Category BA SEMESTER/PAPER III

36. Distribution Maps- Dot, Choropleth and Isopleth Method (वितरण मानचित्र: बिंदु, वर्णमात्री तथा सममान रेखा विधि)

Distribution Maps- Dot, Choropleth and Isopleth Method

(वितरण मानचित्र: बिंदु, वर्णमात्री तथा सममान रेखा विधि)



वितरण मानचित्र:-

          प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक वातावरण के किसी तत्व का दिये हुए क्षेत्र में वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को वितरण मानचित्र कहते हैं।

           वितरण मानचित्र बनाने की विधियों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(1) अमात्रात्मक विधियाँ (Non-Quantitative Methods) तथा

(2) मात्रात्मक विधियाँ (Quantitative Methods)।

    अमात्रात्मक विधियों के द्वारा बनाये गये वितरण मानचित्रों को गुण प्रधान मानचित्र कहते हैं तथा मात्रात्मक विधियों के अनुसार बनाए गए वितरण मानचित्र को सांख्यिकीय मानचित्र कहते हैं।

      गुण प्रधान मानचित्रों में किसी तत्व या वस्तु का वितरण दिखाते समय वितरण के घनत्व पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके विपरीत सांख्यिकीय मानचित्रों का मूल उद्देश्य किसी तत्व या वस्तु के मूल्य, मात्रा या घनत्व की क्षेत्रीय भिन्नता को चित्रित करना होता है। दोनों प्रकार के मानचित्रों का यही एकमात्र अंतर है।

1. अमात्रात्मक विधियां

(i) रंगारेख विधि (Colour-Patch Method):-

         अमात्रात्मक वितरण मानचित्र बनाने की यह एक सरल एवं लोकप्रिय विधि है। इस विधि के अनुसार बनाए गए वितरण मानचित्रों को रंगारेख मानचित्र (Colour Patch Map), रंगक मानचित्र (Tint Map), वर्ण मानचित्र (Colour Map) तथा कोरोकोमैट्रिक मानचित्र (Chorochomatic Map) आदि, भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। उन मानचित्रों में भिन्न-भिन्न तत्वों या वस्तुओं के वितरण क्षेत्रों को रंग भरकर स्पष्ट करते हैं।

      प्राकृतिक प्रदेशों, राजनीतिक व प्रशासनिक क्षेत्रों, भूमि उपयोग के प्रकारों, भूवैज्ञानिक क्षेत्रों तथा प्राकृतिक वनस्पति व मिट्टियों के प्रकारों को प्रदर्शित करने के लिए प्रायः इस विधि का प्रयोग करते हैं।

  • रंगारेख मानचित्रों में अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के अनुसार निर्धारित रंग प्रयोग किये जाते हैं।
  • प्राकृतिक प्रदेश प्रदर्शित करने वाले मानचित्रों में पर्वतीय क्षेत्रों को गहरे भूरे रंग से, पठारी भागों को हल्के भूरे रंग से तथा मैदानों को पीले रंग से दिखाते हैं।
  • वनस्पति मानचित्रों में वनों के लिए हरे रंग का घास के मैदानों के लिए पीले रंग का तथा मरूस्थलीय वनस्पति के लिए भूरे रंग का प्रयोग होता है।

(ii) सामान्य छाया विधि (Simple Shade Method):-

    इसमें रंगों के स्थान पर काली स्याही से बनायी गयी छायाएं प्रयोग में लाते हैं। इस मानचित्र का एकमात्र उद्देश्य भिन्न-भिन्न प्रकार के क्षेत्रों को दिखाना होता है तथा इन मानचित्रों में प्रयुक्त छायाओं का वितरण के घनत्व से कोई संबंध नहीं होता है। इसके विरीत वर्णमात्री मानचित्रों में वितरण के घनत्व के अनुसार छायाओं को हल्का या भारी करना आवश्यक होता है। सामान्य छाया विधि के अनुसार ग्रेट ब्रिटेन में कृषि भूमि उपयोग को दिखलाया जाता है।

  • पुस्तकों में रंगारेख मानचित्रों के स्थान पर सामान्य छाया मानचित्रों की सहायता से भिन्न-भिन्न प्रकार के क्षेत्रों, जैसे- जलवायु, कटिबंध, कृषि पेटियाँ, फसलों के क्षेत्र, मिट्टियों के प्रकार, औद्योगिक पेटियाँ व खनिज क्षेत्र आदि का वितरण दिखलाते हैं।

(iii) चित्रीय विधि (Pictorial Method):-

    इस विधि में जिन-जिन वस्तुओं के स्थान, क्षेत्र या वितरण दिखाने होते हैं, उन वस्तुओं के वास्तविक फोटोचित्रों पर आधारित रेखाचित्रों को मानचित्र में यथा स्थान बना दिया जाता है।

  • किसी देश के दर्शनीय स्थानों, पर्यटक केंद्रों, वेश-भूषा के प्रकारों, जनजातियों तथा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक वैभव को प्रायः इसी विधि के द्वारा दर्शाया जाता है।
  • पर्यटन कार्यालयों एवं बड़े-बड़े रेलवे स्टेशनों पर इस प्रकार के चित्रीय मानचित्र देखे जा सकते हैं।

(iv) वर्णप्रतीकी या प्रतीक विधि (Choro-Schematic or Symbol Method):-

   प्रतीक या चिह्नों की सहायता से वितरण प्रदर्शित करने की विधि को वर्णप्रतीकी या प्रतीक विधि कहते हैं। इस विधि में जिन वस्तुओं का वितरण दिखलाना होता है उन सबके अलग-अलग चिह्न या प्रतीक निश्चित करके उन्हें मानचित्र में यथा स्थान अंकित कर देते हैं।

  • चित्रमय प्रतीकों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इन्हें देखने मात्र से प्रदर्शित की गई वस्तुओं का बोध हो जाता है तथा मानचित्र के संकेत में प्रतीकों का अर्थ देखने की आवश्यकता नहीं है।

(v) नामांकन विधि (Noming Method):-

     यह विधि मूलाक्षर प्रतीक विधि के समान होती है, केवल इतना अंतर है कि मूलाक्षर विधि में प्रदर्शित की जाने वाली वस्तुओं के नाम के प्रथम अक्षर या अक्षरों को प्रतीक के रूप में प्रयोग करते हैं जबकि नामांकन विधि में मानचित्र पर वस्तुओं के यथास्थान पूरे नाम लिखे जाते हैं।

2. मात्रात्मक विधियाँ

     किसी तत्व या वस्तु के मूल्य, मात्रा अथवा घनत्व की क्षेत्रीय भिन्नता प्रकट करने वाली सांख्यिकीय मानचित्रों जैसे, वर्षा-मानचित्र, जनसंख्या मानचित्र, तथा प्रति हेक्टेयर उत्पादन वाले कृषि मानचित्र आदि की रचना करने के लिए मात्रात्मक विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं। इस प्रकार के वितरण मानचित्रों का भूगोल में काफी महत्त्व है। इन विधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i)  वर्णमात्री विधि (Choropleth Method)

(ii) सममान रेखा विधि (Isopleth Method)

(iii) बिंदु-विधि (Dot Method)

(iv) सांख्यिकीय आरेख विधि (Statistical Diagram Method)



(i)  वर्णमात्री विधि (Choropleth Method)



       इस विधि द्वारा प्रशासकीय इकाइयों को आधार मानकर पदार्थों की मात्रा तथा घनत्व का वितरण, मानचित्र पर एक ही रंग की कई आभाओं तथा साधारण रेखा छाया द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र दी हुई सांख्यिकीय तालिका की सहायता से खींचे जाते हैं। सर्वप्रथम, इस तालिका की सहायता से विभिन्न प्रशासकीय इकाइयों के लिए क्रमबद्ध घनत्व आंकड़ों (Graded Density Figures) की तालिका निश्चित कर लेते हैं। तत्पश्चात् एक रंग की विभिन्न आभाओं तथा रेखाओं द्वारा व विभिन्न छायाओं द्वारा पदार्थों के घनत्व एवं मात्रा को प्रदर्शित कर देते हैं।

       ऊंचाई दर्शाने के लिए रंग छाया विधि अधिक उपयोगी है, परन्तु अन्य पदार्थों के घनत्व एवं मात्रा का वितरण रेखाओं द्वारा छाया देकर प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र छाया-वितरण अथवा वर्णमात्री वितरण-मानचित्र (Choropleth Maps) कहलाते हैं। वर्णमात्री-मानचित्र (Choropleth Maps) द्वारा कृषि, उद्योग-धन्धों तथा यातायात सम्बन्धी आंकड़े प्रदर्शित किए जाते हैं।

  • इन मानचित्रों में घनत्व आदि की भिन्नता को राजनीतिक अथवा प्रशासकीय क्षेत्रों के आधार पर प्रदर्शित किया जाता है।
  • इस प्रकार के मानचित्र में सबसे कम घनत्व वाले क्षेत्र में सबसे हल्की छाया, उससे अधिक घनत्व वाले क्षेत्र में और भारी छाया तथा सबसे अधिक घनत्व वाले क्षेत्र में सबसे भारी छाया भरी जाती है।

     छाया विधि द्वारा पदार्थों की मात्रा एवं घनत्व का प्रदर्शन करने के लिए विभिन्न घनत्वों एवं मात्राओं पर आधारित एक छाया-तालिका (Index to Shading) बना ली जाती है। यह छाया तालिका क्रमानुसार (Graded) होती है। तत्पश्चात् विभिन्न घनत्व के क्षेत्रों में इस तालिकानुसार छाया दी जाती है। उदाहरण के लिए, वर्षा के घनत्व को प्रदर्शित करने के लिए 75 सेमी० से कम, 76 सेमी० से 100 सेमी० तक, 101 सेमी० से 135 सेमी० तक वर्षा के विभिन्न घनत्वों के लिए घनत्व की रेखाएं खींच देते हैं। 135 सेमी० अथवा सबसे अधिक घनत्व को काले रंग अथवा अत्यधिक पास खींची गई रेखाओं द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

     यहां एक तत्व अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वह यह है कि केवल वही मानचित्र कोरोप्लेथ मानचित्र (Choropleth Maps) कहलाते हैं जिनमें वितरण प्रशासकीय सीमाओं (Administrative Boundaries) के अनुसार, उन सीमाओं को मानचित्र में खींचकर प्रदर्शित किया जाता है। ऐसे मानचित्रों में चाहे एक ही रंग की विभिन्न आभाओं द्वारा वितरण का घनत्व प्रदर्शित किया जाए चाहे रेखा छाया द्वारा घनत्व प्रदर्शित किया जाये, घनत्व प्रशासकीय इकाइयों के अनुसार मानचित्र में भरा जाता है। अतः ऐसे मानचित्रों (Choropleth Maps) में प्रशासकीय इकाइयां खींचना आवश्यक होता है।

      इस विधि द्वारा पदार्थों की मात्रा तथा घनत्व का प्रदर्शन प्रायः अशुद्ध रहता है। इसका कारण यह है कि घनत्व के विभिन्न क्षेत्र अधिकतर राजनीतिक सीमाओं का अनुसरण करते हैं। इसके अतिरिक्त समस्त क्षेत्र में पदार्थ के समान घनत्व का भ्रम होता है, यद्यपि अधिक न्यून घनत्व भी उस क्षेत्र में हो सकता है। 



(ii) सममान रेखा विधि (Isopleth Method)



        इस विधि द्वारा रेखाओं द्वारा घनत्व अथवा मात्रा का वितरण प्रदर्शित करते हैं। पदार्थों के समान मात्रा एवं घनत्व वाले स्थानों को रेखाओं द्वारा मिला देते हैं। इन रेखाओं को सममान रेखाएं (Isopleth) कहते हैं।

     दूसरे शब्दों में मानचित्रों पर किसी वस्तु के समान मूल्य या घनत्व वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएँ को सममान रेखाएँ कहा जाता है। 

(नोट : सम = बराबर, मान = मूल्य अर्थात मानचित्र पर किसी तत्व या वस्तु के समान मूल्य / घनत्व) 

    उदाहरण के लिए, समान तापक्रम वाले स्थानों को मिलाने वाली समताप रेखाएं (Isotherms), समान वायु दाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएं समदाब रेखा (Isobars), तथा समान वर्षा वाले स्थानों को मिलाने वाली समवर्षा रेखाएं (Isohyets) कहलाती हैं। समोच्च रेखाएं (Contours) भी इसी प्रकार की रेखाएं होती हैं।

     इसी प्रकार कृषि के समान उपज वाले स्थानों को मिलाने के लिए रेखाएं खींचकर Agricultural Isopleth Maps आदि बना सकते हैं, परन्तु इस विधि का उपयोग जलवायु के तत्वों के प्रदर्शन के लिए किया जाता है।

    इस विधि द्वारा निर्मित मात्रात्मक वितरण-मानचित्र भूगोल में अति उपयोगी होती हैं। समान रेखाएं किसी देश अथवा क्षेत्र को विभिन्न मात्रा एवं घनत्व के क्षेत्रों में विभाजित कर देती हैं। उदाहरण के लिए, समवृष्टि रेखाओं द्वारा अधिक एवं न्यून वर्षा क्षेत्रों के विषय में मानचित्र को एक ही बार देखने से वर्षा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। सममान रेखाएं (Isopleth Lines) शुद्ध आंकड़ों के प्राप्त होने पर ही खींची जा सकती हैं। इन रेखाओं के खींचने में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए :

  • सममान रेखाओं का मान निश्चित अन्तिम मान शून्य से प्रारम्भ करके निर्धारित करते हैं।
  • सममान रेखाएं निश्चित अन्तर पर खींची जाती हैं।
  • पास-पास खिंची सममान रेखाएं वितरण के अधिक परिवर्तन की द्योतक हैं। इसी प्रकार दूर-दूर खिंची समरेखाएं वितरण का न्यून परिवर्तन दर्शाती हैं।

मानचित्रों पर दर्शाएँ जाने वाली प्रमुख सममान रेखाएँ

1. आइसोनीफ (Isonif)⇒ समान हिम वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनीफ कहते है।

2.  सममेघ रेखा या आइसोनेफ (Isoneph)⇒ समान मेघ आच्छादन वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनेफ कहते है।

3. आइसो बाथ (Isobath)⇒ समुद्र के अंदर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाकर खींचे जाने वाली रेखा को आइसो बाथ कहते है।

4. आइसो ब्रांट (Isobront)⇒ एक समान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

5. समपवनवेग रेखा या आइसोटैक (Isotach)⇒ मौसम मानचित्र पर पवन की समान गति वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखा।

6. समताप रेखा (Isotherm)⇒ समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

7. आइसोपैच (Isopach)⇒ हिमानी अथवा चट्टानों के समान मोटाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

8.  समकाल रेखा या आइसोक्रोन (Isochrone)⇒ किसी बिंदु से एक समान समय में तय कि गई दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

9. समदिक्पाती रेखा (Isogone)⇒ समान चुंबकीय झुकाव वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

10. समलवणता रेखा (Isohaline)⇒ समुद्री जल में खारेपन की समान मात्रा मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा

11. आइसोरेमे (Isoraime)⇒ पाला गिरने की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

12. आइसोस्टेड (Isostade)⇒ समान अधिवासीय संख्या को मिलाने वाली रेखा।

13. समभूकंपीय (Isoseismal)⇒ भूकंपीय तीव्रता की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

14. सहभूकंप रेखा या होमोसिस्मल (Homoseismal) ⇒ भूकंप के एक ही समय आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

15. आइसोथेरे (Isothere)⇒ ग्रीष्मकाल के समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

16. समदाब रेखा (Isobars)⇒ समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

17. इसालोबार (Isallobar)⇒ एक विशिष्ट अवधि में वायुमंडलीय दबाव में होने वाले समान परिवर्तन के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

18. आइसोहेल (Isohel)⇒ सूर्य के प्रकाश की समान अवधि वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

19. समोच्च रेखा या आइसोहाइप (Contour lines or Isohypes)⇒ समुद्र तल से समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

20. आइसोपाइकनिक (Isopycnic)⇒ मानव जनसंख्या के समान घनत्व वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

21. आइसोकाइनेटिक (Isokinetic)⇒ समान पवन वेग के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

22. समवर्षा रेखा (Isohytes)⇒ वर्षा की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

23. आइसोमेर (Isomer)⇒ वर्षा की वार्षिक मात्रा की प्रतिशत के रूप में व्यक्त की जाने वाली उसकी औसत मासिक मात्रा के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

24. आइसोपाथ (Isopath)⇒ भूगर्भिक अथवा भू भौतिक परत की समान मोटाई वाले बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा।

25. आइसोसिस्ट (Isoseist)⇒ समान भूकंपीय लहरों को एक समय में ही अनुभव करने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

26. आइसोटालेंटोज (Isotalantose)⇒ औसत मासिक तापांतर की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

27. आइसोइकेते (Isoikete)⇒ लोगों केहने योग्य निवास की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

28. आइसोफीन (Isophene)⇒ समान मौसमी घटनाओं को दर्शाने वाली रेखा।

29. आइसोथर्मो बाथ (Isothermobath)⇒ सागरीय जल की गहराई के अनुसा समान ताप वाले बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा।

30. आइसोचाइम (Isochime)⇒ औसत शीत की तापमान की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

31. आइसोफाइट (Isophite) ⇒ वनस्पतियों की समान ऊंचाई अथवा समान ऊंचाई वाले वनस्पति के स्तरों को मिलाने वाली रेखा।

32. आइसोप्रैक्ट (Isopract)⇒ मानव जनसंख्या के समान वितरण वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।



(iii) बिंदु-विधि (Dot Method)



        वितरण मानचित्र बनाने की इस विधि में किसी वस्तु के वितरण के घनत्व को समान आकार व आकृति वाले बिंदुओं के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह एक ऐसा वर्णप्रतीकी मानचित्र होता है जिसमें एक ही प्रतीक की बार-बार पुनरावृत्ति होती है। चूंकि बिंदुकित मानचित्र में बिंदुओं की कुल संख्या तथा प्रदर्शित मात्राओं के मध्य निरपेक्ष अनुपात होता है। अतः बिंदु विधि को कभी-कभी निरपेक्ष विधि (Absolute Method) नाम से भी जाना जाता है।

    इस कार्य के लिए एक बिन्दु का कोई मान, जैसे- 5,000 व्यक्ति, 4,000 पशु अथवा 5,000 हेक्टेअर, आदि निश्चित कर लेते हैं। इसके बाद दिए गए क्षेत्र के प्रत्येक विभाग जैसे- देश, राज्य, जिला, तहसील या विकास खण्ड जिसके अनुसार आंकड़े दिए गए हों, में सम्बन्धित वस्तु की सम्पूर्ण संख्या अथवा मात्रा प्रकट करने के लिए बिन्दुओं की संख्या ज्ञात करते हैं तथा अन्त में इन बिन्दुओं को उस क्षेत्र के रूपरेखा मानचित्र में अंकित कर देते हैं।

    यहाँ पर अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि बिन्दुकित मानचित्र बनाने का कार्य उतना सरल नहीं है जितना कि यह दिखता है। इसका कारण निम्नलिखित चार समस्यएं हैं, जिन्हें मानचित्र बनाने से पूर्व हल कर लेना अत्यन्त आवश्यक है:-

(i) बिन्दु मूल्य निश्चित करना

(ii) बिन्दुओं का आकार

(iii) बिन्दुओं को अंकित करना-

(a) सम वितरण प्रणाली तथा

(b) असम वितरण प्रणाली

(iv) एक समान बिन्दु बनाना, आदि।

     जनसंख्या का वितरण प्रदर्शित करने वाले बिंदुकित मानचित्र में कोई ऐसा बिंदु-मूल्य चुनना कठिन होता है जिससे नगरीय व ग्रामीण दोनों प्रकार की जनसंख्या का सही-सही वितरण दिखाया जा सके।

     उपर्युक्त समस्याओं को हल करने की निम्नांकित दो विधियां हैं-:

(A) स्टिलजेन बोर विधि (Stilgen Baur’s Method):-

     इसे बिन्दु तथा वृत्त विधि भी कहते हैं। इसमें बिन्दु तथा वृत्तों द्वारा जनसंख्या का प्रदर्शन किया जाता है। इस विधि का आविष्कार 1930 ई० में नगरीय एवं ग्रामीण जनसंख्या को एक ही मानचित्र पर प्रदर्शित करने के लिए अमेरिकी मानचित्रकार स्टिलजेन बोर महोदय ने किया। इसमें ग्रामीण जनसंख्या को समान आकार वाले बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या को वृत्तों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नगरीय जनसंख्या को प्रदर्शित करने वाले वृत्तों के अर्द्धव्यास निम्नलिखित सूत्र द्वारा निकाले जाते हैं।

Distribution Maps

Stilgen Baur’s Method

(B) स्टेन डी गीयर विधि (Sten De Geer’s Method):-

     इसे बिन्दु तथा गोला विधि भी कहते हैं। इस विधि का आविष्कार अमेरिकी मानचित्रकार स्टेन डी गीयर ने 1917 ई. में किया। इसमें ग्रामीण जनसंख्या को बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या को गोलों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। गोले बनाने के लिए घनमूल निकालना पड़ता है। इसे निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता है:

Sten De Geer’s Method

बिन्दु विधि के गुण (Merits of dot Methods)-

     बिन्दु विधि के निम्नलिखित गुण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:-

1. चूंकि बिन्दु स्वयं असांतत्य रूप (Discountinuous Form) में होते हैं, अतः यह विधि असांतत्य इकाइयों में मिलने वाली वस्तुओं (जैसे- जनसंख्या, पालतू पशु तथा फसलों, आदि) के वितरण को प्रदर्शित करने में बहुत उपयोगी है।

2. साधारणतया किसी बिन्दुकित मानचित्र में केवल एक वस्तु का वितरण प्रदर्शित करते हैं, लेकिन विशेष परिस्थिति में एक ही मानचित्र में कई सम्बन्धित वस्तुओं को भिन्न-भिन्न प्रकार के बिन्दुओं द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

3. बिन्दु विधि का प्रयोग क्षेत्रफल सम्बन्धी आंकड़ों का वितरण दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस विधि के द्वारा मूल्य, आयतन, भार, आदि आंकड़ों का वितरण भी प्रदर्शित किया जा सकता है।

4. चूंकि बिन्दुकित मानचित्रों में वर्णमात्री मानचित्रों की तरह बार-बार संकेत देखने की जरूरत नहीं होती है, अतः इन मानचित्रों को शीघ्रतापूर्वक आसानी से पढ़ा जा सकता है।

5. बिन्दु विधि के द्वारा सही-सही बनाए गए मानचित्र से किसी वस्तु के वास्तविक वितरण का काफी सीमा तक यथार्थ चित्रण सम्भव है।

6. आवश्यकता पड़ने पर किसी सांख्यिकीय इकाई के बिन्दुओं को गिनकर पुनः आंकड़ों में बदला जा सकता है, लेकिन बिन्दु गिनने में होने वाली कठिनाई व त्रुटि की सम्भावना के कारण यह गुण विवादास्पद है।

बिन्दु विधि के दोष (Demerits of Dot Method)-

       बिन्दु विधि के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं :

1. पर्याप्त अभ्यास के बिना समान आकार व आकृति के बिन्दु बनाना कठिन होता है।

2. छोटी-छोटी सांख्यिकीय इकाइयों के आधार पर आंकड़े उपलब्ध न होने की दशा में बिन्दु विधि के द्वारा किसी वस्तु के वितरण की वास्तविक दशाओं का यथार्थ चित्रण करना असम्भव है।

3. बिन्दु विधि मानचित्र बनाने के लिए ऐसे आधार मानचित्र की आवश्यकता होती है जिसमें आव- श्यक सांख्यिकी इकाई क्षेत्रों में सीमाएं हों। इस तरह के आधार मानचित्र सदैव उपलब्ध नहीं होते हैं, अतः सहायक मानचित्रों की सहायता से आधार मानचित्र में इन सीमाओं को अंकित करने के लिए अतिरिक्त परिश्रम व समय की आवश्यकता पड़ती है।

4. विषय की जानकारी एवं दिए हुए क्षेत्र के भौगोलिक ज्ञान के अभाव में सही-सही बिन्दुकित मानचित्र बनाना कठिन होता है।

5. बिन्दुकित मानचित्र की नकल करके उसकी प्रतिलिपि बनाना कठिन होता है।

6. बिन्दु अंकित करने की प्रक्रिया में मानचित्रकार के द्वारा की गई त्रुटियों को मानचित्र में पहचानना कठिन होता है।



(iv) सांख्यिकीय आरेख विधि (Statistical Diagram Method)



       आंकड़ों का प्रदर्शन भिन्न-भिन्न प्रकार के आरेखों (Diagrams) द्वारा भी किया जा सकता है। यह आरेख मानचित्र पर स्थान-विशेष पर खींचकर अध्यारोपित (Superimpose) कर दिए जाते हैं। इस प्रकार आंकड़ों का प्रदर्शन निम्न प्रकार के आरेखों द्वारा किया जाता है:-

(i) रैखिक आरेख (Line Graph)।

(ii) दण्ड या पट्टिका या स्तम्भ आलेख अथवा स्तम्भाकार आरेख (Bar Graph and Columnar Diagrams)।

(iii) मिश्रित अथवा संयुक्त स्तम्भ, दण्ड अथवा पट्टिका आरेख (Compound Bar Graph)।

(iv) द्वि-विस्तारीय मान आयताकार आरेख (Two Dimensional Value Area Rectangular Diagrams)।

(v) वृत्ताकार तथा चक्रारेख (Ring, Pie, Circle or Wheel Diagrams)।

(vi) घनक अथवा इष्टिका पुंज आरेख (Block Pile Diagrams)।

(vii) पिण्ड अथवा गोलाकार आरेख (Spherical Diagrams)।

(viii) चित्रात्मक चित्र (Pictorial Diagrams)।

(ix) तारक आरेख (Star Diagrams)।

35. Metrological Instruments : Functions of Wind Vane, Anemometer, Barometer, Rain Gauge and Dry and Wet Bulb Thermometer

Metrological Instruments: Functions of

Wind Vane, Anemometer

Barometer, Rain Gauge

and Dry and Wet Bulb Thermometer

1.  WIND VANE (वात् दिग्दर्शी)

WIND VANE (वात् दिग्दर्शी):-

       इस यंत्र से वायु की दिशा ज्ञात की जाती है। इसे भारतीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा निर्धारित 10 मीटर की ऊँचाई पर लगाया जाता है, ताकि पवन में कोई रुकावट न हो। इस यंत्र में तीन भाग होते हैं-

(1) एक भाग तीर,

(2) दूसरा भाग पूँछ तथा

(3) तीसरा भाग लम्बवत् धुरी।

        वात् दिग्दर्शी दो प्रकार के होते हैं:-

(1) तीर वाला वात् दिग्दर्शी एवं

(2) कुक्कुट वाला वात् दिग्दर्शी।

     धुरी एवं ऊपर के तीर या कुक्कुट की व्यवस्था इस प्रकार रहती है कि तनिक भी हवा चलने पर यह घूमने लगे। हवा चलने से यह तीर हवा की ओर इशारा करता है अर्थात् जिधर से हवा आती है, उधर उसका तीर होता है। इस यंत्र के निचले भाग में लगी छड़ में चार छड़े लगी रहती है जिन पर दिशाओं के नाम लिखे रहते है, यथा-उत्तर, पूरब, दक्षिण तथा पश्चिम।

     यहाँ एक बात अधिक ध्यान देने की है कि हवा का नामकरण उसी ओर होता है जिधर से हवा आती है, जैसे- यदि हवा पश्चिम की ओर से चल रही है तो उसे पछुआ पवन कहा जायेगा। जिधर से हवा आती है, उधर तीर का नुकीला भाग होता है। जिस यंत्र में तीर के स्थान पर मुर्गा लगा रहता है, उसे वेदर कॉक (Weather Cock) या मौसम कुक्कुट कहा जाता है।

ARROW-TYPE WIND VANE



COCK-TYPE WIND VANE

(WEATHERCOCK)

Metrological Instruments



2. Anemometer (पवन वेगमापी)

Anemometer (पवन वेगमापी):-

     इस यंत्र द्वारा हवा की गति ज्ञात की जाती है। इसमें चार कटोरियाँ भुजाओं द्वारा एक लम्बी छड़ी में इस तरह लगी रहती है कि वे आसानी से घूम सके। जब हवा चलती है तो ये कटोरियाँ भी घूमने लगती है। इस छड़ी के निचले भाग में एक छड़ी लगी रहती है जिसमें डायल पर चक्करों की संख्या अंकित रहती है। इसकी सहायता से वायु की गति प्रति घण्टा किलोमीटर ज्ञात कर लेते है। वात् दिग्दर्शी की तरह इस यंत्र को भी धरातल से लगभग 10 मीटर की ऊँचाई पर लगाते हैं।

ANEMOMETER

 



3.  BAROMETER (वायुदाबमापी यंत्र)

BAROMETER (वायुदाबमापी यंत्र):-

    इस यंत्र द्वारा वायुदाब ज्ञात किया जाता है। ये बैरोमीटर प्रमुखतः दो प्रकार के होते हैं-

(1) पारायुक्त बैरोमीटर एवं

(2) निर्द्रव बैरोमीटर।

     इसके अतिरिक्त, अब स्वतः वायुदाब लेखी (Barograph) का प्रयोग किया जाने लगा है जिनका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

फॉर्टिन वायुदाब मापी (Fortin’s Barometer)-

     फॉर्टिन बैरोमीटर की रचना फॉर्टिन महोदय ने की थी। उसी के नाम पर इसे फॉर्टिन बैरोमीटर कहा जाता है। यह पारायुक्त वायुदाब मापी है। यह साधारण वायुदाब मापी का परिष्कृत रूप है। इसमें 90 सेण्टीमीटर लम्बी एक काँच की नली होती है जिसमें पारा भरा होता है। इस नली का ऊपरी सिरा बन्द तथा निचला खुला रहता है। निचले सिरे पर नोंक बनी रहती है जो पारे में भरे पात्र में डूबी रहती है। इस बर्तन के नीचे एक चमड़े की थैली के नीचे पेंच लगा रहता है जिसको ढीला करने या कसने पर बर्तन में पारे की ऊँचाई को घटाया या बढ़ाया जा सकता है।

      प्याले तथा नली में पारे की तली को बढ़ने के लिए खुली जगह होती है। मापक का शून्य बताने के लिए हाथीदाँत का नोकदार संकेतक होता है जो दाब नापते समय प्याले से भरे हुए पारे के तल को स्पर्श करता है। नली में पारे का तल पढ़ने के लिए वर्नियर कैलिपर्स मापक होता है। यह सारा यत्र धातु के एक पाइप में बन्द रहता है तथा हुकों द्वारा लकड़ी के तख्ते पर कसा रहता है। इस पूरे यंत्र को काँच के एक शोकेस में रखकर दीवाल पर टाँग दिया जाता है।

     सर्वप्रथम संकेतांक की नोंक को पारे के तल पर स्पर्श कराना चाहिए। यह क्रिया नीचे लगे पेंच द्वारा होती है। यह क्रिया शून्य समायोजन (Zero Adjustment) कहलाती है। अब पारे की सतह पढ़ने के लिए वर्नियर अल्पतमांक ज्ञात करते हैं तथा वर्नियर को पारे की ऊपरी सतह से उठाकर तब तक धीरे-धीरे नीचे लाते हैं जब तक कि वह पारे के सर्वोच्च तल को न छूने लगे। मापक तथा वर्नियर दोनों की नाप जोड़ देने पर वायुदाब आ जाता है। कई बार नाप लेकर उसका मध्यमान ज्ञात कर लिया जाता है।

FORTIN’S BAROMETER

        फॉर्टिन बैरोमीटर से वायुदाब लेते समय निम्नांकित सावधानियाँ बरतनी चाहिए-

(1) बैरोमीटर को ऊर्ध्वाधर कर लेना चाहिए।

(2) प्याले में पारे के तल को संकेतक से ठीक-ठीक स्पर्श करना चाहिए।

(3) वर्नियर मापक के निचले सिरे भी नली में पारे के उत्तल तल के उच्चतम बिन्दु से आँख को उसी ऊँचाई पर रखकर स्पर्श करना चाहिए।

      बैरोमीटर (वायुदाबमापी) से निम्न बातों का ज्ञान होता है-

(1) बैरोमीटर से ऊँचाई का ज्ञान होता है-

     जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती जाती है, वायु का दाब कम होता जाता है फलतः बैरोमीटर को ऊँचाई पर ले जाने से उसका पारा धीरे-धीरे गिरने लगता है। समुद्र तल से 900′ ऊँचाई पर बैरोमीटर से पारे की ऊँचाई लगभग 1″ कम हो जाती है। इस प्रकार प्रत्येक 900′ चढ़ने पर ऊँचाई 1″ कम हो जाती है।

(2) बैरोमीटर से आँधी या तूफान आने का ज्ञान प्राप्त होता है-

     यदि बैरोमीटर का पारा शीघ्रता से गिर रहा है तो यह आँधी या तूफान आने का संकेत करता है क्योंकि उस स्थान का दबाव कम होने के कारण बैरोमीटर का पारा एकदम नीचे गिर जाता है। चारों ओर से ऊँचे दबाव वाले स्थानों से पवनें उस स्थान की ओर बड़े वेग से चलने लगती हैं। यही पवनें तूफान व आँधी का स्वरूप धारण कर लेती है।

(3) बैरोमीटर से मौसम की स्वच्छता का ज्ञान होना-

      यदि बैरोमीटर में पारा धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगे तो समझ लीजिए कि मौसम साफ एवं स्वच्छ होने जा रहा है क्योंकि पारे का चढ़ना अधिक दबाव का द्योतक है। दाब बढ़ने पर वायु अन्य स्थानों को बहने लगती है।

(4) वायुमण्डल के नम होने या वर्षा होने का अनुमान किया जाता है-

    जब बैरोमीटर का पारा धीरे-धीरे नीचे गिरता है तो मौसम के नम होने या वर्षा की सम्भावना की जाती है।

(5) तापमान का ज्ञान होता है-

     जैसे-जैसे तापमान बढ़ता जाता है, वायु गरम होकर हल्की हो जाती है और उसका दबाव घटता जाता है जिससे बैरोमीटर में पारा नीचे गिरने लगता है।

निर्द्रव वायुदाब मापी (Aneroid Barometer)-

      एनीरॉइड ग्रीक भाषा के शब्द Aneros से बना है जिसमें ‘A’ का अर्थ नहीं तथा ‘Neros’ का अर्थ द्रव से लगाया जाता है अर्थात् इसमें कोई द्रव नहीं होता है। यह धातु की एक चादर का बना घड़ी के आकार का एक डिब्बा होता है जिसकी सतह लहरदार होती है। यंत्र की हवा यंत्रों द्वारा निकाल दी जाती है। इस डिब्बे का ऊपरी भाग बहुत हल्की चादर का बना होता है जो थोड़े-से दबाव से प्रभावित होता है।

      वायुदाबमापी के डिब्बे के मध्य का सम्बन्ध एक लीवर तथा कमानी द्वारा ऊपरी भाग में लगी सुई से होता है। हवा के दबाव के कारण डिब्बे का ऊपरी भाग ऊपर-नीचे होता है जो ऊपरी भाग में लगी सुई के द्वारा वायुदाब बताता है। ऊपरी भाग पर आँधी, वर्षा, परिवर्तन, बहुत शुष्क आदि चिह्न बने रहते हैं। इस प्रकार इनकी सहायता से मौसम की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

ANEROIDS BAROMETER

वायुदाब लेखी (Barograph)-

     यह आधुनिकतम उपकरण है जिसमें वायुदाब स्वतः अंकित होता है क्योंकि वायुदाब किसी व्यक्ति द्वारा नहीं पढ़ा जाता है अपितु ग्राफ पेपर पर स्वतः अंकित होता रहता है। इसमें एक बेलन के ऊपर ग्राफ पेपर लगा रहता है तथा इसके भीतर एक घड़ी लगी रहती है जो बेलन को घुमाती है। एक सप्ताह में बेलन एक चक्र पूरा कर लेता है।

      इस प्रकार इस यंत्र द्वारा दैनिक वायुदाब सरलता से ज्ञात कर लिया जाता है। इससे आगामी मौसम के बारे में जानकारी प्राप्त करने में अधिक सहायता मिलती है।

वायुदाब का स्वरूप (Nature of Airpressure):-

     वायुदाब का स्वरूप या इसकी मात्रा का रूप दो प्रकार का होता है-

(1) निम्न बायुदाब:-

     निम्न वायुदाब क्षेत्र में समदाब रेखाएँ अण्डाकार या वृत्ताकार होती है। इसमें केन्द्रीय भाग में वायु का दबाव कम (Low Pressure) तथा बाहर वायुदाब अधिक होता है। इसे चक्रवात भी कहते है। ये वर्षा सूचक है क्योंकि हवाएँ बाहर से केन्द्र की ओर चलती हैं।

(2) उच्च वायुदाब:-

     यह अधिक वायुदाब वाले होते हैं जिनके केन्द्रीय भाग में वायु का दबाव अधिक (High Pressure) तथा बाहर वायुदाब कम होता है। यह साफ एवं शुष्क मौसम का सूचक है। इसमें हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर चलती हैं। इन्हें प्रतिचक्रवात कहते हैं।



4. Rain Gauge (वर्षामापी यंत्र)

Rain Gauge (वर्षामापी यंत्र):-

       साधारणतः वर्षामापी कई प्रकार के होते हैं। इस यंत्र द्वारा किसी निश्चित समय में होने वाली वर्षा की मात्रा ज्ञात की जाती है। साधारणतः यह धातु का बेलन के आकार का एक खोल होता है। इसके ऊपरी भाग में एक कीप (Funnel) लगी रहती है। इस कीप का व्यास बेलन के व्यास के बराबर होता है। वर्षा के समय इसे खुले मैदान में रख दिया जाता है जिससे धीरे-धीरे वर्षा का जल इसमें एकत्रित होता रहता है।

       वर्षा समाप्त होने पर इस जल को अलग से काँच के एक बड़े बर्तन में डालते हैं जिसकी आकृति गिलास जैसी होती है, इसे नपना गिलास कहते हैं। इसमें सेण्टीमीटर या इंच के चिह्न लगे रहते हैं जिनसे वर्षा की मात्रा ज्ञात कर लेते हैं।

     ज्ञातव्य है कि जब बेलन तथा कीप के व्यास बराबर होते हैं तो वर्षा की मात्रा आसानी से ज्ञात हो जाती है किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वे दोनों सदैव बराबर हों। नपना गिलास भी विभिन्न प्रकार के वर्षामापियों के लिए भिन्न-भिन्न होते है। यदि फनल तथा नपना गिलास का व्यास पता हो तो निम्न सूत्र द्वारा नपना गिलास में पानी की ऊँचाई ज्ञात की जा सकती है-

नपना गिलास में पानी की ऊँचाई= कीप का व्यास/नपना गिलास का व्यास

RAIN GAUGE

वर्षालेखी (Rainograph)-

      यह स्वतः वर्षालेखी यंत्र होता है जिसमें वर्षा की मात्रा तथा अवधि दोनों का एक ग्राफ पेपर पर स्वतः आलेखन होता है। इसमें एक घूमता हुआ बेलन होता है जो 24 घण्टे में एक पूरा चक्कर कर लेता है। बेलन के चारों ओर एक ग्राफ लगा रहता है।

     इस ग्राफ का सम्बन्ध लीवर द्वारा एक तैरने वाली वस्तु से होता है। लीवर में एक कलम लगी रहती है जो ग्राफ पेपर को स्पर्श करती है। जब वर्षा होती है तो जल कीप द्वारा नीचे बेलन में गिरता है जिससे लीवर में कम्पन होता है जिसका प्रभाव कलम पर पड़ता है। यह कलम ग्राफ पेपर पर आलेखन करती है।



5. Dry and Wet Bulb Thermometer (शुष्क एवं आर्द्र बल्ब तापमापी)

Dry and Wet Bulb Thermometer (शुष्क एवं आर्द्र बल्ब तापमापी):-

      इस तापमापी के द्वारा तापमान तथा आर्द्रता ज्ञात की जाती है। इसमें एक बोर्ड पर दो तापमापी लगे रहते है। इनमें से एक तापमापी का बल्ब शुष्क तथा दूसरे का गीला रखा जाता है। इसे गीला रखने के लिए बल्ब पर मलमल की पतली पट्टी लिपटी रहती है जिसका एक सिरा नीचे पानी से भरे बर्तन में डूबा रहता है, शुष्क तापमापी का तापमान आर्द्र बल्ब के तापमान से सदैव अधिक रहता है। जितनी अधिक वायु शुष्क होगी, उतना ही अधिक दोनों तापमापियों के पाठ्यांकों में अन्तर होगा। किसी समय दोनों तापमापियों के अन्तर की सहायता से वायु की सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) ज्ञात कर लेते हैं।

DRY

AND

WET BULB THERMOMETER

     किसी वायु पुंज में किसी तापमान पर जितनी अधिकतम जलवाष्प समा सकती है और जितने प्रतिशत वायु में उपस्थित है, उसे सापेक्षिक आर्द्रता कहते हैं अर्थात् किसी निश्चित तापमान पर निश्चित आयतन वाली वायु की आर्द्रता शक्ति तथा उसमें उपस्थित आर्द्रता की वास्तविक मात्रा के अनुपात को सापेक्ष या सापेक्षिक आर्द्रता कहा जाता है।

      उदाहरणार्थ, 70° फारेनहाइट पर आर्द्रता सामर्थ्य 8 ग्रेन है, यदि इसकी वास्तविक आर्द्रता 4.1 ग्रेन है तो सापेक्ष आर्द्रता होगी-

सापेक्ष आर्द्रता = निरपेक्ष आर्द्रता / आर्द्रता सामर्थ्य x 100

= 4.1/8×100

= 51.25%

तापमान की मापनियों का परिवर्तन-

      तापमान प्रायः फारनेहाइट, सेण्टीग्रेड तथा रियूमर में ज्ञात किया जाता है। फारनेहाइट पैमाने का आविष्कार जर्मन विद्वान डेनियल फारनेहाइट ने 1714 ई. में किया था। सेण्टीग्रेड मापनी का आविष्कार स्वीडन के प्रसिद्ध खगोलज्ञ एण्डर्स सेल्सियस ने 1742 ई. में किया था। रियूमर मापनी का आविष्कार फ्रांसीसी वैज्ञानिक रियूम ने किया था। इन इकाइयों में नापे गये तापमान को निम्नलिखित सूत्र द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है-

F-32/180 = C/100 = R/80

या

F-32/9 = C/5 = R/4

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव



         हरित क्रांति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्लू. एस. गौड ने खाद्यान्न उत्पादन में आई क्रांति, जो कि गेहूँ के HYV (High Yielding Varieties- उच्च उत्पादकता किस्में) प्रकार के आविष्कार से संभव हुई थी, के लिए किया था। यह क्रांति भारत, पाकिस्तान एवं विकासशील देशों में विद्यमान खाद्यान्न संकट को दूर करने में अत्यन्त मददगार रही। भारत में मुख्य रूप से भारतीय कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन द्वारा निर्देशित थी, जो नॉर्मन ई. बोरलॉग की बड़ी हरित क्रांति पहल का हिस्सा थी, जिसने अविकसित देशों में कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि अनुसंधान और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया था।

      उन्नत किस्म के बीज के अलावा अच्छी सिंचाई की व्यवस्था, आधुनिक यंत्रों का उपयोग, अच्छे उर्वरक का वैज्ञानिक प्रयोग इत्यादि हरित क्रांति के आधार थे। इसमें सस्ते मूल्य पर बिजली उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य बैंकिंग एवं बाजार की सुविधा उपलब्ध करायी गयी। हरित क्रांति की सफलता के दो पक्ष रहे, एक सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक।

सकारात्मक पक्ष

     इस क्रांति से खाद्यान्न की उपज में काफी बढ़ोत्तरी हुई। 1950 में भारत में 50 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर अब 200 मिलियन टन हो चुका है। गेहूँ के उत्पादन में 177 प्रतिशत, चावल में 76 प्रतिशत तथा मक्के में 56 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई। खाद्यान्न में वार्षिक वृद्धि 2.62 प्रतिशत हो गयी, जो पहली बार जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक थी अर्थात् खाद्यान्न संकट दूर हुआ।

      कृषि क्षेत्र में 1961 से 1999 के बीच 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 1960-61 में यह कुल कृषि क्षेत्र का 72 प्रतिशत था, जो 1970-71 में 78 प्रतिशत हो गया, 1980-81 में 81 प्रतिशत और अब 82 प्रतिशत के करीब है। पिछले तीन दशकों में गेहूँ के क्षेत्र में 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसमें 82 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है तथा 95 प्रतिशत HYV के अंतर्गत आता है। चावल क्षेत्र में भी 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

       भारतीय कृषि पहली बार बाजार में लाभदायक व्यापार के रूप में आई क्योंकि अब किसानों के पास अतिरिक्त अन्न मौजूद था। कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों का विकास हुआ तथा कृषि में प्रयुक्त होने वाले यंत्रों के निर्माण में भी लौह एवं यांत्रिक उद्योग को बढ़ावा मिला। भारतीय किसानों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ, भारतीय किसान बढ़ी पैदावार को देखते हुए नवीन कृषि प्रणाली को अपनाने को तुरंत तैयार हो गये और कृषि सहायता से लाभदायक वाणिज्यिकी में परिणत हो गये।

     खाद्यान्न का आयात रुका तथा भारतीय मुद्रा का विदेश गमन भी नियंत्रित हुआ। भारत जैसे विकासशील देश में यह मुद्रा अधः संरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। ग्रामीण रोजगार के भी शुभ अवसर पैदा हुए। घरेलू उद्योग धंधों का भी विकास हुआ तथा मजदूरी में बढ़ोतरी हुई।

नकारात्मक पक्ष

     परंतु हरित क्रांति के नकारात्मक पक्ष भी उभर का सामने आये हैं। हरित क्रांति ने उसी क्षेत्र में सफलता पाई, जहाँ पर पूर्व से ही अधः संरचना का विकास हुआ था, किसान बड़े एवं धनी थे, कुल जोत अधिक थी तथा दूसरी भौगोलिक एवं सामाजिक शर्तें पूरी हो रही थीं। अतः यह पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में तो सफल रही, परन्तु उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि में असफल रही, जिससे आर्थिक विकास में असमानता आयी।

     उत्तर प्रदेश के अंदर ही पूर्वी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास की विषमता दिखती है। इसी तरह कृष्णा, गोदावरी क्षेत्र एवं तेलंगाना और रायल सीमा क्षेत्र में विषमता दिखती है।

        अंतर्वैयक्तिक विषमता का भी जन्म हो गया। क्योंकि बड़े किसान ही इसका भरपूर फायदा उठा सके जबकि छोटे किसान आर्थिक रूप से असफल ही रह गये। गेहूँ और चावल की उपज एवं उपज क्षेत्र में तो बढ़ोत्तरी हुई, परंतु तिलहन एवं दलहन की उपज एवं उपज क्षेत्र दोनों ही घट गये। अंतर्वैयक्तिक विषमता ने बड़े किसानों के समाज में प्रभुत्व को पूर्वस्थापित कर दिया। छोटे किसान अपनी जमीन को बढ़ी कीमत में बेचने पर प्रलोभित हो गये तथा उनकी आर्थिक दुर्गति बढ़ गयी। कृषि में यांत्रिकी के प्रवेश से रोजगार के अवसर भी घट गये।

         हरित क्रांति के सर्वाधिक दुष्परिणाम पर्यावरणीय दृष्टि से उभर कर सामने आये। कृषि में HYV किस्म की आवश्यकता अधिक रहती है। हरित क्रांति के क्षेत्र में अपवाह प्रणाली बेहद खराब है। अतः नहरों से सिंचित क्षेत्र में जल जमाव एवं कूप तथा नलकूप क्षेत्र में लवणता की समस्या का जन्म हो गया। हरियाणा एवं पंजाब के अर्द्धशुष्क भौगोलिक दशा में लवणता को और बढ़ावा मिला।

        कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए वनस्पति का विनाश हुआ, अधिक उर्वरक के प्रयोग से प्राकृतिक उर्वरता का ह्रास तथा कृषि प्रणाली में परिवर्तन (जैसे दलहन का न बोया जाना) आदि प्रयोगों एवं कार्यों से मृदा अपरदन एवं प्रदूषण दोनों बढ़े। एकल कृषि तथा कृषि पारिस्थितिकी पर प्रभाव भी नकारात्मक पड़े। एक ही फसल उपजाने से कृषि पारिस्थतिकी का विनाश हो रहा है।

       रासायनिक खादों के उपयोग से तथा खाद्यान्नों में सीसा, तांबा, जस्ते आदि की मात्रा बढ़ने से यकृत संबंधी रोग तथा जल जमाव से मलेरिया, डेंगू आदि रोग बढ़े। डीडीटी और कीटनाशक दवाओं का दुधारू जानवरों के दूध में पाया जाना भी घातक संकेत है। इस तरह एक तफ तो हरित क्रांति से खाद्यान्न उत्पादन में आशानुरूप वृद्धि हुई तो दूसरी तफ इसने पर्यावरणीय एवं सामाजिक दुर्व्यवस्था को भी जन्म दे दिया।


37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व



      भूमि की आवश्यकतानुसार सिंचाई द्वारा पानी उपलब्ध कराने के लिए जिस प्रारूप, संयंत्र तथा तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, उसे ही सिंचाई व्यवस्था कहते हैं। देश के विभिन्न भागों में सिंचाई प्रणाली वहाँ के भू संरचना, जलवायु, जल की उपलब्धता आदि विभिन्न परिस्थितियों द्वारा निर्देशित होती है। इसलिए देश के विभिन्न भागों में सिंचाई की पद्धतियों में पर्याप्त असमानता पायी जाती है, हमारे देश में सिंचाई के जिन विविध साधनों का प्रयोग किया जाता है उनका संक्षिप्त वर्णन एवं महत्व निम्नानुसार है:-

1. कुएं एवं नलकूप

2. तालाब

3. नहरें

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ

1. कुआँ एवं नलकूप:-

       भारत में पानी के लिए कुओं का प्रयोग प्राचीन समय से ही होता आ रहा है और वर्तमान में भी यह जल प्राप्त करने या सिंचाई का एक महत्वपूर्ण साधन है। वर्तमान में हमारे देश में लगभग 89.6 लाख कुआँ हैं, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र के लगभग 21.1 प्रतिशत भाग की सिंचाई करते हैं, कुआँ प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं-

(i) कच्चा कुआँ

(ii) पक्का कुआँ,

      कच्चे कुओं को बनवाने के लिए कम खर्च करना पड़ता है, जबकि पक्के कुओं के निर्माण का खर्च अधिक है, कुआँ सिंचाई का सस्ता एवं सुगम साधन होने के कारण भारतीय किसान इसका उपयोग आमरूप में करता है, कुओं से गुजरात के कुल सिंचित क्षेत्र के 73 प्रतिशत, महाराष्ट्र के 60 प्रतिशत, राजस्थान के 46 प्रतिशत व मध्य प्रदेश के 37 प्रतिशत भाग की सिंचाई की जाती है।

      इस तरह उत्तर प्रदेश के 23.2 प्रतिशत, आन्ध्र प्रदेश के 6 प्रतिशत, तमिलनाडु 11 प्रतिशत, कर्नाटक 3 प्रतिशत तथा केरल के 4 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई कुओं के द्वारा की जाती है, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उड़ीसा व हरियाणा कुओं द्वारा सिंचाई करने वाले देश के अन्य राज्य हैं।

      ट्यूबवैल या नलकूप सिंचाई का एक नवीनतम साधन है, जिनका प्रयोग 1930 से आरम्भ किया गया था। यह एक अत्यधिक गहरा (30 फीट से 500 फीट तक) एवं संकरा छिद्र होता है (जिसकी खुदाई मशीन के द्वारा की जाती है) जिससे बिशेष यंत्र या विद्युत् मोटरों की सहायता से पानी निकाला जाता है

       ये प्रायः ऐसे कुएँ होते हैं जिनसे निरन्तर जल प्राप्त होता है पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात नलकूपों द्वारा सिंचाई करने वाले प्रमुख भारतीय राज्य हैं राज्यों के सिंचित क्षेत्र का 51.6 प्रतिशत उत्तर प्रदेश, 26 प्रतिशत पंजाब तथा 20.6 प्रतिशत हरियाणा में नलकूपों द्वारा सिंचाई की जाती है इस प्रकार उत्तर प्रदेश नलकूपों से सिंचाई करने वाला देश का अग्रणी राज्य है।

         पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान नलकूपों से सिंचाई करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं। इस समय ट्यूबवैल या नलकूपों से लगभग 14.3 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र का 29.9 प्रतिशत है।

नलकूपों या ट्यूबवैलों का महत्व:-

(i) नलकूपों द्वारा कम वर्षा वाले देश के ऐसे भागों में सिंचाई की जा सकती है, जहाँ का जल स्तर नीचा हो वहाँ सिंचाई के अन्य साधन उपलब्ध न हों

(ii) नलकूपों द्वारा किसान फसलों को इच्छित समय में पानी दे सकता है

(iii) नलकूपों के जल में ऐसे कई रसायन होते हैं, जो फसलों के लिए उपयोगी होते हैं

(iv) नलकूपों के संचालन व्यवस्था का व्यय कम होता है

(v) नलकूपों द्वारा फसलों को आवश्यकतानुसार कम या अधिक जल दिया जा सकता है।

2. तालाब:-

      तालाब से आशय मानव या प्रकृति निर्मित उन जलाशयों से होता है जिसमें वर्षा का जल एकत्रित हो जाता है, तालाबों का आकार छोटे नालों या पोखरों से लेकर बड़ी-बड़ी झीलों के रूप में हो सकता है ये दो प्रकार के हो सकते हैं-

(i) कृत्रिम तालाब,

(ii) प्राकृतिक तालाब।

      कृत्रिम तालाब भूमि खोदकर तथा बांध बनाकर वर्षा का जल एकत्र करके बनाये जाते हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे तथा गहरे होते हैं। जब प्राकृतिक गड्ढों में जल एकत्र हो जाता है तो प्राकृतिक तालाब बन जाते हैं, ये बड़े व छिछले होते हैं।

        तालाब द्वारा देश के प्रायद्वीपीय भाग में जहाँ की भूमि पथरीली, असमतल तथा कुएँ एवं नहरों के निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है, इसी साधन से सिंचाई की जाती है। देश के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 6.8 प्रतिशत भाग की सिंचाई तालाबों द्वारा की जाती है तालाबों द्वारा सिंचाई करने वाले राज्यों में तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं पश्चिमी बंगाल प्रमुख हैं। इसके अलावा दक्षिणी झारखंड, दक्षिणी मध्य प्रदेश, द. छत्तीसगढ़ एवं दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के कुछ भागों में तालाबों द्वारा सिंचाई की जाती है।

       इस समय देश में लगभग 5 लाख बड़े और 60 लाख छोटे तालाब है, निजाम सागर (आन्ध्र प्रदेश), कृष्णराज सागर (कर्नाटक), जयसमन्द, उदय सागर एवं फतेह सागर (राजस्थान) आदि सिंचाई तालाबों के प्रमुख उदाहरण हैं जयसमन्द सबसे बड़ा तालाब है।

तालाबों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) ऐसे भागों में जहाँ भूमि तल कठोर होता है, तालाब बनाना उपयुक्त रहता है।

(ii) इससे वर्षा जल का उचित उपयोग हो जाता है एवं पानी बेकार नहीं जाता।

(iii) तालाबों से सिंचाई के साथ-साथ मत्स्य पालन भी किया जा सकता है, जिससे कुछ सीमा तक खाद्य समस्या हल करने में सहायता मिल सकती है।

(iv) तालाबों द्वारा बिना मोटरों या पम्पों के बिना ही कुछ सीमा तक सिंचाई की जा सकती है।

(v) तालाबों का निर्माण ऐसे भागों में भी किया जा सकता है जहां कुएँ खोदना एवं नहर निकालना सम्भव नहीं होता।

      तालाबों द्वारा सिंचाई केवल वर्षा पर निर्भर रहती है, किसी-किसी वर्ष जब वर्षा कम होती है तो तालाब सूख जाते हैं और फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती है।

3. नहरें

       नहरें भारत में सिंचाई का सबसे बड़ा व प्रमुख साधन हैं, जिससे देश की लगभग 35.7 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई की जाती है इस समय देश में लगभग 1 लाख 50 हजार किमी लम्बी नहरें हैं जिससे 163.9 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है भारत की नहर प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी नहर प्रणाली है। नहरों का विस्तार देश में प्रमुख रूप से उत्तरी भारत में मिलता है

        सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से 20 प्रतिशत नहरों द्वारा सिंचाई केवल उत्तर प्रदेश में होती है आन्ध्र प्रदेश 10 प्रतिशत, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ 9.8 प्रतिशत, राजस्थान 8.3 प्रतिशत, पंजाब 8 प्रतिशत तथा हरियाणा 8 प्रतिशत, नहरों द्वारा सिंचाई प्राप्त करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं।

      भारत में नहरें तीन प्रकार की पायी जाती हैं:-

(i) बारहमासी नहरें- ये वे नहरें हैं जो पूरे वर्ष बहती हैं। इनका निर्माण नदियों में बांध बनाकर किया जाता है।

(ii) बरसाती नहरें- इन नहरों में पानी केवल बरसात में ही रह पाता है इनका निर्माण मुख्य रूप से नदियों में बाढ़ के अतिरिक्त जल की निकासी के लिए किया जाता है।

(iii) स्टोरेज वर्क्स- इस प्रकार की नहरें पहाड़ी घाटियों में बांध बनाकर वर्षा का पानी एकत्र करके निकाली जाती हैं इन नहरों का उपयोग तालाबों की तरह ही किया जाता है। इन्दिरा गांधी नहर (राजस्थान), सरहिन्द नहर (पंजाब), ऊपरी गंगा नहर, निचली गंगा नहर, मध्य गंगा नहर, पूर्वी यमुना नहर आदि सिंचाई नहरों के उदाहरण हैं।

नहरों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) नहरों द्वारा खेतों को पानी देना सस्ता एवं सरल है

(ii) बाढ़ के समय नदियों के पानी को नहरों में छोड़ा जा सकता है और बाढ़ से उत्पन्न संकट से निपटा जा सकता है।

(iii) नहरों को आन्तरिक परिवहन के साधन के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।

(iv) नहरों के किनारे वृक्षारोपण करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(v) भारत की अधिकांश नहरें बारहमासी हैं, अतः किसान आवश्यकतानुसार कभी भी अपने खेत में सिंचाई कर सकता है।

        नहर सिंचाई से जहाँ एक ओर अनेक लाभ हैं वहीं दूसरी और सिंचित क्षेत्र के जलमग्न होने का भय भूमि की क्षारीयता, अन्तिम छोर में पानी की कमी, पानी सम्बन्धी आपसी विवाद जैसी कई समस्याएँ भी हैं।

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ-

         भारत में विभिन्न उद्देश्यों जैसे- सिंचाई, बाढ़ नियन्त्रण, पेयजल आपूर्ति, जल विद्युत उत्पादन, नहर परिवहन, पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण इत्यादि की पूर्ति बहुउद्देशीय परियोजनाओं के तहत् की जाती है इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने इन परियोजनाओं को “आधुनिक भारत का मंदिर” की संज्ञा दी है

          भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ निम्नलिखित हैं-

(i)  कोसी परियोजना 

(ii) दामोद घाटी परियोजना 

(iii) रिहन्द बाँध परियोजना

(iv) हीराकुण्ड बाँध

(v) भाखड़ा नांगल परियोजना

(vi)  गंडक परियोजना

(vii) तुंग भद्रा परियोजना इत्यादि

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है?



       वर्षा के अभाव में खेतों को कृत्रिम ढंग से जल पिलाने की क्रिया को सिंचाई करना कहा जाता है। भारत एक उष्ण कटिबन्धीय देश है जिसमें कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है, किन्तु इस वर्षा की प्रकृति एवं उसके वितरण में कई दोष पाये जाते हैं। इन दोषों को दूर करने एवं नियमित कृषि करने का सर्वोत्तम उपाय सिंचाई की व्यवस्था करना है।

सिंचाई की आवश्यकता के कारण

(1) वर्षा की अनिश्चितता (Uncertainty of Rainfall):-

         भारत में वर्षा समय एवं स्थान की दृष्टि से अनिश्चित होती है तथा विभिन्न क्षेत्रों में उसकी मात्रा भी भिन्न होती है। मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है कि प्रत्येक 7 वर्ष में दो बार सूखा पड़ जाता है। अकाल सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को क्षत-विक्षत कर देते हैं। कभी तो समय से बहुत पहले ही वर्षा हो जाती है और कभी लम्बे अन्तराल पर इसी कारण नियमित रूप में कृषि करने के लिए सिंचाई अनिवार्य है।

(2) वर्षा का असमान वितरण (Unequal Distribution of Rainfall):-

      यद्यपि देश में वर्षा का औसत 100 सेण्टीमीटर है, किन्तु इसका क्षेत्रीय वितरण असमान है। उदाहरण के लिए पश्चिमी तटीय क्षेत्रों और असम प्रदेश में 250 सेण्टीमीटर से भी अधिक वर्षा होती है। उत्तरी मैदान और प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में यह 100 से 200 सेण्टीमीटर ही होती है। पंजाब के मैदान और दक्षिण प्रायद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों में वर्षा की मात्रा केवल 25 से 100 सेण्टीमीटर होती है।

        गंगा नदी के पूर्वी मैदान तथा पश्चिमी समुद्री तट को छोड़ कर अन्य सभी भागों में वर्षा की कमी से सदैव अकाल का संकट बना रहता है। राजस्थान, हरियाणा और दक्षिणी पंजाब में तो बहुत कम वर्षा होने से सिंचाई के बिना खेती करना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार दक्षिणी पठार के मध्यवर्ती एवं आन्तरिक भागों में कृषि बिना समुचित सिंचाई के सम्भव नहीं है, क्योंकि इन प्रदेशों में या तो सूखा पड़ता है या फिर वर्षा बहुत कम होती है।

(3) वर्षा का कुछ ही महीनों में सीमित होना (Restriction of Rainfall to few months):-

       भारत के सभी भागों में एक ही मौसम में वर्षा नहीं होती। शीतकाल में केवल दक्षिण-पूर्वी भाग में ही वर्षा होती है और शेष भाग सूखे रहते हैं। वर्षा का 74% जून से सितम्बर के महीनों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा प्राप्त होता है, शेष का एक भाग शीत ऋतु में उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकालीन चक्रवातों द्वारा ऐसी स्थिति में वनस्पति अथवा कृषि उत्पादन के लिए लम्बे शुष्क काल में सिंचाई आवश्यक हो जाती है।

(4) जनसंख्या में वृद्धि (Growth in Population):-

      भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 121 करोड़ है। प्रतिवर्ष बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अधिकाधिक मात्रा में खाद्यान्नों की आवश्यकता पड़ती है। देश में इनका उत्पादन कम होने से अभाव के वर्षों में अनाज आयात करना पड़ता है।

           अतः आयात बन्द करने के लिए अतिरिक्त उत्पादन, गहरी खेती और प्रति हेक्टेअर एक से अधिक फसले उगाने से ही सम्भव है। इसके लिए सिंचाई करना अनिवार्य है। ऐसा अनुमान है कि यदि गेहूँ और धान उत्पादक क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था बराबर की जा सके तो इन अनाजों का अतिरिक्त उत्पादन प्रतिवर्ष 1 करोड़ से 1.5 करोड़ टन तक बढ़ाया जा सकता है।

(5) विशेष फसलों के लिए अधिक जल की आवश्यकता (Some Special Crops Require more Water):-

       चावल, गन्ना, जूट, मिर्ची, प्याज, लहसुन, आलू, आदि फसलों के लिए नियमित रूप से अधिक जल की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल की फसलें और बरसीम आदि के लिए प्रतिवर्ष 90 सेण्टीमीटर, रसदार फलों के लिए 100 सेण्टीमीटर तथा कठोर फलों के लिए 75 सेण्टीमीटर अतिरिक्त वर्षा की आवश्यकता पड़ती है। अतः अतिरिक्त जल की पूर्ति सिंचाई द्वारा की जाती है।

(6) मिट्टी की प्रकृति (Nature of Soil):-

       उत्तरी मैदान तथा नदियों के डेल्टाओं में उपजाऊ कांप मिट्टी पायी जाती है। जिससे थोड़ी सिंचाई करने से ही उत्पादन बढ़ जाता है। अन्य भागों में बलुई और दोमट मिट्टी अधिक समय तक जल रोकने में असमर्थ रहती है, अतः उसे कृषि योग्य बनाए रखने के लिए बार-बार सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है।

(7) चारागाहों के विकास के लिए (For Development (of Pastures):-

        पशु पालन और दुग्ध व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के लिए प्राकृतिक चारागाहों की रक्षा करना आवश्यक है तथा नए चारागाहों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता होना आवश्यक है।

(8) व्यावसायिक फसलों में वृद्धि के लिए (For Increas- ing Commercial Crops):-

         कृषि के अन्तर्गत कुल क्षेत्र के 20% पर व्यावसायिक फसलें पैदा की जाती हैं, जिनसे कृषि उत्पादन के कुल मूल्य का 35% प्राप्त होता है। इन फसलों के अन्तर्गत केवल 16% भाग को ही सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। चूंकि व्यावसायिक फसलों के निर्यात द्वारा भारत को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में लगभग 9% विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है और देश के उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है, अतः इनके उत्पादन में वृद्धि करने के लिए सिंचाई की विशेष आवश्यकता पड़ती है।

(9) भारत में वर्षा प्रायः तेज बौछारों के रूप में होती है जो कृषि के लिए हितकर नहीं है। इससे वर्षा का जल भूमि में रिस नहीं पाता और भूमि प्यासी रह जाती है। निरन्तर फसलों के उत्पादन के लिए तब सिंचाई कना अनिवार्य हो जाता है।


प्रश्न प्रारूप

1. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? विवेचना कीजिये।

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश



        भारत एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु यहाँ कृषि की दशा संतोषजनक नहीं है। भारत की जनसंख्या का लगभग 70% भाग कृषि कार्य में लगा हुआ है लेकिन इसके उपरान्त भी भारतीय कृषक की दशा अच्छी नहीं है। निम्न स्तर पर सीमित विकास के बावजूद आज भी भारतीय कृषक परम्परावादी हैं।

        भारतीय किसान कृषि कार्य को एक व्यवसाय के रूप में नहीं करता है, बल्कि जीविकोपार्जन के लिए करता है। कृषि की पुरानी विधियों, पूँजी की कमी, भूमि सुधार की कमी, विपणन एवं वित्त सम्बन्धी कठिनाइयों आदि के कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता अत्यन्त न्यून है। अब नई पीढ़ी में शिक्षा एवं कृषि को कमाई का साधन मानने की प्रवृत्ति से भी कृषि एवं कृषक की आर्थिक दशा में कुछ सुधार आने लगा है। भारतीय कृषि की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं, जिनसे भारतीय कृषि शताब्दियों से पीड़ित है-

(1) भूमि पर जनसंख्या का निरन्तर बढ़ता हुआ भार:-

     भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है, अतः भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रतिव्यक्ति उपलब्ध भूमि का औसत कम होता जा रहा है। 1921 में यह 0.8 हेक्टेयर था, 1931 में 0.72, 1941 में 0.64, 1951 में 0.75 तथा 1981 में घटकर यह 0.18 एवं 2011 में 0.12 हेक्टेयर हो गया, जबकि विश्व का यह औसत 0.2 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है। विश्व के कुछ देशों में जैसे- कनाडा में 2.12 है, अर्जेन्टाइना में 1.25 है, रूस में 1.03 है, सं. रा. अमेरीका में 0.89 तथा आस्ट्रेलिया में 3.39 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है।

(2) भूमि का असमान वितरण:-

       भारत में भूमि का वितरण बहुत ही असमान एवं असन्तुलित है। देश में आज भी 62 प्रतिशत कृषि भूमि केवल 10 प्रतिशत किसानों के पास है तथा शेष 38 प्रतिशत भाग ही 90 प्रतिशत किसानों के पास है। इस तरह एक ओर जहाँ बड़े किसान अपनी भूमि क्षमता का समुचित उपयोग नहीं कर पाते वहीं दूसरी ओर छोटे किसान अपनी गुजर बसर करने में असमर्थ रहते हैं। यद्यपि भारत में 1952 में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया जा चुका है, लेकिन स्थिति में आशाजनक सुधार अभी तक नहीं हो पाया है।

(3) कृषि जोतों का बिखराव एवं भूमि का विभाजन:-

       भारत में उत्तराधिकार के नियमों के कारण भूमि का बंटवारा होता रहता है। इस कारण खेतों का आकार बहुत छोटा हो गया है। छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए रहते हैं। इस कारण आधुनिक यंत्रों के द्वारा उन्नत कृषि नहीं की जा सकती है।

(4) कृषि की न्यून उत्पादकता:-

       1970 तक देश के अधिकांश भागों में औसत उत्पादन स्तर अधिकांश विकसित व कई विकासशील देशों (मैक्सिको, ब्राजील, फिलीपीन्स) से भी काफी कम रहा, लेकिन अब हरित क्रांति एवं सरकारी प्रयत्नों से स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है। गेहूँ, चावल, तिलहन, दलहन आदि फसलों के प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हुई है।

(5) सिंचाई के साधनों की कमी:-

       भारतीय कृषि अधिकतर मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है और मानसून हमेशा अनियमित बना रहता है। ऐसी स्थिति में सिंचाई के साधनों की अत्यधिक आवश्यकता होती है, किन्तु दुर्भाग्य है कि आज भी सिंचाई के पर्याप्त साधनों का अभाव है। सिंचाई के साधनों के अभाव में आधुनिक ढंग से कृषि कार्य करना कठिन होता है। अतः आज भी भारतीय कृषि की दशा में सुधार नहीं हो सकी।

(6) कृषि आदानों का अभाव:-

       भारतीय कृषकों के पास कृषि आदानों (कृषि सामाग्रियों) का हमेशा अभाव बना रहता है, जिससे वे अच्छे बीज, खाद, सिंचाई, कृषि यंत्र आदि का उपयोग नहीं कर पाते हैं। इन साधनों के अभाव में कृषि कार्य करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है।

(7) साख सुविधाओं की कमी:-

        भारतीय कृषकों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, इस कारण उनके सामने हमेशा आर्थिक संकट बना रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में साख-सुविधाओं का आज भी अभाव है। अतः कृषकों को वित्त पूर्ति के लिए गांव के महाजन एवं साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। साहूकार ऊँची ब्याज दर वसूल करता है एवं कृषकों के साथ धोखाधड़ी करता रहता है। इस प्रकार एक बार जो कृषक साहूकार के चंगुल में फंस जाता है फिर उसका बाहर निकलना कठिन होता है। ये देशी महाजन बड़ी मात्रा में कृषकों का शोषण करते हैं, फलतः कृषक अपनी दीन-हीन दशा के कारण कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दे पाता।

(8) मृदा अपरदन:-

        मृदा अपरदन के कारण कृषि भूमि को क्षति पहुंचती है, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। जहां प्रतिवर्ष विस्तृत क्षेत्रों में भूमि का ह्रास हो जाता है वहां भूमि कृषि योग्य नहीं रहती है।

(9) धार्मिक एवं सामाजिक कारण:-

      भारतीय कृषक भाग्यवादी एवं अंधविश्वासी होता है। वह कृषि के विकास पर व्यय करने की अपेक्षा शादी, मृत्यु-भोज, सामाजिक रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है। इस प्रकार कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

(10) कृषि बीमा का अभाव:-

        भारत में कृषि बीमा का अभाव है। किसानों को किसी-किसी वर्ष बाढ़, सूखा एवं विभिन्न प्रकार के कृषि रोगों से कृषि उत्पादन में भारी क्षति उठानी पड़ती है, यहाँ तक कि उस आय से वह उत्पादन का खर्च भी प्राप्त नहीं कर पाता और उनकी स्थिति इतनी दयनीय हो जाती है कि वे आत्महत्या तक के लिए विवश हो जाते हैं। ऐसी अनिश्चितताओं के कारण भारतीय किसान फसलों का व्यावसायिक उत्पादन करने से डरता है, यदि देश में कृषि बीमा का सर्वव्यापीकरण हो जाए तो कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।

(11) विपणन व्यवस्था का अभाव:-

        विपणन व्यवस्था का अभाव भारतीय किसान की एक महत्वपूर्ण समस्या है, क्योंकि इसके अभाव में किसान को अपने फसल उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है। विपणन की व्यवस्था नगरों या कस्बों तक सीमित है, जबकि फसलों का अधिकांश उत्पादन गाँव में ही होता है। अतः उसे अपना माल मण्डियों तक ले जाने के लिए अतिरिक्त परिवहन व्यय की आवश्यकता पड़ती है, विवश होकर वह अपना माल गाँव में कम मूल्य पर ही बिचौलियों को बेच देता है जिससे उसे कम लाभ प्राप्त होता है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से ग्रस्त है, और आज भी विकसित देशों की तुलना में काफी पिछड़ी स्थिति में है, इसके विकास के लिये अनेकानेक कारग कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश पर प्रकाश डालिए।


34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

       34.भारत की प्राकृतिक वनस्पति



भारत की प्राकृतिक वनस्पति

           प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उगने वाले वनस्पतियों के समुच्य को “प्राकृतिक वनस्पति” कहते हैं। दूसरी ओर वैसी वनस्पति जो मानवीय हस्तक्षेप से विकसित होती हैं उन्हें “मानव जनित वनस्पति” कहते हैं। जैसे- बाग-बगीचा, उद्यान आदि।

       प्राकृतिक वनस्पतियों के ऊपर जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। कोपेन के अनुसार उपरोक्त तीनों कारकों में सर्वाधिक प्रभाव जलवायु का पड़ता है। उन्होंने बताया कि- “वनस्पति जलवायु का सूचकांक होता है।”

     प्राकृतिक वनस्पति में पुनर्नवीनीकरण का गुण पाया जाता है। इसका तात्पर्य है कि यदि पृथ्वी को 25 वर्षों तक स्वतंत्र छोड़ दिया जाय तो यह पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों से भर जायेगी। पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों में अनुकूलन की क्षमता भी पायी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार

     भारत की प्राकृतिक वनस्पति प्राकृतिक वातावरण में रहते हुए विविध रूपों में रूपान्तरित हो चुकी है। भारत में लगभग 30 हजार से अधिक प्रकार के वनस्पति पाये जाते हैं। इन वनस्पत्तियों को वर्षा और तापीय स्थिति के आधार पर छ: भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

(4) ज्वारीय वनस्पति

(5) उपोषण पर्वतीय वनस्पति

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति-

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति की तुलना ‘विषुवतीय वनस्पति’ से की जाती है। इसकी सामान्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

(i) इसकी वृक्ष की लम्बाई 30-60 मी० तक होती है।

(ii) इसकी जड़े बहुत गहराई तक नहीं पहुँच पाते हैं क्योंकि धरातल पर ही उन्हें पर्याप्त वर्षा जल प्राप्त हो जाती है।

(iii) पौधों में शाखाएँ कम पायी जाती हैं जिसके कारण इसका बितान कम चौड़ा होता है।

(iv) इसका तना काफी कठोर होता है।

(v) पत्तियाँ चौड़ी होती हैं क्योंकि सूर्य की रोशनी प्राप्त करने के लिए पौधों में प्रतिस्पर्धा चलती है।

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति में विविध प्रकार के वृक्ष एक साथ मिलते हैं। वृक्षों के ऊपर बड़े पैमाने पर अधिपादप (Ekiphyte) पाये जाते हैं। वृक्ष सालोंभर हरे-भरे रहते हैं। ये एक ही बार में सभी पत्तियों को नहीं गिराते, इसीलिए इसे “चिरहरित सदाबहार वनस्पति” कहते हैं। प्रमुख वृक्षों में महोगनी, बालनट, आबनूस, कब्रेका, सिनकोना, गाटापार्चा, एबोनी, रबड़, तेलताड़, सीडर, रोजवुड, आयरन वुड आदि हैं।

       उष्णार्द्र सदावहार वनस्पति सामान्यतः वैसे क्षेत्र में विकसित होती है, जहाँ वर्षा सालों भर होती है। तापमान अति उच्च रहता है। वर्षा 130-250 cm के बीच होती है। औसत तापमान 22°- 27°C, वायुमण्डलीय आर्द्रता 70% तथा तापान्तर 10°C से कम रहता है।

        भारत में विषुवतीय वनस्पति के तीन प्रमुख क्षेत्र है-

(i) अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह,

(i) मालाबार और कोंकण तट,

(iii) उ.-पू. भारत

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

         भारत के मानसूनी जलवायु क्षेत्रों में उगने वाले वनस्पति को मानसूनी वनस्पति कहते हैं। मानसून क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दो शुष्क एवं आर्द्र जलवायु पायी जाती है। उष्णार्द्र मानसूनी वनस्पति शुष्क मौसम में पत्तियाँ गिरा देती है जिसे “पतझड़ मानसूनी वन” कहते हैं। जैसे- शीशम, पीपल, सागवान, इमली, अमलतास, एक्सल, सेमल आदि। मानसूनी प्रदेश में कुछ ऐसे भी वृक्ष मिलते हैं जो एक ही बार पत्तियों को नहीं गिराते हैं। जैसे- आम, अमरूद, बरगद इत्यादि। मानसूनी वनस्पति की जड़े विषुवतीय वनस्पति की तुलना में लम्बी होती है। तना मोटा होता है। बितान चौड़ा होता है। पतियों की चौड़ाई सामान्य होती है। वृक्षों के छाल काफी मोटे होते हैं। शुष्कता से बचने के लिए ही पौधे पत्तियों को गिराती है।

       मानसूनी वनस्पति मानसूनी जलवायु के प्रभाव में उगने वाली वनस्पति है। यहाँ न्यूनतम तापमान 18ºC अधिकतम तापमान 35°C, वर्षा ऋतु में वर्षा की मात्रा 60-130 cm नवम्बर से मई महीने तक मौसम शुष्क पायी जाती है।

        मानसूनी वनस्पति का विस्तार गंगा के मैदानी क्षेत्र, शिवालिक पर्वत, असम के मैदान, कोयम्बटूर के पठार, मध्यवर्ती भारत में हुआ है। भारत में मानसूनी वनस्पति का विस्तार सबसे अधिक क्षेत्र पर हुआ है।

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

          शुष्क जलवायु प्रदेशों में उगने वाले वनस्पति को “शुष्क और अर्द्धशुष्क वनस्पति” कहते हैं। सामान्यतः ऐसे वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं-

(i) अर्द्ध शुष्क वनस्पति

(i) पूर्ण शुष्क वनस्पति

           अर्द्ध शुष्क वनस्पति में घासभूमि और झाड़ियाँ बड़े पैमाने पर मिलती है। झाड़ियों की ऊँचाई 6-9 मी० तक होती है। जबकि पूर्ण शुष्क वनस्पति में कंटीले या कैक्टस वनस्पति का विकास बड़े पैमाने पर होता है। खेजड़ी अर्द्धशुष्क प्रदेश की प्रमुख वृक्ष हैं। जबकि पूर्ण शुष्क प्रदेश में नागफनी, बबूली, खजूर जैसे वृक्ष मिलते हैं। शुष्क वातावरण होने के कारण पौधों की जड़ें जलग्रहण करने हेतु काफी लम्बी हो जाती है। पत्तियाँ काँटों में रूपान्तरित हो जाती है। पति और तना के ऊपर मोम जैसे परत विकसित हो जाते हैं। कीटों को आकर्षित करने हेतु फूलों के रंग काफी चटकदार हो जाते हैं।

       50-100 cm वर्षा वाले क्षेत्रों में अर्द्धशुष्क वनस्पति का विकास होता है। जबकि 50 cm ये कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पूर्ण शुष्क वनस्पति का विकास होता है। शुष्क मानसूनी वनस्पति का विकास वहीं होता है जहाँ 8-11 माह तक शुष्क मौसम रहती है। तापमान और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया अधिक होती है।

        अरावली पर्वत के पूर्वी भाग में, द. भारत के वृष्टिछाया प्रदेश में तथा लेह लद्दाख क्षेत्र में ‘अर्द्धशुष्क वनस्पत्ति’ पायी जाती है। जबकि थार मरुस्थलीय क्षेत्र में “पूर्ण शुष्क वनस्पति” पायी जाती है।

(4) ज्वारीय वनस्पति

        इसे ‘गरान’ या ‘मैंग्रोव वनस्पति’ भी कहा जाता है। इसका विकास तटीय क्षेत्रों में हुआ है। चूँकि तटीय क्षेत्रों में लवण की मात्रा अधिक पायी जाती है। इसलिए लवणीय वातावरण के साथ इनका अनुकूलन हुआ है। ज्वारीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वारीय प्रवाह क्षेत्र के वन-

        इसे सुन्दर वन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सुन्दरी, केन और बेंत नामक वृक्ष मिलते हैं। इन वृक्षों की ऊँचाई 30 मी० तक होती है। लकड़ियाँ काफी नाजुक होती है।

(ii) ज्वारीज प्रवाह से मुक्त प्रदेश की वनस्पति-

         यहाँ ताड़ और नारियल जैसे वृक्ष प्रमुख हैं। इनकी लम्बाई बहुत अधिक होती है। तना में रेशम पायी जाती है जिसके कारण लकड़ियाँ काफी मजबूत होती है।

     ज्वारीय वनस्पति मुख्य रूप से विषुवतीय वातावरण में उगने वाली वनस्पति है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में अधिक लवण पाये जाने के कारण अनुकूलन की क्षमता पायी जाती है। जैसे- धरातल के ऊपर आ जाते हैं ताकि श्वसन की क्रिया आसानी से हो सके।

      भारत में ज्वारीय वनस्पति का विकास तटवर्ती क्षेत्रों में स्थित ज्वारनदमुख, नदियों के मुहानों, संकरी खाड़ियों या निवेशिकाओं में हुआ है। गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा मैन्ग्रोव वनस्पति का क्षेत्र है।

(5) उपोष्ण पर्वतीय वनस्पत्ति

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति का विकास वैसे क्षेत्रों में हुआ है जहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है। लेकिन, ऊँचाई के कारण जलवायु में परिवर्तन हुई है और यह उपोष्ण जलवायु में बदल चुकी है। उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते है। जैसे-

(i) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति और

(ii) आर्द्र शीतोष्ण पहाड़ी वनस्पति

      आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति 1070-1525 मी० की ऊँचाई पर मिलती है। जबकि आर्द्र शीतोष्ण वनस्पति 1525 से भी अधिक ऊँचाई पर मिलती है। ऐसे वनस्पति को ‘सोलास वन या शोला वन के नाम से भी जानते हैं। उपरोक्त दोनों प्रकार के वनों में मिलने वाले वृक्ष सदाबहार प्रकार के होते हैं। ज्यों-2 ऊँचाई बढ़ती जाती है त्यों-2 लकड़ी गुलायम तथा पते की चौड़ाई कम होते जाती हैं। चेस्टनट, रोजवुड, यूकेलिप्टस, देवदार, पाइन इत्यादि वृत मिलती हैं।

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति उपोष्ण जलवायु क्षेत्र में पायी जाती हैं। यह प्रायद्वीपीय भारत की वनस्पति है। जो अरावली, विन्ध्यन, सतपुड़ा, अजन्ता, पूर्वी घाट, प० धाट, नीलगिरि, अन्नामलाई की पहाड़ियों पर 1070 मी० से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलते हैं।

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

         इसे अल्पाइन वनस्पति भी कहते हैं। हिमालय प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति पर निम्न कारकों का प्रभाव पड़ा है। उच्चावच, पवन, वर्षा की मात्रा, ऊँचाई के साथ तापीय परिवर्तन, अक्षांश और ढाल का।

     हिमालय का उत्तरी ढाल मंद और द० ढाल तीव्र है जिसके कारण उत्तरी ढालों पर वनों का विस्तार अधिक तथा दक्षिणी ढालों पर वनों का विस्तार कम हुआ है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर कश्मीर हिमालय में मिलने वाले घास को ‘गुलमर्ग’ और ‘सोनमर्ग’ तथा कुमायूँ हिमालय में बुग्याल और ‘प्यायर’ कहते हैं। यह एक शीतोष्ण प्रकार के मुलायम घास है जिसका प्रयोग पशुचारे के रूप में किया जाता है।

       अक्षांशीय प्रभाव के आधार पर भी हिमालय के वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं।

 (i) पूर्वी हिमालय की वनस्पति और

(ii) पश्चिमी हिमालन की वनस्पति।

        पूर्वी हिमालय निम्न अक्षांश पर है। अतः यहाँ आर्द्रता अधिक, वर्षा 200 cm तक और सूर्य की लम्बवत किरणें मिलती है। जबकि पश्चिम हिमालय अपेक्षाकृत उच्च अक्षांश पर स्थित है जिसके कारण आर्द्रता कम, वार्षिक वर्षा 75 से कम और सूर्य की लम्बवत किरणों का प्रभाव कम पड़ता है। पूर्वी हिमालय में पतझड़ वन मिलते है जबकि प० हिमालय में नहीं। इसी तरह प० हिमालय में शीतोष्ण शुष्क वनस्पति मिलती है जबकि पूर्वी हिमालय में नहीं।

        हिमालय प्रदेश की वनस्पति पर उच्च्वाच का व्यापक प्रभाव पड़ा है। ऊँचाई के अनुसार ताप में परिवर्तन होते है और उसी के अनुरूप वनस्पति बदलते हैं जिसे नीचे के चित्र में दिखाया गया है।

भारत की प्राकृतिक

चित्र: भारत के प्राकृतिक वनस्पति

            इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में अनेक प्रकार के प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती हैं। इन वनस्पतियों पर जलवायु, उच्चावच, ढाल, मिट्टी, सूर्याताप, समुद्र से दूरी इत्यादि भौगोलिक काकों का प्रभाव पड़ा है। इन कारकों में सबसे ज्यादा प्रभाव जलवायु का पड़ा है। इसलिए कोपेन का कथन सत्य प्रतीत होता है कि “भारतीय वनस्पतियाँ जलवायु के सूचकांक होती हैं।”

प्रश्न प्रारूप

1. “भातीय प्राकृतिक वनस्पतियाँ जलवायु के सूचक हैं।” विवेचना करें।

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश


हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

            हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत है जो भारत के उत्तर में एक चाप के रूप में अवस्थित है। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज/दर्रा से लेकर  ब्रह्मपुत्र गॉर्ज(नामचा बरबा) के मध्य हुआ है। इसकी लम्बाई लगभग 2500Km है। कश्मीर में इसकी चौड़ाई सबसे अधिक (450Km) और अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौड़ाई सबसे कम (150 Km ) है। इस पर्वत में विश्व की कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। ये चोटियाँ सालोंभर हिम से आच्छादित रहती है। इसलिए इसे हिमालय कहते हैं।

          हिमालय का निर्माण अल्पाइन भूसंचलन से तृतीयक काल में हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इसमें तीन प्रमुख श्रृंखलाएँ मिलती हैं। लेकिन पश्चिम से पूर्व की ओर जाने पर स्थलाकृतिक विशेषता के आधार पर इसे चार भागों में वर्गीकृत करते हैं। जैसे-

(1) पंजाब हिमालय / कश्मीर हिमालय / हिमाचल हिमालय

(2) कुमायूँ हिमालय

(3) नेपाल हिमालय

(4) असम हिमालय

हिमालय के स्थलाकृतिक

चित्र: हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

(1) पंजाब हिमालय:- 

        इसे “कश्मीर हिमालय” हिमालय भी कहते हैं। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से लेकर सतलज गॉर्ज (शिपकिला दर्रा) के मध्य हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 560 Km है। यह हिमालय का सबसे चौ० भाग है। चौड़ा होने का प्रमुख कारण हिमालय के साथ-2 ट्रांस हिमालय का पाया जाना है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर क्रमश: काराकोरम, जास्कर श्रेणी, महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय पायी जाती है।

             लघु हिमालय को कश्मीर में पीरपंजाल के नाम से जानते हैं। कश्मीर हिमालय अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस हिमालय में कई क्षेत्रीय विशेषताएं भी पायी जाती हैं। जैसे- ट्रांस हिमालय का निर्माण मुख्य हिमालय के निर्माण से पहले हुआ है। ट्राँस हिमालय पर सालोभर बर्फ, जमी रहती है। हिमानी के अपरदन से सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास हुआ है। यह पूर्णत शीतोष्ण अर्द्धमरुस्थल का भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

            कश्मीर हिमालय में अवस्थित सभी श्रृंखलाओं का उत्तरी ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है। महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में कश्मीर की घाटी अवस्थित है जिसमें डल वुलर झील से होकर झेलम नदी प्रवाहित होती है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मुलायम घास के क्षेत्र मिलते हैं जिसे सोनमर्ग  और गुलमर्ग कहते हैं। पीरपंजाल हिमालय पूर्णतिः वनस्पतियों, जंगलों से ढका हुआ है। इसी पर्वत में पीरपंजाल दर्रा पायी जाती है जिस दर्रे से होकर कुलगाँव से कोठी पहुंचा जाता है।

            बनिहाल दर्रे जम्मू को श्री नगर से जोड़ता है। इसी दर्रा में जवाहर सुरंग का निर्माण किया गया है। महान हिमालय में बुर्जिला और जोजिला जैसे प्रमुख दर्रे मिलते हैं। ट्रांस हिमालय और महान हिमालय में कई हिमानी का प्रमाण मिलता है। जैसे-  काराकोरम श्रेणी का सियाचीन हिमानी सबसे प्रमुख हैं।

(2) कुमायूँ हिमालय:-

        इसका विस्तार सतलज गॉर्ज से लेकर काली नदी के बीच हुआ है। इसका विस्तार हिमाचल प्रदेश और उतराखण्ड में देखा जा सकता है। इसकी लम्बाई मात्र 320Km है। यह हिमालय का सबसे कम लम्बाई वाला हिस्सा है। यहाँ पर महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय तीनों स्पष्ट रूप से पायी जाती है। महान हिमालय में माना और नीति दो प्रसिद्ध कॉल पाये जाते हैं। इसके अलावे नदियों के द्वारा निर्मित कई दर्रे पाये जाते हैं। जैसे थागला दर्रा, लिपुलेख, पिथौरागढ़ दर्रा सबसे प्रमुख है। महान हिमालय में यमुनोत्री, गंगोत्री, मिलाम, पिण्डारी जैसे प्रसिद्ध हिमानी पाले जाते हैं।

          कुमायूँ हिमालय में नंदादेवी (7817m) और कामेट (7756m) जैसे ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मिलने वाले वनस्पति को बुग्याल और पैय्यार कहते हैं। लघु हिमालय को इस क्षेत्र में धौलाधर, मसूरी पहाड़ी और कुमायूँ पहाड़ी के नाम से भी जानते हैं। लघु हिमालय पर नैनीताल, मसूरी, अल्मोड़ा जैसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थल पायी जाती है। लघु हिमालय के दक्षिण से शिवालिक हिमालय अवस्थित है जिसकी ऊँचाई बहुत कम है।

         लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय के बीच में मिलने वाले घाटी को दून के नाम से पुकारते हैं जिसमें ‘देहरादून की घाटी’ सबसे प्रसिद्ध है। यह अनुदैर्ध्य घाटी का अच्छा उदाहरण है। पीरपंजाल और धौलाधर पर्वत एक ही क्रम में स्थित है। इन दोनों के बीच में कुल्लू और मनाली की घाटी अवस्थित है जो अनुप्रस्थ घाटी का उदहारण है।

नोट: नन्दादेवी (7817m) कुमायूँ हिमालय की सर्वोच्च चोटी है। गंगा और यमुना नदी कुमायूँ हिमालय से ही निकलती है।

(3) नेपाल हिमालय:-

            इसका विस्तार नेपाल और सिक्कीम में काली नदी से तिस्ता नदी के बीच में हुआ है। यह हिमालय का सबसे लम्बा भाग है जिसकी लम्बाई 800km है। इसमें भी हिमालय की तीनों श्रृंखलाएँ स्पष्ट रूप से पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिण में तिब्बत का पठार स्थित है। महान हिमालय के दक्षिण में लघु हिमालय स्थित है। जिसे महाभारत श्रेणी के नाम से जानते हैं।

             महान हिमालय और महाभारत श्रेणी के बीच में काठमाण्डु की घाटी अवस्थित है। जो अनुद्धैर्य घाटी का एक उदा० प्रस्तुत करता है। इन क्षेत्र में महान हिमालय पर कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। जैसे- माउण्ट एवरेस्ट (8850m), कंचनजंघा (8598m) इत्यादि। ये क्रमश: हिमालय के प्रथम एवं द्वितीय सबसे ऊँची चोटियाँ हैं। इसके अलावे धौलागिरी, अन्नापूर्णा, मनसालू, गौरीशंकर और मकालू जैसे भी ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती है।

            मध्य हिमालय के दक्षिण में शिवालिक हिमालय स्थित है। अपरदन क्रिया के कारण इसकी ऊँचाई बहुत कम हो चुकी है। यह एक विखण्डित श्रृंखला है। नेपाल और बिहार के सीमा पर शिवालिक पर्वत को ही ‘सोमेश्वर की पहाड़ी’ (874- मी0) कहते हैं। 

(4) असम हिमालय:-

           इसका विस्तार असम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान में हुआ है। इसका सीमांकन तिस्ता नदी से नामचा बरबा गॉर्ज के बीच किया जाता है। इसकी इसकी लम्बाई 750 km है। यहाँ महान हिमालय लगभग 9 महीने तक बर्फ से शिवालिक ढका रहता है और मध्य हिमालय ही पायी जाती है। यहाँ शिवालिक हिमालय की श्रृंखला विलुप्त हो चुकी है। लघु हिमालय को मिश्मी और डाफला नाम से जानते हैं। लघु हिमालय यहाँ पर कई भागों में विभक्त हो चुकी है। लघु हिमालय के दक्षिण में धँसान क्रिया के फलस्वरूप ब्रह्मपुत्र रेम्प घाटी का विकास हुआ है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय की प्रत्येक स्थलाकृतिक प्रदेश अपने-2 विशिष्ट लक्षणों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में मानवीय हस्तक्षेप के कारण भू-दृश्य में तेजी से परिवर्तन हो हा है। अतः आवश्यकता है कि इस प्रदेश के भूदृश्य को विश्व धरोहर में शामिल कर इसे अक्षुण्ण बनाये रखा जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय को स्थलाकृतिक प्रदेशों में विभक्त कीजिए और प्रत्येक प्रदेश के विशिष्ट लक्षणों का वर्णन कीजिए।

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास



हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास 

        कई पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन के कारण प्राचीन टेथिस सागर में नदियों के द्वारा लाकर मलवा जमा किये जाने तथा उनमें पड़े वलन की क्रिया से हिमालय जैसे पर्वत का निर्माण हुआ है। भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय पर्वत का निर्माण केनोजोइक महाकल्प के तृतीयक काल में हुए अल्पाइन भूसंचलन से हुआ है। पुन: भूवैज्ञानिकों के अनुसार ओलीगोसीन में महान हिमालय, मायोसीन में मध्य हिमालय तया प्लायोसीन एवं प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक हिमालय का निर्माण हुआ।

       हिमालय पर्वतीय क्षेत्र के उत्पान और विकास का स्पष्ट प्रभाव नदी के प्रतिरूप पर पड़ा है। जैसे:-   

    कई प्रसिद्ध भूवैज्ञानिकों का मत है कि तृतीयक काल में लघु हिमालय के दक्षिण में उसके समानान्तर एक विशालकाय नदी थी जो पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती थी। यह नदी उत्तर-पश्चिम भारत में जाकर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुड़ जाती थी। पैस्को और पिल्ग्रीम जैसे भूगोलवेताओं ने इस प्राचीन नदी का नाम शिवालिक नदी या ‘इण्डो ब्रह्मा नदी’ दिया है।

       जब इस नदी में हिमालय के नदियों द्वारा मलवा का लगातार निक्षेपण होता रहा तो इसकी तली में दबाव की क्रिया के कारण इस मलवा में पुन: उत्थान की क्रिया सम्पन्न हुई। इस उत्थान से शिवालिक नदी का जल ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने से कई अनुवर्ती नदियों का जन्म हुआ। ये नदियाँ काफी छोटी-2 हैं और मे उत्तर भारत की मुख्य नदियों की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

       सिन्धु, सतलज, कोसी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ पूर्ववर्ती नदी के उदाहरण है। पूर्ववर्ती नदी तात्पर्य वैसे नदी से है जिसका निर्माण किसी भी प्रदेश के उत्थान के पूर्व से ही नदी की प्रवाह जारी है। उपरोक्त पूर्ववर्ती नदी के बारे में भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय के उत्थान का दर नदी के अपरदन के दर से कम था जिसके कारण उपरोक्त पूर्ववर्ती नदियों ने हिमालय पर्वत को जगह-2 पर अपरदित करके गहरे गॉर्ज और दर्रों का निर्माण की हैं।

         जैसे- सिन्धु नदी नंगा पर्वत के पास काटकर विश्व का सबसे गहरा गॉर्ज सिन्धु गॉर्ज 5200 मी० गहरा का निर्माण करती है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी नामचा बरबा के पास गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है। सतलज नदी महान हिमालय को काटकर शिपकीला दर्रा का निर्माण करती है।

        शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र के दक्षिण में ‘बोल्डर क्ले’ के जमाव से भावर प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण की प्रक्रिया भी हिमालय के विकास से जुड़ा हुआ है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जब भावर प्रदेश से गुजरती हैं तो मे विलुप्त हो जाती है जिससे ‘खण्डित अपवाह तंत्र’ का निर्माण करती है। पुनः ये नदियाँ मैदानी क्षेत्र में दृष्टिगत होने लगती है और ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने की प्रवृति रखती हैं जिसके कारण “समानान्तर प्रतिरूप” का विकास करती हैं। पुनः हिमालय से निकलने वाली नदियाँ समुद्र में मिलने से पहले कई वितरिकाओं में विभक्त हो जाती है जिससे गुंफिट या जालीदार प्रतिरूप का विकास होता है।

         हिमालय पर्वत का अक्ष एक चाप के समान है जो पूरब से पश्चिम दिशा की ओर स्थित है। हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढाल तीव्र और उत्तरी ढाल मंद है। वलन की क्रिया से हिमालय पर्वत में कई अनुप्रस्थ एवं अनुद्धैर्य घाटियों का विकास हुआ है। अनुद्धैर्य घाटियों से होते हुए नदियाँ प्रवाहित होती थीं लेकिन जब हिमालय का विकास या उत्थान होने लगा तो अनुद्धैर्य घाटियों में प्रवाहित होने वाली जल प्रवाह बाधित हो गई, जिसके कारण इन अनुद्धैर्य घाटियों में कई बड़े-2 झीलों का निर्माण हुआ।

          इन झीलों में जब जल की मात्रा अधिक हो गई तो पहाड़ों के ऊपर से प्रवाहित होने लगी। जिसके फलस्वरूप बहते हुए जल से कई स्थानों पर हिमालय पर्वत को काटकर अनुप्रस्थ घाटियों का निर्माण कर ली। इन संपूर्ण परिघटना से हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों में समान आयताकार अपवाह तंत्र का विकास हुआ है। जैसे- कोसी नदी अपने उद्‌गम क्षेत्र में आयताकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

        हिमालय के उत्थान के पूर्व कई ऐसी नदियाँ थी जो भिन्न-2 दिशाओं से आकर टेथिस सागर में आकर गिरती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के बाद बड़ी-बड़ी नदियों ने छोटी-2 नदियों के जल को अपहरण कर लिया जिससे क्रमहीन अपवाह तंत्र का विकास हुआ। जैसे- ब्रह्मपुत्र नदी ने लोहित एवं दिवांग नदी के जल को अपहृत कर ‘क्रमहीन अपवाह तंत्र’ का विकास किया है।

       भूगर्भशास्त्रियों का अनुमान है कि प्राचीन काल में सतलज और यमुनी नदी राजस्थान से होकर बहती थी। पुन: सरस्वती नामक पौराणिक नदी प्रयागराज के पास आकर गंगा से मिलती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के दौरान उ०-प० भारत में हुए उत्थान से सतलज नदी का अपवाह क्षेत्र खिसक कर उ०-प० की तरफ चला गया और सरस्वती एवं यमुना नदी आपस में मिलकर एक नदी के रूप में प्रवाहित होकर मिलने लगी। इस तरह हिमालय के उत्थान एवं विकास से उ०-प० भारत के नदी तंत्र में कई परिवर्तन हुए।

निष्कर्ष

     उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय से निकलने वाली नदियों के ऊप हिमालय के उत्थान एवं विकास का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। यही काण है कि हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में नदी के अनेक प्रतिरूप दिखाई देते है।

हिमालय के विकास के संदर्भ

चित्र: हिमालय की उत्पत्ति एवं विकास

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास की विवेचना करें।

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र



गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र  

          गंगा तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय से निकलने वाली उत्तर भारत की सबसे प्रमुख नदी हैं। ये नदियाँ लम्बी है तथा अनेक छोटी एवं बड़ी महत्त्वपूर्ण नदियाँ इनमें आकर मिलती हैं। इनके सम्मिलित रूप को गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र कहते हैं। इनकी चर्चा हम दो अलग-2 नदी तंत्र में कर रहे हैं।

(1) गंगा नदी तंत्र

    गंगा भारत के सबसे बड़े भाग की नदी तंत्र है। इसका विस्तार लगभग 18 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र पर है जिसका 8.6 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र भारतीय सीमा के अन्तर्गत है। यह हिमालय के पर्वतीय भाग से लेकर मैदान तथा दक्षिण के पठारी भाग तक विस्तृत है। गंगा नदी तंत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हैं। इसका विकास हिमालय के उत्थान के बाद हुआ लेकिन इसको विकसित करने में पूर्ववर्ती का भी योगदान रहा है। इस नदी तंत्र में गंगा मुख्य नदी है।

     गंगा नदी महान हिमालय में गंगोत्री के पास गोमुख हिमानी से निकलती है। इसकी आरंभिक धारा को ‘भागीरथी’ कहा जाता है। उत्तराखण्ड के देवप्रयाग में भागीरथी में अलकनन्दा धारा आकर मिलती है। दोनों की सम्मिलित धारा को ‘गंगा’ कहते हैं। हरिद्वार तक गंगा पर्वतीय भाग से गुजरती है। इसके बाद यह मैदान में प्रवेश करती है। इलाहाबाद के निकट गंगा में यमुना नदी मिलती है। यमुना नदी महान हिमालय में यमुनोत्री हिमनद से निकलती है। यमुना की सहायक नदी चम्बल, कालीसिन्ध, बेतवा, केन आदि प्रमुख हैं। बिहार के चौसा (बक्सर) नामक स्थान पर गंगा बिहार में प्रवेश करती है और कटिहार तथा भागलपुर जिले के बाद झारखण्ड होते हुए गंगा नदी पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।

      गंगा के दाहिने किनारे पर यमुना, टोंस, सोन, पुनपुन, किऊल इत्यादि नदियाँ आकर मिलती हैं। इसमें यमुना को छोड़कर में सभी नदियाँ प्रायद्वीपीय उच्चभूमि से निकलती हैं। गंगा के बाएँ किनारे पर हिमालय से निकलने वाली अनेक नदियाँ जैसे- रामगंगा, गोमती, घाघरा, गण्डक, बुढी गण्डक, कोसी, महानन्दा इत्यादि आकर मिलती हैं।

     दाहिने एवं बाएँ किनारे की सहायक नदियों के जल से परिपूर्ण होकर गंगा पूरब दिशा में पश्चिम बंगाल के फरक्का तक बहती है। फरक्का गंगा डेल्टा का सबसे उत्तरी भाग है। यहाँ गंगा नदी दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा हुगली के नाम से दक्षिण की तरफ बहती है तथा डेल्टा के मैदान से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

      गंगा की मुख्य धारा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती हैं। यहाँ गंगा नदी को “पदमा” कहा जाता है तथा ब्रह्मपुत्र नदी इससे आकर मिलती है। गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की सम्मिलित धारा को “मेघना” कहा जाता है। अन्ततः यह बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। इन नदियों के द्वारा बनाए गए डेल्टा को “सुन्दरवन का डेल्टा” कहते हैं।

(2) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

       इस नदी तंत्र की ब्रह्मपुत्र सबसे प्रमुख नदी है। बह्मपुत्र नदी तिब्बत में मानसरोवर झील के पूर्व 80 किमी० की दूरी पर स्थित हिमानी से निकलती है। इसकी लम्बाई 2900 किमी० है। यह नदी तिब्बत में सांग्पो ने नाम से हिमालय के समानान्तर पूरब की ओर बहती है। पूरब में नामचा बरबा पर्वत को काटकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में बह्मपुत्र नदी को ‘दिहांग’ कहा जाता है। इसके बाद असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। असम के डुबरी जिले के बाद ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में जमुना के नाम से प्रवेश कती है। यहाँ गंगा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

       ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में दिवांग, लुहित, स्वर्णसिरी, धनसीरी, भाद्री, बण्डी, बुढ़ी दिहंग, मानस, सकोंश, तिस्ता, दिसांग, दिखो, कुलसी, कपिली, कोपिती इत्यादि हैं।

     प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु में यह नदी अपने किनारों से ऊप बहने लगती है एवं बाढ़ के द्वारा असम तथा बांग्लादेश में अधिक क्षति पहुँचती है।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

गंगा ब्रह्मपुत्र नदी

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी

(Monsoon of Mechanism)



भारतीय मानसून की प्रक्रिया

      भारत में मानसून की उत्पत्ति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायु-संचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होती है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ द०-प० मानसून से लगभग 80% होती है जबकि 20% वर्षा उ०-पू० मानसून और पछुवा विक्षोभ से होती है।

         ग्रीष्म ऋतु के बाद दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के आगमन से वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। भारत में सबसे पहले द०-प० मानसून 29 मई को अण्डमान & निकोबार द्वीप समूह में 1 जून को केरल के तट पर पहुँचती है।

          केरल के तट पर पहुंचकर द०-प० मानसून पश्चिमी घाट पर्वत से टकराती है और संघनित होकर अचानक मूसलाधार वर्षा करती है जिसे “मानसून विस्फोट” कहा जाता है। 15 जून तक द.-प. मानसून मध्य भारत के आन्तरिक भागों में पहुँच जाती है जिससे 5° से 8°C तापमान में गिरावट दर्ज की जाती है। द०-प० मानसून की दो प्रमुख शाखा है।

(1) अरब सागर की मानसूनी पवन

(2) बंगाल की खाड़ी की मानसूनी पवन

          अरब सागर के मानसून की उत्पत्ति अरब सागर में होती है। जब यह भारत के तट पर पहुंचती है तो यह तीन शाखाओं में बंट जाती है।

(i) पहली शाखा पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदान में 250 cm वर्षा करती है। पश्चिमी घाट से टकराने के बाद‌ यह हवा पूर्वी ढाल के सहारे नीचे उतरती है। लेकिन पूर्वी ढाल के सहारे उतरने वाली इस हवा के कारण वर्षा बहुत कम होती है जिसके कारण पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में वृष्टिछाया प्रदेश का निर्माण होता है।

(ii) अरब सागरीय मानसून की दूसरी शाखा नर्मदा और ताप्ती नदी घाटी के सहारे भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण नर्मदा एवं ताप्ती नदी घाटी क्षेत्र पर्याप्त मात्रा वर्षा प्राप्त करते हैं।

(iii) तीसरी शाखा अरावली पर्वत के समानान्तर राजस्थान में प्रवेश करती है। रास्ते में कोई रुकावट नहीं मिलने के कारण यह राजस्थान के ऊपर से गुजर जाती है जिससे वहाँ वर्षा नहीं हो पाती है। यह शाखा राजस्थान से होते हुए कूल्लू और मनाली के पास जाकर यह हिमालय से टकराती है और वर्षा करती है।

(2) बंगाल की खाड़ी से चलने वाली मानसूनी हवा भी कई छोटे-छोटे शाखाओं में बंट जाती है। इनमें से दो शाखा प्रमुख है-

(i) पहली शाखा बंगलादेश से होते हुए उ०-पूर्वी भारत में प्रवेश करती है।

⇒ इसकी एक शाखा बराक और सूरमा नदी घाटी से गुजरती है जिससे मिजोरम, मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में पर्याप्त वर्षा होती है।

⇒ एक शाखा गारो, खासी, जयंतिया पर्वत से टकराकर विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मासिनराम ग्राम  का निर्माण करती है।

(ii) बंगाल की खाड़ी की दूसरी सबसे प्रमुख शाखा उड़ीसा और प. बंगाल के सहारे भारत में सीधे प्रविष्ट करती है। यह शाखा कोसी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जाकर असम से आने वाली मानसूनी हवा से मिलकर अत्याधिक वर्षण का कार्य करती है।

         धीरे-2 ये दोनों शाखाएँ सम्मिलित रूप से पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होने लगती है जिससे गंगा के उतरी मैदानी क्षेत्र पर्याप्त वर्षा प्राप्त करती है। यह शाखा कुल्लू के पास जाकर अरेबियन शाखा से मिलती है जिसके कारण यहाँ “बादल फटने की घटना” होती है।

          ग्रीष्म ऋतु में गया से प्रयागराज के बीच ITCZ या तीव्र निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाने के कारण बंगाल की खाड़ी की मानसूनी शाखा को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी अक्ष के सहारे धीरे-2 मानसूनी हवा दक्षिण गंगा के मैदान में पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होती है। ज्यों-2 पूरब से पश्चिम की ओर जाती है त्यों-2 आर्द्रता में कमी आने के कारण वर्षा की मात्रा में कमी देखी जाती है।

      पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के दौरान उष्णकटिबंधीय चक्रवात के आँख का विकास होता है जिसके चारों ओर तीव्र गति से हवाएँ चक्र के रूप में घुमकर पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षण कार्य करती है।

मानसून का लौटना

        15 अक्टूबर के बाद भारत से मानसून के लौटने की प्रक्रिया शुरू होती है। मानसून लौटने के दौरान वायु स्थल से समुद्र की ओर चलती है। इसे उत्तर-पूरब मानसून की संज्ञा देते हैं। इस शाखा की एक भाग बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

निकर्ष

       इस तह ऊपर के तथ्यों के स्पष्ट है कि भातीय मानसून की यांत्रिकी काफी जटिल है। इसे नीचे के मानचित्र से भी समझा जा सकता है।

भारतीय मानसून की प्रक्रि

चित्र: द०-प० मानसून की क्रियाविधि

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना



भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

          भारत एक मानसूनी प्रदेश है। यहाँ ही जलवायु मानसूनी है। मानसून एक मौसमी हवा है। ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ (Mausim) अथवा मलायन भाषा के मोनसिन (Monsin) शब्द से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है- मौसम के अनुसार हवाओं का उलट-फेर।

        ब्रिटिश भूगोलवेता हैली महोदय ने बताया कि मानसून एक ऐसी वायु प्रवाह है जो छ: महीने द०-प० से उ०-पू० की ओर (15 मई से 15 नवम्बर तक) तथा अगले छ: महीने (15 नवम्बर से 15 मई तक) उ०-पू० से द०-प० की ओर प्रवाहित होती है। इन्हें चित्रों से समझा जा सकता है:

भारतीय मानसून

मानसून का प्रकार

     भूगोलवेत्ताओं ने मानसून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर करते हुए इसे दो भागों में बाँटा है:- उष्ण कटिबंधीय मानसून और शीतोष्ण प्रदेश की मानसून।

        भारत में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की मानसून है। इसे भी दो भागों में बाँटा गया है :-

(i) द०-प० मानसून,

(ii) उ०-पू० मानसून

             द०-प० मानसून को ग्रीष्मकालीन मानसून तथा उ०-पू० मानसून को शीतकालीन मानसून कहा जाता है। द०-प० मानसून ही भारत की प्रमुख मानसून है। भारत की 80% वर्षा इसी द०-प० मानसून से होती है। यह मानसून अरब सागर से भारतीय उपमहाद्वीप पर जलवाष्प लाकर वर्षा करती है। जबकि उ०-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प लाकर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती है। द०-प० मानसून की तुलना समुद्री समीर से और उ०-पूर्वी मानसून की तुलना स्थलीय समीर से की जा सकती है।

भारतीय मानसून की विशेषताएँ

        भारतीय मानसून की कई विशेषताएँ हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) भारतीय मानसून अपने अनिश्चितताओं के लिए विश्व विख्यात है। अर्थात इनकी आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

(2) भारतीय मानसून भारत का वास्तविक बजट निर्माता है।

(3) मानसून मौसम विशेष की हवा है।

(4) मानसून के कारण भारत में मुख्यत: प्रकार की वर्षा होती है-

(i) पर्वतीय वर्षा

(ii) चक्रवातीय वर्षा।

(5) मानसूनी वर्षा का वितरण अत्यन्त अनियमित है।

(6) मानसूनी वर्षा की मात्रा काफी अनिश्चित है। 

(7) मानसून की विश्वसनीयता संदिग्ध है।

(8) मानसून की वर्षा निरंतर नहीं होती, बल्कि कुछ दिनों के अन्तराल पर रुक-रुक कर होती है।

(9) मानसूनी वर्षा मूल रूप से धरातलीय वर्षा है।

(10) मानसूनी वर्षा भारतीय उपमहाद्वीप के तापमान में कमी लाती है।

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून कई विशेषताओं से युक्त हैं।

भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक:-

       भारतीय मानसून को अनेक कारक प्रभावित करते हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) स्थिति एवं अक्षांशीय विस्तार:-

        भारत मोटे तौर पर 8°4’N से 37°6’N अक्षांशों के मध्य स्थित है। कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है। विषुवत रेखा के पास होने के कारण दक्षिणी भागों में वर्ष भर उच्च तापमान रहता है। दूसरी उतरी भाग गर्म शीतोष्ण पेटी में स्थित है।

       अत: यहाँ विशेषकर शीतकाल में निम्न तापमान रहता है। इसके कारण स्थल और समुद्र पर मिलने वाले वायुदाब में अन्तर आ जाता है। फलत: मध्य मई से मध्य नवम्बर तक द०-प० मानसून सागर से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर और मध्य नवम्बर से मध्य मई तक उ०-पूर्वी मानसून भारतीय उपमहाद्वीप से सागर की ओर अग्रसारित होती है और वे वर्षा करते है।

(2) समुद्र से दूरी:-

        प्रायद्वीपीय भारत अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है। अत: भारत के तटीय प्रदेशों की जलवायु सम है। इसके विपरीत जो प्रदेश देश के आन्तरिक भागों में स्थित हैं, वे समुद्री प्रभाव से अछूते हैं। फलस्वरूप उन प्रदेशों की जलवायु अति विषम या महाद्वीपीय है। समुद्र से निकटवर्ती क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा अधिक और जैसे-2 इससे दूरी बढ़ती जाती है वैसे- वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है।

(3) उत्तरी पर्वतीय श्रेणियाँ:-

       हिमालय तथा उसके साथ की श्रेणियाँ जो उत्तर-पश्चिम में कश्मीर से लेकर उ०-प० में अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई हैं। ये भारत को शेष एशिया से अलग करते हैं। ये श्रेणियाँ शीतकाल में मध्य एशिया से आने वाली अत्याधिक ठण्डी व शुष्क पवनों से भारत की रक्षा करती हैं। साथ ही वर्षादायिनी द०-पश्चिम मानसून पवनों के सामने एक प्रभावी अवरोध बनाती हैं, ताकि वे भारत की उत्तरी सीमाओं को पार न कर सकें। इस प्रकार ये श्रेणियाँ उपमहाद्वीप तथा मध्य एशिया के बीच एक जलवायु विभाजक का कार्य करती है।

(4) स्थलाकृति:-

          देश के विभिन्न भागों में स्थलाकृतिक लक्षण वहाँ के तापमान, वायुमण्डलीय दाब, पवनों की दिशा तथा वर्षा की मात्रा को प्रभावित करते हैं। उत्तर में हिमालय पर्वत नमीयुक्त मानसून पवनों को रोककर समूचे उत्तरी भारत में वर्षा का कारण बनता है। मेघालय पठार में पहाड़ियों की कीपनुमा आकृति से मानसून पवनों द्वारा विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है। अरावली पर्वत मानसून पवनों की दिशा के समानान्तर है।

       अत: यह मानसूनी पवनों को रोकने में असफल होता है। फलस्वरूप वहाँ वर्षा नहीं हो पाती और लगभग सम्पूर्ण राजस्थान एक विस्तृत मरूस्थल में बदल गया है। पश्चिमी घाट द०-प० मानसून पवनों के मार्ग में दीवार की भाँति खड़ा है जिसके कारण इस पर्वत के पश्चिमी ढालों तथा पश्चिमी तटीय मैदान में भारी वर्षा होती है। इसके पूर्व में पवनें नीचे उत्तरती है और ठण्डी व शुष्य हो जाती है। अतः इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है और यह “वृष्टि छाया क्षेत्र” कहलाता है।

(5) मानसूनी पवनें:-

        द०-प० पश्चिमी ग्रीष्मकालीन पवनें समुद्र से स्थल की ओर चलती है और समस्त देश को प्रचुर वर्षा प्रदान करती हैं। इसके विपरीत शीतकालीन उ०-पूर्वी मानसून पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती है और वर्षा करने में असमर्थ होती है। बंगाल की खाड़ी से कुछ जलवाष्प प्राप्त करने के पश्चात ये पवनें तमिलनाडु के तट पर थोड़ी सी वर्षा करती है।

(6) ऊपरी वायु परिसंचरण:-

        भारत में मानसून के अचानक विस्फोट का एक अन्य कारण भारतीय भाग के ऊपर वायु परिसंचरण में होने वाला परिवर्तन भी है। ऊपरी वायुतंत्र में बहने वाली जेट वायुधरायें भारतीय जलवायु को निम्न प्रकार से प्रभावित करती है। जैसे:-

(i) पश्चिमी जेट वायुधारा-

       शीतकाल में, समुद्र तल से लगभग 8Km की ऊँचाई पर पश्चिमी जेट वायुधारा अधिक तीव्र गति से समशीतोष्ण कटिबंध के ऊपर चलती है। यह जेट वायुधारा हिमालय की श्रेणियों द्वारा दो भागों में विभाजित हो जाती है। इस जेट वायुधारा की उत्तरी शाखा इस अवरोध के उत्तरी सिरे के सहारे चलती है। दक्षिणी शाखा हिमालय श्रेणियों के दक्षिण में 25°N अक्षांश के ऊपर पूर्व की ओर चलती है।

       मौसम वैज्ञानिकों का ऐसा विश्वास है कि यह शाखा भारत की शीतकालीन मौसमी दशाओं को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह जेट वायुधारा भूमध्य सागरीय प्रदेशों से पश्चिमी विक्षोभों को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने के लिए उत्तरदायी है। उत्तर पश्चिम मैदानों में होने वाली शीतकालीन व ओलावृष्टि तथा पहाड़ी प्रदेशों में कभी-2 होने वाली भारी हिमपात इन्हीं विक्षाओं का परिणाम है। इसके बाद सम्पूर्ण उतरी मैदानों में शीत लहरें चलती है।

(ii) पूर्वी जेट वायुधारा-

        ग्रीष्मकाल में, उतरी गोलार्द्ध में सूर्य के उत्तरायण के कारण ऊपरी वायु परिसंचरण में परिवर्तन हो जाता है। पश्चिमी जेट वायुधारा के स्थान पर पूर्वी जेट वायुधारा चलने लगती है, जो तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी गर्म जेट वायुधारा विकसित होती है जो 15°N अक्षांश के आस-पास प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर चलती है। यह द०-पश्चिमी मानसून पवनों के अचानक आने में सहायता करती है।

(7) एलनीनो प्रभाव:-

        भारत में मौसमी दशाएँ एलनीनो से भी प्रभावित होती है, जो संसार के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में विस्तृत बाढ़ों और सूखों के लिए उत्तरदायी है। एलनीनो एक सतही उप गर्म जलधारा है। यह कभी-2 द० अमेरिका के पेरू तट से कुछ दूरी पर दिसम्बर के महीने में दिखाई देती है। कई बार पेरू की ठंडी धारा के स्थान पर अस्थायी धर्म धारा के रूप में बहने लगती है। कभी-2 अधिक तीव्र होने पर यह समुद्र के ऊपरी जल के तापमान को 10ºC तक बढ़ा देती है।

         उष्ण कटिबंधीय प्रशान्त महासागरीय जल के गर्म होने से भूमण्डलीय दाब व पवन तंत्रों के साथ-2 हिन्द महासागर में मानसून पवनें भी प्रभावित होती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि 1987 ई. में भारत में भयंकर सूखा एलनीनो का ही परिणाम था।

(8) दक्षिणी दोलन:-

        दक्षिणी दोलन मौसम विज्ञान से संबंधित वायुदाब में होने वाली परिवर्तन का प्रतिरूप है, जो हिन्द व प्रशांत महासागरों के मध्य प्राय: देखा जाता है। ऐसा देखा गया है कि जब वायुदाब हिन्द महासागर में अधिक होता प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र पर अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है अथवा इन दोनों महासागरों पर वायुदाब की स्थिति एक-दूसरे के उलटा होती है। जब वायुदाब प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर  अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है तो भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक शक्तिशाली होती है। इसके विपरीत परिस्थिति में मानसून के कमजोर होने की संभावना अधिक होती है।

     उपरोक्त कारकों के अलावे पश्चिमी विक्षोभ, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब का खिसकाव इत्यादि भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक हैं।

निष्कर्ष

        उपरोक्त तथ्यों विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मानसून ए मौसमी हवा है। इसकी कई विशेषताएँ होती हैं। ये विशेषताएँ मानसून को प्रभावित कने वाले कारकों द्वारा निर्धारित होती हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

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