Category BA SEMESTER/PAPER III

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार


प्रायद्वीपीय भारत के पठार

               प्रायद्वीपीय भारत का बाहरी किनारा विन्ध्यन, अरावली, गारो, खाँसी, जयन्तिया, पूर्वीघाट और पश्चिमी घाट से निर्मित है। ये श्रृंखलाएँ प्रायद्वीपीय भारत को एक पठार के समय में बदल देती है। पुन: सतपुड़ा, हरिश्चंद्र, बालाघाट, बाबाबूदन, श्रीशैलम जैसी छोटी-2 पहाड़ियाँ इस पठार को कई छोटे-2 पठारों में बाँट देती हैं। इसलिए प्रायद्वीपीय भारत को “पठारों का पठार” कहा जाता है। प्रायद्वीपीय भारत में निम्नलिखित पठार पाये जाते हैं-

(1) दक्कन का पठार-

       दक्कन के पठार का विस्तार महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु में हुआ है। महाराष्ट्र के पश्चिमी भाग में इसे ‘महाराष्ट्र का पठार’ जबकि पूर्वी भाग में पूर्वी ‘विदर्भ का पठार’ कहते हैं। इसी तरह से आन्ध्र प्रदेश में उत्तर वाला भाग को तेलंगाना का पठार जबकि दक्षिण वाला भाग रॉयल सीमा का पठार कहलाता है। तमिलनाडु में इसे कोयम्बटूर का पठार कहते हैं जबकि कर्नाटक में इसे मैसूर और बंगलोर का पठार कहते हैं।

         महाराष्ट्र के पठार का औसत ऊँचाई 300-900 m है। इसी पठार पर अजन्ता की पहाड़ी स्थित है। विदर्भ के पठार की औसत ऊंचाई 700 9am है। यहाँ पर पतली लावा की परत पायी जाती है। आन्ध्र प्रदेश में स्थित पठारों की औसत ऊँचाई 300-900 m है। और इसकी ढाल बंगाल की खाड़ी की ओर है। कर्नाटक में स्थित पठारों की औसत ऊँचाई 600-900 m है।

        सम्पूर्ण दक्कत के पठार का निर्माण क्रिटेशियस कल्प में हुए दरारी लावा उद्‌गार से हुआ है। इस पठार पर क्षारीय लावा के निक्षेपण से बैसाल्टिक चट्टानों का निर्माण हुआ है। कहीं-2 केन्द्रीय उद्‌गार होने से शंकु पहाड़ियों अनेक क्रेटर एवं कोल्डेरा का निर्माण हुआ है।

(2) कठियाबाड़ का पठार-

         गुजरात के काठियाबाड़ क्षेत्र में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 200-400 m है। इस पठार पर चूनापत्थर और लावा निक्षेपण का प्रमाण मिलता है। इसी पठार पर एक शंकुनुमा गिर की पहाड़ी स्थित है।

(3) उत्तर का पठार- 

               प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में कई छोटे-2 पठार स्थित है। जैसे:

(i) मारवाड़ का पठार-

         यह राजस्थान के जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर जिला में स्थित है। यह शुष्क मरुस्थलीय प्रदेश के भूदृश्य प्रस्तुत करता है। इनकी औसत ऊँचाई 250-500 m है।

(ii) मेवाड़ का पठार-

           यह राजस्थान के चितौड़, उदयपुर और बाँसवाड़ा जिला में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 250-500 m है। यह पठार काफी उबड़-खाबड़ है। इसी पठार पर हल्दी घाटी का मैदान अवस्थित है।

(iii) मालवा का पठार-

          यह राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है। इसे ढक्कन के पठार का ‘उत्तरी विस्तार’ माना जाता है। मलबा पठार की औसत ऊँचाई 500-600 m मानी जाती है।

(iv) बुंदेलखण्ड के पठार-

          इसका विस्तार दक्षिण-पश्चिम उत्तर प्रदेश और उतरी मध्य प्रदेश के सीमा पर हुआ है। ललितपुर, झाँसी, गुना, विदिशा, ग्वालियर इत्यादि जिले इसी पठार पर अवस्थित है। चम्बल नदी इस पर प्रवाहित होकर उत्खात भूमि का निर्माण करती है। इसकी औसत ऊँचाई 500-600 m है।

(v) बस्तर का पठार और बघेलखण्ड का पठार-

         बस्तर का पठार छतीसगढ़ के दक्षिण में और बघेलखंड का पठार छत्तीसगढ़ के उत्तर में स्थित है। इन दोनों के बीच महानदी के सहायक नदी शिओनाथ (शिवनाथ) सीमा निर्माण करती है। बखेलखण्ड के पठार की औसत ऊँचाई 700-900 m है। जबकि बस्तर के पठार की औसत ऊँचाई 500-700 m है। बस्तर के पठार पर ही दण्डकारण्य क्षेत्र अवस्थित है जो भारत का सबसे अधिक उबड़-खाबड़ वाला क्षेत्र है।

(vi) छोटानागपुर का पठार-

        इसका विस्तार झारखण्ड, द०-पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और छतीसगढ़ में हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 700-900 m है। इस पठार का पश्चिमी भाग सबसे ज्यादा ऊँचा है जिसे पाट (PAT) का पठार कहते हैं। इस पर नेतरहाट नामक पहाड़ी मोनेडनॉक का उदाहरण प्रस्तुत करती है। पाट के पठार के पूरब में में राँची का पठार और हजारीबाग का पठार स्थित है। इन दोनों के बीच में दामोदर नदी सीमा बनाते हुए भ्रंश घाटी में प्रवाहित होती है।

       हजारीबाग पठार पर पारसनाथ के पहाड़ी अवस्थित है। जिसके सबसे अधिक ऊँचाई 1365 m छोटानागपुर पठार के सबसे पूर्वी एवं उतरी भाग को कोडरमा के पठार से सम्बोधित करते हैं। हाजारीबाग और कोडरमा पठार के बीच में कोडरमा की घाटी और चतरा की घाटी स्थित है।

(vii) मेघालय का पठार-

         यह मेघालय राज्य में स्थित है। इसे प्रायद्वीपीय भारत का ही एक भाग माना जाता है। राजमहल गैप के द्वारा यह प्रायद्वीपीय भारत से पृथक है। इस पठार पर गारो, खाँसी और जयन्तिया तीन शंकु पहाड़ी स्थित है।इस प्रकार की औसत ऊँचाई 700-900 m है।

निष्कर्ष

         इस तह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रायद्वीपीय भारत अनेक पर्वतों और अनेक पठारों से निर्मित है। इसके भूदृश्य पर वाह्य एवं आन्तरिक कारकों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।

23. एलनीनो सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत


एलनीनो सिद्धांत

         मानसून की उत्पत्ति के संबंध में “एलनीनो सिद्धांत” को एक नवीन सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त है। एलनीनो के बारे में विश्व को पहली जानकारी तब मिली जब गिल्बर्ट वाकर महोदय 1924 में मध्य प्रशान्त महासागर में बनने वाला “निम्न वायुदाब क्षेत्र” का अध्ययन कर रहे थे। मध्य प्रशान्त महासागर में निम्न वायुदाब क्षेत्र का कारण उन्होंने अलनीनो जलधारा को बताया। पुन: 1987 ई० में भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न हुई तो अलनीनो का संबंध भारतीय मानसून से जोड़ा गया।

         अलनीनो एक गर्म उपसतही जलधारा है जिसकी उत्पत्ति पेरू के तट पर 3ºS से 33ºS अक्षांश के मध्य होती है। यह वह क्षेत्र है जहाँ दोनों गोलार्द्धों की वाणिज्यिक हवाएं अपने नियत मार्ग से होकर प्रवाहित होती है। पुनः पृथ्वी की घूर्णन गति के विरुद्ध यह जलधारा पूरब से पश्चिम दिशा में विषुवत रेखा के समान्तर प्रवाहित होने लगती है। यह जलधारा मध्य प्रशान्त महासागर में बिना कोई अवरोध के प्रवाहित होती है। पुन: मलाया प्रायद्वीप और आस्ट्रेलिया के मध्यवर्ती भाग से गुजरकर यह जलधारा हिन्द महासागर में प्रविष्ट कर जाती है और धीरे-2 इसका फैलावा पूर्वी अफ्रीका के तट तक हो जाता है।

        अलनीनो जलधारा के कारण समुद्री जल का तापमान 3º-10ºC तक बढ़ जाती है। पुनः सामान्य नियम के अनुसार भारत में मानसून सक्रिय होने के लिए यह यावश्यक है कि ग्रीष्म ऋतु में समुद्री सतह पर HP और स्थल पर LP का निर्माण हो। लेकिन अलनीनो का प्रभाव समुद्री क्षेत्र में होते ही समुद्र के ऊपर ग्रीष्म ऋतु में LP का निर्माण हो जाता है और उसके तुलना में स्थल पर HP का निर्माण होता है। फलत: वायु स्थल से समुद्र की ओर चलने की प्रवृति रखती है। जिससे भारत में मानसून सक्रिय हो ही नहीं पाता है।

      अलनीनों का प्रभाव सभी वर्ष एक समान नहीं देखा गया है। अत: इसके प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए (SOS) ‘साउथ ओसीलेशन स्केल” (दक्षिणी दोलन पैमाना) का विकास किया गया है। इन पैमान में दो तरह के सूचकांक (इंडेक्स) विकासत किये गये हैं। जैसे-

(i) अप्रैल महीने में मध्य प्रशान्त महासागर में स्थित टेहिटी (Tahiti) द्वीप पर HP का निर्माण होता है, और ऑस्ट्रेलिया के डार्विन नगर में LP का निर्माण होता है तो यह सकारात्मक मानसून का सूचक है। और

(ii) जब अप्रैल महीने में टेहिटी द्वीप पर LP और डार्विन नगर पर HP का निर्माण हो तो यह नकारात्मक मानसून का सूचक है।

एलनीनो सिद्धांत

चित्र: एलनीनो सिद्धांत के अनुसार मानसून की उत्पत्ति

आलोचना

       यद्यपि अलनीनो के प्रभाव से सूखे की प्रभाव की व्याख्या होती है। लेकिन मानसून की उत्पत्ति के संबंध में यह कोई भी तर्क प्रस्तुत नहीं करता है। पुन: अलनीनो सिद्धांत सूर्य की उत्पत्ति के संबंध में तापीय सिद्धांत के समान ही सरल तर्क प्रस्तुत करता है। अत: अनेक मौसम वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को सूखे की उत्पत्ति का सिद्धांत मानते हैं न कि मानूसून की उत्पत्ति का सिद्धांत। यह सिद्धांत सूखे की उत्पत्ति की व्याख्या करने में भी पूर्णरूपेण सक्षम नहीं हैं।

       1875 ई० – 1985 ई० के बीच एलनीनो से संबंधित सूचना एकत्रित किये गये हैं। इन 110 वर्षों में 43 वर्ष मानसून औसत से कम सक्रिय रहा। इन 43 वर्षो में मात्र 19 वर्ष मानसून असफल होने का कारण अलनीनो का प्रभाव था। कई ऐसे वर्ष भी थे जब हिन्द महासागर में अलनीनो का प्रभाव था फिर भी भारत में मानसून से पर्याप्त वर्षा हुई। ये तथ्य अलनीनो सिद्धांत की सीमा/आलोचना को रेखांकित करते हैं।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति के संबंध में कोई भी सिद्धांत पूर्ण व्यख्या करने में सक्षम नहीं है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि उपरोक्त चारों सिद्धांतों को मिलाकर एक संश्लेषित सिद्धांत प्रस्तुत किया जाए। अगर संभव हो सके तो आधुनिक उपग्रह और GIS के माध्यम से मानसून को प्रभावित करने वाले अन्य चरों/कारकों को पहचान कर इसके विश्लेषण में शामिल किया जाय।

नोट: एलनीनो सिद्धांत- एलनीनो का प्रभाव रहने पर ग्रीष्म ऋतु में हिन्द महासागर पर LP तथा भारतीय महाद्वीप पर HP बनता है फलत: वायु स्थल (HP) से समुद्र (LP) की ओर चल पड़ती है जिससे भारत में मानसून सक्रिय नहीं हो पाती

प्रश्न प्रारूप

2 एलनिनो क्या है? भातीय मानसून में एलनिनो प्रभाव प प्रकाश डालिए।

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत


मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत     

        मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले सिद्धांतों में जेट स्ट्रीम सिद्धांत को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। इस सिद्धांत का विकास तब हुआ जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जेट स्ट्रीम वायु की खोज की गई। जेट स्ट्रीम वायु की खोज करने का श्रेय अमेरिकी सैनिकों को जाता है। लेकिन जेट स्ट्रीम का वैज्ञानिक अध्ययन करने का श्रेय रॉक्सबी महोदय को जाता है।

       सर्वप्रथम एम.टी. यीन महोदय ने जेट स्ट्रीम को भारतीय मानसून से जोड़‌कर मानसून उत्पत्ति की व्याख्या करने का प्रयास किया। पुन: कोटेश्वरम् महोदय ने उनके सिद्धांत में संशोधन प्रस्तुत करते हुए इसको प्रस्तुत किया। पुन: 1973 ई० में पूर्व सोवियत संघ के वैज्ञानिक और भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘MONEX’ अनुसंधान के द्वारा जेट स्ट्रीम सिद्धांत को पुष्ट करने का प्रयास किया। वर्तमान समय में भारतीय एवं अमेरिकी उपग्रह प्रणाली भी इसी सिद्धांत का समर्थन करते हैं।

‘जेट स्ट्रीम’ क्या है?

       जेट स्ट्रीम हवा ऊपरी वायुमण्डल में तीव्र गति से चलने वाली हवा है। इन हवाओं का संबंध पृथ्वी के धरातल पर बनने वाले वायुदाब परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों ने जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल के माध्यम से करने का प्रयास किया है।

          मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जेट हवा चार प्रकार की होती है:-

(1) ध्रुवीय रात्रि जेट हवा- इनका प्रभाव समताप मण्डल में होता है।

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा- इनका विस्तार 45º से 65º अक्षांशों के बीच होता है 

(3) उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा- इनका विस्तार 20º से 40º अक्षांशों के बीच होता है। यह भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं।

(4) उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट हवा- यह एक अस्थाई जेट स्ट्रीम है जो ग्रीष्म काल में दक्षिण एशिया के ऊपर बहती है। भारत में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के उद्भव में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

        उपरोक्त चार जेट हवाओं में से अंतिम दो जेट हवाओं का संबंध मानसून उत्पत्ति से है। एम. टी. यीन महोदय ने बताया कि उपोष्ण पछुवा जेट हवा जाड़े की ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से गुजरती है। इसकी दिशा पश्चिम से पूरब की ओर होती है। इसलिए इसे ‘पछुवा जेट हवा’ भी कहते हैं।

मानसून उत्पत्ति का जेट

चित्र: पछुवा और पूर्वा जेट हवा

      पछुवा जेट हवा का तापमान कम होता है। ऐसी स्थिति में यह हवा नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है। नीचे बैठने की प्रवृति के कारण भारतीय उपमहाद्वीप उच्च भार / उच्च वायुदाब के क्षेत्र में बदल जाता है। फलतः धरातल पर हवाएं स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है। ये हवाएँ ही “उत्तरी-पूर्वी मानसून” कहलाता है।

          ग्रीष्म ऋतु में स्थितियाँ भिन्न होती है, क्योंकि एम. टी. यीन महोदय के अनुसार 15 मार्च के बाद से ही भारत के दक्षिणी भाग और श्रीलंका के जाफना प्रायद्वीप के ऊपर एक नवीन जेट स्ट्रीम वायु का जन्म होता है जिसे “उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा” कहते है। जैसे-2 सूर्य का उतरायण होता जाता है, वैसे-2 इस जेट हवा का विस्तार उत्तर की ओर होने लगता है। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है।

         पूर्वा जेट हवा के विकास होते ही उपोष्ण जेट हवा उत्तर की ओर खिसक कर चीन के तारिम बेसिन के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। पूर्वा जेट हवा के गर्म होने के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की हवा को ऊपर की ओर खींचने लगता है जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर LP का निर्माण होता है। इसी LP को भरने के लिए अरब सागर से हवाएँ दौड़ती है और “दक्षिणी-पश्चिमी मानसून” को जन्म देती है।

       कोटेश्वरम महोदय ने इस सिद्धांत की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल से किया है। जैसे- उनके अनुसार 15 मार्च के बाद ही तिब्बत का पठार दो कारणों से गर्म होने लगती है-

चित्र: त्रि-कोशिकीय मॉडल

(i) 5000 m समुद्र तल से तिब्बत के पठार का ऊँचा होना। और

(ii) बर्फ के पिघलने से बड़ी मात्रा में गुप्त ऊष्मा का परित्याग।

       इन दो कारणों के चलते तिब्बत के पठार की धरातलीय हवाएँ लम्बवत रूप से ऊपर उठने लगती है और तिब्बत के पठार के ऊपर HP का निर्माण कर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न करती है। इस प्रतिचक्रवातीय केन्द्र से हवाएँ मूलतः उत्तर और दक्षिण दिशा की तरफ अग्रसारित होती है। उत्तर की ओर चलने वाली हवा चीन की जलवायु को प्रभावित करती है जबकि दक्षिण की ओर चलने वाली हवा भारत की जलवायु को प्रभावित करती है।

      दक्षिण की ओर चलने वाली हवा फेरल के नियमानुसार उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलना चाहिए। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप पर इसकी दिशा पूर्णतः पूरब से पश्चिम की ओर होती है। इसे ही उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा या पूर्वा जेट हवा कहते हैं। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है। जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ठण्डी धरातलीय हवा को ऊपर की ओर खींच लेती है जिसके कारण छोटे-2 चक्रवातों का आगमन होता है। पूर्वा जेट हवा अरब सागर के ऊपर ठण्डी होकर बैठने की प्रवृति रखती है, जिसके कारण समुद्री क्षेत्र HP में बदल जाते हैं और अरब सागर से हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलकर दक्षिणी-पश्चिमी मानसून को जन्म देते हैं।

चित्र : पूर्वा जेट हवा से दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति

      पुन: कोटेश्वरम महोदय ने बताया कि ग्रीष्म ऋतु के बाद सूर्य ज्यों ही दक्षिणायन होने लगता है त्यों ही तिब्बत के पठार के ऊपर बनने वाला निम्न वायुदाब पेटी का विस्तार प्रायद्वीपीय भारत और हिन्द महासागर तक हो जाता है, जिसके कारण समुद्र और प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर प्रतिचक्रवात की स्थिति उत्पन्न होती है।

       इस प्रतिचक्रवात से पुन: हवाएं दो दिशाओं में चलती है जो हवाएँ उत्तर की ओर अग्रसारित होती है वही वायु फेरल का नियम अनुसरण करते हुए पछुवा जेट हवा को जन्म देती है। यही पछुवा जेट हवा ठण्डी होकर भारतीय उपमहाद्वीप पर बैठने लगती है जिससे घरातल पर HP का निर्माण होता है। पुन: हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति होती है।

चित्र: पछुआ जेट हवा से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति

         MONEX अनुसंधान तथा उपग्रह से लिए गए मानचित्रों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में मानसून की अनिश्चितता तथा बाढ़ और सूखाड़ के लिए “पूर्वा जेट हवा” उत्तरदायी है। इसमें कहा गया है कि पूर्वा जेट हवा का विस्तार जब प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाता है तब भारत में मानसून सामान्य रहता है और जब इसका विस्तार शिवालिक पर्वत और मैदानी क्षेत्र तक ही रह जाता है तो भारत में अनावृष्टि की स्थिति उत्पन्न होती है।

आलोचना

       मानसून की उत्पत्ति का व्याख्या करने वाला यह सबसे आधुनिक एवं वैज्ञानिक सिद्धांत है। लेकिन इसकी उत्पत्ति के संबंध में अभी भी प्रश्नचिह्न उठाये जाते हैं। इस पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है कि इसका विस्तार कभी प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाती है और कभी इसका विस्तार शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र तक ही रह जाता है। ऐसा क्यों? अतः इन दिशा में और भी वैज्ञानिक अनुसंसाधन किए जाने की आवश्यकता है।

नोट: जेट स्टीम सिद्धांत के अनुसार, उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा से उ०-पूर्वी मानसून और उष्णकटिबंधीय पूर्वा जेट हवा से द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

⇒ सूर्य के दक्षिणायण से भारतीय उपमहाद्वीप पर उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा (ठण्डी) का आगमन होता है एवं HP का निर्माण करता है और उतरायण से उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा (गर्म) का आगमन होता है तथा LP का निर्माण करता है। फलत: वायु H.P. से L.P. की ओर चलकर क्रमश: उ०-पूर्वी मानसून तथा द०-प० मानसून को जन्म देती है।

जेट स्ट्रीम की विशेषताएँ-

⇒ जेट स्ट्रीम का संचरण ऊपरी क्षोभमंडल में 7.5 से 14 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक संकरी पट्टी के रूप में पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर होता है।

⇒ ये त्रिकोणीय पवनें होती हैं, जिनकी लंबाई कई हजार किलोमीटर, चौड़ाई सैकड़ों किलोमीटर तथा गहराई कुछ किलोमीटर तक होती है।

⇒ इनका विकास 20º अक्षांश से ध्रुवों तक होता है। जेट स्ट्रीम मौसम में परिवर्तन से प्रभावित होते हैं शीतकाल में इनका वेग तथा विस्तार अपेक्षाकृत अधिक होता है।

⇒ ग्रीष्मकाल में उत्तर की ओर खिसकने से इनके विस्तार में कमी आ जाती है।

प्रश्न प्रारूप

1. भातीय मानसून की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि की व्याख्या हेतु प्रस्तावित अभिनव सिद्धांत की विवेना करें।

2. मानसून की उत्पत्ति से संबंधित नवीन सिद्धांत की विवेचना करें।

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

 5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास


भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास           

             भूवैज्ञानिक संरचना का तात्पर्य चट्टानों के भूगर्भिक इतिहास से है। भूगर्भिक इतिहास के अंतर्गत समय के संदर्भ में चट्टानों के विकास तथा आन्तरिक एवं बाह्य भौगोलिक कारकों के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। किसी भी भौगोलिक भूखण्ड के इतिहास का अध्ययन चट्टानों के आधार पर किया जाता है। जेम्स हटन ने यहाँ तक कहा था कि ”चट्टान पृथ्वी के इतिहास के पन्ने हैं।”

       भूवैज्ञानिकों ने अलग-2 विधियों का उपयोग कर भूगर्भिक संरचना का अध्ययन करने का प्रयास किया है। भारत के संदर्भ में सर्वप्रथम टी०एच० हॉलैण्ड महोदय ने अध्ययन करने का प्रयास किया। इन्होंने भारतीय भूगर्भिक चट्टानों का अध्ययन कर “इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया” (1904) नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। इन्होंने भारतीय चट्टानों को निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकृत किया:-

(1) पुराण समूह की चट्टान- पठारी क्षेत्र (जीवाश्म नहीं)।

(2) द्रविड़ समूह की चट्टान- पठारी क्षेत्र (परन्तु परतदार/रूपांतरित)।

(3) आर्यन समूह की चट्टान- हिमालय, उत्तर भारत के मैदान ।

(4) नवीन समूह की चट्टान- डेल्टाई, तराई, नदी के किनारे।

         पुराण समूह की चट्टान में वैसे चट्टानों को रखा जिसमें किसी भी प्रकार का जीवाश्म नहीं मिलता है। इस प्रकार का चट्टान भारत के पठारी क्षेत्रों में मिलते हैं। प्रो. कृष्णन महोदय ने इस प्रकार के चट्टानों को “आर्कियन समूह की चट्टान” से संबोधित किया है। टी० एच० हलैण्ड ने द्रविड़ समूह की चट्टान में वैसे चट्टान को रखा है जो पठारीय भारत में ही मिलते हैं लेकिन वे परतदार प्रकार के हैं। ये चट्टानें परतदार होने के बावजूद इस पर बाह्य एवं आन्तरिक कारकों का इतना जब‌दस्त प्रभाव पड़ा है कि यह पूर्णतः रूपान्तरित हो चुके हैं।

        टी० एच० हालैण्ड ने आर्यन समूह के चट्टानों में हिमालय पर्वतीय क्षेत्र एवं उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में मिलने वाले चट्टानों को शामिल किया है। जबकि नवीन समूह की चट्टानों में डेल्टाई, तटीय और नदियों के किनारों पर मिलने वाले चट्टानों को शामिल किया है।

आलोचना

        टी० एच० हॉलैण्ड के द्वारा प्रस्तुत भूगर्भिक संरचना के वर्गीकरण से कई आधारों पर आलोचना की जाती है। जैसे-

(1) इनके वर्गीकरण में कोई निश्चित समय सीमा का निर्धारण नहीं किया गया है।

(2) कुछ विद्वानों ने नामाकरण पर ही आपति उठायी है क्योंकि उनके वर्गीकरण से औपनिवेशिक शासन की गन्ध आती है।

(3) टी० एच० हॉलैण्ड ने कहा है कि हमारा वर्गीकरण कार्बन डेटिंग पर आधारित है लेकिन वैज्ञानिक पद्धति से यह साबित हो चुकी है कि कार्बन डेटिंग के द्वारा मात्र 5700+ 50 वर्ष तक के ही चट्टानों का उम्र ज्ञात किया जा सकता है। लेकिन भारत में इससे भी पुराने चट्टानों का प्रमाण मिलता है।

     उपरोक्त आलोचनाओं के परिपेक्ष्य में भारतीय एवं यूरोपीय भूगर्भशास्त्रियों ने इस बात पर बल दिया है कि भारतीय चट्टानों के संरचनात्मक अध्ययन अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित किये गये पैमान के आधार पर किया जाना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उसी पैमाना को स्वीकार किया गया है जो यूरोपीय वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित किया गया है। इस पैमाने के अनुसार भूगर्भिक काल को चार महाकल्प (Era) में बाँटा गया है। पुन: महाकल्प को काल/कल्प (Period) और काल को युग (Epoch) में बाँटा गया है।

      अन्तर्राष्ट्रीय पैमाना के अनुसार चारो महाकल्प इस प्रकार है:-

(1) आर्कियोजोइक

(2) पैलियोजोइक

(3) मीसोजोइक

(4) केनोजोइक

         आर्कियोजोइक को पूर्व प्राथमिक काल में, पैलियोजोइक को प्राथमिक काल में, मीसोजोइक को द्वितीयक काल में रखा गया है। लेकिन केनोजोइक को तृतीयक एवं चतुर्थक काल में बाँटा गया है। कुछ भूगर्भशास्त्री चतुर्थक काल नियोजोइक महाकल्प के रूप में स्वीकार करते हैं।

       प्रत्येक महाकल्प में विकसित भारतीय चट्टानों की संरचनात्मक विशेषता इस प्रकार से है-

(1) आर्कियोजोइक

            इसे पूर्व प्राथमिक काल में रखा गया है। इस काल को पुन: दो कल्प में बाँटा गया है-

(I) आर्कियन कल्प और

(II) प्री-कैम्बियन कल्प

(I) आर्कियन कल्प को अजैविक कल्प भी कहा जाता है।  इसमें पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर 2500 मिलियन वर्ष पूर्व तक के निर्मित चट्टानों को शामिल किया जाता है। ये वे चट्टानें हैं जो भारतीय उपमहाद्वीय के आधारशीला का निर्माण करते हैं। इसे “पैंजिया परिवार का चट्टान” भी कहा जाता है।

         यह वह चट्टान है जो कभी भी समुद्र के नीचे नहीं गया है। लम्बी अवधि तक स्थलखण्ड के रूप में रहने के कारण मे चट्टानें अपरदित एवं विलुपित हो चुकी है। भारत में यह चट्टान धरातल पर कहीं दिखाई नहीं देता है बल्कि इसी चट्टान के ऊपर अन्य चट्टानों के विकास हुआ है।

भारत की भूगर्भिक

चित्र: आर्कियन क्रम की चट्टानें

(II) प्री-कैम्बियन कल्प

        प्री-कैम्बियन कल्प की चट्टानों की आयु 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 60 मिलियन वर्ष पूर्व निर्धारित की गई है। इस कल्प को पुनः दो भाग में बाँटते है।

(A) अजैविक क्रम की चट्टानें-धारवाड़ चट्टान 

(B) जैविक क्रम की चट्टानें- कुप्पा, विन्ध्य

       अजैविक क्रम की चट्टानों में वैसे चट्टानों को शामिल करते हैं जो जीवाश्म रहित है। इसे भारत का सबसे प्राचीनतम परतदार चट्टान मानते हैं। इसे ‘धारवाड़ चट्टान’ के नाम से भी जानते हैं। इस प्रकार के चट्टान 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 1500 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच बना है। यह धात्विक खनिजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसमें लोहा, मैंगनीज, यूरेनियम, सोना, जैसे, धात्विक खनिज मिलते हैं। इस प्रकार की चट्टानें कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, झारखण्ड एवं उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्रों में पायी जाती है।

           जबलपुर से नागपुर के बीच में स्थित सॉसर श्रेणी की चट्टान, गुजरात के चम्पानेर श्रेणी के चट्टान और हिमालय पर्वत के गर्भ में मिलने वाले कुमायूँ & लद्दाख श्रेणी की चट्टान इसी काम के माने जाते हैं।

चित्र: धारवाड़ क्रम की चट्टानें

           जैविक प्री-कैम्ब्रियन चट्टानों को पुन: दो भागों में बाँटा जाता है-

(i) कुडप्पा समूह चट्टान और

(1) विन्ध्यन समूह की चट्टान।

          कुडप्पा समूह की चट्टान का निर्माण 1500-1000 मिलियन वर्ष पूर्व हुआ है। जबकि विन्ध्ययन समूह की चट्टान का निर्माण 1000 मिलियन वर्ष पूर्व से 600 मिलियन वर्ष पूर्व। ये दोनों समूह की चट्टानें चूना पत्थर चट्टान के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रकार के चट्टानों से सूक्ष्म एक कोशीय प्राणियों के जीवाश्म के प्रमाण मिलता है। पुन: विन्ध्यन प्रकार के चट्टानों के क्षेत्र में ज्वालामुखी क्रिया के कारण चट्टानों में रूपान्तरण देखा जा सकता है। कहीं-2 पर वलन (मोड़) का भी प्रमाण मिलता है।

चित्र : विन्ध्यन क्रम की चट्टानें

             ज्वालामुखी क्रिया और वलन क्रिया के कारण ही विन्ध्यन समूह के चट्टानों से नीलम, पन्ना, हीरा, टोपाज जैसे- रंगीन पत्थर मिलते हैं। कुडप्पा समूह की चट्टान भारत के पूर्वी घाट के समान्तर उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मिलते है। भारत में कुडप्पा समूह की चट्टानों में पापाघानी श्रेणी की चट्टान, चेयार श्रेणी की चट्टान, कृष्णा घाटी श्रेणी की चट्टान और नल्लामलई श्रेणी के चट्टानों को शामिल करते हैं। जबकि विन्ध्यन समूह के चट्टानों का विकास विन्ध्याचल पर्वत के अनुरूप हुआ है। इसका विस्तार प० M.P. से बिहार के रोहतास  जिला तक हुआ है।

चित्र: कुडप्पा क्रम की चट्टानें

(2) पैलियोजोइक

      पैलियोजोइक का काल 600 मिलियन वर्ष पूर्व से 225 मिलियन वर्ष पूर्व माना जाता है। इसे प्राथमिक काल के अन्तर्गत रखा गया है। इसे पुन: छ: कल्प में बाँटते हैं। जैसे :-

(i) कैम्ब्रियन

(ii) आर्डोविसियन

(iii) सिल्यूरियन 

(iv) डिवोनियन

(v) कार्बोनीफेरस

(vi) पर्मियन।

        कैम्ब्रियन कल्प की चट्टानें भारत में नहीं पायी जाती हैं। इसका प्रमुख कारण अपरदन माने जाते हैं। पुन: पाकिस्तान के सॉल्ट रॉक पर्वत कैम्ब्रियन कल्प का ही माना जाता है। पुन: आर्डोविसियन, सिल्यूरियन और डिवोनियन कल्प की चट्टानें भी प्रायद्वीपीय भारत तथा मैदानी भारत में नहीं पाये जाते हैं। लेकिन भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि उपरोक्त तीनों कल्प की चट्टानें हिमालय के गर्भ में मिल सकते हैं।

       कार्बोनीफेरस कल्प की चट्टानें भारत में कई क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे- दामोदर, सोन, वर्द्धा, महानदी और गोदावरी नदी घाटी  में मिलने वाले कोयला इसके सर्वोत्तम उदा० है।

चित्र: गोंडवाना क्रम की चट्टानें

          वस्तुतः कार्बोनीफेरस कल्प तक विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे जिसे पैन्जिया कहा जाता था। पैन्जिया का अधिकांश भाग ग्लोपोप्टेरिस नामक वनस्पति से ढका हुआ था। लेकिन इस कल्प में हुए भूसंचलन क्रिया के कारण कई क्षेत्रों में वलन एवं भ्रंशन की घटना हुई। इसी क्रम में प्राकृतिक वनस्पतियाँ धरातल के अन्दर दब गये। उस पर अत्याधिक दबाव एवं ताप के कारण ये रूपान्तरित होकर कोयला में तब्दील हो गये। जिन क्षेत्रों में चुना पत्थर युक्त चट्टान और वनस्पति एक साथ दब गए उन क्षेत्रों में खनिज तेल का निर्माण हुआ है।

          परमियन कल्प की संरचना भी कोयले के लिए प्रसिद्ध है। इसका प्रमाण उड़ीसा के तालचेर क्षेत्र से मिलता है। इस कल्प में हिमयुग का भी आगमन हुआ था। इस हिमयुग का प्रभाव महानदी और दामोदर नदी घाटी तक देखा जा सकता है क्योंकि हिमानी के अपरदन से निर्मित बोल्डर का प्रमाण इन क्षेत्रों में उपलब्ध है।

(3) मीसोजोइक

          मीसोजोइक की आयु 225 मिलियन वर्ष पूर्व से 70 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच निर्धारित किया गया है। इसे द्वितीयक काल के अंतर्गत रखा गया है। इसे पुन: तीन कल्प में बाँटते हैं:-

(i) ट्रायसिक

(ii) जुरासिक

(iii) क्रिटेशियस

         ट्रायसिक कल्प में भी चुना पत्थर चट्टानों का विकास हुआ है। इसका प्रमाण मध्य प्रदेश  तथा महाराष्ट्र के सीमा पर स्थित महादेव की पहाड़ी और पंचेत की पहाड़ी में मिलता है।

      जुरासिक कल्प में भारत में कई संरचनाओं का विकास हुआ है। जैसे- बिहार और झारखण्ड की सीमा पर स्थित राजमहल की पहाड़ी, मध्य प्रदेश में जबलपुर के पास संगमरमर चट्टान राजस्थान के मकराना क्षेत्र की संगमरमर की चट्टान जुरासिक कल्प में विकसित हुए हैं।

       किटेशियस कल्प की चट्टान भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी कल्प में हुए दरारी ज्वालामुखी क्रिया के कारण होने वाले लावा उद्गार से दक्कन के पठार का निर्माण हुआ है। लावा के ऋतुक्षरण से ही भारत में काली मिट्टी का विकास हुआ है। महाराष्ट्र का पठार, विदर्भ का पठार, तेलंगाना का पठार, गिर की पहाड़ी, कर्नाटक का पठार  तथा बंगलोर का पठार क्रिस्टेशियस कल्प में ही बना है। क्रिटेशियस कल्प में नर्मदा और ताप्ती की भ्रंश घाटी और ब्रह्मपुत्र रैम्प घाटी का निर्माण हुआ है। 

चित्र: दक्कन ट्रैप निक्षेप

(4) केनोजोइक

        केनोजोइक की आयु 70 मिलियन वर्ष पूर्व से अब तक निर्धारित किया गया है। इसे दो काल में वर्गीकृत करते हैं:-

(क) तृतीयक काल (Tertiary Period)

(ख) चतुर्थक काल (Quartanary Period)

         तृतीयक काल को पुन: पाँच कल्प में वर्गीकृत करते हैं। जैसे-

(i) पैलियोसीन

(ii) इयोसीन,

(iii) ओलीगोसीन

(iv) मायोसीन और

(V) प्लायोसीन

          जबकि चतुर्थक काल को पुन: दो कल्प में बाँटते है:-

(i) प्लीस्टोसीन और

(ii) होलोसीन

         तृतीयक काल का समय 70 मिलियन वर्ष पूर्व से 2.5 मिलियन वर्ष पूर्व निर्धारित किया गया है। इसे हिमालय निर्माण का काल भी कहा जाता है। इस काल में गोंडवाना भूमि के उत्तर की ओर खिसकने के कारण टेथिस सागर के मलवा के उत्थान से हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई है। हिमालय की तीन प्रमुख श्रेणियाँ है:-

(i) महान हिमालय- जिसका निर्माण ओलिगोसीन से मायोसीन कल्प के बीच हुआ है।

(ii) मध्य हिमालय-  इसका निर्माण मायोसीन और प्लायोसीन कल्प के बीच हुआ।

(iii) शिवालिक पर्वत- इसका निर्माण  प्लायोसीन के अंतिम काल और प्लीस्टोसीन कल्प के बीच हुआ है।

        तृतीयक काल की चट्टानें गुजरात के रण और कच्छ में, असम के बैरल की पहाड़ी में मिलते हैं। ये मूलत: पैलियोसीन कल्प के चट्टानें हैं।

चित्र: तृतीय/टर्शियरी चट्टानें

           स्फीति, लाहुली, नारीक्रम, गजक्रम की चट्टानें ओलिगोसीन कल्प की मानी जाती है। असम के सूरमा घाटी और उत्तराखण्ड के कसौली घाटी की चट्टानों मायोसीन कल्प के मिलते हैं। जबकि दिहांग नदी घाटी (A.P.) तमिलनाडु में रामेश्वरम के पास पाण्डिचेरी, केरल के कोबलम जिला, आन्ध्र प्रदेश के नेल्लूर और गोदावरी में प्लायोसीन कल्प की चट्टानें पायी जाती हैं।

भारत की भूगर्भिक संरचना

चित्र: चतुर्थक काल की चट्टानें

        चतुर्थक काल की आयु 2.5 मिलियन वर्ष पूर्व से अब तक निर्धारित किया गया है। प्लीस्टोसीन कल्प की आयु 2.5 मिलियन से 10 हजार वर्ष के पूर्व के बीच निर्धारित की गई है। होलोसीन की शुरुआत 10 हजार वर्ष पहले हुआ था और वर्तमान समय में चल रहा है।

 

      प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक पर्वत का निर्माण कार्य पूरा हुआ तथा मेघालय का पठार, राजमहल की पहाड़ी से टूटकर उ०-पूर्व की ओर चला गया। जिससे राजमहल गैप का निर्माण हुआ। प्लीस्टोसीन कल्प में चार बार (गुंज, मिंडल, रिस और वुर्म) हिमयुग का आगमन हुआ। इस कल्प में अरब सागर के उत्तरी भाग के उत्थान से थार मरुस्थल का निर्माण हुआ तथा उड़ीसा का चिल्का झील बना।

            होलोसीन कल्प की चट्टानों के निर्माण कार्य आज भी चल रहा है। उत्तर-भारत के मैदानी क्षेत्रों में खादर मिट्टी का निर्माण, नदियों के मुहानों पर डेल्टा का निर्माण और तटीय क्षेत्रों में पुलिन का निर्माण आज भी जारी है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भात में लगभग सभी कल्प की चट्टानें पायी जाती है, जिसका प्रमाण भारत के अलग-2 क्षेत्रों में मिलती है। इस भूगर्भिक काल का प्रभाव भारत के संरचना, उच्चावच इत्यादि पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भूगर्भिक चट्टानों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत


मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

      मानसून अपनी अनिश्चितताओं के लिए प्रसिद्ध है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रस्तुत किये गये हैं। लेकिन कोई भी सिद्धांत इसकी उत्पत्ति एवं विशेषताओं का पूर्ण व्याख्या करने में सक्षम नहीं हैं। फिर भी मानसून की उत्पत्ति के संबंध में निम्नलिखित चार सिद्धांतों पर विचार करते हैं:-

(1) तापीय सिद्धांत- एडमंड हैली, बेकर और डडले स्टाम्प

(2) विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत- फ्लोन

(3) जेट स्ट्रीम सिद्धांत- रॉक्सबी, एम.टी. यीन, कोटेश्वरम

(4) अलनीनो सिद्धांत- गिल्बर्ट वाकर

(1) तापीय सिद्धांत 

        तापीय सिद्धांत का प्रतिपादन ब्रिटिश मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा किया गया था। यह सिद्धांत पृथ्वी की वार्षिक गति या सूर्य के उतरायण एवं दक्षिणायण होने पर आधारित है। वस्तुतः पृथ्वी की वार्षिक गति के प्रभाव से सूर्य की किरणें जून महीने में कर्क रेखा पर लम्बवत चमकती है। अर्थात सूर्य के उतरायण होने से भारतीय उपमहाद्वीप पर ग्रीष्म ऋतु की स्थिति होती है। सूर्य के लम्बवत किरण के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र गर्म होने लगती है।

        धरातल के गर्म होने से वायु भी गर्म होकर ऊपर उठने लगती है जिससे सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र निम्न वायुदाब क्षेत्र में बदल जाती है दूसरी ओर हिन्द महासागर में सूर्य की तिरछी किरण पड़ने के कारण वायु ठण्डी ही रह जाती है। जिससे समुद्र के ऊपर उच्च वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है। फलतः वायु H.P. से L.P. की ओर अग्रसारित होने लगती है। लेकिन फेरल के नियमानुसार अग्रसारित होने वाली वायु दायीं ओर मुड़कर द०-प० मानसून को जन्म देती है। यही मानसून भारतीय उपमहाद्वीप में अधिकांश वर्षा करने के लिए जिम्मेदार है।

मानसून उत्पत्ति

       तापीय सिद्धांत को मौसम वैज्ञानिकों ने थोड़ा परिमार्जित करते हुए प्रस्तुत किया है। जैसे सूर्य का उत्तरायण होते ही उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र LP में बदल जाती है जिससे उतरी गोलार्द्ध की वाणिज्यिक हवा विषुवत रेखा तक नहीं पहुँच पाती है जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के सामने विषुवत रेखा पर अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का निर्माण नहीं कर पाती है। लेकिन दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने वाली वाणिज्यिक हवा विषुवत रेखा तक पहुँचने की प्रवृति रखती है।

         दक्षिणी गोलार्द्ध की वाणिज्यिक हवा को विषुवतीय क्षेत्र में जब कोई अवरोध नहीं मिलता है तो उत्तरी गोलार्द्ध में यह प्रविष्ट कर जाती है। पुन: इस हवा पर फेरल का नियम लागू होने लगता है जिसके कारण यह द०-प० से उ०-पू० की ओर चलने लगती है। इसे ही द०-पश्चिम मानसून की संज्ञा देते हैं।

चित्र: तापीय सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति

      शीत ऋतु में स्थितियाँ भिन्न होती है। जैसे सूर्य दक्षिणायण हो जाती है तथा उसकी किरण मकर रेखा पर लम्बत गिरने लगती है। भारतीय उपमहाद्वीप की तुलना में समुद्र गर्म होकर L.P. का निर्माण करती है जबकि स्थल तिरछी किरण प्राप्त करने के कारण H.P. में बदल जाती है। फलत: वायु स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहित होते लगती है। इस पर फेरल का नियम लागू होने के कारण यह उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलने लगती है। इसकी एक शाखा बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

चित्र: तापीय सिद्धांत के अनुसार उ०-पू० मानसून की उत्पत्ति

नोट:-

⇒ तापीय सिद्धांत के अनुसार सूर्य के उतरायण होने से द०-प० मानसून और दक्षिणायण होने से उ०-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति होती है। 

⇒ ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण से उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र LP और हिन्द महासागर में HP का निर्माण होता है। फलत: वायु HP से LP की ओर चलने लगती है जिससे द०-प० मानसून की उत्पति होती है।

⇒ जाड़े के दिनों में सूर्य के दक्षिणायण से भारतीय उपमहाद्वीप पर HP और हिन्द महासागर में LP का निर्माण होता है। फलत: वायु H.P. से L.P. की ओर चलकर फेरल के नियम का अनुसरण करते हुए उ०-पूर्वी मानसून को जन्म देती है।

आलोचना 

      तापीय सिद्धांत के विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायण होने पर आधारित है। सूर्य का उतरायण एवं दक्षिणायण होना नियत है। जबकि मानसून आने और जाने की तिथि अनियमित है। यह इस सिद्धांत की सबसे बड़ी आलोचना है। पुन: यह सिद्धांत भारत में अतिवृष्टि और अनावृष्टि की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। फिर भी मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या का सैद्धांतिकरण करने में एक सफल प्रयास था।

(2) विषुवतीय पछुवा हवा का सिद्धांत

       इस सिद्धांत का प्रतिपादक फ्लोन महोदय हैं। इनके अनुसार द०-प० मानसून मूलत: विषुवतीय पछुवा हवा का एक विकसित रूप है। उनके अनुसार विषुवतीय पछुआ हवा की उत्पत्ति ITCZ  से जुड़ी हुई है।

       इस सिद्धांत के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होते ही ITCZ उत्तर की तरफ खिसक जाती है। यहाँ तक कि ITCZ भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। ऐसी स्थिति में भारतीय उपमहाद्वीप के सामने विषुवत रेखा पर ITCZ का निर्माण नहीं होता है लेकिन अरब सागर और अफ्रीका महाद्वीप के ऊपर ITCZ का निर्माण होता है। ITCZ में दोनों गोलार्द्ध की मिलने वाली वाणिज्यिक हवा पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकर पश्चिम से पूरब की ओर चलने लगती है जिसे “विषुवतीय पछुवा हवा” कहते हैं। इसी हवा को भारतीय उपमहाद्वीप पर निर्मित निम्न वायुदाब क्षेत्र चुम्बक की तरह अपनी ओर खींचने की प्रवृत्ति रखती है जिससे द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

      विषुवतीय पछुवा हवा का सिद्धांत एक प्रकार का तापीय सिद्धांत ही है लेकिन कुछ मायने में यह सिद्धांत भिन्न भी है। जैसे- विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न वायुदाब के निर्माण का दो कारण उत्तरदायी माने जाते है:

(i) सूर्य का उत्तरायण होना

(ii) ITCZ का उत्तर की ओर खिसकना

      यह सिद्धांत भारत में होने वाले अनावृष्टि और अतिवृष्टि की व्याख्या का भी प्रयास करती है। जैसे अगर ITCZ का विस्तार उत्तर में शिवालिक पर्वत तक हो जाता है तो उत्तर भारत में तीव्र वर्षा होने के कारण बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। लेकिन जब ITCZ प्रायद्वीपीय भारत तक ही सीमित रहता है तो उत्तर भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

       यह सिद्धांत मानसून की अनिश्चितता को भी स्पष्ट करने का प्रयास करता है। जैसे- इस सिद्धांत के अनुसार ज्यों-2 ITCZ उत्तर की ओर अग्रसारित होता है त्यों-2 मानसून का आगमन होता है। जब किसी कारणवश ITCZ के खिसकाव में बाधा उत्पन्न होती है तब ही मानसून के आने में देरी होती है।

चित्र: विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति

आलोचना

(i) इस सिद्धांत को तापीय सिद्धांत का ही प्रतिलिपि माना जाता है।

(ii) यह सिद्धांत विषुवतीय रेखा या तापीय रेखा तथा ITCZ के निर्माण पर कोई प्रकाश नहीं डालता है।

(iii) चूंकि इन दोनों का निर्माण सूर्य की स्थिति पर निर्भर करती है और सूर्य की स्थिति (उतरायण या दक्षिणायण होना) नियत है। ऐसे में ITCZ का खिसकाव नियत होना चाहिए।

     अत: इस प्रका इस सिद्धांत को भी अमान्य घोषित क दिया गया है।


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15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

         भारत दक्षिण एशिया में अवस्थित एक विशालकाय देश है जिसका क्षेत्रफल 32,87,263 km है। इसका अक्षांशीय विस्तार 8°4’N से 37°6’N के बीच एवं देशान्तरीय विस्तार 68°7′ से 97°25′ के मध्य है। भारत एक उत्तरी गोलार्द्ध का देश है जो प्राचीन काल के गोंडवाना भूखण्ड के ऊपर अवस्थित है। भूगोलवेताओं ने भारत को भौगोलिक संरचना एवं उच्चावच के आधार पर मुख्यतः चार भौतिक इकाइयों में बांटा है। जैसे-

(1) उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र

(2) उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र

(3) दक्षिण भारत का पठारी क्षेत्र

(4) तटीय मैदानी क्षेत्र एवं द्वीपीय क्षेत्र

भारत का तटीय

चित्र: भारत की भौतिक इकाई

      भारत के दक्षिणी भाग 1600 km समुद्र के अंदर प्रक्षेपित है जिसके तीन ओर जलीय विस्तार हैं जिसके कारण प्रायद्वीप का निर्माण हुआ है। भारत की मुख्य भूमि समुद्र के साथ 6100 km समुद्री सीमा का निर्माण करती है। अगर द्वीपों के सीमा को जोड़ दिया जाय तो भारत की कुल समुद्री सीमा की लम्बाई 7516.6 km हो जाता है। भारत के तटीय क्षेत्र को मोटे तौर पर इसे दो भागों में बाँट कर अध्ययन करते हैं:-
(A) पश्चिमी तटीय मैदान

(B) पूर्वी तटीय मैदान

(A) पश्चिमी तटीय मैदान

       इसका विस्तार गुजरात से कन्याकुमारी तक हुआ है। इसके पश्चिम में अरब सागर और पूरब में पश्चिमी घाट पर्वत है। इसकी औसत चौड़ाई 64kn है। कहीं-2 पर पश्चिमी घाट पर्वत के कारण काफी संकीर्ण हो चुका है। मुम्बई के पास इसकी चौडाई मात्र 10 km रह जाती है जबकि नर्मदा एवं ताप्ती के मध्य इसकी चौड़ाई 80km हो जाती है। इस मैदान को पुन: कई उपभागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते हैं।

जैसे :-

(i) गुजरात का मैदान

(ii) कोंकण तट / मैदान

(iii) कन्नड़ का मैदान

(iv) मालावार का मैदान

        गुजरात के तटीय मैदान को पुनः दो भागों में बाँटते हैं।

(a) कच्छ का मैदान

(b) काठियावाड़ का मैदान
        कच्छ का मैदान पुनः दो भागों में वर्गीकृत है:-

(i) छोटा रण ऑफ कच्छ

(ii) बड़ा रण ऑफ कच्छ

       यह क्षेत्र 6 माह तक जल प्लावित रहता है। समुद्री जल से नमक का निर्माण किया जाता है। यह क्षेत्र भूकम्प प्रभावित क्षेत्र है। जगह-2 पर भूकम्प से निर्मित वलन का प्रमाण मिलता है।

      काठियावाड़ का मैदान गुजरात के दक्षिणी भाग में स्थित है। इस मैदान के मध्य में गिर की पहाड़ी अवस्थित है। इस मैदान में लावा निक्षेपण का प्रमाण मिलता है।

       कोंकण तट का विस्तार उत्तर में दमन से गोवा तक हुआ है। यह काफी संकीर्ण तटीय मैदान है। मुम्बई कोंकण तट के किनारे ही अवस्थित है। कोंकण रेलवे का विकास इसी तट के सहारे किया गया है। मरमागाँव, न्वाशेवा जैसे प्रमुख वंदरगाह का विकास यहाँ किया गया है।

      कनन्नड़ का तट मुख्यतः कर्नाटक में अवस्थित है। पश्चिमी घाट के कारण यह अति संकीर्ण तटीय मैदान बन चुका है। इसी मैदान के पूरब में गरसोप्पा जलप्रपात अवस्थित है।

     मालाबार तट का विस्तार केरल राज्य में हुआ है। इसका उत्तरी सीमा मंगलोर से प्रारंभ होता है और अंत दक्षिण में कन्याकुमारी के पास होता है। यहाँ विशेष स्थलाकृति कयाल (पश्चजल स्थलाकृति) का विकास हुआ है।

     पश्चिमी तटीय मैदान की कुछ सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार से है। जैसे:-

(1) यह मैदान सीधा है।

(2) इस मैदान में जगह-2 पर बालू के टीले मिलते है।

(3) इसका ढाल पूरब से पश्चिम की ओर है।

(4) तेज गति से नदी के जल प्रवाह होने के कारण डेल्टा का अभाव मिलता है लेकिन नदियों का मुहाना ज्वार नद‌मुख का निर्माण करती है।

(5) यह मैदान पर्याप्त वर्षा ग्रहण करने के कारण सालों भर आर्द्र बनी रहती है।

(6) पश्चिमी तट पर कई प्राकृतिक पोताश्रय(बंदरगाह) का निर्माण हुआ है। जैसे- मुम्बई।

(7) गुजरात के तट पर उत्थान का प्रमाण मिलता है लेकिन कोंकण तट पर निमज्जन (धंसान) का प्रमाण मिलता है।

(B) पूर्वी तटीय मैदान

     यह मैदान पूर्वी घाट से लेकर बंगाल की खाड़ी के मध्य है। इसका दक्षिणी विस्तार कन्याकुमारी तक और उत्तरी विस्तार गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा तक हुआ है। इसे उतरी सरकार और कोरोमंडल तट में बांटते हैं।

(नोट: कोरोमण्डल तट का विस्तार- तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश, उत्तरी सरकार का विस्तार- उड़ीसा)

       उत्तरी सरकार तट के मैदान को ‘उत्कल तट का मैदान’ भी कहते हैं।

पूर्वी तटीय मैदान की सम्मान्य विशेष‌ताएँ निम्नलिखित है।:-

(1) पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में यह काफी चौड़ा है।

(2) यह मैदान वक्राकार है।
(3) इस मैदान में नदियाँ बड़े-बड़े डेल्टा का निर्माण करती है।

(4) इस भाग में चिल्का, पुलीकट, कोलेरू जैसी झील मिलती है।

(5) कोरोमण्डल तट के पर निमज्जन का प्रमाण मिलता है।

(6) कोरोमण्डल तट के कावेरी डेल्टाई क्षेत्र अपनी उर्वरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

द्वीपीय समूह

      भारत के तटीय क्षेत्रों/मैदानों के नजदीक और उनसे दूर कई द्वीपों का विकास हुआ है। द्वीप एक ऐसी स्थलाकृति है जो जल के बीच में स्थित स्थल होता है। भारतीय द्वीपों का अध्ययन दो समूहों में बाँटकर करते है

(1) बंगाल की खाड़ी के द्वीप 

(2) अरब सागर के द्वीप

बंगाल की खाड़ी के द्वीप

      इसमें मुख्य द्वीप गंगा सागर द्वीप (गंगा नदी के मुहाना पर), न्यू मूर द्वीप (भारत), व्हीलर द्वीप (उड़ीसा), क्रोकोडाई द्वीप (मन्नार की खाड़ी में), हेयर द्वीप (तमिलनाडु), पम्बन द्वीप (तमिलनाडु) और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह है।

     बंगाल की खाड़ी में लगभग 572 द्वीप है। इनमें से अण्डमान निकोबार द्वीप समूह सबसे प्रमुख है। इसमें द्वीपों की संख्या लगभग 300 है। इसका विस्तार लगभग 350 km तक हुआ है। केवल निकोबार में 19 द्वीप है। अण्डमान निकोबार द्वीप समूह असंगठित कंकड़-पत्थर से निर्मित है।

       इसका निर्माण हिमालय पर्वत के निर्माण के दौरान संरक्षी सीमा के सहारे हुआ है।

    यहाँ बैरन और नारकोंडम जैसे ज्वालामुखी का भी प्रमाण मिलता है। इनमें से नारकोंडम मृत ज्वालामुखी का उदा० है जबकि बैरन प्रसुप्त ज्वालामुखी का उदाहरण है। यहाँ का इन्टरव्यू द्वीप और इंडरसन द्वीप चूना पत्थर से निर्मित है। अण्डमान द्वीप का सर्वोच्च चोटी माउण्ट सैडल (734m) और निकोबार की सर्वोच्च चोटी माउण्ट थुलीयर (642m) है। दक्षिण अण्डमान और लिटिल अंडमान के बीच में डंकन पैसेज अवस्थित है। भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु इंदिरा प्वाइंट निकोबार द्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है।

अरब सागर के द्वीप

     अरब सागर में तट से नजदीक और तट से दूर कई द्वीप मिलते हैं। जैसे- मूल द्वारिका (गुजरात), दीव (गुजरात), एलीफेण्टा द्वीप (महाराष्ट्र), अलियावेट, खलियाबेट द्वीप (नर्मदा नदी के मुहाना पर), जंजीरा द्वीप (महाराष्ट्र), हेनरी द्वीप, कैनेरी द्वीप, बुचर द्वीप (सभी महाराष्ट्र में), लक्ष्य द्वीप।

      अरब सागर में मिलने वाले द्वीपों में सबसे प्रमुख द्वीप लक्षद्वीप है। यह केरल से 280 km दूर पश्चिम में अवस्थित है। लक्षद्वीप प्रवाल भीति से निर्मित है। इसमें कुल 36 द्वीप है जिनमें से 11 द्वीप ही मानव बसाव के योग्य हैं। 11° चैनल लक्षद्वीप को दो भागों में बाँट देती है- उत्तर में अमिनी द्वीप और दक्षिण में कलानोरे द्वीप कहलाता है। मिनीकाय द्वीप लक्षद्वीप का सबसे दक्षिणी द्वीप है। एण्ड्रायट द्वीप लक्षद्वीप का सबसे बड़ा द्वीप है। लक्षद्वीप की औसत ऊँचाई 9-11 मी० है।

निष्कर्ष

       इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत अपने भौतिक विशेषताओं एवं विविधताओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

प्रश्न प्रारूप 

1. भात की भौतिक इकाइयों का नाम लिखिए तथा तटीय मैदान तथा भातीय द्वीपों का वर्णन कीजिए।

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

         दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी० है। इसका आकार एक  त्रिभुज के समान है। यह 1600 km हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750मी० मानी गयी है।

           प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल तथा गारो, खाँसी और जयन्तिया पर्वत सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करते हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे पठारों का पठार भी कहा जाता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषताएँ                

     प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेंजिया के चट्टानें पायी जाती है। प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषता का अध्ययन नीचे किया जा रहा है।

(i) दक्षिण भारत को जिसके चतुर्दिक मैदानी भूभाग है। भूगर्भवेताओं ने इसे प्रायद्वीपीय भारत से संबोधित किया है। जबकि इसके बाहर वाले क्षेत्र को अतिरिक्त प्रायद्वीपीय भारत (Extra peninsular India, प्रायद्वीपेत्तर भारत) से संबोधित किया है।

(ii) प्रायद्वीपीय भारत प्राचीनतम दृढ भूखण्डों से निर्मित है। इसका निर्माण मूलतः पृथ्वी की गैसीय अवस्था से ठोस अवस्था में परिणत होने की प्रक्रिया से जुड़ा है।

(iv) सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत समप्राय सतह का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस सतह पर मोनैडनॉक, शंकु पहाड़ी, वलित पर्वत, ब्लॉक पर्वत, अवशिष्ट पहाड़ी, भ्रंश घाटी, ज्वालामुखी उदगार, उबड़-खाबड़ भूमि इत्यादि का प्रमाण मिलता है।

(v) दक्षिण भारत प्रायद्वीप के रूप में क्रिटेशियस कल्प में बना क्योंकि गोंडवाना लैण्ड में भ्रंशन की क्रिया से अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अण्टार्कटिका महाद्वीप विलग हो गये।

(vi) प्रायद्वीपीय भारत के मूल या मौलिक चट्टानों का निर्माण आर्कियोजोइक महाकल्प में हुआ था। इस महाकल्प के चट्टानों में ग्रेनाइट और नीस प्रकार के चट्टान मिलते हैं। इन चट्टानों के रूपान्तरण से शिष्ट एवं चारकोनाइट चट्टानों का निर्माण हुआ है।

(vii) प्रायद्वीपीय भारत अधिकांश क्षेत्र कभी भी समुद्र के अन्दर नहीं गया है। प्रायद्वीपीय भारत को ‘भूकम्प रहित क्षेत्र’ माना जाता है। इस पर दीर्घकालिक अपरदन के कारण चट्टानों के जब‌ड़दस्त अपरदन हुआ है।

(viii) कर्नाटक, उड़ीसा, तमिलनाडु इत्यादि में धाड़वाड़ की चट्टानें मिलती है जो प्राचीनतम परतदार चट्टानों का उदाहरण है। यह धात्विक ‘खनिजों’ के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(ix) प्रायद्वीपीय भारत में कुडप्पा एवं विन्ध्यन क्रम की कई चट्टानें मिलती है। इस क्रम की चट्टानों में चुना पत्थर और  बलुआ पत्थर की चट्टानें सबसे प्रमुख है।

(x) कार्बोनीफेरस कल्प में आये हिमयुग का प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इनका प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इसका प्रमाण दामोदरी, महानदी, गोदावरी नदी घाटी में देखा जा सकता है।

(xi) प्रायद्वीपीय भारत का दक्षिणी भूभाग दक्कन का पठार कहलाता है। इसका निर्माण क्रिटेशियस कल्प में हुए ज्वालामुखी उद्‌गार से हुआ है। क्रिटेशियस कल्प में दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन की क्रिया होने के कारण भूगर्भ से क्षारीय प्रकार की लावा बड़े पैमाने पर बाहर की ओर निकला जो फैलकर एवं ठण्डा होकर दक्कन के पठार का निर्माण किया। आज इसी लावा के ऋतुक्षरण से दक्कन के पठार पर काली मिट्टी का प्रमाण मिलता है।

        क्रिटेशियस कल्प में कुछ केन्द्रीय उद्‌गार भी हुए थे जिससे छोटे-2 शंकु पहाड़ियों का भी निर्माण हुआ है। इनके मुख से जब लावा निकलना बंद हो गया तो अनेक क्रेटर और कॉल्डेरा का निर्माण हुआ है। इसी क्रेटर और कोल्डेरा में जल के जमाव से दक्षिण भारत में अनेक तालाबों का विकास हुआ है।

(xii) प्रायद्वीपीय भारत की संरचना पर भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। जैसे- भूसंचलन के ही कारण नर्मदा, ताप्ती और दामोदर नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है। सतपुड़ा जैसे ब्लॉक पर्वत का निर्माण हुआ है। यहाँ तक की पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल धँसकर तीव्र ढाल का निर्माण करती है।

(xiii) कार्बोनिफेरस कल्प में हुए भूसंचलन के कारण सतह पर स्थित वनस्पति भूगर्भ के अंदर दब गये जिसके कारण कोयला जैसे संरचना का निर्माण हुआ है।

(xiv) विगत 20 करोड़ वर्ष से पठारीय भारत में कोई नवीन भूगर्भिक संरचना का विकास नहीं हुआ है। केवल 7 करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के निर्माण हो रहा था तो उस वक्त प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में केवल उत्थान का प्रमाण  मिलता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संर

चित्र: प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

        इस तरह स्पष्ट है कि प्रायद्वीपीय भारत जटिल भूगर्भिक संरचना रखने वाला एक भूखण्ड है।

प्रश्न प्रारूप 

1. प्रायद्वीपीय भात की संचना का संक्षिप्त रूप में चर्चा करें।

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

       10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र


उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

              प्रायद्वीपीय पठार और हिमालय के बीच ‘उत्तर भारत का विशाल मैदान’ अवस्थित है जिसका क्षेत्रफल 7.5 लाख वर्ग किमी० है। उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र मूलत: उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत, पश्चिम में किर्थर और सुलेमान तथा पूरब में पूर्वांचल हिमालय से घिरा हुआ है। भारतीय क्षेत्र में इसकी लम्बाई 2400 km है। पश्चिम में इसकी चौ० लगभग 500Km और पूरब में 150km है।

उत्तर भारत का विशाल

चित्र: उत्तर भारत का विशाल मैदान

        यह मैदान मूलत: सिन्धु, गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र नदी और उनके सहायक नदियों द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से बना है। उत्तर के मैदानी क्षेत्र को कई भौगोलिक इकाई में वर्गीकृत कर अध्ययन किया जा सकता है। जैसे-

(A) सिन्धु सतलज का मैदान

(B) थार मरुस्थलीय क्षेत्र

(C) गंगा-यमुना का मैदान

(D) ब्रह्मपुत्र का मैदान

(A) सिन्धु-सतलज का मैदान

          इसे “पंजाब का मैदान” भी कहते हैं। इसका निर्माण सिन्धु और उसके पाँच सहायक नदी जैसे- सतलज, व्यास, चिनाब, रावी, झेलम नदी के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से बना है।

       पंजाब के मैदान का विस्तार भारत के पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में हुआ है। इस क्षेत्र की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 200m से भी कम है। इसका निर्माण प्लोस्टोसीन कल्प में हुआ है। इस क्षेत्र में कहीं-कहीं शुष्क नदियाँ और शुष्क क्षारीय झील पायी जाती हैं जिसे स्थानीय लोग “धांड़” के नाम से जानते हैं। कहीं-2 पुराने नदियों के सँकरे घाटी का प्रमाण मिलता है जिसे स्थानीय लोग ‘घोरोस’ या ‘तल्ली’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदानी क्षेत्र में कई नदी-दोआब का विकास हुआ है। यहाँ दोआब का तात्पर्य दो नदियों के बीच वाला क्षेत्र से है। कुछ दोआब के उदाहरण निम्नलिखित है:-

(1) बिस्त दोआब (व्यास और सतलज)

(2) बारी दोआब (व्यास और रावी)

(3) रचना दोआब (रावी और चिनाव)

(4) चाझ दोअब (चिनाव और झेलम)

(5) सिन्धु सागर दोअब (सिन्धु, चिनाव और झेलम)

       सिन्धु की सहायक नदियाँ जब शिवालिक पर्वत को पार करती है तो उसे कई जगह अपरदन कर काट डालती है। इस कटे हुए भूभाग को स्थानीय लोग ‘चो’ कहते हैं। इस मैदान में नदियाँ जब आगे की ओर बहती हैं तो अपने किनारे को काटकर ‘ब्लफ’ का निर्माण करती है। स्थानीय लोग ब्लफ को ‘धाया’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदान का ढाल मूलत: उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। इस तरह स्पष्ट है कि सिन्धु सतलज का मैदान की एक अलग पहचान है। इसकी पहचान का दूसरा कारण उर्वर भूमि पर बड़े पैमाने पर कृषि कार्य किया जाना है। इस मैदान को ‘अन्न  के भण्डार’ नाम से सम्बोधित करते हैं।

(B) थार मरुस्थल

         यह भारत के उत्तर के मैदान का ही एक भाग है। थार मरुस्थल का विस्तार भारत और पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसकी लम्बाई 640 km और चौड़ाई 160 km है। अरावली पर्वत के दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर की ओर स्थित होने के कारण यह प्रदेश शुष्क क्षेत्र में बदल चुका है। इस क्षेत्र में सरस्वती नदी कभी मुख नदी के रूप में प्रवाहित होती थी। लेकिन, अब मरुस्थलीय वातावरण के कारण यह विलुप्त हो चुकी है। इस क्षेत्र का ढाल दक्षिण-पक्षिम की ओर है।

         थार मरुस्थलीय क्षेत्र मिसोजोइक कल्प तक अरब सागर में डूबा हुआ था। होलोसीन कल्प के प्रारंभ में हुए भूसंचलन के कारण अरब सागर का उत्तरी भाग ऊपर की ओर उठ गया और दक्षिण वाला भाग धँस गया जिसके कारण उत्तर का जल दक्षिण की ओर प्रवाहित हो जाने से समुद्री भूखण्ड ऊपर की ओर आ गये। आज भी इस क्षेत्र में खारे पानी की कई झीलों का प्रमाण मिलता है। जैसे- साँभर झील, डीडवाना झील, पिछौला झील (उदयपुर)।

         शुष्क प्रदेश के कारण चट्टानों के ऋतुक्षरण से बालू का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है। इस क्षेत्र में बरखान, गारा, बालुका स्तूप जैसे कई मरुस्थलीय स्थलाकृति मिलते हैं। छोटी-2 नदियों के द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से निर्मित मैदान को स्थानीय लोग ‘रोही’ के नाम से सम्बोधित करते हैं।

(C) ब्रह्मपुत्र का मैदान

          इसका विस्तार भारत के उत्तरी-पूर्वी भाग में हुआ है। इसका विस्तार उत्तर में हिमालय, दक्षिण में गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी, पूरब में पटकोईबुम की पहाड़ी तथा पश्चिम में तिस्ता नदी के मध्य हुआ है।

          यह मैदान असम के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। यह मैदान मूलत: ब्रह्मपुत्र और उसके सहायक नदी जैसे दिहांग, बराक, धनश्री, सुवर्णश्री और तिस्ता नदी के द्वारा लायी मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान मूलत: रैम्प घाटी में अवस्थित है। इसका निर्माण कार्य आज भी चल रहा है। भारत का आज भी यह बाढ़ प्रभावित इलाका है। इसका ढाल पूरब से पश्चिम की ओर है। बंगलादेश में इसकी ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 50m से 200m हो जाती है।

         कम ऊँचाई होने के कारण जगह-2 दलदली भूमि का विकास हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी अपने मार्ग में विश्व की सबसे बड़ी नदी द्वीप माजुली का निर्माण करती है।

(D) गंगा-यमुना का मैदान

             गंगा-यमुना के मैदान का विस्तार भारत के उत्तरी भाग में हुआ है। इसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल, पूरब में राजमहल की पहाड़ी और पश्चिम में अरावली की पहाड़ी है। इस मैदान में गंगा नदी रीढ़ की हड्‌डी के समान प्रवाहित होती है। हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियाँ गंगा नदी में ही आकर मिलती है। इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। यह समुद्रतल से 0-300m ऊँचा है। गंगा नदी इस मैदान को दो भागों में बाँट डालती है।- प्रथम उत्तरी गंगा का मैदान और द्वितीय दक्षिणी गंगा का मैदान।

           उत्तरी गंगा के मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है जबकि दक्षिणी गंगा के मैदान का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है। उत्तरी गंगा का मैदान स्थानीय आधार पर कई उपविभागों में विभक्त है। जैसे:-

(1) रोहिलखण्ड का मैदान,

(2) अवध का मैदान,

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान,

(4) मिथलांचल का मैदान

         इसी तरह दक्षिणी गंगा के मैदान भी स्थानीय आधार पर निम्न भागों में विभक्त हैं:-

(1) बुंदेलखण्ड का मैदान

(2) इलाहाबाद का मैदान

(3) भोजपुर का मैदान

(4) मगध का मैदान

(5 ) अंग का मैदान

गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति

         गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रकट किये गये हैं। जैसे:-

(1) ओल्डहम:- “संरचनात्मक दृष्टिकोण से यह मैदान हिमालय के आगे का गर्त (Fore Deep) है, जिसमें नदियों के द्वारा लाये गये अवसाद का औसतन 500m गहरा निक्षेपण से बना है।”

(2) एडवर्ड स्वेस:- “हिमालय निर्माण के समय यहाँ पर एक गर्त था जिसे भूसन्नति (Geo-syncline) कहा जाता था। इसी भूसन्नति में हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत की नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से इस मैदान का निर्माण हुआ है।”

(3) बुरार्ड:- “इसका निर्माण हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के बीच में स्थित रिफ्ट घाटी में नदियों के द्वारा लायी मलवा के विक्षेपण से हुआ है। इन मैदान के निर्माण पर प्लीस्टोसीन काल हुए भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। आज भी हिमालय से निकलने वाली नदियाँ मलवा का निक्षेपण कर रही हैं जिससे इसका निर्माण कार्य जारी है।” यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

        संरचनात्मक दृष्टिकोण से गंगा-यमुना के मैदान को चार भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे-

(1) भावर प्रदेश

           भावर का विस्तार शिवालिक पर्वत के दक्षिण में हुआ है। यह पश्चिम में पोटवार के पठार से लेकर पूरब में तिस्ता नदी तक विस्तृत है। इसकी चौड़ाई 8 से 16km है। इसकी औसत ऊँचाई समुद्रतल से 150-250m है।

भावर की उत्पत्ति

         इसका निर्माण हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गई बोल्डर क्ले के निक्षेपण से हुआ है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

भावर की विशेषता

(1) यह बोल्डर क्ले नामक कंकड़-पत्थर से निर्मित है।

(2) इसका निर्माण शिवालिक पर्वत के पदस्थली में हुआ है क्योंकि मंद ढाल के कारण बड़े-2 और मोटे चट्टानों का निक्षेपण सबसे पहले होता है।

(3) हिमालय से निकलने वाली नदियाँ इस क्षेत्र में आकर विलुप्त हो जाती है जिससे खण्डित नदी प्रवाह का विकास होता है।

(4) कहीं -2 जल जमाव वाले क्षेत्रों में द‌लदली भूमि का विकास हुआ है।

(5) भावर क्षेत्र में कई जलोढ़ पंख और जलोढ़ शंकु का भी प्रमाण मिलता है।

(6) भावर प्रदेश पर्वत और मैदान के बीच संक्रमण पेटी का क्षेत्र है।

(2) तराई प्रदेश

         भाँवर के दक्षिण में तराई प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण नमी युक्त चिपचिपी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 150-200m और चौड़ाई 15-30Km है। यह अत्याधिक नमीयुक्त वाला क्षेत्र है। जहाँ पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है। यह घने जंगलों से ढका हुआ है। कहीं-2 दलदली भूमि का भी विकास हुआ है। भावर क्षेत्र में जो नदियाँ विलुप्त हो गयी थी वे इस प्रदेश (तराई प्रदेश) में दिखाई देने लगती है।

          उष्णार्द्र वातावरण के कारण तराई क्षेत्र मलेरिया के लिए प्रसिद्ध है। इसी प्रदेश में थारू जनजाति के लोग सदियों से निवास करते आ रहे हैं। लेकिन, भारत विभाजन के बाद तराई प्रदेश में सिखों के बसाए जाने के कारण थारूओं की भूमि को हड़प लिया है। तराई प्रदेश में ही मुजफ्फरपुर से मुजफ्फर नगर तक विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(3) बाँगर प्रदेश

       इसे पुरानी जलोढ़ मिट्टी के नाम से जानते हैं। यहाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न नहीं होती है। इसकी औसत ऊँचाई 100-15om है। बाँगर का विस्तार ऊपरी गंगा के मैदान और दक्षिणी गंगा के मैदान में हुआ है। मुरादाबाद के पास बागर क्षेत्र में बालू के बड़े-2 टीले मिलते हैं। जिसे भूर कहते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में बांगर के साथ लैटेराइट मिट्टी से युक्त मैदान मिलता है जिसे बारिन्द्र कहते हैं। बांगर प्रदेश भारत में ‘खाद्यान्न फसल पेटी’ के रूप में प्रसिद्ध है।

(4) खादर प्रदेश

         इसे नवीन जलोढ़ मिट्टी कहते हैं। पंजाब के लोग इसे “बेट भूमि” से सम्बोधित करते हैं। इसका निर्माण नदियों के द्वारा लायी गयी महीन और चिकनी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। ये आज भी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र हैं। नदियों के मुहानों पर खादर के निक्षेपण से ही डेल्टा का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है। इसकी संरचनात्मक विशेषताएँ और विस्तार ही इसे विश्व का सबसे बड़ा जलोढ़ का मैदान के रूप में मान्यता दिलवाता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारत के मुख्य भूआकृति विभाग के नाम लिखे। सिंधुगंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान का वर्णन करे।

2. भावर तथा तराई से आप क्या समझते हैं? संक्षिप्त में उनकी विशेषता बताये।

3.  भावर क्या है? शिवालिक की पदस्थली के बराबर इसका विकास क्यों हुआ?

4. भारत का उत्तरी मैदान हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार से नदियों के द्वारा लायी उत्कृष्ट जलोढ़ का उदाहरण है। इस तथ्य की सत्यता की जाँच करें।

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई


भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

               भारत दक्षिण एशिया में अवस्थित एक विशाल देश है जिसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी० है। इसका अक्षांशीय विस्तार भारत के मुख्य भूमि से 8°4’N से 37°6’N के बीच एवं देशांतरीय विस्तार 68°7’E से 97°25’E के मध्य है। भारत एक उत्तरी गोलार्द्ध का देश है जो प्राचीनकाल के गोंडवाना भूखण्ड के ऊपर अवस्थित है। यह एक ऐसा देश है। जिसके दक्षिण में तीन सागर जैसे अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी स्थित हैं। जबकि उत्तरी भाग में हिमालय जैसे विशालकाय पर्वत स्थित है। पुन: भारत एक ऐसा देश है जिसकी संरचनात्मक विशेषता को नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।

भारत के उच्चावच

चित्र: भारत की भूगर्भिक संरचना

              भूगोलवेत्ताओं ने भारत को धरातलीय संरचना एवं उच्चावच के आधार पर मुख्यतः चार भू-आकृतिक इकाईयों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र

(2) उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र

(3) दक्षिण भारत का पठारी क्षेत्र

(4) तटीय मैदानी क्षेत्र एवं द्वीपीय क्षेत्र

चित्र: भारत की भौतिक इकाई

(1) उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र           

         सम्पूर्ण भारत के 10.7% भूभाग पर पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हुआ है। भारत के उत्तर में विशालकाय मोड़दार पर्वतों की कई श्रृंखलाएँ मौजूद है जिसका विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी० पर हुआ है। इसी क्षेत्र में विश्व की कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती है। सुविधा के दृष्टिकोण से उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को तीन भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

1. ट्राँस हिमालय (ट्राँस = उस पार)

2. हिमालय

3. पूर्वांचल हिमालय

1. ट्राँस हिमालय

         मुख्य हिमालय के उत्तर में जितने भी पर्वतीय श्रृंखलाएँ हैं उन्हें ट्राँस हिमालय से संबोधित करते हैं। भारतीय भूभाग पर ट्राँस हिमालय की तीन श्रृंखलाएँ मौजूद हैं:-

(i) काराकोरम श्रेणी

(ii) लद्दाख श्रेणी

(iii) जास्कर श्रेणी।

          उपरोक्त तीन श्रृंखलाओं के अतिरिक्त चीन में स्थित टिएन्सान और क्यूनलून पर्वत और पाकिस्तान में स्थित हिन्दूकुश पर्वत ट्राँस हिमालय के उदाहरण हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ मिलकर कश्मीर के उत्तरी भाग में एक गाँठ का निर्माण करती हैं जिसे पामीर का पठार कहते हैं। इसे ‘दुनिया के छ्त’ से भी सम्बोधित करते है। इसकी ऊँचाई समुद्रतल से 4500 मीटर से अधिक है। भारत में अवस्थित ट्रांस हिमालय श्रृंखलाओं की संक्षिप्त चर्चा नीचे की जा रही है।

(i) काराकोरम श्रेणी 

       सिन्धु नदी के उत्तर में भारत और चीन के सीमा पर स्थित है जो पामीर के पठार से निकलकर उत्तर-पश्चिम से द०- पूरब की ओर विस्तृत है। इसका प्राचीन नाम ‘कृष्णा गिरि’ है। इसकी औसत ऊँचाई 6000 मीटर है। इसकी सबसे ऊँची चोटी K-2 (केल्विन-2 या (गॉडविन ऑस्टिन) है जिसकी ऊँचाई 8611 मीटर है। यह विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। काराकोरम पर्वत की चौड़ाई  80 किमी० है।

            सालों भर बर्फ से ढका रहता है। इस पर्वत पर कई हिमानी मिलते हैं। जैसे:- बटुरा, हिस्पार, स्कामरी, बियाफो, बल्टोरा, सियाचीन हिमानी आदि। काराकोरम पर्वत पर हिमानी के अपरदन से कई दर्रे बने हैं। जैसे- खंजरेब, इन्दिरा कॉल, अगहिल इत्यादि। हिमानी के अपरदन से इसका ढाल सीढ़ीनुमा बन चुका है। यह विशुद्ध रूप से अर्द्ध मरुस्थलीय भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

(ii) लद्दाख श्रेणी

        काराकोरम श्रेणी और जास्कर श्रेणी के बीच स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 5300 मीटर है। हिमानी के अपरदन के कारण यह पठार के रूप में तब्दील हो चुका है। इसका दक्षिणी-पूर्वी भाग चीन में जाकर कैलाश पर्वत के नाम से जाना जाता है। इस श्रृंखला पर प्रसिद्ध पुगा की घाटी मिलती है जो भूतापीय ऊर्जा का विशाल स्रोत है। इस पठार पर सिन्धु की सहायक नदी श्योक नदी बहती है। लद्दाख श्रेणी के उत्तर-पूरब में सोड्डा का मैदान और देप्सांग का मैदान स्थित है।

(iii) जास्कर श्रेणी  

    लद्दाख श्रेणी के दक्षिण में समान्तर रूप से फैला हुआ है। यह पर्वत 76°E देशान्तर रेखा के पास महान हिमालय से निकलती है। इस पर्वत की वहीं विशेषताएँ है जो लद्दाख एवं काराकोरम श्रेणी की है।

चित्र: ट्रांस हिमालय

2. हिमालय

     ‘हिमालय’ दो शब्दों के मिलने से बना है प्रथम- हिम, दूसरा- आलय। हिम का तात्पर्य बर्फ से है जबकि आलय का तात्पर्य घर से है, अर्थात हिमालय एक ऐसा नवीन मोड़दार पर्वत है जहाँ लाखों वर्षों से हिम स्थायी रूप से निवास करता है। वस्तुतः यह पर्वत भारत के उत्तरी भाग में एक चाप के समान है जिसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से लेकर ब्रह्मपुत्र गॉर्ज तक है। इसकी कुल लम्बाई 2500Km. है जबकि इसकी चौड़ाई अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग है। जैसे अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौ० 150 km. है जबकि जम्मू कश्मीर में इसकी चौड़ाई 450 Km. है।

          हिमालय पर्वत में तीन प्रमुख श्रृंखलाएँ हैं जो महान हिमालय, लघु हिमालय, तथा शिवालिक हिमालय के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी उत्पत्ति की व्याख्या हेतु कई सिद्धांत प्रस्तुत किये गये है उनमें सबसे वैज्ञानिक सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत है।

हिमालय की उत्पत्ति

     ‘प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत’ के अनुसार हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत है। आज जहाँ पर हिमालय अवस्थित है वहाँ पर प्लीस्टोसीन कल्प तक एक विशाल सागर अवस्थित था जो टेथिस सागर के नाम से प्रसिद्ध था। टेथिस सागर के उत्तर में अंगारालैण्ड और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड था। अंगारालैण्ड एक स्थिर भूखण्ड था क्योंकि उसके नीचे संवहन तरंग नहीं चल रही थी। जबकि गोंडवानालैण्ड एक ऐसा भूखण्ड था जिसके नीचे संवहन तरंग चल रही थी। इन संवहन तरंग के कारण ही गोंडवानालैण्ड का खिसकाव उत्तर-पूर्व एवं उत्तर दिशा में हो रही थी।

          टेथिस सागर का निर्माण कार्बोनीफेरस कल्प में एक महान भूसंचलन के कारण हुआ था। यह सागर एक भूसन्नति गर्त के समान है। इस भूसन्नति में लाखों वर्षों तक अंगारालैण्ड और गोंडवाना लैण्ड के ऊपर बहने वाली नदियों के द्वारा मालवा का निक्षेपण होता रहा। जब भूसन्नति में अत्याधिक मलवा का जमाव हो गया तो गोंडवाना लैण्ड में उत्तर की ओर खिसकने की प्रवृति प्रारंभ हो गयी।

        चूँकि गोंडवाना लैण्ड की उत्तरी सीमा पर विन्ध्याचल पर्वत स्थित था। जब गोंडवाना लैंड उत्तर की ओर खिसका तो गोंडवाना का अग्र भाग बुलडोजर का काम करने लगा। जिसके परिणामरूवरूप टेथिस सागर में जमे मलबा या अवसाद में वलन की क्रिया प्रारंभ हो गयी जिसके कारण टेथिस सागर के मलवो में वलन एवं उत्थान की क्रिया से हिमालय जैसे विशाल पर्वत का निर्माण हुआ।

चित्र: हिमालय पर्वत की उत्पत्ति

         हिमालय पर्वत को तृतीयक काल का पर्वत भी कहा जाता है क्योंकि इसका निर्माण का कार्य तृतीयक काल में ही सम्पन्न हुआ था। इस काल में महान भू-संचलन की किया सम्पन्न हुई थी जिसे अल्पाइन भू-संचलन के नाम से जानते है। हिमालय पर्वत का निर्माण भी अल्पाइन भूसंचलन से हुआ, इसीलिए हिमालय को अल्पाइन पर्वत के नाम से जानते हैं।

हिमालय पर्वत का विकास 

        अल्पाइन भू-संचलन के फलस्वरूप टेथिस सागर के अवसादों में वलन के फलस्वरूप अचानक हिमालय का निर्माण नहीं हुआ बल्कि इसके विकास में करोड़ों वर्ष का समय लगा है। हिमालय का विकास आज भी जारी है क्योंकि आज भी गोंडवाना लैण्ड के द्वारा हिमालय के भूगर्भ में दबाव लगाये जाने के कारण प्रतिवर्ष 4 से 5 सेमी० हिमालय का उत्थान हो रहा है।

      भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, हिमालय में स्थित दोनों श्रृंखलाओं का विकास अलग-2 अवस्था (समय) में हुआ है। दूसरे शब्दों में हिमालय पर्वत के निर्माण तीन अवस्थाओं में हुआ है।

        प्रथम अवस्था में महान हिमालय का निर्माण हुआ है। महान हिमालय के निर्माण का कल्प मुख्यतः ओलिगोसीन निर्धारित किया गया है क्योंकि उसके भूगर्भ से भी ओलीगोसिन के अवसादों का प्रमाण मिलता है।

       द्वितीय अवस्था लघु हिमालय का निर्माण मयोसीन कल्प में माना जाता है लेकिन कुछ क्षेत्रों का निर्माण प्लायोसीन कल्प तक जारी रहा।

     तीसरी अवस्था में शिवालिक पर्वत का निर्माण कार्य प्लायोसीन में प्रारंभ हुआ और प्लीस्टोसीन में उसका निर्माण कार्य पूरा हुआ।

       शिवालिक पर्वत के बारे में कहा जाता है कि जब महान हिमालय और लघु हिमालय का निर्माण हो गया तो उसके बाद लघु हिमालय के दक्षिणी भाग में टेथिस सागर का अवशिष्ट भाग बचा रहा गया जो शिवालिक नदी या इण्डो ब्रह्मा नदी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस नदी में महान हिमालय और लघु हिमालय के द्वारा लाई गई मलवा का निक्षेपण लाखों वर्षों तक होता रहा। पुन: गोंडवाना लैंड के उत्तर की ओर खिसकने से या मलवा पर दबाव पड़ने से शिवालिक पर्वत का विकास हुआ।

हिमालय की संरचना

         संरचनात्मक दृष्टिकोण से हिमालय को तीन श्रृंखला में बाँटते हैं-

(1) महान हिमालय

(2) लघु/मध्य हिमालय

(3) शिवालिक हिमालय

         महान हिमालय पूर्व से पश्चिम की ओर एक लगातार श्रृंखला के रूप में है। कहीं-2 पूर्ववर्ती नदी (जैसे- सिन्धु, सतलज, कोशी, ब्रह्मपुत्र) के कारण दर्रों का विकास हुआ है। दूसरी ओर लघु हिमालय में महान हिमालय की तुलना में अधिक विखण्डन देखा जा सकता है। पुनः शिवालिक हिमालय एक ऐसा पर्वत है जो पूर्ण रूप से विखण्डित हो चुकी है। पुनः इसका विस्तार पश्चिम में पोटवार के पठार से लेकर पूरब में अरुणाचल प्रदेश तक हुआ है। प्रत्येक हिमालय के श्रृंखलाओं की संरचना की चर्चा नीचे के शीर्षक में की जा रही है:-

(1) महान हिमालय/हिमाद्री-

         इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से नामचा बरबा गॉर्ज तक हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 6000m है। इसका आकार एक चाप के समान है। सालोंभर इसकी चोटियाँ बर्फ से ढकी रहती है। गंगोत्री, यमुनोत्री जैसी कई हिमानी पायी जाती है। इसका उत्तरी ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है।

         महान हिमालय पर विश्व की कई ऊँची-ऊँची चोटियाँ पायी जाती है। जैसे- माउंट एवरेस्ट (8850m) विश्व की सबसे ऊँची चोटी है। कंचनजंघा (8598m) हिमालय की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। इसके अलावे नंगा पर्वत, कामेट, केदारनाथ (6945m), धौलागिरी, गौरीशंकर, गोसाईथान इत्यादि भी ऐसी चोटियाँ है जिसकी ऊँचाई 6000m से भी अधिक है।

महान हिमालय की प्रमुख चोटियाँ:

(i) एवरेस्ट (8850m)

(ii) कंचनजंघा (8598m)

(iii) मकालू  (8481m)

(iv) चोयू (8201m)

(v) धौलागिरी (8172m)

(vi) मंसालू (8156m)

(vii) नंगा पर्वत (8126 m)

(viii) अन्नपूर्णा (8078m)

(ix) नंदादेवी (7817m)

(x) नामचाबरबा (7756m) 

(xi) कामेत (7756m) 

(xii) गौरीशंकर (7145m)

(xiii) बद्रीनाथ (7138m)

(xiv) एपी (7132m)

(xv) नीलकंठ (7073m) 

       हिमालय पर्वत को कई नदियों एवं हिमानियों ने काटकर कई दर्रों एवं कॉल का निर्माण किया है। उतराखंड में अवस्थित माना और नीति दो प्रसिद्ध कॉल के उदाहरण है। जबकि कश्मीर का जोजीला और बुर्जिला, हिमाचल प्रदेश का शिपकीला, उत्तराखण्ड का पिथौरागढ़, थागला और लिपुलेख, अरुणाचल प्रदेश का बोमडिला, सिक्किम का जेलेप्ला और नाथुला प्रमुख दर्रों के उदाहरण है।

        महान हिमालय अवसादी और कांग्लोमरेट चट्टानों से निर्मित है। जिसके कारण नदियों द्वारा अपरदन का कार्य तेजी से किया जा रहा है जिससे कई गौण स्थलाकृतियों का विकास हो रहा है। महान हिमालय की संरचना में कई क्षेत्रीय विषमताएँ भी देखी जा सकती है। जैसे कश्मीर में स्थित महान हिमालय की ऊँचाई कम है जबकि पूर्वी एवं मध्यवर्ती भाग में इसकी अधिक ऊँचाई है। पुन: उत्तरांचल में अत्याधिक दबाव बल के कारण अतिवलन और नेपी का प्रमाण मिलता है।

(2) लघु / मध्य हिमालय / हिमाचल हिमालय

          इसे हिमाचल / लघु हिमालय के नाम से जानते हैं। इसे कश्मीर में पीरपंजाल, हिमाचल प्रदेश में धौलाधर, नेपाल में “महाभारत श्रेणी”, अरुणाचल प्रदेश में “मिश्मी और डाफला” के नाम से जानते हैं। इस पर्वत का भी उतरी  ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है। यह पर्वत अवसादी और कांग्लोमरेट चट्टानों के अलावे रूपान्तरित चट्टानों से निर्मित है। रूपान्तरित चट्टानों का निर्माण अत्याधिक दबाव एवं ताप के कारण हुआ है।

       मध्य हिमालय की औसत ऊँचाई 4500m है। इसमें कई अनुप्रस्थ घाटियों का विकास हुआ है। जैसे- कुल्लू-मनाली की घाटी इसका प्रसिद्ध उदा० है। इस पर्वत पर मसूरी, नैनीताल, दार्जीलिंग, शिमला जैसे कई पर्यटक नगर अवस्थित है।

       महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में लगभग 200Km की दूरी है। कश्मीर में इन दोनों श्रृंखलाओं के बीच में जो स्थिर जल बच गया था वह करेवा झील के नाम से प्रसिद्ध था। डल एवं वुलर झील इसी महान झील का अवशिष्ट भाग है, करेवा झील में मलवा के निक्षेपण से ही कश्मीर घाटी का विकास हुआ है।

    महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में एक विशाल दरार या भ्रांश घाटी स्थित है जिसे Main Central Thrust कहते है।

(3) शिवालिक पर्वत/ उप हिमालय

       शिवालिक पर्वत की औसत ऊँचाई 600 मी० है। इसका विस्तार पूरब में कोशी नदी से पश्चिम में पाकिस्तान के पोटवार पठार तक हुआ है। यह पूर्णत विखंडित श्रृंखला है। कहीं-2 पर इसकी ऊँचाई पर्वतीय मान्यता से भी कम है। शिवालिक पर्वत अवसादी और काँग्लोमरेट चट्टानों से निर्मित है।

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय क्षेत्र अपनी विशिष्ट संरचनात्मक विशेषता के कारण एक विशिष्ट भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

3. पूर्वांचल हिमालय

        पूर्वांचल हिमालय का विस्तार नामचाबरबा गॉर्ज से लेकर वर्मा के अराकान योमा पहाड़ी तक हुआ है। अराकानयोमा पहाड़ी के दक्षिण में अवस्थित द्वीपीय क्षेत्र (अंडमान निकोबार द्वीप समूह) पूर्वांचल हिमालय का ही अवशिष्ट भाग के रूप में है। पूर्वांचल हिमालय का विस्तार भारत के अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर एवं मिजोरम राज्य में हुआ है। यह मूलत: उ०-पूर्वी भारत और म्यानमार के बीच में सीमा का निर्माण करती है। वर्मा में इसी पर्वत को ‘अराकान योमा’ के नाम से जानते हैं।

पूर्वांचल हिमालय की उत्पत्ति

          पूर्वांचल हिमालय का निर्माण संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे हुआ है। पूर्वांचल हिमालय का विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर हुआ है। भूगर्भिक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि गोंडवाना प्लेट तथा अंगारा प्लेट की संरक्षी सीमा इसी पर्वत के सहारे विकसित हुआ है। इन दो प्लेटों के रगड़ के कारण कुछ चट्टानें धरातल से ऊपर उठ गयी जिनसे पूर्वांचल हिमालय का निर्माण हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 2000 से 3000 मी० है। इसकी उत्पत्ति की क्रिया नीचे के चित्र में भी देखा जा सकता है।

पूर्वांचल हिमालय की स्थलाकृतिक विशेषता

          नागचा बरबा के पास हिमालय अचानक दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। नामचा बरबा के पास हिमालय और पूर्वांचल हिमालय मुड़कर Syntaxis मोड़ का निर्माण करती है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर पूर्वांचल हिमालय में पर्वतों का निम्नलिखित क्रम पायी जाती है। अरुणाचल प्रदेश में पटकोईबुम, नागालैण्ड में नागा की पहाड़ी, मणिपुर में मणिपुर पहाड़ी, मिजोरम में मिजों की पहाड़ी या लुशाई की पहाड़ी, त्रिपुरा में अगरतल्ला की पहाड़ी कहलाता है।

         पुन: मेघालय में  जयंतिया की पहाड़ी और मणिपुर की पहाड़ी एक छोटी-सी पहाड़ी से जुड़ जाती है जिसे बैरल की पहाड़ी कहते हैं। पूर्वांचल हिमालय का एक छोटा-सा भाग बंगलादेश में भी है जिसे चटगाँव की पहाड़ी कहते हैं। पूर्वांचल हिमालय का विस्तृत भाग ही म्यांमार में जाकर अराकानयोमा की पहाड़ी कहलाती है। पूर्वांचल हिमालय की सबसे ऊँची चोटी का‌ पटकोईबुम (3826 मी०) है जो नागा की पहाड़ी पर स्थित है। मिजो पहाड़ी की सबासे ऊँची चोटी ‘द ब्लू माऊण्टेन’ (2157 मी०) हैं। 

चित्र: पूर्वांचल हिमालय की पहाड़ियाँ

        पूर्वांचल हिमालय में कई छोटी-छोटी दर्रे भी पाये जाते हैं जैसे दिफू, कुमजावती, हफूंगान, चौकन और पांगशू। पूर्वांचल हिमालय में कई अनुवर्ती घाटियों का विकास हुआ है जिसमें बराक की घाटी, कोहिमा की घाटी सबसे प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. हिमालय के विकास एवं संरचना की विवेचना करें। अथवा हिमालय की उत्पत्ति की व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के माध्यम से करें।

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व


प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व       

          भारत में प्राचीनतम कल्प से लेकर नवीनतम कल्प की चट्टानें पायी जाती हैं। प्राचीनतम कल्प में एक प्रमुख चट्टान धारवाड़ समूह की है। इसका निर्माण 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 1500 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच मानी जाती है। यह मूलत: प्री कैम्ब्रीयन  कल्प की चट्टान है जिसका खोज सर्वप्रथम राबर्ट ब्रशफुट महोदय ने कर्नाटक के धारवाड़ जिला से किया था।

धारवाड़ क्रम के चट्टानों की विशेषताएँ

      धारवाड़ चट्टान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं। जैसे- 

(1) यह भारत का सबसे प्राचीनतम परतदार चट्टान का उदाहरण है।

(2) लम्बे समय के कारण इसका काफी रूपान्तरण हो चूका है।

(3) धारवाड़ क्रम  के चट्टानों से किसी भी प्रकार का जीवाश्म नहीं मिलता है क्योंकि उस वक्त पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति हुई ही नहीं थी।

(4) धारवाड़ समूह की चट्टानों में नीस और शिस्ट प्रकार की चट्टानें मिलती हैं।

(5) प्री कैम्ब्रीयन कल्प में भूपटल के फैलाव और सिकुड़न से कई महासागरों और प्राचीन मोड़दार पर्वतों का निर्माण हुआ है। राजस्थान की अरावली की पहाड़ी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

(6) भारत में इसका विस्तार 15600 वर्ग किमी० क्षेत्र में हुआ है।

(7) भारत में धारवाड़ प्रकार की चट्टान कर्नाटक के धारवाड़ जिला, विशाखापत्तनम के पास कूदोराइट श्रेणी की चट्टान, रीवा & हजारीबाग के बीच में गोंडाइट क्रम की चट्टान, जम्मू-कश्मीर की सेलखाला क्रम की चट्टान, राजस्थान के अरावली क्षेत्र में, झारखण्ड और उड़ीसा के सीमा पर लौहक्रम की चट्टान, धारवाड़ समूह के चट्टान माने जाते हैं।

प्राचीनतम कल्पआर्थिक महत्व

         धारवाड़ क्रम की चट्टानें भारत में धात्विक खनिजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस चट्टान से लोहा, सोना, मैगनीज, यूरेनियम, ताम्बा, जिंक, क्रोमियम जैसे- धात्विक खनिज प्राप्त किये जाते हैं। राजस्थान की खेतरी का खान ताम्बा के लिए प्रसिद्ध रही है।

         कर्नाटक, गोआ, झारखण्ड, उड़ीसा इत्यादि से हेमाटाइट और मैग्नेटाइट जैसे लौह अयस्क प्राप्त किये जाते है।मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा, बाला घाट, उड़ीसा के कालाहांडी और बोलांगिर क्षेत्र से मैंग्नीज प्राप्त किया जाता है।

        धारवाड़ क्रम की चट्टानों से एस्बेस्ट, कोबाल्ट, अभ्रक, प्लेटीनम, सूरमा, सीसा, फ्यूराइट, इल्मेनाइट (नाभिकीय खनिज का स्रोत), गारनेट, संगमरमर, कोरंडम जैसे खनिज भी प्राप्त किये जाते हैं। 

    धारवाड़ क्रम चट्टानें भारत में लाल और लैटेराइट मिट्टी के निर्माण में भी सहायक रहा है जो विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों के लिए आधार का कार्य करती है।

निष्कर्ष

       इस ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि धावाड़ क्रम की चट्टानें अपनी विशिष्टता एवं आर्थिक महत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध रही हैं।

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व


भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

         भारत में विभिन्न भूगर्भिक काल में निर्मित अनेक प्रकार की चट्टानें पायी जाती हैं। इसका संबंध पैलियोजोइक महाकल्प के कार्बोनीफेरस कल्प से लेकर मीसोजोइक कल्प के मध्य रहा है।

भारत में गोण्डवाना क्रम की चट्टानें

        ‘गोंडवाना’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1872 ई० में एच०बी० मेडलीकॉट और 2876 ई० में ओ० फीस्टमेंटल महोदय ने किया था। इस शब्द की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के गोंड क्षेत्र से हुआ है क्योंकि सबसे पहले गोण्ड जनजातियों के निवास क्षेत्र से ही गोंडवानाक्रम की चट्टानों की खोज की गई थी। बाद में इस प्रकार की चट्टानें जहाँ कहीं भी प्राप्त हुआ उसे गोडवाना क्रम के चट्टानों से सम्बोधित किया।

         वस्तुत: विन्ध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण हो जाने के बाद प्रायद्वीपीय भारत का भूखण्ड लम्बे समय तक भूगर्भिक हलचल/भूकंप से मुक रहा है। लेकिन, कार्बोनीफेरस के पूर्वार्द्ध में भयंकर भूसंचलन हुआ जिसे हर्सीनियन भू-संचलन के नाम से जानते हैं।

      हर्सीनियन भू-संचलन भूसंचलन का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण पृथ्वी पर पड़ा। इस समय जल और स्थल के वितरण में भारी परिवर्तन हुआ। +जैसे: पेन्जिया रूपी विशालकाय भूखण्ड के मध्यवर्ती भाग में धंसान की क्रिया से एक विशाल टेथिस सागर का निर्माण हुआ। इसका विस्तार पश्चिम में भूमध्यसागर से लेकर पूरब में प्रशान्त महासागर तक था। टेथिस सागर के उतरी भाग अंगारालैण्ड कहलाया जबकि दक्षिणी भाग गोण्डवानालैण्ड कहलाया।

भारत में गोण्डवानाक्रम

         कार्बोनीफेरस कल्प में ही पृथ्वी पर कुछ क्षेत्रों में हिमयुग का आगमन हुआ था। पर्वतीय क्षेत्रों / पर्वतों के ऊँचाई वाले भाग में हिम के जमने और हिमस्खलन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों का अपरदन होने लगा। अपरदित सामाग्री गोंडवाना भूखण्ड के विभिन्न नदी घाटियों और गर्तों में जमा कर दिये जाने से उपजाऊ समतल मैदान का विकास हुआ है। उस वक्त मानवीय उद्भव नहीं होने के कारण सभी मैदानी क्षेत्र सघन वनस्पतियों से ढक गये। इन वनस्पतियों में ग्लोसोप्टेरिस और टीलोफाइलम समूह की वनस्पत्ति अधिक थी। भूसंचलन के कारण ये वनस्पति गिरकर यत्र-तत्र जमने लगे।

         पुन: अत्याधिक ताप एवं दाब के कारण ये वनस्पति कोयले में रूपान्तरित हो गये। जगह-2 पर आज भी इन वनस्पतियों के परतों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। चूँकि कार्बोनीफेरस कल्प में इन वनस्पतियों का विकास एवं भूमि के अन्दर दबने की क्रिया नदी घाटी क्षेत्रों में हुआ था। इसीलिए आज भी कोयला की पेटियाँ नदी घाटी क्षेत्रों में मिलती है।

वितरण

      भारत में गोंडवनाक्रम की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपीय भारत के बाहरी क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जैसे-

झारखण्ड- दामोदर नदी घाटी, उत्तरी कोल क्षेत्र, डाल्टेनगंज क्षेत्र।

बिहार- ललमटिया ये लेकर राजमहल की पहाड़ी तक।

उड़ीसा- महानदी घाटी क्षेत्र में।

आन्ध्रप्रदेश- गोदावरी एवं उनके सहायक नदी घाटी क्षेत्र में।

छतीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश- सोन नदी घाटी क्षेत्र।

महाराष्ट्र- वर्दा नदी घाटी क्षेत्र।

पश्चिम बंगाल- दामोदर और बराकर नदी घाटी क्षेत्र में।

         उपरोक्त क्षेत्रों के अलावे कश्मीर, असम, सिक्कीम और दार्जलिंग में भी गोंडवाना प्रकार की चट्टानें पायी जाती है।

भारत में गोण्डवानाक्रम

चित्र: गोंडवाना समूह की चट्टानों का वितरण

आर्थिक महत्व

(1) भारत का 96% एन्थ्रासाइट और बिटुमिनस कोपला गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलता है। थोड़ा-बहुत लिग्नाइट कोयला इस समूह की चट्टान से प्राप्त होता है।

(2) गोंडवानाक्रम की चट्टानों से बलुआ पत्थर मिलता है जिसका उपयोग भवन निर्माण में किया जाता है।

(3) कोयले की खानों ने चिका मिट्टी और फायर क्ले प्राप्त किये जाते हैं जिसका प्रयोग ईट और बर्तन के निर्माण में किया जाता है।

(4) गोंडवानाक्रम की चट्टानें, सीमेन्ट और रासायनिक उर्वरक के निर्माण में काफी उपयोगी माने जाते हैं।

(5) गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलने वाला कंक्रीट का प्रयोग, नाभिकीय भट्टी के निर्माण में किया जाता है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मिलने वाला गोडवानाक्रम की चट्टान से कोयला जैसे ऊर्जा संसाधन के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिसकी महत्ता अपने आप में सर्वविदित है।

प्रश्न प्रारूप

Q. भात में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधा, वितरण एवं आर्थिक महत्व की विवेचना कीजिए।

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