्द्र का विकास पाकिस्तान के सुदूर पश्चिम में एवं ईरान की सीमा पर हुआ है।

     ऋतु मानचित्र में कटक के निकट के चक्रवात या गर्त चक्र के अतिरिक्त राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी निम्न वायुदाब केन्द्रों का विकास हुआ है। इनमें से पूर्वी निम्न भार स्फान (wedge) की भाँति फैला हुआ है। सभी को 990 मिलीबार समभार रेखा प्रायः वृत्ताकार घेरे हुए हैं।

उच्च वायुदाब के केन्द्र:-

   ग्रीष्मकालीन वर्षा काल के इस ऋतु मानचित्र के हिन्द महासागर या मानचित्र के सुदूर दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व और उत्तर में कश्मीर के उत्तरी भाग में उच्च वायुदाब की दिशा का विकास बताया गया है। इसमें हिन्द महासागर में 1006 मिलीबार रेखा और कश्मीर में 1002 मिलीबार रेखा पूर्व-पश्चिम दिशा में गयी है। इस प्रकार दक्षिणी उच्च वायुदाब अधिक गहन और विकसित है। इस कारण भी 8.30 बजे वाले ऋतु मानचित्र में दक्षिणी भारत में समभार रेखाएँ अधिक निकट हैं।

     सामान्यतः समभार रेखाओं की दिशा पूर्व-पश्चिम है, और सागर पर यह अधिक नियमित है। मध्यवर्ती और पूर्वी भारत में यह निम्न वायुदाब के केन्द्रों की ओर मुड़ गयी है। इसी कारण सुदूर पूर्व की समभार रेखाओं की दिशा उत्तर-दक्षिण हो गयी है।(iii) सामान्य वायुदाब से विचलन:-

     प्रातः 8.30 बजे के सम्बन्धित मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग को छोड़ सर्वत्र औसत से कम वायुदाब पाया जाता है। यही नहीं कर्क रेखा में दक्षिण में यह औसत से 4 से 8 मिलीबार तक कम है। सबसे कम वायुदाब-8 मिलीबार दक्षिणी सौराष्ट्र, कोंकण के तट और निकटवर्ती सागर एवं पूर्वी भारत में उड़ीसा के तट व निकटवर्ती सागर पर पाया जाता है।

    स्पष्टतः इसका सीधा सम्बन्ध उस निम्न वायुदाब व्यवस्था से है जो कि इन केन्द्रों के निकट ही विकसित हुए हैं। औसत से 6 मिलीचार समदाब रेखा उपर्युक्त दोनों केन्द्रों पर, -8 मिलीबार समुदाब रेखा को घेरे हुए हैं। औसत वायुदाब की 0 समभार रेखा पाकिस्तान से उत्तरी राजस्थान होकर पश्चिमी भारत को घेरते हुए कश्मीर की ओर मुड़ गयी है। पूर्वी भारत में यद्यपि औसत से कुछ कम वायुदाब (-2 से -4 तक) पाया जाता है परन्तु यहाँ इसकी प्रवणता धीमी है।

(iv) वायु दिशा एवं वायु वेग:-

      सारे भारतीय उप महाद्वीप में इस समय स्पष्टतः दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवाएँ चल रही हैं। ये हवाएँ दक्षिणी भारत में दक्षिण-पश्चिम, उत्तरी बंगाल की खाड़ी में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व और देश के शेष भागों में पूर्व दिशा से चल रही है। पश्चिमी तट एवं बंगाल की खाड़ी के तट पर इन हवाओं का वेग देश के अन्य भागों की तुलना में अधिक है।

    यहाँ हवा की गति 10 से 30 नॉट के बीच है। 30 नॉट की गति मार्मा गोआ और पूना के निकट अंकित की गयी है। देश के शेष भागों में वायु वेग सामान्यतः 0 से 10 नॉट प्रति घण्टा के बीच है। अधिकांश भागों में वायु वेग 5 नॉट से भी कम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में सर्वाधिक वायु वेग उत्तरी लक्षद्वीप में 40 नॉट प्रति घण्टा विशेष उल्लेखनीय है।

    पूर्वी भारत के चक्रवात के कारण यहाँ वायु दिशा औसत दिशा से भिन्न है और स्थानीय रूप से प्रभवित हुई है।

(v) 1.5 कि० मी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    इस ऊँचाई पर देश के अधिकांश विक्षोभ मण्डल में वायु तीव्र गति से चल रही है। दक्षिणी भारत में इसकी गति 30 से 70 नॉट है जबकि पूर्वी भारत में 10 से 30 नॉट एवं सबसे धीमी गति उत्तरी-पश्चिमी भारत में 5 से 15 नॉट के बीच है।

    सबसे तेज गति से वायु मछलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) में 70 नॉट एवं दक्षिणी लक्षद्वीप में 65 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गयी है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ऊँचाई पर भी वायु की दशा सर्वत्र दक्षिण-पश्चिमी मानसून हवाओं के अनुसार ही है।

(vi) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

    वर्षाकाल होने से देश के सभी भागों में मेघ छाये हुए हैं। कोटा, डाल्टेनगंज, लखनऊ और तेजपुर ही अपवाद स्वरूप ऐसे मौसम केन्द्र हैं, जहाँ कि मेघाच्छन्न 1/8 से कम है। सर्वाधिक मेघाच्छन्नता दक्षिणी भारत में पायी जाती है।

    यहाँ के अधिकांश केन्द्र पूर्ण मेघाच्छादित बताये गये हैं। इनमें से अधिकांश केन्द्रों पर या तो वर्षा हो रही है या पिछले 24 घण्टों में वर्षा हुई है। शेष भारत में मेघाच्छन्नता अनिश्चित है। 7/8 या अधिक मेघाच्छन्नता पश्चिमी भारत में उदयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, जयपुर, देहरादून, शिमला एवं गंगा के डेल्टा, उड़ीसा और खाड़ी के द्वीपों में दर्शायी गयी है।

    सारे ऋतु मानचित्र में एक भी केन्द्र ऐसा नहीं है जहाँ कि आकाशीय दशा अनिश्चित बतायी गयी हो। पूर्व दिन की संध्या के मानचित्र में भी मेघाच्छन्नता प्रायः इसी भाँति ही है।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     वर्षा काल, अधिक मेघाच्छन्नता और चक्रवात सभी व्यापक वर्षा के लिए अनुकूल दशाएँ उत्पन्न करते हैं। ऋतु मानचित्र में पिछले 24 घण्टों में दूर-दूर तक वर्षा हुई भी है। वर्षा की मात्रा प्रत्येक केन्द्र के वृत्त के दक्षिण-पूर्व दिशा में अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा पश्चिमी तट पर हुई है। यहाँ पिछले 24 घण्टों में पूना में 18, कोलावा में 16, होनावर में 14, रत्नागिरी और कोल्हापुर में 11-11, मंगलौर एवं मुम्बई में 9.9 और शेष स्थानों पर 3 से 8 सें० मी० के बीच वर्षा ऑकत की गयी है।

    मुख्य पठार पर नागपुर में 9 से० मी० और शेष भागों में ०.25 से 3 से० मी० के बीच, बंगाल की खाड़ी के उत्तरी तट पर 1 से 3 से० मी० के बीच, खाड़ी के द्वीपों में क्रमशः 7 से 11 से० मी० और उत्तरी लक्षद्वीप में 3 से० मी० वर्षा अंकित की गयी। इस मानचित्र में उत्तरी एवं उत्तरी-पश्चिमी भारत में वर्षा प्रायः नहीं के बराबर हुई है। यहाँ सबसे अधिक वर्षा झालावाड़ में 3 से० मी०, उदयपुर और जोधपुर में 1-1 से० मी० अंकित की गयी।

    वर्तमान में (6 जुलाई, 1973) को प्रातः 8.30 बजे) सारे पश्चिमी तट पर एवं खाड़ी द्वीपों में दूर-दूर तक वर्षा हो रही है। मुख्य पठार और उत्तरी बंगाल की खाड़ी में कहीं-कहीं वर्षा और बौछारें हो रही हैं, देश के शेष भागों में इस समय वर्षा प्रायः नहीं हो रही है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में समभार रेखाएँ पास-पास होने से यहाँ तेज पवन चल रही है। सागर में सभी स्थानों पर 20 से 25 नॉट के बीच पवन बह रहा है अतः सामान्य सागर की दशा भी प्रतिकूल है।

    अरब सागर में अशान्त (Rough) और बंगाल की खाड़ी में अति अशान्त (V. Rough) से उत्तंग तरंग गति (V. High) के बीच सागर दशा अंकित की गयी है। यद्यपि अरब सागर में केवल एक स्थान पर और बंगाल की खाड़ी में दो स्थानों पर ही सागर की दशा अंकित की गयी है। परन्तु इसमें ही सागर की दशा का स्पष्ट आभास हो जाता है।

(ix) अधिकतम तापमान का सामान्य दशा से विचलन (सायं 5.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार अधिकांश दक्षिणी और उत्तरी-पश्चिमी भारत में अधिकतम तापमान औसत से कम अंकित किये गये। सबसे कम -4°C उत्तरी आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी कश्मीर और निकटवर्ती पाकिस्तान में अंकित किये गये। औसत से अधिक तापमान +4°C हाड़ौती (राजस्थान) और मालवा (मध्य प्रदेश) एवं उत्तरी-पूर्वी उत्तर प्रदेश में अंकित किये गये।

    अधिकतम औसत या 0°C विचलन वाली समताप रेखा देश की तीन स्थानों से होकर गुजरती है। पहली दक्षिणी-पश्चिमी कर्नाटक से केरल होती हुई श्रीलंका की तरफ चली गयी है। दूसरी सौराष्ट्र, पूर्वी गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, उत्तरी-पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा और दक्षिणी-पश्चिमी बंगाल होती हुई खाड़ी की ओर मुड़ गयी है और तीसरी पाकिस्तान से पश्चिमी व उत्तरी राजस्थान की सीमा से पूर्व की ओर मुड़कर पश्चिम उत्तर प्रदेश से हिमालय की ओर मुड़ गयी है। इस प्रकार औसत अधिकतम तापमान की दशा इस समय प्रायः विषम है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्राय: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के अधिकांश मध्यवर्ती, उत्तरी-पूर्वी और सुदूर पूर्वी भागों में न्यूनतम तापमान औसत से अधिक से अधिक और शेष दक्षिण पठार और उत्तरी-पश्चिम भारत में औसत से कम तापमान अंकित किये गये हैं।

     औसत दशा से कहीं भी +2℃ या -2°C से अधिक का विचलन नहीं पाया जाता। अधिकांश दक्षिणी पठार और मध्यवर्ती भारत में यह विचलन इससे भी कम है। औसत तापमान रेखा रेखा सर्वाकार मार्ग से प्रथम उत्तर से दक्षिण की ओर जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र होकर पुनः उत्तर-पूर्व की ओर कर्नाटक, महाराष्ट्र, पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तरी बंगाल व बंग्लादेश होती हुई सुदू पूर्व की ओ चली गयी है।

34. Climograph and Hythergraph

Climograph and Hythergraph



क्लाइमोग्राफ

         Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था।

Climograph X-अक्ष पर Relative Humidity (सापेक्षिक आर्द्रता) को और Y-अक्ष पर Wet Bulb Temperature (आर्द्र बल्ब तापमान) को ध्यान में रखकर मानचित्र या ग्राफ बनाया जाता है।

इंग्लैण्ड के निवासी औपनिवेशिक काल में Climograph का उपयोग वैश्विक स्तर पर निवास करने योग्य स्थान के निर्धारण में किया कर‌ते थे।

जबकि हीदरग्राफ का प्रयोग स्थानीय स्तर पर निवास करने योग्य स्थान का निर्धारण किया करते थे।

प्रश्न 1. क्लाइमोग्राफ (Climograph) के अभिप्राय को समझाते हुए दिए आँकड़ों के आधार पर भोजपुर का क्लाइमोग्राफ बनाइए।

 

Months JAN. FUB. MAR. APR. MAY. JUN. JUL. AUG. SEP. OCT. NOV. DEC.
आर्द्र-वल्ब तापमान (0°C) 13 15 17 19 22 24 26 25 23 20 18 14
आपेक्षिक आर्द्रता 40 30 14 10 12 42 71 74 74 60 42 40

उत्तर-

       Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था। इनके द्वारा क्लाइमोग्राफ का विकास शीत कटिबन्ध में निवास करने वाले यूरोपियों के लिए उष्ण कटिबन्ध में निवास करने की संभावना को ध्यान में रख कर किया गया।

     इससे किसी स्थान के आर्द्र बल्ब तापमान (Wet bulb temperature) तथा प्रतिशत में सापेक्षिक आर्द्रता (Relative humidity) की आवश्यकता होती है इन्हीं दोनों आँकड़ों की सहायता से ग्राफ पेपर पर स्केल के अनुसार x-अक्ष पर सापेक्षिक आर्द्रता तथा y-अक्ष पर आर्द्र बल्ब तापमान को प्रदर्शित करके, प्रत्येक महीना के लिए निर्देशांक से 12 बिन्दु प्राप्त करके उन्हें क्रम से रेखा में मिला देते हैं। इससे क्लाइमोग्राफ का निर्माण हो जाता है।

     टेलर महोदय ने एक निवास्यता मापक्रम का भी निर्माण किया है। जिससे हमें वहाँ की जलवायु सुखद है या दुःखद है, इसका भी आसानी से ग्राफ देखकर पता चलता है।

निवास्यता मापक्रम (Hability Scale)

क्रम सुखद या दुःखद के प्रकार तापमान
1. अत्यल्प दुःखद (Very rarely uncomfortable) 40° से 45° F (4° से 7° C)
2. आदर्श (Ideal) 45° से 55° F (7° से 13° C)
3.

अत्यल्प दुःखद (Very rarely uncomfortable)

55° से 60° F (13° से 16° C)
4. बहुधा दुःखद (Sometimes uncomfortable) 60° से 70° F (16° से 19° C)
5.

बहुधा दुःखद (Often comfortable)

65° से 70° F (19° से 21° C)
6. हमेशा दुःखद (Usually uncomfortable) 70° से 75° F (21° से 24° C)

          टेलर ने कुछ विशेष प्रकार की जलवायु को भी दर्शाया है जो क्लाइमोग्राफ के चारों कोनों पर होता है। इसके चार प्रकार हैं:

1. झुलसता हुआ (SCORCHING):-

        NW कोने पर, आर्द्र बल्ब तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् उष्ण-शुष्क जलवायु।

2. उमसदार (MUGGY):-

       NE कोने पर तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् उष्णार्द्र जलवायु।

3. शीतार्द्र (RAW):-

      SE कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् ठंडी आर्द्र जलवायु।

4. शीत-शुष्क (KEEN):-

       SW कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् शीत व शुष्क जलवायु।

    इस प्रकार क्लाइमोग्राफ की आकृतियों से विभिन्न स्थानों की जलवायु में भिन्नता का पता चलता है। जैसे- शुष्क क्षेत्रों के लिए क्लाइमोग्राफ की आकृति तकुए की भाँति होती है, भूमध्यसागरीय जलवायु हेतु विकर्ण तथा मानसूनी जलवायु हेतु उल्टे विकर्ण की आकृति बनती है। जिससे विभिन्न स्थानों की जलवायु का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

CLIMOGRAPH OF BHOJPUR

रचना विधि:

      एक ग्राफ कागज लेकर क्षैतिज रेखा खींचा जो X-अक्ष हुआ। इस पर समान दूरी के अंतर पर आपेक्षिक आर्द्रता के आँकड़ों के अनुसार मापनी निश्चित कर 0, 10, 20, 30, 40, 50, 60, 70, 80 लिखा। इसके नीचे मोटे अक्षरों में RELATIVE HUMIDITY (In %) लिख दिया। X-अक्ष पर लंब डाला और Y-अक्ष बनाया। अब भोजपुर के आर्द्र बल्ब तापमान (Wet bulb Temperature) के आँकड़ों के अनुसार मापनी निश्चित कर 0, 10, 20, 30 व 40 लिखा तथा इसके समीप ही WET BULB TEMPERATURE (°C) लिख दिया।

    अब January के आर्द्र बल्ब तापमान 13°C और आपेक्षिक आर्द्रता 40% के आँकड़ों को मिलाते हुए सीधी रेखाएँ खीचीं। जिस बिन्दु पर ये दोनों रेखाएँ मिलती हैं उसे चिह्नित कर J लिखा। इसी प्रकार Febuary, March से November तथा December तक के आर्द्र बल्ब तापमान और आपेक्षिक आर्द्रता के आँकड़ों को मिलाते हुए खीचें बिन्दुओं पर क्रमशः F, M ……. N व D लिखा।

     अब सरल रेखा द्वारा January के बिन्दु को Febuary के बिन्दु से, Febuary के बिन्दु को March के बिन्दु से… November के बिन्दु को December के बिन्दु से तथा अंततः December के बिन्दु को January के बिन्दु से मिलाते हुए 12 रेखाएँ खींची। इस प्रकार प्राप्त 12 भुजी आकृति ही हमारा अभीष्ट Climograph होगा। Climograph के NW कोने पर SCORCHING, NE कोने पर MUGGY, SE कोने पर RAW तथा SW कोने पर KEEN लिख दिया।

Climograph



हीदरग्राफ

          हीदरग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम टेलर महोदय ने किया था।

हीदरग्राफ में जलवायु के आँकड़े को प्रदर्शित किया जाता है।

हीदरग्राफ में X-अक्ष पर वर्षा और Y-अक्ष पर तापमान को दिखाया जाता है।

हीदरग्राफ का प्रयोग औपनिवेशिक काल में अँग्रेज लोग बड़े पैमाने पर किया करते थे।

हीदरग्राफ पर बहुत अधिक गर्म, बहुत अधिक ठण्डा, बहुत अधिक सूखा और बहुत अधिक आर्द्रता के साथ-2 अधिवासित होने के लिए उपयुक्त क्षेत्र को प्रदर्शित किया जाता था।

प्रश्न 1. हीदरग्राफ (Hythergraph) के अभिप्राय को समझाते हुए दिये गये आँकड़ों के आधार पर भोजपुर के हीदरग्राफ की रचना कीजिए।

Months JAN. FUB. MAR. APR. MAY. JUN. JUL. AUG. SEP. OCT. NOV. DEC.

औसत मासिक तापमान (0°C)

17 20 27 30 32 31 30 28 28 27 23 18
औसत मासिक वर्षा (cm) 2 2 1 1 3 12 28 25 18 5 1 1

उत्तर-

      हीदरग्राफ (Hydhergraph) एक ऐसा आरेख है जिसमें वर्षा और तापमान के सम्बन्धों एक साथ को प्रदर्शित किया जाता है। इसमें वर्षा तथा तापमान के मासिक वितरण को प्रदर्शित किया जाता है।

    इसमें क्षैतिज भुजा (X-axis) पर मिलीमीटर या इंचों में वर्षा और लम्बवत् भुजा (Y-axis) पर °F या °C में तापमान बताये जाते हैं। टेलर का हीदरग्राफ पहले के विद्वानों फास्टर व हटिंगटन द्वारा बनाया गया क्लाइमोग्राफ ही है। इसमें मासिक वर्षा और शुष्क तापमान को टेलर के क्लाइमोग्राफ की भाँति प्रतिमास अंकित कर बारह बिन्दु प्राप्त करते हैं। इन्हें आपस में जोड़कर बन्द आकृति बना दी जाती है।

     इसके द्वारा किसी स्थान विशेष की वर्षा और वाष्पीकरण के सम्बन्ध को समझाकर वास्तविक जल उपलब्धता को समझा जा सकता है। टेलर के हीदरग्राफ में तापमान और वर्षा की सीमा नहीं दी गई है। जिन भागों में गर्मियों में वर्षा होती है वाष्पीकरण भी अधिक होने से वास्तविक जल उपलब्धता तेजी से घटने लगती है।

HYTHERGRAPH OF BHOJPUR

रचना विधि:

     एक ग्राफ कागज लेकर आधार के समानांतर एक रेखा खींचा जो X-अक्ष होगा। इस अक्ष पर एक लंबवत् रेखा खींचा जो Y-अक्ष होगा। X-अक्ष पर औसत मासिक वर्षा के आँकड़ों के अनुसार समान दूरी के अंतर पर मापनी निश्चित करके 0, 5, 10, 15, 20, 25, 30 व 35 की संख्याएँ लिखीं। इनके नीचे मोटे अक्षरों में AVERAGE MONTHLY RAINFALL (CM) लिख दिया।

    अब Y-अक्ष पर औसत मासिक तापमान के आँकड़ों को आधार मानकर मापनी निश्चित करके 0, 5, 10, 15, 20, 25, 30 व 35 की संख्याएँ लिख दीं। इसके ऊपर मोटे अक्षरों में AVERAGE MONTHLY TEMPERATURE (°C) लिख दिया।

     अब January के तापमान 17°C और वर्षा 2 cm के आँकड़ों को मिलाते हुए रेखाएँ खींची। जहाँ ये दोनों रेखाएँ मिलती हैं, उस बिन्दु को चिह्नित क J लिखा। इसी प्रका Febuary, March….. November, December के तापमान एवं वर्षा के आँकड़ों के आधार पर 12 बिन्दु चिह्नित करके संबंधित बिन्दुओं क्रमशः F, M, N, तथा D लिखा।

      अब January के बिन्दु को सरल रेखा द्वारा Febuary के बिन्दु से, Febuary के बिन्दु को March के बिन्दु से November के बिन्दु को December के बिन्दु से तथा अंततः December के बिन्दु को January के बिन्दु से मिलाते हुए 12 भुजी बहुभुज बनाया जो अभीष्ट Hythergraph हुआ।

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